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जुगल और किशोर, प्रीति अहलावत को लेकर फार्म हाउस पहुँच चुके थे।
इस समय प्रीति एक ऑफिसनुमा कमरे में बैठी थी। उसके दाँये बाएँ जुगल और किशोर बैठे थे। प्रीति की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। लेकिन उसने शॉक की स्थिति गुज़र जाने पर जब पुनः सारी बातों पर गौर किया, तो उसे मामला कुछ अलग लगा। कम से कम जो दिख रहा था, वह तो नहीं था। उसे अब लगने लगा था कि उसे सुनियोजित ढंग से फँसाया गया था। पर क्यों ? इस क्यों का जवाब उसके पास नहीं था। जो दो अफ़सर उसे यहाँ लाए थे, जो एयरपोर्ट पर सतर्कता और जाँबाज़ी की प्रतिमूर्ति लग रहे थे, अब अचानक ही मूर्ख लगने लगे थे। कहो कुछ, सुनते कुछ थे, और करते कुछ थे।
“कब तक आएँगे आपके अफ़सर ?”–उसने तीसरी बार ये सवाल दोहराया।
“तीन आदमी कभी सुखी नहीं रह सकते।”–जुगल दार्शनिक अंदाज़ में बोला।
“कौन ?”–प्रीति बोली।
“शरणवीर, रामपाल और विशंबर।”–जुगल बोला।
“अब ये कौन हैं ?”
“ये तीनों मेरी बुआ के लड़के हैं। तीनों की पत्नी इतनी खूँखार और लड़ाका हैं कि ये तीनों मासूम कभी सुखी नहीं रह सकते।”–जुगल उदास स्वर में बोला।
“लेकिन इससे मेरा क्या मतलब ?”–प्रीति का दिमाग़ ख़राब हो गया।
“कोई मतलब नहीं। कतई कोई मतलब नहीं। आपने पूछा, तो मैंने बता दिया। वरना मेरा सिद्धांत है कि मैं अपना ग़म कभी किसी को नहीं बताता।”–जुगल की आँखें भर आईं।
“मैंने कब पूछा ? और मैं क्यों पूछूँगी ?”
“बाज लोगों को होता है शौक़, दूसरों के ग़मों का मज़ा लेने का।”–जुगल की आँख से एक आँसू टपका।
“चुप हो जा भाई। ये दुनिया ऐसी ही है। ग़म के मारों का यहाँ मजाक ही उड़ाया जाता है।”–किशोर उठ कर उसकी पीठ थपथपाता हुआ हमदर्दी भरे स्वर में बोला।
“मुझे आप लोगों का ही समझ नहीं आ रहा। अरे मैं पूछ रही हूँ कि आपके अफ़सर कब तक आयेंगे ?”
“आपकी उम्र कितनी है ?”–किशोर ने पूछा।
“फोर्टी थ्री। क्यों ?”
“लेकिन आपके पासपोर्ट के हिसाब से तो फिफ्टी फोर है
।” “हाँ...वह…दरअसल ऐसा है कि…पर मेरी एज से क्या लेना देना ?”
“ग्यारह साल !...पूरे ग्यारह साल ! कौन देगा इनका हिसाब, मैडम जी? ग्यारह साल कम नहीं होते।”–किशोर उसे घूरता हुआ बोला।
“कौन से ग्यारह साल ?”
“फिफ्टी फोर साल आप कन्ज्यूम कर चुकी हैं अपनी एज के और फोर्टी थ्री बता रही हैं। तो ये जो ग्यारह साल का अंतर है इसकी अदायगी कौन करेगा ?
“आप क्या पागल हो ?”–प्रीति चिल्लाई।
“आपको ग्यारह साल कुछ नहीं लग रहे ? और अगर आपको ग्यारह साल हम जेल में डाल दें तो पता चलेगा। क्योंकि आपके हिसाब से तो ग्यारह साल कुछ होते ही नहीं।”
“आप कहाँ की बात कहाँ ले जा रहे हो। अरे हर औरत अपनी उम्र थोड़ी बहुत कम बताती ही है।”–प्रीति के सिर में दर्द होने लगा था।
“आप हर औरत के ख़िलाफ़ कोर्ट में गवाही दे सकती हो ?”–किशोर ने गंभीरता से पूछा।
“मैं अब हर औरत के ख़िलाफ़ गवाही कैसे दे सकती हूँ ? मैं क्या हर औरत को जानती हूँ।”–प्रीति सिर पकड़ती हुई बोली।
“यानी बिना जाने ही आरोप लगा दिया। आप क्या हमारे रायता मास्टर की बहन हो ?”
“कौन रायता मास्टर ?”–प्रीति असमंजस भरे स्वर में बोली।
“मैडम जी, पहले तो ये बताओ कि रायता मास्टर में आपकी दिलचस्पी क्या है ?”–जुगल ने पूछा।
“मेरी भला क्या दिलचस्पी होगी ?”–वह जुगल की तरफ़ घूम कर बोली।
“तो जब दिलचस्पी है ही नहीं, तो उनके बारे में पूछ क्यों रही हो ?”
“मैं कहाँ पूछ रही हूँ ? कब पूछा मैंने ?”–वह दयनीय स्वर में बोली।
“अभी आपने पूछा नहीं कि कौन रायता मास्टर ?”–जुगल तेज स्वर में बोला।
अभी प्रीति कोई जवाब देती, कि दरवाज़ा खुला और अमित और आरिफ ने अंदर कदम रखा। उनके पीछे राज और डॉली भी थे। आरिफ को देखते ही दोनों खड़े हो गए। उन्हें खड़ा होता देख प्रीति भी खड़ी हो गई।
“कितनी देर हो गई आये हुए ?”–आरिफ ने पूछा।
“आधा घंटा हुआ है सर।”–दोनों समवेत स्वर में बोले।
“बैठ जाइए।”–आरिफ एक कुर्सी पर बैठता हुआ प्रीति से बोला। सहमी सकुचाई सी प्रीति बैठ गई। आरिफ ने वहीं मेज पर पानी का ढका रखा गिलास उठाया और जेब से निकालकर डिस्प्रिन की गोली निकाली और गिलास में डाल कर प्रीति की तरफ़ बढ़ा दिया–“लीजिए। आप कई घंटों से हमारे इन दो अफसरों के साथ हैं। आपको इसकी सख़्त ज़रूरत होगी।”
प्रीति ने कृतज्ञ भाव से गिलास थाम लिया और गोली के पूरी तरह घुलते ही पूरा पानी पी गई। “थैंक्स।”–वह गिलास टेबल पर रखती हुई बोली।
“मैं एन०सी०बी० से आरिफ अली, और ये आई०बी० से अमित आनंद।”–आरिफ ने परिचय दिया।
“मैं डॉक्टर प्रीति अहलावत।”–उसने हाथ जोड़ कर अभिवादन किया।
“देखिए डॉक्टर प्रीति, मुझे बात घुमा फिरा कर कहने की आदत नहीं है। इसलिए मैं सीधे मुद्दे पर आता हूँ।”–आरिफ गंभीर स्वर में बोला।
“सर मैं क़सम खा कर कहती हूँ कि वह पैकेट मेरा नहीं है। मुझे नहीं मालूम कि वह मेरे सामान में कैसे आ गया ?”–प्रीति रुआँसी आवाज़ में बोली।
“ठीक है मान ली आपकी बात। अब आप दो मिनट उस पैकेट का पीछा छोड़िये और मेरी सुनिये।”
“जी।”
“आप रणविजय को जानती हैं ?”
“कौन रणविजय ?”
“रणविजय। आपका अलवर वाला आशिक़।”–आरिफ बोला।
“अलवर वाले आशिक़ से आपका क्या आशय है ? मेरा क्या हर शहर में एक आशिक़ है ?”–वह अप्रसन्न भाव से बोली।
“नहीं, मेरा वह मतलब नहीं था। वह तो मैंने आपको याद दिलाने के लिए अलवर का नाम लिया।”–आरिफ नम्र स्वर में बोला। उसके चेहरे से अप्रसन्नता के भाव फिर भी नहीं गए। “देखिए, आप याद करने की कोशिश कीजिये। रणविजय सिंह...बड़ा सुंदर स्मार्ट लड़का था। ऑटो चलाता था…याद आया कुछ ?”–आरिफ ने आशापूर्ण स्वर में पूछा।
“मुझे कुछ याद नहीं। अब तीस बत्तीस साल पहले का किसे याद रहता है ?”–वह भुनभुना कर बोली।
“सर आप जाकर फ्रेश हो लीजिये। पंद्रह मिनट बाद आइये। तब तक मैडम को याद आ जाएगा।”–अमित–जो बड़ी देर से ये सब देख रहा था–बोला। आरिफ ने सहमति में सिर हिलाया और आँखों ही आँखों में बाहर आने का इशारा करता हुआ उठा और कमरे से बाहर चला गया।
“मैं एक प्रतिष्ठित डॉक्टर हूँ। समाज में मेरा एक रुतबा है। आप मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते।”
अमित उसकी बात को अनसुनी करते हुए बाहर निकल गया।
“कहिये सर।”–बाहर आकर वह आरिफ से बोला।
“हम उससे इस तरह से पेश नहीं आ सकते।”–आरिफ बोला।
“किस तरह से सर ?”
“सख्ती बहुत नहीं कर सकते। ग्रिलिंग तो कतई नहीं। किया ही क्या है उसने ?”
“ऐसे तो वो मानने से रही।”
“डरा दो, लेकिन फिजिकल तो कतई नहीं। न मानी तो सोचा जायेगा कुछ और।”
अमित ने सिर हिलाकर सहमति जताई। आरिफ आगे बढ़ गया। अमित वापस कमरे में पहुँचा।
“हाँ, तो क्या कह रही थीं, मैडम जी ?”–भीतर आकर वो बोला।
“आप मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते।”–प्रीति बोली।
“नहीं, कुछ और भी कह रही थीं। क्या है आपका समाज में ?”
प्रीति कुछ न बोली।
इस समय प्रीति एक ऑफिसनुमा कमरे में बैठी थी। उसके दाँये बाएँ जुगल और किशोर बैठे थे। प्रीति की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। लेकिन उसने शॉक की स्थिति गुज़र जाने पर जब पुनः सारी बातों पर गौर किया, तो उसे मामला कुछ अलग लगा। कम से कम जो दिख रहा था, वह तो नहीं था। उसे अब लगने लगा था कि उसे सुनियोजित ढंग से फँसाया गया था। पर क्यों ? इस क्यों का जवाब उसके पास नहीं था। जो दो अफ़सर उसे यहाँ लाए थे, जो एयरपोर्ट पर सतर्कता और जाँबाज़ी की प्रतिमूर्ति लग रहे थे, अब अचानक ही मूर्ख लगने लगे थे। कहो कुछ, सुनते कुछ थे, और करते कुछ थे।
“कब तक आएँगे आपके अफ़सर ?”–उसने तीसरी बार ये सवाल दोहराया।
“तीन आदमी कभी सुखी नहीं रह सकते।”–जुगल दार्शनिक अंदाज़ में बोला।
“कौन ?”–प्रीति बोली।
“शरणवीर, रामपाल और विशंबर।”–जुगल बोला।
“अब ये कौन हैं ?”
“ये तीनों मेरी बुआ के लड़के हैं। तीनों की पत्नी इतनी खूँखार और लड़ाका हैं कि ये तीनों मासूम कभी सुखी नहीं रह सकते।”–जुगल उदास स्वर में बोला।
“लेकिन इससे मेरा क्या मतलब ?”–प्रीति का दिमाग़ ख़राब हो गया।
“कोई मतलब नहीं। कतई कोई मतलब नहीं। आपने पूछा, तो मैंने बता दिया। वरना मेरा सिद्धांत है कि मैं अपना ग़म कभी किसी को नहीं बताता।”–जुगल की आँखें भर आईं।
“मैंने कब पूछा ? और मैं क्यों पूछूँगी ?”
“बाज लोगों को होता है शौक़, दूसरों के ग़मों का मज़ा लेने का।”–जुगल की आँख से एक आँसू टपका।
“चुप हो जा भाई। ये दुनिया ऐसी ही है। ग़म के मारों का यहाँ मजाक ही उड़ाया जाता है।”–किशोर उठ कर उसकी पीठ थपथपाता हुआ हमदर्दी भरे स्वर में बोला।
“मुझे आप लोगों का ही समझ नहीं आ रहा। अरे मैं पूछ रही हूँ कि आपके अफ़सर कब तक आयेंगे ?”
“आपकी उम्र कितनी है ?”–किशोर ने पूछा।
“फोर्टी थ्री। क्यों ?”
“लेकिन आपके पासपोर्ट के हिसाब से तो फिफ्टी फोर है
।” “हाँ...वह…दरअसल ऐसा है कि…पर मेरी एज से क्या लेना देना ?”
“ग्यारह साल !...पूरे ग्यारह साल ! कौन देगा इनका हिसाब, मैडम जी? ग्यारह साल कम नहीं होते।”–किशोर उसे घूरता हुआ बोला।
“कौन से ग्यारह साल ?”
“फिफ्टी फोर साल आप कन्ज्यूम कर चुकी हैं अपनी एज के और फोर्टी थ्री बता रही हैं। तो ये जो ग्यारह साल का अंतर है इसकी अदायगी कौन करेगा ?
“आप क्या पागल हो ?”–प्रीति चिल्लाई।
“आपको ग्यारह साल कुछ नहीं लग रहे ? और अगर आपको ग्यारह साल हम जेल में डाल दें तो पता चलेगा। क्योंकि आपके हिसाब से तो ग्यारह साल कुछ होते ही नहीं।”
“आप कहाँ की बात कहाँ ले जा रहे हो। अरे हर औरत अपनी उम्र थोड़ी बहुत कम बताती ही है।”–प्रीति के सिर में दर्द होने लगा था।
“आप हर औरत के ख़िलाफ़ कोर्ट में गवाही दे सकती हो ?”–किशोर ने गंभीरता से पूछा।
“मैं अब हर औरत के ख़िलाफ़ गवाही कैसे दे सकती हूँ ? मैं क्या हर औरत को जानती हूँ।”–प्रीति सिर पकड़ती हुई बोली।
“यानी बिना जाने ही आरोप लगा दिया। आप क्या हमारे रायता मास्टर की बहन हो ?”
“कौन रायता मास्टर ?”–प्रीति असमंजस भरे स्वर में बोली।
“मैडम जी, पहले तो ये बताओ कि रायता मास्टर में आपकी दिलचस्पी क्या है ?”–जुगल ने पूछा।
“मेरी भला क्या दिलचस्पी होगी ?”–वह जुगल की तरफ़ घूम कर बोली।
“तो जब दिलचस्पी है ही नहीं, तो उनके बारे में पूछ क्यों रही हो ?”
“मैं कहाँ पूछ रही हूँ ? कब पूछा मैंने ?”–वह दयनीय स्वर में बोली।
“अभी आपने पूछा नहीं कि कौन रायता मास्टर ?”–जुगल तेज स्वर में बोला।
अभी प्रीति कोई जवाब देती, कि दरवाज़ा खुला और अमित और आरिफ ने अंदर कदम रखा। उनके पीछे राज और डॉली भी थे। आरिफ को देखते ही दोनों खड़े हो गए। उन्हें खड़ा होता देख प्रीति भी खड़ी हो गई।
“कितनी देर हो गई आये हुए ?”–आरिफ ने पूछा।
“आधा घंटा हुआ है सर।”–दोनों समवेत स्वर में बोले।
“बैठ जाइए।”–आरिफ एक कुर्सी पर बैठता हुआ प्रीति से बोला। सहमी सकुचाई सी प्रीति बैठ गई। आरिफ ने वहीं मेज पर पानी का ढका रखा गिलास उठाया और जेब से निकालकर डिस्प्रिन की गोली निकाली और गिलास में डाल कर प्रीति की तरफ़ बढ़ा दिया–“लीजिए। आप कई घंटों से हमारे इन दो अफसरों के साथ हैं। आपको इसकी सख़्त ज़रूरत होगी।”
प्रीति ने कृतज्ञ भाव से गिलास थाम लिया और गोली के पूरी तरह घुलते ही पूरा पानी पी गई। “थैंक्स।”–वह गिलास टेबल पर रखती हुई बोली।
“मैं एन०सी०बी० से आरिफ अली, और ये आई०बी० से अमित आनंद।”–आरिफ ने परिचय दिया।
“मैं डॉक्टर प्रीति अहलावत।”–उसने हाथ जोड़ कर अभिवादन किया।
“देखिए डॉक्टर प्रीति, मुझे बात घुमा फिरा कर कहने की आदत नहीं है। इसलिए मैं सीधे मुद्दे पर आता हूँ।”–आरिफ गंभीर स्वर में बोला।
“सर मैं क़सम खा कर कहती हूँ कि वह पैकेट मेरा नहीं है। मुझे नहीं मालूम कि वह मेरे सामान में कैसे आ गया ?”–प्रीति रुआँसी आवाज़ में बोली।
“ठीक है मान ली आपकी बात। अब आप दो मिनट उस पैकेट का पीछा छोड़िये और मेरी सुनिये।”
“जी।”
“आप रणविजय को जानती हैं ?”
“कौन रणविजय ?”
“रणविजय। आपका अलवर वाला आशिक़।”–आरिफ बोला।
“अलवर वाले आशिक़ से आपका क्या आशय है ? मेरा क्या हर शहर में एक आशिक़ है ?”–वह अप्रसन्न भाव से बोली।
“नहीं, मेरा वह मतलब नहीं था। वह तो मैंने आपको याद दिलाने के लिए अलवर का नाम लिया।”–आरिफ नम्र स्वर में बोला। उसके चेहरे से अप्रसन्नता के भाव फिर भी नहीं गए। “देखिए, आप याद करने की कोशिश कीजिये। रणविजय सिंह...बड़ा सुंदर स्मार्ट लड़का था। ऑटो चलाता था…याद आया कुछ ?”–आरिफ ने आशापूर्ण स्वर में पूछा।
“मुझे कुछ याद नहीं। अब तीस बत्तीस साल पहले का किसे याद रहता है ?”–वह भुनभुना कर बोली।
“सर आप जाकर फ्रेश हो लीजिये। पंद्रह मिनट बाद आइये। तब तक मैडम को याद आ जाएगा।”–अमित–जो बड़ी देर से ये सब देख रहा था–बोला। आरिफ ने सहमति में सिर हिलाया और आँखों ही आँखों में बाहर आने का इशारा करता हुआ उठा और कमरे से बाहर चला गया।
“मैं एक प्रतिष्ठित डॉक्टर हूँ। समाज में मेरा एक रुतबा है। आप मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते।”
अमित उसकी बात को अनसुनी करते हुए बाहर निकल गया।
“कहिये सर।”–बाहर आकर वह आरिफ से बोला।
“हम उससे इस तरह से पेश नहीं आ सकते।”–आरिफ बोला।
“किस तरह से सर ?”
“सख्ती बहुत नहीं कर सकते। ग्रिलिंग तो कतई नहीं। किया ही क्या है उसने ?”
“ऐसे तो वो मानने से रही।”
“डरा दो, लेकिन फिजिकल तो कतई नहीं। न मानी तो सोचा जायेगा कुछ और।”
अमित ने सिर हिलाकर सहमति जताई। आरिफ आगे बढ़ गया। अमित वापस कमरे में पहुँचा।
“हाँ, तो क्या कह रही थीं, मैडम जी ?”–भीतर आकर वो बोला।
“आप मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते।”–प्रीति बोली।
“नहीं, कुछ और भी कह रही थीं। क्या है आपका समाज में ?”
प्रीति कुछ न बोली।