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Thriller तबाही



' स्पष्टतया तो उसे मार ही डाला गया था - लेकिन एक फीसदी सन्देह है कि वह जिन्दा न हो । '

" जिन्दा होगी तो संजय के साथ होगी ? ' '

' ' जी हां । '

" अगर वह संजय के साथ होती तो संजय को छुपने की क्या जरूरत थी ? वह अदालत में हाजिर हो सकता था । ' '

' ' म ... म ... मैं ... इतनी बारीकियां नहीं समझता । "

" फिर जब में संजय के यहां गया ... ? ' '

" तब आप जिस टैक्सी में गए तो वह मेरे ही एक आदमी की थी । "

" ओहो ! ' '

" फिर उसने मुझे बताया कि आप संजय के घर से अकेले चले थे ... वह आपके साथ गजेबो तक आया ... पर उसने सुना कि आपको किसी ने फोन करके कहा है कि आप उसका गजेबो में इन्तजार करें । "

" और फिर तुम गजेबो में पहुंच गए ... और थोड़ी देर बाद तुमने रेणु को वहां आते देखा । "

' ' जी हाँ ! "

" और वेटर को हमारी निगरानी पर लगा दिया । ' '

" जी हां ... और वेटर ने मुझे बताया कि आप दोनों ऐश करने जुहू पर होटल सी - व्यू में जा रहे हैं । "

" तो तुमने हमारे साथ करीम को लगा दिया । "



" जी हां ! ' '

' ' करीम ने तुम्हें कोड में बताया कि मैंने तुम्हे डॉज दिया और करीम मेरे कब्जे में है । ' '

" जी हां ! '

" तुमने करीम को क्या आदेश दिया ? ' '

" उसकी नौबत ही नहीं आई - मुझे विश्वास था कि आप करीम को गिरफ्तार कर लेंगे - और बाद में उसे छुड़ा लिया जाएगा । "

" तुम्हारे सपने में भी नहीं होगा कि करीम आर्च - वे के तुम्हारे फ्लैट का पता बता चुका है । ' '



' ' जी हां ! "

विजय ने हल्की सांस ली और बोला

" अब यह फैसला करना तुम्हारा काम है कि तुम करीम के पास जाना पसन्द करते हो या सरकारी गवाह बनना । "

' ' म ... म ... मैं मरना नहीं चाहता । '

" तो फिर बताओ , तुम यह सब किसके लिए कर रहे हो ? "

।।

' आप शायद मेरी बात पर विश्वास नहीं करेंगे । ' '

" तुम बात करो ... मैं विश्वास करू या करू ... इसका फैसला करना तुम्हारा काम नहीं - मेरा अपना काम है

। "

' ' साहब ! मुझे तो खुद मालूम नहीं कि मैं किसके लिए काम कर रहा हूं । ' '

विजय सरदाना के होठों पर बहशियाना मुस्कराहट फैल गई ... उसने कहा

' ' मुझे मालूम था तुम्हारा यही जवाब होगा । ' ' ' ' मैंने कहा न कि आप मेरी बात का विश्वास नहीं करेंगे । "

' ' तुम कालीचरण के लिए काम करते थे । ' '

" जी हां - जब मैं टैक्सी में लड़कियों को उनके बताए ठिकाने पर पहुंचाया करता था । "

" फिर ? "

" फिर जब कालीचरण का भरोसा प्राप्त हो गया

तो उसने मुझे शहर की उन सारी टैक्सियों का इंचार्ज बना दिया जो उसके लिए लड़कियां इधर से उधर पहुंचाते थे - उनमें करीम भी था ... करीम को मैंने ही इस धंधे पर लगाया था - करीम जैसे कई और आदमियों को भी लगाया था । "

" इस काम में तुम्हे क्या मुआवजा मिलता है ? "

' इतना कि मैं सपने में नहीं सोच सकता था । हर लड़की द्वारा कालीचरण को मिलने वाली रकम का पांच परसेंट - इससे भी महीने में लगभग लाख तो हो ही जाता है । ' '

" तुम्हारे पास उन लड़कियों की लिस्ट होगी जो कालीचरण के धंधे में शामिल हैं । ' '

' ' जी हां ! "

.

" और कालिचरण के ग्राहकों की लिस्ट भी होगी

' ' जी हां ! "

' ' इनमें ज्वाला प्रसाद जैसे बड़े लोग लोगों की कमी नहीं होगी । "

" जी हां , सभी बड़े आदमी हैं , नेता , मिनिस्टर ,

ऑफिसर , पूंजीपति , प्रोड्यूसर , डायरेक्टर , वगैरा ... हीरो तक भी हैं । "

" तुम इन लड़कियों के साथ जिन रक्षकों को भेजते हो उनके नाम पते भी होंगे । "

" जी हां ! "

' ' संजय भी इन्हीं में एक था ? ' '

' ' जी नहीं साहब ! संजय का दर्जा मुझसे ऊंचा था - वह मुझसे भी किसी मामले में जवाब - तलब कर सकता था - कालीचरण की बजाए संजय को ही हिसाब - किताब देना - लेना पड़ता था । ' '

" ओहो ... ! "

' कालीचरण मुझसे बढकर संजय पर भरोसा करता है । "



' क्या कालीचरण ने शकीला को संजय के साथ भेजा था ? "

" साहब ! शकीला की जिम्मेदारी तो संजय ही के सिर पर रहती थी , क्योंकि शकीला न सिर्फ बहुत खूबसूरत थी , बल्कि उसका धंधा भी बहुत राज में रखना पड़ता था , क्योंकि संजय और शकीला एक - दूसरे से मुहब्बत करते थे । "

' ' तो रात जब शकीला को ज्वाला प्रसाद के यहां भेजा गया था तो संजय ही उसके साथ गया था । ' '

" तो फिर उसे छुपने के लिए भगोड़ा होने की क्या जरूरत थी ? "



" लगता है , जब वह अपनी जगह लौटा होगा तो उसे शकीला की लाश मिली होगी और वह रूपोश हो गया हो । '

' ' मतलब , शकीला को मार डाला गया । ' '

' ' जी हां ! "

" इसलिए कि उसने ज्वाला प्रसाद के असली कातिल को देख लिया था और उसके खिलाफ वही अकेली गवाह थी । "



' ' जी हां , साहब ! "

' ' क्या कालीचरण का हुक्म यही था ? ' '



" नहीं साहब ! कालीचरण तो शकीला की बहुत इज्जत करता था , इसीलिए वह संजय के सिवा किसी और पर भरोसा नहीं करता था । ' '

" तुम यह कहना चाहते हो कि कालीचरण का इस साजिश से कोई सम्बन्ध नहीं ? ' '



" जहां तक मेरा अनुमान और या जितना मुझे ज्ञान है । ' '

" तो फिर संजय की जगह लेने वाला कोई ऐसा आदमी ही हो सकता है जो कालीचरण के हर प्रोग्राम से पूरी तरह वाकिफ है । "

" जी हां ! "

' ' और उसे मालूम होगा कि शकीला एक रात ज्वाला प्रसाद के यहां जाएगी और संजय उसके साथ

जाएगा । "

" जी हां ! "

' ' संजय , क्या अपनी खुशी से किसी को अपनी जगह दे सकता था ? "

' ' जी नहीं । ' '

' फिर ? "

' ' संजय सिर्फ कालीचरण के हुक्म की पाबंदी करता है । "

' यानी ... संजय को कालीचरण का हुक्म मिला कि किसी खास जगह पर शकीला को छोड़कर वह उतर जाए और उसकी जगह कोई दूसरा आदमी ले लेगा ? "

" जी हां ! '

।।

' मगर हुक्म देने वाला कालीचरण नहीं था । ' '

' शायद । "

" और यह सब तुमने किया ? " विशनु का चेहरा एकदम काला पड़ गया । विजय सरदाना ने कहा

" कालीचरण के सारे आदेश - निर्देशों से संजय के अलावा सिर्फ तुम वाकिफ थे और कालीचरण संजय के बाद तुम्हीं पर भरोसा करता था । "

' ' जी हां ! "

" और तुमने उस भरोसे का अनुचित लाभ उठाया

' ' म ... म ...

मैं ! "

" कौन है वह जिसके इशारे पर तुम ज्वाला प्रसाद जी के खून की साजिश के साझेदार बने ? ' '

" म ... म ... मैं उसे नहीं जानता । "

विजय ने कड़े स्वर में कहा- ' ' शायद तुम भी करीम के पास जाना चाहते हो । '

" साहब , मुझसे कोई सौगंध ले लें ... मैं उसे नहीं जानता । "

' फिर भी तुम उसके लिए काम कर रहे हो ? ' ' ' ' मैं मजबूर हूं साहब । "

" कैसी मजबूरी ? ' '

' ' साहब ! मैं सामने से आने वाले पचास हमलावरों का मुकाबला कर सकता हूं , लेकिन अनदेखी मौत से हर कोई डरता है । ' '



' साफ - साफ बताओ । "

" बताता हूं साहब , अगर गला तर करने की इजाजत हो तो - मेरा गला बुरी तरह सूख गया है । ' '

' ' इजाजत है । "

विशनु ने एक पूरा गिलास भरा और एक लम्बा चूंट लेकर बोला - ' ' आप बिल्कुल नहीं पीते । ' '

विजय सरदाना ने रूखे स्वर में कहा- " सिर्फ काम की बात करो , फालतू की बातें नहीं । ' '

' ' म ... म ... माफ कर दें मुझे । ' '

' ' तुम बताने वाले थे कि तुम किसी अनदेखी मौत से डर गए थे । "



' ' साहब ! यह फ्लैट कालीचरण का ही है - मुझे यह फ्लैट और कार उन्होंने ही दी है । ' '

" जब मैं टैक्सी चलाता था तो बहुत छोटा - सा आदमी था ... सिर्फ आठ घंटे टैक्सी चलाने के बाद भी न मैं अपनी इच्छाएं पूरी कर पाता था और न अपनी पत्नी को सुखी रख सकता था । ' '

' ' तो तुम विवाहित भी हो ? '

' ' मेरी बेटी है साहब , आठ बरस की ... और मैं अपनी पत्नी और बेटी से बहुत प्यार करता हूं । ' '

" फिर ? "

' मैंने अपनी बेटी के उज्वल भविष्य और पत्नी को खुश रखने के लिए ही इस धंधे में कदम रखे थे ... मगर उन दोनों को इस चमक - दमक से दूर रखता हूं - वहां मेरी बेटी पढ़ रही है - मैं उन दोनों की इतनी रकम भेजता हूं कि वह आराम से रहती है । '

' फिर ? "

' ' कुछ दिन पहले अचानक मुझे ट्रंककॉल मिला कि मेरी बेटी एक एक्सीडेंट में मारी गई ... मैं पागल - सा हो गया ... कार लेकर दौड़ा - कोल्हापुर पहुंचा तो मेरी बेटी सही - सलामत थी - मैं उससे चिमटकर रो पड़ा । "

' ' फिर ? "

' ' मैंने सोचा , किसी ने यूंही बहका दिया होगा ... मैं वापस आ गया ... एक दिन मुझे अपनी पत्नी की फोटो जो पता नहीं कौन , कब और किस तरह इस फ्लैट में इसी मेज पर रख गया था ... जबकि इस फ्लैट की चाबी मेरे या कालीचरण ही के पास रहती है । "

' फिर ? ' '

' ' मुझे आश्चर्य हुआ ... फोटो में मेरी पत्नी मेरी बेटी को स्कूल पहुंचाकर बाहर निकल रही थी ... मैं परेशान था कि मुझे गुमनाम टेलीफोन मिला और कहा गया - विशनु तुम्हें पहले अपनी बेटी की मौत की झूठी खबर मिली जो सच भी हो सकती है ... आज अपनी पत्नी का फोटो मेज पर पाया होगा ... यानी हम जब , जो कुछ चाहें कर सकते हैं - तुम सात तालों में भी बंद कर दो , हम तुम्हारी पत्नी और बेटी तक पहुंच सकते हैं - तुम्हारी पत्नी को इतने आदमी एक साथ रेप कर सकते हैं वह चिल्ला - चिल्लाकर दम तोड़ दे - तुम्हारी बेटी बड़ी होकर वेश्या भी बन सकती है । "

.

' मतलब यह कि उस गुमनाम आदमी ने तुम्हें बुरी तरह भयभीत करके अपने जाल में फांस लिया है ? ' '

" जी हां ! "

' ' फिर उसने तुमसे कालीचरण के कामकाज और दैनिक दिनचर्या के बारे में पूछा ! "



" जी हां ! ' '

" और जिस दिन शकीला को ज्वाला प्रसाद जी के यहां भेजा गया था , उस दिन तुम्हें क्या निर्देश मिला था ? ' '

' उस दिन मुझे बताया गया था कि संजय की जगह रास्ते में कोई दूसरा ले लेगा । " ' ' क्या तुम्हें उसकी नीयत मालूम थी ? ' '

" नहीं - मुझे सन्देह था कि वह कुछ सीक्रेट डाक्यूमेंट्स उड़ाने का इरादा रखते होंगे । "

' ' मगर , क्या तुम्हें विश्वास था कि संजय अपनी जगह किसी को जाने देगा ? ' '

" मैंने उस गुमनाम आदमी से भी यही कहा था - उसने जवाब दिया था -- संजय कालीचरण का हुक्म नहीं टाल सकता । ' मैंने पूछा - कालीचरण ऐसा हुक्म देने ही क्यों लगा ? ' तब उसने खुद मुझे कालीचरण की आवाज बनाकर सम्बोधित किया ... तो मैं उछल पड़ा , क्योंकि वह आवाज सौ प्रतिशत कालीचरण ही की थी

। ' '



" तुम्हें उसके बदले क्या मिला ? ' ' ' ' पूरे दस लाख डालर जो एक विदेशी बैंक में मेरे नाम जमा करा दिए गए हैं । ' '



' उसका प्रमाण ? ' '

' ' मेरे पास है - मेरै बैंक के लॉकर में है । ' '

" तुम इतनी रकम का क्या करते ? ' '

' ' सर ! मैंने सोचा था कोई गरीब अनाथ लड़का जो शरीफ और रोशन दिमाग हो ... उसे अपना दामाद बनाऊंगा और अपनी बेटी के साथ विदेश भेज दूंगा ... बाद में मैं ख़ुद भी पत्नी के साथ विदेश में जा बनूंगा । "

" तुम्हें उस गुमनाम आदमी से और भी काम मिलने की आशा होगी । ' '

" जी हां - उसने कहा था , तुम हमारे लिए काम करोगे तो इस बार दुगुना मुआवजा दिया जाएगा ... दौलत के लालच के साथ मौत का डर भी था - उसने धमकी दी थी कि अगर राज खुल गया तो पहले मेरे खानदान का खात्मा कर दिया जाएगा ... फिर मुझे मार डाला जाएगा । "

" उसने इस काम के लिए तुम्हें क्यों चुना ? "

' शायद इसलिए कि मैं गरीबी की बहुत निचली गहराई से उठकर ऊपर आया था और उस गुमनाम आदमी के काम के लिए कालीचरण फाइनेंस कम्पनी से ज्यादा अच्छा कोई प्लेटफार्म नहीं हो सकता था । "

" और अब , जब तुम यह सब कुछ बता चुके हो ? " विशनु ने भर्राई आवाज में कहा - ' ' मैंने सब कुछ अपनी मौत के डर से बताया है , क्योंकि मैं पत्नी और बेटी के लिए जिन्दा रहना चाहता हूं | आपके बारे में मैं बहुत कुछ सुन चुका हूं ... मुझे भरोसा है कि आप मेरी बीवी और बेटी की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी लेंगे । "
 
' अगर ऐसा होने का संशय हुआ ? ' '

' ' मैं समझा नहीं । "



' जब तक उस गुमनाम आदमी को यह मालूम न हो जाए कि तुम मुझे सब कुछ बता चुके हो , तब तक तुम उसके लिए इसी तरह काम करते रहो । ' '

' ' साहब ! हो सकता है उसे मालूम हो गया हो । उसे हर बात की सूचना मिल जाती है - बहुत चतुर और चटक है वह । "

' ' किस द्वारा ? यहां तक मेरी कार्यवाइयों का ज्ञान तो उसे तुम द्वारा हुआ है ... तुम उसके परखे हुए विश्वसनीय साथी हो और वह तुमसे जल्दी ही बीगाड़ना पसंद नहीं करेगा , क्योंकी तुम्हारे ही द्वारा उसे कालीचरण फाइनेंस कम्पनी का प्लेटफार्म मिला हुआ है - इस कम्पनी के विश्वसनीय आदमी को इतनी जल्दी तलाश कर लेना आसान काम नहीं है । "

' ' यह तो आप ठीक कहते हैं साहब ! ' '

" उसके साथ ही अब तुम मेरे लिए भी काम करोगे

' ' जी साहब ! "

" उसके दिए गए आदेशों को तुम मुझे देते रहोगे फिर विजय सरदाना ने उसे नम्बर बताकर कहा ' इन्हें नोट मत करो । बस , याद कर लो और इन पर काल्स करके अपना मैसेज छोड़ दिया करो ... मुझे मिल जाया करेंगे । "

' ' जी साहब ? ' '

' अब तुम मुझे कोई ऐसी निशानी बताओ जिससे मैं उसको पहचानने की कोशिश करू । ' '

" जी , ऐसा कोई निशान नहीं बताया जा सकता जिससे वह पहचाना जा सके ... मैंने उसे कभी सामने नहीं देखा और आवाजें बदलने में वह निपुण है - कभी मेरी ही आवाज बनाकर बोलता है , कभी किसी बूढ़े , कभी जवान की , कभी नम्रता भरी और कभी कड़कदार , यहां तक कि औरत की आवाज भी । ' '

" तुमने कभी उसकी आवाज टेप करने की कोशिश

की ? "

" एक बार की थी ... जब उसकी बात पूरी हो गई तो वह ठहाका लगाकर बोला - ' ' कोई फायदा नहीं - मैं हजार आवाजें निकाल लेता हूं - फिर ऐसी मूर्खता मत करना । "

तभी अचानक टेलीफोन की घंटी बजी और विशनु बुरी तरह उछल पड़ा - उसका चेहरा एकदम सफेद पड़ गया और डर से कंपकंपाती आवाज में वह बोला - ' ' यह जरूर उसी का फोन है । ' '

घंटी बार - बार बज रही थी ... विजय ने कहा - ' ' तुम्हारे पास दूसरा इन्स्टूमेंट है । "

' ' ज ... ज ... जी है ! ' '

विजय ने जल्दी से रेणु द्वारा वहीं मंगवा लिया और दोनों ने साथ इन्स्टूमेंट उठाकर कान से लगा लिए । विशनु ने अपने आपको संभालकर कहा- " हैलो ! ' '

दूसरी ओर से हल्का - सा ठहाका सुनाई दिया और विशनु के माथे पर पसीने की बूंदें झलकने लगीं । फिर आवाज आई

" सुपरिन्टेंडेंट विजय सरदाना और उसकी साथी चले गए या अभी तुम्हारे साथ ही हैं ? ' '

' ' मालिक ! कौन सुपरिन्टेंडेंट ? "

' ' बच्चे हो विशनु ... विजय सरदाना नीली जीन्स जैकेट पहने है और उसकी साथी ने पतलून टी - शर्ट पहन रखी है ... वह लड़की संजय की बहन है - और वह तथा वह लड़की तुम्हारे फ्लैट में दस बजकर पांच मिनट पर दाखिल हुए थे । "

विशनु का चेहरा फक्क हो गया - आवाज फिर आई

" वे लोग बाहर निकलते नहीं देखे गए ।



" अचानक विजय सरदाना स्वयं ही कड़वे स्वर में दूसरे इन्स्ट्रमेंट से बोल उठा - ' ' तुम्हारा ख्याल ठीक है - मैं अभी यहीं हूं । "

" हल्का - सा ठहाका और बदली हुई आवाज सुनाई दी

' ' मुझे मालूम था , तुम दुसरे इन्स्टूमेंट पर मेरी आवाज सुन रहे हो । "

" तुम जो कोई भी हो , कानून की नजरों से ज्यादा देर तक नहीं बच सकते - बेहतर होगा कि अपने आपको कानून के हवाले कर दो । "

फिर ठहाके की आवाज आई और कहा गया " अभी तो तुम मेरी दया पर हो - मैं चाहूं तो पूरी बिल्डिंग एक बटन दबाकर उड़ा सकता हूं - विशनु के फ्लैट में ही एक बहुत ताकतवर बम लगा हुआ है जिसका रिमोट मेरे पास है - और यह रिमोट सौ किलोमीटर तक भी काम कर सकता है - समझ रहे हो

। "

इस बार आवाज ऐसी थी जैसे सरदाना बोल रहा हो । सरदाना ने अपनी आवाज बदलकर वही आवाज निकाली जो गुमनाम आदमी की थी और बोला

' ' मैं समझ रहा हूं मिस्टर एक्स । ' '

" वैरी गुड ! तुमने मुझे अच्छा नाम दिया ... तुम भी मेरी तरह आवाज बदल लेते हो ... बहुत खूब । ' '

' ' मैं इन्तजार कर रहा हूं..तुम रिमोट का बटन दबाओ । "

" अभी मैं इतना बड़ा आतंक नहीं चाहता ... हमारा जो उद्देश्य था वह विशनु की मदद से पूरा हो गया है | ' '

' ' तुम्हें ज्वाला प्रसाद जी के खून से क्या लाभ हुआ ? "

' ' यह तो समय ही बताएगा । ' '

.

" तुम उन्हें ब्लैकमेल भी तो कर सकते थे । "

' ' वह कैसे ? "

' ज्वाला प्रसाद जी के बैड के सिरहाने एक मिनी कैमरा फिट था ... तुम उस द्वारा ज्वाला प्रसाद की प्राइवेट ब्ल्यू फिल्में लेते होगे । "

हल्का - सा ठहाका लगाकर कहा गया- ' तुम सचमुच बहुत योग्य ऑफिसर हो - मैं तुम्हारी योग्यता का आदर करता हूं ... और इस देश में जब हमारी हुकूमत बनेगी तो तुम्हें कोई बड़ी पदवी दी जाएगी । ' '

' ' शुक्रिया .... इस देश पर तुम्हारी नहीं जनता की हुकूमत बनेगी - सुन रहे हो मिस्टर एक्स । '

फिर ठहाका लगाया गया और कहा गया- " इस देश की जनता अगर इतनी ही अक्लमंद होती तो आज देश में एक मजबूत और ताकतवर हुकूमत होती ... हम लोग जब चाहें कोई भी कैसी भी हुकूमत गिरा सकते है..और एलेक्शन लादकर तुम्हारे देश की जड़ें खोखली कर सकते हैं । ' '

" यह तुम्हारा भ्रम है । "

" तुम इस धोखे को वास्तविकता के रूप में कई बरसों से देखते चले आ रहे हो । '

“ खैर , तुम जो कोई भी हो , तुम्हारे हाथ बहुत लम्बे और ताकतवर हैं , मानता हूं , मगर क्या तुम विशनु की बीवी और बेटी पर दया करोगे ? ' '

' ' एक बड़े और पुराने ऑफिसर ने यह बात कही , जिसकी मैं इज्जत करता हूं ... वचन देता हूं कि विशनु की बीवी और बेटी को कुछ नहीं होगा । ' '

' ' शुक्रिया ... विशनु से तुम जिस तरह भी निबटना चाहो , निबटो , मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी । "

" क्या तुम

उसे गिरफ्तार नहीं कर रहे ? "

' ' क्या करूँगा उसे गिरफ्तार करके - जो कुछ मालूम करना था , कर ही चुका हूं । ' '

" तो फिर विशनु मेरी तरफ से भी आजाद है । ' '

' ' मगर तुम अब उससे काम नहीं ले सकोगे । ' ' ' ' ऐसी मूर्खता का सवाल ही नहीं पैदा होता । '

" ओ . के . मिस्टर एक्स , तुमसे जल्दी ही कहीं मुलाकात होगी । "

दूसरी ओर से ठहाके की आवाज और डिस्कनेक्ट कर दिया गया - दोनों ने रिसीवर रख दिए । विशनु के चेहरे से हवाइयां उड़ रही थीं..विजय ने उसे ध्यान से देखा और कहा

' ' क्या तुम सन्तुष्ट नहीं हो ? "

" मुझे विश्वास नहीं आता । ' '

" किस बात का ? ' '

' ' वह मेरी बीवी और बेटी को कोई हानि नहीं पहुंचाएगा । "

' ' मेरा मन कहता है ... यह तुम्हारा भ्रम है । ' '

विशनु कुछ नहीं बोला ... उसका चेहरा उतरा हुआ था ।

विजय सरदाना और रेणु आर्च - वे से बाहर आए ही थे कि अचानक उनके कानों में लहराती हुई एक चीख की आवाज गूंजी ... दोनों ठिठककर रुक गए , क्योंकि यह चीख आर्च - वे ही से निकली थी ... साथ ही ऐसा धमाका हुआ जैसे कोई बहुत जोर से गिरा हो ।

चारों तरफ खिड़कियां खुलने लगीं और लोगों की आवाजे आने लगी .. चौकीदार दौड़कर अंदर गया । विजय ने धीरे से कहा

' निकल चलो । ' '

" क ... क ... क्या हुआ ? "

" विशनु खत्म हो गया । "

" नहीं ... ! ' '

" उसने शायद खिड़की से छलांग लगा दी है । "

' ' मगर क्यों ? "

.

' लगता है - उस गुमनाम आदमी ने फोन करके ऐसा करने का आदेश दिया है । ' '

रेणु सन्नाटे में रह गई ... वे लोग सड़क की भीड़ में शामिल हो गए थे जो चीख सुनकर जमा हो गई थीं ... पड़ोस की बिल्डिंगों के लोग भी उधर आने लगे थे । वह सरदाना का हाथ पकड़कर उसे भीड़ से अलग ले आई और धीरे से बोली

.

" विशनु की पत्नी और बेटी का क्या होगा ? " " कुछ नहीं ... मैं अभी इन्तजाम किए देता हूं । ' ' फिर उसने एक अलग जगह आकर ट्रांसमीटिंग सेट पर कोल्हापुर डी . आई . जी . से सम्पर्क किया - रेणु की

आंखों में गहरी बेचैनी नजर आ रही थी । कुछ देर बाद विजय सरदाना ने कहा

' ' अब चिन्ता की कोई बात नहीं ... विशनु की पत्नी को पूरी सिक्योरिटी मिलनी शुरू हो गई है । '

फिर वे लोग सड़क की ओर चल पड़े । थोड़ी देर मौन रहने के बाद रेणु ने चिन्ता भरे स्वर में कहा- " उस आदमी को इतनी जल्दी हमारे विशनु के यहां पहुंचने का टाइम तक कैसे मालूम हो गया ? ' '

' ' सरोज द्वारा - हम दोनों को उसी ने इधर आते देखा था ... और उसी ने विशनु के फ्लैट का पता बताया था

| "

रेणु सन्नाटे में रह गई । विजय ने कहां- “ सरोज को तो में चैक कर लूंगा , लेकिन अब संजय का मिलना जरूरी है ... क्योंकि ज्वाला प्रसाद के असल कातिल को सिर्फ संजय या शकीला ने ही देखा है । "

" अबकी बार मुझे उनका फोन मिला तो मैं उनसे कह दूंगी कि वह आपसे कहीं भी मिल लें । '

" ठीक है । "

फिर वे दोनों रुक गए , क्योंकि विजय ने एक टैक्सी को रूकने का इशारा किया था जो उनके पास आकर रुक गई थी - कुछ देर बाद वे दोनों टैक्सी में सवार थे और टैक्सी सड़क पर दौड़ रही थी ।
 
संजय के शरीर पर मछेरों का लिबास था और शकीला भी एक मराठी घाटन मछेरन बनी हुई थी ... उनकी नाव इस समय किनारे से काफी दूर समुद्र के तल पर थी - ऊपर सितारों का जाल बिछा हुआ था - दूसरी तरफ एक बड़े टोकरे में मछलियां भरी थीं ... वे दोनों नाव के बीच में बैठे थे ।

अचानक संजय ने कहा- ' ' शकीला ! तुम्हारे लिए तुम्हारे डैडी बहुत परेशान होंगे । "

' ' बहुत ज्यादा ... रिटायर्ड कर्नल हैं - खूखार हो रहे होंगे । "

" क्या तुम उनसे टेलीफोन पर बात करना चाहोगी ? ' '

' ' हर्गिज नहीं । ' ' शकीला ने कांपकर कहा ।

" क्यों ? ' '

" वह मुझसे बहुत प्यार करते हैं ... मम्मी की मौत के बाद तो वह मेरे ऊपर जान छिड़कने लगे हैं - मेरी आवाज सुनते ही वह फौजी ढंग मे हुक्म देंगे ... मेरी आवाज सुनते ही घर चली आओ । "

' ' और तुम उनका हुक्म टाल भी नहीं सकोगी । "

' क्या कहूंगी उनसे ? उन्हें तो यह भी नहीं मालूम कि मैं क्या कर रही हूं - न मैं उन्हें यह बता सकती हूं कि मैं किस बवाल में फंस गई हूं । ' '

' ' तुम ठीक कहती हो । '

" तुम तो अपनी बहन से बात करते रहते हो .... आज क्यों नहीं की ? "

' ' करूगा कुछ देर बाद । "

' ' मगर हम कब तक वेश बदले छिपे - छिपे जिन्दगी गुजारेंगे ... हम लोग मुम्बई की सीमा से भी बाहर नहीं निकल सकते ... सारे रास्तों पर निगरानी हो रही होगी । "

' ' हां - जरूर हो रही होगी । ' '

" बैठे - बिठाए अचानक यह कैसी बला गले पड़ गई

' ' मेरे सपने में भी नहीं था कि कालीचरण किसी ऐसी साजिश में भी शामिल हो सकता है । ' '

अचानक शकीला ने करवट लेकर कहा- ' ' सुनो !

क्या तुम्हें विश्वास है कि कालीचरण ज्वाला प्रसाद के खून की साजिश में शामिल था ? ' '

' ' मैं उसकी आवाज हजारों में पहचान सकता हूं - उसने मुझे रास्ते में उतरने और असल कातिल को अपनी जगह भेजने का आदेश दिया था ।

।।

" क्या यह काम मुझसे नहीं ले सकता था ? "

' ' नहीं । ' '



" क्यों ? "



' हर आदमी के काम करने की एक रेंज होती है - मैं दस गुंडों से मुकाबला कर सकता हूं , लेकिन एक निर्दोष सीधे - सादे आदमी को जरा - सी चोट पहुंचाने का मुझमें साहस नहीं - पेशेवर कातिल अलग ही होते हैं । ' '

' ' तो वह कोई पेशेवर कातिल था ? ' '

" स्पष्ठ है ... तुम्हारे सहारे वह ज्वाला प्रसाद तक पहुंचा ... उनका खात्मा करके वह वापस हुआ ... और रास्ते में तुम्हारा गला दबाकर अपने ख्याल में तुम्हें भी ठिकाने लगा दिया । ' '

' ' बेशक ! "

' ' वह तो यही समझ रहा होगा कि मैं तुम्हारी लाश छुपाकर भगोड़ा हो गया हूं ... अगर पकड़ा भी गया तो दो व्यक्तियों के मर्डर के केस में मुझे फांसी की सजा हो जाएगी ... बहुत सीरियस केस है - मेरा छुटकारा मेरी मौत होगी । "

' ' क्या कालीचरण ने यह नहीं सोचा होगा कि लपेटे में तो वह भी आएगा ... मैं उसके यहां से ज्वाला प्रसाद के यहां भेजी गई थी और मेरी हिफाजत के लिए तुम

' ' मैं अकेला भी तो किसी विदेशी रैकेट के हाथों बिक सकता हूं ... तुम द्वारा काम निकालकर तुम्हें मार दिया । "

' मगर मैं तो जिन्दा हूं और असल कातिल के खिलाफ गवाह दूंगी । "

' अगर हम पुलिस तक पहुंच सके तभी तो । "

' हो सकता है , कालीचरण के गुंडे ही हमें ढूंढ रहे हों और देखते ही गोली मार दें - फिर कालीचरण का पुलिस से भी तो सम्बन्ध है - वह उन्हें भी खुश रखता है - मैं पुलिस के हाथों भी तो मारा जा सकता हूं । ' '

" फिर हम कब तक चमत्कार का इन्तजार करेंगे ? ' '

' ' बस , एक - दो दिन ... मुझे देखने दो फिर मैं इस दलदल से निकलने का कोई रास्ता निकालूंगा । ' '

अचानक पानी में सपड़ - सपड़ की आवाज सुनाई दी और वे लोग चौंक पड़े - शकीला का दिल बहुत जोर से धड़कने लगा और वह संजय से लिपटकर कांपती आवाज में बोली- ' ' क ... कोई आ रहा है । ' '



" डरो मत । ' ' संजय उसे थपककर बोला- ' ' किसी को क्या मालूम कि हम असल मछेरे नहीं हैं । ' '

" किसी ने पहचान लिया तो ? ' '

' देखा जाएगा । "

फिर उन लोगों की नाव पर लाइट पड़ी और शकीला और भी डर गई ।

" कहीं नाइट गार्ड वाले न हों । "

' आराम से लेटी रहो । ' '

शकीला चुप हो गई ... लाइट फिर गायब हो गई ... लेकिन ऐसी आवाज जैसे कोई मोटरबोट पास से गुजर रही हो ... फिर किसी मर्द की आवाज लहरों में गूंजी- ' ' किसी मछुआरे की नाव है । ' '



" लेकिन इधर कहां आती हैं मछेरों की नावें । " किसी और की आवाज आई ।

.

इस बार संजय का भी दिल धड़क उठा । पहली आवाज फिर सुनाई दी - ' ' बादवानी नाव है , हवा के सहारे आ गई होगी ! "

" इसमें तो कोई नहीं मालूम होता । ' ' फिर किसी ने ललकार कर पूछा ? " कौन है नाव में ? "

संजय संभल गया ,

उसने शकीला को थपकी दी और फिर उठकर खड़ा

गया और ऊंची जम्हाई लेकर नींद भरी आवाज मैं बोला- ' ' कौन है बाबू ? ' '

' ' क्या हो रहा है यहां ? ' '

' ' मछलियां पकड़ी जा रही हैं । ' '

" अकेले हो ? ' '

' घर वाली भी है । ' '

" कुछ पियोगे ? "

' ' दारू हो तो जरूर । "

' ' अंग्रेजी है ... लो संभालो । ' '

उसने बोतल उछालकर फेंकी जिसे संजय ने लपक लिया और बोला- " धन्यवाद बाबूजी ! "

' ' ऐश करो ... इधर कोई पुलिस की बोट आए तो मत बताना कि इधर से कोई मोटरबोट गुजरी है ... तुम्हारा इनाम बोतल में है । "

' समझ गया बाबू । " मोटरबोट आगे निकल गई तो शकीला का दिल जोर - जोर से धड़क रहा था ... संजय बैठता हुआ बोला- ' ' स्मगलर मालूम होता

| ' ' फिर उसने बोतल को आसमान की ओर करके देखा , उसमें एक लम्बी - सी सुनहरी सलाख नजर आई ।

" ओहो ... स

... सोने की सलाख है । "

" अच्छा ! "
 
संजय ने बोतल एक बड़े बर्तन में खाली की ... व्हिस्की के साथ सोने की सलाख भी निकल आई ... जिसका वजन कम से कम दस तोला होगा ... खालिस सोना मालूम होता था ।

" रिश्वत दे गए हैं । ' ' शकीला ने कहा ।

" सभी को देकर जाते होंगे ... और यह व्हीस्की खालिस फॉरेन होगी , वरना सोने की सलाख छोड़ने का रिस्क न लेते । "



' मगर वे लोग गए किधर ? ' '

संजय ने गर्दन उठाकर देखा ... दूर एक सफेद जहाज लंगर डाले खड़ा था और मोटरबोट उधर ही जा रही थी । संजय ने कहा- ' ' ओहो ! उधर तो समुद्री जहाज भी है । ' '

शकीला ने भी देखा और बोली- " यह तो खतरनाक मामला लगता है । ' '

लगता तो है , मगर बहुत बड़े पैमाने का धंधा है । ' '

' ' खुदा के लिए इधर से निकल चलो संजय । "

संजय ने भी यही उचित समझा ... बादवान खोलकर उसकी दिशा बदलने लगा - मगर हवा की दशा ऐसी थी कि नाव उधर ही बहने लगी । संजय ने जल्दी से बादबान बंद कर दिया । शकीला ने भयभीत स्वर में कहा- " अब क्या होगा ?



" तुम बेकार परेशान हो रही हो । '

' ' इन लोगों की न दोस्ती अच्छी , न दुश्मनी । ' '

' फिर भी । ' '

' अब करें भी क्या ... नाव हवा की दिशा बदले बिना कहीं जा भी नहीं सकती । ' '

कुछ देर चिन्तित रहकर संजय ने कहा- " देखा जाएगा ... हम लोगों ने अभी खाना भी नहीं खाया । '

' ' मुझे भूख नहीं है । ' '

" पागल मत बनो । ' " संजय ने खाने का टिफिन खोला और दो गिलासों में व्हिस्की भरकर एक गिलास शकीला की ओर बढ़ा दिया- " लो पियो । "

" नहीं , मैं इस वक्त नहीं पियूंगी । "

' ' मूड खराब मत करो ... जो होना है वह तो होकर ही रहेगा । "

शकीला ने व्हिस्की के गिलास से एक चूंट भरा और तली हुई पामफ्रेट मछली खाने लगी - पन्द्रह मिनट बाद ही दोनों को सरूर आने लगा - शकीला ने एक बूंट संजय के गिलास से भरा और संजय की एक बूंट अपने गिलास से पिलाया - फिर दोनों ने एक - दूसरे के होंठ चूमे ... संजय बोला- " तुम बहुत अच्छी हो । "

' ' तुम भी तो बहुत अच्छे हो । ' '

" तुम साथ हो इसलिए मेरा समय अच्छा कट रहा है , वरना बहुत बोर होता । "

अचानक फिर वही मोटरबोट जहाज की ओर से आती दिखाई दी और संजय चौंककर बोला - ' ' मोटरबोट इधर आ रही है । ' '

' वापस जा रहे होंगे । "

कुछ देर बाद मोटरबोट से कोई कूदा हो - यह बात बाद में समझ आई कि ऐसे ही रंग की एक बोट पीछे

थी जो दूर से नजर नहीं आई थी ... दोनों के दिल धड़क उठे ... शकीला ने कहा - ' ' कोई पानी में गिरा है । "



' ' गिरा नहीं कूदा है । "

मोटरबोट निकली चली गई ... पीछे आने वाली बोट से फायरिंग भी हुई ... आगे वाली बोट लम्बा चक्कर काटकर दूर चली गई और दूसरी बोट उसके पीछे ... पानी में कूदने वाला छपाक - छपाक करता हुआ इन्हीं की नाव की ओर आ रहा था । शकीला के हाथ - पांव फूल गए । संजय ने किनारे झुककर जोर से कहा- " कौन है ? "

नीचे से एक सुरीली आवाज आई- “ फॉर गॉड सेक ! रोशनी मत करना । '

संजय उछलकर शकीला से बोला- ' ' यह तो कोई औरत है । "

औरत नाव के पास आ गई थी - वह कांपती हुई जोर से चिल्लाई

' ' मुझे बचा लो ! "

' ' एक मिनट ठहरो । ' ' संजय ने जल्दी से रस्सा नीचे लटकाया और बोला- " पकड़ नहीं सकोगी - कमर से बांध लो । "

औरत ने रस्सा पकड़कर कमर से बांध लिया - फिर संजय ने उसे ऊपर खींच लिया - ऊपर पहुंचकर वह

औरत संजय की बांहों मे ढह - सी गई । संजय ने उसे लिटा दिया ... तारों की रोशनी में उसकी सुन्दरता फटी पड़ रही थी - रुपहली काम का सफेद लबादा पहने थी - सफेद ही सैंडल थे - उसकी सांस बहुत तेज चल रही थी - वह हांफती हुई बड़ी मुश्किल से बोली- ' ' म .. म ... मुझे ठंड लग रही है । "

शकीला ने जल्दी से उसे कम्बल से ढंक दिया । औरत ने फिर हांफते हुए कहा- ' ' व ... वो ... वो लोग शायद पलट पड़ें ... मुझे वे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे । "

' ' मामला क्या है ? "

' बता नहीं सकती - तुम नहीं समझोगे - क्या यह नाव किनारे तक नहीं ले जा सकते - मेरी गाड़ी वहां खड़ी हुई

' मेम साहब ? बादवानी नाव है और हवा भी लंगर डाले जहाज की ओर चल रही है । "

" ओ गॉड ! शायद , यह आज मेरे जीवन का आखिरी दिन है । ' '

" घबराएं मत ... हम कोशिश करेंगे कि उन्हें डॉज दे सकें । "

" वह ... वह मोटरबोट देखो पहले वाली । ' '



' क्या उसमें आप थीं - और वह बोतल ? ' '

' ' मेरे साथियों ने तुम्हें उपहार में दी थी - वह फिर बताऊंगी , पहले वह मोटरबोट देखो । ' '

वे दोनों उधर देखने लगे । काफी दूर दोनों बोटें एक दूसरी के गिर्द चकराती नजर आई ... फिर पहले वाली बोट गायब हो गई ... फायरिंग की आवाजें लगातार सुनाई दे रही थीं - फिर फायरिंग थम गई और बोट वापस चल पड़ी । औरत ने पूछा- ' ' क्या हुआ ? ' '

' ' नजर नहीं आ रही ... शायद डूब गई होगी और दूसरी बोट जहाज की तरफ लौट रही है । ' '

" थैक्स गॉड ! उन लोगों ने मुझे मुर्दा समझ लिया है

' ' मगर बात क्या है ? "

' ' आसानी से समझ में आने वाला मामला नहीं - मैं बैठना चाहती हूं । "

उन दोनों ने औरत को सहारा देकर बिठाया ... औरत ने थकी - थकी - सी आवाज में कहा " शायद शाहिद मारा गया । "

' कौन शाहिद ? "

' ' मेरा पर्सनल सैक्रेटरी ... वही मुझे लेकर भागा था - उसने मुझे बचाते हुए अपनी जान दे दी । " फिर हल्की सांस लेकर बोली- ' ' मुझे एक गिलास व्हिस्की चाहिए । "



शकीला ने उसे गिलास भरकर व्हिस्की दी - वह औरत को पहचानने की कोशिश कर रही थी । औरत ने एक चौथाई गिलास एक ही सांस में खाली कर दिया , फिर गहरी सांस लेकर बोली - ' ' मैं तुम्हारा उपकार कभी नहीं भूलूंगी । "

' उपकार कैसा मेम साहब ! ऐसे समय में कोई भी होता , तो आपकी मदद करता । "

' ' हर कोई नहीं ... सब लोग मौत से डरते हैं ... मैं उस समय मौत के मुंह में थी - फिर डरी हुई नजरों से उसने जहाज की तरफ देखा और धूंट भरकर बोली - ' ' जब तक वह जहाज सामने रहेगा , मुझे मौत का डर सताता रहेगा । "

संजय ने कहा- " घबराइए मत , हम लोग आपके साथ हैं । "

औरत ने बड़े ध्यान से दोनों को देखा , और बोली - ' ' आप लोग बातचीत और हाव - भाव से मछेरे नहीं मालूम होते । "

शकीला सन्नाटे में रह गई , लेकिन संजय ने आराम

से कहा

' ' आपका ख्याल ठीक है - मिस सरोज । ' '

सरोज उछल पड़ी- ' ' त ... त ... तुम ! ' '

' आप शायद मुझे न जानती हो ... मगर मैं आपको अच्छी तरह पहचान गया हूं । ' '

सरोज ने बेचैनी से कहा- ' ' ओह ! तुम .... तुम जरूर संजय हो । '

।।

" आपने ठीक पहचाना ... मैंने आपकी काफी सेवा की है कालीचरण के आदेश पर । ' '

" ओह ... संजय तुम भागकर यहां छुपे बैठे हो । तब तो यह शकीला होगी । ' '

' ' जी हां । '

' ' मगर शकीला जिन्दा कैसे बच गई ? ' '

' ' मिस सरोज , मारने वाले से बचाने वाला ज्यादा ताकतवर होता है । हम दोनों एक - दूसरे को प्यार करते हैं ... और हम दोनों शादी भी करेंगे । "

सरोज संभल गई और बोली- ' ' आम ख्याल यह है कि तुमने ज्वाला प्रसाद का खून किया है और चूंकि तुम्हारे खिलाफ शकीला है इसलिए तुमने इसे मार डाला होगा । शकीला के बारे में तुम सब कुछ जानते हुए भी उससे शादी करोगे ? ' '

' ' शकीला ने जो कुछ किया वह उसकी मजबूरी थी

' ओ गॉड ! काश मुझे भी कोई ऐसा संजय मिला होता तो आज मैं इस हाल को हर्गिज न पहुंचती । "

' तलाश कीजिए जरूर मिल जाएगा ... दिल को दिल में राह होती है ... आपका उद्देश्य हीरोइन बनना था , बन गई । "



" अब मैं अपनी उस इच्छा को धिक्कारती हूं । ' " जहां आंख खुल जाए वहीं से सवेरा समझिए । ' '

सरोज ने यूंट भरकर कहा- ' ' कल तुम्हारी बहन से मुलाकात हुई थी । "

संजय चौंककर बोला- " कौन - सी बहन से ? ' '

" रेणु से । "

" कहां पर ? ' '

" सेंट सीरियल रोड पर । ' '

' ' वहां क्या करने गई थी ? "

' ' वे लोग एक आदमी का पता लगा रहे थे .... मैंने ही दोनों को गाइड किया था । ' '

' दूसरा कौन था ? "

' ' सी . बी . आई . सुपरिन्टेंडेंट विजय सरदाना । वह ज्वाला प्रसाद के बारे में इन्वेस्टीगेशन कर रहा है । ' '

' मगर रेणु .... उसके साथ ? "

' ' दोनों शायद एक - दूसरे को को - ऑपरेट कर रहा है

" आपने कैसे पहचाना ? ' '

' ' मैं सुपर सरदाना को बहुत पहले से जानती हूं ... उन्होंने ही रेणु का परिचय कराया था ... मैं समझ गई थी कि रेणु तुम्हारी बहन है । ' '

" क्यों ? ' '

' ' एक बहन ही भाई को निर्दोष सिद्ध करने में किसी सरकारी ऑफिसर का साथ ले सकता है ! ' '

" वह सरकारी ऑफिसर कैसा है ? ' '

" बहुत शानदार , शरीफ और बहादुर आदमी । ' '



" वह किसको ढूंढ रहा था ? ' '

' कालीचरण के गिरोह के विशनु को जानते हो ? "

' ' बहुत अच्छी तरह । "

" वे दोनों उसी की तलाश में थे और विशनु सेंट सीरियल रोड पर आर्च - वे नाम की बिल्डिंग में रहता है

' ' आपके सामने वह लोग विशनु तक पहुंच गए थे

। ' '

' ' मैं उन्हें गाइड करके चली गई थी । ' '

संजय सन्नाटे में बैठा रह गया - शकीला भी चुप थी - सरोज ने चूंट भरकर ऊपर देखा और कहने लगी

हवा की दिशा बदल गई है - फॉर गॉड सेक ! मुझे किनारे तक पहुंचा दो ... जब तक वह जहाज सामने रहेगा मेरी आंखों में मौत नाचती रहेगी । ' '

' शायद तेज

' ' मैं देखता हूं । ' ' और फिर संजय ने बादवान खोला ... सचमुच हवा की दिशा बदल गई थी और नाव किनारे की ओर बढ़ने लगी और सरोज ने सन्तोष की सांस ली - किनारे तक कोई रुकावट नहीं आई - कार सामने खड़ी थी । सरोज , संजय और शकीला की मदद से किनारे उतरकर कार की ओर बढ़ी - फिर कार के पास पहुंचकर मुड़ी और बोली- ' ' मैं तुम लोगों को कभी नहीं भूलूंगी । "

' हमें विश्वास है ... आप किसी को न बताएंगी हम लोग कहां हैं ? ' '

" तुम जो चाहते हो वही होगा । ' '

। " थैक्स ! "
 
सरोज कार की ओर बढ़ ही रही थी कि अचानक कार स्टार्ट हुई और जन्नाटे से सरोज की तरफ आई ... साथ ही शकीला के गले से चीख निकल गई और संजय चिल्लाया- ' ' सरोज बचो । ' '

बचते - बचते भी सरोज ठोकर खाकर गिरी और कार उसकी टांगें कुचलती हुई निकल आई ... उसके गले से अनायास चीखें निकलीं - कार इस तरह घूमी जैसे वह सरोज को पूरा कुचल देना चाहती हो - दूसरे ही क्षण संजय ने नाव में से एक लोहे का औजार उठाया

और पूरे बल से कार की ओर फेंका ... कार का विन्ड स्क्रीन टुकड़े - टुकड़े हो गया और झकोले खाती - खाती रुक गई - कार में से एक अजनबी उतरा ... उसने संजय के ऊपर फायर झोंक दिए ।

उधर शकीला में जाने कहां से इतनी स्फूर्ति आ गई थी कि उसने झट नाव में से एक गंडासा उठाकर पूरी शक्ति से अजनबी की गर्दन पर पीछे से वार किया ... उसके गले से बिलबिलाती चीख निकली और उसके हाथ से रिवाल्वर गिर गया ... वह जरा - सा घुटनों के बल खड़ा हुआ , फिर गिरा और औंधा लुढ़क गया । संजय ने उस पर फायर झोंक दिए ।

शकीला दौड़कर सरोज के पास पहुंच गई जो बेहोश थी और उसकी टांगों से लहू बह रहा था । संजय ने उसे टटोला और बोला

' ' बेहोश है ... टांगें बुरी तरह कुचल गई हैं । ' '

।।

' अब क्या करें ?

' ' मैं इन्तजाम करता हूं पहले गाड़ी का पिछला दरवाजा खोलो । "

शकीला ने पिछला दरवाजा खोला - संजय ने सरोज को उठाकर कार की पिछली सीट पर लिटा दिया और वापस नाव में आकर जाल में छुपा हुआ अपना मोबाइल फोन निकालकर नम्बर मिलाए ।

" हैलो ! ' ' जल्दी ही आवाज आई ।

संजय ने आवाज बदलकर कहा- ' ' आंटी ! जरा रेणु को बुला दें । "

' अच्छा , तुम हो ... अभी बुलाती हूं । " कुछ देर बाद रेणु की आवाज आई- " हैलो ! ' '

संजय ने कहा- ' ' मैं हूं संजय । "

' ' हां ! बोलो किशन ! मैं सोच रही थी तुम कब फोन करोगे ? ' '

" मम्मी क्या कर रही हैं ? ' '

' ' पड़ोस की बिल्डिंग में कीर्तन पर गई हैं । ' '

" फ्लैट में और कोई तो नहीं । "

" बस मैं ही हूं । "

" तब तुम जल्दी से निकल आओ । ' '

" क्यों ? "

" तुम्हें सेंट सीरियल रोड पर सरोज नाम की हीरोइन मिली थीं न शाम के बाद । ' '

" हां ...

... मगर तुम्हें कैसे मालूम ? "

" फिर बताऊंगा । ' '

" तुमसे बहुत बातें करनी हैं । ' '

" मुझे भी - अभी सरोज को तुरन्त डॉक्टरी मदद की जरूरत है - तुम जानती हो कि मैं और शकीला किसी पब्लिक स्थान पर नहीं आ सकते । ' '

" क्या हुआ उन्हें ? " " उनकी दोनों टांगे कुंचली गई हैं ... वह मड के पास वरसोवा के बीच पर हैं अपनी कार में जिसका विंड स्क्रीन टूटा हुआ है । "

' ' ओहो । '



" तुम्हारे पास विजय सरदाना का कान्टैक्ट नम्बर है तो उनकी मदद ले लो । "

" मैं अभी उन्हें फोन करके बताती हूं । ' '

संजय ने फोन बंद कर दिया - उसकी आंखों में गहरी चिन्ता झलक रही थी ।

-

उसने शकीला से कहा- ' ' चलो ! हम लोग नाव को दूर ले चलें । "

" क्यों ? "

" रेणु जल्दी ही सुपर विजय सरदाना को लेकर पहुंच जाएगी और मैं अभी विजय सरदाना के सामने नहीं आना चाहता । "

फिर वह शकीला के साथ नाव की ओर चला गया ... कुछ देर बाद नाव दूसरी ओर जा रही थी ।

7

विजय सरदाना और रेणु सरोज के पास ही थे । सरोज इस समय सरकारी अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में थीं - वह अभी तक बेहोश थी - उसकी दोनों टांगें बुरी तरह कुचली गई थीं - डॉक्टरों ने कह दिया था कि टांगें काटे बगैर उसको बचाना मुश्किल है ।

रेणु उसे देखकर बहुत दुःखी थी - इतनी सुन्दर लड़की जिसको नयी - नयी हीरोइन बनने का चांस मिला था ... उसकी टांगें कट जाएंगी तो उसके जीवन में क्या रह जाएगा । डॉक्टर दूसरी बार चैक करने आया तो विजय ने पूछा- " कब तक होश आने की आस है ? ' '

" कुछ कहा नहीं जा सकता - बहुत सीरियस केस है - आपने रिपोर्ट दर्ज कराई ? ' '

" अभी नहीं । ' '

' मगर यह तो पुलिस केस है । "

विजय सरदाना ने अपना आई . कार्ड निकालकर दिखाया तो सिविल सर्जन के होंठ कुछ और कहने की बजाए गोलाई में सिकुड़ गए- ' ' ओहो ! "

' ' मैं नहीं चाहता कि मिस सरोज मुझे बताने से पहले किसी दूसरे से बात करें या कुछ बताएं । ' '

" ठीक है - मगर ऑपरेशन से पहले फार्म भरने के लिए तो उसके रिश्तेदार के सिग्नेचर जरूरी हैं । ' '

' ' इन्हें थोड़ी होश तो आने दीजिए । ' '

" ओ . के . ! "

डॉक्टर के जाने के बाद विजय ने अपना आई . कार्ड जेब में रख लिया और चिन्ता भरी नजरों से सरोज को देखा जिसकी आंखों के नीचे कुछ काले घेरे नजर आ रहे थे और होंठ सूख गए थे ।

रेणु ने दुःखी स्वर में कहा- ' ' अभी कल ही तो मुलाकात हुई थी कितनी स्मार्ट और खूबसूरत हंसमुख लड़की थी । "



" आं ! ' ' विजय ने चौंककर उसे इस तरह देखा जैसे वह रेणु की अपने साथ उपस्थिति को भूल ही गया हो । उसने पूछा- ' ' संजय ने कितने बजे खबर दी थी ? "

रेणु ने टाइम बताया ... विजय ने

पूछा

' ' संजय को सरोज मिली कैसे और कहां ? ' '

' ' पता नहीं ...

... बता नहीं पाए कुछ ... जल्दी में थे । ' '

' ' यह भी नहीं बताया कि संजय ने सरोज के लिए तुम्हें फोन करके मेरी ही मदद क्यों मांगी थी ? ' '

' भैया ने बताया था कि सरोज ने ही उन्हें बताया था कि वह मुझसे आपके साथ कल ही सेंट सीरियल रोड पर मिली थी । "

" ओहो ! "



" भैया ने पूछा भी था कि मैं सेंट सीरियल रोड क्या करने गई थी । मैंने उनसे कहा था एक बार विजय से मिल लों ... उन्होंने कहा था- ' मैं अभी उनके सामने नहीं आना चाहता । ' सरोज की कार का क्या हुआ ? ' '

' ' मैंने एक भरोसे के मैकेनिक को फोन कर दिया था ... वह उठाकर अपने गैरिज ले गया है । "

" सरोज के घर वालों को सूचना दोगे । ' '

" अभी नहीं ... मैं पहले सरोज का बयान लेना चाहता हूं । यह मड की तरफ क्या करने गई थी ? ऐसा कौन - सा दुश्मन है उसका जिसने उसे मारने की कोशिश की या सिर्फ टांगें ही कुचलना चाहता था ? ' '

इतने में कदमों की आहटें गूंजी ... वे लोग दरवाजे की ओर देखने लगे ... एक फ्रैंचकट दाढ़ी - मूछों वाला डार्क शीशों की ऐनक लगाए अंदर दाखिल हुआ ।

विजय उसे ध्यान से देखने लगा ... डॉक्टर ने उसकी तरफ ध्यान भी नहीं दिया और सीधा सरोज के बैड पर जाकर उसे चैक करने लगा ।

विजय ने उसे गौर से देखते हुए पूछा

' ' क्या हाल है अब ? ' '

डॉक्टर ने बिना उसकी तरफ देखे कहा- " वैरी सीरियस पल्स रेट बहुत डाउन है । ' '



' होश कब तक आ जाएगा ? ' '

' ' हो सकता है कभी न आए । ' '

.

" व्हाट ! "



" अभी तो इन्हें कम से कम आठ घंटे तक सोते रहना चाहिए ... मैं इंजेक्शन दे रहा हूं । '

डॉक्टर ने जेब से इंजेक्शन की शीशी और सिरिंज निकाली तो विजय ने आगे बढ़कर कहा " नहीं ... अभी इंजेक्शन नहीं दिया जा सकता । ' '



डॉक्टर ने तीखे स्वर में पूछो- ' ' क्यों ? ' '

' ' इसलिए कि पहले इनका बयान जरूरी है । ' '

' ' आप कौन हैं बयान लेने वाले ? ' '

' ' मैं कौन हूं ? यह मैं सिविल सर्जन को बता चुका हूं

' ' तो आप सिविल सर्जन से बात कीजिए ... मुझे अपना काम करने दे । ' ' फिर वह सरोज की बांह उठाने लगा , उसके दूसरे हाथ में भरा हुआ सिरिंज था



विजय ने आगे बढ़कर कहा- " डॉक्टर ! आप इंजेक्शन नहीं दे सकते । ' '

' ' ऐ मिस्टर ... अलग हटिए । "

अचानक विजय के हाथ में रिवाल्वर नजर आया और रेणु चौकन्नी हो गई - वह समझ गई जरूर कोई गड़बड़ है । डॉक्टर नो विजय को घूरकर कहा ' इसका मतलब ? "





' मतलब मैं सिविल सर्जन ही को बताऊंगा । ' ' फिर विजय ने रेणु से कहा - ' ' जरा सिविल सर्जन को खबर करो । "

इससे पहले कि रेणु बढ़ती , डॉक्टर ने विजय के रिवाल्वर वाले हाथ पर हाथ मारा और रिवाल्वर गिर गया था और डॉक्टर ने दरवाजे की ओर छलांग लगाई ... यह अलग बात है कि वह मुंह के बल गिरा , क्योंकि विजय ने उसकी टांगों में टांग अड़ा दी थी ।
 
दूसरे ही क्षण विजय उसकी पीठ पर सवार था ... पहले उसने डॉक्टर के दोनों हाथों को काबू में कर लिया जिनमें से एक हाथ में भरा हुआ इंजेक्शन था और रेणु से बोला

" जल्दी से दरवाजा बंद कर दो । "

रेणु ने झपटकर दरवाजा बंद कर दिया । डॉक्टर के दोनों हाथ उलटी तरफ आने के कारण वह बेबस हो गया था ... वह कराहती आवाज में बोला- " छोड़ दो मुझे

विजय ने कहा- " घबराते क्यों हो , छोड़ दूंगा । ' '

' ' तुम पछताओगे । "

" हम लोगों का तो जन्म ही पछताने के लिए होता है । ' ' और उसने डॉक्टर के हाथ पीछे लाकर एक - दूसरे के उपर करके अपनी बेल्ट से कसकर बांध दिये और बोला- ' ' अब तुम चिल्लाना चाहते हो तो चिल्ला सकते हो । ' '

' ' मैं कहता हूं - अब भी छोड़ दो मुझे । ' ' डॉक्टर हांफता हुआ बोला ।

' ' घबराओ मत ... मैं तुम्हें बिल्कुल छोड़ दूंगा । " विजय ने उसके हाथ से लिया हुआ इंजेक्शन संभाला और रेणु से बोला- " इसका बाजू पकड़ लो

। ' '

रेणु बाजू पकड़ने के लिए झुकी तो डॉक्टर बिलबिलाकर बोला- ' ' यह क्या कर रहे हो तुम ? "

" इंजेक्शन लगा रहा हूं । ' ' " नहीं , तुम ऐसा नहीं कर सकते । ' '

" क्या हर्ज है ... तुम सरोज को आठ घंटे के लिए सुलाना चाहते थे - मैं आठ घंटे के लिए तुम्हें सुलाए देता

' ' नहीं ... नहीं ... खुदा के लिए यह इंजेक्शन मत

लगाना ! ' '

' ' इसलिए कि इसमें जहर है । ' '

' ' हां । ' '

" तुम इसके द्वारा सरोज को खत्म करना चाहते थे

" हां । "

" फिर अपनी मौत से क्यों डरते हो ? ' '

" तुम - तुम ... कौन हो ? " ' ' मैं कोई भी हूं । अब तुम मुझे बताओगे कि तुम कौन हो ... और तुम्हें सरोज को मार डालने का किसने हुक्म दिया था । "

फिर विजय उठ गया ... डॉक्टर ने पलटी खाई और विजय पर टांगों से वार करना चाहा , लेकिन विजय ने अचानक उसकी दोनों टांगें पकड़ ली .. डॉक्टर झटके मारता रह गया और धड़ाम से गिरा ।

विजय ने रेणु से कहा- " रेणु यह रिवाल्वर उठा लो | ' '

रेणु ने रिवाल्वर उठा लिया । विजय ने कहा ' ' इसकी कनपटी पर इतनी जोर से मारो कि दो घंटे तक होश में न आ सके ! ' '

रेणु ने नाल की ओर से पकड़कर रिवाल्वर संभाला ही था कि डॉक्टर बिलबिलाकर गिड़गिड़ाया

" नहीं - नहीं , मुझे घायल मत करो । ' '

' ' मैं तुमसे यहां बात नहीं करना चाहता । ' '

" तुम क्या बात करोगे ? "

" ठिकाने पर चलकर बताऊंगा ! "

' ' मैं तुम्हारे साथ खुद ही चलने को तैयार हूं । ' '

" ठीक है । ' ' विजय ने उसे खड़ा कर दिया । डॉक्टर ने कहा - ' ' मेरे हाथ पीछे बंधे देखकर लोग क्या कहेंगे । "

विजय ने रिवाल्वर रेणु से ले लिया - अपनी जेब में हाथ डालकर कहा- ' ' रिवाल्वर वाला हाथ मेरी जेब में है । और मेरा निशाना कभी नहीं चूकता - तुमने जरा भी हरकत की तो मैं गोली मार दूंगा । "

फिर उसने रेणु से कहा- " तुम सरोज के पास ठहरो - सिविल सर्जन से कह देना , मेरी वापसी से पहले होश आने पर उसको कोई बयान न देने दिया जाए । "

" ठीक है । "

" वैसे अगर तुम कुछ मालूम कर सकती हो तो कर लेना । " फिर विजय ने डॉक्टर से कहा- “ चलो । "

दोनों बिल्कुल दोस्ताना ढंग से बाहर निकले - रात काफी बीत चुकी थी इसलिए भीड़ - भाड़ नहीं थी - विजय ने कहा

" मेरी गाड़ी पार्किंग में है । "

" मेरे पास भी गाड़ी है - पिछवाड़े की तरफ । "

" मगर तुम्हें मेरी गाड़ी ही से चलना है । "

" कहां ले जाओगे मुझे ? "

" दावत खिलाने । "

" मैं अकेला नहीं हूं । "

' अब मैं इतना भी गरीब भी नहीं हूं कि दस - पांच आदमियों की खातिर न कर सकूँ । "

दोनों पार्किंग में आ गए । सुपर विजय सरदाना की टाटा सूमो पार्किंग में खड़ी नजर आई - डॉक्टर ने कहा

" यह गाड़ी तुम्हारी है ? "

' अब क्या सरोज जैसी सुन्दर लड़की किसी ऐरे - गैरे को घास डालती है । "

दोनों अगली सीट पर बैठ गए , लेकिन डॉक्टर अब लड़ाई - भिड़ाई के मूड़ में नहीं नजर आता था - वैसे वह चौकन्ना था ।

विजय ने दर्शन स्टार्ट करके गाड़ी बढ़ा दी । डॉक्टर

ने कहा

" बड़े अमीर लगते हो ... सरोज से कब से ताल्लुकात हैं ? "

" काफी पुराने जब वह सड़कों पर ग्राहक ढूंढती थी ... तुम शायद नए आशिक हो । '

" सिर्फ दो हफ्ते पुराना । " " आशिक होकर माशूक से अचानक दुश्मनी पर क्यों उतर आए ? "

" दगाबाज माशूक को जिन्दा छोड़ना कैंसर पालना है । "

" क्या सरोज ने तुमको धोखा दिया है ? "

" बहुत बड़ा धोखा ... यार ! हम दोनों बेकार एक - दूसरे से टकरा बैठे । "

" मेरी जगह होते तो मार ही डालते - आज हम दोनों शादी के बंधनों में बंधने वाले थे । "

" फिर अचानक यह दुश्मनी क्यों ? ' '

" उसकी जिद थी कि पहले मैं एक करोड़ डालर उसके नाम स्विस बैंक में डलवा दूं जो मेरे लिए अभी मुमकिन नहीं था । "

" ओहो ! "

" मैंने कोशिश की थी कि वह कुछ दिनों के लिए मान जाए , मगर वह नहीं मानी ... मुझे गुस्सा आ गया

| "

" और तुमने उसकी टांगें कुचल डालीं ? "

" मैं तो उसे कुचलकर मार ही डालना चाहता था - मगर एक अजनबी बीच में आकर चिल्ला पड़ा

और इसकी सिर्फ टांगे ही कुचलकर रह गई ... इसी वजह से मेरा एक जांबाज लड़ाका मारा गया ! "

" कहां रहते हो तुम ? "

" मेरे पास इंटरनेशनल पासपोर्ट है , मुझे वीजा भी नहीं लेना पड़ता - जिस मुल्क में चाहूं , जितने दिन चाहूं रह सकता हूं । "

" बहुत बड़े आदमी मालूम होते हो ... बड़ी खुशी की बात है । "

" मेरे बाप के दो जहाज हैं ... एक जहाज यहां आया हुआ है ... मड की तरफ लंगर डाले हुए है । ' '

" क्या नाम है जहाज का ? ' '

" शाहीन । "

" ओहो ... तो शाहीन के मालिक तुम हो । '

" हां । "

“ सरोज से मुलाकात शाहीन पर ही हुई थी ? " " मुलाकात तो सन एंड सैंड में एक पार्टी में हुई थी ... बहुत अच्छी लगी ... तभी अपनाने को फैसला कर लिया था । "

" फिर ... ?

' आज हमारा निकाह होना था ...

... सरोज पहुंच भी गई , लेकिन अचानक एक करोड़ डालर की उसकी शर्त ने गड़बड़ कर दी । "

" फिर क्या हुआ ? ' '

" यह वापस जाने लगी तो मैंने अपने जांबाज से कहा- ' इसे समुद्र में डुबो दो ... उसकी मोटरबोट का पीछा किया गया ... मोटरबोट तो डूब गई ; मगर सरोज बच गई ... पता नहीं कब कूद गई थी । "

" फिर ? ' '

" मेरा जांबाज जानता था कि वह अपनी कार के पास ही पहुंचेगी - फिर वह जैसे ही कार की ओर आई , मेरे जांबाज ने उस पर कार चढ़ा दी , लेकिन किसी ने रुकावट डाल दी ... और इसकी सिर्फ टांगें कुचलकर रह गई । "

“ और तुम्हारा जांबाज ? ' '

" उसे किसी ने मार डाला । ' '

" और तुम सरोज को मारने चले आए । "

" जब मेरे आदमी किनारे पर पहुंचे ... तुम अपने साथी के साथ सरोज को उठाकर अपनी सूमो में डाल रहे थे । ' '

" और उन लोगों ने मेरी कार का पीछा किया । ' '

" हां ... इस तरह मुझे मालूम हो गया कि सरोज कहां है - मैं उसे किसी कीमत पर जिन्दा नहीं देखना चाहता

" क्या कीमत लगाते हो उसकी मौत की ? ' '

" मुंह मांगी । "

" एख लाख डालर । ' '

" मंजूर है । "

" श्योर ! "

" एब्स्लूटली । "

" तो फिर मिलाओ हाथ । ' '

" मैं खाली हाथ किसी से हाथ नहीं मिलाता । ' '

" चलो ... अभी तुम्हारा हाथ भरे देता हूं । ' '

" तुम्हारा नाम क्या है ? "

" शेख अब्दुल - जब्बार - अल जाबर ... वैसे लोग मुझे जाबर ही कहते हैं । "

' अच्छा ... तो जाबर साहब , आपको कहां पहुंचाऊं ? ' '

" मड के साहिल पर । "

विजय ने गाड़ी की रफ्तार तेज कर दी ... वह बैक - व्यू मिरर में देख रहा था ... एक बड़ी - सी वैन उनका पीछा कर रही थी ।

मड के पास किनारे पर सूमो रुक गई । विजय ने इंजन बंद करते हुए उससे कहा- " आ गई तुम्हारी मंजिले । ' '

" शुक्रिया दोस्त । "

" एक लाख डालर ... ? ' '

" वह सामने सफेद जहाज देख रहे हैं । " जाबर ने इशारा करते हुए कहा- " वह मेरा जहाज है , शाहीन । "

" बहुत खूब ! "

" एक लाख डालर के लिए तुम्हें वहां तक चलना पड़ेगा । "

" क्या कार में ? "

जाबर हंस पड़ा- " मेरी मोटरबोट आ जाएगी । "

" जरूर चलूंगा । "

" मोस्ट वैलकम । "

जाबर उतर गया , विजय भी उतरा । वैन पीछे आकर रुक गई ... उसमें से केवल चार आदमी ही उतरे - विजय यही जानना चाहता था कि जाबर के साथ कितने आदमी हैं ।

जाबर ने कहा- ' ' यहीं एक किश्ती खड़ी थी मछेरे की ... अब वह गायब है ... उन्हीं लोगो ने सरोज की मदद की होगी । ' '

जाबर के साथियों ने विजय को चारों ओर से घेर लिया । विजय ने जाबर से कहा- " बुलवाओ मोटरबोट को । '

-

जाबर बहशियाना ढंग में मुस्कराया और बोला

' आ जाएगी - अपना रिवाल्वर मेरे हवाले कर दो । "

" क्यों ? "

" हमारे शिप पर कोई आदमी हथियार लेकर नहीं जा सकता । "

" मगर हथियार तो मैं हमेशा पास रखता हूं - मेरी आदत है । "

" बुरी आदत है ... बदल डालो ... आज ही और अभी

' अब इतनी जल्दी भी क्या है ? ' '

" जरा अपने चारों तरफ देख लो । "

विजय ने उन चारों की देखा और मुस्कराकर बोला- " मेरे लिए कोई नई बात नहीं । "

" बहुत जियाले हो । "

" जिबाला न होता तो इतने आराम से यहां तुम्हारे साथ इस वीराने में क्यों चला आया होता । ' '

" रिवाल्वर निकालो ? "

" क्या फायदा ? ' '

" तुमने मेरी बहुत बेइज्जती की है - मैं ऐसे आदमी को कभी माफ नहीं करता । ' '

" अच्छी आदत है । "

" कौन हो तुम ? "

" सरोज का एक पुराना आशिक । "

" झूठ बोलते हो तुम । "

" जो चाहो ... समझ लो । ' '

" तुम कोई आफिसर हो ... सी . आई . डी . के । ' '

विजय ने ठहाका लगाया - जाबर उसे घूरता रहा - विजय ने बड़ी देर बाद अपना ठहाका रोका और बोला- “ एक नहीं , दो - दो समुद्री जहाजों का मालिक अब्दुल जब्बार अल - जाबर एक सी . आई . डी . ऑफिसर से डरता है । "

" हम इस जमीन पर ज्यादा खून - खराबा नहीं चाहते

। "

“ अच्छा ... ! " ज्वाला प्रसाद के खून से ही तसल्ली हो गई । "

" ओहो ... तुम काफी कुछ जानते हो और यह बात तुम्हारी सेहत के लिए अच्छी नहीं । "

" मेरी सेहत तो खराब हो चुकी है - अब तुम अपनी सेहत की फिक्र करो । "

जाबर ने अपने साथियों से कहा

" मार डालो इसे । ' '

विजय ने हाथ उठाकर कहा- " एक मिनट । ' '

जाबर ने पूछा- " क्या कहना चाहते हो ? ' '

" मैंने एक लाख डालर कभी एक साथ नहीं देखे ' अब देखना चाहते हो ? "

" हर महीना ।।

" अच्छा ! "

" मैं बहुत बड़ी पोस्ट पर हूं - समझ लो , पूरा डिपार्टमेंट तुम्हारे कब्जे में होगा । ' '

" कौन हो तुम ? "

" सी . बी . आई . सुपरिन्टेंडेंट । ' '

" नाम ? ' '

" विजय सरदाना । ' '

जाबर ने चौंककर कहा- " सुपरिन्टेंडेट विजय सरदाना फ्रॉम सेन्ट्रल इंटेलीजेंस । ' '

“ यस । '

" तुम्हारा नाम तो बहुत मशहूर है । ' '

" इसीलिए तो कीमत भी ज्यादा है । "

" सुना है , तुम किसी कीमत पर नहीं बिक सकते

" यही पब्लिसिटी तो भाव बढ़ाती है । "

जाबर के एक साथी ने कहा- " यार शेख ! यह आदमी मक्कार मालूम होता है । " दूसरे ने कहा- " हम लोगों को डॉज दे रहा है । ' '

तीसरे ने कहा- " इसे फौरन मार डालना चाहिए । "

चौथे ने अंधाधुंध विजय पर हमला कर दिया - विजय भी यही चाहता था , क्योंकि दूसरे ही क्षण विजय ने हमलावर को ढाल बना लिया और पीछे हटकर बोला " चलाओ गोलियां । '

हमलावर चिल्लाया- “ नहीं ... नहीं ... मैं मर जाऊंगा | ' '

जाबर ने मुट्ठियां भींचकर कहा- ' ' उल्लू के पढे , तुझे किसने कहा था हमला करने को ? "

' ' श ... श ... शेख ... ! "

" शेख के बच्चे ... अब पहले तू ही मरेगा । "

" नहीं ... ! ' '

जाबर ने दूसरे साथियों को हुक्म दिया- " करो फायरिंग , इसके बाद तो विजय ही मरेगा । अब उसे जरूर मारना हैं । "
 
उन लोगों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी - हर फायर के साथ शिकार की चीख गूंजी , क्योंकि विजय इस फुर्ती से शिकार को पकड़े हुए तेजी से दाएं बाएं घूमता कि सारी गोलियां शिकार के बदन में घुस गई - विजय एक हाथ से उसे संभाले अपना रिवाल्वर बाहर निकाल चुका था उसने पहला फायर किया और एक चीख के साथ एक आदमी उछलकर चित्त गिरा - जाबर चिल्लाया- ' ' हरामजादो जल्दी करो । "

इस बार दो फायर हुए और दो साथी और ढेर हो गए - आखिरी साथी का रिवाल्वर खाली हो गया - और उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं ।

जाबर चिल्लाया- “ अबे लोड़ कर । "

अचानक वह साथी भाग खड़ा हुआ , लेकित विजय की गोली ने उसकी टांग की पीछे से उधेड़ दिया - वह चीख मारकर गिरा और तड़पने लगा ।

जाबर की आंखे अब भी शोले बरसा रही थीं ।

विजय ने मरे हुए आदमी की लाश फेंक दी और वहशियाना मुस्कराहट के साथ जाबर से बोला

" हां , तो शेख अब्दुल जब्बार अल - जाबर - अब क्या

ख्याल है ? "

जाबर ने गुर्राकर कहा- " मार दो मुझे गोली । "

-

" अरे नहीं । "



" मर्द के बच्चे हो तो गोली चलाओ । "

" मर्द के बच्च निहत्थे पर वार नहीं करते । "

" तो फिर मैं तुझ पर वार करता हूं । "

जाबर ने विजय पर छलांग लगाई , मगर विजय एक ओर हट गया और जाबर धप्प से रेत पर गिरा । विजय ने कहा- “ एक मौका और देता हूं । "

जाबर उठता हुआ चिल्लाया- " उल्लू के पट्टे ... मुझे मार डाल । "

" विजय बेबसों पर वार नहीं करता । "

" हरामजादे ! "

जाबर ने फिर छलांग लगाई , लेकिन विजय फिर बच गया । जाबर ने हांफते हुए उससे गुर्राकर कहा- “ तू मुझे गिरफ्तार नहीं कर सकता । "

" जानता हूं । '

" मेरे पुलिस स्टेशन पहुंचते ही हमारा ऐम्बेसी में हलचल मच जाएगी । "

" मालूम है , इसीलिए मैं तुम्हें सरकारी मेहमान नहीं बनाना चाहता बल्कि निजी मेहमान बनाऊंगा । "

" अपना मेहमान बनाकर क्या मेरी जबान खुलवाएगा ? "

" नहीं ... बड़े प्यार से सरोज की तुम्हारे साथ शादी कराऊंगा । "

" हरामजादे ! तू सौ साल तक मुझे तंग करता रहे , फिर भी मेरी जबान नहीं खुलवा सकता - मेरा नाम जाबर है । "

" जबान खुलवाने की हमें जरूरत ही क्या है ? मैं जानता हूं तुम्हारा जहाज किस प्रकार की गतिविधियों के लिए खड़ा है ? ' ' ज्वाला प्रसाद जी के खून का उद्देश्य क्या है ? तुम लोग यहां आतंक फैलाकर आने वाले चुनावों को उलट - पुलट करना चाह रहे हो । "

" तुम कुछ भी साबित नहीं कर सकते । "

" मैं तुम्हारी हाड्डियां तो तोड़ सकता हूं । "



" व्हाट ! "

" तुम्हें अपनी इज्जत प्यारी है न - मैं हर रोज एक - एक घंटे के बाद तुम्हारी खातिर पांच - पांच जूते मारकर कर लूंगा । "

जाबर गला फाड़कर दहाड़ा , विजय ने जोरदार ठहाका लगाया- और जाबर से बोला- " सिर्फ सुनकर तुम्हारा यह हाल है तो जब तुम्हारे साथ यह सलूक किया जाएगा , तब तुम क्या करोगे ? ' '

जाबर के ऊपर जैसे पागलपन सवार हो गया ... वह विजय सरदाना पर बुरी तरह टूट पड़ा । विजय सरदाना जानता था कि किसी अपराधी की मानसिक दशा बिगाड़ने का मतलब होता है उसका काबू में आ जाना - वह बिना फाइट किए जाबर को लगातार थकाता रहा - और जाबर उसको घेरने की कोशिश करते - करते समुद्र के पास आ गया और फिर ... अचानक जैसे सरदाना को बचपने का एहसास हुआ हो , क्योंकि जाबर ने अचानक हवा में ऐसे छलांग लगाई और उड़ता हुआ समुद्र में उस जगह चला जहां लहरों ने उसे ढंक लिया - विजय को रिवाल्वर निकालने तक का समय नहीं मिला - उसने भी दौड़कर तेजी से पानी में छलांग लगा दी और गोता लगाकर दूर तक उसे ढूंढता चला गया , लेकिन जाबर का कोई पता नहीं मिला - जाबर ने विजय को बहुत अच्छा डॉज दिया था

-

कुछ देर बाद विजय सरदाना किनारे पर खड़ा आश्चर्य से चारों ओर देख रहा था ... क्योंकि वहां से जाबर के चारों आदमी भी गायब थे - यहां तक कि खून के छींटे तक नहीं थे ... लेकिन उसकी टाटा सूमो ज्यों की त्यों खड़ी थी ।

विजय ने मुड़कर देखा , दूर वही सफेद जहाज लंगर डाले था जिसका नाम जाबर ने शाहीन बताया था ।

विजय को फौरन सरोज का ख्याल आया ... उसके साथ रेणु भी थी..वह फुर्ती से सूमो की ओर बढ़ा , और उसके डैश बोर्ड से मोबाइल निकालकर बटन दबाए । फिर रिसीवर कान से लगा लिया - दूसरी तरफ से एक मर्द की आवाज आई- " हैलो ! सिविल हॉस्पिटल । ' '

" कुड आई टेक टू सिविल सर्जन । "

" जस्ट ए मिनट । "

कुछ क्षण बाद सिविल सर्जन की आवाज आई

" यस सिविल सर्जन स्पीकिंग । "

" मैं सुपर विजय सरदाना हूं । "

" ओहो ...

... आप कहां हैं मिस्टर सरदाना ? ' '

' क्या हुआ ? रेणु कहां है ? "



" रेणु तो बेहोश पड़ी है , वार्ड में । ' '

" ओ ... नो ! ' '

" मैंने अभी एक जूनियर डॉक्टर को भेजा था - उसने आकर यही बताया है मुझे । "

' और सरोज जो बेहोश थी । "

" सरोज का बैड़ खाली पड़ा है । "

" यह क्या कह रहे हैं आप ? आपको मालूम है वह कितनी जरूरी हस्ती है कानून की नजर में । "

' आप ही ने रोक दिया था कि सिविल पुलिस को इन्फार्म नहीं करना । मैं तो समझ रहा था आप वार्ड में मौजूद होंगे ।

" वैसे रेणु है तो कुशल । "

" जी हां ... वह सिर्फ बेहोश है । ' '

" उसकी हिफाजत आपकी जिम्मेदारी है ... मैं थोड़ी देर में ही पहुंच रहा हूं । '

फिर उसने डिस्कनेक्ट कर दिया ।

विजय तेजी से चलता हुआ वार्ड में पहुंचा तो रेणु वहां मौजूद थी , मगर उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं ... उसके साथ सिविल सर्जन भी था जो परेशान था



विजय को देखकर रेणु हड़बड़ाकर उठी- " विजय ! ' ' वह झपटकर विजय के कंधे से लगकर सिसक पड़ी । विजय ने उसे थपकी दी और बोला

" तुम ठीक तो हो । '

" हां ... मैं ठीक हूं । ' ' सिविल सर्जन ने कहा- " लेकिन यह कुछ बता नहीं रहीं । "

' ' इसकी कोई जरूरत भी नहीं ... मैं आपका आभारी हूं कि आपने हमारे साथ को - ऑपरेट किया । "

" यह तो मेरी ड्यूटी थी । "

" बस , यह बात आप ही तक रहनी चाहिए कि मैं किसी को लेकर यहां आया था और वह यहां से गायब हो गई । "

' आप सन्तोष रखिए ... मगर मैं उलझन में रहूंगा ... ऐसा यहां पर पहले कभी नहीं हुआ । ' '

" डोंट वरी ... सब जगह कुछ न कुछ होता रहता है

। "

फिर वे दोनों बाहर निकल आए - रेणु के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं । विजय ने पूछा- " हां ... बताओ क्या हुआ था ? "

वे लोग सूमो में बैठ गए । सूमो चल पड़ी थी । रेणु ने थूक निगलकर जवाब दिया

" तुम्हारे जाने के थोड़ी देर बाद ही डॉक्टरों की टीम आ गई , उनमें दो नर्से भी थीं - उन्होंने कहा- ' इस पेशेंट का अर्जेन्ट ऑपरेशन होना है ' -मैंने कहा - जब तक विजय नहीं आ जाते ऑपरेशन नहीं होगा । ' '

" फिर ... ! "

" उन लोगों ने कहा- " कोई बात नहीं ... हम इन्तजार करते हैं ... फिर एक नर्स ने अचानक मेरी नाक पर रूमाल रखकर मुझे बेहोश कर दिया - और जब मैं होश में आई तो सरोज गायब थी - सिविल सर्जन मेरे पास था - मैंने कुछ नहीं बताया । ' ' " अच्छा किया - चिन्ता मत करो । "

" मगर आप जिसे ले गए थे , उसका क्या हुआ ? "

" मैं भी उससे धोखा खा गया । ' '

" क्या मतलब ? ' '

विजय ने रेणु को विस्तार से बताया और बोला ' ' शाहीन नाम का जहाज समुद्र में मड से थोड़ा परे लंगर डाले खड़ा है । शेख अब्दुल जब्बार अल - जाबर उस पर है , लेकिन मैं उसे गिरफ्तार नहीं कर सकता । "



" मगर उसने सरोज का अगवा कराया है । "

" हमारे पास इसका क्या प्रमाण है ? "

" क्या तुम्हें भी प्रमाण की जरूरत है ? "

" सबसे बेबस हमीं लोग तो होते हैं । "

' अब क्या होगा ? वह सरोज को क्यों मारना चाहते हैं ? "

' ' इसलिए कि सरोज को उनकी गतिविधियों की पूरी जानकारी थी । "

" फिर वह बचकर क्यों भाग रही थी ? "

" यह तो होश आने पर वही बताती । "

" इसका मतलब है ज्वाला प्रसाद के कत्ल का जाल बहुत दूर तक फैला हुआ है और कालीचरण इन लोगों की साजिश में शामिल हुआ होगा । "

" हो सकता है । "

" आप भ्रम की - सी बातें कर रहे हैं । "

" अभी पूर्ण रूप से मामला मैं भी नहीं समझ सका

" मुझे क्या करना है ? "

" अभी तुम घर जाओ और संजय से मेरी मुलाकात जल्दी से जल्दी से करानी है तुम्हें ... बहुत जरूरी है । मैं तुम्हें घर छोड़े जाता हूं । "

रेणु कुछ नहीं बोली ।

रेणु को उसकी बिल्डिंग के पास उतारकर विजय आगे बढ़ गया .. फिर एक जगह मोटर संभालकर मोबाइल का बटन दबाकर नम्बर मिलाए ।

दूसरी ओर से यस की आवाज आने पर उसने कहा

" आई . जी . सर , मैं सुपर विजय सरदाना । ' '

" हां विजय बोलो । ' '

' ' सर ! जल्दी से जल्दी मुझे शाहीन नाम के समुद्री जहाज की तलाशी का वारंट चाहिए और सी एंड सिविल फोर्स की मदद चाहिए ।

" शाहीन कौन - सा जहाज ! " चौंककर पूछा गया ।

" मड की तरफ किनारे से दूर लंगर डाले खड़ा है जबकि उधर कोई भी विदेशी जहाज लंगर नहीं डाल सकता । "

" वह जहाज किसका है ? "

" कोई अरब शेख है , अब्दुल जब्बार अल - जाबर नाम का ... जहाज कमर्शियल दौरे पर है । "

" मगर उस जहाज की तलाशी क्यों लेनी है ? "

" सर ! मुझे विश्वास है कि ज्वाला प्रसाद जी के खून की साजिश का जाल उस जहाज से फैलाया गया

" नहीं ! "

' ' मैं खुद गवाह हूं । "

" किस आधार पर ? "

" तफसील लम्बी है ... अगर फौरन जहाज की तलाशी न ली गई तो बहुत नुकसान हो सकता | उस जहाज पर ऐसे सबूत मिल सकते हैं जिन द्वारा हमें उनकी स्थानीय कठपुतलियों का पता मिल सकता है । ' '

आई . जी . के खामोश होने पर विजय ने कहा " सर ! क्या सोच रहे हैं ? "

आई .. जी . ने कहा- " भई , वह देश हमारे दोस्त देशों में है ... इससे खुल्लम - खुल्ला दुश्मनी हो जाएंगी

| "

" सर ! हमने हमेशा दोस्तों पर भरोसा करके ही धोखा खाया है और नुकसान उठाया है । "

दूसरी ओर से फिर जल्दी जवाब न मिलने पर विजय ने होंठ भींचकर कहा- “ सर ! शायद आप अपने आपको बेबस समझ रहे हैं । "

" भई ! तुम मुझसे मिली तो मैं तुम्हें समझाने की

कोशिश करू । "

" ओ . के . सर ! मुझे जब भी वक्त मिलेगा , मैं आपसे मिलने की कोशिश जरूर करूगा । ' '

" तुम कुछ नाराज हो । "

!

" कुछ नहीं सर ! मैं भी इस देश का एक नागरिक हूं - निजी तौर पर भी देश के प्रति मेरी कुछ जिम्मेदारियां हैं । "

" सरदाना ! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूं इसलिए मैं तुम्हे परामर्श दूंगा कि तुम ऐसा कुछ मत कर बैठना कि कानून तुम्हारे ही गले पड़ जए । "

" सर ! मैं आपके परामर्श पर अमल करने की कोशिश करूँगा । " फिर उसके होंठ और भी सख्ती से

भिंच गए ।
 
जब विजय सरदाना के दिमाग में इमरजेंसी सम्बन्धी विचार सवार होते हैं तो वह बहुत चौकन्ना और कर्तव्य और सुरक्षा के लिए सावधान हो जाता है और विचार शटल की तरह तेजी से घूमते हैं ... लेकिन मूड खराब नहीं करता - इस समय वह इसी मानसिक अवस्था में था ।

उसने सूमो का मुंह एक ऐसे गैरेज की ओर मोड़ दिया जो रात - दिन खुला रहता था और उसका मालिक अब्दुल रहमान बरसों से उसे अच्छी तरह जानता था और दिल से इज्जत करता था ।

" कोई खराबी साहब ? " विजय से इतनी रात गए आने पर पूछा ।

" बस ,

यही समझ लो । ' '

" ओहो ! समझ गया , कब तक ? "

' अगर कोई पूछने आए तो कहना , कम से कम एक हफ्ता मरम्मत में लगेगा - और मैं कहां गया हूं ? पता नहीं । "

" मैं बिल्कुल समझ गया साहब ... आपकी प्राइवेट गाड़ी निकालूं ? "

" उसे तैयार रखो ... आजकल किसी भी वक्त जरूरत पड़ सकती है । "

फिर वह बाहर निकल आया ... कुछ देर बाद वह एक लोकल बस में सवार होकर घर की तरफ जा रहा था - रात बहुत हो चुकी थी , सवारियां भी कम नजर आ रही थीं ।

अपने ठिकाने से एक स्टॉप पहले उतरकर पैदल चलना शुरू कर दिया और अपनी बिल्डिंग के पास पहुंचकर उसने दूर ही से निरीक्षण शुरू कर दिया । बिल्कुल फाटक के सामने ही उसे एक ऐसा आदमी नजर आया जिस पर निगरानी रखने का सन्देह किया

जा सकता था ।

विजय सरदाना बिल्डिंग के पिछवाड़े की ओर बढ़ गया - कम्पाउंड - वाल काफी ऊंची और कांटेदार तारों के जाल से ढंकी थी , लेकिन विजय इस दीवार को कई बार पार कर चुका था - कुछ देर बाद वह बंगले के अंदर था ... सेनेटरी पाइप के सहारे वह टेरेस तक पहुंच गया ... फिर अपने ब्लॉक में उतर आया । तीन फ्लैटों की बिल्डिंग थी ... दो फ्लैटों में सन्नाटा था ।

विजय कुछ देर सुनगुन लेता रहा । फिर उसने अपने फ्लैट का दरवाजा बहुत धीरे से खोला और अंदर दाखिल हो गया - बत्ती जलाना उसने उचित नहीं जाना - सबसे पहले वह बैडरूम की ओर बढ़ा - पेंसिल टॉर्च निकालते समय ही उसकी छठी ज्ञानेन्द्री ने खतरे की घोषणा कर दी थी ।

उसने पेंसिल टॉर्च का छोटा - सा दायरा पहले अपने बैड पर डाला और उसके होंठ दायरे की शक्ल में सिकुड़ गए - क्योंकि उसके बैड के ऊपर सरोज चित्त लेटी छत की ओर देख रही थी ।

विजय आगे बढ़ा और ध्यान करने पर उसे विश्वास हो गया कि उसका सन्देह गलत नहीं था , क्योंकि सरोज मर चुकी थी - उसकी फटी हुई आंखें छत को ताक रही थीं - उसके चेहरे से साफ झलकता था कि उसे गला घोंटकर बेहोशी की हालत में ही मारा गया है



विजय ने पूरी सावधानी से पूरे बैड का निरीक्षण किया - चादर पर शिकन तक नहीं थी - मगर लगता था कि गला घोंटने से पहले उससे बलात्कार भी किया गया है , क्योंकि सरोज का लबादा इसी प्रकार उठा

हुआ था ।

उसके होंठ भिंच गए ... सरोज जैसी खूबसूरत , जिन्दादिल औरत की मौत किसी के लिए भी दुःख का कारण बन सकती थी - स्पष्ट था कि यह हरकत उसे फंसाने के लिए की गई थी - मगर ... |

जिस औरत का धंधा ही अपनी रातें बेचना हो और

जिसकी टांगे पहले ही से मारी गई हों , उसके साथ बलात्कार करके उसका गला घोंटकर मार डालने की क्या तुक हो सकती है ?

उसे साजिश करने वालों की इस मूर्खतापूर्ण अमानवीय हरकत पर थोड़ी - सी हंसी भी आई , लेकिन वह सरोज की मौत के दुःख में दब गई ।

वह बाथरूम की तरफ बढ़ गया और दरवाजा बंद करके मोबाइल फोन निकालकर बटन दबाकर नम्बर मिलाए ।

कुछ देर बाद हैलो की आवाज पहचानकर विजय ने कहा- “ आई . जी . सर , मैं विजय सरदाना हूं । "

" ओहो ... कहां हो तुम ? "

' ' क्यों सर ! आपको खबर मिल गई ? ' '

" हां , किसी गुमनाम आदमी ने कमिश्नर को फोन पर बताया है कि तुम जबरदस्ती सरोज नाम की एक नई हीरोइन को जबरदस्ती अपने फ्लैट ले गए हो । ' '

विजय के होठों पर शरारत भरी मुस्कराहट फैल गई और उसने शोख स्वर में जवाब दिया- " और मैंने उसके साथ बलात्कार करके उसका गला घोंटकर उसे जान से मार डाला है - और वह भी जबकि वह बेहोश थी और उसकी टांगें कुचली हुई थीं । ' '

" व्हाट ! "

" यस सर ! मैंने उसकी टांगें भी तो तोड़ दी हैं । "

" विजय ! "

" सर ! " उसकी लाश इस वक्त मेरे बैड पर है और मेरी बिल्डिंग के चारों तरफ सादा लिबास वालों का

पहरा है । "

" तुम कहां हो ? "

' अपने ही फ्लैट में । "

बेचैनी से कहा गया- " ओह ! तुम ... तुम फौरन मुझसे मिलो । "

" सर ! क्यों न मैं गिरफ्तार हो जाऊं । "

" विजय प्लीज ! बचपना नहीं - अभी कौम और देश को तुम जैसे ऑफिसरों की सख्त जरूरत है । "

विजय व्यंग्य उड़ाने के ढंग में हंसा तो आवाज आई

" विजय ! मैं तुम्हें हुक्म दे रहा हूं - फौरन मुझसे मिलो । "

विजय एकदम गम्भीर होकर बोला- " ओ . के . सर ! मैं आ रहा हूं , मगर कुछ देर लगेगी । "

" क्यों ? ' '

" यह आकर बताऊंगा । "

" मैं बेचैनी सै तुम्हारा इन्तजार कर रहा हूं । "

फिर विजय ने फोन बंद कर दिया ... उसकी आंखों में इस समय एक बहशियाना और शैतानी चमक नजर आ रही थी ।
 
आई . जी . जगदीश चावला अपने बंगले के ड्राइंग रूम में टहल रहा था । वह बार - बार घड़ी देखने लगता ... इतने में फोन की घंटी बजी और उसने चौंककर रिसीवर उठा लिया- " हैलो ! "

' ' सर ! मैं सरदाना । "

" ओह ! कहां हो तुम ? "

" सॉरी सर ! मगर आपका ऑर्डर और मेरी मजबूरी थी । आपके मकान के चारों तरफ भी सिविल पुलिस के सादा लिबास बाले शिकारी कुत्ते घूम रहे हैं । "

आई . जी . ने रिसीवर रख दिया और सीढ़ियां चढ़कर अपने बैडरूम में आया तो दरवाजा खुला था

और विजय मेज के पास शिष्टता से खड़ा था ... उसने पूरी शिष्टता से आई . जी . से कहा

" मुझे इस गुस्ताखी पर अफसोस है सर । " " क्या सचमुच मेरे बंगले की निगरानी हो रही है ? ' ' " कुछ हायर एथारिटीज जानती हैं कि सी . बी . आई . का डिपार्टमेंट और खासतौर से आप एक जिम्मेदार ऑफिसर हैं जो मुल्क और कौम के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझते हैं और वे लोग भी चाहते हैं मुझे एक्शन में आने के लिए हमेशा आपका संरक्षण प्राप्त हुआ है । ' '

" मगर ... ! "

" आपने मेरा फोन रिसीव करने के बाद किसी को फोन किया था ? "

" हां । "

विजय ने हल्की सांस लेकर कहा- " तो फिर आपके बंगले की निगरानी उसके बाद ही शुरू कराई गई होगी ... उन लोगों को विश्वास हो गया होगा कि मैं आपकी खिदमत में जरूर हाजिर होऊंगा । "

" तो क्या तुम्हारे वारंट ... ! "

" अभी तो नहीं ... रंगे हाथों पकड़े जाने पर ही इश्यू होते हैं । "

" सरोज की लाश कहां है ? ' '

विजय ने धीरे से हंसकर कहा- ' ' ऐसी जगह कि कमिश्नर साहब अपने सिर के बाल नोच लेंगे । ' '

" क्या मतलब ? "

" कमिश्नर साहब के बैडरूम में - उनके बैड पर । ' '

" नहीं ... ! " आई . जी , सन्नाटे में रह गया ।

विजय ने कहा- " अब आप चाहें तो कमिश्नर साहब को रंगे हाथों गिरफ्तार करवा सकते हैं । ' '

आई . जी . ने बेचैनी से कहा- “ यह सब क्या हो रहा है ? बात कहां से शुरू हुई थी और कहां पहुंच गई है ? मेरे दिमाग की रगें फट जाएंगी । "

" मैं आपको कहां से बताऊं ? "

" मुझे तो केवल इतना ही मालूम है कि ज्वाला प्रसाद जी का खून हुआ है - उस वक्त उनके बैडरूम में एक पेशेवर लड़की थी जिसके साथ आने वाले ड्राइवर संजय ने उसका खून किया है ... लड़की गायब है - संजय भी भगोड़ा हो गया है ... उसके बिना जमानत वारंट निकले हुए हैं । "

" बड़ी खूबसूरती से केस बनाया गया है । " " प्लीज ... साफ - साफ और विस्तार से बताओ । "

विजय ने केस की जरूरी - जरूरी बातें बता दी जिनके बताने से किसी पर बात न आए और आखिर में उसने कहा- ' ' ज्वाला प्रसाद जी का असली खूनी संजय नहीं है - संजय के साथ शकीला नाम की एक लड़की थी - सन्देह है कि संजय ने उसे राजदारी के लिए खत्म कर दिया है - मगर शकीला भी मौजूद है और संजय के साथ है । "

" ओह ! "

" और सबसे बड़ी बात यह है कि इतने बड़े आदमी का खून करने वाला एक मामूली पेशेवर लड़की का साथी नहीं हो सकता , क्योंकि उसकी कोई दुश्मनी तो उनसे हो नहीं सकती । ' '

" यह तो ठीक है । "

" ऐसे कातिल की पीठ पर किसी बड़े गिरोह या बड़ी हस्तियों का हाथ होता है ... और जिसे ऐसी हस्तियों की शह और सहायता प्राप्त हो ... उसे दर - ब - दर भटकने की क्या जरूरत है - वह तो आजाद रहेगा । ' '

" सच कहते हो तुम ... मगर वह असल कातिल कौन है ? "

' ' मैं उसी की तलाश में हूं ' '

" वह संजय नहीं ... इसका विश्वास तुम्हें कैसे हुआ ? कोई ठोस प्रमाण है इसका । "

" सर ! उस जूते के तले के निशान से जो ज्वाला प्रसाद जी के बाथरूम में पाया गया है ... वह नौ नम्बर के जूते का निशान है , जबकि संजय के जूते का नम्बर आठ है । "

" हूं ... क्या वह आदमी कालीचरण नहीं हो सकता जिसके आदेश पर संजय ने अपनी जगह नौ नम्बर के जूते वाले किसी खास हार्ड कोर क्रिमिनल को दे दी हो

" बिल्कुल हो सकता है ... बल्कि सचमुच हुआ है । "

" फिर वह ...

? ' '

मैं अभी उससे मिला ही नहीं हूं । "

' मगर यह शेख अब्दुल जब्बार - अल - जाबर का किस्सा कहां से निकल आया ? "

" सरोज से । "

विजय ने फिर दोहराया कि किस तरह जब वह विशनु की तलाश में था तो उसे सरोज मिली थी और उसी ने विशनु का पता बताया था ... और जब मैं विशनु से मिलकर निकला तो विशनु या तो तीसरे माले से फेंककर मार डाला गया ... या उसको आत्महत्या पर मजबूर कर दिया गया ।

फिर उसने बताया कि किस तरह संजय की बहन को उसका मैसेज मिला और रेणु जब विजय के साथ सरोज को लेकर अस्पताल गई तो क्या घटना घटी और किस तरह वे लोग सरोज को ले गए ।

" सर ! वहीं से शेख बब्दुल जब्बार - अल - जाबर पहले डॉक्टर बनकर आया और उसने सरोज को जहर का इंजेक्शन देकर मारने की कोशिश की । ” पूरी घटना विस्तार से सुनाकर आखिर में विजय बोला " जाबर मेरे हाथ नहीं लग सका ... तभी मैंने शाहीन जहाज की तलाशी के वारंट की दरख्वास्त की थी ... आपके उत्तर से निराश होकर मैं अपने फ्लैट के पास पहुंचा तो दूर ही से शुब्हा हुआ कि मेरे फ्लैट की निगरानी हो रही है - मैंने बैक डोर से सेनेटरी पाइप द्वारा फ्लैट के अंदर पहुंचकर देखा कि मेरे ही बैड पर सरोज की लाश पड़ी थी । ' '

" मतलब , वे तुम्हें रंगे हाथों फंसाना चाहते थे । "

" स्पष्ट है ... आपसे फोन पर मालूम हुआ कि किसी गुमनाम आदमी ने कमिश्नर को फोन पर यह बताया है इसलिए मैंने अपनी बला कमिश्नर के सिर मंढ़ दी । ' '

' ' माई गॉड ! यह क्या हो रहा है । "

" यह कोई नई बात नहीं है ... हमारा देश तो शताब्दियों से विदेशी शक्तियों का अखाड़ा रहा है ... इसी कारण कि हमारी आपसी दुश्मनी , एक राज्य की दूसरे और दूसरे की तीसरे से हम लोगों की प्रकृति बन गई है - आपसी अविश्वास लोभ और लालच में एक - दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र रचना - आपसी छोटी - छोटी रियासतों की जंग ... इतिहास के पीछे मुड़के देखिए - पहले मुगलों के गुलाम रहे - फिर अंग्रेजों के , फ्रांसीसी , पुर्तगाली ... | "

" क्या होगा अब ? "

" सर - किसी को तो शुरूआत करनी पड़ेगी - ज्वाला प्रसाद जी की बे - वक्त मौत से हमारे देश की अनेकता में एकता की पॉलिसी को जबर्दस्त झटका लगा है ... और इस झटके का तोड़ यही है कि अब जो भी यहां है हिन्दुस्तानी है - चाहे वह शताब्दियों से आकर यहां बसे हों , चाहे किसी नस्ल और धर्म के हों

हिन्दू , मुस्लिम सिख ईसाई ,

भारत माता सबकी माई ,

आपस में सब भाई भाई ।

हम सब आपस में एकजुट होकर रहें । तभी मजबूत देश बन सकते हैं ... जब आपसी विरोध और घृणा को समाप्त कर दें ताकि बाहरी दुश्मन कोई फूट डलवाकर ... षड्यंत्रों द्वारा हमें कमजोर बनाकर अपना उल्लू सीधा न करते रहें । "

" मिस्टर विजय सरदाना , यह सब ऊंची बातें हैं । "



" ऊंची बातें , ऊंची आवाज से ही जनता के दिमाग तक पहुंचती है । आखिर एक झूठा नेता कैसे धीमे

और नम्र स्वर में आवाज बदलकर लाउडस्पीकर पर एक वर्ग को बहकाकर उसके दिमाग में अलगाववाद की भावना पैदा कर देता है । "

" तुम यह बताओ , कि अब क्या करने जा रहे हो ? "

" सर ! अगर आपके दिमाग में कोई खास लाइन ऑफ एक्शन हो तो मुझे गाइड कीजिए वरना , मुझे खुद अपने ढंग से काम करने की आज्ञा दें । "

" तुम ... तुम ... क्या ...

? "

" सर ! अगर कोई आरोप लगेगा तो मुझ पर ... मैं कहीं भी मौत की सजा का हकदार हूं तो इसमें झिझकिए मत । "

" मैं चाहता हूं जो कुछ करो , कानून के दायरे में रहकर करो । "
 
विजय ने बुरा - सा मुंह बनाकर कहा- " सर ! कानून बनाया किसने है ? एक आदमी ने , अप्रूवल मिला है कुछ लोगों से । कानून बनाने वाला आसमान से नहीं उतरा था ... मेरे और आप जैसा इंसान ही तो था ।



कानून बनता है , देश और जनता की सुरक्षा और उसके हित के लिए ... और अगर कोई कानून देश की जनता के लिए हानिकारक हो तो क्या हम उस कानून को बदल नहीं सकते ... न बदलें , मगर थोड़ी देर के लिए उसे तोड़कर अपना काम तो निकाल सकते हैं । "

" विजय ... ! "

" सर ! कानून की रस्सी का फंदा ही मेरे गले के लिए तैयार किया था , मेरे बेडरूम में सरोज की लाश पहुंचाकर । जरा सोचिए , अगर मैं चौकन्ना न होता तो इस वक्त कहां होता ? ' '

' ' वह तो है । '

" अब उसी कानून की मदद कीजिए - कमिश्नर साहब को गिरफ्तार करा लीजिए - लेकिन आप ऐसा इसलिए नहीं करेंगे कि आपको मैंने बताया है कि सरोज की लाश मैंने कमिश्नर साहब के बैडरूम में पहुंचाई है ।

' ' बेशक ! "

" मगर आपको इससे क्या .... यह लाश किसी भी तरह कमिश्नर के बैडरूम में पहुंची - कमिश्नर की गिरफ्तारी तो कानून अनुसार होगी ही - भले ही वह अदालत से निर्दोष करार देकर छोड़ दिए जाएं - या उन्हें बलात्कार , खून के अपराध में सजा - ए - मौत सुना दी

जाए । ' '

' ' तुम कहते तो ठीक हो । "

' ' बस , तो सर ! आप मुझे गिरफ्तार नहीं कर सकते तो मुझे अपनी लाइन ऑफ एक्शन खुद बनाने दीजिए । "

आई . जी . ने हल्की सांस ली और बोले- " ठीक है - मगर मुझे कम से कम अपनी एक्शन की सूचना जरूर देना ... हो सकता है कभी जरूरत पड़ जाए । ' '

।'ओ . के . सर ! "

" क्या तुम्हें लगता है कमिश्नर ... ? ' '

' ' सर ! आप हुए , मैं हुआ या कमिश्नर हुए ... हम लोग अपनी ड्यूटी के पाबंद है - हम लोगों का दायरा सीमित है - यहां भी हमें अपने तबादलों के खतरे और प्रमोशन , डिमोशन के लिए हायर अथॉरिटीज पर ही निर्भर रहना पड़ता है , क्योंकि अपनी नौकरी का समय पूरा करना पड़ता है - और हायर अथॉरिटीज जानती हैं कि उनकी अथॉरिटी की कोई मुद्दत नहीं - जनता उन्हें पांच साल तक रखे , पांच महीने या पांच दिन ही में निकाल फेंके । "

" तुम ठीक कहते हो ... मगर तुम अब कहां से

शुरूआत करोगे ? "

" मेरे दिमाग में अभी भी कुछ साफ नहीं है - मगर मैं कोई भी लाइन ऑफ एक्शन तैयार करते समय आपको जरूर खबर कर दूंगा । "

' ' ओ . के . ! ' '

विजय पूरी शिष्टता से सैल्यूट करके आई . जी . के बैडरूम से ऐसे गायब हो गया जैसे वह कभी यहां आया ही न हो ।

आई . जी . के माथे पर चिन्ता की गहरी लकीरें झलकने लगी थीं ।

कमिश्नर ने फोन की घंटी की आवाज सुनकर रिसीवर कान से लगा लिया ।

" हैलो ! ' '

' ' कमिश्नर साहब ! "

' ' स्पीकिंग । ' '

' ' विजय सरदाना का क्या हुआ ? ' '

" वह अभी अपने फ्लैट में नहीं पहुंचा है । ' '



' कब पहुंचेगा ? "

' ' मैं क्या बता सकता हूं । ' ' ' ' पहुंचते ही गिरफ्तार हो जाना चाहिए । ' '

कमिश्नर ने कुछ झुंझलाकर कहा - ' ' बता तो दिया है , उसकी बिल्डिंग के चारों तरफ सादा लिबास वाले फैले हुए हैं ... वे लोग विजय के पहुंचते ही उसे दबोच लेंगे । ' '

-

अचानक फोन पर ठहाके की आवाज आई तो कमिश्नर के चेहरे का रंग बदल गया ... उसने गुस्से से कहा-- " व्हाट नॉनसेंस ! ' '

' ' कमिश्नर साहब , मैं सुपर विजय सरदाना हूं । "

कमिश्नर उछल पड़ा-- ' ' व्हाट ! ' '

' ' जी हां । '

" कहां से बोल रहे हो ? "

" अपने फ्लैट से । ' '

.

" व्हाट ! "

' ' मैं दो घंटे की नींद लेना चाहता हूं ... मगर सोचा पहले आपकी कई रातों की नींद खराब होने से बचा लूं

। "

' ' क्या मतलब ? ' '

' ' मतलब अपने बैडरूम में जाकर देखिए । ' '

' ' व्हाट ! ' '

' ' सरोज की बलात्कार करके दम घुटी हुई डैडबॉडी आपके रूम में आपके बैंड पर पड़ी है । ' '

" नहीं ... ! ' '

' ' इससे पहले कि एंटी करप्शन फोर्स आपले बंगले ... धावा बोले - आप वह लाश यहां से हटा दें । ' '

कमिश्नर सन्नाटे में रह गया - आवाज आई- ' ' हैलो

' ' मैं सुन रहा हूं । ' कमिश्नर ने भर्राई आवाज में कहा । "

' ' मैं चाहता तो यही नाटक आपके साथ कर सकता था - मगर मैं जानता हूं आपने जो कुछ किया , वह अपनी खुशी और अपनी मर्जी से नहीं किया ... आपसे ऐसा कराया गया है - फिर भी एक कानून के रक्षक के नाते आपको अपनी पोजीशन का ख्याल रखना चाहिए । खासतौर से मेरे जैसे ऑफिसर के साथ नाटक करते

समय ।।

' ' विजय सरदाना मैं तुमसे मिलना चाहता हूं । ' '



" जरूर मिलूंगा ... मगर वक्त आने पर । "



" मुझे अफसोस है .... मगर मैं तुम्हारा आभारी हूं कि तुमने मेरी चाल से मुझे मात नहीं दी । "

" कमिश्नर साहब ! वर्दी , कुर्सी वालों की क्या - क्या मजबूरियां होती हैं , यह बात मुझसे ज्यादा बेहतर कौन जान सकता है । "

' क्या तुम सचमुच फ्लैट ही में हो ? ' '





" जी हां और अपने सौदा लिबास वालों को यहां से हटवा दें ताकि मैं आजादी से बाहर निकल सकुँ । '

' हां । "

" और बेहतर होगा , सरोज की लाश को अपने विश्वसनीय लोगों द्वारा लावारिस , एक्सीडेंट में मरी

औरत की लाश डिक्लेयर करके अस्पताल से सर्टिफिकेट लेकर उसका दाह करवा दीजिए वरना नाकाम , झल्लाए हुए लोग आप ही के साथ दुश्मनी पर उतारू हो जाएंगे । "



" तुम ठीक कहते हो । '

।।

' ' ओ . के . एंड गुड नाइट । ' '

फिर दोनों ओर से डिस्कनेक्ट हो गया और कमिश्नर घबराया डरा हुआ अपने बैडरूम की ओर लपक पड़ा ... उसके बैड पर सरोज की लाश मौजूद थी जिसे देखकर वह पत्थर - सा खड़ा रह गया ।
 
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