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Guest
मैं कैसे उसे समझाता कि मर्द से धोखा खाना औरत का प्रारब्ध था । आदिकाल से ऐसा ही चला आ रहा था । कैसे समझाता कि प्यार और वासना में सूई की नोक जितना ही फर्क होता था । कैसे समझाता कि मर्द की भंवरे वाली फितरत नहीं बदल सकती थी ।
“शायद ये आपका भ्रम हो !” - फिर भी मैंने उसे तसल्ली देने की कोशिश की ।
उसने जवाब न दिया, मुझे लगा कि वो अपने आंसू रोकने की कोशिश कर रही थी ।
मैं उठ कर उसके पहलू में पहुंचा और उसकी पीठ थपथपाकर उसे सांत्वना देने लगा ।
वो हौले से मेरे साथ आ लगी, उसने अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया और आंखें बन्द कर लीं ।
मैंने उसका वो गाल सहलाया जो मेरे कन्धे के साथ लगा हुआ था और उसके जो आंसू पोंछे जिनका कोई वजूद नहीं था । मेरा दूसरा हाथ उसके कन्धों के गिर्द से सरक कर पीठ पर पड़ा, पीठ से कमर तक पहुंचा और और भी उत्तर दक्षिण कई जगह भटका ।
उसने कोई ऐतराज न किया ।
मैंने और हिम्मत की, मैंने दायें हाथ की एक उंगली उसकी ठोढी के नीचे टिकाकर उसका चेहरा ऊंचा किया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिये ।
वो कसकर मेरे साथ लिपट गयी ।
कई क्षण यथापूर्व स्थिति बनी रही । फिर एकाएक वो मेरे से अलग हुई ।
“दरवाजा खुला है ।” - वो हांफती सी बोली ।
“लेकिन” - मैं बोला - “केयरटेकर के आने में तो अभी बहुत वक्त है ।”
“इत्तफाकन जल्दी आ सकता है ?”
“ओह ! तो दरवाजा बन्द करें ।”
“जाने दो अब ।”
मैंने जाने दिया ।
वो किसी की ब्याहता बीवी थी, किसी की माशूक थी, फिर भी उस पर ‘अवेलेबल’ का साइन बोर्ड लगा हुआ था । तभी तो सयाने कहते हैं कि औरत अभिसाररत भी हो तो एक हाथ फ्री रखती है ताकि किसी दूसरे कद्रदान, मेहरबान को वेव करने का स्कोप बना रहे ।
त्रिया चरित्रम्, पुरुषस्य भाग्यम्; दैवो न जानियेत्, कुतो मनुष्य: ।
मैं उस घड़ी उसका चरित्र देख रहा था और अपना भाग्य देख रहा था ।
बाज औरतें पंचायती हुक्का होती हैं जिन्हें कोई भी गुड़गुड़ा सकता है ।
फर्क भी क्या पड़ता था !
कहीं कोई मीटर तो लगा हुआ था नहीं ! फिर फिरंगियों की जुबान में कहते ही हैं कि ‘वन्स ए केक इज कट, नोबॉडी मिसिज ए पीस’ ।
यानी एक बार संतरा छिल जाये तो एक फांक की घट बढ़ का क्या पता लगता था ।
उस विषय पर से अपना ध्यान हटाने के लिये मैं बोला - “आपकी सार्थक के शेफाली की तरफ झुकाव वाली बात मुझे कतई हजम नहीं हो रही । जरूर ये आपका वहम है ।”
“तुम कहो” - वो बोली - “कि शेफाली का झुकाव तुम्हारी तरफ है तो मैं मान लूंगी मेरा वहम है ।”
उसकी उस बात ने मेरे सामने धर्म संकट खड़ा कर दिया था ।
क्या मैं उसकी खातिर झूठ बोलूं ? और नहीं तो इसलिये झूठ बोलूं कि अभी खातिर करा के हटा था !
“मेरी उससे हालिया मुलाकात है ।” - मैं बोला - “अभी पिछले शुक्रवार ही मैं उससे पहली बार मिला था ।”
“तो ?” - वो बोली ।
“शेफाली भली लड़की है ।”
गुजश्ता सारी रात मेरे साथ गुत्थमगुत्था थी भली लड़की ।
“वो तो वो है !” - उसने मेरी राय को मोहरबन्द किया ।
“माधव धीमरे की बाबत क्या कहती हैं ?”
“सार्थक उसका अस्सी हजार रुपये का कर्जाई था । जिस रात श्यामला का कत्ल हुआ था, उस रात धीमरे ने अपनी रकम कलैक्ट करने के लिये मोतीबाग जाना था । उससे पहले हमारी सीक्रेट मीटिंग प्लेस पर सार्थक मुझे मिला था और तब मैंने धीमरे को लौटाने के लिये उसे अस्सी हजार रुपये दिये थे । उसकी धीमरे से मुलाकात का दस बजे का टाइम पहले से फिक्स था लेकिन” - उसके चेहरे पर एक रंगीन मुस्कान आई - “तुम जानते ही होगे दो चाहने वालों की सीक्रेट मुलाकात में क्या होता है ! वन थिंग लीड्स टु एनदर । टाइम का पता ही नहीं चला ।”
“आखिर कब फ्री हुआ, वहां से कब गया सार्थक ?”
“ग्यारह तो बज ही गये थे । मेरे खयाल से साढ़े ग्यारह होने वाले थे या हो चुके थे ।”
“आप लोगों की सीक्रेट मीटिंग प्लेस से मोतीबाग में उसका घर कितनी दूर था ?”
“ज्यादा दूर नहीं था । बड़ी हद दस मिनट में मोतीबाग पहुंचा जा सकता था ।”
“ये है वो सीक्रेट प्लेस ?”
“नहीं ।”
“आपके पति को मालूम है कि जिस रात श्यामला का कत्ल हुआ था, उस रात आप सार्थक के साथ थीं ?”
“मेरे खयाल से नहीं । मेरे घर लेट पहुंचने की वजह से कुछ सूझ गया हो तो बात दूसरी है वर्ना नहीं ।”
“उसे आपके लौटने की खबर लगी थी ?”
“हां ।”
“कुछ बोला नहीं ? कोई कमेंट न किया ?”
“भई, हम एक दूसरे से तभी कलाम करते हैं जब तकरार करनी हो, लड़ना झगड़ना हो ।”
“आई सी । बाई दि वे, सार्थक की बाबत एक गुड न्यूज है मेरे पास ।”
“क्या ?”
“उसकी जमानत की रकम का इन्तजाम हो गया है । कल वो रकम जमा करा दी जायेगी, फिर परसों या उससे अगले दिन वो बाहर आ जायेगा ।”
उसकी शक्ल से न जाने क्यों मुझे यूं लगा जैसे उस गुड न्यूज से उसे कोई गुडनैस हासिल नहीं हुई थी ।
“क्या बात है ?” - मैं पूछे बिना न रह सका - “आपको इस खबर से कोई खुशी न हुई ?”
वो खामोश रही ।
“शायद आप समझती हैं वो आजाद हो कर आपकी बाबत मुंह फाड़ेगा ।”
“वो बात नहीं है ।”
“तो ?”
“उसका आजाद होना उसके लिये खतरनाक साबित हो सकता है, उसका कोई बुरा अंजाम हो सकता है ।”
“आपके पति के किये ?”
“शरद के किये । उसका मिजाज वैसे ही वायलेंट है, आजकल और वायलेंट हो गया है ।” - वो एक क्षण ठिठकी, फिर बोली - “उस रोज क्लब में बहुत बढ़िया हैंडल किया तुमने उसे । बहन को हिट करने लगा था । कामयाब हो जाता तो बुरा होता । तुम्हारी वजह से तो लोगों को पता ही न चला कि उसका इरादा क्या था !”
“शरद की फौजदारी नहीं चलेगी ।”
“कैसे रोकोगे ?”
“जैसे शुक्रवार को रोकी थी । सार्थक बाहर आ जायेगा तो मैं उसे अपने साथ अपने घर में रखूंगा ।”
“तुम ऐसा करोगे ?”
“इरादा तो है ! उसी ने मना कर दिया तो बात दूसरी है ।”
“आखिर क्या होगा ?”
“आखिर वो बरी होगा । जब आप इतने दावे के साथ कहती हैं कि कातिल माधव धीमरे है तो क्यों नहीं होगा ! ऊपर वाले के घर देर है, अन्धेर नहीं है ।”
“लेकिन कहने से क्या होता है ! कोई साबित भी तो करके दिखाये कि कातिल वो है !”
“होगा । आखिर साबित होगा । और किसी तरीके से नहीं होगा तो आपकी गवाही से होगा ।”
“उससे सार्थक बरी होगा, धीमरे मुजरिम थोड़े ही साबित हो जायेगा ?”
“पुलिस भी तो कुछ करेगी ? जब वो बरी हो जायेगा तो क्या के किसी आल्टरनेट कैंडीडेट पर तवज्जो नहीं देगी ? और फिलहाल तो आल्टरनेट कैंडीडेट धीमरे ही दिखाई दे रहा है ।”
“हूं ।”
“गवाही की बाबत आपका क्या इरादा है ?”
“मैं एडवोकेट महाजन पर जाहिर कर चुकी हूं । जब तक मेरे पति के मन्त्री पद का कोई फाइनल नतीजा सामने नहीं आ जाता, मैं कोर्ट में खड़ी होकर गवाही देने को तैयार नहीं ।”
“ये आपका दृढ़ निश्चय है ?”
“हां ।”
“ठीक है फिर” - मैं उठ खड़ा हुआ - “फिर तो कुछ कहना सुनना । बाकी नहीं रह गया । फिर तो मुझे इजाजत दीजिये ।”
उसने सहमति में सिर हिलाया और खुद भी उठ कर खड़ी हुई ।
मेरे साथ वो मेन डोर पर पहुंची ।
“शायद ये आपका भ्रम हो !” - फिर भी मैंने उसे तसल्ली देने की कोशिश की ।
उसने जवाब न दिया, मुझे लगा कि वो अपने आंसू रोकने की कोशिश कर रही थी ।
मैं उठ कर उसके पहलू में पहुंचा और उसकी पीठ थपथपाकर उसे सांत्वना देने लगा ।
वो हौले से मेरे साथ आ लगी, उसने अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया और आंखें बन्द कर लीं ।
मैंने उसका वो गाल सहलाया जो मेरे कन्धे के साथ लगा हुआ था और उसके जो आंसू पोंछे जिनका कोई वजूद नहीं था । मेरा दूसरा हाथ उसके कन्धों के गिर्द से सरक कर पीठ पर पड़ा, पीठ से कमर तक पहुंचा और और भी उत्तर दक्षिण कई जगह भटका ।
उसने कोई ऐतराज न किया ।
मैंने और हिम्मत की, मैंने दायें हाथ की एक उंगली उसकी ठोढी के नीचे टिकाकर उसका चेहरा ऊंचा किया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिये ।
वो कसकर मेरे साथ लिपट गयी ।
कई क्षण यथापूर्व स्थिति बनी रही । फिर एकाएक वो मेरे से अलग हुई ।
“दरवाजा खुला है ।” - वो हांफती सी बोली ।
“लेकिन” - मैं बोला - “केयरटेकर के आने में तो अभी बहुत वक्त है ।”
“इत्तफाकन जल्दी आ सकता है ?”
“ओह ! तो दरवाजा बन्द करें ।”
“जाने दो अब ।”
मैंने जाने दिया ।
वो किसी की ब्याहता बीवी थी, किसी की माशूक थी, फिर भी उस पर ‘अवेलेबल’ का साइन बोर्ड लगा हुआ था । तभी तो सयाने कहते हैं कि औरत अभिसाररत भी हो तो एक हाथ फ्री रखती है ताकि किसी दूसरे कद्रदान, मेहरबान को वेव करने का स्कोप बना रहे ।
त्रिया चरित्रम्, पुरुषस्य भाग्यम्; दैवो न जानियेत्, कुतो मनुष्य: ।
मैं उस घड़ी उसका चरित्र देख रहा था और अपना भाग्य देख रहा था ।
बाज औरतें पंचायती हुक्का होती हैं जिन्हें कोई भी गुड़गुड़ा सकता है ।
फर्क भी क्या पड़ता था !
कहीं कोई मीटर तो लगा हुआ था नहीं ! फिर फिरंगियों की जुबान में कहते ही हैं कि ‘वन्स ए केक इज कट, नोबॉडी मिसिज ए पीस’ ।
यानी एक बार संतरा छिल जाये तो एक फांक की घट बढ़ का क्या पता लगता था ।
उस विषय पर से अपना ध्यान हटाने के लिये मैं बोला - “आपकी सार्थक के शेफाली की तरफ झुकाव वाली बात मुझे कतई हजम नहीं हो रही । जरूर ये आपका वहम है ।”
“तुम कहो” - वो बोली - “कि शेफाली का झुकाव तुम्हारी तरफ है तो मैं मान लूंगी मेरा वहम है ।”
उसकी उस बात ने मेरे सामने धर्म संकट खड़ा कर दिया था ।
क्या मैं उसकी खातिर झूठ बोलूं ? और नहीं तो इसलिये झूठ बोलूं कि अभी खातिर करा के हटा था !
“मेरी उससे हालिया मुलाकात है ।” - मैं बोला - “अभी पिछले शुक्रवार ही मैं उससे पहली बार मिला था ।”
“तो ?” - वो बोली ।
“शेफाली भली लड़की है ।”
गुजश्ता सारी रात मेरे साथ गुत्थमगुत्था थी भली लड़की ।
“वो तो वो है !” - उसने मेरी राय को मोहरबन्द किया ।
“माधव धीमरे की बाबत क्या कहती हैं ?”
“सार्थक उसका अस्सी हजार रुपये का कर्जाई था । जिस रात श्यामला का कत्ल हुआ था, उस रात धीमरे ने अपनी रकम कलैक्ट करने के लिये मोतीबाग जाना था । उससे पहले हमारी सीक्रेट मीटिंग प्लेस पर सार्थक मुझे मिला था और तब मैंने धीमरे को लौटाने के लिये उसे अस्सी हजार रुपये दिये थे । उसकी धीमरे से मुलाकात का दस बजे का टाइम पहले से फिक्स था लेकिन” - उसके चेहरे पर एक रंगीन मुस्कान आई - “तुम जानते ही होगे दो चाहने वालों की सीक्रेट मुलाकात में क्या होता है ! वन थिंग लीड्स टु एनदर । टाइम का पता ही नहीं चला ।”
“आखिर कब फ्री हुआ, वहां से कब गया सार्थक ?”
“ग्यारह तो बज ही गये थे । मेरे खयाल से साढ़े ग्यारह होने वाले थे या हो चुके थे ।”
“आप लोगों की सीक्रेट मीटिंग प्लेस से मोतीबाग में उसका घर कितनी दूर था ?”
“ज्यादा दूर नहीं था । बड़ी हद दस मिनट में मोतीबाग पहुंचा जा सकता था ।”
“ये है वो सीक्रेट प्लेस ?”
“नहीं ।”
“आपके पति को मालूम है कि जिस रात श्यामला का कत्ल हुआ था, उस रात आप सार्थक के साथ थीं ?”
“मेरे खयाल से नहीं । मेरे घर लेट पहुंचने की वजह से कुछ सूझ गया हो तो बात दूसरी है वर्ना नहीं ।”
“उसे आपके लौटने की खबर लगी थी ?”
“हां ।”
“कुछ बोला नहीं ? कोई कमेंट न किया ?”
“भई, हम एक दूसरे से तभी कलाम करते हैं जब तकरार करनी हो, लड़ना झगड़ना हो ।”
“आई सी । बाई दि वे, सार्थक की बाबत एक गुड न्यूज है मेरे पास ।”
“क्या ?”
“उसकी जमानत की रकम का इन्तजाम हो गया है । कल वो रकम जमा करा दी जायेगी, फिर परसों या उससे अगले दिन वो बाहर आ जायेगा ।”
उसकी शक्ल से न जाने क्यों मुझे यूं लगा जैसे उस गुड न्यूज से उसे कोई गुडनैस हासिल नहीं हुई थी ।
“क्या बात है ?” - मैं पूछे बिना न रह सका - “आपको इस खबर से कोई खुशी न हुई ?”
वो खामोश रही ।
“शायद आप समझती हैं वो आजाद हो कर आपकी बाबत मुंह फाड़ेगा ।”
“वो बात नहीं है ।”
“तो ?”
“उसका आजाद होना उसके लिये खतरनाक साबित हो सकता है, उसका कोई बुरा अंजाम हो सकता है ।”
“आपके पति के किये ?”
“शरद के किये । उसका मिजाज वैसे ही वायलेंट है, आजकल और वायलेंट हो गया है ।” - वो एक क्षण ठिठकी, फिर बोली - “उस रोज क्लब में बहुत बढ़िया हैंडल किया तुमने उसे । बहन को हिट करने लगा था । कामयाब हो जाता तो बुरा होता । तुम्हारी वजह से तो लोगों को पता ही न चला कि उसका इरादा क्या था !”
“शरद की फौजदारी नहीं चलेगी ।”
“कैसे रोकोगे ?”
“जैसे शुक्रवार को रोकी थी । सार्थक बाहर आ जायेगा तो मैं उसे अपने साथ अपने घर में रखूंगा ।”
“तुम ऐसा करोगे ?”
“इरादा तो है ! उसी ने मना कर दिया तो बात दूसरी है ।”
“आखिर क्या होगा ?”
“आखिर वो बरी होगा । जब आप इतने दावे के साथ कहती हैं कि कातिल माधव धीमरे है तो क्यों नहीं होगा ! ऊपर वाले के घर देर है, अन्धेर नहीं है ।”
“लेकिन कहने से क्या होता है ! कोई साबित भी तो करके दिखाये कि कातिल वो है !”
“होगा । आखिर साबित होगा । और किसी तरीके से नहीं होगा तो आपकी गवाही से होगा ।”
“उससे सार्थक बरी होगा, धीमरे मुजरिम थोड़े ही साबित हो जायेगा ?”
“पुलिस भी तो कुछ करेगी ? जब वो बरी हो जायेगा तो क्या के किसी आल्टरनेट कैंडीडेट पर तवज्जो नहीं देगी ? और फिलहाल तो आल्टरनेट कैंडीडेट धीमरे ही दिखाई दे रहा है ।”
“हूं ।”
“गवाही की बाबत आपका क्या इरादा है ?”
“मैं एडवोकेट महाजन पर जाहिर कर चुकी हूं । जब तक मेरे पति के मन्त्री पद का कोई फाइनल नतीजा सामने नहीं आ जाता, मैं कोर्ट में खड़ी होकर गवाही देने को तैयार नहीं ।”
“ये आपका दृढ़ निश्चय है ?”
“हां ।”
“ठीक है फिर” - मैं उठ खड़ा हुआ - “फिर तो कुछ कहना सुनना । बाकी नहीं रह गया । फिर तो मुझे इजाजत दीजिये ।”
उसने सहमति में सिर हिलाया और खुद भी उठ कर खड़ी हुई ।
मेरे साथ वो मेन डोर पर पहुंची ।