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“लेकिन” - परमार बोला - “मुझे तो तुमने यहां डिटेन किया हुआ है !”
“क्योंकि आप किडनैपर्स की करतूत के लिये जवाबदेय हैं जिनमें एक क्लब का मुलाजिम है और दूसरा क्लब के केटरिंग कांट्रेक्टर का मुलाजिम है । फिर ये छोटी सी जहमत है जो आपको इंसाफ की खातिर, दिल्ली पुलिस की खातिर, बर्दाश्त कर लेनी चाहिये ।”
“आगे बढ़ो ।”
“उसके लिये मुझे थोड़ा पीछे जाने की इजाजत दीजिये । पिछले महीने सोलह तारीख को आपकी बेटी श्यामला का कत्ल हुआ, कातिल उसके पति सार्थक बराल को ठहराया गया लेकिन उसको अपना गुनाह कबूल नहीं था । शहर में बहुत लोग उसकी बात पर ऐतबार लाने वाले निकल आये लेकिन न आपको उसकी बेगुनाही पर यकीन आया और न ही पुलिस को आया । फिर कल जब एमपी साहब को पत्नी संगीता निगम का कत्ल हुआ तो...”
“कत्ल !” - नेता ने तत्काल प्रतिवाद किया - “संगीता का कत्ल !”
“जी हां । आपकी पत्नी का कत्ल हुआ था ।”
“कौन कहता है ? ये” - नेता ने तिरस्कारपूर्ण भाव से मेरी तरफ देखा - “ये खुराफाती, गैरजिम्मेदार शख्स, जो...”
“सर, मुझे अपनी बात मुकम्मल करने दीजिये, फिर आप जो जी में आये, कहियेगा ।”
नेता खामोश हो गया ।
“पहले ये बात मेरे ऐतबार में आयी कि आपकी बेटी का कत्ल हुआ था, फिर आज ये बात उजागर हुई कि सार्थक बेल जम्प करके फरार नहीं हुआ था, इन दो जनों ने - माधव धीमरे और विशू मीरानी ने - उसका अगवा किया था और उसे यहां कैद करके रखा हुआ था तो...”
“बट दैट इज शियर नानसेंस !” - परमार बोला - “धीमरे आज सारा दिन मेरे साथ था ।”
“...इस सिलसिले में रिहा कराये जाने के बाद दिया सार्थक का बयान नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता, बतौर किडनैपर्स उसकी निशानदेयी को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता । ये बात भी गौरतलब है कि उसको बुरी तरह से ठोका गया था । वो बहुत मजबूत, तन्दुरुस्त और हट्टा कट्टा आदमी है, उसकी वो गत बनाना सिंगल सिलेंडर के इस” - उसने मीरानी की तरफ इशारा किया - “अकेले आदमी के बस का काम नहीं था । इस लिहाज से भुक्तभोगी के बयान पर ऐतबार लाना पड़ता है कि उसकी दुरगत करने वालों में माधव धीमरे भी शामिल था ।”
परमार खामोश रहा ।
“अब तुम बोलो ।” - यादव मीरानी और धीमरे की तरफ आकर्षित हुआ - “जो इलजाम तुम दोनों पर आयद है, उसकी बाबत तुम क्या कहते हो ? किसके कहने पर तुमने ये काम किया ?”
दोनों परे देखने लगे ।
“कोई बात नहीं ।” - यादव बोला - “अभी मैं तुम लोगों का खामोश रहना अफोर्ड कर सकता हूं ।” - वो मेरी तरफ घूमा - “अब तुम बोलो ।”
“नो ।” - परमार ने तत्काल विरोध किया - “आई विल हैव नन आफ दैट ।”
“क्या आप नहीं चाहते कि आपकी बेटी के कत्ल के राज पर से पर्दा उठे ?”
“क्यों नहीं चाहता ? जरूर चाहता हूं । लेकिन ये पुलिस का काम है । पुलिस करे अपना काम ।”
“कर रही है, जनाब । आप इसे हमारे काम का ही हिस्सा मानिये कि आप से अपील है कि इसे बोलने दिया जाये । जो ये कहे, उससे आप का सहमत होना जरूरी नहीं है । इसलिये इस सिलसिले में आप इसका नहीं, मेरा लिहाज कीजिये ।” - वो एक क्षण ठिठका, फिर उसने जोड़ा - “प्लीज ।”
परमार हिचकिचाया ।
“मैं जानता हूं आप इसे नापसन्द करते हैं लेकिन किसी उद्देश्य की खातिर कभी कभी घोर शत्रु को भी बर्दाश्त कर लेना चाहिये ।”
“ओके ।” - परमार कठिन स्वर में बोला - “ओके ।”
“थैंक्यू सर । आई एम ग्रेटफुल ।”
उसने फिर मुझे इशारा किया ।
तभी दरवाजा खुला और एक उम्रदराज रोबीले व्यक्ति ने वहां कदम रखा ।
परमार उछल कर खड़ा हुआ और लपक कर उसके करीब पहुंचा ।
उसने उसकी बांह पकड़ कर मौजूद लोगों की तरफ उसकी पीठ घुमाई और दबी जुबान में जल्दी जल्दी बोलने लगा । उस मोनोलाग के दौरान उस शख्स का सिर कई बार सहमति में हिला ।
आखिर परमार खामोश हुआ और वापस घूमा ।
“मिस्टर जोशीपुरा ।” - वो बोला - “माई लीगल काउन्सल ।”
कोई कुछ न बोला ।
परमार वापिस आकर अपनी कुर्सी पर बैठा । उसने वकील को अपने करीब बिठाया ।
“अब ये बोले ?” - यादव बोला ।
परमार ने सहमति में सिर हिलाया ।
अब वो पहले की तरह टेंशन में नहीं लग रहा था - वकील पहुंच गया था, सब सम्भाल लेगा ।
“मैं पहले सार्थक का ही जिक्र करना चाहता हूं ।” - मैं खंखार कर गला साफ करता बोला - “उसकी बेगुनाही पर किसी को यकीन न आने की प्रमुख वजह ये थी कि अपने डिफेंस में वो कोई मजबूत एलीबाई पेश नहीं कर सका था । अपने भाई शिखर की जो एलीबाई उसने पेश की थी, वो झोलझाल थी, गढ़ी हुई थी और जल्दी ही ये बात उजागर हो गयी थी । लेकिन उसके पास एक मजबूत, चौकस, एयरटाइट एलीबाई भी थी जिसकी बाबत वो खामोश था क्योंकि आखिरी दम तक वो किसी को प्रोटेक्ट करना चाहता था ।”
“किसको ?” - यादव बोला - “नाम लो ।”
“नेता जी खफा हो जायेंगे ।”
“नाम लो ।”
“उसकी मजबूत एलीबाई संगीता निगम थी जिसके साथ उसका अफेयर था । कत्ल की रात को सार्थक उसके पहलू में था ।”
“दैट्स कैरेक्टर असासीनेशन।” - वकील जोशीपुरा ने तत्काल विरोध किया - “मिस्टर हूसोऐवर यू आर, तुम्हारे पर इज्जत हत्तक का गम्भीर दावा ठोका जा सकता है ।”
“मेरी तरफ से इजाजत है आप को ऐसा करने की ।”
“मुझे किसी की इजाजत की जरूरत नहीं ।”
“बढ़िया ।”
“जो वाहियात बात तुम कह रहे हो, उसे कोर्ट में साबित कर सकोगे ?”
“जब आप केस करेंगे तो कुछ तो करूंगा ही ! फिलहाल खामोश रहें और मुझे अपनी बात कह लेने दें तो कैसा रहे ?”
“तुम्हें नाजायज बात कहने की इजाजत नहीं दी जा सकती ।”
“ओह ! तो जज साहब ने अपना फैसला सुना भी दिया है !”
“मिस्टर जोशीपुरा” - यादव सख्ती से बोला - “प्लीज कीप क्वाइट ।”
“लेकिन...”
“दैट्स ऐन आर्डर !”
वकील तिलमिलाया लेकिन उसने होंठ भींच लिये ।
“मे आई प्रोसीड ?” - मैं बोला ।
“यस ।” - यादव बोला ।
“संगीता निगम का सार्थक से अफेयर था और बकौल उसके एमपी साहब इस हकीकत से नावाकिफ भी नहीं थे । लेकिन उस का कहना था कि इस बात की एमपी साहब को खबर नहीं थी कि कत्ल की रात को वो सार्थक के साथ थी । लेकिन उसका ये कहना गलत था, आपको इस बात की खबर थी और खबर पर रियेक्ट करने की आपकी अपनी योजना थी ।”
“कैसी योजना ?” - नेता धीरज से बोला ।
“आपने गुमनाम डोनर के तौर पर सार्थक के वकील विवेक महाजन के आफिस में छ: लाख रुपये पहुंचवाये ताकि उसकी जमानत राशि पूरी होती और वो बाहर आ पाता ।”
“हमने पहुंचवाये ?”
“आपके सिवाय ये काम करने वाला दूसरा कोई नहीं दिखाई देता मुझे । छ: लाख रुपये कोई मामूली रकम नहीं होती और उसका खड़े पैर इन्तजाम करना कोई मामूली काम नहीं होता । कोई हैसियत वाला शख्स ही ये काम कर सकता था । परमार साहब हैसियत वाले हैं लेकिन ये सार्थक के, अपने दामाद के, जले पर नमक छिड़कने को तैयार नहीं । सार्थक के भाई, मां की ऐसी हैसियत नहीं, ऐसे साधन नहीं । संगीता, आपकी पत्नी, आर्थिक रूप से आप पर आश्रित थी, और कौन था जो उसके लिये ये कदम उठा सकता था । होता तो पहले उठाता ।”
“ये बात हम पर लागू नहीं ?”
“नहीं । क्योंकि आप को देर से खबर लगी अपनी बीवी के अफेयर की । जब लगी, तब आपने वो कदम उठाया ।”
“क्यों ? हमें इस बात से क्या लेना देना था कि वो लड़का जेल के अन्दर था या बाहर ?”
“था लेना देना । आप उसकी उस हरकत की, उस जुर्रत की उसको सजा देना चाहते थे और ऐसा करने के लिये, गुस्ताखी माफ, तड़प रहे थे ।”
“सजा अदालत देती न !”
“सालों में देती । आप उसको अपनी पसन्दीदा सजा देना चाहते थे और फौरन देना चाहते थे । और ऐसा तभी मुमकिन था जब कि वो बाहर होता । उसके बाहर आते ही उस का अगवा हो गया । और एक बात भी इसी तरफ इशारा करती है कि अगवा आप के इशारे पर हुआ था ।”
“नानसेंस ! हम किसे इशारा करते ?”
मैंने मजबूत उंगली रॉक डिसिल्वा की तरफ उठाई ।
“बकवास !” - मुंह से सिगार निकालते डिसिल्वा ने तीव्र विरोध किया - “मेरा अगवा से क्या लेना देना ?”
“नेता जी से तो लेना देना है न ! इनकी भृकुटी के इशारे पर दुम हिलाता है न ! वर्ना परसों इतनी रात गये इनकी कोठी पर क्या कर रहा था ?”
“देखो !” - नेता बोला - “तुम बहुत बढ़ बढ़ के बोल रहे हो । अब तुम...”
“सर, इसे बोलने दीजिये ।” - वकील बोला - “जितना ज्यादा ये मुंह फाड़ेगा, उतना ही ज्यादा फंसेगा । मैं अपने मोबाइल पर इसकी हर बात रिकार्ड कर रहा हूं जो कोर्ट में पेश की जायेगी तो... तो... हिज गूज विल बी कुक्ड ।”
नेता खामोश हो गया ।
“चलिये, बहस के लिये मैं मान लेता हूं” - मैं बोला - “कि आपने कुछ नहीं किया । इस सूरत में जो दूसरा कैण्डीडेट मेरी निगाह में है, वो शरद परमार है ।”
“क्या !” - शरद भड़का ।
“तुम्हारी निगाह में वो श्यामला का कातिल था और तुम उससे बदला लेना चाहते थे । तुम रईस बाप के बेटे हो, छ: लाख रुपये का गुप्त दान तुम्हारे लिये कोई बड़ी बात नहीं था । लेकिन तुम्हारे साथ प्राब्लम ये पेश आयी कि तुम्हें ये खबर न लगी कि सार्थक जमानत पर छूट कर कहां गया ! इस बात का पता निकालने के लिये तुमने शिखर को धुन दिया जिसको कि सार्थक का अता पता मालूम होना तुम्हारी निगाह में लाजमी था ।”
“बकवास ! उस वक्त मैं यहां क्लब में था । धीमरे भी तब यहां था ।”
“कब ?”
“जब शिखर के साथ वो वाकया हुआ था ।”
“कब हुआ था ?”
वो खामोश हो गया, उसने बेचैनी से पहलू बदला ।
“तुम्हें कैसे मालूम कि वो वाकया किस वक्त गुजरा था और किस वक्त की एलीबाई का तुमने इन्तजाम करके रखना था ? ऐसे मालूम, शरद बाबू कि उस वाकये को अंजाम ही तुमने दिया था । धीमरे के साथ मिलकर । इसी वजह से वो तुम्हारी एलीबाई है और तुम उसकी एलीबाई हो कि तब तुम दोनों यहां क्लब में थे । कहो कि मैं गलत कह रहा हूं !”
शरद से कुछ कहते न बना, उसने फिर बेचैनी से पहलू बदला ।
“मैं तमाम जनाबेहाजरीन से दरख्वास्त करता हूं कि वो इस वक्त की शरद की सूरत देखें । इसके माथे पर लिखा है कि सीक्रेट डोनर ये था । साथ ही एमपी साहब से माफी चाहता हूं कि पहले मैंने इन्हें सीक्रेट डोनर करार दिया ।”
नेता का सिर सहमति में हिला ।
“लेकिन इस बात पर मैं कायम हूं कि परसों आप में और आप की पत्नी में भीषण तकरार छिड़ी थी जिसकी गर्मागर्मी में उसने अपने अफेयर की बाबत आप को बता दिया था और उसने आपसे अपने इस वादे से भी पीछे हटने की घोषणा कर दी थी कि जब तक आपके मन्त्री पद का फैसला नहीं हो जाता था, वो कोर्ट में तलाक का केस नहीं डालेगी । सबसे बड़ी बात उसने ये कही थी कि उसने कोर्ट में सार्थक के हक में गवाही देने का फैसला कर लिया था । यानी शरेआम आप पर कीचड़ उछालने का, आपकी छवि बिगाड़ने का फैसला कर लिया था । मीडिया इस खबर को गोली की तरह लपकता कि आप जैसे रूलिंग पार्टी के इज्जतदार नेता की बीवी बेवफा थी, उसके एक कामनर से प्रेम सम्बंध थे । आपको तब अपनी आंखों के आगे बदनामी का ऐसा मंजर दिखाई दिया जो आपके भावी मन्त्री पद को तो आपके लिये सपना बना ही देता, आपके राजनैतिक कैरियर को भी भारी क्षति पहुंचाता । आप ये सब होने देने को तैयार नहीं थे इसलिये आपने अपने वफादार पप्पी रॉक डिसिल्वा को तलब किया जो आपके ‘सिट’ कहने पर सिट होता था, ‘स्टैंड’ कहने पर स्टैण्ड होता था ।”
डिसिल्वा ने प्रतिवाद के लिए मुंह खोला लेकिन यादव ने उसे यूं सख्ती से घूरा कि उसका मुंह सन्दूक के ढ़क्कन की तरह बन्द हुआ ।
“क्योंकि आप किडनैपर्स की करतूत के लिये जवाबदेय हैं जिनमें एक क्लब का मुलाजिम है और दूसरा क्लब के केटरिंग कांट्रेक्टर का मुलाजिम है । फिर ये छोटी सी जहमत है जो आपको इंसाफ की खातिर, दिल्ली पुलिस की खातिर, बर्दाश्त कर लेनी चाहिये ।”
“आगे बढ़ो ।”
“उसके लिये मुझे थोड़ा पीछे जाने की इजाजत दीजिये । पिछले महीने सोलह तारीख को आपकी बेटी श्यामला का कत्ल हुआ, कातिल उसके पति सार्थक बराल को ठहराया गया लेकिन उसको अपना गुनाह कबूल नहीं था । शहर में बहुत लोग उसकी बात पर ऐतबार लाने वाले निकल आये लेकिन न आपको उसकी बेगुनाही पर यकीन आया और न ही पुलिस को आया । फिर कल जब एमपी साहब को पत्नी संगीता निगम का कत्ल हुआ तो...”
“कत्ल !” - नेता ने तत्काल प्रतिवाद किया - “संगीता का कत्ल !”
“जी हां । आपकी पत्नी का कत्ल हुआ था ।”
“कौन कहता है ? ये” - नेता ने तिरस्कारपूर्ण भाव से मेरी तरफ देखा - “ये खुराफाती, गैरजिम्मेदार शख्स, जो...”
“सर, मुझे अपनी बात मुकम्मल करने दीजिये, फिर आप जो जी में आये, कहियेगा ।”
नेता खामोश हो गया ।
“पहले ये बात मेरे ऐतबार में आयी कि आपकी बेटी का कत्ल हुआ था, फिर आज ये बात उजागर हुई कि सार्थक बेल जम्प करके फरार नहीं हुआ था, इन दो जनों ने - माधव धीमरे और विशू मीरानी ने - उसका अगवा किया था और उसे यहां कैद करके रखा हुआ था तो...”
“बट दैट इज शियर नानसेंस !” - परमार बोला - “धीमरे आज सारा दिन मेरे साथ था ।”
“...इस सिलसिले में रिहा कराये जाने के बाद दिया सार्थक का बयान नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता, बतौर किडनैपर्स उसकी निशानदेयी को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता । ये बात भी गौरतलब है कि उसको बुरी तरह से ठोका गया था । वो बहुत मजबूत, तन्दुरुस्त और हट्टा कट्टा आदमी है, उसकी वो गत बनाना सिंगल सिलेंडर के इस” - उसने मीरानी की तरफ इशारा किया - “अकेले आदमी के बस का काम नहीं था । इस लिहाज से भुक्तभोगी के बयान पर ऐतबार लाना पड़ता है कि उसकी दुरगत करने वालों में माधव धीमरे भी शामिल था ।”
परमार खामोश रहा ।
“अब तुम बोलो ।” - यादव मीरानी और धीमरे की तरफ आकर्षित हुआ - “जो इलजाम तुम दोनों पर आयद है, उसकी बाबत तुम क्या कहते हो ? किसके कहने पर तुमने ये काम किया ?”
दोनों परे देखने लगे ।
“कोई बात नहीं ।” - यादव बोला - “अभी मैं तुम लोगों का खामोश रहना अफोर्ड कर सकता हूं ।” - वो मेरी तरफ घूमा - “अब तुम बोलो ।”
“नो ।” - परमार ने तत्काल विरोध किया - “आई विल हैव नन आफ दैट ।”
“क्या आप नहीं चाहते कि आपकी बेटी के कत्ल के राज पर से पर्दा उठे ?”
“क्यों नहीं चाहता ? जरूर चाहता हूं । लेकिन ये पुलिस का काम है । पुलिस करे अपना काम ।”
“कर रही है, जनाब । आप इसे हमारे काम का ही हिस्सा मानिये कि आप से अपील है कि इसे बोलने दिया जाये । जो ये कहे, उससे आप का सहमत होना जरूरी नहीं है । इसलिये इस सिलसिले में आप इसका नहीं, मेरा लिहाज कीजिये ।” - वो एक क्षण ठिठका, फिर उसने जोड़ा - “प्लीज ।”
परमार हिचकिचाया ।
“मैं जानता हूं आप इसे नापसन्द करते हैं लेकिन किसी उद्देश्य की खातिर कभी कभी घोर शत्रु को भी बर्दाश्त कर लेना चाहिये ।”
“ओके ।” - परमार कठिन स्वर में बोला - “ओके ।”
“थैंक्यू सर । आई एम ग्रेटफुल ।”
उसने फिर मुझे इशारा किया ।
तभी दरवाजा खुला और एक उम्रदराज रोबीले व्यक्ति ने वहां कदम रखा ।
परमार उछल कर खड़ा हुआ और लपक कर उसके करीब पहुंचा ।
उसने उसकी बांह पकड़ कर मौजूद लोगों की तरफ उसकी पीठ घुमाई और दबी जुबान में जल्दी जल्दी बोलने लगा । उस मोनोलाग के दौरान उस शख्स का सिर कई बार सहमति में हिला ।
आखिर परमार खामोश हुआ और वापस घूमा ।
“मिस्टर जोशीपुरा ।” - वो बोला - “माई लीगल काउन्सल ।”
कोई कुछ न बोला ।
परमार वापिस आकर अपनी कुर्सी पर बैठा । उसने वकील को अपने करीब बिठाया ।
“अब ये बोले ?” - यादव बोला ।
परमार ने सहमति में सिर हिलाया ।
अब वो पहले की तरह टेंशन में नहीं लग रहा था - वकील पहुंच गया था, सब सम्भाल लेगा ।
“मैं पहले सार्थक का ही जिक्र करना चाहता हूं ।” - मैं खंखार कर गला साफ करता बोला - “उसकी बेगुनाही पर किसी को यकीन न आने की प्रमुख वजह ये थी कि अपने डिफेंस में वो कोई मजबूत एलीबाई पेश नहीं कर सका था । अपने भाई शिखर की जो एलीबाई उसने पेश की थी, वो झोलझाल थी, गढ़ी हुई थी और जल्दी ही ये बात उजागर हो गयी थी । लेकिन उसके पास एक मजबूत, चौकस, एयरटाइट एलीबाई भी थी जिसकी बाबत वो खामोश था क्योंकि आखिरी दम तक वो किसी को प्रोटेक्ट करना चाहता था ।”
“किसको ?” - यादव बोला - “नाम लो ।”
“नेता जी खफा हो जायेंगे ।”
“नाम लो ।”
“उसकी मजबूत एलीबाई संगीता निगम थी जिसके साथ उसका अफेयर था । कत्ल की रात को सार्थक उसके पहलू में था ।”
“दैट्स कैरेक्टर असासीनेशन।” - वकील जोशीपुरा ने तत्काल विरोध किया - “मिस्टर हूसोऐवर यू आर, तुम्हारे पर इज्जत हत्तक का गम्भीर दावा ठोका जा सकता है ।”
“मेरी तरफ से इजाजत है आप को ऐसा करने की ।”
“मुझे किसी की इजाजत की जरूरत नहीं ।”
“बढ़िया ।”
“जो वाहियात बात तुम कह रहे हो, उसे कोर्ट में साबित कर सकोगे ?”
“जब आप केस करेंगे तो कुछ तो करूंगा ही ! फिलहाल खामोश रहें और मुझे अपनी बात कह लेने दें तो कैसा रहे ?”
“तुम्हें नाजायज बात कहने की इजाजत नहीं दी जा सकती ।”
“ओह ! तो जज साहब ने अपना फैसला सुना भी दिया है !”
“मिस्टर जोशीपुरा” - यादव सख्ती से बोला - “प्लीज कीप क्वाइट ।”
“लेकिन...”
“दैट्स ऐन आर्डर !”
वकील तिलमिलाया लेकिन उसने होंठ भींच लिये ।
“मे आई प्रोसीड ?” - मैं बोला ।
“यस ।” - यादव बोला ।
“संगीता निगम का सार्थक से अफेयर था और बकौल उसके एमपी साहब इस हकीकत से नावाकिफ भी नहीं थे । लेकिन उस का कहना था कि इस बात की एमपी साहब को खबर नहीं थी कि कत्ल की रात को वो सार्थक के साथ थी । लेकिन उसका ये कहना गलत था, आपको इस बात की खबर थी और खबर पर रियेक्ट करने की आपकी अपनी योजना थी ।”
“कैसी योजना ?” - नेता धीरज से बोला ।
“आपने गुमनाम डोनर के तौर पर सार्थक के वकील विवेक महाजन के आफिस में छ: लाख रुपये पहुंचवाये ताकि उसकी जमानत राशि पूरी होती और वो बाहर आ पाता ।”
“हमने पहुंचवाये ?”
“आपके सिवाय ये काम करने वाला दूसरा कोई नहीं दिखाई देता मुझे । छ: लाख रुपये कोई मामूली रकम नहीं होती और उसका खड़े पैर इन्तजाम करना कोई मामूली काम नहीं होता । कोई हैसियत वाला शख्स ही ये काम कर सकता था । परमार साहब हैसियत वाले हैं लेकिन ये सार्थक के, अपने दामाद के, जले पर नमक छिड़कने को तैयार नहीं । सार्थक के भाई, मां की ऐसी हैसियत नहीं, ऐसे साधन नहीं । संगीता, आपकी पत्नी, आर्थिक रूप से आप पर आश्रित थी, और कौन था जो उसके लिये ये कदम उठा सकता था । होता तो पहले उठाता ।”
“ये बात हम पर लागू नहीं ?”
“नहीं । क्योंकि आप को देर से खबर लगी अपनी बीवी के अफेयर की । जब लगी, तब आपने वो कदम उठाया ।”
“क्यों ? हमें इस बात से क्या लेना देना था कि वो लड़का जेल के अन्दर था या बाहर ?”
“था लेना देना । आप उसकी उस हरकत की, उस जुर्रत की उसको सजा देना चाहते थे और ऐसा करने के लिये, गुस्ताखी माफ, तड़प रहे थे ।”
“सजा अदालत देती न !”
“सालों में देती । आप उसको अपनी पसन्दीदा सजा देना चाहते थे और फौरन देना चाहते थे । और ऐसा तभी मुमकिन था जब कि वो बाहर होता । उसके बाहर आते ही उस का अगवा हो गया । और एक बात भी इसी तरफ इशारा करती है कि अगवा आप के इशारे पर हुआ था ।”
“नानसेंस ! हम किसे इशारा करते ?”
मैंने मजबूत उंगली रॉक डिसिल्वा की तरफ उठाई ।
“बकवास !” - मुंह से सिगार निकालते डिसिल्वा ने तीव्र विरोध किया - “मेरा अगवा से क्या लेना देना ?”
“नेता जी से तो लेना देना है न ! इनकी भृकुटी के इशारे पर दुम हिलाता है न ! वर्ना परसों इतनी रात गये इनकी कोठी पर क्या कर रहा था ?”
“देखो !” - नेता बोला - “तुम बहुत बढ़ बढ़ के बोल रहे हो । अब तुम...”
“सर, इसे बोलने दीजिये ।” - वकील बोला - “जितना ज्यादा ये मुंह फाड़ेगा, उतना ही ज्यादा फंसेगा । मैं अपने मोबाइल पर इसकी हर बात रिकार्ड कर रहा हूं जो कोर्ट में पेश की जायेगी तो... तो... हिज गूज विल बी कुक्ड ।”
नेता खामोश हो गया ।
“चलिये, बहस के लिये मैं मान लेता हूं” - मैं बोला - “कि आपने कुछ नहीं किया । इस सूरत में जो दूसरा कैण्डीडेट मेरी निगाह में है, वो शरद परमार है ।”
“क्या !” - शरद भड़का ।
“तुम्हारी निगाह में वो श्यामला का कातिल था और तुम उससे बदला लेना चाहते थे । तुम रईस बाप के बेटे हो, छ: लाख रुपये का गुप्त दान तुम्हारे लिये कोई बड़ी बात नहीं था । लेकिन तुम्हारे साथ प्राब्लम ये पेश आयी कि तुम्हें ये खबर न लगी कि सार्थक जमानत पर छूट कर कहां गया ! इस बात का पता निकालने के लिये तुमने शिखर को धुन दिया जिसको कि सार्थक का अता पता मालूम होना तुम्हारी निगाह में लाजमी था ।”
“बकवास ! उस वक्त मैं यहां क्लब में था । धीमरे भी तब यहां था ।”
“कब ?”
“जब शिखर के साथ वो वाकया हुआ था ।”
“कब हुआ था ?”
वो खामोश हो गया, उसने बेचैनी से पहलू बदला ।
“तुम्हें कैसे मालूम कि वो वाकया किस वक्त गुजरा था और किस वक्त की एलीबाई का तुमने इन्तजाम करके रखना था ? ऐसे मालूम, शरद बाबू कि उस वाकये को अंजाम ही तुमने दिया था । धीमरे के साथ मिलकर । इसी वजह से वो तुम्हारी एलीबाई है और तुम उसकी एलीबाई हो कि तब तुम दोनों यहां क्लब में थे । कहो कि मैं गलत कह रहा हूं !”
शरद से कुछ कहते न बना, उसने फिर बेचैनी से पहलू बदला ।
“मैं तमाम जनाबेहाजरीन से दरख्वास्त करता हूं कि वो इस वक्त की शरद की सूरत देखें । इसके माथे पर लिखा है कि सीक्रेट डोनर ये था । साथ ही एमपी साहब से माफी चाहता हूं कि पहले मैंने इन्हें सीक्रेट डोनर करार दिया ।”
नेता का सिर सहमति में हिला ।
“लेकिन इस बात पर मैं कायम हूं कि परसों आप में और आप की पत्नी में भीषण तकरार छिड़ी थी जिसकी गर्मागर्मी में उसने अपने अफेयर की बाबत आप को बता दिया था और उसने आपसे अपने इस वादे से भी पीछे हटने की घोषणा कर दी थी कि जब तक आपके मन्त्री पद का फैसला नहीं हो जाता था, वो कोर्ट में तलाक का केस नहीं डालेगी । सबसे बड़ी बात उसने ये कही थी कि उसने कोर्ट में सार्थक के हक में गवाही देने का फैसला कर लिया था । यानी शरेआम आप पर कीचड़ उछालने का, आपकी छवि बिगाड़ने का फैसला कर लिया था । मीडिया इस खबर को गोली की तरह लपकता कि आप जैसे रूलिंग पार्टी के इज्जतदार नेता की बीवी बेवफा थी, उसके एक कामनर से प्रेम सम्बंध थे । आपको तब अपनी आंखों के आगे बदनामी का ऐसा मंजर दिखाई दिया जो आपके भावी मन्त्री पद को तो आपके लिये सपना बना ही देता, आपके राजनैतिक कैरियर को भी भारी क्षति पहुंचाता । आप ये सब होने देने को तैयार नहीं थे इसलिये आपने अपने वफादार पप्पी रॉक डिसिल्वा को तलब किया जो आपके ‘सिट’ कहने पर सिट होता था, ‘स्टैंड’ कहने पर स्टैण्ड होता था ।”
डिसिल्वा ने प्रतिवाद के लिए मुंह खोला लेकिन यादव ने उसे यूं सख्ती से घूरा कि उसका मुंह सन्दूक के ढ़क्कन की तरह बन्द हुआ ।