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काफी देर वह खोदता रहा और आखिरकार उसकी छड़ एक नरकंकाल से जाकर टकराई। गेन्मार्ड ने देखा कि हड्यिों का एक ढांचा मिट्टी में दबा हुआ उसके समाने पड़ा हुआ था। उसका कुछ भाग उसे नजर आ रहा था।
विजय ने एकटक गेन्मार्ड को गड्ढे के अन्दर इस प्रकार घूरते देखा तो वह वहीं पेड़ के साथ टेक लगाये ही बोला-‘क्या बात है? क्या तुम्हें खजाने का रास्ता नजर आ गया है? मेरा मतलब है कि अन्दर किसी सुरंग में जाती हुई सीढ़ियां आ रही है क्या?’
‘यहां आओ।’ गेन्मार्ड उसे बुलाता हुआ बोला-‘मैंने तुम से कहा था यहां कुछ दबा हुआ है। आकर देखो कि मेरा विचार कितना ठीक था।’
‘लेकिन क्या दबा हुआ?’ विजय ने उसकी ओर बढ़ते हुए पूछा। फिर जब उसने गढ़े के अन्दर झांक कर देखा तो एकदम आश्चर्य से चौंक पड़ा- ‘हड्डी।’
‘हां, गेन्मार्ड फिर छड़ चलाता हुआ बोला-‘किस की है, यह तुम्हें अभी पता चला जाता है।’
कुछ देर बाद ही उस गढ़े में एक आदमी का लाश पड़ी हुई थी। लाश के कपड़े गल चुके थे और सारे शरीर में कीड़े रेंग रहे थे। उनमें से कई कीड़े गेन्मार्ड के शरीर पर भी चढ़ गए थे जिन्हें उसने हाथ से दूर झटक दिया। लाश के शरीर पर से कई स्थानों से मांस बिल्कुल गायब था और वहां केवल सफेद हड्डी चमक रही थी। लाश का रूप इतना बिगड़ चुका था कि पहचान पाना ही असंम्भव था।
‘यह किसकी लाश हो सकती है?’ विजय लाश को घूरता हुआ बोला।
‘मुझे क्या मालूम?’ गेन्मार्ड छड़ से लाश को पटकता हुआ बोला- ‘मुझे तो इस स्थान पर शक हुआ था और मैंने वह चीज तुम्हारे सामने निकाल कर रख दी जो कि यहां पर दबी हुई थी।
‘मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैंने यह कोठी खरीदी है अथवा भूत खाना।’ विजय अपनी गरदन को खुजाता हुआ बोला।
‘इतना तो निश्चित है कि यह हत्या का मामला है।’ गेन्मार्ड ने लाश को छड़ से पलट कर फिर सीधा करते हुए कहा।
‘यह तुम कैसे कह सकते हो?’
‘सीधी सी बात है।’ गेन्मार्ड अपने कपड़ों की चिन्ता किए बिना ही उस गड्ढे की दीवार से टेक लगाकर खड़ा होता हुआ बोला- ‘अगर यह आदमी अपनी मौत मरा होता तो या तो इसे जला दिया जाता अथवा किसी कब्रिस्तान में दफना दिया जाता। जहां तक मैं समझता हूं यह कब्रिस्तान नहीं है।’
विजय किसी गहन सोच में डूबा हुआ था। गेन्मार्ड का कथन उसे शत प्रतिशत ठीक लगा था। अवश्य ही किसी व्यक्ति ने इस आदमी की हत्या करके इसे यहां दबा दिया है। गेन्मार्ड की जासूसी ने उस पर सिक्का जमा लिया था। ऐसा आदमी अभी तक उसकी नजर से नहीं गुजरा था कि जो जमीन देखकर यह बता दे कि यहां कुछ दबा हुआ है।
फिर उसका दिल गेन्मार्ड के प्रति संदेह से भर गया। उसने संदिग्ध दृष्टि से उसकी ओर देखा। गेन्मार्ड ने उसी आंखों में छाये हुए संदेह को देखा और मन ही मन मुस्करा दिया।
‘इस प्रकार मेरी और क्या देख रहे हो?’
‘देख रहा हूं कि इस फ्राड से तुम्हारा मतलब क्या है?’
‘कैसा फ्राड?’
‘यह फ्राड ही तो है कि पहले तुमने एक आदमी की हत्या करके उसे यहां दबा दिया और अब मुझ पर अपनी जासूसी का रौब डालने के लिए तुमने इसे मेरे सामने ही खोद निकाला।’
‘यह क्या मूर्खता है?’ गेन्मार्ड बुरा सा मुंह बनाकर बोला।
‘यह मूर्खता नहीं।’
‘मूर्खता नहीं तो क्या है?’ गेन्मार्ड उसकी बात बीच में ही काटता हुआ बोला- ‘भला मैं तुम्हारे ऊपर अपना रौब किसलिए डालना चाहूंगा। क्या मैं चोर लफंगा हूं और तुम एक धनी व्यक्ति हो ताकि मैं तुम्हें अपने कब्जे में लेकर तुमसे धन एेंठ सकूं। अथवा तुम कोई बहुत बड़े सरकारी ऑफिसर हो जो मैं तुम से कोई सरकारी रहस्य प्राप्त कर सकूंगा। तुम हो क्या? तुम्हारी नौकरी क्या है?’
गेन्मार्ड कुछ इस प्रकार गर्म हुआ था कि विजय जैसे वाचाल व्यक्ति की भी एक बारगी तो बोलती बन्द हो गई। वह भौंचक्का सा खड़ा हुआ गेन्मार्ड का चेहरा देख रहा था जो कि बिल्कुल लाल हो गया था। क्रोध से या किसी और कारण से इसका अनुमान विजय नहीं लगा पाया था।
‘बड़े भाई इसमें क्रोधित होने की क्या बात है?’ विजय गेन्मार्ड को ठंडा करने की कोशिश करता हुआ बोला।
‘तुमने बात ही ऐसी की है।’ गेन्मार्ड गड्ढे से बाहर निकलता हुआ नथुने फुलाकर बोला- ‘आखिर तुमने मुझे समझा क्या है?’
‘वह तो मैंने ऐसे ही जरा मजाक में कह दिया था।’ विजय उसका कंधा थपथपाता हुआ बोला।
‘मैं मजाक पंसद करता हूं।’ गेन्मार्ड ठंडा होता हुआ बोला- ‘और मुझे हंसमुख चेहरे बहुत पसंद आते हैं। लेकिन इस प्रकार का वाहियात मजाक मुझे बिल्कुल पंसद नहीं है।’
विजय की समझ में गेन्मार्ड का यह रूप बिल्कुल भी नहीं आया था। वह गेन्मार्ड की ओर से संदिग्ध अवश्य हो उठा था लेकिन वह अभी उस पर कोई गलत हाथ नहीं डालना चाहता था।
‘तुमने उस लााश को खोद कर तो निकाल दिया है लेकिन अब इसका क्या करना है। यह तो बताओ।’ विजय बोला।
गेन्मार्ड गरदन को एक झटका देकर फिर गड्ढे में उतर गया और उस लाश का निरीक्षण करने लगा।
‘तुम तब तक इसका आंखों से पोस्ट मार्टम करो। मैं अभी आया।’- कहता हुआ विजय कोठी की ओर चल दिया। जब तक वह गेन्मार्ड की आंखों से दूर नहीं हो गया तब तक तो धीरे-धीरे चलता रहा। लेकिन उसकी आंखों से ओझल होते ही वह एक दम दौड़ता हुआ अपने फोन वाले कमरे में गया।
वहां से उसने अशरफ को फोन नम्बर डायल किये। सौभाग्य अशरफ घर पर ही मिल गया।
‘हलो इट इज अशरफ।’ दूसरी ओर से अशरफ का स्वर सुनाई दिया।
‘हलो अशरफ।’ विजय पवन के से भर्राये स्वर में बोला- ‘इट इज पवन स्पीकिंग।’
‘यस सर।’ ऐसा लगा जैसे वह सोते से चौंक गया हो।
‘विजय की कोठी पर पहुंचो।’ विजय ने पवन के भेष में संक्षिप्त शब्दों में आदेश दिया-‘वह जिस व्यक्ति को कोठी के द्वार तक छोड़ने आये उसका पीछा करो।’
‘ओके सर...।’
लेकिन विजय ने अशरफ के शब्दों की ओर ध्यान दिये बिना ही रिसीवर कैडिल में रखकर सम्बन्ध विच्छेद कर दिया और कमरे से बाहर निकल आया।
जिस समय वह गेन्मार्ड के पास पहुंचा तो गेन्मार्ड उसे लोहे की बनी हुई प्लेट दिखाता हुआ बोला-‘इसके पास तो केवल यही मिला है।’
‘यह क्या है?’ विजय उसके साथ से एक प्लेट को लेकर देखता हुआ बोला-‘लोहे की प्लेट बिल्कुल साफ थी और उसमें अभी जंग नहीं लगा था।’
प्लेट में काले रंग से हुक्म के इक्के का निशान बना हुआ था और उस निशान के बीच में एक बड़ा सा गोल घेरा था।
विजय ने एकटक गेन्मार्ड को गड्ढे के अन्दर इस प्रकार घूरते देखा तो वह वहीं पेड़ के साथ टेक लगाये ही बोला-‘क्या बात है? क्या तुम्हें खजाने का रास्ता नजर आ गया है? मेरा मतलब है कि अन्दर किसी सुरंग में जाती हुई सीढ़ियां आ रही है क्या?’
‘यहां आओ।’ गेन्मार्ड उसे बुलाता हुआ बोला-‘मैंने तुम से कहा था यहां कुछ दबा हुआ है। आकर देखो कि मेरा विचार कितना ठीक था।’
‘लेकिन क्या दबा हुआ?’ विजय ने उसकी ओर बढ़ते हुए पूछा। फिर जब उसने गढ़े के अन्दर झांक कर देखा तो एकदम आश्चर्य से चौंक पड़ा- ‘हड्डी।’
‘हां, गेन्मार्ड फिर छड़ चलाता हुआ बोला-‘किस की है, यह तुम्हें अभी पता चला जाता है।’
कुछ देर बाद ही उस गढ़े में एक आदमी का लाश पड़ी हुई थी। लाश के कपड़े गल चुके थे और सारे शरीर में कीड़े रेंग रहे थे। उनमें से कई कीड़े गेन्मार्ड के शरीर पर भी चढ़ गए थे जिन्हें उसने हाथ से दूर झटक दिया। लाश के शरीर पर से कई स्थानों से मांस बिल्कुल गायब था और वहां केवल सफेद हड्डी चमक रही थी। लाश का रूप इतना बिगड़ चुका था कि पहचान पाना ही असंम्भव था।
‘यह किसकी लाश हो सकती है?’ विजय लाश को घूरता हुआ बोला।
‘मुझे क्या मालूम?’ गेन्मार्ड छड़ से लाश को पटकता हुआ बोला- ‘मुझे तो इस स्थान पर शक हुआ था और मैंने वह चीज तुम्हारे सामने निकाल कर रख दी जो कि यहां पर दबी हुई थी।
‘मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैंने यह कोठी खरीदी है अथवा भूत खाना।’ विजय अपनी गरदन को खुजाता हुआ बोला।
‘इतना तो निश्चित है कि यह हत्या का मामला है।’ गेन्मार्ड ने लाश को छड़ से पलट कर फिर सीधा करते हुए कहा।
‘यह तुम कैसे कह सकते हो?’
‘सीधी सी बात है।’ गेन्मार्ड अपने कपड़ों की चिन्ता किए बिना ही उस गड्ढे की दीवार से टेक लगाकर खड़ा होता हुआ बोला- ‘अगर यह आदमी अपनी मौत मरा होता तो या तो इसे जला दिया जाता अथवा किसी कब्रिस्तान में दफना दिया जाता। जहां तक मैं समझता हूं यह कब्रिस्तान नहीं है।’
विजय किसी गहन सोच में डूबा हुआ था। गेन्मार्ड का कथन उसे शत प्रतिशत ठीक लगा था। अवश्य ही किसी व्यक्ति ने इस आदमी की हत्या करके इसे यहां दबा दिया है। गेन्मार्ड की जासूसी ने उस पर सिक्का जमा लिया था। ऐसा आदमी अभी तक उसकी नजर से नहीं गुजरा था कि जो जमीन देखकर यह बता दे कि यहां कुछ दबा हुआ है।
फिर उसका दिल गेन्मार्ड के प्रति संदेह से भर गया। उसने संदिग्ध दृष्टि से उसकी ओर देखा। गेन्मार्ड ने उसी आंखों में छाये हुए संदेह को देखा और मन ही मन मुस्करा दिया।
‘इस प्रकार मेरी और क्या देख रहे हो?’
‘देख रहा हूं कि इस फ्राड से तुम्हारा मतलब क्या है?’
‘कैसा फ्राड?’
‘यह फ्राड ही तो है कि पहले तुमने एक आदमी की हत्या करके उसे यहां दबा दिया और अब मुझ पर अपनी जासूसी का रौब डालने के लिए तुमने इसे मेरे सामने ही खोद निकाला।’
‘यह क्या मूर्खता है?’ गेन्मार्ड बुरा सा मुंह बनाकर बोला।
‘यह मूर्खता नहीं।’
‘मूर्खता नहीं तो क्या है?’ गेन्मार्ड उसकी बात बीच में ही काटता हुआ बोला- ‘भला मैं तुम्हारे ऊपर अपना रौब किसलिए डालना चाहूंगा। क्या मैं चोर लफंगा हूं और तुम एक धनी व्यक्ति हो ताकि मैं तुम्हें अपने कब्जे में लेकर तुमसे धन एेंठ सकूं। अथवा तुम कोई बहुत बड़े सरकारी ऑफिसर हो जो मैं तुम से कोई सरकारी रहस्य प्राप्त कर सकूंगा। तुम हो क्या? तुम्हारी नौकरी क्या है?’
गेन्मार्ड कुछ इस प्रकार गर्म हुआ था कि विजय जैसे वाचाल व्यक्ति की भी एक बारगी तो बोलती बन्द हो गई। वह भौंचक्का सा खड़ा हुआ गेन्मार्ड का चेहरा देख रहा था जो कि बिल्कुल लाल हो गया था। क्रोध से या किसी और कारण से इसका अनुमान विजय नहीं लगा पाया था।
‘बड़े भाई इसमें क्रोधित होने की क्या बात है?’ विजय गेन्मार्ड को ठंडा करने की कोशिश करता हुआ बोला।
‘तुमने बात ही ऐसी की है।’ गेन्मार्ड गड्ढे से बाहर निकलता हुआ नथुने फुलाकर बोला- ‘आखिर तुमने मुझे समझा क्या है?’
‘वह तो मैंने ऐसे ही जरा मजाक में कह दिया था।’ विजय उसका कंधा थपथपाता हुआ बोला।
‘मैं मजाक पंसद करता हूं।’ गेन्मार्ड ठंडा होता हुआ बोला- ‘और मुझे हंसमुख चेहरे बहुत पसंद आते हैं। लेकिन इस प्रकार का वाहियात मजाक मुझे बिल्कुल पंसद नहीं है।’
विजय की समझ में गेन्मार्ड का यह रूप बिल्कुल भी नहीं आया था। वह गेन्मार्ड की ओर से संदिग्ध अवश्य हो उठा था लेकिन वह अभी उस पर कोई गलत हाथ नहीं डालना चाहता था।
‘तुमने उस लााश को खोद कर तो निकाल दिया है लेकिन अब इसका क्या करना है। यह तो बताओ।’ विजय बोला।
गेन्मार्ड गरदन को एक झटका देकर फिर गड्ढे में उतर गया और उस लाश का निरीक्षण करने लगा।
‘तुम तब तक इसका आंखों से पोस्ट मार्टम करो। मैं अभी आया।’- कहता हुआ विजय कोठी की ओर चल दिया। जब तक वह गेन्मार्ड की आंखों से दूर नहीं हो गया तब तक तो धीरे-धीरे चलता रहा। लेकिन उसकी आंखों से ओझल होते ही वह एक दम दौड़ता हुआ अपने फोन वाले कमरे में गया।
वहां से उसने अशरफ को फोन नम्बर डायल किये। सौभाग्य अशरफ घर पर ही मिल गया।
‘हलो इट इज अशरफ।’ दूसरी ओर से अशरफ का स्वर सुनाई दिया।
‘हलो अशरफ।’ विजय पवन के से भर्राये स्वर में बोला- ‘इट इज पवन स्पीकिंग।’
‘यस सर।’ ऐसा लगा जैसे वह सोते से चौंक गया हो।
‘विजय की कोठी पर पहुंचो।’ विजय ने पवन के भेष में संक्षिप्त शब्दों में आदेश दिया-‘वह जिस व्यक्ति को कोठी के द्वार तक छोड़ने आये उसका पीछा करो।’
‘ओके सर...।’
लेकिन विजय ने अशरफ के शब्दों की ओर ध्यान दिये बिना ही रिसीवर कैडिल में रखकर सम्बन्ध विच्छेद कर दिया और कमरे से बाहर निकल आया।
जिस समय वह गेन्मार्ड के पास पहुंचा तो गेन्मार्ड उसे लोहे की बनी हुई प्लेट दिखाता हुआ बोला-‘इसके पास तो केवल यही मिला है।’
‘यह क्या है?’ विजय उसके साथ से एक प्लेट को लेकर देखता हुआ बोला-‘लोहे की प्लेट बिल्कुल साफ थी और उसमें अभी जंग नहीं लगा था।’
प्लेट में काले रंग से हुक्म के इक्के का निशान बना हुआ था और उस निशान के बीच में एक बड़ा सा गोल घेरा था।