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Thriller इंसाफ

“तुम्हारी माली हैसियत समझने की फिराक में हूं जो कि तुम्हारे यहां के रहन सहन से कोई खास नहीं जान पड़ती । लोन शार्किंग के लिये पैसा कहां से आता है तुम्हारे पास ?”

“गो टु हैल ।”

“सार्थक तुम्हारा अस्सी हजार का कर्जाई है, ऐसे क्रेडिटर्स और भी होंगे । इतनी इनवेस्टमेंट कहां से आती है ?”

“आती है कहीं से ।”

“या तो ये धंधा तुम्हारा है ही नहीं - तुम इस धंधे में किसी के फ्रण्ट हो - या फिर ये पार्टनरशिप का धंधा है । पार्टनर का नाम बोलो ।”

“गौ टु हैल ।”

“मैं डिटेक्टिव हूं बुरे के घर तक पहुंचने का फुल तजुर्बा है मेरे को । तुम्हारे पीछे पड़ गया तो तुम्हें, तुम्हारे धंधे को, तुम्हारे पार्टनर को ऐसा एक्सपोज करूंगा कि जेल में नजर आओगे ।”

“जेल में ! पागल हुए हो ?”

“तुम पागल हुए हो । नादान भी । जो समझते हो ब्याज पर पैसा उठा कर धर्म कारज कर रहे हो । नहीं है धर्म कारज लोन शार्किंग । गैरकानूनी धंधा है ये । मैं एक्सपोज करूंगा तुम्हें । बल्कि अभी करता हूं ।”

“अभी करते हो ?”

“हां । पुलिस के महकमे में एक इन्स्पेक्टर मेरा जिगरी दोस्त है । देवेन्द्र सिंह यादव नाम है । मैं उसको फोन करके तुम्हारे बारे में, तुम्हारे धंधे के बारे में बात करता हूं । फिर देखना वो तुम्हारी कैसी खबर लेता है !”

मैंने जेब से मोबाइल निकाला ।

“खबरदार !” - वो व्यग्र भाव से बोला ।

“अरे, भाई, खबरदार होने की जरूरत तुम्हें है । अभी जब पुलिस आयेगी और तुम पर चढ़ दौंड़ेगी तो...”

“क्या चाहते हो ?”

“बोल नहीं चुका ?”

“फिर बोलो ।”

“तुम बोलो । धंधे की बाबत जो पूछा है, वो बोलो । धंधा किसी दूसरे का है ? तुम खाली फ्रंट हो ?”

“नहीं ।”

“तुम्हारा है ?”

“हां ।”

“पार्टनरशिप में ?”

“हां ।”

“पार्टनर का नाम बोलो ।”

“विशू मीरानी ।”

“लोन शार्किंग के धंधे में तुम्हारा पार्टनर है ?”

“हां ।”

“बराबर का ?”

“सिक्सटी फॉर्टी का ।”

“सिक्सटी कौन ?”

“वो ।”

“कौन है ? कहां पाया जाता है ?”

“’रॉक्स’ में बारटेंडर है ।”

““रॉक्स’, जो कि सैनिक फार्म्स में बार है ? जिसका मालिक रॉक डिसिल्वा है ? जो कि रोज़वुड क्लब का केटरिंग कांट्रेक्टर भी है ?”

“वही ।”

“रकम की वापिसी के लिये सार्थक पर प्रेशर बनाया जाना चाहिये था, ये फैसला किस का था ? तुम्हारा या तुम्हारे सीनियर पार्टनर विशू मीरानी का ?”

“विशू मीरानी का ।”

“लेकिन उसको अमली जामा तुमने पहनाया था ?”

“हां ।”

“कार की हैडलाइट फोड़ना तुम्हारा अपना आइडिया था ? बीवी के लिये वल्गर धमकी जारी करना तुम्हारा अपना आइडिया था ?”

“हं - हां ।”

“श्यामला के कत्ल की रात को मैंने सुना है कि तुम अपने बेमेल फ्रेंड शरद परमार के साथ ‘रॉक्स’ में थे ?”

“हां ।”

“कब तक वहां थे ?”

“क्लोजिंग टाइम तक ।”

“वो कौन सा हुआ ?”

“रात एक बजे तक ।”

“इतनी देर बार खुला रखना तो दिल्ली में गैरकानूनी है !”

“सब चलता है ।”

“कोई गवाह है जो ये स्थापित करे कि तुम रात एक बजे तक ‘रॉक्स’ में थे ?”

“है ।”

“कौन ?”

“विशू मीरानी । बारटेण्डर ।”

“चोर चोर मौसेरे भाई । कोई भरोसे का गवाह है ?”

वो खामोश रहा ।

“तुम नशे के आदी हो ।”

उसने हड़बड़ा कर गर्दन उठाई ।

“तुम्हारा पसन्दीदा नशा चरस है, जिसे विलायती जुबान में हशीश कहते हैं । ये बात मैं तुम्हारे से पूछ नहीं रहा, तुम्हें बता रहा हूं ।”

“ब - ब... बता रहे हो ?”

“इस बक्से की - जिसे तुम कमरा कहते हो - हवा में चरस की महक है जिसे मेरे नथुने बाखूबी पकड़ रहे हैं । तुम चरस का सिग्रेट सुलगाये बैठे थे जब कि कालबैल बजी थी । तभी तुमने सिग्रेट को उधर कोने में रखे स्टूल पर पड़ी ऐशट्रे में डालकर मसला था । लगता है सिग्रेट फौरन बुझा नहीं इसलिये ऐशट्रे में मसले जाने के बाद भी माहौल को चरस से महकाता रहा ।”

उसका मुंह खुला, बन्द हुआ ।

“अभी यहां एनसीबी का छापा पड़े तो कितनी मिकदार में चरस बरामद होगी ?”

वो बदहवास दिखाई देने लगा । उसने जोर से थूक निगली, उसके गले की घन्टी उछली ।

“और” - मैं उठ खड़ा हुआ - “तुम्हारे लिये सार्थक का एक सन्देशा है ।”

“क्या ?”

“वो बहुत जल्द आ कर तुम्हारे से मिलेगा ।”

तत्काल उसका मिजाज बदला ।

“मिले ।” - वो फुंफकारता सा बोला - “तैयार पायेगा मुझे अपने स्वागत के लिये ।”

“गुड ! ये की न बहादुर, जांबाज, जगतप्रसिद्ध गोरखों वाली बात ! खुखरी है न ! मुकाबला गन से होगा, फिर भी धार दे के रखना । शाबाश !”

वो आग्नेय नेत्रों से मुझे जाता देखता रहा

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मैं सैनिक फार्म्स पहुंचा ।

‘रॉक्स’ एक मध्यम दर्जे का बार निकला जो उस बड़ी लगभग खाली था । लगता था उसकी तमाम रौनक चराग जले की ही थी ।

बार के पीछे एक बारमैन तो मौजूद था लेकिन जाहिर था कि व्यस्तता से न उसका कोई वास्ता था, न पड़ने वाला था । वो काउन्टर पर कोहनियां टिकाये खड़ा था और ऊंघता जान पड़ता था । वो एक सिंगल सिलेंडर बॉडी वाला दरम्याने कद का व्यक्ति था ।

मैं बार पर जा कर उसके सामने खड़ा हुआ ।

उसके पोज में कोई फर्क न आया ।

“जिन्दा हो ?” - मैं बोला ।

वो हडबड़ाया, उसने सिर उठा कर मेरी तरफ देखा ।

“विशू मीरानी से मिलना है ।” - मैं बोला ।

“वो तो चला गया ।” - जवाब मिला - “अभी गया ।”

जो कि कोई हैरानी की बात नहीं थी । जाहिर था कि मेरे घर से निकलते ही माधव धीमरे ने मेरी बाबत उसे फोन खड़का दिया था और खबरदार कर दिया था कि मैं उसके पास भी पहुंच सकता था ।

“मैं वेट करूंगा उसके लौटने की ।” - मैं बोला - “एक वोदका लगा ।”

“उसने नहीं बोला था कि वो लौट के आयेगा ।”

“फिर तो ये भी नहीं बोला होगा कि नहीं लौट के आयेगा ?”

वो गड़बड़ाया ।

“आईल वेट ।”

“टाइम ही जाया करोगे, साहेब !”

“कोई बात नहीं । है मेरे पास जाया करने के लिये टाइम ।”

उसने प्रतिवाद में मुंह खोला, बन्द किया ।

“बोल के गया कि कहां जा रहा था ?” - मैंने पूछा ।

“नहीं ।”

“मैं उसी के बुलावे पर यहां आया हूं ।”

उसके चेहरे पर अविश्वास के भाव आये ।

“भूल गया होगा ।” - फिर बोला - “इस लिहाज से तो कोई मतलब ही नहीं उसके लौटने का !”

“भूली बात याद आ जाती है ।”

तभी रॉक डिसिल्वा ने बार में कदम रखा ।

यानी वार्निंग बैल उस तक जा बजी थी ।

उसके मुंह में सुलगा सिगार तब भी मौजूद था ।

लम्बे डग भरता वो बार पर पहुंचा और बोला - “क्या प्राब्लम है, विशू...”

विशू !

“...ये हैं वो साहब जो...”

वो बोलता-बोलता रुक गया । तब तक उसकी निगाह मेरी सूरत पर पड़ गयी थी । उसके नेत्र फैले ।

“तुम !” - उसके मुंह से निकला - “फिर !”

“पहचान लिया !” - मैं सहज भाव से बोला ।

“तुमने ‘रोज़वुड’ में शरद परमार पर हाथ उठाया था !” - वो अप्रसन्न भाव से बोला ।

“गलत । हाथ उठाया नहीं था, बहन पर उठता हाथ ब्लॉक किया था । फर्क समझ में आया चट्टान सिंह ?”

“क्या !”

“रॉक ! रॉक डिसिल्वा !”

जवाब देने की जगह उसने बेचैनी से पहलू बदला ।

मैं वापिस बारमैन की ओर घूमा ।

“तो” - और बोला - “तुम्हीं हो विशू मीरानी ! अच्छी तरकीब सोची मुझे भटकाने की ! बॉस ने आ कर बनता काम बिगाड़ दिया !”

उसने खामोशी से अपने होंठों पर जुबान फेरी ।

“मांगता क्या है तुम्हें यहां ?” - डिसिल्वा पूर्ववत् अप्रसन्न भाव से बोला ।

“तुम्हारे बारमैन से बात करना मांगता है । ये मिजाज दिखाता है । अभी देखना, मैं इससे कुछ पूछूंगा, ये या तो जवाब देगा नहीं या ऐसा गोलमोल जवाब देगा जैसे को समझने के लिये मुझे उस्ताद रखना पड़ेगा । वाच इट नाओ । विशू मीरानी, तुमने अपने पार्टनर माधव धीमरे को सार्थक बराल पर प्रेशर बनाने को बोला था ?”

“कौन कहता है ?” - मीरानी बोला ।

“तुम्हारा पार्टनर माधव धीमरे कहता है ।”

“गलत कहता है । और वो मेरा पार्टनर नहीं, मामूली दोस्त है ।”

“दोस्त भी होगा लेकिन पार्टनर पहले है ।”

“नहीं है ।”

“सार्थक की बीवी श्यामला मरहूम को फाश धमकी जारी करने का आइडिया भी तुमने उसे सरकाया था । तुम्हारे कहने पर धीमरे ने धमकी जारी की थी कि सार्थक उधारी की रकम फौरन वापिस नहीं करेगा तो उसकी बीवी का रेप होगा और करने वाला धीमरे होगा ।”

मीरानी ने जवाब न दिया, उसने पनाह मांगती निगाह से अपने बॉस की तरफ देखा ।

“एनफ आफ दैट ।” - डिसिल्वा कर्कश स्वर में दखलअन्दाज हुआ - “प्लीज गो अवे ।”

मैंने न उसकी धमकी की परवाह की, न उसकी तरफ ध्यान दिया, मैं पूर्ववत् बारमैन से सम्बोधित हुआ - “तुमने धीमरे को कत्ल की रात की एलीबाई दी...”

“आई सैड आउट !” - डिसिल्वा गर्जा ।

“...लेकिन तुम्हारी एलीबाई की तब हवा निकल गयी जबकि सार्थक की पड़ोसन कमला ओसवाल ऐन उस वक्त के आसपास धीमरे को सार्थक की कोठी में दाखिल होता देख लिया जबकि श्यामला का कत्ल हुआ था । इस लिहाज से कातिल कौन हुआ ?”

वो बात सफेद झूठ थी लेकिन मेरे कारोबार में कई बार ऐसे झूठ के बड़े कारआमद नतीजे निकलते थे ।

वहां भी औना पौना नतीजा निकला ।

मीरानी नर्वस दिखाई देने लगा वो बेचैनी से बार बार पहलू बदलने लगा और फरियाद सी करता डिसिल्वा की ओर देखने लगा ।

उसके उस हाल ने ही मुझे यकीन दिला दिया कि माधव धीमरे झूठ बोलता था कि वो देर रात तक, क्लोजिंग टाइम तक, उस बार में था ।

“साहब ऐसे नहीं मानेंगे ।” - डिसिल्वा उग्र भाव से बोला - “अन्दर से चार पांच आदमी बुलाओ जो इन्हें उठा कर बाहर फेंकें ।”

“साहब फौजदारी के खिलाफ हैं” - मैं बोला - “इसलिये इस जहमत की जरूरत नहीं । नमस्ते । अलविदा । गुडबाई । दस्वीदानिया ।”

दोनों खामोशी से मुझे वहां से रुखसत पाते देखते रहे ।

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कुछ आदत से मजबूर, कुछ टाइम पास की मजबूरी, सात बजे मैं ‘कोजी कार्नर’ में था ।

मैं जानता था किसी ने दावत पर जाना हो तो वो घर से पेट भर के नहीं जाता था । लेकिन इनवीटेशन डिनर का था, ड्रिंक्स का तो कोई जिक्र ही नहीं उठा था ।

जिक्र नहीं उठा था - मैंने खुद को समझाया - लेकिन वो खुद ड्रिंक करती थी इसलिये जाहिर था कि डिनर में ड्रिंक्स शामिल थीं ।

सब जानते बूझते मैं बार में पहुंचा हुआ था ।

कसूर - मैंने खुद को समझाया - रिंद का नहीं, मौसम का था ।

मैं बार पर जा कर बैठा । जुत्शी ने तत्काल मुझे ड्रिंक सर्व किया । मैंने एक सिग्रेट सुलगा लिया और उसके कश लगाता विस्की चुसकने लगा ।

सार्थक का केस मेरे लिये चैलेंज जनता जा रहा था और अब मुझे ये अन्देशा सताने लगा था कि कहीं मुझे नाकामी का मुंह न देखना पड़े, हाथ न खड़े कर देने पड़ें कि उस केस को हल करना मेरे बस का नहीं था । ऐसा आज तक तो हुआ नहीं था इसलिये अपने बनाने वाले से मेरी यही दुआ थी कि नाचीज को ये दिन न दिखाना या रब ।

मैंने दो ड्रिंक्स हलक से उतारे और जुत्शी को बिल देने को बोला ।

पुष्पा विहार पहुंचने तक वो दो ड्रिक कहां गये, मुझे पता ही नहीं लगना था ।

मैंने बार से बाहर कदम रखा ।

बाहर ठण्ड तो मौसम के मुताबिक थी ही, उस रोज ठण्डी, बर्फीली हवा भी चल रही थी जो कपड़ों को भेद कर हड्डियों में जा घुसने की क्षमता रखती थी, लेकिन मुझे क्या परवाह थी, आखिर अब मैं दो लार्ज पैग उम्दा स्काच विस्की से प्रोटेक्टिड और फोर्टीफाइड था ।

मैंने नया सिग्रेट सुलगा लिया, कोट का कालर ऊंचा कर लिया और जन्तर मन्तर की ओर बढा ।

जहां कहीं ‘सार्थक को इंसाफ दो’ का शिविर था ।

वो जगह ‘कोजी कार्नर’ से कोई ज्यादा दूर नहीं थी । दस मिनट की वाक ने मुझे वहां पहुंचा दिया ।

वहां सड़क किनारे एक शामियाना लगा हुआ था जिसमें एक बाजू एक स्टेज था और उसके सामने दरियां बिछी हुई थीं, उस ठण्ड के मौसम में भी जिन पर कुछ लोग बैठे हुए थे जो कि तकरीबन नेपाली थे । हर तरफ ‘सार्थक को इंसाफ दो’ के बैनर लगे दिखाई दे रहे थे जो कि स्टेज पर सबसे ज्यादा थे । स्टेज पर माइक के सामने खड़ा कोई भाषण दे रहा था और पीछे कुर्सियों पर कुछ लोग यूं बैठे थे जैसे भाषण दे चुके थे या अपनी बारी आने का इन्तजार कर रहे थे या फिर खाली सम्मानित अतिथि थे जिनको सम्मान देने के लिये स्टेज पर जगह दी गयी थी ।

जैसे कि सार्थक की मां अहिल्या बराल ।

उसका बड़ा भाई शिखर बराल ।

वकील विवेक महाजन ।

मैं आगे बढ़ कर स्टेज के करीब जा खड़ा हुआ ।

वकील से मेरी निगाह मिली ।

तत्काल वो उठा और स्टेज से पिछली तरफ कहीं उतर कर मेरी निगाह से ओझल हो गया । दो मिनट बाद फिर प्रकट हुआ तो वो मेरे पहलू में था । उसने मुझे दिखा कर बाहर की तरफ इशारा किया । मैंने सहमति में सिर हिलाया और उसके पीछे हो लिया । हम शामियाने से बाहर निकल कर उससे थोड़ा दूर फुटपाथ पर एक जगह ठिठके ।

“यहां कैसे ?” - वो बोला ।

“कभी धरना प्रदर्शन नहीं देखा था” - मैं बोला - “जिसके लिये कि जन्तर मन्तर मशहूर है । देखने चला आया ।”

“अच्छा किया । वर्ना मेरा ‘कोजी कार्नर’ का चक्कर लगाने का इरादा था ।”

“क्योंकि आसपास थे ! पिछली बार की तरह !”

“हां ।”

“यहां तो कई स्टेज हैं, कई शामियाने हैं, कई प्रदर्शन चल रहे हैं !”

“ऐसा ही होता है यहां । धरना प्रदर्शन के लिये दिल्ली सरकार ने ये जगह पक्के तौर पर मुकर्रर कर दी हुई है ।”

“आई सी । ‘सार्थक को इंसाफ दो’ का क्या हाल है ?”

“कमजोर हो गया है सिलसिला । पब्लिक में अब पहले जैसा जोश बाकी नहीं है लेकिन चल रहा है ।”

“चन्दे की क्या पोजीशन है ?”

“इजाफा हो रहा है लेकिन बहुत सुस्त रफ्तार से ।”

“ओह !”

“तुम बताओ क्या खबर है, क्या प्रॉग्रेस है ?”

“कोई खास खबर प्रॉग्रेस नहीं । पिछले दो दिन तो कुछ भी नहीं हुआ । शुक्रवार को ‘रोज़वुड’ में लंच पर शेफाली परमार से मेरी लम्बी, इवेन्टफुल मुलाकात हुई थी ।”

“उसकी मुझे खबर है ।”

“कैसे ?”

“मेरे से ही उसने तुम्हारा मोबाइल नम्बर पूछा था ।”

“आप से ?”

“हां ।”

औरत की जात ! मेरे को कहती थी मेरे पुर्जा पुर्जा विजिटिंग कार्ड के टुकड़े जोड़े थे ।

वकील का घोड़ा ऐसी बातें बताता था, ये नहीं बताता था कि रहस्यमयी रमणी शेफाली थी या नहीं थी ।

“क्या जाना उससे ?” - वो उत्सुक भाव से बोला ।

“जाना तो काफी कुछ” - मैं बोला - “लेकिन ऐसा कुछ न जाना जिससे कत्ल के हल की तरफ मुझे अपने कदम बढ़ते जान पड़ते ।”

“ओह ! माधव धीमरे की बोलो । उससे मुलाकात हुई ?”

“आज हुई आखिर ।”

“क्या हुआ ?”

मैंने उसे दिन का तमाम वाकया कह सुनाया ।

“आल थिंग्स सैड एण्ड डन ।” - मैं बोला - “मुझे केस में कामयाबी की कोई गुंजायश दिखाई देती है तो माधव धीमरे में ही दिखाई देती है । अब मैं यकीनी तौर पर कह सकता हूं कि वो सरासर झूठ बोलता है जब जो कहता है कि कत्ल की रात को वो तमाम वक्त ‘रॉक्स’ में था । लेकिन इस बात का ढोल पीटना शुरू करने से पहले कुछ और जानकारी हासिल होना जरूरी है ।”

“करो ।”

“करूंगा न ! आज जो कुछ पहले धीमरे के घर में और फिर ‘रॉक्स’ में हुआ, उसकी कोई प्रतिक्रिया सामने आने का इन्तजार करूंगा, फिर... देखूंगा ।”

“तुम देखोगे, देखते रहोगे, मेरा क्लायंट जेल में सड़ता रहेगा ।”

“आप क्या चाहते हैं ? इन्तजार का वक्फा खारिज करने के लिये मैं धीमरे का बैंड बजा दूं ?”

“क्या मतलब ?”

“फौजदारी करूं उससे ? थर्ड डिग्री वाले तरीकों से हकीकत कबुलवाने की कोशिश करूं ?”

“नहीं, ये तो ठीक नहीं होगा ! मैं वकील यूं मेरे से बेहतर कौन जानता है कि जबरन हासिल किया गया कनफैशन कोर्ट में नहीं ठहरता । कई बार तो कोई फायदा करने की जगह उलटा नुकसान करता है ।”

“ऐग्जैक्टली ! इसीलिये इन्तजार जरूरी है ।”

तभी माइक पर घोषणा होने लगी - “एडवोकेट विवेक महाजन से मेरी प्रार्थना है कि वो जहां कहीं भी हों, स्टेज पर पधारें । एडवोकेट महाजन कृपया स्टेज पर पधारें ।”

“चलता हूं ।” - वो व्यस्त भाव से बोला ।

“जरूर ।” - मैं बोला - “शिखर बराल को मैंने आपके बाजू में स्टेज पर बैठे देखा था । उसे बोलियेगा कि थोड़ी देर के लिये यहां मेरे पास आये ।”

“बोलूंगा ।”

वो वापिस स्टेज की तरफ बढ़ चला ।

पीछे मैंने एक सिग्रेट सुलगा लिया और प्रतीक्षा करने लगा ।

शिखर मेरे पास पहुंचा ।

“क्या है ?” - वो भुनभुनाता सा बोला ।

“ईंट क्यों मार रहे हो ?” - मैं बोला ।

वो हड़बड़ाया, फिर कदरन नम्र स्वर में बोला - “क्या है ?”

“याद आयी मेरी ? पहचान लिया मेरे को ?”

“हां । तभी तो आया !”

“ओह ! मैं समझा खाली वकील साहब का कहना माना ।”

“मेरी मां भीड़ में अकेले में घबरा जाती है, मेरा उसके पास होना जरूरी है ।”

“हिन्ट ले लिया मैंने । मुझसे दोबारा मिलकर तुम्हें कोई खुशी नहीं हुई जान पड़ती । मैं तो समझा था कि देखोगे कौन मुलाकात का तमन्नाई है तो बाग बाग हो जाओगे ।”

“मैं गे नहीं हूं ।”

मैं हड़बड़ाया, मैंने घूर कर उसे देखा । मेरे घूरने का उस पर कोई असर हुआ हो तो वो नुमायां न हुआ ।

“तुमने कहा” - मैं बदले स्वर में बोला - “कि कत्ल की रात को तुम ‘रॉक्स’ में थे !”

“हां ।”

“वहां से कब निकले थे ?”

“साढ़े नौ बजे । तभी शरद परमार और माधव धीमरे वहां पहुंचे थे । उनके वहां पहुंचते ही मैं वहां से निकल लिया था ।”

“उनकी वजह से निकल लिये ? वर्ना और रुकते ?”

“हां ।”

“उनसे प्राब्लम क्या थी तुम्हें ?”

“शरद से प्राब्लम थी । वो टुन्न था । ऐसी हालत में कुछ पता नहीं लगता था कि उसके मिजाज का ऊंट किस करवट बैठता ! मैं किसी बखेड़े में नहीं फंसना चाहता था ।”

“आई सी । बार से निकल कर कहां गये ?”

“घर गया ।”

“कब पहुंचे वहां ?”

“ध्यान नहीं । समझो कि जितना वक्त ‘रॉक्स’ से घर तक की ड्राइव में लगता है ।”

“खुद ड्राइव करते हो ?”

“हां ।”

“कार कौन सी है ?”

“रिट्ज है ।”

“सफेद रंग की ?”

“हां । कैसे जाना ?”

“तुम्हारे भाई के पास भी सफेद रंग की कार है ?”

“हां, लेकिन वो सान्त्रो है ।”

“दोनों में देखने में कोई खास फर्क तो नहीं !”

“है फर्क । खास तौर से रियर में ।”

“जो रियर से ही तो दिखाई देगा ! साइड से या फ्रंट से तो नहीं दिखाई देगा न !”

“तो ?”

“तो उस रात तुम घर उतने वक्त में पहुंचे थे जितना ‘रॉक्स’ से घर तक की ड्राइव में लगता है ?”

“हां । पहले भी बोला ।”

“घर ‘रॉक्स’ से कोई ज्यादा दूर तो नहीं !”

“तो समझो जल्दी पहुंचा ।”

“तुम्हारी मां को तो करैक्ट टाइम पता होगा जब कि तुम घर लौटे थे ?”

“नहीं ।”

“क्यों ?”

“वो जल्दी सो जाती है । मैं जब घर पहुंचा था तो तब वो सोई पड़ी थी ।”

“भई, उसको उठ कर दरवाजा खोलना होता होगा !”

“नहीं । मेन डोर पर स्प्रिंग लॉक है, उसकी एक चाबी हमेशा मेरे पास होती है ।”

“फासले का जो मेरा अन्दाजा है, उसके लिहाज से तुम्हें पौने दस तक घर पहुंच गया होना चाहिये था ।”

“ठीक ।”

“बशर्ते कि रास्ते में कहीं रुके न हो । किया था ऐसा ?”

“याद नहीं । ध्यान नहीं । पुरानी बात हो गयी है न ! फिर ये न भूलो कि मैं बार से निकला था ।”

“इसी काम के लिये बार में जाया जाता है ।”

“हैवी ड्रिंकर हो ?”

“मैं नहीं जानता हैवी ड्रिंकर किसे कहते हैं !”

“एक शाम को कितने पैग पीते हो बार में ?”

“गिन कर नहीं पीता । जब तक मूड होता है, जब तक मौज होती है, पीता हूं ।”

“कभी टुन्न नहीं हुए ?”

“कार खुद ड्राइव करके घर पहुंचता हूं कि नहीं पहुंचता !”

“खुद ड्राइव करने वाले तजुर्बेकार बेवड़ों में कोई ऐसा राडार लगा होता है जिसके सदके घर तो वो पहुंच ही जाते हैं, भले ही कितने टुन्न हों । खुद मेरे साथ कई बार ऐसा होता है कि अगली सुबह मुझे याद नहीं आता कि कौन से रास्ते से मैं घर पहुंचा था लेकिन पहुंचा था बराबर । सेफ एण्ड साउन्ड । ऐसा तुम्हारे साथ भी होता होगा !”

उसने जवाब न दिया ।

“बहरहाल तुम्हारी मां इस बात की तसदीक नहीं कर सकती कि उस रात तुम पौने दस घर पहुंचे थे या पौने ग्यारह घर पहुंचे थे या पौने बारह घर पहुंचे थे या और भी लेट कर पहुंचे थे । नहीं ?”

“जब मैं कहता हूं कि...”

“कत्ल का मामला है, भाई, सिर्फ तुम्हारा कहना काफी नहीं । जो तुम कह रहे हो, उसको सबस्टैंशियेट करने का कोई जरिया तुम्हारे पास होना चाहिये, जो कि नहीं है ।”

वो फिर खामोश हो गया ।

“उस रात तुम्हें भाई का एक्सप्रैस बुलावा आया था । सार्थक ने तुम्हें फोन करके मोतीबाग बुलाया था ताकि तुम्हारे जरिये वो अपने लिये एलीबाई खड़ी कर पाता । कब फोन आया था उसका ? क्या टाइम था तब ?”

“जहां तक मुझे याद पड़ता है साढ़े ग्यारह बजे थे ।”

“तुम आनन फानन भाई के पास पहुंचे थे । वहां उसने तुम्हें...”

“अब छोड़ो भी । आगे वही बातें दोहराओगे जो सारी दिल्ली को मालूम हैं । क्या फायदा टाइम वेस्ट करने का ! मैंने बोला न, मैंने मां के पास स्टेज पर वापिस जाना है ।”

“खफा क्यों होते हो, यार । सहयोग के लिये शुक्रिया कबूल करो और... जाओ ।”

बिना एक लफ्ज भी और बोले वो घूमा और स्टेज की ओर बढ़ चला ।

पीछे एक ज्वलंत प्रश्न छोड़ कर ।

क्या वो कातिल था ?

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सवा नौ बजे मैं पुष्पा विहार में शेफाली परमार के फ्लैट पर था ।

फ्लैट एक चारमंजिला इमारत की पहली मंजिल पर था, एक अकेले शख्स की रिहायश के लिहाजे से बहुत बड़ा था और जिस ऐश्वर्यशाली ढंग से सजा हुआ था, वो किसी फिल्दी रिच बाप की बेटी की पहुंच में ही हो सकता था ।

मेरे कालबैल बजाने पर दरवाजा जिस मेड ने खोला वो इतनी जवान, इतनी खूबसूरत थी कि अगर मैं शेफाली से पहले मिल न चुका होता तो उसी को शेफाली समझ बैठा होता ।

उसने बड़ी अदा से सिर नवा कर मेरा अभिवादन किया और हाथ जोड़ कर नमस्ते की जिससे जाहिर होता था कि उसे मेरी आमद की खबर थी ।

फिर उसने तसदीक भी की ।

“मिस्टर शर्मा सर ?” - उसने खनकती आवाज में पूछा ।

“दि सेम ।” - मैं बोला ।

“वैलकम, सर । प्लीज कम इन ।”

“थैंक्यू ।”

उसने मेरे पीछे दरवाजा बंद किया और घूमी ।

मेरी पारखी निगाह उस पर नख से शिख कर फिरी ।

“क्या अन्दाजा है ?” - वो मुस्कराती हुई बोली ।

“चौंतीस - सत्ताइस - पैंतीस ।” - मैं बोला ।

“तकरीबन ठीक । लेकिन कमर पच्चीस ।”

“ओह ! वो क्या है कि आंखों से लिये नाप में गलती की गुंजायश रहती है । हाथ से लिया नाप नख से शिख तक ऐन दुरुस्त होता है । अपनी करैक्शन कनफर्म करने देती हो ?”

वो होंठ दबा कर हंसी ।

“मैडम कहां हैं ?”

“बैडरूम में ।” - वो बोली ।

“बैडरूम में ! वहां क्या कर रही हैं ?”

“वार पेंट को फाइनल टच दे रही हैं ।”

यानी खूबसूरत ही नहीं, पढ़ी लिखी भी थी ।

“आप ड्राईंगरूम में बैठिये, मैम आती है ।”

“ड्राइंगरूम कहां हैं ?”

उसने एक दरवाजे को धकेल कर खोला तो जैसे मुझे मुगलेआजम का सैट दिखाई दिया ।

“लेकिन” - वो अर्थपूर्ण भाव से बोली - “लिकर कैबिनेट लाक्ड है ।”

“नो प्राब्लम, मैं अपना इन्तजाम साथ रखता हूं ।”

“लिकर साथ रखते हैं ?”

“मास्टर-की साथ रखता हूं ।”

वो हंसी । दिलकश हंसी ।

“वैरी वैल सैड, सर ।”

फिरंगियों में कहते हैं - एक मेड हू लाफ्स विद मेल गैस्ट, इज हाफ टेकन ।

मेड ऐसे हंसी तो आधी फंसी ।

लेकिन आपके खादिम को उस घड़ी वो प्रॉस्पैक्ट कबूल नहीं था क्योंकि फिरंगियों में ही ये भी कहते हैं - नैवर फ्लर्ट विद ए मेड वैन मिस्ट्रेस इज विलिंग ।

अभी मिस्ट्रेस से मुझे बहुत उम्मीदें थीं इसलिये मेड मेरे लिये ‘एब्सोल्यूट नो नो’ थी ।

फिर भी टाइम पास के लिये चिरौरी करने में क्या हर्ज था !

“आप तशरीफ रखिये” - वो बोली - - “मैं मैम को आपकी आमद की खबर करती हूं ।”

“यस, प्लीज । बाई दि वे, नाम क्या है तुम्हारा ?”

“आयुशा । आयुशा कोईराला ।”

“ऐनी रिलेशन विद मोनीषा कोईराला ?”

“नो, नो रिलेशन, सर ।”

“लेकिन हो नेपाली !”

“हूं तो सही आपको मेरे नेपाली होने से कोई ऐतराज है ?”

“नहीं भई, बिल्कुल नहीं ।”

“मैं मैडम को खबर करती हूं ।”

इठलाती, बल खाती वो चली गयी ।

मालकिन नौजवान हो, अकेली रहती हो तो हमउम्र मेड मेड नहीं रहती, सहेली बन जाती है ।

मैं एक सोफे पर ढ़ेर हुआ, मैंने एक सिग्रेट सुलगा लिया और प्रतीक्षा करने लगा ।

मेरा सिग्रेट अभी आधा खत्म हुआ था कि उसने ड्राईंगरूम में कदम रखा ।

तत्काल मैंने सिग्रेट को ऐशट्रे में झोंका और उछल कर खड़ा हुआ ।

“हल्लो !” - वो मुस्कराई और खनकती आवाज में बोली - “वैलकम, मिस्टर शर्मा । थैंक्स फार कमिंग ।”

“दि प्लेजर इज माइन, मैडम ।”

“प्लीज सिट डाउन ।”

सिट डाउन होने से पहले मैंने आंख भर कर उसे देखा ।

वो बनारसी रेशम की साड़ी पहने थी और रेशम रेशम लग रही थी । पता नहीं कौन सा बाकमाल सैंट लगाये थी कि मेरे नथुनों से मदहोश कर देने वाली खुशबू टकरा रही थी । कृत्रिम प्रकाश में उसके खुले बाल चमक रहे थे और काली कजरारी आंखें बालों से ज्यादा चमक रही थीं ।

कहीं मेरी तरह वो भी शाम की तफरीह शुरू कर ही तो नहीं चुकी थी !

मैं बैठ गया तो वो मेरे सामने बैठने की जगह आकर मेरे पहलू में बैठी । मैं बाग बाग हो गया ।

उसके पीछे पीछे ही ड्रिंक्स की ट्रे उठाये मेड वहां पहुंची ।

ग्लैनफिडिक - 18 इयर्स ओल्ड ।

नाइस !

बाजार में नौ हजार की थी ।

दूसरे फेरे में मेड कबाब की दो तीन प्लेटें वहां छोड़ के गयी ।

उसने दक्षता से दो ड्रिंक्स तैयार किये और हमने चियर्स बोला ।

मैंने खूबसूरत, कीमती, बिलौरी गिलास अपनी उंगलियों में घुमाया और बोला - “बढ़िया ।”

वो मुस्कराई ।

“ग्लैनफिडिकन-18 है ही...”

“गिलास ।”

उसके होंठों से मुस्कराहट गायब हुई ।

“ओह !” - वो गिला करती सी बोली - “यानी विस्की पसंद नहीं आयी !”

“गिलास के बाद कोई चीज पसन्द आयी तो... विस्की ।”

“लिहाजा मेरा नम्बर गिलास और विस्की के बाद !”

“नहीं, भई । ये सोफा बहुत शानदार है । उधर वाल कैबिनेट भी कमाल की है । फर्श पर बिछे कश्मीरी कालीन की तो बात ही क्या है...”

“सन आफ ए बिच ।”

“ओरीजिनल ! ऐज ओरीजिनल ऐज दिस ग्रेट विस्की ।”

“ओह !” - उसने चैन की सांस ली - “तो पहले जोक मारा !”

मैं हंसा ।

“मेरे को तो डरा ही दिया था तुमने । सोचा, शायद ‘ब्लू लेबल’ पीते हो ।”

“मैं डेली ड्रिंकर हूं और कामकाजी आदमी हूं । कैसे होगा ! पल्ले से ‘ब्लू लेबल’ या समगलर पी सकता है या नेता पी सकता है या शाहरुख पी सकता है या दुख्तरेपरमार पी सकती है ।”

“क्या कहने ! बातें बढ़िया करते हो ! अच्छी गुजरेगी ।”

“जहेनसीब !”

हम दोनों ने खामोशी से अपना अपना जाम घुसका ।

“शुक्रवार को क्लब में जो कुछ हुआ” - फिर वो बोली - “उसका मुझे अफसोस है । उस रोज की खता बख्शवाने के लिये ही आज मैंने तुम्हें डिनर पर इनवाइट किया है ।”

“तुम्हारी कोई खता नहीं थी ।” - मैंने उसे आश्वासन दिया ।

“शरद बहुत ड्रिंक करता है । बाज नहीं आता ।”

“दिल्ली की ये कॉमन लानत है लेकिन दिन में भी हैवी ड्रिंकिंग !”

“वो परवाह नहीं करता । कहता है मौज का, मूड का कोई वक्त मुकर्रर नहीं होता । कहता है ये बात सरकार को भी मालूम है, तभी तो क्लब का बार दिन में भी खुलता है ।”

“अजीब लॉजिक है ! बाई दि वे, रॉक डिसिल्वा मुझे फिर मिला था ।”

“अच्छा ! कब ? कहां ?”

“आज ही । ‘रॉक्स’ में ।”

“कैसे पेश आया ?”

“खराब ।”

“अरे ! क्या हुआ ?”

मैंने बताया ।

“कमाल है !” - वो हैरानी जताती बोली ।

“सिगार हर वक्त पीता है ?”

“हर वक्त तो नहीं पीता ।”

“शुक्र है ।”

“जैसे सोते में नहीं पीता, नहाते वक्त नहीं पीता ।”

“ओह ! यानी चेन स्मोकर है !”

“यही समझ लो । सिगार भी खास पीता है । पुर्तगाल से आता है । चुरुट बोलता है उसे ।”

“आई सी । ‘रॉक्स’ में तुम्हारा कभी आना जाना होता है ?”

“बस, एक बार गयी थी । मुझे वो जगह जरा पसन्द नहीं आयी थी लेकिन शरद वहां अक्सर जाता है ।”

“वहां का बारमैन... विशू मीरानी... उसके बारे में कुछ जानती हो ?”

“नहीं । सिवाय इसके कुछ नहीं कि डिसिल्वा उस पर बहुत मेहरबान है ।”

“उसका नमूना तो दिखाई दिया था मुझे । अपने बारमैन की हिमायत के लिये दौड़ा आया था वहां ।”

वो खामोश रही । उसने स्काच का एक घूंट भरा, कबाब का एक टुकड़ा चुभलाया ।

“श्यामला के मर्डर के केस के बारे में क्या सोचता है वो ?”

“कौन ? बारमैन ?”

“अरे, नहीं भई । उसका एम्प्लायर । रॉक डिसिल्वा ।”

“क्या सोचता है ! सार्थक को कातिल करार देता है । क्लब में कभी जिक्र छिड़े उस केस का तो खम ठोक के कहता है सार्थक फांसी पर झूलेगा ।”

“सार्थक के खिलाफ था ?”

“खिलाफ तो था ही, मुखालफत छुपाता भी नहीं था । कहता था सार्थक श्यामला की सैंडल पालिश करने के काबिल नहीं था ।”

“सार्थक के सामने कहता था ?”

“नहीं, सामने तो नहीं कहता था - कहता तो जरूर फौजदारी होती - लेकिन उसकी गैरहाजिरी में उसके खिलाफ बोलता ही रहता था ।”

“कोई टोकता नहीं था ?”

“एक बार मैंने टोका था तो साफ मुकर गया था । पुरजोर बोला कि उसने ऐसा कुछ नहीं कहा था । यही स्टाइल है उसका । बात को सरकाता था, फिर डिसओन करता था ।”

“आई सी ।”

“शादी की खबर आम हुई थी तो कहता था कि पांव की धूल उड़ कर सिर पर आ पड़ी थी ।”

“इन बातों से तो लगता है कि सार्थक से उसको कोई पर्सनल खुन्नस थी !”

“हो सकता है ।”

“तुम्हारे भाई से अच्छी दोस्ती बताई जाती है उसकी ।”

“शरद नादान है । उनतीस साल का हो गया है लेकिन भले बुरे की पहचान नहीं आयी अभी तक ।”

“दैट्स टू बैड ।”

“गिलास खाली करो ।”

मैंने आदेश का पालन किया ।

उसने नये पैग तैयार किये ।

पहली बार मैंने उस बात की तरफ तवज्जो नहीं दी थी लेकिन इस बार देखा कि उसने दोनों गिलासों में ऐन एक मिकदार में विस्की डाली थी ।

जिससे साबित होता था चराग जले घूंट लगाना उसका रेगुलर शगल था ।

इस बार मैंने एक सिग्रेट भी सुलगा लिया ।

“टीवी देखोगे ?” - वो बोली ।

“नहीं ।”

“वजह । देखते नहीं हो ?”

“देखता हूं लेकिन जब टीवी से बढ़िया कुछ दिखाई दे रहा हो तो नहीं देखता ।”

“यानी इस वक्त बढ़िया कुछ दिखाई दे रहा है ?”

“हां ।”

“क्या ?”

“तुम ।”

उसने नकली त्योरी चढ़ा कर दिखाई ।

“लाइन मार रहे हो ?” - फिर बोली ।

“हां ।” - मैंने शराफत से कबूल किया ।

“यानी रंगीले राजा हो !”

“राजा नहीं हूं ।”

“रंगीले हो !”

“मेड के आ जाने का खतरा न होता तो साबित करके दिखाता कि कितना रंगीला हूं ।”

“मेड बुलाये बिना नहीं आती ।”

“पक्की बात ?”

“हां ।”

“फिर कम से कम बोहनी तो कर ही लेने दो ।”

“बोहनी ! वो कैसे होती है ?”

मैंने गिलास मेज पर रखा और उसे अपनी बांहों में भर लिया । उसका शरीर एक बार विरोध में तना फिर ढ़ीला पड़ गया । मैंने उसके होंठों पर एक चुम्बन अंकित किया और उसे बंधनमुक्त कर दिया ।

“ऐसे होती है ।” - मैं बोला ।

उसका गुलाबी चेहरा लाल हो गया ।

“सन आफ ए बिच !” - उसने गुस्से का इजहार किया जो मुझे सरासर फर्जी लगा ।

“माई डियर” - मैं बोला - “आई एम नाट ए सन आफ ए बिच, आई एम दि ओरीजिनल सन आफ ए बिच । इस जगतप्रसिद्ध बिच ने जितने सन पैदा किये थे, सब मेरे बाद पैदा किये थे ।”

उसकी हंसी छूट गयी ।

जहेनसीब ! इसका मतलब था कि बोहनी की मेरी खता माफ हो भी चुकी थी । नयी खता के लिये ग्राउन्ड तैयार हो भी चुकी थी ।

राज शर्मा ! - मैंने मन ही मन अपनी पीठ थपथपाई - दि लक्की बास्टर्ड !

“एक बात पूछूं ?” - फिर मैं बोला ।

“अरे, बोला न मैंने, मेड बिन बुलाये नहीं आयेगी ।”

“वो सुना मैंने । और बात है ।”

“और बात क्या ?”

“क्लब में लंच पर हुई मीटिंग में तुमने कहा था कि तुम कंट्रोवर्शियल फैमिली से बिलांग करती हो लेकिन आगे कुछ नहीं कहा था । अब क्या खयाल है ?”

उसने उस बात पर विचार किया । उस दौरान उसने कई बार गिलास में से विस्की चुसकी और कबाब चबाए ।

“कैन आई ट्रस्ट यू ?” - फिर एकाएक बोली ।

“आफकोर्स ।” - मैंने संजीदगी से जवाब दिया ।

“कैन यू कीप ए सीक्रेट ?”

“आई कैन । आई आलवेज डू ।”

“ताकीद है मैं परिवार के ढोल की बड़ी पोल खोलने जा रही हूं ।”

मुझे उसकी वो घोषणा बड़ी उम्मीदअफजाह लगी ।

“तुम जो भी कहोगी” - मैं बोला - “वो यहां से आगे नहीं जायेगा ।”

“डू आई हैव युअर वर्ड ?”

“यू हैव माई सॉलम वर्ड ।”

“तो सुनो । ढोल की पहली पोल सुनो । शरद के श्यामला से ताल्लुकात थे ।”

“भई, वो भाई बहन थे तो...”

“गहरे ताल्लुकात थे । बहुत गहरे ताल्लुकात थे ।”

मैं सकपकाया ।

“तुम” - फिर बोला - “वही कह रही हो न, जो मैं समझ रहा हूं ?”

“हां, वही कह रही हूं । कोई दूसरा मुझको ये बात कहता तो मैं उसका मुंह नोच लेती लेकिन क्या कहूं ! मैंने अपनी आंखों से देखा ।”

“क्या ? क्या देखा ?”

“दोनों को एक बैड पर देखा ।” - उसने आंखें बन्द कर लीं - “एक दूसरे के साथ गुत्थमगुत्था देखा ।”

“शरद हैवी ड्रिंकर है, शायद नशे में...”

“कई बार देखा ।”

सन्नाटा छा गया ।

सस्पेंस में मैंने अपना गिलास खाली किया ।

मेरे गिलास को मेज पर रखने की आवाज सुनकर उसने आंखें खोलीं ।

मुझे उनमें नमी साफ दिखाई दी । उसकी तवज्जो मेरे खाली गिलास की तरफ गयी तो उसने मेरे लिये - इस बार सिर्फ मेरे लिये - नया जाम तैयार किया ।

“ये कब की बात है ?” - मैंने धीरे से पूछा ।

“पांच साल पहले की ।”
 
“यानी जब शरद चौबीस साल का था और श्यामला नाबालिग थी, सोलह साल की थी ?”

“हां ।”

“सगे भाई ने नाबालिग बहन के साथ...”

“सगा नहीं ।”

“क्या मतलब ?”

“शरद पापा की पहली बीवी से है, सुनीता मरहूम से है । मैं और श्यामला उनकी दूसरी, मौजूदा, बीवी दीप्ति की संतान हैं । अमरनाथ परमार हमारा पिता नहीं, हमारा पिता हमारी असली मां दीप्ति का पहला पति था जिससे उसका तलाक हो गया था । शरद का पिता अमरनाथ परमार है । जब अमरनाथ परमार और - दीप्ति निगम की शादी हुई थी तब दोनों बाऔलाद थे । ग्रूम का एक बेटा था, ब्राइड की दो बेटियां थीं । एक तरह से देखा जाये तो शरद हम बहनों का कुछ नहीं लगता, उसका हमारे से खून का रिश्ता स्थापित नहीं । वो हमारा भाई इसलिये है क्योंकि उसका पिता और हमारी मां पति पत्नी हैं । यू गैट दि पिक्चर ?”

“आई थिंक आई डू । तुमने जब पहली बार ये काण्ड देखा तो उन में से किसी को कुछ बोला नहीं ?”

“नहीं ।”

“परमार साहब को तो बोला होता ! वो शरद की खबर लेते !”

“इसीलिये न बोला । मैं घर में फसाद की भूमिका नहीं खड़ी करना चाहती थी ।”

“मां को ?”

“इसी वजह से न बोला ।”

“हूं ।”

“मुझे एक सिग्रेट दो ।”

मैं सकपकाया, फिर अपना डनहिल का पैकेट उसकी तरफ बढ़ाया ।

“सुलगा के दो ।”

मैंने सुलगा के सिग्रेट पेश किया ।

उसने अपना गिलास खाली किया और मेज पर रखने की जगह मुझे थमा दिया ।

मैंने उसका इशारा समझा और उसकी वो खिदमत भी की ।

कुछ क्षण हमारे में खामोशी व्याप्त रही, वो खामोशी से विस्की चुसकती रही, सिग्रेट के कश लगाती रही ।

उस बद्मजा जिक्र से माहौल भी बद्मजा हो गया था । ग्लैनफिडिक अब मुझे पहले जैसा आनन्दित नहीं कर रही थी ।

फिर उसने नया बम फोड़ा ।

“लेकिन” - वो बोली - “बाद में ऐसा कुछ हुआ जिससे मुझे गारन्टी हुई कि शरद की बाबत पापा को कुछ कहना किसी काम नहीं आना था ।”

“क्या हुआ ?”

जवाब देने से पहले वो फिर रुआंसी हो उठी, इस बार इतनी कि आंसुओं की दो मोटी मोटी बून्दें गालों पर ढुलक पड़ी ।

“पापा भी हैवी ड्रिंकर हैं” - वो बोली - “लेकिन उनका बुजुर्गी का दौर है । इस उम्र में लोगों का बॉटल से अनुराग बढ़ ही जाता है । नो ?”

“यस ।”

“एक रात टुन्न घर लौटे । इतनी पिये हुए थे कि ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे...”

मेरा दिल जोर से अपनी जगह से उछला । जो आगे आने वाला था उसका अहसास मुझे होने लगा । मेरा जी चाहा मैं उसे बोलूं वो चुप करे, मैं अब और नहीं सुनना चाहता था लेकिन उम्मीद के खिलाफ उम्मीद करता चुप रहा कि शायद कोई और बात हो ।

“लेट नाइट का वक्त था । मैं बिस्तर के हवाले थी लेकिन अभी सोई नहीं थी । पापा लौटते थे तो कभी कभार मेरे बैडरूम में झांकते थे और प्यार से मेरा सिर सहला के, माथा चूम के जाते थे । मैंने सोचा कि उस रात भी ऐसा ही होने वाला था लेकिन वो तो मेरा गाल चूमने लगे, होंठ चूमने लगे ।”

“तौबा !”

“उनकी इज्जत रखने के लिये मैंने यही बहाना किया कि मैं गहरी नींद सोई पड़ी थी, मुझे नहीं मालूम था क्या हो रहा था । उन्होंने इसका गलत मतलब लगाया । उनकी किसिंग और उग्र हो उठी । फिर उनका हाथ मेरी नाइटी में घुस गया और मेरे वक्ष पर पड़ा । तब मैं नींद का बहाना करती न रही सकी । मैंने उनका हाथ झटक कर उन्हें परे धक्का दिया, तड़प कर उठी और गला फाड़ के चिल्लाई । मेरे चिल्लाते ही उनका सारा नशा हिरण हो गया । लगे माफिया मांगने । मैंने माफ तो किया लेकिन वार्निंग के साथ कि अगर उन्होंने फिर कभी ऐसी जलील हरकत की तो उनका मुकाम जेल होगा ।”

“बाज आये ?”

“हां । लेकिन बस फिजीकल न हुए । बाद में भी कई बार उनके नशे की हालत में मैं उनके सामने पड़ी तो मैंने उनकी आंखों में ऐसी वहशत देखी जो पुकार पुकार के कहती थी कि थी खयालों में मुझे नंगी कर रहे थे, मेरे साथ बलात्कार कर रहे थे ।”

“दाता !”

“अब आया समझ में कितना कलरफुल परिवार है हमारा ! कितनी पोल है इस के ढ़ोल में ?”

“आया ।”

“शुक्रवार को नशे से हिले हुए शरद को इस बात ने नहीं भड़काया था कि मैं क्लब में तुम्हारे से इंटीमेट हो रही थी, बल्कि इस बात ने भड़काया था कि मेरी वो अटेंशन उसे हासिल नहीं थी ।”

“कोई वहशी ही ऐसे खयाल रख सकता है ।”

“रखे, लेकिन ये तो खयाल करे कि डायन भी सात घर छोड़ देती है ।”

“ठीक कहा ।”

“क्लब में तुम्हारे मेरे बीच कुछ नहीं हो रहा था । मेरे को तुम्हारे साथ बैठे, हंसते मुस्कराते देख कर ही, देखा था, वो कितना भड़का था ! अब उसकी तब यहां मौजूदगी की कल्पना करो जबकि तुम मुझे किस कर रहे थे । दो कंसेंटिंग एडल्ट्स का प्राइवेसी में किस करना न अनैतिक है, न गैरकानूनी । शरद देखता तो खून करने पर आमादा हो जाता - इसलिये नहीं कि तुमने मुझे किस किया, बल्कि इसलिये कि वही काम मैंने उसे न करने दिया । बोलता घर की मुर्गी बाहर कैसे सर्व हो रही थी ।”

मैं खामोश रहा ।

बहुत तल्ख बोल रही थी लड़की लेकिन दुरुस्त बोल रही थी । कैसा अंधेर था कि एक नौजवान लड़की की अस्मत घर में ही महफूज नहीं थी - न बाप से, न भाई से ।

उसने सिग्रेट का बचा हुआ टुकड़ा ऐश ट्रे में डाला और खाली गिलास मेज पर रखा ।

मैंने नोट किया था कि इस बार ड्रिंक को उसने चुस्का नहीं था, बल्कि हलक में धकेला था ।

“दो ड्रिंक्स मेरी लिमिट है ।” - वो बोली - “आज तीन हो गये हैं लेकिन मैं और पीना चाहती हूं । फैमिली की जो जलालत, जो बेहयाई मेरे को अन्दर से साल रही है, आज उसे मैं विस्की में बहा देना चाहती हूं । साथ दोगे समीर शर्मा...”

“राज शर्मा ।”

“उठके चल तो नहीं दोगे ?”

“कैसे चल दूंगा ? ड्रिंक्स तो सरपराइज आफ दि हाउस हैं, मेरा इनवीटेशन तो डिनर का है वो तो अभी होना है । नहीं ?”

“हां । ड्रिंक बनाओ ।”

मैंने दो - नये ड्रिंक तैयार किये ।

इस बार बादाखोरी खामोशी में चली ।

“एक बात पूछूं ?” - मैं बोला ।

“हरीश शर्मा, तुम हाउस गैस्ट हो” - वो झूम कर बोली - “मुअज्जिज मेहमान हो, तुम्हें कुछ भी करने के लिये इजाजत लेने की जरूरत नहीं ।”

“कुछ भी ?” - मैं उसकी आंखों में आंखें डालता बोला ।

“हां, भई, कुछ भी ।”

“सार्थक का किसी के साथ अफेयर था । तुम्हारे साथ था ?”

“क्या बात करते हो ? सार्थक मेरा जीजा था, भई ।”

“अमरनाथ तुम्हरा पिता था !”

“गलत मिसाल है । वो जबरदस्ती का सौदा था । अफेयर कहीं जबरदस्ती होता है ? अफेयर तब होता है जब दोनों तरफ हो आग बराबर लगी हुई ।”

“तो अफेयर तुम्हारे साथ नहीं था ?”

“नहीं था । बात क्या है अफेयर की ?”

मैंने उसे रहस्यमयी रमणी की बाबत बताया, बाजरिया एडवोकेट महाजन मैं जिसका क्लायंट था, जिसकी बाबत मैं कुछ नहीं जानता था लेकिन जानना चाहता था ताकि मैं बिचौलिये को दरकिनार करके डायरेक्ट उससे डील कर पाता ।

“तुम्हारे खयाल से कौन हो सकती है वो ?” - मैंने पूछा ।

“पता नहीं ।” - वो बोली - “लेकिन ये पता है मैं नहीं हूं ।”

“कोई अन्दाजा ?”

उसने कुछ क्षण विवार किया, फिर इंकार में सिर हिलाया ।

“मैं शरद पर फिर वापिस लौट रहा हूं । इतनी पीता है, अल्कोहलिक नहीं हुआ अभी ?”

“क्या पता हो ?”

“लिवर सलामत है ?”

“क्या पता !”

“सार्थक का बड़ा भाई शिखर बराल कहता है कि कत्ल की रात को जब शरद के पांव ‘रॉक्स’ में पड़े थे, तब वो पहले से ही टुन्न था ।”

“क्या बड़ी बात है ! सच पूछो तो उस रात जब वो घर लौटा था तो सीढ़ियां चढ़ कर ऊपर अपने बैडरूम में नहीं जा सका था, नीचे ड्राईंग रूम में - ही ढ़ेर हो गया था । पापा को तो उसकी उस हालत की तब खबर लगी थी - बल्कि यही तब पता लगा कि वो घर में था - जबकि श्यामला के कत्ल की तफ्तीश करती पुलिस वहां पहुंची थी ।”

“तुम्हें कब खबर लगी थी ?”

“तभी लगी थी । पापा के भेजे रॉक डिसिल्वा मुझे लेने के लिये यहां आया था न ! मेरी कार तो शरद मांग के ले गया था । वापिस लौटाने आया ही नहीं था ।”

“वजह ?”

“ठोक दी थी । नशे में एक बिजली के खम्बे में दे मारी थी ।”

“कौन सी कार है तुम्हारे पास ?”

“आई-10 ।”

“कलर ?”

“वाइट । क्यों पूछते हो ?”

“यूं ही । कोई खास वजह नहीं ।”

“अजीब जवाब है ! लगता है कुछ छुपा रहे हो !”

उसकी जुबान कदरन लड़खड़ाने लगी थी लेकिन दिमाग अभी पूरी तरह से अलर्ट था ।

“मोतीबाग में तुम्हारी बहन की कोठी के सामने वाली कोठी के निवासी दर्शन सक्सेना का बयान है कि उस रात एक सफेद रंग की कार उसकी स्विफ्ट की टेल लाइट तोड़ गयी थी ।”

“ऐसा मेरी कार से हुआ नहीं हो सकता । मेरी कार शरद के कब्जे में थी और वो ‘रॉक्स’ में था । देर रात तक वहां था ।”

“क्या गारन्टी है ?”

उसने सकपका कर मेरी तरफ देखा । जाहिर था मेरा गारन्टी की बात करना उसे पसन्द नहीं आया था ।

“अरे, मैं ये थोड़े ही कह रहा हूं कि उसने श्यामला का कत्ल किया था !” - मैंने बात संवारने की कोशिश की - “अभी तो ये ही स्थापित नहीं है कि उस रात वो श्यामला की कोठी पर गया था । ये महज इत्तफाक हो सकता है कि गवाह ने उसकी कार की टेल लाइट ठोकती एक सफेद कार देखी थी, ये जरूरी थोड़े ही है कि वो कार तुम्हारी हो ! दिल्ली में वैसी सफेद कारों का कोई घाटा है क्या ?”

उसने हिचकिचाते हुए सहमति में सिर हिलाया ।

“तुम कहो तो” - फिर बोली - “इस बाबत मैं शरद से बात करूं !”

“क्या जरूरत है ? वो नाहक शक करेगा । तुम खातिर जमा रखो, इस बाबत जो करना होगा, वो मैं खुद कर लूंगा ।”

“मेरे लिये फिक्रमन्द जान पड़ते हो !”

“भई, जिसका अन्न जल ग्रहण किया हो, उसका खयाल करना तो बनता है न !”

“अन्न जल !” - वो हंसी, उसने अपना गिलास ऊंचा किया - “जल !”

“स्काटलैंड का ।”

वो हंसी ।

“यू टॉक नाइस, मिस्टर अधीर शर्मा । यू डू टॉक नाइस ।”

पता नहीं उसे करारा नशा हो गया था या वो जानबूझ कर मुझे नये नये नामों से पुकार रही थी ।

“अधीर तो मैं हूं, नो डाउट” - मैं बोला - “लेकिन मेरा नाम...”

“क्यों अधीर हो ?” - वो मदभरे स्वर में बोली ।

“तुम्हें मालूम है ।”

“नहीं, मुझे नहीं मालूम ।”

“एक बात पूछूं ?”

“फिर ?”

“हां ।”

“अरे, बोला न, तुम मुअज्जिज...”

“मुझे याद है । मैं ये पूछना चाहता था तुम मुझे माधव धीमरे और शिखर बराल की तसवीर हासिल करने का कोई तरीका सुझा सकती हो ?”

“क्या करोगे उनका ?”

“गवाहों को - कमला ओसवाल और दर्शन सक्सेना को - दिखाऊंगा और उनकी बाबत उनसे कुछ सवाल करूंगा ।”

“आई सी । कोई मुश्किल काम तो नहीं ये !”

“गुड ! कैसे होगा ?”

“माधव धीमरे ‘रोज़वुड’ का रेगुलर एम्प्लाई है, शिखर बराल क्लब में कैजुअल हायर्ड हैल्प के तौर पर रजिस्टर्ड है । दोनों की बाबत हर डिटेल क्लब के रिकार्ड में अवेलेबल है । रिकार्ड में तसवीर भी जरूर होगी !”

“तसदीक करने का जरिया !”

“भई, सबकुछ क्लब के वैब साइट पर है ।”

“अभी तसदीक करने का जरिया !”

जवाब में उसने कार्डलैस काल बैल का बटन दबाकर मेड को तलब किया और उसे अपना लैपटॉप ले कर आने का हुक्म दिया ।

मेड लैपटॉप के साथ उलटे पांव वापिस लौटी ।

शेफाली ने लैपटॉप आन किया और उस पर रोजुबुड क्लब का वैबसाइट तलाश किया ।

फिर स्क्रीन पर माधव धीमरे का क्लोजअप प्रकट हुआ ।

वो दूसरी तसवीर की तलाश में आगे स्क्रॉल करने लगी ।

एक तसवीर पर मेरी निगाह अटकी ।

वो एक हृष्ट पुष्ट, गोरे चिट्टे व्यक्ति की तसवीर थी जो नेपाली ड्रैस पहने था ।

“बैक करो ।” - मैं बोला ।

उसने सहमति में सिर हिलाया, वो तसवीर वापिस स्क्रीन पर प्रकट हुई ।

मैंने गौर से सूरत देखी ।

“ये कौन है ?” - फिर बोला ।

“पहचानो ।” - वो बोली ।

मैं सकपकाया ।

“हाल ही में इससे दो बार मिल चुके हो !”

उस बात ने मुझे सचेत किया । मैंने सूरत का बारीक मुआयना किया ।

“एक हिन्ट देती हूं ।” - वो बोली - “मूंछ नकली है ।”

“डिसिल्वा !” - तत्काल मैं बोला - “रॉक डिसिल्वा ।”

“ऐग्जैक्टली ।

“इस फैंसी ड्रेस में ?”

“फैंसी ड्रैस वाला ही मौका था । फैली ड्रैस पार्टी थी क्लब में । ये ट्रेडीशनल नेपाली बनके आया था ।”

“ओह !”

फिर उसने शिखर की तसवीर भी तलाश की ।

“यहां प्रिंटर है ?” - मैं बोला ।

“है । क्यों ?”

“मुझे इस तीन तसवीरों का प्रिंट हासिल हो सकता है ?”

उसने फिर मेड को तलब किया और जरूरी हिदायत के साथ लैपटॉप उसे सौंपा ।

पांच मिनट में सुघड़, सर्वगुणसम्पन्न मेड मुझे एक लिफाफा थमा गयी जिसमें तीनों तसवीरों के पांच गुणा सात इंच के प्रिंट थे ।

“श्यामला से डिसिल्वा के कैसे ताल्लुकात थे ?” - मैंने पूछा ।

“वैसे ही जैसे हर किसी से थे ।” - वो बोली - “बहुत मिलनसार आदमी है डिसिल्वा ।”

मुझे अहसास हुआ कि उसके स्वर में व्यंग्य का पुट था ।

“घर आता जाता था ?”

“मैं तुम्हारी सोच को फालो कर सकती हूं । लेकिन वो सोच गलत है ।”

“ऐसा ?”

“हां । आम अफवाह है कि वो गे है ।”

“है ?”

“मुझे नहीं मालूम । जो लोग कहते हैं, वो मैंने बोल दिया ।”

“लोगों का कहा हमेशा तो सच नहीं होता ?”

“वो तो है !”

“तो श्यामला पर लाइन नहीं मारता था ?”
 
“मुझे नहीं पता लाइन कैसे मारी जाती है । हंसता बोलता तो था ! मन में क्या होता था, क्या मालूम ! वैसे श्यामला उससे उम्र में इतनी छोटी थी ।”

“तुम्हारी खुद की क्या पोजीशन है इस डिपार्टमेंट में ? तुम तो छोटी नहीं हो !”

“हूं । श्यामला जितनी न सही लेकिन हूं । ही इज अबोव फोर्टी ।”

“दिल्लगी में उम्र दखलअन्दाज नहीं होती ।”

“भई, जैसे श्यामला से पेश आता था, वैसे ही मेरे से पेश आता है लेकिन...”

“क्या लेकिन ?”

“अब तुम कहलवा रहे हो तो कहती हूं । संगीता की तरफ बहुत तवज्जो देता है । खास ही तवज्जो देता है ।”

“संगीता निगम ! तुम्हारी मामी ?”

“हां ।”

“वो खास तवज्जो अफेयर की तरफ इशारा हो सकता है । वो तो उसकी हमउम्र भी है ! जवाब ये सोच के देना कि अभी तुमने कहा कि लोग कहते हैं वो गे है लेकिन तुम समझती हो कि लोगों का कहा हमेशा ही सच नहीं होता ।”

“मामी चंचल तो है लेकिन अफेयर... दूर की कौड़ी है । मामा एमपी हैं, पॉलिटिक्स में बिजी रहते हैं, पब्लिक की तरफ तवज्जो देना होता है उन्हें । शायद संगीता ये जताने के लिये फ्लर्ट करती हो कि घर में भी किसी को तवज्जो की जरूरत थी ।”

“ठीक से नहीं निभ रही उनकी ?”

“पता नहीं । लेकिन कोई बोले कि नहीं निभ रही तो मुझे हैरानी नहीं होगी ।”

“वजह ?”

“अरे, इकट्ठे बहुत कम कहीं आते जाते हैं । मामा की अपनी पोलिटिकल दुनिया है, मामी की अपनी मौज बहार है । दोनों अपने अपने ढ़ण्ग से अपनी अपनी जिन्दगी के साथ मसरूफ हैं । क्या पता अन्दर क्या हो रहा है ! फिर आज की हाई सोसायटी में इनफिडिलिटी फैशनेबल भी तो हो गयी है !”

“यू सैड इट, माई डियर ।”

“औरत खूबसूरत हो, हसीन हो, हैसियत वाली हो - जैसे कि संगीता है - तो शादी के पांच साल बाद उसकी सोच ये बन जाती है कि एक जिन्दगी में एक मर्द से क्या बनता है ! मेन कोर्स के साथ साइड डिश तो होनी ही चाहिये । हुस्न और जवानी हमेशा तो साथ देते नहीं...”

अब वो मेरे वाली जुबान बोल रही थी ।

“यू आर एब्सोल्यूटली करैक्ट ।” - मैं बोला - “इस बात पर मैं तुम्हें एक जोक सुनाता हूं...”

उस रात मैं घर न गया ।
 
Chapter 4

दोपहरबाद मैं मोतीबाग पहुंचा ।

श्यामला की कोठी वाले ब्लॉक की सड़क पर दाखिल होने से पहले ही मुझे फिजा भारी लगने लगी । अपने मुकाम पर पहुंचने से पहले ही मुझे आगे सड़क पर लगा लोगों का जमघट दिखाई दिया । मैं कार से उतर कर पैदल आगे बढ़ा, करीब पहुंचा तो मालूम हुआ कि जमघट का मरकज श्यामला की नहीं, उससे अगली कोठी थी ।

कमला ओसवाल की कोठी ।

रात की किसी घड़ी कोठी को आग लगी थी जिसने भारी डैमेज किया था । पता नहीं कोठी की मालकिन कमला ओसवाल भी उस डैमेज में शामिल थी या नहीं ।

तमाशाईयों की भीड़ में मुझे दर्शन सक्सेना की सूरत न दिखाई दी ।

मैं उसकी कोठी पर पहुंचा तो मालूम पड़ा वो घर पर नहीं था । मैंने उससे अगली कोठी की कालबैल बजाई ।

गोद में प्यारा सा चिहुआहुआ सम्भाले एक महिला ने बाहर कदम रखा ।

“क्या हुआ सामने ?” - अभिवादनोपरान्त मैंने पूछा ।

उसने सन्दिग्ध भाव से मेरी तरफ देखा ।

“मैं प्रेस रिपोर्टर हूं ।” - अपने पीडी वाले आई-कार्ड की एक झलक मैंने उसे यूं दिखाई कि वो उस पर लगी तसवीर ही देख पाती ।

“ओह !” - उसके मिजाज में तब्दीली आयी - “कौन सा पेपर ?”

“हिन्दोस्तान टाइम्स आफ इन्डिया ।”

उसके चेहरे पर उलझन के भाव आये ।

“तमाम पेपर ‘ऑफ इन्डिया’ ही होते हैं, आफ श्रीलंका या मियामर या पाकिस्तान तो नहीं हो सकते न !”

“ओह !”

“क्या हुआ सामने ?”

“आग लगी । रात एक बजे । वर्मा साहब तब बाई चांस टायलेट जाने के लिये उठे थे तो उन्हें मिसेज ओसवाल की कोठी से उठता धुंआ और आग की लपटें दिखाई दी थीं ।”

“वर्मा साहब ?”

“मेरे हसबैंड । अरुण वर्मा । होम मिनिस्ट्री में” - उसके स्वर में गर्व का पुट आया - “अन्डर सैक्रेट्री हैं ।”

“आई सी । फिर ?”

“फिर उन्होंने फौरन फायर ब्रिगेड को फोन किया । फायर ब्रिगेड वाले पहुंचे - पुलिस भी पहुंची - उन्होंने कोई एक घंटे में आग को काबू में किया ।”

“वर्मा साहब की नींद न खुली होती तो ?”

उसने अनभिज्ञता से कन्धे उचकाये ।

“इधर वाली, श्यामला की कोठी तो आजकल लाक्ड है, परली तरफ वालों को आग की खबर न लगी जिनकी मिसेज ओसवाल की कोठी की दीवार से दीवार मिलती है ?”

“जो कोठी चानना साहब की है लेकिन वो भी आज कल आबाद नहीं है । सब लोग अमृतसर गये हुए हैं ।”

“मिसेज ओसवाल पर क्या बीती ?”

“भली बीती । प्रभू की किरपा हुई कि घर पर नहीं थीं ।”

“कहां गयीं ?”

“जयपुर ।”

“किसी काम से ?”

“बुक्स की बहुत दीवानगी है उन्हें, वहां कोई लिटरेरी फैस्टिवल होता है इन दिनों जो कि कई दिन चलता है । उसमें मिसेज ओसवाल हर साल जाती हैं ।”

“आग कैसे लगी ? कोई वजह सामने आयी ?”

“सुना है कोई सिग्रेट जलता रह गया था ।”

“वो स्मोक करती हैं ?”

“करती होंगी !” - उसने तनिक नाक चढाया - “या कोई स्मोक करने वाला मेहमान आ गया होगा !”

“लेकिन जलता सिग्रेट दिनोंदिन तो जलता नहीं रहता !”

“दिनोंदिन क्या मतलब ? कल रात ही तो गयीं ! रात साढ़े नौ बजे के करीब मैंने खुद उन्हें कार में सामान रखते देखा था ।”

“कार ड्राइव करके जयपुर गयीं ! वो भी नाइट ड्राइव ! इस मौसम में !”

उसने उस बात पर विचार किया, फिर बोली - “कार कहीं पार्किंग में छोड़ी होगी ।”

“हो सकता है । कल रात उस वक्त दर्शन सक्सेना साहब घर पर नहीं थे ?”

“मेरे खयाल से नहीं थे । उनकी कोठी की कोई बत्ती तो मुझे जलती नहीं दिखाई दी थी ।”

“कैसे ताल्कुकात थे उनके कमला जी से ।”

वो एक आंख तनिक दबा कर हंसी ।

“या कमला जी के उनसे ?”

“अरे, कोई फर्क होता है जब दोनों तरफ हो आग बराबर लगी हुई !”

“जी !”

“क्या जी ? समझो !”

“आप समझातीं तो बेहतर होता !”

“अरे, आये दिन तो सक्सेना साहब मिसेज ओसवाल के यहां डिनर पर इनवाइटिड होते हैं । और दिल्ली में, इस मौसम में, कोई डिनर ड्रिंक्स के बिना चलता है ?”

“यानी अच्छे पड़ोसी थे ! बड़े कार्डियल रिलेशंस थे उनमें !”

“अच्छे पड़ोसी !” - उसने नाक चढायी - “कार्डियल रिलेशंस ! माई फुट !”

“मैडम, गुस्ताखी माफ, आपका इशारा कहीं और ही जान पड़ता है !”

“है तो सही ऐसा कुछ कुछ । पता नहीं कुछ कहना मुनासिब होगा या नहीं !”

“आप जो कहना है, बेहिचक कहिये । हमारे पेपर की पालिसी है कि हम अपनी हर रिपोर्ट छपने से पहले उस शख्स से पास करवाते हैं जिसके इन्टरव्यू पर वो आधारित होती है । मैं जो लिखूंगा पहले आपको दिखाऊंगा, कोई बात आपको नहीं जंचेगी तो आपके सामने काट दूंगा ।”

“पक्की बात ?”

“हां ।”

“वो क्या है कि उन दोनों की आपस में कोई खास ही ट्यूनिंग है । सक्सेना साहब की वाइफ नहीं है, मिसेज ओसवाल का हसबैंड नहीं है, बड़ी तनहा जिन्दगी है दोनों की । ऐसे दो जनों का स्वाभाविक तौर से करीब आ जाना कोई बड़ी बात नहीं । या है ?”

“नहीं है । दोस्ती हो ही जाती है ?”

“अरे, दोस्ती कौन बोला ?”

“आपका इशारा... अफेयर की तरफ है ?”

“मैं तुम्हें एक वाकया सुनाती यूं उससे तुम खुद समझ जाओगे कि दोस्ती थी, अफेयर था या क्या था !”

औरत वाचाल थी, स्कैण्डलप्रिय थी और वो दोनों बातें उस वक्त मुझे रास आ रही थीं ।

“वो क्या है कि” - वो कह रही थी - “एक रोज मैं वहां अपने गेट पर खड़ी थी कि दर्शन सक्सेना साहब आये और मेरे से बतियाने लगे । थोड़ी देर वो सिलसिला चला, फिर वो चले गये । फौरन बाद कमला दनदनाती हुई मेरे सिर पर आ सवार हुई ।”

अब मिसेज ओसवल का अदब वाला सम्बोधन ‘कमला’ में तब्दील हो गया था ।

“खफा थीं ?” - प्रत्यक्षत: मैं बोला ।

“आगबबूला थी ।”

“किस बात पर ?”

“बेबात ।”

“उनकी निगाह में तो कोई बात होगी !”

“हां, वो तो थी !”

“क्या ?”

“मेरे को आकर बोली कि मेरा एक मरद से पेट नहीं भरता था जो मैं दूसरे के पीछे पड़ी थी !”

“ऐसा बोली वो !”

“अरे, जो वो असल में बोली, वो सुनोगे तो कान पक जायेंगे तुम्हारे ।”

“पकाइये ।”

“बोली - ‘डोट यू गैट एनफ फ्रॉम यूअर हसबैंड दैट यू आर आफ्टर मिस्टर सक्सेना’ ।”

“अरे ! ऐसा बोलीं !”

“हां । पहले तो मैंने मजाक समझा लेकिन वो तो एक दम संजीदा थी ।”

“क्यों कहा उन्होंने ऐसा ?”

“क्योंकि मेंटल है । जवानी में विधवा हो जाने की वजह से दिमाग पर असर हो गया है । विडो के फीमेल हारमोंस जोर मारते हैं और उसका भेजा हिलाते हैं ।”

मैंने उस बद्मजा डायलॉग का रुख बदला ।

“पुलिस” - मैं बोला - “मिसेज ओसवाल को कांटेक्ट करने की कोशिश तो कर रही होगी ?”

“हां । लेकिन फिलहाल तो कामयाब नहीं हो या रही ! सुना है कमला को ट्रेस करने के लिये उन्होंने जयपुर पुलिस को अप्रोच किया है ।”

“सक्सेना साहब को तो उनका कोई अता पता मालूम होगा !”

“कहते हैं, नहीं मालूम, मालूम होता तो वो अभी तक उसे आगजनी की खबर कर चुके होते ।”

“अता पता न सही, जब वो दोनों इतने इंटीमेट थे तो उनके पास मिसेज ओसवाल का मोबाइल नम्बर भी तो होगा !”

“कहते हैं उस पर कोई रिस्पांस नहीं है ।”

“आई सी । सक्सेना साहब से आप अच्छी तरह से वाकिफ हैं ?”

“नहीं, अच्छी तरह से नहीं । पड़ोसी होने की वजह से दुआ सलाम है, बस । वैसे भी वो कोई ज्यादा मिलनसार नहीं हैं ।”

“सार्थक और श्यामला ? उनका मिजाज कैसा था ।”

वो तनिक कसमसाई, फिर कठिन स्वर में बोली - “वो भी अपने आप में मग्न रहने वाली किस्म के लोग थे ।”

“कत्ल की रात और वारदात की बाबत क्या कहती हैं ?”

“कुछ नहीं । उस रात हम बहुत जल्दी सो गये थे । अगली सुबह ही पता लगा था कि पड़ोस में इतना बड़ा कांड हो गया था ।”

“ओह !”

“लेकिन सक्सेना साहब उस रात के वाकये से काफी वाकिफ हैं । वो तो बाकायदा गवाह हैं पुलिस के सार्थक के खिलाफ ।”

“ठीक । सहयोग का शुक्रिया, मैडम ।”

“जो लिखो, छपने से पहले मुझे दिखाने आना न भूलना ।”

“नहीं भूलूंगा ।”

मैंने उससे विदा ली । मेरे पीठ फेरते ही वो भी घर में वापिस घुस गयी ।

मैं सड़क पर आ गया ।

तब तक जली कोठी के आगे की भीड़ काफी हद तक छंट गयी थी ।

मेरे ऐतबार में ये बात नहीं आ रही थी कि वहां लगी आग एक हादसा थी, सिग्रेट जलती रह जाने की वजह से लगी थी । सार्थक आजाद होता तो तब कम से कम मैं ये जरूर सोचता कि उसने यूं अपने खिलाफ खड़े एक गवाह को खत्म करने की कोशिश की थी ।

वो बहुत दूर की कौड़ी थी लेकिन इंसानी दिमाग का क्या पता लगता था कि कब किस खुराफात पर उतर आये !

कत्ल का सार्थक का सुझाया आल्टररनेट सस्पैक्ट - माधव धीमरे - तो आजाद था ! अगर कातिल वो था तो जाहिर था कि कत्ल की रात को कमला ओसवाल ने मौकायवारदात से कूच करते सार्थक को नहीं, माधव धीमरे को देखा था । लिहाजा माधव धीमरे कातिल था तो वो कारनामा उसका हो सकता था ।

रॉक डिसिल्वा की नेपाली वेषभूषा वाली तसवीर भी मेरे जेहन पर कहीं दस्तक दे रही थी । उस ड्रैस में पट्ठा इतना नेपाली लगता था कि मैंने उसे पहचाना तक नहीं था ।

पेचीदा किरदार था उसका । और अच्छी तरह से समझने की जरूरत थी ।

समझूंगा - मैंने मन ही मन निश्चय किया ।

अभी तो मैंने किसी तरह से जली कोठी का मुआयना करना था ।

******************************************************************
 
शाम को एडवोकेट महाजन ‘कोजी कार्नर’ में मुझे फिर मिल गया ।

“फिर इधर कोई काम पड़ गया ?” - मैं तनिक व्यंग्यपूर्ण भाव से बोला ।

“हां ।”

“क्या काम ? जासूस पर जासूसी करने का काम ?”

“क्या ! पागल हुए हो ! मेरे को ऐसी कोई जरूरत कहां है ! होगी तो तुम्हें अपने पास तलब करूंगा । ऐनी प्राब्लम ?”

“नो” - मुझे कबूल करना पड़ा - “नो प्राब्लम ।”

“मैं काम से ही आया था इधर, लेकिन अपने नहीं ।”

“अपने नहीं ! तो और किसके ?”

मैं सकपकाया ।

“मेरा कैसा काम ?” - मैंने पूछा ।

“रहस्यमयी रमणी जैसा काम ।”

“सर, प्लीज एक्सप्लेन ।”

“मरे जा रहे थे न उसकी शिनाख्त से वाकिफ होने के लिये ! उसका ताआरुफ हासिल करने के लिये ? उसके साथ तुम्हारी कल सुबह साढ़े ग्यारह बजे की अप्वायंटमेंट फिक्स की है ।”

मैं मुंह बाये उसे देखने लगा ।

“अब खुश हो के तो दिखाओ । कोई थैंक्यू-वैंक्यू तो बोलो ।”

“कौन है वो ? नाम बोलिये ।”

“संगीता निगम ।”

“संगीता निगम !”

“नाम से वाकिफ जान पड़ते हो !”

“अमरनाथ परमार के एमपी साले की बीवी ! मकतूला की मामी !”

“हैरान हो गये ?”

मेरा सिर स्वयमेव सहमति में हिला ।

लिहाजा शेफाली ने जब मामी के स्वभाव को चंचल बताया था तो उसको बहुत कम करके आंका था । हसबैंड के जीजा के दामाद से अफेयर ! क्यों हाई सोसायटी के लोग इतने ‘इनसैस्ट’ प्रेमी थे ।

दुनिया राज शर्मा के कैरेक्टर को बद् बोलती थी । इन लोगों के मुकाबले में तो मैं महात्मा था ।

बड़ों का बड़प्पन इन बातों में था तो लानत ‘बद् भला बदनाम बुरा’ राज शर्मा की ।

“कहां खो गये ?” - वकील बोला ।

“तो” - मैं बोला - “सार्थक का एमपी साहब की बीवी से अफेयर था ?”

“बहुत ढ़ंका छुपा । अत्यंत गोपनीय ।”

“क्या गोपनीय ! आपको तो खबर थी !”

“अब हुई न ! क्योंकि ऐसी मजबूरी बन गयी । क्योंकि संगीता को एक काबिल वकील की जरूरत थी । अब वकील को तो कॉन्फिडेंस में लेना पड़ता है न !”

“वाकिफ कैसे थी आपसे ?”

“जब एमपी निगम पूरी तरह से करप्ट नहीं था, तब मैंने उसका एक केस किया था । कामयाबी से । संगीता को इस बात की वाकिफयत थी क्योंकि उस केस के दौरान उनके घर में मेरा अक्सर आना जाना होता था । जब उसकी खुद की जरूरत पेश आयी तो उसको मेरी याद आना स्वाभाविक था ।”

“जान कर खुशी हुई कि कोई ऐसा भी वक्त था जब एमपी साहब पूरी तरह से करप्ट नहीं था । कौन सी सदी में था ऐसा ?”

“शट अप !”

“इसी सदी में तो सौ दरिन्दों को निचोड़ो तो एक नेता बनता है ।”

“आई सैड शट अप ।”

“और !”

“और आज दिन में एक बड़ा अजीब वाकया हुआ मेरे साथ । एक स्पैशल मैसेंजर के जरिये मेरे को ब्राउन पेपर में लिपटा एक पैकेट डिलीवर हुआ जिस पर मेरा पता तो दूर, नाम तक नहीं था । मैसेंजर मेरे रूबरू हुआ, मेरे से मेरे नाम की तसदीक की और पैकेट मुझे थमाकर ये जा वो जा ।”

“क्या था पैकेट में ?”

“मैं वहीं पहुंच रहा हूं यार ।”

“सॉरी ।”

“दो-दो हजार के नये चले नोटों की तीन गड्डियां थीं । छ: लाख रुपये थे नकद । क्या समझे ?”

मैंने अनभिज्ञता से कन्धे उचकाये ।

“उतनी रकम थी जितनी से सार्थक की जमानत की रकम शार्ट थी ।”

“ओह ! ओह ! साथ कोई कवरिंग लैटर था ?”

“नहीं । खाली एक चिट थी जिस पर लिखा था : एक सदउद्देश्य के लिये एक शुभचिन्तक का योगदान ।”

“कोई नाम, कोई दस्तखत नहीं ?”

“न ।”

“योगदान आपके पास क्यों पहुंचाया गया ? ‘सार्थक को इंसाफ दो’ वालों को क्यों न पहुंचाया गया ?”

“शुभचिन्तक को उसमें कोई प्राब्लम लगी होगी ! या लगा होगा कि वहां कोशिश करने में एक्सपोजर का खतरा था ।”

“खामखाह ! जैसे मैसेंजर राजेन्द्रा प्लेस पहुंचा था, वैसे जन्तर मन्तर पहुंच जाता !”

“जैसे उसने पैकेट मेरे को सौंपा, वैसे वहां किसको सौंपता ! फिर भी किसी एक को चुनता तो हो सकता था कि वो भेजने वाले की बाबत जाने बिना पैकेट लेने से इंकार देता । या पैकेट खुद ही हज्म कर जाता ! इस बाबत क्या कहते हो ?”

मुझे जवाब न सूझा ।

“गुप्त दान की कोई रसीद तो ईशू होती नहीं ! फिर वो दानकर्ता तो इच्छुक ही नहीं था रसीद पाने का या बतौर मेजर कंट्रीब्यूटर अपनी हाजिरी लगवाने का ।”

“ठीक ।”

“उस कथित शुभचिन्तक को किसी तरीके से मालूम था कि मैं सार्थक का वकील था । उसे यकीन था कि मैं अमानत में खयानत नहीं कर सकता था ।”

“उसे खबर कैसे लगती कि आपने ऐसा किया था या नहीं ?”

“सार्थक के जमानत पर बाहर आने से लगती कि मैंने अमानत में खयानत नहीं की थी । वो तब भी आजाद न होता तो मतलब साफ होता कि रकम मैं हज्म कर गया था ।”

“तो वो क्या करता ? वापिस वसूली के लिये आपके पास पहुंच जाता ?”

“क्या पता क्या करता ! हो सकता है उसके ऐसे भी साधन हों ! जब हम जानते ही नहीं कि डोनर कौन है तो क्या कहा जा सकता है !”

“बहरहाल आपकी अमानत में खयानत की कोई मंशा नहीं ?”

“पागल हुए हो ! कल सार्थक की जमानत की रकम जमा हो जायेगी, जज ने कोई हुज्जत न की तो परसों वो बाहर होगा ।”

“हुज्जत कैसी ?”

“जजों का नखरा है, कई बार फैसला एकाध दिन के लिये रिजर्व रख लेते हैं ।”

“आई सी । लेकिन जमानत एक सुविधा है जो सार्थक को हासिल होगी । जमानत हो जाने से कोई बेगुनाह तो साबित नहीं हो जाता न ! मुकद्दमा तो उस पर फिर भी चलेगा !”

“वो तो है ।”

“फिर रहस्यमयी रमणी की - जो अव हम जानते हैं संगीता निगम है - सीक्रेट एलीबाई की अहमियत खत्म तो नहीं हो गयी न ! किसी और तरीके से वो बेगुनाह साबित न किया जा सका तो उस एलीबाई की दरकार तो उसे बराबर होगी !”

“मैंने ये बात संगीता से डिसकस की थी । अपनी बात पर तो वो अभी भी कायम है लेकिन अब उसमें एक पेच पड़ गया है ।”

“क्या ?”

“ये अफवाह गर्म है कि आलोक निगम को मंत्री बनाया जा सकता है । प्रधान मंत्री ने निकट भविष्य में कैबिनेट रीशफल का स्पष्ट संकेत दिया है । संगीता कहती है कि जब तक वो रीशफल न हो जाये, एमपी साहब मंत्री बनते हैं या नहीं बनते, ये बात स्पष्ट न हो जाये, तब तक वो सामने नहीं आयेगी ।”

“यानी तब तक वो गवाही नहीं देगी ?”

“हां । अपने पति के राजनैतिक भविष्य की खातिर, भविष्य निर्धारित हो जाने तक वो किसी स्कैंडल का अंग बनने को तैयार नहीं । कहती है उसके नाम से जुड़ा वो स्कैंडल उसके पति का राजनैतिक भविष्य बिगाड़ सकता है ।”

“उसके बाद ।”

“असर तो बाद में भी होगा लेकिन तब तक निगम मन्त्री बन चुका होगा । उस स्कैंडल ने, कि उसकी बीवी का अपने कम उम्र के एक करीबी रिश्तेदार से अफेयर है कैबिनेट रीशफल से पहले सिर उठाया तो बहुत मुमकिन है कि सम्भावित नये मंत्रियों की लिस्ट में से उसका नाम ड्रॉप कर दिया जाये !”

“ओह !”

“अब तुम्हारे पर भी प्रेशर है, शर्मा, कि पहले ही कुछ कर दिखाओ वर्ना संगीता की नयी शर्त सार्थक के लिये बहुत नुकसानदेय साबित होगी ।”

“मैं कोशिश करूंगा । कर रहा हूं आगे और शिद्दत से करूंगा ।”

“यस, प्लीज । यू विल बी हैण्डसमली कम्पंसेटिड ।”

“फिर तो जी जान से कोशिश करूंगा ।”

“कल जब संगीता से मिलो तो उसको उसकी उस शर्त से भी हिलाने की कोशिश करना । तुम्हारे किसी मिकनातीसी सुरमे के बहुत चर्चे सुने हैं मैंने, कल उसको आंखों में लगा के जाना न भूलना । शायद वो संगीता पर भी अपना असर दिखाये और वो अपनी शर्त वापिस ले ले ।”

मैं फैसला न कर सका कि वो संजीदा था या तंज कस रहा था ।

“अपने रीयल एस्टेट एक्सपर्ट से कोई मशवरा हुआ आपका ?”

“हुआ । पवन सेठी से कल मेरी लम्बी मीटिंग हुई थी ।”

“क्या जाना ?”
 
“अमरनाथ परमार का कोई बहुत बड़ा कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट पाइपलाइन में है जिसके लिये उसका दुबई की किसी कंस्ट्रक्शन कम्पनी से कोई टाई अप हुआ है । परमार ने उस प्रोजेक्ट के लिये एडवांस में एक बड़े भूखण्ड का पोजेशन अपनी कम्पनी के पास दिखाना है, तभी टाई अप फाइनल होगा और फॉरेन फाइनांस का इनफ्लो शुरू होगा । जो भूखण्ड परमार की निगाह में है वो देवली के उस हिस्से में है जिसमें सार्थक की मां अहिल्या बराल का मकान है । वैसे सवा सौ के करीब मकान परमार के फोकस में हैं । हैरान करने वाली बात ये पता लगी है कि उसमें से तीस एक ही औरत के नाम रजिस्टर्ड हैं ।”

“और” - मैंने सस्पैंस के हवाले पूछा - “वो औरत अहिल्या बराल है ?”

“नहीं ।”

मैंने चैन की सांस ली ।

“तो कौन है ? मालूम पड़ा ?” - मैंने पूछा ।

“हां ।”

“अरे, तो बताओ न कौन है ! तपा क्यों रहे हो ?.”

“कमला ओसवाल ।”

“हे भगवान !”

“चौंक गये न ?”

“हां । बुरी तरह से ।”

“अपनी डिटेक्शन की रुटीन में बात करना उससे इस बाबत ।”

“ये मुमकिन नहीं ।”

“क्यों ?”

“दिल्ली में नहीं है । सुना है जयपुर गयी है । अभी कल रात ही गयी है, कब लौटेगी, पता नहीं ।”

“ओह !”

“पीछे उसके यहां एक काण्ड हो गया है जिसकी उसको खबर लगेगी तो बुरा हाल होगा उसका ।”

“कैसा काण्ड ?”

“उसके पीठ फेरते ही उसके घर को आग लग गयी ।”

“ओ गॉड !”

“फायर ब्रिगेड ने आकर बुझाई । वो लोग आनन फानन पहुंचे, देर करते तो सब स्वाहा हो चुका होता ।”

“आई सी ।”

“अब भी कोई कम डैमेज नहीं हुआ है लेकिन इमारत बिल्कुल ही खंडहर होने से बच गयी है ।”

“आगजनी के वक्त घर होती तो !”

उसके शरीर ने स्पष्ट झुरझुरी ली ।

“तो बोलो राम हो गया होता ।”

“शुक्र है बचाव हुआ, लेकिन बड़ा नुकसान तो हुआ !”

“तीस मकानों की मालकिन बता रहे हैं आप उसे । क्या फर्क पड़ता है !”

“अरे, पीडी साहब, अक्ल से काम लो ।”

“क्या अक्ल से काम लूं ? क्या हुआ ?”

“मैंने कहा है कि तीस मकानों का रजिस्ट्रेशन उसके नाम है, ये नहीं कहा कि मालकिन वो है ।”

“क्या फर्क हुआ ?”

“शायद विस्की का असर है जो दिमाग बराबर काम नहीं कर रहा । अरे, हालात ढ़ोल बजा के कह रहे हैं कि वो बेनामी का मामला है ।”

“यानी” - मैं नेत्र फैलाता बोला - “वो अमरनाथ परमार की बेनामी खरीद है ?”

“पवन सेठी को गारन्टी है इस बात की । कहता है परमार की उधर की और परचेजिज भी बेनामी की हो सकती हैं ।”

“आई सी ।”

“देवली में परमार का कोई बड़ा गेम चल रहा है - बड़ा और खुफिया - लेकिन वो हमारी तफ्तीश का मुद्दा नहीं अगरचे कि उसका उसकी बेटी के कत्ल से कोई रिश्ता न हो । शर्मा, वो बात तुम्हारी जानकारी के लिये है क्योंकि तुम इस जानकारी के तालिब थे लेकिन उसके बखिये उधेड़ने की कोशिश तभी करना जबकि गारन्टी हो कि उसका कत्ल के केस से कोई रिश्ता है । समझे ?”

“हां ।”

“मैं अब चलता हूं । गुड नाइट ।”

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अगले दिन एडवोकेट महाजन को मिले छ: लाख रुपये के अनुदान की खबर अखबार के मुखपृष्ठ पर थी ।

मुझे हैरानी हुई ।

इस बात ने आखिर तो रौशनी में आना ही था लेकिन वो इतनी जल्दी लीक हो जायेगी, इसका मुझे इमकान नहीं था । बहरहाल इतनी जल्दी वो खबर या दाता लीक कर सकता था, या प्राप्तकर्ता ।

दाता गुमनाम था इसलिये मैंने उस बाबत महाजन को फोन लगाया ।

वकील ने बताया कि खबर उसने प्रैस को लीक नहीं की लेकिन रकम उसने कल ही ‘सार्थक को इंसाफ दो’ कमेटी को सौंप दी थी ताकि पूरी जमानत राशि का - बीस लाख का - एडवांस में ड्राफ्ट बनवाया जा सकता । उसकी राय में खबर या कमेटी से लीक हुई थी या इरादतन लीक की गयी थी ।

जमानत के सन्दर्भ में अमरनाथ परमार का छोटा सा बयान छपा था जिसमें उसमें ‘कातिल’ की - अपने दामाद की नहीं - जमानत की मुखालफत की थी और पुरजोर अलफाज में कहा था कि जमानत हरगिज नहीं होनी चाहिये थी ।

बहरहाल आज जमानत राशि अदा हो जानी थी ।

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सांसद आलोक निगम की निजी कोठी साकेत में थी जबकि - उसे बतौर सांसद राजेन्द्र प्रसाद रोड पर सरकारी बंगला भी अलाटिड था । मुझे साकेत में हाजिरी भरने का हुक्म हुआ था इसलिये मैं वहां पहुंचा वर्ना मुझे मालूम नहीं था कि निगम परिवार का हालिया स्थायी आवास साकेत में था या राजेन्द्र प्रसाद रोड पर ।

कोठी के आयरन गेट पर मैंने कोई दरबान तैनात न पाया । गेट ठेल कर मैं भीतर दाखिल हुआ, मैंने मेनडोर पर पहुंच कर कालबैल बजाई ।

दरवाजा खुद संगीता निगम ने खोला, उससे मैंने यही अन्दाजा लगाया कि उन लोगों की रेगुलर रिहायश सरकारी बंगले में थी, वहां वो मेरे से मुलाकात के लिये ही मौजूद थी । उस घड़ी वो वैसी काली जींस पहने थी जो टखनों तक नहीं पहुंचती थी, घुटनों से जरा नीचे पिंडलियों पर ही खत्म हो जाती थी । साथ में वो वैसा ही काला ट्यूबटॉप पहने थी जो उसके वक्ष से बस जरा ही नीचे तक पहुंचता था । उसका नंगा पेट ऐन सपाट था, सुडौल था, मां बन चुकी थी तो कमाल था, नहीं बन चुकी थी - चालीस से ऊपर तो शर्तिया थी - तो उस उम्र में तो फिर भी कमाल था ।

कुछ खुशकिस्मत औरतों को अक्षत यौवन का वरदान प्राप्त होता था, संगीता यकीनन वैसी ही खुशकिस्मत औरतों में से एक थी ।

वो मुझे ड्राईंगरूम में लेकर आयी जहां हम आमने सामने बैठे ।

उसने मेरा परिचय प्राप्त करने की कोशिश नहीं की थी, दो वजह से ऐसा था - एक तो वो राज शर्मा से प्रीशिड्यूल्ड मीटिंग थी, दूसरे शायद उसे शुक्रवार की रोज़वुड क्लब में हुई हमारी मुख़्तसर मीटिंग की याद आ गयी थी ।

“हमारा रहन सहन आर.पी. रोड के सरकारी बंगले में है ।” - उसने मेरे अनुमान की तसदीक की - “यहां मैं तुम्हारे से मुलाकात के लिये आयी हूं ताकि तुम्हें दूर न जाना पड़े ।”

“ऐसा नहीं होने वाला था” - मैं बोला - “क्योंकि मैं भगवान दास रोड पर रहता हूं ।”

“दूसरे” - उसने जैसे मेरी बात सुनी ही नहीं - “मैं इस मीटिंग को सीक्रेट रखना चाहती हूं । यहां एक केयरटेकर होता है, उसको मैंने एक ऐसे काम से भेज दिया है जिसमें उसे घंटे से ज्यादा लग जायेगा । हमारी मीटिंग इतना टाइम तो नहीं लेगी ?”

“नहीं ।”

“कोई चाय-काफी पियोगे ?”

“टाइम जाया होगा । दूसरे आपको बनानी पड़ेगी ।”

“तो कोल्ड ड्रिंक ?”

“जरूरत नहीं । आप तकल्लुफ बिल्कुल न कीजिये । मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं ।”

“सो नाइस आफ यू ।”

“अलबत्ता स्मोक करने से ऐतराज न करें तो...”

“ओह, नो । गो अहेड ।”

“थैंक्यू ।”

मैंने अपना डनहिल का पैकेट निकाला और एक सिग्रेट सुलगा लिया ।

“इस वक्त मेरा हसबैंड यहां आ टपके” - वो बोली - “तो जानते हो क्या होगा ?”

“क्या होगा ?” - मैं सकपकाया सा बोला ।

“जल भुनकर कबाब हो जायेगा ।”

“काहे को ?”

“आदत बना ली है उसने ऐसी । मैं जो करूं गलत । मुझे मेल कम्पनी में देखेगा तो बोलेगा निम्फो, फीमेल कम्पनी में देखेगा तो बोलेगा लेस्बियन ।”

“ओ, माई गॉड !”

“मर्द की फितरत होती है ये, स्पेशियलिटी होती है ये, खुद सालोंसाल बीवी की उंगली न थामी हो, किसी दूसरे को कुछ थामता देखेगा तो कहेगा गोली मार दूंगा ।”

“गुस्ताखी माफ, बहुत कडुवाहट है आपके मन में पति के लिये ?”

“कोई ओवरनाइट तो नहीं हो गयी !”

“तो... बनती तो क्या होगी उनसे !”

“काफी समझदार हो । क्लब में मैं एक निगाह मैं भांप गयी थी कि इधर” - उसने एक उंगली से अपनी कनपटी ठकठकाई - “कुछ रखते हो ।”

“जहेनसीब ।”

“कौन सा नसीब ?”

“मेरा मतलब है कि मेरा अहोभाग्य कि आपने ऐसा कुछ समझा ।”

“कुछ नहीं, काफी कुछ समझा ।”

“काफी कुछ ?”

“हां । शेफाली तुम्हारे पर फिदा जान पड़ती थी ।”

“अरे, नहीं, मैडम । मैं तो लाइफ में पहली बार उससे मिला था । पहली बार में ऐसा करतब कहीं होता है !”

“होता है । आजकल कोर्टशिप में टाइम न जाया करने का रिवाज है ।”

वो ही बातें चलती रहती तो शाम वहीं हो जाना कोई बड़ी बात नहीं थी जबकि खुद उसने वार्निंग जारी की थी कि हमारे पास सीमित समय था । लिहाजा मुझे कूद कर मुख्य विषय पर पहुंचना जरूरी लगने लगा ।

“आपके पति को” - मैं बोला - “सार्थक बराल से आपके अफेयर की खबर है ?”

एकाएक हुए उस सवाल पर वो हड़बड़ाई लेकिन हड़बड़ाहट मुश्किल से दस सैकंड ही कायम रही ।

“हां, खबर है ।” - वो दिलेरी से बोली - “जानते हो कैसे खबर है ? मैंने बताया ।”

“जी !”

“बस, इतना फर्क हुआ कि परमार साहब से पहले न बता सकी ।”

“क्या ! अमरनाथ परमार साहब को इस बात की खबर थी ?”

“हां ।”

“कैसे लगी ?”

“श्यामला से लगी ।”

“लेकिन मैंने सुना है कि श्यामला को इस बाबत कुछ नहीं मालूम था !”

“कौन कहता है ?”

“खुद सार्थक कहता है ।”

“वो नादान है । अपने आपको भरमाता है । उस कबूतर की तरह है जो आंखें बन्द कर लेता है और समझ लेता है कि खतरा टल गया ।”

“कबूतरों का बहुत तजुर्बा है आपको ।”

वो हंसी ।

मेरे को तो हंसी फाश लगी लेकिन शायद वो मेरा भ्रम था, खुराफाती दिमाग का खलल था ।

“लेकिन” - उसका स्वर संगीतमय हुआ - “यही अदा तो कातिल है जिसने हमको मारा है ।”

“जो कुछ आपने निगम साहब को बोला, उसे सुन कर वो क्या बोले ?”

“वो क्या बोलते ! सिवाय इसके कि घोषित करने लगे कि मेरा उनका रिश्ता खत्म था ।”

“अच्छा !”

“हां । लेकिन खत्म रिश्ते को भी बनाये रखना मेरे पति की मजबूरी थी । वो पॉलिटिक्स में हैं जहां दागदार नेता का पतन कोई बड़ी बात नहीं । इस बात का आम होना उसके किरदार पर बड़ा दाग होता कि उसकी बीवी का किसी से अफेयर था । लिहाजा वो मुझे परित्यक्ता बना सकता था, डाईवोर्सी नहीं बना सकता था ।”

“मन्त्री बन जाने के बाद ?”

“तब भी फौरन नहीं । वो उज्जवल छवि वाला नेता बताता है अपने आपको । अपनी छवि को खुद दागदार करना वो अफोर्ड नहीं कर सकता ।”

“ऐसा कब तक चलेगा ?”

“क्या पता !”

कुछ क्षण खामोशी रही ।

उस दौरान मैंने अपने सिग्रेट के दो कश लगा कर उसे तिलांजलि दी ।

“श्यामला तलाक की तैयारी कर रही थी ।” - फिर मैं बोला - “अब ये बात साफ है कि उस फैसले की वजह पति की बेवफाई थी । उसका तलाक का केस कोर्ट में जाता तब भी तो सार्थक के आपसे अफेयर की पोल खुलती ! तब भी तो वो स्कैण्डल खड़ा होता जो आपके पति नहीं खड़ा होने देना चाहते थे ।”

“अरे, कहीं तुम ये हिन्ट तो नहीं ड्रॉप कर रहे कि मेरे पति ने श्यामला का कत्ल किया था ?”

“आप इस बात को नहीं झुठला सकतीं कि श्यामला की मौत की वजह से तलाक की बात खत्म हो गयी है और आपके अफेयर का पर्दाफाश होने से बच गया है ।”

“मेरा अपने पति से कोई लगाव बाकी नहीं लेकिन मैं उसकी कल्पना कातिल के तौर पर नहीं कर सकती ।”

“हैसियत और रसूख वाले लोगों को कत्ल खुद नहीं करना पड़ता ।”

“मैं तुम्हारा इशारा समझ रही हूं लेकिन मैं वो बात भी मानने को तैयार नहीं । मेरा पति इतना नीचे नहीं गिर सकता कि खुद अपनी भांजी के कत्ल का सामान करे ।”

“आई सी ।”

“और फिर सौ बातों की एक बात, मुझे मालूम है कातिल कौन है !”

“अच्छा ! मालूम है !”

“हां ।”

“कौन है ?”

“माधव धीमरे ।”

“ऐसा सोचने की वजह ?”

“सार्थक उसका कर्जाई था...”

“आप सार्थक की कोई माली इमदाद नहीं करती थीं ? आखिर आप एक सम्पन्न व्यक्ति की पत्नी हैं ।”

“और उस सम्पन्न व्यक्ति ने मेरे लिये खजाने खोले हुए हैं ?”

“ऐसा नहीं था ?”

“जैसे तल्ख हमारे ताल्कुकात चल रहे थे, उसमें क्यों भला वो अपनी सम्पन्नता में मुझे शेयरहोल्डर बनाता ?”

“ठीक !”

“फिर भी मेरे से कुछ बन पड़ता था तो मैं करती थी सार्थक के लिये । लेकिन आखिर था तो वो भी मर्द ही !”

मैं सकपकाया, उसके लहजे की वितृष्णा मेरे से छुपी न रही ।

“कोई” - मैं बोला - “शिकायत हुई उससे ?”

“बड़ी शिकायत हुई ।”

“क्या ?”

“मुझे उसका झुकाव शेफाली की तरफ बनता जान पड़ा ।”

“अरे, नहीं ।”

“औरत की छठी इन्द्रिय बोलती है इन मामलों में । उन दोनों में जरूर कुछ चल रहा था ।”

वो जज्बाती हो उठी । मैंने उसके गले की घन्टी उछलती साफ देखी ।
 
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