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“तुम्हारी माली हैसियत समझने की फिराक में हूं जो कि तुम्हारे यहां के रहन सहन से कोई खास नहीं जान पड़ती । लोन शार्किंग के लिये पैसा कहां से आता है तुम्हारे पास ?”
“गो टु हैल ।”
“सार्थक तुम्हारा अस्सी हजार का कर्जाई है, ऐसे क्रेडिटर्स और भी होंगे । इतनी इनवेस्टमेंट कहां से आती है ?”
“आती है कहीं से ।”
“या तो ये धंधा तुम्हारा है ही नहीं - तुम इस धंधे में किसी के फ्रण्ट हो - या फिर ये पार्टनरशिप का धंधा है । पार्टनर का नाम बोलो ।”
“गौ टु हैल ।”
“मैं डिटेक्टिव हूं बुरे के घर तक पहुंचने का फुल तजुर्बा है मेरे को । तुम्हारे पीछे पड़ गया तो तुम्हें, तुम्हारे धंधे को, तुम्हारे पार्टनर को ऐसा एक्सपोज करूंगा कि जेल में नजर आओगे ।”
“जेल में ! पागल हुए हो ?”
“तुम पागल हुए हो । नादान भी । जो समझते हो ब्याज पर पैसा उठा कर धर्म कारज कर रहे हो । नहीं है धर्म कारज लोन शार्किंग । गैरकानूनी धंधा है ये । मैं एक्सपोज करूंगा तुम्हें । बल्कि अभी करता हूं ।”
“अभी करते हो ?”
“हां । पुलिस के महकमे में एक इन्स्पेक्टर मेरा जिगरी दोस्त है । देवेन्द्र सिंह यादव नाम है । मैं उसको फोन करके तुम्हारे बारे में, तुम्हारे धंधे के बारे में बात करता हूं । फिर देखना वो तुम्हारी कैसी खबर लेता है !”
मैंने जेब से मोबाइल निकाला ।
“खबरदार !” - वो व्यग्र भाव से बोला ।
“अरे, भाई, खबरदार होने की जरूरत तुम्हें है । अभी जब पुलिस आयेगी और तुम पर चढ़ दौंड़ेगी तो...”
“क्या चाहते हो ?”
“बोल नहीं चुका ?”
“फिर बोलो ।”
“तुम बोलो । धंधे की बाबत जो पूछा है, वो बोलो । धंधा किसी दूसरे का है ? तुम खाली फ्रंट हो ?”
“नहीं ।”
“तुम्हारा है ?”
“हां ।”
“पार्टनरशिप में ?”
“हां ।”
“पार्टनर का नाम बोलो ।”
“विशू मीरानी ।”
“लोन शार्किंग के धंधे में तुम्हारा पार्टनर है ?”
“हां ।”
“बराबर का ?”
“सिक्सटी फॉर्टी का ।”
“सिक्सटी कौन ?”
“वो ।”
“कौन है ? कहां पाया जाता है ?”
“’रॉक्स’ में बारटेंडर है ।”
““रॉक्स’, जो कि सैनिक फार्म्स में बार है ? जिसका मालिक रॉक डिसिल्वा है ? जो कि रोज़वुड क्लब का केटरिंग कांट्रेक्टर भी है ?”
“वही ।”
“रकम की वापिसी के लिये सार्थक पर प्रेशर बनाया जाना चाहिये था, ये फैसला किस का था ? तुम्हारा या तुम्हारे सीनियर पार्टनर विशू मीरानी का ?”
“विशू मीरानी का ।”
“लेकिन उसको अमली जामा तुमने पहनाया था ?”
“हां ।”
“कार की हैडलाइट फोड़ना तुम्हारा अपना आइडिया था ? बीवी के लिये वल्गर धमकी जारी करना तुम्हारा अपना आइडिया था ?”
“हं - हां ।”
“श्यामला के कत्ल की रात को मैंने सुना है कि तुम अपने बेमेल फ्रेंड शरद परमार के साथ ‘रॉक्स’ में थे ?”
“हां ।”
“कब तक वहां थे ?”
“क्लोजिंग टाइम तक ।”
“वो कौन सा हुआ ?”
“रात एक बजे तक ।”
“इतनी देर बार खुला रखना तो दिल्ली में गैरकानूनी है !”
“सब चलता है ।”
“कोई गवाह है जो ये स्थापित करे कि तुम रात एक बजे तक ‘रॉक्स’ में थे ?”
“है ।”
“कौन ?”
“विशू मीरानी । बारटेण्डर ।”
“चोर चोर मौसेरे भाई । कोई भरोसे का गवाह है ?”
वो खामोश रहा ।
“तुम नशे के आदी हो ।”
उसने हड़बड़ा कर गर्दन उठाई ।
“तुम्हारा पसन्दीदा नशा चरस है, जिसे विलायती जुबान में हशीश कहते हैं । ये बात मैं तुम्हारे से पूछ नहीं रहा, तुम्हें बता रहा हूं ।”
“ब - ब... बता रहे हो ?”
“इस बक्से की - जिसे तुम कमरा कहते हो - हवा में चरस की महक है जिसे मेरे नथुने बाखूबी पकड़ रहे हैं । तुम चरस का सिग्रेट सुलगाये बैठे थे जब कि कालबैल बजी थी । तभी तुमने सिग्रेट को उधर कोने में रखे स्टूल पर पड़ी ऐशट्रे में डालकर मसला था । लगता है सिग्रेट फौरन बुझा नहीं इसलिये ऐशट्रे में मसले जाने के बाद भी माहौल को चरस से महकाता रहा ।”
उसका मुंह खुला, बन्द हुआ ।
“अभी यहां एनसीबी का छापा पड़े तो कितनी मिकदार में चरस बरामद होगी ?”
वो बदहवास दिखाई देने लगा । उसने जोर से थूक निगली, उसके गले की घन्टी उछली ।
“और” - मैं उठ खड़ा हुआ - “तुम्हारे लिये सार्थक का एक सन्देशा है ।”
“क्या ?”
“वो बहुत जल्द आ कर तुम्हारे से मिलेगा ।”
तत्काल उसका मिजाज बदला ।
“मिले ।” - वो फुंफकारता सा बोला - “तैयार पायेगा मुझे अपने स्वागत के लिये ।”
“गुड ! ये की न बहादुर, जांबाज, जगतप्रसिद्ध गोरखों वाली बात ! खुखरी है न ! मुकाबला गन से होगा, फिर भी धार दे के रखना । शाबाश !”
वो आग्नेय नेत्रों से मुझे जाता देखता रहा
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“गो टु हैल ।”
“सार्थक तुम्हारा अस्सी हजार का कर्जाई है, ऐसे क्रेडिटर्स और भी होंगे । इतनी इनवेस्टमेंट कहां से आती है ?”
“आती है कहीं से ।”
“या तो ये धंधा तुम्हारा है ही नहीं - तुम इस धंधे में किसी के फ्रण्ट हो - या फिर ये पार्टनरशिप का धंधा है । पार्टनर का नाम बोलो ।”
“गौ टु हैल ।”
“मैं डिटेक्टिव हूं बुरे के घर तक पहुंचने का फुल तजुर्बा है मेरे को । तुम्हारे पीछे पड़ गया तो तुम्हें, तुम्हारे धंधे को, तुम्हारे पार्टनर को ऐसा एक्सपोज करूंगा कि जेल में नजर आओगे ।”
“जेल में ! पागल हुए हो ?”
“तुम पागल हुए हो । नादान भी । जो समझते हो ब्याज पर पैसा उठा कर धर्म कारज कर रहे हो । नहीं है धर्म कारज लोन शार्किंग । गैरकानूनी धंधा है ये । मैं एक्सपोज करूंगा तुम्हें । बल्कि अभी करता हूं ।”
“अभी करते हो ?”
“हां । पुलिस के महकमे में एक इन्स्पेक्टर मेरा जिगरी दोस्त है । देवेन्द्र सिंह यादव नाम है । मैं उसको फोन करके तुम्हारे बारे में, तुम्हारे धंधे के बारे में बात करता हूं । फिर देखना वो तुम्हारी कैसी खबर लेता है !”
मैंने जेब से मोबाइल निकाला ।
“खबरदार !” - वो व्यग्र भाव से बोला ।
“अरे, भाई, खबरदार होने की जरूरत तुम्हें है । अभी जब पुलिस आयेगी और तुम पर चढ़ दौंड़ेगी तो...”
“क्या चाहते हो ?”
“बोल नहीं चुका ?”
“फिर बोलो ।”
“तुम बोलो । धंधे की बाबत जो पूछा है, वो बोलो । धंधा किसी दूसरे का है ? तुम खाली फ्रंट हो ?”
“नहीं ।”
“तुम्हारा है ?”
“हां ।”
“पार्टनरशिप में ?”
“हां ।”
“पार्टनर का नाम बोलो ।”
“विशू मीरानी ।”
“लोन शार्किंग के धंधे में तुम्हारा पार्टनर है ?”
“हां ।”
“बराबर का ?”
“सिक्सटी फॉर्टी का ।”
“सिक्सटी कौन ?”
“वो ।”
“कौन है ? कहां पाया जाता है ?”
“’रॉक्स’ में बारटेंडर है ।”
““रॉक्स’, जो कि सैनिक फार्म्स में बार है ? जिसका मालिक रॉक डिसिल्वा है ? जो कि रोज़वुड क्लब का केटरिंग कांट्रेक्टर भी है ?”
“वही ।”
“रकम की वापिसी के लिये सार्थक पर प्रेशर बनाया जाना चाहिये था, ये फैसला किस का था ? तुम्हारा या तुम्हारे सीनियर पार्टनर विशू मीरानी का ?”
“विशू मीरानी का ।”
“लेकिन उसको अमली जामा तुमने पहनाया था ?”
“हां ।”
“कार की हैडलाइट फोड़ना तुम्हारा अपना आइडिया था ? बीवी के लिये वल्गर धमकी जारी करना तुम्हारा अपना आइडिया था ?”
“हं - हां ।”
“श्यामला के कत्ल की रात को मैंने सुना है कि तुम अपने बेमेल फ्रेंड शरद परमार के साथ ‘रॉक्स’ में थे ?”
“हां ।”
“कब तक वहां थे ?”
“क्लोजिंग टाइम तक ।”
“वो कौन सा हुआ ?”
“रात एक बजे तक ।”
“इतनी देर बार खुला रखना तो दिल्ली में गैरकानूनी है !”
“सब चलता है ।”
“कोई गवाह है जो ये स्थापित करे कि तुम रात एक बजे तक ‘रॉक्स’ में थे ?”
“है ।”
“कौन ?”
“विशू मीरानी । बारटेण्डर ।”
“चोर चोर मौसेरे भाई । कोई भरोसे का गवाह है ?”
वो खामोश रहा ।
“तुम नशे के आदी हो ।”
उसने हड़बड़ा कर गर्दन उठाई ।
“तुम्हारा पसन्दीदा नशा चरस है, जिसे विलायती जुबान में हशीश कहते हैं । ये बात मैं तुम्हारे से पूछ नहीं रहा, तुम्हें बता रहा हूं ।”
“ब - ब... बता रहे हो ?”
“इस बक्से की - जिसे तुम कमरा कहते हो - हवा में चरस की महक है जिसे मेरे नथुने बाखूबी पकड़ रहे हैं । तुम चरस का सिग्रेट सुलगाये बैठे थे जब कि कालबैल बजी थी । तभी तुमने सिग्रेट को उधर कोने में रखे स्टूल पर पड़ी ऐशट्रे में डालकर मसला था । लगता है सिग्रेट फौरन बुझा नहीं इसलिये ऐशट्रे में मसले जाने के बाद भी माहौल को चरस से महकाता रहा ।”
उसका मुंह खुला, बन्द हुआ ।
“अभी यहां एनसीबी का छापा पड़े तो कितनी मिकदार में चरस बरामद होगी ?”
वो बदहवास दिखाई देने लगा । उसने जोर से थूक निगली, उसके गले की घन्टी उछली ।
“और” - मैं उठ खड़ा हुआ - “तुम्हारे लिये सार्थक का एक सन्देशा है ।”
“क्या ?”
“वो बहुत जल्द आ कर तुम्हारे से मिलेगा ।”
तत्काल उसका मिजाज बदला ।
“मिले ।” - वो फुंफकारता सा बोला - “तैयार पायेगा मुझे अपने स्वागत के लिये ।”
“गुड ! ये की न बहादुर, जांबाज, जगतप्रसिद्ध गोरखों वाली बात ! खुखरी है न ! मुकाबला गन से होगा, फिर भी धार दे के रखना । शाबाश !”
वो आग्नेय नेत्रों से मुझे जाता देखता रहा
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