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Thriller अलफाँसे

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Thriller अलफाँसे

श्री गणेश ही गलत हुआ।

वह संदिग्ध हो उठा। विजय अपनी नई कोठी के बरामदे में खड़ा हुआ अन्दर प्रविष्ट होने के सम्बन्ध में सोच ही रहा था कि तभी उसकी कनपटी पर एक घूंसा पड़ा। अभी वह सम्हलने भी नहीं पाया था कि कुछ घूंसे और पड़े। घूंसे कुछ इतनी फुर्ती और तेजी से पड़े थे कि विजय को संभलने का अवसर ही नहीं मिला। उसके सिर से कोई चीज टकराई और वह बेहोश होकर गिर पड़ा।

बेहोश होने से पहले गिरते समय विजय केवल अबे...अबे...कहता ही रह गया। लेकिन बेहोश होने के बाद उसे कुछ पता नहीं लगा कि उसके साथ क्या हो रहा है। उसे कहां ले जाया जा रहा है।

लेकिन जब वह होश में आया तो उसने अपने आपको एक पलंग पर रस्सी से कसा हुआ पाया। अच्छा सजा हुआ कमरा था और उसकी अपनी कोठी से मिलता जुलता सा था। वह रस्सियों के कुछ इस प्रकार कसा हुआ था कि करवटें तक नहीं बदल सकता था न वह अपने हाथ ही हिला सकता था।

कमरे में एक बल्ब जल रहा था और उसकी रोशनी में उसने देखा कि कमरा उसकी कोठी से मिलता जुलता ही नहीं है। बल्कि उसकी कोठी का ही है। वह इस समय अपने ही कमरों में रस्सियों से बंधा हुआ था।

यह कोठी उसने अभी लगभग एक सप्ताह पूर्व ही खरीदी थी सिंगही से टकराने के समय ही उसकी कोठी सिंगही द्वारा नष्ट कर दी गई थी।

उसके पश्चात वियज ने एक प्लैट लिया था और फिर एक छोटा सा मकान और अब कहीं जाकर वह अपने मन माफिक कोठी खरीद पाया था।

लेकिन इस कोठी को खरीदे हुए उसे अभी सप्ताह भर भी नहीं हुआ था कि यह घटना पेश आ गई। वह रघुनाथ के यहां से सीधा अपनी कोठी आया था। लेकिन यहाँ उसका स्वागत घूंसों से किया गया। विजय इतनी जल्दी और इतनी आसानी से काबू मे आने वाला मनुष्य नहीं था। लेकिन अन्धकार और आकस्मिक आक्रमण ने उसे विवश कर दिया था कि वह अपने बचाव के लिए कुछ कर भी नहीं पाया था।

उसने अपने शरीर को करव्ट देने की कोशिश की लेकिन पाया कि वह हिल नहीं पायेगा। रस्सियाँ बहुत मोटी और कसकर बंधी हुई थी। विजय पलंग पर पड़ हुआ मचलता रहा और बराबर के कमरों से खड़खड़ाहट की आवाज आती रहीं। ऐसा मालूम पड़ रहा था जैसे काफी सामान उठा पटक किया जा रहा है।

विजय सोचने लगा कि आज चोरों ने उसका ही माल साफ कर देना है। उसने इधर उधर गरदन घुमाकर देखा तो कमरे की एक खिड़की में किसी व्यक्ति को खड़े हुआ पाया। वह व्यक्ति एकटक विजय को घूरे जा रहा था। उसके हाथ में रिवाल्वर था, जो कि उसने खिड़की पर रखा हुआ था। लेकिन रिवाल्वर का दस्ता उसके हाथ में दबा हुआ था।

‘प्यारे भाई।’ विजय ने उसे सम्बोधित करके बड़े ही प्यार भरे स्वर में पूछा-‘तुम विवाहित हो अथवा कुँवारे।’

‘क्यों तुम क्या मेरा विवाह करा दोगे?’

‘अभी तो मैं अपना ही विवाह नहीं करा पाया हूं।’ विजय ने एक लम्बी साँस के साथ कहा-!लेकिन अगर तुम भी कुंआरे हो तो हम दोनों मिलकर एक संस्था बनायेंगे। जिसका नाम होगा कुंआरा समिति। जब हम काफी हो जायेंगे तो हम सबके विरुद्ध आंदोलन चलायेंगे। कि सरकार कुंआरों को विशेष सुविधायें प्रदान करने की और ध्यान दे। हम अपने मांग पत्र में कहेंगे कि देश की आजादी में कुंआरों ने जितना अधिक सहयोग दिया है उतना विवाहित पुरुष भी नहीं दे पाये है। जब उन लाल मुंह वाले बन्दरों की गालियां चलती थीं तो कुंआरे केवल अपने देश की याद लेकर ही मरते थे। लेनिक ये विवाहित पुरुष मरते हुए अपने परिवार के सम्बन्ध में सोचते थे। महान कौन? जो मरते समय देश के सम्बन्ध में सोचे अथवा वह जो अपने परिवार के सम्बन्ध में ही सोचता है?’

वह व्यक्ति उसे मुस्कराता हुआ देखता रहा। विजय ने उसकी और देखा और बोला-‘यहाँ मेरे निकट आओ मेरे प्यारे भाई। मैं तुम्हें अभी पैदा होने वाली अपनी संस्था के विचार और उद्देश्य अच्छी तरह से समझाना चाहता हूं।’

‘नहीं प्यारे भाई।’ वह व्यक्ति मुस्करा कर बोला-‘तुम आराम से सो जाओ। रात काफी गहरी हो गई है। अच्छी आदमी इतनी देर तक नहीं जागा करते।’

‘तो फिर तुम क्यों जाग रहे हो?’ विजय ने किसी जिद्दी बच्चे की भांति पूछा- ‘क्या तुम अच्छे आदमी नहीं हो?’

‘नहीं।’ वह लापरवाही से बोला।

‘तो आओ प्यारे।’ विजय ने उसे पुकारा-‘मैं तुम्हें अच्छा आदमी बना दूं।’

‘धीरे बोलो।’

‘अच्छा मैं धीरे ही बोलूंगा। लेकिन तुम मेरे पास तो जाओ। मैं तुम्हें अच्छा आदमी बना दूंगा।’

‘अबे बन जाओ ना।’ विजय खुशामद करने के से स्वर में बोला- ‘देखो तुम अच्छे आदमी बन जाओगे। अर्थात तुम्हारा सुधार हो जायेगा और मेरा काम हो जायेगा। दस पांच तुम्हारे जैसे आदमियों को सुधारने के बाद मैं लोगों में काफी प्रिय हो जाऊंगा। लोग मेरी भी बुद्ध भगवान अथवा चैतन्य महाप्रभु की भांति पूजा करा करेंगे। भगवान की कसम बड़ा मजा आ जाएगा।’

‘तुम वास्तव में बहुत बकवास करते हो।’

‘वास्तव में तो मैं कुछ भी नहीं कर रहा हूं प्यारे भाई।’ विजय बोला ‘वास्तव में तो मैं रस्सियों से बंधा हुआ विवश पड़ा हुआ हूं। अगर मैं आजाद होता तो इस समय तुम्हारी कमर में हाथ डालकर रम्बा नाच रहा होता।’

वह व्यक्ति कुछ नहीं बोला बल्कि आराम से खड़ा हुआ उसकी निगरानी करता रहा। उसकी आंखें विजय पर जमीं हुई थीं और हाथ रिवाल्वर पर रखा हुआ था।

‘आखिर तुम इस प्रकार मुझे क्यों घूर रहे हो।’ विजय फिर बोला- उसकी जबान चुप रह ही नहीं पा रही थी- ‘यह ठीक है कि हम बहुत सुन्दर हैं। लेकिन इतने सुन्दर भी नहीं हैं कि तुम हमें एक टक घूरे ही जाओ।’

वह मुस्करा कर रह गया।

बराबर के कमरे में अभी भी खड़खड़ाहट की आवाज आ रही थी। विजय ने उस खड़खड़ाहट को सुना और उस आदमी को सम्बोधित करते हुए कहा- ‘प्यारे भाई। अपने साथियों से कहो कि वह कोई और घर जाकर ढूँढें। उन्हें यहां कुछ नहीं मिलेगा।’

‘तो तुम आराम से आँखें बन्द करके सो क्यों नहीं जाते?’

‘तुम्हारे रहते हुए मैं कैसे सो सकता हूं।’ विजय उदास स्वर में बोला, विजय यद्यपि उससे बातें किये जा रहा था लेकिन फिर भी उसकी समझ में नही आ रहा था कि वह उससे बातें क्यों कर रहा है। लेकिन वह चुप भी तो नहीं रह सकता था। वह आदमी उसकी बातों में कोई विशेष दिलचस्पी नहीं ले रहा था।

काफी देर तक वह बराबर के कमरे में होने वाली खड़खड़ाहट को सुनता रहा। फिर उसके पश्चात न जाने उसे कब नींद ने धर दबाया। लेकिन जब वह जागा तो दिन निकल चुका था। वह अभी भी रस्सियों से बंधा हुआ था। उसने आंखें खोली और खिड़की की ओर देखा खिड़की खुली थी। उसमें से अब दिन का प्रकाश अन्दर आ रहा था। बराबर की तिपाई पर रखे हुये फोन की घन्टी लगातार बजती रही। लेकिन हाथ बंधे होने के कारण विजय उसे उठाने में विवश था।

उसने मुस्कुरा कर फोन की ओर देखा और बोला- ‘बजे जाओ प्यारे।’

फिर उसने एक ठंडी साँस के साथ फोन को एक शे’र सुना दिया-

वो सुनके नहीं सुनते जिनको तुम सुनाते थे,

वो तो बंधे पड़े हैं जो तुमको उठाते थे।

फोन की घन्टी काफी देर तक बजती रही। लेकिन विजय ने उसे नहीं उठाया। क्योंकि वह उठा भी नहीं सकता था। उसके बाद घन्टी खामोश हो गई और विजय भी खामोशी से छत को ताकता रह गया।
 
ज्यों ज्यों दिन जवान होता जा रहा था विजय की भूख भी जवान हो रही थी। नाश्ते की तो छुट्टी हो ही गई थी। साथ ही उसे खाने की भी हड़ताल होती नजर आ रही थी। न उसे किसी के आने की आशा थी। नौकर उसने अभी तक कोई रखा नहीं था। नाश्ते के लिए किसी होटल वाले से सम्बन्ध स्थापित नहीं किया था।

उन कम्बख्तों ने रस्सी कुछ इस प्रकार कस कर बांधी थी कि काफी जोर लगाने के बावजूद भी रस्सी उसके शरीर में घुसती जाती थी। विजय ने अपनी आंखों से और हाथ की उंगलियों से रस्सी की गांठ देखने की चेष्टा की थी। लेकिन असफल रहा। उसे कहीं भी गांठ नजर नहीं आई थी।

विजय यहां पर पड़ा हुआ अजीब अजीब सी हरकतें कर रहा था। कभी वह सीटी बजाता था। कभी हवा में फूंक मारता था और कभी छत को इस प्रकार आँख मारता था जैसे वह कोई सुन्दर शर्मीली कन्या हो।

दोपहर गुजर गई और सूरज ढलने लगा। इसका पता विजय को कमरे में प्रविष्ट होने वाली धूप और प्रकाश से चल रहा था। सूरज डूब भी गया और कमरे में अन्धेरा छाने लगा चोरों ने कल रात जाते समय कमरे की बत्ती बन्द कर दी थी। क्योंकि कल रात कमरे में अन्धेरे के स्थान पर बिजली का प्रकाश था और अब अन्धेरा था। केवल अन्धेरा।

विजय पड़ा रहा और सोचता रहा कि आखिर वह कब तक इस प्रकार पड़ा रहेगा। उसे पहले हल्की सी आशा थी कि शायद कोई आ जाये। लेकिन जब कोई नहीं आया तो उसे बड़ी निराशा हुई। अब उसके पास केवल एक ही उपाय था जिसे उसने काफी देर से काम में नही लिया था।

उसने चिल्लाना आरम्भ कर दिया-‘बचाओ...बचाओ...अरे भाई बचाओ...’

दौड़ते हुए कदमों की आहट विजय को सुनाई दी और फिर फटाक की आवाज के साथ उसके कमरे का दरवाजा खुला ओर मानवाकृति उसे दरवाजे के बीच में खड़ी नजर आई।

‘दरवाजे के निकट ही बांईं ओर की दीवार में स्विच लगा हुआ है।’ विजय ने चिल्लाना बन्द करके उस मानवाकृति को सम्बोधित किया। दूसरे ही क्षण कमरे में प्रकाश हो गया और विजय ने देखा कि वह और कोई नहीं सुपर रघुनाथ ही था।

‘अबे तुम्हारी यह क्या हालत है?’ रघुनाथ ने उसे आश्चर्य से देखते हुए कहा- ‘तुम्हें बांध दिया।’

‘जरा पहले रस्सी तो खोल दो रघु डीयर।’

‘रस्सी तो खोलता हूं। लेकिन यह क्या हुआ।’ रघुनाथ ने रस्सी की गाँठ खोलते हुए कहा।

विजय को इस अवस्था में देखकर उसे वास्तव में आश्चर्य हुआ था।

विजय कुछ नहीं बोला। रघुनाथ रस्सियां खोलता रहा। जब पूरी रस्सियां खुल गई और विजय स्वतन्त्र हो गया तो वह एकदम उछल कर खड़ा हो गया और फिर रघुनाथ को गले से पकड़ कर बोला- ‘अबे तुम सवेरे से कहां थे?’

‘क्या मतलब?’ एक झटके के साथ अपना गिरेबान छुड़ाते हुए रघुनाथ ने कहा-‘अरे मेरा धन्यवाद तो करने से रहे और ऊपर से गिरेबान पकड़ रहे हो।’

‘अबे धन्यवाद तो मैं तुम्हारा इकट्ठा कर दूंगा।’ विजय नथुने फुलाकर बोला-‘लेकिन तुम्हें शर्म नहीं आई कि तुम्हारा मित्र प्यारा रस्सियों से बंधा पड़ा है और आजकल तुम चना गश्ती कर रहे हो।’

‘चना गश्ती नहीं मटरगश्ती।’

‘अबे मटर तो आजकल इतनी महंगी है कि तुम्हारा बाप भी उसमें गश्ती नहीं हो सकता तुम केवल चनागश्ती कर सकते हो। लेकिन इन बातों में मेरी पहली बात का उत्तर तो गोल कर ही दिया।’

‘कैसी बात?’

‘अबे यही कि तुम सवेरे से क्यों नहीं आये। यहां न नाश्ता किया है न दोपहर का खाना खाया है। यह देखो यह पेट पीठ से चिपका जाता है।’

‘लेकिन इसमें मेरा क्या कसूर है? मुझे क्या मालूम कि तुम

बंधे पड़े हो और फिर सवेरे से मैं लगातार तुम्हें फोन करने की चेष्टा करता रहा। लेकिन तुम्हारी ओर से कोई उत्तर ही न मिला।’

‘तो मैं क्या करूं। वो साले मेरे हाथ भी बांध गये।’

‘लेकिन वह थे कौन?’

‘क्या पता? लेकिन तुम जल्दी से बाहर जाकर होटल से कुछ खाने के लिये लाओ।’

‘अबे लेकिन वेकिन कुछ नहीं। मेरा बुरा हाल हो रहा है। मुझे भूखा शेर समझो जो अत्यधिक भूखा होने पर नरभक्षी हो जाता है। अगर मैं नरभक्षी बना तो मेरे पहले शिकार तुम ही होगे।

बिना कुछ बताये ही विजय ने रघुनाथ को बाहर खाना लाने के लिए भेज दिया और स्वयं उस कमरे की ओर चल दिया जहां पर कि रात भर धड़ाधड़ होती रही थी। वह दूसरे कमरे में पहुंचा और उसने बत्ती जलाकर कमरे का निरीक्षण किया।

लेकिन कमरे का नक्शा उसकी आशा के विपरीत था कोई भी चीज अपने स्थान से हिली भी नहीं थी। जितनी भी चीज कमरे में थी। वे सब अपने स्थान पर थी। विजय का ख्याल था कि समस्त सामान इधर उधर बिखरा हुआ होगा। लेकिन ऐसा नहीं था।

उसने बारी-बारी से सब कमरे देख डाले। लेकिन कहीं भी कुछ बिखरा हुआ नहीं था। सब कुछ अपने स्थान पर था। इस घटना ने विजय को वास्तव में चकित कर के रख दिया था।

तब तक रघुनाथ एक वेटर के हाथों पर खाने का सामान लदवाये वापिस आ गया था। वेटर खाने का सामान रख कर वापिस चला गया था।

‘आखिर माजरा क्या है?’ रघुनाथ ने फिर अपनी उत्सुकता को प्रकट किया- ‘क्या किसी ने चोरी की है?’

‘सोचता तो यही था?’ विजय अपनी गुद्दी सहलाता हुआ बोला- ‘लेकिन अब स्वयं मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि यह हो क्या गया है?’

‘क्या मतलब?’

और फिर विजय ने बड़े प्रेम से उसको मतलब समझाया। उसने उसे वह सब कुछ बता दिया जो कि रात को उसके साथ घटा था।

‘मैं भी तो कहूं कि आखिर तुम सुबह-सुबह कहां चले गये थे?’ रघुनाथ ने पूरी बात सुनने के उपरांत कहा- ‘मैंने काफी देर तक तुम्हें रिंग किया। लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला। फिर यह सोचकर कि शायद तुम कहीं बाहर चले गये हो। मैंने रिंग करना छोड़ दिया।’

‘अबे तुम तो न जाने क्या छोड़ोगे?’ विजय खाने पर टूटता हुआ बोला- ‘मैं खाना खालूं तो फिर देखेंगे कि क्या कोई चीज चोरी की गई है या नहीं। प्रत्यक्ष में तो कोई चीज चोरी नहीं की गई है। लेकिन हो सकता है कि हमारी कोई कीमती चीज चोरी चली गई हो। लेकिन रघु डीयर हमारे पास कौन सी कीमती चीज है।’

पेट भर चुकने के बाद विजय रघुनाथ के साथ मिलकर अपना सामान चैक करने लगा। सभी मुख्य चीजें मौजूद थीं। यहां तक कि जितनी भी नगदी थी वह सब मौजूद थी।

‘फिर तो उन्होंने कुछ नहीं चुराया है।’ रघुनाथ कुछ सोचता हुआ बोला।

‘अबे तो फिर यहां क्या किसी बड़े खेल का रिहर्सल करने आये थे वो?’

‘लेकिन यह भी तो हो सकता है कि तुमने कोई स्वप्न देखा हो।’

‘हां यह हो सकता है।’ विजय उसका समर्थन करता हुआ बोला। फिर वह एक दम फूट पड़ा- ‘अबे तुम्हें किस घसियारे ने सुपर बना दिया है। तुम्हें यह नहीं मालूम कि आज तक किसी को कभी इतना गम्भीर स्वप्न नहीं आया है कि वह वास्तव में भी रस्सियों से लिपटा हुआ पलंग पर पड़ा रिरियाता रहे।’

‘तो फिर वह यहां क्या करने आये थे?’

‘क्या पता साले क्या करने आये थे?’ विजय बोला-‘लेकिन यह निश्चय है कि वे लोग थे बहुत ही शरीफ। अन्यथा लाला सुपर ईडियट आज कल किस चोर को फुरसत रहती है कि वह चोरी करने के बाद सामान भी ठीक ठाक करके रख दे।’
 
मामाला रहस्यमय ही बना रहा और अगले दिन समाचार पत्रों में आ गया। अधिक तो नहीं लेकिन फिर भी लोग चकित थे। स्वयं विजय की ही समझ में इस मामले का रहस्य नहीं आ रहा था और किसी की तो बात ही क्या है।

और उसके साथ ही अगले दिन इससे भी अधिक आश्चर्यजनक घटना घटी और विजय की बुद्धि भी चकरा कर रह गई। उस घटना को अगर संसार को आठवाँ आश्चर्य कह दिया जाये तो अतिशयोक्ति न होगी।

हुआ यह था कि विजय बरामदे में लगे हुए एक खम्बे के साथ अपना कन्धा टिकाये समाचार पत्र पढ़ रहा था। वह उसी घटना को पढ़ रहा था कि तभी उसे कम्पाउन्ड में किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।

उसने दृष्टि उठाकर देखा तो एक साधारण शरीर के दुबले पतले व्यक्ति को अपनी ओर आते देखा। सूरत अपरिचित थी इसलिए विजय उसकी ओर प्रश्नपूर्ण दृष्टि से ही देखता रह गया।

‘नमस्कार महाशय।’ उस व्यक्ति ने बड़े ही विनीत स्वर में उससे कहा।

विजय ने आंख से ही उसके नमस्कार का उत्तर दिया और आंख से ही प्रश्न किया कि क्या है?

‘मैंने समाचार पत्रों में आपके साथ घटी घटना पढ़ी है।’ वह व्यक्ति बोला।

‘बड़ा अच्छा किया।’ विजय बोला- ‘आप हमेशा मेरे साथ घटी घटनायें पढ़ते रहा कीजिए। आपके स्वास्थ्य में भी काफी अन्तर पड़ जायेगा। क्या आपने शीशे में नहीं देखा कि अब चेहरे पर पहले से अधिक लाली है।’

‘आप मजाक कर रहे है।’ वह व्यक्ति हाथ मलकर हंसते हुए बोला- ‘लेकिन मैं सच कह रहा हूं कि समाचार पत्र में आपकी घटना पढ़ कर मैं काफी आश्चर्य में डूब गया था।’

‘फिर आप बाहर कैसे निकले? क्या आपको तैरना आता है?’

‘जी हां, कालिज में मैं तैराकी का चैम्पियन था।’

‘और क्या क्या थे आप?’

‘बहुत कुछ था।’ वह व्यक्ति बोला- ‘लेकिन इस समय मैं आपसे एक बहुत ही आवश्यक बात करने आया हूं। क्या हम अन्दर बैठ कर कुछ बातें नहीं कर सकते?’

‘अवश्य कर सकते हैं।’ विजय समाचार पत्र की तह करता हुआ बोला- ‘आप नाश्ता तो कर ही आये होंगे।’

‘जी हां।’

‘और खाने का अभी समय हुआ नहीं है।’ विजय बोला- ‘इसलिए आप अन्दर आ सकते हैं।’

वह आदमी यही सोचने की चेष्टा कर रहा था कि विजय कहना क्या चाह रहा है। अपने मस्तिष्क में उलझन लिए वह पीछे चल दिया। सीटी बजाता हुआ और उसकी ताल पर हौले-हौले नाचता हुआ विजय ड्राईंग रूम की ओर चल दिया।

उसको सोफे पर बैठने का संकेत करके विजय स्वयं उसके सामने बैठ गया और उसकी आंखों में झांकता हुआ बोला- ‘अब फरमाइए?’

‘मेरा नाम रमण है।’ उस व्यक्ति ने अपना नाम बताया।

‘क्या आप केवल यही आवश्यक कार्य करने के लिए आये थे?’ विजय ने उसे घूरते हुए पूछा।

‘जी नहीं, यह तो मैं आपको अपना नाम बता रहा हूं।’

‘अजी नाम से क्या अन्तर पड़ता है? अगर इसके स्थान पर आपका नाम चमन या धवन भी हो तो आपके व्यक्तित्व में क्या अन्तर पड़ जाता।’

‘कुछ नहीं।’

‘तभी तो भारत के बड़े-बड़े ऋषि मुनियों ने कहा है कि व्यक्ति को उसके नाम अथवा जाति से नहीं बल्कि उसके व्यक्तित्व और चरित्र से देखो। यह ही एक ऐसी परख है जिस पर जिससे...खैर इससे हमें क्या मतलब है कि जिससे क्या हो जाता है। आप यह बताइए कि आपने यहां आने का कष्ट कैसे किया?’

‘मैं उस स्थान को देखना चाहता हूं जिस कमरे में यह घटना हुई थी।’

‘आप क्या करेंगे उसे देखकर।’ विजय ने बड़े प्यार से पूछा-‘वह कोई ऐतिहासिक अथवा धार्मिक स्थान नहीं है जिसे देखकर आप तृप्त हो सकें। वह तो एक साधारण सा कमरा है।’

‘अगर आप मुझे उस कमरे को पांच मिनट देखने की आज्ञा दें तो मैं आपको यह बता दूंगा कि चोर यहां क्या चुराने आया थे?’

‘उससे मुझे क्या लाभ होगा। हाँ अगर आप चारों का पता बतायें तब तो कुछ काम की बात भी हो सकती है।’

‘मैं केवल पाँच मिनट उस कमरे को देखना चाहता हूं।’

‘आप उस कमरे को केवल अन्दर से ही देखेंगे ना?’

‘जी हां।’ रमण बोला- ‘लेकिन आप इस प्रकार क्यों पूछ रहे हैं?’

‘क्योंकि मुझे डर है कहीं आप कमरे को साथ लेकर ही न भाग जायें।’

‘आप काफी दिलचस्प आदमी हैं।’

‘आपको मियादी बुखार तो नहीं है?’

‘नहीं, लेकिन आप यह सब कुछ क्यों पूछ रहे हैं?’

‘क्योंकि जिन व्यक्तियों को मैं दिलचस्प आदमी नजर आता हूं। प्रायः वे सब मियादी बुखार के शिकार पाये गए हैं।’

‘तो क्या मैं यह समझ लूं कि आप मुझे अपना कमरा देखने की इजाजत न देंगे?’

‘आप अगर ऐसा समझेंगे तो गलत समझेंगे।’ विजय बोला- ‘क्या आप नहीं जानते कि मैं भारत में पैदा हुआ हूं। इसलिए भारतीय हूं और भारतीयों का यह प्रथम सिद्धांत है कि घर आये अतिथि को खाली हाथ नहीं भेजा करते। अपने उसी सिद्धान्त का पालन करते हुए मैं भी तुम्हें खाली हाथ नहीं भेजूंगा।’

‘तो क्या मैं उस कमरे को अन्दर से देख सकता हूं?’

‘जरूर देख सकते हो। मगर एक शर्त पर।’

‘किस शर्त पर।’

‘यही कि उस कमरे को देखने के पश्चात तुम मुझे यह बताओगे कि क्या चीज चोरी की गई है? उसके साथ ही तुम यह भी बताओगे कि रात को कौन व्यक्ति यहां पर आया था।’

‘मुझे स्वीकार है।’

विजय का हृदय रमण के प्रति संदिग्ध हो उठा था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह व्यक्ति उस कमरे को देखने के लिए इतना अधिक उत्सुक क्यों है? वह देखना चाहता था कि रमण अन्दर जाकर क्या करेगा।

जिस समय वह रमण को कमरे के निकट ले आया तो वह बोला- ‘मैं कमरे को कुछ देर के लिए अन्दर से देखना चाहता हूं।’

‘लेकिन तुम देखकर करोगे क्या?’

‘यह मैं देखने के पश्चात बताऊंगा।’

‘अच्छा।’

विजय लापरवाही से बोला और रमण कमरे के अन्दर चला गया लेकिन विजय ने निश्चय कर लिया था कि वह रमण के बाहर निकलते ही उसे रोक लेगा और उससे पूछेगा कि इस कमरे में क्या है। यह कमरा उसके लिए रहस्य बन गया था। परसों रात को इसी कमरे में धरापटक होती रही थी और आज समाचार पत्र में इस घटना को सुनकर यह महाशय उसे देखने के लिए चले आ रहे हैं। अवश्य इसका कोई न कोई स्वार्थ है अन्यथा प्रत्येक व्यक्ति कमरा देखने के लिए क्यों नहीं आ गया।
 
यह सब सोचता हुआ विजय किसी ऐसे स्थान की खोज में था जहां से उसे अन्दर का दृश्य नजर आ जाये। लेकिन रमण ने अन्दर जाकर न केवल दरवाजा बन्द कर लिया बल्कि खिड़कियां भी। रोशनदान इतने ऊंचे थे कि जितनी देर में विजय उन तक पहुंचने की तरकीब लड़ाता। तब तक बाहर भी निकल आता। क्योंकि उसने केवल पांच मिनट ही लगाने के लिए कहा था।

अभी कठिनाई से एक दो मिनट गुजरे थे कि अन्दर से एक फायर की आवाज आई और उसके साथ ही रमण की चीख सुनाई दी। आवाज के विषय में विजय निश्चय पूर्वक कह सकता था कि यह फायर की आवाज है।

अधिक सोचने विचारने में समय न लगाकर विजय तेजी से दूसरे कमरे में गया और मेज उठा लाया। मेज पर कुर्सी रखकर वह रोशनदान तक पहुंच गया था। उसने अंदर झांक कर देखा। रमण फर्श पर पड़ा हुआ तड़प रहा था। उसकी कनपटी में से खून बह रहा था। एक रिवाल्वर भी विजय को उसके निकट पड़ा हुआ दिख रहा था।

वह सब दृश्य देखकर विजय के मुख से केवल इतना ही निकला- ‘भौम शंकर।’ और वह नीचे उतर आया। उसके कदम फोन की ओर बढ़ रहे थे। फोन पर जल्दी से उसने रघुनाथ के आफिस के नम्बर डायल किये। क्योंकि उसे विश्वास था कि अब तक रघुनाथ आफिस पहुंच चुका होगा।

उसका विचार सच निकला। रघुनाथ आफिस पहुंच चुका था।

‘हलो सुपर रघुनाथ स्पीकिंग।’ दूसरी ओर से रघुनाथ का स्वर सुनाई दिया।

‘रघु डीयर, तुरन्त मेरी कोठी पहुंच जाओ।’

‘क्यों?’

‘मेरी कोठी ने आत्महत्या कर ली है।’

‘क्या कहा कहीं तुम्हारा मस्तिष्क तो खराब नहीं हो गया है।’

‘मैं सच कह रहा हूं।’

‘खाक सच कह रहे हो।’ रघुनाथ झल्लाकर बोला- ‘कहीं कोठियाँ भी आत्महत्या किया करती हैं।’

‘अबे तो मैं कब कह रहा हूं कि कोठियाँ आत्महत्या करती हैं। मैं तो कह रहा हूं कि मेरी कोठी में आत्महत्या हो गई है।’

‘लेकिन पहले तो...’

‘पहले तुमने गलत सुना होगा।’

‘परन्तु...’

‘अरन्तु परन्तु कुछ नहीं...तुरन्त मेरी कोठी पहुंचो।’ इतना कहकर विजय ने सम्बन्ध विच्छेद कर दिया दूसरी बात उसने निकटवर्ती पुलिस स्टेशन को फोन किया।

रघुनाथ के पहुंचने से पहले ही इंस्पेक्टर बिलमोरिया दो कोंस्टेबलों के साथ वहाँ पहुंच चुका था। लेकिन अभी वह विजय से कुछ अधिक पूछताछ नहीं कर पाया था कि रघुनाथ भी यहां पहुंच गया।

इंस्पेक्टर बिलमोरिया के साथ-साथ दोनों कोंस्टेबलों ने भी उसे सैल्यूट दिया। लापरवाही से उनके सलामों का उत्तर देने के पश्चात् रघुनाथ जल्दी से विजय से बोला- ‘क्या बात है? किसने कर ली है आत्महत्या?’

‘इस मेज पर जो कुर्सी खड़ी हुई है, उस पर तुम खड़े हो जाओ और रोशनदान से अन्दर झांको।’ विजय आराम से बोला।

रघुनाथ ऊपर चढ़ गया और उसने रोशनदान से अन्दर झांक कर देखा। फिर वह विजय की ओर मुड़ता हुआ बोला-‘लेकिन यह कौन है? यहां कैसे आया।’

‘पहले प्रश्न का उत्तर तो यह है कि इसका नाम रमण है। दूसरे प्रश्न का उत्तर वही है घिसा पिटा पुराना कि यह पैरों से चलकर आया है।’

रघुनाथ नीचे उतरता हुआ बोला- ‘लेकिन तुमने इसे आत्महत्या क्यों करने दी?’

‘मैं रोक भी कैसे सकता था।’

‘जब यह अपनी कनपटी पर रिवाल्वर रखने जा रहा था तुमने इसे तभी क्यों नहीं रोका।’

‘अबे कैसे रोकता।’ विजय बोला- ‘यह कमरे के अन्दर था और मैं कमरे के बाहर था।’

‘पूरी बात बताओ।’

विजय ने उसे पूरी घटना बता दी और फिर बोला- ‘मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि अगर इस मुर्गी वाले को आत्महत्या ही करनी थी तो फिर यह यहीं क्यों आया?’

‘यही मैं भी सोच रहा हूं।’

‘अरे केवल सोचते ही रहोगे या कुछ करोगे भी। केवल सोचने से तो तुम जनता की रक्षा नहीं कर पाओगे।’

‘तो मैं क्या करूं?’ रघुनाथ के स्वर में विवशता थी- ‘जब तुम्हारे ही मस्तिष्क में कुछ नहीं उभर रहा है तो मैं क्या सोच सकता हूं?’

‘अभी बताता हूं।’ विजय बोला- ‘पहले इंस्पेक्टर को अपना काम करके चले जाने दो।’

कमरे का दरवाजा तोड़ा गया। फिंगर प्रिंट सैक्शन के फोटोग्राफर फोन द्वारा बुलाये जा चुके थे। उन्होंने लाश के विभिन्न कोणों से फोटो लिए और चले गये। रघुनाथ ने लाश की तलाशी ली और चौंक पड़ा। क्योंकि मृतक के बायें हाथ में एक ताश का पत्ता पड़ा हुआ था। यह हुक्म का इक्का था। जहां पर हुक्म के इक्के का निशान बना हुआ था। वहां एक गोल सुराख हो रहा था।

इंस्पेक्टर बिलमोरिया आवश्यक कार्यवाही के बाद वहाँ से चला गया।

‘यह कोई जुआरी तो नहीं था।’ इंस्पेक्टर के जाने के बाद विजय ने रघुनाथ से कहा।

‘क्यों?’

‘क्योंकि यह हाथ में ताश का पत्ता लिए मरा है। तुम कुछ भी हो मुझे तो ऐसा लगता है कि जैसे इस हुक्म के इक्के कारण यह सारी जायदाद हार चुका है। यही कारण है कि इसने हुक्म के इक्के के अन्दर छेद कर रखा है।’

‘मूर्खतापूर्ण बातें न करो।’

‘तो फिर क्या करूं।’ विजय अजीब विवशता के साथ बोला- ‘इन घटनाओं ने तो मुझे वास्तव में मूर्ख बना कर रख दिया है। वैसे मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर इस कमरे में लोगों को क्या दिलचस्पी है कि हर प्रकार का अपराध इसी कमरे में करने के लिए लोग उत्सुक रहते हैं।’

‘मैं समझा नहीं।’

‘तुम आमतौर से समझा नहीं करते। लेकिन मैं तुम्हें समझाकर रहूँगा। मेरे कहने का मतलब यह है कि वह साले चोर अपनी अपनी चोरी करने का रिहर्सल करने के लिए इसी कमरे में आए थे। ये भाई इस कमरे में आत्महत्या करने के लिए आ गए। अब कोई साहब यहां पर हत्या करने आयेंगे फिर कुछ दिनों के बाद इस कमरे में बहुत से गुन्डे आकर अपना अड्डा जमा लेंगे और मैं...यह कोठी उनके सुपुर्द करके हाथ में चिमटा लेकर गली गली गाता फिरूंगा-

भगवान भला होगा तेरा,

गर एक काम करे मेरा,

तू अपनी जगह मुझे दे डाल,

और ये चिमटा ले ले मेरा,

‘मेरा तो दिमाग फेल हो गया है।’ रघुनाथ अपने माथे को रगड़ते हुए बोला।

‘तुम जल्दी से यहां से फूट जाओ। कहीं मेरा दिमाग भी फेल नहीं कर देना।’

‘तुम तो दुनिया के अन्यतम बुद्धिमान व्यक्तियों में से एक हो।’ रघुनाथ बोला ‘कोई निष्कर्ष निकालो ना।’

‘पहले मैं तुम्हें यहां से निकाल लूं, फिर निष्कर्ष निकालूंगा।’

‘क्या मतलब?’

‘मतलब यह कि मुझे तुम्हारे सामने निष्कर्ष निकालते हुए शर्म आती है।’ विजय ने अजीब ढंग से शर्माने की चेष्टा करते हुए कहा।
 
‘तो तुमने मुझे बुलाया क्यों था?’

‘अबे गलती हो गई बाबा। माफ कर दो। ‘विजय ने हाथ जोड़ कर कहा- ‘अब जाओ ना।’

रघुनाथ मुस्कराता हुआ चला गया।

(2)

शाम तक बात काफी फैल चुकी थी बिल्कुल आग की भाँति। प्रत्येक की जबान पर यही रहस्यमय घटना थी। सीक्रेट सर्विस के समस्त सदस्य विजय से इस सम्बन्ध में पूछताछ कर चुके थे। लेकिन विजय स्वयं ही कुछ नहीं जानता था। उन्हें क्या बताता।

यद्यपि उसके पश्चात और कोई घटना नहीं हुई थी। लेकिन फिर भी विजय इसी के सम्बन्ध में सोच सोचकर परेशान था। इस मामले की तह तक पहुंचने के लिए उसे कोई हल नहीं सुझाई दे रहा था।

जिस रोज रमण ने आत्महत्या की थी उसी दिन शाम को सूरज छुपने के बाद एक व्यक्ति और वहां आया। विजय उस समय लान में ही टहल रहा था। वह व्यक्ति सीधा उसकी ओर बढ़ता चला आया। यद्यपि अन्धेरा हो चुका था लेकिन इतना नहीं कि वह परिचित और अपरिचित को भी न पहचान सके। वह व्यक्ति उसके लिए बिल्कुल अपरिचित था।

विजय की आंखें उसी व्यक्ति को घूर रही थी। बिल्कुल इस प्रकार जैसे उसे अभी उससे किसी विशेष प्रकार की हरकत की आशा हो। लेकिन उसने कोई ऐसी वैसी हरकत नहीं की और सीधा उसके निकट आकर इंग्लिश में बोला-‘क्षमा कीजियेगा मुझे मिस्टर विजय से मिलना है।’

‘तो इसमें क्षमा करने की कौन सी बात है?’ विजय भी इंग्लिश में बोला। वह पहचान गया था कि यह व्यक्ति को विदेशी ही है।

‘कोई बात नहीं है।’ वह व्यक्ति लापरवाही से बोला- ‘मैंने तो ऐसे ही कह दिया था मेरा नाम गेन्मार्ड है और मैं पेरिस पुलिस के गुप्तचर विभाग में इंस्पेक्टर हूं।’

कहते हुए गेन्मार्ड ने अपनी जेब से एक कार्ड निकाल कर विजय की ओर बढ़ा दिया।

विजय कार्ड लेते हुए बोला- ‘मुझे विजय कहते हैं और मैं इस कोठी का मालिक हूं। फिलहाल मेरे पास कोई कार्ड नहीं है जो मैं आपको पेश सकूं। वैसे यह कार्ड देने का तरीका बिल्कुल गलत है।’

‘क्यों?’

‘आप यह सोचिये कि कार्ड एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को क्यों देता है। केवल इसलिए कि दूसरे को पहले के सम्बन्ध में कुछ जानकारी प्राप्त हो जाये।’ विजय बोला- ‘यह जानकारी आप मुझे दे ही चुके हैं। मेरा मलतब है कि आप मुझे अपने सम्बन्ध में पूरी तरह बता चुके है। फिर आपने मुझे कार्ड क्यों दिया? क्या आप अपने सम्बन्ध में झूठ बोल रहे हैं जो आपने विश्वास दिलाने के लिए गवाह के रूप में यह कार्ड दिया है।’

गेन्मार्ड मुस्कराता रहा। जब विजय अपनी बात पूरी कर चुका तो वह बोला- ‘आप तो काफी तार्किक है।’

‘काफी तो मैं कुछ भी नहीं हूं।’ विजय बोला- ‘लेकिन आप यह बताइये कि आप यहां करने आये हैं।’

‘दरअसल मैंने आपके नाम के समाचार पत्र में आज की घटना के सम्बन्ध में पढ़ा है और उसको पढ़ने के बाद...’

‘आप भी यहां आ गये हैं ताकि उसी व्यक्ति की भांति आप भी आत्महत्या कर लें। देखिये मिस्टर गेन्मार्ड।’ विजय उसे समझाने के से ढंग में बोला- ‘यह तो मेरी कोठी है ना। इसे मैंने अपने रहने के लिए खरीदा है। इसलिए नहीं कि बाहर के लोग इसे आत्महत्या करने का स्थान समझकर धड़ाधड़ आना आरम्भ कर दें।’

‘आपको वह गलतफहमी कैसे हुई है कि मैं यहां पर आत्महत्या करने आया हूं।’

‘आज के समाचार पत्र को पढ़ कर ही वह महाशय भी मुझ से मिलने के लिए आये थे।’ विजय बोला- ‘आप भी समाचार पत्र ही पढ़कर आये हैं। यानि कि उसने भी समाचार पत्र पढ़ा आपने भी पढ़ा। पढ़ने के बाद वह भी यहां आया था और आप भी सीधे यहीं आये हैं। अब बाकी क्या बचा है। त्रिकोण की अगर दो भुजायें बराबर हो जायें तो तीसरी को जबर्दस्ती बराबर होना पड़ेगा।’

‘आप निश्चिन्त रहिए। मैं आत्महत्या नहीं करूंगा।’ गेन्मार्ड मुस्करा कर बोला।

‘आप आत्महत्या करिये और बड़े शौक से करिये। आपके आत्महत्या करने से मुझे कोई आपत्ति नहीं है।’ विजय बोला-‘लेकिन मेरे हाल पर इतनी मेहरबानी अवश्य कीजिए कि मेरी कोठी के अहाते में आत्महत्या न करियेगा।’

‘नहीं करूंगा।’ गेन्मार्ड ने उत्तर दिया-‘लेकिन क्या आप मुझे यहीं खड़ा रखेंगे?’

‘तो आप राष्ट्रीय संग्रहालय में खड़ा होना पसन्द करते हैं।’ विजय बोला- ‘अगर ऐसी बात है तो बता दीजिए। मैं आपके लिए कोशिश अवश्य कर सकता हूं।’

‘जी हाँ लेकिन इस बात का ध्यान अवश्य रखियेगा कि कहीं ऐसा न हो कि आप मुझे राष्ट्रीय संग्रहालय में पहुंचाने की चेष्टा करते करते स्वयं ही वहां न पहुंच जायें। क्योंकि आपको देखते ही संग्रहालय वाले सोचेंगे कि आप जैसी अजूबा चीज को तो वहां अवश्य होना चाहिए।’

‘वैसे आपको यहां कौन सी चुम्बकीय शक्ति खींच लाई है?’

‘क्या आप भूल गये कि मैं एक जासूस हूँ।’ गेन्मार्ड बोला- ‘मैं भारत भ्रमण के लिए आया हूं। वैसे तो मैं छुट्टी पर हूं लेकिन आज के समाचार पत्र में यह रहस्मय घटना पढ़कर मेरा जासूस दिल उत्सुक हो उठा। इस मामले को हल करने के लिए ही मैं यहां आया हूं ताकि इसकी वास्तविकता से परिचित हो सकूं।’

‘तो आइये इंस्पेक्टर साहब।’ विजय बोला- ‘किसी होटल में चल कर बैठते हैं।’

‘क्या आप मुझे अपने मकान में नहीं घुसने देंगे?’ गेन्मार्ड ने मुस्कुरा कर पूछा।

‘नहीं मकान आपके सामने हाजिर है। अगर आप भूखा रह कर या मकान खाकर निर्वाह कर सकते हैं, तो ठीक है।’

‘क्या मतलब?’

‘मतलब साफ है कि यहां आपको खाने के लिए कुछ नहीं मिलेगा।’

‘ओह।’

‘आप भारत आये हैं। हमारे अतिथि हैं। इसलिए आपका अतिथि सत्कार करना हमारा कर्त्तव्य है।’

विजय उसके साथ कोठी से बाहर निकल आया और दोनों टैक्सी में बैठ कर होटल डी-गारिका की ओर चल पड़े। वहां दोनों ने खाना खाया और दोनों काफी देर तक बातें करते रहे।

जिस समय रात को दोनों विदा हुए तो काफी बेतकल्लुफ हो चुके थे। गेन्मार्ड कल फिर आने का वायदा करके विजय से विदा हो गया।
 
(3)

उसी रात की बात है।

शहर के प्रसिद्ध उद्योगपतियों में से एक ठाकुर जयसिंह भी थे। बहुत ही सुन्दर और स्वस्थ व्यक्ति। अपनी कोठी के एक कमरे में जयसिंह अपने मैनेजर के साथ बैठा हुआ अपने महीने भर के हिसाब किताब की जाँच पड़ताल कर रहा था कि तभी नौकर ने एक कार्ड लाकर उसके हाथ में दिया।

जयिंसह ने कार्ड पढ़ा और फिर मैनेजर की ओर देखकर कुटिलता भरी मुस्कान के साथ बोला- ‘वह आ गया है।’

‘मुझे भी यही आशा थी।’ मैनेजर फाइल बंद करता हुआ बोला- ‘आओ उससे मिल लें।’ जयिंसह बोला और कमरे के बाहर निकल गया। मैनेजर भी अपनी जेब पर हाथ माारता हुआ उसके पीछे चल दिया। जेब में रिवाल्वर रखा हुआ था।

जिस समय जयसिंह ड्राईंग रूम में पहुंचा तो एक व्यक्ति को खड़े पाया। जयिंसह उसे देखकर बोला-‘तुम आ ही गये।’

‘क्यों न आता।’ वह व्यक्ति गुर्राया।

‘च...च...च...,’ जयसिंह उसका मजाक उड़ाने के से ढंग में बोला ‘इस तरह गुर्राने से गला खराब हो जाता है।’ बैठो और शांत चित्त से बात करो।

‘तुम मेरा मजाक उड़ाना चाहते हो?’ वह व्यक्ति उसी स्वर में बोला।

‘तुम गलत समझे।’

‘देखा ठाकुर।’ वह व्यक्ति शान्त स्वर में बोला-‘पन्द्रह हजार रुपए मेरे हवाले कर दो।’

‘किस प्रसन्नता में।’

‘अपनी पत्नी के प्रेम पत्रों के बदले में।’

‘कैसे प्रेम पत्र?’ जयसिंह ने अनजान बनते हुये कहा।

‘वही जो तुम उस कोठी में से निकाल लाये थे?’

‘तुमने तो मुझे नहीं दिये।’

‘लेकिन तुम उन्हें मेरे कब्जे में से तो निकाल लाये हो।’

‘मूर्ख न बनो चन्दन।’ जयसिंह बुरा सा मुंह बनाकर बोला-‘छीनी हुई चीज पर से अधिकार समाप्त हो जाता है। अगर बुरा न माना तो एक सलाह दूं।’

‘कैसी सलाह।’

‘यही कि तुम भी अपने छोटे भाई रमण का अनुकरण करो।’

‘क्या मतलब।’

‘मतलब साफ है।’ जयसिंह लापरवाही से बोला- ‘जब रमण उस कोठी में गया और उसने वह स्थान खाली पाया तो मारे ग्लानि के आत्म हत्या कर बैठा। वह शर्मदार था मर गया। लेकिन तुम बेशर्म हो जो अभी तक जीवित हो।’

चन्दन जयसिंह को घूरता रहा।

‘जब मैंने तुम से वह पत्र मांगे थे तो तुमने मुझे से पचास हजार रु- मांगे थे। मैं तुम्हें पन्द्रह हजार रुपये तक देने के लिए तैयार था। लेकिन तुम टस से मस न हुए। और जब मैंने यह कहा था कहीं ऐसा न हो कि मैं यह पत्र बिना कुछ दिये ही वसूल कर लूंगा...’

‘जानते हो तुम ने क्या कहा था। तुम दोनों भाइयों ने कहा था कि जिस दिन ऐसा होगा हम दोनों भाई आत्महत्या कर लेंगे। अब ऐसा हो चुका है प्यारे। एक तो बात का धनी निकला और उसने आत्महत्या कर ली है। लेकिन तुम बड़े बेशर्म हो। देखो यह रहा पत्रों का पैकेट। अब तुम भी आत्म हत्या कर लो।’

चन्दन ने बिना कुछ सोचे समझे ही जयसिंह के उस हाथ पर छलांग लगा दी जिसमें कि वह पत्रों का पैकेट पकड़े खड़ा था। पैकेट उसने जेब से निकाला था। जयसिंह को इस बात की आशा नहीं थी कि पैकेट उसके हाथ से छूटकर चन्दन के हाथ में पहुंच जाएगा।

दरवाजे की आड़ में खड़े मैनेजर ने चन्दर पर फायर किया। लेकिन कुर्सी से एक ओर को लुड़क कर चन्दन अपने आप को बचा गया। फिर इससे पहले कि मैनेजर दूसरा फायर कर पाता। चन्दन ने अपनी जेब से रिवाल्वर निकाल कर मैनेजर पर फायर कर दिया।

मैनेजर के सिर का कोना बाहर को निकला हुआ था। गोली उसकी आँख में घुसती चली गई। एक चीख मैनेजर के गले से निकली और वह अपनी आँख पकड़ कर तड़पने लगा। उसकी आँख से बुरी तरह खून बहने लगा था। जयसिंह भौंचक्का सा रह गया। यद्यपि वह कुछ कर न सकने की हालत में था लेकिन फिर भी चन्दन फर्श पर से उठता हुआ बोला- ‘हिलने की कोशिश न करना जयसिंह। केवल मूंछें रख लेने से पुरुष में पौरुष नहीं आ सकता।’

‘चन्दन।’ जयसिंह आग्नेय नेत्रें से चन्दन को घूरता हुआ बोला।

‘चाहूं तो तुम्हें भी यहीं समाप्त कर दूं। लेकिन नहीं मैं तुम्हें जीवित रखूंगा ताकि तुम अपनी प्रेममयी पत्नी के प्रेम पत्रों को समाचार पत्रों में प्रकाशित देख सको और उन्हें बड़े आराम से पढ सको।’

चन्दन बोला और पीछे हटने लगा। जयसिंह ने हिलने की चेष्टा की लेकिन चन्दन ने उसे फिर धमकी दी- ‘यह मत समझना कि अगर मैं तुम्हें जान से नहीं मारूंगा तो तुम बच ही जाओगे। मैं तुम पर गोली ही नहीं चलाऊंगा। इस भ्रम में मत रहना। अगर मैं तुम्हें जान से नहीं मारूंगा तो घायल तो अवश्य ही कर दूंगा।’

बाहर से भागते हुए कदमों की आहट सुनाई दी। एक छलांग में ही चन्दन कमरे से बाहर था। जयसिंह का मुंह काला हो गया था। अपमान, आत्मग्लानि अपनी निर्बलता एवं विवशता के कारण केवल उसके होंठ ही हिले थे। उसका समस्त शरीर जड़वत था। उसको इतना भी होश नहीं था कि उसका मैनेजर उससे कुछ फासले पर ही पीड़ा से तड़प रहा है। उसे उसकी सहायता करनी चाहिए।

फायरों की आवाज काफी देर तक फैली थी लेकिन भागते हुए केवल कोठी के नौकर ही आये थे।

‘क्या हुआ...मालिक क्या हुआ?’ भागकर आये हुए नौकरों से एक ने जो कि काफी वृद्ध था जयसिंह से पूछा।

‘कुछ नहीं...तुम सब दफा हो जाओ।’ जयसिंह अपने मुंह को हाथों से छिपा कर भर्राये स्वर में बोला- ‘तुम सब चले जाओ...मैं कहता हूँ चले जाओ...।’

अन्तिम शब्द वह इतनी जोर से चीख कर बोला था कि उसको खांसी हो गई थी। और वह छाती पकड़ कर खांसने लगा। दृश्य कुछ इस प्रकार था जैसे किसी फिल्म का ट्रैजिक सीन ही हो। मैनेजर कुछ दूरी पर पड़ा हुआ हाय हाय कर रहा था। उसका सारा मुंह समस्त कपड़े यहां तक कि बाल भी उसकी आंख से बहने वाले खून से भर गये थे। पीड़ा के मारे उसका बुरा हाल था। मगर उसका बस चलता तो वह उस भाग को जहां की आंख में गोली लगी थी, नोंच कर फेंक देता।

‘मालिक...इस मनीजर साब हो का होगिवा।’ वृद्ध नौकर ने मैनेजर की ओर देखते हुए जयसिंह से पूछा।

‘ओह...हां...’ जयसिंह जैसे चाक कर बोला-‘तुम इन्हें पलंग पर लिटाओ, मैं डॉक्टर को फोन करता हूं।’
 
जयसिंह की कोठी से बाहर भागने में चन्दन को कोई कठिनाई नहीं हुई क्योंकि वह कोठी से बाहर निकलने की बजाय कोठी की पिछवाड़े चार दीवारी के निकट ही खड़े हुए एक बड़े से पेड़ पर चढ़ गया था। उसका ख्याल था कि उसका पीछा किया जायेगा। इसलिए वह उस पर चढ़ गया था। क्योंकि अन्धेरे में वह अपने आपको पत्तों के अन्दर अच्छी तरह से छुपा सकता था। मगर पीछा किया जाता तो वह लोग उसे बाहर की सड़कों पर ही ढूंढते किसी को यह ख्याल भी नहीं हो सकता था कि वह वहीं पेड़ पर चढ़ा बैठा था।

लेकिन इसका पीछा नहीं किया जा रहा है, इस बात से निश्चिन्त होकर वह बड़ी सावधानी से पेड़ की सबसे निचली डाल पर आया और फिर वहां से वह चार दीवारी के बाहर कूद गया। पत्रों का पैकेट और रिवाल्वर वह पहले ही जेब में रख चुका था।

‘मुझे तुम्हारी ही प्रतीक्षा थी।’

जैसे ही चन्दन नीचे कूदा था, उसके कानों में यह शब्द सुनाई दिये। चन्दन चौंक कर पलटा। एक आदमी चार दीवारी के साथ पीठ टिकाये हुए बड़े ही नाटकीय पोज बनाये खड़ा था।

‘कौन हो तुम?’ चन्दन अपना हाथ जेब की ओर से जाता हुआ बोला।

‘बुरी बात।’ वह व्यक्ति हाथ उठाकर रोकता हुआ बोला- ‘मैं तुमसे मित्रतापूर्ण ढंग से बात कर रहा हूं और तुम अपनी जेब से रिवाल्वर निकालने जा रहे हो? क्या करोगे? मुझे जान से मार दोगो?

उस व्यक्ति के इन शब्दों ने चन्दन को निरुत्तर सा कर दिया लेकिन फिर भी वह बोला- ‘कौन हो तुम?’

‘यही बात तुम अभी कुछ देर पहले ही पूछ चुके हो।’ वह व्यक्ति बोला- ‘मैं तुम्हें सब कुछ तो नहीं लेकिन इतना अवश्य बता दूंगा कि मेरा नाम अलफांसे है।’

‘क्या कहते हो?’

‘कुछ नहीं। दो चार मीठी बातें करना चाहता हूं।’

‘रहस्यपूर्ण ढंग से बात करने की अपेक्षा अगर तुम स्पष्ट रूप से बात करो तो अधिक उपयुक्त होगा।’

‘हर बात अधिक उपयुक्त नहीं होती।’ अलफांसे बोला-‘मेरा ख्याल है अब तुम सीधे अपने घर जाना ही पसन्द करोगे।’

चन्दन ने उसे घूरते हुये गरदन हिला दी।

‘आओ मैं तुम्हें छोड़ आऊं।’ अलफांसे बोला-‘वह रही मेरी कार।’

चन्दन अलफांसे के साथ कार की ओर बढ़ गया। उसकी समझ में नहीं आया कि यह रहस्यमय व्यक्ति उससे चाहता क्या है। वह कार में अगली सीट पर ही बैठ गया। अलपफ़ांसे कार ड्राईव कर रहा था।

‘तुमने मुझ से मेरे घर का पता तो पूछा ही नहीं है।’ चन्दन बोला।

‘मुझे मालूम है।’ अलफांसे शांत स्वर में बोला।

‘क्या मतलब?’

‘मैंने कोई ऐसी बात नहीं कही है जिससे तुम चौंक पड़ो। सीधी सी बात है कि मुझे तुम्हारे मकान का पता मालूम है। इसलिए पूछने का प्रश्न ही नहीं उठता।’

‘तुम्हारे शब्दों में मुझे चालाकी की बू आ रही है।’ चन्दन अपनी जेब से रिवाल्वर निकालकर अलफांसे की पसलियों से सटाते हुए बोला।

‘तो अब तुम क्या चाहते हो?’

‘कार रोक दो।’

‘क्यों?’

‘मुझ से चालाकी खेलने की चेष्टा न करो। कार रोक दो।’

‘और अगर मैं कार न रोकूं तो?’ अलफांसे ने अजीब ढंग से मुस्कराते हुए पूछा।

‘तो मैं तुम्हें गोली मार दूंगा।’

‘फिर क्या होगा?’ अलफांसे ने इस प्रकार पूछा जैसे गोली लग जाने से कोई अन्दर नहीं पड़ेगा।

‘तुम अच्छी तरह जानते हो कि फिर क्या होगा?’

‘नहीं तुम ही बता दो। मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं कि अगर तुमने मुझे गोली मार दी तो फिर क्या होगा?’ अलफांसे उसकी ओर देखे बिना बोला।

चन्दन खामोश रहा।

‘तुमने बताया नहीं।’ अलफांसे ने कार को मोड़ते हुए कहा। मोड़ पर कार की गति धीमी हो गई थी। चन्दन को सुनहरी अवसर मिला। वह दरवाजा खोल कर बाहर कूद गया। साथ ही उसने ट्रिगर भी दबा दिया।

चन्दन अभी फुटपाथ पर से उठ भी नहीं पाया था कि उसने अलफांसे को अपने सामने खड़ा पाया। जो कि तुरन्त कार रोक कर उतर आया था। चन्दन के लिए यह आश्चर्यजनक फुर्तीला कार्य था।

‘मुझे अफसोस है मेरे दोस्त कि मैं तुम्हें यह बताना भूल गया था कि तुम्हारा रिवाल्वर खाली है।’ अलफांसे अपनी जेब से गोलियां निकाल कर उसी ओर बढ़ाता हुआ बोला- ‘यह लो अपनी पांचों गोलियां।’

चन्दन फटी सी आंखों से अलफांसे के हाथ को देखता रहा। जिसमें रिवाल्वर की पाँचों गोलियां थीं। फिर उसने अपना रिवाल्वर खोलकर देखा और वास्तव में उसे खाली पाया।

‘व...व्व वास्तव में यह तो खाली है।’ चन्दन आश्चर्यमय स्वर में बोला।

‘कोई बात नहीं है।’ अलफांसे उसे इस प्रकार पुचकारता हुआ बोला जैसे किसी हठी बच्चे को बहला रहा हो- ‘तुम इसमें दुबारा गोलियां भरकर मुझ पर फायर कर सकते हो।’

इस एक कार्य ने ही चन्दन की सारी बुद्धि हवा कर दी थी। वह हकलाये हुए स्वर में बोला-‘लेकिन...लेकिन तुमने यह निकाली किस समय।’

‘क्या करोगे यह जानकर।’ अलफांसे उसकी बात को टालता हुआ बोला-‘आओ बैठो कार में, मैं तुम्हें तुम्हारे घर पहुंचा दूं।’

चन्दन कुछ नहीं बोला। वह अलफांसे से इतना प्रभावित हो गया था कि उसके सामने कुछ बोल भी नहीं सकता था। वह खामोशी से कार में बैठ गया। अलफांसे ने फिर कार स्टार्ट कर दी।

कुछ देर तक कार में खामोशी छाई रही। फिर अलफांसे ने ही उस सन्नाटे के साम्राज्य को तोड़ा।

‘जयसिंह की पत्नी के प्रेम पत्रों का अब तुम क्या करोगे।’

‘प्रेम पत्रों के सम्बन्ध में तुम क्या जानो?’ चन्दन फिर चौंकता हुआ बोला।

‘मैं क्या नहीं जानता?’ अलफांसे लापरवाही से बोला।

‘लेकिन तुम्हें उन प्रेम पत्रों के सम्बन्ध में कैसे मालूम है?’

‘यह रहस्य जान लेने के बाद तुम्हारे स्वास्थ्य में कोई अन्तर नहीं पड़ पायेगा।’

‘लेकिन...’

‘लेकिन वेकिन कुछ नहीं।’ अलफांसे उसे रोकता हुआ बोला- ‘जो कुछ मैंने पूछा है उसका उत्तर दो।’

चन्दन कुछ देर सोचता रहा।

‘क्या सोच रहे हो?’ अलफांसे ने उसकी ओर नजर फेर कर कहा।

‘यही कि मैं तुम्हें इस सम्बन्ध में बताऊं अथवा नहीं?’

‘यह क्या मूर्खतापूर्ण बात सोच रहे हो?’ अलफांसे बुरा सा मुख बनाकर बोला-‘कुछ देर सवेर से मुझे मालूम तो हो ही जायेगा। वैसे मैं अपने अनुमान के अनुसार तुम्हें बता भी सकता हूँ कि तुम्हारा क्या करने का विचार है?’

चन्दर ने केवल प्रश्न पूर्ण दृष्टि से उसकी ओर देखा वह मुंह से कुछ नहीं बोला।

‘इन प्रेम पत्रों को अपने कब्जे में रखकर तुम एक बार फिर जयसिंह से सम्बन्ध स्थापित करोगे। उसे धमकी दोगे कि या तो वह तुम्हें तुम्हारी इच्छित रकम उन प्रेम पत्रों के बदले दे दे या फिर तुम उन प्रेम पत्रों को प्रकाशित कर दोगे। वह अगर तुम्हें तुम्हारी इच्छित रकम दे देता है तो तुम उन प्रेम पत्रों को उसे दे दोगे। अन्यथा प्रकाशित कर दोगे।’

‘यह बात तो कोई मूर्ख व्यक्ति भी कह सकता है।’

‘वैसे तुम यही करोगे ना?’

‘और इसके अतिरिक्त कोई चारा भी तो नहीं है।’

‘यही तो तुम्हारी मूर्खता है।’ अलफांसे ने कार रोकते हुए कहा। क्योेकि चन्दन का मकान आ चुका था।

‘क्या मतलब?’

‘मतलब अन्दर समझाऊंगा।’ अलफांसे कार से उतरता हुआ बोला।

फुटपाथ के निकट ही कुछ सीढ़ियाँ चढ़ने के उपरान्त चन्दन के मकान का दरवाजा था। चन्दन अलफांसे से काफी प्रभावित हो चुका था। उसके बात करने का ढंग, चाल ढाल, व्यक्तित्व सभी कुछ तो प्रभावशाली था। वह उसी के सम्बन्ध में सोच रहा था कि तभी उसके मस्तिष्क में एक विचार उभरा।

‘तुम्हारा नाम अलफांसे है?’ उसने पूछा।

‘यकायक तुम्हें मेरे नाम से दिलचस्पी कैसे हो गई?’

‘नाम से तो तुम भारतीय नहीं लगते?’ चन्दन ने उसके शब्दों पर ध्यान दिए बिना ही कहा।

‘तो इससे क्या होता?’

‘फिर तुम इतनी अच्छी हिन्दी कैसे बोल रहे हो। तुम्हारे बोलने के ढंग से तो ऐसा लग रहा है जैसे तुम यहीं पैदा हुए हो।’

‘क्या किसी विदेशी को इतनी अच्छी हिन्दी बोलने का अधिकार नहीं है?’

‘नहीं यह बात नहीं है?’ चन्दन कुछ उत्तर न दे पाया।

‘फिर कोई बात नहीं है।’ अलफांसे उसे खामोश करता हुआ बोला- ‘तुम दरवाजा खोलो।’

जेब से ताली निकाल कर चन्दन ने दरवाजा खोला। दोनों अन्दर प्रविष्ट हो गए। अन्दर जाकर उन्होंने फिर दरवाजा बन्द कर लिया। लेकिन उससे पहले स्विच दबाकर चन्दन ने एक मरकरी टयूब जला ली जिसके दूधिया प्रकाश से कमरा सफेद रोशनी से भर गया।
 
‘बैठ जाओ।’ अलफांसे स्वयं में ही वही एक कुर्सी पर बैठकर चन्दन को पलंग पर बैठने का संकेत करता हुआ बोला- ‘ढंग बिल्कुल ऐसा था जैसे इस मकान का वह मालिक है और चन्दन कहीं बाहर से उससे बात करने के लिए आया है।’

चन्दन बैठ गया।

‘हां। तो हम अपने भूले हुए विषय को फिर याद कर लें।’ अलफांसे ने स्वयं ही बात आरम्भ करते हुए कहा- ‘तुम्हारा विचार उन प्रेम पत्रों के साथ यही करने का है ताकि अगर जयसिंह ने तुम्हें पचास हजार रु- दे दिये तो तुम यह प्रेम पत्र उसे लौटा दोगे। अन्यथा तुम इन्हें प्रकाशित करवा दोगे।’

‘मैं फिर अपने उन्हीं शब्दों को दोहराता हूं कि इसके अतिरिक्त और कोई चारा भी क्या है?’ चन्दन बोला।

‘चारे तो बहुत हैं खाने वाला चाहिए।’ अलफांसे बोला-‘अगर मैं जयसिंह के स्थान पर होता तो मैं तुम्हें इन प्रेम पत्रों के बदल में एक नया पैसा भी देने को तैयार न होता।’

‘क्या मतलब?’ चन्दन चौंका।

‘मतलब यह कि अगर तुम वह प्रेम पत्र मुझे मुफ्त में दे देते तब तो ठीक था। अन्यथा अगर तुम उनके बदले में कुछ रकम भी माँगते तो मैं तुम्हें स्पष्ट धत्ता बता देता।

‘चाहे मैं उन्हें प्रकाशित ही क्यों न करवा देता।’

‘अगर तुम उन्हें प्रकाशित करवा देते तो मैं तुम पर मान हानि का दावा कर देता।

‘जब ये प्रेम पत्र’ चन्दन अपनी उस जेब को थपथपाता हुआ बोला जिसमें कि प्रेम पत्र रखे हुए थे- ‘प्रमाण के रूप में होते तो तुम मेरा कुछ भी न कर पाते। बल्कि स्वयं तुम्हारा ही अपमान होता।’

‘मेरा कुछ भी न होता। बल्कि उल्टे तुम और अधिक फंस जाते।’ अलफांसे शान्त स्वर में बोला।

‘वह कैसे?’

‘एक प्रेम पत्र मुझे निकाल कर दो।

चन्दन शँकित हो उठा और संदिग्ध दृष्टि से अलफांसे को घूरता हुआ बोला- ‘ क्या तुम मुझे मूर्ख समझते हो।’

‘हां।’ अलफांसे ने बड़ी सज्जनता से उत्तर दिया।

चन्दन की समझ में नहीं आ रहा था कि यह आदमी है किस मिट्टी का बना हुआ। फिर भी वह बोला- ‘तुम यही चाहते हो ना कि जैसे ही मैं अपनी जेब से वह पत्रों का पैकेट निकालूं तुम तुरन्त उन पर झपट्टा मारकर छीन लो।’

‘अगर तुम्हारे मस्तिष्क में यही विचार है तो मैं तुम्हें मूर्ख ना कहूं तो क्या कहूं।’ अलफांसे बोला- ‘अरे मूर्ख व्यक्ति, अगर मुझे इन पत्रों को छीनना ही होता तो मैं तुम्हें घर तक पहुंचाने का कष्ट ही क्यों करता। मार्ग में ही छीन लेता।’

चन्दन फिर चकरा गया। लेकिन इन शब्दों का उस पर यह प्रभाव पड़ा कि उसने उस पैकेट में से एक कागज निकाल कर अलफांसे को दे दिया।

अलफांसे ने उस कागज को गौर से देखा और कहा- ‘अगर मैं जयसिंह की जगह होता तो इस कागज को देखकर कह देता कि यह मेरी पत्नी का लिखा हुआ नहीं है।’

‘क्या मतलब? क्या यह जयसिंह की पत्नी का लिखा हुआ नहीं है।’

‘है तो उसी लिखा हुआ। लेकिन मैं साबित कर सकता हूं कि यह उसका लिखा हुआ नहीं है।’

‘तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आ रही है।’

‘न आने दो।’

‘तुम कैसे साबित कर सकते हो कि यह पत्र जयसिंह की पत्नी का लिखा हुआ नहीं है।’

‘यह कहकर कि उसकी पत्नी की लिखाई की ऐसी नकल की गई है कि कोई नहीं कह सकता कि यह उसके हाथ का लिखा हुआ नहीं है। यहां तक कि कोई विशेेषज्ञ भी नहीं।’

‘ऐसा कभी नहीं हो सकता संसार का कोई भी व्यक्ति इतनी अच्छी तरह से नकल नहीं कर सकता कि कोई विशेषज्ञ भी न पहचान सके।’

‘मैं कर सकता हूं।’

‘वह कैसे?’

‘एक कोरा कागज दो।’

चन्दन ने साथ की अलमारी में से एक कापी निकाली और उसमें से एक सफेद कागज निकाल कर अलफांसे की ओर बढ़ा दिया। अलफांसे उस प्रेम पत्र वाले पैकेट में से दिए हुए कागज को बड़े ध्यान पूर्वक देखता रहा। वह कागज को बड़ी बारीकी से निरीक्षण कर रहा था। काफी देर तक उसकी आंखें कागज की लिखावट को देखती रही फिर वह चन्दन की ओर उस कागज को बढ़ाता हुआ बोला- ‘यह लो, अब तुम फिर अपने उसी पैकेट में रख लो।’

चन्दन न कागज ले लिया और अलफांसे के मांगने पर उसने अलमारी से वह कापी निकाल कर दे दी जिसमें से उसने कागज फाड़कर दिया था। अलफांसे ने कोरा कागज उस कापी पर रखा और जेब से पैन निकाल कर लिखना आरम्भ कर दिया।

चन्दन खामोशी से खड़ा हुआ उसकी प्रत्येक गतिविधि को देखता रहा। कुछ देर बाद ही अलफांसे ने वह कागज पूरा लिखकर उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा- ‘लो इसे देखो। क्या, तुम इसकी लिखावट में और उस प्रेम पत्र की लिखावट में कोई अन्तर निकाल सकते हो?’

चन्दन ने पैकेट में से फिर उस प्रेम पत्र निकाला और दोनों की लिखावट का मिलान करने लगा। यद्यपि वह लिखावट की पहचान का विशेषज्ञ नहीं था लेकिन फिर भी उसने काफी सूक्ष्मता से दोनों कागज की लिखावट को देखा और उन्हें एक जैसा ही पाया।

‘नहीं यह दोनों तो एक ही जैसे है।’

‘तुम तो क्या कोई विशेषज्ञ भी इनमें कोई अन्तर नहीं बता सकता।’ अलफांसे उसे प्रभावित करने वाले स्वर में बोला। चन्दन वास्तव में उससे प्रभावित हो गया। वह उसे एक असाधारण व्यक्ति समझने लगा था। अलफांसे के इस कार्य ने उसकी सारी अक्ल हवा कर दी थी और अब वह बिल्कुल बुद्धिहीन सा हो गया था।

‘मान लो तुमने यह प्रेम पत्र प्रकाशित करा दिए और जयसिंह ने मेरे करने पर तुम पर मान हानि का दावा कर दिया और तुमने प्रमाण के रूप में यह पत्र पेश कर दिए और मैंने वहीं अदालत में इस लिखाई की नकल करके दिखा दी तब तुम क्या करोगे? क्या तुम अपने ही जाल में उलझ कर नहीं रह जाओगे?’

‘लेकिन तुम ऐसा क्यों करोगे?’

‘अगर तुम मेरी इच्छानुसार काम नहीं करोगे तो मैं ऐसा ही करूंगा।’ अलफांसे उसके चेहरे की ओर देखता हुआ बोला।

‘तुम क्या चाहते हो?’ विवशता से स्वर में चन्दन पूछा।

‘मैं चाहता हूं कि मैं जयसिंह से इन प्रेम पत्रों के सम्बन्ध में बात करूंगा। वह जो भी अधिक से अधिक देने को तैयार हो इतने में ये पत्र उसे वापिस कर दिए जायेंगे। लेकिन इन पत्रों के बदले में जो भी रकम वह तुम्हें देगा उसका पच्चीस प्रतिशत तुम्हें मुझे देना होगा।’

‘मुझे स्वीकार है।’ चन्दन की हालत इस समय सांप छछून्दर जैसी हो गई थी। उसके पास अलफांसे की हर बात स्वीकर कर लेने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं था वह अलफांसे के सम्मुख बिल्कुल विवश था।

‘चलो यह फैसला तो काफी मित्रता पूर्ण ढंग से समाप्त हो गया।’ अलफांसे एक लम्बी सांस लेकर बोला- ‘मैं इसी के सम्बन्ध में तुम से बात करने आया था।’

चन्दन खामोश रहा।

‘अब केवल एक काम रह गया है। अलफांसे बोला- ‘लेकिन उसके सम्बन्ध में मैं फिर कभी बात करूंगा।’

‘दूसरा काम कौन सा।’

‘कह तो दिया कि उसके सम्बन्ध में फिर कभी बात करूंगा।’ अलफांसे खड़ा हो गया और चन्दन से बिना आवश्यक शिष्टाचार दिखाये ही कमरे के दरवाजे की ओर बढ़ गया। दरवाजे तक जाकर वह इस प्रकार रूका जैसे यकायक कोई भूली हुई बात याद आ गई हो।

वह चन्दन की ओर मुड़ता हुआ बोला-‘मेरी सलाह लिए बिना तुम कोई गलत कदम न उठाना। अन्यथा पछताओगे।’

चन्दन के उत्तर की चिन्ता किए बिना ही वह कमरे से बाहर निकल कर कार में आ बैठा। कार का रूख वापिस जयसिंह की कोठी की ओर था। जिस समय वह जयसिंह की कोठी पर पहुंचा तो एक पुलिस जीप वापिस जा रही थी। जयसिंह पुलिस इंस्पेक्टर को छोड़ने कम्पाउन्ड के गेट तक आया था।

वह मुड़कर कोठी की ओर जा ही रहा था कि अपने पीछे कार की आवाज सुनकर यह रूक गया। कार की हैड लाईटस का प्रकाश सीधा उस पर पड़ रहा था। वह अपनी आंखों को प्रकाश से बचाने की चेष्टा करता हुआ एक ओर को हट गया।

अलफांसे ने कार की हैडलाईटस बुझा दी और जयसिंह को सम्बोधित करता हुआ बोला- ‘मिस्टर जयसिंह?’

जयसिंह कार की खिड़की के निकट आ गया और शक्ल पहचानने की चेष्टा करता हुआ बोला- ‘फरमाइये?’

‘अब आपके मैनेजर की हालत कैसी है?’

‘खतरे से बाहर है। लेकिन आप कौन साहब हैं?’

‘जो भी साहब आप समझना चाहें समझ लीजिए।’ अलफांसे बोला’ ‘पुलिस को क्या आपने बुलाया था?

‘जी हां।’ जयसिंह आश्चर्य से बोला- ‘लेकिन आप हैं कौन? आप को इन सब बातों से क्या मतलब है?’

‘बहुत गहरा मतलब है।’ अलफांसे बोला- ‘क्या हम कोठी में बैठकर कुछ देर बातें नहीं कर सकते?’

अलफांसे ने कार को आगे बढ़ाकर कम्पाउन्ड में एक ओर को खड़ा कर दिया और फिर जयसिंह के साथ चलता हुआ ड्राईंग रूम में आ गया। सोफे पर बैठने से पूर्व उसने डाªईंग रूम का अच्छी तरह से निरीक्षण किया। फिर वह बैठता हुआ बोला- ‘मेरे साथ भी वहीं खेल तो नहीं खेला जा रहा है। जैसे तुमने चन्दन के साथ खेला है?’

‘कैसा खेल?’

‘यही कि किसी और व्यक्ति को तुमने रिवाल्वर समेत छुपाकर खड़ा कर दिया हो। जो कि अवसर देखते मुझे गोली मार दे।’

‘तुम्हारे दिल में यह विचार कैसे जागृत हुआ। क्या तुम कोई गलत काम कर रहे हो?’

‘नहीं।’

‘फिर तुमने ऐसा क्यों सोचा?’

‘क्योंकि तुम इससे पहले ऐसा कर चुके हो।’

‘तुम्हारा मतलब क्या है?’ जयसिंह संदेह से अपनी आंखें सिकोड़ता हुआ बोला।

अलफांसे ने देखा कि बात का रूख गलत दिशा की ओर मुड़ गया है। उसे अपनी गलती का तुरंत आभास हो गया और वह उसे सुधारता हुआ बोला- ‘खैर छोड़ो इन बातों को और हमें मतलब की बातें करनी चाहिए।’

‘मैंने तुम्हें मतलब की बातें न करने के लिए कब कहा है?’

अलफांसे पर जयसिंह की इन बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था वह कहने लगा कि उन प्रेम पत्रों के चक्कर में तुम्हारे मैनेजर की आंख भी चली गई और वे प्रेम पत्र भी तुम्हारे हाथ नहीं लगे।

‘तुम्हें उन प्रेम पत्रों के सम्बन्ध में क्या मालूम है?’

‘यह ठीक है कि पत्र तुम्हारी पत्नी के हैं। लेकिन उनके सम्बन्ध में इतनी जानकारी तुम्हें भी न होगी जितनी मुझे है।’ अलफांसे बोला- ‘खैर तुम यह बताओ कि क्या तुम उन्हें वापिस लेना चाहते हो?’

‘तुम हो कौन?’

‘मेरे क्या होने से तुम्हें लाभ हो सकता है? जो तुम कहो मैं वही हो आऊंगा।’

‘रात काफी बीत चुकी है और बेकार की बातों के लिए मेरे पास समय नहीं है।’ जयसिंह उखड़े हुए स्वर में बोला।

‘तब तुम यह चाहते हो कि चन्दन उन प्रेम पत्रों के बदले में तुमसे पचार हजार रुपये ही वसूल कर ले।

‘मैं उसे एक पाई भी नहीं दूंगा।’

‘भारत सरकार की प्रमाणिका मुद्रा में पाई नाम की कोई चीज नहीं है। अब नये पैसे चलते हैं।’ अलफांसे बोला- ‘वैसे तुम पचास हजार तो क्या एक लाख रुपये भी उन पत्रों के बदले में देने को तैयार हो जाओगे।’

‘किस प्रकार?’

‘मैं यह बता कर अभी अपनी योजना फेल नहीं करना चाहता।’ अलफांसे बोला- ‘मैं तुमसे काफी मित्रता पूर्ण ढंग से बात करना चाहता हूं। लेकिन...।’

‘लेकिन क्या?’

‘लेकिन खैर छोड़ो इसे।’ बात को स्वयं ही टालता हुआ बोला- ‘तुम उन पत्रों के बदले में पन्द्रह हजार रुपये देने को तैयार थे?’

‘बिल्कुल लेकिन अब नहीं दूंगा।’

‘और अगर मैं तुम्हें केवल दो हजार रुपये में वे पत्र वापिस दिलवा दूं तो कैसे रहे।’

‘जो चीज मुझे पन्द्रह हजार रुपये में नहीं मिल रही है। वह तुम दो हजार रुपये में कैसा दिलवा दोगो?’

‘दिलवा तो मैं मुफ्त में भी सकता हूं लेकिन मुझे भी अपनी मेहनत के बदले में कुछ चाहिए। दो हजार रुपये मैं अपने परिश्रम का मांग रहा हूं।’

‘वह किस प्रकार?’ अलफांसे के इन शब्दों ने जयसिंह का हृदय उत्सुकता से भर गया था।
 
अलफांसे ने उसे एक योजना समझाई और उसे सुनकर जयसिंह का हृदय फूल उठा। आँखें विश्वास और प्रसन्नता से चमचमाने लगी। प्रसन्नता के आवेग को छुपाने के लिए वह बार-बार अपने होठों पर जीभ फेरने लगा।

‘यह ठीक रहेगा।’ जयसिंह प्रसन्नता से बोला।

‘ठीक रहेगा ना।’ अलफांसे बोला- ‘माल हर समय तुम्हारे हाथ में ही रहेगा।’

‘लेकिन जो चीज मैं पन्द्रह हजार रुपये में प्राप्त करना चाहता हूं वह तुम दो हजार रुपये में ही वापिस दिलवाना क्यों चाहते हो?’

‘तो फिर कितने में वापिस दिलवाऊं?’

‘मेरा मतलब है कि...।’

‘मैं समझ गया हूं तुम्हारा मतलब?’ अलफांसे बोला-‘दरअसल मैं जर्मन हूं और प्रायवेट जासूस भी हूं। मैं भारत घूमने आया था। सोचता हूं इसी प्रकार अपना कुछ खर्चा निकाल लूं।’

‘तो तुम एक प्रायवेट जासूस हो?’ जयसिंह ने कुछ सोचते हुए कहा।

‘जी हाँ।’

जयसिंह किसी सोच में डूबा हुआ था। उसके मुख को देखकर इस बात का अनुमान लगाना बड़ा सहज था कि वह मानसिक संघर्ष में उलझा हुआ है। कुछ देर बात ही वह बोला- ‘अगर तुमने मेरा सारा काम सुलझा दिया तो मैं तुम्हें पांच हजार रुपये दूंगा।’

‘अवश्य सुलझा दूंगा।’ अलफांसे बोला-‘लेकिन उसके साथ ही तुम्हें उसके सम्बन्ध में जिसे कि तुम सुलझाना चाहते मुझे हो सब कुछ बताना होगा।’

‘मैं सब कुछ तुम्हें बता दूंगा।’ जयसिंह बोला-‘लेकिन क्या मैं तुम्हें भरोसे का आदमी समझ लूं?’

‘प्रायवेट जासूस भरोसे के आदमी ही हुआ करते हैं।’

‘हूं।’ जयसिंह कुछ देर सेाचता रहा फिर बोला- ‘मुझे बहुत दिन से तुम्हारे जैसे आदमी की तलाश थी। भारत में प्राइवेट जासूस नहीं होते और पुलिस से मैं सम्बन्ध स्थापित नहीं करना चाहता था इसीलिए...।’

‘मेरा ख्याल है कि व्यर्थ की भूमिका बांधने के बजाय अगर तुम मतलब की बात करो तो अधिक अच्छा होगा।’ अलफांसे उसके बीच में ही रोकता हुआ बोला- ‘क्योंकि रात काफी गहरी हो गई है।’

‘मैं तुम्हें संक्षेप में ही सब कुछ बताऊंगा।’ जयसिंह बोला- ‘दरअसल कुछ साल पहले चन्दन और रमण ये दोनों भाई मेरे यहां काम करते थे। उस समय मैं एक वैज्ञानिक को सहायता दे रहा था। जो कि एक आविष्कार करने में संलग्न था। यह आविष्कार वास्तव में अपने ढंग की एक अनोखी चीज होती। वह एक ऐसे वाहन का आविष्कार कर रहा था जो कि पानी के ऊपर, पानी के अन्दर, जमीन पर समान गति से चल सकता था। वह वैज्ञानिक जिसका नाम शील कुमार था। एक दूसरे मकान में जो कि मैंने उसके लिए किराये पर लिया था, काम करता था। लेकिन वह यहां आविष्कार करने के साथ-साथ अनजान बना रहा क्योंकि मेरे सामने वह अनोखा आविष्कार था। आखिर एक दिन वह अपने इस आविष्कार को बनाने में सफल हो गया। मैं जब उससे वह फार्मूला मांगने के लिए गया तो उसने स्पष्ट इन्कार कर दिया। वह बोला- ‘आपने जितना भी रुपया मेरे आविष्कार पर खर्च किया है उस सबका मेरे पास हिसाब है। कुछ समय पश्चात ही मैं आपको आपके खर्च किए हुए रुपये साढ़े बारह प्रतिशत ब्याज लगा कर वापिस कर दूंगा। वैसे मैं आपका कृतज्ञ हूं।’

मैं उसकी यह बात सुनकर आश्चर्य चकित रह गया। लेकिन मैं कर भी क्या सकता था। जब वह मुझसे विदा होकर जाने लगा तो मैंने रमण और चन्दन को उसके पीछे लगा दिया। उस समय वह दोनों मेरी दो विभिन्न मित्रें के मैनेजर थे। बस उस दिन के बाद से चन्दन और रमण दोंनो ही मुझसे सौदे बाजी करने लगे।

‘यानि कि उस वैज्ञानिक का फार्मूला उनके कब्जे में आ गया?’

‘बिल्कुल यही बात है।’

‘उस वैज्ञानिक का क्या हुआ?’

‘उसके बाद मुझे उसका कुछ पता नहीं चला।’

‘वैसे तुम उस कोठी के अन्दर से प्रेम पत्र कहां से निकाल कर लाये थे?’

‘यह मैं तुम्हें बाद में बताऊंगा।’

‘लेकिन यह तो बात दो कि प्रेम पत्र उस कोठी में पहुंचे कैसे?’

‘पहले रमण और चन्दन दोनों भाई उस कोठी के अन्दर रहते थे। मुझे किसी प्रकार पता चला कि इन दोनों भाईयों ने वह कोठी छोड़ दी है। लेकिन वे प्रेम पत्र और वह वैज्ञानिक फार्मूला अभी तक उस कोठी में ही है। कहां है यह भी मुझे मालूम हो गया था। मैं गया और मैंने उस स्थान को टटोला। प्रेम पत्र तो मुझे मिल गये लेकिन वह फार्मूला अभी तक नहीं मिला। लेकिन मुझे पूर्ण विश्वास है कि वह फार्मूला है उसी कोठी में।’

‘यह दोनों चीज तुम्हारे हवाले करने के मैं पांच हजार रुपये लूंगा।’ अलफांसे बोला।

‘मैं तुम्हारी मुंह मांगी रकम ही तुम्हें दूंगा।’

‘बस फिर तुम मेरी अगली सूचना की प्रतीक्षा करना।’ अलफांसे बोला- ‘मैं शीघ्र ही तुम से सम्बन्ध स्थापित करूंगा।’

जयसिंह उसे कोठी से बाहर तक विदा करने आया। कार में बैठने से पूर्व ही अलफांसे ने उससे एक प्रश्न किया- ‘तुम्हारी पत्नी कहां है?’

‘यहीं मेरी कोठी में ही है।’

‘क्या तुम्हें उससे अब कोई शिकायत नहीं है?’

‘मैं उससे शिकायत कर ही नहीं सकता।’

‘क्यों?’

‘क्योंकि मैंने चौथी बार शादी की है।’ जयसिंह एक लम्बी साँस लेकर बोला।

अलफांसे ने केवल इतना ही कहा और कार में बैठ गया।

(4)

गेन्मार्ड अपने वायदे के मुताबिक अगले दिन सुबह विजय की कोठी पर पहुंच गया था। विजय उसे देखते ही बोला- ‘हम तो पतिव्रता स्त्री की भांति तुम्हारा इन्तार कर रहे हैं और तुम हो कि ठुनकते हुए चले आ रहे हो।’

‘मैंने सोचा था कि शायद तुम अभी तक सो कर ही नहीं उठे होगे।’ गेन्मार्ड अपनी आदत के अनुसार मुस्करा कर बोला।

‘तुमने ऐसी घटिया बात सोची कैसे?’ विजय उसे घूरता हुआ बोला। एक ही रात में वे दोनों काफी बेतकल्लुफ हो गये थे।

‘लेकिन अब सोच चुका हूं। क्या किया जा सकता है?’ गेन्मार्ड लापरवाही से अपने कन्धों को झटका देता हुआ बोला’।

‘यह तुम्हारी जान को गालियां दे रहा है।’ विजय ने अपने निकट ही बैठे हुए एक छोटे से बच्चे की ओर संकेत करते हुए कहा।

‘कौन हैं ये?’

‘तुम्हारी औलाद नहीं है।’ विजय बुरा सा मुंह बनाकर बोला- ‘यह मैंने सुबह से अपने पास इसलिए बैठा रखा है कि तुम आओ तो मैं नाश्ता मंगाऊं। मगर तुम अब आ रहे हो।’

‘क्या तुमने अभी तक नाश्ता नहीं किया है?’

‘नहीं।’ विजय अपनी छाती ठोक कर बोंला। - ‘हम भारतीय हैं। अतिथि को खिलाये बिना कुछ नहीं खाते।’

‘ओह यह तो बहुत बुरा हुआ?’

‘क्यों बुरा हुआ?’ विजय उसे घूरते हुए बोला।

‘मतलब यह है कि मैं खाना खा आया हूं।’

‘क्या?’ विजय की आंखे आश्चर्य से फैल गई और वह भौंचक्का सा खड़ा रहा। यह दूसरी बात है कि गेन्मार्ड को यह जानने में कुछ देर नहीं लगी कि यह अभिनय कर रहा है।

‘तुम नाश्ता कर आये हो।’ विजय अजीब सी आंखें बनाता हुआ बोला।

‘हां’ गेन्मार्ड ने उत्तर दिया- ‘लेकिन मुझे क्या पता था कि तुम नाश्ते पर मेरी प्रतीक्षा करोगे।’

‘तो पता करना चाहिये ना।’ विजय बोला- ‘फिर उसने एक पर्चा लिखकर उस लड़के को दिया। साथ मे एक अठन्नी भी दी। लड़का पर्चा और अठन्नी लेकर भागा चला गया।

‘रात तो आराम से बीती।’ गेन्मार्ड ने पूछा।

‘मैं भी क्या कोई आशिक हूं जो मेरी रात के आराम के बीतने में सन्देह किया जाये।’

‘मेरा मतलब है कि रात तो कोई वैसी रहस्यमय घटना नहीं घटी जैसे कि पहले घटी थी।’

‘नहीं रात तो आराम से बीती थी।’ विजय बोला- ‘रात कुछ नहीं हुआ था।’

‘उस आदमी की आत्म-हत्या करने के सम्बन्ध में कुछ पता चला।’ गेन्मार्ड ने अपनी जासूसी आरम्भ करते हुए कहा। वार्तालाप इंग्लिश में ही हो रहा था।

‘तुम इस मामले में बड़ी दिलचस्पी ले रहे हो?’

‘मैंने कल ही तुमसे कहा था कि एक पेशेवर जासूस ही हर उलझे हुए केस से दिलचस्पी होती है।’ गेन्मार्ड बोला- ‘तुमने कभी जासूसी नहीं की है। इसलिए इन बातों को नहीं समझ सकोगे।’

‘बेटा मेरे जैसे जासूसी तो तुम्हारे बाप ने भी नहीं की होगी।’ विजय हिन्दी में बड़बड़ाया।

‘क्या कहा तुमने?’

‘कुछ नहीं।’ विजय बात टालता हुआ बोला- ‘अपनी मातृभाषा में मैंने कहा कि तुम ठीक कह रहे हो। किसी साधारण नागरिक को जासूसी से क्या दिलचस्पी हो सकती है।’

‘जो बातें साधारण आदमी के लिए बेकार सी होती हैं।’ गेन्मार्ड अपनी तारीफ करते हुए कहा- ‘हम उन्हीं बेकार सी बातों से मामले की तह तक पहुंच जाते हैं। एक बार पेरिस में एक बहुमूल्य हार की चोरी का केस काफी चर्चा का विषय बन रहा था। बड़े-बड़े अनुभवी जासूसों ने उस केस को हल करने की कोशिश की लेकिन हल नहीं कर पाये। मैंने भी उस केस में हाथ डाला और उसे सुलझा कर रख दिया।’

‘अच्छा?’ विजय ने कृत्रिम आश्चर्य प्रगट किया।

‘हां।’ गेन्मार्ड ने सोफे पर पहलू बदलते हुए कहा- ‘केस तो बहुत लम्बा है लेकिन मैं तुम्हें संक्षिप्त करके सुनाता हूं।’

‘बिना सुनाये नहीं रह सकते क्या?’ विजय ने विवशतापूर्ण स्वर में पूछा।

‘अरे सुनो तो सही।’ गेन्मार्ड बोला और फिर बिना इसकी चिन्ता किये ही विजय सुन रहा हैं या नहीं, उसने उसे वह केस अपने शब्दों में सुनाना आरम्भ कर दिया- ‘केस इस प्रकार था मिसेज दुराय अपने पति मिस्टर दुराय के साथ रात को काफी देर के बाद एक पार्टी से लौटी। हमेशा की भांति उन्होंने अपना खानदानी बहुमूल्य हार पहन रखा था। पेरिस का एक जौहरी उस हार की कीमत सत्तर लाख फ्राँक देने के लिए तैयार था। लेकिन मिस्टर दुराय ने उसे नहीं बेचा। दोनों अपने सोने के कमरे में आये। मिसेज दुराय ने हार को उतारा। डिब्बे में बन्द करके अलमारी के अन्दर कपड़ों के नीचे उस डिब्बे को दबा कर रख दिया। दोनों ने अन्दर से दरवाजा बन्द किया और सो गये।’

‘क्या तुम वास्तव में इस केस को पूरा सुना कर ही दम लोगो?’ उसके जरा सा रुकते ही विजय ने पूछा।

‘बोर होने की आवश्यकता नहीं है।’ गेन्मार्ड बोला- ‘केस वास्तव में ही बड़ा मजेदार है। सुनते रहो। हां, तो मैं कह रहा था कि रात को मिसेज दुराय अपने उस बहुमूल्य हार को एक डिब्बे में बन्द करके अलमारी के अन्दर कपड़ों के नीचे दबाकर सो गये। दरवाजा उन्होंने अन्दर से बन्द कर लिया था। लेकिन जब उन्होंने सुबह उठकर उस अलमारी में हार को देखा तो हार गायब था। मिस्टर और मिसेज दुराय के पैरों के नीचे से जमीन निकल गई।’

‘तब तो वे धड़ाम से नीचे आ गिर होंगे?’

‘क्यों?’ गेन्मार्ड ने उसकी ओर प्रश्न भरी दृष्टि से देखते हुए पूछा।’

‘तुम्हीं ने तो कहा क इनके पैरों के नीचे से जमीन निकल गई।’ विजय ने बच्चों के से भोलेपन के साथ कहा।

‘ओह।’ गेन्मार्ड गरदन को झटका देता हुआ बोला- ‘यह तो मुहावरा है।’

‘अच्छा?’ विजय कृत्रिम आश्चर्य प्रकट करता हुआ बोला- ‘मुझे क्या पता था कि यह मुहावरा है। खैर, आगे सुनाओ आगे क्या हुआ?’
 
गेन्मार्ड ने उसे आगे कहानी सुनानी आरम्भ कर दी- ‘तो साहब, दोनों पति पत्नी बुरी तरह से घबरा गये। हार को अपने स्थान पर न पाकर उन्होंने दरवाजे की ओर देखा। लेकिन दरवाजा अन्दर बन्द था। उन्होंने खिड़की की ओर देखा जहां से कि किसी चोर के आने की सम्भावना हो सकती थी। तो खिड़की के दोनों दरवाजे हमेशा की भांति बन्द थे। खिड़की के आगे ही एक भारी अलमारी से जाकर ही टकराते थे। अब दरवाजों के बीच में खुल जाने के बावजूद भी इतनी जगह पैदा नहीं हो सकती थी कि कोई कबूतर भी उसमें से आसानी से गुजर जाये। आदमी की तो बात क्या? हां एक दरवाजा बन्द करके दूसरा खोल दिया जाए तो अंदर जाने के लिए कुछ जगह अवश्य हो जाती थी लेकिन इतनी नहीं कि कोई आदमी अंदर घुस सके। मिस्टर एन्ड मिसेज दुराय के कमरे के अंदर ही चोर की तलाश की लेकिन न चोर का ही कहीं पता चला न हार का। आखिर दोनों ने पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी।’

‘और फिर पुलिस आ गई।’ पुलिस ने पुछा।

‘हां, फिर पुलिस आ गई।’ गेन्मार्ड कहता गया ‘बड़े-बड़े धुरन्धर जासूस आये लेकिन कोई भी हार की चोरी का रहस्य न सुलझा सका।’

बेरा नाश्ता लेकर आ गया था। विजय ने उससे सामान मेज पर रखवा कर उसे वापिस भेज दिया।

‘क्या मैं काफी बनाना आरम्भ कर दूं?’ विजय ने उससे पूछा।

‘अवश्य?’ गेन्मार्ड बोला- इतनी देर में मैं तुम्हें इस केस का अन्तिम भाग भी सुनाये देता हूं। हां, तो पेरिस के बड़े-बड़े जासूसों ने इस केस को सुलझाने की चेष्टा की। लेकिन कोई भी नहीं सुलझा पाया और केस पैडिंग में डाल दिया गया। न जाने मेरे दिमाग में क्या आया कि मैंने इस केस को हल करने की सोची। मैंने केस का ध्यान पूर्वक अध्ययन किया और उस पर तहकीकात करनी आरम्भ कर दी और तुम्हे यह सुनकर आश्चर्य होगा कि जिस केस को पेरिस पुलिस के धुरंधर जासूस न सुलझा सके उसे मैंने एक सप्ताह में सुलझा कर रख दिया।’

‘अच्छा?’ विजय आश्चर्य के साथ बोला- ‘लेकिन मुझे आश्चर्य हो रहा है कि तुम्हारी इस बात पर मुझे आश्चर्य क्यों नहीं हुआ? वैसे तुमने इस केस को कैसे सुलझा दिया?’

‘मेरी तहकीकात की बातें तो बहुत लम्बी है और तुम उन्हें सुनने के मूड में ही नहीं हो। इसलिए मैं केवल तुम्हें इतना बता देना चाहता हूं कि चोर कौन था एक सात वर्ष का बच्चा?’

‘अएं?’ विजय ने कृत्रिम आश्चर्य प्रकट किया- ‘चोर एक सात वर्ष का बच्चा था?’

‘हां।’ गेन्मार्ड ने अपने शब्दों पर जोर देते हुए कहा- ‘चोर एक सीढ़ी के द्वारा उस खिड़की तक पहुंच गया था और वहां से उसने खिड़की में से एक बच्चे को सब कुछ समझा कर अंदर भेज दिया क्योंकि उस खिड़की के पलड़ों में से कोई आदमी अन्दर नहीं घुस सकता था। बच्चा अंदर गया और कमरे में से हार निकाल लाया।’

‘यह तो तुमने वास्तव में बड़ा भारी केस हल कर दिया।’ विजय जो कि गेन्मार्ड की यह कहानी सुनकर बुरी तरह बोर हो गया था बोला।

‘नहीं, कोई विशेष बात नहीं थी। यह तो जरा से समान्य ज्ञान की बात थी।’

‘तो क्या पेरिस के बड़े-बड़े जासूसों में सामान्य ज्ञान बिल्कुल भी नहीं है?’

गेन्मार्ड इसका कोई उत्तर नहीं दे पाया।

‘चलो अब तुम यह नाश्ता करो।’

‘लेकिन नाश्ता तो मैं करके आया हूं।’

‘तो इसे क्या तुम्हारा बाप करेगा।’

गेन्मार्ड जो के विजय से अच्छी तरह परिचित हो गया था, उसकी बात से जरा भी न झल्लाया। बल्कि मुस्कराता रहा। लेकिन विजय के जोर देने पर उसे भी नाश्ते में हाथ बंटाना ही पड़ा।

‘नाश्ते से निबट कर मैं तुम्हारी सारी कोठी देखना चाहूंगा।’ गेन्मार्ड के नाश्ते के बीच में ही विजय से कहा।

‘मेरी समझ में नही आता कि यह मेरी कोठी है अथवा ऐतिहासिक भवन।’ विजय नाश्ते में व्यस्त रहने के बावजूद भी बोला- ‘आखिर तुम क्यों इसे देखना चाहते हो।’

‘वह रहस्यमय आत्महत्या वाला केस सुलझाने के लिए मुझे तुम्हारी सारी कोठी देखनी ही पड़ेगी।’

‘अगर ऐसी ही बात है तो देख लो।’ विजय बोला- ‘अतिथि की इच्छाओं के आगे झुकना हम भारतियों का परम कर्त्तव्य है।’

नाश्ते से निबटने के बाद गेन्मार्ड विजय के साथ उसी कोठी देखने के लिए चल दिया। उसने कोठी का एक-एक कमरा बड़े गौर से देखा लेकिन जिस कमरे में आत्महत्या की गई थी। और जिसमें चोरों ने रात भर ऊधम मचाया था उसे उसने विशेष रूप से देखा था।

विजय गेन्मार्ड की एक एक हरकत पर नजर रख रहा था। यद्यपि अभी तक गेन्मार्ड ने ऐसी कोई हरकत नहीं की थी जिससे कि विजय उसके प्रति संदिग्ध हो जाता लेकिन फिर भी वह जानना चाहता था कि गेन्मार्ड का इस केस में दिलचस्पी लेने से क्या आशय था।

गेन्मार्ड की यह बात कि वह पेरिस में इंस्पेक्टर है और भारत घूमने के लिए आया है। यहां इस रहस्यमय केस को देखकर उसका जासूसी दिल उत्सुक हो उठा है और वह इस केस को सुलझाना चाहता है, उसे विश्वास करने योग्य लगी थी। लेकिन फिर भी वह उस पर नजर रख रहा था ताकि, उसका इस केस को सुलझाने का तरीका क्या है, वह यह मालूम कर ले। अभी तह वह स्वयं अंधेरे में था और उसने इसके सम्बन्ध में अभी कुछ कोशिश भी नहीं की थी। क्योंकि उसका ध्यान फिलहाल गेन्मार्ड पर ही केन्द्रित था।

कोठी के समस्त कमरे देखने के बाद गेन्मार्ड विजय के साथ बाहर कम्पाउंड में निकल अया। वह कम्पाउंड पर इस प्रकार नजरें जमाये हुए था जैसे उस सूखी जमीन पर किसी के कदमों के निशान ढूंढने की चेष्टा कर रहा हो। विजय उसकी पूंछ की भांति उसके पीछे चल रहा था। वह स्वयं कुछ नहीं कर रहा था लेकिन गेन्मार्ड जो कुछ भी कर रहा था वह उस पर अच्छी तरह से नजर रख रहा था।

कम्पाउंड का बारीकी ने निरीक्षण करने के बाद गेन्मार्ड विजय के साथ कोठी के पिछले भाग में आ गया। कोठी के पीछे भी आगे की भांति काफी जगह पड़ी हुई थी। लेकिन यह आगे वाले कम्पाउंड की भांति सुन्दर नहीं थी। गेन्मार्ड वहां पर भी जमीन पर नजरें घुमाये घूमता रहा। विजय उसके साथ ही था।

‘क्या इस कोठी में कहीं खजाना वजाना तो नहीं दबा हुआ है।’ विजय ने गेन्मार्ड को सम्बोधित करते हुए कहा। लेकिन गेन्मार्ड कुछ नहीं बोला। वह जमीन को घूरता रहा। फिर एक जगह वह रूक गया और उसने संकेत से विजय को अपने निकट बुलाया।

‘क्या है?’ विजय ने उसके निकट आकर पूछा।

‘यहां पर कुछ है।’ गेन्मार्ड ने एक स्थान पर उंगली रखते हुए कहा।

‘यह तो मैं भी जानता हूं।’ विजय लापरवाही से बोला।

‘तुम क्या जानते हो?’

‘यही कि यहां पर जमीन है।’

‘मेरा मतलब है कि यहां जमीन में कुछ दबा हुआ है।’

‘यह तो मुझे भी मालूम है कि यहां पर कुछ दबा हुआ है।’ विजय उसी प्रकार लापरवाही से बोला- ‘बल्कि मैं तो यह भी जानता हूं कि यहां पर क्या दबा हुआ है?’

‘क्या दबा हुआ है?’

‘यहा पर नेपोलियन की लाश दबी हुई है।’

‘तुम मजाक समझ रहे हो।’ गेन्मार्ड बोला- ‘यहां कुछ न कुछ जरूर दबा हुआ है।’

‘फिर मैं क्या करूं, अगर यहां पर कुछ दबा हुआ है तो?’

‘कोई चीज यहां की जमीन खोदने के लिए लाओ।’

‘क्या यहां की जमीन खोदोगे?’

‘हां, देखें तो सही कि यहां क्या दबा हुआ है?’

‘मेरे बस का रोग नहीं है यह जमीन खोदना।’

‘मैं तुम से कब कह रहा हूं खोदने के लिए। मैं स्वयं खोदूंगा।’

विजय अपनी गुद्दी खुजाने लगा। गेन्मार्ड कुछ देर तक उसे देखता रहा फिर बोला- ‘क्या सोचने लगे हो तुम?’

‘यही कि मैं तुम्हें क्या चीज दूं खोदने के लिए।’ विजय बोला- ‘तुम जानते हो कि मैं कोई माली तो हूं नहीं जो जमीन खोदने की चीजें अपने पास रखूंगा।’

‘तुम अपने माली से क्यों नहीं मांग लाते।’

‘मेरा कोई माली नहीं है।। विजय बोला- ‘अभी तो मैंने इस कोठी को खरीदा ही है, अब माली और नौकर इत्यादि रखूंगा।’

‘पुराने माली की कोठी देखो शायद वहीं पर कोई चीज खोदने के लिए मिल जाये।’ गेन्मार्ड ने उसकी ओर देखते हुए कहा।

‘लेकिन मैं नहीं खोदूंगा।’

‘हां, हां, बाबा तुम मत खोदना।’ गेन्मार्ड के कहने का ढंग बिल्कुल ऐसा था जैसे किसी बच्चे को बहला रहा हो।

विजय और गेन्मार्ड देानों ने एक साथ ही माली की कोठी को देखा। खुदाई करने के लिए उन्हें कोई विशेष औजार तो नहीं मिला लेकिन लोहे की एक छड़ सी मिल गई। गेन्मार्ड उस छड़ को उलट पलट कर देखता हुआ बोला-‘चलो फिलहाल तो इससे ही काम चल जायेगा।‘तो चलाओ काम।’ विजय लापरवाही से बोला-‘मैं तुम्हारी इस काम में बिल्कुल भी सहायता नहीं करूंगा। यह ठीक है कि तुम हमारे अतिथि हो और तुम्हारी सेवा करना हमारा धर्म है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हम तुम्हारी हर मूर्खता पर भी अमल करते रहें।’

गेन्मार्ड केवल मुस्कुरा कर रह गया। अब छड़ लेकर फिर उसी स्थान की ओर चल दिया। विजय उसके साथ अवश्य था। लेकिन बिल्कुल इस प्रकार जैसे उसका गेन्मार्ड के नाम से जरा भी सम्बन्ध नहीं है।

गेन्मार्ड ने छड़ से खुदाई आरम्भ कर दी और विजय एक पेड़ के साथ खड़ा हुआ गा रहा था-

‘जालिम तेरी नजर से अगर हम बच गये,

तो भी न जी सके, अदाओं से मर गये,

खाने को क्या क्या खायें, कुछ सूझता नहीं,

होटल में जो कुछ मिलता था हम वो तो चर गये’

लेकिन गेन्मार्ड पर विजय की इस शायरी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह बदस्तूर छड़ चलाता रहा और विजय आराम के साथ उसका काम करना देखत रहा। उसने काफी मिट्टी नरम कर दी थी और अब उसका पैरों से एक ओर का ढेर लगा रहा था।

विजय ने उसकी ओर देखा और मुंह बिचका कर उसने एक शेर और कह दिया-

‘उफ, ये इतनी सख्त जमीं तौबा,

एक निगोड़ी ये छड़ हाथ आई है।’

गेन्मार्ड ने फिर भी उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसके काम करने के ढंग से ऐसा नहीं लग रहा था कि वह हिन्दी समझता हो। क्योंकि विजय के इन शेरों की उस पर कोई प्रतिक्रिया नही हुई थी।

‘जब थक जाओ तो मुझे बता देना।’ विजय ने वहीं खड़े खड़े उसका पुकार कर कहा।

गेन्मार्ड ने अपना हाथ रोक दिया और गरदन उठाकर मुस्कराते हुए बोला- ‘तो तब तुम क्या करोगे।’

‘मैं उस समय तुम्हें एक सलाह दूंगा’

‘कैसी सलाह?’

‘यही की जमीन पर छड़ को रखकर तुम भी बैठ जाओ और फिर अपने हाथों से अपने सिर को पकड़ कर लम्बी लम्बी सांसे लेने लगो। इससे तुम्हारी थकान उतर जायेगी और तुम फिर पहले की भांति तरोताजा हो जाओगे, याद रखिए जब आप थक जायें तो विजय मार्का यह नुस्खा आजमाइए। आप अपने को पहले से अधिक चुस्त और फुर्तीला पायेंगे। विजय मार्का यह नुस्खा हर स्थान पर प्राप्य है।’

अन्तिम शब्द विजय ने रेडियो सीलोन के विज्ञापनकर्ता की भांति कहे थे। गेन्मार्ड ने उसकी ओर से निगाहें फेर लीं ओर छड़ से फिर जमीन को खोदने लगा।

विजय फिर एक शेर गाने लगा-

‘ऐसे निगाहें न फेरो सनम,

तेरी कसम मर जायेंगे हम,

तू ही गर यूं रूठ गया तो किधर जायेंगे हम,

तेरे घर पर सत्याग्रह कर भूखे ही मर जायेंगे हम’

गेन्मार्ड जमीन खोदता रहा और विजय उलजलूल शेर गाता रहा। इन शेरों से वह स्वयं ही टाइम पास कर रहा था अन्यथा गेन्मार्ड उन में जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखा रहा था।

‘क्या तुम थक गये?’ विजय ने पूछा।

‘कहो तो मैं इसी तरह खोदता-खोदता अमरीका में चला जाऊं।’

‘क्या मतलब?’

‘मतलब यह कि अमेरिका भारत के बिल्कुल नीचे है। अगर यहां से एक गड्ढा खोदा जाये तो वह सीधा अमरीका जाकर निकलेगा।’

‘अच्छा।’ विजय गरदन को झटका देकर बोला- ‘फिर तुम ऐसा करो कि यहां से अमरीका तक एक गड्ढा खोद दो। ताकि जब कभी भी मुझे अमरीका जाना हो तो व्यर्थ में विमान यात्र के पैसे खर्च करने की बजाय में उस गड्ढे में कूद पडूंगा और सीधा अमरीका पहुंच जाऊंगा।’

गेन्मार्ड कोई उत्तर न देकर फिर छड़ चलाने लगा। यद्यपि मिट्टी खोदने के लिए छड़ कोई उपयुक्त साधन नहीं था लेकिन फिर भी वह खोदने में संलग्न था। वह पहले छड़ से मिट्टी को भुरभुरी कर लेता था और फिर हाथों से उसे उठाकर एक तरफ फेंक देता था।
 
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