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सुनीलजी ने अपनी बात चालु रखते हुए कहा, “एक कहावत है की एक बार हो तो हादसा, दूसरी बार हो तो संयोग पर अगर तीसरी बार भी होता है तो समझो की खतरे की घंटी बज रही है।”
ज्योति बुद्धू की तरह सुनीलजीको देखती ही रही। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था।
सुनीलजी ने ज्योति के उलझन भरे चेहरे की और देखा और ज्योति का नाक पकड़ कर हिलाते हुए बोले, “अरे मेरी बुद्धू रानी, पहली बार कोई मेरे घरमें से मेरा पुराना लैपटॉप और एक ही जूता चुराता है, यह तो मानलो हादसा हुआ। फिर कोई मेरा और तुम्हारे पतिदेव सुनीलजी का पीछा करता है। मानलो यह एक संयोग था…
फिर कोई संदिग्ध व्यक्ति टिकट चेकर का भेस पहन कर हमारे ही डिब्बे में सिर्फ हमारे ही पास आ कर हम से पूछताछ करता है की हम कहाँ जा रहे हैं। मानलो यह भी एक अद्भुत संयोग था। उसके बाद कोई व्यक्ति स्टेशन पर हमारा स्वागत करता है, हमें हार पहनाता है और हमारी फोटो खींचता है…
क्यों भाई? हम लोग कौनसे फिल्म स्टार या क्रिकेटर हैं जो हमारी फोटो खींची जाए? और आखिर में कोई बिना नंबर प्लेट की टैक्सी वाला हमें आधे से भी कम दाम में स्टेशन से लेकर आता है और रास्ते में बड़े सलीके से तुम से हमारे कार्यक्रम के बारे में इतनी पूछताछ करता है? क्या यह सब एक संयोग था?”
ज्योति के खूबसूरत चेहरे पर कुछ भी समझ में ना आने के भाव जब सुनीलजी ने देखे तो वह बोले, “कुछ तो गड़बड़ है। सोचना पड़ेगा।” कह कर सुनीलजी उठ खड़े हुए और कमरे की और चल दिए।
साथ साथ में ज्योति भी दौड़ कर पीछा करती हुई उनके पीछे पीछे चल दी। दोनों अपने अपने विचारो में खोये हुए अपने कमरे की और चल पड़े।
..........................
कर्नल साहब (सुनीलजी) ने काफी समय पहले ही कैंप के मैनेजमेंट से दो कमरों का एक बड़ा फ्लैट टाइप सुईट बुक करा दिया था। उसमें उनके दोनों बैडरूम को जोड़ता हुआ परदे से ढका एक किवाड़ था। वह किवाड़ दोनों तरफ से बंद किया जा सकता था।
जब तक दोनों कमरों में रहने वाले ना चाहें तब तक वह किवाड़ अक्सर बंद ही रहता था। अगर वह किवाड़ खुला हो तो एक दूसरे के पलंग को दोनों ही जोड़ी देख सकती थी। दोनों ही बैडरूम में एक एक वाशरूम जुड़ा हुआ था।
बैडरूम का दुसरा दरवाजा एक साँझा बड़े ड्रॉइंग कम डाइनिंग रूम में खुलता था। सुईट के अंदर प्रवेश उसी ड्रॉइंगरूम से ही हो सकता था। ड्रॉइंगरूम में प्रवेश करने के बाद ही कोई अपने कमरे में जा सकता था।
जब कैंप में आगमन के तुरंत बाद सुबह में पहली बार दोनों कपल कमरों में दाखिल हुए थे (चेक इन किया था) तब सबसे पहले सुनीलजी ने सुईट की तारीफ़ करते हुए सुनीलजी से कहा था, “सुनीलजी, यह तो आपने कमाल का सुईट बुक कराया है भाई! कितना बड़ा और बढ़िया है! खिड़कियों से हिमालय के बर्फीले पहाड़ और खूबसूरत वादियाँ भी साफ़ साफ़ दिखती हैं। मेरी सबसे एक प्रार्थना है। मैं चाहता हूँ की जब तक हम यहां रहेंगे, दोनों कमरों को जोड़ते हुए इस किवाड़ को हम हमेशा खुला ही रखेंगे। मैं हम दोनों कपल के बिच कोई पर्दा नहीं चाहता। आप क्या कहते हैं?”
सुनीलजी ने दोनों पत्नियों की और देखा। ज्योतिजी फ़ौरन सुनीलजी से सहमति जताते हुए बोली थी, “मुझे कोई आपत्ति नहीं है। भाई मान लो कभी भी दिन में या आधी रात में सोते हुए अचानक ही कोई बातचित करने का मन करे तो क्यूँ हमें उठकर एक दूसरे का दरवाजा खटखटा ने की जेहमत करनी पड़े? इतना तो हमें एक दूसरे से अनौपचारिक होना ही चाहिए। फिर कई बार जब मेरा न करे की मैं मेरी प्यारी छोटी बहन ज्योति के साथ थोड़ी देर के लिए सो जाऊं तो सीधा ही चलकर चुचाप तुम्हारे पलंग पर आ सकती हूँ ना?”
उस वक्त ज्योतिजी ने साफ़ साफ़ यह नहीं कहा की अगर दोनों कपल चाहें तो बिना किसी की नजर में आये एक दूसरे के पलंग में सांझा एक साथ सो भी तो सकते हैं ना?
ज्योति सारी बातें सुन कर परेशान हो रही थी। वह फ़ौरन अपने पति सुनीलजी को अपने कमरे में खिंच कर ले गयी और बोली, “तुम पागल हो क्या? तुम एक रात भी मुझे प्यार किये बिना तो रह नहीं सकते। अगर यह किवाड़ खुला रखा तो फिर रात भर मुझे छेड़ना मत। यह समझ लो।”
अपनी पत्नी की जिद देख कर सुनीलजी ने अपनी बीबी ज्योति के कानों में फुसफुसाते हुए कहा था, “डार्लिंग, तुम्ही ने तो माना था की हम दोनों कपल एक दूसरे से पर्दा नहीं करेंगे। अब क्यों बिदक रही हो? और अगर हम प्यार करेंगे भी तो कौनसा सबके सामने नंगे खड़े हो कर करेंगे? बिस्तर में रजाई ओढ़कर भी तो हम चुदाई कर सकते है ना?”
यह सुन कर ज्योति का माथा ठनक गया। उसने तो अपने पति से कभी यह वादा नहीं किया था की वह सुनीलजी और ज्योतिजी से पर्दा नहीं करेगी। तब उसे याद आया की उसने ज्योतिजीसे यह वादा जरूर किया था। तो क्या ज्योतिजी ने उनदोनों के बिच की बातचीत सुनीलजी को बतादी थी क्या? खैर जो भी हो, उसने वादा तो किया ही था। सुनीलजी की बात सुन कर हार कर ज्योति चुपचाप अपने काम में लग गयी थी।
——
दोपहर का खाना खाने के बाद चारों के जहन में अलग अलग विचारों की बौछार हो रही थी। ज्योतिजी पहली बार अच्छी तरह कुदरत के आँगन में खुले आकाश के निचे सुनीलजी से चुदाई होने के कारण बड़ी ही संतुष्ट महसूस कर रही थी और कुछ गाना मन ही मन गुनगुना रहीं थीं। उनके पति सुनीलजी अपनी ही उधेड़बुन में यह सोचने में लगे थे की जो राज़ था उसे कैसे सुलझाएं। उस राज़ को सुलझाने का मन ही मन वह प्रयास कर रहे थे।
ज्योति मन ही मन खुश भी थी और दुखी भी। खुश इसलिए थी की उसने तैराकी के कुछ प्राथमिक पाठ सुनीलजी से सीखे थे और इस लिए भी की उसे सुनीलजी के लण्ड को सहलाने के मौक़ा मिला था। वह दुखी इस लिए थी की सब के चाहते हुए भी वह सुनीलजी का मन की इच्छा पूरी नहीं कर सकती थी। सुनीलजी को दोनों हाथों में लड्डू नजर आ रहे थे। बिस्तर में वह अपनी बीबी को चोदेंगे और कहीं और मौक़ा मिला तो ज्योति को।
दोपहर का खाना खाने के बाद अलग अलग वजह से दोनों ही कपल थके हुए थे। डाइनिंग हॉल से वापस आते ही ज्योतिजी और सुनीलजी अपने पलंग पर और सुनीलजी और ज्योति अपने पलंग पर ढेर हो कर गिर पड़े और फ़ौरन गहरी नींद सो गए। बिच का किवाड़ खुला ही था।
शाम को छे बजे स्वागत और परिचय का कार्यक्रम था और साथ में सब मेहमानों को अगले सात दिन के प्रोग्राम से अवगत कराना था। उसके बाद खुले में कैंप फायर (एक आग की धुनि) के इर्दगिर्द कुछ ड्रिंक्स (शराब या जूस इत्यादि) और नाच गाना और फिर आखिर में खाना।
शाम के पांच बजने वाले थे। सबसे पहले सुनीलजी उठे। चुपचाप वह हलके पाँव वाशरूम में जाने के लिए तैयार हुए। उन्होंने अपने पत्नीकी और देखा। वह अपने गाउन में गहरी नींद सोई हुई बड़ी ही सुन्दर लग रही थी। ज्योति के घने बाल पुरे सिरहाने पर फैले हुए थे। उसका चेहरा एक संतुष्टि वाला, कभी हलकी सी मुस्कान भरा सुन्दर प्यारा दिख रहा था। सुनीलजी के मन में विचार आया की कहीं उस झरने के वाटर फॉल के पीछे सुनीलजी ने उनकी बीबी को चोदा तो नहीं होगा?
विचार आते ही वह मन ही मन मुस्काये। हो सकता है सुनीलजी और ज्योति ने उस दोपहर अच्छी खासी चुदाई की होगी। क्यूंकि ज्योतिजी और सुनीलजी काफी कुछ ज्यादा ही दोस्ताना से एक दूसरे घुलमिल रहे थे। सुनीलजी के मन में स्वाभाविक रूपसे कुछ जलन का भाव तो हुआ, पर उन्होंने एक ही झटके में उसको निकाल फेंका। वह ज्योति को बेतहाशा प्यार करते थे। ज्योति सिर्फ उनकी पत्नी ही नहीं थी। उनकी दोस्त भी थी। और प्यार में और दोस्ती में हम अपनों पर अपना अधिकार नहीं प्यार जताते हैं। हम अपनी ख़ुशी से ज्यादा अपने प्यारे की खुशी के बारे में ही सोचते हैं।
खुले हुए किवाड़ के दूसरी और जब सुनीलजी ने नजर की तो देखा की सुनीलजी अपनीं बीबी को अपनी बाँहों में घेरे हुए गहरी नींद में सो रहे थे। ज्योति अपने पति की बाँहों में पूरी तरह से उन्मत्त हो कर निद्रा का आनंद ले रही थी।
सुनीलजी फुर्ती से वाशरूम में गए और चंद मिनटों में ही तैयार हो कर बाहर आये। उन्होंने फिर अपनी पत्नी को जगाया। ज्योति आखिर एक फौजी की बीबी थी। सुनीलजी की एक हलकी आवाज से ही वह एकदम बैठ गयी। अपने पति को तैयार देख वह भी वाशरूम की और तैयार होने के लिए अपने कपडे लेकर भागी। सुनीलजी हलके से चलकर बिच वाले खुले किवाड़ से अपने कमरे से सुनील और ज्योति के कमरे में आये।
सुनीलजी ने सुनील और ज्योति के पलंग में बदहाल गहरी नींद में लेटी हुई ज्योति को देखा। ज्योति का गाउन ऊपर उसकी जाँघों तक आ गया था। अगर थोड़ा झुक कर टेढ़ा होकर दो जाँघों के बिच में देखा जाये तो शायद ज्योति की चूत भी दिख जाए। बस उसकी चूत के कुछ निचे तक गाउन चढ चुका था। ज्योति की दो जाँघों के बिच में गाउन के अंदर कुछ अँधेरे के कारण गाउन ज्योति की प्यारी चूत को मुश्किल से छुपा पा रहा था। यह जाहिर था की ज्योति ने गाउन के अंदर कुछ भी नहीं पहन रखा था।
सुनीलजी को बेहाल लेटी हुई ज्योति पर बहुत सा प्यार आ रहा था। पता नहीं उन्हें इससे पहले कभी किसी औरत पर ऐसा आत्मीयता वाला भाव नहीं हुआ था। वह ज्योति को भले ही चोद ना पाएं पर ज्योति से साथ सो कर सारी सारी रात प्यार करने की उनके मन में बड़ी इच्छा थी। उन्होंने जो कुछ भी थोड़ा सा वक्त ज्योति को अपनी बाँहों में लेकर गुजारा था वह वक्त उनके लिए अमूल्य था। ज्योति के बदन के स्पर्श की याद आते ही सुनीलजी के शरीर में एक कम्पन सी सिहरन दौड़ गयी।
सिरहाने की साइड में खड़े होकर देखा जाए तो गाउन के अंदर ज्योति के दो बड़े बूब्स के बिच की खाई और उसके दो मस्त पहाड़ की चोटी पर विराजमान निप्पलोँ तक का नजारा लण्ड खड़ा कर देने वाला था। वह इसलिए की गहरी नींद में लेटे हुए सुनीलजी के दोनों हाथ अपनी बीबी के उन्मत्त स्तनोँ को नींद में ही दबा रहे थे।
ज्योति बुद्धू की तरह सुनीलजीको देखती ही रही। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था।
सुनीलजी ने ज्योति के उलझन भरे चेहरे की और देखा और ज्योति का नाक पकड़ कर हिलाते हुए बोले, “अरे मेरी बुद्धू रानी, पहली बार कोई मेरे घरमें से मेरा पुराना लैपटॉप और एक ही जूता चुराता है, यह तो मानलो हादसा हुआ। फिर कोई मेरा और तुम्हारे पतिदेव सुनीलजी का पीछा करता है। मानलो यह एक संयोग था…
फिर कोई संदिग्ध व्यक्ति टिकट चेकर का भेस पहन कर हमारे ही डिब्बे में सिर्फ हमारे ही पास आ कर हम से पूछताछ करता है की हम कहाँ जा रहे हैं। मानलो यह भी एक अद्भुत संयोग था। उसके बाद कोई व्यक्ति स्टेशन पर हमारा स्वागत करता है, हमें हार पहनाता है और हमारी फोटो खींचता है…
क्यों भाई? हम लोग कौनसे फिल्म स्टार या क्रिकेटर हैं जो हमारी फोटो खींची जाए? और आखिर में कोई बिना नंबर प्लेट की टैक्सी वाला हमें आधे से भी कम दाम में स्टेशन से लेकर आता है और रास्ते में बड़े सलीके से तुम से हमारे कार्यक्रम के बारे में इतनी पूछताछ करता है? क्या यह सब एक संयोग था?”
ज्योति के खूबसूरत चेहरे पर कुछ भी समझ में ना आने के भाव जब सुनीलजी ने देखे तो वह बोले, “कुछ तो गड़बड़ है। सोचना पड़ेगा।” कह कर सुनीलजी उठ खड़े हुए और कमरे की और चल दिए।
साथ साथ में ज्योति भी दौड़ कर पीछा करती हुई उनके पीछे पीछे चल दी। दोनों अपने अपने विचारो में खोये हुए अपने कमरे की और चल पड़े।
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कर्नल साहब (सुनीलजी) ने काफी समय पहले ही कैंप के मैनेजमेंट से दो कमरों का एक बड़ा फ्लैट टाइप सुईट बुक करा दिया था। उसमें उनके दोनों बैडरूम को जोड़ता हुआ परदे से ढका एक किवाड़ था। वह किवाड़ दोनों तरफ से बंद किया जा सकता था।
जब तक दोनों कमरों में रहने वाले ना चाहें तब तक वह किवाड़ अक्सर बंद ही रहता था। अगर वह किवाड़ खुला हो तो एक दूसरे के पलंग को दोनों ही जोड़ी देख सकती थी। दोनों ही बैडरूम में एक एक वाशरूम जुड़ा हुआ था।
बैडरूम का दुसरा दरवाजा एक साँझा बड़े ड्रॉइंग कम डाइनिंग रूम में खुलता था। सुईट के अंदर प्रवेश उसी ड्रॉइंगरूम से ही हो सकता था। ड्रॉइंगरूम में प्रवेश करने के बाद ही कोई अपने कमरे में जा सकता था।
जब कैंप में आगमन के तुरंत बाद सुबह में पहली बार दोनों कपल कमरों में दाखिल हुए थे (चेक इन किया था) तब सबसे पहले सुनीलजी ने सुईट की तारीफ़ करते हुए सुनीलजी से कहा था, “सुनीलजी, यह तो आपने कमाल का सुईट बुक कराया है भाई! कितना बड़ा और बढ़िया है! खिड़कियों से हिमालय के बर्फीले पहाड़ और खूबसूरत वादियाँ भी साफ़ साफ़ दिखती हैं। मेरी सबसे एक प्रार्थना है। मैं चाहता हूँ की जब तक हम यहां रहेंगे, दोनों कमरों को जोड़ते हुए इस किवाड़ को हम हमेशा खुला ही रखेंगे। मैं हम दोनों कपल के बिच कोई पर्दा नहीं चाहता। आप क्या कहते हैं?”
सुनीलजी ने दोनों पत्नियों की और देखा। ज्योतिजी फ़ौरन सुनीलजी से सहमति जताते हुए बोली थी, “मुझे कोई आपत्ति नहीं है। भाई मान लो कभी भी दिन में या आधी रात में सोते हुए अचानक ही कोई बातचित करने का मन करे तो क्यूँ हमें उठकर एक दूसरे का दरवाजा खटखटा ने की जेहमत करनी पड़े? इतना तो हमें एक दूसरे से अनौपचारिक होना ही चाहिए। फिर कई बार जब मेरा न करे की मैं मेरी प्यारी छोटी बहन ज्योति के साथ थोड़ी देर के लिए सो जाऊं तो सीधा ही चलकर चुचाप तुम्हारे पलंग पर आ सकती हूँ ना?”
उस वक्त ज्योतिजी ने साफ़ साफ़ यह नहीं कहा की अगर दोनों कपल चाहें तो बिना किसी की नजर में आये एक दूसरे के पलंग में सांझा एक साथ सो भी तो सकते हैं ना?
ज्योति सारी बातें सुन कर परेशान हो रही थी। वह फ़ौरन अपने पति सुनीलजी को अपने कमरे में खिंच कर ले गयी और बोली, “तुम पागल हो क्या? तुम एक रात भी मुझे प्यार किये बिना तो रह नहीं सकते। अगर यह किवाड़ खुला रखा तो फिर रात भर मुझे छेड़ना मत। यह समझ लो।”
अपनी पत्नी की जिद देख कर सुनीलजी ने अपनी बीबी ज्योति के कानों में फुसफुसाते हुए कहा था, “डार्लिंग, तुम्ही ने तो माना था की हम दोनों कपल एक दूसरे से पर्दा नहीं करेंगे। अब क्यों बिदक रही हो? और अगर हम प्यार करेंगे भी तो कौनसा सबके सामने नंगे खड़े हो कर करेंगे? बिस्तर में रजाई ओढ़कर भी तो हम चुदाई कर सकते है ना?”
यह सुन कर ज्योति का माथा ठनक गया। उसने तो अपने पति से कभी यह वादा नहीं किया था की वह सुनीलजी और ज्योतिजी से पर्दा नहीं करेगी। तब उसे याद आया की उसने ज्योतिजीसे यह वादा जरूर किया था। तो क्या ज्योतिजी ने उनदोनों के बिच की बातचीत सुनीलजी को बतादी थी क्या? खैर जो भी हो, उसने वादा तो किया ही था। सुनीलजी की बात सुन कर हार कर ज्योति चुपचाप अपने काम में लग गयी थी।
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दोपहर का खाना खाने के बाद चारों के जहन में अलग अलग विचारों की बौछार हो रही थी। ज्योतिजी पहली बार अच्छी तरह कुदरत के आँगन में खुले आकाश के निचे सुनीलजी से चुदाई होने के कारण बड़ी ही संतुष्ट महसूस कर रही थी और कुछ गाना मन ही मन गुनगुना रहीं थीं। उनके पति सुनीलजी अपनी ही उधेड़बुन में यह सोचने में लगे थे की जो राज़ था उसे कैसे सुलझाएं। उस राज़ को सुलझाने का मन ही मन वह प्रयास कर रहे थे।
ज्योति मन ही मन खुश भी थी और दुखी भी। खुश इसलिए थी की उसने तैराकी के कुछ प्राथमिक पाठ सुनीलजी से सीखे थे और इस लिए भी की उसे सुनीलजी के लण्ड को सहलाने के मौक़ा मिला था। वह दुखी इस लिए थी की सब के चाहते हुए भी वह सुनीलजी का मन की इच्छा पूरी नहीं कर सकती थी। सुनीलजी को दोनों हाथों में लड्डू नजर आ रहे थे। बिस्तर में वह अपनी बीबी को चोदेंगे और कहीं और मौक़ा मिला तो ज्योति को।
दोपहर का खाना खाने के बाद अलग अलग वजह से दोनों ही कपल थके हुए थे। डाइनिंग हॉल से वापस आते ही ज्योतिजी और सुनीलजी अपने पलंग पर और सुनीलजी और ज्योति अपने पलंग पर ढेर हो कर गिर पड़े और फ़ौरन गहरी नींद सो गए। बिच का किवाड़ खुला ही था।
शाम को छे बजे स्वागत और परिचय का कार्यक्रम था और साथ में सब मेहमानों को अगले सात दिन के प्रोग्राम से अवगत कराना था। उसके बाद खुले में कैंप फायर (एक आग की धुनि) के इर्दगिर्द कुछ ड्रिंक्स (शराब या जूस इत्यादि) और नाच गाना और फिर आखिर में खाना।
शाम के पांच बजने वाले थे। सबसे पहले सुनीलजी उठे। चुपचाप वह हलके पाँव वाशरूम में जाने के लिए तैयार हुए। उन्होंने अपने पत्नीकी और देखा। वह अपने गाउन में गहरी नींद सोई हुई बड़ी ही सुन्दर लग रही थी। ज्योति के घने बाल पुरे सिरहाने पर फैले हुए थे। उसका चेहरा एक संतुष्टि वाला, कभी हलकी सी मुस्कान भरा सुन्दर प्यारा दिख रहा था। सुनीलजी के मन में विचार आया की कहीं उस झरने के वाटर फॉल के पीछे सुनीलजी ने उनकी बीबी को चोदा तो नहीं होगा?
विचार आते ही वह मन ही मन मुस्काये। हो सकता है सुनीलजी और ज्योति ने उस दोपहर अच्छी खासी चुदाई की होगी। क्यूंकि ज्योतिजी और सुनीलजी काफी कुछ ज्यादा ही दोस्ताना से एक दूसरे घुलमिल रहे थे। सुनीलजी के मन में स्वाभाविक रूपसे कुछ जलन का भाव तो हुआ, पर उन्होंने एक ही झटके में उसको निकाल फेंका। वह ज्योति को बेतहाशा प्यार करते थे। ज्योति सिर्फ उनकी पत्नी ही नहीं थी। उनकी दोस्त भी थी। और प्यार में और दोस्ती में हम अपनों पर अपना अधिकार नहीं प्यार जताते हैं। हम अपनी ख़ुशी से ज्यादा अपने प्यारे की खुशी के बारे में ही सोचते हैं।
खुले हुए किवाड़ के दूसरी और जब सुनीलजी ने नजर की तो देखा की सुनीलजी अपनीं बीबी को अपनी बाँहों में घेरे हुए गहरी नींद में सो रहे थे। ज्योति अपने पति की बाँहों में पूरी तरह से उन्मत्त हो कर निद्रा का आनंद ले रही थी।
सुनीलजी फुर्ती से वाशरूम में गए और चंद मिनटों में ही तैयार हो कर बाहर आये। उन्होंने फिर अपनी पत्नी को जगाया। ज्योति आखिर एक फौजी की बीबी थी। सुनीलजी की एक हलकी आवाज से ही वह एकदम बैठ गयी। अपने पति को तैयार देख वह भी वाशरूम की और तैयार होने के लिए अपने कपडे लेकर भागी। सुनीलजी हलके से चलकर बिच वाले खुले किवाड़ से अपने कमरे से सुनील और ज्योति के कमरे में आये।
सुनीलजी ने सुनील और ज्योति के पलंग में बदहाल गहरी नींद में लेटी हुई ज्योति को देखा। ज्योति का गाउन ऊपर उसकी जाँघों तक आ गया था। अगर थोड़ा झुक कर टेढ़ा होकर दो जाँघों के बिच में देखा जाये तो शायद ज्योति की चूत भी दिख जाए। बस उसकी चूत के कुछ निचे तक गाउन चढ चुका था। ज्योति की दो जाँघों के बिच में गाउन के अंदर कुछ अँधेरे के कारण गाउन ज्योति की प्यारी चूत को मुश्किल से छुपा पा रहा था। यह जाहिर था की ज्योति ने गाउन के अंदर कुछ भी नहीं पहन रखा था।
सुनीलजी को बेहाल लेटी हुई ज्योति पर बहुत सा प्यार आ रहा था। पता नहीं उन्हें इससे पहले कभी किसी औरत पर ऐसा आत्मीयता वाला भाव नहीं हुआ था। वह ज्योति को भले ही चोद ना पाएं पर ज्योति से साथ सो कर सारी सारी रात प्यार करने की उनके मन में बड़ी इच्छा थी। उन्होंने जो कुछ भी थोड़ा सा वक्त ज्योति को अपनी बाँहों में लेकर गुजारा था वह वक्त उनके लिए अमूल्य था। ज्योति के बदन के स्पर्श की याद आते ही सुनीलजी के शरीर में एक कम्पन सी सिहरन दौड़ गयी।
सिरहाने की साइड में खड़े होकर देखा जाए तो गाउन के अंदर ज्योति के दो बड़े बूब्स के बिच की खाई और उसके दो मस्त पहाड़ की चोटी पर विराजमान निप्पलोँ तक का नजारा लण्ड खड़ा कर देने वाला था। वह इसलिए की गहरी नींद में लेटे हुए सुनीलजी के दोनों हाथ अपनी बीबी के उन्मत्त स्तनोँ को नींद में ही दबा रहे थे।