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Erotica साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन complete

नीतू ने सिर्फ ब्रिगेडियर साहब से कुछ सालों पहले सेक्स किया था। उसे याद भी नहीं था की वह उसे वह उसे कैसा लगा था। नीतू भूल चुकी थी की जवानी क्या होती है और बदन की भूख क्या होती है।

कुमार से मिलने पर जो नीतू को महसूस हुआ वह उससे पहले उसे कभी महसूस नहीं हुआ था। नीतू ने अपनी चूत में सरसराहट और गीलापन काफी समय के बाद या शायद पहली बार महसूस किया था।

कुमार और नीतू के पीछे चल रहे सुनीलजी ने अचानक ही नीतू और कुमार को मुख्य पगदंडी से हट कर निचे झरने के करीब कंदराओं की और जाते हुए देखा तो वह जोर से चिल्लाकर उन्हें सावधान करना चाहते थे की ऐसा करना काफी खतरनाक हो सकता था।

पर उनके जोर से चिल्लाने पर भी उनकी की आवाज कुमार और नीतू के कानों तक पहुँच ना सकी। नदी के पानी के तेज बहाव की कलकलाहट के शोर में भला उनकी आवाज वह दो तेजी से धड़कते दिल और सुलगते बदन कहाँ सुनने वाले थे?

सुनीलजी वहीँ रुक गए। उन्होंने पीछ चल रही ज्योति की और देखा। तेज चढ़ाई चढ़ते हुए कदम कदम पर ज्योति का फ्रॉक उसकी जाँघों तक चढ़ जाता था।

जब ज्योति आगे की और झुकती तो उसके ब्लाउज के पीछे छिपे हुए उसके अल्लड़ स्तनोँ के काफी बड़े हिस्सों की झांकी हो जाती थी। सुनीलजी रुक गए और जैसे ही ज्योति करीब आयी, सुनीलजी ने ज्योति का हाथ थामा और उसे ऊपर चढ़ाई चढ़ने में मदद की।

सर्दी के बावजूद, ज्योति के गुलाबी चेहरे पर पसीने की नदियाँ सी बह रहीं थीं।

सुनीलजी ने ज्योति को कहा, “ज्योति, मैंने अभी वहाँ दूर कुमार और नीतू को पगदंडी से हट कर निचे नदी की और जाते हुए देखा है। वह लोग मुख्य रास्ता छोड़ कर उस तरफ क्यों गए? क्या उन्हें पता नहीं है की ऐसा करना खतरे से खाली नहीं है? अब हम क्या करें?”

ज्योति सुनीलजी की बात सुनकर हँस पड़ी और बोली, “तो? तो क्या हुआ? सुनीलजी, क्या आप को दो धड़कते दिलों की आवाज नीतू और कुमार में सुनाई नहीं दी? यह तो होना ही था।”

सुनीलजी ज्योति की बात समझ नहीं पाए और अचम्भे से ज्योति की और देखते रह गए। तब ज्योति ने सुनीलजी की नाक पकड़ कर खींचते हुए कहा, “मेरे बुद्धू सुनीलजी! आप कुछ नहीं समझते। अरे भाई नीतू और कुमार हम उम्र होने के बजाय एक दूसरे से काफी आकर्षित हैं? क्या आपने उनकी आँखों में बसा प्यार नहीं देखा?”

सुनीलजी की आँखें यह सुनकर फटी की फटी ही रह गयीं। वह बोल पड़े, “क्या? पर नीतू तो शादीशुदा है?”

ज्योति से हँसी रोकी नहीं जा रही थी। वह बोली, ” हम दोनों भी तो शादीशुदा हैं? तो क्या हम दोनों…..” यह बोल कर ज्योति अचानक चुप हो गयी। उसे ध्यानआया की कहीं इधरउधर बोल देने से सुनीलजी आहत ना हों। ज्योति सुनीलजी के घाव पर नमक छिड़कने का काम ज्योति नहीं करना चाहती थी।

सुनीलजी ने कहा, “इस कदर इस जंगल में अकेले इधर उधर घूमना ठीक नहीं।”

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ज्योति ने सुनीलजी का हाथ थाम कर दबाया और बोली, “यह यूनिफार्म पहन कर आप को क्या हो जाता है? अचानक आप इतने बदल कैसे जाते हो? और आपने अपने पीछे यह बैकपैक में क्या रखा हुआ है?”

सुनीलजी ने ज्योति की और आश्चर्य से देखा और बोले, “कैसे? मैं कहाँ बदला हूँ? पीछे मेरे बैकपैक में कुछ जरुरी सामान रखा हुआ है।”

ज्योति ने हँस कर कहा, “एक जवान मर्द और एक जवान खूबसूरत औरत मुख्य मार्ग छोड़कर जहां कोई नहीं हो ऐसी जगह भला क्यों जाएंगे? उस बात को समझ कर एन्जॉय करने के बजाय आप खतरे की बात कर रहे हो? अगर ख़तरा वहाँ हो सकता है, तो खतरा यहां भी तो हो सकता है?”

सुनीलजी ने कहा, “ज्योति, तुम नहीं जानती। पिछले दो तीन दिनों में इस एरिया में कुछ आशंका जनक घटनाएं हो रहीं हैं। खैर, यह सब बात को छोडो। चलो हम उन्हें जा कर सावधान करते हैं और मुख्य रास्ते पर आ जाने के लिए कहते हैं।”

ज्योति ने अपनी आँखें नचाकर पूछा, “खबरदार! आप ऐसा कुछ नहीं करोगे। आप वहाँ जाकर किसी के रंग में भंग करोगे क्या?”

सुनीलजी ने कहा, “अगर कुछ ऐसा वैसा चल रहा होगा तो फिर हम वहाँ उनको डिस्टर्ब नहीं करेंगे। पर उनको अकेला भी तो नहीं छोड़ सकते।”

ज्योति ने कहा, “वह सब आप मुझ पर छोड़ दीजिये। आप चुपचाप मेरे साथ चलिए। हम लोग छुपते छुपाते चलते हैं ताकि वह दोनों हमें देख ना लें और डिस्टर्ब ना हों। देखते हैं वहाँ वह दोनों क्या पापड बेल रहे हैं। और खबरदार! आप बिलकुल चुप रहना।”

ज्योति ने सुनीलजी का हाथ थामा और दोनों चुपचाप नीतू और कुमार जिस दिशा में गए थे उस तरफ उनके पीछे छिपते छिपाते चल पड़े। पीछे आ रहे ज्योतिजी और सुनीलजी ने दूर से देखा तो उन्हें नजर आया की ज्योति सुनीलजी का हाथ थामे मुख्य मार्ग से हट कर निचे नदी की कंदराओं की और बढ़ रही थी। आश्चर्य की बात यह थी की वह कभी पौधों के पीछे तो कभी लम्बी लम्बी घाँस के पीछे छिपते हुए चल रहे थे।

मौक़ा मिलते ही ज्योति ने कहा, “सुनीलजी, देखा आपने? आपकी पतिव्रता पत्नी, मेरे पति का हाथ थामे कैसे हमसे छिप कर उन्हें अपने साथ खींचती हुई उधर जा रही है? लगता है उसका सारा मान, वचन और राजपूतानी वाला नाटक आज बेपर्दा हो जाएगा। मुझे पक्का यकीन है की आज उसकी नियत मेरे पति के लिए ठीक नहीं है…

और मेरे पति भी तो देखो! कैसे बेशर्मी से उसके पीछे पीछे छुपते छुपाते हुए चल रहे हैं। अरे भाई तुम्हारी चूत में खुजली हो रही है तो साफ़ साफ़ कहो। हम ने कहाँ रोका है? पर यह नाटक करने की क्या जरुरत है? चलो हम भी उनके पीछे चलते हैं और देखते हैं की आज तुम्हारी बीबी और मेरे पति क्या गुल खिलाते हैं? हम भी वहाँ जा कर उनका पर्दाफाश करते हैं।”

सुनीलजी ने कहा, “उन्हें छोडो। शायद ज्योति को पेशाब जाना होगा। इसी लिए वह उस साइड हो गए हैं। उनकी चिंता छोडो। आप और हम आगे बढ़ते हैं।” यह कह कर सुनीलजी ने ज्योतिजी का हाथ थामा और उनके साथ मुख्य रास्ते पर आगे जाने के लिए अग्रसर हो गए।

थोड़ा सा आगे बढ़ते ही ज्योति ने दोनों युवाओँ को एक दूसरे की बाँहों में कस के खड़े हुए प्रगाढ़ चुम्बन में मस्त होते हुए देखा। कुमार नीतू के ब्लाउज के ऊपर से ही नीतू की चूँचियों को दबा रहे थे और मसल रहे थे। नीतू कुमार का सर अपने दोनों हाथों में पकडे कुमार के होँठों को ऐसे चूस रही थी जैसे कोई सपेरा किसीको सांप डंस गया हो तो उसका जहर निकालने के लिए घाव चूस रहा हो।

कुमार साहब का एक हाथ नीतू के बूब्स दबा रहा था तो दुसरा हाथ नीतू की गाँड़ के गालों को भींच रहा था। इस उत्तेजनात्मक दृश्य देख कर सुनीलजी और ज्योति वहीं रुक गए। ज्योति ने अपनी उंगली अपनी नाक पर लगा कर सुनीलजी को एकदम चुप रहने को इशारा किया। सुनीलजी समझ गए की ज्योति नहीं चाहती की इन वासना में मस्त हुए पंखियों को ज़रा भी डिस्टर्ब किया जाए।

सुनीलजी ने ज्योति के कानों में कहा, “इन दोनों को हम यहां अकेला नहीं छोड़ सकते।”

यह सुनकर ज्योति ने अपनी भौंहों को खिंच कर कुछ गुस्सा दिखाते हुए सुनीलजी के कान में फुसफुसाते हुए कहा, “तो ठीक है, हम यहीं खड़े रहते हैं जब तक यह दोनों अपनी काम क्रीड़ा पूरी नहीं करते।”

ज्योति ने वहाँ से हट कर एक घनी झाडी के पीछे एक पत्थर पर सुनीलजी को बैठने का इशारा किया जहाँसे सुनीलजी प्रेम क्रीड़ा में लिप्त उस युवा युगल को भलीभांति देख सके, पर वह उन दोनों को नजर ना आये। चुकी वहाँ दोनों को बैठने की जगह नहीं थी इस लिए ज्योति सुनीलजी के आगे आकर खड़ी हो गयी। वहाँ जमीन थोड़ी नीची थी इस लिए ज्योति ने सुनीलजी की टाँगे फैलाकर उन के आगे खड़ी हो गयी। सुनीलजी ने ज्योति को अपनी और खींचा अपनी दो टांगों के बिच में खड़ा कर दिया। ज्योति की कमर सुनीलजी की टांगों के बिच में थीं। घनी झाड़ियों के पीछे दोनों अब नीतू और कुमार की प्रेम क्रीड़ा अच्छी तरह देख सकते थे।

इन से बेखबर, नीतू और कुमार काम वासना में लिप्त एक दूसरे के बदन को संवार और चूम रहे थे। अचानक नीतू ने घूम कर कुमार से पूछा, “कुमार क्या कर्नल साहब हम को न देख कर हमें ढूंढने की कोशिश तो नहीं करेंगे ना?”

कुमार ने नीतू को जो जवाब दिया उसे सुनकर सुनीलजी का सर चकरा गया। कुमार ने कहा, “अरे कर्नल साहब के पास हमारे बारेमें समय कहाँ? उनका तो खुदका ही ज्योतिजी से तगड़ा चक्कर चल रहा है। अभी तुमने देखा नहीं? कैसे वह दोनों एक दूसरे से चिपक कर चल रहे थे? और उस रात ट्रैन में वह दोनों एक ही बिस्तर में क्या कर रहे थे? बापरे! यह पुरानी पीढ़ी तो हमसे भी तेज निकली।”

सुनीलजी ने जब यह सूना तो उनका हाल ऐसा था की छुरी से काटो तो खून ना निकले। इन युवाओँ की बात सुनकर सुनीलजी का मुंह लाल हो गया। पर करे तो क्या करे? उन्होंने ज्योति की और देखा। ज्योति ने मुस्कुरा कर फिर एक बार अपने होँठों और नाक पर उंगली रख कर सुनीलजी को चुप रहने का इशारा किया। ज्योति ने सुनीलजी के कान में बोला, “आप चुप रहिये। अभी उनका समय है। पर यह बच्चे बात तो सही कह रहे हैं।” उस समय सुनीलजी की शकल देखने वाली थी।

नीतू ने निचे की बहती नदी की और देख कर कुमार के हाथ पकड़ उन्हें अपनी गोद में रखते हुए कुमार के करीब खिसक कर कहा, “कुमार, देखो तो! कितना सुन्दर नजारा दिख रहा है। यह नदी, ये बर्फीले पहाड़ यह बादल! मन करता है यहीं रह जाऊं, यहां से वापस ही ना जाऊं! काश वक्त यहीं थम जाए!”

कुमर ने चारों और देख कर कहा, “मैं तो इस समय सिर्फ यह देख रहा हूँ की कहीं कोई हमें देख तो नहीं रहा?”

नीतू ने मुंह बिगाड़ते हुए कहा, “कुमार तुम कितने बोर हो! मैं यहां इतने सुन्दर नजारों बात कर रही हूँ और तुम कुछ और ही बात कर रहे हो!”

कुमार ने नीतू का गोरा मुंह अपनी दोनों हथेलियों में लिया और बोले, “मुझे तो यह चाँद से मुखड़े से ज्यादा सुन्दर कोई भी नजारा नहीं लग रहा है। मैं इस मुखड़े को चूमते ही रहना चाहता हूँ। मैं इस गोरे कमसिन बदन को देखता ही रहूं ऐसा मन करता है। मेरा मन करता है की मैं तुम्हारे साथ हरदम रहूं। हमारे ढेर सारे बच्चें हों और हमारी जिंदगी का आखरी वक्त तक हम एक दूसरे के साथ रहें।” फिर एक गहरी साँस लेते हुए कुमार ने कहा, “पर मेरी ऐसी तकदीर कहाँ?”

नीतू कुमार की और गौरसे और गंभीरता से देखती रही और बोली, “क्या तुम मेरे साथ हरदम रहना चाहते हो?”

कुमार ने दोनों हाथों को अपने हाथों में पकड़ा बोले, “हाँ। काश ऐसा हो सकता! पर तुम तो शादीशुदा हो।”

नीतू ने कहा, “देखो, कहने के लिए तो मैं शादीशुदा मिसिस खन्ना हूँ, पर वास्तव में मिस खन्ना ही हूँ। ब्रिगेडियर साहब मेरे पति नहीं वास्तव में वह मेरे पिता हैं और मुझे बेटी की ही तरह रखते हैं। उन्होंने मुझे बदनामी से बचाने के लिए ही मेरे साथ शादी की। शादी के बाद हमारा शारीरिक सम्बन्ध मुश्किल से शुरू के कुछ महीनों तक का भी नहीं रहा होगा। उसके बाद उनका स्वास्थ्य लड़खड़ाया और तबसे उन्होंने मुझे गलत इरादे से हाथ तक नहीं लगाया। उन्होंने मुझे एक बेटी की तरह ही रखा है। वह मेरे लिए एक पिता की तरह मेरे लिए जोड़ीदार ढूंढ रहे हैं।

चूँकि वह सरकारी रिकॉर्ड में ऑफिशियली मेरे पति हैं, तो अगर कोई मेरा मनपसंद पुरुष मुझे स्वीकार करता है तो वह मुझे तलाक देने के लिए तैयार हैं। मैं जानती हूँ की तुम्हारे माता पिता शायद मुझे स्वीकार ना करें। मैं इसकी उम्मीद भी नहीं करती। पर अगर वास्तव में तुम तुम्हारा परिवार मुझे स्वीकार करने लिए तैयार हो और सचमें तुम मेरे साथ पूरी जिंदगी बिताना चाहते हो तो मेरे पिता (खन्ना साहब) से बात करिये।”

नीतू इतना कह कर रुक गयी। वह कुमार की प्रतिक्रिया देखने लगी। नीतू की बात सुनकर कुमार कुछ गंभीर हो गए थे। उनका गम्भीर चेहरा देख कर नीतू हँस पड़ी और बोली, “कुमार साहब, मैं आपसे कोई लेनदेन नहीं कर रही हूँ। मैं आप से यह उम्मीद नहीं रख रही हूँ की आप अथवा आपका परिवार मुझे स्वीकार करेगा। उन बातों को छोड़िये। आप मुझे अपना जीवन साथी बनाएं या नहीं; हम यहां जिस हेतु से वह तो काम पूरा करें? वरना क्या पता हमें ना देख कर कर्नल साहब कहीं हमारी खोज शुरू ना करदें।” यह कह नीतू ने कुमार की पतलून में हाथ डाला।

कुमार का लण्ड नीतू का स्पर्श होते ही कड़ा होने लगा था। कुमार ने अपने पतलून की झिप खोली और अपनी निक्कर में से अपना लण्ड निकाला। नीतू कुमार का लण्ड हाथ में लेकर उसे सहलाने लगी। नीतू ने हँसते हुए कहा, “कुमार यह तो एकदम तैयार है। तुमतो वाकई बड़े ही रोमांटिक मूड में लग रहे हो।

कुमार ने नीतू के होठोँ को चूमते हुए अपना एक हाथ नीतू की स्कर्ट को ऊपर उठा कर उसकी पेंटी को निचे खिसका कर उसकी एक टाँग को ऊपर उठा कर नीतू की जाँघों के बिच उसकी चूत में उंगली डालते हुए कहा, “तुम भी तो काफी गरम हो और पानी बहा रही हो।”

बस इसके बाद दोनों में से कोई भी कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थे। वहीं पत्थर के सहारे खड़े खड़े कुमार और नीतू गहरे चुम्बन और आलिंगन में जकड़े हुए थे। कुमार का एक हाथ नीतू की मस्त गाँड़ को सेहला रहा था और दुसरा हाथ नीतू की उद्दंड चूँचियों को मसलने में लगा हुआ था।

नीतू ने कुमार से कहा, “जो करना है जल्दी करो वरना वह कर्नल साहब आ जाएंगे तो कहीं रंग में भंग ना कर दें।”

सुनीलजी कुमार और नीतू की बात सुनकर एक तरह शर्मिन्दा महसूस कर रहे थे तो दूसरी तरफ गरम भी हो रहे थे। पर उस समय वह आर्मी के यूनिफार्म में थे। ज्योति ने पीछे घूम कर सुनीलजी की पतलून में उनकी टाँगों के बिच देखा तो पाया की नीतू और कुमार की प्रेम क्रीड़ा देख कर सुनीलजी का लण्ड भी कड़क हो रहा था और उनकी पतलून में एक तम्बू बना रहा था।

मन ही मन ज्योति को हंसी आयी। ज्योति सुनीलजी का हाल समझ सकती थी। सुनीलजी एक पत्थर पर निचे टाँगें लटका कर बैठे हुए घनी झाडी के पीछे नीतू और कुमार को देख रहे थे। ज्योति उनकी टाँगों के बिच में कुछ नीची जमीन पर खड़ी हुई थी। ज्योति की पीठ सुनीलजी के लौड़े से सटी हुई थी।

सुनीलजी की दोनों टांगें ज्योति के कमर के आसपास फैली हुई ज्योति को जकड़ी हुई थीं। सुनीलजी का हाथ अनायास ही ज्योति के बूब्स को छू रहा था। सुनीलजी अपना हाथ ज्योति के बूब्स से छूने से बचाते रहते थे। ज्योति ने सुनीलजी का खड़ा लण्ड अपनी पीठ पर महसूस किया।

सहज रूप से ही ज्योति ने अपनी कोहनी पीछे की और सुनीलजी की जाँघों के बिच में टिका दीं। ज्योति ने अपनी कोहनी से सुनीलजी का लण्ड छुआ और कोहनी को हिलाते हुए वह सुनीलजी का लण्ड भी हिला रही थी। ज्योति की कोहनी के छूते ही सुनीलजी का लण्ड उनकी पतलून में फर्राटे मारने लगा
 
कुमार ने नीतू को उठा कर पत्थर के पास हरी नरम घास की कालीन पर लिटा दिया। फिर बड़े प्यार से नीतू के स्कर्ट को ऊपर उठाया और उसकी पैंटी निकाल फेंकी। उसे स्कर्ट में से नीतू की करारी जाँघे और उनके बिच स्थित उसकी सुन्दर रसीली चूत के दर्शन हुए। उसने जल्द ही नीतू की स्कर्ट में मुंह डाल कर उसकी चूत को चूमा। नीतू को कुमार का लंड डलवाने की जल्दी थी।

उसने कहा, “अरे जल्दी करो। यह सब बाद में करते रहना। अभी तो तुम ऊपर चढ़ आओ और अपना काम करो। कहीं कोई आ ना जाए और हमें देख ना ले।” उसे क्या पता था उन दोनों की चुदाई की पूरी फिल्म सुनीलजी और ज्योति अच्छी तरह से देख रहे थे।

कुमार ने अपना लण्ड पतलून से जब निकाला तब उसे सुनीलजी ने देखा तो उनके मुंहसे भाई हलकी सी “आह… ” निकल गयी। शायद उन्होंने भी उसके पहले इतना बड़ा लण्ड अपने सिवाय कभी किसीका देखा नहीं था। ज्योति ने पीछे मूड कर देखा। सुनीलजी की प्रतिक्रया देख कर वह मुस्कुराई और सुनीलजी की टांगों के बिच खड़े हुए टेंट पर ज्योति ने अपना हाथ रखा।

सुनीलजी ने फ़ौरन ज्योति का हाथ वहाँ से हटा दिया। ज्योति ने सुनीलजी की और देखा तो सुनीलजी कुछ

हिचकिचाते हुए बोले, “अभी मैं ड्यूटी पर हूँ। वैसे भी अब मैं तुम्हारे साथ कोई भी हरकत नहीं करूंगा क्यूंकि फिर मेरी ही बदनामी होती है और हाथ में कुछ आता जाता नहीं है। मुझे छोडो और इन प्रेमी पंछियों को देखो।”

ज्योति ने अपनी गर्दन घुमाई और देखा की नीतू ने कुमार को अपनी बाँहों में दबोच रखा था और कुमार नीतू के स्कर्ट को ऊंचा कर अपनी पतलून को नीचा कर अपना लण्ड अपने हाथों में सेहला रहा था।

नीतू ने फ़ौरन कुमार को अपना लण्ड उसकी चूत में डालने को बाध्य किया। कुमार ने देखा की नीतू की चूत में से उसका रस रिस रहा था। कुमार ने हलके से अपना लण्ड नीतू की चूत के छिद्र पर केंद्रित किया और हिलाकर उसके लण्ड को घुसने की जगह बनाने की कोशिश की। नीतू की चूत एकदम टाइट थी। कई महीनों या सालों स नहीं चुदने के कारण वह संकुडा गयी थी। वैसे भी नीतू की चूत का छिद्र छोटा ही था।

कुमार ने धीरे धीरे जगह बनाकर और अपने हाथों से अपना लण्ड इधर उधर हिलाकर नीतू की टाइट चूत को फैलाने की कोशिश की। नीतू ने दर्द और डर के मारे अपनी आँखें मूंद लीं थीं। धीरे धीरे कुमार का मोटा और कडा लण्ड नीतू की लगभग कँवारी चूत में घुसने लगा।

नीतू मारे दर्द के छटपटा रही थी पर अपने आप को इस मीठे दर्द को सहने की भी कोशिश कर रही थी। उसे पता था की धीरे धीरे यह दर्द गायब हो जाएगा। कुमार ने धीरे धीरे अपनी गाँड़ के जोर से नीतू की चूत में धक्के मारने शुरू किये।

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इस तरफ ज्योति का हाल भी देखने वाला था। नीतू की चुदाई देख कर ज्योति की चूत में भी अजीब सी जलन और हलचल हो रही थी। उन्हें चोदने के लिए सदैव इच्छुक उसके प्यारे सुनीलजी वहीं खड़े थे।

हकीकत में ज्योति अपनी पीठ में महसूस कर रही की सुनीलजी का लण्ड उनकी पतलून में फनफना रहा था। पर दोनों की मजबूरियां थीं। ज्योति ने फिर भी अपना हाथ पीछे किया और सुनीलजी के बार बार ज्योति के हाथ को हटाने की नाकाम कोशिशों के बावजूद सुनीलजी की जाँघों के बिच में डाल ही दिया।

सुनीलजी के पतलून की ज़िप खोलकर ज्योति ने बड़ी मुश्किल से निक्कर को हटा कर सुनीलजी का चिकना और मोटा लण्ड अपनी उँगलियों में पकड़ा।

कुमार अब नीतू की अच्छी तरह चुदाई कर रहे थे। दोनों टाँगों को पूरी तरह फैला कर नीतू कुमार के मोटे तगड़े लण्ड से चुदवाने का मजा ले रही थी। कुमार का लण्ड जैसे ही नीतू की चूत पर फटकार मारता तो नीतू के मुंह से आह… निकल जाती।

सुनीलजी और ज्योति को वहाँ बैठे हुए नीतू और कुमार की चुदाई का पूरा दृश्य साफ़ साफ़ दिख रहा था। वह कुमार का मोटा लण्ड नीतू की चूत में घुसते हुए साफ़ देख पा रहे थे।

ज्योति ने सुनीलजी की और देखा और पूछा, “कर्नल साहब, आपके जहन में यह देख कर क्या हो रहा है?”

सुनीलजी का बुरा हाल था। एक और वह नीतू की चुदाई देख रहे थे तो दूसरी और ज्योति उनके लण्ड को बड़े प्यार से हिला रही थी।

सुनीलजी ने ज्योति के गाल पर जोरदार चूँटी भरते हुए कहा, “मेरी बल्ली, मुझसे म्याऊं? तू मेरी ही चेली है और मुझसे ही मजाक कर रही है? ज्योति, मेरे लिए यह बात मेरे दिल के अरमान, फीलिंग्स और इमोशंस की है। मेरे मन में क्या है, यह तू अच्छी तरह जानती है। अब बात को आगे बढ़ाने से क्या फायदा? जिस गाँव में जाना नहीं उसका रास्ता क्यों पूछना?”

ज्योति को यह सुनकर झटका सा लगा। जिस इंसान ने उसके लिए इतनी क़ुरबानी की थी और जो उससे इतना बेतहाशा प्यार करता था उसके हवाले वह अपना जिस्म नहीं कर सकती थी। हालांकि ज्योति को ज्योति को खुदके अलावा कोई रोकने वाला नहीं था। ज्योति का ह्रदय जैसे किसी ने कटार से काट दिया ही ऐसा उसे लगा। वह सुनीलजी की बात का कोई जवाब नहीं दे सकती थी।

ज्योति ने सिर्फ अपना हाथ फिर जबरदस्ती सुनीलजी की टाँगों क बिच में रखा और उनके लण्ड को पतलून के ऊपर से ही सहलाते हुए बोली, “मैं मजाक नहीं कर रही सुनीलजी। क्या सजा आप को अकेले को मिल रही है? क्या आप को नहीं लगता की मैं भी इसी आग में जल रही हूँ?”

ज्योति की बात सुनकर सुनीलजी की आँख थोड़ी सी गीली हो गयी। उन्होंने ज्योति का हाथ थामा और बोले, “मैं तुम्हारा बहुत सम्मान करता हूँ। मैं तुम्हारे वचन का और तुम्हारी मज़बूरी का भी सम्मान करता हूँ और इसी लिए कहता हूँ की मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। क्यों मुझे उकसा रही हो?”

ज्योति ने सुनीलजी के पतलून के ऊपर से ही उनके लण्ड पर हाथ फिराते उसे हिलाते हुए कहा, “सुनीलजी, मेरी अपनी भी कुछ इच्छाएं हैं। अगर सब कुछ न सही तो थोड़ा ही सही। मैं आपको छू तो सकती हूँ ना? मैं आपके नवाब (लण्ड) से खेल तो सकती हूँ ना? की यह भी मुझसे नकारोगे?”

ज्योति की बात का सुनीलजी ने जवाब तो नहीं दिया पर ज्योति का हाथ अपनी टांगों से बिच से हटाया भी नहीं। ज्योति ने फ़ौरन सुनीलजी की ज़िप खोली और निक्कर हटा कर उनके लण्ड को अपनी कोमल उँगलियों में लिया और नीतू की अच्छी सी हो रही चुदाई देखते हुए ज्योति की उँगलियाँ सुनीलजी के लण्ड और उसके निचे लटके हुए उसके अंडकोष की थैली में लटके हुई बड़े बड़े गोलों से खेलनी लगी।

ज्योति की उँगलियों का स्पर्श होते ही सुनीलजी का लण्ड थनगनाने लगा। जैसे एक नाग को किसीने छेड़ दिया हो वैसे देखते ही देखते वह एकदम खड़ा हो गया और फुंफकारने लगा। ज्योति की उँगलियों में सुनीलजी के लण्ड का चिकना पूर्व रस महसूस होने लगा। देखते ही देखते सुनीलजी का लण्ड चिकनाहट से सराबोर हो गया। सुनीलजी मारे उत्तेजना से अपनी सीट पर इधरउधर होने लगे।

उधर कुमार बड़े प्यार से और बड़ी फुर्ती से नीतू की चूत में अपना लण्ड पेले जा रहा था। कभी धीरे से तो कभी जोरदार झटके से वह अपनी गाँड़ से पीछे से ऐसा धक्का माता की नीतू का पूरा बदन हिल जाता। तो कभी अपना लण्ड नीतू की चूत में अंदर घुसा कर वहीँ थम कर नीतू के खूबसूरत चेहरे की और देख कर नीतू की प्रतिक्रिया का इंतजार करता।
 
जब नीतू हल्का हास्य देकर उसे प्रोत्साहित करती तो वह भी मुस्कुराता और फिर ज्योति की चुदाई जारी रखता। कुछ देर में नीतू का जोश और हिम्मत बढ़ी और वह कुमार के निचे से बैठ खड़ी हुई। उसने कुमार को निचे लेटने को कहा। नीतू ने कहा, “अब तक तो तुम मुझे चोदते थे। अब कप्तान साहब मैं तुम्हें चोदती हूँ। तुमभी क्या याद रखोगे की किसी लड़की ने मुझे चोदा था।”

और फिर नीतू ने कुमार के ऊपर चढ़कर कुमार का फुला हुआ मोटा लण्ड अपनी उँगलियों से अपनी चूत में घुसेड़ा और कूद कूद कर उसे इतने जोश से चोदने लगी की कुमार की भी हवा निकल गयी। कुमार का लण्ड, नीतू की चूत में पूरा उसकी बच्चे दानी तक पहुँच जाता।

यह दृश्य देखकर ज्योति भी मारे उत्तेजना के सुनीलजी का लण्ड जोर से हिलाने लगी। सुनीलजी की समझ में नहीं आ रहा था की वह आँखें मूँद कर ज्योति की उँगलियों से अपने लण्ड को हिलवाने का मझा लें या आँखें खुली रख कर नीतू की चुदाई देखने का। दोनों ही उनको पागल कर देने वाली चीज़ें थीं।

सुनीलजी ज्योति की आँखों में देखने लगे की उनका लण्ड हिलाते वक्त ज्योति के चेहरे पर कैसे भाव आते थे। ज्योति यह देखने की कोशिश कर रही थी की सुनीलजी के चेहरे पर कैसे भाव थे। ज्योति कुमार की चुदाई देख रही थी। उस समय उसके मन में क्या भाव थे यह समझना बहुत मुश्किल था। क्या वह नीतू की जगह खुद को रख रही थी? तो फिर कुमार की जगह कौन होगा? सुनीलजी या फिर ज्योति के पति सुनीलजी?

नीतू के सर पर तो जैसे भुत सवार हो गया था। शायद नीतू को उसके जीवन में पहली बार एक जवाँ मर्द का फुला हुआ मोटा लण्ड अपनी चूत में लेने का मौक़ा मिला था। कुमार के लण्ड की घिसने से नीतू की चूत में हो रहा घर्षण उसके पुरे बदन में आग लगा दे रहा था। ऐसा पहले कभी नीतू ने महसूस नहीं किया था। उसने पहले सिर्फ चुदाई की कहानियां ही पढ़ी या सुनी थीं या कोई कोई बार एकाध वीडियो देखा था।

खन्ना साहब ने अपने कमजोर ढीले लण्ड से बड़ी मुश्किल से जरूर नीतू को चोद ने की कोशिश की थी। वह भी कुछ दिनों तक ही। पर उस बात को तो जमाने बीत गए थे। वाकई में एक हट्टे कट्टे जवाँ मर्द से चुदाई में कैसा आनंद आता है वह नीतू पहली बार महसूस कर रही थी।

नीतू इस बात का पूरा लाभ उठाना चाहती थी। उसे पता नहीं था की शायद उसे ऐसा मौक़ा फिर मिले या नहीं। नीतू उछल उछल कर कुमार के लण्ड को ऐसे चोद रही थी जिससे कुमार का लण्ड उसकी चूत की नाली में आखिर तक पहुंच जाए। नीतू के दोनों बूब्स उछल उछल कर पटक रहे थे। कुमार ने नीतू का जोश देखा तो वह भी जोश में आकर निचे अपनी गाँड़ उठाकर ऊपर की और जोरदार धक्का दे रहा था। दोनों ही के मुंह से आह्ह्ह्ह…. ओह…. उफ….. की आवाजें निकल रहीं थीं।

कुछ ही देर में नीतू अपने चरम पर पहुँच रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब से भाव प्रकाशित हो रहे थे। एक तरह का अजीब सा उन्माद और रोमांच उसके पुरे बदन को रोमांचित कर रहा था। कुछ धक्के मारने के बाद वह बोल पड़ी, “कुमार मैं अब छोड़ने वाली हूँ। तुम भी अपना वीर्य मुझ में छोड़ दो। आज मैं तैयारी के साथ ही आयी थी। मैं जानती थी की आज तुम मेरी लेने वाले हो और मुझे छोड़ोगे नहीं।”

कुमार ने नीतू के होंठ चूमते हुए हाँफते हुए स्वर में कहा, “नीतू, आई लव यु! मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूँ और तुम्हें अपनी बनाना चाहता हूँ। मैं तुम्हें आज ही नहीं, जिंदगी भर नहीं छोड़ना चाहता, अगर तुम्हें कोई एतराज ना हो तो। मैं तुम्हें रोज चोदना चाहता हूँ। क्या तुम मेरी बनने के लिए तैयार हो?”

नीतू ने कहा, “देखो कुमार डार्लिंग! यह वक्त यह सब कहना का नहीं है। कोई भी काम जोश में नहीं होश में करना चाहिए। अभी तुम चुदाई के जोश में हो। जब यह सब हो जाए और तुम ठन्डे दिमाग से सोचोगे तब तय करना की तुम मुझे अपनी बनाना चाहते हो या नहीं। अपने माता पिता से भी सलाह और मशवरा कर लो। कहीं ऐसा ना हो की तुम तैयार हो पर तुंहारी फॅमिली साथ ना दे। मैं ऐसा नहीं चाहती।”

कुमार ने कहा, “ओह…… नीतू डार्लिंग, मेरा वीर्य भी छूटने वाला है। पर मैं तुम्हें पुरे होशो हवास मैं कह रहा हूँ की शादी तो मैं तुमसे ही करूंगा अगर खन्ना साहब इजाजत दें तौ।”

नीतू ने कहा, “खन्ना साहब तो अपना पिता का धर्म अदा करना चाहते हैं। वह मुझे कह रहे थे की उन्होंने कभी कन्यादान नहीं किया। उनके जीवन की इस कमी को वह मेरी शादी करा कर पूरी करना चाहते हैं। बशर्ते की कोई मुझे स्वीकार करे और प्यार से रक्खे। अगर तुम तैयार होंगे तो उनसे ज्यादा खुश कोई नहीं होगा।” इतना बोल कर नीतू चुप हो गयी। उसने कुमार की चुदाई करने पर अपना ध्यान लगा दिया क्यूंकि वह अब झड़ने वाली थी।

कुछ ही देर में नीतू और कुमार झड़ कर शांत हो गए।

तो इस तरफ ज्योति सुनीलजी का लण्ड अपनी उँगलियों में जोर से हिला रही थी। साथ साथ में सुनीलजी के चेहरे के भाव भी वह पढ़ने की कोशिश कर रही थी। सुनीलजी आँखें मूँद कर अपने लण्ड की अच्छी खासी मालिश का आनंद महसूस कर रहे थे। नीतू और कुमार को झड़ते हुए देखकर उनके लण्ड के अंडकोष में छलाछल भरा वीर्य भी उनकी नालियों में उछल ने लगा। ज्योति की उँगलियों की कला से वह बाहर निकलने को व्याकुल हो रहा था।

नीतू से हो रही कुमार की चुदाई देख कर ज्योति ने भी तेजी से सुनीलजी का लण्ड हिलाना शुरू किया जिसके कारण कुछ ही समयमें सुनीलजी की भौंहें टेढ़ी सी होने लगी। वह अपना माल निकाल ने के कगार पर ही थे। एक ही झटके में सुनीलजी अपना फ़व्वार्रा रोक नहीं पाए और “ज्योति, तुम क्या गजब का मुठ मार रही हो!! अह्ह्ह्हह…… मेरा छूट गया…. कह कर वह एक तरफ टेढ़े हो गए। ज्योति की हथेली सुनीलजी के लण्ड के वीर्य से लथपथ भर चुकी थी।

ज्योति ने इधर उधर देखा, कहीं हाथ पोंछने की व्यवस्था नहीं थी। ज्योति ने साथ में ही रहे पेड़ की एक डाली पकड़ी और एक टहनी से कुछ पत्तों को तोड़ा।

डाली अचानक ज्योति की हांथों से छूट गयी और तीर के कमान की तरह अपनी जगह एक झटके से वापस होते हुए डाली की आवाज हुई।

चुदाई खत्म होने पर साथ साथ में लेटे हुए कुमार और नीतू ने जब पौधों में आवाज सुनी तो वह चौकन्ने हो गए। कुमार जोर से बोल पड़े, “कोई है? सामने आओ।”

सुनीलजी का हाल देखने वाला था। उन्होंने फ़टाफ़ट अपना लण्ड अपनी पतलून में सरकाया और बोले, “कौन है?”

तब तक नीतू अपने कपडे ठीक कर चुकी थी। कुमार भी कर्नल साहब की आवाज सुनकर चौंक एकदम कड़क आर्मी की अटेंशन के पोज़ में खड़े हो गए और बोले, “सर! मैं कप्तान कुमार हूँ।”

सुनीलजी ने डालियों के पत्तों को हटाते हुए कहा, “कप्तान कुमार, एट इज़ (मतलब आरामसे खड़े रहो।)” उन्होंने फिर नीतू की और देखते हुए कुमार पूछा, “कप्तान तुम दोनों यहां क्या कर रहे हो?”

जब कुमार की बोलती बंद हो गयी तब बिच में ज्योति बोल उठी, “कॅप्टन साहब, कर्नल साहब के कहने का मतलब यह है की आप दोनों को मुख्य मार्ग से हट कर यहां नहीं आना चाहिए था। यह जगह खतरे से खाली नहीं है।”

कुमार साहब ने नजरें नीची कर कहा, “आई एम् सॉरी सर।” फिर नीतू की और इशारा कर कहा, “इनको कुदरत का नजारा देखने की ख़ास इच्छा हुई थी। तो हम दोनों यहां आ गए। आगे से ध्यान रखूंगा सर।”

सुनीलजी ने कहा, “ठीक है। कुदरत का नजारा देखना हो या कोई और वजह हो। आप को इनको सम्हाल ना है और अपनी और इनकी जान खतरे में नहीं डालनी है। समझे?”

कैप्टेन कुमार ने सलूट मारते हुए कहा, “यस सर!”

सुनीलजी ने मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर नीतू के सर पर हाथ फिराते हुए मुस्कराते हुए कहा, “तुम्हें जो भी नजारा देखना हो या जो भी करना हो, करो। पर सम्हाल कर के करो। तुम दोनों बहुत अच्छे लग रहे हो।” कह कर सुनीलजी ने ज्योति को साथ साथ में चलने को कहा।

ज्योति को सुनीलजी के साथ देख कर कैप्टेन कुमार और नीतू भी मुस्कुराये। केप्टिन कुमार ने ज्योति की और देखा और चुपचाप चल दिए।

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कैप्टेन कुमार और नीतू भीगी बिल्ली की तरह कर्नल साहब के पीछे पीछे चलते हुए मुख्य राह पर पहुँच गए। इस बार जान बुझ कर सुनीलजी ने ज्योति से कुमार और नीतू की और इशारा कर धीरे चलने को कहा।

नीतू और कुमार की मैथुन लीला देखने के बाद ज्योति को सुनीलजी का रवैया काफी बदला हुआ नजर आया। अब वह उनकी कामनाओं और भावनाओं की कदर करते हुए नजर आये।

रास्ते से भटक जाने के लिए पहले शायद वह कैप्टेन कुमार को आड़े हाथों ले लेते। पर उन्होंने जब दोनों के बिच का आकर्षण और उत्कट प्यार देखा तो कुमार को थोड़ी सी डाँट लगा कर छोड़ दिया।

कर्नल साहब अब धीरे धीरे समझ रहे थे की जो कामबाण उनके और ज्योति के ह्रदय को घायल कर रहा था वही कामबाण कप्तान कुमार और नीतू के ह्रदय को भी घायल कर रहा था।

जब प्यार के कामबाण का तीर चलता है तो वह उम्र, जाती, समय, समाज का लिहाज नहीं करता। शादीशुदा हो या कंवारे, बच्चों के माँ बाप हों हो या विधवा हो, इंसान घायल हो ही जाता है।

हाँ, यह सच है की समाज ऐसी हरकतों को पसंद नहीं करता और इसी लिए अक्सर यह सब कारोबार चोरी छुप्पी चलता है। आखिर कर्नल साहब और ज्योति भी तो शादीशुदा थे।

नीतू और कुमार की मैथुन लीला देखने के बाद कर्नल साहब का नजरिया कुछ बदल गया। वह कर्नल साहब नहीं सुनीलजी के नजरिये से नीतू और कुमार का प्यार देखने लगे। ज्योति यह परिवर्तन देख कर खुश हुई।

धीरे धीरे पूरा कारवाँ गंतव्य स्थान की और आगे बढ़ने लगा। ज्योति के पूछने पर सुनीलजी ने बताया की करीब आधा रास्ता ही तय हुआ था। कुछ आगे जाने पर दूर से सुनीलजी ने ऊपर की और नजर कर के ज्योति को दिखाया की उसके पति सुनीलजी ज्योतिजी पास पास में एक पत्थर लेटे हुए सूरज की रौशनी अपने बदन को सेकते हुए आराम कर रहे थे।

इतने सर्द मौसम में भी सुनीलजी के पसीने छूट रहे थे। पहाड़ों की चढ़ाई के कारण वह बार बार रुक रहे थे। ज्योति और ज्योतिजी भी करीब चार किलो मीटर चलने के बाद थके हुए नजर आ रहे थे।

नीतू और कुमार ज्यादा दूर नहीं गए थे। वह एक दूसरे के साथ बातें करते हुए, खेलते हुए आगे बढ़ रहे थे। पर जैसे चढ़ाई आने लगी, नीतू भी थकान और हाँफ के कारण थोड़ा चलकर रुक जाती थी। चुदाई में हुए परिश्रम से वह काफी थकी हुई थी।

कैप्टेन कुमार और कर्नल साहब को ऐसे चलने की आदत होने के कारण उनपर कोई ज्यादा असर नहीं हुआ था पर असैनिक नागरिकों के धीरे धीरे चलने के कारण सैनिकों को भी धीरे धीरे चलना पड़ता था।

अचानक ही सब को वही जँगली कुत्तों की डरावनी भौंकने की आवाज सुनाई पड़ी। उस समय वह आवाज ज्यादा दूर से नहीं आ रही थी। लगता था जैसे कुछ जंगली भेड़िये पहाड़ों में काफी करीबी से दहाड़ रहें हों।

काफिला तीन हिस्सों में बँटा था। आगे ज्योतिजी और सुनीलजी थे। उसके थोड़ा पीछे नीतू और कैप्टेन कुमार चल रहे थे और आखिर में उनसे करीब १०० मीटर पीछे ज्योति और सुनीलजी चल रहे थे।

भेड़ियों की डरावनी चिंघाड़ सुनकर ख़ास तौर से महिलाओं की सिट्टीपिट्टी गुम होगयी। वह भाग कर अपने साथी के करीब पहुँच कर उनसे चिपक गयीं। नीतू कुमार से, ज्योति सुनीलजी से और ज्योतिजी सुनीलजी से चिपक कर डरावनी नज़रों से अपने साथी से बिना कुछ बोले आँखों से ही प्रश्न कर रहीं थीं की “यह क्या था? और अब क्या होगा?”

तब सुनीलजी ज्योति को अपने से अलग कर, अचानक ही बिना कुछ बोले, भागते हुए रास्ते के करीब थोड़ी ही दुरी पर एक पेड़ था उस पर चढ़ गए।

सब अचरज से सुनीलजी क्या कर रहे थे यह देखते ही रहे की सुनीलजी ने अपने बैकपैक (झोले) से एक जूता निकाला और उसको एक डाल पर फीते से बाँध कर लटका दिया। फिर फुर्ती से निचे उतरे और जल्दी से सब को अपने रास्ते पर जल्दी से चलने को कहा।

जाहिर था सुनीलजी को कुछ खतरे की आशंका थी। सब सैलानियों का हाल बुरा था। सब ने सुनीलजी को पूछना चाहा की वह क्या कर रहे थे? उन्होंने अपना एक जूता डाली पर क्यों लटकाया? पर सुनीलजी ने उस समय उसका कोई जवाब देना ठीक नहीं समझा।

उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा, “अब एकदम तेजी से हम अपनी मंजिल, याने ऊपर वाले कैंप में पहुँच जाएंगे, उसके बाद मैं आपको बताऊंगा।”

सब फुर्ती से आगे बढ़ने लगे। सुनीलजी ने सब को एकसाथ रहने हिदायत दी तो पूरा ग्रुप एक साथ हो गया। सुनीलजी और कैप्टेन कुमार ने अपनी अपनी पिस्तौल निकाल लीं। कर्नल साहब (सुनीलजी) ने कैप्टेन कुमार को सबसे आगे रह कर निगरानी करने को कहा।

उन्होंने नीतू और बाकी सबको बिच में एकजुट रहने के लिए कहा और खुद सबसे पीछे हो लिए। जब सुनीलजी सबसे पीछे हो लिए तब ज्योति भी सुनीलजी के साथ हो ली।

सुनीलजी ने जब ज्योति को सब के साथ चलने को कहा तो ज्योति ने सुनीलजी से कहा, “मैं आप के साथ ही रहूंगी। हमने तय किया था ना की इस ट्रिप दरम्यान मैं आप के साथ रहूंगी और ज्योतिजी सुनीलजी के साथ। तो मैं आप के साथ ही रहूंगी।”

सुनीलजी ने अपने कंधे हिलाकर लाचारी में अपनी स्वीकृति दे दी।

काफिला करीब एक या दो किलोमीटर आगे चला होगा की सब को फिर वही जंगली कुत्तों की भयानक आवाज दुबारा सुनाई पड़ी। उस समय वह आवाज निचे की तरफ से आ रही थी।

सब ने निचे की और देखा तो पाया की जिस पेड़ पर सुनीलजी ने अपना एक जूता लटकाया था उस पेड़ के आजुबाजु दो भयानक बड़े जंगली कुत्ते भौंक रहे थे और उस पेड़ के इर्दगिर्द चक्कर काट रहे थे।

तब सुनीलजी ने कहा, “मेरा शक ठीक निकला। वह भेड़िये नहीं, हाउण्ड हैं। अब यह साफ़ हो गया है की दुश्मन के कुछ सिपाही हमारी सरहद में घुसने में कामियाब हो गए हैं और दुश्मन कुछ चाल चल रहा है। धीरे धीरे सारी कहानी समझ आ जायेगी। फिलहाल हमें ऊपर के कैंप पर फ़ौरन पहुंचना है।”

आर्मी के हाउण्ड की चिंघाड़ने की डरावनी आवाज सुनकर और हकीकत में उन भयानक बड़े डरावने जंगली कुत्तों को देख कर सब सैलानियों में जैसे बिजली का करंट लग गया।

सबके पॉंव में पहिये लग गए हों ऐसे सब की गति तेज हो गयी। सबकी थकान और आराम करने की इच्छा गायब ही हो गयी, दिल की धड़कनें तेज हो गयी।

कैप्टेन कुमार को किसीको तेज चलने के लिए कहना नहीं पड़ा। सब प्रकाश के सामान गति से ऊपर के कैंप की और लगभग दौड़ने लगे। अगर उस समय कोई गति नापक यंत्र होता तो शायद तेज चलने के कई रिकॉर्ड भी टूट सकते थे।

रास्ते में चलते चलते कर्नल साहब ने सब के साथ जुड़कर ख़ास तौर से ज्योति की और देख कर कहा, “आप लोगों के मन में यह प्रश्न था ना की मैं किस उधेड़बुन में था और मैंने पेड़ पर जूता क्यों लटकाया? और यह जंगली भेड़िये जैसे भयानक कुत्ते क्या कर रहे है? तो याद करो, क्या तुम्हें याद है की कुछ हफ्ते पहले मेरे घर में चोरी हुई थी जिसमें मेरा एक पुराना लैपटॉप और सिर्फ एक ही जूता चोरी हुआ था?

घर में इतना सारा माल पड़ा हुआ था पर चोरी सिर्फ दो चीज़ों की ही हुई थी? वह चोरी दुशमनों की खुफिया एजेंसीज ने करवाई थी ताकि मेरे लैपटॉप से उन्हें कोई जानकारी मिल सके। एक जूता इस लिए चुराया था जिससे उस जूते को वह लोग अपने हाउण्ड को सुंघा सके जो मेरी गंध सूंघ कर मुझे पकड़ सके।

मुझे इसके बारेमें पहले से कुछ शक पहले से ही हो गया था। पर मैं भी इतना समझ नहीं पाया की दुश्मन की इतनी जुर्रत कहाँ से हुई की वह हमारी ही सरहद में घुसकर ऐसी हरकतें कर सके? जरूर इसमें हमारे ही कुछ लोग मिले हुए हैं।

मैंने दूसरे जूते को सम्हाल कर रक्खा हुआ था, ताकि जरुरत पड़ने पर मैं उन हाउण्ड को बहका कर भुलावा दे सकूँ और उनको गुमराह कर सकूँ। आज सुबह जब मैंने देखा की वह हाउण्ड मेरा ही पीछा कर रहे थे तब मैंने पेड़ पर वह जूता लटका कर कुछ घंटों के लिए उन हाउण्ड को गुमराह करने की कोशिश की और वह कोशिश कामयाब रही। वह हाउण्ड मेरा पीछा करने के बजाय उस पेड़ के ही चक्कर काट रहे थे यह लड़ाई मेरे और उनके बिच की है। आप में सी किसी को कुछ भी नहीं होगा।”

उस समय सब एक पहाड़ी के निचे से गुजर रहे थे। अचानक जोरों से वही डरावनी हाउण्ड की चिंघाड़ सुनाई दी। उस वक्त एकदम करीब ऊपर की और से आवाज आ रही थी।

सब ने जब डर कर ऊपर देखा तो सब चौंक गए। उपर से दो भारी भरखम जंगली हाउण्ड, जिन्होंने सब लोगोंका जीना हराम कर रखा था, वह जोरों से दहाड़ते हुए कर्नल साहब के ऊपर कूद पड़े।

लगभग पंद्रह फुट की ऊंचाई से सीधे कर्नल साहब के ऊपर कूदने के कारण कर्नल साहब लड़खड़ा कर गिर पड़े। इस अफरातफरी में एक हाउण्ड ने बड़ी ताकत के साथ कर्नल साहब के हाथ से उनका रिवाल्वर छीन लिया।

दुसरा हाउण्ड कैप्टेन कुमार पर कूद पड़ा और उसने उसी तरीके से कुमार के हाथ से रिवाल्वर छीन लिया। उतनी ही देरमें उनके बिलकुल पीछे लगभग दस से बारह घुड़सवारों ने बन्दुक तानकर सब को घेर लिया।

सबा को “हैंड्स अप” करवा कर काफिले के मुखिया ने पूछा, “आप में से जनाब सुनील मडगाओंकर कौन है?” फिर सुनीलजी की और देख कर उसने अपनी जेब में से एक तस्वीर निकाली।

तस्वीर जम्मू स्टेशन पर ली गयी थी जब सब ट्रैन से सुबह उतरे थे। उसमें सब के नाम एक कलम से लिखे हुए थे।

सुनीलजी का नाम पढ़कर सरदार ने सुनीलजी को ढूंढ लिया और बोले, “आप जाने माने रिपोर्टर सुनील मडगाओंकर है ना? हमें आप की और कर्नल साहब की आवश्यकता है।”

बाकी सब की और देखा और बोले, “अगर आप सब चुपचाप यहां से बगैर कोई हरकत किये चल पड़ोगे तो आप को कोई नुक्सान नहीं होगा।।” ज्योतिजी, कैप्टेन कुमार और नीतू चुपचाप बिना कुछ बोले वहीँ स्तंभित से खड़े रहे।

कर्नल साहब और सुनीलजी की और देखकर मुखिया ने एक साथीदार को कहा, “इन्हें बाँध दो”

जैसे ही सुनीलजी को बाँधने के लिए साथीदार आगे बढ़ा की ज्योति भी आगे बढ़ी और उस आदमी को कंधे से पकड़ कर कस के एक तमाचा उसके गाल पर जड़ दिया और एक धक्का मार कर उसे गिरा दिया। फिर उनके मुखिया की और भाग कर उसे भी पकड़ा और उसे उसकी बन्दुक छीनने की कोशिश की।
 
ज्योति साथ ही साथ में चिल्ला कर कहने लगी, “अरे कुत्तों, शर्म करो। धोखा देकर हमला करते हो? यह कर्नल साहब और सुनीलजी क्या तुम्हारे बाप का माल है की उन्हें पकड़ कर तुम ले जाओगे? जब तक हिन्दुस्तान का एक भी मर्द अथवा औरत ज़िंदा है तब तक तुम्हारी यह चाल कामयाब नहीं होगी। यह वीरों का देश है बुझदिल और कायरों का नहीं।”

मुखिया ज्योति की इस हरकत से कुछ पलों तक तो स्तब्ध होकर मौन हो गया और ज्योति के भयानक रूप को देखता ही रहा। उसने सोचा भी नहीं था की एक औरत में इतना दम हो की इतने सारे बन्दुक धारियों के सामने ऐसी हरकत कर सके। फिर सम्हल कर वह आगे बढ़ा और बड़ा ही जबरदस्त थप्पड़ उसने ज्योति के गाल पर दे मारा।

सरदार का हाथ भारी था और थप्पड़ इतना तेज था की ज्योति गिर पड़ी और बेहोश हो गयी। उसके गाल लाल हो गये। ज्योति के मुंह में से खून निकलने लगा। निचे गिर पड़ने से ज्योति की स्कर्ट ऊपर उठने से ज्योति की जाँघें नंगीं हो गयीं। ज्योति ऐसे गिरी थी की उसका टॉप भी ऊपर से कुछ खुल गया और ज्योति के करारे बूब्स का उभार साफ़ दिखाई देने लगा।

मुखिया ज्योति की खूबसूरती और बदन देख कर कुछ पल चुपचाप ज्योति के बदन को देखता ही रहा। ज्योति की दबंगाई देख कर बाकी सब सिपाही फुर्ती सेअपनी बंदूकें सबकी और तान कर खड़े हो गए।

उनका सरदार हंस पड़ा और ठहाका मार कर हँसते हुए बोला, “बड़ी करारी औरत हे रे यह तो। बड़ा दम है रे इसके अंदर। क्या कस के थप्पड़ मारा है इस बेचारे को। साला गिर ही पड़ा। बड़ी छम्मक छल्लो भी है यह औरत तो।”

फिर मुखिया अपने साथीयों की और देख कर बोला, “बाँध दो इस औरत को भी। ले चलते हैं इसे भी। बड़ी खूबसूरत जवान है ये। साली पलंग में भी इतनी ही गरम होगी यह तो। चलो यह औरत जनाब का बिस्तर गरम करेगी आज रात को। ऐसा माल देख कर बहुत खुश होंगें जनाब। मुझे अच्छा खासा मोटा सा इनाम देंगे। जनाब का बिस्तर गरम करने के बाद में हम सब मिलकर साली का मजा लेंगे।”

एक मोटा सा काला सिपाही ज्योति के पास आया। उसके बदसूरत काले मुंह में से उसके सफ़ेद दांत काली रात में तारों की तरह चमक रहे थे। ज्योति को देख कर उसके मुंह में से एक बेहूदी और कामुक हंसी निकल गयी। उसने ज्योति के दोनों हाथ और पाँव पकड़ कर बाँध दिए।

काफिले का सरदार जल्दी में था। उसने वही कालिये को कहा, “इस नचनिया को तुम अपने साथ जकड कर बाँध कर ले चलो। वक्त जाया मत करो।

कभी भी इनके सिपाही आ सकते हैं।” बाकी दो साथियों की और इशारा करके मुखिया बोला, “इस कर्नल को और इन रिपोर्टर साहब को बाँध कर तुम दोनों अपने साथ ले चलो।”

मुखिया के हुक्म के अनुसार सुनीलजी, कर्नल साहब और ज्योति को कस के बाँध कर तीनों सिपाहियों ने अपने घोड़े पर बिठा दिया। ज्योति को मोटे बदसूरत सिपाही ने अपने आगे अपने बदन के साथ कस के बांधा और अपना घोडा दौड़ा दिया। देखते ही देखते सब पहाड़ों में गायब हो गए।

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काफिले के पीछे उनके पालतू हाउण्ड घोड़ों के साथ साथ दौड़ पड़े और देखते ही देखते काफिला सब की आंखोंसे ओझल होगया। उस समय सुबह के करीब ११३० बज रहे थे।

ज्योतिजी, कैप्टेन कुमार और नीतू बाँवरे से सुनीलजी, ज्योति और सुनीलजी को आतंक वादियों के साथ कैदी बनकर जाते हुए देखते ही रह गए। उनकी समझ में नहीं आ रहाथा की वह करे तो क्या करे?

कैप्टेन कुमार ने सबसे पहले चुप्पी तोड़ते हुए कहा, “हमें तेजी से चलकर सबसे पहले हमारे तीन साथीदारों की अगुआई की खबर ऊपर कैंप में जाकर देनी होगी। हो सकता है वहाँ उनके पास वायरलेस हों ताकि यह खबर सब जगह फ़ैल जाए। जिससे पूरा आर्मी हमारे साथीदारों को ढूंढने में लग जाए।”

असहाय से वह तीनो भागते हुए थके, हारे परेशान ऊपर के कैंप में पहुंचे। उनके पहुँचते एक घंटा और बीत चुका था। इधर ज्योति, सुनीलजी और सुनीलजी के हाथ पाँव बंधे हुए थे और आँखों पर पट्टी लगी हुई थी।

सुनीलजी आँखों पर पट्टी बंधे हुए भी पूरी तरह सतर्क थे। उनके दोनों हाथ कस के बंधे हुए थे। घुड़सवार इधर उधर घोड़ों को घुमाते हुए कोई नदी के किनारे वाले रास्ते जा रहे थे क्यूंकि रास्ते में सुनीलजी को पहाड़ों से निचे की और बहती हुई नदी के पानी के तेजी से बहने की आवाज का शोर सुनाई दे रहा था।

ज्योति का हाल सबसे बुरा था। उस मोटे बदसूरत काले बन्दे ने ज्योति को अपनी जाँघों के बिच अपने आगे बिठा रखा था। ज्योति के दोनों हाथ पीछे कर के बाँध रखे थे। कालिये के लण्ड को ज्योति के हाथ बार बार स्पर्श कर रहे थे। जाहिर है इतनी खूबसूरत औरत जब गोद में बैठी हो तो भला किस मर्द का लण्ड खड़ा न होगा? कालिये का लण्ड अजगर तरह फुला और खड़ा था जो ज्योति अपने हांथों में महसूस कर रही थी।

घोड़े को दौड़ाते दौड़ाते कालिया बार बार अपना हाथ ज्योति की छाती पर लगा देता था और मौक़ा मिलने पर ज्योति की चूँचियाँ जोरसे दबा देता था। कालिया इतने जोर से ज्योति के बूब्स दबाता था की ज्योति के मुंह से चीख निकल जाती थी।

पर उस शोर शराबे में भला किसी को क्या सुनाई देगा? कालिया ने महसूस किया की उसका लण्ड ज्योति की गाँड़ पर टक्कर मार रहा था तब उसने अपने पाजामे को ढीला किया और घोड़े को दौड़ाते हुए ही अपना मोटा हाथी की सूंढ़ जैसा काला लंबा तगड़ा लण्ड पाजामे से बाहर निकाल दिया। जैसे ही उसने अपना लण्ड बाहर निकाल दिया की वह सीधा ही ज्योति के हाथों में जा पहुंचा।

ज्योति वैसे ही कालिये के लण्ड से उसकी गाँड़ में धक्के मारने के कारण बहुत परेशान थी ऊपर से कालिये के लण्ड का स्पर्श होते ही वह काँप उठी। उसके हाथों में कालिये का लण्ड ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई अजगर हो।

ज्योति को यह ही समझ नहीं आ रहा था की वह कहाँ से शुरू हो रहा था और कहाँ ख़तम हो रहा था। ज्योति को लगा की जिस किसी भी औरत को यह कालिया ने चोदा होगा वह बेचारी तो उसका लंड उसकी चूत में घुसते ही चूत फट जाने के कारण खून से लथपथ हो कर मर ही गयी होगी।

छोटी मोटी औरत तो उस भैंसे जैसे कालिये से चुदवा ही नहीं सकती होगी। कालिये को चोदने के लिए भी तो उसके ही जैसी भैंस ही चाहिए होगी। यह सब सोच कर ज्योति की जान निकले जा रही थी।

उस दिन तक तो ज्योति यह समझती थी की सुनीलजी का लण्ड ही सबसे बड़ा था। पर इस मोटे का लण्ड तो सुनीलजी के लण्ड से भी तगड़ा था। ऊपर से उस लण्ड से इतनी ज्यादा चिकनाहट निकल रही थी की ज्योति के बंधे हुए हाथ उस चिकनाहट से पूरी तरह लिपट चुके थे।

ज्योति को डर था की कहीं कालिया के मन में काफिले से अलग हो कर जंगल में घोड़ा रोक कर ज्योति को चोदने का कोई ख़याल ना आये।

ज्योति बारबार अपने कानों से बड़े ध्यान से यह सुनने की कोशिश कर रही थी की कहीं वह मोटा काफिले को आगे जानेदे और खुद पीछे ना रह जाए, वरना ज्योति की जान को मुसीबत आ सकती थी।

कुछ देर बाद ज्योति को महसूस हुआ की काफिले के बाकी घुड़सवार शायद आगे निकले जारहे थे और कालिये का घोड़ा शायद पिछड़ रहा था। मारे डर के ज्योति थर थर काँपने लगी। उसे किसी भी हाल में इस काले भैंसे से चुदवाने की कोई भी इच्छा नहीं थी।
 
ज्योति ने “बचाओ, बचाओ” बोल कर जोर शोर से चिल्लाना शुरू किया। अचानक ज्योति की चिल्लाहट सुनकर कालिया चौंक गया। वह एकदम ज्योति की चूँचियों पर जोर से चूँटी भरते हुए बोला, “चुप हो जाओ। मुखिया खफा हो जाएगा।” ज्योति समझ गयी की उसे सरदार से चुदवाने के लिए ले जाया जा रहा था।

जाहिर है सरदार को खुद ज्योति को चोदने से पहले कोई और चोदे वह पसंद नहीं होगा। इस मौके का फायदा तो उठाना ही चाहिए। दुसरा कालिया सरदार से काफी डरता था। ज्योति ने और जोर से चिल्लाना शुरू किया, “बचाओ, बचाओ।”

कालिया परेशान हो गया। आगे काफिले में से किसीने ज्योति के चिल्लाने की आवाज सुनली तो काफिला रुक गया। सब कालिया की और देखने लगे। कालिया अपना घोड़ा दौड़ा कर आगे चलने लगा। उसी वक्त ज्योति को सुनीलजी की आवाज सुनाई दी। सुनीलजी जोर से चिल्ला कर बोल रहे थे, “ज्योति तुम कहाँ हो? क्या तुम ठीक तो हो?”

ज्योति ने सोचा की अगर उन्होंने सुनीलजी को अपना सच्चा हाल बताभी दिया तो वह कर कुछ भी नहीं पाएंगे, पर बेकार परेशान ही होंगें। तब ज्योति ने जोर से चिल्लाकर जवाब दिया “मैं यहां हूँ। मैं ठीक हूँ।”

ज्योति ने फिर पीछे की और घूम कर कालिये से कहा, “अगर तुम मुझे और परेशान करोगे तो मैं तुम्हारे सरदार को बता दूंगी की तुम मुझे परेशान कर रहे हो।”

कालिये ने कहा, “ठीक है। पर तुम चिल्लाना मत। राँड़, अगर तू चिल्लायेगी तो अभी तो मैं कुछ नहीं करूँगा पर मौक़ा मिलते ही मैं तुझे चोद कर तेरी चूत और गाँड़ दोनों फाड़ कर तुझे मार कर जंगल में भेड़ियों को खिलाने के लिए डाल दूंगा और किसीको पता भी नहीं चलेगा। तू मुझे जानती नहीं। अगर तू चुप रहेगी तो मैं तुझे ज्यादा परेशान नहीं करूँगा। बस तू सिर्फ मेरा लण्ड सहलाती रहे।”

कालिये की धमकी सुनकर ज्योति की हवा ही निकल गयी। उसकी बात भी सच थी। मौक़ा मिलते ही वह कुछ भी कर सकता था। अगर उस जानवर ने कहीं उसे जंगल में दोनों हाथ और पाँव बाँध कर डाल दिया तो भेड़िये भले ही उसे ना मारें, पर पड़े पड़े चूंटियाँ और मकोड़े ही उसके बदन को बोटी बोटी नोंच कर खा सकते थे।

इससे बेहतर है की थोड़ा बर्दाश्त कर इस जानवर से पंगा ना लिया जाए। ज्योति ने अपनी मुंडी हिलाकर “ठीक है। अब मैं आवाज नहीं करुँगी।” कह दिया।

उसके बाद कालिये ने ज्योति की चूँचियों को जोर से मसलना बंद कर दिया पर अपना लण्ड वहाँ से नहीं हटाया। ज्योति ने तय किया की अगर कालिया ऐसे ही काफिले के साथ साथ चलता रहा तो वह नहीं चिल्लायेगी। ज्योति ने अपनी उंगलयों से जितना हो सके, कालिये के लण्ड को पकड़ कर सहलाना शुरू किया।

दहशतगर्दों का काफिला काफी घंटों तक चलता और दौड़ता ही रहा। कभी एकदम तेज चढ़ाव तो कभी एकदम ढलाव आता जाता रहा। पर पुरे सफर दरम्यान एक बात साफ़ थी की नदी के पानी के बहाव का शोर हर जगह आ रहा था। इससे साफ़ जाहिर होता था की काफिला कोई नदी के किनारे किनारे आगे चल रहा था।

सुनीलजी और ज्योति काफी थक चुके थे। घोड़े भी हांफने लगे थे। काफी घंटे बीत चुके थे। शाम ढल चुकी थी। ज्योति को महसूस हुआ की काफिला एक जगह रुक गया। तुरंत ज्योति की आँखों से पट्टी हटा दी गयी। ज्योति ने देखा की पूरा काफिला एक गुफा के सामने खड़ा था। वहाँ काफी कम उजाला था। कुछ देर में ज्योति के हाथों से भी रस्सी खोल दी गयी।

ज्योति ने सुनीलजी और सुनीलजी को भी देखा। उनके हाथों और पाँव की रस्सी निकाली जा रही थी। सब काफी थके हुए लग रहे थे। काफिले के मुखिया ने गुफा के अंदर से किसी को बाहर बुलाया।

दुशमन की सेना के यूनिफार्म में सुसज्जित एक अफसर आगे आया और सुनीलजी से हाथ मिलाता हुआ बोला, “मेरा नाम कर्नल नसीम है। कर्नल जसवंत सिंघजी आपका और सुनील मडगाओंकरजी का स्वागत है। आप बिलकुल निश्चिन्त रहिये। यहाँ आपको हमसे कोई खतरा नहीं है। हम सिर्फ आपसे कुछ बातचीत करना और कुछ जानकारी हासिल करना चाहते हैं। अब आप हिंदुस्तान की सरहद के दूसरी और आ चुके हैं। अगर आप सहयोग करेंगे तो हम आपको कोई तकलीफ नहीं पहुंचाएंगे।”

फिर ज्योति की और देख कर वह थोड़े अचरज में पड़े और उन्होंने मुखिया से पूछा, “अरे यह औरत कौन है? इन्हें क्यों उठाकर लाये हो?”

मुखिया ने उनसे कहा, “यह ज्योति है जनाब। यह बड़ी जाँबाज़ औरत है और जब हमने इन दोनों को कैद किया तो यह अकेले ही हम से भिड़ने लगी। मैंने सोचा सरदार को यह जवान औरत पेश करेंगे तो वह खुश हो जाएंगे।”

तब सुनीलजी ने आगे बढ़कर कहा, “जनाब यह मेरी बेगम हैं। आपके लोग उन्हें भी उठाकर ले आये हैं।”

कर्नल नसीम ने अपना सर झुकाते हुए माफ़ी मांगते हुए कहा, “मैं मुआफी माँगता हूँ। यह बेवकूफ लोगों ने बड़ी घटिया हरकत की है।”

उस आर्मी अफसर ने कहा, “अरे बेवकूफों, यह क्या किया तुमने? कहीं जनरल साहब नाराज ना हो जाएँ तुम्हारी इस हरकत से।”

फिर थोड़ा रुक कर वह अफसर कुछ देर चुप रहा और कुछ सोच कर बोला, “खैर चलो देखो, आज रात को इस मोहतरमा को इन साहबान के साथ ही रहने दो। सुबह जब जनरल साहब आ जाएंगे तब देखेंगे।”

फिर उस अफसर ने सुनीलजी की और घूमकर कहा, “अब आप आराम कीजिये। आपको हमारे जनरल साहब से सुबह मिलना होगा। वह आपसे कुछ ख़ास बातचीत करना चाहते हैं। हमने आपके लिए रात को आराम के लिए कुछ इंतेझामात किये हैं। इस वीरान जगह में हमसे ज्यादा कुछ हो नहीं पाया है। इंशाअल्लाह अगर आप हमसे कोआपरेट करेंगे तो फिर आप हमारी खातिरदारी देखियेगा। फिलहाल हमें उम्मीद है आप इसे कुबूल फरमाएंगे। चलिए प्लीज।”

कर्नल नसीम एक बड़े से हाल में उनको ले गए। अंदर जाने का एक दरवाजा था जो लकड़ी का था और उसके आगे एक और लोहे की ग्रिल वाला दरवाजा था। अंदर हॉल में एक बड़ा पलंग था और साथ में एक गुसलखाना था। एक बड़ा मेज था। दो तीन कुर्सियां रखीं थीं। बाकी कमरा खाली था।

कर्नल नसीम ने बड़ी विनम्रता से सुनीलजी से कहा, “मुझे माफ़ कीजिये, पर मोहतरमा के आने का कोई प्लान नहीं था इसलिए उनके लिए कोई ख़ास इंतेजामात कर नहीं पाए हैं। उम्मीद है आप इसी में गुजारा कर लेंगे।”

जो कालिया ज्योति को गोद में बिठाकर घोड़े पर बाँध कर ले आया था वह वहीँ खड़ा था। उसकी और इशारा करते हुए कर्नल नसीम ने कहा, “अगर आपको कोई भी चीज़ की जरुरत हो तो यह अब्दुल मियाँ आपकी खातिरदारी में कोई कमी नहीं छोड़ेंगे। तो फिर कल सुबह मिलेंगे। तब तक के लिए खुदा हाफ़िज़।”

यह कह कर कर्नल नसीम चल दिए। दरवाजे पर पहुँचते ही जैसे कुछ याद आया हो ऐसे वह वापस घूमे और कर्नल साहब की और देख कर बोले, “देखिये, अगर आप के मन में कोई भागने का प्लान हो ता ऐसी गलती भूल कर भी मत करियेगा। हमारे हाउण्ड भूखे हैं। वह आपकी गंध को अच्छी तरह पहचानते हैं। हमने उन्हें खुला छोड़ रखा है। बाकी आप समझदार हैं। खुदा हाफ़िज़।”

यह कह कर कर्नल नसीम रवाना हुए। कालिया को दरवाजे पर ही तैनात किया गया था। जैसे ही नसीम साहब गए, कालिया की लोलुप नजर फिर से ज्योति के बदन पर मंडराने लगीं।

अब उसे एक तसल्ली थी की सरदार को मोहतरमा में कोई दिलचस्पी नहीं थी। कालिया को लगा की अगर वह कैसे भी ज्योति को मना लेता है तो उसकी रात सुहानी बन सकती है।

सुनीलजी ने दोनों दरवाजे बंद कर दिए। कालिया दरवाजे के बाहर पहरेदारी में था। दरवाजा बंद होते ही ज्योति, सुनीलजी और सुनीलजी इकट्ठे हो गए और एक दूसरे की और देखने लगे।

सुनीलजी ने होँठों पर उंगली रख कर सब को चुप रहने का इशारा किया और वह पुरे कमरे की छानबीन करने में लग गए। उन्होंने पलंग, कुर्सी, मेज, दरवाजे, खिड़कियाँ सब जगह बड़ी अच्छी तरीके छानबीन की।

सुनीलजी को कोई भी कैमरा, या ऐसा कोई खुफिया यंत्र नहीं मिला। चैन की सांस लेते हुए उन्होंने सुनीलजी और ज्योति को कहा, “हमारे दुश्मन की सेना के अफसर हमसे हमारी सेना की गति विधियों के बारेमें खुफिया जानकारी हमसे लेना चाहते हैं। दुश्मन का कुछ प्लान है। शायद वह हम पर कोई एक जगह हमला कर घुसपैठ करना चाहते हैं। पर उन्हें पता नहीं की हम कहाँ कितने सतर्क हैं।

वह हमारी खातरदारी तब तक करते रहेंगे जबतक हम उनको खबर देते रहेंगे। जैसे ही उनको लगा की हम उनसे कोआपरेट नहीं करेंगे तो वह हमें या तो मार डालेंगे या फिर अपनी जेल में बंद कर देंगे। यह तय है की हम हमारे मुल्क से धोखा नहीं करेंगे।

कल जब उनके जनरल के सामने हमारी पेशी होगी तो वह जान जाएंगे की हम उन्हें कुछ भी नहीं बताने वाले। वह हमें खूब त्रास देंगे, मारेंगे, पीटेंगे, जलती हुई आग के अंगारों पर चलाएंगे और पता नहीं क्या क्या जुल्म करेंगे।

हमारी भलाई इसी में है की हम इस रात को ही कुछ भी कर यहां से भाग निकलें

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गर्मी और पसीने के मारे सुनीलजी, सुनीलजी और ज्योति, तीनों की हालत खराब थी। ऊबड़खाबड़ रास्ते पर इतना लंबा सफर वह भी घोड़े पर हाथ पाँव बंधे हुए करना थकावट देने वाला था। ज्योति लगभग बेहोशी की हालत में थी।

एक तो इतना लंबा सफर उपरसे कालिया की पुरे सफर के दौरान ज्योति के बूब्स को दबाना और जाँघों पर हाथ फिराते फिराते ज्योति की चूत तक हाथ ले जाना और मौक़ा मिलने पर पैंटी उठाकर चूत के अंदर उंगली घुसाने की कोशिश करते रहना बगैरह हरकतों से ज्योति एकदम थक चुकी थी।

सुनीलजी के बारेमें सोचते हुए कई बार ज्योति उत्तेजित भी हो जाती थी और एकाध बार तो झड़ भी चुकी थी। उपर से कालिया के अजगर जैसे लम्बे और मोटे लण्ड से निकली हुई उसकी चिकनाहट ने ज्योति के पूरा हाथ को चिकनाहट से भर दिया था।

जब सुनीलजी ने कहा की उन्हें भाग निकलना चाहिए तो ज्योति को उस मुसीबत के दरम्यान भी हँसी आगयी। सुनीलजी ऐसे बात कर रहे थे जैसे बाहर निकलना बच्चों का खेल हो। बाहर कालिया भैंसे जैसा पहलवान बैठा था, जिसके हाथ में भरी हुई बंदूक थी।

उपर से कर्नल नसीम ने बात बात में उन्हें सावध कर दिया था की बाहर ही उन्होंने भयानक हाउण्ड भूखे छोड़ रखें हैं, जिनको सुनीलजी के बदन की भली भाँती पहचान थी। जाहिर है की बाहर और भी सिपाही लोग पहरा दे रहे होंगे। ऐसे में भाग निकलने का तो सवाल ही नहीं था।

कुछ ही देरमें किसीने उनका दरवाजा खटखटाया। एक चौकीदार तीन प्लेट्स और खाना लेकर आया। उसने मेज पर खाना लगा दिया। खाना सजा कर पहरेदार झुक कर चला गया। ज्योति और सुनीलजी सुनीलजी की और देख ने लगे।

सुनीलजी ने कहा, “देखो कहावत है ना की बकरे को मारने के पहले अच्छा खासा खिलाया पिलाया जाता है। चलो आज रात को तो खापी लें।

सबने मिलकर खाया।

ज्योति को कुछ आराम करने की जरुरत थी। ज्योति कमरे के साथ में ही लगे गुसलखाने (बाथरूम) में गयी। बाथरूम साफ़ सुथरा था। बाल्टी में ठंडा साफ़ पानी भी था। ज्योति का नहाने का मन किया। पर सवाल था की नहाने के बाद पोंछे किस से और कपड़ा क्या बदलें?

ज्योति ने अपने पति सुनीलजी को इशारा किया और पास बुलाया। ज्योति ने कहा, “मुझे नहाना है। साफ़ होना है। उस गंदे बदबूदार कालिये ने पुरे रास्ते में मेरी जान ही निकाल ली है। मुझे इतना गंदा सा फील हो रहा है। पर क्या करूँ? ना तो कोई तौलिया है और ना ही कोई बदलने के लिए कपड़ा।”

सुनीलजी ने कहा, “देखो, हम कोई पांच सितारा होटल में नहीं ठहरे हैं। यह जेल है। भगवान् इनका भला करे की इन्होने हमें इतनी भी सहूलियत दी है। वह सोच रहे होंगे की शायद हमें सहूलियत देने से हम उनको सारी खुफिया खबर यूँ ही दे देंगे। खैर जहां तक बात है तौलिये की और कपडे बदलने की, तो तुम नहा कर इन्हीं कपड़ों से पोंछ लेना और इन्हें सुखाने के लिए रख देना। इतनी गर्मी में यह जल्द ही सुख जाएंगे।”

ज्योति ने अपने पति की और अचम्भे से देखा और बोली, “तुम पागल हो? अरे मैंने अगर कपडे भिगोये और सुखाने के लिए रक्खे तो फिर मैं क्या पहन के सोऊंगी?”

सुनीलजी ने कहा, “रोज कौन से कपडे पहन कर सोती हो?”

ज्योति ने अपने पति की और देखा और बोली, “तुम्हारा जवाब नहीं। अरे एक ही तो पलंग है। और सोने वाले हैं हम तीन। कोई पर्दा भी नहीं है। तो क्या मैं जसस्सूजी के साथ नंगी सो जाऊं?”

सुनीलजी ने कड़ी नज़रों से ज्योति की और देखा और बोले, “वह सब तुम जानो। अगर नंगी सो भी जाओगी तो यकीन मानो सुनीलजी तुम पर चढ़ जाकर तुम्हें चोदेंगे नहीं। हम एक आपात स्थिति में हैं। यहां हम सब यह सोचकर नहीं आये।”

ज्योति ने एक गहरी साँस ली। पति के साथ बात करना बेकार था। ज्योति ने कहा, “चलो ठीक है, सबसे पहले आप लोग नहा लो या फ्रेश हो जाओ। फिर मैं सीचूंगी मुझे क्या करना है।”

सबसे पहले सुनीलजी बाथरूम में गए और नहा कर जब बाहर निकले तो उन्होंने एक छोटी सी निक्कर पहन रक्खी थी, अंदर के बाकी कपडे धो कर निचोड़ कर पलंग पर ही उन्होंने इधर उधर लटकाये। उन्होंने अपना यूनिफार्म जराभी गिला नहीं किया।

ज्योति सुनीलजी के करारे बदन को देखती ही रही। उनके बाजुओं के शशक्त माँसपेशियाँ, उनका लंबा कद, उनके घने घुंघराले बाल और छाती पर बालों का घना जंगल कोई भी स्त्री को मोहित करने वाला था। निक्कर में से उनका फनफनाते लण्ड का आकार साफ़ साफ़ दिख रहा था।

सुनीलजी की सपाट गाँड़ और चौड़े सीने के निचे सिमटा हुआ कई सिलवटदार पेट सुनीलजी की फिटनेस का गवाह था। जाहिर था की वह किसी भी औरत को चुदाई कर के पूरी तरह संतुष्ट करने में शक्षम लग रहे थे।

सुनीलजी भी नहाकर सुनीलजी की ही तरह निक्कर पहनकर आगये। सुनीलजी की निक्कर गीली होने से उनका लण्ड तो जैसे नंगा सा ही दिख रहा था। ज्योति ने उन्हें एक हल्का सा धक्का मारकर हलकी सी हंसी दे कर सुनीलजी ना सुने ऐसे कहा, “अरे तुम देखो तो, तुम्हारा यह घण्टा कैसा नंगा दिखता है।”

सुनीलजी ने भी हंसी हंसी में ज्योति के कानों में कहा, “अच्छा? तू हम दोनों के घण्टे ही देखती रहती हो क्या?” फिर वह पलंग पार जा कर लेट गए। अपने पति की बात सुनकर शर्म से लाल लाल हुई ज्योति आखिर में नहाने गयी।

ज्योति का पूरा बदन दर्द कर रहा था। उसकी कमर घुड़ सवारी से टेढ़ी सी हो गयी थी। पुरे रास्ते में कालिया का मोटा लण्ड ज्योति की गाँड़ को कुरेद रहा था।

अगर ज्योति के हाथ पीछे बंधे ना होते तो शायद वह कालिया ज्योति की पैंटी ऊपर करके अपना मोटा लण्ड ज्योति की गाँड़ में डाल ही देता।

हर बार जब कालिया ज्योति की कमर से उसका स्कर्ट ऊपर और पैंटी निचे खिसका ने की कोशिश करता, ज्योति उसका हाथ पकड़ लेती, जिससे कालिया ज्योति के चिल्लाने के डर से कुछ नहीं कर पाया था।

ज्योति ने बाथरूम में जाने के पहले कमरे की सारी बत्तियां बुझा दीं। फिर बाथरूम का दरवाजा बंद कर सारे कपडे निकाल कर पानी और साबुन रगड़ रगड़ कर अपना बदन साफ़ किया। वह कालिये की पसीने और उसके लण्ड की चिकनाहट की बदबू से निजाद पाने की कोशिश में थी।

अच्छी तरह साफ़ होने के बाद ज्योति सिर्फ अपनी पैंटी पहन कर बाहर निकली। उसने अपनी स्कर्ट और टॉप अच्छी तरह धो कर निचोड़ कर अपने साथ लेली ताकि उसे कहीं सूखा सके।

नहा कर बाहर निकलते हुए ज्योति ने जब हलके से बाथरूम का दरवाजा खोल कर देखा की कमरे में अन्धेरा था। ज्योति चुपचाप पलंग की और अपने पति के पास पहुंची।

जैसे जैसे ज्योति की आँखें अँधेरे से वाकिफ हुईं तो उसे कुछ कुछ दिखने लगा। ज्योति ने देखा की सुनीलजी सोये नहीं थे बल्कि बैठे हुए थे। ब्रा और पैंटी पहने हुए होने के कारण ज्योति को बड़ी शर्म महसूस हो रही थी। शायद सुनीलजी की आँखें बंद थीं।

ज्योति बिना आवाज किये कम्बल के अंदर अपने पति के साथ घुस गयी। उसका हाथ अपने पति की निक्कर में फ़ैल रहे लण्ड से टकराया।

सुनीलजी सुनीलजी की दूसरी तरफ बैठे हुए कुछ गहरी सोच में डूबे हुए लग रहे थे। ज्योति के पलंग में घुसते ही सुनीलजी ने ज्योति की भारी सी चूँचियों को सहलाने लगे।

इतनी ही देर में सब चौंक गए जब बाहर से कालिया की “ज्योति…. ज्योति” गुर्राने की आवाज सुनाई पड़ी।

कालिया की आवाज सुनकर ज्योति डर के मारे कम्बल में घुस गयी। तब अचानक चुटकी बजा कर सुनीलजी बोले, “मेरी बात ध्यान से सुनो। हम यहां से बाहर निकल कर भाग सकते हैं। और वह भेड़िये हाउण्ड भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ेंगे।”

सुनीलजी की बात सुनकर सुनीलजी और ज्योति अचम्भे से उन्हें सुनने के लिए तैयार हो गए। सुनीलजी ने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा, “अगर ज्योति हमारी मदद करे तो।”

सुनीलजी की बात सुनकर सुनीलजी बोले, “हाँ ज्योति मदद क्यों नहीं करेगी? क्या रास्ता है, बताओ तो?”

सुनीलजी ने कहा, “ज्योति को कालिया के पास जाना होगा। उसे फाँसना होगा।”

सुनीलजी की बात सुनकर ज्योति अकुला कर बोली, “कभी नहीं। अगर मैं उसके थोड़ी सी भी करीब गयी तो वह राक्षस मुझे छोड़ेगा नहीं। मैं जानती हूँ पुरे रास्ते मैंने क्या भुगता है। वह वहीं का वहीं मुझ पर बलात्कार कर मुझे मार डालेगा।”

ज्योति को रस्ते की आपबीती कहाँ भूलने वाली थी? सारे रास्ते में कालिया ज्योति को यही कहता रहता था, “ज्योति, मेरी जान तू मुझे एक बार चोदने का मौक़ा देदे। मेरे इस लण्ड से मैं तुझे ऐसे चोदुँगा की इसके बाद तुझे बाकी सारे लण्ड फ़ालतू लगेंगे। उसके बाद तू सिर्फ मुझ से ही चुदवाना चाहेगी। मेरी बात मानले, आज रात को मैं चुपचाप तुझे चोदुँगा और किसीको कानो कान खबर भी नहीं होगी। बस एक बार राजी हो जा।”

यह सुनकर ज्योति के कान पक गए थे। चुदवाना या फाँसना तो दूर, ज्योति उस कालिये की शकल भी देखना नहीं चाहती थी।
 
सुनीलजी ने कहा, “ज्योति, मेरा प्लान १००% सफल होगा। बस तुम्हें थोड़ी हिम्मत और धीरज रखनी होगी। समझा करो। बाहर कालिया बंदूक ले कर बैठा हुआ है। गली में भेड़िये जैसे भूखे हाउण्ड हमारा इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में हम कैसे बाहर निकलेंगे? यहां से छटक ने का सिर्फ एक ही रास्ता है। कालिया तुम पर फ़िदा है। अगर तुम उसे कुछ भी समझा बुझा कर पटा लोगी तो हम निकल पाएंगे। मेरी बात मानो और कालिया को ललचाओ।”

ज्योति ने सुनीलजी की बात का कोई जवाब नहीं दिया। तब सुनीलजी बोले, “देखो डार्लिंग! या तो हम यहाँ सारी रात गुजारें और कल इन लोगों की मार खाएं। सबसे बुराहाल तो तुम्हारा होगा। एक बार यह लोग समझ गए की हम उनकी बात नहीं मानने वाले हैं तो यह लोग एक के बाद एक या तो कई लोग एक साथ तुम्हारे सुन्दर बदन को भूखे भेड़िये समान नोंच नोंच कर चींथड़े कर देंगे। बाकी तुम जानो।”

ज्योति अपने पति की बात सुनकर डर के मारे काँपने लगी। उसे अपनी आँखों के सामने अन्धेरा दिखने लगा। उसे लगा की उसके लिए तो एक और कुआं था तो दूसरीऔर खाई। अगर पति की बात मानी तो पता नहीं यह कालिया उसके साथ क्या क्या करेगा। और नहीं मानी तो क्या हुआ यह तो बता ही दिया था।

ज्योति ने अपने पति सुनील से कहा, “तुम्हें पता है, मेरे साथ पुरे रास्ते में वह कालिया ने क्या क्या किया? उसने मेरे पुरे बदन को नोंचा, मेरे पिछवाड़े को अपने आगे से खूब कुरेदा और अपने हाथों से मेरी छाती को मसल मसल कर मेरे सीने को लाल लाल कर दिया। पुरे रास्ते वह मुझे मनाता रहा की मैं उसके साथ एक रात गुजारूं।

मुझे मरना है की मैं उसके साथ एक मिनट भी गुजारूं। बापरे मेरे बंधे हाथ में उसने अपना गवर्नर पकड़ा दिया था। बापरे, कितना बड़ा और मोटा था उसका गवर्नर! पता नहीं इसकी कोई बीबी है या नहीं।

पर अगर है तो वह एक भैंस जैसी ही होगी क्यूंकि इस कालिये का लेना कोई साधारण औरत का काम नहीं है। अब उसके साथ एक पल बिताना मेरे लिए पॉसिबल नहीं है। आई एम् सॉरी।”

ज्योति का डर देखकर सुनीलजी ने कहा, “ज्योति, डरो मत। तुम्हारे साथ कुछ नहीं होगा। मेरी बात ध्यान से सुनो।” उसके बाद सुनीलजी ने ज्योति को अपना प्लान बताया। सुनीलजी की बात सुनकर ज्योति को कुछ तसल्ली हुई। ज्योति अपने पति सुनीलजी की बाँहों में कुछ देर आराम कर ने के लिए सो गयी।

हालांकि बार बार बाहर से कालिया की “ज्योति…… ज्योति……. ” की आवाज सुनाई दे रही थी। सुनीलजी वैसे ही बैठे हुए सोच में डूबे हुए सही समय का इंतजार कर रहे थे। सुनीलजी भी इस ट्रिप में क्या क्या रोमांचक और खतरनाक अनुभवों के बारे में सोचते हुए अपनी बीबी की चूँचियों को सहलाते हुए तंद्रा में पड़े रहे।

रात बीती जा रही थी। ज्योति ठाक के मारे कुछ ही मनटों में गहरी नींद सो गयी। सुनीलजी की आँख में नींद का नामो निशाँ नहीं था। सुनीलजी कभी सो जाते तो कभी जाग जाते। बाहर से काइये की “ज्योति…… ज्योति…..” की पुकार कुछ मिनटों बाद सुनाई देती रहती थी।

कुछ देर बाद ज्योति को सुनीलजी ने जगाया। ज्योति गहरी नींद में से चौंक कर जागी। काफी रात हो चुकी थी। रात के करीब बारह बजने वाले थे। सुनीलजी ने ज्योति को इशारा किया।

ज्योति दबे पाँव दरवाजे के पास गयी और उसने धीरे से अंदर का लकड़ी का दरवाजा खोला। बाहर का लोहे का दरवाजा बंद था। दरवाजे के बाहर कालिया अपनी बन्दुक हाथ में लिए बैठा था।

ज्योति ने अंदर से “छी. … छी…. ” आवाज कर के कालिया को बुलाया। कालिया ने फ़ौरन देखा तो ज्योति को लोहे के दरवाजे के अंदर देखा। ज्योति ने अपना हाथ बाहर निकल कर कालिया को नजदीक आने का इशारा किया।

कालिया कुछ देर तक ज्योति के हाथ को देखता ही रहा। वह शायद इस असमंजस में था की वह दरवाजे के नजदीक जाए या नहीं। उसे डर था की कहीं इन लोगों के पास कुछ हथियार तो नहीं जिनसे वह उसको मारने का प्लान कर रहे हों।

पर जब उसने देखा की ज्योति सिर्फ ब्रा और पैंटी पहने खड़ी थी तो उससे रहा नहीं गया और वह उठकर ज्योति के पास गया।

ज्योति ने अपने होँठों पर उंगली रखते हुए धीमे आवाज में कहा, “सुनो, बिलकुल आवाज मत करो। अंदर मेरे पति और कर्नल साहब गहरी नींद सो रहे हैं, आवाज से कहीं वह जाग ना जाएँ। मैं अभी उनको गहरी नींद सुला कर आयी हूँ।’

फिर कालिया को और करीब बुलाकर लोहे का दरवाजा खोले बिना अंदर से ही एकदम धीरे से बोली, “देखो, मुझे तुम बहुत पसंद हो। मुझे तुम्हारा गर्म बदन बहुत पसंद है। पुरे रास्ते में तुमने मुझे बहुत मजा कराया। तुम्हारा वह जो है ना? अरे वह…? वह बहुत बड़ा और लंबा है। मैंने रास्ते में हिलाया तो मुझे बहुत अच्छा लगा। क्या तुम मुझसे ….. करना चाहते हो? क्या तुम जो कहते थे की तुम मुझे खूब मजे कराओगे वह करा सकते हो? तुम्हारे बॉस नाराज तो नहीं हो जाएंगे? यहाँ और कोई पहरे दार तो नहीं की हम पकडे जाएंगे? मैं किसीसे नहीं कहूँगी। बोलो?”

कालिया ज्योति को हक्काबक्का देखता ही रह गया। उसकी समझ में नहीं आया की इतनी खूबसूरत लड़की कैसे उससे इतनी जल्दी पट गयी।

ज्योति ने उसके शक को दूर करने के लिए कहा, “देखो आज तक मुझे किसीने इतने बड़े लण्ड से सेक्स नहीं किया। मैं हमेशा बड़े लण्ड वाले से सेक्स करना चाहती थी। मेरे पति का लण्ड एकदम छोटा है। मुझे बिलकुल मजा नहीं आता। क्या तुम मुझे चोदोगे?” ज्योति ने तय किया की वह राक्षस सीधी बात ही समझेगा। सेक्स बगैरह शब्द वह शायद ना समझे।

कालिया का चेहरा यह सुन कर खिल उठा। उसका तो जीवन जैसे धन्य हो गया। आजतक उसने खूबसूरत औरतों को चोदने के सपने जरूर देखे थे। पर हकीकत में उसने कभी सपने में भी यह सोचा नहीं था की एक दिन ऐसी हसीना उसे सामने चलकर चुदवाने का न्यौता देगी।

कालिया ने लोहे के दरवाजे स मुंह लगा कर कहा, “देखो, तुम बाहर आ जाओ। मेरा घर बाजू में ही है। वहाँ कोई चौकीदार नहीं है। हम पिछले वाले दरवाजे से जाएंगे। यहां से जैसे निकालेंगे ना उसके बाद तुरंत बाएं में एक दरवाजा है। मेरे पास उसकी चाभी है। उसको खोलते ही मेरा घर है। हम वहाँ चलते हैं।”

ज्योति ने अंदर की और देख कर कहा, “नहीं। तुम अंदर आजाओ। बाहर कोई भी हमें देख सकता है। मेरे पति और कर्नल साहब गहरी नींद सो रहे हैं। तुम आ जाओ और मेरी भूख शांत करो।”

कालिया कुछ देर सोचता रहा तब ज्योति ने कहा, “ठीक है। लगता है तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है। तो मैं फिर सो जाती हूँ। अगर तुम मेरी चुदाई कर मेरी भूख शांत करना नहीं चाहते हो तो मैं तुम्हें छोडूंगी नहीं। कल मैं तुम्हारे जनरल साहब को कहूँगी की तुमने मेरे साथ क्या क्या किया था।”

कालिया ने सोचा नेकी और पूछ पूछ? जब यह इतनी खूबसूरत औरत सामने चलकर चूदवाने का न्योता दे रही है और ऊपर से धमकी दे रही है की अगर उसको नहीं चोदा तो वह शिकायत कर देगी, तो फिर सोचना क्या? उसके पास बन्दुक तो थी ही, तो फिर अगर कुछ गड़बड़ हो गयी तो वह उनको गोली मार देगा।

यह सोच कालिया ने कहा, “ठीक है। तुम दरवाजा खोलो।“ ज्योति के लोहे के दरवाजा खोलते ही कालिया अपनी बन्दुक लेकर डरते डरते कमरे के अंदर दाखिल हुआ। कालिया ने सावधानी से चारों तरफ देखा। चारों तरफ एकदम शान्ति थी। कोई हलचल नहीं थी…

पलंग पर से दोनों मर्दों की खर्राटें सुनाई दे रही थी। दरवाजे के पास ही गद्दा बिछा हुआ था। उस गद्दे पर ज्योति सोइ होगी ऐसा कालिया ने मान लिया। उसे अँधेरे में कुछ ज्यादा साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था…
 
अंदर आते ही कालिया ने अपनी बन्दुक दरवाजे से थोड़ी अंदर की दीवार के सहारे रक्खी और ज्योति को अपनी बाहों में लेने के लिये ज्योति की और कमरे के अंदर आगे बढ़ा।

कालिया जैसे ही ज्योति के करीब पहुंचा की सुनीलजी और सुनीलजी दोनों पलंग पर रक्खे गद्दे को लेकर कालिया पर टूट पड़े। एक ही जबर दस्त झटके में दोनों ने कालिया को गिरा दिया और गद्दे में दबोच लिया जिससे उसके मुंह से कोई आवाज निकल ना सके।

ज्योति ने फ़ौरन बन्दुक अपने हाथों में ले ली। सुनीलजी ने फ़टाफ़ट गद्दा हटाया और ज्योति के हाथों से बन्दुक लेकर कालिया की कान पट्टी पर रख कर बोले, “अगर ज़रा सी भी आवाज की तो मैं तुझे भून दूंगा। मैं हिन्दुस्तानी सेना का सिपाही हूँ और दुश्मनों को मारने में मुझे बड़ी ख़ुशी होगी। तुम अगर अपनी जानकी सलामती चाहते हो तो हमें यहां से बाहर निकालो। क्या तुम हमें बाहर निकालोगे या नहीं?”

कालिया ने कर्नल साहब की और देखा। उस अँधेरे में भी उसे कर्नल साहब का विकराल चेहरा दिखाई दे रहा था। वह समझ गया की कर्नल साहब कोरी धमकी नहीं दे रहे थे। कालिया ने फ़ौरन कर्नल साहब को अपना सर हिला कर कहा, “ठीक है।”

कर्नल साहब ने कालिया की कान पट्टी पर बंदूक का तेज धक्का देकर कहा, “चलो और अपने कुत्तों को शांत करना वरना तुम्हें और उन्हें दोनों को गोली मार दूंगा।”

कालिया आगे और उसके पीछे कर्नल साहब कालिया की कान पट्टी पर बंदूक सटाये हुए और उनके पीछे सुनीलजी और ज्योति चल पड़े। वही रास्ता जो कालिया ने ज्योति को बताया था उसी रास्ते पर कालिया सबको अपने घर के पास ले गया।

अचानक दोनों हाउण्ड कर्नल साहब की गंध सूंघते ही भागते हुए वहाँ पहुंचे। कालिया ने झुक कर उन हाउण्ड का गला थपथपाया तो वह हाउण्ड वहाँ से चले गए। वह हाउण्ड कालिया को भली भाँती जानते थे।

जब कालिया ने उनका गला थपथपाया तो वह समझ गए की अब उनको कर्नल साहब की गंध के पीछे नहीं दौड़ना है। अब यह आदमी उनका दोस्त बन गया था ऐसा वह समझ गए।

हाउण्ड से निजात पाते ही कालिया उन्हें लेकर आगे की और चल पड़ा। थोड़ा चलते ही वही नदी आ गयी जिसके किनारे किनारे वह काफिला आया था।

जैसे ही सब नदी के किनारे पहुंचे, कर्नल साहब ने अचानक ही बंदूक ऊपर की और उठायी और फुर्ती से बड़े ही सटीक चौकसी से और बड़ी ताकत से कालिया को सतर्क होने का कोई मौक़ा ना देते हुए बंदूक का भारी सिरा कालिया के सर पर दे मारा।

कालिया के सर पर जैसे ही बंदूक का भारी सिरा लगा, तो कालिया चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ा। कालिया की कानपट्टी से खून की धार निकल पड़ी। इतने जोर का वार कालिया बर्दाश्त नहीं कर पाया। एक उलटी कर कालिया वहीँ ढेर हो गया।

सुनीलजी और ज्योति ने सुनीलजी का ऐसा भयावह रूप पहले नहीं देखा था। उनके चेहरे पर हैरानगी देख कर कर्नल साहब ने कहा, “यह लड़ाई है। यहाँ जान लेना या देना आम बात है। अगर हम ने इसको नहीं मारा होता तो वह हम को मार देता। अब हमें इसकी बॉडी को ऐसे ठिकाने लगाना है जिससे वह दुश्मन के सिपाहियों को आसानी से मिल ना सके ताकि पहले दुश्मन कालिया की बॉडी ढूंढने में अपना काफी वक्त गँवाएँ। और हमें कुछ ज्यादा वक्त मिल सके।” सुनीलजी का सोचने का तरिका सुनकर ज्योति सुनीलजी की कायल हो गयी।

सुनीलजी ने कालिया की बॉडी को टांगों से नदी की और घसीटना चालु किया। सुनीलजी भी सुनीलजी की मदद करने आ गए। दोनों ने मिलकर कालिया की बॉडी को नदी के किनारे एक ऐसी जगह ले आये जहां से उन्होंने दोनों ने मिलकर उसे उछालकर निचे नदी में फेंक दिया। नदी के पानी का बहाव पुर जोश में था। देखते ही देखते, नदी के बहाव में कालिया की बॉडी गायब हो गयी।

वैसे ही चारों और काफी अन्धेरा था। आकाश में काले घने बादल छाने लगे और बूंदा बांदी शुरू हो गयी थी। आगे रास्ता साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था। दिन की गर्मी की जगह अब ठंडा मौसम हो रहा था। सुनीलजी ने सुनीलजी का हाथ थामा और उनके हाथों में कालिया की बंदूक थमा दी।

सुनीलजी ने ज्योति को कहा, “ज्योति तुम सबसे आगे चलो। मैं तुम्हारे पीछे चलूँगा। आखिर में सुनीलजी चलेंगे। हम सब पेड़ के साथ साथ चलेंगे और एक दूसरे के बिच में कुछ फैसला रखेंगे ताकि यदि दुश्मन की गोली का फायरिंग हो तो छुप सकें और अगर एक को लग जाए तो दुसरा सावधान हो जाए।”

फिर सुनीलजी सुनीलजी की और घूम कर बोले, “सुनीलजी अगर हमें कुछ हो जाये तो आप इस बंदूक को इस्तेमाल करने से चूकना नहीं। अब हमें बड़ी फुर्ती से भाग निकलना है। हमारे पास ज्यादा से ज्यादा सुबह के पांच बजे तक का समय है। शायद उतना समय भी ना मिले। पर सुबह होते ही सब हमें ढूंढने में लग जाएंगे। तब तक कैसे भी हमें सरहद पार कर हमारे मुल्क की सरहद में पहुँच जाना है।”

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