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Erotica साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन complete

एक ही रात की बात थी जब उनका और आयेशा का मिलन हुआ। पर उनको ऐसा लगा जैसे सालों का साथ हो। पर एक ही पल में वह साथ छूट गया।

सुनीलजी अपने आपको रोक नहीं पाए और जोर शोर से फफक फफक कर रोने लगे। उनको रोते हुए सुनने वाला और सांत्वना देने वाला कोई नहीं था।

सुनीलजी एक चट्टान के पीछे आयेशा का बदन घसीट कर ले गए। फायरिंग जारी था और रुकने का नाम नहीं ले रहा था। सुनीलजी का वहाँ दुश्मनों की सरहद में रुकना खतरे से खाली नहीं था। कैसे भी कर उन्हें हिन्दुस्तान की सरहद में दाखिल होना जरुरी था। उनके पास आयेशा की बॉडी को दफनाने का समय ही नहीं था।

सुनीलजी ने आयेशा की बॉडी को खिसका कर चट्टान के पीछे ले जाकर कुछ डाल और पत्तों से उसे ढक दिया। फिर दिए धीरे वह उस कुटिया की और जमीन पर रेंगते हुए चल पड़े। कुछ देर चलने के बाद घनी झाडी में उन्हें वही नदी दिखाई दी। बिना सोचे समझे सुनील उसमें कूद पड़े। उतनी ही देर में उनपर फायरिंग होने लगी।

सुनीलजी ने पानी में डुबकी लगा कर गोलियों से बचने फुर्ती से पानी के अंदर तैरने लगे। पानी का बहाव तेज था। पहाड़ों से पानी निकल कर निचे की और फुर्ती से बह रहा था। बहाव इतना तेज था और पानी इतना गहरा था की कोई भी तैराक उस में कूदने का साहस नहीं करेगा।

यही जगह थी जहां पर सरहद में कुछ झरझरापन था। यहाँ सैनिक निगरानी कुछ कमजोर थी। इसका फायदा दुशमन के फौजी और आतंकवादी अक्सर उठाते रहते थे।

सुनीलजी की बाँह का घाव अब दर्द देने लगा था। वह थके हुए थे और उनको ऐसा लग रहा था की कहीं वह पानी में बेहोश ना हो जाएँ। जैसे तैसे हाथ पाँव मारते हुए वह निचे की और तेजी से पानी में बह रहे थे। जिस दिशा में वह जा रहे थे उन्होंने अंदाज लगाया की वह हिन्दुस्तानी सरहद में दाखिल हो चुके हैं। गोलियों की फायरिंग भी बंद हो चुकी थी।

सुनीलजी ने अपना सर पानी से बाहर निकाला और देखा की दूर दूर में वह कुटिया नजर आ रही थी। सुनीलजी तैरते हुए नदी के किनारे आ गए। उनके बाँहों में सख्त दर्द हो रहा था। उनको ट्रीटमेंट की जरुरत थी। वह लुढ़कते हुए पानी के बाहर निकले। पर बाहर निकल कर थोड़ा चलने पर ही ढेर होकर गिर पड़े। थोड़ी देर बाद जब वह होश में आये तो पाया की वह तो वहीं नदी के किनारे लेटे हुए थे और कुछ मछवारे उनको ऊपर से देख रहे थे।

उनमें से एक मछवारे ने उन्हें हाथ का सहारा देकर उठाया। उस मछवारे ने सुनीलजी से कहा, “तुम्हारे घाव से खून निकल रहा है। इस तरफ डॉ. खान का शफाखाना है। वहाँ जाइये और अपना इलाज कराइये। इंशाअल्लाह ठीक हो जाएगा।”

सुनीलजी वहाँ से लड़खड़ाते लुढ़कते हुए डॉ. खान के शफा खाने पर पहुंचे और वहाँ पहुँचते ही उन्होंने दरवाजे की घंटी बजाई। उनके पाँव से जमीन जैसे खिसक गयी जब सुनीलजी ने डॉ. खान के शफाखाने का दरवाजा खोला।

सुनीलजी का हाल देख कर सुनीलजी बड़े ही आश्चर्य और आघात से सुनीलजी को देखने लगे। सुनील जी के सारे कपडे एकदम भीगे हुए पर खून के लाल धब्बों से पूरी तरह रंगे हुए थे। उनकी एक बांह से खून निकल रहा था। सुनीलजी ने फ़ौरन सुनीलजी को अंदर बुला लिया और दरवाजा बंद करते बुए पूछा, “क्या हुआ सुनीलजी? यह क्या है…….?”

इससे पहले की सुनीलजी अपनी बात पूरी करे, सुनीलजी सुनीलजी से लिपट गए और फफक फफक कर रो पड़े। उनकी आँखों से आंसूं रुकने का नाम ही नाहीं ले रहे थे। सुनीलजी ने उनको अपना कमीज निकाल ने के लिए कहा। यह सब आवाजें सुनकर बिस्तरे पर नंगी सो रही ज्योति जाग गयी और चद्दर को बदन पर लपेटे बिस्तरे में बैठ गयी। उसने अपने पति का खून में लथपथ हाल देखा तो ज्योति की तो जान ही निकल गयी।

ज्योति को होश ही नहीं रहा की उसने बदन पर कोई भी कपड़ा नहीं पहना था। जब ज्योति बिस्तर से उठ खड़ी हुई तब उसे अपनी नग्न हालात का अंदाजा लगा। फ़ौरन उसने बिस्तर से ही चद्दर उठाई, अपने आपको ढका और भागती हुई आकर जार जार रोते हुए अपने पति से लिपट गयी। सुनीलजी की आँखों से आंसूं की गंगा जमुना बह रही थी। सुनीलजी ने उनको गले लगा कर सुनीलजी को काफी सांत्वना देनेका प्रयास किया।

ज्योति और सुनीलजी ने पूछा की क्या सुनीलजी को कहीं घाव है? तब सुनील जी ने अपने कमीज की आस्तीन उठाकर बाँह पर लगे हुए घाव को दिखाया।

सुनीलजी भाग कर डॉ. खान के एक अलमारी में रखे हुए घाव पर पट्टी बगैरह लगा ने वाले सामान को उठा लाये और उन्होंने और ज्योति ने उनकी मरहम पट्टी की।

ज्योति भी अपने पति से गले लग कर उनको ढाढस देने की कोशिश करने लगे। कुछ समय बीतने पर जब सुनीलजी कुछ शांत हुए तो उन्होंने अपनी कहानी सुनीलजी और ज्योति को बतानी शुरू की।

सुनीलजी ने कहा, “सुनीलजी, मैंने आज तक मेरी जिंदगी में पटाखा फोड़ने वाली बन्दुक भी नहीं चलायी थी। पर आज रातको ना सिर्फ मैंने आपका असली फौजी रूप देखा जिसमें आपने एक हट्टेकट्टे आदमी को गोली से भून दिया पर मैंने अपने हाथों से दुश्मन के एक फौजी को एक कटार से मौत के घाट भी उतार दिया। उतना ही नहीं, कुछ ही देर के बाद मैंने एक आतंकवादी को भी मेरी बन्दुक से मार गिराया। मेरे सामने मैंने मेरी ही करीबी महिला साथीदार को दुश्मन की गोलियों से छलनी होते हुए देखा।

सुनीलजी की बात सुन सुनीलजी और ज्योति दोंनो चकमें आ गए। सुनीलजी की महिला साथीदार? वह कौन थी? सुनीलजी और ज्योति पहले सुनीलजी की और फिर एक दूसरे की और प्रश्नात्मक नजर से देखने लगे।

सुनीलजी ने बताया की कैसे वह उस रात को सुनीलजी से अलग होने के बाद अँधेरे में चलते चलते नदी किनारे एक गॉंव से कुछ दूर पहुंचे और वहाँ उन्होंने कुछ बन्दुक की फायरिंग की आवाज सुनी।

उसके बाद उन्होंने अपनी सारी कहानी बताई जिसमें की उन्होंने एक दुशमन के मुल्क की लड़की की जान कैसे बचाई और काफी रात तक गुफा में छुपे रहने के बाद जब उस लड़की ने उनसे वादा किया की वह उन्हें सरहद पार करा देगी तब वह दोनों छुपते छुपाते गुफा से बाहर निकले। अचानक ही दुश्मन की और से आये हुए दहशतखोरों ने जब उन्हें देखा तो गोलियां दागनी शुरू कर दीं।

सुनीलजी जी ने भी जवाबी कारवाई करते हुए अपनी बन्दुक से एक आतंक वादी को ठार मार दिया, पर उस फायरिंग में उस लड़की जिसका नाम आयेशा था उसे गोली लगी। वह लड़की ने मरते हुए भी सुनीलजी को डॉक्टर के घर का रास्ता बताया जहां सुनीलजी को सुरक्षा मिलेगी और घाव का इलाज भी होगा।

सुनीलजी थकान से चूर हो गए थे। उनमें बोलने की भी ताकत नहीं थी। उन्होंने देखा की उनकी पत्नी ज्योति सुनीलजी के बिस्तर में नंगी सोई हुई थी। उन्हें समझने में देर नहीं लगी की क्या हुआ होगा। आखिर वह जो चाहते थे वह हुआ। पर उनमें हिम्मत नहीं थी की वह कुछ बोले।

उन्होंने हड़फड़ाहट में कपडे पहने हुए सुनीलजी को देखा और चद्दर में लिपटी हुई अपनी पत्नी ज्योति को भी देखा। पर आगे कुछ बोले उसके पहले वह बिस्तर पर ढेर हो कर गिर पड़े और फ़ौरन खर्राटे मारने लगे।

ज्योति और सुनीलजी एक दूसरे की और देखने लगे। ज्योति ने तुरंत आपने पति के पाँव स गीले जूते निकाले। फिर उनका शर्ट और पतलून भी निकाला। सुनीलजी के सारे कपडे ना सिर्फ भीगे हुए थे पर खून के लाल धब्बों से रंगे हुए और गंदे थे। ज्योति ने अपने पति के सारे कपडे एक के बाद एक निकाले और गरम पानी से कपड़ा भिगो कर अपने पति के पुरे शरीर को स्पंज किया।

इस दरम्यान सुनीलजी गहरी नींद में सोये हुए ही थे। ज्योति ने उन्हें पूरी तरह प्यार से निर्वस्त्र कर दिया और ज्योति और सुनीलजी ने बिस्तर में ठीक तरह स सुला कर और ऊपर से कम्बल बगैरह ओढ़ा दिया।

सुनीलजी को आराम से बिस्तरे में सुलाकर सुनीलजी फारिग हुए थे की डॉ. खान की आवाज उनको दरवाजे के बाहर से सुनाई दी।

डॉ. खान कह रहे थे, “कर्नल साहब, आज वैसे ही जुम्मा है। शफाखाना आज बंद है। प आज के पुरे दिन और रात को आराम करो दुपहर को और शामको मैं आप तीनों के लिए खाना ले कर आऊंगा। आप कल सुबह तक यहां ही रुकिए। आप तीनों ही थके हुए हैं। मैं एक गद्दा और भिजवा देता हूँ।

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कुछ ही देर में गद्दा और रजाई चटाई बगैरह लेकर डॉ. खान हाजिर हुए। डॉ. खान ने सुनीलजी से सुनीलजी की कहानी सुनी। कैसे आतंकवादियों से उनका पाला पड़ा था, बगैरा।

आखिर में गहरी साँस लेते हुए डॉ. खान बोले, “अल्लाह, ना जाने कब ये मातम का माहौल थमेगा और चमन फिर इन वादियों में लौटेगा? पर बच्चों, यहां दुश्मनों को गोलीबारी का ज्यादा असर नहीं होता क्यूंकि यहां से सरहद दुरी पर है।”

कर्नल साहम ने डॉ. खान से कहा, “डॉक्टर साहब आपका बहुत बहुत शुक्रिया। पर हमें हिंदुस्तानी सेना बड़ी शिककत से खोज रही होगी। हमें चाहिए की हम फ़ौरन हमारी सेना को इत्तला करदें की हम यहां है ताकि वह हमें यहां से ले जाने की व्यवस्था करें।”

डॉ. खान ने अपना सर हिलाते हुए कहा, “पिछले दो दिन से यहां दहशतगर्दों के कारण इंटरनेट और टेलीफोन सेवा ठप्प पड़ी हुई है। वैसे भी टेलीफोन मुश्किल से चलता है। पर हाँ अगर मेरी मुलाकात कोई हिंदुस्तानी फ़ौज के जवान से हुई तो मैं उसे बताऊंगा की आप लोग यहाँ रुके हुए हैं। आप अपना नाम और पता एक कागज़ में लिख कर मुझे दीजिये। जब तक सेना का बुलावा नहीं आता आप आप निश्चिन्त यहाँ विश्राम कीजिये। तब तक इन जनाब का घाव भी कुछ ठीक होगा। आपके खाने पिने का सारा इंतजाम यहां है।”

सुनीलजी इस भले आदमी को आभार से देखते रहे। उन्होंने अपना, ज्योति का और सुनीलजी का नाम एक कागज़ पर लिख कर दे दिया। फिर डॉ. खान ने ज्योति को सही कपडे भी ला दिए और सब के नाश्ते का सामान दे कर वह ऊपर नमाज पढ़ने चले गए। सुबह के करीब दस बज रहे थे।

सुनीलजी ने ज्योति की और देखा। वह डॉ. खान की बड़ी लड़की के दिए हुए ड्रेस में कुछ खिली खिली सी लग रही थी। दरवाजा बंद होते ही ज्योति सुनीलजी की गोद में आ बैठी और सुनीलजी की चिबुक अपनी उँगलियों में पकड़ कर अपने पति की और इशारा कर के बोली, “मेरे राजा, यह क्या हो गया? सुनीलजी की मानसिक हालत ठीक नहीं लग रही। अब बताओ हम क्या करें?”

सुनीलजी ने ज्योति को अपनी बाँहों में भर कर कहा, “जानेमन, पहले तो हम इन्हें उठायें और कुछ् खाना खिलाएं। टेबल पर गरमागरम खाने की खुशबु आ रही है और मैं भूखा हूँ। ”

ज्योति ने मजाक में हंसकर कहा, “सुनीलजी आप तो हरबार भूखे ही होते हो।”

सुनीलजी ने फिर ज्योति को अपनी बाँहिं में भरकर उसे चूमते हुए कहा, तुम्हारे लिए तो मैं हरदम भूखा होता हूँ। पर मैं अभी खाने की बात कर रहा हूँ।”

ज्योति ने अपने पति की और इशारा करते हुए कहा, “इनका क्या करें?”

सुनीलजी ने कहा, “सुनीलजी बहुत ज्यादा थके हुए हैं। वह ना सिर्फ शारीरिक घाव से परेशान है, बल्कि उनके मन पर काफी गहरा घाव है। लगता है, उस विदेशी लड़की से उनका लगाव कुछ ज्यादा ही करीब का हो गया था। देखो यह थोड़ी गंभीर बात है पर मुझे लगता है एक ह रत में उस लड़की से सुनीलजी का शारीरिक सम्बन्ध भी हुआ लगता है।”

ज्योति थोए कटाक्ष करते हुए थोड़ा टेढ़ा मुंह कर बोली, “सुनीलजी साफ़ साफ़ क्यों नहीं कहते की मेरे पति किसी अनजान औरत को चोद कर आए हैं?”

सुनीलजी ने बड़ी गंभीरता से सुनीलजी की और देखते हुए कहा, “ज्योति, चुदाई को इतने हलके में मत लो। यह प्यार का अपमान है। चुदाई दो तरह की होती है। एक तो कहते हैं ना, “मारा धक्का, माल निकाला, तुम कौन और हम कौन?” यह एक रीती है। भरी जवानी के पुर जोश में कई बार कुछ लोग ऐसे चुदाई करते हैं। ख़ास कर आजकल कॉलेज में कुछ सिर्फ चंद युवा युवती। पर तुम्हारे पति ऐसे नहीं।

मैं जानता हूँ की आज तक वह कितनी लड़कियों को चोद चुके हैं। पर अब वह बदल गए हैं। उनका सेक्स का भाव अब परिपक्व हो गया है। वह भी तुम्हारी तरह हो गए हैं। वह मानने लगे हैं की चुदाई याने सेक्स, वह मन के मिलने से होना चाहिए। सुनीलजी का उस लड़की से सम्बन्ध भी उसी कक्षा में था भले ही एक ही रात में हुआ हो। तुम्हारे पति ने अगर उस लड़की को चोदा भी होगा तो उन्होंने खुद बताया की दोनों ने एक दूसरे के लिए जान न्यौछावर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अफ़सोस इस बात का है की वह लड़की अपनी जान गँवा बैठी। ख़ुशी इस बात की है की सुनीलजी बाल बाल बच गए।”

सुनीलजी की बात सुन ज्योति कुछ झेंप सी गयी और सुनीलजी के होँठों से होंठ मिलाती हुई बोली, “सुनीलजी आप बड़े ही परिपक्व और सुलझे हुए इंसान हो। मैं अपने पति को नहीं समझ पायी। आपने उन्हें सही समझा। वाकई आप ठीक कहते हैं।”

सुनीलजी ने ज्योति के होँठों को चूमते हुए कहा, “तुम जाओ और अपने पतिको प्यार से उठाओ। पहले उनको खाना खिलाते हैं। बाद में ठंडा हो जाएगा। फिर देखते हैं वह क्या कहते हैं।”

ज्योति अपने पति सुनीलजी के पास गयी और उनके बालों को हलके से संवारते हुए उनके कानों में प्यार भरे शब्दों में बोली, “जानेमन सुनील, उठो तो, खाना आ गया है। थोड़ा खालो प्लीज? अभी गरम है। फिर ठंडा हो जाएगा।”

सुनीलजी ने आँखें खोलीं और आधी नींद में ही दोनों की और देखा। फिर बिना बोले ही बिस्तरमें लुढ़क पड़े।”

यह बहुत थक गए हैं और वैसे भी उनको आराम की सख्त जरुरत है। उनको सोने देते हैं। जब वह जग जाएंगे तो मैं उनके लिए खाना गरम कर दूंगी। अभी हम दोनों खा लेते हैं और फिर हम भी आराम करते हैं। आप भी बहुत थके हुए हो। आखिर फौजियों को भी आराम की जरुरत होती है। मैं तो थकान और आधी अधूरी नींद के कारण चकनाचूर हो चुकी हूँ। बस बिस्तर में जाकर औंधी होकर सो जाउंगी। आज पूरा दिन और पूरी रात बस सोना ही है।”

ज्योति ने फ़ौरन खाना परोसा और सुनीलजी और ज्योति दोनों ने खाना खाया। ज्योति ने सुनीलजी से पलंग की और इशारा कर कहा, “आप पलंग पर सो जाओ। मैं निचे फर्श पर इस गद्दे पर सो जाउंगी।”

सुनीलजी, “क्यों? तुम्हें फर्श पर बहुत ठण्ड लगेगी। मैं गद्दे पर क्यों नहीं सो सकता?”

ज्योति, “तो क्या आपको ठण्ड नहीं लगेगी? तो फिर क्या करें?”

सुनीलजी, “तो हम दोनों भी पलंग पर सो जाते हैं। वैसे भी यह पलंग काफी बड़ा है। तुम अपने पति के साथ सो जाना मैं हट के सो जाऊंगा।” यह कह कर सुनीलजी ने निचे रक्खी हुई रजाई उठायी और पलंग एक छोर पर सो गए।

ज्योति ने कहा, “ठीक है। मैं अपने पति के साथ सो जाउंगी।” यह कह कर ज्योति ने सारे बर्तन उठाये और उन्हें साफ़ कर सुनीलजी का खाना अलग से रख कर हाथ धो कर गाउन पहने हुए बिस्तर पर जा पहुंची। पलंग पर एक कोने में सुनीलजी सो रहे थे, दूसे छोर पर सुनीलजी थे। ज्योति बिच में जा कर लेट गयी। बिस्तर में पहुँच कर ज्योति ने सुनीलजी की रजाई खींची और अपने ऊपर ओढ़दी। अपना हाथ पीछे कर ज्योति ने सुनीलजी को अपनी और खिंच लिया।

सुनीलजी ने धीमे शब्दों में कुछ हलकी सी कड़वाहट के साथ कहा, “अरे! तुम अपने पति के पास सो जाओ ना? मेरा क्या है? मैं यहीं ठीक हूँ।”

ज्योति ने जवाब दिया, “मैं अपने पतियों के साथ ही तो सोई हुई हूँ। मैंने तुम्हें भी मेरे पति के रूप में स्वीकार किया है। अब तुम मुझसे बच नहीं सकते।”

सुनीलजी के मुंह पर बरबस मुस्कान आ गयी। सुनीलजी ने कहा, “नहीं। सिर्फ सोना ही नहीं है। अभी तो हमारा मिलन पूरा नहीं हुआ। उसे भी तो पूरा करना है।”

ज्योति ने अपने पति की और इशारा करते हुए कहा, “तो फिर इनका क्या करें?”

सुनीलजी ने कहा, “यह तो आपका सामान है। इसे तो आपको सम्हालना ही पडेगा।”

ज्योति ने कहा, “ठीक है, मेरा जो भी सामान है उन्हें मैं ही सम्हालूँगी।” यह कह कर ज्योति करवट बदल कर अपने पति सुनीलजी के पास उनके शरीर से लिपट गयी।

ज्योति ने अपनी एक टाँग उठायी और अपने पति की जाँघ पर रख दी और सुनीलजी को अपनी बाँहों में घेर लिया। फिर ज्योति ने एक हाथ पीछे कर सुनीलजी को अपनी और करीब खींचा।

सुनीलजी को खिसक कर ज्योति के पीछे उस की गाँड़ से अपना लण्ड सटा कर लेटना पड़ा। ज्योति ने सुनीलजी की एक बाँह पकड़ कर अपने एक बाजू को ऊपर कर सुनीलजी का हाथ अपने बाजू के निचे बगल में से अपने मस्त स्तनोँ पर रख दिया।
 
ज्योति चाहती थी की सुनीलजी उसके स्तनोँ को सहलाते रहें। तीनों गरम बदन एक दूसरे से चिपके हुए लेट गए। कुछ देर तक कमरे में एकदम शान्ति छा गयी। कुछ ही देर में तीनों खर्राटे मारने लगे। प्रचुर थकान की वजह से चाहते हुए भी तीनों गहरी नींद सो गए। चारों और सन्नाटा छाया हुआ था। खिड़की में से दूर दूर तक कोई इंसान जानवर नजर नहीं आता था। ऐसे ही कुछ घंटे बीत गए।

अचानक ज्योति के गाल पर कुछ पानी की बूंदड़ें टपकने लगी। ज्योति ने आँखें खोलीं तो पाया की उसके पति सुनीलजी ज्योति की आँखों में करीब से एकटक देख रहे थे। उनकी आँखों से आँसुंओं की धारा बह रही थी। ज्योति अपने पति के और करीब खिसकी और और उनसे और कस के चिपक गयी और बोली, “मेरी जान! क्या बात है? इतने दुखी क्यों हो?”

सुनीलजी ने ज्योति के होंठों पर हलके से चुम्बन किया और बोले, “डार्लिंग, आजतक मैंने किसी पर हाथ तक नहीं उठाया। आज इन्हीं हाथों से मैंने दो इंसानों को मौत के घाट उतार दिया। आज तक मैंने किसी डेड बॉडी को करीब से नहीं देखा था। आज और कलमें मैंने चार चार मृत शरीर को मेरे हाथों में उठाया। मैं खुनी हूँ, मैंने खून किया है। मुझे माफ़ कर दो।”

ज्योति ने अपने पति के सर को अपनी छाती से चिपका दिया और बोली, “जानू, तुम कोई खुनी नहीं हो। तुमने कोई खून नहीं किया। तुमने अपनी जानकी रक्षा की है और आत्मा रक्षा करना हम सब का कर्तव्य है। भगवान श्री कृष्ण ने भी श्रीमद भगवत गीता में अर्जुन को यही उपदेश दिया था की आत्मरक्षा से पीछे हटना कायरता का निशान है। जानू, तुम कायर नहीं और तुम खुनी भी नहीं हो। अगर तुमने उनको नहीं मारा होता तो वह तुमको मार डालते।”

ऐसा कह कर ज्योति ने अपने पति सुनील के ऊपर उठकर उनके होँठों से अपने होंठ चिपका दिए। अपने पति को क़िस करते हुए ज्योति उनको दिलासा दिलाती हुई बार बार यही बोले जा रही थी की “मेरा जानू कतई खुनी नहीं है। वह किसीका खून कर ही नहीं सकता।” जैसे माँ अपने बच्चे को दिलासा देती रहती है ऐसे ही ज्योति अपने पति को यह भरोसा दिला रही थी की उन्होंने कोई खून नहीं किया। साथ ही साथ में अपने स्तनों पर सुनीलजी का मुंह रगड़ कर ज्योति अपने स्तनों का अस्वादन भी अपने पति को करवा रही थी। ज्योति चाहती थी की सुनीलजी का मूड़ जो नकारात्मक भावों में डूबा हुआ था वह कुछ रोमांटिक दिशा में घूमे।

सुनीलजी नींद से जाग गए और पति पत्नी की चर्चा ध्यान से सुन रहे थे। वह भी ज्योति के पीछे उसके और करीब आये और सुनीलजी के आंसूं पोंछते हुए बोले, “सुनीलजी आप ने देश की और अपनी सुरक्षा की है और वास्तव में आप शाबाशी के पात्र हो। एक साधारण नागरिक के लिए इस तरह अपनी रक्षा करना आसान नहीं है। आपने अपने देश की भी रक्षा की है। वह ऐसे की, अगर आप पकडे जाते तो आपको यह दुश्मन बंधक बना देते और फिर अपनी सरकार से कुछ आतंकवादी छुड़वाने के लिए फिरौती के रूप में सौदेबाजी करते। हो सकता है मज़बूरी में सरकार मान भी जाती। इस नजरिये से देखा जाये तो आपने अपने आपकी सुरक्षा कर के देश सेवा की है।”

सुनीलजी ने सुनीलजी को अपनी पत्नी ज्योति के पीछे देखा तो अपना हाथ बढ़ा कर उनका हाथ अपने हाथों में लिया। सुनीलजी ने सुनीलजी से कहा, “सुनीलजी, मैं बता नहीं सकता की ज्योति को बचाकर आपने मुझ पर कितना बड़ा एहसान किया है। जो काम करने की मेरी हिम्मत और काबिलियत नहीं थी वह आपने कर दिखाया। मैं और ज्योति आपके सदा ऋणी रहेंगे।”

अपनी पत्नी और जिगरी दोस्त के सांत्वना और उत्साह से भरे वाक्य सुनकर सुनीलजी का मूड़ बिलकुल बदल चुका था। अब वह अपने पुराने शरारती अंदाज में आ गए थे। उन्होंने ज्योति को पकड़ा और जबरदस्ती करवट लेने को बाध्य किया। ज्योति अब सुनीलजी के मुंह से मुंह मिलाने के करीब थी। सुनीलजी ने ज्योति की गाँड़ में अपने पेंडू से धक्का माते हुए कहा, “ज्योति अब तो तुम्हारा प्रण पूरा हुआ की नहीं? अब तो तुम अपनी माँ को दिए हुए वचन का पालन करोगी ना? सुनीलजी ने अपनी जान जोखिम में डाल कर तुम्हारी जान बचायी। अब तो तुम मेरी ख्वाहिश पूरी करोगी ना?”

ज्योति ने अपने पति को चूँटी भरते हुए पर काफी शर्म से गालों पर लाली दिखाते हुए उसी अंदाज में कहा, “अब आपको सुनीलजी का ऋणी होने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने किसी और को नहीं बचाया उन्होंने अपनी ज्योति को ही बचाया है। जहां तक आपकी ख्वाहिश पूरी करने का सवाल है तो मैं क्या कहूं? आप दोनों मर्द हैं। मैं तो आपकी ही मिलकियत हूँ। अब आप जैसा चाहेंगे, मैं वैसा ही करुँगी।”

ज्योति ने धीरे से सारी जिम्मेवारी का टोकरा अपने पति के सर पर ही रख दिया। वैसे भी पत्नियां ऐसे नाजुक मामले में हमेशा वह जो करेगी वह पति के ख़ुशी के लिए ही करती है यह दिखावा जरूर करती है।

सुनीलजी ने अपनी पत्नी को और धक्का देते हुए सुनीलजी से बिलकुल चिपकने को बाध्य किया और अपने पेंडू से और कड़क लण्ड से ज्योति की गाँड़ पर एक धक्का मार कर सुनीलजी के होँठों से ज्योति के होँठ चिपका दिए। उन्होंने ज्योति का एक हाथ उठाया और सुनीलजी के बदन के ऊपर रख दिया जिससे ज्योति सुनीलजी को अपनी बाँहों में ले सके।

सुनीलजी ने बड़े ही संङ्कोच से सुनीलजी की और देखा। सुनीलजी ने आँख मारकर सुनीलजी को चुप रहने का इशारा किया और अपना हाथ भी अपनी बीबी के हाथ पर रख कर ज्योति को सुनीलजी को बाहुपाश में बाँधने को बाध्य किया।

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ज्योति ने अपने पति सुनीलजी की और अपना सर घुमा कर देखा और कहा, “देखिये आज आपने दो दुश्मन के फौजी और आतंकवादी को मार दिए इससे आप को इतनी ज्यादा रंजिश हुई और आप इतना दुखी हुए। हमारे फौजी नवजवानों को देखिये। लड़ाई में वह ना सिर्फ दुश्मनों को मौत के घाट उतारते हैं, वह खुद दुश्मनों की गोली पर बलिदान होते हैं। देश के लिए वह कितना बड़ा बलिदान है? सुनीलजीने वह कालिये को मारने में एक सेकंड का भी समय जाया नहीं किया। अगर उस कालिये को चंद सेकंड ही मिल जाते तो वह हम सब को मार देता।”

फिर ज्योति ने वापस सुनीलजी की और घूम का देखा और बोली, “सुनीलजी, आप ने हम सब पर इतने एहसान किये हैं की हम कुछ भी करें, हम आप का ऋण नहीं चुका सकते।”

ऐसा कह कर ज्योति ने सुनीलजी का सार अपनी छाती पर अपने उन्मत्त स्तनोँ पर रख दिया और उनके सर को अपने स्तनोँ पर रगड़ने लगी। ज्योति सुनीलजी के घुंघराले बालों को संवारने लगी।

पुरे कमरे में एक अत्यंत जज्बाती भावुक वातावरण हो गया। सुनीलजी और ज्योति की आँखों में प्यार भरे आंसूं बहने लगे। सुनीलजी ने पीछे से ज्योति को धक्का देते हुए ज्योति को सुनीलजी के आहोश में जाने को मजबूर कर दिया। सुनीलजी ने ज्योति को अपनी बाँहों में भर लिया और अपने बाजु लंबा करके सुनीलजी को भी अपने आहोश में लेना चाहा।

ज्योति बेचारी दोनों मर्दों के बिच में पीस रही थी। एक तरफ उसके पति सुनीलजी और दूसरी और उसके अतिप्रिय प्रियतम सुनीलजी। ज्योति ने अपने पति सुनीलजी की और प्रश्नात्मक दृष्टि से देखा। वह पूछना चाहती थी की क्या वह सुनीलजी के आहोश में जाए और उनको प्यार करे।

सुनीलजी ने अपनी पत्नी की और देखा और अपनी मुस्कुराते हुए उसे कोहनी मारकर सुनीलजी के और करीब धकेला और आँख की पालक झपका कर आगे बढ़ने को प्रोत्साहित किया। ज्योति फ़ौरन सुनीलजी के गले लिपट गयी और बोली, “आपने मुझे मरने से बचाया इसके लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया।”

ज्योति की बात सुनकर सुनीलजी कुछ नाराज से हो गए। उन्होंने ज्योति की पीठ थपथपाते हुए कहा, “ज्योति यह तुम लोग बार बार शुक्रिया, शुक्रिया कहते हो ना, तो मुझे परायापन महसूस होता है। क्या कोई अपनों के लिए काम करता है तो शुक्रिया कहलवाना चाहता है? यह सभ्यता विदेशी है। हम तो एक दूसरों के लिए जो भी कुछ करते हैं वह तो स्वाभाविक रूप से ही करते हैं। अब तुम दोनों सो जाओ। मैं भी थोड़ी देर सो जाता हूँ।”

यह कह कर सुनीलजी करवट बदल कर लेट गए। ज्योति को समझ नहीं आया की क्या वह ज्योति से प्यार करने से कतरा रहे थे या फिर सुनीलजी की हाजरी के कारण शर्मा रहे थे। कुछ ही देर में सुनीलजी की खर्राटें सुनाई देने लगीं।

सुनीलजी का रूखापन देख कर ज्योति को दुःख हुआ। फिर उसने सोचा की शायद सुनीलजी की हाजरी देख कर सुनीलजी कुछ असमंजस में पड़ गए थे। ज्योति ने करवट बदली और अपने पति के सामने घूम गयी। सुनीलजी पूरी तरह जाग चुके थे। ज्योति ने अपने पति से कहा, ” आप कुछ खा लीजिये न? खाना टेबल पर रखा है।”

सुनीलजी ने हाँ में सर हिलाया तो ज्योति फ़ौरन उठ खड़ी हुई और उसने अपने कपड़ों को सम्हालती हुई खाना गरम कर सुनीलजी को परोसा और खुद सुनील जी के करीब की कुर्सी में अपने कूल्हों को टिकाके बैठ गयी।

खाते खाते सुनीलजी ने ज्योति से एकदम हलकी आवाज में पूछा ताकि सो रहे सुनीलजी सुन ना पाए और जाग ना जाए, “ज्योति, यह तुमने ठीक नहीं किया। सुनीलजी ने तुम्हारे लिए इतना किया और तुमने बस? खाली शुक्रिया? ऐसे? तुम्हें सुनीलजी ने मरने से बचाया और तुम कह रही हो, बचाने के लिए शुक्रिया? ऐसा शुक्रिया तो अगर तुम्हारा रुमाल गिर जाये और उसे उठाकर कोई तुम्हें दे दे तो कहते हैं। जान जोखिम में डाल कर बचाने के लिये बस शुक्रिया?”

ज्योति ने मूड कर अपने पति की और देखा और बोली, “क्या मतलब? ऐसे नहीं तो कैसे शुक्रिया अदा करूँ?”

सुनीलजी ने कहा, “जाने मन, जब मैंने शादी के समय आपके लिए दुनिया का सब कुछ कुर्बान करने की सौगंध खायी थी तो बादमें आपने मुझे क्या तोहफा दिया था?”

ज्योति ने सोचकर कहा, “तोहफा? मैंने आपको कोई तोहफा नहीं दिया था। मैंने तो आपको अपना सर्वस्व और अपने आपको भी आपके हवाले कर दिया था।”

सुनीलजी, “ज्योति डार्लिंग, मैंने तो सिर्फ वादा ही किया था. सुनीलजी ने तो जैसे अपनी जान ही कुर्बान करदी थी और आपको बचाया। क्या आपका कोई फर्ज नहीं बनता?”

ज्योति के गालों पर शर्म की लालिमा छा गयी। ज्योति की नजरें निचे झुक गयीं। ज्योति समझ गयी थी की पति क्या कहना चाहते हैं। हालांकि ज्योति ने सुनीलजी से चंद घंटों पहले ही जम के चुदाई करवाई थी, पर अपने पति के सामने उसे इसके बारे में बात करना भी एकदम अजीब सा लग रहा था। वह अपने पति के सामने सुनीलजी से कैसी प्यार करे?

ज्योति ने शर्माते हुए कहा, “मैं जानती हूँ तुम क्या चाहते हो। पर मुझे शर्म आती है।”

सुनीलजी ने पूछा, “देखो, जानेमन, मैं जानता हूँ की तुम भी सुनीलजी से बहुत प्यार करती हो। शर्म अथवा लज्जा प्यार का एक अलंकार है। पर कभी कभी वह प्यार में बाधा भी बन सकता है। क्या तुम्हें मेरे सामने उन्हें प्यार करने में शर्म आती है?”

ज्योति ने लज्जा से सर नीचा करके अपना सर हिलाते हुए “हाँ” कहा। सुनीलजी का माथा ठनक गया। वह अपनी बीबी को अपने सामने सुनीलजी से चुदवाती हुई देखना चाहते थे। वह जानते थे की उसी रात को ही शायद सुनीलजी ने ज्योति की चुदाई कर के ज्योति को चोदने की शुरुआत तो कर ही दी थी। पर वह अपनी पत्नी को इस के बारे में पूछ कर उसे उलझन में डालना नहीं चाहते थे।

अब अगर वह अपनी बीबी को सुनीलजी से चुदवाती हुई नहीं देख पाए तो उनका सपना अधूरा रह जाएगा। उन्होंने ज्योति से दबी आवाज में पूछा, “पर अगर मैं चोरी से छुप कर देखूं तो?”

ज्योति ने अपना सर हिला कर मना कर दिया। ज्योति ने कहा, “तुम अपने सामने मुझसे यह सब क्यों करवाना चाहते हो?”

सुनीलजी ने कहा, “यह मेरी दिली ख्वाहिश है।” ज्योति ने अपने पति की बात का कोई जवाब नहीं दिया।

सुनीलजी ने कहा, “ठीक है भाई। मैंने इसे स्वीकार किया। तो फिर एक काम करो तुम्हें सुनीलजी के सामने मुझसे चुदवाने में तो कोई आपत्ति नहीं है ना?” यह तो तुम एक बार कर ही चुकी हो?”

ज्योति चुप हो गयी। वह इस बात से मना नहीं कर सकती थी। उसने अपने पति से सुनीलजी के देखते हुए अपनी चुदाई तो करवाई ही थी। तो अब कैसे मना करे? ज्योति ने कुछ ना बोल कर अपने पति को अपनी स्वीकृति दे दी।

सुनीलजी जब उस कमरे में दाखिल हुए थे तो उन्होंने देख ही लिया था की ज्योति नग्न अवस्था में बिस्तर में लेटी हुई थी और सुनीलजी ने भी अपने कपडे आनन फानन में ही पहन रक्खे थे।

इसका मतलब साफ़ था की ज्योति और सुनीलजी एक ही बिस्तर में एक साथ नंगे सोये थे। तो सुनीलजी को जानते हुए यह सोचना कठिन नहीं था की सुनीलजी ने ज्योति को उस रात जरूर चोदा होगा। यह तो एकदम स्वाभाविक था। अगर एक हट्टाकट्टा नंगा जवान मर्द एक खूब सूरत नग्न स्त्री के साथ एक ही बिस्तर में रात भर सोता है तो उनके बिच चुदाई ना हो यह तो एक अकल्पनीय घटना ही मानी जा सकती है।

पर फिर भी सुनीलजी खुद अपनी आँखों से अपनी बीबी की चुदाई देखना चाहते थे। और साथ साथ वह भी अपनी बीबी को किसी और के सामने चोदना भी चाहते थे।

वह चाहते थे की कोई और उनको उनकी बीबी को चोदते हुए देखे और फिर दोनों मर्द मिलकर ज्योति को चोदें। इसे इंग्लिश भाषा में “थ्री सम एम् एम् ऍफ़” याने दो मर्द मिलकर एक औरत को एक साथ या बारीबारी से एकदूसरे के सामने चोदें।
 
अब जब ज्योति के माँ को दिए हुए वचन की भलीभाँति पूर्ति हो चुकी थी तो ज्योति के अवरोध का बांध तो टूट ही चुका था। अब मौक़ा था की सुनीलजी अपनी ख्वाहिश या यूँ कहिये की पागलपन पूरा करना चाहते थे। वह यह भी जान गए थे की ज्योति को भी अब धीरे धीरे यह बात गले उतर ही गयी थी की उसके पति अब उससे यह “थ्री सम एम् एम् ऍफ़” करवाकर ही छोड़ेंगे।

ज्योति ने सोचा, अब उसके पास कोई चारा भी तो नहीं था। पर ज्योति ने तय किया की वह पहल नहीं करेगी। अगर उसके पति या सुनीलजी, दोनों में से कोई एक पहल करेगा तो वह उसका साथ जरूर देगी। पर पहल नहीं करेगी। आखिर वह मानिनी जो ठहरी।

ज्योति ने अपने पति को अपनी बाँहों में लिया और उन्हें होठोँ पर एक गहरा चुम्बन करती हुई बोली, “तुम ना, सुधरोगे नहीं। तुम वाकई में ही मेरे पागल पति हो। तुम ने एक बार ठान लिया तो फिर तुम जो चाहते हो वह मुझसे करवाके ही छोड़ोगे। देखो तुम यह सब मुझसे करवा कर बड़ा ही जोखिम ले रहे हो। अपनी बीबी को किसीके हाथ में सौपना ठीक नहीं। खैर, चलो आप जा कर लेट जाओ। मैं बर्तन साफ़ कर के आती हूँ।”

जल्द ही ज्योति ने सारे बर्तन और टेबल साफ़ कर ठीक सजा कर अपने आपको ठीक ठाक कर वह सुनीलजी और सुनीलजी के बिच में अपनी जगह पर जाकर अपने पति की रजाई में घुस गयी।

सुनीलजी ने सोच ही लिया था की अब उन्हें अपनी पागल ख्वाहिश को पूरा करने का इससे अच्छा मौक़ा फिर नहीं मिलेगा। उन्होंने ज्योति को सुनीलजी के सामने घुमा दिया और खुद ज्योति की गाँड़ में ज्योति के गाउन के ऊपर से अपना लण्ड टिकाकर उन्होंने ज्योति को अपनी दोनों टाँगों के बिच में जकड लिया।

पीछे से सुनीलजी ने ज्योति के कान, उसकी गर्दन और उसके बालों को चूमना शुरू किया। वह ज्योति को चुदवाने के लिए तैयार कर रहे थे।

ज्योति ने अपने पति के इशारे और बात का कोई जवाब नहीं दिया। वह सुनीलजी के सामने ही उनकी छाती से छाती मिलाकर अपने पति की बाहों में ही छिप कर अपनी आँखें बंद कर अपना सर निचा कर आगे क्या होगा उसका इंतजार करती हुई चुपचाप पड़ी रही।

सुनीलजी ने अपनी पत्नी ज्योति की पीठ को प्यार से सहलाना शुरू किया। हालांकि सुनीलजी गहरी नींद सो रहे थे, अपने पति की हरकतें सुनीलजी के सामने करते हुए देख कर ज्योति एकदम रोमांचित हो उठी। ज्योति के पुरे बदन में एक सिहरन सी फ़ैल गयी।

सुनीलजी ने धीरे से अपनी बीबी के गाउन के अंदर अपना हाथ डाल कर उसके भरे हुए स्तनोँ को अपनी हथेली में लेकर उसे बारी बारी से सहलाना और दबाना शुरू किया। ना चाहते हुए भी ज्योति के होठों के बिच से सिसकारी निकल ही गयी।

सुनीलजी ने ज्योति की पीठ सहलाते हुए कहा, “डार्लिंग, यह सफर मेरे लिए एक अजीब, रोमांचक, उत्तेजना से भरा और साथ साथ बड़ा ही खतरनाक भी रहा। पर हर पल भगवान ने हमारा हर कदम पर साथ दिया। सब से बुरे वक्त में भी आखिरी वक्त में भगवान ने हमें बचा लिया। सबसे बड़ी बात यह रही की सुनीलजी ने तुम्हें मौत के मुंह में से बचा के निकाला। हमारे लिए तो सुनीलजी भगवान के सामान हैं। हैं की नहीं?”

ज्योति ने थोड़ा ऊपर उठकर सुनीलजी के हाथों को सहलाते हुए कहा, “वह तो हैं ही।”

पति पत्नी दोनों सुनीलजी उनकी बात सुनकर उठ ना जाएँ इस लिए बड़ी ही हलकी आवाज में बात कर रहे थे।

सुनीलजी ने अपनी पत्नी ज्योति से कहा, “ज्योति डार्लिंग, जहां इतना गहरा प्यार होता है, वहाँ कुछ भी मायने नहीं रखता है। अब आगे तुम समझदार हो, की तुम्हें क्या करना चाहिए।”

ज्योति ने बड़े ही भोलेपन से कहा, “डार्लिंग, मुझे नहीं मालुम, मुझे क्या करना चाहिए। तुम्ही बताओ मुझे क्या करना चाहिए।”

सुनीलजी ने बड़े ही प्यार से ज्योति के गाउन के पीछे के बटन खोलते हुए कहा, “जो चीज़ में तुम सबसे ज्यादा मास्टर हो तुम वही करो। तुम बस प्यार करो।”

ज्योति के बटन खुलते ही सुनीलजी ने अपनी बीबी का गाउन कन्धों के निचे सरका दिया। ज्योति के बड़े उन्नत वक्ष फूली हुई निप्पलों के साथ गाउन से बाहर निकल पड़े।

पीछे से हाथ डाल कर सुनीलजी ने अपनी बीबी दोनों फुले स्तनोँ को अपनी हथेलियों में उठाया और उन जेली के समान डोलते हुए स्तनोँ को हिलाते हुए सुनीलजी ने अपनी बीबी ज्योति से कहा, “जानेमन यह तुम्हारे दो गोल गुम्बज पर कोई भी मर्द अपनी जान न्योछावर कर सकता है।” यह कर सुनीलजी ने ज्योति के बॉल अपनी हथली में दबाने और मसलने शुरू किये।

ज्योति के मुंह से फिर से सिसकारी निकल गयी। इस बार कुछ ज्यादा ही ऊँची आवाज थी।

ज्योति को डर था की कहीं उसकी सिसकारी सुनकर सुनीलजी जाग ना जाएँ। सुनीलजी तो चाहते थे की सुनीलजी जाग जाएँ और यह सब देखें।

वह जितना हो सके अपनी पत्नी को उकसाना चाहते थे ताकि उसकी कराहटें और सिकारियों का आवाज बढे और सुनीलजी उठ कर वह नजारा देखें जो वह उन्हें दिखाना चाहते थे।

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सुनीलजी ने सिर्फ एक धोती जो डॉ. खान की अलमारी में मिली थी वह पहन रक्खी थी। उसकी गाँठ भी बिस्तरे में पलटते हुए छूट गयी थी। वह बिस्तर में नंगे ही सोये हुए थे।

अपनी पत्नी के दो मस्त गुम्बजों को अपने हाथों में मसलते हुए और ज्योति की निप्पलों को पिचकाते और अपनी बीबी की गाँड़ में पीछे से धक्का मारते हुए कहा, “डार्लिंग, सुनीलजी हमारे लिए भगवान से भी ज्यादा हैं। वह इस लिए की भगवान को कुछ भी करने के लिए सिर्फ इच्छा करनी पड़ती है। जब की हम इंसानों को अपने प्रियजन के लिए कुछ करने के लिए महेनत और अपना आत्म समर्पण करना पड़ता है।

सुनीलजी ने वह तुम्हारे लिए क्यों किया? क्यूंकि वह तुम्हें दिलोजान से चाहते थे। वह तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकते हैं। तो क्या तुम उनके लिए कुछ कर नहीं सकती?”

ज्योति ने अपने पति की बात का कुछ भी जवाब नहीं दिया। वह जानती थी की उसके पति क्या चाहते थे। पर वह क्यों अपना मुंह खोले? वह सिर्फ अपने पति के अपनी गाँड़ पर धक्का मरते हुए लण्ड को मेहसूस कर रही थी। अपने पति का जाना पहचाना मोटा और लंबा लंड एकदम कड़क और जोशीला तैयार लग रहा था।

ज्योति भी एक साथ दो लण्ड से चुदवाने के विचार से ही काफी उत्तेजित हो रही थी। उसने कभी सोचा नहीं था की उसके दोनों प्राणप्रिय मर्द उसे एकसाथ चोदेंगे। उसके पति तो तैयार थे, पर क्या सुनीलजी भी तैयार होंगे? यह ज्योति को पता नहीं था।

सुनीलजी ने जब अपनी पत्नी का कोई जवाब नहीं मिला तो वह समझ गए की ज्योति तैयार तो है पर अपने मुंह से हाँ नहीं कहना चाहती। आखिर में वह मानिनी जो ठहरी? सुनीलजी ने फ़ौरन ज्योति गाउन पूरा खोल कर उसे हटाना चाहा। ज्योति ने भी कोई विरोध ना करते हुए अपने हाथ और पाँव ऊपर निचे कर के उसे हटाने में सुनीलजी की मदद की।

अब सुनीलजी और उनकी पत्नी ज्योति बिस्तरे में एक़दम नंगे थे। सुनीलजी ने फिर से अपना लण्ड ज्योति की गाँड़ के गालों पर टिका दिया और हलके धक्के मारने लगे। अपने पति का तगड़ा लण्ड अब उसकी गाँड़ को टोचने लगा तो ज्योति चंचल हो उठी। उससे रहा नहीं गया।

ज्योति के मुंह से कुछ ज्यादा ही जोर से कराहट निकल पड़ी। ज्योति समझ गयी की अब वख्त आ पहुंचा था जब उसके पति उसकी पीछे से चुदाई करेंगे। ज्योति जानती थी की सुनीलजी को पीछे से चोदना बहुत पसंद था।

ज्योति की दोनों चूँचियों को अपने हाथों में पकड़ कर उन्हें दबोचते हुए ज्योति की गाँड़ की दरार में से होते हुए ज्योति की रसीली चूत में अपना लण्ड पेलने के लिए उसके पति हमेशा व्याकुल रहते थे।

जब वह ज्योति को पीछे से चोदते थे तो अपना मुंह ज्योति के घने बालों में मलते हुए ज्योति की गर्दन, पीठ और कन्धों को बार बार चूमते रहते जिससे ज्योति का उन्माद सातवें आसमान पर पहुंच जाता था।

ज्योति को महसूस हुआ की सुनीलजी ज्योति की कराहट सुनकर शायद उठ चुके थे। ज्योति के मन में उस समय एकसाथ कई भाव जाग्रत हो रहे थे। एक सुनीलजी के इतने करीब से देखते हुए की ज्योति पने पति से कैसे चुदाई करवा रही है यह सोच कर रोमांच का भाव। दुसरा चिंता का भाव की सुनीलजी कहीं ईर्ष्या या दुःख से परेशान तो नहीं हो जाएंगे की ज्योति किसी और से चुद रही थी?

तीसरा डर का भाव की कहीं उसी समय अगर सुनीलजी का ज्योति को चोदने का मन किया तो कहीं वह सुनीलजी से ज्योति को चोदने के लिए बहस तो नहीं करेंगे? चौथा भाव की कहीं दोनॉ मर्द मिलकर ज्योति को एक साथ चोदने के लिए तैयार अगर हो गए तो क्या एक ज्योति की चूत में तो दुसरा उसकी गाँड़ में तो अपना लण्ड नहीं घुसाना चाहेंगे?

ज्योति डर चिंता और रोमांच से एकदम अभिभूत हो रही थी। ज्योति ने महसूस किया की सुनीलजी थोड़ा हिल रहे थे। उसका मतलब वह जाग गए थे। ज्योति ने देखा की सुनीलजी ने अपनी आँखें नहीं खोलीं थी। यह अच्छा था। क्यूंकि भले ही सुनीलजी ने महसूस किया हो की ज्योति अपने पति से चुदाई करवा रही थी। पर ना देखते हुए कुछ हद तक ज्योति की लज्जा कम हो सकती थी।

पर सुनीलजी ने कोई कोशिश नहीं की वह ज्योति की गरम चूत में अपना लण्ड डालें। वह तो ज्योति को इतना गरम करना चाहते थे की ज्योति आगे चलकर अपनी सारी लज्जा और शर्म छोड़ कर, अगर सुनीलजी उठ जाएँ तो भी अपने पति से बिनती करे की “प्लीज आप मुझे चोदिये।”

सुनीलजी ने फुर्ती से पलंग से निचे उतर कर ज्योति की जाँघें फैलायीं। अपना मुंह ज्योति की जाँघों के बिच में रख कर वह ज्योति का रिस्ता हुआ स्त्री रस चाटने लगे और अपनी जीभ डाल कर ज्योति की चूत को जीभ से कुरेदने लगे।

सुनीलजी की जीभ के अंदर घुसते ही ज्योति अपनी आँखें कस के मूंद के रखती हुई एकदम पलंग पर चौक कर उछल पड़ी। उसके तन के ऊपर से कम्बल हट गया। वह नंगी दिखने लगी। शायद सुनीलजी ने भी एक आँख खोल कर ज्योति का कामातुर खूबसूरत कमसिन नंगा बदन देख लिया था।

सुनीलजी ने यह भी देखा की ज्योति के पति सुनीलजी के उठने की परवाह ना करते हुए ज्योति की चूत में अपनी जीभ डाल कर अपनी बीबी को “जिह्वा मैथुन” करा रहे थे।

ज्योति पलंग के ऊपर उछल उछल कर उसे झेलने की कोशिश कर रही थी। थोड़ी देर ज्योति का जिह्वा मैथुन करने के बाद सुनीलजी वापस पलंग पर आ गए। सुनीलजी फिर वही ज्योति की गाँड़ पर अपना लण्ड टिकाकर ज्योति को अपनी जाँघों के बिच में जकड कर सके माध मस्त स्तनोँ को अपनी हथलियों में दबाने लगे और ज्योति की फूली हुई निप्पलों को पिचकाने में फिर व्यस्त हो गए।

सुनीलजी ने अपना हाथ ज्योति की पतली कमर और नाभि को सहलाते हुए धीरे से निचे ले जाकर उसकी चूत के ऊपर वाले टीले से सरका कर ज्योति की चूत पर रक्खा। अपने पति का हाथ जब अपनी चूत के पास महसूस किया तो ज्योति बोल पड़ी, “डार्लिंग यह क्या कर रहे हो?”

सुनीलजी ने कुछ ना बोलते हुए ज्योति की पानी झरती चूत में अपनी दो उंगलियाँ डाल दीं और उसे प्यार से अंदर बाहर करने लगे। ज्योति की (और शायद सब स्त्रियों की) यह बड़ी कमजोरी होती है की जब पुरुष उनकी चूत में उँगलियाँ डालकर उनको हस्तमैथुन करते हैं तब वह उसे झेलनेमें नाकाम रहतीं हैं।

सुनीलजी कभी उँगलियों से ज्योति की चूत के पंखुड़ियों को खोल कर प्यार से उसे ऐसे रगड़ ने लगे की ज्योति मचल उठी और उसके रोंगटे खड़े हो गए। बड़ी मुश्किल से वह अपने पति को चुदाई करने के लिए आग्रह करने से अपने आप को रोक पायी।

जैसे जैसे सुनीलजी की उँगलियाँ फुर्ती से ज्योति की चूत में अंदर बाहर होने लगीं, ज्योति की मचलन बढ़ने लगी। साथ साथ में ज्योति की चूत की फड़कन भी बढ़ने लगी। ज्योति अपनी सिसकारियां रोकने में नाकाम हो गयी। उसके मुंह से बार बार “आहहहह…… ओफ्फफ्फ्फ़…… हाय……… उम्फ………” आवाजों वाली सिकारियाँ बढ़ती ही गयीं।

जाहिर है की ऐसे माहौल में एक मर्द कैसे सो सकता है जब एक जवान औरत उसके बगल में एक ही पलंग पर उसके साथ नंगी सोई हुई जोर शोर से सिकारियाँ मार रही हो? सुनीलजी उठ तो गए पर अपनी आँखें मूंद कर पड़े रहे और उम्मीद करते रहे की उनको भी कभी कुछ मौक़ा मिलेगा।

सुनीलजी को भी शायद आइडिया हो गया था की सुनीलजी उठ गए थे। सुनीलजी का आइडिया था की वह ऐसे हालत पैदा करदें की सुनीलजी खुल्लमखुल्ला जाहिर करने के लिए मजबूर हो जाएँ की वह उठ गए हैं। सुनीलजी ने ज्योति की चूत में अपनी उँगलियों से चोदने की फुर्ती एकदम तेज करदी। उनकी उँगलियाँ ज्योति की चूत से इतनी फुर्ती से अंदर बाहर होने लगीं जैसे कोई इंजन में पिस्टन सिलिंडर के अंदर बाहर होता हो।

ज्योति के लिए यह आक्रमण झेलना असंभव था। वह अपनी सिसकारियों को रोकने में अब पूरी तरह से नाकाम हो रही थी। अब उसे परवाह नहीं थी की उसके साथ में ही सोये हुए सुनीलजी उसकी कराहट सुनकर उठ जाएंगे। वास्तव में तो कहीं ना कहीं उसके मन में भी छिपी हुई इच्छा थी की सुनीलजी उठ जाएँ और ज्योति को उसके पति के साथ दोनों मिलकर चोदें।

सारी कुशंका और चिंताओं के बावजूद ज्योति के मन में भी पति की यह इच्छा पूरी करने का बड़ा मन तो था ही। जैसे जैसे सुनीलजी ने उंगलयों से चोदने की गति तेज कर दी तो ज्योति की सिसकारियों ने कराहट का रूप ले लिया। ज्योति अब जोर शोर से सुनीलजी को, “डार्लिंग, यह क्या कर रहे हो? अरे……. भाई तुम थोड़ा रुको तो…… अरे यह कोई तरिका है? आह्ह्ह्हह्ह……. ओह…… अह्ह्ह्हह.” इत्यादि आवाजें निकालने लगी। पीछे से सुनीलजी अपना लण्ड भी ज्योति की गांड के गालों पर घुसेड़ रहे थे।
 
सुनीलजी इस बात का ध्यान रख रहे थे की उनका लण्ड अभी जब तक उपयुक्त समय ना आये तब तक ज्योति की चूत या गाँड़ में ना घुसेड़ें। ज्योति अपने पति के उसकी गाँड़ में मारे जा रहे धक्कों और उनकी उँगलियों की चुदाई से इतनी ज्यादा उत्तेजित हो गयी थी की उसने सुनीलजी की बाहें पकड़ीं और अपने साथ साथ सुनीलजी को भी हिलाने लगी।

जब थोड़ी देर तक ऐसा चलता रहा तो मज़बूरी में सुनीलजी ने अपनी आँखें खोलीं और ज्योति की और देखा। ज्योति आँखें बंद किये हुए अपने पति की उंगल चुदाई और फ़ालतू के गाँड़ पर उनका कडा और खड़ा लण्ड धक्के मार रहा था उसे एन्जॉय कर रही थी। सुनीलजी ने एक हाथ ज्योति की नंगी कमर पर रखा तो ज्योति ने अपनी आँखें खोलीं।

जब ज्योति की सुनीलजी से आँखें मिलीं तो वह शर्म के मारे फिर झुक गयीं और फिर ज्योति ने अपनी आँखें बंद कर लीं। पर ज्योति की कराहटें रुक नहीं पा रहीं थीं क्यूंकि उसके पति अपनी उँगलियों से ज्योति की चूत में बड़े जोरसे चुदाई कर रहे थे। ज्योति ने अब तय किया की जब सुनीलजी ने उसे अपने पति से चुदते हुए देख ही लिया था तो अब फ़ालतू का पर्दा रखने का कोई फ़ायदा नहीं था।

ज्योति तब सुनीलजी की और खिसकी और सुनीलजी से चिपक गयी। ज्योति के स्तन पर सुनीलजी का हाथ भी सुनीलजी की छाती का स्पर्श कर रहा था। सुनीलजी समझ गए की सुनीलजी जग गए हैं और ज्योति की उंगली चुदाई देख रहे हैं। सुनीलजी ने ज्योति की चूँचियों से अपना हाथ हटाकर सुनीलजी के कन्धों पर रख दिया।

सुनीलजी ने तब अपनी बीबी की उँगलियों से चुदाई रोक दी। उन्होंने अपने हाथों से सुनीलजी का कंधा थोड़े जोर से दबाया और बोले, “सुनीलजी, उठो। मैं और ज्योति आपसे प्रार्थना करते हैं की आप अपनी प्रिया और मेरी बीबी का आत्मसमर्पण स्वीकार करो।”

ज्योति की चूँचियों को दबाते हुए सुनीलजी बोले, “मैं जानता हूँ आप इन स्तनोँ को सहलाने के लिए कितने ज्यादा उत्सुक हो। मैं ज्योति का पति आपसे कहता हूँ की आज से ज्योति के प्यार और बदन पर सिर्फ मेरे अकेले का ही हक़ नहीं होगा। ज्योति के प्यार और बदन पर हम दोनों का साँझा हक़ होगा अगर ज्योति इस के लिए राजी हो तो।”

फिर वह अपनी बीबी की और देखते हुए बोले, “ज्योति डार्लिंग तुम क्या कहती हो?”

ज्योति ने शर्म से अपनी नजरें निचीं कर लीं और कुछ नहीं बोली। सुनीलजी ने सुनीलजी का हाथ पकड़ा और अपनी बीबी के खुले स्तनों को उनके हाथ में पकड़ा दिए।

सुनीलजी ने सुनीलजी के सामने देखा और झिझकते हुए ज्योति के स्तनोँ पर अपना हाथ फिराने लगे। हालांकि सुनीलजी ने पहले भी ज्योति के मस्त स्तनोँ का भलीभांति आनंद ले रखा था, पर यह पहली बार हुआ था की ज्योति के पति ने सामने चलकर अपनी पत्नी के स्तनोँ को उनके हाथों में दिए थे।

सुनीलजी को इस बात से एक अद्भुत रोमांच का अनुभव हुआ। सुनीलजी की हिचकिचाहट सुनीलजी के वर्ताव से काफी कम हो चुकी थी। उस समय के सुनीलजी के चेहरे के भाव देखने लायक थे। जैसे कोई नई नवेली वधु शादी की पहली रात को पति के कमरे में पति के सामने होती है और पति जब उसके कपड़ों को छूता है तो कैसे उसका पूरा बदन रोमांचा से सिहर उठता है ऐसा भाव उनको ज्योति के भरे सुनीलजी के हाथों में उठाये हुए स्तनों को छूने से हुआ।

ज्योति का हाल तो उससे भी कहीं और बुरा था। उसकी जाँघों के बिच उसकी चूत में से तो जैसे रस की धार ही निकल रही थी। अपने पति के सामने ही किसी और पुरुष के हाथों अपने स्तनोँ को छुआना कैसा अनूठा और पुरे शरीर को रोमांच से भर देने वाला होता है यह ज्योति ने अनुभव किया।

सुनीलजी ने ज्योति के दोनों स्तनोँ को अपने हाथों की हथेलियों में लिए और उनको झुक कर चूमा। सुनीलजी ने ज्योति को अपनी बाँहों में जकड कर पीछे से ज्योति के कन्धों को चुम कर कहा..

“सुनीलजी, मैं सच कह रहा हूँ। हालांकि मेरे मन में ज्योति के लिए बहुत ही अजीब भाव थे और मैं जानता था की आपको और ज्योति को भी इसके लिए कोई एतराज नहीं था पर मैं यह चाहता था की ज्योति सामने चलकर मुझे अपने आपको पूरी ख़ुशी के साथ समर्पित करे और उसकी माँ को दिया हुआ वचन अगर पूरा ना हो तो ऐसा ना करे।

अगर ज्योति की माँ को दिया हुआ वचन आपके और ज्योति के हिसाब से पूरा हो गया है तो मुझे और कुछ नहीं कहना। ज्योति मेरी थी और रहेगी। वह आपकी पत्नी थी है और रहेगी। अगर वह मेरी शैय्या भागिनी हुई तो उससे आपके अधिपत्य पर कोई भी असर नहीं होगा।”

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