• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Erotica साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन complete

सुनीता ने कहा, "जस्सूजी, ऐसे शब्द आगे से अपनी ज़बान से कभी मत निकालिये। मैं आपको अपने आप से भी ज्यादा चाहती हूँ। मैं आपकी इतनी इज्जत करती हूँ की आपके मन में मेरे लिये थोड़ा सा भी हीनता का भाव आये यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती। सच कहूं तो मैं यह सोच रही थी की कहीं मुझे इस कॉस्च्यूम में देख कर आप मुझे हल्कट या चीप तो नहीं समझ रहे?"

जस्सूजी ने सुनीता को अपनी बाहों में कस के दबाते हुए बड़ी गंभीरता से कहा, "अरे सुनीता! कमाल है! तुम इस कॉस्च्यूम में कोई भी अप्सरा से कम नहीं लग रही हो! इस कॉस्च्यूम में तो तुम्हारा पूरा सौंदर्य निखर उभर कर बाहर आ रहा है। भगवान ने वैसे ही स्त्रियों को गजब की सुंदरता दी है और उनमें भी तुम तो कोहिनूर हीरे की तरह भगवान की बेजोड़ रचना हो।

अगर तुम मेरे सामने निर्वस्त्र भी खड़ी हो जाओ तो भी मैं तुम्हें चीप या हलकट नहीं सोच सकता। ऐसा सोचना भी मेरे लिए पाप के समान है। क्यूंकि तुम जितनी बदन से सुन्दर हो उससे कहीं ज्यादा मन से खूबसूरत हो। हाँ, मैं यह नहीं नकारूँगा की मेरे मन में तुम्हें देख कर कामुकता के भाव जरूर आते हैं। मैं तुम्हें मन से तो अपनी मानता ही हूँ, पर मैं तुम्हें तन से भी पूरी तरह अपनी बनाना तहे दिल से चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ की हम दोनों के बदन एक हो जाएँ।

पर मैं तब तक तुम पर ज़रा सा भी दबाव नहीं डालूंगा जब तक की तुम खुद सामने चलकर अपने आप मेरे सामने घुटने टेक कर अपना सर्वस्व मुझे समर्पण नहीं करोगी। अगर तुम मानिनी हो तो मैं भी कोई कम नहीं हूँ। तुम मुझे ना सिर्फ बहुत प्यारी हो, मैं तुम्हारी बहुत बहुत इज्जत करता हूँ। और वह इज्जत तुम्हारे कपड़ों की वजह से नहीं है।"

जस्सूजी के अपने बारे में ऐसे विचार सुनकर सुनीता की आँखों में से गंगा जमुना बहने लगी। सुनीता ने जस्सूजी के मुंह पर हाथ रख कर कहा, "जस्सूजी, आप से कोई जित नहीं सकता। आप ने चंद पलों में ही मेरी सारी उधेङबुन ख़त्म कर दी। अब मेरी सारी लज्जा और शर्म आप पर कुर्बान है। मैं शायद तन से पूरी तरह आपकी हो ना सकूँ, पर मेरा मन आपने जित लिया है। मैं पूरी तरह आपकी हूँ। मुझे अब आपके सामने कैसे भी आने में कोई शर्म ना होगी। अगर आप कहो तो मैं इस कॉस्च्यूम को भी निकाल फैंक सकती हूँ।"

जस्सूजी ने मुस्कुराते हुए सुनीता से कहा, "खबरदार! ऐसा बिलकुल ना करना। मेरी धीरज का इतना ज्यादा इम्तेहान भी ना लेना। आखिर मैं भी तो कच्ची मिटटी का बना हुआ इंसान ही हूँ। कहीं मेरा ईमान जवाब ना दे दे और तुम्हारा माँ को दिया हुआ वचन टूट ना जाए!"

सुनीता अब पूरी तरह आश्वस्त हो गयी की उसे जस्सूजी से किसी भी तरह का पर्दा, लाज या शर्म रखने की आवश्यकता नहीं थी। जब तक सुनीता नहीं चाहेगी, जस्सूजी उसे छुएंगे भी नहीं। और फिर आखिर जस्सूजी से छुआ ने में तो सुनीता को कोई परहेज रखने की जरुरत ही नहीं थी।

सुनीता ने अपनी आँखें नचाते हुए कहा, "जस्सूजी, मुझे तैरना नहीं आता। इस लिए मुझे पानी से डर लगता है। मैं आपके साथ पानी में आती हूँ। अब आप मेरे साथ जो चाहे करो। चाहो तो मुझे बचाओ या डूबा दो। मैं आपकी शरण में हूँ। अगर आप मुझे थोड़ा सा तैरना सीखा दोगे तो मैं तैरने की कोशिश करुँगी।"

जस्सूजी ने हाथमें रखा तौलिया फेंक कर पानी में उतर कर मुस्कुराते हुए अपनी बाँहें फैला कर कहा, "फिर आ जाओ, मेरी बाँहों में।"

दूर वाटर फॉल के निचे नहा रहे ज्योति और सुनीलजी ने जस्सूजी और सुनीता के बिच का वार्तालाप तो नहीं सूना पर देखा की सुनीता बेझिझक सीमेंट की बनी किनार से छलांग लगा कर जस्सूजी की खुली बाहों में कूद पड़ी। ज्योति ने फ़ौरन सुनील को कहा, "देखा, सुनीलजी, आपकी बीबी मेरे पति की बाँहों में कैसे चलि गयी? लगता है वह तो गयी!"

सुनीलजी ने ज्योतिजी की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। दोनों वाटर फॉल के निचे कुछ देर नहा कर पानी में चलते चलते वाटर फॉल की दूसरी और पहुंचे। वह दोनों सुनीता और जस्सूजी से काफी दूर जा चुके थे और उन्हें सुनीता और जस्सूजी नहीं दिखाई दे रहे थे।

वाटर फॉल के दूसरी और पहुँचते ही सुनीलजी ने ज्योतिजी से पूछा, "क्या बात है? आप अपना मूड़ क्यों बिगाड़ कर बैठी हैं?"

ज्योतिजी ने कुछ गुस्से में कहा, "अब एक बात मेरी समझ में आ गयी है की मुझमे कोई आकर्षण रहा नहीं है।"

सुनीलजी ने ज्योतिजी की बाँहें थाम कर पूछा, "पर हुआ क्या यह तो बताइये ना? आप ऐसा क्यों कह रहीं हैं?"

ज्योति ने कहा, "भाई घर की मुर्गी दाल बराबर यह कहावत मुझ पर तो जरूर लागू होती है पर सुनीता पर नहीं होती।"

सुनीलजी: "पर ऐसा आप क्यों कहते हो यह तो बताओ?"

ज्योतिजी: "और नहीं तो क्या? अपनी बीबी से घर में भी पेट नहीं भरा तो आप ट्रैन में भी उसको छोड़ते नहीं हो, तो फिर में और क्या कहूं? हम ने तय किया था इस यात्रा दरम्यान आप और मैं और जस्सूजी और सुनीता की जोड़ी रहेगी। पर आप तो रात को अपनी बीबी के बिस्तरेमें ही घुस गए। क्या आपको मैं नजर नहीं आयी?"

ज्योतिजी फिर जैसे अपने आप को ही उलाहना देती हुई बोली, "हाँ भाई, मैं क्यों नजर आउंगी? मेरा मुकाबला सुनीता से थोड़े ही हो सकता है? कहाँ सुनीता, युवा, खूबसूरत, जवान, सेक्सी और कहाँ मैं, बूढी, बदसूरत, मोटी और नीरस।"

सुनीलजी का यह सुनकर पसीना छूट गया। तो आखिर ज्योतिजी ने उन्हें अपनी बीबी के बिस्तर में जाते हुए देख ही लिया था। अब जब चोरी पकड़ी ही गयी है तो छुपाने से क्या फायदा?

सुनीलजी ने ज्योतिजी के करीब जाकर उनकी ठुड्डी (चिबुक / दाढ़ी) अपनी उँगलियों में पकड़ी और उसे अपनी और घुमाते हुए बोले, "ज्योतिजी, सच सच बताइये, अगर मैं आपके बिस्तर में आता और जैसे आपने मुझे पकड़ लिया वैसे कोई और देख लेता, तो हम क्या जवाब देते? वैसे मैं आपके बिस्तर के पास खड़ा काफी मिनटों तक इस उधेड़बुन में रहा की मैं क्या करूँ? आपके बिस्तर में आऊं या नहीं? आखिर में मैंने यही फैसला किया की बेहतर होगा की हम अपनी प्रेम गाथा बंद दीवारों में कैद रखें। क्या मैंने गलत किया?"

ज्योतिजी ने सुनील की और देखा और उन्हें अपने करीब खिंच कर गाल पर चुम्मी करते हुए बोली, "मेरे प्यारे! आप बड़े चालु हो। अपनी गलती को भी आप ऐसे अच्छाई में परिवर्तित कर देते हो की मैं क्या कोई भी कुछ बोल नहीं पायेगा। शायद इसी लिए आप इतने बड़े पत्रकार हो। कोई बात नहीं। आप ने ठीक किया। पर अब ध्यान रहे की मैं अपनी उपेक्षा बर्दास्त नहीं कर सकती। मैं बड़ी मानिनी हूँ और मैं मानती हूँ की आप मुझे बहुत प्यार करते हैं और मेरी बड़ी इज्जत करते हैं। आप की उपेक्षा मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती। वचन दो की मुझे आगे चलकर ऐसी शिकायत का मौक़ा नहीं दोगे?"

सुनीलजी ने ज्योति को अपनी बाँहों में भर कर कहा, "ज्योति जी मैं आगे से आपको ऐसी शिकायत का मौक़ा नहीं दूंगा। पर मैं भी आपसे कुछ कहना चाहता हूँ।"

ज्योति जी ने प्रश्नात्मक दृष्टि से देख कर कहा, "क्या?"
 
सुनीलजी ने कहा, "आप मेरे साथ बड़ी गंभीरता से पेश आते हैं। मुझे अच्छा नहीं लगता। जिंदगी में वैसे ही बहुत उलझन, ग़म और परेशानियाँ हैं। जब हम दोनों अकेले में मिलते हैं तब मैं चाहता हूँ की कुछ अठखेलियाँ हो, कुछ शरारत हो, कुछ मसालेदार बातें हों। यह सच है की मैं आपकी गंभीरता, बुद्धिमत्ता और ज्ञान से बहुत प्रभावित हूँ।

पर वह बातें हम तब करें जब हम एक दूसरे से औपचारिक रूप से मिलें। जब हम इतने करीब आ गए हैं और उसमें भी जब हम मज़े करने के लिए मिलते हैं तो फिर भाड़ में जाए औपचारिकता! हम एक दूसरे को क्यों "आप" कह कर और एक दूसरे के नाम के साथ "जी" जोड़ कर निरर्थक खोखला सम्मान देने का प्रयास करते हैं? ज्योति तुम्हारा जो खुल्लमखुल्ला बात करने का तरिका है ना, वह मुझे खूब भाता है। उसके साथ अगर थोड़ी शरारत और नटखटता हो तो क्या बात है!"

ज्योति सुनील की बातें सुन थोड़ी सोच में पड़ गयीं। उन्होंने नज़रें उठाकर सुनीलजी की और देखा और पूछा, " सुनील तुम सुनीता से बहोत प्यार करते हो। है ना?"

सुनील ज्योति की बात सुनकर कुछ झेंप से गए। उन दोनों के बिच सुनीता कहाँ से आ गयी? सुनील के चेहरे पर हवाइयां उड़ती हुई देख कर ज्योति ने कहा, "जो तुम ने कहा वह सुनीता का स्वभाव है। मैं ज्योति हूँ सुनीता नहीं। तुम क्या मुझमें सुनीता ढूँढ रहे हो?"

यह सुनकर सुनील को बड़ा झटका लगा। सुनील सोचने लगे, बात कहाँ से कहाँ पहुँच गयी? उन्होंने अपने आपको सम्हालते हुए ज्योति के करीब जाकर कहा, "हाँ यह सच है की मैं सुनीता को बहुत प्यार करता हूँ। तुम भी तो जस्सूजी को बहुत प्यार करती हो। बात वह नहीं है। बात यह है की जब हम दोनों अकेले हैं और जब हमें यह डर नहीं की कोई हमें देख ना ले या हमारी बातें सुन ना लें तो फिर क्यों ना हम अपने नकली मिजाज का मुखौटा निकाल फेंके, और असली रूप में आ जायें? क्यों ना हम कुछ पागलपन वाला काम करें?"

"अच्छा? तो मियाँ चाहते हैं, की मैं यह जो बिकिनी या एक छोटासा कपडे का टुकड़ा पहन कर तुम्हारे सामने मेरे जिस्म की नुमाइश कर रही हूँ, उससे भी जनाब का पेट नहीं भरा? अब तुम मुझे पूरी नंगी देखना चाहते हो क्या?" शरारत भरी मुस्कान से ज्योति सुनीलजी की और देखा तो पाया की सुनील ज्योति की इतनी सीधी और धड़ल्ले से कही बात सुनकर खिसियानी सी शक्ल से उनकी और देख रहे थे।

ज्योति कुछ नहीं बोली और सिर्फ सुनील की और देखते ही रहीं। सुनील ने ज्योति के पीछे आकर ज्योति को अपनी बाहों में ले लिया और ज्योति के पीछे अपना लण्ड ज्योति की गाँड़ से सटा कर बोले, "ऐसे माहौल में मैं ज्योतिजी नहीं ज्योति चाहता हूँ।"

ज्योति ने आगे झुक कर सुनील को अपने लण्ड को ज्योति की गाँड़ की दरार में सटा ने का पूरा मौक़ा देते हुए सुनीलजी की और पीछे गर्दन घुमाकर देखा और बोली, "मैं भी तो ऐसे माहौल में इतने बड़े पत्रकार और बुद्धिजीवी सुनीलजी नहीं सिर्फ सुनील को ही चाहती हूँ। मैं महसूस करना चाहती हूँ की इतने बड़े सम्मानित व्यक्ति एक औरत की और आकर्षित होते हैं तो उसके सामने कैसे एक पागल आशिक की तरह पेश आते हैं।"

सुनील ने कहा, "और हाँ यह सच है की मैं यह जो कपडे का छोटासा टुकड़ा तुमने पहन रखा है, वह भी तुम्हारे तन पर देखना नहीं चाहता। मैं सिर्फ और सिर्फ, भगवान ने असलियत में जैसा बनाया है वैसी ही ज्योति को देखना चाहता हूँ। और दूसरी बात! मैं यहां कोई विख्यात सम्पादक या पत्रकार नहीं एक आशिक के रूप में ही तुम्हें प्यार करना चाहता हूँ।"

पर ज्योति तो आखिरमें ज्योति ही थी ना? उसने पट से कहा, "यह साफ़ साफ़ कहो ना की तुम मुझे चोदना चाहते हो?"

सुनील ज्योति की अक्खड़ बात सुनकर कुछ झेंप से गए पर फिर बोले, "ज्योति, ऐसी बात नहीं है। अगर चुदाई प्यार की ही एक अभिव्यक्ति हो, मतलब प्यार का ही एक परिणाम हो तो उसमें गज़ब की मिठास और आस्वादन होता है। पर अगर चुदाई मात्र तन की आग बुझाने का ही एक मात्र जरिया हो तो वह एक तरफ़ा स्वार्थी ना भी हो तो भी उसमें एक दूसरे की हवस मिटाने के अलावा कोई मिठास नहीं होती।"

सुनील की बात सुन ज्योति मुस्कुरायी। उसने सुनील के हाथों को प्यार से अपने स्तनोँ को सहलाते हुए अनुभव किया।

अपने आपको सम्हालते हुए ज्योति ने इधर उधर देखा। वह दोनों वाटर फॉल के दूसरी और जा चुके थे। वहाँ एक छोटा सा ताल था और चारों और पहाड़ ही पहाड़ थे। किनारे खूबसूरत फूलों से सुसज्जित थे। बड़ा ही प्यार भरा माहौल था।

सुनीलजी और ज्योति दोनों ही एक छोटी सी गुफा में थे ओर गुफा एक सिरे से ऊपर पूरी खुली थी और सूरज की रौशनी से पूरी तरह उज्जवलित थी। जैसा की जस्सूजी ने कहा था, यह जगह ऐसी थी जहां प्यार भरे दिल और प्यासे बदन एक दूसरे के प्यार की प्यास और हवस की भूख बिना झिझक खुले आसमान के निचे मिटा सकते थे। प्यार भरे दिल और वासना से झुलसते हुए बदन पर निगरानी रखने वाला वहाँ कोई नहीं था।

सुनीता और जस्सूजी वाटर फॉल के दूसरी और होने के कारण नजर नहीं आ रहे थे। ज्योति अपनी स्त्री सुलभ जिज्ञासा को रोक नहीं पायी और ज्योति ने वाटर फॉल के निचे जाकर वाटर फॉल के पानी को अपने ऊपर गिरते हुए दूर दूसरे छोर की और नज़र की तो देखा की उसके पति जस्सूजी झुके हुए थे और उनकी बाँहों में सुनीता पानी की परत पर उल्टी लेटी हुई हाथ पाँव मारकर तैरने के प्रयास कर रही थी।

ज्योति जानती थी की उस समय सुनीता के दोनों बूब्स जस्सूजी की बाँहों से रगड़ खा रहे होंगे, जस्सूजी की नजर सुनीता की करारी नंगी गाँड़ पर चिपकी हुई होगी। सुनीता को अपने इतने करीब पाकर जस्सूजी का तगड़ा लण्ड कैसे उठ खड़ा हो गया होगा यह सोचना ज्योति के लिए मुश्किल नहीं था।

पता नहीं शायद सुनीता को भी जस्सूजी का खड़ा और मोटा लण्ड महसूस हुआ होगा। अपने पति को कोई और औरत से अठखेलियां करते हुए देख कर कुछ पलों के लिए ज्योति के मन में स्त्री सुलभ इर्षा का अजीब भाव उजागर हुआ। यह स्वाभाविक ही था। इतने सालों से अपने पति के शरीर पर उनका स्वामित्व जो था!
 
फिर ज्योति सोचने लगी, "क्या वाकई में उनका अपने पति पर एकचक्र स्वामित्व था?" शायद नहीं, क्यूंकि ज्योति ने स्वयं जस्सूजी को कोई भी औरत को चोदने की छूट दे रक्खी थी। पर जहां तक ज्योति जानती थी, शादी के बाद शायद पहली बार जस्सूजी के मन में सुनीता के लिए जो भाव थे ऐसे उसके पहले किसी भी औरत के लिए नहीं आये थे।

अपने पति और सुनील की पत्नी को एकदूसरे के साथ अठखेलियाँ खेलते हुए देख कर जब ज्योति वापस लौटी तो उसे याद आया की सुनील चाहते थे की उसे ज्योति बनना था। ज्योति फिर सुनील को बाँहों में आगयी और बोली, "जाओ और देखो कैसे तुम्हारी बीबी मेरे पति से तैराकी सिख रही है। लगता है वह दोनों तो भूल ही गए हैं की हम दोनों भी यहाँ हैं।"

सुनीलजी ने ज्योतिजी की बात को सुनी अनसुनी करते हुए कहा, "उनकी चिंता मत करो। मैं दोनों को जानता हूँ। ना तो वह दोनों कुछ करेंगे और ना वह इधर ही आएंगे। पता नहीं उन दोनों में क्या आपसी तालमेल या समझौता है की कुछ ना करते हुए भी वह एक दूसरे से चिपके हुए ही रहते हैं।"

ज्योतिजी ने कहा, "शायद तुम्हारी बीबी मेरे पति से प्यार करने लगी है।"

सुनीलजी ने कहा, "वह तो कभी से आपके पति से प्यार करती है। पर आप भी तो मुझसे प्यार करती हो."

ज्योति ने सुनील का हाथ झटकते हुए कहा, "अच्छा? आपको किसने कहा की मैं आपसे प्यार करती हूँ?"

सुनील ने फिरसे ज्योतिजी को अपनी बाँहों में ले कर ऐसे घुमा दिया जिससे वह उसके पीछे आकर ज्योति की गाँड़ में अपनी निक्कर के अंदर खड़े लण्ड को सटा सके। फिर ज्योति के दोनों स्तनोँ को अपनी हथेलियों में मसलते हुए सुनील ने ज्योति की गाँड़ के बिच में अपना लण्ड घुसाने की असफल कोशिश करते हुए कहा, "आपकी जाँघों के बिच में से जो पानी रिस रहा है वह कह रहा है।"

ज्योति ने कहा, "आपने कैसे देखा की मेरी जाँघों के बिच में से पानी रिस रहा है? मैं तो वैसे भी गीली हूँ।"

सुनील ने ज्योति की जाँघों के बिच में अपना हाथ ड़ालते हुए कहा, "मैं कब से और क्या देख रहा था?"

फिर ज्योति की जाँघों के बिच में अपनी हथेली डाल कर उसकी सतह पर हथेली को सहलाते हुए सुनील ने कहा, "यह देखो आपके अंदर से निकला पानी झरने के पानी से कहीं अलग है। कितना चिकना और रसीला है यह!" यह कहते हुए सुनील अपनी उँगलियों को चाटने लगे।

ज्योति सुनील की उंगलियों को अपनी चूत के द्वार पर महसूस कर छटपटा ने लगी। अपनी गाँड़ पर सुनील जी का भारी भरखम लण्ड उनकी निक्कर के अंदर से ठोकर मार रहा था। ज्योति ने वाकई में महसूस किया की उसकी चूत में से झरने की तरह उसका स्त्री रस चू रहा था। वह सुनीलजी की बाँहों में पड़ी उन्माद से सराबोर थी और बेबस होने का नाटक कर ऐसे दिखावा कर रही थीं जैसे सुनीलजी ने उनको इतना कस के पकड़ रक्खा था की वह निकल ना सके।

ज्योति ने दिखावा करते हुए कहा, "सुनीलजी छोडो ना?"

सुनील ने कहा, "पहले बोलो, सुनील। सुनीलजी नहीं।"

ज्योति ने जैसे असहाय हो ऐसी आवाज में कहा, "अच्छा भैया सुनील! बस? अब तो छोडो?"

सुनील ने कहा, "भैया? तुम सैयां को भैय्या कहती हो?"

ज्योति ने नाक चढ़ाते हुए पूछा, "अच्छा? अब तुम मेरे सैयां भी बन गए? दोस्त की बीबी को फाँस ने में लगे हो? दोस्त से गद्दारी ठीक बात नहीं।"

सुनीलजी ने कहा, "ज्योति, दोस्त की बीबी को मैं नहीं फाँस रहा। दोस्त की बीबी खुद फँस ने के लिए तैयार है। और फिर दोस्त से गद्दारी कहाँ की? गद्दारी तो अब होती ही जब किसी की प्यारी चीज़ उससे छीन लो और बदले में अंगूठा दिखाओ। मैंने उनसे तुम्हें छीना नहीं, कुछ देर के लिए उधार ही माँगा है। और फिर मैंने उनको अंगूठा भी नहीं दिखाया , बदले में मेरे दोस्त को अकेला थोड़े ही छोड़ा है? देखो वह भी तो किसी की कंपनी एन्जॉय कर रहा है। और वह कंपनी उनको मेरी पत्नी दे रही है।"

ज्योति सुनीलजी को देखती ही रही। उसने सोचा सुनीलजी जितने भोले दीखते हैं उतने हैं नहीं। ज्योति ने कहा, "तो तुम मुझे जस्सूजी के साथ पत्नी की अदलाबदली करके पाना चाहते हो?"

सुनीलजी ने फौरन सर हिलाए हुए कहा, "ज्योति, आपकी यह भाषा अश्लील है। मैं कोई अदलाबदली नहीं चाहता। देखिये अगर आप मुझे पसंद नहीं करती हैं तो आप मुझे अपने पास नहीं फटकने देंगीं। उसी तरह अगर मेरी पत्नी सुनीता जस्सूजी को ना पसंद करे तो वह उनको भी नजदीक नहीं आने देगी। मतलब यह पसंदगी का सवाल है। ज्योति मैं तुम्हें अपनी बनाना चाहता हूँ। क्या तुम्हें मंजूर है?"

ज्योति ने कहा, "एक तो जबरदस्ती करते हो और ऊपर से मेरी इजाजत माँग रहे हो?"

सुनील एकदम पीछे हट गए। इनका चेरे पर निराशा और गंभीरता साफ़ दिख रही थी। सुनील बोले, "ज्योतिजी, कोई जबरदस्ती नहीं। प्यार में कोई जबरदस्ती नहीं होती।"
 
ज्योति को सुनीलजी के चेहरे के भाव देख कर हँसी आ गयी। वह अपनी आँखें नचाती हुई बोली, "अच्छा जनाब! आप कामातुर औरत की भाषा भी नहीं समझते? अरे अगर भारतीय नारी जब त्रस्त हो कर कहती है 'खबरदार आगे मत बढ़ना' तो इसका तो मतलब है साफ़ "ना"। ऐसी नारी से जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। पर वह जब वासना की आग में जल रही होती है और फिर भी कहती है, "छोडो ना? मुझे जाने दो।", तो इसका मतलब है "मुझे प्यार कर के मना कर चुदवाने के लिए तैयार करो तब मैं सोचूंगी।" पर वह जब मुस्काते हुए कहती है "मैं सोचूंगी" तो इसका मतलब है वह तुम्हें मन ही मन से कोस रही है और इशारा कर रह है की "मैं तैयार हूँ। देर क्यों कर रहे हो?" अगर वह कहे "हाँ" तो समझो वह भारतीय नहीं है।"

सुनीलजी ज्योति की बात सुनकर हंस पड़े। उन्होंने कहा, "तो फिर आप क्या कहती हैं?"

ज्योति ने शर्मा कर मुस्काते हुए कहा, "मैं सोचूंगी।"

सुनील ने फ़ौरन ज्योति की गाँड़ में अपनी निक्कर में फर्राटे मार रहा अपना लण्ड सटा कर ज्योति के करारे स्तनोँ को उसकी बिकिनी के अंदर अपनी उंगलियां घुसाकर उनको मसलते हुए कहा, "अब मैं सिर्फ देखना नहीं और भी बहुत कुछ चाहता हूँ। पर सबसे पहले मैं अपनी ज्योति को असली ज्योति के रूप में बिना किसी आवरण के देखना चाहता हूँ।" ऐसा कह कर सुनील ने ज्योति की कॉस्च्यूम के कंधे पर लगी पट्टीयों को ज्योति की दोनों बाजुओं के निचे की और सरका दीं।

जैसे ही पट्टियाँ निचे की और सरक गयीं तो सुनील ने उनको निचे की और खिसका दिया और ज्योति के दोनों उन्मत्त स्तनों को अनावृत कर दिए। ज्योति के स्तन जैसे ही नंगे हो गए की सुनील की आँखें उनपर थम ही गयीं। ज्योति के स्तन पुरे भरे और फुले होने के बावजूद थोड़े से भी झुके हुए हैं नहीं थे।

ज्योति के स्तनों की चोटी को अपने घेरे में डाले हुए उसके गुलाबी एरोला ऐसे लगते थे जैसे गुलाबी रंग का छोटा सा जापानी छाता दो फूली हुई निप्पलोँ के इर्दगिर्द फ़ैल कर स्तनोँ को और ज्यादा खूबसूरत बना रहे हों। बीचो बिच फूली हुई निप्पलेँ भी गुलाबी रंग की थीं। एरोला की सतह पर जगह जगह फुंसियां जैसी उभरी हुईं त्वचा स्तनों की खूबसूरती में चार चाँद लगा देती थीं। साक्षात् मेनका स्वर्ग से निचे उतर कर विश्वामित्र का मन हरने आयी हो ऐसी खूबसूरती अद्भुत लग रही थी।

ज्योति की कमर रेत घडी के सामान पतली और ऊपर स्तनोँ काऔर निचे कूल्हों के उभार के बिच अपनी अनूठी शान प्रदर्शित कर रही थी। ज्योति की नाभि की गहराई कामुकता को बढ़ावा दे रही थी। ज्योति की नाभि के निचे हल्का सा उभार और फिर एकदम चूत से थोडासा ऊपर वाला चढ़ाव और फिर चूत की पंखुडियों की खाई देखते ही बनती थी। सबसे ज्यादा खूबसूरत ज्योति की गाँड़ का उतारचढ़ाव था। उन उतारचढ़ाव के ऊपर टिकी हुई सुनील की नजर हटती ही नहीं थी। और उस गाँड़ के दो खूबसूरत गालों की तो बात ही क्या?

उन दो गालों के बिच जो दरार थी जिसमें ज्योति की कॉस्च्यूम के कपडे का एक छोटासा टुकड़ा फँसा हुआ था वह ज्योति की गाँड़ की खूबसूरती को ढकने में पूरी तरह असफल था।

सुनील की धीरज जवाब देने लगी। अब वह ज्योति को पूरी तरह अनावृत (याने नग्न रूप में) देखना चाहते थे। सुनील ने ज्योति की कमर पर लटका हुआ उनका कॉस्च्यूम और निचे, ज्योति के पॉंव की और खिसकाया। ज्योति ने भी अपने पाँव बारी बारी से उठाकर उस कॉस्च्यूम को पाँव के निचे खिसका कर झुक कर उसे उठा लिया और किनारे पर फेंक दिया। अब ज्योति छाती तक गहरे पानी में पूरी तरह नंगी खड़ी थी।

ना चाहते हुए भी सुनील नग्न ज्योति की खूबसूरती की नंगी सुनीता से तुलना करने से अपने आपको रोक ना सका। हलांकि सुनीता भी बलाकि खूबसूरत थी और नंगी सुनीता कमाल की सुन्दर और सेक्सी थी, पर ज्योति में कुछ ऐसी कशिश थी जो अतुलनीय थी। हर मर्द को अपनी बीबी से दूसरे की बीबी हमेशा ज्यादा ही सुन्दर लगती है।

सुनील ने नंगी ज्योति को घुमा कर अपनी बाँहों में आसानी से उठा लिया। हलकीफुलकी ज्योति को पानी में से उठाकर सुनील पानी के बाहर आये और किनारे रेत के बिस्तर में उसे लिटा कर सुनील उसके पास बैठ गए और रेत पर लेटी हुई नग्न ज्योति के बदन को ऐसे प्यार और दुलार से देखने लगे जैसे कई जन्मों से कोई आशिक अपनी माशूका को पहली बार नंगी देख रहा हो।

ऐसे अपने पुरे बदन को घूरते हुए देख ज्योति शर्मायी और उसने सुनीलकी ठुड्डी अपनी उँगलियों में पकड़ कर पूछा, "ओये! क्या देख रहे हो? इससे पहले किसी नंगी औरत को देखा नहीं क्या? क्या सुनीता ने तुम्हें भी अपना पूरा नंगा बदन दिखाया नहीं?"

ज्योति की बात सुनकर सुनील सकपका गए और बोले, "ऐसी कोई बात नहीं, पर ज्योति तुम्हारी सुंदरता कमाल है। अब मैं समझ सकता हूँ की कैसे जस्सूजी जैसे हरफनमौला आशिक को भी तुमने अपने हुस्न के जादू में बाँध रखा है।"
 
ज्योति जैसे ही सुनीलजी की बाँहों में समायी उसने सुनीलजी के खड़े लण्ड को महसूस किया। ज्योति जानती थी की सुनीलजी उस पर कोई जबरदस्ती नहीं करेंगे पर बेचारा सुनीलजी का लण्ड कहाँ मानने वाला था? ज्योति को ऐसे स्विमिंग कॉस्च्यूम में देख कर सुनीलजी के लण्ड का खड़ा होकर सुनीलजी की निक्कर में फनफनाना स्वाभाविक ही था।

ज्योति को सुनीलजी के लण्ड से कोई शिकायत नहीं थी। दो बार ज्योति ने सुनीलजी के लण्ड की गरमी अपने दक्ष हाथों के जादू से निकाल दी थी। ज्योति सुनीलजी के लण्ड की लम्बाई और मोटाई के बारे में भलीभांति वाकिफ थी। पर उस समय उसका एक मात्र लक्ष्य था की उसे सुनीलजी से तैरना सीखना था।

कई बार ज्योति को बड़ा अफ़सोस होता था की उसने तैरना नहीं सीखा था। काफी समय से ज्योति के मन में यह एक प्रबल इच्छा थी की वह तैरना सीखे।

सुनीलजी जैसे आला प्रशिक्षक से जब उसे तैरना सिखने का मौक़ा मिला तो भला वह उसे क्यों जाने दे? जहां तक सुनीलजी के उसके बदन छूने की बात थी तो वह ज्योति के लिए उतनी गंभीर बात नहीं थी।

ज्योति के मन में सुनीलजी का स्थान ह्रदय के इतना करीब था की उसका बस चलता तो वह अपनी पूरी जिंदगी सुनीलजी पर कुर्बान कर देती। सुनीलजी और ज्योति के संबंधों को लेकर बार बार अपने पति के उकसाने के कारण ज्योति के पुरे बदन में सुनीलजी का नाम सुनकर ही एक रोमांच सा हो जाता था।

सुनीलजी से शारीरिक संबंधों के बारेमें ज्योति के मन में हमेशा अजीबो गरीब ख़याल आते रहते थे। भला जिसको कोई इतना चाहता हो उसे कैसे कोई परहेज कर सकता है?

ज्योति मन में कहीं ना कहीं सुनीलजी को अपना प्रियतम तो मान ही चुकी थी। ज्योति के मन में सुनीलजी का शारीरिक और मानसिक आकर्षण उतना जबरदस्त था की अगर उसके पाँव माँ के वचन ने रोके नहीं होते तो शायद अब तक ज्योति सुनीलजी से चुद चुकी होती। पर एक आखरी पड़ाव पार करना बाकी था शायद इस के कारण अब भी सुनीलजी से ज्योति के मन में कुछ शर्म और लज्जा और दुरी का भाव था।

या यूँ कहिये की कोई दुरी नहीं होती है तब भी जिसे आप इतना सम्मान करते हैं और उतना ही प्यार करते हो तो उसके सामने निर्लज्ज तो नहीं हो सकते ना? उनसे कुछ लज्जा और शर्म आना स्वाभाविक भारतीय संस्कृति है।

जब सुनीलजी के सामने ज्योति ने आधी नंगी सी आने में हिचकिचाहट की तो सुनीलजी की रंजिश ज्योति को दिखाई दी। ज्योति जानती थी की सुनीलजी कभी भी ज्योति को बिना रजामंदी के चोदने की बात तो दूर वह किसी भी तरह से छेड़ेंगे भी नहीं।

पर फिर भी ज्योति कभी इतने छोटे कपड़ों में सूरज के प्रकाश में सुनीलजी के सामने प्रस्तुत नहीं हुई थी। इस लिए उसे शर्म और लज्जा आना स्वाभाविक था। शायद ऐसे कपड़ों में पत्नीयाँ भी अपने पति के सामने हाजिर होने से झिझकेंगी।

जब सुनीलजी ने ज्योति की यह हिचकिचाहट देखि तो उन्हें दुःख हुआ। उनको लगा ज्योति को उनके करीब आने डर रही थी की कहीं सुनीलजी ज्योति पर जबरदस्ती ना कर बैठे।

हार कर सुनीलजी पानी से बाहर निकल आये और कैंप में वापस जाने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने ज्योति से इतना ही कहा की जब ज्योति उन्हें अपना नहीं मानती और उनसे पर्दा करती है तो फिर बेहतर है वह ज्योति से दूर ही रहें।

इस बात से ज्योति को इतना बुरा लगा की वह भाग कर सुनीलजी की बाँहों में लिपट गयी और उसने सुनीलजी से कहा, “अब मैं आपको नहीं रोकूंगी। मैं आपको अपनों से कहीं ज्यादा मानती हूँ। अब आप मुझसे जो चाहे करो।”

उसी समय ज्योति ने तय किया की वह सुनीलजी पर पूरा विश्वास रखेगी और तब उसने मन से अपना सब कुछ सुनीलजी के हाथों में सौंप दिया। पर सुनीलजी भी तो अकड़ू थे।

वह दया, दान, मज़बूरी या भिक्षा नहीं वह अपनी प्रियतमा से प्यार भरा सक्रीय एवं स्वैच्छिक सम्पूर्ण आत्म समर्पण चाहते थे।

ट्रैन में सफर करते हुए सुनीलजी ज्योति के बिस्तर में जा घूसे थे उस वाकये के कारण वह अपने आपसे बड़े नाराज थे।

कैसे उन्होंने अपने आप पर नियत्रण खो दिया? जब ज्योति ने उन्हें स्पष्ट शब्दों में कहा था की वह उनसे शारीरिक सम्बन्ध नहीं रख सकती तब क्यों वह ज्योति के बिस्तर में चले गए? यह तो उनके सिद्धांतों के बिलकुल विरुद्ध था।

उन्होंने ज्योति के सामने सौगंध सी खायी थी की जब तक ज्योति सामने चलकर अपना स्वैच्छिक सक्रीय एवं सम्पूर्ण आत्म समर्पण नहीं करेगी तब तक वह ज्योति को किसी भी तरह के शारीरिक सम्बन्ध के लिए बाध्य नहीं करेंगे।

पर फीर भी ट्रैन में उस रात ज्योति के थोड़ा उकसाने पर वह ज्योति के बिस्तर में घुस गए और अपनी इज्जत दाँव पर लगा दी यह पछतावा सुनीलजी के ह्रदय को खाये जा रहा था।

ज्योति ने तो अपने मन में तय कर लिया की सुनीलजी उसके साथ जो व्यवहार करेंगे वह उसे स्वीकारेगी। अगर सुनीलजी ने ज्योति को चोदने की इच्छा जताई तो ज्योति सुनीलजी से चुदवाने के लिए भी मना नहीं करेगी, हालांकि ऐसा करने से उसने माँ को दिया गया वचन टूट जाएगा।

पर ज्योति को पूरा भरोसा था की सुनीलजी एक सख्त नियम पालन करने वाले इंसान थे और वह कभी भी ज्योति का विश्वास नहीं तोड़ेंगे।

सुनीलजी ने ज्योति को सीमेंट की फर्श पर गाड़े हुए स्टील के बार हाथ में पकड़ कर पानी को सतह पर उलटा लेट कर पॉंव एक के बाद एक पछाड़ ने को कहा।

खुद स्टील का पाइप पकड़ कर जैसे सिख रहे हों ऐसे पानी की सतह पर उलटा लेट गए और पॉंव को सीधा रखते हुए ऊपर निचे करते हुए ज्योति को दिखाया। और ज्योति को भी ऐसा ही करने को कहा।

ज्योति सुनीलजी के कहे मुजब स्टील के बार को पकड़ कर पानी की सतह पर उल्टी लेट गयी। उसकी नंगी गाँड़ सुनीलजी की आँखों को परेशान कर रही थी। वह ज्योति की सुआकार गाँड़ देखते ही रह गए।

ज्योति की नंगी गाँड़ देख कर सुनीलजी का लण्ड सुनीलजी के मानसिक नियत्रण को ठेंगा दिखाता हुआ सुनीलजी की दो जाँघों के बिच निक्कर में कूद रहा था। पर सुनीलजी ने अपने ऊपर कडा नियत्रण रखते हुए उस पर ध्यान नहीं दिया।

सुनीलजी के लिए बड़ी दुविधा थी। उन्हें डर था की अगर उन्होंने ज्योति के करारे बदन को इधर उधर छु लिया तो कहीं वह अपने आप पर नियत्रण तो नहीं खो देंगे? जब ज्योति ने यह देखा तो उसे बड़ा दुःख हुआ।

वह जानती थी की सुनीलजी उसे चोदने के लिए कितना तड़प रहे थे। ज्योति को ऐसे कॉस्च्यूम में देख कर भी वह अपने आप पर जबर दस्त कण्ट्रोल रख रहे थे। हालांकि यह साफ़ था की सुनीलजी का लण्ड उनकी बात मान नहीं रहा था।

खैर होनी को कौन टाल सकता है? यह सोचकर ज्योति ने सुनीलजी का हाथ थामा और कहा, “सुनीलजी, अब आप मुझे तैरना सिखाएंगे की नहीं? पहले जब मैं झिझक रही थी तब आप मुझ पर नाराज हो रहे थे। अब आप झिझक रहे हो तो क्या मुझे नाराज होने का अधिकार नहीं?”
 
धीरे धीरे दर्द कम होने लगा और उन्माद बढ़ने लगा। ज्योति भी कई महीनों से सुनीलजी से चुदवाने के लिए बेक़रार थी। यह सही था की ज्योति ने अपने पति से सुनीलजी से चुदवाने के लिये कोई इजाजत या परमिशन तो नहीं ली थी पर वह जानती थी की जस्सूजी उसके मन की बात भलीभांति जानते थे। जस्सूजी जानते थे की आज नहीं तो कल उनकी पत्नी सुनीलजी से चुदेगी जरूर।

धीरे सुनील का लण्ड ज्योति की चूत की पूरी सुरंग में घुस गया। सुनील का एक एक धक्का ज्योति को सातवें आसमान को छूने का अनुभव करा रहा था। सुनील धक्का ज्योति के पुरे बदन को हिला देता था। ज्योति की दोनों चूँचियाँ सुनील ने अपनी हथेलियों में कस के पकड़ रक्खी थीं। सुनील थोड़ा झुक कर अपना लण्ड पुरे जोश से ज्योति की चूत में पेल रहे थे।

सुनील की चुदाई ज्योति को इतनी उन्मादक कर रही थी की वह जोर से कराह कर अपनी कामातुरता को उजागर कर रही थी। ज्योति की ऊँचे आवाज वाली कराहट वाटर फॉल के शोर में कहीं नहीं सुनाई पड़ती थी। ज्योति उस समय सुनील के लण्ड का उसकी चूत में घुसना और निकलना ही अनुभव कर रही थी। उस समय उसे और कोई भी एहसास नहीं हो रहा था। सुनील उत्तेजना से ज्योति की चूतमें इतना जोशीला धक्का मार रहे थे की कई बार ज्योति ड़र रही थी की सुनील का लण्ड उसकी बच्चे दानी को ही फाड़ ना दे।

ज्योति को दर्द का कोई एहसास नहीं हो रहा था। दर्द जैसे गायब ही हो गया था और उसकी जगह सुनील का लण्ड ज्योति को अवर्णनीय सुख और उन्माद दे रहा था। जैसे सुनील का लण्ड ज्योति की चूत की सुरंग में अंदर बाहर हो रहा था, ज्योति को एक अद्भुत एहसास रहा था। ज्योति न सिर्फ सुनील से चुदवाना चाहती थी; उसे सुनील से तहे दिल से प्यार था।

उनकी कुशाग्र बुद्धिमत्ता, उनकी किसी भी मसले को प्रस्तुत करने की शैली, बातें करते समय उनके हावभाव और सबसे ज्यादा उनकी आँखों में जो एक अजीब सी चमक ने ज्योति के मन को चुरा लिया था। ज्योति सुनीलजी से इतनी प्रभावित थी की वह उनसे प्यार करने लगी थी। अपने पति से प्यार होते हुए भी वह सुनील से भी प्यार कर बैठी थी।

अक्सर यह शादीशुदा स्त्री और पुरुष दोनों में होता है। अगर कोई पुरुष अपनी पत्नी को छोड़ किसी और स्त्री से प्यार करने लगता है और उससे सेक्स करता है (उसे चोदता है) तो इसका मतलब यह नहीं है की वह अपनी पत्नी से प्यार नहीं करता। ठीक उसी तरह अगर कोई शादीशुदा स्त्री किसी और पुरुष को प्यार करने लगती है और वह प्यार से उससे चुदाई करवाती है तो इसका कतई भी यह मतलब नहीं निकालना चाहिए की वह अपने पति से प्यार नहीं करती।

हाँ यदि यह प्यार शादीशुदा पति या पत्नी के मन में उस परायी व्यक्ति के लिए पागलपन में बदल जाए जिससे वह अपने जोड़ीदार को पहले वाला प्यार करने में असमर्थ हो तब समस्या होती है।

बात वहाँ उलझ जाती है जहां स्त्री अथवा पुरुष अपने जोड़ीदार से यह अपेक्षा रखते हैं की उसका जोड़ीदार किसी अन्य व्यक्ति से प्यार ना करे और चुदाई तो नाही करे या करवाए। बात अधिकार माने अहम् पर आकर रुक जाती है। समस्या यहां से ही शुरू होती है।

जहां यह अहम् नहीं होता वहाँ समझदारी की वजह से पति और पत्नी में पर पुरुष या स्त्री के साथ गमन करने से (मतलब चोदने या चुदवाने से) वैमनस्यता (कलह) नहीं पैदा होती। बल्कि इससे बिलकुल उलटा वहाँ ज्यादा रोमांच और उत्तेजना के कारण उस चुदाई में सब को आनंद मिलता है यदि उसमें स्पष्ट या अष्पष्ट आपसी सहमति हो।

ज्योति को सुनील से तहे दिल से प्यार था और वही प्यार के कारण दोनों बदन में मिलन की कामना कई महीनों से उजागर थी। तलाश मौके की थी। ज्योति ने सुनील को जबसे पहेली बार देखा था तभी से वह उससे बड़ी प्रभावित थी।

उससे भी कहीं ज्यादा जब ज्योति ने देखा की सुनील उसे देख कर एकदम अपना होशोहवास खो बैठते थे तो वह समझ गयी की कहीं ना कहीं सुनीलजी के मन में भी ज्योति के लिए वही प्यार था और उनकी ज्योति के कमसिन बदन से सम्भोग (चोदने) की इच्छा प्रबल थी यह महसूस कर ज्योति की सुनील से चुदवाने की इच्छा दुगुनी हो गयी।

जैसे जैसे सुनील ने ज्योति को चोदने की रफ़्तार बढ़ाई, ज्योति का उन्माद भी बढ़ने लगा। जैसे ही सुनील ज्योति की चूत में अपने कड़े लण्ड का अपने पेंडू के द्वारा एक जोरदार धक्का मारता था, ज्योति का पूरा बदन ना सिर्फ हिल जाता था, ज्योति के मुंह से प्यार भरी उन्मादक कराहट निकल जाती थी। अगर उस समय वाटर फॉल का शोर ना होता तो ज्योति की कराहट पूरी वादियों में गूंजती।

सुनील की बुद्धि और मन में उस समय एक मात्र विचार यह था की ज्योति की चूत में कैसे वह अपना लण्ड गहराई तक पेल सके जिससे ज्योति सुनील से चुदाई का पूरा आनंद ले सके। पानी में खड़े हो कर चुदाई करने से सुनील कोज्यादा ताकत लगानी पड़ रही थी और ज्योति की गाँड़ पर उसके टोटे (अंडकोष) उतने जोर से थप्पड़ नहीं मार पाते थे जितना अगर वह ज्योति को पानी के बाहर चोदते।

पर पानी में ज्योति को चोदने का मजा भी तो कुछ और था। ज्योति को भी सुनील से पानी में चुदाई करवाने में कुछ और ही अद्भुत रोमांच का अनुभव हो रहा था। सुनील एक हाथ से ज्योति की गाँड़ के गालों पर हलकी सी प्यार भरी चपत अक्सर लगाते रहते थे जिसके कारण ज्योति का उन्माद और बढ़ जाता था। ज्योति की चूत में अपना लण्ड पेलते हुए सुनील का एक हाथ ज्योति को दोनों स्तनोँ पर अपना अधिकार जमाए हुए था।

सुनील को कई महीनों से ज्योति को चोदने के चाह के कारण सुनील के एंड कोष में भरा हुआ वीर्य का भण्डार बाहर आकर ज्योति की चूत को भर देने के लिए बेताब था। सुनील अपने वीर्य की ज्योति की चूत की सुरंग में छोड़ने की मीठी अनुभूति करना चाहते थे। ज्योति की नंगी गाँड़ जो उनको अपनी आँखों के सामने दिख रही थी वह सुनील को पागल कर रही थी।

सुनील का धैर्य (या वीर्य?) छूटने वाला ही था। ज्योति ने भी अनुभव किया की अगर उसी तरह सुनील उसे चोदते रहे तो जल्द ही सुनील अपना सारा वीर्य ज्योति की सुरंग में छोड़ देंगे। ज्योति को पूरी संतुष्टि होनी बाकी थी। उसे चुदाई का और भी आनंद लेना था। ज्योति ने सुनील को रुकने के लिए कहा।

सुनील के रुकते ही ज्योति ने सुनील को पानी के बाहर किनारे पर रेत में सोने के लिए अनुग्रह किया। सुनील रेत पर लेट गए। ज्योति शेरनी की तरह सुनील के ऊपर सवार हो गयी। ज्योति ने सुनील का फुला हुआ लण्ड अपनी उँगलियों में पकड़ा और अपना बदन नीचा करके सुनील का पूरा लण्ड अपनी चूत में घुसेड़ दिया।

अब ज्योति सुनील की चुदाई कर रही थी। ज्योति को उस हाल में देख ऐसा लगता था जैसे ज्योति पर कोई भूत सवार हो गया हो। ज्योति अपनी गाँड़ के साथ अपना पूरा पेंडू पहले वापस लेती थी और फिर पुरे जोश से सुनील के लण्ड पर जैसे आक्रमण कर रही हो ऐसे उसे पूरा अपनी चूत की सुरंग में घुसा देती थी। ऐसा करते हुए ज्योति का पूरा बदन हिल जाता था। ज्योति के स्तन इतने हिल तरहे थे की देखते ही बनता था।

ज्योति की चूत की फड़कन बढ़ती ही जा रही थी। ज्योति का उन्माद उस समय सातवें आसमान पर था। ज्योति को उस समय अपनी चूत में रगड़ खा रहे सुनील के लण्ड के अलावा कोई भी विचार नहीं आ रहा था। वह रगड़ के कारण पैदा हो रही उत्तेजना और उन्माद ज्योति को उन्माद की चोटी पर लेजाने लगा था। ज्योति के अंदर भरी हुई वासना का बारूद फटने वाला था।

सुनील को चोदते हुए ज्योति की कराहट और उन्माद पूर्ण और जोरदार होती जा रही थी। सुनील का वीर्य का फव्वारा भी छूटने वाला ही था। अचानक सुनील के दिमाग में जैसे एक पटाखा सा फूटा और एक दिमाग को हिला देने वाले धमाके के साथ सुनील के लण्ड के केंद्रित छिद्र से उसके वीर्य का फव्वारा जोर से फुट पड़ा।

जैसे ही ज्योति ने अपनी चूत की सुरंग में सुनील के गरमा गरम वीर्य का फव्वारा अनुभव किया की वह भी अपना नियत्रण खो बैठी और एक धमाका सा हुआ जो ज्योति के पुरे बदन को हिलाने लगा। ज्योति को ऐसा लगा जैसे उसके दिमाग में एक गजब का मीठा और उन्मादक जोरदार धमाका हुआ। जिसकेकारण उसका पूरा बदन हिल गया और उसकी पूरी शक्ति और ऊर्जा उस धमाके में समा गयी।

चंद पलों में ही ज्योति निढाल हो कर सुनील पर गिर पड़ी। सुनील का लण्ड तब भी ज्योति की चूत में ही था। पर ज्योति अपनी आँखें बंद कर उस अद्भुत अनुभव का आनंद ले रही थी।

end
 
सुनीता जैसे ही जस्सूजी की बाँहों में समायी उसने जस्सूजी के खड़े लण्ड को महसूस किया। सुनीता जानती थी की जस्सूजी उस पर कोई जबरदस्ती नहीं करेंगे पर बेचारा जस्सूजी का लण्ड कहाँ मानने वाला था? सुनीता को ऐसे स्विमिंग कॉस्च्यूम में देख कर जस्सूजी के लण्ड का खड़ा होकर जस्सूजी की निक्कर में फनफनाना स्वाभाविक ही था।

सुनीता को जस्सूजी के लण्ड से कोई शिकायत नहीं थी। दो बार सुनीता ने जस्सूजी के लण्ड की गरमी अपने दक्ष हाथों के जादू से निकाल दी थी। सुनीता जस्सूजी के लण्ड की लम्बाई और मोटाई के बारे में भलीभांति वाकिफ थी। पर उस समय उसका एक मात्र लक्ष्य था की उसे जस्सूजी से तैरना सीखना था।

कई बार सुनीता को बड़ा अफ़सोस होता था की उसने तैरना नहीं सीखा था। काफी समय से सुनीता के मन में यह एक प्रबल इच्छा थी की वह तैरना सीखे।

जस्सूजी जैसे आला प्रशिक्षक से जब उसे तैरना सिखने का मौक़ा मिला तो भला वह उसे क्यों जाने दे? जहां तक जस्सूजी के उसके बदन छूने की बात थी तो वह सुनीता के लिए उतनी गंभीर बात नहीं थी।

सुनीता के मन में जस्सूजी का स्थान ह्रदय के इतना करीब था की उसका बस चलता तो वह अपनी पूरी जिंदगी जस्सूजी पर कुर्बान कर देती। जस्सूजी और सुनीता के संबंधों को लेकर बार बार अपने पति के उकसाने के कारण सुनीता के पुरे बदन में जस्सूजी का नाम सुनकर ही एक रोमांच सा हो जाता था।

जस्सूजी से शारीरिक संबंधों के बारेमें सुनीता के मन में हमेशा अजीबो गरीब ख़याल आते रहते थे। भला जिसको कोई इतना चाहता हो उसे कैसे कोई परहेज कर सकता है?

सुनीता मन में कहीं ना कहीं जस्सूजी को अपना प्रियतम तो मान ही चुकी थी। सुनीता के मन में जस्सूजी का शारीरिक और मानसिक आकर्षण उतना जबरदस्त था की अगर उसके पाँव माँ के वचन ने रोके नहीं होते तो शायद अब तक सुनीता जस्सूजी से चुद चुकी होती। पर एक आखरी पड़ाव पार करना बाकी था शायद इस के कारण अब भी जस्सूजी से सुनीता के मन में कुछ शर्म और लज्जा और दुरी का भाव था।

या यूँ कहिये की कोई दुरी नहीं होती है तब भी जिसे आप इतना सम्मान करते हैं और उतना ही प्यार करते हो तो उसके सामने निर्लज्ज तो नहीं हो सकते ना? उनसे कुछ लज्जा और शर्म आना स्वाभाविक भारतीय संस्कृति है।

जब जस्सूजी के सामने सुनीता ने आधी नंगी सी आने में हिचकिचाहट की तो जस्सूजी की रंजिश सुनीता को दिखाई दी। सुनीता जानती थी की जस्सूजी कभी भी सुनीता को बिना रजामंदी के चोदने की बात तो दूर वह किसी भी तरह से छेड़ेंगे भी नहीं।

पर फिर भी सुनीता कभी इतने छोटे कपड़ों में सूरज के प्रकाश में जस्सूजी के सामने प्रस्तुत नहीं हुई थी। इस लिए उसे शर्म और लज्जा आना स्वाभाविक था। शायद ऐसे कपड़ों में पत्नीयाँ भी अपने पति के सामने हाजिर होने से झिझकेंगी।

जब जस्सूजी ने सुनीता की यह हिचकिचाहट देखि तो उन्हें दुःख हुआ। उनको लगा सुनीता को उनके करीब आने डर रही थी की कहीं जस्सूजी सुनीता पर जबरदस्ती ना कर बैठे।

हार कर जस्सूजी पानी से बाहर निकल आये और कैंप में वापस जाने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने सुनीता से इतना ही कहा की जब सुनीता उन्हें अपना नहीं मानती और उनसे पर्दा करती है तो फिर बेहतर है वह सुनीता से दूर ही रहें।

इस बात से सुनीता को इतना बुरा लगा की वह भाग कर जस्सूजी की बाँहों में लिपट गयी और उसने जस्सूजी से कहा, “अब मैं आपको नहीं रोकूंगी। मैं आपको अपनों से कहीं ज्यादा मानती हूँ। अब आप मुझसे जो चाहे करो।”

उसी समय सुनीता ने तय किया की वह जस्सूजी पर पूरा विश्वास रखेगी और तब उसने मन से अपना सब कुछ जस्सूजी के हाथों में सौंप दिया। पर जस्सूजी भी तो अकड़ू थे।

वह दया, दान, मज़बूरी या भिक्षा नहीं वह अपनी प्रियतमा से प्यार भरा सक्रीय एवं स्वैच्छिक सम्पूर्ण आत्म समर्पण चाहते थे।

ट्रैन में सफर करते हुए जस्सूजी सुनीता के बिस्तर में जा घूसे थे उस वाकये के कारण वह अपने आपसे बड़े नाराज थे।

कैसे उन्होंने अपने आप पर नियत्रण खो दिया? जब सुनीता ने उन्हें स्पष्ट शब्दों में कहा था की वह उनसे शारीरिक सम्बन्ध नहीं रख सकती तब क्यों वह सुनीता के बिस्तर में चले गए? यह तो उनके सिद्धांतों के बिलकुल विरुद्ध था।

उन्होंने सुनीता के सामने सौगंध सी खायी थी की जब तक सुनीता सामने चलकर अपना स्वैच्छिक सक्रीय एवं सम्पूर्ण आत्म समर्पण नहीं करेगी तब तक वह सुनीता को किसी भी तरह के शारीरिक सम्बन्ध के लिए बाध्य नहीं करेंगे।

पर फीर भी ट्रैन में उस रात सुनीता के थोड़ा उकसाने पर वह सुनीता के बिस्तर में घुस गए और अपनी इज्जत दाँव पर लगा दी यह पछतावा जस्सूजी के ह्रदय को खाये जा रहा था।

सुनीता ने तो अपने मन में तय कर लिया की जस्सूजी उसके साथ जो व्यवहार करेंगे वह उसे स्वीकारेगी। अगर जस्सूजी ने सुनीता को चोदने की इच्छा जताई तो सुनीता जस्सूजी से चुदवाने के लिए भी मना नहीं करेगी, हालांकि ऐसा करने से उसने माँ को दिया गया वचन टूट जाएगा।

पर सुनीता को पूरा भरोसा था की जस्सूजी एक सख्त नियम पालन करने वाले इंसान थे और वह कभी भी सुनीता का विश्वास नहीं तोड़ेंगे।

जस्सूजी ने सुनीता को सीमेंट की फर्श पर गाड़े हुए स्टील के बार हाथ में पकड़ कर पानी को सतह पर उलटा लेट कर पॉंव एक के बाद एक पछाड़ ने को कहा।

खुद स्टील का पाइप पकड़ कर जैसे सिख रहे हों ऐसे पानी की सतह पर उलटा लेट गए और पॉंव को सीधा रखते हुए ऊपर निचे करते हुए सुनीता को दिखाया। और सुनीता को भी ऐसा ही करने को कहा।

सुनीता जस्सूजी के कहे मुजब स्टील के बार को पकड़ कर पानी की सतह पर उल्टी लेट गयी। उसकी नंगी गाँड़ जस्सूजी की आँखों को परेशान कर रही थी। वह सुनीता की सुआकार गाँड़ देखते ही रह गए।

सुनीता की नंगी गाँड़ देख कर जस्सूजी का लण्ड जस्सूजी के मानसिक नियत्रण को ठेंगा दिखाता हुआ जस्सूजी की दो जाँघों के बिच निक्कर में कूद रहा था। पर जस्सूजी ने अपने ऊपर कडा नियत्रण रखते हुए उस पर ध्यान नहीं दिया।

जस्सूजी के लिए बड़ी दुविधा थी। उन्हें डर था की अगर उन्होंने सुनीता के करारे बदन को इधर उधर छु लिया तो कहीं वह अपने आप पर नियत्रण तो नहीं खो देंगे? जब सुनीता ने यह देखा तो उसे बड़ा दुःख हुआ।

वह जानती थी की जस्सूजी उसे चोदने के लिए कितना तड़प रहे थे। सुनीता को ऐसे कॉस्च्यूम में देख कर भी वह अपने आप पर जबर दस्त कण्ट्रोल रख रहे थे। हालांकि यह साफ़ था की जस्सूजी का लण्ड उनकी बात मान नहीं रहा था।

खैर होनी को कौन टाल सकता है? यह सोचकर सुनीता ने जस्सूजी का हाथ थामा और कहा, “जस्सूजी, अब आप मुझे तैरना सिखाएंगे की नहीं? पहले जब मैं झिझक रही थी तब आप मुझ पर नाराज हो रहे थे। अब आप झिझक रहे हो तो क्या मुझे नाराज होने का अधिकार नहीं?”
 
ज्योति की बात सुनकर सुनीलजी मुस्कुरा दिए। अपने आप को सम्हालते हुए बोले, “ज्योति मैं सच कहता हूँ। पता नहीं तुम्हें देख कर मुझे क्या हो जाता है। मैं अपना आपा खो बैठता हूँ। आज तक मुझे किसी भी लड़की या स्त्री के लिए ऐसा भाव नहीं हुआ। ज्योति के लिए भी नहीं।”

ज्योति ने कहा, “सुनीलजी मुझमें कोई खासियत नहीं है। यह आपका मेरे ऊपर प्रेम है। कहावत है ना की ‘पराये का चेहरा कितना ही खूबसूरत क्यों ना हो तो भी उतना प्यारा नहीं लगता जितनी अपने प्यारे की ____ लगती है।; ज्योति सुनीलजी के सामने गाँड़ शब्द बोल नहीं पायी।

ज्योति की बात सुनकर सुनीलजी हंस पड़े और ज्योति की नंगी गाँड़ देखते हुए बोले, “ज्योति, मैं तुम्हारी बात से पूरी तरह सहमत हूँ।”

ज्योति सुनीलजी की नजर अपनी गाँड़ पर फिरती हुई देख कर शर्मा गयी और उसे नजर अंदाज करते हुए उलटा लेटे हुए अपने पाँव काफी ऊपर की और उठाकर पानी की सतह पर जैसे सुनीलजी ने बताया था ऐसे पछाड़ने लगी।

पर ऐसा करने से तो सुनीलजी को ज्योति की चूत पर टिकाई हुई ज्योति के कॉस्च्यूम की पट्टी खिसकती दिखी और एक पल के लिए ज्योति की खूबसूरत चूत का छोटा सा हिस्सा दिख गया।

यह नजारा देख कर सुनीलजी का मन डाँवाँडोल हो रहा था। ज्योति काफी कोशिश करने पर भी पानी की सतह पर ठीक से लेट नहीं पा रही थी और बार बार उसक पाँव जमीन को छू लेते थे।

सुनीलजी ने बड़ी मुश्किल से अपनी नजर ज्योति की जाँघों के बिच से हटाई और ज्योति के पेट के निचे अपना हाथ देकर ज्योति को ऊपर उठाया।

ज्योति ने वैसे ही अपने पाँव काफी ऊपर तक उठा कर पछाड़ती रही और ना चाहते हुए भी सुनीलजी की नजर ज्योति की चूत के तिकोने हिस्से को बारबार देखने के लिए तड़पती रही।

ज्योति सुनीलजी के मन की दुविधा भलीभाँति जानती थी पर खुद भी तो असहाय थी।

ऐसे ही कुछ देर तक पानी में हाथ पाँव मारने के बाद जब ज्योति कुछ देर तक पानी की सतह पर टिकी रह पाने लगी तब सुनीलजी ने ज्योति से कहा, “अब तुम पानी की सतह पर अपना बदन तैरता हुआ रख सकती हो। क्या अब तुम थोड़ा तैरने की कोशिश करने के लिए तैयार हो?”

ज्योति को पानी से काफी डर लगता था। उसने सुनीलजी से लिपट कर कहा, “जैसे आप कहो। पर मुझे पानी से बहुत डर लगता है। आप प्लीज मुझे पकडे रखना।”

सुनीलजी ने कहा, “अगर मैं तुम्हें पकड़ रखूंगा तो तुम तैरना कैसे सिखोगी? अपनी और से भी तुम्हें कुछ कोशिश तो करनी पड़ेगी ना?”

ज्योति ने कहा, “आप जैसा कहोगे, मैं वैसा ही करुँगी। अब मेरी जान आप के हाथ में है।”

सुनीलजी और ज्योति फिर थोड़े गहरे पानी में आ गए। ज्योति का बुरा हाल था। वह सुनीलजी की बाँह पकड़ कर तैरने की कोशिश कर रही थी।

सुनीलजी ने ज्योति को पहले जैसे ही पानी की सतह पर उलटा लेटने को कहा और पहले ही की तरह पाँव उठाकर पछाड़ने को कहा, साथ साथ में हाथ हिलाकर पानी पर तैरते रहने की हिदायत दी।

पहली बार ज्योति ने जब सुनीलजी का हाथ छोड़ा और पानी की सतह पर उलटा लेटने की कोशिश की तो पानी में डूबने लगी। जैसे ही पानी में उसका मुंह चला गया, ज्योति की साँस फूलने लगी।

जब वह साँस नहीं ले पायी और कुछ पानी भी पी गयी तो वह छटपटाई और इधर उधर हाथ मारकर सुनीलजी को पकड़ने की कोशिश करने लगी।

दोनों हाथोँ को बेतहाशा इधर उधर मारते हुए अचानक ज्योति के हाथों की पकड़ में सुनीलजी की जाँघें आ गयी। ज्योति सुनीलजी की जाँघों को पकड़ पानी की सतह के ऊपर आने की कोशिश करने लगी और ऐसा करते ही सुनीलजी की निक्कर का निचला छोर उसके हाथों में आ गया।

ज्योति ने छटपटाहट में उसे कस के पकड़ा और खुद को ऊपर उठाने की कोशिश की तो सुनीलजी की निक्कर पूरी निचे खिसक गयी और सुनीलजी का फुला हुआ मोटा लण्ड ज्योति के हांथों में आ गया।

.......................
 
जान बचाने की छटपटाहट के मारे ज्योति ने सुनीलजी के लण्ड को कस के पकड़ा और उसे पकड़ कर खुद को ऊपर आने की लिए खिंच कर हिलाने लगी।

ज्योति के मन में एक तरफ अपनी जान बचाने की छटपटाहट थी तो कहीं ना कहीं सुनीलजी का मोटा और काफी लंबा लण्ड हाथों में आने के कारण कुछ अजीब सी उत्तेजना भी थी।

सुनीलजी ने पानी के निचे अपना लण्ड ज्योति के हाथों में महसूस किया तो वह उछल पड़े। उन्होंने झुक कर ज्योति का सर पकड़ा और ज्योति को पानी से बाहर निकाला। ज्योति काफी पानी पी चुकी थी। ज्योति की साँसे फूल रही थीं।

सुनीलजी ज्योति को अपनी बाँहों में उठाकर चल कर किनारे ले आये और रेत में लिटा कर ज्योति के उन्मत्त स्तनोँ के ऊपर अपने हाथों से अपना पूरा वजन देकर उन्हें दबाने लगे जिससे ज्योति पीया हुआ पानी उगल दे और उसकी साँसें फिर से साधारण चलने लग जाएँ।

तीन या चार बार यह करने से ज्योति के मुंह से काफी सारा पानी फव्वारे की तरह निकल पड़ा। जैसे ही पानी निकला तो ज्योति की साँसे फिर से साधारण गति से चलने लगीं।

ज्योति ने जब आँखें खोलीं तो सुनीलजी को अपने स्तनोँ को दबाते हुए पाया। ज्योति ने देखा की सुनीलजी ज्योति को लेकर काफी चिंतित थे।

उन्हें यह भी होश नहीं था की अफरातफरी में उनकी निक्कर पानी में छूट गयी थी और वह नंगधडंग थे। सुनीलजी यह सोच कर परेशान थे की कहीं ज्योति की हालत और बिगड़ गयी तो किसको बुलाएंगे यह देखने के लिए वह इधर उधर देख रहे थे।

ज्योति फिर अपनी आँखें मूंद कर पड़ी रही। सुनीलजी का हाथ जो उसके स्तनों को दबा रहा था ज्योति को वह काफी उत्तेजित कर रहा था।

पर चूँकि ज्योति सुनीलजी को ज्यादा परेशान नहीं देखना चाहती थी इस लिए उसने सुनीलजी का हाथ पकड़ा ताकि सुनीलजी समझ जाएँ की ज्योति अब ठीक थी, पर वैसे ही पड़ी रही। चूँकि ज्योति ने सुनीलजी का हाथ कस के पकड़ा था, सुनीलजी अपना हाथ ज्योति के स्तनोँ पर से हटा नहीं पाए।

जब सुनीलजी ने ज्योति के स्तनोँ के ऊपर से अपना हाथ हटा ने की कोशिश की तब ज्योति ने फिर से उनका हाथ कस के पकड़ा और बोली, “सुनीलजी, आप हाथ मत हटाइये। मुझे अच्छा लग रहा है।”

ऐसा कह कर ज्योति ने सुनीलजी को अपने स्तनोँ को दबाने की छूट देदी। सुनीलजी ना चाहते हुए भी ज्योति के उन्नत स्तनोँ को मसलने से अपने आपको रोक नहीं पाए।

ज्योति ने अपना हाथ खिसकाया और सुनीलजी का खड़ा अल्लड़ लण्ड एक हाथ में लिया तब सुनीलजी को समझ आया की वह पूरी तरह से नंगधडंग थे। सुनीलजी ज्योति के हाथ से अपना लण्ड छुड़ाकर एकदम भाग कर पानी में चले गए और अपनी निक्कर ढूंढने लगे।

जब उनको निक्कर मिल गयी और वह उसे पहनने लगे थे की ज्योति सुनीलजी के पीछे चलती हुई उनके पास पहुँच गयी।

सुनीलजी के हाथ से एक ही झटके में उनकी निक्कर छिनती हुई बोली, “सुनीलजी, निक्कर छोड़िये। अब हम दोनों के बिच कोई पर्दा रखने की जरुरत नहीं है।”

ऐसा कह कर ज्योति ने सुनीलजी की निक्कर को पानी के बाहर फेंक दिया। फिर ज्योति ने अपनी बाँहें फैला कर सुनीलजी से कहा, “अब मुझे भी कॉस्च्यूम को पहनने की जरुरत नहीं है। चलिए मुझे आप अपना बना लीजिये। या मैं यह कहूं की आइये और अपने मन की सारी इच्छा पूरी कीजिये?”

यह कह कर जैसे ही ज्योति अपना कॉस्च्यूम निकाल ने के लिए तैयार हुई की सुनीलजी ने ज्योति का हाथ पकड़ा और बोले, “ज्योति नहीं। खबरदार! तुम अपना कॉस्च्यूम नहीं निकालोगी। मैं तुम्हें सौगंध देता हूँ। मैं तुम्हें तभी निर्वस्त्र देखूंगा जब तुम अपना शरीर मेरे सामने घुटने टेक कर तब समर्पित करोगी जब तुम्हारा प्रण पूरा होगा। मैं तुम्हें अपना वचन तोडने नहीं दूंगा। चाहे इसके लिए मुझे कई जन्मों तक ही इंतजार क्यों ना करना पड़े।”

यह बात सुनकर ज्योति का ह्रदय जैसे कटार के घाव से दो टुकड़े हो गया। अपने प्रीयतम के ह्रदय में वह कितना दुःख दे रही थी? ज्योति ने अपने आपको सुनीलजी को समर्पण करना भी चाहा पर सुनीलजी थे की मान नहीं रहे थे! वह क्या करे?

अब तो सुनीलजी ज्योति के कहने पर भी उसे कुछ नहीं करेंगे। ज्योति दुःख और भावनात्मक स्थिति में और कुछ ना बोल सकी और सुनीलजी से लिपट गयी।

सुनीलजी का खड़ा फनफनाता लण्ड ज्योति की चूत में घुसने के लिए जैसे पागल हो रहा था, पर अपने मालिक की नामर्जी के कारण असहाय था। इस मज़बूरी में जब ज्योति सुनीलजी से लिपट गयी तो वह ज्योति के कॉस्च्यूम के कपडे पर अपना दबाव डाल कर ही अपना मन बहला रहा था।

सुनीलजी ने सारी इधर उधर की बातों पर ध्यान ना देते हुए कहा, “देखो ज्योति, तैरने का एक मूलभूत सिद्धांत समझो। जब आप पानी में जाते हो तो यह समझलो की पानी आपको अपने अंदर नहीं रखना चाहता। हमारा शरीर पानी से हल्का है। पर हम इसलिए डूबते हैं क्यूंकि हम डूबना नहीं चाहते और इधर उधर हाथ पाँव मारते हैं…

पानी की सतह पर अगर आप अपना बदन ढीला छोड़ देंगे और भरोसा रखोगे की पानी आपको डुबाएगा नहीं तो आप डूबेंगे नहीं। इसके बाद सुनियोजित ताल मेल से हाथ और पाँव चलाइये। आप पानी में ना सिर्फ तैरेंगे बल्कि आप पानी को काट कर आगे बढ़ेंगे। यही सुनियोजित तालमेल से हाथ पैर चलाने को ही तैरना कहते हैं।”
 
ज्योति सुनीलजी की बात बड़े ध्यान से सुन रही थी। उसे सुनीलजी पर बड़ा ही प्यार आ रहा था। उस समय सुनीलजी का पूरा ध्यान ज्योति को तैराकी सिखाने पर था।

मन से असहाय और दुखी ज्योति को लेकर सुनीलजी फिर से गहरे पानी में पहुँच गए और फिर से ज्योति को पहले की तरह ही प्रैक्टिस करने को कहा। धीरे धीरे ज्योति का आत्मा विश्वास बढ़ने लगा। ज्योति सुनीलजी की कमर छोड़ कर अपने आपको पानी की सतह पर रखना सिख गयी।

इस बिच दो घंटे बीत चुके थे। सुनीलजी ने ज्योति को कहा, “आज के लिए इतना ही काफी है। बाकी हम कल करेंगे।” यह कह कर सुनीलजी पानी के बाहर आगये और ज्योति अपना मन मसोसती हुई महिलाओं के शावर रूम में चलीगयी।

ज्योति जब एकपडे बदल कर बाहर निकली तो सुनीलजी बाहर नहीं निकले थे। ज्योति को उसके पति सुनीलजी और ज्योतिजी आते हुए दिखाई दिए। दोनों ही काफी थके हुए लग रहे थे।

ज्योति को अंदाज हो गया की हो सकता है सुनीलजी की मन की चाहत उस दोपहर को पूरी हो गयी थी। ज्योतिजी भी पूरी तरह थकी हुई थी। ज्योति को देखते ही ज्योतिजी ने अपनी आँखें निचीं करलीं। ज्योति समझ गयी की पतिदेव ने ज्योति जी की अच्छी खासी चुदाई करी होगी।

ज्योति ने जब अपने पति की और देखा तो उन्होंने ने भी झेंपते हुए जैसे कोई गुनाह किया हो ऐसे ज्योति से आँख से आँख मिला नहीं पाए। ज्योति मन ही मन मुस्कुरायी।

वह अपने पति के पास गयी और अपनी आवाज और हावभाव में काफी उत्साह लाने की कोशिश करते हुए बोली, “डार्लिंग, सुनीलजी ना सिर्फ मैथ्स के बल्कि तैराकी के भी कमालके प्रशिक्षक हैं। मैं आज काफी तैरना सिख गयी।”

सुनीलजी ने अपनी पत्नी का हाथ थामा और थोड़ी देर पकडे रखा। फिर बिना कुछ बोले कपडे बदल ने के लिए मरदाना रूम में चले गए। अब ज्योतिजी और ज्योति आमने सामने खड़े थे।

ज्योतिजी अपने आपको रोक ना सकी और बोल पड़ी, “अच्छा? मेरे पतिदेव ने तुम्हें तैरने के अलावा और कुछ तो नहीं सिखाया ना?”

ज्योति भाग कर ज्योति जी से लिपट गयी और बोली, “दीदी आप ऐसे ताने क्यों मार रही हो? क्या आपको बुरा लगा? अगर ऐसा है तो मैं कभी आपको शिकायत का मौक़ा नहीं दूंगी। मैं सुनीलजी के पास फरकुंगी भी नहीं। बस?”

ज्योति जी ने ज्योति को अपनी बाँहों में भरते हुए कहा, “पगली, मैं तो तुम्हारी टांग खिंच रही थी। मैं जानती हूँ, मेरे पति तुम्हें तुम्हारी मर्जी बगैर कुछ भी नहीं करेंगे। और तुमने तो मुझे पहले ही बता दिया है। तो फिर मैं चिंता क्यों करूँ? बल्कि मुझे उलटी और चिंता हो रही है। मुझे लग रहा है की कहीं निराशा या निष्फलता का भाव आप और सुनीलजी के सम्बन्ध पर हावी ना हो जाए।“

ज्योति को गले लगाते हुए ज्योतिजी की आँखों में आंसूं छलक आये। ज्योतिजी ज्योति को छाती पर चीपका कर बोली, “ज्योति! मेरी तुमसे यही बिनती है की तुम मेरे सुनीलजी का ख्याल रखना। मैं और कुछ नहीं कहूँगी।”

ज्योति ने ज्योति जी के गाल पर चुम्मी करते हुए कहा, “दीदी, सुनीलजी सिर्फ आपके ही नहीं है। वह मेरे भी हैं। मैं उनका पूरा ख्याल। रखूंगी।”

कुछ ही देर में सब कपडे बदल कर कैंप के डाइनिंग हॉल में खाना खाने पहुंचे।

खाना खाने के समय ज्योति ने महसूस किया की सुनीलजी काफी गंभीर लग रहे थे। पुरे भोजन दरम्यान वह कुछ बोले बिना चुप रहे। ज्योति ने सोचा की शायद सुनीलजी उससे नाराज थे।

भोजन के बाद जब सब उठ खड़े हुए तब सुनीलजी बैठे ही रहे और कुछ गंभीर विचारों में उलझे लग रहे थे। ज्योति को मन ही मन अफ़सोस हो रहा था की सुनीलजी जैसे रंगीले जांबाज़ को ज्योति ने कैसे रंगीन से गमगीन बना दिया था।

ज्योति भी जानबूझ कर खाने में देर करती हुई बैठी रही। ज्योतिजी सबसे पहले भोजन कर “थक गयी हूँ, थोड़ी देर सोऊंगी” यह कह कर अपने कमरे की और चल पड़ी।

उसके पीछे पीछे सुनीलजी भी, “आराम तो करना ही पड़ेगा” यह कह कर उठ कर चल पड़े।

जब दोनों निकल पड़े तब ज्योति सुनीलजी के करीब जा बैठी और हलके से सुनीलजी से बोली, “आप मेरे कारण दुखी हैं ना?”

सुनीलजी ने ज्योति की और कुछ सोचते हुए आश्चर्य से देखा और बोले, “नहीं तो। मैं आपके कारण क्यों परेशान होने लगा?”

“तो फिर आप इतने चुपचाप क्यों है?” ज्योति ने पूछा.

“मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ। यही गुत्थी उसुलझाने की कोशिश कर रहा हूँ।” सुनीलजी ने जवाब दिया।

“गुत्थी? कैसी गुत्थी?” ज्योति ने भोलेपन से पूछा। उसके मन में कहीं ना कहीं डर था की सुनीलजी आने आप पर ज्योति के सामने इतना नियंत्रण रखने के कारण परेशान हो रहे होंगे।”

“मेरी समझ में यह नहीं आ रहा की एक साथ इतने सारे संयोग कैसे हो सकते हैं?” सुनीलजी कुछ गंभीर सोच में थे यह ज्योति समझ गयी।
 
Back
Top