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Erotica वासना का भंवर

जय हैरानी से सारी बातें सुन रहा था। कुणाल ने एक पेपर पेन लेकर जय को समझाना शुरू किया-

"अगर हम इस केस को आसानी से समझने की कोशिश करते हैं। राज और डॉली की शादी होने वाली थी। राज के सम्बन्ध ग़लती से ज्योति से बन गये जिसका फ़ायदा ज्योति राज को ब्लैकमेल करके उठाने लगी। यहाँ तक कि वो राज के पीछे केरल भी आ गयी। यहाँ पर फिर एक रात डॉली को इस सच्चाई के बारे में पता चल जाता है.. कैसे?" उसने जय की तरफ़ सवाल उछालते हुए पूछा।

जय-"ज़ाहिर है डॉली ने राज के मोबाइल में ज्योति और राज का वो अश्लील वीडियो देख लिया था!" कुणाल ने आगे की कड़ी जोड़ते हुए कहा-

"फिर ज्योति के बयान के मुताबिक़ डॉली राज का मोबाइल लेकर ज्योति के कमरे में जाती है जहाँ वो ज्योति को राज के मोबाइल में वो वीडियो दिखाती है। वहाँ दोनों बहनों के बीच कहा-सुनी होती है और ज्योति डॉली और राज की ज़िन्दगी से दूर जाने का फ़ैसला कर लेती है। वो डॉली को वहीं उसी कमरे में यानी के रूम नंबर 224 में छोड़कर जाती है!" जय ने कुणाल को बीच में टोकते हुए पूछा-

"हाँ.. इसमें नयी बात क्या है?"

कुणाल- "अगर ज्योति की कही हर बात सही है तो इसका मतलब राज का मोबाइल वहीं उसी कमरे में होना चाहिए था, यानी के रूम नंबर 224 में?

जय- "हाँ!"

कुणाल- "पर पुलिस को राज का मोबाइल वहाँ नहीं मिला। वो मिला उसके कमरे में यानी रूम नंबर 331 में। कैसे? और इस बात का ज़िक्र राज ने अपने बयान में नहीं किया। यहाँ तक कि इस पूरे घटना क्रम में राज ने दो मर्तबा रागिनी दुबे से बात की पर उसने

उस बात का भी ज़िक्र नहीं किया.. क्यों?" जय अब कुणाल की बातें समझ रहा था। शायद उसके दिमाग़ में इन सवालों के जवाब भी रूप लेने लगे थे।

"कुणाल जी आपके इन सभी.. 'क्यों'..के जवाब मैं निकल लूँगा बस आप मुझ पर छोड़ दीजिये!" कहकर वो निकल गया। जय ने तो कुणाल के घर से नीचे उतरने के लिए लिफ़्ट का भी इंतज़ार नहीं किया। अपने सर पर हैट पहनता हुआ वो सीधा अपनी जीप में जा बैठा। उसे अब हॉस्पिटल पहुँचने की जल्दी थी। जय जानता था अभी खेल ख़त्म नहीं हुआ था। अभी तो कहानी में और भी मोड़ आने बाक़ी थे और अब बारी थी राज के साथ सख़्ती से पेश आने की।

जय ने हॉस्पिटल पहुँचकर आव देखा न ताव राज के कमरे में जाकर अंदर से दरवाज़ा बंद किया और राज को बैड पर झटके से बिठा दिया। राज हैरान था कि बिना कोई बात किये जय उसके साथ ऐसा क्यों कर रहा है।

राज ने रोते हुए पूछा- "क्यों कर रहे हैं आप ऐसा, मैं ज़ख़्मी हूँ मर जाऊँगा!"

जय- "मर तो तू पहले ही गया था, हमने ही तुझे बचाया है और अब अगर तू मर भी गया तो मुझे कोई दुःख नहीं होगा!" कहते हुए वो राज की बाज़ू से डिरिप्स निकलने शुरू कर दिए। राज ने जय का हाथ पकड़ते हुए पूछा-

"क्यों कर रहे हैं आप ये?"

जय- "झूठ बोला तूने!!.. तूने रागिनी दुबे के बारे में कुछ नहीं बताया। जबकि उस रात दो बार तेरी रागिनी दुबे से बात हुई थी.." राज के बाल खींचते हुए क्रोध में जय ने कहा।

राज ने रोते हुए कहा- "हाँ रागिनी मेरी अच्छी दोस्त है, पर उसका इस केस से कोई लेना देना नहीं है!"

"उसका इस केस से लेना-देना है या नहीं वो हम तय करेंगे। तेरी रागिनी दुबे से कितनी गहरी दोस्ती है? मुझे सारी कहानी जाननी है एकदम सच-सच। नहीं तो २ मिनट बाद मैं एक रिपोर्ट बनाऊँगा कि राज शर्मा नाम के लड़के ने पहले अपनी पत्नी का क़त्ल किया और फिर हॉस्पिटल में उसने दम तोड़ दिया!" कहते ही उसने राज के ज़ख़्म को ज़ोर से दबा दिया। दर्द के मारे राज ने चिलाते हुए कहा-

"बताता हूँ सब सच बताता हूँ!" जय ने अपने मोबाइल का रिकॉर्डर ऑन कर दिया और राज ने बताना शुरू किया कि वो और रागिनी बचपन के दोस्त हैं। मेरठ में दोनों के पिता एक ही ऑफ़िस में काम करते थे और एक ही मोहल्ले में रहते थे। बचपन से साथ बड़े हुए। फिर बाहरवीं के बाद मैं कॉलेज चला गया और वो लन्दन चली गयी पढ़ने। तीन

साल बाद वो वापस आयी थी। मुझे जब पता चला तो मैं उससे मिलने उसके घर गया। कहते हुए वो जय को अतीत में ले गया-

"उस दिन दोपहर की गर्मी थी, मैं रागिनी से मिलने के लिए बहुत उतावला हो रहा था। बचपन की दोस्ती थी हमारी। मैं बेसब्री से उसकी डोर बेल बजा रहा था कि अचानक रागिनी ने जब दरवाज़ा खोला तो मैं उसे देखकर दंग रह गया। वो अब पहले जैसी बच्ची नहीं रही थी। तीन साल में काफ़ी बदल गयी थी। वो बचपन को पीछे छोड़ जवानी में क़दम रख चुकी थी। उसका गठीला बदन इस बात का प्रमाण था। वो तो मुझे देखकर चहक उठी और मेरे गले लग गयी और मुझे कसकर जकड़ लिया। उसका स्पर्श पाते ही मैंने भी पल भर में अपने बचपन को अलविदा कह दिया था। वो बहुत चहक रही थी आख़िर ३ साल बाद हम मिल रहे थे। वो मेरे लिए लन्दन से टीशर्ट लेकर आयी थी और बिना परवाह किये उसने मेरी टी शर्ट उतार दी और उसकी वाली टी शर्ट पहनने की ज़िद करने लगी!"

अब जय राज की कहानी की कल्पना कर रहा था मानो सब कुछ उसका सामने किसी फ़िल्म के मंज़र की तरह घूम रहा हो। राज का ध्यान टी शर्ट में कम रागिनी के नये नवेले यौवन में ज़्यादा था। रागिनी ने ये महसूस कर लिया था। उसने झेंपते हुए पूछा-

"ऐसे क्या देख रहे हो राज? टी शर्ट ट्राई करो न!" राज ने रागिनी के नजदीक आते हुए कहा-

"एक साथ करते है ना..." इतना सुन रागिनी और झेंप गयी।

"क्या मतलब है तुम्हारा?"

राज- "बचपन से लेकर आज तक जो भी किया है ना? तो अब टी शर्ट भी साथ ही बदलेंगे।"

रागिनी ने वहाँ पड़े कपड़े समेटते हुए कहा, "पहले बात और थी!"

राज- "तो अब क्या बदल गया है? जो इन तीन सालों में तुम्हारे साथ बदला है वही बदलाव तो मुझमे भी आये हैं ना!" रागिनी राज की इस बात का जवाब नहीं देना चाहती थी।

"राज जल्दी से ये टी-शर्ट ट्राई करो फिर ये परफ़्यूम भी तुम्हारे लिए है.." कहते हुए उसने एक परफ़्यूम की बोतल राज के आगे कर दी थी। राज ने रागिनी की आँखों में ऑंखें डालते हुए पहले परफ़्यूम ख़ुद पर छिड़क लिया और फिर रागिनी पर छिड़कना शुरू कर दिया जब तक बोतल से सारा परफ़्यूम ख़त्म नहीं हो गया। राज हैरान था कि रागिनी ने कुछ नहीं कहा वो बस अब ऊपर से नीचे तक महक रही थी।

रागिनी- "क्या चाहते हो?" राज ने हिम्मत करते हुए कहा, "तुम्हें छूना.." रागिनी ने अपना हाथ बड़ा दिया, "लो छू लो.." राज ने उसका हाथ नीचे करते हुए एक लम्बी आह भरते हुए कहा, "नहीं! पूरा का पूरा, जैसे तुमने मेरी टी शर्ट उतारी, मैं भी तुम्हारी ..." कहते हुए रुक गया, उसे लगा शायद ये बात रागिनी को अच्छी नहीं लगेगी। पर उसकी हैरानी का ठिकाना नहीं था रागिनी अपने दोनों हाथ ऊपर करके, नज़रें झुकाकर खड़ी हो गयी। मानो वो राज को आमंत्रण दे रही थी और राज ने मौक़े का फ़ायदा उठाकर रागिनी की टी शर्ट उसके सर के ऊपर से धीरे-धीरे खिसकानी शुरू कर दी। जैसे-जैसे रागिनी की टी शर्ट ऊपर की और खिसक रही थी, राज के सामने रागिनी की सुन्दरता एक नये स्वरूप में उभर रही थी। उसकी कमर पहले से काफ़ी पतली थी। उसकी नाभी पर एक चाँदी का छल्ला टंगा हुआ था। जैसे ही उसने रागिनी की टी शर्ट और ऊपर खिसकाई उसके गोर बदन की बनावट राज को और आकर्षित करने लगी। रागिनी ने जवानी में क्या क़दम रखा, उसके बदन की बनावट ही बदल गयी थी। उसका हर अंग राज को उसे छूने का आमंत्रण दे रहा था। उसने रागिनी की टी शर्ट उतार कर फेंक दी। वो अब रागिनी के बदन के हर उतार-चढ़ाव का स्पर्श लेना चाहता था। वो अभी सोच हो रहा था कि रागिनी ने उसके दिमाग़ को पढ़ते हुए अपने बदन से हर छोटे-बड़े वस्त्र को आज़ाद कर दिया। रागिनी भी भी किसी चित्रकार की पेंटिंग की तरह हाथ ऊपर करके एक पोज़ बनाकर खड़ी थी। राज अब रागिनी की सुंदरता देखकर मुग्ध था और रागिनी नज़रें झुकाए राज को हर इजाज़त दे चुकी थी। राज के लिए उस वक़्त ये नया अनुभव था। उसके लिए रागिनी को छूना एक नयी खोज जैसे था। राज की साँसे अब तीव्र गति से दौड़ रही थीं। उसने देखा कि रागिनी के बदन उसके वक्षों से होकर फिर कमर और फिर कमर के नीचे तक एक लहराता हुआ आकर बना रहा था। उसकी नाभी पर एक छल्ला लटक रहा था। जो रागिनी ने गुदवाया था। उसने किसी भी लड़की के बदन को इतने क़रीब से नहीं देखा था। उसने पाया कि उसने अंदर एक अजीब-सी ऊर्जा का संचार होने लगा था। उसका अंग-अंग रागिनी के बदन को छूने के लिए मचल रहा था। उसने अपने हाथ बढ़ाकर रागिनी की कमर को क्या छुआ कि रागिनी भी सिहर उठी। राज के लिए अब हर पल एक नया अनुभव था। वो रागिनी के बदन को जगह-जगह से छूकर ऐसे महसूस कर रहा था जैसे रागिनी कोई अजूबा हो। अपने बदन पर राज के हाथों की छूवन को महसूस कर अब तो रागिनी भी नहीं चाहती थी कि राज और विलम्ब करे। उसने ख़ुद ही राज के दोनों हाथ अपने तने हुए वक्षों पर रख दिए। राज के लिए तो रागिनी इस क्रीड़ा में उसकी अध्यापिका बनी हुई थी। राज ने महसूस किया कि उसका लिंग अब उसके बस में नहीं है, वो तो बस आज़ाद होकर अपनी मंज़िल को पा लेना चाहता था। जैसे कोई पालतू टॉमी अपने मालिक के हाथ से बंधे पट्टे से छूटने के

लिए छटपटा रहा हो। पर इस टॉमी को जाना कहाँ था ये राज को नहीं मालूम था। तब रागिनी ने धीरे से राज को अपने ऊपर खींच लिया और फिर राज ने अपने टॉमी को आज़ाद छोड़ दिया और टॉमी ख़ुद ही अपना रास्ता ढूँढ़ने लगा। रागिनी ने भी टाँगे फैलाकर राज का साथ दिया। राज अब अपने और रागिनी के गुप्त अंगों के बीच एक तरल पदार्थ को महसूस कर रहा था और फिर थोड़ी सी कोशिश के बाद राज रागिनी के भीतर एक ही झटके से समा गया। इसके बाद तो राज को किसी अध्यापक या शिक्षा की ज़रूरत नहीं पड़ी। सबकुछ अपने आप ही होता चला गया। एक मधुर अनुभव राज को स्वर्ग की सैर पर ले गया और बचपन का रिश्ता एक जवान रिश्ते में बदल गया।
 
राज ये बात हॉस्पिटल के कमरे में जय को बता रहा था उसने आगे बताया-

"और फिर ये सिलसिला लगातार चलने लगा। घरवालों ने कभी हमारे रिश्ते को इस नज़र से नहीं देखा था, लिहाज़ा किसी को कभी शक भी नहीं हुआ और हम दोनों को एक-दूसरे की आदत पड़ गयी। हमने कभी शादी करने की नहीं सोची। रागिनी मेरे लिए एक अच्छी दोस्त थी बस और फिर इसी दौरान पापा ने डॉली से मेरे रिश्ते की बात तय कर दी। मैं बहुत ख़ुश था पर इस बात को समझने में देर लगी कि इसके बाद मैं रागिनी को हमेशा के लिए खो दूँगा। मैं रागिनी से माफ़ी माँगना चाहता था पर रागिनी ने मुझसे बात करने से मना कर दिया। वो हमारी शादी की वीडियो भी मजबूरी में बना रही थी क्योंकि मेरी मम्मी ने उससे कहा था।

जय ने राज की ये बात सुनकर अपने मोबाइल पर उसके सामने वही शादी की वीडियो चला दी। उस वक़्त वीडियो में राज की हल्दी रस्म वाला सीन चल रहा था जहाँ राज की मामियाँ और चाचियाँ राज को हल्दी लगा रही थीं और राज ग़ुस्से में रह-रहकर रागिनी को देख रहा था। जो ये वीडियो उतार रही थी। जय ने राज को ये दिखाते हुए पूछा-

"उस वक़्त तेरे और रागिनी के बीच क्या चल रहा था?" उस वीडियो को देखकर राज को वो लम्हा याद आ गया-

"मैं बस रागिनी को मनाने की कोशिश कर रहा था!"

जय- "किसलिए?"

राज- "उस दिन जब मेरी हल्दी रस्म हो रही थी, रागिनी मेरी वीडियो बना रही थी। पर वो मेरी तरफ़ ध्यान नहीं दे रही थी और मैं चाह रहा था कि रागिनी मेरी तरफ़ एक बार देखे। कहते हुए वो जय को अतीत में ले गया। जब राज को उसकी चाचियाँ और मामियाँ हल्दी लगा रही थीं और कोई गीत गा रही थीं। सामने रागिनी इस पूरा कार्यक्रम की तस्वीरें ले रही थी। राज की नज़र रागिनी से नहीं हट रही थी। रागिनी थी ही ऐसी। उम्र

लगभग २६ साल, रंग गोरा, सर पर लहराते गोरे बाल। ज़्यादातर वो डार्क कलर की टी शर्ट और जीन्स में रहती थी। उसके हाव भाव देखकर लगता था कि वो अपने काम में बहुत निपुण है।

ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि राज रागिनी से कुछ बात करना चाहता है। हर पल इंतज़ार कर रहा था कि रागिनी की नज़रें उससे मिलें। पर रागिनी जानबूझकर उससे नज़रें नहीं मिला रही थी। साफ़ दिख रहा था कि रागिनी राज को अवॉयड कर रही है कि तभी राज की मम्मी ने आकर बताया कि जल्दी करो लड़की वाले भी आ रहे हैं राज को मेहँदी लगाने। इतना सुन रागिनी ने उसकी मम्मी से कहा, आंटी जी मेरा कार्ड ख़त्म हो गया है, चेंज करके आती हूँ। कहकर वो अपने कमरे की ओर चली गयी। राज रागिनी को जाते हुए देख रहा था। उसने देखा कि उसके सभी रिश्तेदार उसकी मम्मी को बधाइयाँ देने में मगन हैं, शायद वो इसी मौक़े की तलाश में था। वो रागिनी के पीछे जाना चाहता था कि उसकी मम्मी ने उसकी बाज़ू पकड़ते हुए कहा-

"कहाँ जा रहा है? हल्दी लगने के बाद बीच में नहीं उठते, अपशगुन होता है!" राज ने अपनी मम्मी के मुँह से इतनी बात सुन उसने छोटी उँगली उठाकर इशारा किया, "अब यहीं सब निकल गया तो सबसे बड़ा अपशगुन हो जायेगा!" इतना सुन के वहाँ बैठीं सभी औरते हँस दीं। ताई जी ने कह दिया-

"जाने दे कोई अपशगुन नहीं होगा, हल्दी लग गयी है।" राज को अब रागिनी के पीछे जाने की इजाज़त मिल गयी थी। वो चुपचाप वहाँ से निकल गया।

रागिनी अपने कमरे में आकर अपने बैग से एक नया कार्ड निकाल रही थी जिसे उसे कैमरा में डालना था। वो बस इतना ही कर पायी थी कि अचानक राज ने आकर उसे पीछे से दबोच लिया और बिना वक़्त गँवाये रागिनी की गर्दन पर चुम्बनों की बौछार कर दी। उसके बदन पर लगी सारी हल्दी अब रागिनी की गर्दन पर लग गयी थी। रागिनी को शायद यह सब पसंद नहीं आया। उसने राज को झटकते हुए कहा-

"बिहेव योर सेल्फ़ राज.... तुम्हारी शादी है.."

राज- "पर प्यार तो मैं तुमसे करता हूँ!" कहते हुए वो फिर से रागिनी पर झपट पड़ा। रागिनी ने लगभग उसे धक्का देते हुए कहा-

"तुम मुझसे नहीं मेरी बॉडी से प्यार करते हो राज!"

राज- "यह झूठ है!"

रागिनी- "झूठ है झूठ है.. ठीक है... तो आओ.." लगभग राज पर चिल्लाते हुए उसने अपनी टी शर्ट उतार दी। उसकी आँखों में आक्रोश था।

रागिनी- "लो करो जो करना है.." राज यहाँ भी नहीं रुका। रागिनी की ख़ूबसूरती देख वो उत्तेजित हो उठा-

"यू हैव बिउटीफ़ुल बॉडी रागिनी.." उसने अपने हाथ रागिनी की ओर बढ़ाते हुए कहा। पर रागिनी पर राज की इन आहों का कोई असर नहीं हो रहा था। वो बस राज को घूरे जा रही थी और अपने कैमरा सामने लाकर उसने कहा-

"ठीक है जो करना है करो.. बट इसका मैं वीडियो बनाऊँगी और सबको दिखाऊँगी!" इतना सुनते ही राज ने अपने हाथ पीछे कर लिये। वो हैरानी से रागिनी के दिमाग़ को पढ़ने की कोशिश कर रहा था।

रागिनी- "मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है... अगर तुम मुझे प्यार करते हो तो प्रॉब्लम तुम्हें भी नहीं होनी चाहिए... ऍम आइ राईट?" वो राज की झुकी नज़रों में नज़रें गाड़कर कह रही थी। रागिनी की इस हरकत से ये तो समझ आ गया था कि रागिनी पहली बार राज के सामने निर्वस्त्र नहीं हुई थी और ये भी कि राज के लिए रागिनी के लिए ये प्यार नहीं वासना थी। राज ने देखा कि रागिनी बेबाक-सी अपने नग्न वक्षों को उसके सामने ताने खड़ी थी। राज हल्का-सा इमोशनल हुआ।

"बस एक बार आख़िरी बार.... मुझे तुम्हें प्यार करने दो.. उसके बाद मेरी शादी हो जायेगी तो तुम्हें फ़ोन भी नहीं करूँगा.. प्रोमिस.." रागिनी ने ख़ुद को सँभालते हुए राज को पीछे किया-

"ये तुम्हारी हवस है राज.. हाँ ये भी सच है कि आज तक मेरे और तुम्हारे बीच जो भी हुआ वो प्यार नहीं सिर्फ़ एक ज़रूरत थी... फिज़िकल नीड... जो हम दोनों ने एक-दूसरे के लिए पूरी की.. बस अब और नहीं राज। हमें इसी वक़्त इसे यहाँ ख़त्म करना होगा। मैं तो तुम्हारी शादी की फ़ोटोग्राफ़ी भी नहीं करना चाहती थी पर मेरे पापा तुम्हारे पापा के अच्छे दोस्त हैं। तुम्हारी मम्मी ने ज़िद की, तो मुझे आना पड़ा। मैं नहीं चाहती थी कि हमारे रिलेशन को लेकर किसी को शक भी हो।" उसने देखा कि राज को उसके तर्क से कुछ लेना देना नहीं था।

रागिनी- "अब जाओ यहाँ से ख़ा-म-ख़ा किसी को शक हो गया तो बहुत सी ज़िंदगियाँ बर्बाद हो जायेंगी जिसके ज़िम्मेदार सिर्फ़ तुम होगे!" कहते हुए उसने अपनी टी शर्ट पहन ली। उसने अपनी गर्दन से हल्दी साफ़ करते हुए कहा-

"सारी हल्दी लगा दी अब नहाना भी पड़ेगा, तुम खड़े क्यों हो जाओ!" राज समझ गया था कि इस वक़्त वहाँ से चले जाने में ही भलाई है। वो दरवाज़े तक गया और मुड़कर उसने फिर से रागिनी को देखकर कहा-

"कुछ भी हो जाये रागिनी.. मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए.. आख़िरी बार.. और वो मैं लेकर रहूँगा.." उसकी बात में रागिनी के लिए हल्की सी धमकी थी, पर रागिनी ने सोच लिया था कि वो जल्दी से काम ख़त्म करके यहाँ से निकल जायेगी।
 
केरल के हॉस्पिटल में राज जय को ये सारी कहानी सुना रहा था। अब तो कुणाल भी वहाँ पहुँच गया था। वो भी राज के इस बयान का साक्षी बनना चाहता था। राज ने आगे कहा-

"मुझे न जाने क्यों ज़िद सी चढ़ गयी थी कि शादी से पहले मैं एक बार रागिनी को प्यार कर लूँ। पर रागिनी वो तो मुझे अवॉयड कर रही थी। ज्योति जब अपनी चाची के साथ मुझे हल्दी लगाने आयी तो मैंने जानबूझ कर उसकी बेवक़ूफ़िओं को हवा दी। उसके कहने पर अपना पायजामा भी उतार दिया, सिर्फ़ रागिनी को जलाने के लिए। पर उसे किसी भी बात से फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था। वो जितना मुझे अवॉयड कर रही थी उसे एक बार पाने की मेरी ज़िद उतनी ही बढ़ती जा रही थी और वो फिर से अतीत में पहुँच गया जब ज्योति और उसकी चाचियाँ राज को हल्दी लगाकर जा चुकी थीं। रागिनी ने भी जाने का फ़ैसला कर लिया।

राज याद कर रहा था कि उस वक़्त वो कपड़े पहनते हुए रागिनी को ही देखे जा रहा था और रागिनी अपना कैमरा बंद करके बैग में डाल रही थी। रागिनी ने तब राज की मम्मी को जा कर कहा-

"आंटी जी मैं चलती हूँ.. कुछ ज़रूरी मीटिंग्स हैं। मेरा एसोसिएट आकर बाक़ी की फ़ोटोग्राफ़ी कर लेगा।" राज इस बात पर चौंक गया कि रागिनी बहाना बनाकर जा रही है और उसकी तमन्ना अधूरी रह जायेगी, पर उसे तब राहत मिली जब उसकी मम्मी ने कहा-

"अरे ऐसे कैसे.... नहीं -नहीं.... तुम शादी की पूरी फ़ोटोग्राफ़ी करोगी.. बोल दे रही हूँ... तुम्हारी जो भी ज़रूरी मीटिंग्स हैं उसे कैंसिल कर दो.. बस मैं कुछ नहीं जानती!"

रागिनी- "आंटी प्लीज़.. बहुत ज़रूरी मीटिंग्स हैं... नहीं रुक सकतीं!" राज जानता था कि रागिनी उसे अवॉयड करके जा रही है, उसने आगे आकर रागिनी से कहा-

"क्यों ज़िद कर रही हो.. मेरी शादी बार -बार थोड़े न होनी है और फिर दो दिन की तो बात है परसों तो मैं डॉली को लेकर हनीमून के लिए निकल जाऊँगा। प्लीज़ रुक जाओ.. प्रॉमिस तुम्हें यहाँ कोई तकलीफ़ नहीं होगी.. प्रॉमिस।"

रागिनी जानती थी कि राज ये सब क्यों कह रहा है। इसे पहले वो कुछ कह पाती कि राज की मम्मी ने रागिनी की ठोढ़ी पर हाथ रखते हुए कहा-

"मान जाओ रागिनी.. देखो राज तुम्हारे बचपन का दोस्त है। अब उसकी शादी है.. दो दिन बाद ये अपनी लाइफ़ में बिजी हो जायेगा.. न जाने फिर तुम लोगों की कब

मुलाक़ात हो.. यही तो यादें रह जायेंगी।" उसने रागिनी को समझाते हुए कहा और राज ने भी अपनी मम्मी की बात का फ़ायदा उठाते हुए कह दिया-

"हाँ मम्मी यही समझा रहा था मैं इसे कि ये इन दो दिनों को ऐसा यादगार बना दें, जिसकी यादें जीवन भर संजोकर रखी जा सकें!" उसने ये बात रागिनी की आँख में आँख डालकर कह दी थी कि राज की मम्मी ने राज को डाँटते हुए कहा-

"चल बहुत हो गयी शायराना बातें अब जाकर नहा.. कहीं नहीं जा रही रागिनी।" कहते हुए उसने राज को अंदर भेज दिया। रागिनी राज की मम्मी को ना नहीं कह पायी पर वो जानती थी कि उसे हर हाल में राज से सँभलकर रहना है।

लड़के वालों की तरफ़ अब राज अपने दोस्तों और कज़न्स के साथ बीयर पी रहा था। उनकी तरफ़ छत पर सारा इंतज़ाम था। सभी राज को एक सुखद गृहस्थ जीवन की नसीहत दे रहे थे। कुल मिलाकर वो ख़ुद को एक जोकर महसूस कर रहा था। जैसे कि दुल्हे का तो मज़ाक़ उड़ने का हक़ हर एक को होता है। पर उसकी नज़रें रागिनी को तलाश रही थीं। उसके अंदर अपनी आख़िरी इच्छा पूरी करने की तमन्ना उबाल खा रही थी। बस एक बार.. एक आख़िरी बार वो रागिनी को पा लेना चाहता था। अचानक उसे रागिनी दिख गयी जो तस्वीरें खींच रही थी। पूरी छत एक मिन्नी बार में बदल चुकी थी। जगह-जगह लोग छोटे-छोटे झुण्ड बनाकर व्हिस्की और बियर पी रहे थे। ज़्यादातर लोगों को चढ़ चुकी थी। उनके ठहाकों की आवाज़ इस बात का प्रमाण थी और रागिनी यह मोमेंट्स अपने कैमरे में क़ैद कर रही थी कि राज के एक दोस्त ने रागिनी को आवाज़ लगते हुए कहा-

"रागिनी मैडम एक फ़ोटो हमारी राज भाई के साथ हो जाये.. आज तो बैचलर है कल से इसके गले में भी पति नाम का पट्टा आ जायेगा। उसकी बात पर सभी ने सहमति दिखाते हुए राज को बीच में कर लिया और हाथों में गिलास पकड़कर रागिनी के कैमरे के लिए पोज़ देने लगे। राज की नज़र रह-रहकर रागिनी से मिल रही थी वो जानती थी कि राज की आँख में एक ही सवाल है। वो उसे आख़िरी बार पाना चाहता था। रागिनी फ़ोटो क्लीक करके वो वहाँ से निकल गयी अब राज की बारी थी। बस अब वो मौक़ा ढूँढ़ रहा था वहाँ से खिसकने का जिससे वो रागिनी के कमरे में जा सके।

उधर रागिनी अब अपने कमरे में आ चुकी थी। उसके सामने से राज का विनती करते हुए चेहरा नहीं जा रहा था। उसने कुछ सोचकर अपने कैमरे में सुबह के वीडियो देखने शुरू कर दिए। वो राज की उन वीडियोज़ को देख रही थी जो उसने सुबह हल्दी के समय खींची थी। वो ये सारी ख़ुशियाँ देखकर डर गयी कि कहीं राज का या पागलपन इन ख़ुशियों को बर्बाद ना कर दे। उससे रहा नहीं गया उसने झट से अपना मोबाइल उठाया और उस पर एक मैसेज टाइप कर डाला।

छत पर राज भी अंकल्स की पार्टी में फँसा हुआ था और उसे शादीशुदा ज़िन्दगी का गायन देने से कोई भी नहीं चूक रहा था कि अचानक वो अपने मोबाइल पर एक मैसेज देखकर चौंक गया। ये रागिनी का मैसेज था जिसमें रागिनी ने लिखा था-

"ओके राज.. आई विल मीट यू.. सिर्फ़ तुम्हारा पागलपन शांत करने के लिए, पर तुम्हें प्रॉमिस करना होगा कि हम ये आख़िरी बार मिल रहे हैं.. इसके बाद तुम मुझे कभी फ़ोन नहीं करोगे.." राज की बाँछे खिल उठीं। उसकी तो जैसे लॉटरी लग गयी थी। उसने जवाब में लिखा, "यस एग्रीड.. पर मिलना कहाँ है?" पर इस मैसेज का जवाब नहीं आया उसे। वो वहीं अंकल्स की पार्टी में खड़ा रागिनी के अगले मैसेज का इंतज़ार करने लगा।

ये बात बताते-बताते राज वर्तमान में आ गया। उसने जय से कहा कि वो रागिनी के मैसेज का इंतज़ार कर रहा था कि तभी ज्योति ने आकर उसे बताया कि कोई उसका इंतज़ार दहेज़ वाले कमरे में कर रहा है। राज ने समझा कि ये मैसेज शायद रागिनी ने ही उसके लिए भेजा होगा। वो बस जल्द से जल्द दहेज़ वाले कमरे में पहुँच जाना चाहता था पर उसके रिश्तेदार उसे छोड़ ही नहीं रहे थे। कहते-कहते वो फिर उस अतीत के मंज़र को जय और कुणाल के सामने ले आया।

बस किसी तरह जब सब लुढ़कने लगे तो वो मौक़ा पाकर दहेज़ वाले कमरे में पहुँच गया। उसने सोचा कि उस कमरे में रागिनी है, पर वो नहीं जानता था कि वहाँ रागिनी नहीं ज्योति थी। उसने ज्योति को रागिनी समझकर ख़ूब प्यार किया। बस यही ग़लती हो गयी थी उससे। जिसका ख़ामियाज़ा वो आज तक भुगत रहा था और उसने अपनी पत्नी को भी खो दिया। राज ने एक लम्बी साँस लेकर बात ख़त्म की। "बस उसके बाद रागिनी हमेशा के लिए मुझे अलविदा कहकर चली गयी। जब वो डॉली की डोली लेकर आ रहा था।"

जय ने कुणाल को गर्व से नज़र भर देखा कि कैसे उसने रागिनी के आख़िरी शब्दों से कहानी के सिरे को पकड़ लिया था। जय ने अपनी कुर्सी राज के नज़दीक खिसकाते हुए कहा-

"अब ये बताओ कि डॉली के क़त्ल से पहले तुम्हारी रागिनी से क्या बात हुई? देखो बात को घुमाकर कोई भी झूठ मत बोलना क्योंकि तुम्हारे कॉल्स रिकार्ड्स की लिस्ट है हमारे पास!" राज जानता था कि अब वो कोई भी झूठ बोलकर बच नहीं सकता। राज ने कहा कि "मैंने उस दिन बार में बैठकर बहुत शराब पी ली थी। मुझसे अब ये हालात सँभल नहीं रहे थे। ज्योति अब मेरे जी का जंजाल बन चुकी थी। मैं ये बात करूँ तो किस्से करूँ? मैंने सोचा कि क्या मुझे डॉली को सब सच बता देना चाहिए? नहीं मैं डर गया कहीं डॉली मुझे ना समझ पायी तो? आख़िर ज्योति डॉली की सगी बहन है। डॉली तो उसी की तरफ़दारी करेगी। ऐसा ना हो एक रिश्ता सँभालने के चक्कर में बाक़ी रिश्ते भी बिगड़

जाएँ। तो फिर किसके सामने मैं अपना बोझ हल्का करूँ? अचानक मुझे रागिनी की याद आयी। बचपन की दोस्त थी रागिनी मेरी। मैंने रागिनी को फ़ोन लगा दिया और रोते हुई रागिनी को सारी बात बता दी कि ज्योति कितनी पागल हो चुकी है। उसे पाने के लिए वो किसी की भी जान ले सकती है चाहे वो उसकी अपनी बहन डॉली ही क्यों न हो। बेशक रागिनी के दिल में मेरे लिए हमदर्दी थी पर वो ये भी जानती थी कि ये सब मेरे ही कर्मों का ही नतीजा है। उसने मुझे साफ़-साफ़ ये कहकर मना कर दिया कि ये प्रॉब्लम मेरी क्रीयेट की हुई है और मुझे ही सोल्व करनी होगी। मैंने उससे बहुत रिक्वेस्ट की कि रागिनी मेरी हेल्प करो इस जंजाल से बाहर आने के लिए, बहुत बुरा फँस गया हूँ इस रिश्ते में। मैं तुमसे प्रॉमिस करता हूँ मैं सुधर जाऊँगा.. मैं केरल में होटल तलसानियाँ में ठहरा हूँ रूम नंबर 331 में और ज्योति बग़ल वाले रूम 224 में है। डॉली को पता भी नहीं.. एक बार यहाँ आ सकती हो तो आ जाओ.. मैं टिकट भेज दूँगा, पर उसने मना कर दिया। वो यही कहे जा रही थी कि मैं जाकर डॉली को सब सच-सच बता दूँ। बस एक रागिनी उम्मीद थी। वो रास्ता भी बंद हो गया। मैंने फिर सोच लिया था कि मैं जाकर डॉली को सब सच बता दूँगा। जब मैं अपने कमरे में पहुँचा तो मुझे इतनी चढ़ गयी थी कि कुछ बताने से पहले ही मैं बेहोश हो गया और फिर शायद डॉली के हाथ मेरा मोबाइल लग गया जिसमें उसने मेरी और ज्योति की वीडियो देख ली।" कहते हुए वो ज़ार-ज़ार रोने लगा।

कुणाल ने राज की बात को ख़त्म होने से पहले ही पकड़ते हुए कहा, "हाँ, तुम जब शराब पीकर बेहोश थे तो शायद डॉली ने तुम्हारा मोबाइल चेक किया और उसमें से उसे तुम्हारे और ज्योति के ग़लत संबंधों के बारे में सारी इन्फ़ोर्मशन मिली और वो ज्योति के कमरे में उससे इस बात के लिए पूछने गयी थी। जहाँ ज्योति और उसके बीच कुछ कहा सुनी हुई और फिर ज्योति एयरपोर्ट के लिए निकल गयी। ख़ैर ये तो तुम्हें भी अब पता चल गया है कि तुम्हारी पत्नी यानी कि डॉली ज्योति के कमरे मैं कैसे पहुँची। वो तुम्हारा मोबाइल लेकर ज्योति के पास गयी थी, फिर तुम वहाँ गये और किसी ने तुम पर हमला कर दिया..राइट? बस ये पता लगाना है कि तुम्हारा मोबाइल जो डॉली के पास था यानी उस वक़्त ज्योति के कमरे में... सुबह तुम्हारे कमरे में कैसे आ गया? जबकि तुम्हारी पत्नी की तो डेड बॉडी पड़ी थी उस कमरे में और उसके सामने तुम पड़े थे ज़ख़्मी और तुम्हारा मोबाइल वहीं उसी कमरे में होना चाहिए था... पर इस हादसे के बाद तुम्हारा मोबाइल तुम्हारे कमरे से यानी के रूम नंबर 331 से बरामद हुआ!" राज कुणाल को देखे जा रहा था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि कुणाल आख़िर पहुँचना कहाँ चाहता है।

कुणाल- "बस इन दो सवालों के जवाब मिल जायें कि तुम्हारा फ़ोन उस कमरे से यहाँ यानी 224 से 331 में कौन लेकर आया और ये कि वो कौन था जिसने डॉली और फिर तुम पर हमला किया.... या फिर सिर्फ़ डॉली पर!"

राज- "मुझे कुछ समाझ नहीं आ रहा, क्यों आप मेरा दिमाग़ ख़राब कर रहे हैं? किसकी बात कर रहे हैं आप?"

कुणाल- "दिमाग़ तुम हमारा ख़राब कर रहे हो राज। तुमने ख़ुद कहा कि डॉली तुम्हारा मोबाइल लेकर ज्योति के कमरे में गयी। जहाँ उसका क़त्ल हो गया। फिर तुम ज़ख़्मी हुए। पर पुलिस को वहाँ तुम्हारा मोबाइल नहीं मिला। वो तुम्हारे कमरे में पाया गया। मुझे जवाब चाहिए कि एक लाश कैसे तुम्हें तुम्हारा मोबाइल लौटा सकती है? या तुम इतनी ज़ख़्मी हालत में कैसे अपना मोबाइल अपने कमरे में छोड़ आये?"

राज- "मैं नशे में बेहोश था, मुझे कुछ नहीं पता कि मेरा मोबाइल मेरे कमरे में कैसे आया?"

कुणाल- "... मैं बताता हूँ.. डॉली के कमरे से ये फ़ोन तुम्हारी फ़्रैंड रागिनी ले कर आयी थी!" कुणाल के मुँह से ये बात सुनकर जहाँ एक तरफ़ राज के होश उड़ गये वहीं जय भी हैरान था। कुणाल ने राज का फ़ोन उसे दिखाते हुए कहा-

"तुमने फ़ोन किया था ना? रागिनी को बोलो?" राज कुणाल की आवाज़ सुन के डर गया था-

"हाँ मैंने बोला तो अभी आपको... रागिनी मेरी फ़्रैंड है.. वो मैं ज्योति से बहुत डर गया था तो रागिनी को हेल्प के लिए फ़ोन किया था।

कुणाल- "तो फिर क्या हुआ? की उसने तुम्हारी हेल्प?"

राज- "कुछ नहीं.. उसने कह दिया कि ये मेरी प्रॉब्लम है मैं ख़ुद देखूँ!"

कुणाल- "फिर? तुमने देख ली अपनी प्रॉब्लम? अब मैं बताता हूँ कि क्या हुआ था। तुम्हें पता चल गया था कि डॉली को तुम्हारी सच्चाई पता चल गयी है। वो तुम्हारा फ़ोन लेकर ज्योति के कमरे में गयी है और तुम उसके पीछे गये। तुमने इंतज़ार किया जब तक ज्योति कमरा छोड़कर नहीं चली गयी। ज्योति के जाने के बाद तुम ज्योति के रूम नंबर 331 में दाख़िल हुए, जहाँ तुमने देखा कि तुम्हारी पत्नी डॉली अकेली बैठी रो रही थी। उसने तुम्हें देखकर तुमसे झगड़ा करने की कोशिश की और तुमने बेरहमी से उसका सर पकड़कर दीवार पे दे मारा, पर उसकी जान नहीं निकली थी। तो तुमने उसके सीने मैं वो चक्कू घोंप दिया।"

राज- "नहीं!" कुणाल तो मानो राज को कोई मौक़ा देना ही नहीं चाहता था। "और उसके बाद तुम अपना फ़ोन उठाकर अपने कमरे में आ गये। तुम डर गये थे कि सुबह

पुलिस को डॉली की लाश मिलेगी तो क्या होगा? तुम अपना फ़ोन अपने कमरे में छोड़कर वापस वहाँ गये जहाँ डॉली की लाश पड़ी थी। तुमने अपने सर को भी दीवार से मार कर ख़ुद को ज़ख़्मी करने की कोशिश की ताकि पुलिस को तुम पर शक न हो!" कुणाल की इतनी तेज़ आवाज़ सुनकर राज इतना डर गया था के उसने कहा-

राज -"नहीं.. ये झूठ है.. मैं अपना फ़ोन लेकर नहीं आया!"

कुणाल- " तुम अपना फ़ोन लेकर आये थे ताकि अपना जुर्म मिटा सको, पर उसी फ़ोन ने तुम्हें मुजरिम साबित कर दिया.." राज झल्ला पड़ा-

"मैं ज्योति के कमरे से फ़ोन नहीं लाया था..."

कुणाल- "झूठ! तुम्हीं अपना फ़ोन लेकर आये थे।"
 
राज- "नहीं! रागिनी लेकर आयी थी...." राज हैरान था कि उसके मुँह से ये सच कैसे निकल गया। अचानक वो रोने लगा। जय भी कुणाल की इस कला को देखकर उसका क़ायल हो गया। पल भर के लिए कमरे में सन्नाटा था, सिर्फ़ राज के रोने की आवाज़ आ रही थी। कुणाल ने जय से आँखों ही आँखों में सहमती लेते हुए आगे कहा-

"देखो राज अब तुम डॉली के क़त्ल की सज़ा से बचना चाहते हो तो सच-सच बताओ कि तुम्हारी रागिनी से क्या बात हुई?" राज जानता था कि वो फँस चुका था, उसने कहानी सुनानी शुरू की। कुणाल और जय उसकी कहानी सुन रहे थे मानो उनके सामने कोई फ़िल्म चल रही थी।

राज- "उस वक़्त बेशक रागिनी ने मेरा साथ देने से मना कर दिया था पर वो मुझे दिल से चाहती थी उसने मुझे दोबारा फ़ोन किया और कहा कि वो आ रही है। मेरी मदद करने। बस मैं कोशिश करूँ कि रात को ज्योति अपने कमरे 224 में अकेली हो...बाकि वो सँभाल लेगी। मैं जानता था कि कुछ भी हो जाये ज्योति मुझे डॉली के साथ रहने नहीं देगी। तो एक ही तरीक़ा था कि मैं इतनी पी लूँ कि कमरे से बाहर ही ना जा सकूँ। सब कुछ प्लान के मुताबिक़ हुआ। मैंने ख़ूब पी ली और फिर मैं अपने कमरे में सो रहा था.. रागिनी को प्लान के मुताबिक़ रात को होटल में पहुँचना था। जब सारा स्टाफ़ सो जाता है तो CCTV कैमरे ऑफ़ करने थे ताकि वो किसी की नज़र में न आ सके। जब वेटर और डॉली के साथ मैं अपने कमरे में जा रहा था मैंने बहाने से CCTV का प्लग निकल दिया। सब कुछ प्लान के मुताबिक़ ही जा रहा था। मैं नशे में अपने कमरे में सो गया कि डॉली के हाथ मेरा मोबाइल लग गया। जिसमें ज्योति के अश्लील मैसेज और वो वीडियो था। डॉली इस बात को लेकर ज्योति से उसके कमरे में झगड़ा करने चली गयी। उसके बाद मुझे कुछ नहीं पता क्या हुआ। सुबह के ४ बजे होंगे। जब मैं उठा तो मैंने पाया कि डॉली कमरे में नहीं थी। मुझे लगा कि डॉली बाथरूम में है और रागिनी अपना काम कर गयी होगी। ये सुनिश्चित

करने के लिए मैं ज्योति के कमरे में गया तो पाया कि बग़ल वाले कमरे में मेरी डॉली मरी पड़ी थी। ज्योति तो एयरपोर्ट के लिए निकल चुकी थी। मुझे लगा कि शायद रागिनी ने ग़लती से डॉली को मार दिया है।" कहते कहते वो रोने लगा।

कुणाल- "फिर क्या हुआ?"

राज- "फिर अचानक मेरे सर पर एक ज़ोरदार वार हुआ, उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं!" कहते हुए वो रोने लगा। जय ने अपने मोबाइल का रिकॉर्डर बंद किया और कुणाल के साथ कमरे से बाहर आ गया।

जय- "क्या लगता है कुणाल जी एक और कहानी? कितनी सच्चाई है इसकी कहानी में?" कुणाल ने जेब से सिगरेट निकालते हुए कहा, " फ़िलहाल तो ये कहानी है.. जैसा आपने कहा... हकीकत तो तब बनेगी जब रागिनी अपने बयान से इस पर मोहर लगा दे... उसकी गिरफ़्तारी के वार्रेंट निकलवाइये।" कहते हुए उसने अपनी सिगरेट जला ली।

इसके बाद केरल पुलिस ने गुड़गाँव पुलिस की मदद से रागिनी को गुड़गाँव में ही पकड़ लिया। रागिनी को केरल बुलवा के सख़्ती से उसका बयान लिया गया। तो कुछ चौंका देने वाले सच बाहर आये।

केरल पुलिस स्टेशन में रागिनी कुणाल और जय के सामने बैठी थी। जय ने उसे डॉली की डोली का वीडियो दिखाते हुए पूछा, "आप ये राज को क्यों बोल रही थीं कि अब इन रिश्तों की इज़्ज़त करना जैसे करते आये हो... वैसे राज आपके और उसके बीच के रिश्ते के बारे में सब बता चुका है हमें!" रागिनी जानती थी कि उसके पास सच बोलने के सिवाए कोई चारा नहीं था।

"हाँ ये बात सच है कि राज की शादी की रात, राज मुझसे आख़िरी बार मिलने की ज़िद कर रहा था। वो मुझसे बस आख़िरी बार मिलने के लिए पागल हुए जा रहा था। फिर मैंने भी सोच लिया कि राज से एक बार और मिलने में कोई हर्ज नहीं है।"

जय- "क्यों? ये जानते हुए भी कि उसकी शादी हो रही थी?"

रागिनी- "ये पागलपन उसने पहली बार नहीं दिखाया था। जब भी उसकी मर्ज़ी के आगे नहीं झुकती, वो उसका ग़ुस्सा दूसरों पे निकालता था। मैं डर गयी कि कहीं वो इस पागलपन में अपनी शादी ख़राब न कर ले और फिर हमारे बीच ये रिश्ता कोई पहली बार थोड़े न बन रहा था। मैं भी इसे एक यादगार अंत देना चाहती थी, पर उस रात जब मैं उसे खोज रही थी तो उसे मैंने ज्योति के साथ दहेज़ वाले कमरे से निकलते हुए देखा। मैं समझ गयी थी कि अंदर क्या हुआ होगा! बस तभी मैंने ठान लिया कि राज किसी का सगा नहीं। बस इसी के रहते मैं उसे आख़िरी नसीहत देकर हमेशा के लिए चली गयी।" कुणाल ने जय को देखते हुए अब ख़ुद मोर्चा सँभाला-

"तो फिर उस रात ऐसा क्या हुआ कि आप सर पे कफ़न बाँधकर राज की मदद करने चली आयीं.. यहाँ केरल में?"

रागिनी- "उस रात मैं मुंबई एयरपोर्ट से दिल्ली की फ़्लाइट पकड़ने जा रही थी, जब राज का फ़ोन मुझे आया। वो बहुत नशे में था और रो रहा था। तब उसने मुझे बताया कि कैसे शादी की रात उसने समझा था कि दहेज़ वाले कमरे में ज्योति नहीं मैं हूँ और उसके बाद कैसे वो ज्योति के चंगुल में फँसता चला गया।"

कुणाल- "फिर आपने सोचा कि राज अब दोनों तरफ़ से फँस चुका है। इस वक़्त कमज़ोर है, तो चलो डॉली को ख़त्म करके अपना रास्ता साफ़ कर लेते हैं?"

रागिनी- "व्हाट? ये क्या कह रहे हैं आप? ये ग़लत है, मैं सिर्फ़ ज्योति को सबक़ सिखाना चाहती थी। हाँ ये सच है मैंने राज के साथ मिलकर ज्योति को रास्ते से हटाने के प्लान बनाया। मैंने अपनी दिल्ली की फ़्लाइट कैंसिल करके केरल की फ़्लाइट करवायी। मेरी फ़्लाइट १२ बजे केरल लैंड होनी थी। उस वक़्त राज को CCTV ऑफ़ करने थे, ताकि मैं कैमरा में ना आऊँ!"

कुणाल की आँखें अब सिकुड़नी शुरू हो गयीं थी। वो जानता था कि अब सच बहुत जल्दी सामने आने वाला था कि रागिनी ने आगे की बात कहकर उसे चौंका दिया-

"मैं रात के अँधेरे में जब रूम नंबर 224 में पहुँची तो देखकर दंग रह गयी। वहाँ ज्योति नहीं थी बल्कि डॉली सो रही थी।"

जय- "आप ग़लत कह रही हैं, आपको लगा कि वो ज्योति है और इसीलिए अपने उसका ख़ून कर दिया!"

रागिनी- "नहीं मुझे वहाँ डॉली ही सोती हुई दिखी और ज़मीन पर राज का मोबाइल पड़ा था। मैं हैरान रह गयी कि कहीं राज ने मुझे ग़लत रूम नंबर तो नहीं बता दिया। मैं राज का मोबाइल लेकर साथ वाले कमरे में गयी, रूम नंबर 331। दरवाज़ा खुला था। जैसे अंदर गयी देखा कि राज सो रहा था। मैंने जाकर राज को उठाना चाहा, पर मैंने पाया वो नशे में धुत था। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और नशे में यही बड़बड़ा रहा था-

"डॉली आई एम सॉरी, मैंने तुम्हें धोका दिया, मैं सब ठीक कर लूँगा डॉली.. " ये बड़बड़ाते हुए वो सो गया। मैं समझ गयी थी कि राज डॉली से बहुत प्यार करता है और इस वक़्त दोनों को प्यार की ज़रूरत है नफ़रत की नहीं, और वैसे भी ज्योति मुझे कहीं दिखी नहीं। मैंने अपना इरादा बदल दिया और चुप चाप एयर पोर्ट के लिएनिकल गयी।" जय और कुणाल रागिनी का बयान सुनकर हैरान थे।

जय- "मतलब तुमने डॉली का ख़ून नहीं किया?"

रागिनी- "मैंने कहा ना मैं नहीं चाहती थी कि इन दोनों की ज़िन्दगी में कुछ ऐसा हो जिससे इनकी ज़िन्दगी सँवरने की बजाये और उलझकर रह जाये और मैं ये सच कह रही हूँ!"

जय- "मतलब तुम चाहती हो कि हम तुम्हारी बात का यक़ीन करें?"

रागिनी- "हाँ!" रागिनी बड़ी सहजता से जय के सवालों का जवाब दे रही थी कि अब जय अपना आपा खोने लगा था। उसने टेबल पर ज़ोर से हाथ मरते हुए कहा-

"देखो रागिनी हमें सब सच बता दो नहीं तो हमारे पास दूसरे तरीक़े भी हैं सच उगलवाने के!" कि कुणाल ने जय के काँधे पर हाथ रखते हुए उसे बाहर आने का इशारा किया। जय लेडी हवलदार को इशारा करके कुणाल के पीछे निकल गया।

पुलिस स्टेशन के बाहर आकर कुणाल ने अपनी सिगरेट जलायी। जय ने देखा कि उसके चेहरे पर शिकन बिल्कुल नहीं थी।

जय- "आपको क्या लगता है ये सच बोल रही है? मुझे लगता है ख़ून इसी ने किया है!"
 
कुणाल ने सिगरेट का काश लेते हुए कहा- "फिर से आप कन्क्लुशन पर पहुँच रहे हैं जय जी। देखिये इस वक़्त हमारे पास तीन सस्पेक्ट्स हैं। जिनके क़त्ल करने के अपने-अपने मोटिव हैं। पहला राज जो ज्योति को मरवाना चाहता था, दूसरी रागिनी जो राज के लिए ज्योति को मारना चाहती थी, पर दोनों केसेज़ में ग़लती से मर जाती है डॉली और तीसरी ज्योति जो राज को पाने के लिए डॉली को मारना चाहती थी!"

जय- "पर वो उस वक़्त एयरपोर्ट पे थी!"

कुणाल- "यही तो मैं कह रहा हूँ कि तीनों के पास डॉली का क़त्ल ना करने की एक कहानी है और तीनों कहानियाँ सच्ची लग रही हैं!"

जय- "पर क़त्ल तो हुआ है, एक नहीं बल्कि दो, वो तो राज बच गया!"

कुणाल- "हाँ राज बच गया!" कहते हुए कुणाल अपनी गर्दन घुमाने लगा। संकेत था ये जय के लिए कि उसके दिमाग़ में अब कोई ख़ुराफ़ात चल रही है। कुणाल ने जय से तब कहा के वो सारे सबूत फिर से देखना चाहता है। जय ने लम्बी साँस लेकर हवलदार से सारे सबूत लाने को कहा।

कुछ ही पल में जय की टेबल पर ज्योति, डॉली, राज और रागिनी के मोबाइल पड़े थे। उनके साथ उनकी कॉल रिकॉर्डिंग की लिस्ट। वो चक्कू जिससे क़त्ल हुआ था। पोस्टमोर्टेम और फ़ोरेंसिक रिपोर्ट। कुणाल बार-बार सबके बयान सुन रहा था, जो जय ने अपने मोबाइल में रिकॉर्ड किये थे।

सुबह से शाम हो गयी पर कुणाल को कुछ नहीं मिला। हर सबूत हर बयान के साथ मेल खा रहा था। ऐसा लग रहा था कि तीनों की कहानियाँ एक-दूसरे के साथ जुड़ी हों।

"तो मतलब क़ातिल कोई चौथा है?" जय ने कुणाल को चाय का कप देते हुए पूछा और फिर तीनों की टेलीफ़ोन की कॉल डिटेल्स उठाकर उनमें नये नंबर तलाश करने लगा।

कुणाल- "क्या ढूँढ़ रहे हो?"

जय- "आपके हिसाब से ये तीनों तो क्लीन हैं। अब देख रहा हूँ इसके अलावा इन्होंने उस रात और किसे फ़ोन किया है!" इतना सुन कुणाल का माथा ठनका, उसने ज्योति की कॉल हिस्ट्री देखनी शुरू की और उसके चेहरे के भाव बदलने लगे। जय समझ गया था कि कुणाल को फिर कुछ मिल गया है।

जय- "क्या हुआ?"

कुणाल- "ज्योति ने कहा था कि उसने रास्ते में अपनी टिकट बुक की पर उसकी कॉल लिस्ट में तो किसी भी एयरलाइन या ट्रेवल एजेंट का नंबर नहीं दिख रहा!" इतना देख जय का दिमाग़ भी ठनका, उसने कुणाल से वो लिस्ट लेकर दोबारा देखी। "पर उसके पास तो बोर्डिंग पास था, ये देखिये!" कहते हुए उसने ज्योति का बोर्डिंग पास कुणाल को थमा दिया।

"हो सकता है उसने काउंटर पे टिकट ली हो!"

कुणाल- "हो सकता है!.. एक काम कीजिये इस एयरलाइन्स के काउंटर से ज्योति की फ़्लाइट डिटेल्स निकलवाइए.. कि उसने ये टिकट कितने बजे बुक की?" जय के लिए कुणाल का इशारा काफ़ी था। उसने झट से कुणाल से बोर्डिंग पास लेकर एयरपोर्ट फ़ोन लगा दिया। तब तक कुणाल ने अपनी जेब से सिगरेट निकाली और कश मरता हुआ बाहर निकल गया। कुणाल अभी सिगरेट ख़त्म कर ही नहीं पाया था कि जय ने उसे वो ख़बर दी जिसकी कुणाल को उम्मीद थी।

"यू वर थिंकिंग राइट डिटेक्टिव.. ज्योति ने काउंटर से ही अपनी टिकट करवाई थी, पर एक नहीं दो। एक रात २ बजे की फ़्लाइट की और दूसरी सुबह ५ बजे की!"

जय- "इसका मतलब ज्योति जानती थी कि उसे दो टिकट्स की ज़रूरत पड़ सकती है!" वो इतना ही कह पाया थे कि कुणाल के चेहरे पर उभरती मुस्कान को देखकर वो समझ गया था कि अब आगे उसे क्या करना है।

अगले पल ज्योति एक कमरे में लेडी हवलदार के साथ बैठी हुई थी। वो यही चिल्लाये जा रही थी कि अब क्यों उसे टॉर्चर किया जा रहा है, जबकि वो सब कुछ सच बता चुकी है

कि उसने देखा कुणाल और जय अंदर आकर उसके पास बैठ गये। कुणाल के हाथ में उसका बोर्डिंग पास था। बोर्डिंग पास को देखकर ज्योति घबरा गयी।

कुणाल- "तो ज्योति जी ये आपका बोर्डिंग पास है? केरल टू दिल्ली...राइट?"

ज्योति- "हाँ ..क्यों?"

जय- "मतलब रात २ बजे की गो एयर की फ़्लाइट केरल टू दिल्ली ..राइट?"

ज्योति- "हाँ.. तो आप एयरलाइन से चेक कर लीजिये.. बोर्डिंग पास है आपके पास!"

कुणाल- "नहीं ये बोर्डिंग पास सही है। फ़्लाइट की डिटेल्स भी सही हैं.."

ज्योति- "तो?"

कुणाल- "अगर जय जी का फ़ोन आपको नहीं आया होता तो आप ये फ़्लाइट पकड़ ही लेती ना?"

ज्योति- "हाँ मैं सिक्यूरिटी चेक के लिए पहुँच गयी थी!" कुणाल ने इसके बाद टेबल पर ज़ोर से हाथ मारते हुए ज्योति को चौंका दिया-

"तो फिर आपने सुबह ५ बजे की फ़्लाइट भी क्यों बुक की? जबकि आप तो २ बजे की फ़्लाइट से निकल ही रही थीं?"

ज्योति- "मुझे अपने वकील से बात करनी है इसी वक़्त... मैं आपको किसी भी बात का जवाब नहीं दूँगी!"

जय- "वकील चाहिए?"

ज्योति- "हाँ!" कि जय ने वहाँ खड़ी एक हट्टी-कट्टी लेडी कांस्टेबल को इशारा किया और उसने आते ही ज्योति को दो थप्पड़ जड़ दिये। ज्योति एक पल के लिए चकरा गयी।

जय- "थोड़ी और वार्तालाप करेंगी हमारी इस वकील से? या हमसे बात कयेंगी?" ज्योति अब बहुत डर गयी थी। उसने देखा कि वो कांस्टेबल अब अपनी मट्ठी बंद कर रही थी।

ज्योति- "हाँ मैंने दो टिकट करवायी थीं।" ज्योति डर के मारे हाँफ रही थी।
 
जय- "थोड़ी और वार्तालाप करेंगी हमारी इस वकील से? या हमसे बात कयेंगी?" ज्योति अब बहुत डर गयी थी। उसने देखा कि वो कांस्टेबल अब अपनी मट्ठी बंद कर रही थी।

ज्योति- "हाँ मैंने दो टिकट करवायी थीं।" ज्योति डर के मारे हाँफ रही थी।

कुणाल- "देखो ज्योति हमें बात तो सारी समझ आ गयी है, बेहतर होगा तुम अपना गुनाह ख़ुद क़बूल कर लो तो सज़ा कम हो जायेगी।" ज्योति ने नज़रें उठाकर देखा जय और वो कांस्टेबल उसे घूर रहे थे। वो समझ गयी थी कि उसके पास कोई और चारा नहीं था। ज्योति ने बोलना शुरू किया-

"मैं जानती थी कि राज मुझसे कतरा रहा था। उस रात जब वो मेरे कमरे में मेरी बेइज़्ज़ती करके गया तो मैं उसके पीछे गयी जहाँ बार में वो पी रहा था। मैं उसे प्यार से समझाना चाहती थी पर मैंने उसे किसी से बात करते हुए सुना कि वो मुझे रास्ते से हटाने की प्लानिंग कर रहा था। वो किसी को बता रहा था, १२ बजे CCTV कैमरा बंद होंगे और उसके बाद शायद मेरे क़ातिल को आना था। मैं स्तब्ध रह गयी कि जिस इन्सान पर मैंने अपना सब कुछ निछावर कर दिया था वो मुझे ही मारने की प्लानिंग कर रहा था। बस मेरा दिमाग़ फिर गया कि मैं राज को नहीं छोडूँगी। अगर इसने कोई प्लान बनाया है तो इससे बड़ा प्लान मैं बनाऊँगी। मैं अपने कमरे में आकर, अपने प्लान के बारे में सोच ही रही थी कि अचानक मेरा मैसेज पाकर डॉली मेरे कमरे में आ गयी। उसके हाथ मेरा और राज का वो वीडियो लग गया था। उस वीडियो को लेकर हम दोनों में काफ़ी कहा-सुनी हुई पर मौक़ा पाकर मैंने डॉली को शांत करते हुए उसे पानी पिला दिया। जिसमें मैंने बेहोशी को गोली डाल दी थी। डॉली वहीं बेहोश हो गयी। मैंने लाइट्स बंद कर दीं।

अब मुझे इंतज़ार था उस क़ातिल का जो मुझे मारने आने वाला था ताकि वो डॉली को मुझे समझकर उस पर हमला कर दे,पर उससे पहले मुझे अपने उस होटल में ना होने का सबूत चाहिए था। मैं एयरपोर्ट गयी और वहाँ मैंने दो टिकट्स खरीदीं एक २ बजे की फ़्लाइट की दूसरी ५ बजे की। २ बजे की फ़्लाइट से मुझे केवल बोर्डिंग पास चाहिए था। मैं अब वापस आयी ये सोचकर डॉली अब तक मर चुकी होगी और मैं राज को उसके ख़ून के इल्ज़ाम में फँसाकर साफ़ निकल जाऊँगी। पर जब में होटल अपने कमरे में पहुँची तो देखकर हैरान रह गयी कि डॉली तो अभी भी सो रही थी और राज का मोबाइल भी वहाँ नहीं था। इसका मतलब क़ातिल वहाँ आया था और उसने डॉली को देखकर अपना इरादा बदल दिया, पर मैं अपना इरादा नहीं बदलना चाहती थी।

अचानक डॉली जाग गयी मेरे हाथ में यूँ चक्कू देखकर वो हैरान थी। वो फिर से मुझे पापा को फ़ोन करने की धमकी देने लगी। मैंने आवेश में उसका सर पकड़कर दीवार से दे मारा। वो तड़पने लगी। फिर चक्कू से मैंने उसके सीने में दो वार कर दिए जिससे उसकी मौत......" कहते हुए वो रोये जा रही थी।

"मैंने मार दिया उसे .. मार दिया.... उस हरामजादे राज के लिए मैंने अपनी बहन को मार दिया।" जय ने कुणाल की तरफ़ देखा मानो अब उसकी बारी थी।

कुणाल- "और फिर राज?"

ज्योति- "मैं अभी इस सदमे से उभर ही नहीं पायी थी कि मेरे हाथों मेरी बड़ी बहन का ख़ून हो गया है कि अचानक मैंने पाया कि राज कमरे में दाख़िल हो रहा था। मैं वहाँ पड़ा एक डंडा लेकर तैयार खड़ी थी। जैसे राज अंदर आया, वो डॉली की लाश को देखकर सदमे में आ गया। मैंने मौक़ा पाकर उसके सर पर वार करना शुरू कर दिया, जब तक वो ढेर नहीं हो गया। मैं समझी वो मर गया है। मैंने वो चक्कू राज के हाथ में पकड़ा दिया जिससे जब पुलिस को पता चले तो वो राज को ही डॉली का क़ातिल समझे। उसके बाद मैं चुपचाप होटल से एयरपोर्ट के लिए निकल गयी।

हाँ मैंने दो टिकट जानबूझ कर लीं थीं एक २ बजे की, जिससे मैं ये साबित कर सकूँ कि मैं उस वक़्त होटल में नहीं थी जब ये क़त्ल हुए और दूसरी ५ बजे की जिससे मुझे इसका बाद दिल्ली की फ़्लाइट पकड़नी थी!" कहते हुए वो रोये जा रही थी। जय ने वहाँ खड़ी कांस्टेबल को ज्योति को ले जाने का इशारा किया। कुणाल ज्योति को तब तक देखता रहा जब तक उसकी चीख़ें धूमिल नहीं हो गयीं और अपने परिचित अंदाज़ में उसने अपनी सिगरेट निकाली और सूँघता हुआ निकल गया।

ज्योति के बयान से यह साबित हो गया कि डॉली का क़त्ल ज्योति ने ही किया था और राज पर जानलेवा हमला। ज्योति को इस जुर्म के लिए उम्र क़ैद की सज़ा मिली। राज को क़त्ल का षड्यंत्र रचने के जुर्म में और अपनी पत्नी के होते अपनी साली के साथ सम्बन्ध रखने के जुर्म में सात साल की सज़ा मिली और रागिनी को राज के साथ क़त्ल का षड़यंत्र रचने के जुर्म में ४ साल की सज़ा।

कैसे सब कुछ इतनी जल्दी बदल गया। अभी १० दिन पहले ही तो सब ठीक था। डॉली कितनी ख़ुश थी। पर राज और फिर ज्योति की एक छोटी-सी भूल ने कितनी ही ज़िंदगियाँ तबाह कर दीं और उसके ऊपर रागिनी का पागलन जो अपने एक्स बॉय फ़्रैंड के लिए उसकी साली का क़त्ल करने के लिए तैयार हो गयी। प्यार और हवस में सिर्फ़ थोड़ा-सा ही फ़र्क़ होता है।

'प्यार' ख़ुशियों का दूसरा नाम है।

the end
 
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