• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Erotica साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन complete

हालांकि इस कहानी मैं कोई जबरदस्ती की बात नहीं है, पर अगर किसी महिला को कोई आला अफसर, नेता, बिज़नेस मेन या फिर कोई धार्मिक ओहदे पर बैठे हुए व्यक्ति अपने ओहदे या आर्थिक ताकत का गलत इस्तमाल कर यौन क्रिया के लिए उसके मना करने पर भी परेशान करे तो उस महिला को चुप नहीं रहना चाहिए और ऐसे लोगों का भंडाफोड़ करना चाहिए। आजकल हमारी न्यायिक और सरकारी महकमे इस मामले में काफी सजग है और बड़े बड़े रसूखदार व्यक्तियों को भी जेल जाना पड़ रहा है।

-

चलिए, हम वापस अपनी कहानी पर आते हैं।

नीतू ने जब इशारा किया की कर्नल साहब सुनीलजी की बीबी सुनीताजी की चुदाई कर चुके थे और उसके कुछ देर बाद उसी वक्त सुनीताजी अपने पति से चुद रही थी तो उन्हें आश्चर्य तो हुआ, पर फिर उन्होंने सोचा की दूसरों के निजी मामलों में उन्हें कोई दखल अंदाजी या टिपण्णी नहीं करनी चाहिए तो वह कुछ सोच कर बोले, "उनको जो करना है, करने दो। हम अपनी बात करते हैं। हम बात क्यों कर रहे हैं? भाई हम भी तो कुछ करें ना?"

नीतू ने कुमार के गालों को चूमते हुए कहा, "तो फिर करो ना, किसने रोका है?"

नीतू के मन में कुमार के लिए इतना प्यार उमड़ पड़ा की वह कुमार के होँठों के अलावा उसके कपाल, उस के चेहरे पर बंधी पट्टियां, उसके नाक, कान और बालों को भी चूमने लगी। नीतू की चूत में से पानी की धार बहने लगी थी। कुमार का लण्ड एकदम अटेंशन में खड़ा हुआ था और नीतू की चूत को कपड़ों के माध्यम से कुरेद रहा था।

कुमार का एक हाथ नीतू की गाँड़ की और बढ़ रहा था। नीतू की सुआकार गाँड़ पर हाथ पहुंचते ही नीतू के पुरे बदन में एक तेज सिहरन सी फ़ैल गयी। नीतू के मुंह से बरबस ही सिसकारी निकल गयी। कुमार नीतू की गाँड़ के गालों को बड़े प्यार से दबाया और उन्हें उँगलियाँ से चूँटी भर कर दबाने और मसलने लगा।

नीतू पर अजीब सी मदहोशी छा गयी थी। कुमार ने उसकी जान बचाई थी तो उसकी जान, उसका बदन और उसकी रूह पर भी कुमार का पूरा हक़ था। कुमार को वह अपना सबकुछ अर्पण कर देना चाहती थी। आगे चाहे कुछ भी हो, नीतू कुमार को अपनी जात सौंपने के लिए बेबस हो रही थी।

नीतू ने फिर कुमार की आँखों में आँखें डाल कर पूछा, 'तुम इस रात मुझसे क्या चाहते हो?"

कुमार ने कहा, "मैं तुम्हें पूरी तरह से मेरी बनाना चाहता हूँ।"

नीतू ने कहा, "तो बनाओ ना? मैंने कहाँ रोका है? पर एक बात ध्यान रहे। मैं तुम्हारे आगे के सपने पुरे ना कर सकुंगी! मैं चाहती हूँ की मैं पूरी जिंदगी तुम्हारी बन कर रहूं। पर शायद यह मेरी ख्वाहिश ही बन कर रह जायेगी। शायद भाग्य को यह मंजूर नहीं।"

कुमार को लगा की नीतू कुछ गंभीर बात करना चाहती थी। उसने पूछा, "जानेमन बोलो ना ऐसी क्या बात है?"

नीतू ने कुमार के गालों पर चुम्मी भरते हुए कहा, "आज की रात हम दोनों की रात है। आज और कोई बात माने नहीं रखती। मैं एक बात और कहना चाहती हूँ। यह सात दिन हमारे रहेंगे, यह मेरा तुमसे वादा है। मैं पूरी जिंदगी का वादा तो नहीं कर सकती पर यह सात दिन मौक़ा मिलते ही मैं दिन में या रात में तुम्हारे पास कुछ ना कुछ जुगाड़ करके पहुँच ही जाउंगी और फिर उस वक्त मैं सिर्फ तुम्हारी ही रहूंगी। तुम मुझसे जी भर कर प्यार करना। हाँ मैं तुम्हें सबके सामने नहीं मिल सकती। मेरे बारे में किसी से भी कोई बात या पूछताछ ना करना। यह बात ध्यान रहे।"

कुमार नीतू की बात सुनकर बड़े ही अचम्भे में पड़ गए। आखिर ऐसी कौनसी रहस्य वाली बात थी, जो नीतू उन्हें नहीं कहना चाहती थी? पर कुमार जानते थे की जिससे प्यार करते हैं उस पर विश्वास रखना और उनकी बात का सम्मान करना जरुरी है। कुमार ने और कुछ सोचना बंद किया और वह नीतू के चारों और फैले हुए बालों में खो गए।

ट्रैन तेजी से दिशा को चीरती हुई भाग रही थी। उसकी हलचल से कुमार और नीतू के बदन ऐसे हिल रहे थे वह दोनों चुदाई में लगे हों। नीतू का हाथ बरबस ही उन दोनों के शरीर के बिच में घुस कर कुमार की जाँघों के बिच में कुमार के खड़े हुए लण्ड के पास जा पहुंचा। वह कुमार के लण्ड को अपनी उँगलियों में महसूस करना चाहती थी। कुमार का लण्ड नीतू की उठी हुई जाँघों के बिच था और इतना लम्बा था की बिच में थोड़ा अंतर होते हुए भी वह नीतू की चूत में ठोकर मार रहा था।

नीतू के हाथ लण्ड के ऊपर महसूस करते ही कुमार की बोलती बंद हो गयी। नीतू ने कुमार के लण्ड के इर्दगिर्द अपनी उँगलियों की गोलाई बनाकर उसमें उसको मुठी में पकड़ना चाहा। कपडे के दूसरी और भी कुमार का लण्ड नीतू की मुठी में तो ना समा सका पर फिर भी नीतू ने कुमार के लण्ड को कुमार के पयजामे के ऊपर से ही सहलाना शुरू किया। कुमार ने मारे उत्तेजना के नीतू के सर को फिर से अपने हाथों में पकड़ कर उसे अपने मुंह से चिपका कर नीतू को गाढ़ चुम्बन करने लगा। कुमार का लण्ड अपने पूर्व रस का स्राव कर रहा था। पहले से ही उसका लण्ड उसके पूर्व रस की चिकनाहट से लथपथ था।
 
नीतू के पकड़ने से जैसे उसके लण्ड में बिजली का कर्रेंट दौड़ ने लगा। कुमार के लण्ड की सारी नसें उसके वीर्य के दबाव से फूल गयी। कुमार ने अपने दोनों हाथ नीतू के सर से हटाए और नीतू की चोली पर रख कर चोली के ऊपर से ही उसके स्तनोँ को कुमार दबाने लगे। कुमार और नीतू अपने प्यार की उच्चतम ऊंचाइयों को छूना चाहते थे।

नीतू कुमार के लण्ड को हल्के हल्के से सहलाने लगी। कुमार के लण्ड से निकली चिकनाहट कुमार के पयजामे को भी गिला और चिकना कर नीतू की उँगलियों में चिपक रही थी। नीतू इसे महसूस कर मन ही मन मुस्कुरायी। कुमार की उत्तेजना वह समझ रही थी। वह जानती थी कुमर उन्हें चोदना चाहते थे और वह खुद भी उनसे चुदना चाहती थी। पर चुदाई के पहले थोड़ी छेड़छाड़ का खेल तो खेलना बनता है ना?

कुमार ने नीतू के ब्लाउज के ऊपर से अपनी उँगलियाँ घुसा कर नीतू के उन्मत्त दो फलों को अपन उंगलयों में पकड़ना चाहा। पर नीतू के स्तनोँ का भराव इतना था की नीतू की चोली और ब्रा इतनी टाइट थी की उसमें में हाथ डाल कर उनको छूना उस हाल में कठिन था।

कुमार ने जल्दी में ही नीतू की पीठ पर से नीतू के ब्लाउज के बटन खोल दिए। बटन खुल जाने पर कुमार ने ब्रा के हुक भी खोल दिए। नीतू के स्तन अब पूर्णतयाः आजाद थे। कुमार ने नीतू को अपने ऊपर ही बैठ जाने के लिए बाध्य किया और नीतू के अल्लड़ स्तन जो पूरी आजादी मिलते हुए भी और इतने मोटे होने के बावजूद भी अकड़े हुए बिना झूले खड़े थे उनको दोनों हाथों में पकड़ कर उन्हें दबाने और मसलने लगे।

नीतू के स्तनोँ के बिच छोटी छोटी फुँसियों का जाल फैलाये हलकी गुलाबी चॉकलेट रंग की एरोला जिसके ठीक बिच में उसकी फूली हुई निप्पलोँ को कुमार अपनी उँगलियों में पिचकाने लगे।

अचानक नीतू को अपनी कोहनी में कुछ चिकनाहट महसूस हुई। नीतू को अजीब लगा की उसकी कोहनी में कैसे चिकनाहट लगी। यह कुमार के लण्ड से निकला स्राव तो नहीं हो सकता। नीतू ने अपने फ़ोन की टोर्च जलाई तो देखा की उसकी कोहनी में कुमार का लाल खून लगा था। तलाश करने पर नीतू ने पाया की उन दोनों के बदन को रगड़ने से एक जगह लगा घाव जो रुझ रहा था उस में से खून रिस ने लगा था। पर कुमार थे की कुछ आवाज भी नहीं की। वह अपनी माशूका को यह महसूस नहीं करवाना चाहते थे की वह दर्द में है।

नीतू को महसूस हुआ की कुमार का दर्द अभी भी था। क्यूंकि जब भी नीतू ट्रैन के हिलने के कारण अथवा किसी और वजह से कुमार के ऊपर थोड़ी हिलती थी तो कुमार के मुंह से कभी कभी एकदम धीमी सिसकारी निकल जाती थी। नीतू समझ गयी की कुमार अपना दर्द छिपाने की भरसक कोशिश कर रहे थे। वह नीतू को प्यार करने के लिए इतने उतावले हो रहे थे की अपना दर्द नजर अंदाज कर रहे थे।

नीतू को कुमार का हाल देख बड़ा आश्चर्य हुआ। क्या कोई मर्द किसी स्त्री को कभी इतना प्यार भी कर सकता है? ना सिर्फ कुमार ने अपनी जान पर खेल कर नीतू को बचाया पर उसे प्यार करने के लिए अपना दर्द भी छुपाने लगा। नीतू ने उस से पहले कभी किसी से इतना प्यार नहीं पाया था। नीतू ने सोचा ऐसे प्यारे बांके बहादुर जांबाज और विरले नवजवान इंसान पर अपना तन और शील तो क्या जान भी देदे तो कम था। उस वक्त तो उसके लिए कुमार के घावोँ को ठीक करना ही एक मात्र लक्ष्य था।

अपने स्तनोँ पर से कुमार का हाथ ना हटाते हुए नीतू धीरे से कुमार से अलग हुई और अपने शरीर का वजन कुमार के ऊपर से हटाया और कुमार के बगल में बैठ गयी। जब कुमार उसकी यह प्रक्रिया को आश्चर्य से देखने लगा तो नीतू ने कहा, "जनाब, अभी आप के घाव पूरी तरह नहीं भरे हैं। आप परेशान मत होइए। मैं कहीं भागी नहीं जा रही हूँ। आप पहले ज़रा ठीक हो जाइये। अगले सात दिनों तक मैं आपकी ही हूँ, यह मेरा आपसे वचन है।"

नीतू ने धीरे से अपना हाथ कुमार की जाँघों के बिच में रख दिया और वह कुमार के लण्ड को पयजामे के ऊपर से ही सहलाने लगी। कुमार ने फुर्ती से अपने पयजामे का नाडा खोल दिया। पयजामे का नाडा खुलते ही कुमार का फनफनाता मोटा और काफी लंबा लण्ड नीतू की छोटी सी हथेली में आ गया। उस दिन तक नीतू ने अपने पति के अलावा किसी बड़े आदमी का लण्ड नहीं देखा था। उसके पति का लण्ड अक्सर तो खड़ा होने में भी दिक्कत करता था और अगर खड़ा हो भी गया तो वह चार इंच से ज्यादा लंबा नहीं होता था। कुमार का लंड उससे दुगुना तो था ही, ऊपर से उससे कई गुना मोटा भी था।

कुमार का लण्ड हाथ की हथेली में महसूस होते ही नीतू के मुंह से नकल ही पड़ा, "हाय दैय्या, तुम्हारा यह कितना लंबा और मोटा है? इतना लम्बा और मोटा भी कभी किसीका होता है क्या?"

कुमार ने मुस्कराते हुए बोला, "क्यों? इतना बड़ा लण्ड इससे पहले नहीं देखा क्या?"

नीतू ने, "धत्त तेरी! क्या बातें करते हैं आप? शर्म नहीं आती ऐसी बात करते हुए? तुम क्या समझते हो? मुझे इसके अलावा कोई और काम नहीं है क्या?" यह कह कर शर्म से अपना मुंह चद्दर में छिपा लिया। कुमार नीतू के शर्माने से मसुकुरा उठे और नीतू की ठुड्डी अपनी उँगलियों में दबा कर बोले, " जानेमन बात की शुरुआत तो तुमने ही की थी। बड़ा है छोटा है, आजसे यह सिर्फ तुम्हारा है।"
 
एक हाथ से नीतू कुमार के नंगे लण्ड को सेहला रही थी और दोनों हाथों से कुमार नीतू के दो गुम्बजों पर अपनी उँगलियाँ और हथेली घुमा रहा था और बार बार नीतू की निप्पलों को पिचका रहा था। नीतू ने सोचा की वह समय और जगह चुदाई करने लायक नहीं थी। कोई भी उन्हें पर्दा हटा कर देख सकता था। दूसरी बात यह भी थी की नीतू जब मूड़ में होती थी तब चुदाई करवाते समय उसे जोर से कराहने की आदत थी। उस रात एकदम सन्नाटे सी ट्रैन में शोर करना खतरनाक हो सकता था।

नीतू ने कुमार का लण्ड अपनी हथेली में लेकर उसे जोर से हिलाना शुरू किया। नीतू ने कुमार से कहा, "अब तुम कुछ बोलना मत। चुपचाप पड़े रहो। तुम्हें आज रात कोई परिश्रम करने की जरुरत नहीं है। प्लीज मेरी बात मानो। आज रात को हम कुछ नहीं करेंगे। कुमार मैं तुम्हारी हूँ। अब तुम चुपचाप लेटे रहो। मैं तुम्हारी गर्मी निकाल देती हूँ। ओके? मैंने तुम्हें वचन दिया है की मौक़ा मिलते ही मैं तुम्हारे पास आ जाउंगी और हम वह सब कुछ करेंगे जो तुम चाहते हो। पर इस वक्त और कोई बात नहीं बस लेटे रहो।"

नीतू ने कुमार के लण्ड को जोर से हिलाना शुरू किया। कुछ ही देर में कुमार का बदन अकड़ने लगा। कुमार अपनी आँखे भींच कर नीतू के हाथ का जादू अपने लण्ड पर महसूस कर रहा था। कुमार से ज्यादा देर रहा नहीं गया। कुछ ही देर में कुमार के लण्ड से उसके वीर्य की पिचकारी फुट पड़ी और नीतू का हाथ कुमार के वीर्य से लथपथ हो गया।

सुनीलजी की आँखों में नींद ओझल थी। वह बड़ी उलझन में थे। उन्होंने अपनी पत्नी सुनीता को तो कह दिया था की वह रात में उसके साथ सोने के लिए (मतलब बीबी को चोदने के लिए) आएंगे, पर जब वास्तविकता से सामना हुआ तो उनकी हवाही निकल गयी। निचे के बर्थ पर ज्योतिजी सोई थीं। पत्नी के पास चले गए और अगर ज्योतिजी ने देख लिया तो फिर तो उनकी नौबत ही आ जायेगी।

हालांकि सुनीताजी तो सुनीलजी की बीबी थीं, पर आखिर माशूका भी तो बीबियों से जलती है ना? वह तो उन्हें खरी खोटी सुनाएंगे ही। कहेंगी, "अरे भाई अगर बीबी के साथ ही सोना था तो घर में ही सो लेते! रोज तो घर में बीबी के साथ सोते हुए पेट नहीं भरा क्या? चलती ट्रैन में उसके साथ सोने की जरुरत क्या थी? हाँ अगर माशूका के साथ सोने की बात होती तो समझ में आता है। जल्द बाजी में कभी कबार ऐसा करना पड़ता है। पर बीबी के साथ?" बगैरा बगैरा।

जस्सूजी ने देख लिया तो वह भी टिका टिपण्णी कर सकते थे। वह तो कुछ ख़ास नहीं कहेंगे पर यह जरूर कहेंगे की "यार किसी और की बीबी के साथ सोते तब तो समझते। तुमतो अपनी बीबी को ट्रैन में भी नहीं छोड़ते। भाई शादी के इतने सालों के बाद इतनी आशिकी ठीक नहीं।"

खैर, सुनीलजी डरते कांपते अपनी बर्थ से निचे उतर कर अपनी पत्नी की बर्थ के पास पहुंचे। उन्हें यह सावधानी रखनी थी की उन्हें कोई देख ना ले। यह देख कर उन्हें अच्छा लगा की कहीं कोई हलचल नहीं थी। ज्योतिजी और जस्सूजी गहरी नींद में लग रहे थे। उनकी साँसों की नियत आवाज उन्हें सुनाई दे रही थी।

सुनीलजी को यह शांति जरूर थीकि यदि कभी किसी ने उन्हें देख भी लिया तो आखिर वह क्या कह सकते थे? आखिर वह सो तो अपनी बीबी के साथे ही रहे थे न?

जब सुनीलजी अपनी बीबी सुनीता के कम्बल में घुसे तब सुनीता गहरी नींद में सो रही थी। सुनीलजी उम्मीद कर रहे थे की सुनीता जाग रही होगी। पर वह तो खर्रांटे मार रही थी। लगता था वह काफी थकी हुई थी। थकना तो था ही! सुनीता ने जस्सूजी के साथ करीब एक घंटे तक प्रेम क्रीड़ा जो की थी! सुनीलजी को कहाँ पता था की उनकी बीबी जस्सूजी से कुछ एक घंटे पहले चुदवाना छोड़ कर बाकी सब कुछ कर चुकी थी?

सुनीलजी उम्मीद कर रहे थे की उनकी पत्नी सुनीता उनके आने का इंतजार कर रही होगी। उन्होंने कम्बल में घुसते ही सुनीता को अपनी बाहों में लिया और उसे चुम्बन करने लगे। सुनीता गहरी नींद में ही बड़बड़ायी, "छोडो ना जस्सूजी, आप फिर आ गए? अब काफी हो गया। इतना प्यार करने पर भी पेट नहीं भरा क्या?"
 
यह सुनकर सुनीलजी को बड़ा झटका लगा। अरे! वह यहां अपनी बीबी से प्यार करने आये थे और उनकी बीबी थी की जस्सूजी के सपने देख रही थी? सुनीलजी के पॉंव से जमीन जैसे खिसक गयी। हालांकि वह खुद अपनी बीबी सुनीता को जस्सूजी के पास जाने के लिए प्रोत्साहित कर तो रहे थे पर जब उन्होंने अपनी बीबी सुनीता के मुंह से जस्सूजी का नाम सूना तो उनकी सिट्टीपिट्टी गुम हो गयी। उनके अहंकार पर जैसे कुठाराघात हुआ।

पुरुष भले ही अपनी बीबी को दूसरे कोई मर्द के से सेक्स करने के लिए उकसाये, पर जब वास्तव में दुसरा मर्द उसकी बीबी को उसके सामने या पीछे चोदता है और उसे उसका पता चलता है तो उसे कुछ इर्षा, जलन या फिर उसके अहम को थोड़ी ही सही पर हलकी सी चोट तो जरूर पहुँचती है। यह बात सुनीलजी ने पहली बार महसूस की। तब तक तो वह यह मानते थे की वह ऐसे पति थे की जो अपनी पत्नी से इतना प्यार करते थे की यदि वह किसी और मर्द से चुदवाये तो उनको रत्ती भर भी आपत्ति नहीं होगी। पर उस रात उनको कुछ तो महसूस जरूर हुआ।

सुनीलजी ने अपनी बीबी को झकझोरते हुए कहा, "जानेमन, मैं तुम्हारा पति सुनील हूँ। जस्सूजी तो ऊपर सो रहे हैं। कहीं तुम जस्सूजी से चुदवाने के सपने तो नहीं देख रही थी?"

अपने पति के यह शब्द सुनकर सुनीता की सारी नींद एक ही झटके में गायब हो गयी। वह सोचने लगी, "हो ना हो, मेरे मुंह से जस्सूजी का नाम निकल ही गया होगा और वह सुनील ने सुन लिया। हाय दैय्या! कहीं मेरे मुंहसे जस्सूजी से चुदवाने की बात तो नींद में नहीं निकल गयी? सुनील को कैसे पूछूं? अब क्या होगा?"

सुनीता का सोया हुआ दिमाग अब डबल तेजी से काम करने लगा। सुनीता ने कहा, "मैं जस्सूजी ना नाम ले रही थी? आप का दिमाग तो खराब नहीं हो गया?" फिर थोड़ी देर रुक कर सुनीता बोली, "अच्छा, अब मैं समझी। मैंने आपसे कहा था, 'अब खस्सो जी, फिर मेरी बर्थ पर क्यों आ गये? क्या आप का मन पिछली रात इतना प्यार करने के बाद भी नहीं भरा?' आप भी कमाल हैं! आपके ही मन में चोर है। आप मेरे सामने बार बार जस्सूजी का नाम क्यों ले रहे हो? मैं जानती हूँ की आप यही चाहते हो ना की मैं जस्सूजी से चुदवाऊं? पर श्रीमान ध्यान रहे ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। अगर आपने ज्यादा जिद की तो मैं उनको अपने करीब भी नहीं आने दूंगी। फिर मुझे दोष मत दीजियेगा!"

अपनी बीबी की बात सुन कर सुनीलजी लज्जित हो कर माफ़ी मांगने लगे, "अरे बीबीजी, मुझसे गलती हो गयी। मैंने गलत सुन लिया। मैं भी बड़ा बेवकूफ हूँ। तुम मेरी बात का बुरा मत मानना। तुम मेरे कारण जस्सूजी पर अपना गुस्सा मत निकालना। उनका बेचारे का कोई दोष नहीं है। मैं भी तुम पर कोई शक नहीं कर रहा हूँ।"

बेचारे सुनीलजी! उन्होंने सोचा की अगर सुनीता कहीं नाराज हो गयी तो जस्सूजी के साथ झगड़ा कर लेगी और बनी बनायी बात बिगड़ जायेगी। इससे तो बेहतर है की उसे खुश रखा जाए।"

सुनीलजी ने सुनीता के होँठों पर अपने होँठ रखते हुए कहा, "जानूं, मैं जानता हूँ की तुमने क्या प्रण लिया है। पर प्लीज जस्सूजी से इतनी नाराजगी अच्छी नहीं। भले ही जस्सूजी से चुदवाने की बात छोड़ दो। पर प्लीज उनका साथ देने का तुमने वादा किया है उसे मत भुलाना। आज दोपहर तुमने जस्सूजी की टाँगे अपनी गोद में ले रक्खी थी और उनको हलके से मसाज कर रही थी तो मुझे बहुत अच्छा लगा था। सच में! मैं इर्षा से नहीं कह रहा हूँ।"

सुनीता ने नखरे दिखाते हुए कहा, "हाँ भाई, आपको क्यों अच्छा नहीं लगेगा? अपनी बीबी से अपने दोस्त की सेवा करवाने की बड़ी इच्छा है जो है तुम्हारी? तुम तो बड़े खुश होते अगर मैंने तुम्हारे दोस्त का लण्ड पकड़ कर उसे भी सहलाया होता तो, क्यों, ठीक कहा ना मैंने?"

सुनीलजी को समझ नहीं आ रहा था की उनकी बीबी उनकी फिल्म उतार रही थी या फिर वह मजाक के मूड में थी। सुनीलजी को अच्छा भी लगा की उनकी बीबी जस्सूजी के बारेमें अब काफी खुलकर बात कर रही थी।

सुनीलजी ने कहा, "जानूं, क्या वाकई में तुम ऐसा कर सकती हो? मजाक तो नहीं कर रही?"

सुनीता ने कहा, "कमाल है! तुम कैसे पति हो जो अपनी बीबी के बारे में ऐसी बाते करते हो? एक तो जस्सूजी वैसेही बड़े आशिकी मिजाज के हैं। ऊपर से तुम आग में घी डालने का काम कर रहे हो! अगर तुमने जस्सूजी से ऐसी बात की ना तो ऐसा ना हो की मौक़ा मिलते ही कहीं वह मेरा हाथ पकड़ कर अपने लण्ड पर ही ना रख दें! उनको ऐसा करने में एक मिनट भी नहीं लगेगा। फिर यातो मुझे उनसे लड़ाई करनी पड़ेगी, या फिर उनका लण्ड हिलाकर उनका माल निकाल देना पडेगा। हे पति देव! अब तुम ही बताओ ऐसा कुछ हुआ तो मुझे क्या करना चाहिए?"

अपनी बीबी के मुंह से यह शब्द सुनकर सुनीलजी का लण्ड खड़ा हो गया। यह शायद पहेली बार था जब सुनीता ने खुल्लमखुल्ला जस्सूजी के लण्ड के बारेमें सामने चल कर ऐसी बात छेड़ी थी। सुनील ने अपना लण्ड अपनी बीबी के हाथ में पकड़ाया और बोले, "जाने मन ऐसी स्थिति में तो मैं यही कहूंगा की जस्सूजी सिर्फ मेरे दोस्त ही नहीं, तुम्हारे गुरु भी हैं। उन्होंने भले ही तुम्हारे लिए अपनी जान कुर्बान नहीं की हो, पर उन्होंने तुम्हारे लिए अपनी रातों की नींद हराम कर तुम्हें शिक्षा दी जिसकी वजह से आज तुम्हें एक शोहरत और इज्जत वाली जॉब के ऑफर्स आ रहे हैं। तो अगर तुमने उनकी थोड़ी गर्मी निकाल भी दी तो कौनसा आसमान टूट पड़ने वाला है?"
 
अपने पति की ऐसी उत्तेजनात्मक बात सुनकर सुनीता की जाँघों के बिच में से पानी चुना शुरू हो गया। उसकी चूत में हलचल शुरू हो गयी। पहले ही उसकी पेंटी भीगी हुई तो थी ही। वह और गीली हो गयी। अपने आपको सम्हालते हुए सुनीता ने कहा, "अच्छा जनाब! क्या ज़माना आ गया है? अब बात यहां तक आ गयी है की एक पति अपनी बीबी को गैर मर्द का लण्ड हिला कर उसका माल निकालने के लिए प्रेरित कर रहा है?" फिर अपना सर पर हाथ मारते हुए नाटक वाले अंदाज में सुनीता बोली, " पता नहीं आगे चलकर इस कलियुग में क्या क्या होगा?"

सुनील ने अपनी बीबी सुनीता का हाथ पकड़ कर कहा, "जानेमन, जो होगा अच्छा ही होगा।"

सुनीता की चूत में उंगली डाल कर सुनीलजी न कहा, "देखो, मैं महसूस कर रहा हूँ की तुम्हारी चूत तो तुम्हारे पानी से पूरी लथपथ भरी हुई है। जस्सूजी की बात सुनकर तुम भी तो बड़ी उत्तेजित हो रही हो! भाई, कहीं तुम्हारी चूत में तो मचलन नहीं हो रही?"

सुनीता ने हँस कर कहा, "डार्लिंग! तुम मेरी चूत में उंगलियां डाल कर मुझे उकसा रहे हो और नाम ले रहे हो बेचारे जस्सूजी का! चलो अब देर मत करो। मेरी चूत में वाकई में बड़ी मचलन हो रही है। अपना लण्ड डालो और जल्दी करो। कहीं कोई जाग गया तो और नयी मुसीबत खड़ी हो जायेगी।"

मौक़ा पाकर सुनीलजी ने सोचा फायदा उठाया जाये। वह बोले, "पर जानेमन यह तो बताओ, की अगर मौक़ा मिला तो जस्सूजी का लण्ड तो सेहला ही दोगी ना?"

सुनीता ने हँसते हुए कहा, "अरे छोडो ना जस्सूजी को। अपनी बात सोचो!"

सुनील को लगा की उसकी बात बनने वाली है, तो उसने और जोर देते हुए कहा, "नहीं डार्लिंग! आज तो तुम्हें बताना ही पडेगा की क्या तुम मौक़ा मिलने पर जस्सूजी का लण्ड तो हिला दोगी न?"

सुनीता ने गुस्से का नाटक करते हुए कहा, "मेरा पति भी कमाल का है! यहां उसकी बीबी नंगी हो कर अपने पति को उसका लण्ड अपनी चूत में डालने को कह रही है, और पति है की अपने दोस्त के लण्ड के बारे में कहे जा रहा है! पहले ऐसा कोई मौक़ा तो आनेदो? फिर सोचूंगी। अभी तो मारे उत्तेजना के मैं पागल हो रही हूँ। अपना लण्ड जल्दी डालो ना?"

सुनील ने जिद करते हुए कहा, "नहीं अभी बताओ। फिर मैं फ़ौरन डाल दूंगा।"

सुनीता ने नकली नाराजगी और असहायता दिखाते हुए कहा, "मैं क्या करूँ? मेरा पति हाथ धोकर मुझे मनवाने के लिए मेरे पीछे जो पड़ा है? यहां मैं मेरे पति के लण्ड से चुदवाने के लिए पागल हो रही हूँ और मेरा पति है की अपने दोस्त की पैरवी कर रहा है! ठीक है भाई। मौक़ा मिलने पर मैं जस्सूजी का लण्ड मसाज कर दूंगी, हिला दूंगी और उनका माल भी निकाल दूंगी, बस? पर मेरी भी एक शर्त है।"

सुनिजि यह सुन कर ख़ुशी से उछल पड़े और बोले, "बोलो, क्या शर्त है तुम्हारी?"

सुनीता ने कहा, "मैं यह सब तुम्हारी हाजरी में तुम्हारे सामने नहीं कर सकती। हाँ अगर कुछ होता है तो मैं तुम्हें जरूर बता दूंगी। बस, क्या यह शर्त तुम्हें मंजूर है?"

सुनील ने फ़ौरन अपनी बीबी की चूत में अपना लण्ड पेलते हुए कहा, "मंजूर है, शत प्रतिशत मंजूर है।"

और फिर दोनों पति पत्नी कामाग्नि में मस्त एक दूसरे की चुदाई में ऐसे लग पड़े की बड़ी मुश्किल से सुनीता ने अपनी कराहटों पर काबू रखा।

सुनीलजी अपनी बीबी की अच्छी खासी चुदाई कर के वापस अपनी बर्थ पर आ रहे थे की बर्थ पर चढ़ते चढ़ते ज्योतिजी ने करवट ली और जाने अनजानेमें उनके पाँव से एक जोरदार किक सुनीलजी के पाँव पर जा लगी। ज्योतिजी शायद गहरी नींद में थीं। सुनीलजी ने घबड़ायी हुई नजर से काफी देर तक वहीं रुक कर देखना चाहा की ज्योतिजी कहीं जाग तो नहीं गयीं? पर ज्योतिजी के बिस्तर पर कोई हलचल नजर नहीं आयी। दुखी मन से सुनील वापस अपनी ऊपर वाली बर्थ पर लौट आये।

सुबह हो रही थी। जम्मू स्टेशन के नजदीक गाडी पहुँचने वाली थी। सब यात्री जाग चुके थे और उतर ने के लिए तैयार हो रहे थे।

जब कुमार जागे और उन्होंने ऊपर की बर्थ पर देखा तो बर्थ खाली थी। नीतू जा चुकी थी। कप्तान कुमार को समझ नहीं आया की नीतू कब बर्थ से उतर कर उन्हें बिना बताये क्यों चली गयी। सुनीता उठकर फ़ौरन कुमार के पास उनका हाल जानने पहुंची और बोली, "कैसे हो आप? उठ कर चल सकते हो की मैं व्हील चेयर मँगवाऊं?"

कप्तान कुमार ने उन्हें धन्यवाद देते हुए कहा की वह चल सकते थे और उन्हें कोई मदद की आवश्यकता नहीं थी। जब उन्होंने इधरउधर देखा तो सुनीता समझ गयी की कुमार नीतू को ढूंढ रहे थे। सुनीता ने कुमार के पास आ कर उन्हें हलकी आवाज में बताया की नीतू ब्रिगेडियर साहब के साथ चली गयी थी। उस समय भी यह साफ़ नहीं हुआ की ब्रिगेडियर साहब नीतू के क्या लगते थे। यह रहस्य बना रहा।
 
ट्रैन से निचे उतर ने पर सब ने महसूस किया की ज्योतिजी का मूड़ ख़ास अच्छा नहीं था। वह कुछ उखड़ी उखड़ी सी लग रही थीं। जस्सूजी ने सबको रोक कर बताया की उन्हें वहाँ से करीब चालीस किलोमीटर दूर हिमालय की पहाड़ियों में चम्बल के किनारे एक आर्मी कैंप में जाना है। उन सबको वहाँ से टैक्सी करनी पड़ेगी। जस्सूजी ने यह भी कहा की चूँकि वापसी की सवारी मिलना मुश्किल था इस लिए टैक्सी वाले मुंह माँगा किराया वसूल करते थे।

जस्सूजी, ज्योतिजी, सुनीता और सुनीलजी को बड़ा आनंद भरा आअश्चर्य तब हुआ जब एक व्यक्ति ने आकर सबसे हाथ मिलाये और सबके गले में फुलकी एक एक माला पहना कर कहा, "जम्मू में आपका स्वागत है। मैं आर्मी कैंप के मैनेजमेंट की तरफ से आपका स्वागत करता हूँ।"

फिर उसने आग्रह किया की सबकी माला पहने हुए एक फोटो ली जाए। सब ने खड़े होकर फोटो खिंचवाई। सुनील को कुछ अजीब सा लगा की स्टेशन पर हाल ही में उतरे कैंप में जाने वाले और भी कई आर्मी के अफसर और लोग थे, पर स्वागत सिर्फ उन चारों का ही हुआ था। फोटो खींचने के बाद फोटो खींचने वाला वह व्यक्ति पता नहीं भिडमें कहाँ गायब हो गया। सुनील ने जब जस्सूजी को इसमें बारेमें पूछा तो जस्सूजी भी इस बात को लेकर उलझन में थे। उन्होंने बताया की उनको नहीं पता था की आर्मी कैंप वाले उनका इतना भव्य स्वागत करेंगे।

खैर जब जस्सूजी ने टैक्सी वालों से कैंप जाने के लिए पूछताछ करनी शुरू की तो पाया की चूँकि काफी लोग कैंप की और जा रहे थे तो टैक्सी वालों ने किराया बढ़ा दिया था। पर शायद उन चारों की किस्मत अच्छी थी। एक टैक्सी वाले ने जब उन चारों को देखा तो भागता हुआ उनके पास आया और पूछा, "क्या आपको आर्मी कैंप साइट पर जाना है?"

जब सुनील ने हाँ कहा तो वह फ़ौरन अपनी पुरानी टूटी फूटी सी टैक्सी, के जिस पर कोई नंबर प्लेट नहीं था; ले आया और सबको बैठने को कहा। जब जस्सूजी ने किराये के बारे में पूछा तो उसने कहा, "कुछ भी दे देना साहेब। मेरी गाडी तो कैंप के आगे के गाँव तक जा ही रही है। खाली जा रहा था। सोच क्यों ना आपको ले चलूँ? कुछ किराया मिल जायेगा और आप से बातें भी हो जाएंगी।" ऐसा कह कर हम सब के बैठने के बाद उसने गाडी स्टार्ट कर दी।

जब जस्सूजी ने फिर किराए के बारे में पूछा तब उसने सब टैक्सी वालों से आधे से भी कम किराया कहा। यह सुनकर सुनीता बड़ी खुश हुई। उसने कहा, "यह तो बड़ा ही कम किराया माँग रहा है? लगता है यह भला आदमी है। यह कह कर सुनीता ने फ़ौरन अपनी ज़ेब से किराए की रकम टैक्सी वाले के हाथ में दे दी। सुनीता बड़ी खुश हो रही थी की उनको बड़े ही सस्ते किरायेमें टैक्सी मिल गयी। पर जब सुनीता ने जस्सूजी की और देखा तो जस्सूजी बड़े ही गंभीर विचारों में डूबे हुए थे।

कैंप जम्मू स्टेशन से करीब चालीस किलोमीटर दूर था और रास्ता ख़ास अच्छा नहीं था। दो घंटे लगने वाले थे। टैक्सी का ड्राइवर बड़ा ही हँसमुख था। उसने इधर उधर की बातें करनी शुरू की। ज्योतिजी का मूड़ ठीक नहीं था। कर्नल साहब कुछ बोल नहीं रहे थे। सुनील जी को कुछ भी पता नहीं था तब हार कर टैक्सी ड्राइवर ने सुनीता से बातें करने शुरू की, क्यूंकि सुनीता बातें करने में बड़ी उत्साहित रहती थी। टैक्सी ड्राइवर ने सुनीता से उनके प्रोग्राम के बारे में पूछा। सुनीता को प्रोग्राम के बारे में कुछ ख़ास पता नहीं था। पर सुनीता को जितना पता था उसने ड्राइवर को सब कुछ बताया।

आखिर में दो घंटे से ज्यादा का थकाने वाला सफर पूरा करने के बाद हिमालय कीखूबसूरत वादियों में वह चारों जा पहुंचे।

------------------------
 
जम्मू स्टेशन से कैंप की और टैक्सी चला कर ले जाते हुए पुरे रास्ते में सुनीलजी को ऐसा लगा जैसे टैक्सी का ड्राइवर "शोले" पिक्चर की "धन्नो" की तरह बोले ही जा रहा था और सवाल पे सवाल पूछे जा रहा था। आप कहाँ से हो, क्यों आये हो, कितने दिन रहोगे, यहां क्या प्रोग्राम है, बगैरा बगैरा। सुनीता भी उस की बातों का जवाब देती जा रही थी जितना उसे पता था।

जिसका उसे पता नहीं था तो वह जस्सूजीको पूछती थी। पर जस्सूजी थे की पूरी तरह मौन धरे हुए किसी भी बात का जवाब नहीं देते थे। सुनीता ड्राइवर से काफी प्रभावित लग रही थी। वैसे भी सुनीता स्वभाव से इतनी सरल थी की उसे प्रभावित करने में कोई ख़ास मशक्कत करने की जरुरत नहीं पड़ती थी। सुनीता किसीसे भी बातों बातों में दोस्ती बनानेमें माहिर तो थी ही।

आखिर में जस्सूजी ने ड्राइवर को टोकते हुए कहा, "ड्राइवर साहब, आप गाडी चलाने पर ध्यान दीजिये। बातें करने से ध्यान बट जाता है। तब कहीं ड्राइवर थोड़ी देर चुप रहा। सुनीता को जस्सूजी का रवैया ठीक नहीं लगा। सुनीता ने जस्सूजी की और कुछ सख्ती से देखा। पर जब जस्सूजी ने सुनीता को सामने से सीधी आँख वापस सख्ती से देखा तो सुनीता चुप हो गयी और खिसियानी सी इधर उधर देखती रही।

काफी मशक्कत और उबड़ खाबड़ रास्तों को पार कर उन चार यात्रियों का काफिला कैंप पर पहुंचा। कैंप पर पहुँचते ही सब लोग हिमालय की सुंदरता और बर्फ भरे पहाड़ियों की चोटियों में और कुदरत के कई सारे खूबसूरत नजारों को देखने में खो से गए। सुनीता पहली बार हिमालय की पहाड़ियों में आयी थी। मौसम में कुछ खुशनुमा सर्दी थी। सफर से सब थके हुए थे।

सारा सामान स्वागत कार्यालय में पहुंचाया गया। जस्सूजी ने देखा की टैक्सी का ड्राइवर मुख्य द्वार पर सिक्योरिटी पहरेदार से कुछ पूछ रहा था। फ़ौरन जस्सूजी भागते हुए मुख्य द्वार पर पहुंचे। वह देखना चाहते थे की टैक्सी ड्राइवर पहरेदार से क्या बात कर रहा था। जस्सूजी को दूर से आते हुए देख कर चन्द पल में ही ड्राइवर जस्सूजी की नज़रों से ओझल हो गया। जस्सूजी ने उसे और उसकी टैक्सी को काफी इधर उधर देखा पर वह या उसकी टैक्सी नजर नहीं आये।

जब कर्नल साहब ने पहरेदार से पूछा की टैक्सी ड्राइवर क्या पूछ रहा था तो पहरेदार ने कहा की वह कर्नल साहब और दूसरों के प्रोग्राम के बारेमें पूछ रहा था। पहरेदार ने बताया की उसे कुछ पता नहीं था और नाही वह कुछ बता सकता था। कुछ देर तक बात करने के बाद ड्राइवर कहीं चला गया। जब कर्नल साहब ने पूछा की क्या वह पहरेदार उस ड्राइवर को जानता था। तब पहरेदार ने कहा की वह उस ड्राइवर को नहीं जानता था। ड्राइवर कहीं बाहर का ही लग रहा था। जब कर्नल साहब ने और पूछा की क्या आगे कोई गांव है, तो पहरेदार ने बताया की वह रास्ता कैंप में आकर ख़तम हो जाता था। आगे कोई गाँव नहीं था।

कर्नल साहब बड़ी उलझन में ड्राइवर के बारेमें सोचते हुए जब रजिस्ट्रेशन कार्यालय वापस आये तब सुनीलजी ने जस्सूजी को गहरी सोच में देखते हुए पाया तो पूछा की क्या बात थी की जस्सूजी इतने परेशान थे?

जस्सूजी ने कहा की ड्राइवर बड़े अजीब तरीके से व्यवहार कर रहा था। ड्राइवर ऐसे पूछताछ कर रहा था जैसे उसको कुछ खबर हासिल करनी हो। कर्नल साहब ने यह भी कहा की जम्मू स्टेशन पर उनको जो मालाएं पहनाई गयीं और फोटो खींची गयी, वैसा कोई प्रोग्राम कैंप की तरफ से नहीं किया गया था। जस्सूजी की समझ में यह नहीं आ रहा था की ऐसा कौन कर सकता है और क्यों? पर उसका कोई जवाब नहीं मिल रहा था।

सुनीलजी ने तर्क किया की हो सकता है की कोई ग़लतफ़हमी से ऐसा हुआ। जस्सूजी ने सोचते सोचते सर हिलाया और कहा, "यह एक इत्तेफाक या संयोग हो सकता है। पर पिछले कुछ दिनों में काफी इत्तेफ़ाक़ हो रहे हैं। मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा। मैं उंम्मीद करता हूँ की यह इत्तेफ़ाक़ ही हो। पर हो सकता है की इसमें कोई सुनियोजित चाल भी हो। सोचना पडेगा।" कर्नल साहब यह कह कर रीसेप्प्शन की और कमरे की व्यवस्था करने के लिए चल पड़े।

सुनीलजी और सुनीता की समझ में कुछ नहीं आया। सब रिसेप्शन की और चल पड़े।

जस्सूजी ने दो कमरे का एक सूट बुक कराया था। सूट में एक कॉमन ड्राइंग रूम था और दोनों बैडरूम के बिच एक दरवाजा था। आप एक रूम से दूसरे रूम में बिना बाहर गए जा सकते हो ऐसी व्यवस्था थी। दोनों बैडरूम में अटैच्ड बाथरूम था। कमरे की खिड़कियों से कुदरत का नजारा साफ़ दिख रहा था। सुनीता ने खिड़की से बाहर देखा तो देखती ही रह गयी। इतना खूबसूरत नजारा उसने पहले कभी नहीं देखा था।

सुनीता ने बड़ी ही उत्सुकता से ज्योतिजी को बुलाया और दोनों हिमालय की बर्फीली चोटियों को देखने में मशगूल हो गए। सुनीलजी पलंग पर बैठे बैठे दोनों महिलाओं की छातियोँ में स्थित चोटियों को और उनके पिछवाड़े की गोलाइयोँ के नशीले नजारों को देखने में मशगूल थे। जस्सूजी उसी पलंग के दूसरे छोर पर बैठे बैठे गहराई से कुछ सोचने में व्यस्त थे।

सुनीता ने ज्योतिजी कैंप के बिलकुल नजदीक में ही एक बहुत ही खूबसूरत झरना बह रहा था उसे दिखाते हुए कहा, "ज्योतिजी यह कितना सुन्दर झरना है। यह झरना उस वाटर फॉल से पैदा हुआ है। काश हमलोग वहाँ जा कर उसमें नहा सकते।"

जस्सूजी ने यह सुन कर कहा, "हम बेशक वहाँ जा कर नहा सकते हैं। वहाँ नहाने पर कोई रोक नहीं है। दर असल कई बार आर्मी के ही लोग वहाँ तैरते और नहाते हैं। वहाँ कैंप वालों ने एक छोटा सा स्विमिंग पूल जैसा ढ़ाँचा बनाया है। आप यहां से घने पेड़ों की वजह से कुछ देख नहीं सकते पर वहाँ बैठने के लिए कुछ बेंच रखे हैं और निचे उतर ने के लिए सीढ़ियां भी बनायी हैं। आपको एक छोटा सा कमरा दिखाई रहा होगा। वह महिलाओं और पुरुषों का कपडे बदलने का अलग अलग कमरा है। वहाँ वाटर फॉल के निचे और झरने में हम सब नहाने जा सकते हैं।"

जस्सूजी ने सुनीलजी को आंख मारते हुए कहा, "अक्सर, वाटर फॉल के पीछे अंदर की और कई बार कुछ कपल्स छुपकर अपना काम भी पूरा कर लेते हैं! पर चूँकि यह कैंप की सीमा से बाहर है, इस लिए कैंप का मैनेजमेंट इस में कोई दखल नहीं देता। हाँ, अगर कोई अकस्मात् होता है तो उसकी जिम्मेदारी भी कैंप का मैनेजमेंट नहीं लेता। पर उसमें वैसे भी पानी इतना ज्यादा गहरा नहीं है की कोई डूब सके। ज्यादा से ज्यादा पानी हमारी छाती तक ही है।"

सुनीता यह सुनकर ख़ुशी के मारे कूदने लगी और ज्योतिजी की बाँहें पकड़ कर बोली, "ज्योतिजी, चलिए ना, आज वहाँ नहाने चलते हैं। मैं इससे पहले किसी झरने में कभी भी नहीं नहायी। अगर हम गए तो आज मैं पहेली बार कोई झरने में नहाउंगी।"

फिर ज्योतिजी की और देख कर शर्माते हुए सुनीता बोली, "ज्योतिजी, प्लीज, मैं आपकी मालिश भी कर दूंगी! प्लीज जस्सूजी को कह कर हम सब उस झरने में आज नहाने चलेंगे ना?"

ज्योतिजी ने अपने पति जस्सूजी की और देखा तो जस्सूजी ने घडी की और देखते हुए कहा, "इस समय करीब बारह बजे हैं। हमारे पास करीब दो घंटे का समय है। डेढ़ से तीन बजे तक आर्मी कैंटीन में लंच खाना मिलता है। अगर चलना हो तो हम इस दो घंटे में वहा जाकर नहा सकते हैं।"

सुनीता जस्सूजी की बात सुनकर इतनी खुश हुई की भागकर छोटे बच्चे की तरह जस्सूजी से लिपटते हुए बोली, "थैंक यू, जस्सूजी! हम जरूर चलेंगे। फिर अपने पति की और देख कर सुनीता बोली, "हम चलेंगे ना सुनीलजी?"

सुनीलजी ने सुनीता का जोश देखकर मुस्कुरा कर तुरंत हामी भरते हुए कहा, "ठीक है, आप इतना ज्यादा आग्रह कर रहे हो तो चलो फिर अपना तौलिया, स्विम सूट बगैरह निकालो और चलो।"

स्विमिंग सूट पहनने की बात सुनकर सुनीता कुछ सोच में पड़ गयी। उसने हिचकिचाते हुए ज्योतिजी के करीब जाकर उनके कानों में फुसफुसाते हुए पूछा, "बापरे! स्विमिंग कॉस्च्यूम पहन कर नहाते हुए मुझे सब देखेंगे तो क्या होगा?"

ज्योतिजी सुनीता की नाक पकड़ कर खींची और कहा, "अभी तो तुम जाने के लिए कूद रही थी? अब एकदम ठंडी पड़ गयी? हमें नहाते हुए कौन देखेगा? और मानलो अगर देख भी लिया तो क्या होगा? भरोसा रखो तुम्हें कोई रेप नहीं करेगा। अभी वहाँ कोई नहीं है। बस हम चार ही तो हैं। फिर इतने घने पेड़ चारों और होने के कारण हमें वहाँ नहाते हुए कोई कहीं से भी नहीं देख सकता। इसी लिए तो जस्सूजी कहते हैं की यहां कई प्यार भरी कहानियों ने जन्म लिया है।"

यह सुन कर सुनीता को कुछ तसल्ली हुई। वह फ़टाफ़ट अपनी सूटकेस खोलने में लग गयी और ज्योतिजी को धक्का देती हुई बड़े प्यार और विनम्रता से बोली, "ज्योतिजी अपने कमरे में जाइये और अपना स्विमिंग कॉस्च्यूम निकालिये ना, प्लीज? चलते हैं ना?"
 
ज्योतिजी सुबह से ही कुछ गंभीर सी दिख रही थीं। पर सुनीता की बचकाना हरकतें देख कर हँस पड़ी और बोली, "ठीक है भाई। चलते हैं। पर तुम मुझे धक्का तो मत मारो।"

सुनीलजी कल्पनाओं की उड़ान में खो रहे थे। वह सोच रहे थे ज्योतिजी जब स्विमींग सूट पहनेंगीं तो अपने स्विमिंग सूट में कैसी लगेंगी? उसदिन वह पहेली बार ज्योतिजी को स्विम सूट में देख पाएंगे। उनके मन में यह बात भी आयी की सुनीता भी स्विमिंग सूट में कमाल की दिखेगी। सुनीलजी सोच रहे थे की उनकी बीबी सुनीता को देख कर जस्सूजी का क्या हाल होगा? इस यात्रा के लिए सुनीलजी ने सुनीता को एक पीस वाला स्विम सूट लाने को कहा था। वह ऐसा था की उसमें सुनीता को देख कर तो सुनीता के पति सुनीलजी का लण्ड भी खड़ा हो जाता था तो जस्सूजी का क्या हाल होगा?

खैर, कुछ ही देर में यह सपना साकार होने वाला था ऐसा लग रहा था। बिना समय गँवाए दोनों जोड़ियाँ अपने तैरने के कपडे साथ में लेकर झरने की और चलदीं। बाहर मौसम एकदम सुहाना था। वातावरण एकदम निर्मल और सुगन्धित था।

सुनीलजी और जस्सूजी मर्दों को कपडे बदलने के रूम में चले गए। पर झरने के पास पहुँचते ही सुनीता जनाना कपडे बदलने के कमरे के बाहर रूक गयी और कुछ असमंजस में पड़ गयी। ज्योतिजी ने सुनीता की और देखा और बोली, "क्या बात है सुनीता? तुम रुक क्यों गयी?"

सुनीता ज्योतिजी के पास जाकर बोली, "ज्योतिजी, मेरा तैरने वाला ड्रेस इतना छोटा है। सुनीलजी ने मेरे लिए इतना छोटा कॉस्च्यूम खरीदा था की मुझे उसको पहन कर जस्सूजी के सामने आने में बड़ी शर्म आएगी। मैं नहाने नहीं आ रही। आप लोग नहाइये। मैं यहां बैठी आपको देखती रहूंगी। और फिर दीदी मुझे तैरना भी तो आता नहीं है।"

ज्योति जी ने सुनीता की बाहें पकड कर कहा, "अरे चल री! अब ज्यादा तमाशा ना कर! तूने ही सबको यहां नहाने के लिए आनेको तैयार किया और अब तू ही नखरे दिखा रही है? देख तूने मुझसे वादा किया था, की तू मेरे पति जस्सूजी से कोई पर्दा नहीं करेगी। किया था की नहीं? याद कर तुम जब मेरी मालिश करने आयी थी तब? तूने कहा था की तुम मेरे पति से मालिश नहीं करवा सकती क्यूंकि तूने तुम्हारी माँ को वचन दिया था। पर तूने यह भी वादा किया था की तुम बाकी कोई भी पर्दा नहीं करेगी? कहा था ना? और जहां तक तुझे तैरना नहीं आता का सवाल है तो जस्सूजी तुझे सीखा देंगे। जस्सूजी तो तैराकी में एक्सपर्ट हैं। मैं भी थोड़ा बहुत तैर लेती हूँ। मुझे पता नहीं सुनीलजी तैरना जानते हैं या नहीं?"

सुनीता मन ही मन में काँप गयी। अगर उस समय ज्योति जो को यह पता चले की सुनीता ने तो ज्योतिजी के पति का लण्ड भी सहलाया था और उनका माल भी निकाल दिया था तो बेचारी दीदी का क्या हाल होगा? और अगर यह वह जान ले की जस्सूजी ने भी सुनीता के पुरे बदन को छुआ था तो क्या होगा?

खैर, सुनीता ने ज्योतिजी की और प्यार भरी नज़रों से देखा और हामी भरते हुए कहा, "हाँ दीदी आप सही कह रहे हो। मैंने कहा तो था। पर मुझे उस कॉस्च्यूम में देख कर कहीं आपके पति जस्सूजी मुझसे कुछ ज्यादा हरकत कर लेंगे तो क्या होगा? मैं तो यह सोच कर ही काँपने लगी हूँ। मेरे पति सुनीलजी भी ऐसे ही हैं। वह तो थोड़ा बहुत तैर लेते हैं।"

ज्योतिजी ने हँस कर कहा, "कुछ नहीं करेंगे, मेरे पति। मैं उनको अच्छी तरह जानती हूँ। वह तुम्हारी मर्जी के बगैर कुछ भी नहीं करेंगे। अगर तुम मना करोगी को तो वह तुम्हें छुएंगे भी नहीं। पर खबरदार तुम उन्हें छूने से मना मत करना! और तुम्हारे पति सुनीलजी को तो मैं तैरना सीखा दूंगी। तू चल अब!"

सुनीता ने हँस कर कहा, "दीदी, मेरी टाँग मत खींचो। मुझे जस्सूजी पर पूरा भरोसा है। वह मेरे जीजाजी भी तो हैं।"

"फिर तो तुम उनकी साली हुई। और साली तो आधी घरवाली होती है।" ज्योतिजी ने सुनीता को आँख मारते हुए कहा।

सुनीता ने ज्योतिजी को कोहनी मारते हुए कहा, "बस करो ना दीदी!" और दोनों जनाना कपडे बदल ने के कमरे में चले गए।

जब सुनीता और ज्योतिजी स्विमिंग कॉस्च्यूम पहन कर बाहर आयीं तब तक सुनीलजी और जस्सूजी भी तैरने वाली निक्कर पहन कर बाहर आ चुके थे।

सुनीता की नजर जस्सूजी पर पड़ी तो वह उन्हें देख कर दंग रह गयी। जस्सूजी शावर में नहा कर पुरे गीले थे। जस्सूजी के कसरती गठित स्नायु वाली पेशियाँ जैसे कोई फिल्म के हीरो के जैसे छह बल पड़े हुए पैक वाले पेट की तरह थीं। उनके बाजुओं के स्नायु उतने शशक्त और उभरे हुए थे की सुनीता मन किया की वह उन्हें सहलाये। जस्सूजी के बिखरे हुए गीले काले घुंघराले घने बाल उनके सर पर कितने सुन्दर लग रहे थे। जस्सूजी के चौड़े सीने पर भी घने काले बाल छाये हुए थे। अपने पति की छाती पर भी कुछ कुछ बाल तो थे, पर सुनीता चाहती थी की उसके पति की छाती पर घने बाल हों। क्यूंकि छाती पर घने बाल सुनीता को काफी आकर्षित करते थे।

पर जब सुनीता की नजर बरबस जस्सूजी की निक्कर की और गयी तो वह देखती ही रह गयी। सुनीता सोच रही थी की शायद उस समय जस्सूजी का लण्ड खड़ा तो नहीं होगा। पर फिर भी जस्सूजी की निक्कर के अंदर उनकी दो जाँघों के बिच इतना जबरदस्त बड़ा उभार था की ऐसा लगता था जैसे जस्सूजी का लण्ड कूद कर बाहर आने के लिए तड़प रहा हो। सुनीता को तो भली भाँती पता था की उस निक्कर में जस्सूजी की जाँघों के बिच उनका कितना मोटा और लंबा लण्ड कोई नाग की तरह चुचाप छोटी सी जगह में कुंडली मारकर बैठा हुआ था और मौक़ा मिलते ही बाहर आने का इंतजार कर रहा था। अगर वह खड़ा हो गया तो शामत ही आ जायेगी।
 
सुनीता ने देखा तो जस्सूजी भी उसे एकटक देख रहे थे। सुनीता को जस्सूजी की नजरें अपने बदन पर देख कर बड़ी लज्जा महसूस हुई। जब उसने कमरे में स्विमिंग कॉस्च्यूम पहन कर आयने में अपने आप को देखा था तो उसे पता था की उसके करारे स्तन उस सूट में कितने बड़े बाहर की और निकले दिख रहे थे। सुनीता की सुआकार गाँड़ पूरी नंगी दिख रही थी। उसके स्विमिंग कॉस्च्यूम की एक छोटी सी पट्टी सुनीता की गाँड़ की दरार में गाँड़ के दोनों गालों के बिच अंदर तक घुसी हुई थी और गाँड़ को छुपाने में पूरी तरह नाकाम थी।

सुनीता जानती थी की उस कॉस्च्यूम में उसकी गाँड़ पूरी नंगी दिख रही थी। सुनीता की गाँड़ के एक गाल पर काला बड़ा सा तिल था। वह भी साफ़ साफ़ नजर आ रहा था। सुनीता की गाँड़ के गालों के बिच में एक हल्का प्यारा छोटा सा खड्डा भी दिखाई देता था। जस्सूजी की नजर उसकी गाँड़ पर गयी यह देख कर सुनीता के पुरे बदन में सिहरन फ़ैल गयी। वह नारी सुलभ लज्जा के कारण अपनी जांघों को एक दूसरे से चिपकाए हुए दोनों मर्दों के सामने खड़ी क्या छिपाने की कोशिश कर रही थी उसे भी नहीं पता था।

आगे सुनीता की चूत पर इतनी छोटी सी उभरी हुई पट्टी थी की उसकी झाँट के बाल अगर होते तो साफ़ साफ़ दीखते। सुनीता ने पहले से ही अपन झाँटों के बाल साफ़ किये थे। सुनीता की चूत का उभार उस कॉस्च्यूम में छिप नहीं सकता था। बस सुनीता की चूत के होँठ जरूर उस छोटी सी पट्टी से ढके हुए थे।

सुनीता शुक्र कर रही थी वह उस समय पूरी तरह गीली थी, क्यूंकि जस्सूजी की जांघों के बिच उन का लम्बा लण्ड का आकार देख कर उसकी जाँघों के बिच से उसकी चूत में से उस समय उसका स्त्री रस चू रहा था। अगर सुनीता उस समय गीली नहीं होती तो दोनों मर्द सुनीता की जाँघों के बिच से चू रहे स्त्री रस को देख कर यह समझ जाते की उस समय वह कितनी गरम हो रही थी।

सुनीता ने अपने पति की और देखा तो वह ज्योतिजी को निहारने में ही खोए हुए थे। स्विमिंग कॉस्च्यूम में ज्योतिजी क़यामत सी लग भी तो रहीं थीं। ज्योतिजी की जाँघें कमाल की दिख रहीं थीं। उन दो जांघों के बिच की उनकी चूत के ऊपर की पट्टी बड़ी मुश्किल से उनकी चूत की खूबसूरती का राज छुपा रहीं थीं। उनकी लम्बी और माँसल जांघें जैसे सारे मर्दों के लण्ड को चुनौती दे रही थीं। वहीँ उनकी नंगी गाँड़ की गोलाई सुनीता की गाँड़ से भी लम्बी होने के कारण कहीं ज्यादा खूबसूरत लग रही थीं।

ज्योतिजी के घने और घुंघराले गीले बाल उनके पुरे चेहरे पर बिखरे हुए थे, उन्हें वह ठीक करने की कोशिश में लगी हुई थीं। उनकी पतली और लम्बी कमर निचे ज़रा सा पेट उसके निचे अचानक ही फुले हुए नितम्बोँ के कारण गिटार की तरह खूबसूरत लग रहा था। सुनीता और ज्योतिजी के स्तन मंडल एक सरीखे ही लग रहे थे। हालांकि ज्योतिजी का गिला कॉस्च्यूम थोड़ा ज्यादा महिम होने के कारण उनकी दो गोलाकार चॉकलेटी रंग के एरोला के बिच में स्थित फूली हुई गुलाबी निप्पलोँ की झाँखी दे रहा था।

ज्योति की नीली आँखें शरारती होते हुए भी उनकी गंभीरता दर्शा रहीं थीं। सब से ज्यादा कामोत्तेजक ज्योतिजी के होँठ थे। उन होँठों को मोड़कर कटाक्ष भरी आँखों से देखने की ज्योतिजी की अदा जवाँ मर्दों के लिए जान लेवा साबित हो सकती थीं। जस्सूजी उस बात का जीता जागता उदाहरण थे।

दोनों कामिनियाँ अपने हुस्न की कामुकता के जादू से दोनों मर्दों को मन्त्रमुग्ध कर रहीं थीं। सुनीलजी तो ज्योतिजी के बदन से आँखें ऐसे गाड़े हुए थे की सुनीता ने उनका हाथ पकड़ कर उन्हें हिलाया और कहा, "चलोजी, हम झरने की और चलें?" तब कहीं जा कर सुनीलजी इस धराधाम पर वापस लौटे।

सुनीता अपने पति सुनीलजी से चिपक कर ऐसे चल रही थी जिससे जस्सूजी की नजर उसके आधे नंगे बदन पर ना पड़े। ज्योतिजी को कोई परवाह नहीं थी की सुनीलजी उनके बदन को कैसे ताड़ रहे थे। बल्कि सुनीलजी की सहूलियत के लिए ज्योति अपनी टांगों को फैलाकर बड़े ही सेक्सी अंदाज में अपने कूल्हों को मटका कर चल रही थी जिससे सुनीलजी को वह अपने हुस्न की अदा का पूरा नजारा दिखा सके।

सुनीलजी का लण्ड उनकी निक्कर में फर्राटे मारा रहा था। दोनों कामिनियों का जादू दोनों मर्दों के दिमाग में कैसा नशा भर रहा था वह सुनीलजी ने देखा भी और महसूस भी किया। सुनील बार बार अपनी निक्कर एडजस्ट कर अपने लण्ड को सीधा और शांत रखने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। ज्योतिजी ने उनसे काफी समय से कुछ भी बात नहीं की थी। इस वजह से उन्हें लगा था की शायद ज्योति उनसे नाराज थीं।

सुनीलजी जानने के लिए बेचैन थे की क्या वजह थी की ज्योतिजी उनसे बात नहीं कर रही थी। जैसे ही ज्योतिजी झरने की और चल पड़ी, सुनीलजी भी सुनीता को छोड़ कर भाग कर ज्योति के पीछे दौड़ते हुए चल दिए और ज्योतिजी के साथ में चलते हुए झरने के पास पहुंचे। सुनीता अपने पति के साथ चल रही थी। पर अपने पति सुनीलजी को अचानक ज्योतिजी के पीछे भागते हुए देख कर उसे अकेले ही चलना पड़ा।

सुनीता के बिलकुल पीछे जस्सूजी आ रहे थे। सुनीता जानती थी की उसके पीछे चलते हुए जस्सूजी चलते चलते सुनीता के मटकते हुए नंगे कूल्हों का आनंद ले रहे होंगे। सुनीता सोच रही थी पता नहीं उस की नंगी गाँड़ देख कर जस्सूजी के मन में क्या भाव होते होंगे? पर बेचारी सुनीता, करे तो क्या करे? उसी ने तो सबको यहाँ आकर नहाने के लिए बाध्य किया था।

सुनीता भलीभांति जानती थी की जस्सूजी भले कहें या ना कहें, पर वह उसे चोदने के लिए बेताब थे। सुनीता ने भी जस्सूजी के लण्ड जैसा लण्ड कभी देखा क्या सोचा भी नहीं था। कहीं ना कहीं उसके मन में भी जस्सूजी के जैसा मोटा और लंबा लण्ड अपनी चूत में लेनेकी ख्वाहिश जबरदस्त उफान मार रही थी। सुनीता के मन में जस्सूजी के लिए इतना प्यार उमड़ रहा था की अगर उसकी माँ के वचन ने उसे रोका नहीं होता तो वह शायद तब तक जस्सूजी से चुदवा चुदवा कर गर्भवती भी हो गयी होती।
 
आगे आगे ज्योतिजी उनके बिलकुल पीछे ज्योतिजी से सटके ही सुनील जी, कुछ और पीछे सुनीता और आखिर में जस्सूजी चल पड़े। थोड़ी पथरीली और रेती भरी जमीन को पार कर वह सब झरने की और जा रहे थे। सुनीलजी ने ज्योतिजी से पूछा, "आखिर बात क्या है ज्योतिजी? आप मुझसे नाराज हैं क्या?"

ज्योतिजी ने बिना पीछे मुड़े जवाब दिया, "भाई, हम कौन होते हैं , नाराज होने वाले?"

सुनीलजी ने पीछे देखा तो सुनीता और जस्सूजी रुक कर कुछ बात कर रहे थे। सुनील ने एकदम ज्योतिजी का हाथ थामा और रोका और पूछा, "क्या बात है, ज्योतिजी? प्लीज बताइये तो सही?"

ज्योतिजी की मन की भड़ास आखिर निकल ही गयी। उन्होंने कहा, "हाँ और नहीं तो क्या? आपको क्या पड़ी है की आप सोचें की कोई आपका इंतजार कर रहा है या नहीं? भाई जिसकी बीबी सुनीता के जैसी खुबसुरत हो उसे किसी दूसरी ऐसी वैसी औरत की और देखने की क्या जरुरत है?"

सुनीलजी ने ज्योतिजी का हाथ पकड़ा और दबाते हुए बोले, "साफ़ साफ़ बोलिये ना क्या बात है?"

ज्योति ने कहा, "साफ़ क्या बोलूं? क्या मैं सामने चल कर यह कहूं, की आइये, मेरे साथ सोइये? मुझे चोदिये?"

सुनीलजी का यह सुनकर माथा ठनक गया। ज्योतिजी क्या कह रहीं थीं? उतनी देर में वह झरने के पास पहुँच गए थे, और पीछे पीछे सुनीता और जस्सूजी भी आ रहे थे। ज्योति ने सुनील की और देखा और कहा, "अभी कुछ मत बोलो। हम तैरते तैरते झरने के उस पार जाएंगे। तब सुनीता और जस्सूजी से दूर कहीं बैठ कर बात करेंगे।"

फिर ज्योति ने अपने पति जस्सूजी की और घूम कर कहा, "डार्लिंग, यह तुम्हारी चेली सुनीता को तैरना भी नहीं आता। अब तुम्हें मैथ्स के अलावा इसे तैरना भी सिखाना पडेगा। तुमने इससे मैथ्स सिखाने की तो कोई फ़ीस नहीं ली थी। पर तैरना सिखाने के लिए फ़ीस जरूर लेना। आप सुनीता को यहाँ तैरना सिखाओ। मैं और सुनीलजी वाटर फॉल का मजा लेते हैं।"

यह कह कर ज्योतिजी आगे चल पड़ी और सुनीलजी को पीछे आने का इशारा किया।

ज्योतिजी और सुनीलजी झरने में कूद पड़े और तैरते हुए वाटर फॉल के निचे पहुँच कर उंचाइसे गिरते हुए पानी की बौछारों को अपने बदन पर गिरकर बिखरते हुए अनुभव करने का आनंद ले रहे थे। हालांकि वह काफी दूर थे और साफ़ साफ़ दिख नहीं रहा था पर सुनीता ने देखा की ज्योतिजी एक बार तो पानी की भारी धार के कारण लड़खड़ाकर गिर पड़ी और कुछ देर तक पानी में कहीं दिखाई नहीं दीं। उस जगह पानी शायद थोड़ा गहरा होगा। क्यूंकि इतने दूर से भी सुनीलजी के चेहरे पर एक अजीब परेशानी और भय का भाव सुनीता को दिखाई दिया। सुनीता स्वयं परेशान हो गयी की कहीं ज्योतिजी डूबने तो नहीं लगीं।

पर कुछ ही पलों में सुनीता ने चैन की साँस तब ली जब जोर से इठलाते हँसते हुए ज्योतिजी ने पानी के अंदर से अचानक ही बाहर आकर सुनीलजी का हाथ पकड़ा और कुछ देर तक दोनों पानी में गायब हो गए। सुनीता यह जानती थी की ज्योतिजी एक दक्ष तैराक थीं। यह शिक्षा उन्हें अपने पति जस्सूजी से मिली थी।

सुनीता ने सूना था की जस्सूजी तैराकी में अव्वल थे। उन्होंने कई आंतरराष्ट्रीय तैराकी प्रतियोगिता में इनाम भी पाए थे। सुनीता ने जस्सूजी की तस्वीर कई अखबारों में और सेना और आंतरराष्ट्रीय खेलकूद की पत्रिकाओं में देखि थी। उस समय सुनीता गर्व अनुभव कर रही थी की उस दिन उसे ऐसे पारंगत तैराक से तैराकी के कुछ प्राथमिक पाठ सिखने को मिलेंगे। सुनीता को क्या पता था की कभी भविष्य में उसे यह शिक्षा बड़ी काम आएगी।

फिलहाल सुनीता की आँखें अपने पति और ज्योतिजी की जल क्रीड़ा पर टिकी हुई थीं। उनदोनों के चालढाल को देखते हुए सुनीता को यकीन तो नहीं था पर शक जरूर हुआ की उस दोपहर को अगर उन्हें मौक़ा मिला तो उसके पति सुनीलजी उस वाटर फॉल के निचे ही ज्योतिजी की चुदाई कर सकते हैं। यह सोचकर सुनीता का बदन रोमांचित हो उठा। यह रोमांच उत्तेजना या फिर स्त्री सहज इर्षा के कारण था यह कहना मुश्किल था।

सुनीता के पुरे बदन में सिहरन सी दौड़ गयी। सुनीता भलीभांति जानती थी की उसके पति अच्छे खासे चुदक्कड़ थे। सुनीलजी को चोदने में महारथ हासिल था। किसी भी औरत को चोदते समय, वह अपनी औरत को इतना सम्मान और आनंद देते थे की वह औरत एक बार चुदने के बाद उनसे बार बार चुदवाने के लिए बेताब रहती थी। जब सुनीता के पति सुनीलजी अपनी पत्नी सुनीता को चोदते थे तो उनसे चुदवाने में सुनीता को गझब का मजा आता था।

सुनीता ने कई बार दफ्तर की पार्टियों में लड़कियों को और चंद शादी शुदा औरतों को भी एक दूसरी के कानों में सुनीलजी की चुदाई की तारीफ़ करते हुए सूना था। उस समय उन लड़कियों और औरतों को पता नहीं था की उनके बगल में खड़ीं सुनीता सुनीलजी की बीबी थी।

शायद आज उसके पति सुनीलजी उसी जोरदार जस्बे से ज्योतिजी की भी चुदाई कर सकते हैं, यह सोच कर सुनीता के मन में इर्षा, उत्तेजना, रोमांच, उन्माद जैसे कई अजीब से भाव हुए।

सुनीता की चूत तो पुरे वक्त झरने की तरह अपना रस बूँद बूँद बहा ही रही थी। अपनी दोनों जाँघों को एक दूसरे से कस के जोड़कर सुनीता उसे छिपाने की कोशिश कर रही थी ताकि जस्सूजी को इसका पता ना चले।

सुनीता झरने के किनारे पहुँचते ही एक बेंच पर जा कर अपनी दोनों टाँगे कस कर एक साथ जोड़ कर बैठ गयी। जस्सूजी ने जब सुनीता को नहाने के लिए पानी में जाने से हिचकिचाते हुए देखा तो बोले, "क्या बात है? वहाँ क्यों बैठी हो? पानीमें आ जाओ।"

सुनीता ने लजाते हुए कहा," जस्सूजी, मुझे आपके सामने इस छोटी सी ड्रेस में आते हुए शर्म आती है। और फिर मुझे पानी से भी डर लगता है। मुझे तैरना नहीं आता।"

जस्सूजी ने हँसते हुए कहा, "मुझसे शर्म आती है? इतना कुछ होने के बाद अब भी क्या तुम मुझे अपना नहीं समझती?"

जब सुनीता ने जस्सूजी की बात का जवाब नहीं दिया तो जस्सूजी का चेहरा गंभीर हो गया। वह उठ खड़े हुए और पानी के बाहर आ गए। बेंच पर से तौलिया उठा कर अपना बदन पोंछते हुए कैंप की और जाने के लिए तैयार होते हुए बोले, "सुनीता देखिये, मैं आपकी बड़ी इज्जत करता हूँ। अगर आप को मेरे सामने आने में और मेरे साथ नहाने में हिचकिचाहट होती है क्यूंकि आप मुझे अपना करीबी नहीं समझतीं तो मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूँ। मैं यहां से चला जाता हूँ। आप आराम से ज्योति और सुनीलजी के साथ नहाइये और वापस कैंप में आ जाइये। मैं आप सब का वहाँ ही इंतजार करूंगा।"

यह कह कर जब जस्सूजी खड़े हो कर कैंप की और चलने लगे तब सुनीता भाग कर जस्सूजी के पास पहुंची। सुनीता ने जस्सूजी को अपनी बाहों में ले लिया और वह खुद उनकी बाँहों में लिपट गयी। सुनीता की आँखों से आंसू बहने लगे।
 
Back
Top