• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Erotica साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन complete

जस्सूजी को ठण्ड ना लगे इस लिए सुनीता ने एक और रक्खी एक चद्दर और उसके ऊपर रक्खा पड़ा हुआ कम्बल खिंच निकाला और जस्सूजी के पुरे शरीर को उस कम्बल से ढक दिया। कम्बल के निचे एक चद्दर भी लगा दी। वही कम्बल और चद्दर का दुसरा छोर अपनी गोद और छाती पर भी डाल दिया। इस तरह ठण्ड से थोड़ी राहत पाकर सुनीता प्यार से जस्सूजी की टाँगों को अपनी गोद में रख कर उस पर हाथ फिरा कर हल्का सा मसाज करने लगी।

उसे जस्सूजी के पाँव अपनी गोद में पाकर अच्छा लग रहा था। उसे अपने गुरु और अपने प्यारे प्रेमी की सेवा करने का मौक़ा मिला था। वह उन दिनों को याद करने लगी जब वह अपने पिताजी के पॉंव तब तक दबाती रहती थी जब तक वह सो नहीं जाते थे।

पाँव दबाते हुए सुनीता जस्सूजी की और सम्मान और प्यार भरी नज़रों से देखती रहती थी। उसे जस्सूजी के पाँव अपनी गोद में रखने में कोई भी झिझक नहीं महसूस हुई।

सुनीता ने अपनी टांगें भी लम्बीं कीं और अपने पति सुनीलजी की गोद में रख दीं। सुनीलजी खर्राटे मार रहे थे। कुछ पल के लिए वह उठ गए और उन्होंने आँखें खोलीं जब उन्होंने अपनी पत्नी की टाँगें अपनी गोद में पायीं।

उन्होंने सुनीता की और देखा। उन्होंने देखा की जस्सूजी की टाँगें उनकी पत्नी सुनीता की गोद में थीं और सुनीता उन्हें हलके से मसाज कर रही थी। सुनीता ने देखा की वह कुछ मुस्काये और फिर आँखें बंद कर अपनी नींद की दुनिया में वापस चले गए।

सुनीता जस्सूजी की टाँगों को सेहला और दबा रही थी तब उसे जस्सूजी के हाथ का स्पर्श हुआ। जस्सूजी ने कम्बल के निचे से अपना एक हाथ लंबा कर सुनीता के हाथ को हलके से थामा और धीरे से उसे दबा कर ऊपर की और खिसका कर उसे अपनी दो जाँघों के बिच में रख दिया। सुनीता समझ गयी की जस्सूजी चाहते थे की सुनीता जस्सूजी के लण्ड को अपने हाथोँ में पकड़ कर सहलाये। सुनीता जस्सूजी की इस हरकत से चौंक गयी। वह इधर उधर दिखने लगी। सब गहरी नींद सो रहे थे।

सुनीता का हाल देखने जैसा था। सुनीता ने जब चारों और देखा तो पाया की कम्बल के निचे की उनकी हरकतों को और कोई आसानी से नहीं देख सकता था। सारे परदे फैले हुए होने के कारण अंदर काफी कम रौशनी थी। करीब करीब अँधेरा जैसा ही था।

सुनीता ने धीरे से अपना हाथ ऊपर की और किया और थोड़ा जस्सूजी की और झुक कर जस्सूजी के लण्ड को उनकी पतलून के ऊपर से ही अपने हाथ में पकड़ा। जस्सूजी का लण्ड अभी पूरा कड़क नहीं हुआ था। पर बड़ी जल्दी कड़क हो रहा था। सुनीता ने चारोँ और सावधानी से देख कर जस्सूजी के पतलून की ज़िप ऊपरकी और खिसकायी और बड़ी मशक्कत से उनकी निक्कर हटा कर उनके लण्ड को आज़ाद किया और फिर उस नंगे लण्ड को अपने हाथ में लिया।

सुनीता के हाथ के स्पर्श मात्र से जस्सूजी का लण्ड एकदम टाइट और खड़ा हो गया और अपना पूर्व रस छोड़ने लगा। सुनीता का हाथ जस्सूजी के पूर्व रस की चिकनाहट से लथपथ हो गया था। सुनीता ने अपनी उँगलियों की मुट्ठी बना कर उसे अपनी छोटी सी उँगलियों में लिया। वह जस्सूजी का पूरा लण्ड अपनी मुट्ठी में तो नहीं ले पायी पर फिर भी जस्सूजी के लण्ड की ऊपरी त्वचा को दबा कर उसे सहलाने और हिलाने लगी।

सुनीता ने जस्सूजी के चेहरे की और देखा तो वह अपनी आँखें मूँदे सुनीता के हाथ में अपना लण्ड सेहलवा कर अद्भुत आनंद महसूस कर रहे थे ऐसा सुनीता को लगा। सुनीता ने धीरे धीरे जस्सूजी का लण्ड हिलाने की रफ़्तार बढ़ाई। सुनीता चाहती थी की इससे पहले की कोई जाग जाए, वह जस्सूजी का वीर्य निकलवादे ताकि किसीको शक ना हो।

सुनीता के हाथ बड़ी तेजी से ऊपर निचे हो रहे थे। सुनीता ने कम्बल और चद्दर को मोड़ कर उसकी कुछ तह बना कर ख़ास ध्यान रक्खा की उसके हाथ हिलाने को कोई देख ना पाए। सुनीता जस्सूजी के लण्ड को जोर से हिलाने लगी। सुनीता का हाथ दुखने लगा था। सुनीता ने देखा की जस्सूजी के चेहरे पर एक उन्माद सा छाया हुआ। थोड़ी देर तक काफी तेजी से जस्सूजी का लण्ड हिलाने पर सुनीता ने महसूस किया की जस्सूजी पूरा बदन अकड़ सा गया। जस्सूजी अपना वीर्य छोड़ने वाले थे।

सुनीता ने धीरे से अपनी जस्सूजी के लण्ड को हिलाने की रफ़्तार कम की। जस्सूजी के लण्ड के केंद्रित छिद्र से उनके वीर्य की पिचकारी छूट रही थी। सुनीता को डर लगा की कहीं जस्सूजी के वीर्य से पूरी चद्दर गीली ना हो जाए। सुनीता ने दूसरे हाथ से अपने पास ही पड़ा हुआ छोटा सा नेपकिन निकाला और उसे दूसरे हाथ में देकर अपने हाथ की मुट्ठी बना कर उनका सारा वीर्य अपनी मुट्ठी में और उस छोटे से नेपकिन में भर लिया। नेपकिन भी जस्सूजी के वीर्य से पूरा भीग चुका था।

जस्सूजी के लण्ड के चारों और अच्छी तरह से पोंछ कर सुनीता ने फिर से उनका नरम हुआ लण्ड और अपना हाथ दूसरे नेपकिन से पोंछा और फिर जस्सूजी के लण्ड को उनकी निक्कर में फिर वही मशक्कत से घुसा कर जस्सूजी की पतलून की ज़िप बंद की। उसे यह राहत थी की उसे यह सब करते हुए किसीने नहीं देखा था।

जस्सूजी को जरुरी राहत दिला कर सुनीता ने अपनी आँखें मुँदीं और सोने की कोशिश करने लगी।

ज्योतिजी पहले से ही एक तरफ करवट ले कर सो रही थीं। शायद वह रात को पूरी तरह ठीक से सो नहीं पायीं थीं। ज्योतिजी ने अपनी टाँगें लम्बीं और टेढ़ी कर रखीं थीं जो सुनीलजी की जाँघों को छू रही थीं।
 
सुनीता जब आधी अधूरी नींद में थी तब उसे कुमार और नीतू की कानाफूसी सुनाई दी। सुनीता समझ गयी की कुमार नीतू को फाँसने की कोशिश में लगा था। नीतू भी उसे थोड़ी सी ढील दे रही थी। दरअसल नीतू और कुमार साइड वाली बर्थ लम्बी ना करके बर्थ को ऊपर उठा कर दो कुर्सियां बना कर आमने सामने बैठे थे। नीतू और कुमार का परिचय हो चुका था। पर शायद नीतू ने अपनी पूरी कहानी कुमार को नहीं सुनाई थी। नीतू ने यह नहीं जाहिर किया था की वह शादी शुदा थी।

वैसे भी नीतू को देखने से कोई यह नहीं कह सकता था की वह शादीशुदा थी। नीतू ने अपने चेहरे पर कोई भी ऐसा निशान नहीं लगा रखा था। ना ही माँग में सिंदूर और नाही कोई मंगल सूत्र। नीतू ने ऊपर सफ़ेद रंग का टॉप पहना था। उसका टॉप ब्लाउज कहो या स्लीवलेस शर्ट कहो, नीतू के उन्नत स्तनोँ के उभार को छुपाने में पूरी तरह नाकाम था। नीतू के टॉप में से उसके स्तन ऐसे उभरे हुए दिख रहे थे जैसे दो बड़े पहाड़ उसकी छाती पर विराजमान हों।

नीतू ने निचे घाघरा सा खुबसुरत नक्शबाजी वाला लंबा फैला हुआ मैक्सी स्कर्ट पहना था जो नीतू की एड़ियों तक था। नीतू ने अपने लम्बे घने बालों को घुमा कर कुछ क्लिपों में बाँध रखे थे। होठोँ पर हलकी लिपस्टिक उसके होठोँ का रसीलापन उजागर कर रही थी।

नीतू की लम्बी गर्दन और चाँद सा गोल चेहरा, जिस पर उसकी चंचल आँखें उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगाती थी। नीतू की गाँड़ का उभार अतिशय रमणीय था। पतली कमर के निचे अचानक उदार फैलाव से वह सब मर्दो की आँखों के आकर्षण का केंद्र हुआ करता था। जब नीतू चलती थी तो उसकी गाँड़ का मटकना अच्छेअच्छों का पानी निकाल सकता था।

जब कभी थोडासा भी हवा का झोंका आता तो नितुका घाघरा नीतू के दोनों पाँव के बिच में घुस जाता और नीतू की दोनों जाँघों के बिच स्थित चूत कैसी होगी यह कल्पना कर अच्छे अच्छे मर्द का मुठ मारने का मन करता था। नीतू की जाँघें सीधी और लम्बी थीं। नीतू कोई भी भारतीय नारी से कुछ ज्यादा ही लम्बी होगी। उसकी लम्बाई के कारण नीतू का गठीला बदन भी एकदम पतला लगता था।

हम उम्र होने के अलावा एक दूसरे से पहली नजर से ही जातीय आकर्षण होने के कारण कुमार और नीतू दोनों एक दूसरे से कुछ अनौपचारिकता से बातें कर रहे थे। सुनीता को जो सुनाई दिया वह कुछ ऐसा था।

कुमार: "नीतू, आप गजब की ख़ूबसूरत हो।"

नीतू: "थैंक यू सर। आप भी तो हैंडसम हो!"

कुमार: "अरे कहाँ? अगर मैं आपको हैंडसम लगता तो आप मेरे करीब आने से क्यों झिझकतीं?"

नीतू: "क्या बात करते हैं? मैं आपके करीब ही तो हूँ।"

कुमार ने अपनी टांगों की नीतू की टांगों से मिलाया और बोला, "देखो हमारे बिच इतना बड़ा फासला है।"

नीतू: "फासला कहाँ है? आप की टाँगें मेरी टाँगों को टच तो कर रहीं हैं।"

कुमार: "सिर्फ टाँगें ही तो टच कर रहीं है। हमारे बदन तो दूर हैं ना?"

नीतू: "कमाल है, कप्तान साहब! अभी हमें मिले दो घंटे भी हुए नहीं और आप हमारे बदन एक दूसरे से मिलाने का ख्वाब देख रहे हो?"

कुमार: "क्यों भाई? क्या ख्वाब देखने पर की कोई पाबंदी है? और मान लो हमें मिले हुए एक दिन पूरा हो गया होता तो क्या होता?""

नीतू: "नहीं कप्तान साहब ख्वाब देखने पर कोई पाबंदी नहीं है। आप जरूर ख्वाब देखिये। जब ख्वाब ही देखने है तो कंजूसी कैसी? और जहां तक मिलने के एक दिन के बाद की बात है तो वह तो एक दिन बीतेगा तब देखेंगे। अभी तो सिर्फ शुरुआत है। अभी से इतनी बेसब्री क्यों?"

कुमार: "क्या मतलब?"

नीतू: "अरे जब ख्वाब ही देखने हैं तो फिर ख्वाब में सब कुछ ही देखिये। खाली बदन एक दूसरे से करीब आये यही क्यों रुकना भला? ख्वाब पर कोई लगाम लगाने की क्या जरुरत है? हाँ ख्वाब के बाहर जो असली दुनिया है, वहाँ सब्र रखना जरुरी है।"
 
कुमार: "मोहतरमा, आप कहना क्या चाहती हो? मैं ख्वाब में क्या देखूं? जहां तक सब्र का सवाल है तो मैं यह मानता हूँ की मुझमें सब्र की कमी है।"

नीतू: "कमाल है कप्तान साहब! अब मुझे ही बताना पडेगा की आप ख्वाब में क्या देखो? भाई देश आजाद है। जो देखना हो वह ख्वाब में देख सकते हो। मुझे क्या पता आप ख्वाब में क्या देखना चाहते हो? पर ख्वाब की दुनिया और असलियत में फर्क होता है।"

कुमार: "मैं बताऊँ मैं ख्वाब में क्या देखना चाहता हूँ?''

नीतू: "फिर वही बात? भाई जो देखना चाहो देखो। बताओ, क्या देखना चाहते हो?"

कुमार: "अगर मैं सच सच बोलूं तो आप बुरा तो नहीं मानोगे?"

नीतू: "कमाल है! आप ख्वाब देखो तो उसमें मुझे बुरा मानने की क्या बात है? कहते हैं ना, की नींद तुम्हारी ख्वाब तुम्हारे। बताओ ना क्या ख्वाब देखना चाहते हो?"

कुमार: "हाँ यह तो सही कहा आपने। तो मैं ख्वाब देखना चाहता हूँ की आप मेरी बाँहों में हो और मैं आपको खूब प्यार कर रहा हूँ।"

नीतू: "अरे! अभी तो हम ढंग से मिले भी नहीं और आप मुझे बाँहों में ले कर प्यार करने के ख्वाब देखने लगे?"

कुमार: "आपने ही तो कहा था की ख्वाब देखने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है? जहां तक ढंग से मिलने का सवाल है तो बताइये ना हम कैसे ढंग से मिल सकते हैं?"

नीतू: "ढंग से मिलने का मतलब है आपस में एक दूसरे को जानना एक दूसरे के करीब आने के लिए समय निकालना, एक दूसरे की ख़ुशी और भले के लिए कुछ बलिदान करना, बगैरह बगैरह। हाँ, मैंने कहा तो था ख्वाब देखने पर कोई पाबंदी नहीं है, पर ख्वाब भी सोच समझ कर देखने चाहिए।"

कुमार: "क्या आप सोच समझ कर ख्वाब देखते हो? क्या ख्वाब पर हमारा कोई कण्ट्रोल होता है क्या?"

नीतू कुमार की बात सुनकर चुप हो गयी। उसके चेहरे पर गंभीरता दिखाई पड़ी। नीतू की आँखें कुछ गीली से हो गयीं। कुमार को यह देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ। वह नीतू को चुपचाप देखता रहा। सुनीता के चेहरे पर मायूसी देख कर कुमार ने कहा, "मुझे माफ़ करना नीतूजी, अगर मैंने कुछ ऐसा कह दिया जिससे आपको कोई दुःख हुआ हो। मैं आपको किसी भी तरह का दुःख नहीं देना चाहता।"

नीतू ने अपने आपको सम्हालते हुए कहा, "नहीं कप्तान साहब ऐसी कोई बात नहीं। जिंदगी में कुछ ऐसे मोड़ आते हैं जिन्हें आपको झेलना ही पड़ता है और उन्हें स्वीकार कर चलने में ही सबकी भलाई है।"

कुमार: "नीतूजी, पहेलियाँ मत बुझाइये। कहिये क्या बात है।"

नीतू ने बात को मोड़ देकर कुमार के सवाल को टालते हुए कहा, "कप्तान साहब मैं आपसे छोटी हूँ। आप मुझे नीतूजी कह कर मत बुलाइये। मेरा नाम नीतू है और मुझे आप नीतू कह कर ही बुलाइये।"

नीतू ने फिर अपने आपको सम्हाला। थोड़ा सा सोचमें पड़ने के बाद नीतू ने शायद मन ही मन फैसला किया की वह कुमार को अपनी असलियत (की वह शादी शुदा है) उस वक्त नहीं बताएगी।

कुमार: "तो फिर आप भी सुनिए। आप मुझे कप्तान साहब कह कर मत बुलाइये। मेरा नाम कुमार है। आप मुझे सिर्फ कुमार कह कर ही बुलाइये।"
 
नीतू का मन डाँवाडोल हो रहा था। वह कुमार के साथ आगे बढे या नहीं? पति (ब्रिगेडियर साहब) ने तो उसे इशारा कर ही दिया था की नीतू को अगर कहीं कुछ मौक़ा मिले तो उसे चोरी छुपी शारीरिक भूख मिटाने से उनको कोई आपत्ति नहीं होगी, बशर्ते की सारी बात छिपी रहे। नीतू के लिए यह अनूठा मौक़ा था। उसका मनपसंद हट्टाकट्टा हैंडसम नवयुवक उसे ललचा कर, फाँस कर, उससे शारीरिक सम्बन्ध बनानेकी ने भरसक कोशिश में जुटा हुआ था।

अब नीतू पर निर्भर था की वह अपना सम्मान बनाये रखते हुए उस युवक को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करे या नहीं। नीतू ने सोचा यह पहली बार हुआ था की इतना हैंडसम युवक उसे ललचा कर फाँसने की कोशिश कर रहा था। पहले भी कई युवक नीतू को लालच भरी नजर से तो देखते थे, पर किसीभी ऐसे हैंडसम युवक ने आगे बढ़कर उसके करीब आकर उसे ललचाने की इतनी भरसक कोशिश नहीं की थी।

फिर भी भला वह कैसे अपने आप आगे बढ़ कर किसी युवक को कहे की "आओ और मेरी शारीरिक भूख मिटाओ?" आखिर वह भी तो एक मानिनी भारतीय नारी थी। उसे भी तो अपना सम्मान बनाये रखना था।

काफी सोचने के बाद नीतू ने तय किया की जब मौक़ा मिला ही है तो क्यों ना उसका फायदा उठाया जाए? यह मौक़ा अगर चला गया तो फिर तो उसे अपने हाथोँ की उँगलियों से ही काम चलाना पड़ेगा। एक दिन की चाँदनी आयी है फिर तो अँधेरी रात है ही।

नीतू ने अपनी आँखें नचाते हुए कहा, "कप्तान साहब, सॉरी कुमारजी, शायद आप ख्वाब और असलियत का फर्क नहीं समझते।"

कुमार ने आगे बढ़कर नीतू का हाथ थामा और कहा, "आप ही बताइये ना? मैं तो नौसिखिया हूँ।"

जैसे ही कुमार ने नीतू का हाथ थामा तो नीतू के पुरे बदन में एक बिजली सी करंट मार गयी। नीतू के रोंगटे खड़े हो गए। उस दिन तक ब्रिगेडियर साहब को छोड़ किसीने भी नीतू का हाथ इस तरह नहीं थामा था। नीतू हमेशा यह सपना देखती रहती थी कोई हृष्टपुष्ट युवक उसको अपनी बाँहों में थाम कर उसको गहरा चुम्बन कर, उसकी चूँचियों को अपने हाथ में मसलता हुआ उसे निर्वस्त्र कर उसकी चुदाई कर रहा है।

नीतू को अक्सर सपने में वही युवक बारबार आता था और नीतू का पूरा बदन चूमता, दबाता और मसलता था। कई बार नीतू ने महसूस किया था की वह युवक उसकी गाँड़ की दरार में अपनी उंगलियां डाल कर उसे उत्तेजना और उन्माद के सातवे आसमान पर उठा लेता था।

नीतू ने ध्यान से देखा तो उसे लगा की कहीं ना कहीं कुमार की शक्ल और उसका बदन भी वही युवक जैसा था।

कुमार ने देखा की जब उसने नीतू का हाथ थामा और नीतू ने उसका कोई विरोध नहीं किया और नीतू अपने ही विचारो में खोयी हुई कुमार के चेहरे की और एकटक देख रही थी, तब उसकी हिम्मत और बढ़ गयी। उसने नीतू को अपनी और खींचते हुए कहा, "क्या देख रही हो, नीतू? क्या मैं भद्दा और डरावना दिखता हूँ? क्या मुझमें तुम्हें कोई बुराई नजर आ रही है?"

नीतू अपनी तंद्रा से जाग उठी और कुमार की और देखती हुई बोली, "नहीं, ऐसी कोई बात नहीं, क्यों?"

कुमार: "देखो, सब सो रहे हैं। हम जोर से बात नहीं कर सकते। तो फिर मेरे करीब तो बैठो। अगर मैं तुम्हें भद्दा और डरावना नहीं लगता और अगर हमारा पहला परिचय हो चुका है तो फिर इतना दूर बैठने की क्या जरुरत है?"

नीतू: "अरे कमाल है। भाई यह सीट ही ऐसी है। इसके रहते हुए हम कैसे साथ में बैठ सकते हैं? यह बर्थ तो पहले से ही ऐसी रक्खी हुई थी। मैंने थोड़े ही उसे ऊपर की और उठाया है?"

कुमार: "तो फिर मैं उसे नीचा कर देता हूँ अगर तुम्हें कोई आपत्ति ना हो तो?" ऐसा कह कर बिना नीतू की हाँ का इंतजार किये कुमार उठ खड़ा हुआ और उसने बर्थ को निचा करना चाहा। मज़बूरी में नीतू को भी उठना पड़ा। कुमार ने बर्थ को बिछा दिया और उसके ऊपर चद्दर बिछा कर नीतू को पहले बैठने का इशारा किया।
 
नीतू ने हलके से अपने कूल्हे बर्थ पर टिकाये तो कुमार ने उसे हल्का सा अपने करीब खिंच कर कहा, "भाई ठीक से तो बैठो। आखिर हमें काफी लंबा सफर एक साथ तय करना है।"

नीतू और खिसक कर ठीक कुमार के करीब बैठी। उसने महसूस किया की उसकी जाँघें कुमार की जाँघों से घिस रहीं थीं। कम्पार्टमेंट का तापमान काफी ठंडा हो रहा था। कुमार ने धीरे से नीतू को अपने और करीब खींचा तो नीतू ने उसका विरोध करते हुए कहा, "क्या कर रहे हो? कोई देखेगा तो क्या कहेगा?"

कुमार समझ गया की उसे नीतू ने अनजाने में ही हरी झंडी दे दी थी। नीतू ने कुमार का उसे अपने करीब खींचने का विरोध नहीं किया, उस पर कोई आपत्ति नहीं जताई; बल्कि कोई देख लेगा यह कह कर उसे रोका था। यह इशारा कुमार के लिए काफी था। कुमार समझ गया की नीतू मन से कुमार के करीब आना चाहती थी पर उस को यह डर था की कहीं उन्हें कोई देख ना ले।"

कुमार ने फ़ौरन खड़े हो कर पर्दों को फैला कर बंद कर दिया जिससे उन तो बर्थ पूरी तरह से परदे के पीछे छिप गयी। अब कोई भी बिना पर्दा हटाए उन्हें देख नहीं सकता था। जब नीतू ने देखा की कुमार ने उन्हें परदे के पीछे ढक दिया तो वह बोल पड़ी, "कुमार यह क्या कर रहे हो?"

कुमार: " मैं वही कर रहा हूँ जो आप चाहते हो। आपही ने तो कहा की कहीं कोई देख ना ले। अब हमें कोई नहीं देख सकता। बोलो अब तो ठीक है?" नीतू क्या बोलती? उसने चुप रहना ही ठीक समझा।

नीतू को महसूस हुआ की उसकी जाँघों के बिच में से उसका स्त्री रस चुने लगा था। उसकी निप्पलेँ फूल कर बड़ी हो गयीं थीं। नीतू अपने आपको सम्हाल नहीं पा रही थी। उस पर कुछ अजीब सा नशा छा रहा था। नीतू को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था की यह सब क्या हो रहा था। जो आजतक उसने अनुभव नहीं किया था वह सब हो रहा था।

कुमार ने देखा की उसकी जोड़ीदार कुछ असमंजस में थी तो कुमार ने नीतू को अपनी और करीब खींचा और नीतू के कूल्हों के निचे अपने दोनों हाथ घुसा कर नीतू को ऊपर की और उठाया और उसे अपनी गोद में बिठा दिया।

जैसे ही कुमार ने नीतू को अपनी गोद में बिठाया की नीतू मचलने लगी। नीतू ने महसूस किया की कुमार का लण्ड उसकी गाँड़ को टोंच रहा था। उसकी गाँड़ की दरार में वह उसके कपड़ों के उस पार ऐसी ठोकर मार रहा था की नीतू जान गयी की कुमार का लण्ड काफी लंबा, मोटा और बड़ा था और एकदम कड़क हो कर खड़ा हुआ था।

नीतू से अब यह सब सहा नहीं जा रहा था। नीतू की चूत गीली होती जा रही थी। उसकी चूत में से रिस रहा पानी थमने का नाम नहीं ले रहा था। उसे यह डर था की कहीं उसकी पेंटी भीग कर उसके घाघरे को गीला ना कर दे, जिससे कुमार को नीतू की हालत का पता लग जाए। साथ साथ नीतू को अपनी मर्यादा भी तो सम्हालनी थी।

हालांकि वह जानती थी की उसे अपने पति से कोई परेशानी नहीं होगी, पर फिर भी नीतू एक मानिनी शादीशुदा औरत थी। अगर इतनी आसानी से फँस गयी तो फिर क्या मजा? आसानी से मिली हुई चीज़ की कोई कीमत नहीं होती। थोड़ा कुमार को भी कुछ ज्यादा महेनत, मिन्नत और मशक्कत करनी चाहिए ना?
 
नीतू से अब यह सब सहा नहीं जा रहा था। नीतू की चूत गीली होती जा रही थी। उसकी चूत में से रिस रहा पानी थमने का नाम नहीं ले रहा था। उसे यह डर था की कहीं उसकी पेंटी भीग कर उसके घाघरे को गीला ना कर दे, जिससे कुमार को नीतू की हालत का पता लग जाए। साथ साथ नीतू को अपनी मर्यादा भी तो सम्हालनी थी।

हालांकि वह जानती थी की उसे अपने पति से कोई परेशानी नहीं होगी, पर फिर भी नीतू एक मानिनी शादीशुदा औरत थी। अगर इतनी आसानी से फँस गयी तो फिर क्या मजा? आसानी से मिली हुई चीज़ की कोई कीमत नहीं होती। थोड़ा कुमार को भी कुछ ज्यादा महेनत, मिन्नत और मशक्कत करनी चाहिए ना?

नीतू ने तय किया की अब उसे कुमार को रोकना ही होगा। मन ना मानते हुए भी नीतू उठ खड़ी हुई। उसने अपने कपड़ों को सम्हालते हुए कुमार को कहा, "बस कुमार। प्लीज तुम मुझे और मत छेड़ो। मैं मजबूर हूँ। आई एम् सॉरी।" नीतू से कुमार को यह नहीं कहा गया की कुमार का यह सब कार्यकलाप उसे अच्छा नहीं लग रहा था। नीतू ने कुमार को साफ़ साफ़ मना भी नहीं किया।

नीतू अपनी बर्थ से उठ कर गैलरी में चल पड़ी। सुनीता ने अपनी आँखें खोलीं तो देखा की नीतू कम्पार्टमेंट के दरवाजे की और बढ़ने लगी थी और उसके पीछे कुमार भी उठ खड़ा हुआ और नीतू के पीछे पीछे जाने लगा। सुनीता से रहा नहीं गया। सुनीता ने हलके से जस्सूजी के पाँव अपनी गोद से हटाए और धीरे से बर्थ पर रख दिए। जस्सूजी गहरी नींद सो रहे थे। सुनीता ने जस्सूजी के बदन पर पूरी तरह से कम्बल और चद्दर ओढ़ाकर वह स्वयं उठ खड़ी हुई और कुमार और नीतू की हरकतें देखने उनके पीछे चल पड़ी।

नीतू आगे भागकर कम्पार्टमेंट के शीशे के दरवाजे के पास जा पहुंची थी। कुमार भी उसके पीछे नीतू को लपक ने के लिए उसके पीछे भाग कर दरवाजे के पास जा पहुंचा था। सुनीता ने देखा की कुमार ने भाग कर नीतू को लपक कर अपनी बाँहों में जकड लिया और उसके मुंह पर चुम्बन करने की कोशिश करने लगा। नीतू भी शरारत भरी हुई हँसी देती हुई कुमार से अपने मुंह को दूर ले जा रही थी।

फिर उससे छूट कर नीतू ने कुमार को अँगुठे से ठेंगा दिखाया और बोली, "इतनी आसानी से तुम्हारे चंगुल में नहीं फँस ने वाली हूँ मैं। तुम फौजी हो तो मैं भी फौजी की बेटी हूँ। हिम्मत है तो पकड़ कर दिखाओ।"

और क्या था? कुमार को तो जैसे बना बनाया निमंत्रण मिल गया। उसने जब भाग कर नीतू को पकड़ ना चाहा तो नीतू कूद कर कम्पार्टमेंट का शीशे का दरवाजा खोलकर वहाँ पहुंची जो हिस्सा ऐयर-कण्डीशण्ड नहीं होता। जहां टॉयलेट बगैरह होते हैं। पीछे पीछे कुमार भी भाग कर पहुंचा और नीतू को लपक कर पकड़ना चाहा। नीतू दरवाजे की और भागी। दुर्भाग्य से दरवाजा खुला था। वहाँ फर्श पर कुछ दही या अचार जैसा फिसलन वाला पदार्थ बिखरा हुआ था। नीतू का पाँव फिसल गया। वह लड़खड़ायी और गिर पड़ी। उस के दोनों पाँव खुले दरवाजे से फिसल कर तेज चल रही ट्रैन के बाहर लटक गए।

कुमार ने फुर्ती से लपक कर ट्रैन के बाहर फिसलकर गिरती हुई नीतू के हाथ पकड़ लिए। नीतू के पाँव दरवाजे के बाहर निचे खुली हवा में पायदानों पर लटक रहे थे। वह जोर जोर से चिल्ला रही थी, "बचाओ बचाओ। कुमार प्लीज मुझे मत छोड़ना।"

कुमार कह रहे थे, "नहीं छोडूंगा, पर तुम मेरा हाथ कस के थामे रखना। कुछ नहीं होगा। बस हाथ कस के पकड़ रखना।"

नीतू कुमार के हाथोँ के सहारे टिकी हुई थी। कुमार के पाँव भी उसी चिकनाहट पर थे। वह अपने को सम्हाल नहीं पाए और चिकनाहट पर पाँव फिसलने के कारण गिर पड़े। कुमार के कमर और पाँव कोच के अंदर थे और उनका सर समेत शरीर का ऊपरी हिस्सा दरवाजे के बाहर था। चूँकि उन्होंने नीतू के हाथ अपने दोनों हाथों में पकड़ रखे थे, इस लिए वह किसी भी चीज़ का सहारा नहीं ले सकते थे और अपने बदन को फिसल ने से रोक नहीं सकते थे।

कुमार ने अपने पाँव फैला कर अपने बदन को बाहर की और फिसलने से रोकना चाहा। पर सहारा ना होने और फर्श पर फैली हुई चिकनाहट के कारण उसका बदन भी धीरे धीरे दरवाजे के बाहर की और खिसकता जा रहा था। पीछे ही सुनीता आ रही थी। उसने यह दृश्य देखा तो उसकी जान हथेली में आ गयी। कुछ ही क्षण की बात थी की नीतू और कुमार दोनों ही तेज गति से दौड़ रही ट्रैन के बाहर तेज हवा के कारण उड़कर फेंक दिए जाएंगे।

सुनीता ने भाग कर फिसल रहे कुमार के पाँव कस के पकडे और अपने दो पाँव फैला कर कोच के कोनों पर अपने पाँव टिका कर कुमार के शरीर को बाहर की और फिसलने से रोकने की कोशिश करने लगी। कुमार नीतू के दोनों हाथों को अपने हाथों में पकड़ कर अपनी जान की बाजी लगा कर उसे बाहर फेंके जाने से रोकने की भरसक कोशिश में लगा हुआ था।
 
तेज हवा और गाड़ी की तेज गति के कारण नीतू पूरी तरह दरवाजे के बाहर जैसे उड़ रही थी। कुमार ने पूरी ताकत से नीतू के दोनों हाथ अपने दोनों हाथोँ में कस के पकड़ कर रखे थे। नीतू के पाँव हवा में झूल रहे थे। अक्सर नीतू का घाघरा खुल कर छाते की तरह फ़ैल कर ऊपर की और उठ रहा था। नीतू डिब्बे में से नीचे उतरने वाले पायदान पर अपने पाँव टिकाने की कोशिश में लगी हुई थी।

सुनीता जोर से "कोई है? हमें मदद करो" चिल्ला ने लगी। कुछ देर तक तो शीशे का दरवाजा बंद होने के कारण कर्नल साहब और सुनीलजी को सुनीता की चीखें नहीं सुनाई दी। पर किसी और यात्री के बताने पर सुनीता की चिल्लाहट सुनकर एकदम कर्नल साहब और सुनीलजी उठ खड़े हुए और भाग के सुनीता के पास पहुंचे। कर्नल साहब ने जोर से ट्रैन की जंजीर खींची।

इतनी तेजी से भाग रही ट्रैन एकदम कहाँ रूकती? ब्रेक की चीत्कार से सारा वातावरण गूँज उठा। ट्रैन काफी तेज रफ़्तार पर थी। नीतू को लगा की उसके जीवन का आखरी वक्त आ चुका था। उसे बस कुमार के हाथ का सहारा था। पर कुमार की भी हालत ऐसी थी की वह खुद फिसला जा रहा था। एक साथ दो जानें कभी भी जा सकतीं थीं।

कुमार ने अपने जान की परवाह ना करते हुए नीतू का हाथ नहीं छोड़ा। नीतू और कुमार के वजन के कारण सुनीता की पकड़ कमजोर हो रही थी। सुनीता कुमार के पाँव को ठीक तरह से पकड़ नहीं पा रही थी। कुमार के पाँव सुनीता के हाथोँ में से फिसलते जा रहे थे। ट्रैन की रफ़्तार धीरे धीरे कम हो रही थी पर फिर भी काफी थी।

अचानक सुनीता के हाथोँ में से कुमार के पाँव छूट गए। कुमार और नीतू दोनों देखते ही देखते ट्रैन के बाहर उछल कर निचे गिर पड़े। थोड़ी दूर जाकर ट्रैन रुक गयी।

नीतू लुढ़क कर रेल की पटरियों से काफी दूर जा चुकी थी। बाहर घाँस और रेत होने के कारण उसे कुछ खरोंचे और एक दो जगह पर कुछ थोड़ी गहरी चोट लगी थी। पर कुमार को पत्थर पर गिरने के कारण काफी घाव लगे थे और उसके सर से खून बह रहा था। निचे गिरने के बाद चोट के कारण कुमार कुछ पल बेहोश पड़े रहे।

ट्रैन रुकजाने पर कर्नल साहब और सुनीलजी के साथ कई यात्री निचे उतर कर कुमार और नीतू को पीछे की और ढूंढने भागे। कुछ दुरी पर उन्हें कुमार गिरे हुए मिले। कुमार रेल की पटरियों के करीब पत्थरों के पास बेहोश गिरे हुए पड़े थे। उनके सर से काफी खून बह रहा था। सुनीता भी उतर कर वहाँ पहुंची। उसने अपनी चुन्नी फाड़ कर कुमार के सर पर कस के बाँधी। कुछ देर बाद कुमार ने आँखें खोलीं।

कर्नल साहब कुमार को सुनीता के सहारे छोड़ और पीछे की और भागे और कुछ दुरी पर उन्हें नीतू दिखाई दी। नीतू और पीछे गिरी हुई थी। नीतू के कपडे फटे हुए थे पर उसे ज्यादा चोट नहीं आयी थी। वह उठ कर खड़ी थी और अपने आपको सम्हालने की कोशिश कर रही थी। उसका सर चकरा रहा था। वह कुमार को ढूंढने की कोशिश कर रही थी।

कर्नल साहब और कुछ यात्री ने गार्ड के पास रखे प्राथमिक सारवार की सामग्री और दवाइयों से कुमार और नीतू की चोटों पर दवाई लगाई और पट्टियां बाँधी और दोनों को उठाकर वापस ट्रैन में लाकर उनकी बर्थ पर रखा। सुनीता और ज्योतिजी उन दोनों की देखभाल करने में जुट गए। ट्रैन फिर से अपने गंतव्य की और जाने के लिए अग्रसर हुई।

नीतू काफी सम्हल चुकी थी। वह कुमार के पाँव के पास जा बैठी। उसने कुमार का हाल देखा तो उसकी आँखों में से आँसुओं की धार बहने लगी। कुमार ने अपने जान की परवाह ना करते हुए उसकी जान बचाई यह उसको खाये जा रहा था। कुमार बच गए यह कुदरत का कमाल था। तेज रफ़्तार से चलती ट्रैन में से पत्थर पर गिरने से इंसान का बचना लगभग नामुमकिन सा होता है।

पर कुमार ने फिर भी अपनी जान को जोखिम में डाल कर नीतू को बचाया यह नीतू के लिए एक अद्भुत और अकल्पनीय अनुभव था। उसने सोचा भी नहीं था की कोई इंसान अपनी जान दुसरेकी जान बचाने के लिए ऐसे जोखिम में डाल सकता था। सुनीता और ज्योति नीतू को ढाढस देकर यह समझा रहे थे की कुमार ठीक है और उसकी जान को कोई ख़तरा नहीं है।

कम्पार्टमेंट में एक डॉक्टर थे उन्होंने दोनों को चेक किया और कहा की उन दोनों को चोटें आयीं थी पर कोई हड्डी टूटी हो ऐसा नहीं लग रहा था। कुछ देर बाद कुमार बैठ खड़े हुए और इधर उधर देखने लगे। सर पर लगी चोट के कारण उन्हें कुछ बेचैनी महसूस हो रही थी। उन्होंने नीतू को अपने पाँव के पास बैठे हुए और रोते हुए देखा।

कुमार ने झुक कर नीतू के हाथ थामे और कहा, "अब सब ठीक है। अब रोना बंद करो। मैंने तुम्हें कहा था ना, की सब ठीक हो जाएगा? हम भारतीय सेना के जवान हमेशा अपनी जान अपनी हथेली में लेकर घूमते हैं। चाहे देश की अस्मिता हो या देशवासी की जान बचानी हो। हम अपनी जान की बाजी लगा कर उन्हें बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। मैं बिलकुल ठीक हूँ तुम भी ठीक हो। अब जो हो गया उसे भूल जाओ और आगे की सोचो।"

थोड़ी देर बाद सुनीता और ज्योति अपनी बर्थ पर वापस चले गये। नीतू ने पर्दा फैला कर कुमार की बर्थ को परदे के पीछे ढक दिया। पहले तो वह कुमार के पर्दा फैलाने पर एतराज कर रही थी। पर अब वह खुद पर्दा फैला कर अपनी ऊपर वाली बर्थ पर ना जाकर निचे कुमार की बर्थ पर ही अपने पाँव लम्बे कर एक छोर पर बैठ गयी। नीतू ने कुमार को बर्थ पर अपने शरीर को लंबा कर लेटने को कहा। कुमार के पाँव को नीतू ने अपनी गोद में ले लिए और उनपर चद्दर बिछा कर वह कुमार के पाँव दबाने लगी।
 
नीतू के पाँव कुमार ने करवट लेकर अपनी बाहों में ले लिए और उन्हें प्यार से सहलाने लगा। देखते ही देखते कप्तान कुमार गहरी नींद में सो गये। धीरे धीरे नीतू की आँखें भी भारी होने लगीं। संकड़ी सी बर्थ पर दोनों युवा बदन एक दूसरे के बदन को कस कर अपनी बाहों में लिए हुए लेट गए। एक का सर दूसरे की पाँव के पास था। ट्रैन बड़ी तेज रफ़्तार से धड़ल्ले से फर्राटे मारती हुई भाग रही थी।

कुमार की चोटें गहरी थीं और शायद कोई हड्डी नहीं टूटी थी पर मांसपेशियों में काफी जख्म लगे थे और बदन में दर्द था। नीतू के कप्तान कुमार के बर्थ पर ही लम्बे होने से कुमार के बदन का कुछ हिस्सा दबा और दर्द होने के कारण कप्तान कुमार कराह उठे। नीतू एकदम बैठ गयी और उठ कर कुमार के पाँव के पास जा बैठी। कुमार के पाँव को अपनी गोद में रख कर उस पर कम्बल डालकर वह हल्के से कुमार के पाँव को सहलाने लगी।

नीतू की अपनी आँखें भी भारी हो रही थीं। नीतू बैठे बैठे ही कुमार के पाँव अपनी गोद में लिए हुए सो गयी।

नीतू के सोने के कुछ देर बाद नीतू के पति ब्रिगेडियर खन्ना नीतू को मिलने के लिए नीतू की बर्थ के पास पहुँचने वाले थे तब सुनीता ने उन्हें देखा। सुनीता को डर था की कहीं नीतू के पति नीतू को कुमार के साथ कोई ऐसी वैसी हरकत करते हुए देख ना ले इसलिए वह ब्रिगेडियर साहब को नमस्ते करती हुई एकदम उठ खड़ी हुई और जस्सूजी के पाँव थोड़े से खिसका कर सुनीता ने ब्रिगेडियर साहब को अपने पास बैठाया।

सुनीता ने ब्रिगेडियर खन्ना साहब से कहा की उस समय नीतू सो रही थी और उसे डिस्टर्ब करना ठीक नहीं था। सुनीता ने फिर ब्रिगेडियर खन्ना साहब को समझा बुझा कर अपने पास बैठाया और नीतू और कुमार के साथ घटी घटना के बारे में सब बताया। कैसे नीतू फिसल गयी फिर कुमार भी फिसले और कैसे कुमार ने नीतू की जान बचाई।

नीतू के पति ब्रिगेडियर खन्ना ने भी सुनीता को बताया की जब गाडी करीब एक घंटे तक कहीं रुक गयी थी तब उन्होंने किसी को पूछा की क्या बात हुई थी। तब उनके साथ वाली बर्थ बैठे जनाब ने उन्हें बताया की कोई औरत ट्रैन से निचे गिर गयी थी और कोई आर्मी के अफसर ने उसे बचाया था। उन्हें क्या पता था की वह वाक्या उनकी अपनी पत्नी नीतू के साथ ही हुआ था?

यह सब बातें सुनकर नीतू के पति ब्रिगेडियर खन्ना साहब बड़े चिंतित हो गए और वह नीतू के पास जाने की जिद करने लगे तब सुनीता ने उन्हें रोकते हुए ब्रिगेडियर साहब को थोड़ी धीरज रखने को कहा और बाजू में सो रहे जस्सूजी को जगाया और ब्रिगेडियर खन्ना से बातचीत करने को कहा।

ब्रिगेडियर साहब जैसे ही जस्सूजी से घूम कर बात करने में लग गए की सुनीता उठखडी हुई और उसने परदे के बाहर से नीतू को हलके से पुकारा।

--

नीतू को सोये हुए आधे घंटे से कुछ ज्यादा ही समय हुआ होगा की वह जागी तो नीतू ने पाया की कुमार की साँसे धीमी रफ़्तार से नियमित चल रही थीं। कभी कभार उनके मुंह से हलकी सी खर्राटे की आवाज भी निकलने लगी। नीतू को जब तसल्ली हुई की कुमार सो गए हैं तब उसने धीरे से अपने ऊपर से कम्बल हटाया और अपनी गोद में से कुमार का पाँव हटाकर निचे रखा।

नीतू ने कुमार के पाँव पर कम्बल ओढ़ा दिया और पर्दा हटा कर ऊपर अपनी बर्थ पर जाने के लिए उठने ही लगी थी की उसे परदे के उस पार सुनीता की आवाज सुनिए दी। उसको अपने पति ब्रिगेडियर खन्ना की भी आवाज सुनाई दी। नीतू हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुई। उस ने पर्दा हटाया और सुनीता को देखा। सुनीता नीतू का हाथ पकड़ कर उसे ब्रिगेडियर साहब के पास ले गयी। सुनीता ने अपने पति ब्रिगेडियर साहब को देखा तो उनके चरण स्पर्श करने झुकी।

ब्रिगेडियर साहब ने अपनी पत्नी नीतू को उठाकर गले लगाया और पूछा, "नीतू बेटा (ब्रिगेडियर खन्ना कई बार प्यार से नीतू को अपनी पत्नी होने के बावजूद नीतू की कम उम्र के कारण उसे बेटा कह कर बुलाया करते थे।) मैंने अभी अभी इन (सुनीता की और इशारा करते हुए) से सूना की तुम ट्रैन के निचे गिर गयी थी? मेरी तो जान हथेली में आ गयी जब मैंने यह सूना। उस वक्त मैं गहरी नींद में था और मुझे किसीने बताया तक नहीं। मेरा कोच काफी पीछे है। मैंने यह भी सूना की कप्तान कुमार ने तुम्हें अपनी जान पर खेल कर बचाया? क्या यह सच है?"

ब्रिगेडियर खन्ना फिर अपनी पत्नी के बदन पर हलके से हाथ फिराते हुए बोले, "जानूं, तुम्हें ज्यादा चोट तो नहीं आयी ना?"

नीतू ने ब्रिगेडियर साहब की छाती में अपना सर लगा कर कहा, "हाँ जी यह बिलकुल सच है। मैं कप्तान कुमारजी के कारण ही आज ज़िंदा हूँ। मुझे चोट नहीं आयी पर कुमारजी काफी चोटिल हुए हैं। वह अभी सो रहे हैं।"

सुनीता और कर्नल साहब की और इशारा करते हुए नीतू ने कहा, "इन्होने कुमार साहब की पट्टी बगैरह की। एक डॉक्टर ने देखा और कहा की कुमार जी की जान को कोई ख़तरा नहीं है।"

फिर नीतू ने अपने पति को जो हुआ उस वाकये की सारी कहानी विस्तार से सुनाई। नीतू ने यह छुपाया की कुमार नीतू को पकड़ने के लिए उस के पीछे भाग रहे थे और कुमार की चंगुल से बचने के लिए वह भाग रही थी तब वह सब हुआ। हालांकि यह उसे बताना पड़ा की कुमार उसके पीछे ही कुछ बात करने के लिए तेजी से भागते हुए हुए आ रहे थे तब उसे धक्का लगा और वह फिसल गयी और साथ में कुमार भी फिसल गए। ऐसे वह वाक्या हुआ। नीतू को डर था की कहीं उसके पति उसकी कहानी की सच्चाई भाँप ना ले।

नीतू की सारी कहानी सुनने के बाद ब्रिगेडियर साहब ने नीतू के बाल सँवारते हुए कहा, "नीतू, शुक्र है तुम्हें ज्यादा चोट नहीं आयी और कुमार भी बच गए। चलो जो हुआ सो हुआ। अब तुम मेरी बात बड़े ध्यान से सुनो। तुम अब कुमार का अच्छी तरह ख्याल रखना। वह अकेला है। उसे कोई तकलीफ ना हो। उन्हें किसी तरह की कोई भी जरुरत हो तो तुम पूरी करना। उनके साथ ही रहना। उन्होंने तुम्हारी ही नहीं मेरी भी जान बचाई है। मेरी जान तुम हो। उन्होंने तुम्हारी जान बचाकर हकीकत में तो मेरी जान बचाई है। ओके बच्चा? मैं चलता हूँ। तुम अपना भी ध्यान रखना।"

यह कह कर सुनीता और जस्सूजी को धन्यवाद देते और नमस्कार करते हुए ब्रिगेडियर साहब धीरे धीरे कम्पार्टमेंट की दीवारों का सहारा लेते हुए अपने कम्पार्टमेंट की और चल दिए।

अपने पति का इतना जबरदस्त सहारा और प्रोत्साहन पाकर नीतू की आँखें नम हो गयीं। वह काफी खुश भी थी। "कुमार के साथ ही रहना, उन का ख़ास ध्यान रखना। उन्हें किसी तरह की कोई भी जरुरत हो तो तुम पूरी करना।" क्या उसके पति ब्रिगेडियर साहब यह कह कर उसे कुछ इशारा कर रहे थे? नीतू इस उधेङबुन में थी की सुनीता ने नीतू को बताया की उन्होंने नीतू और कुमार के लिए भी दोपहर का खाना आर्डर किया था। खाना आ भी चुका था।

सुनीता ने नीतू को कहा की वह कुमार को भी जगाये और खाने के लिए कहे।
 
नीतू ने प्यार से कुमार को जगा कर बर्थ पर बिठा कर खाने के लिए आग्रह किया। कुमार को चेहरे और पाँव पर गहरी चोटें आयी थीं, पर वह कह रहे थे की वह ठीक हैं। कुमार खाने के लिए मना कर रहे थे पर नीतू ने उनकी एक ना सुनी। चेहरे पर पट्टी लगाने के कारण उन्हें शायद ठीक ठीक देखने में दिक्कत हो रही थी। नीतू ने खाने की प्लेट अपनी गोद में रखकर कप्तान कुमार के मना करने पर भी उन्हें एक एक निवाला बना कर अपने हाथों से खिलाना शुरू किया।

सुनीता, ज्योतिजी, सुनीलजी और जस्सूजी इस दोनों युवा का प्यार देख कर एक दूसरे की और देख कर शरारती अंदाज में मुस्कराये। सबके मन में शायद यही था की "जवाँ दिल की धड़कनों में भड़कती शमाँ। आगे आगे देखिये होता ही क्या।" प्यार और एक दूसरे के प्रति का ऐसा भाव देख सब के मन में यही था की कभी ना कभी जवान दिलों में भड़कती प्यार की यह छोटी सी चिंगारी जल्द ही आगे चल कर जवान बदनों में काम वासना की आग का रूप ले सकती है।

सुनीता नीतू के एकदम पास खिसक कर बैठ गयी और नीतू के कानों में अपना मुंह लगा कर कोई न सुने ऐसे फुसफुसाते हुए कहा, "नीतू, क्या इतना प्यार कोई किसी को कर सकता है? कुमार ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए तुम्हारी जान बचाई। कोई भी स्त्री के लिए कोई भी पुरुष इससे ज्यादा क्या बलिदान दे सकता है भला? मैं देख रही थी की कुमार तुम्हारे करीब आने की कोशिश कर रहा था और तुम उससे दूर भाग रही थी। ऐसे जाँबाज़ पुरुष के लिए अपना स्त्रीत्व की ही क्या; कोई भी कुर्बानी कम है।"

ऐसा कह कर सुनीता ने नीतू को आँख मारी और फिर अपने काम में लग गयी। सुनीत की बात नीतू के जहन में बन्दुक की गोली के तरह घुस गयी। एक तो उसका तन और मन भी ऐसी मर्दानगी देख कर मचल ही रहा था उस पर सुनीताजी की सटीक बात नीतू के दिल को छू गयी।

खाने के बाद नीतू फिर से कुमार के पाँव से सट कर बैठ गयी। फिर से सारे परदे बंद हुए। क्यों की कुमार को तब भी काफी दर्द था, इस कारण नीतू ने मन ना मानते हुए भी कुमार को प्यार से उसकी साइड की निचली बर्थ पर लिटा कर उसे कंबल ओढ़ा कर खुद जैसे ही अपनी ऊपर वाली बर्थ पर जाने लगी थी की उसने महसूस किया की कप्तान कुमार ने उसकी बाँह पकड़ी। नीतू ने मूड के देखा तो कुमार का चेहरा कम्बल से ढका हुआ था और शायद वह सो रहे थे पर फिर भी वह नीतू को दूर नहीं जाने देना चाहते थे।

नीतू के चेहरे पर बरबस एक मुस्कान आ गयी। नीतू कुमार का हाथ ना छुड़ाते हुए वहीं खड़ी रही। कुमार ने नीतू का हाथ पकडे रखा। नीतू धीरे से हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगी पर फिर भी कुमार ने हाथ नहीं छोड़ा और नीतू का हाथ पकड़ अपना चेहरा ढके हुए रखते नीतू को अपने पास बैठने का इशारा किया।

नीतू कुमार के सर के पास गयी और धीरे से बोली, "क्या बात है? कुछ चाहिए क्या?"

परदे को उठा कर अपना मुंह नीतू के मुंह के पास लाकर बोले, "नीतू, क्या अब भी तुम मुझसे रूठी हुई हो? मुझे माफ़ नहीं करोगी क्या?"

नीतू ने अपने हाथ कुमार के मुंह पर रख दिए और बोली, "क्या बात कर रहें हैं आप? भला मैं आपसे कैसे नाराज हो सकती हूँ?"

कुमार ने कहा, "फिर उठ कर ऊपर क्यों जाने लग़ी? नींद आ रही है क्या?"

नीतू ने कुमार की बात काटते हुए कहा, "मुझे कोई नींद नहीं आ रही। भला इतना बड़ा हादसा होने के बाद कोई सो सकता है? जो हुआ यह सोचते ही मेरा दिल धमनी की तरह धड़क रहा है। पता नहीं मैं कैसे बच गयी। मेरी जान तुम्हारी वजह से ही बची है कुमार!"

कुमार ने फट से अपने हाथ नीतू की छाती पर रखने की कोशिश करते हुए कहा, "मैंने तुम्हें कहाँ बचाया? बचाने वाला सबका एक ही है। उसने तुम्हें और मुझे दोनों को बचाया। यह सब फ़ालतू की बातें छोडो। तुमने क्या कहा की तुम्हारा दिल तेजी से धड़क रहा है? ज़रा देखूं तो वह कितनी तेजी से धड़क रहा है?"

नीतू ने इधर उधर देखा। कहीं कोई उन दोनों की प्यार की लीला देख तो नहीं रहा? फिर सोचा, "क्या पता कोई अपना मुंह परदे में ही छिपाकर उनको देख ना रहा हो?" नीतू ने एक हाथ से कुमार की नाक पकड़ कर उसे प्यार से हिलाते हुए और दूसरे हाथ से धीरे से प्यार से कुमार का हाथ जो नीतू के स्तनोँ को छूने जा रहा था उसको अपने टॉप के ऊपर से हटाते हुए कहा, "जनाब को इतनी सारी चोटें आयी हैं, पर फिर भी रोमियोगिरी करने से बाज नहीं आते? अगर मैं आपके पास बैठी ना, तो सो चुके आप! मैं चाहती हूँ की आप आराम करो और एकदम फुर्ती से वापस वैसे ही हो जाओ जैसे पहले थे। मैं चाहती हूँ की कल सुबह तक ही आप दौड़ते फिरते हो जाओ। फिर अगले पुरे सात दिन हमारे हैं। अब सो जाओ ना प्लीज? तुम्हें आराम की सख्त जरुरत है।"
 
Back
Top