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Thriller हाफ़ मेंटल

करीब एक घण्टे बाद कांशी राणा ने अपनी जिप्सी शहर की सीमा के बाहर निकाली और उसे थोड़ा आगे चलकर एक कच्ची सड़क पर मोड़ दिया।

कच्ची सड़क पर धूल के बादल उड़ाते हुए जिप्सी आगे बढ़ने लगी।

हिचकोले खाते हुए जिप्सी करीब दो किलोमीटर चलकर रुकी तो जिप्सी के साथ-साथ कांशी राणा भी धूल से भरा हुआ नजर आ रहा था।

मगर उसने अपने कपड़ों पर लगी धूल की तरफ ध्यान नहीं दिया।

वह छलांग मारकर जिप्सी से उतरा और इधर-उधर देखने लगा।

चारों तरफ दूर-दूर तक बंजर पड़ी जमीन थी जिसमें जगह-जगह कंटीली झाड़ियां उगी हुई थीं। बीच-बीच में बड़े-छोटे गड्ढे थे और उनमें से कई बड़े गड्ढों में पानी भरा हुआ था।

उसके दायीं तरफ करीब आधा किलोमीटर दूर एक खंडहर नुमा इमारत थी।

दूर से देखने पर वह कोई मस्जिद नजर आ रही थी।

अपने कपड़ों पर हाथ मारते हुए कांशी राणा उस इमारत की तरफ पैदल ही बढ़ने लगा।

अभी वह इमारत से थोड़ी दूर था कि तभी—

‘धांय....!’

गोली की आवाज गूंजी और उसके पैरों के पास की मिट्टी उखड़कर उछल गई।

कांशी राणा पहले तो हड़बड़ाया, फिर वहीं स्थिर हो गया।

खड़ा होने के साथ ही उसने हाथ भी सिर पर रख लिये और उधर देखने लगा जिधर से गोली चली थी।

तभी एक झाड़ी के पीछे से एक आदमी निकला जो कि ऐ.के. सैंतालीस से लैस था, और उसकी तरफ बढ़ा।

ऐ.के. सैंतालीस का रुख उसी की तरफ था और उंगली ट्रिगर पर दबी हुई थी।

कांशी राणा से कुछ कदम पहले आकर वह रुक गया और गुर्राया—

“कौन है तू?”

“कांशी राणा।” कांशी राणा बिना घबराये बोला—“इंस्पेक्टर कांशी राणा। जगवीर से बोलो कि मैं आया हूं।”

उस आदमी ने अपने बायें हाथ से जेब से वॉकी-टॉकी निकाला और उसका बटन दबाकर मुंह के पास ले जाते हुए बोला—

“इंस्पेक्टर कांशी राणा आया है।....ओ.के.....!”

उसने वॉकी-टॉकी जेब में डाला और कदम पीछे हटाते हुए बोला—“जा।”

कांशी राणा ने हाथ नीचे किये और कदम आगे बढ़ा दिये।

इमारत का ऊपरी गुम्बद मस्जिदनुमा तो था—मगर वो मस्जिद नहीं थी, बल्कि किसी इमारत के खंडहर थे। इमारत की चारदीवारी जगह-जगह से टूट रही थी तथा नीचे जमीन पर छोटी ईंटें जगह-जगह बिखरी हुई थीं।

ऐसे ही एक टूटे हुए स्थान से कांशी राणा भीतर दाखिल हुआ और इमारत के उस हॉल की तरफ बढ़ा जिसके ऊपर गुम्बद बना हुआ था।

उस हॉल के दायें-बायें कुछ और कमरे भी बने हुए थे। और वे सभी खस्ता हाल में थे। बस एक हॉल ही था जो अन्य कमरों से बेहतर नजर आ रहा था।

कांशी राणा हॉल में दाखिल हुआ।

दीवारों की तरह हॉल का फर्श भी छोटी ईंटों का बना हुआ था—दायीं तरफ आदमकद अलमारी दीवार में थी जिसका दरवाजा दीमक ने चट कर डाला था। बस उसके अवशेष ही नजर आ रहे थे, जिसके पीछे दीमक की खाई लकड़ी की शैल्फ लगी थी।

अलमारी के करीब ही साथ वाले कमरे में जाने का रास्ता था।

कांशी राणा ने उस तरफ अभी रुख ही किया था कि तभी हाथ में रिवॉल्वर लिये करीब तेईस-चौबीस साल का लड़का साथ वाले कमरे से निकला।

“हथियार है?” बिना किसी दुआ-सलाम के वह बोला।

“है।” कांशी राणा बोला।

“निकाल!” कहते हुए लड़के ने बायां हाथ आगे बढ़ाया।

कांशी राणा ने चुपचाप अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकालकर उसके बढ़े हाथ पर रख दी।

“अब जा!” लड़का उसकी रिवॉल्वर को अपनी पैंट की जेब में डालते हुए बोला।

कांशी राणा उसके बराबर से निकलकर साथ वाले कमरे में प्रविष्ट हो गया।

वह कमरा बिल्कुल खाली था। कमरे के बीचोंबीच चमगादड़ों के बीट का ढेर लगा हुआ था और ऊपर छत में दर्जनों की संख्या में चमगादड़ उल्टे लटके हुए शोर कर रहे थे।

कांशी राणा बीट के ढेर के करीब से निकलकर सामने वाली दीवार के करीब आकर ठिठका और दीवार की तरफ देखने लगा।

लगातार दो मिनट तक वह दीवार को इस तरह देखता रहा जैसे वह अपनी आंखों के सामने दीवार के एक ही हिस्से में कुछ तलाश कर रहा हो।

दो मिनट बाद जैसे चमत्कार हुआ।

दीवार एक तरफ हटने लगी और देखते-ही-देखते उसमें इतनी जगह बन गई कि एक आदमी भीतर प्रवेश कर सके।

कांशी राणा भीतर प्रवेश कर गया।

दायीं तरफ नीचे जा रही सीढ़ियां थीं।

सीढ़ियों की दोनों साइडों की दीवार से रगड़ खाते हुए वह नीचे उतरने लगा।

करीब पंद्रह सीढ़ियां उतरकर उसने स्वयं को एक हॉल में खड़ा पाया।

वह हॉल भी ऊपरी कमरों की तरह छोटी ईंट का बना हुआ था—मगर वह ऊपर की अपेक्षा काफी मजबूत था। एक तरफ दो ट्यूब लाईटें जल रही थीं जो कि बैटरी से चल रही थीं। उनके करीब ही एक दरी बिछी हुई थी जिस पर कि जगवीर एक निहायत ही खूबसूरत युवती के साथ बैठा हुआ था।

जगवीर करीब तीस साल का गोरे रंग का मगर सख्त और क्रूर आंखों वाला व्यक्ति था। जिसके बालों का रंग लाल था और उसने फ्रैंच कट दाढ़ी रखी हुई थी।

उस वक्त वह सिर्फ कच्छा-बनियान पहने हुए था—और उसके बाकी के कपड़े एक तरफ खूंटी पर टंगे हुए थे।

युवती ने नीचे स्कर्ट पहनी हुई थी—और ऊपर सिर्फ ब्रा पहने हुए थी। उसके करीब ही उसकी टॉप पड़ी थी और उसके साथ ही उसका जांघिया पड़ा हुआ था जो साफ बता रहा था कि स्कर्ट के नीचे उसने कुछ नहीं पहन रखा।

“आ राणा....!” कांशी राणा को देखते ही बोला जगवीर—“बैठ।”

कांशी राणा आगे बढ़कर उसके सामने दरी पर बैठ गया।

उसने एक नजर युवती के उभारों पर डाली, फिर पुनः जगवीर को देखने लगा।

“कोई खास खबर?” जगवीर ने पूछा।

“तभी तो आया हूं।”

“बोल।”

“पुलिस को तुम्हारा पता चल चुका है कि तुम इस शहर में हो।”

“क्या?” बुरी तरह से चौंका जगवीर।

“हां।”

“तुझे कैसे पता चला?”

“डॉली आई थी मेरे पास।”

“डॉली ....यह कौन है?”

“उसके आई-कार्ड से वकील ही नजर आ रही थी।”

“कमाल है....एक वकील मेरे बारे में पूछ रही है।” हैरानी जताई जगवीर ने।

“सरकार ने तुम्हें पकड़ने का काम उसे सौंपा है। ऐसे में जाहिर है कि वकील होने के साथ-साथ वह और भी बहुत कुछ है।”

“फिर तूने क्या बताया?”

कांशी राणा ने डॉली से हुई सारी बात उसे बता दी।

“ओह! तो वह नटराज होटल में ठहरी है।”

“हां।”

“दिखने में कैसी है वो?” कहते हुए जगवीर भेद-भरी मुस्कान मुस्कुराया।

कांशी राणा भी मुस्कुरा पड़ा—“बढ़िया है। क्लास—वन।” कहते हुए उसने बाईं आंख दबाई।

“इससे भी....!” जगवीर ने अपने पास बैठी युवती की उंगली दबाई—“बढ़िया है?”

कांशी राणा ने युवती की फीगर पर निगाह मारी—उसकी ब्यूटी को देखा, फिर उसके चेहरे पर निगाहें जमाते हुए बोला—

“सच बोलूं?”

“मैं सच ही सुनना चाहता हूं।” जगवीर बोला।

“तो सच है यह जगवीर कि यह डॉली के सामने कुछ भी नहीं।”

सुनकर उस युवती का चेहरा बुझ गया। आंखों में ईर्ष्या के भाव साफ नजर आने लगे।

“बेशक यह”—उसके चेहरे पर फैली नाराजगी को नजरंदाज करते हुए कांशी राणा ने अपनी बात आगे बढ़ाई—“यह बहुत खूबसूरत है। मगर वो....वो है।”

कहकर उसने जगवीर की तरफ देखा।

“कमाल है—ऐसी खूबसूरती को इतने बड़े काम पर लगाया गया है।” जगवीर ने हैरानी जताई—“जबकि खूबसूरत औरत तो कोमल होती है। बहादुरी का तो उससे मीलों दूर का वास्ता नहीं होता। लगता है सरकार को मैं कोई छोटा-मोटा मुजरिम नजर आ रहा हूं—जो उसने किसी खूंखार आदमी की बजाये एक हसीना को मेरे पीछे लगाया है। कोई बात नहीं....हम भी उससे गिरफ्तार होंगे।”

“क्या....?” हड़बड़ाया कांशी राणा।

“हथकड़ियों में नहीं....उसकी जुल्फों में कैद होंगे।”

“ओऽऽ....!” कांशी राणा ने दांत दिखाये—“ऐसी गिरफ्तारी अगर मुझे भी मिल जाये तो....।”

“घबरा नहीं....प्रसाद तुझे भी मिलेगा। आज रात को भोग मैं लगाऊंगा और सुबह पहला प्रसाद तुझे ही मिलेगा।”

कांशी राणा का चेहरा खिल उठा—उसकी आंखों के सामने डॉली का खूबसूरत चेहरा ही नहीं, उसका समूचा बदन—वो भी निर्वस्त्र नाचने लगा।

“क्या नाम बताया था तूने होटल का?”

तभी जगवीर के प्रश्न पर वह हड़बड़ाया और उस शानदार सपने से बाहर निकल आया।

“नटराज!” वह थूक सटककर बोला।

उसकी हालत ही बता रही थी कि डॉली के बारे में सोचकर वह बेतहाशा गर्म हो चुका था।

“कमरा नम्बर?” जगवीर ने पूछा।

कांशी राणा ने बताया।

“ठीक है—अब तू जा....कल तुझे प्रसाद के साथ-साथ बढ़िया इनाम भी मिल जायेगा।”

कांशी राणा ने एक भरपूर निगाह युवती पर डाली।

युवती ने तुनककर मुंह परे फेर लिया। निश्चय ही उसे डॉली की तारीफ बुरी लगी थी।

कांशी राणा ने गहरी सांस छोड़ी और खड़ा हो गया।

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“नमस्कार....!”

होटल नटराज के डायनिंग हॉल में टेबल पर बैठी खाना खा रही डॉली के कानों में आवाज पड़ी तो उसने गर्दन ऊपर उठाई।

करीब तैंतीस वर्ष का साधारण कद-बुत का व्यक्ति उसके सामने खड़ा था।

डॉली ने प्रश्न-भरी निगाहों से उसकी तरफ देखा।

“कहिये।” वह बोली।

“अगर मैं गलत नहीं तो आप डॉली जी हैं....।”

उसकी आवाज में इज्जत और श्रद्धा के भाव थे।

“आप....!”

“मेरा नाम रंगीला है।” वह आदमी बोला—“दीनापुर में रहता हूं। आपके मैंने बहुत कारनामे पढ़े-सुने हैं—बहुत ही बड़ी वकील हैं आप....।”

“खाना खायेंगे?” डॉली उसकी बात को काटते हुए बोली।

“ज....जी नहीं।” हड़बड़ाया रंगीला।

“तो फिर मैं खा लूं?”

“ह....हां....आ....प खाइये....स....सॉरी....।”

रंगीला पुनः हड़बड़ाया और उसके सामने से हट गया।

डॉली पुनः डिनर पर झुक गई। रंगीला के उसके सामने से हटते ही उसने उसे अपने दिमाग से निकाल दिया।

हालांकि उसने उसकी आंखों में अपने प्रति इज्जत के भाव देखे थे। जबकि अन्य मर्द हमेशा उसे ललचाई निगाहों से ही देखते थे। मगर उसे किसी की भी परवाह नहीं थी।

खाना समाप्त कर उसने नेपकिन से हाथ पौंछे और खड़ी हो गई।

उसने अपनी रिस्टवॉच में वक्त देखा।

साढ़े नौ बज चुके थे—और कांशी राणा को उसने दस बजे तक का वक्त दे रखा था। सो उसने अपने कमरे में ही जाना उचित समझा।

छठी मंजिल पर कमरा था उसका, सो वह लिफ्ट की तरफ बढ़ी।

लिफ्ट द्वारा वह छठी मंजिल पर पहुंची और बायीं तरफ के गलियारे में आगे बढ़ने लगी।

बायीं तरफ छह कमरे छोड़कर सातवें कमरे के सामने वह रुकी और जेब से चाबी निकालकर उसे की-होल में डाला और चाबी को दायीं तरफ घुमाकर चाबी निकाली और दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गई।

अभी उसने बेड की तरफ दो कदम ही बढ़ाये थे कि उसे वातावरण में जहरीली गैस का आभास हुआ।

सिर एकदम से भारी होने लगा था उसका और दम घुटने लगा था।

“खतरा....!”

फौरन उसके जेहन में यह एक शब्द हथौड़े के समान बजा।

बिजली की-सी फुर्ती से वह पीछे मुड़ी।

लेकिन मुड़ नहीं पाई वह, बल्कि उसके घुटने मुड़ गये। और वह वहीं फर्श पर बिछ गई।

उसकी आंखें तो हरकत कर रही थीं—मगर दिमाग चेतना-शून्य हो गया था। जुबान भी बन्द हो गई थी। ठीक तभी उसके ऐन सामने वाले कमरे का दरवाजा खुला और दो व्यक्ति बाहर निकले।

दोनों ने पहले गलियारे में इधर-उधर देखा।

कोई नजर नहीं आया उन्हें।

तुरंत दोनों आगे बढ़े और डॉली के कमरे में दाखिल हो गये।

आनन-फानन में उन्होंने डॉली को उठाया और सीधा खड़ा कर कमरे से बाहर इस तरह ले आये जैसे किसी शराबी को सम्भालने की कोशिश कर रहे हों वो।

मजे की बात यह थी कि कमरे में फैली जहरीली गैस का उन पर कोई असर नहीं हुआ था।

उसे सम्भाले हुए वे अपने कमरे में आ गये।

“जल्दी से बोतल निकाल।” एक बोला और डॉली की बाजू अपनी गर्दन में डाल उसे सम्भाल लिया। तुरंत दूसरे ने डॉली को छोड़ा और सामने टेबल पर से बोतल उठाकर वापस आया और ढक्कन खोलकर बोतल उसके मुंह से लगा दी।

कुछ शराब डॉली के पेट में गई और कुछ उसके जिस्म पर जा गिरी।

उसने बोतल बन्द कर वापस टेबल पर रखी और आकर डॉली की दूसरी बाजू अपनी गर्दन में पिरो दी।

“अब ठीक है।” पहला बोला—“अब हर कोई यही समझेगा कि इसने बहुत पी रखी है।”

दोनों उसे सम्भाले कमरे से निकले और लिफ्ट की तरफ बढ़े।

लड़खड़ाते हुए घिसटते हुए डॉली उनके साथ चल रही थी।

लिफ्ट द्वारा दोनों हॉल में आये और गेट की तरफ बढ़े।

“कितनी बार कहा है कि ज्यादा न पीया करो।” एक बोला।

“करा दी न हमारी बेइज्जती।” दूसरा बोला।

“अब डॉक्टर उल्टियां करायेगा—तब ठीक होंगी तुम।” पहला बोला।

यह डायलॉग उन्होंने जानबूझ कर कहे थे, ताकि आसपास की टेबलों पर बैठे लोगों को संदेह न हो।

लेकिन कोने की टेबल पर एक शख्स ऐसा था जिसकी आंखों में संदेह साफ नजर आ रहा था।

रंगीला था वह।

अभी थोड़ी देर पहले ही उसने डॉली को ठीक-ठाक खाना खाते देखा था। उससे बात भी की थी उसने और उसे कहीं से भी ऐसा नहीं लगा था कि उसने शराब पी हुई थी। ऐसे में इतनी जल्दी शराब के नशे में कोई चूहा भी टुन्न नहीं हो सकता, फिर वह तो इंसान थी।

और उसे बाहर ले जा रहे दोनों शख्स कौन थे?

उसे इसके पीछे कोई भारी साजिश महसूस हो रही थी।

डॉली के बारे में वह काफी कुछ पढ़ चुका था। उसे पता था कि वह कानून की बेटी के तौर पर जानी-जाती थी और अपराध के प्रति उसे दिली नफरत थी। ऐसे में जाहिर था कि उसने सैंकड़ों दुश्मन बना लिये थे।

कहीं डॉली को ले जाने वाले उसके दुश्मन तो नहीं?

डॉली का फैन तो था ही वह सो अपने फेवरिट को बचाने के लिये वह फौरन टेबल छोड़कर खड़ा हो गया।

उस वक्त दोनों डॉली को सम्भाले गेट के करीब पहुंच चुके थे।

अपनी तरफ से लापरवाही दर्शाते हुए वह टेबलों के बीच से निकलते हुए उनके पीछे-पीछे गेट से निकल गया।

ठीक तभी एक मारुति जेन गेट के सामने आकर रुकी और एक व्यक्ति ड्राइविंग डोर खोलकर बाहर निकला और पिछला दरवाजा खोल दिया।

दोनों में से पहले ने डॉली को छोड़ा और कार की पिछली सीट पर बैठ गया।

तब दूसरे ने डॉली को पिछली सीट पर डाला—जिसे पहले ने भीतर खींच लिया—और फिर दूसरा भी भीतर प्रवेश कर गया।

ड्राईवर बना व्यक्ति पुनः स्टीयरिंग के पीछे बैठा और स्टार्ट कर दी।

जैसे ही कार आगे बढ़ी, ठीक तभी थोड़ी दूरी पर बाईक पर बैठे रंगीला ने भी बाईक स्टार्ट की और कार के पीछे लगा दी।

इधर कार की पिछली सीट पर डॉली पहले वाले व्यक्ति पर गिरी पड़ी थी—जिससे कि उस आदमी के भीतर पल-प्रतिपल आग भड़क रही थी। उसकी सांसें तेज चल रही थीं—और चेहरा लाल-भभूका हो गया था।

उसे ऐसा लगने लगा कि वह अपने साथ लगी आग को और ज्यादा देर बर्दाश्त नहीं कर पायेगा और जल्दी ही पिघल जायेगा।

जगवीर की तरफ से उन्हें हुक्म था कि उन्हें डॉली के किसी अंग को छूना नहीं। और अभी तक उन्होंने उसको कहीं से भी नहीं छुआ था।

मगर अब....!

अब उसे ऐसा लग रहा था कि मामला उसकी बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा है।

आखिर उसका सब्र जवाब दे ही गया।

उसने चोर निगाहों से अपने साथी की तरफ देखा।

वह सामने देख रहा था।

धीरे से उसका बायां हाथ ऊपर उठा और डॉली के शरीर पर जा पहुंचा।

जैसे ही उसने उसको दबाया—

करंट का तेज झटका लगा उसे।

उसका दिल किया कि वह अभी डॉली को सीट पर गिराये और उसे आगोश में ले ले।

“सम्भल के—।”

तभी उसके कानों में अपने साथी की फुंफकार पड़ी।

सिर से पांव तक कांप उठा वह—और हाथ फौरन नीचे गिर गया।

“म....मैं तो इसे सम्भाल रहा था।

वह हड़बड़ाते हुए अपने साथी से बोला—जो कि उसी की तरफ देख रहा था।

उसके भीतर पक रहा सारा लावा पानी में तब्दील हो चुका था।

“छातियों को पकड़कर सम्भाल रहा था।”

“न....हीं....म....मैंने तो....।”

“अब हाथ ऊपर न उठे।”

कहकर दूसरे ने गर्दन सीधी कर ली।

मन-ही-मन अपने साथी को सौ-सौ गालियां निकालते हुए पहला भी सामने देखने लगा।

डॉली की छातियां अभी भी उसकी बांह से टकरा रही थीं—मगर अब उस पर खौफ की ऐसी चादर पड़ गई थी कि उसे कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था।

कार पूरी गति से सड़क पर दौड़ रही थी।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
साढ़े दस बजे कार एक दोमंजिला कोठी के मेन गेट के सामने रुकी।

ड्राईवर ने हॉर्न बजाया।

‘पीं....पीं....!’

तुरंत कोठी का फाटक खुला और कार खुले गेट में प्रवेश कर हाई-वे पर आगे बढ़ने लगी।

गेट खोलने वाले ने तुरंत गेट बन्द कर दिया।

कार कम्पाऊंड के सामने आकर रुकी और उसी के साथ ही दूसरे व्यक्ति ने दरवाजा खोला और बाहर आ गया।

वापस मुड़कर वह झुका और डॉली की बांह पकड़कर उसे बाहर खींच लिया।

पीछे-पीछे पहला भी बाहर आ गया।

डॉली को सम्भाले दोनों कम्पाऊंड में दाखिल हुए और दरवाजे की तरफ बढ़े। तभी कोठी का मेन डोर खुला।

सामने उन्हीं की तरह पच्चीस-छब्बीस वर्ष का युवक था।

डॉली को देख वह एक तरफ हो गया।

दोनों भीतर दाखिल हो गये।

“उस्ताद को फोन कर दे कि शिकार आ गया है।” दूसरा दरवाजा खोलने वाले से बोला।

दरवाजा खोलने वाले ने सिर हिला दिया।

दोनों डॉली को सम्भाले हॉल में आये और सामने वाले कमरे में ले जाकर उसे डबलबेड पर लिटा दिया।

तभी दरवाजा खोलने वाला भीतर प्रविष्ट हुआ।

“फोन किया उस्ताद को?” पहला बोला।

“हां....उस्ताद आ रहा है। उसने कहा है कि इसके कपड़े उतार इसे नंगी कर दो।” उसने डॉली की तरफ इशारा किया—“और इसके हाथ-पैर बांध दो और फिर इसे इंजेक्शन लगा देना।”

सुनकर दोनों ने गहरी सांस छोड़ते हुए एक दूसरे को देखा।

बहुत बड़ा इम्तिहान था यह उनका।

बला-सी खूबसूरत और परियों जैसे हुस्न की मलिका के कपड़े उतारना और कुछ भी न करना—किसी इम्तहान से कम नहीं था। उससे आसान काम तो एवरेस्ट पर चढ़ना था।

मगर जगवीर का हुक्म था।

पालन तो करना ही था उन्हें।

दरवाजा खोलने वाला वापस चला गया।

अब डॉली की बांहें तथा टांगें चौड़ी होकर बेड के पांवों से बंधी हुई थीं—और वह सिर से पांव तक पूरी तरह से निर्वस्त्र थी।

उसकी आंखें सब कुछ देख तो रही थीं—मगर वह कुछ भी करने के काबिल नहीं थी।

“निकाल इंजेक्शन!”

दूसरे ने पहले से कहा।

पहले ने जेब से पहले एक सिरिंज निकालकर उसका रैपर फाड़ा और फिर जेब से एक शीशी निकालकर उसमें से सिरिंज भरी और इंजेक्शन डॉली के कूल्हे पर लगा दिया।

“अब चल....!”

पहला सीधा होते हुए बोला।

“हां....अगर....” दूसरा बोला—“और थोड़ी देर तक खड़े रहे तो एक बार फिर बाथरूम जाना पड़ेगा।” कहकर वह हौले से हंसा।

पहला भी हंसा। और आगे बढ़कर डॉली के कपड़े उठा लिये।

और फिर दोनों ने जी भर के पहले डॉली को देखा—फिर कमरे से बाहर निकल गये।

उसी के साथ ही कमरे का दरवाजा बन्द हो गया।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

इंजेक्शन ने जादू का-सा असर किया।

एक मिनट बीतते-बीतते डॉली पूरी तरह से ठीक हो चुकी थी।

होश में आते ही वह पहले तो हड़बड़ाई, फिर जैसे ही वह उठने को हुई—एक गहरी सांस उसके मुंह से निकल गई। उसे आभास हो गया कि वह बंधी हुई है।

तभी उसे अपने जिस्म पर ठण्डक का अहसास हुआ।

गर्दन उठाते हुए उसने अपने जिस्म पर निगाह मारी।

कपड़े का एक रेशा तक नहीं था उसके बदन पर।

उसे समझते देर नहीं लगी कि वह दुश्मन की कैद में है। और जिस तरह से उसे बेलिबास करके बांधा गया है, उससे दुश्मन की नीयत का साफ पता चल रहा था।

मगर उससे उसे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था। न जाने कितने ही लोगों से वह सम्बन्ध बना चुकी थी। सो दुश्मन की नीयत की तरफ से ध्यान हटाकर वह दुश्मन के बारे में सोचने लगी।

‘कौन हो सकता है वो....जिसने उसे कैद किया हुआ है?’

‘जगवीर।’

फौरन यह नाम उसके जेहन में कौंधा।

लेकिन जगवीर को कैसे पता चला कि वह उसी को पकड़ने यहां आई हुई है? जबकि उसने तो इस ऑपरेशन को गुप्त रखा हुआ था।

फिर उसे पता कैसे चल गया?

‘कांशी राणा।’

वह मन-ही-मन बड़बड़ाई।

एक वही था जिसे उसकी आमद का और आने के मकसद का पता चला था।

‘वो कांशी राणा जगवीर का कुत्ता है।’

वह मन-ही-मन बड़बड़ाई और उसी के साथ ही उसके जबड़े भिंचते चले गये। आंखों में कहर उभर आया।

दांतों पर दांत जमाये हुए उसने पूरी शक्ति से अपनी बांहों को झटका दिया।

मगर रस्सी ढीली होने की बजाये और भी टाईट हो गई।

एक ही झटके में वह समझ गई कि जोर-आजमाईश करनी बेकार है।

‘फिर क्या किया जाये?’

उसने मन-ही-मन सोचा।

अब तो दुश्मन के आने के बाद ही कुछ किया जा सकता है।

वह मन-ही-मन बड़बड़ाई।

तभी....

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
इधर कोठी का गेट बन्द हुआ—उधर रंगीला की बाईक ऐन गेट के सामने आकर रुकी।

सीट पर बैठे-बैठे ही उसने बन्द गेट की तरफ देखा—फिर बाईक को आगे बढ़ाकर थोड़ी दूर ले जाकर बाईक को सड़क से उतारकर वापस कोठी के सामने आ खड़ा हुआ।

इतना तो उसे यकीन हो चुका था कि उसकी फेवरिट डॉली खतरे में है और उसे खतरे से बचाने के लिये वह अपनी जान की बाजी लगाने को भी तैयार था।

कुछ देर तो वह यूं ही कोठी के सामने खड़ा चारदीवारी को देखता रहा—फिर हिम्मत करके चारदीवारी की तरफ बढ़ा।

हथियार के नाम पर उसके पास सुईं तक नहीं थी। फिर भी वह हिम्मत कर रहा था।

उसने चारदीवारी के सिरे को पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा।

चारदीवारी पर चढ़ने के लिये उसे काफी मशक्कत करनी पड़ी थी—और इसी मशक्कत में उसके घुटने भी छिल गये थे।

मगर वह कामयाब हो गया था।

उसने चारदीवारी पर लेटकर ही भीतर झांका।

गेट के करीब उसे एक आदमी कुर्सी पर बैठा नजर आया, जिसकी पीठ उसी की तरफ थी।

रंगीला धड़कते दिल से लटककर नीचे उतरा।

वह जानता था कि अगर गेट पर बैठे आदमी ने उसे देख लिया तो उसका बचना नामुमकिन हो जायेगा—तो वह अपनी तरफ से पूरी तरह से चौकन्ना हो अंधेरे में लुकते-छिपते दीवार के साथ लगते हुए आगे बढ़ा और कोठी के बराबर से निकलकर पीछे के लॉन में आ गया।

अंधेरे में दुबककर उसने पीछे का नजारा किया।

कोई भी नजर नहीं आया उसे।

आश्वस्त हो वह कोठी की पिछली साईड की पहली खिड़की के करीब आया—और आहिस्ता से भीतर झांका।

कमरे में उसे तीन आदमी बैठे नजर आये, जो किसी बात पर हंस रहे थे—मगर खिड़की पर लगे शीशे के कारण उसे उनकी हंसी की आवाज नहीं आ रही थी। उनमें से दो तो वही थे जिन्हें उसने होटल में देखा था।

इस वक्त रंगीला का कलेजा धाड़-धाड़ कर उसकी पसलियों से टकरा रहा था।

वह झुका और खिड़की के नीचे से होते हुए आगे बढ़ गया।

अगले कमरे की खिड़की के करीब आकर उसने भीतर झांका।

कमरा पूरी तरह से खाली था।

रंगीला अगले कमरे की तरफ बढ़ा।

तीसरे कमरे की खिड़की में से उसने जैसे ही भीतर झांका—उसका कलेजा उछलकर उसके हलक में आ फंसा। बेड पर निर्वस्त्र बंधी हुई डॉली उसके सामने थी।

डॉली को बेलिबास देखकर भी उसके दिल में कोई गलत भावना नहीं आई।

सीधे होकर उसने सावधानी बरतते हुए पहले इधर-उधर देखा, फिर खिड़की के पट को धकेला।

खुशकिस्मती से पल्ला भीतर से बंद नहीं था।

रंगीला ने राहत की सांस ली और खिड़की में चढ़कर भीतर कूद गया।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 

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