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Thriller हाफ़ मेंटल

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Thriller हाफ़ मेंटल

“लो बॉस —एक पैग लगा लो।”

“ऊहूं....मैं ऐसे नहीं पीयूंगा।”

“तो फिर कैसे पीयेंगे बॉस ?”

“मुर्गा ला साथ में। मुर्गा समझता है न दो टांगों वाला—एक चोंच वाला—लाल रंग का।”

“मैं समझ गया बॉस । मैं अभी लाया।”

कहकर भीमा ने अपने पीछे खड़ी युवती की तरफ इशारा किया जो कि सिर्फ पैंटी और ब्रा पहने हुए थी।

युवती तुरंत वहां से हटी और शीघ्र ही वह वापस लौटी तो उसके हाथ में एक प्लेट थी जिसमें कि भुना हुआ मुर्गा था।

भीमा ने उससे प्लेट ली और सिंहासन नुमा कुर्सी की तरफ मुड़ा जिस पर सफेद रंग का कुर्ता-पायजामा पहने करीब पचास साल का व्यक्ति बैठा था।

उसका कुर्ता-पायजामा इस कदर मैला हो रहा था मानो कई दिनों से उसने वही पहन रखा हो। जगह-जगह राल टपकने के निशान पड़े हुये थे।

कुर्ता-पायजामा पहने वह शख्स कुणाल ठाकुर था।

कुणाल ठाकुर का इस वक्त का हुलिया बहुत बिगड़ा हुआ था—उसके सफेद बाल उलझ रहे थे—आंखों में सूनापन नजर आ रहा था—दाढ़ी बढ़ी हुई थी और चेहरा पसीने के जम जाने से काला हो रहा था।

गोल चेहरे वाला कुणाल ठाकुर अण्डरवर्ल्ड का बेताज बादशाह था।

उसे जानने वाले कहते हैं कि वह बिहार का रहने वाला था। वहां किसी बात पर उसका पड़ोसी से झगड़ा हो गया और उसने गुस्से में आकर उस पूरे परिवार को ही जिन्दा जला डाला था और फिर वहां से भागकर यहां रामनगर में आकर रिक्शा चलाने लगा।

एक रिक्शा चालक से तरक्की करते-करते आज वह अण्डरवर्ल्ड का डॉन बना हुआ था।

बड़े-बड़े लीडर—पुलिस अफसर उसके दरबार में आकर उसे सलाम करते थे।

वह जिसके भी सिर पर हाथ रख देता—उसका तो समझ लो बेड़ा पार हो गया और जिस पर उसकी नजर टेढ़ी पड़ जाती, समझो उस पर शनि सवार हो गया।

इस वक्त वह अपनी सिंहासन नुमा कुर्सी पर पैर रखे घुटनों को छाती से लगाये कुछ सहमा-सहमा-सा नजर आ रहा था।

उसकी आंखें बता रही थीं कि उसका दिमाग कुछ हिला हुआ है।

भीमा—

गैंडे जैसा सख्त शरीर वाला काले रंग का व्यक्ति उसका बॉडीगार्ड होने के साथ-साथ उसका दायां हाथ भी था।

उसने पैग और प्लेट कुणाल ठाकुर के सामने रखी और उदास स्वर में बोला—

“लीजिये बॉस —मुर्गा भी आ गया।”

अण्डरवर्ल्ड में कुणाल ठाकुर को बॉस के नाम से ही जाना जाता था।

चिकन देखकर कुणाल ठाकुर ऐसे खुश हुआ—जैसे किसी बच्चे को उसकी मनपसंद डिश मिल गई हो।

उसने तुरंत प्लेट में से मुर्गा उठाया और उसकी एक टांग तोड़कर बाकी का मुर्गा प्लेट में वापस रखा और भीमा से पैग लेकर उसकी तरफ देखा।

“खा लूं?” वह ऐसे सिर हिलाकर बोला जैसे खाने की इजाजत मांग रहा हो।

भीमा ने जबरदस्ती होंठों पर मुस्कान लाते हुए इजाजत देने वाले अंदाज में सिर हिलाया।

कुणाल ठाकुर ने टांग को पैग में डुबोया और फिर उसे खाने लगा।

घिन लाने वाली हरकत थी यह उसकी। मगर भीमा के चेहरे पर जरा भी घिन नहीं थी।

“ऐसे तो बड़ा मजा आता है।” वह खुश होते हुए बोला।

“हमें तो बॉस की खुशी चाहिये बस।” भीमा होंठों पर मुस्कान लाते हुए बोला।

टांग खाते हुए ही कुणाल ठाकुर ने सामने देखा—

सात आदमी हाथ बांधे खड़े थे उसके सामने।

वे सभी कुणाल ठाकुर के वफादार थे।

“तुम सब भी मजा लो।” वह टांग आगे कर उन सातों की तरफ घुमाते हुए बोला—“इन सभी को मुर्गा दो और पैग पिलाओ।”

बात करने के दौरान ही दो बार उसके मुंह से थूक निकलकर उसके कपड़ों पर गिरी—साथ ही दांतों द्वारा पिसा हुआ गोश्त भी थोड़ी बहुत मात्रा में टपका।

“जो हुक्म बॉस ।”

भीमा तुरंत बोला और गर्दन पीछे मोड़ अपने पीछे खड़ी युवती की तरफ देखा।

युवती उसके इशारा करने से पहले ही समझ गयी—सो वह तुरंत मुड़ी और हॉल से बाहर निकल गई।

कुणाल ठाकुर टांग को बार-बार शराब में डुबोकर उसे खा रहा था। ऐसे में शराब तथा उसकी राल उसके कपड़ों पर बार-बार गिर रही थी।

थोड़ी देर बाद युवती हाथों में बड़ी ट्रे उठाये वहां पहुंची और भीमा के इशारे पर वहां खड़े सातों आदमियों के सामने जा खड़ी हुई।

ट्रे में सात गिलास शराब से लबालब भरे थे और एक प्लेट में मुर्गे की टांगें रखी थीं। बारी-बारी से सभी एक-एक गिलास और टांग उठाने लगे।

युवती उनके सामने से हटी तो सभी के हाथों में एक-एक गिलास था और दूसरे हाथ में टांग थी।

“खाओ....खाओ! बड़ा मजा आयेगा।”

कुणाल ठाकुर टांग वाला हाथ हिलाते हुए बोला।

सभी सातों ने अपने-अपने हाथ में पकड़ी टांग गिलासों में डुबोई और उसे खाने लगे।

कुणाल ठाकुर अपनी आंखें चमकाते हुए सभी को देख रहा था।

तभी उसकी चमकती आंखों में सहसा ही कहर उभर आया।

चेहरा वीभत्स हो उठा।

उसकी खूंखार हो रही आंखें दायीं तरफ के दूसरे व्यक्ति पर टिकी हुई थीं—जिसका चेहरा ऐसा हो रहा था जैसे उसे मांस को इस तरह खाने से घिन हो रही हो।

सहसा ही कुणाल ठाकुर के हाथ में थमी मुर्गे की टांग उसके हाथ से छूटी और सीधी उस व्यक्ति के मुंह पर जा पड़ी।

बुरी तरह से हड़बड़ा उठा वह।

इधर कुणाल ठाकुर ने फौरन जेब से रिवॉल्वर निकाली और—

‘धांय!’

गोली सीधी उस व्यक्ति के सीने में जा धंसी।

हाथ में पकड़ा पैग और मुर्गे की टांग उसके हाथ से छूट गईं और वह सीने को पकड़े औंधे मुंह कटे वृक्ष की तरह फर्श पर जा टकराया।

“साला हरामी—मुंह बना रहा था—!” गुस्से में गुर्राया कुणाल ठाकुर—“इतनी स्वादिष्ट टांग खा रहा था—वो भी फोकट में—फिर भी मुंह बना रहा था।”

सभी के चेहरे सन्न रह गये।

निगाहें उस लाश पर जा अटकीं जो अभी पल भर पहले हाथों में जाम और मुर्गे की टांग पकड़े था।

वही जाम अब कई टुकड़ों में बंटा उसके आसपास बिखरा हुआ था—और मुर्गे की टांग उसके गाल के नीचे दबी हुई थी।

कुणाल ठाकुर ने टांगें लटकाईं और पैरों को फर्श पर टिकाते हुए खड़ा हो गया।

जेब में रिवॉल्वर रखते हुए उसने बाकियों की तरफ देखा।

“तुम क्यों रुक गये—खाओ-खाओ।”

सभी ने तुरंत मुर्गे की टांगें शराब में डुबोईं और ऐसे खाने लगे जैसे वे जिन्दगी में पहली बार ऐसी स्वादिष्ट चीज खा रहे हों।

कुणाल ठाकुर ने रिवॉल्वर कमीज की साईड की जेब में डाली और कमीज से हाथ पौंछते हुए लाश की तरफ बढ़ा।

लाश के करीब आकर वह झुका और लाश के गाल के नीचे दबी मुर्गे की टांग को खींचकर उसे अपने बायें हाथ में पकड़े गिलास में डुबोया और चटखारे लेकर खाने लगा।
 
भीमा का दिल कर रहा था कि वह जोर-जोर से रोने लगे। उसका दिल रो भी रहा था—लेकिन अपनी आंखों में आंसू नहीं आने दिये उसने।

कल तक जो कुणाल ठाकुर दूसरों के सामने अपनी जूठन फैंकता था, आज वो किसी दूसरे की जूठन खा रहा था।

वो भी मजे ले-लेकर खा रहा था।

मगर वह बोला कुछ नहीं, मन-ही-मन अपने आंसुओं को पी गया।

जब कुणाल ठाकुर ने टांग खा ली और पैग पी लिया तो भीमा उसके करीब आया और बड़े ही अपनत्व भरे स्वर में बोला—

“आपके सोने का वक्त हो गया है बॉस ।”

“सोने का वक्त हो गया?” आंखें फाड़ते हुए बोला कुणाल ठाकुर।

“हां बॉस ।”

“तो फिर चल—सुला मुझे और बढ़िया-सी लोरी सुनाना।”

“चलो।”

कहकर उसने छहों को लाश उठाने तथा वहां से जाने का इशारा किया और फिर कुणाल ठाकुर को अपने साथ लेकर हॉल के दायीं तरफ के दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

वह अर्धनग्न युवती उनके पीछे-पीछे चल रही थी।

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अपने कमरे में फर्श पर बैठा भीमा फर्श पर घूंसे मारे जा रहा था। उसकी आंखों में आंसू भरे हुए थे और चेहरे पर कहर झलक रहा था।

साफ नजर आ रहा था कि वह गुस्से में तो है लेकिन कुछ कर नहीं पा रहा।

भीमा का वह कमरा काफी खूबसूरती से सजा हुआ था।

कमरे के बीचों-बीच शानदार डीलक्स साईज का बेड लगा हुआ था जिस पर कि सफेद सिल्क की चादर बिछी थी।

बेड के करीब ही एक शानदार सोफा सैट था जिसके बीच में सैंटर टेबल पड़ी थी। दायीं तरफ कोने में एक टी.वी. स्टैण्ड पर टी.वी. रखा हुआ था।

पूरा कमरा एयरकंडीशंड था।

मगर वह बैठा हुआ था नंगे फर्श पर और बायें हाथ की हथेली फर्श पर टिकाये दायें हाथ से फर्श पर घूंसे मार रहा था।

तभी कदमों की आहट सुनकर उसने अपना आंसुओं से भरा चेहरा उधर घुमाया।

करीब तेईस-चौबीस साल का अच्छी सेहत और लम्बे कद वाला युवक भीतर प्रवेश कर रहा था।

उसके चेहरे पर चेचक के दाग थे जो उसकी सारी खूबसूरती को खराब कर रहे थे। वर्ना उसकी पर्सनाल्टी काफी अच्छी थी।

उसके चेहरे पर भी उदासी और गुस्से के मिलेजुले भाव थे।

वह कबीर था, कबीर प्रसाद।

कुणाल ठाकुर का लड़का—उसका लख्ते जिगर।

अपने बेटे को वह कबीर नहीं कबीरा कहकर बुलाता था।

कबीर को देख भीमा की आंखों से बहने वाले आंसुओं में तेजी आ गई।

“छोटे बाबू....!” उसकी आवाज भर्रा गई—“यह क्या हो गया बॉस को?”

“सब ठीक हो जायेगा भीमा अंकल।” उसके करीब आकर गहरी सांस छोड़ी कबीर ने—“सब ठीक हो जायेगा—बस एक बार उस औरत का पता चल जाये जिसने भद्रानाथ चाचू को मारा है। फिर देखना कैसे ठीक होंगे बॉस ।”

“यही तो पता नहीं चल रहा छोटे बाबू।” भीमा फिर से फर्श पर मुक्का मारते हुए बोला—“उसी हरामन की वजह से ही तो बॉस की यह हालत हुई है। एक मामूली-सी औरत भद्रानाथ जी को खत्म कर गई। यही सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाये बॉस —जिसका सीधा असर उनके दिलो-दिमाग पर पड़ा और वे आधे पागल हो गये। जिस भद्रानाथ के सामने बड़े-बड़े सूरमाओं का पेशाब निकल जाता था—उस भद्रानाथ को एक औरत ने मार डाला—कैसे विश्वास किया जा सकता है? बॉस को भी यह सुनकर विश्वास नहीं हुआ था। मेरी आंखों के सामने आज भी वह दृश्य उभरता है तो मैं सिहर उठता हूं। कितने खुश थे उस दिन बॉस । इनाम बांट रहे थे वे सभी को जब....।”

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“शाबाश मेरे शेर....शाबाश।” कुणाल ठाकुर एक व्यक्ति के सामने खड़ा उसके कंधे पर थपकी दे रहा था—“कमाल कर दिया तूने तो—एक ही झटके में तूने मुझे चार करोड़ का फायदा करा दिया। वो भी बिना कोई खर्च किये।”

“मैं तो आपका एक तुच्छ सेवक हूं बॉस —और मेरा सबसे पहला फर्ज आपकी वफादारी बनता है और दूसरा आपकी तिजोरी भरना।”

“वाह, क्या डायलॉग मारा है।” हंसा कुणाल ठाकुर— “भीमा....!” उसने अपने पीछे खड़े भीमा को पुकारा।

तुरंत भीमा उसके पीछे से निकलकर उसके बराबर आ खड़ा हुआ।

“जी बॉस ।” वह बोला।

“अरे भई—इन्होंने हमारे लिये इतना कुछ किया”—उसने वहां खड़े चार व्यक्तियों की तरफ इशारा किया—“अब हमारा भी तो कुछ फर्ज बनता है न कि हम भी इन्हें कुछ दें।”

“हुक्म करें बॉस ।”

“चारों को पांच-पांच लाख रुपये हमारी तरफ से बतौर इनाम दिये जायें।”

चारों के चेहरे ऐसे खिल गये जैसे उनके भीतर खुशी का पुतला उछलकूद मचा रहा हो।

“जो हुक्म बॉस ।” भीमा बोला।

“तो फिर खड़ा क्यों है, जाकर बीस लाख लेकर आ—हम अपने हाथों से इनाम देंगे इन्हें।”

भीमा ने सिर हिलाया और जैसे ही वह वहां से हटने को हुआ, तभी वहां एक व्यक्ति पहुंचा।

“दीनापुर से एक आदमी आया है बॉस ।” वह सिर को झुकाते हुए बोला—“अपना नाम जैकी बता रहा है और आपसे फौरन मिलना चाहता है।”

दीनापुर का नाम सुनते ही कुणाल ठाकुर का चेहरा खिल उठा।

“जैकी तो अपने यार भद्रा का आदमी है। जा ले के आ उसे।”

वह आदमी वापस मुड़ा और बाहर निकल गया।

शीघ्र ही जैकी हॉल में दाखिल हो उसकी तरफ बढ़ा।

उसकी उखड़ी हुई सांस और घबराया हुआ चेहरा देखकर कुणाल ठाकुर बुरी तरह से चौंक उठा—साथ ही उसके जेहन में अंजान आशंकायें सिर उठाने लगीं।

“क्या बात है?” जैकी के अपने करीब आते ही वह बोला—“मुंह क्यों उतरा हुआ है तेरा—सब खैरियत तो है न?”

सहसा ही जैकी फफकते हुए कुणाल ठाकुर के पैरों में गिर पड़ा।

“हम लुट गये बॉस !” वह उसके पैरों को अपने आंसुओं से धोते हुए बोला—“बर्बाद हो गये।”

उसकी इस हरकत पर बुरी तरह से हड़बड़ा उठा कुणाल ठाकुर।

झुककर उसने उसे कंधों से पकड़कर खड़ा किया और आंसुओं से भीगे चेहरे को देखते हुए गुर्राया—

“क्या हुआ? मेरा यार ठीक तो है न?”

“ब....बॉस नहीं रहे।” जैकी पुनः फफक पड़ा।

कुणाल ठाकुर के पैरों तले से धरती खिसक गयी। भद्रा की मौत की खबर से उसे बहुत ही गहरा सदमा लगा।

“मेरा भद्रा मर....गया?” उसने सिर को अपने दायें कंधे की तरफ झुकाया।

“ह....हां बॉस ।”

“नहीं....तू....तू झूठ बोलता है....बकवास करता है तू। दुनिया की ऐसी कोई ताकत नहीं जो भद्रा का बाल भी बांका कर सके। उसकी ताकत को जानता हूं मैं....वह इतनी आसानी से मरने वाला नहीं। क....कैसे मरा....हार्ट अटैक हुआ क्या उसे?”

“न....हीं....।” रोते हुए बोला जैकी।

“तो क्या उसने खुद को गोली मार ली?”

“न....हीं।”

“तो फिर कैसे मर सकता है वह? क्या मिलिट्री ने तोपखाना लाकर उस पर हमला किया?”

“उन्हें एक लड़की ने मारा था।”

“लड़की ने!” बुरी तरह से उछल पड़ा कुणाल ठाकुर।

“हां बॉस ....बीच चौराहे पर बॉस को उसने पीट-पीटकर मार डाला।”

कुणाल ठाकुर के जेहन को जबरदस्त झटका लगा।

“य....यह क्या कह रहा है तू? एक औरत ने हाथों से पीट-पीटकर भद्रा को मार डाला?”

“ह....हां बॉस ....अ....और मारा भी सैंकड़ों लोगों के बीच।”

“और उसके वफादार कहां थे....तू कहां था उस वक्त?”

“मैं तो बॉस के काम से दिल्ली गया हुआ था। मेरे पीछे ही उस औरत ने न सिर्फ बॉस का साम्राज्य खत्म कर दिया बल्कि बॉस को भी मार डाला।”

“कमाल है....एक मामूली औरत ने भद्रा को मार डाला! वह भद्रा जो अपने एक ही घूंसे से दीवार को तोड़ने की ताकत रखता था—उसे एक औरत ने मार डाला!”

“ह....हां....बॉस ।”

“तो फिर तू जिन्दा क्यों है? भद्रा के साथ तू क्यों नहीं मर गया?”

सहसा ही काले नाग की तरह फुंफकार उठा वह।

कुणाल ठाकुर के इस बदले रूप को देख बुरी तरह से कांप उठा जैकी।

“ब....बॉस ....म....मैं....।”

बात भी पूरी नहीं कर पाया वह कि कुणाल ठाकुर ने रिवॉल्वर निकालकर उस पर फायर कर दिया।

‘धांय....!’

गोली सीधी जैकी के कलेजे में जा धंसी।

जैकी जोरों से चीखा और वहीं गिरकर छटपटाने लगा।

तभी कुणाल ठाकुर की रिवॉल्वर उसके चारों वफादारों की तरफ घूमी।

रिवॉल्वर का रुख अपनी तरफ होते देख चारों के तो देवता ही कूच कर गये।

“मेरा यार मर गया....।” कुणाल ठाकुर कहर भरे स्वर में बोला—“एक मामूली औरत ने उसे बीच चौराहे में सैकड़ों लोगों के बीच मार डाला—और तुम्हारी आंखों में एक भी आंसू नहीं आया। जबकि मुझे देखो—मैं रो रहा हूं....मेरा दिल रो रहा है। नहीं, तुम मेरे वफादार नहीं हो सकते—और ऐसे कुत्तों को जिन्दा रहने का कोई हक नहीं।”

कहने के साथ ही वह ट्रेगर दबाता चला गया।

‘धांय....धांय....धांय....धांय....!’

उसकी रिवॉल्वर ने एक के बाद एक चार शोले उगले—और वे चारों कटे वृक्षों की तरह एक-दूसरे से उलझते हुए नीचे गिर पड़े।

बेचारे।

कहां उन्हें पांच-पांच लाख इनाम मिल रहा था और कहां उन्हें सिर्फ एक-एक गोली मिली।

उसने रिवॉल्वर वाली बांह नीचे लटकाई और भीमा की तरफ मुड़ा।

“मैंने इन्हें मारकर ठीक किया न भीमा?”

वह अपनी आंखें चौड़ी करते हुए बोला। उसका निचला होंठ नीचे लटक गया था और वहां से दो बूंदें राल की टपक रही थीं। उसका यह बदला हुआ रूप देखकर भीमा भीतर-ही-भीतर कांप उठा।

साफ नजर आ रहा था कि इस वक्त उसका दिमाग अपने काबू में नहीं है।

और यह सच भी था।

भद्रानाथ की मौत को बर्दाश्त नहीं कर पाया था वह। सहसा झटका लगा था उसे और वह अपना दिमागी संतुलन खो बैठा था।

“ह....हां बॉस ।” भीमा हड़बड़ाते हुए बोला—“अ....आपने बिल्कुल ठीक किया।”

सहसा ही कुणाल ठाकुर की आंखें भर आईं।

“एक लड़की ने—एक मामूली लड़की ने मेरे यार को मार डाला—वो भी सरे बाजार—बीच चौराहे पर। मुझे उस लड़की का नाम पता चाहिये—जरा मैं भी तो देखूं—क्या बला है वो। ऐसी क्या खासियत है उसमें जो उसने मेरे हाथी जैसे ताकतवर यार को मार डाला।”

“जो हुक्म बॉस । अब आप यह रिवॉल्वर मुझे दे दीजिये।”

कहते हुए उसने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

निश्चय ही भीमा को यह डर लग रहा था कि कहीं उस पर फिर से पागलपन का दौरा सवार न हो जाये।

“क्यों?”

गुर्राया कुणाल ठाकुर—साथ ही उसके माथे पर बल पड़ गये।

“रिवॉल्वर खाली हो चुकी है बॉस —इसे लोड भी तो करना है।”

“अभी एक गोली है इसमें....” कहते हुए कुणाल ठाकुर ने रिवॉल्वर उस पर तान दी—“चलाकर दिखाऊं?”

भीमा पहले तो हड़बड़ाया—फिर उसके होंठों पर भीगी मुस्कान फैल गई।

“चलाइये बॉस !” वह बोला—“आपके हाथों मरूंगा तो दिल को तसल्ली तो रहेगी कि मैंने अपनी वफा निभाई।”

“न....न....न....!” कुणाल ठाकुर ने सिर दायें-बायें हिलाया—“बेवकूफ समझता है क्या तू मुझे—अगर तू ही मर गया तो उस हरामन को कौन ढूंढेगा—जिसने मेरे यार को मारा....साली एक मामूली औरत मेरे यार को मार गई।”

वह बच्चों की तरह बिलख पड़ा और वहीं फर्श पर बैठ गया।

आसपास लाशें बिखरी हुई थीं—और वह बार-बार भद्रानाथ को याद करते हुए रो रहा था। साथ ही वह बार-बार वही डायलॉग दोहरा रहा था कि एक मामूली-सी औरत ने उसके यार को मार डाला।
 
“बस उसी दिन से बॉस आधे पागल हो गये।” भर्राये स्वर में कह रहा था भीमा—“कभी एकदम ठीक हो जाते हैं तो कभी पूरे पागल हो उठते हैं। अपना आपा खो बैठते हैं और सामने जो भी होता है उसे खत्म कर देते हैं। डॉक्टर टंडन ने साफ कह दिया है कि जब तक बॉस खुद अपने हाथों से उस औरत को खत्म नहीं करेंगे, तब तक वे ऐसे ही पागल बने रहेंगे। मगर वो औरत है कि उसका पता ही नहीं चल रहा। यहां तक कि उसका नाम भी पता नहीं चल पा रहा। महीना भर से ऊपर हो गया है और अभी तक उस औरत का कुछ भी पता नहीं चल पा रहा—जबकि मैंने पचास आदमी दीनापुर में उसकी तलाश में लगा रखे हैं। पता नहीं कब उस हरामन का पता चलेगा—कब बॉस उसे मारेंगे और कब वो ठीक होंगे?”

कहते हुए वह दरिंदा फफक पड़ा।

“हौंसला रखो भीमा अंकल।” कबीर उसके करीब बैठते हुए गम्भीर लहजे में बोला—“कभी-न-कभी तो उसका पता चलेगा ही। बस यूं समझ लो कि अभी तक वह अपनी खुशकिस्मती के कारण ही हमारी निगाह में नहीं चढ़ पाई। आखिर कभी तो उसकी बदनसीबी उस पर सवार होगी। और जिस दिन भी ऐसा हुआ—उसी दिन उसका क्रियाकर्म हो जायेगा।”

“पता नहीं कब आयेगा वो दिन?” ठण्डी सांस भरते हुए बोला भीमा।

“आयेगा—जरूर आयेगा। मुझे देखो—मैं तो बॉस का अपना खून हूं। मैं भी तो सब्र रखे हुए हूं।”

“मैं....आप नहीं छोटे बाबू....मैं....।”

बात बीच में ही रह गई भीमा की—उसके मोबाईल की घण्टी बज उठी थी।

‘ट्रिन....ऽ....ऽ....।’

उसने अपनी जेब से मोबाईल फोन निकाला और उसकी स्क्रीन पर निगाह डाली।

“दीनापुर से आया है फोन।” वह चौंकते हुए बोला।

“देखो....किसका फोन है?” कबीर के स्वर में भी हल्की उत्तेजना उभर आई।

भीमा ने ओ.के. का बटन दबाया और मोबाईल कान से लगाते हुए बोला—

“हैलो....!”

“मैं सलीम बोल रहा हूं मास्टर।”

दूसरी तरफ से आती आवाज को सुन भीमा और भी सतर्क हो गया।

सलीम को उसने अन्यों के साथ दीनापुर भेजा हुआ था।

“हां बोल....क्या रिपोर्ट है?” वह बोला—“पता लगा उस औरत का?”

“नहीं मास्टर....!”

भीमा के चेहरे पर निराशा फैल गई।

“फोन क्यों किया?” वह भरे स्वर में बोला।

“वो औरत तो नहीं मिली मास्टर, मगर हमें उस आदमी का पता चल गया है जिसने उस औरत को दीनापुर में बुलाया था।”

“य....यानि वह औरत दीनापुर की नहीं थी?” चौंकते हुए बोला भीमा।

“यस मास्टर।”

“उस आदमी से पूछताछ की?”

“वो यहां नहीं है।”

“क्या मतलब?”

“वो रामनगर में अपनी रिश्तेदार की मौत में गया हुआ है।”

“या....नि वो हरामी यहां आया हुआ है?”

“यस मास्टर?”

“कहां?”

दूसरी तरफ से एक पता बताया गया।

“नाम बोल उसका।”

“भीम....रंगीला।”

भीमा ने आगे कुछ भी सुनने की जरूरत नहीं समझी। तुरंत उसने मोबाईल बन्द किया और फर्श पर खड़ा हो गया।

“क्या कह रहा था सलीम?” कबीर भी उसके साथ खड़ा होते हुए बोला।

भीमा ने उसे सब कुछ बताया। फिर बोला—“अब उस हरामन का पता लगने में देर नहीं लगेगी। मैं रंगीला नाम के उस कुत्ते के हलक में हाथ देकर उगलवा लूंगा कि उसने किसे बुलाया था—बस एक बार पता लगने की देर है—फिर उसे यहां लाने में देर नहीं लगेगी।”

कहते हुए गुस्से से भीमा के नथुने फूलने-पिचकने लगे।

“इस काम को आप ही अंजाम दीजिये भीमा अंकल—रंगीला को लेने आप ही जाइये।”

“वो तो मैं ही जाऊंगा।”

कहते हुए भीमा के मुंह से कुत्ते की-सी गुर्राहट उबली और आंखों में कहर बरसने लगा।

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“राम नाम....!”

“सत्य है।”

“सच बोलो।”

“गत है।”

शवयात्रा में एक आदमी ‘राम नाम’ कह रहा था—और बाकी के ‘सत्य है’ बोल रहे थे।

आगे चार आदमी एक अर्थी को कंधा दिये चल रहे थे—उसके आगे करीब बीस-बाईस साल का युवक बनियान और धोती पहने चल रहा था—जिसके हाथ में थाली थी और थाली में जौं के आटे के बने पिंड रखे थे—साथ में एक लोटा था जिसमें से वह थोड़ा-थोड़ा पानी निकालकर छींटें मार रहा था। साथ-साथ वह रोता भी जा रहा था।

अर्थी के पीछे लोगों का हुजूम था।

शवयात्रा उस वक्त कुरानी रोड से निकल रही थी—जब एकाएक एक ओपन जीप सामने से आई और सबसे आगे चल रहे लड़के के सामने आ खड़ी हुई।

थाली पकड़े पानी का छिड़काव कर रहे युवक का रोना एकदम से रुक गया।

अब उसके चेहरे पर आतंक की छाया साफ नजर आ रही थी।

“मा....स्टर।” उसके होंठों से कांपता स्वर निकला।

हां....जीप की ड्राइविंग सीट पर भीमा ही बैठा था। और पीछे की सीटों पर स्टेनगनों से लैस छह आदमी बैठे थे।

युवक के रुकते ही उसके पीछे अर्थी को कंधा दे रहे चारों व्यक्ति भी रुक गये।

युवक की तरह उनके चेहरे भी फक्क पड़े हुए थे—और आंखों में आतंक नजर आ रहा था।

तभी जीप के पीछे बैठे गुण्डे हाथों में स्टेनगन पकड़े छलांग लगाकर नीचे उतरे और युवक के सामने आ खड़े हुए।

“ऐ....नीचे रखो मुर्दे को!” एक गुण्डा गुर्राया।

इन्कार करने की हिम्मत किसमें थी।

तुरंत चारों ने अर्थी को कंधे से उतारा और खड़े हो गये।

भीमा अपनी सीट से उतरा और आगे आकर जीप के बोनट पर आ बैठा।

“सभी को नीचे बिठाओ।” वह गुर्राया।

“सारे नीचे बैठ जाओ।” एक अन्य गुण्डा दहाड़ा।

अर्थी के पीछे चल रहे लोगों को अब तक भीमा का पता चल चुका था—सो वे नीचे बैठने लगे।

तभी एक आदमी खड़ा हुआ और आवेश भरे स्वर में बोला—

“यह कैसी गुण्डागर्दी है जो शवयात्रा के....आ ऽ ऽ ऽ!”

बाकी के शब्द चीख में तब्दील हो गये उसके।

एक गुण्डे ने अपनी गन का मुंह खोल दिया था, और तड़-तड़ करती दर्जनों गोलियां उसकी खोपड़ी में जा समाई थीं। उसका जिस्म जोरों से उछला और आसपास बैठे व्यक्तियों पर जा गिरा।

हड़बड़ाते हुए वे लोग इधर-उधर छितरा गये और वह व्यक्ति लाश में तब्दील हो नीचे सड़क पर गिर गया।

उसकी मौत से भीड़ में से कुछ घुटी-घुटी चीखें जरूर निकली थीं—मगर कोई विरोध करने के लिये खड़ा नहीं हुआ।

हां—आखिर के जो कुछ लोग खड़े थे—वे फौरन नीचे बैठ गये।

इधर सबसे आगे खड़े लड़के ने पीछे देखा—फिर बुरी तरह से थर-थर कांपते हुए भीमा को देखने लगा।

भीमा बोला कुछ नहीं, बस उंगली के इशारे से उसे अपनी तरफ बुलाया।

युवक कांपती टांगों पर किसी तरह अपना वजन सम्भाले उसकी तरफ बढ़ा और उसके सामने आ खड़ा हुआ।

“अभी-अभी जो मरा वो कौन था?” भीमा उसे घूरते हुए बोला।

“म....मेरा प....पड़ोसी था।” युवक के मुंह से कांपता स्वर निकला।

“और जो अर्थी पर पड़ा है वो कौन है? तेरी मां—या बाप?”

“म....मां....!” युवक की आवाज भर्रा गई।

“च....च....च....!” भीमा ने अफसोस जताया।

सहसा ही युवक उसके पैरों को पकड़ रोने लगा।

“म....मेरी मां की मिट्टी खराब मत करो मास्टर! तुम....।”

“घबरा नहीं....कुछ नहीं होगा तेरी मां की मिट्टी को....सीधा खड़ा हो।”

युवक कांपते हुए—आंसू बहाते हुए खड़ा हो गया।

“मुझे बस एक आदमी की तलाश है।” वो ही प्यार से बोला भीमा—“और इस वक्त वो इन्हीं लोगों में है।” उसने दूर तक नजर आ रहे सिरों की तरफ बांह लम्बी की—“बस तू हमें यह बता दे कि वो कहां है—फिर तू अपनी मां की लाश को ले जाकर फूंक सकता है। वर्ना तुझे एक नहीं बल्कि इन सभी की लाशें फूंकनी होंगी।”

युवक ने जोरों से थूक सटकी।

“क....किसकी तलाश है?”

“दीनापुर में कौन रहता है तेरा?”

“मौसी।”

“तेरे मौसा का नाम बोल।”

“भ....रंगीला।”

“बस वही चाहिये मुझे....पीछे मुड़ और बोल....कौन है रंगीला?”

भीमा के कहर के बारे में रामपुर का बच्चा-बच्चा जानता था। रामपुर का शायद ही कोई ऐसा आदमी होगा जिसने सरेआम कत्ल होते न देखा हो। रामपुर में कभी भी कहीं भी कुछ भी अनर्थ हो सकता था—मगर उस अनर्थ का विरोध करने वाला कोई नहीं होता। यहां तक कि पुलिस भी उस अनर्थ को होते देख आंखें मूंद लेती थी।

यूं समझ लो कि एक तरह से जानवरों की जिन्दगी जी रही थी रामपुर की जनता।

किसी की भी जिन्दगी का कोई भरोसा नहीं था। किसी की भी बहन-बेटी सुरक्षित नहीं थी।

जब भी दिल करता बॉस के गुण्डे आते और किसी भी लड़की को उठाकर ले जाते।

रामपुर में कानून का नहीं बॉस का राज चलता था और भीमा उसका सेनापति—बॉडीगार्ड उसका सब कुछ था—और रामपुर में मास्टर के नाम से जाना जाता था।

जिधर से भी उसकी गाड़ी निकलती—उधर की सड़कें खाली हो जातीं।

ऐसा खौफ था भीमा का।

ऐसे में उस युवक की क्या हालत हो रही थी, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता था।

अकड़ वह सकता नहीं था।

इन्कार करने का मतलब था मौत और उसके मौसा का पता भीमा ने फिर भी लगा लेना था।

वह नहीं बताता तो उसकी मौत के बाद कोई दूसरा बता देता।

सो वह मुड़ा और लोगों की तरफ मुंह करके खड़ा हो गया।

सड़क पर बैठे लोग उसकी और भीमा की बातों से अंजान थे—सो उत्सुकता से युवक की ओर देख रहे थे।

युवक की निगाहें भीड़ में से अपने मौसा को ढूंढ रही थीं।

तभी उसकी निगाहें रंगीला पर जा टिकीं।

“मौ....सा जी।” वह भर्राये स्वर में बोला।

तुरंत रंगीला खड़ा हो गया।

“वह है रंगीला?” तभी पीछे से गुर्राया भीमा।

“ह....हां मास्टर।” युवक उसकी तरफ गर्दन मोड़ते हुए थूक सटकते हुए बोला।

भीमा ने तुरंत अपने गनमैनों की तरफ इशारा किया।

उसी वक्त दो गनमैन भीड़ में झपटे।

उन्हें रास्ता देने के लिये बैठे हुए लोग फौरन इधर-उधर गिर पड़े। फिर भी तीन-चार की टांगों को रौंदते हुए वे रंगीला तक जा पहुंचे।

झपटकर एक ने उसके बाल पकड़े और उसे घसीटते हुए बाहर की तरफ बढ़ा।

दूसरा उसके पीछे-पीछे था।

बालों के खिंचने से रंगीला के होंठों से कराहें फूट पड़ीं।

बेदर्दी से उसे लगभग घसीटते हुए वे भीमा के सामने ले आये और फिर उसके बालों को छोड़ दिया गया।

“क....कौन हैं आप लोग?” रंगीला भीमा को देखते हुए हैरानी से बोला—“म....मैं तो आपको जानता तक नहीं—और इस शहर में मैं दस साल बाद आया हूं। फिर ये मेरे साथ ऐसा सलूक क्यों?”

“रंगीला है न तेरा नाम?” भीमा उसे घूरते हुए गुर्राया।

“हां, मगर....!”

“दीनापुर से आया है न तू?”

“हां....।”

“भद्रानाथ को तो शायद भूल गया होगा तू। महीना भर हो गया है उसे मरे हुए।”

सुनकर रंगीला पहले तो बुरी तरह से चौंका—फिर उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

“त....तुम....?”

“तेरा चेहरा ही बता रहा है कि भद्रानाथ की मौत का कारण तू ही है। अब बाकी बातें बाद में....डालो इसे गाड़ी में।”

तुरंत गुण्डों ने उसे जकड़ लिया।

भीमा बोनट से उतरा और युवक की तरफ देखते हुए क्रूरता से मुस्कुराया—

“ले जा अपनी मां को फूंकने के लिये।”

कहकर वह जीप की तरफ मुड़ गया।

उसने देखा नहीं कि युवक के चेहरे पर किस तरह के भाव उभर रहे हैं। उसे तो बस रंगीला से मतलब था, जिसे उसने काबू कर लिया था।

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“बॉस ....!”

खर्राटे लेते कुणाल ठाकुर ने हड़बड़ाते हुए ऐसे आंखें खोलीं जैसे वह जागते हुए ही कोई बुरा सपना देख रहा हो। मगर जब उसने सामने खड़े भीमा को देखा तो वह मुस्कुरा पड़ा।

“बड़ा ही शैतान है तू....मुझे ही डरा दिया। डरूं कैसे नहीं....।” वह बैठते हुए उदास हो गया—“जब मेरे यार भद्रा को एक मामूली औरत ने मार डाला—वो भी सैंकड़ों लोगों के बीच तो मैं....।”

“उसी औरत की बात करने आया हूं बॉस ....।”

भीमा उसकी बात काटते हुए बोला।

सुनकर सहसा ही कुणाल ठाकुर के चेहरे पर उत्तेजना फैल गई।

“मुझे बता कौन है वो हरामजादी—नाम बोल उसका।”

“अभी उसका नाम पता नहीं चला।”

“क्या?”

“मगर हमें वो आदमी मिल गया है जो उस औरत को दीनापुर में लेकर आया था। और इस वक्त वह आप ही के जूते खाने का इंतजार कर रहा है।”

“कहां है वो?” फुंफकार उठा कुणाल ठाकुर।

“टार्चर रूम में....कुर्सी से बंधा हुआ है।”

बस और कुछ नहीं पूछा कुणाल ठाकुर ने। वह बेड से उतरा और लगभग भागने वाले अंदाज में भीमा को एक तरफ धकेलते हुए कमरे से निकल गया।

कहीं वह उसे जान से ही न मार दे—यही सोचकर भीमा उसके पीछे भागा। अगर रंगीला मर गया तो फिर उस औरत के बारे में जानना मुश्किल हो जायेगा।

हॉल पार कर वह सामने वाले कमरे में प्रविष्ट हुआ तो कुणाल ठाकुर उसे दायीं तरफ बेसमेंट में जाने वाली सीढ़ियां उतरते नजर आया।

वह भी उसके पीछे-पीछे लपका।

नीचे उतरते ही काफी बड़ा हॉल था—जिसके दायीं तरफ कतार में तीन कमरे बने थे और एक कमरा ऐन सामने था।

कुणाल ठाकुर सामने वाले कमरे की तरफ बढ़ा और उसका दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गया। सामने कुर्सी पर रंगीला बैठा था।

उसके दोनों हाथ कुर्सी के हत्थों से जकड़े हुए थे और पैर पायों के साथ बंधे हुए थे।

उसे देखते ही कुणाल ठाकुर पर छाया पागलपन और भी ज्यादा हो गया।

दांत किटकिटाने लगा था वह और लार उसके मुंह से गिरने लगी थी।

तुरंत उसने जेब में हाथ डाला।

शुक्र था कि उसकी जेब में रिवॉल्वर नहीं थी—वर्ना वह तो उसे खत्म ही कर देता।

रिवॉल्वर को अपनी जेब में न पा उसका पागलपन और भी बढ़ गया और वह उसके करीब आकर टूट पड़ा उस पर।

“हरामजादे....सूअर की औलाद....कुत्ते....तूने बुलाया था उस औरत को....मैं तुझे जिन्दा नहीं छोडूंगा—खत्म कर दूंगा तुझे।”

कुछ ही पलों में ही रंगीला लहुलुहान हो गया।

कुणाल ठाकुर के शक्तिशाली घूंसों ने उसके नाक-सिर-ठोड़ी वगैरह फोड़ डाले थे।

और फिर कुणाल ठाकुर ने दोनों हाथों से उसका सिर पकड़ लिया।

उसके करीब खड़ा भीमा बुरी तरह से घबरा गया।

“न....नहीं बॉस ....” वह चीखा—“इसे खत्म नहीं करना।”

कुणाल ठाकुर की जिस्मानी ताकत जानता था वह। और जब कुणाल ठाकुर किसी का सिर दोनों हाथों से पकड़ लेता था तो उस आदमी की मौत निश्चित हो जाती थी। वह सिर्फ एक ही झटका देता था और सामने वाले की गर्दन की हड्डी टूट जाती थी।

तभी तो वह चीखा था।

उसका सिर पकड़े हुए ही कुणाल ठाकुर ने उसकी तरफ गर्दन मोड़ी—

“नहीं....मैं इस हरामखोर को जिन्दा नहीं छोडूंगा। इसने उस औरत को बुलाया था जिसने मेरे यार को मारा था....। और तू कहता है कि मैं इसे खत्म न करूं....लगता है तू भी मेरे दुश्मनों से मिल गया है।” उसके बोलने के दौरान भीमा के चेहरे पर थूकों के इतने छींटे पड़े कि उसका पूरा मुंह ही छींटों से भर गया।

मगर क्या मजाल जो उसके चेहरे पर घिन उभरी हो—या उसने अपना चेहरा साफ किया हो।

हां—दुःख जरूर उभर आया था उसके चेहरे पर।

“आप....आप मुझे जान से चाहे मार डालें बॉस —मेरी बोटी-बोटी कर दें। लेकिन ऐसा कभी न कहना कि मैं दुश्मनों से मिल गया हूं।”

“तो फिर इसे खत्म न करने को क्यों कह रहा है तू?”

“जरा सोचिये....अगर यह मर गया तो हमें उस मामूली औरत का पता कैसे चलेगा जिसने भद्रानाथ जी को मारा था? फिर हम उसे ढूंढेंगे कहां से?”

“अरे....।” कुणाल ठाकुर रंगीला का सिर छोड़ हैरानी से अपनी ठोड़ी के नीचे उल्टा हाथ रखते हुए बोला—“इसके बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं।”

“तभी तो मैं आपको मना कर रहा था।”

“चल....!” कुणाल ठाकुर एक तरफ हटते हुए बोला—“तू बात कर—पूछ इससे कि उस हरामन को कहां छुपा रखा है इसने?”

भीमा रंगीला के सामने आ खड़ा हुआ।

उसने पहले आस्तीन से अपना थूकों से भरा चेहरा साफ किया फिर कहर भरी निगाह रंगीला के चेहरे पर डाली, जिसके लहूलुहान चेहरे पर पीड़ा के साथ-साथ होंठों पर मुस्कुराहट थी।

उसे मुस्कुराते देख आग-बबूला हो उठा वह।

“हरामजादे मुस्करा रहा है तू!” वह फुंफकारा।

रंगीला के होंठों पर फैली मुस्कान और भी तेज हो गई।

“खामखा ही बांधा मुझे। अरे यह सवाल मुझसे वहां शवयात्रा में भी पूछ लेते तो मैं फौरन उसका जवाब देता।”

भीमा के होंठों पर जहरीली मुस्कान उभर आई।

“ऐसा क्या?”

“बिल्कुल ऐसा....। क्योंकि शैतान उसे तभी याद करता है जब उसे मौत की जरूरत पड़ जाती है और इंसान उसे तब याद करता है जब उसे उसकी मदद दरकार होती है। और इंसान तो तुम हरगिज नहीं हो सकते। जो आदमी—” उसने कुणाल ठाकुर की तरफ देखा—“भद्रा की मौत से पागल हो उठा हो—जो....” उसने भीमा की तरफ देखा—“शवयात्रा में गोली चलाकर किसी की हत्या कर दे, वह इंसान कैसे हो सकता है?”

“बकवास नहीं!” फुंफकारा भीमा—“नाम बोल उसका—कौन है वो हरामजादी?”

“वो हरामजादी नहीं....बल्कि देवी है देवी—और उस देवी का नाम है—डॉली । पता भी बताऊं?”

“बोल....!” चिढ़े स्वर में बोला भीमा।

“मुम्बई चले जाओ। वहां किसी भी बच्चे से, जो बोलना सीख रहा हो, उसका पता पूछ लेना। क्योंकि वहां के बच्चे सबसे पहले मां कहना नहीं सीखते—बल्कि उन्हें डॉली बोलना सिखाया जाता है। इतनी इज्जत है उसकी वहां। और वह तुम्हें या तो अपनी कोठी में मिलेगी या फिर अदालत में। और अगर वह दोनों जगहों पर नहीं मिलती तो समझ लेना कि वो भद्रा जैसे किसी महिषासुर के संहार के लिये निकली हुई है।” कहकर वह पुनः मुस्कुराया—“और कुछ पूछना है?”

भीमा उसके मुस्कुराने से और भी ज्यादा फुंक गया।

उसका दिल तो किया कि वह अभी उसके सिर पर ऐसा घूंसा मारे कि उसका भेजा बाहर आ गिरे। लेकिन उसने ऐसा किया नहीं—बल्कि एक तरफ हटते हुए कुणाल ठाकुर की तरफ देखा।

“क्या नाम बताया इसने उसका?” कुणाल ठाकुर बोला।

“डॉली —मुम्बई में रहती है। आप हुक्म करें तो मैं अभी बिच्छू को उसे लाने के लिये रवाना कर दूं?”

“हां....!” खुश होते हुए कुणाल ठाकुर ने सिर को हिलाया—“तू भेज उन्हें।” कहकर उसने रंगीला की तरफ इशारा किया और बड़ी ही मासूमियत से बोला—“अब मैं इसे खत्म कर दूं?”

मुस्कुराया भीमा।

“अब यह आपका शिकार है बॉस —! मगर इसे मारते समय अपने दिल में यह बात जरूर बिठाये रखना कि भद्रानाथ की मौत में इसका बराबर का हिस्सा था। डॉली को बुलाने वाला यही था।”

यह बात उसने जानबूझकर कही थी ताकि कुणाल ठाकुर के दिमाग में यह बात बैठ जाये और हो सकता था कि रंगीला को मारने के पश्चात् वह कुछ हद तक ठीक हो जाये।

कुणाल ठाकुर आंखें चमकाते हुए रंगीला की तरफ बढ़ा। उसके हाथ आगे की तरफ इस तरह फैले हुए थे जैसे वह उसका गला दबाने के लिये उसकी तरफ बढ़ रहा हो।

उसको पागलों वाले अंदाज में अपनी तरफ बढ़ते देख रंगीला के चेहरे की रंगत पहले तो पीली पड़ी—फिर वह एक गहरी सांस छोड़ते हुए मुस्कुराने लगा।

“एक और महिषासुर के जीवन की उल्टी गिनती शुरू होने जा रही है।” वह बड़बड़ाया—“अब जैसे ही डॉली को पता चलेगा कि मैं मारा गया हूं—वह फौरन यहां पहुंच जायेगी।”

इधर उसके सामने आकर कुणाल ठाकुर रुका और अपनी आंखें चौड़ी करते हुए गुर्राया—

“तो तू है वो हरामी जिसने मेरे यार की मौत को बुलाया था।” थूक की फुहार रंगीला के चेहरे पर पड़ी।

“अब मैं तेरी वो हालत करूंगा कि तू मौत मांगेगा—मगर मैं तुझे मरने नहीं दूंगा। खिलौने की तरह पहले तेरे से खेलूंगा—फिर एक-एक करके तेरे पुर्जे तोडूंगा।”

थूक की फुहार पुनः रंगीला के चेहरे पर पड़ी।

जिस अंदाज से कुणाल ठाकुर बोला था—रंगीला उसी से समझ गया कि वह उसे बहुत ही बुरी मौत मारेगा। और पागल आदमी का क्या भरोसा कि वह कब क्या कर दे।

मौत का डर नहीं था उसे—लेकिन वह बुरी मौत नहीं मरना चाहता था।

सो उसने तुरंत मौत को गले लगाने का रास्ता तलाशा, ताकि उसे कष्ट न उठाना पड़े।

उसने अपने मुंह में ढेर सारा थूक इकट्ठा किया और—

“आक्....थू....।”

ढेर सारा थूक कुणाल ठाकुर के मुंह पर जा पड़ा।

“हरामी के पिल्ले!” वह गुर्राया—“मुंह पर थूकता है। साले बात करनी भी नहीं आती। पागल कहीं का!” एक तो मुंह पर थूक का गिरना—ऊपर से ढेर सारी गालियां।

कुणाल ठाकुर का चेहरा कानों तक लाल हो उठा। गुस्सा सातवें आसमान पर जा चढ़ा।

“तूने मेरे मुंह पर थूका!”

वह कुत्ते की तरह गुर्राया—और अपने दोनों हाथों में उसका सिर पकड़कर एक तेज झटका दिया।

“कड़क्....!” की हल्की-सी आवाज के साथ रंगीला की गर्दन की हड्डी टूट गई और उसका बदन बुरी तरह से हिलने लगा।

“मुझे गाली निकाली तूने।” वह आस्तीन से अपना मुंह पौंछते हुए दहाड़ा और एक जबर्दस्त घूंसा उसकी कनपटी पर रसीद कर दिया।

कुणाल ठाकुर के बाजुओं की ताकत का पता उसके घूंसे से चला।

एक ही घूंसे में रंगीला का भेजा बाहर बिखर गया।

रंगीला दो-चार पल और तड़पा—फिर शांत हो गया।

कुणाल ठाकुर आस्तीन से अपने चेहरे को पौंछते हुए पीछे मुड़ा तो भीमा को सामने खड़ा पाया।

“तूने देखा भीमा”—कुणाल ठाकुर की आवाज भर्रा गई—“इसने मेरे मुंह पर थूका—मुझे गाली निकाली।”

“आपने इसे मारकर ठीक किया बॉस ।”

कहते हुए भीमा ने गहरी सांस छोड़ी। रंगीला की चाल वह समझ गया था। और वह अपनी चाल में सफल भी रहा था। बहुत ही आसान मौत मरा था वह।

मगर वह कुछ कर भी तो नहीं सकता था। कुणाल ठाकुर के गुस्से पर काबू पाना उसके बस की बात नहीं थी। अगर वह पागल न होता तो बात और थी—एक पागल को समझाया नहीं जा सकता था—बस उसकी हां-में-हां ही मिलाई जा सकती थी।

रंगीला को मारकर कुणाल ठाकुर ठीक नहीं हुआ था—बल्कि उस पर पागलपन का भूत और भी गहरा हो गया था।

अब तो बस डॉली ही थी उसका इलाज।

“बिच्छू को बुला।” तभी गुर्राया कुणाल ठाकुर—“उस हरामन को ले के आने का हुक्म मैं खुद दूंगा उसे।”

भीमा कुछ नहीं बोला—बस सिर हिला दिया।

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“इसे उस लड़की का नाम बता भीमा।”

“डॉली ।”

“पता भी बता।”

भीमा ने बिच्छू को डॉली का पता भी बताया।

कुणाल ठाकुर रंगीला की लाश की तरफ पीठ करके बैठा था। उसने अपनी बायीं बांह घुटने पर रखी हुई थी और दायीं हथेली फर्श पर टिकाई हुई थी।

उसके सामने बिच्छू सिर झुकाये खड़ा था। बिच्छू के बराबर में ही भीमा खड़ा था।

बिच्छू करीब पैंतीस साल का गेंडे जैसी गर्दन वाला लम्बा ऊंचा व्यक्ति था।

बेशक उसका रंग गोरा था—मगर उसकी खूंखार आंखें—क्रूर चेहरा उसकी दरिंदगी को साफ जाहिर कर रहे थे।

कुणाल ठाकुर के पेशे में बिच्छू की हैसियत भीमा जैसी तो नहीं थी फिर भी वह उसका एक विश्वसनीय सिपहसालार था।

“नाम-पता सुन लिया?” भीमा के चुप होते ही बोला कुणाल ठाकुर।

“जी बॉस ।” बिच्छू बड़े ही आदर भरे स्वर में बोला।

“तू जानता है डॉली को? पता है कौन है वो? वो....वो वही है जिसने मेरे यार भद्रा को मार डाला।”

कुणाल ठाकुर की आवाज भर्रा गई—आंखों में आंसू भर आये।

“त....तू उसे ले के आ। यहां पर ले के आ—मेरे सामने। ले के आयेगा ना?”

वह ऐसे बोला जैसे वह बिच्छू के सामने गिड़गिड़ा रहा हो।

बिच्छू ने गर्दन उठाई और कुणाल ठाकुर की तरफ देखते हुए बोला—“आप निश्चिंत रहिये बॉस —कल शाम को वह औरत आपके सामने होगी—और आप उसे अपने हाथों से सजा दे रहे होंगे।”

“शाबाश!” कुणाल ठाकुर ने खुश होते हुए ताली बजाई—“मैं उसे अपने हाथों से मारूंगा। एक मामूली औरत ने मेरे यार को मार डाला। जरा मैं भी तो देखूं—कौन है वो। अब जा—ले के आ उसे।”

बिच्छू ने सिर हिलाया और उसकी तरफ पीठ कर ली।

कुणाल ठाकुर ने गर्दन पीछे मोड़ी और रंगीला की लाश को देखते हुए हंसा—

“ही....ही....ही....अब आयेगा मजा—मैं उसे तेरे सामने खत्म करूंगा। ही....ही....ही....।”

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

“लगता है आज मैडम कत्लेआम करने जा रहीं हैं।”

पार्वती शीशे में से डॉली को देखते हुए मुस्कुराई—जो कि अपनी टॉप का ऊपरी हुक बन्द कर रही थी।

“वो कैसे?” बड़ी ही शोख अदा से बोली डॉली ।

“अरे मैडम....” पार्वती ने ठण्डी सांस छोड़ी—“ऐसे पहनावे में बाहर निकलेंगी तो फुटपाथों पर लाशें बिछ जायेंगी—जो भी आपको देखेगा अपना दिल थामकर वहीं गिर पड़ेगा।”

डॉली खिलखिलाई और शीशे की तरफ पीठ फेर पार्वती की तरफ मुड़ी।

“औरत अगर श्रृंगार न करे तो मर्द उसे पूछे ही न। मर्दों के बीच औरत की औकात तभी बनती है जब वह ऐसे ही कपड़े पहने—अपनी चाल में नजाकत लाये।”

कहते हुये उसने बड़ी ही अदा से अपने जिस्म को हिलाया और फिर बेड की तरफ ऐसे बढ़ी जैसे रैंप पर कोई मॉडल चल रही हो।

सचमुच उसके कपड़े ऐसे ही थे।

सफेद रंग की शार्ट टॉप। ऐसी कि बस मुश्किल से उसकी आधी छातियां ही ढक पा रही थीं। टॉप के गले के किनारे पर सफेद रंग की ही कढ़ाई की हुई थी—जिसमें उसकी शानदार गुलाबी छातियां और भी ज्यादा खूबसूरत लगने लगी थीं।

बस यूं समझ लो कि टॉप ऊपर से नीचे तक इतनी छोटी थी कि नीचे से अगर टॉप में उंगली डाली जाये तो उंगली टॉप के गले में से नजर आने लगे।

ऐसे ही स्कर्ट थी उसकी।

उसकी जांघों को नहीं बल्कि सिर्फ उसके नितम्बों को ही ढक पा रही थी—या यूं समझ लो कि अपनी पैंटी को छुपाने के लिये उसने वो स्कर्ट पहनी थी।

वह बेड पर बैठी तो स्कर्ट में से उसकी पैंटी नजर आने लगी।

मगर डॉली को भला इसकी परवाह कहां थी। वह झुकी और बेड के नीचे से सफेद रंग के ही ऊंची हील के सैंडिल निकाले और उन्हें पहनने लगी।

सैंडिल के पत्तीनुमा फीते उसके घुटनों तक जाली बनाते हुए पहुंच गये।

सैंडिल पहनकर वह खड़ी हुई—एक नजर अपने आपको शीशे में निहारा—फिर खुद के ही अक्स को आंख मारकर पलट गई।

उसकी इस हरकत पर पार्वती हौले से हंस पड़ी। बोली कुछ नहीं वह।

“मेरा पर्स ले आना।”

डॉली उसकी हंसी को नजरअंदाज करते हुए बोली और अपने कूल्हे मटकाते हुए कमरे से बाहर निकल गई।

कुछ ही देर में वह अपनी आलीशान कोठी के पोर्टिको में खड़ी थी—जिसमें कि आगे-पीछे छः अलग-अलग कम्पनियों की गाड़ियां खड़ी थीं।

उसने अपने लिये मारुति जेन का चुनाव किया और उसका ड्राइविंग डोर खोलकर स्टेयरिंग के पीछे बैठ गई।

उसने कार स्टार्ट की और उसे चलाते हुए ड्राईव-वे पर आ गई जहां कि पार्वती उसका सफेद रंग का पर्स लिये खड़ी थी।

खिड़की में से हाथ निकालकर उसने पर्स लिया और मेन गेट की तरफ बढ़ी जिसके पल्ले मुरारी खोल रहा था।

ऐसे अंग दिखाऊ कपड़े आज उसने शौक से नहीं पहने थे बल्कि उसके पीछे एक वजह थी।

परसों उसने एक खूंखार आतंकवादी को पकड़ा था और इस नेक काम में सिकंदर ठाकरे उसके साथ था। उस आतंकवादी ने यह तो कबूल कर लिया था कि वह आतंकवादी है लेकिन अभी यह नहीं बताया था कि उसके साथी कौन-कौन हैं—और कहां-कहां हैं।

सिकंदर ठाकरे का अभी आधा घण्टा पहले ही उसे फोन आया था—जिसमें उसने अपने हाथ खड़े कर दिये थे कि वह उससे कुछ भी नहीं उगलवा पायेगा। सो डॉली ने उसकी जुबान खोलने का बीड़ा स्वयं उठाया—अपने उसी काम को अंजाम देने के लिये उसने ऐसे कपड़े पहने थे।

सिकंदर ठाकरे के बारे में वह जानती थी कि वह पत्थर को भी मोम बनाने की कुव्वत रखता है—जब ऐसे इंस्पेक्टर ने ही हाथ खड़े कर दिये हों तो जाहिर था कि आतंकवादी काफी सख्तजान है। और ऐसे सख्तजान व्यक्ति को मोम बनाने के लिये उसे शारीरिक नहीं मानसिक रूप से टॉर्चर किया जाता है—और ऐसे कामों का उसे अच्छा-खासा तजुर्बा था। तभी तो वह ऐसे कपड़े पहनकर निकल रही थी।

कार ड्राईव करते हुए वह अभी गेट से निकली भी नहीं थी कि तभी—

‘चीं....ऽ....ऽ....ऽ....!’

ब्रेकों की तीव्र चरमराहट के साथ एक मैटाडोर वैन ऐन उसकी जेन के आगे आ खड़ी हुई।

अगर डॉली फौरन ब्रेक न मार लेती तो अवश्य ही उसकी जेन मैटाडोर से भिड़ जाती।

बस—दो-तीन इंच का फासला ही रह गया था टक्कर होने में।

जिस अंदाज में मैटाडोर उसकी कार के सामने आकर रुकी थी—उसी से डॉली समझ गई थी कि गड़बड़ है। ऐसे में वह सतर्क न हो—ऐसा कैसे हो सकता था।

गेट के करीब खड़ा मुरारी भी सतर्क हो उठा था। साथ ही उसका हाथ उसकी जेब में रखी रिवॉल्वर के दस्ते पर जा टिका था।

तुरंत मैटाडोर के दरवाजे खुले और देखते-ही-देखते उसमें से दस मुस्टंडे बाहर आ गये। उन सबके बाहर आने के पश्चात् ही बिच्छू बाहर निकला।

सभी गुंडे चाकुओं—हथियारों वगैरा से लैस थे।

डॉली भी कार से बाहर आ गई और कार के बोनट से टेक लगाकर खड़ी हो गई।

“ऐ छोकरी....!” तभी बिच्छू उसके करीब आते हुए गुर्राया—“डॉली यहीं रहती हैं?”

कहते हुए उसकी निगाहें डॉली की शानदार छातियों पर जा टिकीं।

“हां....!” मन-ही-मन मुस्कराई डॉली —“क्यों?”

“कहां है वो?”

“तेरे सामने ही तो खड़ी है।”

बुरी तरह से चौंका बिच्छू—फिर उसके होंठों पर व्यंग भरी मुस्कान फैल गई।

“तू....तू डॉली है?” वह हंसा।

“क्यों?” डॉली की मुस्कान तेज हो गई—“क्या मैं डॉली नहीं हो सकती?”

“तू....!” बिच्छू ने उसके आगे बांह लम्बी कर ऊपर से नीचे की—“तू तो मक्खन मलाई है—बिस्तर पर लड़ने की चीज है तू तो....तेरा हुस्न ही बता रहा है कि तू सिर्फ भोगने की चीज है—तोड़ने की नहीं।”

जबकि डॉली के होंठों पर जहर उभर आया।

“मगर तू कौन है?” वह बोली—“और डॉली से क्यों मिलना चाहता है?”

“यह छोकरी तो रास्ता ही नहीं दे रही उस्ताद।” तभी एक गुण्डा बिच्छू से बोला।

“मुझे तो लगता है वो इसकी मां है।” दूसरा बोला।

“क्यों न इसी को काबू में कर लें।” तीसरे ने सलाह दी—“इसकी मां अपने आप ही खुद को हमारे हवाले कर देगी।”

बिच्छू के होंठों पर कुटिल मुस्कान फैल गई। अपने साथी का विचार उसे बढ़िया लगा था।

“तू ठीक कह रहा है धनिया!” वह बोला—“बॉस के लिये यह छोकरी बहुत बड़ी औषधि का काम करेगी। काबू कर लो इसे और बांधकर गाड़ी में डाल दो।”

कहते हुए उसने डॉली की तरफ उंगली सीधी की।

“पकड़ इसे!” एक गुण्डे ने हाथ में पकड़ी हॉकी अपने साथी की तरफ बढ़ाई—“यह तो ऐसी कोमल है कि पकड़ना भी आहिस्ता से पड़ेगा कि कहीं हड्डी न टूट जाये।”

अपने साथी को हॉकी पकड़ाकर गुण्डा डॉली की तरफ बढ़ा जो कि पूरी तरह से लापरवाह नजर आ रही बोनट के साथ लगकर खड़ी थी। बांहों को अपने सीने पर बांधे हुए—जैसे कुछ हो ही न रहा हो।

मुरारी को उसने पहले ही इशारा कर दिया था कि वह तब तक कुछ न कहे जब तक कि वह इशारा न करे....सो मुरारी ने हाथ जेब से निकाल लिया था।

इधर गुण्डा डॉली की तरफ बढ़ रहा था—उधर बिच्छू ने मुरारी की तरफ गर्दन घुमाई।

“अपनी मालकिन से बोल कि वह चुपचाप बाहर निकल आये—वर्ना उसकी छोकरी को यहीं गाड़ी में ही सभी रगड़ डालेंगे।”

मुरारी ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया—बस चुपचाप खड़ा रहा।

हालांकि उसके शब्दों से उसे गुस्सा तो जरूर आया था—मगर डॉली ने उसे कुछ भी न करने को कह रखा था—सो भीतर-ही-भीतर वह खून का घूंट पीकर रह गया।

“तू पहले मैडम को तो काबू में कर हरामखोर।” वह मन-ही-मन बड़बड़ाया।

“लगता है अपनी छोटी मालकिन की इज्जत लुटते तू अपनी आंखों से देखना चाहता है।” उसे हिलता न देख बोला बिच्छू—“कोई बात नहीं....देख....फिर बाद में चले जाना। और फिर....।”

आगे के शब्द मुंह से नहीं निकल पाये उसके। क्योंकि तब तक गुण्डा डॉली के करीब पहुंच चुका था।

ठीक तभी—

जैसे कोई बिजली चमकी।

डॉली की लम्बी टांग पूरी शक्ति से उसके पेट में पड़ी।

गुण्डा अपने स्थान से उछला और पांच फीट पीछे खड़े अपने साथी से जा टकराया और उसे साथ लिये जमीन पर ढेर हो गया।

ऐसे में बिच्छू के मुंह से शब्द क्या निकलने थे। वह अवाक्-सा डॉली को देखने लगा जो कि उसी तरह से सीने पर हाथ बांधे बोनट के साथ लगकर खड़ी थी।

होंठों पर एक मधुर मुस्कान लिये हुए।

बिच्छू के साथ आये गुण्डे भी स्तब्ध रह गये।

कोई सोच भी नहीं सकता था कि जिस्म से नाजुक नजर आने वाली वह रूप की रानी इतनी फुर्तीली और शक्तिशाली हो सकती है।

“क्यों मियां?” डॉली बिच्छू को देखते हुए हंसी—“मेरा ख्याल है अब तुझे विश्वास हो गया होगा कि तू डॉली के सामने खड़ा है।”

कहते हुए उसने तीन-चार दफा चुटकी बजाई।

बिच्छू पहले तो हड़बड़ाया, फिर उसका चेहरा भभक उठा।

“तू सचमुच डॉली है।” वह गुर्राया—“अच्छा हुआ जो तूने साबित कर दिया कि तू ही वो है जिसके लिये मैं रामपुर से यहां आया हूं—वर्ना मैं तो तुझे चखकर छोड़ देने वाला था। मगर अब, अब तू चखी नहीं जायेगी—बल्कि मेरे साथ रामपुर जायेगी तू।”

“वो तो मेरी मर्जी पर है कि मैं जाऊंगी कि नहीं। तू यह बता कि तू मुझे वहां ले जाना क्यों चाहता है?”

“चिंता मत कर—वहां पहुंचेगी तो सब पता चल जायेगा। काबू करो इसे।” बिच्छू अपने साथियों से बोला—“बेशक इसकी टांगें ही क्यों न तोड़नी पड़ें—इस पर काबू करो। मगर ध्यान रहे—मरनी नहीं चाहिये यह।”

आदेश सुन गुण्डे हाकियां, छुरे सम्भाले डॉली की तरफ बड़े ही खतरनाक भावों से बढ़े।

डॉली भी अब गम्भीर हो गई—और उसने अपने हाथों को खोल दिया—तथा बोनट से हट गई।

मुरारी भी सतर्क हो उठा—साथ ही उसका हाथ पुनः उसकी जेब में रेंग गया।

दस और एक का मुकाबला था—और एक भी वो जो समाज में कमजोर जाना जाता है।

मगर वह कमजोर नहीं थी।

तभी तो वह उनको धूल चटाने के लिये तैयार खड़ी थी।

गुण्डे उससे कुछ फीट दूर आकर ठिठक गये।

आंखों-ही-आंखों में उनमें इशारे हुए और फिर सभी एक साथ डॉली पर झपटे।

मगर....

कोई छू भी नहीं पाया उसे।

डॉली का बदन रबड़ के गुड्डे की मानिंद उछला और उनके सिरों के ऊपर से होते हुए पीछे सड़क पर लैंड कर गया। गुण्डे आपस में उलझ गये—और इसी उलझन में दो गुण्डे नीचे गिर पड़े।

बाकी तेजी से पीछे पलटे।

ठीक तभी डॉली का जिस्म पुनः उछला और—

‘ठाक्....ठाक्....!’

उसकी दोनों टांगें एक साथ चलीं। और दो गुण्डे सीधा जेन के बोनट पर पीठ के बल गिरे और कलाबाजी खाकर जेन की पिछली साईड में सड़क पर जा गिरे।

इधर डॉली पुनः सड़क पर आ खड़ी हुई थी। और बिच्छू—वह आंखें फाड़े उस अबला को देख रहा था जो इस वक्त उसे किसी बला से कम नजर नहीं आ रही थी।

बाकी के गुण्डे पलभर के लिये हड़बड़ाये, फिर हुंकारें भरते हुए डॉली की तरफ झपटे।

मगर....वह डॉली ही क्या जो उन गुण्डों के काबू में आ जाती।

फिरकनी की तरह घूमी वह और जब वह रुकी तो गुण्डे सड़क पर पड़े नजर आ रहे थे।

“साली....!” चीखा बिच्छू—“हराम की खा-खाकर बस चर्बी ही बढ़ाते जा रहे हो। एक लौंडिया नहीं सम्भाली जा सकती क्या तुमसे—उठो....।”

गुण्डे हड़बड़ाते हुए उठे और पुनः डॉली पर टूट पड़े।

कार के पीछे गिरे गुण्डे भी अपने साथियों में शामिल हो गये।

मगर कोई डॉली को छू भी नहीं पाया। यहां तक कि उनके हथियार भी कुछ नहीं कर पाये—जबकि डॉली की लातें घूंसे उन पर कहर बरपा रहे थे।
 
गुण्डों की चीखें उबल रही थीं और वे एक-एक करके ढेर होते जा रहे थे।

और बिच्छू—वह डॉली को ऐसे देख रहा था जैसे वह दुनिया का आठवां अजूबा देख रहा हो।

हड्डी तो उसे जैसे नजर ही नहीं आ रही थी डॉली के जिस्म में। ऐसे उसका जिस्म मुड़-तुड़ रहा था। और फुर्ती—जैसे बिजली प्रवेश कर गई हो उसमें।

पांच मिनट भी नहीं बीते कि सारे गुण्डे इधर-उधर बिखरे पड़े हांफ रहे थे।

किसी का माथा फट गया था तो किसी की नाक से खून बह रहा था, कोई अपनी टांग की टूटी हड्डी को सहला रहा था तो कोई अपनी टूटी बांह पकड़े हुए था।

उनके हाथों में पकड़े हथियार इधर-उधर बिखरे पड़े थे।

डॉली ने गर्दन बिच्छू की तरफ मोड़ी और कुटिलता से हंसी।

“तेरी यह फौज तो फुस्स निकली रे—अब तू दिखा अपना दम-खम।”

पलक झपकते ही बिच्छू के हाथ में रिवॉल्वर चमकने लगी।

“मानता हूं तू बड़ी पहुंची हुई चीज है।” वह गुर्राया—“मेरे दस मुस्टंडों को तूने धराशायी कर दिया। मगर अभी मैं बचा हूं। और देख ले—मेरे हाथ में क्या है।” उसने रिवॉल्वर उंगलियों में नचाई—“बस दो गोलियां खर्च होंगी और तेरे घुटने टूट जायेंगे। और....!”

‘धांय....!”

तभी धमाका हुआ और बिच्छू का हाथ फनफना उठा।

रिवॉल्वर उसके हाथ से छूटकर एक तरफ जा गिरी।

हड़बड़ाते हुए उसने अपना हाथ पकड़ लिया और गर्दन दाईं तरफ मोड़ी—जहां मुरारी हाथ में रिवॉल्वर लिये खड़ा था।

“फाऊल-पर-फाऊल किये जा रहा है तू।” वह हंसा—“पहले दस कुत्ते मैडम से भिड़ने के लिये भेज दिये और अब रिवॉल्वर निकाल रहा है।”

ठीक तभी डॉली की टांग चली और बिच्छू चीखता हुआ उछलकर पीछे जा गिरा।

बड़े इत्मिनान से डॉली ने उसका रिवॉल्वर उठाया और उसे अपने चेहरे के पास ले जाते हुए बोली—

“यह बच्चों के खेलने की चीज नहीं है! घोड़ा दब जाये तो जान निकल जाती है।”

कहने के साथ ही उसने रिवॉल्वर का रुख उसकी तरफ किया और—

‘धांय....धांय....धांय....!'

रिवॉल्वर से पटाखे छूटने लगे।

गोलियां बिच्छू के सिर से बस एक आधा इंच दूर ही सड़क को उखाड़ने लगीं—और बजरी उड़कर उसके सिर से टकराने लगी।

बिच्छू को काटो तो खून नहीं।

अपनी मौत उसे सामने नजर आ रही थी।

राहत की सांस उसने तब छोड़ी जब रिवॉल्वर खाली हो गई।

उसने थोड़ा उठकर पीछे सड़क पर देखा।

जहां उसका सिर था—वहां उसके चारों तरफ छह गड्ढे बने हुए थे।

उसने डॉली की तरफ देखा—जिसके होंठों पर विषैली मुस्कान थी।

“चाहती तो बड़े आराम से यही छह गोलियां तेरे भेजे में उतार सकती थी।” वह बोली—“मगर अभी तुझे मेरे सवालों के जवाब देने हैं—इसी वजह से तू अभी तक जिन्दा है। और फिलहाल मेरे पास अभी इतना वक्त नहीं—सो आकर तेरे से बात करूंगी।”

कहने के साथ ही उसने अपनी टांग चला दी।

ठोकर सीधी उसकी कनपटी पर पड़ी और वह वहीं लम्बा हो गया।

“इसे उठाकर अन्दर ले जाओ मुरारी।” वह बोली।

मुरारी तुरंत बेहोश पड़े बिच्छू की तरफ लपका।

डॉली घायल पड़े गुण्डों से मुखातिब हुई—

“फौरन दफा हो जाओ यहां से—अगर मेरे तीन गिनने तक मुझे यहां कोई भी नजर आया तो अपनी मौत का वह खुद जिम्मेदार होगा।”

डॉली की इस गर्जना ने सभी के कलेजे दहला दिये। जिनकी हड्डियां टूटी हुई थीं, वे पीड़ा की परवाह न करते हुए घिसटते हुए गिरते-पड़ते मैटाडोर की तरफ लपके।

“एक....!” डॉली दहाड़ी।

गुण्डे बुरी तरह से हड़बड़ाये और मैटाडोर में घुसने लगे।

“दो....!”

तीन कहने की नौबत नहीं आई।

गुण्डे वहां से ऐसे भागे जैसे गधे के सिर से सींग।

डॉली हौले से हंसी और जेन की तरफ बढ़ गई।

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मारुति जेन थाने के गेट में प्रविष्ट हुई और प्रांगण में दायीं तरफ जाकर खड़ी हो गई।

डॉली ने दरवाजा खोला और अपना पर्स सम्भाले बाहर आ गई।

ठीक तभी हवलदार खुशीराम लगभग भागते हुए उसके करीब आया और माथे पर उल्टा हाथ रखते हुए बोला—“जय हिन्द डॉली जी।”

दरवाजा बन्द कर डॉली उसकी तरफ मुड़ी और मुस्कुराई—

“कैसे हो खुशीराम?”

“आपकी मेहरबानी से ठीक हूं।”

“तुम्हारी बीवी कैसी है?”

“आपको बहुत याद कर रही है। जब से उसे पता चला है कि आप ही की मदद से वह बची है—तभी से वह बस आप ही को याद कर रही है। अगर आप वक्त पर मुझे पचास हजार नहीं देतीं तो....।” आवाज भर्रा गई उसकी।

“रिलेक्स खुशीराम....!” डॉली ने उसके कंधे पर थपकी दी—“अगर वो तुम्हारी पत्नी है तो मेरी भी तो भाभी हुई—हुई न?”

भावुक होते हुए खुशीराम ने अपना सिर हिला दिया।

“ठाकरे....!”

“साहब अपने आफिस में बैठे हैं।”

डॉली मुस्कुराई और सिकंदर ठाकरे के ऑफिस की तरफ बढ़ गई।

जैसे ही वह अपने ऑफिस में प्रविष्ट हुई—

“वल्लाह....लगता है आज मैडम कत्ल करने के इरादे से आई हैं।”

अपनी कुर्सी पर बैठा सिकंदर ठाकरे चहका।

डॉली एक कातिल हंसी हंसी—और आगे बढ़कर विजिटर चेयर पर बैठ गई।

“अजी जनाब—हम तो कब से पिघलने को तैयार हैं।” बड़े ही आशिकाना अंदाज में उसने सीने पर हाथ मारा—“बस तुम इशारा कर दो।”

डॉली ने मुस्कुराते हुए एक ठण्डी आह भरी। और अपनी बायीं छाती पर हाथ रखते हुए बोली—

“यह तन तो न जाने कब से तुम्हारे साथ बिछने को तड़प रहा है। मगर तुम ऐसे निर्दयी हो कि एक अबला की आरजू भी पूरी नहीं कर सकते।”

“यह कैसी बात कर रही हो तुम....तुम हां तो करो—फिर देखो—कैसे अपने जलवे दिखाता हूं।”

सिकंदर ठाकरे ने अपना सीना चौड़ा करते हुए बायीं आंख दबाई।

“हाऽऽऽ....!” डॉली ने सीने पर हाथ रखते हुए ठण्डी आह भरी—“मैं तो कब से तुम्हारे जलवे देखने को तरस रही हूं....मगर....!”

“मगर क्या?”

“तुम हो कि मेरी एक छोटी-सी आरजू भी पूरी नहीं कर सकते।”

“अरे मेरी जान—तुम मांगो तो सही—जान भी हाजिर है।”

“तुम्हारी जान नहीं चाहिये मुझे।”

“तो?”

“बस....नाक के नीचे जो झाड़ियां तुमने उगा रखी हैं वो....।”

“मूंछ नहीं मुंडाऊंगा।” दहाड़ उठा सिकंदर ठाकरे—साथ ही उसका हाथ अपने मुंह पर जा चिपका।

ठीक तभी एक सिपाही चाय की ट्रे लेकर भीतर दाखिल हुआ।

सिकंदर ठाकरे की दहाड़ उसने भी सुन ली थी—तभी तो वह हड़बड़ा उठा था—फिर हैरानी से ठाकरे को देखने लगा था।

हड़बड़ाया सिकंदर ठाकरे भी था—मगर उसने अपनी हड़बड़ाहट जाहिर नहीं होने दी—बस मुंह से हाथ हटाया और चेहरे को गम्भीर बनाते हुए बोला—

“रख दो।”

सिपाही ने आगे बढ़कर टेबल पर चाय रखी और खाली ट्रे उठाके बाहर आकर उसने अनभिज्ञता से कंधे उचकाये और एक तरफ बढ़ गया।

सिकंदर ठाकरे की मूंछें न मुंडाने की दहाड़ का मतलब वह बिल्कुल भी नहीं समझ सका था।

अब उसे क्या पता कि उन दोनों के बीच कैसा रिश्ता है।

इधर ऑफिस में डॉली उसके जाते ही हौले से हंसी और चाय का कप उठा लिया।

सिकंदर ठाकरे भी मुस्कुराया और सिर पर हाथ फेरकर कप उठा लिया।

बस यही नोंक-झोंक होनी थी उनमें। मजाक जरूर भौंडा था उनका। मगर दोनों के दिलों में किसी भी तरह का कोई मैल नहीं था।

“कुछ बताया उस आतंकवादी ने?” डॉली चाय का घूंट भरते हुए बोली।

“अरे वो तो सिरे से ही मुकर गया कि वह आतंकवादी है।” सिकंदर ठाकरे बोला—“जबकि उसके पास से एक ऐ.के. सैंतालीस के अलावा तीन किलो आर.डी.एक्स. मिला है। और वो पट्ठा है कि उस सामान का अपना होने से भी इन्कार कर रहा है।”

“चाय पी लो—फिर देखते हैं उसे।” डॉली गम्भीरता से बोली।

दोनों चाय पीने लगे।

चाय पीकर डॉली खड़ी हुई।

“कहां है वो?”

“टॉर्चर सैल में....!” कहते हुए सिकंदर ठाकरे भी खड़ा हो गया।

“आओ....!” डॉली दरवाजे की तरफ मुड़ते हुए बोली।

दोनों टार्चर सेल में पहुंचे—जहां पर कि वह आतंकवादी दीवार से टेक लगाकर बैठा हुआ था—उसके दोनों पैर लकड़ी के स्लीपर में बने छेदों में फंसे हुए थे और हाथ पीछे पीठ पर बंधे थे।

डॉली को देखकर पहले तो वह चौंका—फिर गम्भीर हो गया।

बोला कुछ नहीं वह।

डॉली एक कुर्सी खिसकाकर उसके सामने बैठ गई।

उसके बैठते हुए आतंकवादी की निगाहें सीधा उसकी स्कर्ट के भीतर जा पहुंचीं।

हौले से मुस्कुराई डॉली और सिकंदर ठाकरे की तरफ देखे बिना बोली—

“तुम अभी जाओ ठाकरे।”

सिकंदर ठाकरे ने गहरी सांस छोड़ी और टॉर्चर सैल से बाहर निकल गया।

डॉली अपने हुस्न के जलवे दिखाती हुई आतंकवादी से बोली—“यह सब तुम्हारा है—बस जो मैं पूछूं सच-सच बता दो।”

“द....देखो....तुम लोग लाख बार मुझसे पूछ चुके हो। अरे जब मैं जानता ही कुछ नहीं तो बताऊंगा कहां से?”

“तो तुम आतंकवादी नहीं हो।”

“नहीं।”

“और वो आर.डी.एक्स., ऐ.के. सैंतालीस?”

“मैंने तो कभी आर.डी.एक्स. देखा तक नहीं—और न ही कभी गन पकड़ी है। तुम लोग खामखां एक नेक शहरी को तंग कर रहे हो।”

“कहां के रहने वाले हो?”

“क्या मतलब?” हड़बड़ाया वह।

“मैंने तुम्हारा पता पूछा है और एक नेक शहरी होने के नाते तुम्हें अपना नाम-पता बताने में कोई एतराज नहीं होना चाहिये।”

“मगर....!”

“चिंता मत करो....अपनी तसल्ली कर लेने के बाद तुम्हें छोड़ दिया जायेगा।”

अब उस आतंकी के चेहरे पर हल्की-सी घबराहट उभरी।

“क्या हुआ? पता क्यों नहीं बता रहे?”

“नहीं बताऊंगा।” दृढ़ता से बोला वह आतंकी।

“क्यों?”

“जब तुम मुझे ही इतना सता रहे हो तो मेरे घरवालों की तो मिट्टी हराम कर दोगे। तुम कुछ भी कर लो....मैं कुछ नहीं बताने वाला।”

डॉली ने गहरी सांस छोड़ी।

“सोचा था कि अगर तुम मुझे सब कुछ बता दोगे तो मैं तुम पर अपनी जवानी लुटाकर तुम्हें खुश कर दूंगी। लेकिन लगता है तुम प्यार के नहीं मार के भूखे हो। कोई बात नहीं—जब तुम्हारी तमन्ना यही है तो फिर मैं क्या कर सकती हूं।”

“तुम कुछ भी कर लो—मैं तुम्हें कुछ भी नहीं बताने वाला।”

“अपने साथियों के नाम भी नहीं बताओगे?”

“नहीं....!”

“वे कहां छुपे हैं—यह भी नहीं बताओगे?”

“नहीं बताऊंगा।” दृढ़ता से बोला वह।

डॉली के होंठों पर मुस्कान फैल गई।

“चलो....तुमने यह तो माना कि तुम्हारे साथी हैं, और यह भी माना कि वे कहीं छुपे हुए हैं।”

बुरी तरह से हड़बड़ा उठा वह आतंकी—और फिर दृढ़ता से होंठ भींच लिये।

सचमुच उसने काफी बड़ी गलती कर दी थी।

डॉली हंसी और कोहनियां अपने घुटनों पर टिकाते हुए आगे को झुक गई।

आतंकी की निगाहें उसकी छातियों पर जा अटकीं जो कि उसके झुकने से बाहर उलटने को बेकरार हो रही थीं।

“इन्हें भूल जाओ अब।” डॉली बोली—“अब नहीं मिल सकतीं तुम्हें यह।”

आतंकी कुछ नहीं बोला—बस उसकी छातियों से निगाहें हटा लीं—और परे देखने लगा।

डॉली ने अपने पर्स में से रिवॉल्वर निकाली और उसका मुंह छत की तरफ करके ट्रिगर दबा दिया।

‘धांय....!’

गोली छत में जा धंसी और थोड़ा-सा प्लास्टर उखड़कर सीधा आतंकी के सिर पर आ गिरा।

हड़बड़ाकर आतंकी ने पहले ऊपर देखा, फिर डॉली के हाथ में थमी रिवॉल्वर को देखकर मुस्कुरा पड़ा।

बोला कुछ नहीं वह—बस मुस्कुराता रहा।

डॉली के होंठों पर भी मुस्कान रेंग गई।

“मैं जानती हूं कि तुम्हें मौत का जरा भी खौफ नहीं। आई.एस.आई. ने तुम्हारे दिमागों को साफ करके उनमें यह भर दिया है कि अगर तुम मर गये तो सीधे जन्नत में जाओगे। दुश्मन के हाथों तुम्हारी मौत तुम्हें खुदा के करीब ले जायेगी। और तुम्हारे जेहन में यह भरा गया है कि हिन्दुस्तानी हुकूमत मुसलमानों पर कहर ढा रही है—उनकी बेटियों की अस्मत लूटी जा रही है और तुम्हें इन सबका बदला लेने को उकसाया जाता है। इसीलिये तुम मौत से बेखौफ हो।” उसने एक गहरी सांस छोड़ी और आगे बोली—“मैं पाकिस्तान की तमाम करतूतों को बताकर अपना वक्त खराब नहीं करना चाहती। उन करतूतों को सारे हिन्दुस्तान के मुसलमान जानते हैं—तभी तो उनके दिलों में पाकिस्तान के प्रति नफरत है। खैर....अपना मुंह बन्द ही रखना—खोलना नहीं—और अपने कलेजे को भी मजबूत कर लेना।” कहने के साथ ही वह सीधी हुई और कुर्सी छोड़कर खड़ी हो गई।

“ठाकरे....!” उसने दरवाजे की तरफ मुंह करके आवाज लगाई।

सिकंदर ठाकरे बाहर ही खड़ा था—तभी तो वह फौरन भीतर आ गया था।

“इन साहब को कुर्सी पर बिठाओ और हाथ-पैर बांध देना।” वह बोली—“मैं अभी आई।”

कहकर वह बाहर निकल गई।

पीछे-पीछे सिकंदर ठाकरे भी बाहर आया और आवाज आई—

“खुशीराम....!”

तुरंत खुशीराम दौड़ता हुआ उसकी तरफ बढ़ा।

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करीब पन्द्रह मिनट बाद जब डॉली टॉर्चर सैल में प्रविष्ट हुई तो उसने दोनों हाथों में एक मटका उठा रखा था।

कांस्य का मटका था वह।

खूब बड़ा सारा।

मटका देखकर आतंकी के चेहरे पर हैरानी उभरी—लेकिन वह बोला कुछ नहीं।

“यह मटका....!” तभी ठाकरे हैरानी से बोला।

“जादू का मटका है यह।” डॉली उसे अपनी कमर के साथ लगाकर मटके के गले में बांह पिरोती हुई हंसी—“जंच रहा है न मुझ पर?”

“अगर घाघरा-चोली पहनी होती तो जरूर जंचता। इन कपड़ों में नहीं—मगर यह जादू का मटका कैसे हो गया?”

डॉली ने करीब ही पड़ा एक डण्डा उठाकर मटके को अपनी हथेली पर खड़ा किया और उस पर डण्डा मारा।

“टन्न....!” एक तेज आवाज पैदा हुई।

“देखा जादू?” हंसी डॉली ।

“जादू?” हैरानी जताई सिकंदर ठाकरे ने—“मुझे तो सिर्फ टन्न की आवाज ही सुनाई दी—“कोई जादू तो नजर आया नहीं।”

“यह जुबान खुलवाने वाला जादू है। जो टन्न की आवाज से पैदा होता है।”

“मैं अभी भी कुछ नहीं समझा। भला इस मामूली मटके से तुम इसका मुंह कैसे खुलवा सकती हो?”

“अभी तुम्हारे सामने ही होगा जादू।”

कहकर डॉली मटके को उठाके आतंकी के सामने आ खड़ी हुई।

“कलेजा मजबूत कर लिया न?” वह मुस्कुराई।

आतंकी कुछ नहीं बोला—बस होंठों को और भी सख्ती से भींच लिया।

“शाबाश—होंठों को ऐसे ही बन्द रखना—खोलना नहीं।”

आतंकी ने और भी जोरों से होंठ भींच लिये।

“अब मैं तेरे सिर पर यह मुकुट पहनाऊंगी।”

कहते हुए डॉली ने मटके को उल्टा कर उसे दोनों हाथों से पकड़ा और उसके सिर के ऊपर करते हुए बोली—

“घबराओ नहीं—मरोगे नहीं तुम—बस थोड़े से पटाखे तुम्हारे कानों में फटेंगे—फिर या तो तुम बहरे हो जाओगे या पागल—मगर मरोगे तुम हरगिज नहीं।”

कहकर उसने वह मटका आतंकी के सिर पर डाला और छोड़ दिया।

मटका उसके कंधों पर आकर ठहर गया।

अब आतंकी के धड़ पर सिर नहीं बल्कि वह घड़ा नजर आ रहा था।

मटके के भीतर चेहरा आते ही आतंकी के कानों में सांय-सांय होने लगी।

हवा उसके कंधों के पास से भीतर प्रवेश कर रही थी।

“एक छोटा-सा पटाखा फोड़ने जा रही हूं।”

तभी डॉली की गूंजती आवाज उसके कानों में पड़ी—साथ उसे डॉली के मुंह का स्पर्श अपने सीने के पास महसूस हुआ।

वह अपनी आवाज उसके कानों तक पहुंचाने के लिये ही मुंह को घड़े के मुंह के करीब लाई थी।

हालांकि वह साधारण आवाज में बोली थी—मगर आतंकी को ऐसा लगा जैसे लाऊडस्पीकर उसके कानों के पास बजा हो।

डॉली सीधी हुई और उंगली की बटें बनाकर मटके पर दस्तक दी।

बाहर खड़े सिकंदर ठाकरे को वह आवाज साधारण लगी थी—मगर आतंकी को ऐसा लगा जैसे उसके कानों के पास विस्फोट हुआ हो।

न चाहते हुए भी उसका कलेजा जोरों से धड़क उठा। साथ ही वह अपने कलेजे को मजबूत करने की कोशिश करने लगा। वह समझ गया था कि आगे क्या होगा।

डॉली ने मुस्कुराते हुए एक बार सिकंदर ठाकरे को देखा—फिर वही डण्डा उठाकर बोली—

“अब देखो इस जादुई मटके का कमाल।”

कहने के साथ ही उसने मटके पर डण्डे का प्रहार किया।

‘टनाक्....!’

सिकंदर ठाकरे के कानों में तेज आवाज पड़ी और वह अपने दायें कान में उंगली दे खुजाने लगा।

जब बाहर खड़े सिकंदर ठाकरे के कानों में सांय-सांय होने लगी थी तो आतंकी की हालत का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था।

उसका तो सिर मटके के भीतर था।

उसे ऐसा लगा जैसे उसके कानों के साथ लगाकर परमाणु बम फोड़ा गया हो।

एक ही धमाके ने उसके दिल को दहलाकर रख दिया था।

अभी पहले धमाके की गूंज उसके कानों में ही गूंज रही थी कि तभी दूसरा धमाका गूंजा।

और फिर उसके कानों में लगातार विस्फोट होने लगे।

आठ-दस धमाकों में ही उसे अपना दिमाग फटता महसूस होने लगा।

सिर भारी हो गया।

उसे ऐसा लगा जैसे वह ज्यादा देर तक बर्दाश्त नहीं कर पायेगा। फिर भी वह होंठों को भींचे बर्दाश्त करता रहा।

परमाणु बम बार-बार उसके कानों के पास फटकर उसके कलेजे को दहला रहे थे।

आखिर उसका जी मिचलाने लगा।

उसने खुद को रोकने की बहुत कोशिश की मगर रोक नहीं सका।

उसका मुंह पूरा-का-पूरा खुल गया और पिछला सारा खाया-पीया बाहर आ गया।

कै से उसका मुंह, गर्दन तथा गर्दन से नीचे के कपड़े सराबोर हो गये।

अब एक नहीं—दो-दो यातनायें पड़ रही थीं उस पर।

एक तो बम फट रहे थे—दूसरे बदबू से उसका हाल बुरा हो रहा था।

नतीजा—

वह टूट गया।

उसे टूटना पड़ा।

“रोको....!” वह चीखा—“मैं बताता हूं।”

चीखने के साथ-साथ उसने सिर को भी जोर-जोर से हिलाया।

बाहर मटके पर डण्डे बरसा रही डॉली को उसकी आवाज सुनाई तो नहीं पड़ी—मगर मटके के आगे-पीछे हिलने से वह रुक गई कि वह कुछ कहना चाहता है। सो उसका डण्डा वहीं रुक गया।

उसने सिकंदर ठाकरे की तरफ देखते हुए मटके को निकालने का इशारा किया।

सिकंदर ठाकरे आगे बढ़ा और आतंकी के सामने आकर मटके को पकड़ा जो कि डण्डे की चोटों के कारण कई जगहों पर से पिचक गया था।

उसने मटके को ऊपर उठाया तो उसका जी मिचला उठा।

आतंकी का चेहरा कै से भरा हुआ था और वहां से बदबू उठ रही थी।

“म....मैं बताता हूं....।” आतंकी डॉली के बोलने से पहले ही बोल उठा—“मेरा बाप निसार अहमद है और मैं पाकिस्तान में कराची में रहता हूं। म....मैं सब कुछ बता दूंगा—मगर खुदा के लिये पहले मेरे मुंह से गंदगी साफ कर दो।”

डॉली ने गहरी सांस छोड़ी और बोली—“इसका मुंह साफ करवाओ ठाकरे।”

सिकंदर ठाकरे ने मटका नीचे रखा और दरवाजे की तरफ मुड़ गया।

पीछे-पीछे डॉली भी बाहर निकल आई।

“अब वो टूट चुका है।” वह ठाकरे से बोली—“तुम उससे हर जानकारी ले सकते हो।”

सिकंदर ठाकरे जो एक सिपाही को आवाज देने जा रहा था—चौंककर डॉली को देखने लगा।

“अरे जब मुंह तुमने खुलवाया है तो पूछताछ भी तुम ही करो न।”

“वो तुम कर लो।”

“मगर तुम....?”

“मुझे फौरन जाना है! कोई मेरा बेसब्री से इंतजार कर रहा है।” कहते हुए डॉली की आंखों के आगे बिच्छू का चेहरा नाच उठा।

उसकी बात सुन सिकंदर ठाकरे चौंक पड़ा—साथ ही हल्की-सी ईर्ष्या भी उसके चेहरे पर उभरी।

“अभी तो दिन चढ़ा है!” वह चिढ़े स्वर में बोला—“और तुम....!”

“डॉली के लिये दिन क्या रात क्या। बस जब दिल किया दिल भर लिया।”

“तो मुझसे भी दिल भर लो न—मैं क्या मर गया हूं।”

“मूंछें....!” डॉली उसकी मूंछों की तरफ इशारा करते हुए हंसी—“तुम मूंछें कटवाओ मैं....।”

“जाओ....!” सिकंदर ठाकरे उसकी बात काटते हुए हौले से चीखा।

डॉली पुनः हंसी और परिसर की तरफ बढ़ गई।

“खुशीराम....!” तभी ठाकरे ने सिपाही को आवाज लगाई।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
डॉली अपने बेडरूम में दाखिल हुई और सीधा वार्डरोब की तरफ बढ़ी।

वार्डरोब के सामने आकर उसने उसका दरवाजा खोला और अपनी दायीं बांह भीतर डाल पता नहीं ऐसा क्या जादू किया कि वार्डरोब के करीब ही फर्श फटने लगा और फटे स्थान में नीचे जाती सीढ़ियां नजर आने लगीं।

यह बेसमेंट में प्रवेश करने का उसका अपना पर्सनल रास्ता था।

डॉली के बेसमेंट के बारे में तो आप काफी कुछ जानते ही हैं। वह वहां कई तरह के प्रयोग भी करती है और वहीं पर उसका टॉर्चर सैल भी है। जहां पर वह बड़े-बड़े पत्थरों को पिघलाने के एक से बढ़कर एक नायाब तरीके अपनाती है।

सीढ़ियां उतरकर वह बेसमेंट के जिस कमरे में खड़ी हुई, वहां दायीं तरफ एक लम्बी टेबल पर शीशे के कई जार रखे थे जिनमें कि अलग-अलग रंगों के रसायन नजर आ रहे थे।

उन सभी को नजरंदाज करते हुए वह सामने वाली दीवार के सामने पहुंची और ताली बजाई।

तुरंत प्रतिक्रिया हुई।

दीवार फट गई और उसमें बाहर जाने का रास्ता बन गया।

वह उस रास्ते से निकली और एक लम्बे गलियारे में आ गई।

पैदल ही आगे बढ़ते हुए वह गलियारे के अन्त वाले दायीं तरफ के कमरे के दरवाजे में प्रवेश कर गई।

सामने एक कुर्सी पर बिच्छू बंधा हुआ था।

उसके पैर कुर्सी के पायों से बंधे हुए थे, और हाथ हत्थों से।

डॉली को अपनी तरफ देखते देख बिच्छू ने मुंह परे फेर लिया।

डॉली के होंठों पर जहरीली मुस्कान उभर आई।

बड़े ही ठण्डे अंदाज में चलते हुए वह उसके सामने आकर रुकी और उसके बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़कर उसका चेहरा अपनी तरफ घुमा लिया।

“तेरे इस तरह आंखें फेरने से मैं न तो गायब हो जाऊंगी और न ही मेरा इरादा तुझे छोड़ देने का बनेगा।”

“मैं मरने से नहीं डरता।”

बिच्छू अपनी आवाज में दृढ़ता लाते हुए बोला।

“इसका पता तो तब चलेगा जब मौत तेरे सामने होगी। फिलहाल तो तू यह बोल कि तू है कौन? और मुझे उठाने के लिये तू इतनी बड़ी फौज को लेकर क्यों आया था?”

जो बात डॉली ने उससे पूछी थी—उसका जवाब देने में बिच्छू को कोई एतराज नजर नहीं आया।

“भद्रानाथ को तूने ही मारा था न?” वह डॉली की आंखों में घूरते हुए बोला।

सुनकर डॉली बुरी तरह से चौंकी।

“तू....दीनापुर के भद्रा की बात कर रहा है?” वह सोचपूर्ण स्वर में बोली।

“हां....!”

“ओह....तो तू उसका कोई सगेवाला है—और उसकी मौत का बदला लेने आया है।” वह कुटिलता से मुस्कुराई—“अरे बेवकूफ! पहले दीनापुर में पता तो कर लेना था—जूतों से पीट-पीटकर मारा था मैंने भद्रा को—वो भी पब्लिक के सामने। अगर यह तू पहले जान लेता तो....।”

“तेरी इसी हरकत ने तो बॉस को हाफ़ मेंटल बना दिया है।” उसकी बात को काटते हुए गुर्राया बिच्छू—“अब वो तभी ठीक होंगे जब वो तेरे खून से अपने हाथ रंग लेंगे।”

डॉली की आंखें सिकुड़ गईं। उसकी बात का उसने बुरा नहीं माना—हां—बॉस के बारे में जरूर सोच रही थी वह। यह नाम उसने तब भी सुना था—जब बिच्छू उसे उठाने आया था।

“यह....बॉस कौन है?” वह बोली।

“हमारे बॉस हैं—अन्नदाता हैं तुम्हारे—रामनगर चली जाओ—सब पता चल जायेगा।” बिच्छू बोला—“भद्रानाथ बॉस का जिगरी दोस्त था—तूने उसे मारकर अपनी मौत के परवाने पर दस्तखत कर दिये हैं। डॉली —अब तो खुद ऊपर वाला भी आकर तुझे बॉस के कहर से नहीं बचा सकता।”

डॉली के होंठों पर जहरीली मुस्कान फैल गई।

“यह तो वक्त ही बतायेगा कि कहर किस पर टूटता है।” वह गहरी सांस छोड़ते हुए बोली—“फिलहाल तो तू यह बता कि तेरे बॉस का असली नाम क्या है?”

“कुणाल ठाकुर।”

“उसे मेरा पता कैसे चला?”

डॉली के इस सवाल पर बिच्छू हड़बड़ा उठा। साथ ही उसके चेहरे पर हल्का-सा आतंक उभरा।

बाकी सब कुछ तो उसने बेखौफ बता दिया था—लेकिन अब उसे दहशत हो रही थी—और उसकी वजह भी थी। वह जानता था कि उसने रंगीला का नाम बता दिया और यह बता दिया कि वह मर गया है तो कोई बड़ी बात नहीं कि वह गुस्से में आकर उसे गोली से उड़ा दे।

इसी वजह से उसके चेहरे की रंगत उड़ी थी।

उसकी उड़ी हुई रंगत से ही डॉली ने उसका चेहरा पढ़ लिया था। उसे समझते देर नहीं लगी कि कुणाल ठाकुर को उसका पता लगने की बात गहरी है।

“बोल....!” उसके मुंह से इस बार गुर्राहट उबली—“उसे मेरा पता कैसे चला?”

जवाब में बिच्छू ने जोरों से थूक सटकी। बोला कुछ नहीं वह, बस उसके होंठ फड़फड़ाकर रह गये।

“लगता है मौत की शक्ल दिखानी ही पड़ेगी तुझे।” डॉली फुंफकारी।

बिच्छू ने गहरी सांस छोड़ी और गम्भीरता से बोला—

“जिस अंदाज से तुमने मेरे समेत मेरे सभी साथियों को मारा—उसी से पता चल जाता है कि तुम मेरी जुबान भी खुलवा सकती हो। इसलिये मेरे लिये बेहतर यही है कि मैं बता दूं लेकिन....!”

“लेकिन क्या?”

“मेरी एक शर्त है।”

“शर्त?”

“जुबान खोलने की शर्त।”

डॉली के होंठों पर कुटिल मुस्कान फैल गई।

“क्या तुम शर्त रखने की स्थिति में हो?”

“नहीं, फिर भी शर्त रख रहा हूं।”

डॉली ने पल भर के लिये सोचा—फिर बोली—

“बताओ—क्या शर्त है तुम्हारी—लेकिन उसे मानने के लिये मैं बाध्य नहीं हूंगी।”

“बहुत छोटी-सी शर्त है।”

“बोलो।”

“मुझसे यह जानने के बाद कि बॉस को तुम्हारा पता कैसे लगा—तुम मुझे गोली मार दोगी।”

“क्...या मतलब?” बुरी तरह से उछल पड़ी डॉली ।

बिच्छू ने गहरी सांस छोड़ी और गम्भीर स्वर में बोला—

“बॉस से गद्दारी करने की मैं सोच भी नहीं सकता। यूं भी जो तुम पूछ रही हो वो गद्दारी नहीं—और जो कुछ मैंने बताया वो भी गद्दारी नहीं। लेकिन....अगर मैं खाली हाथ वापस गया तो मेरी जो हालत होगी वो मैं ही जानता हूं। नाकामी की सजा सिर्फ और सिर्फ मौत है—वो भी बहुत बुरी मौत। और मैं बुरी मौत नहीं मरना चाहता। इसीलिये मैं तुम्हारे सामने शर्त रख रहा हूं....।”

“कि जानने के बाद मैं तुम्हें गोली मार दूं?”

“हां!”

“आसान मौत मरना चाहते हो।”

“तभी तो शर्त रखी है।”

डॉली ने सोचपूर्ण अंदाज में अपनी ठोड़ी उंगली के पोर से ठकठकाई, फिर सिर को हल्का-सा झटका देकर बिच्छू के चेहरे पर निगाहें जमाते हुए बोली—

“मैं वादा नहीं कर रही कि मैं तुम्हें गोली मारूंगी।”

“ल....लेकिन....!”

“हां....अगर तुम्हारी बातों से मुझे गुस्सा आ गया तब बात और है। वर्ना तुम यहां से सीधे जेल में जाओगे।”

“ल....लेकिन मैं....।”

“बेकसूर लोगों का बिना वजह खून बहाना मेरी फितरत नहीं बिच्छू। इसलिये मैं ऐसा वादा हरगिज नहीं करूंगी और तुम्हें बताना भी पड़ेगा। अगर जिद करोगे तो जुबान खुलवाने के मेरे पास एक नहीं सैंकड़ों रास्ते हैं। अब बोलो—तुम बोल रहे हो कि नहीं।”

जिस खुरदुरे अंदाज में डॉली ने बात की थी—उसे सुन बिच्छू की रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ गई। उसकी ताकत को तो वह देख ही चुका था। वह जान गया था कि उसके सामने खड़ी वह हसीन-तरीन युवती जो कह रही है, उसे कर गुजरने का माद्दा भी रखती है। और वह यह भी जानता था कि उसकी बात सुनकर डॉली उसे गोली नहीं मारेगी—और कुणाल ठाकुर के हाथों वह बुरी मौत मरना नहीं चाहता था। सो उसने खुद ही आसान मौत मरने का फैसला कर लिया।

उसने गहरी सांस छोड़ी और डॉली की तरफ देखते हुए बोला—

“तुम्हारा पता बॉस को रंगीला के जरिये पता चला।”

“भी....म....सेन।” एक तेज झटका लगा डॉली को।

न चाहते हुए भी उसका कलेजा धड़क उठा था।

“दीनापुर वाला रंगीला—उसका पता मैंने ही लगाया था। उसी ने बुलाया था न तुम्हें दीनापुर—भद्रानाथ को खत्म करने के लिये।”

डॉली कुछ नहीं बोली—बस उसे घूरती रही।

“बड़ी मुश्किल से पता चला उसका—और वो पता मुझे ही चला—मैं रंगीला को लेकर सीधा बॉस के पास पहुंचा और फिर जिस तरह मैंने उसकी जुबान खुलवाई, वो मैं ही जानता हूं। दांतों तले पसीना आ गया मेरे। बड़ा ही सख्तजान निकला था वह। टांगें काट डालीं मैंने उसकी—बांहें काट डालीं। तब भी नहीं बोला वह। और फिर जब मैंने उसे उसी हालत में सड़क पर फैंक देने का ऐलान किया, तब जाकर उसने तुम्हारा नाम बताया—वो भी इस शर्त पर कि उसे जिन्दा न छोड़ा जाये।”

“य....यानि रंगीला....।”

“मर गया....।”

डॉली का चेहरा कानों तक लाल हो उठा। आंखें अंगारे बरसाने लगीं।

झपटकर उसने बिच्छू के बालों को अपनी मुट्ठी में पकड़ा और उसे झिंझोड़ते हुए नागिन की तरह फुंफकारी—

“हरामखोर....मेरे भाई को मार डाला तूने।”

“ज....जुबान जो खुलवानी थी उसकी—आ....ह।” पीड़ा भरे स्वर में बोला बिच्छू।

डॉली ने तुरंत रिवॉल्वर निकाली और—

‘धांय....!’

गोली सीधी बिच्छू के सीने में जा धंसी।

बिच्छू पहले तो चीखा फिर उसके होंठों पर फीकी मुस्कान उभर आई।

“थ....थैंक्....यू....री....मा राठौर....। त....तुम्हारे हा....थों आ....सान मौत....म....मरने के....लिये....ही मैं....ने झूठ....ब....बो....ला था....भ....भी....मसेन को मैं....ने न....हीं....ब....बाऊ....जी....न....ने....।”

बात अधूरी ही रह गई उसकी। गर्दन एक तरफ लटक गई।

मर चुका था वह।

लेकिन डॉली उसकी अधूरी छोड़ी बात को समझ गई थी। तभी तो उसके होंठों से गहरी सांस छूट गई थी। अपने धर्म-भाई की मौत को वह बर्दाश्त नहीं कर पाई थी, तभी तो तैश में आ गई थी।

मगर अब उसे अपनी जल्दबाजी पर अफसोस हो रहा था—और खुद पर गुस्सा भी आ रहा था कि वह इतनी जल्दी तैश में क्यों आ गई।

मगर अब किया भी क्या जा सकता था।

तीर तो कमान से निकल कर शिकार भी कर चुका था।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
‘ट्रिन....ट्रिन....।’

फोन की घण्टी घनघना उठी।

जम्हाई लेते हुए सिकंदर ठाकरे ने रिसीवर उठाया और उसे कान से लगाते हुए माऊथपीस में बोला—

“हैलो....!”

“फारिग हो गये आतंकवादी से?” दूसरी तरफ से डॉली की आवाज आई।

“बस अभी कुछ देर पहले ही फारिग हुआ हूं। सुबह उसे लेकर अदालत जाना है और....।”

“यह काम सब-इंस्पेक्टर कर लेगा।”

“क्या मतलब?”

“तुम दो घण्टे के अंदर-अंदर मेरी कोठी पहुंचो।”

“क्या बात है....खैरियत तो है?” चौंकते हुए बोला सिकंदर ठाकरे।

“मैं घर फोन करके तुम्हारी छुट्टी मंजूर करवा रही हूं।”

“ल....लेकिन....।”

गहरी सांस छोड़ कर रह गया सिकंदर ठाकरे। दूसरी तरफ से सम्बंध विच्छेद हो गया था।

जिस गम्भीरता से दूसरी तरफ से डॉली ने बात की थी—वह उसी से समझ गया था कि कोई बड़ी बात हो गई है—और उसे सुलझाने के लिये वह डॉली के साथ बाहर जा रहा है।

कहां....?

यह उसे पता नहीं था।

उसने पुनः गहरी सांस छोड़ी और एक सिपाही को बुलाकर उसे सब-इंस्पेक्टर बंसल को बुलाने का हुक्म सुना दिया।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

“अरे बाबा, हम कहां जा रहे हैं? यह तो बोलो। अपने घर में चाय तक नहीं पिलाई तुमने—यहां तक कि भीतर भी नहीं घुसने दिया। बाहर से ही कार में बिठाया और चल पड़ीं। आखिर बात क्या है? किस आपरेशन पर ले जा रही हो मुझे....कम-से-कम पता तो चले।”

सिकंदर ठाकरे डॉली की तरफ देखते हुए तनिक झल्लाये स्वर में बोला।

पन्द्रह किलोमीटर तक का सफर कर चुके थे वे—और अब मुम्बई की सीमा से बाहर निकल चुके थे। मगर अभी तक डॉली ने उससे कोई बात नहीं की थी। बस कार ड्राईव करते हुए सामने सड़क पर निगाहें टिकाये हुए थी।

उसका चेहरा गम्भीर था—और वह जबड़ों को बार-बार भींच रही थी।

उसका चेहरा देखकर सिकंदर ठाकरे यह तो समझ ही गया था कि मामला गम्भीर है। गम्भीर क्या बहुत ज्यादा गम्भीर है। वर्ना कठिन-से-कठिन परिस्थिति में भी वह हमेशा मुस्कराती ही रहती थी। बस इसी वजह से वह अभी तक चुप बैठा हुआ था कि वह स्वयं ही सब कुछ बता देगी।

मगर जब उसने डॉली के होंठ खुलते नहीं देखे तो उसके सब्र का बांध टूट गया और उसने अपना मुंह खोल दिया।

लेकिन डॉली ने तब भी कुछ नहीं कहा—बस कार ड्राईव करती सामने देखती रही।

“अरे बाबा, मैं तुमसे पूछ रहा हूं।।” सिकंदर ठाकरे उसके कंधे पर हाथ मारते हुए तीखे स्वर में बोला—“जुबान को लकवा मार गया है क्या?”

तब जाकर डॉली ने उसकी तरफ देखा।

बुरी तरह से उछल पड़ा सिकंदर ठाकरे।

आंखों में हैरानी का सागर ठाठें मारने लगा।

उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि जो वह देख रहा है, वो सच है या सपना।

बात ही ऐसी थी।

डॉली की आंखों में आंसू चमक रहे थे।

एक ऐसी महिला की आंखों में वह आज पहली बार आंसू देख रहा था—जिसमें उसने हमेशा कठोरता के ही दर्शन किये थे। भावनाओं की उसके दिल में कोई जगह नहीं थी।

उसके लिये अगर उसका अपना कुछ था तो था—भारतवर्ष और कानून।

और आज वह उसकी आंखों में आंसू देख रहा था। ऐसे में उसका बुरी तरह से चौंकना स्वाभाविक ही था।

“ऐ....त....तुम रो रही हो?” वह हैरानी दर्शाते हुए उसकी तरफ उंगली सीधी करते हुए बोला।

डॉली ने गर्दन सीधी की।

“मेरा भाई मर गया ठाकरे....।” उसके गले से भर्राई आवाज निकली।

एक और झटका लगा सिकंदर ठाकरे को।

“तुम्हारा भाई?” वह हैरानी से बोला—“तुम्हारा भाई कहां से आ गया?”

डॉली ने स्टेयरिंग से बायां हाथ हटाकर अपनी आंखों को पौंछा और पुनः स्टीयरिंग पकड़ते हुए बोली—

“मेरा धर्मभाई था वह।”

“धर्मभाई?”

“हां!”

“मगर तुम तो....।”

“सिर्फ यार ही पालती हूं—यही कहना चाहते हो न तुम?”

बुरी तरह से हड़बड़ा उठा सिकंदर ठाकरे।

ठीक ही तो कह रही थी डॉली । सिकंदर ठाकरे ने अभी तक सिर्फ उसकी आशिकी के ही चर्चे सुने थे। हां, अपने प्रति उसने उसके दिल में कोमल भावनाओं को पनपते जरूर देखा था। लेकिन किसी की बहन बनना....यह वह पहली बार सुन रहा था। तभी तो हैरान हो रहा था वह।

उसे चुप देख डॉली ने गहरी सांस छोड़ी।

“मेरे एक नहीं....कई भाई भी हैं ठाकरे। उन्हीं में से एक रंगीला भी था। मगर मैं उसे सिर्फ एक ही बार राखी बांध पाई। दूसरी बार राखी बंधवाने से पहले ही उसे मार डाला गया।”

“य....यह रंगीला था कौन? कहां रहता था वह? और यह तुम्हारा भाई कैसे बन गया?”

सिकंदर ठाकरे के शब्दों से ही उसके भीतर की आतुरता नजर आ रही थी।

डॉली ने गहरी सांस छोड़ी और कार की रफ्तार बढ़ा दी।

उसकी निगाहें विण्डस्क्रीन पर जमी हुई थीं, जिस पर कि अब धुंधले-धुंधले अक्स उभर रहे थे।

यह तस्वीरें करीब छह महीने पहले की थीं जब वह नील नगर गई हुई थी।

तब उसे तलाश थी जगवीर की, जिसके पीछे पूरे हिन्दुस्तान की पुलिस लगी हुई थी।

एक गुप्त सूचना के आधार पर वह नील नगर गई थी—और उस वक्त वह नील नगर के पुलिस स्टेशन में वहां के एस.एच.ओ. इंस्पैक्टर कांशी राणा के ऑफिस में प्रविष्ट हुई थी।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

इंस्पेक्टर कांशी राणा ने ललचाई निगाहों से डॉली को देखा।

उस वक्त डॉली काले रंग की जीन्स पहने थी—और ऊपर पीले रंग की शर्ट पहने हुए थी।

शर्ट जीन्स में थी सो उसके उभार जानलेवा अंदाज में उभरे हुए थे—ऊपर से उसकी शर्ट के ऊपरी बटन खुले हुए थे।

बस एक बटन और खुल जाता तो भीतर का सारा मामला सामने आ जाता।

एक हसीन तरीन युवती—वो भी फैशनेबल कपड़ों में कांशी राणा के ऑफिस में प्रविष्ट हुई थी। ऐसे में उसका कलेजा धड़कना स्वाभाविक था।

और कलेजा धड़का भी था उसका। जिसका सबूत उसके गले की घण्टी थी जो कि बार-बार उछल रही थी।

अपने भारी कूल्हे मटकाते हुए डॉली आगे बढ़ी और एक विजिटर चेयर पर बैठ गई।

कांशी राणा अभी भी एकटक उसे निहारे जा रहा था। एक अजीब-सी हवस उसकी आंखों में झांक रही थी। उसकी निगाहें एकटक उसके उभारों पर ही टिकी हुई थीं।

डॉली एक-दो पल तो उसे देखती रही—फिर अपना हाथ आगे कर उसके चेहरे के सामने चुटकी बजाते हुए बोली—

“होश में आओ इंस्पेक्टर।”

हड़बड़ाया कांशी राणा और उसकी छातियों से निगाहें हटाकर उसके चेहरे को देखने लगा।

“क्या तुम यहां आने वाली हर औरत की ब्यूटी ऐसे ही देखते हो?” डॉली उसे घूरते हुए बोली।

एक बार फिर हड़बड़ाया कांशी राणा, फिर उसके होंठ फैल गये।

“कोई-कोई फूल ऐसा होता है—जिसे देखकर ही आदमी मदहोश हो जाता है। ऊपर वाले ने लगता है तुम्हें फुरसत में बनाया है। और....।”

“सिर्फ मतलब की बात करो।” डॉली उसे बीच में ही टोकते हुए बोली।

कांशी राणा हल्के से हड़बड़ाया—फिर स्वयं को सम्भालते हुए निगाहें डॉली के चेहरे पर गड़ाते हुए बोला—

“तुम्हारा नाम?”

“डॉली ।”

“काम?”

“जगवीर की तलाश में आई हूं।”

डॉली ने यह शब्द कहे तो सामान्य अंदाज में थे—मगर कांशी राणा के लिये यह जैसे परमाणु बम का विस्फोट था। बुरी तरह से चौंकते हुए वह ऐसे खड़ा हुआ कि कुर्सी पीछे को उलट गई।

हड़बड़ाते हुए वह पीछे हाथ कर झुका और कुर्सी को सीधा कर उस पर वापस बैठते हुए पहले जोरों से थूक सटकी, फिर बोला—

“क....कौन हो तुम?”

“बताया तो, डॉली ।”

“जगवीर से तुम्हारा क्या रिश्ता है?”

“वही जो पुलिस का चोर से होता है। कानून का मुजरिम से होता है।”

“क्या मतलब....मैं कुछ समझा नहीं।”

“मुम्बई से आई हूं मैं। भारत सरकार की तरफ से मुझे आदेश मिला है जगवीर को पकड़ने का—और मुझे पता चला है कि वह यहां नील नगर में छुपा हुआ है।”

कहकर डॉली ने अपनी शर्ट की जेब में से अपना वकील वाला आई कार्ड निकाला और उसे कांशी राणा के सामने करते हुए बोली—

“यह मेरा आई कार्ड है। ज्यादा तसल्ली के लिये गृहमंत्रालय में फोन कर सकते हो।”

“अ....आपने कह दिया तो तसल्ली कैसी?” हड़बड़ाते हुए बोला कांशी राणा—“ल....लेकिन हमें तो ऐसी कोई सूचना नहीं मिली कि जगवीर यहां इस शहर में है।”

“कमाल है।” डॉली ने हैरानी जताई—“चालीस खून अभी हाल ही में किये हैं उसने। भरे चौक में बम फैंककर उसने चालीस बेगुनाहों की जान ली है। उससे पहले भी वह कई बड़े-बड़े अपराध कर चुका है। इतना बड़ा अपराधी नील नगर में है और तुम्हें कोई जानकारी नहीं।”

“म....मगर....!”

“पूरे शहर में अपने मुखबिरों को सचेत कर दो।” डॉली ने उसकी बात काटी—“वह यहीं इसी शहर में छुपा हुआ है। मुझे हर हाल में उसका पता चाहिये। वो भी आज ही। कल रात के दस बजे तक मुझे जगवीर की खबर मिल जानी चाहिये। अभी चार बजे हैं। यानि छह घण्टे हैं तुम्हारे पास।”

कांशी राणा ने थूक सटकते हुए सिर हिला दिया।

“मैं होटल नटराज में ठहरी हूं—कमरा नम्बर छह सौ सात। जैसे ही उसकी सूचना मिले—मुझे फौरन खबर कर देना।”

कांशी राणा ने पुनः सिर हिला दिया।

डॉली खड़ी हो गई।

“को....कोई चाय-पानी तो....।”

“सॉरी....इतना वक्त नहीं है मेरे पास।”

डॉली रूखे अंदाज में बोली और पलटकर कूल्हे मटकाते हुए बाहर निकल गई।

कांशी राणा कुछ देर तक तो दरवाजे को खाली-खाली निगाहों से घूरता रहा—फिर उसने एक ठण्डी आह भरी और कुर्सी छोड़कर खड़ा हो गया।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 

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