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Thriller राक्षस अलफाँसें सीरीज़
वो २५ जून की रात थी|
कितने ही अमावस की रात उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुके थे पर आज जब वो अपने दफ्तर से निकला था तो उसे एहसास न था कि आज की रात उसकी जिंदगी की सबसे भयावह रात बन जाने वाली थी| जब वह अपने दफ्तर से जहाँ वह चपरासी के पद पर कार्यरत था रात नौ बजे निकला तो उसे उसके दोस्तों ने घेर लिया था और दोस्तों के साथ खाते पीते दो घंटे से ऊपर हो गए थे और अब रात के लगभग साढ़े ग्यारह होने को थे| ऑफिस के पास ही एक छोटा सा ढाबा था जहाँ उसने दोस्तों के आग्रह पर दो तीन पैग भी चढ़ा लिए थे जिसकी उसे आदत नहीं थी| ऑफिस से घर की दूरी लगभग बारह किलोमीटर की थी जिसे वह साइकिल से तय करता था|
सेवाराम एक साधारण शक्ल ओ सूरत और इकहरे बदन का चौबीस वर्षीय युवक था और उसमें कोई ऐसी खास बात न थी कि वो किसी के विशेष आकर्षण का केंद्र बने या कम से कम उसका ऐसा ही सोचना था| अपने ही ख्यालों में गुम वह धरमशाला मोड़ तक पहुँच चूका था जहाँ से उसके घर की दूरी महज तीन किलोमीटर रह जानी थी और फिलहाल वह जागरण आश्रम नाम के विशाल भवन के पिछली सड़क से गुज़र रहा था जब आश्रम के भीतर से आते तीव्र मंत्रोच्चार ने उसे साइकिल में ब्रेक लगाने पर मजबूर कर दिया| आश्रम के पिछले हिस्से में एक विशाल पार्क था जो शाम सात बजे ही बंद हो जाया करता था| पार्क में अन्दर आने के लिए सामने वाले फाटक से तो रास्ता था ही, साथ ही इस पिछली तरफ भी एक फाटक था जो ऊँची ऊँची किलेनुमा दीवारों से घिरा था जिसे शाम सात बजे अन्दर की तरफ से बंद कर दिया जाता था| बंद करने का काम केयरटेक मंगल का था जो आश्रम का ही सेवादार था जिसके रहने का कमरा इस पार्क के पिछली तरफ बना था| पार्क के बीचो-बीच एक ऊँचा चबूतरा था जिसपर शिव जी की एक आदमकद मूर्ति थी जिसके दर्शन किये बिना सेवाराम ऑफिस की ओर प्रस्थान नहीं करता था| शाम सात बजे तक बंद हो जाने वाला फाटक आज पूरी तरह खुला था और शिव जी की विशाल मूर्ति पर सामने जलती रौशनी दृष्टिगोचर हो रही थी| पिछले तीन वर्षों में पहली बार उसने ये पिछला फाटक जो धर्मशाला दरवाजा के नाम से जाना जाता था को रात के वक़्त उसने खुला देखा था| साइकिल को वहीँ साइड में खड़ी कर वो भीतर प्रविष्ट हो गया|
...............
वो कोई भैरवी प्रतीत हो रही थी जो हवनकुंड के सामने पद्मासन लगाये बठी थी| सफ़ेद सा, गले में रुद्राक्ष की चंद मालाएं, माथे पर नासिका तक पहुँचता हुआ सुर्ख सिन्दूर| युवती के लम्बे बाल खुले हुए थे और हलके हवा के झोंके के सहारे कभी कभी वो भी झूम उठते थे| सामने जलती हुए हवनकुंड में आग की लपटें बहती हुई हवाओं के सहारे झूम रही थी| युवती को मानों आसपास के वातावरण की कोई चिंता न थी या शायद वह निश्चिन्त थी कि कोई इस माहौल में कदम रखने की जुर्रत न करेगा|
उसके मुख से मध्यम स्वर में मन्त्रों की मानों श्रंखला बह रही थी जिसे पहचानने में सेवाराम असमर्थ था|
शायद उसे फाटक के खुले होने का एहसास न था जिससे होकर जाने किस अज्ञात भावना से वशीभूत होकर सेवाराम वही पास की झाड़ियों में छुपा युवती को निहार रहा था|
भैरवी के विषय में उसने सुन रखा था| इस इलाके में किसी भैरवी की कहानी कुछ महीनों से प्रचलित थी और कुछ लोगों ने शमशान में कुछ अजीब सी क्रियाएं करते देख रखा था।
क्या ये वही भैरवी थी?
सेवाराम अपने मोबाइल में सबकुछ रिकॉर्ड करता जा रहा था! पार्क में लगे पास में एक दो लैंप उसके रिकॉर्डिंग में सहायक थे।
कल उसके पास भी सबको कहने को कुछ स्पेशल होगा! रोमांचक! अद्भुत!
पर अभी असली रोमांच तो बाकी ही था!
सामने एक और शख्स का प्रवेश हुआ जिसे देखकर बमुश्किल सेवाराम ने अपनी चीख निकलने से रोका था।
आने वाले दिनों में भी उसके मानस पटल पर वो आकृति उभर उभर कर डराती रही थी!
ध्यान मोबाइल के स्क्रीन पर रहने के कारण वो तय नहीं कर सका था कि वो आकृति किधर से प्रकट हुई थी!
दायें से या बायें से!
या फिर हवनकुंड से एकाएक तीव्र गति से निकलते धुएं से!
लगभग सारा चबूतरा एकाएक धुएं से भर उठा था!
धुआं जब छटा तो सामने वो खड़ा था जिसकी लम्बाई साढ़े छः फुट से का प्रतीत नहीं हो रही थी।
दोनों बाँहों में सोने के से प्रतीत होते कड़े थे।
शरीर पर एक लंगोट के सिवा वस्त्र के नाम पर कुछ और नहीं था।
रंग काला था। सुर्ख काला, मानों सारे बदन पर स्याही पोत दी गयी हो!
चहरे पर कड़क मूंछें! सर पर चमचमाता हुआ दो सींगों वाला मुकुट।
कुल मिलाकर सेवाराम को कुछ ऐसा प्रतीत हुआ मानों रामलीला में पार्ट करनेवाला कोई राक्षस हो!
या धार्मिक सीरियल का कोई राक्षसी अवतार!
ये उसकी हिम्मत ही थी कि उसने कांपते हाथों से मोबाइल पकड़कर रिकॉर्डिंग करना जारी रखा। अंतर बस इतना था की अब उसकी दृष्टि मोबाइल के स्क्रीन पर न होकर सीधे मंच पर थी।
हाँ, वो मंच ही तो था जिसपर ये दो कलाकार मौजूद थे, बीच में हवनकुंड, दाईं और वो युवती और बाईं और वो राक्षस!
हाँ वो राक्षस ही तो था! कम से कम इंसान तो नहीं था।
पर उस युवती पर मानों कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था!
“तू यहाँ भी आ गया।” वो मानों गुर्राई।
“तू कहीं भी चली जा मुझे वहां पायेगीI तुझे मैं यूँ पथभ्रष्ट होने नहीं दे सकताI” राक्षस के मुंह से आवाज निकली मानों एक साथ कई भेडिये गुर्रा उठे हों!
“तेरा शुभचिंतक हूँ मैंI”
“मैं कई बार कह चुकी हूँ तुझसे कि मेरी चिंता करने की तुझे कोई आवश्यकता नहीं। हमारे रास्ते अलग हो चुके हैं।”
“मूर्खा! जिस रास्ते पर तू चल चुकी है वहां तुझे भटकन के सिवाय कुछ न मिलेगा चाहे तू जीवन भर इन मन्त्रों का पाठ करती रहे। भटका रहा है तुझे ये तेरा गुरु। बर्षों से जानता हूँ तेरे इस गुरु को। आश्रम में नाम पर पैसे कमाने का धंधा बना रखा है इसने। एक न एक दिन इसके सारे ढकोसले को दुनिया के सामने ला कर रख दूंगा।”
भैरवी हंसी, “ढकोसला तो तूने मचा रखा है भैरव। मेरे गुरु के सामने तेरी हीनता ही तुझे तकलीफ पहुंचती है इसलिए बार बार पहुँच जाता है मुझे खोजते खोजते।”
“किसी भ्रम में मत रह लड़की। किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि मुझे तकलीफ पहुंचा सके। जानता हूँ तुझमे गुण था, कि एक सफल तंत्रिका बन सके पर उस कमबख्त ने तुझे अपने धंधे में फंसा लिया। आजा मेरे साथ, तेरे सारे भूलों को माफ़ कर दूंगा मैं।”
“चला जा यहाँ से, तेरी नग्न साधना में मेरी कोई रूचि नहीं वर्ना एक ही झटके में सारी दुनिया के आगे तुझे नंगा कर दूंगी। तू और तेरा पागल वृष्टि खाने वाला गुरु...।”
राक्षस को भड़काने के लिए इतने शब्द ज़रुरत से ज्यादा थे। हवनकुंड को एक ही झटके में लांघता हुआ युवती पर छलांग लगा चुका था।
पर युवती भी सावधान थी। उसे राक्षस से कुछ ऐसी ही उम्मीद थी। फुर्ती से खुद को बचाते हुए पास में पड़ी कटार सामने कर चुकी थी।
कटार राक्षस के दाएं पैर को चीरते हुए निकली। राक्षस को इस प्रहार की उम्मीद नहीं थी। वो लहराते हुए गिर पड़ा। युवती को अंदाज़ा था कि अगर राक्षस संभल गया तो फिर वो उसे नहीं छोड़ेगा! उसने फुर्ती से भागना चाहा।
पर राक्षस बहुत ज़ल्दी संभल चुका था। एक झटके में राक्षस दोनों हाथों से युवती को अपने सर से ऊपर उठा चुका था।
“ये ले तेरी साधना और तू, दोनों जा हवनकुंड में।” कहते हुए उसने युवती को हवनकुंड में फ़ेंक दिया।
तेज़ अग्नि और साथ में प्रस्तर का बना हवनकुंड!
…………………………………
सब्र अपनी सारी सीमाए पार कर चुकी थी।
वो भी सेवाराम जैसा साधारण सा इंसान!
सेवाराम बहुत कुछ बर्दाश्त कर चुका था। हलक से तेज़ चीख निकलने से वो खुद को अब रोक नहीं सका।
जाने क्या गति हुई उस वनिता की।
पर अब सेवाराम को अपनी चिंता थी।
राक्षस के सामने वो मानों अनावृत हो चुका था!
राक्षस अब ऊँचे चबूतरे से उतर चुका था और उस निरीह युवक को निहार रहा था जिसका नाम सेवाराम था।
आंखें थी या दो जलती हुई चट्टानें!
उस के सामने वो खुद को बौना महसूस कर रहा था।
कब वो पलटकर भागा कब उसने फाटक को पार किया और कब वो अपने घर पहुंचा, बाद में पूछे जाने पर भी उसे कुछ ध्यान नहीं था।
क्या उस राक्षस ने उसका पीछा किया था?
उस राक्षस से बचकर कैसे निकल गया?
कई सारे सवाल थे जिसका उत्तर वो देने में असमर्थ था। दो दिनों तक वो बुखार में तपता रहा था।
हाँ अगर उसके पास वो रिकॉर्डिंग नहीं रहती तो उसके बात पर कोई विश्वास नहीं करने वाला था। अगले दिन सुबह उसकी हालत ऐसी नहीं थी कि वो किसी से इसका ज़िक्र कर सके न ही वो कोई जिम्मेदार शहरी था। पर उसके रूम में साथ रहने वाले साथी जगन ने एक जिम्मेदार शहरी का फ़र्ज़ निभाया।
सुबह-सुबह मोबाइल रिकॉर्डिंग के साथ दोनों पुलिस के सामने हाजरी बजा रहे थे।
जून २६ प्रातः
ऐसा नहीं था कि अल्फांसे जुर्म की दुनिया से ऊब चुका था या पिछले गुनाहों के डर ने उसे यहाँ छुपने पर मजबूर कर दिया था। किस माई के लाल में ऐसा दम था जो उसे छुपने पर मजबूर कर सके!
जुर्म की दुनिया में उसका बड़ा नाम था। छोटे-बड़े राजा प्रजा तक उसके असामी रह चुके थे। पर काम वो अपने उसूल पर करता था। एक जगह ठहरना उसके उसूलों में नहीं था।
पर सच्चाई यही थी कि यहाँ आये उसे तीन महीने से ऊपर हो चुके थे और यहाँ का माहौल उसे रास आने लगा था।
कौन यकीन करता कि नेपाल की सीमा से कुछ दूर भारत की चौहद्दी में स्थित चांदीपुर नामक कसबे में स्थित जागरण आश्रम के साधना कक्ष में श्रधालुओं के मध्य प्रतिदिन सुबह-सुबह ध्यान करता शख्स अंतर्राष्ट्रीय शातिर अल्फांसे है।
अब तक वह चैन से अपना समय यहाँ बीता रहा था और कोई ऐसी बात नहीं हुई थी कि उसके राज़ के खुलने का शक पैदा कर सके।
पर आज सुबह ...
आश्रम का दैनिक क्रियाकलाप सुबह ६ बजे शुरू होता था और अल्फांसे का सुबह ५ बजे। सुबह ५ बजे उठकर टहलते हुए पिछले हिस्से में मौजूद पार्क के अंदरूनी दरवाजे तक पहुँचता जहाँ पार्क की रखवाली करने वाले केयरटेकर के क्वार्टर तक पहुँचता और उसके साथ चाय पीकर अन्दर पार्क का एक चक्कर लगता और साढ़े पांच बजते-बजते साधना कक्ष तक पहुँच जाता। आश्रम में रहने वाले हर किसी को वहाँ पहुंचना तय होता था सिवाय चंद सिक्यूरिटी गार्ड्स के।
पर आज चाय पीने की नौबत नहीं आयी।
अन्दर केयरटेकर की क्षत-विक्षत नंग धडंग लाश पड़ी थी!
मानों किसी जानवर ने उसे भंभोर डाला हो! जगह जगह से चमड़े नुचे पड़े थे।
बहुत दिनों बाद अल्फांसे का वास्ता किसी लाश से पड़ा था।
और ये उसके लिए अच्छा संकेत नहीं था। पुनः उसका वास्ता पुलिस से पड़ने वाला था जो वह बिलकुल नहीं चाहता था।
पर यह तो शुरुआत भर थी। एक और लाश पार्क में पुलिस का इंतज़ार कर रही थी।
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वो २५ जून की रात थी|
कितने ही अमावस की रात उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुके थे पर आज जब वो अपने दफ्तर से निकला था तो उसे एहसास न था कि आज की रात उसकी जिंदगी की सबसे भयावह रात बन जाने वाली थी| जब वह अपने दफ्तर से जहाँ वह चपरासी के पद पर कार्यरत था रात नौ बजे निकला तो उसे उसके दोस्तों ने घेर लिया था और दोस्तों के साथ खाते पीते दो घंटे से ऊपर हो गए थे और अब रात के लगभग साढ़े ग्यारह होने को थे| ऑफिस के पास ही एक छोटा सा ढाबा था जहाँ उसने दोस्तों के आग्रह पर दो तीन पैग भी चढ़ा लिए थे जिसकी उसे आदत नहीं थी| ऑफिस से घर की दूरी लगभग बारह किलोमीटर की थी जिसे वह साइकिल से तय करता था|
सेवाराम एक साधारण शक्ल ओ सूरत और इकहरे बदन का चौबीस वर्षीय युवक था और उसमें कोई ऐसी खास बात न थी कि वो किसी के विशेष आकर्षण का केंद्र बने या कम से कम उसका ऐसा ही सोचना था| अपने ही ख्यालों में गुम वह धरमशाला मोड़ तक पहुँच चूका था जहाँ से उसके घर की दूरी महज तीन किलोमीटर रह जानी थी और फिलहाल वह जागरण आश्रम नाम के विशाल भवन के पिछली सड़क से गुज़र रहा था जब आश्रम के भीतर से आते तीव्र मंत्रोच्चार ने उसे साइकिल में ब्रेक लगाने पर मजबूर कर दिया| आश्रम के पिछले हिस्से में एक विशाल पार्क था जो शाम सात बजे ही बंद हो जाया करता था| पार्क में अन्दर आने के लिए सामने वाले फाटक से तो रास्ता था ही, साथ ही इस पिछली तरफ भी एक फाटक था जो ऊँची ऊँची किलेनुमा दीवारों से घिरा था जिसे शाम सात बजे अन्दर की तरफ से बंद कर दिया जाता था| बंद करने का काम केयरटेक मंगल का था जो आश्रम का ही सेवादार था जिसके रहने का कमरा इस पार्क के पिछली तरफ बना था| पार्क के बीचो-बीच एक ऊँचा चबूतरा था जिसपर शिव जी की एक आदमकद मूर्ति थी जिसके दर्शन किये बिना सेवाराम ऑफिस की ओर प्रस्थान नहीं करता था| शाम सात बजे तक बंद हो जाने वाला फाटक आज पूरी तरह खुला था और शिव जी की विशाल मूर्ति पर सामने जलती रौशनी दृष्टिगोचर हो रही थी| पिछले तीन वर्षों में पहली बार उसने ये पिछला फाटक जो धर्मशाला दरवाजा के नाम से जाना जाता था को रात के वक़्त उसने खुला देखा था| साइकिल को वहीँ साइड में खड़ी कर वो भीतर प्रविष्ट हो गया|
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वो कोई भैरवी प्रतीत हो रही थी जो हवनकुंड के सामने पद्मासन लगाये बठी थी| सफ़ेद सा, गले में रुद्राक्ष की चंद मालाएं, माथे पर नासिका तक पहुँचता हुआ सुर्ख सिन्दूर| युवती के लम्बे बाल खुले हुए थे और हलके हवा के झोंके के सहारे कभी कभी वो भी झूम उठते थे| सामने जलती हुए हवनकुंड में आग की लपटें बहती हुई हवाओं के सहारे झूम रही थी| युवती को मानों आसपास के वातावरण की कोई चिंता न थी या शायद वह निश्चिन्त थी कि कोई इस माहौल में कदम रखने की जुर्रत न करेगा|
उसके मुख से मध्यम स्वर में मन्त्रों की मानों श्रंखला बह रही थी जिसे पहचानने में सेवाराम असमर्थ था|
शायद उसे फाटक के खुले होने का एहसास न था जिससे होकर जाने किस अज्ञात भावना से वशीभूत होकर सेवाराम वही पास की झाड़ियों में छुपा युवती को निहार रहा था|
भैरवी के विषय में उसने सुन रखा था| इस इलाके में किसी भैरवी की कहानी कुछ महीनों से प्रचलित थी और कुछ लोगों ने शमशान में कुछ अजीब सी क्रियाएं करते देख रखा था।
क्या ये वही भैरवी थी?
सेवाराम अपने मोबाइल में सबकुछ रिकॉर्ड करता जा रहा था! पार्क में लगे पास में एक दो लैंप उसके रिकॉर्डिंग में सहायक थे।
कल उसके पास भी सबको कहने को कुछ स्पेशल होगा! रोमांचक! अद्भुत!
पर अभी असली रोमांच तो बाकी ही था!
सामने एक और शख्स का प्रवेश हुआ जिसे देखकर बमुश्किल सेवाराम ने अपनी चीख निकलने से रोका था।
आने वाले दिनों में भी उसके मानस पटल पर वो आकृति उभर उभर कर डराती रही थी!
ध्यान मोबाइल के स्क्रीन पर रहने के कारण वो तय नहीं कर सका था कि वो आकृति किधर से प्रकट हुई थी!
दायें से या बायें से!
या फिर हवनकुंड से एकाएक तीव्र गति से निकलते धुएं से!
लगभग सारा चबूतरा एकाएक धुएं से भर उठा था!
धुआं जब छटा तो सामने वो खड़ा था जिसकी लम्बाई साढ़े छः फुट से का प्रतीत नहीं हो रही थी।
दोनों बाँहों में सोने के से प्रतीत होते कड़े थे।
शरीर पर एक लंगोट के सिवा वस्त्र के नाम पर कुछ और नहीं था।
रंग काला था। सुर्ख काला, मानों सारे बदन पर स्याही पोत दी गयी हो!
चहरे पर कड़क मूंछें! सर पर चमचमाता हुआ दो सींगों वाला मुकुट।
कुल मिलाकर सेवाराम को कुछ ऐसा प्रतीत हुआ मानों रामलीला में पार्ट करनेवाला कोई राक्षस हो!
या धार्मिक सीरियल का कोई राक्षसी अवतार!
ये उसकी हिम्मत ही थी कि उसने कांपते हाथों से मोबाइल पकड़कर रिकॉर्डिंग करना जारी रखा। अंतर बस इतना था की अब उसकी दृष्टि मोबाइल के स्क्रीन पर न होकर सीधे मंच पर थी।
हाँ, वो मंच ही तो था जिसपर ये दो कलाकार मौजूद थे, बीच में हवनकुंड, दाईं और वो युवती और बाईं और वो राक्षस!
हाँ वो राक्षस ही तो था! कम से कम इंसान तो नहीं था।
पर उस युवती पर मानों कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था!
“तू यहाँ भी आ गया।” वो मानों गुर्राई।
“तू कहीं भी चली जा मुझे वहां पायेगीI तुझे मैं यूँ पथभ्रष्ट होने नहीं दे सकताI” राक्षस के मुंह से आवाज निकली मानों एक साथ कई भेडिये गुर्रा उठे हों!
“तेरा शुभचिंतक हूँ मैंI”
“मैं कई बार कह चुकी हूँ तुझसे कि मेरी चिंता करने की तुझे कोई आवश्यकता नहीं। हमारे रास्ते अलग हो चुके हैं।”
“मूर्खा! जिस रास्ते पर तू चल चुकी है वहां तुझे भटकन के सिवाय कुछ न मिलेगा चाहे तू जीवन भर इन मन्त्रों का पाठ करती रहे। भटका रहा है तुझे ये तेरा गुरु। बर्षों से जानता हूँ तेरे इस गुरु को। आश्रम में नाम पर पैसे कमाने का धंधा बना रखा है इसने। एक न एक दिन इसके सारे ढकोसले को दुनिया के सामने ला कर रख दूंगा।”
भैरवी हंसी, “ढकोसला तो तूने मचा रखा है भैरव। मेरे गुरु के सामने तेरी हीनता ही तुझे तकलीफ पहुंचती है इसलिए बार बार पहुँच जाता है मुझे खोजते खोजते।”
“किसी भ्रम में मत रह लड़की। किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि मुझे तकलीफ पहुंचा सके। जानता हूँ तुझमे गुण था, कि एक सफल तंत्रिका बन सके पर उस कमबख्त ने तुझे अपने धंधे में फंसा लिया। आजा मेरे साथ, तेरे सारे भूलों को माफ़ कर दूंगा मैं।”
“चला जा यहाँ से, तेरी नग्न साधना में मेरी कोई रूचि नहीं वर्ना एक ही झटके में सारी दुनिया के आगे तुझे नंगा कर दूंगी। तू और तेरा पागल वृष्टि खाने वाला गुरु...।”
राक्षस को भड़काने के लिए इतने शब्द ज़रुरत से ज्यादा थे। हवनकुंड को एक ही झटके में लांघता हुआ युवती पर छलांग लगा चुका था।
पर युवती भी सावधान थी। उसे राक्षस से कुछ ऐसी ही उम्मीद थी। फुर्ती से खुद को बचाते हुए पास में पड़ी कटार सामने कर चुकी थी।
कटार राक्षस के दाएं पैर को चीरते हुए निकली। राक्षस को इस प्रहार की उम्मीद नहीं थी। वो लहराते हुए गिर पड़ा। युवती को अंदाज़ा था कि अगर राक्षस संभल गया तो फिर वो उसे नहीं छोड़ेगा! उसने फुर्ती से भागना चाहा।
पर राक्षस बहुत ज़ल्दी संभल चुका था। एक झटके में राक्षस दोनों हाथों से युवती को अपने सर से ऊपर उठा चुका था।
“ये ले तेरी साधना और तू, दोनों जा हवनकुंड में।” कहते हुए उसने युवती को हवनकुंड में फ़ेंक दिया।
तेज़ अग्नि और साथ में प्रस्तर का बना हवनकुंड!
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सब्र अपनी सारी सीमाए पार कर चुकी थी।
वो भी सेवाराम जैसा साधारण सा इंसान!
सेवाराम बहुत कुछ बर्दाश्त कर चुका था। हलक से तेज़ चीख निकलने से वो खुद को अब रोक नहीं सका।
जाने क्या गति हुई उस वनिता की।
पर अब सेवाराम को अपनी चिंता थी।
राक्षस के सामने वो मानों अनावृत हो चुका था!
राक्षस अब ऊँचे चबूतरे से उतर चुका था और उस निरीह युवक को निहार रहा था जिसका नाम सेवाराम था।
आंखें थी या दो जलती हुई चट्टानें!
उस के सामने वो खुद को बौना महसूस कर रहा था।
कब वो पलटकर भागा कब उसने फाटक को पार किया और कब वो अपने घर पहुंचा, बाद में पूछे जाने पर भी उसे कुछ ध्यान नहीं था।
क्या उस राक्षस ने उसका पीछा किया था?
उस राक्षस से बचकर कैसे निकल गया?
कई सारे सवाल थे जिसका उत्तर वो देने में असमर्थ था। दो दिनों तक वो बुखार में तपता रहा था।
हाँ अगर उसके पास वो रिकॉर्डिंग नहीं रहती तो उसके बात पर कोई विश्वास नहीं करने वाला था। अगले दिन सुबह उसकी हालत ऐसी नहीं थी कि वो किसी से इसका ज़िक्र कर सके न ही वो कोई जिम्मेदार शहरी था। पर उसके रूम में साथ रहने वाले साथी जगन ने एक जिम्मेदार शहरी का फ़र्ज़ निभाया।
सुबह-सुबह मोबाइल रिकॉर्डिंग के साथ दोनों पुलिस के सामने हाजरी बजा रहे थे।
जून २६ प्रातः
ऐसा नहीं था कि अल्फांसे जुर्म की दुनिया से ऊब चुका था या पिछले गुनाहों के डर ने उसे यहाँ छुपने पर मजबूर कर दिया था। किस माई के लाल में ऐसा दम था जो उसे छुपने पर मजबूर कर सके!
जुर्म की दुनिया में उसका बड़ा नाम था। छोटे-बड़े राजा प्रजा तक उसके असामी रह चुके थे। पर काम वो अपने उसूल पर करता था। एक जगह ठहरना उसके उसूलों में नहीं था।
पर सच्चाई यही थी कि यहाँ आये उसे तीन महीने से ऊपर हो चुके थे और यहाँ का माहौल उसे रास आने लगा था।
कौन यकीन करता कि नेपाल की सीमा से कुछ दूर भारत की चौहद्दी में स्थित चांदीपुर नामक कसबे में स्थित जागरण आश्रम के साधना कक्ष में श्रधालुओं के मध्य प्रतिदिन सुबह-सुबह ध्यान करता शख्स अंतर्राष्ट्रीय शातिर अल्फांसे है।
अब तक वह चैन से अपना समय यहाँ बीता रहा था और कोई ऐसी बात नहीं हुई थी कि उसके राज़ के खुलने का शक पैदा कर सके।
पर आज सुबह ...
आश्रम का दैनिक क्रियाकलाप सुबह ६ बजे शुरू होता था और अल्फांसे का सुबह ५ बजे। सुबह ५ बजे उठकर टहलते हुए पिछले हिस्से में मौजूद पार्क के अंदरूनी दरवाजे तक पहुँचता जहाँ पार्क की रखवाली करने वाले केयरटेकर के क्वार्टर तक पहुँचता और उसके साथ चाय पीकर अन्दर पार्क का एक चक्कर लगता और साढ़े पांच बजते-बजते साधना कक्ष तक पहुँच जाता। आश्रम में रहने वाले हर किसी को वहाँ पहुंचना तय होता था सिवाय चंद सिक्यूरिटी गार्ड्स के।
पर आज चाय पीने की नौबत नहीं आयी।
अन्दर केयरटेकर की क्षत-विक्षत नंग धडंग लाश पड़ी थी!
मानों किसी जानवर ने उसे भंभोर डाला हो! जगह जगह से चमड़े नुचे पड़े थे।
बहुत दिनों बाद अल्फांसे का वास्ता किसी लाश से पड़ा था।
और ये उसके लिए अच्छा संकेत नहीं था। पुनः उसका वास्ता पुलिस से पड़ने वाला था जो वह बिलकुल नहीं चाहता था।
पर यह तो शुरुआत भर थी। एक और लाश पार्क में पुलिस का इंतज़ार कर रही थी।
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