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Guest
वो मुझे भीतर एक सुसज्जित ड्राईंगरूम में लेकर आयी । उसके कहने मैं एक सोफाचेयर पर ‘सिट डाउन’ हुआ, वो मेरे सामने बैठी, फिर बोली - “क्या पूछताछ करनी है ?”
“चंद सवाल हैं ।”
“पड़ोस में हुए कत्ल के बारे में ही न !”
“हां ।”
“बेचारी । भरी जवानी में भगवान को प्यारी हो गयी । अच्छी लड़की थी...”
साहबान, अच्छे लोग भगवान को जल्दी प्यारे हो जाते हैं, ये एक सबक है जो खाकसार की राय में बच्चों को बुरा बनने के लिये प्रेरित करता है ।
“...ये कोई उम्र होती है इस दुनिया से चल देने की ! जुल्म हुआ बेचारी के साथ ! रक्षक ही भक्षक बन गया । फांसी लगे कम्बख्त को तो बेचारी का इंसाफ हो, उसकी आत्मा चैन पाये ।”
मैं उसे न टोकता तो मकतूला का फातिहा वो अभी और पढती ।
“बाई दि वे आप कमला ओसवाल ही हैं न !”
“लो ! और क्या मैं मेड हूं ! कुक हूं । आया हूं ?”
“यानी कि हैं ?”
“हां, भई । पुलिस से हो तो तुम्हें मालूम होना चाहिये...”
“सीआईडी से । पहले भी बोला । हमारा केस से अभी वास्ता पड़ा है । अब तक आप से जो पूछताछ हुई थी, थाने से हुई थी । स्पैशलाइज्ड पूछताछ यूं समझिये कि अब शुरू हो रही है जो कि सीआईडी करती है । फालोड ?”
“य.. यस ।”
“लाउड एण्ड क्लियर ?”
“यस ।”
अब मेरा रौब - फर्जी - उस पर गालिब हो रहा था, अब उसके कर्कश लहजे में तब्दीली आ रही थी ।
“भगवान की हर जगह नजर होती है लेकिन फिर भी कई बार, कई जगहों से नजर चूक जाती है । जैसे पिछले महीने आपके पड़ोस से चूक गयी क्योंकि उसकी तवज्जो कहीं और थी, वो किसी और केस की फाइल देखने में मशगूल था । इसलिये पड़ोस में वो जुल्मी वारदात हो गयी ।”
“वही तो ! यही तो मैं कह रही थी जब...”
“मैंने टोक दिया था ?” - मैंने फिर उसे घूरा ।
“नहीं, नहीं ।” - वो हड़बड़ाई ।
“तो” - मैं बदले स्वर में बोला - “आपको यकीन है कि पति कातिल है ?”
“पूरा ।” - वो दृढता से बोली - “वन हण्डर्ड परसेंट । मैंने तो पहली बार ही जब देखा था तो एक निगाह में भांप लिया था कि नालायक था, मतलबी था, हरकती था, उस भली, बड़े घर की लड़की के काबिल तो हरगिज नहीं था । देखो तो, अपने मुल्क में एलिजिबल ग्रूम्स की कमी है जो बेचारी ने नेपाली से माथा फोड़ा...”
“नाता जोड़ा ।”
“समझा ऐसा लेकिन जो हुआ उससे साफ हुआ कि न हुआ कि माथा फोड़ा !”
“ठीक ।”
“पता नहीं सरकार इन लोगों पर कोई सख्ती क्यों नहीं करती, इनकी आमद पर कोई अंकुश क्यों नहीं बरतती ! फिर भी आते हैं तो औकात में रहें । चौकीदारी करें, डोमेस्टिक सर्वेंट बनें, आके बराबरी करने लग जाने का क्या मतलब ? मेरे को तो इसी बात की कुढ़न थी कि पड़ोस में नेपाली आ बसा था और बतौर पड़ोसी मेरे से ईक्वल लैवल पर पेश आने की हिम्मत करता था ।”
“लगता है वसुधैव कुटम्बकम् में आपकी कोई आस्था नहीं है । बहुत संकुचित दृष्टिकोण है आपका !”
“भई, इस मामले में तो है, भले ही कोई मुझे बुरा कहे ।”
“आप नेपालियों के खिलाफ हैं ?”
“बिल्कुल नहीं । नेपाल में रहें तो काहे की खिलाफत !”
क्या औरत थी ! सार्थक बराल के खिलाफ इसलिये नहीं थी क्योंकि वो कातिल था, बल्कि इसलिये थी क्योंकि वो नेपाली था ।
“लड़की तो नादान थी” - वो कह रही थी - “हैरानी है कि अमरनाथ जी ने भी उस बेमेल शादी में कोई दखल न दिया ।”
“आप अमरनाथ परमार से वाकिफ हैं ?”
“लो ! ये कोठी हमने उन्हीं से तो खरीदी थी !”
“हम !”
“मैं और मेरे पति - भगवान उन्हें जनतनशीन करे ।”
“वो इस दुनिया में नहीं हैं ?”
“नहीं हैं न ! पांच साल पहले मुझे अकेला छोड़ गये मदन ओसवाल । मासिव हार्ट अटैक हुआ । अगली सांस न आयी ।”
“ओह ! आई एम सॉरी ।”
उसने एक फरमायशी आह भरी और खुश्क आंखों पर यूं बाएं की पुश्त फिराई जैसे छलक आयी हों ।
त्रिया चरित्रम् !
“श्यामला से अच्छी तरह से वाकिफ थीं ?” - मैंने सवाल किया ।
“हां, खुद अच्छी तरह से । पड़ोसी पड़ोसी से वाकिफ होता ही है । ऐसे ही तो नहीं कहा गया कि हमसाया मांजाया ।”
“वैरी वैल सैड । बहुत उच्च विचार हैं आपके बतौर पड़ोसी !”
“बहुत अच्छी लड़की थी ?” - वो आह भरकर बोली - “मेरे पास अक्सर आती जाती थी चाय वगैरह पीने या... या कुछ भी करने ?”
“आप भी उधर जाती थीं ?”
“हां, लेकिन ज्यादा नहीं । वो ज्यादा आती थी ।”
कमबख्त साफ हिंट दे रही थी कि पड़ोसन खिदमत कराती ज्यादा थी, करती कम थी ।
“हसबैंड से कोई मेल मुलाकात नहीं थीं आपकी ?”
“लो ! मुझे उस गोरखे का मेरे करीब खड़ा होना गंवारा नहीं था, मैं उसे अपने घर में घुसने देती !”
“ओह !”
“उस एक नेपाली के यहां का बसने से पड़ोस में तो नेपालियों के यूं फेरे लगते थे जैसे वो प्राइवेट रेजीडेंस न हो, नेपालियों का क्लब हो ।”
“काफी आते थे ?”
“आते ही थे ? दिखते ही रहते थे अक्सर आते जाते ।”
“यहां से ?”
“और कहां से ?”
“फासले से दिख जाते थे कि नेपाली थे ?”
“हां । फिर अक्सर नेपाली ड्रैस में भी तो आते थे !”
“नेपाली ड्रैस ?”
“वो क्रास्ड खुखरियों के बिल्ले वाली नेपाली टोपी, बन्द कालर वाला घुटनों से ऊंचा कुर्ता, चूड़ीदार पाजामा, कोट, दि वर्क्स !”
“आई सी । होते कौन थे ?”
“कौन होंगे । श्यामला के तो कुछ लगते होंगे नहीं ! हसबैंड के दोस्त या रिश्तेदार होने के अलावा और कौन होंगे !”
“सब सार्थक के ही मिलने वाले होते थे ?”
उसने कुछ क्षण उस सवाल पर विचार किया ।
“नहीं ।” - फिर बोली - “मेरे खयाल से कोई कोई श्यामला से भी मिलने आता था ।”
“अच्छा !”
“हां, जब सार्थक घर नहीं होता था, खाली श्यामला घर होती थी तो तब कोई वैसा शख्स आता था तो आ कर किससे मिलता था ? श्यामला से ही तो !”
“यानी श्यामला को नेपालियों से कोई विरक्ति नहीं थी ?”
“नहीं ही थी । होती तो नेपाली से शादी करती ?”
“उस आवाजाही की बाबत - सार्थक की हाजिरी में या गैरहाजिरी में - आपने कभी श्यामला से सवाल किया ?”
“भई, वो उनका निजी मामला था, मेरा कहां बनता था कोई सवाल करना !”
“वो आपके यहां आती जाती थी, आपके साथ चाय-नाश्ता-पानी शेयर करती थी यानी कि सखी थी ! सखी से बनता तो है सवाल करना !”
“मैंने नहीं किया था कभी । बोला न, वो उनका निजी मामला था ।”
“चलिये, ऐसे ही सही लेकिन उस इतनी आवाजाही के बारे में खुद आपने कुछ सोचा तो होगा कि क्यों था ऐसा ! कोई राय तो कायम की होगी कि क्यों इतने नेपाली पड़ोस में विजिट करते थे !”
“नई, राय तो कायम की मैंने ?”
“क्या ?”
“बोलना मुनासिब होगा ?”
“मेरे सामने बोलना मुनासिब होगा । ये न भूलिये कि मैं खास पूछताछ के लिये ही यहां आया हूं ।”
“हूं ।”
“एण्ड आई एम ए डिटेक्टिव । रिमैम्बर ?”
“ओके, तुम कहते हो तो...”
“मैं कहता हूं ।”
“...बोलती हूं ।” - वो सोफे पर आगे को सरक आयी और मेरी तरफ झुक कर राजदाराना लहजे से बोली - “लेकिन इसलिये बोलती हूं क्योंकि तुम इसरार कर रहे हो । मेरा निजी खयाल ये है कि वो सब नशेड़ी थे जो पड़ोस में आते थे ।”
“जी !”
“ड्रग एडिक्ट्स थे । ड्रग्स की तलाश उन्हें यहां लाती थी । कौन नहीं जानता कि नेपाल नॉरकॉटिक्स समगलिंग का बड़ा अड्डा है । पाकिस्तान, अफगानिस्तान से ओरीजिनेट होने वाले ड्रग्स का इन्डिया तक रूट वाया नेपाल है । वो लड़का जरूर कोई ड्रग समगलर था - ड्रग समगलर नहीं था तो किसी समगलर का एजेंट जरूर था, उसका डीलर जरूर था और पड़ोस में फैली नेपालीज की मुतवातर आवाजाही ड्रग्स की वजह से थी ।”
“ये बड़ा इलजाम है । आपके पास ऐसा सोचने की कोई बुनियाद है ?”
“कोई बुनियाद नहीं । जो मेरे मन में आया, मैंने बोल दिया । उस आवाजाही की जो वजह मुझे सूझी, वो मैंने बयान कर दी ।”
“वो गलत भी हो सकती है !”
“हो सकती है । मैंने कब दावा किया कि नहीं हो सकती ! लेकिन सही भी हो सकती है ।”
“आवाजाही इक्का दुक्का होती थी या ग्रुप में ?”
“ग्रुप में नहीं । बड़े ग्रुप में तो बिल्कुल नहीं । अमूमन जो आता था, अकेला आता था, कभी कभार दो आते थे, लेकिन एक टाइम में दो से ज्यादा कभी नहीं ।”
“आप मुतवातर निगाह रखती थी ?”
“निगाह नहीं रखती थी” - उसने तुरन्त विरोध किया - “निगाह पड़ जाती थी मेरी । आजू बाजू में जो हो रहा हो, उससे आंखें बन्द तो नहीं कर सकती मैं !”
“ठीक । आने वाले हर बार नये होते थे या चन्द लोग ही बार बार आते थे ?”
“चंद सवाल हैं ।”
“पड़ोस में हुए कत्ल के बारे में ही न !”
“हां ।”
“बेचारी । भरी जवानी में भगवान को प्यारी हो गयी । अच्छी लड़की थी...”
साहबान, अच्छे लोग भगवान को जल्दी प्यारे हो जाते हैं, ये एक सबक है जो खाकसार की राय में बच्चों को बुरा बनने के लिये प्रेरित करता है ।
“...ये कोई उम्र होती है इस दुनिया से चल देने की ! जुल्म हुआ बेचारी के साथ ! रक्षक ही भक्षक बन गया । फांसी लगे कम्बख्त को तो बेचारी का इंसाफ हो, उसकी आत्मा चैन पाये ।”
मैं उसे न टोकता तो मकतूला का फातिहा वो अभी और पढती ।
“बाई दि वे आप कमला ओसवाल ही हैं न !”
“लो ! और क्या मैं मेड हूं ! कुक हूं । आया हूं ?”
“यानी कि हैं ?”
“हां, भई । पुलिस से हो तो तुम्हें मालूम होना चाहिये...”
“सीआईडी से । पहले भी बोला । हमारा केस से अभी वास्ता पड़ा है । अब तक आप से जो पूछताछ हुई थी, थाने से हुई थी । स्पैशलाइज्ड पूछताछ यूं समझिये कि अब शुरू हो रही है जो कि सीआईडी करती है । फालोड ?”
“य.. यस ।”
“लाउड एण्ड क्लियर ?”
“यस ।”
अब मेरा रौब - फर्जी - उस पर गालिब हो रहा था, अब उसके कर्कश लहजे में तब्दीली आ रही थी ।
“भगवान की हर जगह नजर होती है लेकिन फिर भी कई बार, कई जगहों से नजर चूक जाती है । जैसे पिछले महीने आपके पड़ोस से चूक गयी क्योंकि उसकी तवज्जो कहीं और थी, वो किसी और केस की फाइल देखने में मशगूल था । इसलिये पड़ोस में वो जुल्मी वारदात हो गयी ।”
“वही तो ! यही तो मैं कह रही थी जब...”
“मैंने टोक दिया था ?” - मैंने फिर उसे घूरा ।
“नहीं, नहीं ।” - वो हड़बड़ाई ।
“तो” - मैं बदले स्वर में बोला - “आपको यकीन है कि पति कातिल है ?”
“पूरा ।” - वो दृढता से बोली - “वन हण्डर्ड परसेंट । मैंने तो पहली बार ही जब देखा था तो एक निगाह में भांप लिया था कि नालायक था, मतलबी था, हरकती था, उस भली, बड़े घर की लड़की के काबिल तो हरगिज नहीं था । देखो तो, अपने मुल्क में एलिजिबल ग्रूम्स की कमी है जो बेचारी ने नेपाली से माथा फोड़ा...”
“नाता जोड़ा ।”
“समझा ऐसा लेकिन जो हुआ उससे साफ हुआ कि न हुआ कि माथा फोड़ा !”
“ठीक ।”
“पता नहीं सरकार इन लोगों पर कोई सख्ती क्यों नहीं करती, इनकी आमद पर कोई अंकुश क्यों नहीं बरतती ! फिर भी आते हैं तो औकात में रहें । चौकीदारी करें, डोमेस्टिक सर्वेंट बनें, आके बराबरी करने लग जाने का क्या मतलब ? मेरे को तो इसी बात की कुढ़न थी कि पड़ोस में नेपाली आ बसा था और बतौर पड़ोसी मेरे से ईक्वल लैवल पर पेश आने की हिम्मत करता था ।”
“लगता है वसुधैव कुटम्बकम् में आपकी कोई आस्था नहीं है । बहुत संकुचित दृष्टिकोण है आपका !”
“भई, इस मामले में तो है, भले ही कोई मुझे बुरा कहे ।”
“आप नेपालियों के खिलाफ हैं ?”
“बिल्कुल नहीं । नेपाल में रहें तो काहे की खिलाफत !”
क्या औरत थी ! सार्थक बराल के खिलाफ इसलिये नहीं थी क्योंकि वो कातिल था, बल्कि इसलिये थी क्योंकि वो नेपाली था ।
“लड़की तो नादान थी” - वो कह रही थी - “हैरानी है कि अमरनाथ जी ने भी उस बेमेल शादी में कोई दखल न दिया ।”
“आप अमरनाथ परमार से वाकिफ हैं ?”
“लो ! ये कोठी हमने उन्हीं से तो खरीदी थी !”
“हम !”
“मैं और मेरे पति - भगवान उन्हें जनतनशीन करे ।”
“वो इस दुनिया में नहीं हैं ?”
“नहीं हैं न ! पांच साल पहले मुझे अकेला छोड़ गये मदन ओसवाल । मासिव हार्ट अटैक हुआ । अगली सांस न आयी ।”
“ओह ! आई एम सॉरी ।”
उसने एक फरमायशी आह भरी और खुश्क आंखों पर यूं बाएं की पुश्त फिराई जैसे छलक आयी हों ।
त्रिया चरित्रम् !
“श्यामला से अच्छी तरह से वाकिफ थीं ?” - मैंने सवाल किया ।
“हां, खुद अच्छी तरह से । पड़ोसी पड़ोसी से वाकिफ होता ही है । ऐसे ही तो नहीं कहा गया कि हमसाया मांजाया ।”
“वैरी वैल सैड । बहुत उच्च विचार हैं आपके बतौर पड़ोसी !”
“बहुत अच्छी लड़की थी ?” - वो आह भरकर बोली - “मेरे पास अक्सर आती जाती थी चाय वगैरह पीने या... या कुछ भी करने ?”
“आप भी उधर जाती थीं ?”
“हां, लेकिन ज्यादा नहीं । वो ज्यादा आती थी ।”
कमबख्त साफ हिंट दे रही थी कि पड़ोसन खिदमत कराती ज्यादा थी, करती कम थी ।
“हसबैंड से कोई मेल मुलाकात नहीं थीं आपकी ?”
“लो ! मुझे उस गोरखे का मेरे करीब खड़ा होना गंवारा नहीं था, मैं उसे अपने घर में घुसने देती !”
“ओह !”
“उस एक नेपाली के यहां का बसने से पड़ोस में तो नेपालियों के यूं फेरे लगते थे जैसे वो प्राइवेट रेजीडेंस न हो, नेपालियों का क्लब हो ।”
“काफी आते थे ?”
“आते ही थे ? दिखते ही रहते थे अक्सर आते जाते ।”
“यहां से ?”
“और कहां से ?”
“फासले से दिख जाते थे कि नेपाली थे ?”
“हां । फिर अक्सर नेपाली ड्रैस में भी तो आते थे !”
“नेपाली ड्रैस ?”
“वो क्रास्ड खुखरियों के बिल्ले वाली नेपाली टोपी, बन्द कालर वाला घुटनों से ऊंचा कुर्ता, चूड़ीदार पाजामा, कोट, दि वर्क्स !”
“आई सी । होते कौन थे ?”
“कौन होंगे । श्यामला के तो कुछ लगते होंगे नहीं ! हसबैंड के दोस्त या रिश्तेदार होने के अलावा और कौन होंगे !”
“सब सार्थक के ही मिलने वाले होते थे ?”
उसने कुछ क्षण उस सवाल पर विचार किया ।
“नहीं ।” - फिर बोली - “मेरे खयाल से कोई कोई श्यामला से भी मिलने आता था ।”
“अच्छा !”
“हां, जब सार्थक घर नहीं होता था, खाली श्यामला घर होती थी तो तब कोई वैसा शख्स आता था तो आ कर किससे मिलता था ? श्यामला से ही तो !”
“यानी श्यामला को नेपालियों से कोई विरक्ति नहीं थी ?”
“नहीं ही थी । होती तो नेपाली से शादी करती ?”
“उस आवाजाही की बाबत - सार्थक की हाजिरी में या गैरहाजिरी में - आपने कभी श्यामला से सवाल किया ?”
“भई, वो उनका निजी मामला था, मेरा कहां बनता था कोई सवाल करना !”
“वो आपके यहां आती जाती थी, आपके साथ चाय-नाश्ता-पानी शेयर करती थी यानी कि सखी थी ! सखी से बनता तो है सवाल करना !”
“मैंने नहीं किया था कभी । बोला न, वो उनका निजी मामला था ।”
“चलिये, ऐसे ही सही लेकिन उस इतनी आवाजाही के बारे में खुद आपने कुछ सोचा तो होगा कि क्यों था ऐसा ! कोई राय तो कायम की होगी कि क्यों इतने नेपाली पड़ोस में विजिट करते थे !”
“नई, राय तो कायम की मैंने ?”
“क्या ?”
“बोलना मुनासिब होगा ?”
“मेरे सामने बोलना मुनासिब होगा । ये न भूलिये कि मैं खास पूछताछ के लिये ही यहां आया हूं ।”
“हूं ।”
“एण्ड आई एम ए डिटेक्टिव । रिमैम्बर ?”
“ओके, तुम कहते हो तो...”
“मैं कहता हूं ।”
“...बोलती हूं ।” - वो सोफे पर आगे को सरक आयी और मेरी तरफ झुक कर राजदाराना लहजे से बोली - “लेकिन इसलिये बोलती हूं क्योंकि तुम इसरार कर रहे हो । मेरा निजी खयाल ये है कि वो सब नशेड़ी थे जो पड़ोस में आते थे ।”
“जी !”
“ड्रग एडिक्ट्स थे । ड्रग्स की तलाश उन्हें यहां लाती थी । कौन नहीं जानता कि नेपाल नॉरकॉटिक्स समगलिंग का बड़ा अड्डा है । पाकिस्तान, अफगानिस्तान से ओरीजिनेट होने वाले ड्रग्स का इन्डिया तक रूट वाया नेपाल है । वो लड़का जरूर कोई ड्रग समगलर था - ड्रग समगलर नहीं था तो किसी समगलर का एजेंट जरूर था, उसका डीलर जरूर था और पड़ोस में फैली नेपालीज की मुतवातर आवाजाही ड्रग्स की वजह से थी ।”
“ये बड़ा इलजाम है । आपके पास ऐसा सोचने की कोई बुनियाद है ?”
“कोई बुनियाद नहीं । जो मेरे मन में आया, मैंने बोल दिया । उस आवाजाही की जो वजह मुझे सूझी, वो मैंने बयान कर दी ।”
“वो गलत भी हो सकती है !”
“हो सकती है । मैंने कब दावा किया कि नहीं हो सकती ! लेकिन सही भी हो सकती है ।”
“आवाजाही इक्का दुक्का होती थी या ग्रुप में ?”
“ग्रुप में नहीं । बड़े ग्रुप में तो बिल्कुल नहीं । अमूमन जो आता था, अकेला आता था, कभी कभार दो आते थे, लेकिन एक टाइम में दो से ज्यादा कभी नहीं ।”
“आप मुतवातर निगाह रखती थी ?”
“निगाह नहीं रखती थी” - उसने तुरन्त विरोध किया - “निगाह पड़ जाती थी मेरी । आजू बाजू में जो हो रहा हो, उससे आंखें बन्द तो नहीं कर सकती मैं !”
“ठीक । आने वाले हर बार नये होते थे या चन्द लोग ही बार बार आते थे ?”