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मकान के पिछले हिस्से से उस पुराने कब्रिस्तान तक जाने के लिए कोई रास्ता नहीं था। कल की तरह ही राज को पेड़ों के बीच से होकर ही कब्रिस्तान तक जाना पड़ा। वो कब्रिस्तान की चहारीदीवारी के बगल से चलते हुए दीवार खत्म होने पर मुड़कर गेट वाले हिस्से की ओर बढ़ता गया।
वहां उसे कब्रिस्तान का गेट बंद मिला।
गेट बंद देख कर राज को हैरानी हुई। उसे अच्छी तरह याद था कि कल उस कब्रिस्तान से वापस लौटते समय वे गेट खुला छोड़ गए थे।
फिर गेट बंद किसने किया
?
राज ने गेट की कुण्डी खोलकर कब्रिस्तान में प्रवेश किया।
कब्रिस्तान में एकदम सन्नाटा छाया हुआ था।
वहां कोई दो दर्जन के आसपास कब्रें थीं। सभी बेहद पुरानी। बुरी तरह टूट-फूट चुकीं।
कल सुबह जब वे लोग वहां आए थे
, उससे पहले शायद वर्षों से उस वीराने में किसी के कदम नहीं पड़े होंगें।
क्या मुर्दों को उनका वहां आकर शांति भंग करना अच्छा नहीं लगा था
?
शायद इसीलिए रात में राज ने उस रहस्यमयी व्यक्ति को देखा था।
राज शांति से कब्रिस्तान में टहलता रहा। उसकी नजरें उन कब्रों का मुआयना कर रहीं थीं।
तभी राज को कब्रिस्तान के दूसरे कोने में कुछ अजीब दिखाई दिया। उसकी आंखें फैल गईं। वो तेजी से लपककर वहां पहुंचा।
वहां पर आठ ताजा खुदी हुईं कब्रें थीं।
डॉली एक बड़ी सी ट्रे में नाश्ता लेकर बाहर आई।
''तुम अकेली ही ब्रेकफास्ट लेकर आ रही हो
?"-जय ट्रे उनके बीच रखी टेबल पर रखवाने में उसकी मदद करते हुए बोला-
''रिंकी कहां रह गई
?"
''वो बीच में अचानक किचन से गायब हो गई।
"-डॉली बोली।
''क्या
?"-प्रीति की आंखें फैल गईं।
''अरे...गायब हो गई से मेरा मतलब किचन से चली गई।
"-डॉली बोली-
''मुझे लगा वॉशरूम वगैरह गई होगी। फिर उसे आने में देर लग रही थी तो मैंने सोचा तब तक ये ट्रे यहां पहुंचा दूं।
"
''तुमने ठीक सोचा
"-प्रीति जल्दी से एक सैंडविच उठाकर मुंह में ठूंसते हुए बोली-
''मैं तो भूख से मरी जा रही हूं।
"
''अरे
, रूको यार!
"-जय बोला-
''सबके आने का इंतजार तो कर लो।
"
''सबके
?"-डॉली चौंकी
, फिर उसने वहां उपस्थित लोगों पर नजर डाली-
''राज कहां है
?"
''देख लीजिये
, डोंगरा साहब।
"-जय डोंगरा से बोला-
''इधर राज गायब है। उधर रिंकी गायब है। कहीं दोनों मिलकर कोई खिचड़ी न पका रहे हों।
"
''व्हाट नॉनसेंस।
"-डोंगरा ने घूरकर जय को देखा।
प्रीति ने जय को कोहनी मारी।
''अरे
, सच तो कहा रहा हूं।
"-जय बोला-
''मैंने नोटिस भी किया था कि रिंकी बार-बार सबकी नजरें बचा कर
राज की ओर देख रही थी।
"
''इनफ विद दैट।
"-अब डोंगरा सचमुच गुस्से में नजर आने लगा।
''ओके। ओके डूड।
"-जय हाथ उठाकर बोला-
''मैं तो आपके ही भले के लिये कह रहा था।
"
''मैं अपना भला-बुरा अच्छी तरह जानता हूं।
"-डोंगरा नाराजगी भरे स्वर में बोला-
''और आपको बता दूं कि मुझे इस तरह की वाहियात बातें बिल्कुल पसंद नहीं।
"
जय ने फिर कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन उसके शब्द बीच में ही अटककर रह गए।
घर के पिछली ओर से किसी औरत की दिल दहला देने वाली चीख सुनाई दी।
ब्रेकफास्ट लगभग तैयार हो चुका था। डॉली सैंडविच बनाने में व्यस्त थी। रिंकी को इस बात की खुशी थी कि डॉली उससे जबर्दस्ती बात करने की कोशिश नहीं कर रही थी।
उसे चुप रहना ही अच्छा लगता था।
रिंकी एक बेहद गरीब परिवार से थी। उसने अपने जीवन में इतने दुख देखे थे कि वो खुशियों के प्रति उदासीन-सी हो गई थी। कभी-कभी तो वो खुद को बेजान लाश की तरह महसूस करती थी। यही कारण था कि वो डोंगरा के साथ थी।
डोंगरा भी उसके प्रति उतना ही उदासीन था
, जितनी वो खुद के प्रति थी। वो उसमें भावनात्मक इंटरेस्ट नहीं दिखाता था। डोंगरा के सम्पर्क में आने के बाद से उसे गरीबी के दलदल से छुटकारा जरूर मिल गया था। कुछ लोग इस रिश्ते के बारे में ये जरूर सोच सकते थे कि उसने पैसों के लिए डोंगरा को चुना था लेकिन हकीकत ये थी कि उसे इस चीज से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वो किसके साथ थी
?
उसका साथी जवान था या अधेड़!
हंसमुख था या गम्भीर!
उसे बस जीने के लिए एक सहारा चाहिए था।
और डोंगरा उसके लिए उन मायनों में एक अच्छा साथी ही साबित हुआ था।
वो बात नहीं करना चाहती थी तो वो बात नहीं करता था। और आमतौर पर वो कम ही बात करना चाहती थी।
कभी-कभी मन के किसी कोने में उसके दिमाग में ये ख्याल भी आया था कि शायद डोंगरा के साथ भी कुछ उतना ही बुरा हुआ होगा
, तभी वो वैसा था। कभी उसका मन डोंगरा से इस बारे में पूछने का भी किया था। लेकिन वो हमेशा इस सवाल को कल पर टाल देती थी।
क्योंकि वो भावनात्मक रूप से डोंगरा के नजदीक नहीं आना चाहती थी।
वो भावनात्मक रूप से किसी के नजदीक नहीं आना चाहती थी।
वो किसी भावना को महसूस ही नहीं करना चाहती थी।
उसने भूख देखी थी।
गरीबी देखी थी।
जब वो छोटी बच्ची ही थी
, तब उसने अभावों से भरी जिंदगी में घर के लोगों को लड़ते-झगड़ते
, एक-दूसरे को ही गालियां देते
, कोसते देखा था। जिन्हें एक-दूसरे के लिए जान देने के लिये तैयार रहना चाहिए था
, उन्हें एक-दूसरे को बद्दुआएं देते देखा था।
घर में माता-पिता के बीच घंटों चलने वाली लड़ाइयां जब बंद होती थीं तो उसका दिमाग सांय-सांय कर रहा होता था। उसे लगता था जैसे वो पागल हो जायेगी।
उसका घर से भाग जाने का मन करता था।
लेकिन घर से भाग कर वो जाती कहां
?
उसी माहौल में वो बड़ी हुई और उसने देखा
, समझा कि भावनाओं की बातें करने वाले उसके माता-पिता असल में भावनात्मक रूप से कितने खोखले थे।
तभी से शायद उसे भावुक होने से नफरत हो गई थी।
या शायद उसे अपने इंसान होने से ही नफरत थी हो गई थी।
जब से वो लोग इस घर में आए थे
, तब से उसे लग रहा था कि वो जगह सही नहीं थी।
वहां कुछ तो गलत था!
लेकिन वो किसी से कुछ कह नहीं सकती थी।
वो एक जरखरीद गुलाम की तरह ही डोंगरा के आदेशों का पालन करती थी।
रिंकी के पिता की मृत्यु पहले ही हो गई थी।
फिर मां ने भी जहर खा कर आत्महत्या करने की कोशिश की।
उसे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।
मां का इलाज कराने के लिए रिंकी के पास पैसे नहीं थे।
तब सुरेश डोंगरा हॉस्पिटल आया।
उसने रिंकी की मां के इलाज के लिए पैसे दिए।
रिंकी की मां डोंगरा के यहां ही काम करती थी
, जिससे वो उन्हें जानता था।
रिंकी सुखद आश्चर्य से भर उठी।
उसे लगा डोंगरा इंसान नहीं
, कोई फरिश्ता था।
उसके माता-पिता ने उसे जो तकलीफ
, तनाव
, बुराइयों से भरी दुनिया दिखाई थी
, उस दुनिया से अलग
, किसी और ही दुनिया का शख्स था।
लेकिन डॉक्टर रिंकी की मां को बचा नहीं पाए।
रिंकी के लिए तो जैसे दुनिया ही खत्म हो गई थी।
फिर डोंगरा उसे अपने घर ले गया।
और उसने रिंकी के सामने शादी की पेशकश रखी।
रिंकी के दिलोदिमाग को जोरदार झटका लगा।
जिस आदमी को वो फरिश्ता मान रही थी
, उसकी नजरें असल में उस पर थीं।
वो उसकी मां के इलाज के लिए पैसे देकर उसकी मदद नहीं कर रहा था
, इंसानियत की मिसाल कायम नहीं कर रहा था बल्कि रिंकी को कोई खरीदने की वस्तु समझकर उसकी रकम एडवांस में चुका रहा था।
उस ख्याल से उसने खुद को दूसरी बार मरते हुए महसूस किया।
वहां उसे कब्रिस्तान का गेट बंद मिला।
गेट बंद देख कर राज को हैरानी हुई। उसे अच्छी तरह याद था कि कल उस कब्रिस्तान से वापस लौटते समय वे गेट खुला छोड़ गए थे।
फिर गेट बंद किसने किया
?
राज ने गेट की कुण्डी खोलकर कब्रिस्तान में प्रवेश किया।
कब्रिस्तान में एकदम सन्नाटा छाया हुआ था।
वहां कोई दो दर्जन के आसपास कब्रें थीं। सभी बेहद पुरानी। बुरी तरह टूट-फूट चुकीं।
कल सुबह जब वे लोग वहां आए थे
, उससे पहले शायद वर्षों से उस वीराने में किसी के कदम नहीं पड़े होंगें।
क्या मुर्दों को उनका वहां आकर शांति भंग करना अच्छा नहीं लगा था
?
शायद इसीलिए रात में राज ने उस रहस्यमयी व्यक्ति को देखा था।
राज शांति से कब्रिस्तान में टहलता रहा। उसकी नजरें उन कब्रों का मुआयना कर रहीं थीं।
तभी राज को कब्रिस्तान के दूसरे कोने में कुछ अजीब दिखाई दिया। उसकी आंखें फैल गईं। वो तेजी से लपककर वहां पहुंचा।
वहां पर आठ ताजा खुदी हुईं कब्रें थीं।
डॉली एक बड़ी सी ट्रे में नाश्ता लेकर बाहर आई।
''तुम अकेली ही ब्रेकफास्ट लेकर आ रही हो
?"-जय ट्रे उनके बीच रखी टेबल पर रखवाने में उसकी मदद करते हुए बोला-
''रिंकी कहां रह गई
?"
''वो बीच में अचानक किचन से गायब हो गई।
"-डॉली बोली।
''क्या
?"-प्रीति की आंखें फैल गईं।
''अरे...गायब हो गई से मेरा मतलब किचन से चली गई।
"-डॉली बोली-
''मुझे लगा वॉशरूम वगैरह गई होगी। फिर उसे आने में देर लग रही थी तो मैंने सोचा तब तक ये ट्रे यहां पहुंचा दूं।
"
''तुमने ठीक सोचा
"-प्रीति जल्दी से एक सैंडविच उठाकर मुंह में ठूंसते हुए बोली-
''मैं तो भूख से मरी जा रही हूं।
"
''अरे
, रूको यार!
"-जय बोला-
''सबके आने का इंतजार तो कर लो।
"
''सबके
?"-डॉली चौंकी
, फिर उसने वहां उपस्थित लोगों पर नजर डाली-
''राज कहां है
?"
''देख लीजिये
, डोंगरा साहब।
"-जय डोंगरा से बोला-
''इधर राज गायब है। उधर रिंकी गायब है। कहीं दोनों मिलकर कोई खिचड़ी न पका रहे हों।
"
''व्हाट नॉनसेंस।
"-डोंगरा ने घूरकर जय को देखा।
प्रीति ने जय को कोहनी मारी।
''अरे
, सच तो कहा रहा हूं।
"-जय बोला-
''मैंने नोटिस भी किया था कि रिंकी बार-बार सबकी नजरें बचा कर
राज की ओर देख रही थी।
"
''इनफ विद दैट।
"-अब डोंगरा सचमुच गुस्से में नजर आने लगा।
''ओके। ओके डूड।
"-जय हाथ उठाकर बोला-
''मैं तो आपके ही भले के लिये कह रहा था।
"
''मैं अपना भला-बुरा अच्छी तरह जानता हूं।
"-डोंगरा नाराजगी भरे स्वर में बोला-
''और आपको बता दूं कि मुझे इस तरह की वाहियात बातें बिल्कुल पसंद नहीं।
"
जय ने फिर कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन उसके शब्द बीच में ही अटककर रह गए।
घर के पिछली ओर से किसी औरत की दिल दहला देने वाली चीख सुनाई दी।
ब्रेकफास्ट लगभग तैयार हो चुका था। डॉली सैंडविच बनाने में व्यस्त थी। रिंकी को इस बात की खुशी थी कि डॉली उससे जबर्दस्ती बात करने की कोशिश नहीं कर रही थी।
उसे चुप रहना ही अच्छा लगता था।
रिंकी एक बेहद गरीब परिवार से थी। उसने अपने जीवन में इतने दुख देखे थे कि वो खुशियों के प्रति उदासीन-सी हो गई थी। कभी-कभी तो वो खुद को बेजान लाश की तरह महसूस करती थी। यही कारण था कि वो डोंगरा के साथ थी।
डोंगरा भी उसके प्रति उतना ही उदासीन था
, जितनी वो खुद के प्रति थी। वो उसमें भावनात्मक इंटरेस्ट नहीं दिखाता था। डोंगरा के सम्पर्क में आने के बाद से उसे गरीबी के दलदल से छुटकारा जरूर मिल गया था। कुछ लोग इस रिश्ते के बारे में ये जरूर सोच सकते थे कि उसने पैसों के लिए डोंगरा को चुना था लेकिन हकीकत ये थी कि उसे इस चीज से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वो किसके साथ थी
?
उसका साथी जवान था या अधेड़!
हंसमुख था या गम्भीर!
उसे बस जीने के लिए एक सहारा चाहिए था।
और डोंगरा उसके लिए उन मायनों में एक अच्छा साथी ही साबित हुआ था।
वो बात नहीं करना चाहती थी तो वो बात नहीं करता था। और आमतौर पर वो कम ही बात करना चाहती थी।
कभी-कभी मन के किसी कोने में उसके दिमाग में ये ख्याल भी आया था कि शायद डोंगरा के साथ भी कुछ उतना ही बुरा हुआ होगा
, तभी वो वैसा था। कभी उसका मन डोंगरा से इस बारे में पूछने का भी किया था। लेकिन वो हमेशा इस सवाल को कल पर टाल देती थी।
क्योंकि वो भावनात्मक रूप से डोंगरा के नजदीक नहीं आना चाहती थी।
वो भावनात्मक रूप से किसी के नजदीक नहीं आना चाहती थी।
वो किसी भावना को महसूस ही नहीं करना चाहती थी।
उसने भूख देखी थी।
गरीबी देखी थी।
जब वो छोटी बच्ची ही थी
, तब उसने अभावों से भरी जिंदगी में घर के लोगों को लड़ते-झगड़ते
, एक-दूसरे को ही गालियां देते
, कोसते देखा था। जिन्हें एक-दूसरे के लिए जान देने के लिये तैयार रहना चाहिए था
, उन्हें एक-दूसरे को बद्दुआएं देते देखा था।
घर में माता-पिता के बीच घंटों चलने वाली लड़ाइयां जब बंद होती थीं तो उसका दिमाग सांय-सांय कर रहा होता था। उसे लगता था जैसे वो पागल हो जायेगी।
उसका घर से भाग जाने का मन करता था।
लेकिन घर से भाग कर वो जाती कहां
?
उसी माहौल में वो बड़ी हुई और उसने देखा
, समझा कि भावनाओं की बातें करने वाले उसके माता-पिता असल में भावनात्मक रूप से कितने खोखले थे।
तभी से शायद उसे भावुक होने से नफरत हो गई थी।
या शायद उसे अपने इंसान होने से ही नफरत थी हो गई थी।
जब से वो लोग इस घर में आए थे
, तब से उसे लग रहा था कि वो जगह सही नहीं थी।
वहां कुछ तो गलत था!
लेकिन वो किसी से कुछ कह नहीं सकती थी।
वो एक जरखरीद गुलाम की तरह ही डोंगरा के आदेशों का पालन करती थी।
रिंकी के पिता की मृत्यु पहले ही हो गई थी।
फिर मां ने भी जहर खा कर आत्महत्या करने की कोशिश की।
उसे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।
मां का इलाज कराने के लिए रिंकी के पास पैसे नहीं थे।
तब सुरेश डोंगरा हॉस्पिटल आया।
उसने रिंकी की मां के इलाज के लिए पैसे दिए।
रिंकी की मां डोंगरा के यहां ही काम करती थी
, जिससे वो उन्हें जानता था।
रिंकी सुखद आश्चर्य से भर उठी।
उसे लगा डोंगरा इंसान नहीं
, कोई फरिश्ता था।
उसके माता-पिता ने उसे जो तकलीफ
, तनाव
, बुराइयों से भरी दुनिया दिखाई थी
, उस दुनिया से अलग
, किसी और ही दुनिया का शख्स था।
लेकिन डॉक्टर रिंकी की मां को बचा नहीं पाए।
रिंकी के लिए तो जैसे दुनिया ही खत्म हो गई थी।
फिर डोंगरा उसे अपने घर ले गया।
और उसने रिंकी के सामने शादी की पेशकश रखी।
रिंकी के दिलोदिमाग को जोरदार झटका लगा।
जिस आदमी को वो फरिश्ता मान रही थी
, उसकी नजरें असल में उस पर थीं।
वो उसकी मां के इलाज के लिए पैसे देकर उसकी मदद नहीं कर रहा था
, इंसानियत की मिसाल कायम नहीं कर रहा था बल्कि रिंकी को कोई खरीदने की वस्तु समझकर उसकी रकम एडवांस में चुका रहा था।
उस ख्याल से उसने खुद को दूसरी बार मरते हुए महसूस किया।