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Horror आसुरी शक्तियां
1-- उस रात इन्साफ
2-- रोज़वेल मेंशन
3-- नाईट वॉकर
4--
उस रात इन्साफ
हरेक की जिंदगी में कुछ बातें, कुछ लम्हे, कुछ किस्से, कुछ घटनायें ऐसी जरूर होती हैं जो उसकी मेमोरी में हमेशा के लिये सुरक्षित हो जाती हैं। कुछ ऐसी घटनायें, जहां आखिर में लगा सवालिया निशान कभी न ख़त्म हो पाये— ऐसी न भुला सकने वाली स्मृतियों में अपना एक खास मकाम बना कर रखती हैं।
अब चूंकि मैं पुलिस की नौकरी में रहा हूं, जहां पूरे कैरियर के दौरान जाने कितने अनसुलझे केस भी मेरी स्मृतियों में दर्ज हुए हैं तो ऐसा नहीं है कि मैं सवालिया निशान छोड़ जाने वाली घटनाओं में सभी को याद रख सकूं— हां, लेकिन कुछ घटनायें तो फिर भी होती हैं जो अपना अलग ही मकाम रखती हैं। ऐसी ही एक घटना है— जब भी कभी मेरे सामने भूत-प्रेत, आत्मा वगैरह की कोई बात हो, तो मेरी स्मृतियों में ऐसे हलचल मचा देती है जैसे किसी झील के शांत पानी में कोई पत्थर फेंक दिया गया हो।
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हां, मैं अपने बारे में बताना भूल गया... मेरा नाम राज है, उपनाम इसलिये नहीं बताऊंगा कि उससे जाति झलकती है और मैं इस कहानी के किरदार के रूप में बस एक इंसान ही रहना चाहता हूं। पुलिस सेवा में सफलता पूर्वक पैंतीस साल गुजार कर रिटायर हो चुका हूं और अब चंडीगढ़ में रहता हूं। ज्यादातर वक्त घर में पोतों के साथ खेलने, या सुबह शाम पार्क में अपनी उम्र के लोगों के साथ गप्पे लड़ाने में गुज़रता है।
बचपन से धर्म में कोई खास रूचि न रही तो ज्यादातर धार्मिक विश्वासों से दूर ही रहा हूं। इस नाते किसी भी तरह के अंध-विश्वास के खिलाफ सख़्ती से ही पेश आया हूं हमेशा से, और भूत-प्रेत, आत्मा जैसे किसी भी विचार को बड़ी कठोरता से नकारता रहा हूं। मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी किसी ने मेरे सामने इन चीजों पर यक़ीन जताया हो और मैंने उसे डपटा न हो। फिर भी... मेरी ज़िंदगी में एक ऐसी घटना ज़रूर हुई है, जिसका सही मतलब मेरी कभी समझ में न आ पाया और आज तक उस पर लगा सवालिया निशान वैसे ही बरकरार है।
आज शाम जब हम कुछ बूढ़े पार्क में जमा हुए थे तो सिह साहब कल रात उनके साथ हुआ एक वाक्या बताने लगे, जो किसी आत्मा से मुठभेड़ होने को लेकर था। जहां बाकी साथी सिह साहब की हां में हां मिलाने लग गये और अपने साथ कभी हुआ ऐसा ही कोई अनुभव बताने लग गये— वहीं मैं लगातार उनकी बातों के खिलाफ बहस करता रहा लेकिन ज़ाहिर है कि उन धार्मिकों के बीच मैं अकेला अर्ध-नास्तिक टाईप शख़्स था तो चली उनकी ही।
फिर वापस घर आ कर जब रात को बिस्तर के हवाले हुआ तो दिमाग़ में वैसी ही एक घटना हलचल मचाये हुए थी, जिसका सामना मैंने किया था, लेकिन जिस मुअम्मे को न कभी मैं सुलझा पाया और न ही किसी को बता ही पाया।
बात आज से करीब चालीस साल पहले की है, उन दिनों मैं ताजा-ताजा ही ज्वाईन हुआ था और एक ऊर्जा से भरा हुआ नौजवान था जो अपनी परफार्मेंस से अपने अधिकारियों को जल्द-से-जल्द प्रभावित कर लेना चाहता था। मेरी ज्वाइनिंग पीलीभीत में हुई थी और पुश्तैनी घर सोमना हुसैनपुर में था तो इसी के बीच दौड़ चलती रहती थी।
मुझे आज भी वह दिन उसी तरह याद है, और याद हैं उससे जुड़ी सारी घटनाएं— ठीक उसी तरह जैसे अभी हाल ही में गुज़री हों।
उस दिन शाम से ही मौसम ख़राब था और आकाश बादलों से घिरा हुआ था— पानी कहीं तेज़ बरसने लगता था तो कहीं टिपटिपाने लगता था। हवा कभी हौले-हौले तन सहलाने की अवस्था में आ जाती तो कभी उखाड़ फेंकने पर उतारू हो जाती। बादलों की घनगरज का सिलसिला भी रुक-रुक कर जारी था— रास्ते के किनारे मौजूद पेड़ किसी-किसी पल में एकदम शांत दिखते तो किन्हीं पलों में मस्ती में झूमने लगते।
मैं ड्यूटी के लिये उस शाम पीलीभीत लौट रहा था... यह सन अस्सी के आसपास की बात है। सड़क पहले से ही खस्ताहाल थी और इस बारिश ने तो रास्ते की हालत ही ख़राब कर रखी थी। खटारा सी जीप अपनी सामर्थ्य भर उन हालात और उस रास्ते का सामना कर रही थी, लेकिन मैं परेशान हाल लगातार यही सोच रहा था कि वह कहीं रास्ते में दगा न दे जाये... आसपास तो कोई आबादी भी नहीं थी कि शरण मिल सकती।
फिर जब ओरैया क्रास हो चुका तो एक जगह आखिरकार जीप ने हाथ खड़े कर दिये।
न चाहते हुए भी मुंह से कई अपशब्द निकल गये।
झुंझलाहट में स्टेयरिंग पर हाथ मार कर रह गया। आसपास कोई भी ऐसी चीज़ नहीं थी जिससे उम्मीद की जा सकती। बस पानी से भीगे झूमते पेड़ खड़े थे या इधर-उधर पानी से भरे थाल दिख रहे थे। कोई घर, गुमटी या इंसान तो ऐसे मौसम में क्या ही दिखता— कोई आवारा जानवर तक नहीं दिख रहा था कि उसे देख के ही तसल्ली होती कि चलो कोई तो है जो ऐसे मौसम में मेरी तरह घर से बाहर है।
बूंदें हल्की हुईं तो उतर कर बोनट खोला लेकिन कम से कम मैं इतना सक्षम तो नहीं था कि किसी बारीक फॉल्ट को पकड़ लेता... और कोई बड़ा, नजर में आने लायक दोष तो दिख नहीं रहा था जो वह यूं रूठ कर खड़ी हो गई थी।
मायूस हो कर वापस अंदर आ बैठा और सोचने लगा कि ऐसी स्थिति में क्या किया जा सकता था। अंधेरा तेजी से बढ़ता जा रहा था तो तय था कि कोई मदद मिलने की उम्मीद भी उसके बढ़ने के साथ ही कमज़ोर हो रही थी।
जंगल से लगा इलाका था तो जानवरों का ख़तरा तो रहता ही था— बस मौसम ही था, जिसके चलते उम्मीद कर सकता था कि जानवर भी ऐसे में अपने ठिकानों पर नाउम्मीदी की हालत में सिमटे पड़े होंगे।
यूं ही बैठे-बैठे आधा घंटा और गुज़र गया— अंधेरे ने पूरी तरह अपनी हुक्मरानी स्थापित कर ली। अब बस बीच-बीच में चमक उठती बिजली ही थी जो उसे भेद कर आसपास का नज़ारा दिखा देती थी। बूंदाबांदी तो वक्त गुज़रने के साथ और कमज़ोर हो गई थी लेकिन हवायें अभी भी एकदम आक्रामक थीं।
अचानक एक तरफ एक साया चमका— दिल ने ज़ोर से धड़क कर प्रतिक्रिया दी। उसे देख पाना भी इसलिये संभव हुआ था कि उसी पल कहीं दूर बिजली कड़की थी, जिसकी कमज़ोर पड़ती चमक वहां तक चली आई थी।
साया इंसानी था— यह देख कर राहत ज़रूर महसूस हुई, लेकिन दिमाग़ इस सवाल में फिर भी उलझ गया कि भला ऐसे मौसम में और ऐसी जगह कोई इंसान क्या कर रहा था।
फिर उसके पास आने पर उसका आभास होने लगा और मैं सतर्क हो कर बैठ गया। हाथ होलस्टर पर पहुंच गया कि ख़तरे की सूरत में उंगलियां रिवॉल्वर से दूर न रहें।
फिर वह साया पैसेंजर साईड की तरफ़ एकदम पास आ खड़ा हुआ... मैंने ख़ुद से कुछ बोलने की कोशिश नहीं की।
"क्या बात है साहब... ऐसे मौसम में आप ऐसी जगह इतनी देर से थमे खड़े हैं... कोई परेशानी है क्या?" उस साये ने पूछा— आवाज़ जनानी थी, जिसे सुन कर मुझे राहत भरी हैरानी हुई और मैंने होलस्टर से हाथ वापस खींच लिया।
"हाँ— गाड़ी खराब हो गई है। क्या यहां किसी तरह की मदद मिल सकती है?" मैंने स्वर में याचना का पुट लाते हुए कहा।
"अब इस वक्त कोई मिस्त्री तो यहां नहीं मिलेगा— सुबह ही आगे जो बस्ती है मैदना की... वहां से आप ला सकते हैं किसी को।" आवाज़ से अंदाज़ा हो रहा था कि वह कोई लड़की ही थी।
"तो मतलब यह तूफानी रात मुझे इसी तरह गुज़ारनी पड़ेगी।" मैंने किसी हद तक मायूसी से कहा।
"लेकिन इस तरह रास्ते में और खुली जीप में रात गुज़ारना तो ठीक नहीं।" लड़की ने चिंता जताई।
"कर भी क्या सकते हैं— यहां तो आसपास कोई ऐसी जगह भी नहीं दिखती कि रात भर के लिये शरण मिल सके।" मैंने निराशा जताई।
"नहीं— ऐसा नहीं है, मैं पास ही रहती हूं अपने बाबा के साथ। आप बुरा न मानें तो वहां रात गुज़ार सकते हैं।" उसके स्वर में आग्रह का पुट था, जिसे मैं इग्नोर न कर पाया।
"ओके।" कुछ देर सोचने के बाद मैंने कंधे गिराते हुए कहा और इग्नीशन से चाबी निकालते हुए नीचे उतर आया।
कुछ छिटकी हुई बूंदों ने भीगी और कीचड़ जैसी हो चुकी ज़मीन पर उतरते ही मेरा स्वागत किया— लेकिन वे मुझे परेशान कर पाने में सक्षम नहीं थीं। उसने अपने पीछे आने का इशारा किया तो मैं ज़मीन पर पानी, कीचड़ और सूखी ज़मीन के बीच अंतर ढूंढने की नाकाम कोशिश करते हुए उसके पीछे बढ़ लिया। वह लंबाई में मुझसे थोड़ी कम थी, लेकिन सेहत ठीक-ठाक थी। नीचे उसने क्या कपड़े पहने थे— वह अंधेरे में देखना या समझना मेरे लिये मुश्किल था, लेकिन ऊपर से एक बरसाती ओढ़ रखी थी, यह मैं देख सकता था। वह बरसाती का सर पर निकला हुड ही था, जिसके पीछे अंधेरे में उसका चेहरा भी खो गया था।
1-- उस रात इन्साफ
2-- रोज़वेल मेंशन
3-- नाईट वॉकर
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उस रात इन्साफ
हरेक की जिंदगी में कुछ बातें, कुछ लम्हे, कुछ किस्से, कुछ घटनायें ऐसी जरूर होती हैं जो उसकी मेमोरी में हमेशा के लिये सुरक्षित हो जाती हैं। कुछ ऐसी घटनायें, जहां आखिर में लगा सवालिया निशान कभी न ख़त्म हो पाये— ऐसी न भुला सकने वाली स्मृतियों में अपना एक खास मकाम बना कर रखती हैं।
अब चूंकि मैं पुलिस की नौकरी में रहा हूं, जहां पूरे कैरियर के दौरान जाने कितने अनसुलझे केस भी मेरी स्मृतियों में दर्ज हुए हैं तो ऐसा नहीं है कि मैं सवालिया निशान छोड़ जाने वाली घटनाओं में सभी को याद रख सकूं— हां, लेकिन कुछ घटनायें तो फिर भी होती हैं जो अपना अलग ही मकाम रखती हैं। ऐसी ही एक घटना है— जब भी कभी मेरे सामने भूत-प्रेत, आत्मा वगैरह की कोई बात हो, तो मेरी स्मृतियों में ऐसे हलचल मचा देती है जैसे किसी झील के शांत पानी में कोई पत्थर फेंक दिया गया हो।
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हां, मैं अपने बारे में बताना भूल गया... मेरा नाम राज है, उपनाम इसलिये नहीं बताऊंगा कि उससे जाति झलकती है और मैं इस कहानी के किरदार के रूप में बस एक इंसान ही रहना चाहता हूं। पुलिस सेवा में सफलता पूर्वक पैंतीस साल गुजार कर रिटायर हो चुका हूं और अब चंडीगढ़ में रहता हूं। ज्यादातर वक्त घर में पोतों के साथ खेलने, या सुबह शाम पार्क में अपनी उम्र के लोगों के साथ गप्पे लड़ाने में गुज़रता है।
बचपन से धर्म में कोई खास रूचि न रही तो ज्यादातर धार्मिक विश्वासों से दूर ही रहा हूं। इस नाते किसी भी तरह के अंध-विश्वास के खिलाफ सख़्ती से ही पेश आया हूं हमेशा से, और भूत-प्रेत, आत्मा जैसे किसी भी विचार को बड़ी कठोरता से नकारता रहा हूं। मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी किसी ने मेरे सामने इन चीजों पर यक़ीन जताया हो और मैंने उसे डपटा न हो। फिर भी... मेरी ज़िंदगी में एक ऐसी घटना ज़रूर हुई है, जिसका सही मतलब मेरी कभी समझ में न आ पाया और आज तक उस पर लगा सवालिया निशान वैसे ही बरकरार है।
आज शाम जब हम कुछ बूढ़े पार्क में जमा हुए थे तो सिह साहब कल रात उनके साथ हुआ एक वाक्या बताने लगे, जो किसी आत्मा से मुठभेड़ होने को लेकर था। जहां बाकी साथी सिह साहब की हां में हां मिलाने लग गये और अपने साथ कभी हुआ ऐसा ही कोई अनुभव बताने लग गये— वहीं मैं लगातार उनकी बातों के खिलाफ बहस करता रहा लेकिन ज़ाहिर है कि उन धार्मिकों के बीच मैं अकेला अर्ध-नास्तिक टाईप शख़्स था तो चली उनकी ही।
फिर वापस घर आ कर जब रात को बिस्तर के हवाले हुआ तो दिमाग़ में वैसी ही एक घटना हलचल मचाये हुए थी, जिसका सामना मैंने किया था, लेकिन जिस मुअम्मे को न कभी मैं सुलझा पाया और न ही किसी को बता ही पाया।
बात आज से करीब चालीस साल पहले की है, उन दिनों मैं ताजा-ताजा ही ज्वाईन हुआ था और एक ऊर्जा से भरा हुआ नौजवान था जो अपनी परफार्मेंस से अपने अधिकारियों को जल्द-से-जल्द प्रभावित कर लेना चाहता था। मेरी ज्वाइनिंग पीलीभीत में हुई थी और पुश्तैनी घर सोमना हुसैनपुर में था तो इसी के बीच दौड़ चलती रहती थी।
मुझे आज भी वह दिन उसी तरह याद है, और याद हैं उससे जुड़ी सारी घटनाएं— ठीक उसी तरह जैसे अभी हाल ही में गुज़री हों।
उस दिन शाम से ही मौसम ख़राब था और आकाश बादलों से घिरा हुआ था— पानी कहीं तेज़ बरसने लगता था तो कहीं टिपटिपाने लगता था। हवा कभी हौले-हौले तन सहलाने की अवस्था में आ जाती तो कभी उखाड़ फेंकने पर उतारू हो जाती। बादलों की घनगरज का सिलसिला भी रुक-रुक कर जारी था— रास्ते के किनारे मौजूद पेड़ किसी-किसी पल में एकदम शांत दिखते तो किन्हीं पलों में मस्ती में झूमने लगते।
मैं ड्यूटी के लिये उस शाम पीलीभीत लौट रहा था... यह सन अस्सी के आसपास की बात है। सड़क पहले से ही खस्ताहाल थी और इस बारिश ने तो रास्ते की हालत ही ख़राब कर रखी थी। खटारा सी जीप अपनी सामर्थ्य भर उन हालात और उस रास्ते का सामना कर रही थी, लेकिन मैं परेशान हाल लगातार यही सोच रहा था कि वह कहीं रास्ते में दगा न दे जाये... आसपास तो कोई आबादी भी नहीं थी कि शरण मिल सकती।
फिर जब ओरैया क्रास हो चुका तो एक जगह आखिरकार जीप ने हाथ खड़े कर दिये।
न चाहते हुए भी मुंह से कई अपशब्द निकल गये।
झुंझलाहट में स्टेयरिंग पर हाथ मार कर रह गया। आसपास कोई भी ऐसी चीज़ नहीं थी जिससे उम्मीद की जा सकती। बस पानी से भीगे झूमते पेड़ खड़े थे या इधर-उधर पानी से भरे थाल दिख रहे थे। कोई घर, गुमटी या इंसान तो ऐसे मौसम में क्या ही दिखता— कोई आवारा जानवर तक नहीं दिख रहा था कि उसे देख के ही तसल्ली होती कि चलो कोई तो है जो ऐसे मौसम में मेरी तरह घर से बाहर है।
बूंदें हल्की हुईं तो उतर कर बोनट खोला लेकिन कम से कम मैं इतना सक्षम तो नहीं था कि किसी बारीक फॉल्ट को पकड़ लेता... और कोई बड़ा, नजर में आने लायक दोष तो दिख नहीं रहा था जो वह यूं रूठ कर खड़ी हो गई थी।
मायूस हो कर वापस अंदर आ बैठा और सोचने लगा कि ऐसी स्थिति में क्या किया जा सकता था। अंधेरा तेजी से बढ़ता जा रहा था तो तय था कि कोई मदद मिलने की उम्मीद भी उसके बढ़ने के साथ ही कमज़ोर हो रही थी।
जंगल से लगा इलाका था तो जानवरों का ख़तरा तो रहता ही था— बस मौसम ही था, जिसके चलते उम्मीद कर सकता था कि जानवर भी ऐसे में अपने ठिकानों पर नाउम्मीदी की हालत में सिमटे पड़े होंगे।
यूं ही बैठे-बैठे आधा घंटा और गुज़र गया— अंधेरे ने पूरी तरह अपनी हुक्मरानी स्थापित कर ली। अब बस बीच-बीच में चमक उठती बिजली ही थी जो उसे भेद कर आसपास का नज़ारा दिखा देती थी। बूंदाबांदी तो वक्त गुज़रने के साथ और कमज़ोर हो गई थी लेकिन हवायें अभी भी एकदम आक्रामक थीं।
अचानक एक तरफ एक साया चमका— दिल ने ज़ोर से धड़क कर प्रतिक्रिया दी। उसे देख पाना भी इसलिये संभव हुआ था कि उसी पल कहीं दूर बिजली कड़की थी, जिसकी कमज़ोर पड़ती चमक वहां तक चली आई थी।
साया इंसानी था— यह देख कर राहत ज़रूर महसूस हुई, लेकिन दिमाग़ इस सवाल में फिर भी उलझ गया कि भला ऐसे मौसम में और ऐसी जगह कोई इंसान क्या कर रहा था।
फिर उसके पास आने पर उसका आभास होने लगा और मैं सतर्क हो कर बैठ गया। हाथ होलस्टर पर पहुंच गया कि ख़तरे की सूरत में उंगलियां रिवॉल्वर से दूर न रहें।
फिर वह साया पैसेंजर साईड की तरफ़ एकदम पास आ खड़ा हुआ... मैंने ख़ुद से कुछ बोलने की कोशिश नहीं की।
"क्या बात है साहब... ऐसे मौसम में आप ऐसी जगह इतनी देर से थमे खड़े हैं... कोई परेशानी है क्या?" उस साये ने पूछा— आवाज़ जनानी थी, जिसे सुन कर मुझे राहत भरी हैरानी हुई और मैंने होलस्टर से हाथ वापस खींच लिया।
"हाँ— गाड़ी खराब हो गई है। क्या यहां किसी तरह की मदद मिल सकती है?" मैंने स्वर में याचना का पुट लाते हुए कहा।
"अब इस वक्त कोई मिस्त्री तो यहां नहीं मिलेगा— सुबह ही आगे जो बस्ती है मैदना की... वहां से आप ला सकते हैं किसी को।" आवाज़ से अंदाज़ा हो रहा था कि वह कोई लड़की ही थी।
"तो मतलब यह तूफानी रात मुझे इसी तरह गुज़ारनी पड़ेगी।" मैंने किसी हद तक मायूसी से कहा।
"लेकिन इस तरह रास्ते में और खुली जीप में रात गुज़ारना तो ठीक नहीं।" लड़की ने चिंता जताई।
"कर भी क्या सकते हैं— यहां तो आसपास कोई ऐसी जगह भी नहीं दिखती कि रात भर के लिये शरण मिल सके।" मैंने निराशा जताई।
"नहीं— ऐसा नहीं है, मैं पास ही रहती हूं अपने बाबा के साथ। आप बुरा न मानें तो वहां रात गुज़ार सकते हैं।" उसके स्वर में आग्रह का पुट था, जिसे मैं इग्नोर न कर पाया।
"ओके।" कुछ देर सोचने के बाद मैंने कंधे गिराते हुए कहा और इग्नीशन से चाबी निकालते हुए नीचे उतर आया।
कुछ छिटकी हुई बूंदों ने भीगी और कीचड़ जैसी हो चुकी ज़मीन पर उतरते ही मेरा स्वागत किया— लेकिन वे मुझे परेशान कर पाने में सक्षम नहीं थीं। उसने अपने पीछे आने का इशारा किया तो मैं ज़मीन पर पानी, कीचड़ और सूखी ज़मीन के बीच अंतर ढूंढने की नाकाम कोशिश करते हुए उसके पीछे बढ़ लिया। वह लंबाई में मुझसे थोड़ी कम थी, लेकिन सेहत ठीक-ठाक थी। नीचे उसने क्या कपड़े पहने थे— वह अंधेरे में देखना या समझना मेरे लिये मुश्किल था, लेकिन ऊपर से एक बरसाती ओढ़ रखी थी, यह मैं देख सकता था। वह बरसाती का सर पर निकला हुड ही था, जिसके पीछे अंधेरे में उसका चेहरा भी खो गया था।