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Horror मौत की चाल

कुछ देर बाद जब डॉली वापस लौटी

, तब भी सब मीटिंग रूम में वैसे ही बैठे थे

, जैसे वो उन्हें बैठे छोड़ गई थी। सबके चेहरे पर बारह बजे हुए थे।

अनुराग ने गर्दन घुमाकर डॉली पर नजर डाली। फिर उसे अकेली देखकर बोला-

''मोहिनी कहां है

?"

''मोहिनी

"-डॉली का स्वर अज्ञात आशंका से कांप रहा था-

''ऊपर नहीं है।

"

'

'क्या

?"-अनुराग का मुंह खुला-का-खुला रह गया। वो हैरत से डॉली को देखता रह गया।

''मोहिनी ऊपर नहीं है।

"-डॉली ने अपनी बात दोहराई-

''मैंने रिंकी से बात की। उसने कहा कि उसने भी काफी देर से मोहिनी को नहीं देखा। फिर मैंने ऊपर हर जगह देख लिया। सिवाय उस ताले वाले कमरे के। लेकिन मोहिनी कहीं भी नहीं दिखी। जबकि सुबह जब वो रिंकी को नाश्ता कराने की बात कह कर उसके लिए नाश्ता लेकर ऊपर गई थी

, उसके बाद से मैंने उसे नीचे आते नहीं देखा है।

"

''हममें से किसी ने नहीं देखा है।

"-प्रीति भी चिंतित स्वर में बोली-

''उसे ऊपर ही होना चाहिए।

"

''लेकिन वो ऊपर नहीं है।

"

अनुराग उठा और जमीन रौंदते हुए सीढिय़ों की ओर बढ़ा। डॉली उसके रास्ते से हट गई। वो ऊपर पहुंचा। उसने भी वहां का कोना-कोना छान मारा लेकिन मोहिनी का कहीं पता नहीं चला।

उस दौरान बाकी लोगों ने भी घर के निचले हिस्से में यहां तक कि आसपास और स्टोर रूम में भी झांक कर देख लिया लेकिन मोहिनी कहीं नजर नहीं आई।

कल रिंकी और आज मोहिनी के इस तरह गायब हो जाने से सभी के होश उड़े हुए थे।

करीब डेढ़-दो घंटे तक आसपास मोहिनी को तलाश करने के बाद थक-हारकर वे सब फिर मीटिंग रूम में इकट्ठे हुए।

''ये सब क्या हो रहा है

?"-अनुराग बोला लेकिन अब उसके स्वर में गुस्सा नहीं हताशा और भय झलक रहा था।

''कल रिंकी

"-प्रीति बोली-

''और आज मोहिनी इस तरह गायब हो गई। रिंकी तो फिर भी मिल गई लेकिन मोहिनी तो कहीं मिल ही नहीं रही।

"

अनुराग कहना चाहता था कि काश

, रिंकी मिली ही न होती लेकिन उसने अपने होंठ भींच लिए।

''अब हम क्या करें

?"-जय असहाय भाव से सिर हिलाते हुए बोला-

''कहां ढूंढें मोहिनी को

?"

''स्टोर रूम।

"-डॉली बोली।

''स्टोर रूम में तो देख चुके हैं। वो वहां नहीं है।

"

''हमें दोबारा स्टोर रूम की तलाशी लेनी चाहिए। शायद हमें कोई काम की चीज मिल जाए।

"

''पागल हुई हो

?"-डोंगरा बोला-

''उस कॉफिन मैन ने हमें उस स्टोर रूम में जाने से मना किया था।

"

''लेकिन रिंकी हमें वहीं मिली।

"-प्रीति बोली।

''वो अलग बात है। रिंकी नहीं मिल रही थी तो हम सब काफी डर गए थे। वही एक जगह रह गई थी

, जहां हमने उसे नहीं ढूंढा था। और शुक्र है वो हमें कम से कम वहां मिली तो। लेकिन अब बिना किसी वजह के उस स्टोर रूम में जाने का कोई मतलब नहीं है।

"

''हम बिना वजह नहीं जा रहे।

"-डॉली सख्त स्वर में बोली-

''अब हम दो बार स्टोर रूम में जा ही चुके हैं तो तीसरी बार जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। क्या पता हमें वहां कोई काम की चीज मिल ही जाए। कोई ऐसा सुराग

, जो हमें मोहिनी के इस तरह गायब होने के बारे में कुछ बता सके। आखिर रिंकी भी तो हमें इतने रहस्यमयी ढंग से वहीं मिली थी।

''डॉली सही कह रही है।

"-अनुराग ने डॉली की बात पर सहमति व्यक्त की।

डोंगरा ने फिर कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन फिर उसने हथियार डालने वाले अंदाज में होंठ भींच लिए।

''किसी को यहां रिंकी का ध्यान रखने के लिए रूकना होगा।

"-जय उठते हुए बोला

, फिर उसने प्रीति से कहा-

''तुम रिंकी के पास रूक जाओ।

"

प्रीति ने सहमति में सिर हिलाया।

''नहीं।

"-अनुराग बोला-

''तुम अकेली यहां मत रूको। तुम्हारे साथ कोई रहना चाहिए। तुम!

"-वो जय से बोला-

''तुम यहीं प्रीति के साथ रूको। हम सब स्टोर रूम में देख कर आते हैं।

"

''और रिंकी के करीब मत जाना।

"-डॉली बोली-

''अगर जाना पड़े तो किसी चीज का मास्क बनाकर चेहरे को ढंक लेना और उससे थोड़ा दूर ही रहना। उसे भी बता देना कि हमें शक है कि वो पॉजीटिव हो सकती है।

"

''ठीक है।

"-जय बोला।

फिर बाकी सभी लोग वहां से निकलकर स्टोर रूम की ओर बढ़ गए।

स्टोर रूम बहुत बढ़ा था और उसमें बहुत सारा सामान भरा हुआ था। कुछ डिब्बे वगैरह तो इतने भारी थे कि दो लोग मिलकर भी नहीं उठा पा रहे थे। और धूल इतनी ज्यादा थी कि एक चीज हिलाओ तो धूल का गुबार उठ खड़ होता था

, जिससे बचने के लिए सबको बाहर वहां से बाहर निकलना पड़ता था।

''तौबा!

"-डोंगरा हांफता सा बोला-

''यहां तो पता नहीं कौन-कौन सी बीमारी हो जाए आदमी को। और रिंकी उतनी देर यहां पड़ी रही थी।

"

''उससे ज्यादा बड़ा सवाल ये है कि वो बेहोशी की हालत में बंद स्टोर रूम के अंदर कैसे पहुंच गई

? वो भी तब

, तब स्टोर रूम के दरवाजे पर ताला लगा था।

"-डॉली बोली।

कोई कुछ न बोला।

बोलता भी क्या

? उनमें से किसी के पास उस सवाल का जवाब नहीं था।

वे लोग फिर हिम्मत करके स्टोर रूम में घुसे। इस बार सामान के पीछे एक बड़ी सी पेटी में अनुराग को एक बेहद पुरानी लेकिन बड़े आकार की किताब मिल गई।

''देखो

, मुझे क्या मिला।

"-अनुराग बोला।

सबकी नजरें उसकी ओर घूम गईं। उसके हाथ में वो अजीब सी किताब देख कर सभी को आश्चर्य हुआ।

''ये किताब कैसी है

?"-डोंगरा बोला।

''ये तो इसे पढ़कर ही पता चलेगा।

"-अनुराग गहरी सांस लेकर बोला।

''चलो फिर

"-काफी देर से वहां जुते होने के बाद भी अब तक कुछ और कारआमद नहीं ढूंढ पाने के कारण हार मानते हुए राज ने कहा-

''इसे ही देखते हैं। क्या बला है ये

?"

वो सचमुच बला ही थी।

वे सब उस किताब को लेकर

'मीटिंग रूम

' में सिर से सिर जोड़े बैठे थे। किताब का धेला अक्षर उनके पल्ले नहीं पड़ा था। वो किताब पता नहीं किस भाषा में थी लेकिन इतना तो तय था कि वो बहुत बहुत पुरानी थी और भूत-प्रेतों से सम्बन्धित थी क्योंकि उसमें कई जगह पर डरावने चित्र बने हुए थे

, जिनमें से ज्यादातर चित्र लोगों को भयानक ढंग से मारने

, भूत-प्रेत

, शैतानों के और अजीबोगरीब

, रहस्यमयी व डरावनी तंत्र क्रियाओं के चित्र थे।

लेकिन उस किताब में ऐसा भी कुछ था

, जो वे समझ सकते थे।

उसमें अलग से कई तस्वीरें

, अखबारों की कटिंग और हस्तलिखित नोट्स थे

, जिनका वे लोग अध्ययन कर रहे थे।

जैसे-जैसे वे लोग उन नोट्स

, अखबारों की कटिंग वगैरह को पढ़ते जा रहे थे

, उनकी आंखें फैलती जा रहंी थीं।

''तुमने कहा था

"-प्रीति एक अखबार की कटिंग को गौर से देखते हुए डॉली और राज से बोली-

''कि यहां आते समय रास्ते में तुम्हें एक पेट्रोल पम्प मिला था

, जिसके अटेंडेंट ने तुम लोगों से काफी अजीब व्यवहार किया था

?"

''हां

, हमने उससे एक कैन में पेट्रोल भी लिया था, जो अब भी कार में रखा है"-डॉली बोली-

''क्यों

? क्या हुआ

?"

प्रीति कुछ देर तक हाथ में थमी उस कटिंग को देखती रही

, फिर उसने वो कटिंग डॉली की ओर बढ़ा दी।

उसके चेहरे की ओर देखते हुए डॉली ने कटिंग उसके हाथ से ली

, फिर उसे पढऩा शुरू करने ही वाली थी कि उस पर छपी तस्वीरों को देख कर उसकी आंखें फैल गईं।

खबर की हैडिंग थी-

दुर्घटना में पेट्रोल पम्प जलकर स्वाहा

पेट्रोल पम्प अटेंडेंट की भयावह मृत्यु

खबर के साथ तीन तस्वीरें छपीं थीं। एक जले हुए पेट्रोल पम्प की थी

, जो कि वही पेट्रोल पम्प लग रहा था

, जहां से उन लोगों ने आते टाइम रास्ते में पेट्रोल भरवाया था। दूसरी तस्वीर एक बुरी तरह जली हुई लाश की थी और तीसरी...।
 
तीसरी तस्वीर उसी पेट्रोल पम्प अटेंडेंट की थी

, जिससे उन्होंने कार में पेट्रोल भरवाया था।

डॉली ने फटाफट पूरी खबर पढ़ डाली।

20

अगस्त

1982

। शहर की सीमा के निकट के स्थित एक पेट्रोल पम्प में कल रात लगी भीषण आग में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई। मृतक की पहचान पेट्रोल पम्प पर ही अटेंडेंट के रूप में कार्य करने वाले जगवीर सिंह के रूप में हुई है। आग किन परिस्थितियों में लगी

,

ये पता नहीं चल पाया है हालांकि मृतक के साथियों ने पुलिस को दिए गए बयान में बताया है कि जगवीर सिंह ने खुद ही पेट्रोल पम्प को आग लगा कर आत्महत्या की हो सकती है। पुलिस को घटनास्थल से ऐसे कुछ प्रमाण भी मिले हैं। मृतक के साथ काम करने वाले अन्य कर्मचारियों का कहना है कि जगवीर सिंह पिछले कई दिनों से पागलों जैसा बर्ताव कर रहा था। वो अक्सर भूत-प्रेतों की बातें करने लगा था। वो कुछ दिनों पूर्व वहां से थोड़ी दूर स्थित 'मौत का घर' के नाम से जाने जाने वाले एक मकान में गया था

,

जिसे इलाके में अभिशप्त माना जाता है। उसके बाद से ही उसका मानसिक संतुलन बिगड़-सा गया था। वो आए दिन अपने ही साथियों से झगडऩे लगा था और एक साथी पर तो उसने जानलेवा हमला भी किया था। साथियों से लड़ते समय वो पेट्रोल पम्प को जलाने की धमकी भी देता था। हाल की घटना को देखते हुए कहा जा सकता है कि उसने अपनी धमकी को पूरा कर दिखाया। लेकिन उसने स्वयं को भी क्यों जला लिया

,

ये स्पष्ट नहीं हो पाया है। पुलिस को घटनास्थल से कोई सुसाइड नोट वगैरह बरामद नहीं हुआ है

,

जिससे आत्महत्या की पुष्टि हो सके। पुलिस घटना की जांच कर रही है।

''क्या है

?"-राज ने कटिंग लेने के लिए डॉली की ओर हाथ बढ़ाया।

उसे विस्फारित नेत्रों से देखते हुए डॉली ने कटिंग राज की ओर बढ़ा दी। कटिंग पर छपी तस्वीरों पर नजर पड़ते ही डॉली की तरह राज को भी झटका लगा। उसने एक बार डॉली की ओर देखा

, फिर जल्दी-जल्दी पूरी खबर पढ़ डाली।

उसे पढऩे के बाद राज को अपने दिमाग में सन्नाटा छाता-सा महसूस हुआ था।

क्या मतलब था उस खबर का

?

पेट्रोल पम्प पर उस आदमी को उसने और डॉली नेे अपनी आंखों से देखा था। उसने उनकी कार में पेट्रोल भी भरा था।

लेकिन उस खबर के अनुसार तो वो शख्स करीब

38 साल पहले ही मर चुका था।

''क्या ये वही है

?"-प्रीति बोली।

''हां

?"-राज ऐसे चौंका

, जैसे भूल ही गया हो कि उसके अलावा भी वहां कोई और शख्स मौजूद था।

''ये पेट्रोल पम्प अटेंडेंट

, जिसके बारे में छपा है

, क्या ये वही है

, जिससे तुम लोगों ने पेट्रोल भरवाया था

?"

राज उस सवाल का जवाब हां में बिल्कुल नहीं देना चाहता था लेकिन उसका सिर अपने-आप में स्वीकृति के अंदाज में ऊपर-नीचे हुआ।

प्रीति ने डॉली की ओर देखा। उसका गम्भीर चेहरा देखकर वो साफ था कि वो भी राज की बात से सहमत थी।

''दिखाओ मुझे!

"-अनुराग ने छीनने के अंदाज से राज के हाथ से अखबार की कटिंग ले ली और फिर फटाफट पढ़कर उस पुरानी रहस्यमयी किताब की ओर उछालते हुए बोला-

''ये बकवास है।

"

''बकवास है

?"-प्रीति बोली-

''क्या मतलब बकवास है

?"

''और नहीं तो क्या

?"-अनुराग उससे भी ज्यादा तीखे स्वर में बोला-

''तुम लोग कहना क्या चाहते हो

? और साबित क्या करना चाहते हो

?"

''हम लोग कुछ कहना या साबित करना नहीं चाहते।

"-राज शांत स्वर में बोला-

''ये पेट्रोल पम्प अटेंडेंट वही है

, जो हमें रास्ते में मिला था। जिससे हमने अपनी कार में पेट्रोल भरवाया था।

"

''ये तुम इतने दावे से कैसे कह सकते हो

?"-अनुराग उखड़े स्वर में बोला-

''ये बहुत पुराना ब्लैक एंड व्हाइट अखबार है। तस्वीर भी इतनी फीकी है। हो सकता है

, बल्कि हो क्या सकता है यही बात है

, कि तुम लोग जिस आदमी से मिले

, वो इत्तफाक से इस शख्स जैसा दिखता था

, जिसकी सालों पहले उस पम्प पर दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी।

"

वो कटिंग अब जय ने उठा ली थी और उसे पढ़ रहा था। उसके पीछे से डोंगरा भी झांकते हुए पढ़ रहा था।

''और इत्तफाक से वो शख्स पेट्रोल पम्प पर भी काम करता है। और इत्तेफाक से वो शख्स अजीब पागलपन भरी बातें भी करता है।

"-राज बोला।

''ये तो शकल से ही भूत दिख रहा है।

"-जय कटिंग को पढऩे के बाद बोला।

''तुम कहना क्या चाहते हो

?"-अनुराग का स्वर तीखा हो गया-

''कि तुम लोगों ने एक भूत से पेट्रोल भरवाया

?"

राज कुछ नहीं बोला। उसने एक बार डॉली की ओर देखा

, फिर वापस उस किताब से निकली अखबारों की कटिंग्स

, तस्वीरों और अन्य कागजों का पोस्टमार्टम करने में जुट गया।

उन सब चीजों की पड़ताल करते हुए कब सूर्यास्त होने को आया

, उन्हें पता ही नहीं चला।

उन कटिंग्स

, नोट्स वगैरह में उन्होंने जो कुछ भी पढ़ा

, उसने उनकी समस्या को कम करने की जगह बढ़ाने का ही काम किया था।

उन्हें कटिंग्स व नोट्स के अनुसार वो घर उस इलाके में

'मौत का घर

' के नाम से मशहूर था।

वहां के निवासी उस घर की छाया से भी डरते थे। उसका नाम भी जुबान पर लानेे से घबराते थे।

उस मनहूस घर से जुड़े कई भयावह किस्से

, आपबीतियां और पुरानी घटनाएं उन अखबारों की कटिंग्स व नोट्स में दर्ज थीं। और साथ में कई तस्वीरें भी थीं

, जो उनमें से कई बातों की पुष्टि भी करती थीं।

कुछ कटिंग्स व नोट्स में

188090 के दशक में-जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था-वहां एक बेहद क्रूर ब्रिटिश अधिकारी के रहने का जिक्र था

, जिसने वहां के लोगों पर अत्याचारों की सीमाएं पार कर दी थीं। एक कटिंग के अनुसार उस अंग्रेज अधिकारी ने एक बार किसी मामूली बात पर भड़क कर गांव के कई लोगों को मरवा डाला था और उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके उसी मकान के सामने वाले हिस्से में जमीन में दफन करवा दिए थे।

एक हस्तलिखित नोट्स में तो उस नृशंसतापूर्ण घटना का इतना वीभत्स विवरण था कि उसे पढ़कर दिल दहल जाता था।

पूरे आंगन में कटे हुए अंग बिखरे हुए थे। ब्रिटिश अफसर उनके बीच खड़ा हाथ में कुल्हाड़ी लेकर बचे हुए शरीर के टुकड़े काटते हुए किसी पिशाच से कम नहीं लग रहा था। सुबह से उसने इन बेचारे गांव वालों पर अत्याचारों की सीमा पार कर दी थी लेकिन उन्हें तड़पा-तड़पाकर मारने के बाद भी उसके अंदर की हैवानियत को अब तक तृप्ति नहीं मिली थी। वो दरिंदा अब उनकी लाशों के साथ बर्बरता करके शैतान को खुश करने की कोशिश कर रहा था।

इतना ही नहीं

, उसमें कुछ बहुत पुरानी श्वेत-श्याम तस्वीरें भी थीं

, जिसमें उसी घर के आंगन में कुछ अंग्रेज खड़े नजर आ रहे थे और आंगन में लाशें व कटे हुए अंग बिखरे हुए थे। तस्वीर में वो घर नये जैसा तो दिख रहा था लेकिन पहचान में आ रहा था। लेकिन उस घर के सामने के मैदान का जो नजारा था

, वो दिल दहला देने वाला था। कुछ तस्वीरों में तो वो अंग्रेज अधिकारी हाथ की दो उंगलियां से विक्टरी का निशान बनाते हुए कैमरे की ओर मुंह करके मुस्कुरा भी रहा था।

उस खबर में उस अधिकारी का नाम भी था।

रॉबर्ट कीन।
 
हेयर लाइज रॉबर्ट कीन

हू लिव्ड अपॉन ह्यूमन ब्लड

कब्रिस्तान में मिली उस कब्र पर अंकित वो शब्द जैसे किसी हथौड़े की तरह उनके मस्तिष्क से टकराए।

सबने बारी-बारी से उन तस्वीरों को देखा

, उन नोट्स को पढ़ा।

सबकी जबान पर जैसे ताले लग गए थे।

''इसे देख कर तो लग रहा है

"-जय उस तस्वीर को देखते हुए बोला

, जिसमें वो अंग्रेज अफसर कैमरे की ओर देखते हुए मुस्कुरा रहा था-

''कि सेल्फी का आविष्कार इसी बंदे ने किया होगा।

"

किसी को हंसी नहीं आई।

''ये...ये कैसे हो सकता है

?"-प्रीति बोली-

''कोई इतना क्रूर

, इतना बेरहम कैसे हो सकता है

?"

''इससे भी ज्यादा क्रूर और बेरहम हुए हैं दुनिया मेें।

"-राज

गम्भीर स्वर में बोला।

''ओ माई गॉड!

"-एक कटिंग को देखते हुए जय के मुंह से निकला।

''क्या हुआ

?"-अनुराग ने चौंक कर वो कटिंग उसके हाथ से ले ली।

वो कटिंग भी उसी खबर की लेकिन शायद दूसरे अखबार की थी। उस खबर के अनुसार उस अंग्रेज अधिकारी ने वहां उस रक्तपात भरी भयावह घटना को अंजाम देने के बाद एक बड़े ताबूत में वो उन लोगों के टुकड़े भरवा दिए थे लेकिन टुकड़े इतने सारे थे कि आधे से भी कम में पूरा ताबूत भर गया था।

फिर उस अंग्रेज अधिकारी ने बाकी टुकड़ों को तो वहीं घर के सामने की जमीन में दफना दिया था लेकिन कटे हुए अंगों से भरे उस ताबूत का क्या हुआ

, ये आज तक किसी को पता नहीं चल पाया था।

उस तस्वीर में वो ताबूत भी दिख रहा था।

वो बिल्कुल वैसा ही ताबूत था

, जैसा वहां पहले दिन उन्होंने उसी कमरे में देखा था।

जिससे खुद को

'कॉफिन मैन

' बताने वाला वो रहस्यमयी शख्स निकला था। उसी ने उनसे वो ताबूत उठवाकर बाहर उस केबिन में रखवाया था।

तभी प्रीति की चीख सुनकर सब चौंक उठे।

प्रीति खुले दरवाजे से बाहर मैदान में कुछ देखकर चीखी थी।

''क्या हुआ

?"-जय बोला

, फिर तुरंत ही उसकी नजर सामने मैदान पर पड़ी तो उसे अपने सवाल का जवाब भी मिल गया।

दरवाजे से थोड़ी ही दूरी पर आंगन में बीचों-बीच ताबूत रखा हुआ था।

वही ताबूत

, जो उन्होंने वहां आने के पहले दिन देखा था।

जिसे वे लोग बड़ी मुश्किल से उठाकर उस केबिन में रख पाए थे।

वो ताबूत इस वक्त दरवाजे की सीध में थोड़ी दूरी पर जमीन पर रखा था।

वे सब लोग कमरे से बाहर निकल आए। हर कोई उस ताबूत को देखकर हैरान था।

''ये यहां कैसे आया

?"-अनुराग हैरानी से बोला।

''क्या पता

?"-राज का स्वर गम्भीर था।

''ऐसा कैसे हो सकता है

?"-जय बुदबुदाया।

''कैसा कैसे हो सकता है

?"-अनुराग तीखे स्वर में बोला।

''ये ताबूत तो बहुत भारी था। हम तीनों इसे उठा भी नहीं पा रहे थे। फिर...फिर ऐसा कैसे हो गया कि कोई चुपचाप इसे यहां लाकर चलता बना और हमें भनक तक नहीं लग सकी।

"

उस सवाल का जवाब उनमें से किसी के पास नहीं था।

''इन साले कंपनी वालों का ड्रामा अब कुछ ज्यादा ही हो रहा है।

"-कहते हुए अनुराग सीढिय़ों से उतरकर ताबूत की ओर बढ़ा।

''अनुराग!

"-जय ने उसे रोकने की कोशिश की लेकिन अनुराग ने उसका हाथ झटक दिया।

''आओ मेरे साथ।

"-अनुराग बोला-

''अब हम इन सालों को अपना ड्रामा दिखाते हैं।

"

अनुराग जाकर ताबूत के बगल में खड़ा हो गया। उसने एक बार चारों ओर सावधान नजरों से देखा

, फिर गौर से ताबूत का निरीक्षण किया।

जय और राज भी सीढिय़ां उतरकर उसके पास आकर खड़े हो गए।

सबकी नजरें ताबूत के ढक्कन पर चिपकी हुईं थीं।

जिस पर खून की कुछ ताजा बूंदें चमक रहीं थीं।

''ये खून कैसा है

?"-जय बोला।

कोई कुछ नहीं बोला। राज ने आसपास की जमीन पर नजरें दौड़ाईं

, फिर परेशान से स्वर में बोला-

''किसी तरह के कदमों के निशान भी नहीं दिख रहे हैं।

"

''मतलब

?"-अनुराग की भंवें उठीं।

''मतलब...अगर पैरों के निशान नहीं हैं तो इसे यहां लाया कौन

?"

अनुराग और जय ने एक-दूसरे की ओर देखा। दोनों में से कोई कुछ नहीं कह सका।

फिर अचानक अनुराग ताबूत के ऊपर झुका।

''ये क्या कर रहे हो

?"-जय ने उसे टोका।

''इसे खोल कर देख रहा हूं।

"-अनुराग बोला।

''खोलकर

?"-प्रीति भयभीत स्वर में बोली-

''लेकिन क्यों

? इसे खोलने की क्या जरूरत है

?"

''कोई इसे इस तरह यहां लाकर छोड़ गया है और तुम लोग चाहते हो कि मैं झांक कर देखूं भी न कि इसके अंदर साला है क्या

?"-अनुराग का स्वर तीखा हो गया।

कोई कुछ नहीं बोला। अनुराग ने ताबूत के ढक्कन को साइड से पकड़ा और एक झटके से खोल दिया।

ढक्कन खुलते ही वहां उपस्थित हर शख्स का चेहरा सफेद पड़ गया।

सब मीटिंग रूम में सिर पकड़कर बैठे हुए थे।

बाहर वो ताबूत अब भी पड़ा था।

अनुराग ने ताबूत का ढक्कन वापस बंद कर दिया था क्योंकि उसमें जो था

, उसे दोबारा देखने की ताब उनमें से किसी में भी नहीं थी।

उस ताबूत में इंसानों के कटे हुए अंग भरे हुए थे।

हाथ

, पैर

, सिर

, धड़...।

उनमें से किसी ने भी अपनी सारी जिंदगी में भी इतना भयानक दृश्य नहीं देखा था।

''अब क्या करें

?"-प्रीति के मुंह से निकला।

''क्या

?"-अनुराग ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा।

''अब हमें क्या करना चाहिए

?"

''सही सवाल।

"-अनुराग अचानक उठ खड़ा हुआ और जमीन रौंदता हुआ अंदर की ओर बढ़ गया।

राज और जय उठे और उसके पीछे-पीछे अंदर की ओर बढ़ गए।

अनुराग किचन में पहुंचा और कुछ ढूंढने लगा।

''क्या ढूंढ रहे हो

?"-जय बोला लेकिन अनुराग ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। किचन में कुछ देर ढूंढने के बाद वो पलटा और वापस गलियारे से निकलकर दूसरे कमरे में पहुंचा और वहां भी तलाश करता रहा। वो जो ढूंढ रहा था

, वो उसे वहां भी नहीं मिला। फिर वो सीढिय़ों से ऊपर चढ़ गया।

''बताओगे

?"-उसके पीछे-पीछे सीढिय़ां चढ़ते हुए जय तेज स्वर में बोला-

''आखिर तुम ढूंढ क्या रहे हो

?"

अनुराग सीढिय़ों पर ही थमककर खड़ा हो गया।

उसके एकदम से रूक जाने के कारण उसके पीछे आ रहे राज और जय को भी सीढिय़ों पर ही रूक जाना पड़ा।

''पेट्रोल।

"-अनुराग ने घूमकर उनकी ओर देखा और तीव्र स्वर में बोला-

''जिससे मैं इस मनहूस ताबूत को आग के हवाले कर सकूं।

"

कहकर अनुराग फिर पलटा और धड़धड़ाते हुए ऊपर पहुंच गया।

जय और राज ने एक-दूसरे की ओर देखा

, फिर वे दोनों भी लपकते हुए उसके पीछे-पीछे ही ऊपर पहुंचे।

ऊपर अनुराग उस कमरे में पहुंचा

, जिसमें वो और डोंगरा ठहरे हुए थे। उसने वहां रखी पेट्रोल की कैन उठाई और बाहर निकला।

तभी नीचे से चीख की आवाज सुनाई दी।

वे तीनों बिजली की तेजी से सीढिय़ों की ओर लपके।

जिस वक्त अनुराग ताबूत को जलााने के लिए पेट्रोल वगैरह की तलाश में अंदर गया था

, उस वक्त डॉली घर के बाहर निकल आई। जय और

राज

अनुराग के पीछे गए थे जबकि डॉली के पीछे प्रीति थी।

डॉली ताबूत के पास पहुंची।

''ये तुम क्या कर रही हो

?"-प्रीति भयभीत स्वर में बोली-

''उसके...उसके पास क्यों जा रही हो

?"

डॉली ने प्रीति की बात का जवाब नहीं दिया। वो ताबूत के पास पहुंची और उसने उसका ढक्कन खोला।

ताबूत खाली था।

प्रीति हक्की-बक्की सी कभी खाली ताबूत को तो कभी डॉली को देख रही थी।

''ये...ये कैसे हो सकता है

?"-प्रीति बोली-

''अभी तो इसमें...इसमें...कटे हुए अंग भरे हुए थे। ये एकदम से खाली कैसे हो गया

?"

''चलो।

"-डॉली पलटी और वापस घर की ओर बढ़ गई। प्रीति उसके पीछे थी। वो दोनों घर के दरवाजे के पास पहुंचे ही थे कि प्रीति ने अचानक पलटकर पीछे देखा।

ताबूत अपनी जगह पर नहीं था।

प्रीति के मुंह से चीख निकल गई।

''क्या हुआ

?"-डॉली चौंक कर दरवाजे के पास ही थमककर खड़ी हो गई। प्रीति को पीछे देखते पाकर उसने भी पलटकर देखा। ताबूत को अपनी जगह पर नहीं पाकर वो भी अपनी स्तम्भित सी हो गई।
 
तभी धड़धड़ाते कदमों की आवाज आई और अनुराग

, जय और राज वहां पहुंचे। डोंगरा भी उनके पीछे था।

''क्या हुआ

?"-अनुराग बोला-

''कौन चीखा था

?"

किसी ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। सबकी नजरें घर के सामने उस जगह पर थीं

, जहां थोड़ी देर पहले ताबूत रखा था लेकिन अब वो जगह खाली थी।

''वो ताबूत कहां गया

?"-ताबूत को वहां न पाकर अनुराग भी हक्का-बक्का रह गया।

''वो...वो अभी यहां था।

"-प्रीति कांपते स्वर में बोली-

''और...और अचानक गायब हो गया।

"

डॉली ने अनुराग के हाथ में थमी पेट्रोल की कैन की ओर देखा।

अनुराग के हाथ कैन के हैण्डल पर कस गए। वो थोड़ी दूर बने उस केबिन की ओर बढ़ गया

, जहां उन लोगों ने उस ताबूत को रखा था।

''तुम क्या कर रहे हो

?"-जय उसके पीछे लपका।

''अब इस पेट्रोल को लेकर आया हूं

"-अनुराग बोला-

''तो इसका कुछ न कुछ इस्तेमाल तो करूंगा ही।

"

वो उस केबिन के पास पहुंचा। फिर उसने केबिन के दरवाजे पर जोर से लात मारी। दरवाजा भड़ाक से खुल गया। अनुराग ने धड़धड़ाते हुए अंदर प्रवेश किया। अंदर वही थोड़ा-बहुत पुराना कबाड़ सामान पड़ा था लेकिन ताबूत का नाम तक नहीं था।

ताबूत को वहां भी नहीं देख कर अनुराग को अपना दिमाग घूमता महसूस हुआ। उसे ये पता नहीं था कि प्रीति की नजरों के सामने चंद सेकेंडों में ही वो ताबूत गायब हो गया था। वो तो यही समझ रहा था कि उनके ऊपर जाने से लेकर नीचे आने तक के दौरान किसी ने ताबूत को वहां से हटाकर कहीं छिपा दिया था। और सबसे पास में उसे वो केबिन ही छिपाने की एक जगह दिख रही थी

, जिससे उसे ताबूत के वहां होने की पूरी उम्मीद थी।

उस ताबूत पर पेट्रोल छिड़ककर उसे भस्म करने की अनुराग की मनोकामना पूरी नहीं हो सकी।

फिर अनुराग ने कैन का ढक्कन खोला और केबिन में ही पेट्रोल छिड़कना शुरू कर दिया।

''ये तुम क्या कर रहे हो...

?"-जय ने विरोध जताने की कोशिश की।

अनुराग ने चेतावनीपूर्ण ढंग से जय की ओर देखा। उसकी आंखों के भाव देखकर जय ने चुप रहने में ही भलाई समझी। पूरा डिब्बा खाली करने के बाद अनुराग बाहर निकला

, जय भी उसके पीछे जल्दी से केबिन से बाहर निकल आया।

सब लोग केबिन के बाहर ही इकट्ठे

हो गए थे।

वातावरण में पेट्रोल की तीव्र महक फैली हुई थी।

अनुराग ने जेब से सिगरेट का पैकेट और माचिस निकाली। पैकेट में से एक सिगरेट निकालकर होंठों से लगाई

, माचिस की तीली सुलगाई

, उसे हवा से बुझने से बचाने की कोशिश करते हुए दोनों हथेलियों को गोल करके जलती हुई तीली की लपट को ढंककर पहले सिगरेट सुलगाई

, फिर तीली को केबिन के अंदर की ओर उछाल दिया।

अगले ही क्षण केबिन भक्क की तेज आवाज के साथ आग की लपटों में घिर गया।

रात हो चुकी थी।

रिंकी पूरे दिन में एक बार भी नीचे नहीं आई थी। उसे कल से बुखार था। मोहिनी गायब थी। ऐसे में वे लोग वहां से जाने की सोच भी नहीं सकते थे। वैसे भी वहां से जाने का एकमात्र रास्ता था

, जिससे वहां से निकलना भी आसान नहीं था।

वो सब लोग

'मीटिंग रूम

' में बैठे थे।

सिवाय डोंगरा और रिंकी के। डोंगरा ऊपर रिंकी को देखने गया था।

ताबूत वाली घटना ने सबको हिलाकर रख दिया था।

वे लोग जब से वहां आए थे

, उनके साथ लगातार अजीब घटनाएं हो रहीं थीं।

पहले रिंकी का गायब होना

, फिर रहस्यमयी ढंग से स्टोर में मिलना

, स्टोर रूम में मिली वो अजीबोगरीब किताब और उसमें मिली तस्वीरें

, कागज और अखबारों की कटिंग

, फिर सामने वाले केबिन से ताबूत का गायब होना

, फिर मोहिनी का गायब होना

, फिर ताबूत का अचानक वापस आ जाना

, उसमें कटे हुए अंगों का दिखना

, डॉली और प्रीति के अनुसार फिर उन अंगों का गायब हो जाना

, फिर ताबूत का ही गायब हो जाना...।

कुछ भी तो ऐसा नहीं था

, जिसे एक्सप्लेन किया जा सकता था।

तभी सीढिय़ों पर आहट सुनाई दी। डोंगरा ऊपर रिंकी को देखने गया था। वो वापस लौट आया था।

डोंगरा भी कमरे में आकर एक कुर्सी पर धप्प से बैठ गया।

''रिंकी कैसी है

?"-डॉली बोली।

''सो रही है।

"-डोंगरा गहरी सांस लेकर बोला-

''दीन-दुनिया से बेखबर।

"

''हमसे तो वही अच्छी है।

"-प्रीति बोली-

''कम से कम उसने वो ताबूत वाला काण्ड तो नहीं देखा।

"

''ताबूत से

"-अनुराग बोला-

''कटे हुए अंग कैसे गायब हो सकते हैं

?"

''वैसे ही

"-प्रीति बोली-जैसे वो पूरा-का-पूरा ताबूत गायब हो गया था। वो भी पलक झपकते ही। हमने मुश्किल से आधे मिनट के लिए उस ताबूत की ओर पीठ की थी

, फिर पलटकर देखा तो वहां कुछ नहीं था।

"

''मोहिनी का भी अब तक कोई पता नहीं चल पाया है।

"-डॉली चिंतित भाव से बोली।

''यहां हुई जिस घटना के बारे में हमने पढ़ा था

"-जय बोला-

''उसके मुताबिक भी उस...उस अंग्रेज ने गांव वालों के टुकड़े-टुकड़े करके उसी ताबूत में भर दिये थे...।

"

''तुम कहना क्या चाहते हो

?"-अनुराग सख्त स्वर में बोला।

''और उस समय हमें ताबूत में वैसे ही टुकड़े दिखाई दिए थे। फिर उन टुकड़ों का रहस्यमयी ढंग से गायब हो जाना

, फिर ताबूत का भी गायब हो जाना...।

"

''मैंने उस मनहूस केबिन को जला दिया है।

"-अनुराग धीमे से बड़बड़ाया

, जैसे अपने-आप से बोल रहा हो।

''क्या उसे जला भर देने से हमारी समस्याएं खत्म हो जाएंगीं

? क्या मोहिनी का पता चल जाएगा

? ये सब...ये जो कुछ भी हो रहा है

, रूक जाएगा

?"-प्रीति बोली।

''नहीं!

"-अचानक अनुराग चीख उठा-

''नहीं रूकेगा। लेकिन जो भी हमारे साथ ये खिलवाड़ कर रहा है

, मैं उसका यही हश्र करूंगा।

"-कहकर वो उठ खड़ा हुआ और आगे बढ़कर कमरे के बीचों-बीच आ गया-

''सुना तुमने!

"-अनुराग कमरे की छत की ओर मुंह करके चीखा-

''तुम जो भी हो

, भूत-प्रेत या कुछ भी

, मैं तुमसे नहीं डरता। मैं किसी से नहीं डरता। जैसे मैंने उस केबिन को जला दिया। ऐसे ही अब तुम्हें भी जलाकर खाक कर दूंगा। इस पूरे मनहूस मकान को जलाकर खाक कर दूंगा। मिट्टी में मिला दूंगा मैं इस मनहूस जगह को। तुममे हिम्मत है तो सामने आओ। रोक लो मुझे। कब तक इस तरह छिप-छिप कर हमारे साथ खेलते रहोगे

? बोलो

? है हिम्मत

?"

कमरे में उपस्थित प्रत्येक शख्स हैरानी से अनुराग को देखता रह गया। अनुराग ऐसे चिल्ला रहा था

, जैसे अपने होश खो बैठा हो।

''अगर मुझे पता होता तो मैं इस मकान को पहले ही जलाकर राख में बदल देता। लेकिन अब भी देर नहीं हुई है। मैं ये किस्सा हमेशा-हमेशा के लिये खत्म करके ही यहां से जाऊंगा। बस

, एक बार मोहिनी मिल जाये....।

"

अचानक अनुराग की आवाज को ब्रेक लग गए।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

सबकी नजरें अनुराग के चेहरे पर थीं।

अनुराग की आंखें फैली हुईं थीं।

''क्या हुआ

, अनु....

?"-प्रीति ने बोलने की कोशिश की लेकिन अनुराग ने होंठों पर उंगली रखकर उसे चुप रहने का इशारा किया-

''श्श्श।

"-वो फुसफुसाता सा बोला। ऐसा लग रहा था

, जैसे वो कुछ सुनने की कोशिश कर रहा हो।

उन लोगों ने भी ध्यान से सुनने की कोशिश की तो उन्हें अजीब-सी आवाज आती हुई सुनाई दी।

वो आवाज ऊपर कहीं से आ रही थी।

छत की ओर से!

सबकी नजरें छत की ओर उठ गईं।

लेकिन छत पर तो सिर्फ रिंकी थी।

और वो अपने कमरे में बेहोश जैसी सोई हुई थी। अभी थोड़ी ही देर पहले डोंगरा उसे देखकर आया था।

वो आवाज ऐसी थी

, जैसे ऊपर गलियारे में किसी को घसीटा जा रहा हो।

फिर सीढिय़ों से किसी के उतरने की आवाज सुनाई दी।

पैरों की आहट के साथ ही कुछ भारी चीज को सीढिय़ों पर घसीटे जाने की आवाज भी सुनाई दे रही थी।

और वो पैरों की आहट भी सामान्य नहीं थी।

जैसे कोई आदमी रूक-रूक कर एक-एक कदम रख रहा हो।

सबने एक-दूसरे की ओर देखा।

ऊपर तो सिर्फ रिंकी थी।

आहट सबसे निचली सीढिय़ों तक आ पहुंची थी। सबकी नजरें उस खुले दरवाजे पर जम गईं

, जिसके बगल से होकर सीढिय़ां ऊपर जाती थीं।

सीढिय़ों पर कुछ आहट सुनाई दी।

सबकी नजरें दरवाजे की ओर उठ गईं

, जिधर सीढिय़ां थीं।
 
दरवाजा

'चींईंईंईं....

' की चरमराती आवाज के साथ खुल गया।

दरवाजे के उस पार रिंकी खड़ी दिखाई दी। उसकी आंखें चढ़ी हुईं लग रहीं थीं

, जैसे उसने पता नहीं कितना तगड़ा नशा कर रखा हो।

''रिंकी!

"-उसे देखकर डोंगरा अपनी जगह से उठकर खड़ा हो गया।

रिंकी ने उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। वो आगे बढ़ी। एक हाथ से वो कोई चीज घसीट रही थी। जब वो कमरे के अंदर आ गई

, तब सबने देखा कि वो चीज क्या थी।

उनकी आंखें फैल गईं।

वो सफेद चादर की एक पोटली थी

, जिस पर खून के लाल-लाल बड़े-बड़े धब्बे लगे हुए थेे।

इतना ही नहीं

, पोटली के ऊपर बंधे वाले हिस्से में खुली जगह से एक जनाना हाथ भी बाहर निकला हुआ था।

वो भयानक दृश्य देखकर कमरे में उपस्थित हर शख्स के शरीर के रोंगटे खड़े हो गए।

और रिंकी का दूसरा हाथ...।

उसमें सब्जी काटने वाला चाकू था।

खून से तर-बतर।

सिर्फ चाकू ही नहीं

, रिंकी का वो पूरा हाथ ही खून से सराबोर था

, जिसमें उसने चाकू थाम रखा था और उससे खून की बूंदें टपकती आ रहीं थीं।

कमरे में उपस्थित हर शख्स जैसे अपनी जगह पर पत्थर की मूर्ति बन गया था।

फिर जय ने राज की ओर देखा

, दोनों में आंखों ही आंखों में कुछ बात हुई

, फिर दोनों सावधानी के साथ रिंकी की ओर बढ़े।

''जय!

"-प्रीति ने जय का हाथ पकड़कर उसे रोकने की कोशिश की लेकिन जय ने अपना हाथ छुड़ा लिया।

फिर अगले कुछ ही क्षणों में कई चीजें एक साथ हुईं।

राज और जय ने झपटकर रिंकी को पकड़ लिया। अनुज ने रिंकी के चाकू वाले हाथ को पकड़ लिया और उससे चाकू छीनने की कोशिश करने लगा। रिंकी के हाथ से चादर के सिरे छूट गए

, जिससे उसने चादर को मोड़ कर पोटली की तरह पकड़ा हुआ था

, जिससे चादर खुल गई और उसमें से किसी लड़की के शरीर के कटे हुए टुकड़े फर्श पर इधर-उधर बिखर गए। लड़की का सिर गेंद की तरह लुढ़कता हुआ प्रीति के पास आकर रूक गया। प्रीति ने फटी-फटी आंखों से उस सिर को देखा

, फिर गला फाड़कर चीख उठी।

वो मोहिनी का सिर था।

''डैम इट!

"-राज रिंकी के हाथ से चाकू छीनने की कोशिश कर रहा था लेकिन रिंकी की उंगलियां जैसे लोहे के शिकंजे की तरह चाकू पर कसी हुईं थीं-

''चाकू मुझे दो रिंकी...।

"

रिंकी की दूसरी बांह जय ने पकड़ रखी थी लेकिन उसके नजरें नीचे चादर की खुल चुकी पोटली पर थीं। वो भी फटी-फटी आंखों से उससे बिखरे मोहिनी के शरीर के कटे हुए टुकड़ों को देख रहा था।

तभी उसे कुछ अजीब-सा अहसास हुआ।

उसने गर्दन घुमाकर रिंकी की ओर देखा।

वो एकटक उसी की ओर देख रही थी। उसके चेहरे पर एक बेहद डरावनी मुस्कान थीं। और उसकी आंखें...।

जय को अपनी रीढ़ की हड्डी में ठण्डक की तीव्र लहर दौड़ती अनुभव हुई।

...उसकी आंखों की काली पुतलियों के गिर्द सुनहरे छल्ले चमक रहे थे और आंखों की पुतलियां सामान्य से काफी बड़े आकार की लग रहीं थीं। ऐसा लग रहा था

, जैसे वो उसकी आंखों से बाहर निकली जा रहीं हों।

जय की ओर देखते हुए रिंकी के गले से एक खून जमा देने वाली हंसी निकली और उसने एक हाथ से जय को धक्का दिया। धक्का इतना शक्तिशाली था कि जय के पैर जमीन से उखड़ गए और वो सीधे दीवार से जा टकराया।

जय का वो हश्र देख कर राज ने रिंकी के हाथ से चाकू छीनने की कोशिश तेज कर दी लेकिन तुरंत ही उसे इस बात का अहसा हो गया कि वो कोशिश फिजूल थी। उस वक्त तो अगर उसके पास क्रेन भी होती तो वो उससे भी उस चाकू को रिंकी की पकड़ से आजाद नहीं करवा सकता था।

रिंकी की गर्दन राज की ओर घूम गई।

उसकी सुनहरे छल्लों वाली आंखें देख कर राज को भी अपनी रगों में बह रहा खून जमता सा महसूस हुआ।

रिंकी ने दूसरे हाथ से राज की गर्दन पकड़ ली और उसे एक झटके से जमीन से ऊपर उठा दिया।

रिंकी का कद राज से कम था

, जिसके चलते वो एक अविश्वसनीय-सा दृश्य था। राज के पैर फर्श से ऊपर उठ गए थे। उसे अपना दम घुटता हुआ महसूस हो रहा था। उसे लग रहा था

, जैसे उसकी गर्दन किसी लोहे के शिकंजे में फंसी हो। वो रिंकी की पकड़ से खुद को आजाद कराने की भरसक कोशिश कर रहा था।

डॉली राज को बचाने के लिए लपकी लेकिन उससे पहले अनुराग उस तक पहुंच गया। अनुराग किसी सांड की तरह दौड़ते हुए रिंकी से जा टकराया

, जिससे रिंकी के कदम जमीन से उखड़ गए। वो फर्श पर जा गिरी। अनुराग उसके ऊपर था। राज रिंकी की पकड़ से आजाद होकर वहीं पर गिर गया।

''राज!

"-डॉली उसे सहारा देने की कोशिश करते हुए बोली-

''तुम...तुम ठीक तो हो न

?"

राज एक हाथ से अपना गला मसल रहा था लेकिन उसकी नजरें रिंकी पर थीं। उन सबमें सबसे हट्टे-कट्टे होने के बावजूद अनुराग रिंकी पर काबू पाने के लिए उससे जूझ रहा था और अभी-अभी रिंकी ने जय और राज की जो हालत की थी

, उसे देखते हुए

राज

को यकीन था कि वो अकेला उस पर काबू नहीं पा सकता था।

राज फुर्ती से उनके पास पहुंचा और रिंकी को पकडऩे में अनुराग की मदद करने लगा।

राज के भी आ जाने पर अनुराग को थोड़ी राहत मिली। उसने रिंकी का एक हाथ पकड़कर मजबूती से फर्श पर टिका दिया जबकि उसका दूसरा हाथ राज ने पकड़कर वैसे ही फर्श पर टिका दिया। इसके बावजूद रिंकी उनके नीचे पानी से निकालकर बाहर फेंक दी गई मछली की तरह फडफ़ड़ा रही थी और जोरों से पैर पटक रही थी

, जिससे लग रहा था कि वे लोग उसे ज्यादा देर तक नहीं रोक पाएंगें।

तभी जय भी वहां आ गया और वो भी रिंकी को काबू करने में उन तीनों की मदद करने लगा।

सेकेंडों में कमरे में नर्क का दृश्य साकार हो चुका था।

जमीन पर यहां-वहां मोहिनी के शरीर के कटे हुए टुकड़े बिखरे पड़े थे। जय

, अनुराग और राज तीनों रिंकी के ऊपर सवार जैसे थे लेकिन इसके बाद भी वो अपने शरीर को भयानक ढंग से झटके दे रही थी। और वो झटके भी इतने शक्तिशाली थे कि उन तीनों को उसे संभालना बेहद मुश्किल लग रहा था।

फिर रिंकी ने अपने शरीर को झटके देना बंद कर दिया। वो अपने सिर को बड़े अजीब ढंग से इधर-उधर मोडऩे लगी। उसकी आंखों से ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वो उनमें से किसी की ओर देख रही हो। वो तो जैसे कहीं और ही देख रही थी।

''इसकी आंखें!

"-अनुराग दहशत भरे स्वर में बोला-

''इसकी आंखों को क्या हो गया है

?"

दोनों में से कोई भी उसके सवाल का जवाब नहीं दे सका।

''डॉली!

"-राज ने सहायता के लिए डॉली को आवाज लगानी चाही लेकिन डॉली कहीं दिखाई नहीं दी।

अब ये डॉली कहां चली गई

?

''डॉली!

"-राज गला फाड़ कर चिल्लाया।

तभी डॉली उसी दरवाजे पर प्रकट हुई

, जिससे अभी थोड़ी देर पहले रिंकी आई थी। डॉली के हाथ में एक लम्बी

, मोटी रस्सी थी। वो जल्दी से रस्सी लेकर उनके पास पहुंची। फिर उन चारों ने उस रस्सी से रिंकी के हाथ-पैरों को मजबूती से बांध दिया।

रिंकी अब उनकी पकड़ से आजाद होने की कोशिश नहीं कर रही थी। वो तो जैसे कहीं ओर ही देख रही थी। बीच-बीच में वो अजीब ढंग से हंसती जा रही थी।

''ये...ये इसे हो क्या हो गया है

?"-प्रीति खौफ भरे स्वर में बोली।

''मत पूछो।

"-राज के दांत भिंचे हुए थे।

''अब क्या करें

?"-उसे अच्छी तरह बांधने के बाद जय बोला।

''इसे ऊपर ले चलते हैं।

"-राज बोला-

''वहां किसी कमरे में बंद कर देंगें।

"

''और ये बाहर आ गई तो

?"-अनुराग बोला।

''तब की तब देखी जाएगी। अभी तो इसे कैद करना बहुत जरूरी है।

"

''तुम लोग रिंकी को कैद कर रहे हो।

"-डोंगरा घबराए हुए स्वर में बोला-

''लेकिन...लेकिन इसने किया क्या है

?"

सबकी नजरें डोंगरा की ओर घूम गईं। उन्हें इस तरह अपनी ओर आते देख डोंगरा सकपका गया।

''ये!

"-प्रीति ने फर्श पर पड़े मोहिनी के टुकड़ों की ओर इशारा किया और चीख उठी-

''ये किया है इसने। तेरी आंखें हैं या बटन

?"

डोंगरा के मुंह से बोल नहीं फूटा।

जय

, अनुराग और राज तीनों ने मिलकर बंधी हुई रिंकी को उठाया और सीढिय़ां चढ़कर ऊपर वाली मंजिल पर पहुंचे। वहां उन्होंने अंदर जाकर रिंकी को एक पलंग पर लिटा दिया। वो अब कोई विरोध नहीं कर रही थी। बस अपनी गर्दन अजीब ढंग से घुमा रही थी। उसकी आंखों से ऐसा लग रहा था

, जैसे वो वहां न होकर कहीं दूर देख रही हो।

''क्या लगता है

?"-जय बोला-

''ये यहां कैद रहेगी

?"

''क्या मतलब

?"-अनुराग ने उसकी ओर देखा।

''जिस तरह इसने मुझे दूर फेंक दिया था

, उससे तो मुझे लगता है कि ये रस्सी को भी तोड़ सकती है।

"

''तो

? तो क्या करें

?"

जय ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने थूक गटक कर अपना गला तर किया।

''चलो यहां से।

"-राज

की नजरें रिंकी के चेहरे पर जमी हुईं थीं-

''इसके पास ज्यादा देर रहना ठीक नहीं है।

"

''लेकिन इसे...इसे हुआ क्या है

?"-जय की आवाज में दहशत झलक रही थी।

''इस बारे में हम बाहर चलकर बात करेंगें।

"-राज का स्वर तीव्र हो उठा-

''मैंने कहा न यहां से चलो।

"
 
अचानक रिंकी ने अपने सिर को अजीब ढंग से इधर-उधर घुमाना बंद कर दिया। फिर वो राज की ओर देख कर भयानक ढंग से मुस्कुराई , जैसे उसने राज की बात सुन ली हो।

''चलो। "राज ने जय और अनुराग की एक-एक बांह पकड़ी और दरवाजे की ओर बढ़ गया।

''अनुज।"-तभी पीछे से रिंकी ने आवाज लगाई।

तीनों दरवाजे के पास थमककर खड़े हो गए। उन्होंने घूम कर रिंकी की ओर देखा।

वो अब बिस्तर पर लेटी नहीं थी। वो उठ बैठी थी। और उन्हीं की ओर देख रही थी।

''तुममे से कोई जिंदा नहीं बचेगा।"-रिंकी की आवाज कमरे में गूंजी। उसकी आवाज पहले से भारी थी और रिंकी की आवाज न होकर किसी और की ही आवाज लग रही थी।

फिर वो जोर से हंसी।

उसकी हंसी भी बेहद भयानक थी।

तीनों एक झटके से पलटे और कमरे से बाहर निकल गए।

कमरे के बाहर डॉली, प्रीति और डोंगरा खड़े थे। बाहर निकलते ही राज ने सबसे पहला काम दरवाजे को बंद करने का किया।

''ये...ये सब क्या था?"-प्रीति चीख पड़ी।

कोई कुछ नहीं बोला।

जवाब शायद किसी के पास नहीं था।

या जो जवाब था, उसे कहने की हिम्मत किसी के पास नहीं थी।

''रिंकी ऐसा कैसे कर सकती है?"-डोंगरा घबराए से स्वर में बोला-''मैं...मैं उसे अच्छी तरह से जानता हूं। वो तो एक चींटी तक नहीं मार सकती।"

राज ने डोंगरा को ऐसे घूरकर देखा कि वो सहमकर चुप हो गया।

कुछ देर तक वहां सन्नाटा छाया रहा।

''हमें इस जगह को तुरंत छोड़ देना चाहिए।

"-फिर गलियारे में राज की आवाज गूंजी।

''क...क...क्या?"-डोंगरा के मुंह से लडख़ड़ाती सी आवाज निकली।

''हां।"-डॉली ने सहमति में सिर हिलाया-

''यहां रूकना अब खतरे से खाली नहीं है।"

''लेकिन जायेंगें कैसे?"-अनुराग बोला।

''हमें कोई न कोई रास्ता ढूंढना ही होगा।"-राज बोला।

तभी प्रीति की आवाज ने सबका ध्यान आकर्षित किया।

प्रीति उनसे थोड़ी दूरी पर दीवार से टिकी दोनों हाथों में चेहरा छिपाए रो रही थी।

उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखा , फिर जय धीरे से प्रीति की ओर बढ़ा।

प्रीति के सिसकने की आवाज कमरे में गूंज रही थी।

''प्रीति।"-उसके पास पहुंचकर जय उसकी ओर हाथ बढ़ाते हुए धीमे स्वर में बोला।

''उसने मोहिनी को मार दिया।"-प्रीति अचानक चेहरे पर से हाथ हटाकर चीख पड़ी। जय ने सहमकर हाथ पीछे खींच लिया लेकिन फिर ये देखकर उसने राहत की सांस ली कि प्रीति का चेहरा आंसुओं में भीगा हुआ था।

जय ही नहीं, वहां मौजूद बाकी चारों के चेहरे पर भी तनाव की रेखाएं स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहीं थीं।

''हिम्मत रखो, प्रीति...।"-जय ने उसे हिम्मत बंधाने की कोशिश की।

''क्या हिम्मत रखूं?"-प्रीति फिर चीख पड़ी-''यहां क्या हो रहा है? रिंकी ऐसी कैसे बन गई? क्या हुआ है उसे?"-फिर वो बोलते-बोलते अचानक रूक गई

, उसने राज की ओर देखा

, फिर अपने चेहरे से आंसू पोंछते हुए धड़धड़ाते हुए राज की ओर ऐसे बढ़ी

, जैसे उसे कुचलते हुए निकल जाएगी-

''तुम!

"-उसने राज के सीने की ओर उंगली ऐसे की , जैसे खंजर भोंक रही हो-''तुम पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हो न। तुम बताओ यहां क्या हो रहा है? क्या हुआ है रिंकी को?"

''मुझे नहीं पता।"-राज शांति के साथ बोला-''ऐसा मैंने पहले कभी नहीं देखा...।"

''तो किसे पता है?"-प्रीति जोर से चीखी, फिर वो बारी-बारी से जय, अनुराग, डॉली और डोंगरा की ओर मुड़ते हुए चीखती रही-

''तुम्हें? तुम्हें? तुम्हें? या तुम्हें?"-डोंगरा पर तो वो इतनी जोर से चिल्लाई कि वो सहम कर पीछे हट गया।

''मुझे बताओ"-प्रीति हिस्टिरिया के मरीज की तरह चिल्ला रही थी''ये सब क्या हो रहा है? क्यों हो रहा है? हम लोगों के साथ ही क्यों हो रहा है? बताओ मुझे।"-कहते-कहते वो दीवार से टिक गई और रोते हुए दीवार से घिसटते हुए जमीन पर ही बैठ गई-''बताओ मुझे। वरना...वरना मैं पागल हो जाऊंगीं...पागल हो जाऊंगीं मैं...।"

जय आगे बढ़कर उसके पास बैठ गया। उसने प्रीति को गले से लगा लिया। प्रीति ने उसके सीने में मुंह छिपा लिया और बदस्तूर रोती रही।

''वहां नीचे मोहिनी के टुकड़े बिखरे हुए हैं जय...उसके टुकड़े...।"

गलियारे में मनहूसियत भरा सन्नाटा पसर गया।

कुछ देर बाद जब प्रीति शांत हुई तो राज ने जय को आंखों ही आंखों में इशारा किया।

''चलो प्रीति।"-जय प्रीति से धीरे से बोला-''नीचे चलते हैं। वहीं चलकर बात करते हैं। हम इस मुसीबत का कोई न कोई हल ढूंढ लेंगें।"

प्रीति ने उसके सीने पर से सिर उठा कर उसकी ओर देखा। उसकी आंखों में भय की झलक थी।

''न...न...नहीं...।"-वो कांपते से स्वर में बोली-''म..म...मैं नीचे नहीं जाऊंगीं...व...वहां...वहां मोहिनी के...मोहिनी के....।"-वो अपनी बात पूरी नहीं कर पाई। बस फटी-फटी सी आंखों से जय की ओर देखती रही। उसकी आंखों में दुनिया-जहान की दहशत दिखाई दे रही थी।

जय को कुछ नहीं करते देख कर राज आगे बढ़ा और उसने प्रीति की बांह पकड़कर उसे खड़ा कर दिया। प्रीति ने वैसी ही डरी-डरी सी नजरों से उसकी ओर देखा।

''देखो, प्रीति।-राज सख्त स्वर में बोला-''यहां जो कुछ भी हो रहा है, वो सब भयानक है, मैं मानता हूं। लेकिन इस तरह हिम्मत छोड़ देने से काम नहीं चलेगा। हिम्मत छोड़ देने का मतलब है पहले ही हार मान लेना। लेकिन हम अपनी आखिरी सांस तक कोशिश करेंगें। हमें किसी भी हालत में यहां से जाना ही होगा। और इसके लिए हम सबको हिम्मत दिखानी होगी। एक-दूसरे की मदद करनी होगी। इस तरह अपने होश खो देना अपने हाथों से अपनी कब्र खोदने जैसा ही है।"

प्रीति ने सहमति में सिर हिलाया। हालांकि उसके चेहरे से भय की छाया अब भी पूरी तरह विलुप्त नहीं हुई थी।

''ठ...ठीक है।"-वो बोली।

पीछे डॉली ने अनुराग के कान में कुछ कहा, जिसे सुनकर अनुराग की आंखें चौड़ी हो गईं। उसने डॉली की ओर देखा, फिर उसके चेहरे पर बेबसी देखकर डोंगरा को टहोका और उसे अपने पीछे आने का इशारा करते हुए सीढिय़ों की ओर बढ़ गया।
 
डोंगरा उसके पीछे नहीं जाना चाहता था लेकिन डॉली ने भी आंखों ही आंखों में डोंगरा को उसके पीछे जाने का इशारा किया तो डोंगरा जैसे मन-मन के कदम रखता हुआ अनुराग के पीछे सीढिय़ों की ओर बढ़ गया।

दोनों नीचे पहुंचे।

अनुराग आगे था इसलिए सबसे पहले सीढिय़ों से वही उतरा। बाहर मीटिंग रूम में कदम रखते ही उसे अपने प्राण सूखते से महसूस हुए।

बाहर वाला दरवाजा पूरा खुला हुआ था और बाहर दूर-दूर तक अंधेरा पसरा नजर आ रहा था।

बाहर जोरों की सर्द हवाएं चल रहीं थीं, जो कमरे में भी प्रवेश कर रहीं थीं।

अनुराग को अच्छी तरह याद था कि जब वे लोग रिंकी को बांध कर सीढिय़ों से ऊपर ले जा रहे थे, तो वो दरवाजा बंद था। डोंगरा, प्रीति और डॉली भी उनके पीछे-पीछे ही सीढिय़ों से ऊपर आ गए थे।

फिर दरवाजा किसने खोला?

अनुराग के शरीर ने जोर की कंपकंपी ली। हवाएं बेहद ठण्डी थीं और मौसम भी ठण्डा था लेकिन अनुराग को कंपकंपी ठण्ड के कारण नहीं आई थी।

खुले दरवाजे से बाहर अंधेरे में दूर हिलते पेड़ों के काले साए दिख रहे थे।

''ये...ये दरवाजा कैसे खुल गया?"-तभी पीछे से डोंगरा का खौफ भरा स्वर सुनाई दिया।

अनुराग ने पलटकर देखा। उसके पीछे डोंगरा भी सीढिय़ों से उतर आया था। खुला दरवाजा देखकर उसके चेहरे पर जैसे हल्दी-सी पुत गई थी। फिर अनुराग फर्श पर पड़े मोहिनी के टुकड़ों से बचते हुए सावधानीपूर्वक दरवाजे के पास पहुंचा और दरवाजा बंद करने की कोशिश करने लगा। उसे आश्चर्य हुआ, हवाएं इतनी तेज थीं कि उसे दरवाजा बंद करने में भी दिक्कत आ रही थी। फिर भी उसने ताकत लगाकर दरवाजा बंद कर ही दिया।

दरवाजा बंद करने में उसे इतनी ताकत लगानी पड़ी कि वो बंद दरवाजे से ही टिककर गहरी-गहरी सांसें लेने लगा। फिर उसने पलटकर डोंगरा की ओर देखा।

वो अब भी अपनी जगह वैसा ही बुत बना खड़ा था।

''तुम तो एक इंच भी नहीं हिले।"-अनुराग धीमे से बड़बड़ाया।

''क...क...क्या?"-डोंगरा के मुंह से निकला।

अनुराग ने कोई जवाब नहीं दिया। वो आगे बढ़ा। उसकी नजरें फर्श पर बिखरे मोहिनी के टुकड़ों पर थीं।

फिर वो उन्हीं टुकड़ों के पास घुटनों के बल बैठ गया और बिलख-बिलख कर रोने लगा।

डोंगरा अपनी जगह पर ऐसे खड़ा था, जैसे समझ नहीं पा रहा हो कि ऐसी स्थिति में उसे क्या करना चाहिए था।

तभी सीढिय़ों पर किसी के नीचे उतरने की आहट सुनाई दी।

डोंगरा की नजरें अपने-आप ही सीढिय़ों की ओर उठ गईं।

पहले सीढिय़ों पर एक छाया दिखाई दी

, फिर उसके पीछे-पीछे डॉली नजर आई।

डॉली को देख कर डोंगरा ने राहत की लम्बी सांस ली।

डॉली तेजी से नीचे उतरी, उसने अनुराग को रोते देखा और उसे नीचे भेजने के अपने फैसले पर मन ही मन खुद को कोसा। फिर वो नीचे बैठ गई और मोहिनी के टुकड़े उठा-उठा कर चद्दर पर रखने लगी। हालांकि ऐसा करते समय उसके हाथ इतनी जोर से कांप रहे थे कि उसे लग रहा था कि वो टुकड़े उसके हाथ से छूटकर गिर जाएंगें। या वो खुद ही बेहोश हो जाएगी।

हाथ, पैर, धड़...।

सब बड़े-बड़े टुकड़े थे।

कैसे?-डॉली के दिमाग में ये सवाल हथौड़े की तरह टकराया-रिंकी ने कैसे किया होगा ये सब?क्या उस छोटे से चाकू से...।

उस चाकू से कैसे...?डॉली का शरीर कांप उठा।

नहीं, वो इस बारे में नहीं सोचना चाहती थी।

सिर लुढ़ककर थोड़ी दूर चला गया था। उसे लेने के लिए डॉली को उठकर वहां तक जाना पड़ा। उसने दोनों हाथों में थामकर सिर को उठाया। मोहिनी के चेहरे की ओर देखने की उसकी हिम्मत नहंी हो रही थी। उसने बिना उसके चेहरे पर नजर डाले सिर को उठाया और ले जाकर पोटली में बाकी अंगों के साथ ही रख दिया।

''नहीं...।"-अनुराग बिलखते हुए ही घुटी-घुटी-सी आवाज में बोला-''नहीं...।"

डॉली ने पलटकर बेबस भाव से अनुराग की ओर देखा। वो अपने होंठ भींचे हुए गर्दन को दायें-बायें हिला रहा था। उसके गाल आंसुओं से तर हो रहे थे। डॉली ने आंखों ही आंखों में उससे क्षमायाचना की और सारे टुकड़ों को उसी चादर पर रखकर उनकी पोटली बना कर उठाई और उसे लेकर अंदर वाले कमरे में चली गई। ऐसा करते समय डॉली को अपनी टांगें बुरी तरह कांपती हुईं लग रहीं थीं। उसे लग रहा था वो रास्ते में ही गिर जाएगी। लेकिन अपनी सारी हिम्मत और शरीर की सारी ताकत समेट कर वो आगे बढ़ती रही। कमरे में उसने मोहिनी के शरीर के अंगों की पोटली आहिस्ता से एक कोने में रख दी

, जैसे मोहिनी जिंदा हो और पोटली जोर से रखने पर उसे चोट लग जाएगी। पोटली रखने पर उसमें रखे अंग सरककर इधर-उधर हुए, जिसकी हलचल चादर के ऊपर से भी सलवटों के रूप में दिखाई दी।

डॉली सिहर उठी।

फिर वो घूमकर बाहर वाले कमरे में पहुंची और वहां एक कुर्सी पर धराशायी होने वाले अंदाज में गिरकर गहरी-गहरी सांसें लेने लगी

, जैसे मीलों लम्बी रेस लगाकर आई हो।

अनुराग अपनी जगह पर बैठा बदस्तूर रोए जा रहा था।

डॉली को अपने अंदर इतनी हिम्मत नहीं लग रही थी कि वो अनुराग को हिम्मत बंधा सके।

इस वक्त तो उसे खुद हिम्मत की जरूरत थी।

उसी वक्त ऊपर से प्रीति, जय और राज भी नीचे आ गए।

प्रीति अब भी बुरी तरह डरी हुई लग रही थी और जय और राज भी बेहद गम्भीर थे।

वे तीनों नीचे मीटिंग रूम में पहुंचे, जहां अनुराग को जमीन पर बैठकर रोते हुए और डॉली को एक तरफ कुर्सी पर बेसुध सी पड़े देखकर उन्हें एक और झटका लगा।

उन्होंने प्रीति को एक कुर्सी पर बिठाया और राज डॉली को और जय अनुराग को सांत्वना देने की कोशिश करने लगा।

डोंगरा अपनी जगह पर जैसे पत्थर की मूर्ति बना हुआ उन सबकी वो हालत देख रहा था।

फिर यकायक उसे अपने शरीर में गुस्से की तीव्र लहर उठती महसूस हुई।

ये सब रिंकी ने किया था।

रिंकी।

मोहिनी के टुकड़े...।उफ्फ!

डोंगरा की मुट्ठियाँ भिंच गईं।

उसने देखा था कि उसी कमरे में, उसी जगह किस तरह जय, अनुराग और राज

तीनों मिलकर भी बड़ी मुश्किल से रिंकी को काबू कर पाए थे।

लेकिन उसे काबू करने का एक आसान तरीका था, जो उन्होंने इस्तेमाल नहीं किया था।

डोंगरा ने अपने कोट के अंदर की जेब को थपथपाकर उसमें रखी रिवॉल्वर के अपनी जगह पर होने की तस्दीक की, फिर धीमे से सीढिय़ों की ओर बढ़ गया।

वहां मौजूद लोग एक-दूसरे में ही इस कदर खोए हुए थे कि उनमें से किसी ने डोंगरा के सीढिय़ों से ऊपर जाने की ओर ध्यान ही नहीं दिया।

डोंगरा सीढिय़ों से ऊपर पहुंचा।वो बेहद सावधान था।

जरूरत पडऩे पर जेब से रिवॉल्वर निकालकर फायर करने में उसे कुछ ही सेकेंड लगने थेे।

कॉलेज टाइम में वो एनसीसी में रह चुका था और उसे अपनी निशानेबाजी पर भी बहुत भरोसा था।

उसे विश्वास था कि वो अब यहां से रिंकी के सिर पर से भूत उतारकर ही वहां से जाएगा।

चाहे उसके लिए उसे रिंकी की जान ही क्यों न लेनी पड़े।

वो उस कमरे के सामने पहुंचा

, जिसमें उन लोगों ने रिंकी को कैद किया था।

उसने धीरे से कमरे की कुण्डी खोल दी।

''रिंकी।"-कमरे में प्रवेश करते ही उसने रिंकी को आवाज दी।

सामने वो बैड खाली था, जिस पर रिंकी को बांध कर डाला गया था।

आश्चर्यचकित डोंगरा ने कमरे में चारों ओर निगाह दौड़ाई।

रिंकी कहीं भी नहीं थी।

उसके पीछे खुला हुआ दरवाजा घूमकर वापस बंद हो गया।
 
दरवाजा खुलने से दरवाजे के पीछे की जो जगह दरवाजे की आड़ में हो गई थी, रिंकी वहीं खड़ी थी।

लेकिन डोंगरा की उसकी ओर पीठ थी इसलिए वो उसे नहीं देख सका।

पीछे दरवाजा बंद होने की आहट सुनकर वो तुरंत पीछे घूमा।

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

रिंकी किसी वहशी जानवर की तरह उस पर झपट पड़ी।

वो उसे धकेलते हुए कमरे की दूसरी दीवार के पास तक ले गई

, फिर उसने जोर का धक्का देकर डोंगरा को जमीन पर गिरा दिया।

अगले ही क्षण वो शैतान की तरह उस पर सवार थी।

रिंकी के एक हाथ में चाकू था, जिसे डोंगरा की मोटी गर्दन पर फेरते हुए, अपनी चमकती सुनहरी आंखों से उसे घूरते हुए रिंकी बोली-''कैसा है, डोंगरा?"

नीचे मीटिंग रूम में प्रीति ने देखा

, जय अनुराग के गले लगकर उसे हिम्मत बंधाने की कोशिश कर रहा था और राज डॉली को संभालने की कोशिश कर रहा था।

प्रीति को जोर की प्यास लग रही थी।

जाने कितनी देर से उसने पानी नहीं पिया था।

वो धीमे से उठी और सीढिय़ों वाले गलियारे से होते हुए किचन की ओर बढ़ गई।

ऊपर कमरे में डोंगरा रिंकी के नीचे दबा पत्ते की तरह थर-थर कांप रहा था।

रिंकी की चमकती आंखें जैसे उसकी आंखों को भेदकर अंदर उतर जाना चाहतीं थीं।

''क्या हुआ, डोंगरा?"-रिंकी अपनी शोलों की तरह दहक रहीं आंखों से उसे घूरते हुए बोली-''तुझे डर लग रहा है क्या? अपनी बेटी की उमर की लड़की से इश्क लड़ाते हुए तो तुझे कभी डर नहीं लगा? फिर अब क्यों इतना डर रहा है?"

डोंगरा के मुंह से बोल न फूटा। वो हक्का-बक्का सा अपने ऊपर सवार रिंकी के रूप में साक्षात मौत के रूप को देख रहा था।

''क्या तुझे अनचाही मौत से डर लग रहा है, मोटे?"-अचानक रिंकी की आवाज तीखी और तेज हो गई, वो चीखती हुई बोल रही थी-''तुझे पता है, कोई भूत कब बनता है? जब उसकी अनचाही मौत होती है। यहां जितनी आत्माएं हैं, सबकी मौत ऐसे ही हुई थी। वो सब तेरा इंतजार कर रहीं हैं। अब तेरी बारी है। तुझे अपनी बिरादरी में शामिल करने का वक्त आ गया है...।"

''नहीं।"-डोंगरा कांपते स्वर में बोला-''मुझे...मुझे जाने दो...। मैं यहां से चला जाऊंगा।"

वो जोर से हंसी।

''अब तू यहां से कभी नहीं जा पाएगा।"-वो चीखती सी आवाज में बोली-''अब तुझे हमेशा यहीं रहना है। हमेशा।"

फिर रिंकी का चाकू वाला हाथ नीचे आया और चाकू का फल डोंगरा के सीने में पैवस्त होता चला गया।

डोंगरा भैंसे की तरह डकरा उठा।

रिंकी ने चाकू खींचकर उसके शरीर से निकाला, उसका हाथ फिर सिर से ऊपर गया और फिर नीचे आया।

इस बार चाकू डोंगरा के पेट में धंस गया।

डोंगरा के गले से फिर चीख निकली।

फिर रिंकी किसी मशीनी पुतले की तरह उसी क्रिया की दोहराती रही।

उसका हाथ सिर के ऊपर जाता था, फिर नीचे आता और चाकू डोंगरा के शरीर के किसी हिस्से में घुस जाता।

कुछ ही वारों के बाद डोंगरा की सांसें थम गईं।

लेकिन रिंकी वही क्रिया दोहराती रही।

साथ ही वो भयानक ढंग से अपने सिर को झटका देते हुए दोहराती जा रही थी-''हमेशा...हमेशा...हमेशा...हमेशा...हमेशा...।"

''डोंगरा कहां है?"-अचानक जय का ध्यान काफी देर से कमरे से लापता डोंगरा की ओर गया।

अब तक अनुराग थोड़ा संभल चुका था। लेकिन उसका दिमाग अब भी सांय-सांय कर रहा था।

''वो शायद ऊपर गया है।"-अनुराग बोला-''शायद...शायद रिंकी के कमरे की निगरानी करने।"

''प्रीति भी नहीं दिख रही।"-जय चिंतित स्वर में बोला।

''प्रीति किचन में गई है।"-डॉली थके-से स्वर में बोली।

''मैं ऊपर डोंगरा के पास जा रहा हूं।"-अनुराग उठते हुए बोला-''शायद उसे मदद की जरूरत पड़े।"-कहकर अनुराग सीढिय़ों से ऊपर चला गया।

कमरे में अब वे तीन ही लोग थे।

अनुराग सीढिय़ां चढ़कर ऊपर की मंजिल पर पहुंचा।

वो जब सबसे ऊपर की सीढिय़ां चढ़ रहा था, तब उसे ऊपर कुछ अजीब-सी आवाजें सुनाईं दीं।

वो ऊपर पहुंचा, तब उसे समझ आया कि आवाजें उसी कमरे से आ रहीं थीं, जिसमें उन्होंने रिंकी को कैद किया था।

उसने गलियारे में कदम रखा। वहां आवाज सीढिय़ों के मुकाबले थोड़ी तेज थी लेकिन फिर भी साफ सुनाई नहीं दे रही थी।

कैसी आवाज थी वो?

उस आवाज में कुछ ऐसा था, जिससे न जाने क्यों अनुराग को दहशत सी हो रही थी।

वैसी ही दहशत, जैसी उसने उस रात सपने में उस डरावने आदमी को देखकर महसूस की थी।

न जाने क्यों उसे लगने लगा कि कुछ बहुत भयानक होने वाला था।

और सबसे बुरी बात तो ये थी कि ये कोई सपना नहीं था।

हकीकत थी।

अनुराग रिंकी के कमरे के दरवाजे के पास पहुंचा।

उसे देखकर हैरानी हुई कि दरवाजा बाहर से बन्द नहीं था। बल्कि दरवाजा बन्द ही नहीं था। बस भिड़ा हुआ था।

वहां आवाजें और साफ सुनाई दे रहीं थीं।

'खच्च...खच्च...हमेशा...हमेशा...खच्च...।'

अनुराग को अपने कदम भय से जड़ होते महसूस हुए। कुछ देर वो दरवाजे पर ही खड़ा रहा। फिर उसने अपनी पूरी हिम्मत बटोरकर दरवाजा खोला।

अन्दर का दृश्य देखकर उसे जैसे काठ मार गया।

अन्दर कमरे के बीचोंबीच दरवाजे के ठीक सामने रिंकी बैठी हुई थी। उसके सामने डोंगरा की लाश पड़ी थी। वैसे उसे लाश कहना ठीक नहीं था। अब वो लाश नहीं बल्कि खून से सना मांस का लोथड़ा बन कर रह गई थी। चाकू के अनगिनत वारों से उसे पहचानना भी मुश्किल हो रहा था।

और उसके पीछे बैठी रिंकी...

उसका चेहरा खून के छींटों से रंग गया था।

उसके बालों में भी खून के छींटें साफ दिख रहे थे। वो अब भी किसी मशीन की तरह डोंगरा की मांस का लोथड़ा बन चुकी लाश पर चाकू बरसाये जा रही थी। कमरे में चाकू बार-बार शरीर में गोदे जाने की 'खच्च...खच्च...' की आवाज गूंज रही थी।

और साथ ही गूंज रही थी रिंकी की आवाज।

वो सिर को बड़े अजीब ढंग से झटकते हुए बार-बार एक ही शब्द दोहरा रही थी-''हमेशा...हमेशा...।"

वो दृश्य देखकर अनुराग तो जैसे अपनी जगह पर पत्थर का हो गया।

उसे अपने शरीर में जान ही महसूस नहीं हो रही थी।

रिंकी के रूप में उसे साक्षात मृत्यु दिखाई दे रही थी।

तभी अचानक वक्त जैसे थम-सा गया।

रिंकी ने डोंगरा को बार-बार चाकू घोंपने की वहशियाना हरकत बन्द कर दी थी।

अपनी जगह पर पत्थर के बुत में तब्दील हो गये अनुराग की निगाहें जैसे उससे चिपककर रह गईं थीं।

उसे अपना दिमाग शून्य हो गया लग रहा था।

फिर रिंकी ने धीरे से डोंगरा की लाश पर से सिर उठाकर अनुराग की ओर देखा।

रिंकी का चेहरा...उफ्फफफ।

उसके चेहरे पर नजर पड़ते ही अनुराग के दिमाग को तेज झटका-सा लगा।

उसे ऐसा लगा, जैसे किसी ने उसे सम्मोहन की सी अवस्था से बाहर लाकर जमीन पर पटक दिया हो।

रिंकी का चेहरा खून के छींटों से भरा हुआ था।

लेकिन उससे भी ज्यादा डरावनी थीं उसकी आंखें...उसकी आंखों की पुतलियों के गिर्द सुनहरा चमकदार छल्ला चमक रहा था।

अनुराग पर नजर पड़ते ही वो जोर से खिलखिलाकर हंसी।

फिर जो हुआ

, वो अनुराग सपने में भी नहीं सोच सकता था।

रिंकी ने दोनों हाथ सामने डोंगरा की लाश के ऊपर रखे। उसकी नजरें अनुराग पर ठीक उसी तरह जमी हुईं थीं

, जैसे कोई शिकारी जानवर अपने शिकार पर नजरें जमाये हो। जिस तरह उसने सामने हाथ टिकाए थे

, वो शिकार पर झपटने के लिए तैयार किसी जानवर की तरह ही लग रही थी।
 
फिर वो अनुराग पर झपट पड़ी।

वो हरकत किसी भी हालत में इंसानी नहीं थी।‘

रिंकी दरवाजे से काफी दूर थी। लेकिन उसने ऐसी उछाल भरी जैसे वो कोई इंसान न होकर कोई शिकारी जानवर हो। उसका पूरा शरीर असामान्य तरीके से हवा में लहरा गया।

ऐन वक्त पर अनुराग की सर्वाइवल इन्स्ंिटक्ट ने उसका साथ दिया। उसने बला की फुर्ती से पीछे हटकर दरवाजा बंद कर दिया।

अन्दर दरवाजे से कोई चीज जोर से टकराई। जो कि जाहिर तौर पर रिंकी ही थी।

अनुराग ने उसी फुर्ती के साथ बाहर से दरवाजे में कुण्डी लगा दी और पीछे हटकर दीवार से चिपक गया। उसकी भयभीत निगाहें सामने दरवाजे पर थीं।

फिर दरवाजा अंदर की ओर से जोर से भड़भड़ाया जाने लगा।

अंदर की ओर से पड़ रही टक्करों से दरवाजा इतनी जोर से हिल रहा था कि लग रहा था कि अभी उखड़ जायेगा।

''अनुराग!"-अन्दर से रिंकी के चीखने की आवाज सुनाई दी-''दरवाजा खोलो...मुझे बाहर आने दो...मुझे...मुझे 'इस' के साथ अकेले मत बंद करो...बाहर आने दो मुझे...।-उसकी चीखती सी आवाज में अजीब किस्म की बेचैनी झलक रही थी।"

अनुराग क्या कहता? बोलना तो दूर की बात, वो अपने सूख कर लकड़ी हो रहे होंठों को हिला तक नहीं सका।

कुछ देर तक अन्दर से रिंकी दरवाजा खोलने के लिये चीखती रही, गिड़गिड़ाती रही।

फिर अचानक सन्नाटा छा गया।

अनुराग स्तब्ध सा दीवार से पीठ टिकाये सामने दरवाजे को देखता रहा।

फिर अचानक उसे अपने कन्धों के पास कुछ सरसराहट महसूस हुई।

उसने नजरेें झुकाकर देखने की कोशिश की कि उसके कन्धों पर क्या था?वो दो हाथ थे।सड़े-गले हाथ! जैसे किसी कई दिनों तक सड़ चुके मुर्दे के हों।और उन हाथों की उंगलियां भी साधारण नहीं थीं। जरूरत से कुछ ज्यादा ही लम्बी वे उंगलियां किसी सांप की तरह ही अनुराग के कंधों और गर्दन पर रेंग रहीं थीं।

अनुराग सिर से पांव तक पत्ते की तरह कांप उठा। उसने तुरंत वहां से हटने की कोशिश की लेकिन वे हाथ कुछ ज्यादा ही फुर्तीले निकले। उन्होंने अनुराग की गर्दन को दबोच लिया।

वो दीवार से निकले उन दोनों हाथों से अपनी गर्दन को छुड़ाने के लिये तड़प उठा। उसके दोनों हाथों ने उन शैतानी हाथों की कलाइयों को दबोच लिया और उनसे गर्दन को आजाद कराने की कोशिश करने लगे।

लेकिन शैतानी हाथों का शिकंजा कसता जा रहा था।और साथ ही घुटता जा रहा था अनुराग का दम!

सामने बन्द दरवाजे के पार से रिंकी के धीमे-धीमे हंसने की आवाज सुनाई दे रही थी।

''अनुराग...।"-हंसी के बीच से रिंकी की धीमी आवाज भी सुनाई दे रही थी, वो पहले की तरह चीख नहीं रही थी बल्कि ऐसी आवाज मेें बोल रही थी, जैसे उसकी उस हालत के मजे ले रही हो-''दरवाजा खोल दो...दरवाजा खोल दो न अनुराग...मैं रिंकी हूं...रिंकी...।"

उसके गले पर कसे हाथों की उंगलियां और भी लम्बी होकर किसी रस्सी की तरह अनुराग की पूरी गर्दन को अपने घेरे में कैद कर चुकीं थीं।

मौत को इतने करीब देखकर अनुराग ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। वो अपने हाथों से उन राक्षसी हाथों की कलाइयों को पकड़कर अपनी गर्दन को छुड़ाने की कोशिश करते हुए अपने शरीर को आगे की ओर खींच रहा था, जिससे उन हाथों के चंगुल से आजाद हो सके।

फिर अचानक उन हाथों ने उसकी गर्दन को आजाद कर दिया।

अपने आप को दीवार से दूर खींचने की कोशिश कर रहा अनुराग अचानक उन हाथों की कैद से आजाद होने पर खुद को सम्भाल नहीं पाया और जोर से सामने दरवाजे से जा टकराया।

उसका चेहरा जोर से दरवाजे से टकराया, जिससे उसे अपनी नाक में एकदम से गर्मी भर जाने जैसा अहसास हुआ और दिमाग में पटाखे से छूटते महसूस हुए।

वो दरवाजे से घिसटता हुआ जमीन पर ही गिर गया।

उन शैतानी हाथों से कुछ ही सेकेंडों के संघर्ष ने जैसे उसके शरीर से प्राण ही खींच लिए थे।

वो ऐसे हांफ रहा था, जैसे मीलों की रेस लगाकर आया हो।

उसका चेहरा बल्कि उसका पूरा शरीर ही पसीने से लथपथ हो चुका था।

उसने डरते-डरते पलटकर दीवार की ओर देखा।

दीवार पर उसकी हाइट की ऊंचाई पर गले के पास दीवार से निकले वो दोनों भयानक हाथ अब भी झूल रहे थे।

अनुराग आंखों में अविश्वास और दहशत लिए उन शैतानी हाथों को देखता रहा गया।

बीच-बीच में वो हाथ बुरी तरह फडफ़ड़ाते थे और उन से लटक रहीं लम्बी-लम्बी अमानवीय उंगलियां इस तरह आसपास घूमतीं थीं

, जैसे पकडऩे के लिए किसी चीज को तलाश कर रहीं हों।

वो दरवाजे से ही पीठ टिकाए उस भयानक दृश्य को देखता रहा।

वो उठकर भाग जाना चाहता था लेकिन दम घुटने के कारण उसे अपना दिमाग घूमता-सा महसूस हो रहा था।

फिर खुद पर काबू पाने के लिए उसने आंखें बंद कर लीं और वैसे ही दरवाजे से टिके हुए गहरी गहरी सांसें लेने लगा।

वो बस कुछ देर वैसे ही पड़े रहना चाहता था, जिससे अपने आप को थोड़ा सम्भाल सके।

जो कुछ उसने पिछले चंद मिनटों में देखा और महसूस किया था, उससे उबर सके।

उसे इस ख्याल से राहत मिली कि कम से कम उन शैतानी हाथों से तो पीछा छूटा।

खटाक्!

अचानक उसके सिर के ऊपर जोरदार आवाज हुई।

आवाज सुनते ही अनुराग की आंखें अपनी पूरी चौड़ाई में खुल गईं।

दरवाजा बिना कोई आवाज किए धीरे से अन्दर की ओर खुल गया।

खुद को लाख सम्भालने की कोशिश करने के बाद भी अनुराग का शरीर कमरे के अन्दर लुढ़कता चला गया।

पीछे दरवाजा भड़ाक की जोरदार आवाज के साथ ऐसे बन्द हो गया

, जैसे अब कभी नहीं खुलेगा।

गलियारा सुनसान था।

दीवार से निकले वो दोनों अमानवीय हाथ अब भी फडफ़ड़ा रहे थे, जैसे अपने शिकंजे में कसने के लिए किसी गर्दन की तलाश कर रहे हों।
 
दीवार से निकले वो दोनों अमानवीय हाथ अब भी फडफ़ड़ा रहे थे, जैसे अपने शिकंजे में कसने के लिए किसी गर्दन की तलाश कर रहे हों।

प्रीति किचन में पहुंची। उसने जग से एक गिलास में पानी भरा लेकिन उसे पीने के लिए गिलास को मुंह से लगाने ही वाली थी कि अचानक गिलास उसके हाथ से छूटते-छूटते बचा।

किचन में किसी बच्चे की हंसी की आवाज सुनाई दी थी।

प्रीति का चेहरा फक्क पड़ गया। उसने इधर-उधर देखा। थोड़ी ही दूर पर एक आठ-दस साल की उम्र का लड़का खड़ा उसे ही देख रहा था। उसके चेहरे पर मासूमियत के भाव थे। हालांकि उसके कपड़े काफी मैले-कुचैले हो रहे थे

, जैसे वो मिट्टी में लोट कर आया हो।

''तुम...।

"-प्रीति का स्वर कांप रहा था-

''तुम कौन हो?"

''मैं डेविड हूं।"-उसकी आवाज भी उसके चेहरे जैसी ही मासूम थी।

''तुम...तुम...यहां कैसे आए?"

''मैं तो यहीं रहता हूं।"-वो किचन के दरवाजे की ओर देखते हुए बोला। अचानक उसके चेहरे से मासूमियत गायब हो गई थी और वो डरा हुआ लगने लगा था।

प्रीति ने भी किचन के दरवाजे की ओर देखा।

वहां कुछ नहीं था।

वो किससे डर रहा था?

''वहां...क्या है?"-प्रीति भयभीत स्वर में बोली।

उस बच्चे ने प्रीति की ओर देखा, फिर अचानक उसका चेहरा गम्भीर हो गया।

''मौत।"-उसने कहा।

किचन का दरवाजा अचानक भड़ाक से बंद हो गया।

प्रीति के मुंह से चीख निकल गई।

उसने बच्चे की दिशा में देखा तो वो भी वहां नहीं था।

प्रीति ने आगे बढ़कर दरवाजा खोलने की कोशिश की तो उसका हैण्डल छूते ही उसके मुंह से चीख निकल गई।

दरवाजे का हैण्डल अंगारे की तरह दहक रहा था।

प्रीति ने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया। उसने हाथ को देखा

, उस पर जलने का बड़ा-सा निशान था।

प्रीति ने वहां से निकलने के किसी दूसरे रास्ते की तलाश में किचन में नजरें दौड़ाई।

किचन में एकमात्र खिड़की थी लेकिन उसके आगे एक सीमेंट का बना काउंटर जैसा था-जैसा आम तौर पर किचन में होता है

, जिस पर गैस चूल्हा, स्टोव वगैरह रखते हैं।

प्रीति ने आनन-फानन में उस पर रखे सामान को हटाया और उस पर चढ़ गई। उसने खिड़की से बाहर झांककर देखा। वहां से जमीन काफी ऊंची लग रही थी। प्रीति ने एक पल के लिए बाहर देखा , फिर सीधे बाहर की ओर कूद गई।

जमीन पर गिरने के बाद वो जल्दी से उठ खड़ी हुई और दीवार के साथ-साथ चलते हुए मकान के सामने वाले हिस्से में पहुंची।

वहां हर तरफ अंधेरा छाया हुआ था।

मकान के सामने वाले मैदान जैसे हिस्से में जला हुआ केबिन और उनकी कारें खड़ीं थीं, जो कि अंधेरे के कारण साए जैसे दिख रहे थे।

प्रीति रूककर कुछ देर तक जले हुए केबिन को देखती रही।

यही एक तरीका था। इस मुसीबत से छुटकारा पाने का।

प्रीति ने एक बार पलटकर घर की ओर देखा, जो अंधेरे में किसी राक्षस की तरह सीना ताने खड़ा था, फिर उन कारों की ओर बढ़ गई।

वो इस घर को जलाकर खाक कर देगी। जैसे अनुराग ने उस केबिन को जलाकर खाक कर दिया।

पहले वो सब लोगों को बाहर बुला लेगी, फिर वो लोग पेट्रोल छिड़ककर उस मकान में आग लगा देंगें।

लेकिन उसे पेट्रोल चाहिए था।

राज और डॉली ने बताया था कि उन लोगों ने वहां आते समय रास्ते में एक पेट्रोल पंप से पेट्रोल लिया था।

प्रीति उनकी कार के पास पहुंची।

उसने कार के अगले हिस्से में झांककर देखा। वहां पेट्रोल की कैन नहीं थी।

कार की पीछे की एक खिड़की खुली थी। प्रीति ने उसमें झांककर देखा।

उसकी आंखें चमक उठीं।

सीट के नीचे पेट्रोल की कैन रखी दिखाई दे रही थी।

प्रीति ने कार के पिछले दरवाजे का हैंडल पकड़कर घुमाया।

दरवाजा खुल गया।

वो जल्दी से कार की पिछली सीट वाले हिस्से में घुस गई

कार के अंदर आने के बाद उसने सीट के नीचे रखी कैन का हैण्डल पकड़कर उसे खींचा। कैन हिली लेकिन बाहर नहीं आई। शायद वो किसी चीज से फंस रही थी।
 
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