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Horror मौत की चाल

मकान के पिछले हिस्से से उस पुराने कब्रिस्तान तक जाने के लिए कोई रास्ता नहीं था। कल की तरह ही राज को पेड़ों के बीच से होकर ही कब्रिस्तान तक जाना पड़ा। वो कब्रिस्तान की चहारीदीवारी के बगल से चलते हुए दीवार खत्म होने पर मुड़कर गेट वाले हिस्से की ओर बढ़ता गया।

वहां उसे कब्रिस्तान का गेट बंद मिला।

गेट बंद देख कर राज को हैरानी हुई। उसे अच्छी तरह याद था कि कल उस कब्रिस्तान से वापस लौटते समय वे गेट खुला छोड़ गए थे।

फिर गेट बंद किसने किया

?

राज ने गेट की कुण्डी खोलकर कब्रिस्तान में प्रवेश किया।

कब्रिस्तान में एकदम सन्नाटा छाया हुआ था।

वहां कोई दो दर्जन के आसपास कब्रें थीं। सभी बेहद पुरानी। बुरी तरह टूट-फूट चुकीं।

कल सुबह जब वे लोग वहां आए थे

, उससे पहले शायद वर्षों से उस वीराने में किसी के कदम नहीं पड़े होंगें।

क्या मुर्दों को उनका वहां आकर शांति भंग करना अच्छा नहीं लगा था

?

शायद इसीलिए रात में राज ने उस रहस्यमयी व्यक्ति को देखा था।

राज शांति से कब्रिस्तान में टहलता रहा। उसकी नजरें उन कब्रों का मुआयना कर रहीं थीं।

तभी राज को कब्रिस्तान के दूसरे कोने में कुछ अजीब दिखाई दिया। उसकी आंखें फैल गईं। वो तेजी से लपककर वहां पहुंचा।

वहां पर आठ ताजा खुदी हुईं कब्रें थीं।

डॉली एक बड़ी सी ट्रे में नाश्ता लेकर बाहर आई।

''तुम अकेली ही ब्रेकफास्ट लेकर आ रही हो

?"-जय ट्रे उनके बीच रखी टेबल पर रखवाने में उसकी मदद करते हुए बोला-

''रिंकी कहां रह गई

?"

''वो बीच में अचानक किचन से गायब हो गई।

"-डॉली बोली।

''क्या

?"-प्रीति की आंखें फैल गईं।

''अरे...गायब हो गई से मेरा मतलब किचन से चली गई।

"-डॉली बोली-

''मुझे लगा वॉशरूम वगैरह गई होगी। फिर उसे आने में देर लग रही थी तो मैंने सोचा तब तक ये ट्रे यहां पहुंचा दूं।

"

''तुमने ठीक सोचा

"-प्रीति जल्दी से एक सैंडविच उठाकर मुंह में ठूंसते हुए बोली-

''मैं तो भूख से मरी जा रही हूं।

"

''अरे

, रूको यार!

"-जय बोला-

''सबके आने का इंतजार तो कर लो।

"

''सबके

?"-डॉली चौंकी

, फिर उसने वहां उपस्थित लोगों पर नजर डाली-

''राज कहां है

?"

''देख लीजिये

, डोंगरा साहब।

"-जय डोंगरा से बोला-

''इधर राज गायब है। उधर रिंकी गायब है। कहीं दोनों मिलकर कोई खिचड़ी न पका रहे हों।

"

''व्हाट नॉनसेंस।

"-डोंगरा ने घूरकर जय को देखा।

प्रीति ने जय को कोहनी मारी।

''अरे

, सच तो कहा रहा हूं।

"-जय बोला-

''मैंने नोटिस भी किया था कि रिंकी बार-बार सबकी नजरें बचा कर

राज की ओर देख रही थी।

"

''इनफ विद दैट।

"-अब डोंगरा सचमुच गुस्से में नजर आने लगा।

''ओके। ओके डूड।

"-जय हाथ उठाकर बोला-

''मैं तो आपके ही भले के लिये कह रहा था।

"

''मैं अपना भला-बुरा अच्छी तरह जानता हूं।

"-डोंगरा नाराजगी भरे स्वर में बोला-

''और आपको बता दूं कि मुझे इस तरह की वाहियात बातें बिल्कुल पसंद नहीं।

"

जय ने फिर कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन उसके शब्द बीच में ही अटककर रह गए।

घर के पिछली ओर से किसी औरत की दिल दहला देने वाली चीख सुनाई दी।

ब्रेकफास्ट लगभग तैयार हो चुका था। डॉली सैंडविच बनाने में व्यस्त थी। रिंकी को इस बात की खुशी थी कि डॉली उससे जबर्दस्ती बात करने की कोशिश नहीं कर रही थी।

उसे चुप रहना ही अच्छा लगता था।

रिंकी एक बेहद गरीब परिवार से थी। उसने अपने जीवन में इतने दुख देखे थे कि वो खुशियों के प्रति उदासीन-सी हो गई थी। कभी-कभी तो वो खुद को बेजान लाश की तरह महसूस करती थी। यही कारण था कि वो डोंगरा के साथ थी।

डोंगरा भी उसके प्रति उतना ही उदासीन था

, जितनी वो खुद के प्रति थी। वो उसमें भावनात्मक इंटरेस्ट नहीं दिखाता था। डोंगरा के सम्पर्क में आने के बाद से उसे गरीबी के दलदल से छुटकारा जरूर मिल गया था। कुछ लोग इस रिश्ते के बारे में ये जरूर सोच सकते थे कि उसने पैसों के लिए डोंगरा को चुना था लेकिन हकीकत ये थी कि उसे इस चीज से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वो किसके साथ थी

?

उसका साथी जवान था या अधेड़!

हंसमुख था या गम्भीर!

उसे बस जीने के लिए एक सहारा चाहिए था।

और डोंगरा उसके लिए उन मायनों में एक अच्छा साथी ही साबित हुआ था।

वो बात नहीं करना चाहती थी तो वो बात नहीं करता था। और आमतौर पर वो कम ही बात करना चाहती थी।

कभी-कभी मन के किसी कोने में उसके दिमाग में ये ख्याल भी आया था कि शायद डोंगरा के साथ भी कुछ उतना ही बुरा हुआ होगा

, तभी वो वैसा था। कभी उसका मन डोंगरा से इस बारे में पूछने का भी किया था। लेकिन वो हमेशा इस सवाल को कल पर टाल देती थी।

क्योंकि वो भावनात्मक रूप से डोंगरा के नजदीक नहीं आना चाहती थी।

वो भावनात्मक रूप से किसी के नजदीक नहीं आना चाहती थी।

वो किसी भावना को महसूस ही नहीं करना चाहती थी।

उसने भूख देखी थी।

गरीबी देखी थी।

जब वो छोटी बच्ची ही थी

, तब उसने अभावों से भरी जिंदगी में घर के लोगों को लड़ते-झगड़ते

, एक-दूसरे को ही गालियां देते

, कोसते देखा था। जिन्हें एक-दूसरे के लिए जान देने के लिये तैयार रहना चाहिए था

, उन्हें एक-दूसरे को बद्दुआएं देते देखा था।

घर में माता-पिता के बीच घंटों चलने वाली लड़ाइयां जब बंद होती थीं तो उसका दिमाग सांय-सांय कर रहा होता था। उसे लगता था जैसे वो पागल हो जायेगी।

उसका घर से भाग जाने का मन करता था।

लेकिन घर से भाग कर वो जाती कहां

?

उसी माहौल में वो बड़ी हुई और उसने देखा

, समझा कि भावनाओं की बातें करने वाले उसके माता-पिता असल में भावनात्मक रूप से कितने खोखले थे।

तभी से शायद उसे भावुक होने से नफरत हो गई थी।

या शायद उसे अपने इंसान होने से ही नफरत थी हो गई थी।

जब से वो लोग इस घर में आए थे

, तब से उसे लग रहा था कि वो जगह सही नहीं थी।

वहां कुछ तो गलत था!

लेकिन वो किसी से कुछ कह नहीं सकती थी।

वो एक जरखरीद गुलाम की तरह ही डोंगरा के आदेशों का पालन करती थी।

रिंकी के पिता की मृत्यु पहले ही हो गई थी।

फिर मां ने भी जहर खा कर आत्महत्या करने की कोशिश की।

उसे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।

मां का इलाज कराने के लिए रिंकी के पास पैसे नहीं थे।

तब सुरेश डोंगरा हॉस्पिटल आया।

उसने रिंकी की मां के इलाज के लिए पैसे दिए।

रिंकी की मां डोंगरा के यहां ही काम करती थी

, जिससे वो उन्हें जानता था।

रिंकी सुखद आश्चर्य से भर उठी।

उसे लगा डोंगरा इंसान नहीं

, कोई फरिश्ता था।

उसके माता-पिता ने उसे जो तकलीफ

, तनाव

, बुराइयों से भरी दुनिया दिखाई थी

, उस दुनिया से अलग

, किसी और ही दुनिया का शख्स था।

लेकिन डॉक्टर रिंकी की मां को बचा नहीं पाए।

रिंकी के लिए तो जैसे दुनिया ही खत्म हो गई थी।

फिर डोंगरा उसे अपने घर ले गया।

और उसने रिंकी के सामने शादी की पेशकश रखी।

रिंकी के दिलोदिमाग को जोरदार झटका लगा।

जिस आदमी को वो फरिश्ता मान रही थी

, उसकी नजरें असल में उस पर थीं।

वो उसकी मां के इलाज के लिए पैसे देकर उसकी मदद नहीं कर रहा था

, इंसानियत की मिसाल कायम नहीं कर रहा था बल्कि रिंकी को कोई खरीदने की वस्तु समझकर उसकी रकम एडवांस में चुका रहा था।

उस ख्याल से उसने खुद को दूसरी बार मरते हुए महसूस किया।
 
पहली बार तो वो तभी मर गई थी

, जब उसकी मां इस दुनिया से चली गई थी।

लेकिन रिंकी ने डोंगरा को निराश नहीं किया।

उसने उसका प्रपोजल स्वीकार कर लिया।

उनकी अब तक शादी नहीं हुई थी लेकिन वे पति-पत्नी की तरह ही एक ही घर में रहते थे।

डोंगरा हमेशा लोगों को उसे अपनी मंगेतर ही बताता था।

आगे क्या होगा

, इस बारे में वो नहीं सोचा करती थी।

इसीलिए वो यहां थी।

उसने डॉली की ओर देखा। वो आखिरी सैंडविच सेंक रही थी। सैंडविच की खुशबू जोरदार थी।

तभी रिंकी को वॉशरूम जाने की जरूरत महसूस हुई। पहले उसने सोचा कि डॉली को कुछ बोल कर जाए लेकिन डॉली का पूरा ध्यान सैंडविच पर देख कर वो बिना उससे कुछ कहे ही किचन से बाहर निकल गई।

किचन से एक छोटा-सा गलियारा एक चौराहे जैसी जगह पर खत्म होता था

, जिसमें सामने दूसरी मंजिल पर जाने वाली सीढिय़ां थीं और अगल-बगल में सामने वाला कमरा यानि

'मीटिंग रूम

' और दूसरा कमरा थे।

वो अभी गलियारे में कुछ ही कदम आगे बढ़ी थी कि अचानक उसे कुछ बेहद अजीब महसूस हुआ।

वो अपनी जगह पर थमककर खड़ी हो गई।

क्या था वो

?

अचानक उसे डर-सा लगने लगा।

उसने वापस किचन में जाने की सोची। वो किचन में जाने के इरादे से पलटी तो पीछे का दृश्य देखकर अपनी जगह पर जड़ होकर रह गई।

पीछे किचन के दरवाजे की जगह दीवार थी।

चिकनी सफाचट् दीवार!

वो हक्की-बक्की सी कुछ देर तक उस दीवार को देखती रही

, फिर वापस पलटी।

पलटकर सामनेे देखते ही उसे फिर आश्चर्य और भय का जोरदार झटका लगा।

सामने गलियारे के अंत में अब वो सीढिय़ां ही दिखाई दे रहीं थीं।

सीढिय़ों के अगल-बगल जो दोनों कमरों में जाने के दरवाजे थे...

...वो अब नहीं थे।

दोनों ओर एकदम सीधी दीवारें थीं।

तभी रिंकी को सब कुछ घूमता-सा महसूस हुआ।

क्या उसे चक्कर आ रहा था

?

नहीं।

वो गलियारा घूम रहा था।

उसने खौफजदा होकर दीवार से टिक कर खुद को संभालने की कोशिश की।

वो जोर से चिल्लाना चाहती थी लेकिन उसकी आवाज जैसे गले में ही घुटकर रह गई थी।

उसे अपनी सारी जिंदगी में इतना डर नहीं लगा था।

गलियारा पूरा घूम कर पलट चुका था। अब गलियारे की छत नीचे थी और जमीन ऊपर। रिंकी गलियारे की जमीन-जो कि थोड़ी देर पहले तक गलियारे की छत थी-पर पड़ी गहरी-गहरी सांसें ले रही थीं।

फिर वो दीवार का सहारा लेते हुए खड़ी हुई।

उसने सामने देखा। गलियारे के अंत में सीढिय़ां अब भी वैसी ही नजर आ रहीं थीं। यानि सिर्फ गलियारा घूमा था। सीढिय़ां नहीं।

'खट...खट...।

'

उस आवाज ने रिंकी को चौंकाया।

वो आवाज कहां से आ रही थी

?

उसने इधर-उधर देखा। वहां दीवारों के सिवा कुछ भी नहीं था। फिर उसकी नजरें बरबस ही सामने की ओर गलियारे के अंत में दिख रही सीढिय़ों की ओर चली गईं।

आवाज उधर से ही आ रही थी।

कोई ऊपर से नीचे आ रहा था।

कौन था वो

?

रिंकी जानती थी कि सब लोग बाहर थे। अनुराग भी किचन में उन दोनों से बातें करने के बाद बाहर की ओर ही गया था।

फिर छत से नीचे कौन आ रहा था

?

रिंकी आतंक से जड़ हो गई। इतना डर उसे सारी जिंदगी में कभी नहीं लगा था।

उसने एक बार फिर पीछे की ओर देखा। इस उम्मीद में कि शायद पीछे किचन का दरवाजा दिख जाये। उसे इस मुसीबत से निकलने का रास्ता दिख जाये।

लेकिन नहीं।

पीछे अब भी पहले की तरह वो दीवार ही नजर आ रही थी।

सीढिय़ों पर ऊपर से नीचे की ओर आ रही किसी के आने की आहट अब तेज हो गई थी। उस आवाज मेंं कुछ जाना-पहचाना-सा अहसास था।

रिंकी को लगा उसने वो आवाज पहले कहीं सुन रखी थी।

बल्कि उसने वो आवाज सैंकड़ों बार सुनी थी। हजारों बार सुनी थी।

आहट से लग रहा था

, ऊपर से नीचे आ रहा शख्स सीढिय़ों से नीचे उतरने ही वाला था।

रिंकी की पलटकर सीढिय़ों की ओर देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी।

वो पलटने से पहले

, सीढिय़ों की ओर देखने से पहले ये पहेली सुलझा लेना चाहती थी कि वो कदमों की आहट उसे इतनी सुनी-सुनी क्यों लग रही थी

?

आहट अब साफ सुनाई दे रही थी। ऐसा लग रहा था

, वो शख्स अब सीढिय़ों से नीचे उतर चुका था।

कहां सुनी थी उसने वो आवाज

?

रिंकी का मन कर रहा था कि पलटकर सीढिय़ों की ओर देख ले लेकिन उसके दिमाग का एक हिस्सा चीख-चीख कर कह रहा था कि जो दिखेगा

, वो

'अच्छा

' नहीं होगा।

शायद इसीलिए वो सीढिय़ों की ओर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।

आहट अब काफी करीब आ चुकी थी।

अचानक रिंकी के दिमाग में छनाका-सा हुआ।

वो उस आहट को पहचानती थी।

वो उसके ही पैरों की आहट थी।

इसीलिए वो इतनी पहचानी हुई लग रही थी।

वो आहट उसने सैंकड़ों नहीं

, हजारों नहीं बल्कि अनगिनत बार सुनी थी।

रिंकी का सिर अपने-आप ही सीढिय़ों की ओर घूम गया।

'वो

' उसके ठीक पीछे खड़ी थी।

अपने एकदम पास खुद

'अपने-आप

' को ही खड़ा देख कर रिंकी भय से जड़ हो गई।

उसने कपड़े भी वही थे

, जो रिंकी ने पहने हुए थे।

'वो

' बिल्कुल रिंकी की ही प्रतिमूर्ति थी।

सिवाय एक चीज के।

आंखें!

उसकी आंखों की पुतलियों को चमकते सुनहरे रंग के छल्ले घेरे हुए थे

, जिससे ऐसा लग रहा था कि उसकी आंखों की पुतलियों की जगह दहकते हुए अंगारे रखे हों।

'वो

' अपने होंठों पर भयानक सी लगने वाली मुस्कान लिए एकटक रिंकी की ओर देख रही थी।

'उस

' के सामने रिंकी ज्यादा देर तक अपने होश कायम नहीं रख पाई।

बेहोश होने से पहले रिंकी के गले से एक चीख निकली

, फिर उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया।
 
राज आश्चर्य से उन कब्रों को देख रहा था।

कल सुबह ही वे लोग जब यहां आए थे

, उन कब्रों का नामोनिशान तक वहां नहीं था।

फिर ऐसे उजाड़ बियाबान में कौन आकर कब्रें खोदकर चला गया

?

और कब्रें खोदीं भी तो उन्हें इस तरह खुले छोड़कर जाने का क्या मतलब

?

रात में वो विचित्र सपना और अब ये रहस्यमयी कब्रें...

?

राज को अपना सिर घूमता सा महसूस हुआ।

तभी मकान की ओर से दिल दहला देने वाली चीख सुनाई दी।

राज मकान के पिछले हिस्से वाले मैदान में पहुंचा

, तब तक बाकी लोग भी भागते हुए वहां पहुंच चुके थे।

''क्या हुआ

?"-जय के होश उड़े हुए थे-

''ये चीख किसकी थी

?"

''वही तो मैं पूछ रहा हूं।

"-राज बोला-

''चीख किसकी थी

?"

''रिंकी की।

"-प्रीति खौफ भरे स्वर में बोली।

''क्या

?"-सब स्तब्ध रह गए।

''तुम...तुम कैसे कह सकती हो कि वो...वो रिंकी की चीख थी

?"-डोंगरा परेशान सा बोला।

''वही तो हम लोगों के बीच नहीं है।

"-प्रीति बोली।

''रिंकी।

"-डोंगरा पागलों की तरह चीख उठा-

''रिंकी!

"

कोई जवाब नहीं।

सब हैरान और घबराए से एक-दूसरे का मुंह ताक रहे थे।

''चलो।

"-जय बोला-

''उसे तलाश करते हैं।

"

''लेकिन कहां

?"-डॉली बोली-

''कहां तलाश करें उसे

? आवाज तो यहां से आई थी। यहां तो उसका नामोनिशान तक नहीं है।

"

सबकी नजरें स्टोर रूम के बड़े से लकड़ी के पुराने दरवाजे की ओर घूम गईं।

लेकिन वो तो बाहर से मजबूती से बंद था।

रिंकी उसमें कैसे हो सकती थी

?

''हो सकता है

"-मोहिनी बोली-

''आवाज घर के अंदर से ही आई हो। वैसे भी डॉली ने बताया कि वो किचन में उसे छोड़कर गई थी। हमने उसे बाहर वाले दरवाजे से निकलते नहीं देखा। हम सब वहीं थे। पिछला दरवाजा भी बंद है। यानि उसे घर के अंदर ही होना चाहिए।

"

''मोहिनी ठीक कह रही है।

"-जय बोला-

''चलो सब चलकर उसे घर के अंदर ही ढूंढते हैं। लेकिन दो लोग यहां भी रूको। और आसपास नजर रखो। कुछ दिखाई दे तो आवाज देकर सबको बुलाना।

"

प्रीति और अनुराग को वहीं छोड़कर सब मकान के अंदर चले गये।

अगले करीब आधे घंटे में उन्होंने मकान का कोना-कोना छान मारा। मकान बड़ा था लेकिन वे लोग भी छ: थे। उन्हें पूरे मकान को खंगालने में ज्यादा समय नहीं लगा।

रिंकी का कोई पता नहीं चला।

आखिरकार थक-हारकर वे सब वापस मकान के पिछले हिस्से में पहुंचे

, जहां अनुराग और प्रीति उनका इंतजार कर रहे थे।

''रिंकी का कुछ पता चला

?"-प्रीति ने पूछा।

जय का सिर इनकार में हिला।

''वहां कब्रिस्तान में

"-राज बोला-

''कुछ ताजी कब्रें खुदी हुईं हैं।

"

''क्या

?"-सबने चौंक कर राज की ओर देखा।

''जिस वक्त चीख की आवाज सुनाई दी

, उस वक्त मैं कब्रिस्तान मेंं ही था।

"-राज का स्वर गम्भीर था-

''कल सुबह हमारे उस कब्रिस्तान से जाने के बाद से लेकर सुबह मेरे दोबारा वहां आने के बीच किसी ने वहां आठ नई कब्रें खोदी हैं।

"

''कितनी

?"-डोंगरा के चेहरे पर हवाईयां उड़ रहीं थीं।

''आठ।

"

वहां सन्नाटा छा गया।

हर कोई दहशत में था।

ये सब क्या हो रहा था

?

जिसे वो एक पिकनिक के रूप में ले रहे थे

, एक एडवेंचर समझ रहे थे

, वो इतना भयानक रूप धारण कर लेगा

, ये उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था।

''मैं देख कर आता हूं।

"-जय बोला।

''हम भी चलते हैं।

"-मोहिनी बोली।

सभी कब्रिस्तान में पहुंचे।

वहां आठ खुदी हुई कब्रें देख कर सभी के चेहरों पर जैसे हल्दी पुत गई।

''ये अब कुछ ज्यादा ही हो रहा है।

"-अनुराग गम्भीर स्वर में बोला।

सबकी नजरें उसकी ओर घूम गईं।

''हां।

"-मोहिनी भी अनुराग से सहमत नजर आई-

''ज्यादा नहीं बल्कि बहुत ज्यादा हो रहा है।

"

''क्या ये भी हमें चौंकाने या डराने का उन कंपनी वालों का कोई आइडिया है

?"- राज ने डोंगरा और जय से पूछा।

दोनों कुछ भी नहीं कह पाए। उनकी जबान पर तो जैसे ताले लग गए थे।

''यहां आते ही आते जिस तरह उस कॉफिन मैन ने हमारा स्वागत किया था

"-अनुराग बोला-

''वही बर्दाश्त करने लायक नहीं था। फिर भी हम ड्रामा समझकर बर्दाश्त कर गए। लेकिन अब तो बिल्कुल ही हद पार हो चुकी है।

"

''हां।

"-जय ने भी अनुराग की बात पर सहमति व्यक्त की-

''थोड़ा-बहुत ड्रामा सहन किया जा सकता है। लेकिन ये अब जरूरत से कुछ ज्यादा ही हो रहा है।

"

''डोंगरा साहब।

"-अनुराग डोंगरा की ओर घूमा-

''ये आपकी और रिंकी की कोई मिली-जुली चाल तो नहीं है

? मतलब हमें डराने के लिए 'कॉफिन मैन' जैसा ही कोई ड्रामा...

?"

''नहीं।

"-डोंगरा ने इनकार में सिर हिलाया-

''रिंकी का कंपनी से सीधे कोई कॉन्टैक्ट नहीं है। उसे तो मैं अपने साथ लेकर आया था। वो उनके किसी तरह प्रैंक में कैसे शामिल हो सकता है।

"

''फिर वो गई कहां

?"-मोहिनी बुरी तरह घबराई हुई लग रही थी-

''इतनी देर हो गई...उसका अब तक कोई पता नहीं है...कहीं उसके साथ कोई हादसा...।

"-उसने अपनी बात अधूरी ही छोड़कर अपने मुंह पर हाथ रख लिया।

उस बात ने सबके रहे-सहे होश भी उड़ा दिये।

''मेरे ख्याल से हमें शहर जाना चाहिये।

"-राज निर्णायक स्वर में बोला-

''और पूरे मामले की सूचना पुलिस को देनी चाहिए। और उससे पहले आप पुलिस को फोन लगाइये और मदद बुलवाइये।

"-उसने डोंगरा से कहा।

''ठीक है।

"-डोंगरा बोला-

''मैं अभी अपनी कार से मोबाइल निकालता हूं और पुलिस को इन्फॉर्म करता हूं।

"

''लेकिन हम रिंकी को यहां छोड़कर कैसे जा सकते हैं

?"-मोहिनी बोली।

''क्या मतलब

?"-जय बोला।

''हमने अभी थोड़ी देर पहले उसकी चीख सुनी थी। वो यहीं कहीं आसपास होनी चाहिए। अगर वो यहां आती है

, फिर यहां किसी को नहीं देखेगी

, इस वीरान

, भुतहा जगह पर खुद को अकेली पाएगी तो उस पर क्या गुजरेगी

?"

''तो मैंने कब कहा कि हम सभी शहर चले जाएं

?"-राज बोला-

''हममें से कोई दो लोग शहर जाएंगें। वहां से मदद लेकर आएं

, फिर रिंकी के मिलने के बाद सभी लोग इस मनहूस जगह को फौरन छोड़ देंगें।

"

''बिल्कुल सही।

"-डोंगरा ने जोर-जोर से सिर हिलाते हुए अपनी सहमति व्यक्त की-

''हम लोगों ने यहां आकर जो गलती कर दी है

, उसे सुधारने के लिये अब भी हमारे पास मौका है। और हमें ये मौका गंवाना नहीं चाहिये।

"

''चलो।

"-जय ने भी सहमति में सिर हिलाते हुए दृढ़ भाव से कहा-

''यही करते हैं।

"
 
डोंगरा ने अपने मोबाइल से पुलिस को कॉल करने की कोशिश की लेकिन वहां नेटवर्क ही नहीं मिल रहा था। किसी नम्बर पर कोई किसी तरह की

, यहां तक कि इमरजेंसी कॉल भी नहीं लग पा रही थी।

आखिरकार परेशान होकर डोंगरा ने अपनी कार की डिक्की खोल दी और सबके मोबाइल उन्हें वापस सौंप दिए। सबने अपने-अपने मोबाइलों से कॉल करने की कोशिश की लेकिन किसी की भी

, कहीं कॉल नहीं लग रही थी।

आखिरकार थक-हारकर उन्होंने दो लोगों को मदद लाने के लिए शहर भेजने का फैसला किया।

निश्चय हुआ कि जय और प्रीति कार से शहर जायेंगें

, वहां से पुलिस की मदद लेकर वापस लौटेंगें। तब तक बाकी लोग वहीं रूककर रिंकी की तलाश जारी रखेंगें।

जय और प्रीति डोंगरा की कार से शहर के लिये रवाना हुए। जिस वक्त वे लोग रवाना हुए

, उस समय सुबह के

10 बजे से ऊपर टाइम हो चुका था।

उनका नाश्ता ज्यों-का-त्यों टेबल पर पड़ा था। किसी को खाने का होश नहीं था।

अब हर कोई जल्दी से जल्दी रिंकी को ढूंढकर वहां से निकल जाना चाहता था।
 
सभी मीटिंग रूम में बैठे हुए थे। उनके बीच सन्नाटा छाया हुआ था।

''मेरे ख्याल से

"-फिर मोहिनी ने सन्नाटे को भंग किया-

''हमें एक बार स्टोर रूम को भी चैक कर लेना चाहिए।

"

''स्टोर रूम?"-अनुराग बोला-

''पागलों जैसी बात मत करो। रिंकी स्टोर रूम में कैसे हो सकती है? वो तो बाहर से बंद था।"

''लेकिन बाकी जगह तो हमने तलाश कर लिया न? अब वही एक जगह रह जाती है, जो हमने नहीं देखी। तो मेरी मानो तो हमें स्टोर रूम को भी एक बार चैक कर ही लेना चाहिए।"

''उस स्टोर रूम पर इतना बड़ा ताला लटका है। रिंकी क्या हवा बनकर दरवाजे पर पड़ी दरारों के बीच से अंदर चली जायेेगी?"

मोहिनी कुछ नहीं बोली।

''मोहिनी सही कह रही है।"-राज ने मोहिनी की बात का समर्थन किया-''हमें स्टोर रूम को भी चैक कर लेना चाहिये। बल्कि पहले ही चैक कर लेना चाहिए था। उस समय भी उस ताले के चक्कर में हमने स्टोर रूम की ओर ध्यान नहीं दिया। इस मकान में एक वही जगह है, जहां की हमने तलाशी नहीं ली।"

''लेकिन उस पर तो ताला लगा है न...।"-डोंगरा बोला।

''ऐसी-तैसी ताले की!"-डॉली बोली-''वैसे भी हमारे पास यहां करने के लिये कुछ नहीं है। और रिंकी कहां है, किस हाल में है, हमें कुछ पता नहीं चल पा रहा है। तो अब हमें उस स्टोर रूम की भी तलाशी ले लेनी चाहिए।"\

''लेकिन"-डोंगरा दबे स्वर में बोला-'' 'कॉफिन मैन' ने हमें स्टोर रूम में जाने से मना किया था...।"

''भाड़ में गया 'कॉफिन मैन!"-राज अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ-''हम स्टोर रूम में जा रहे हैं। "
 
रिंकी को ढूंढने के दौरान उन्हें उस मकान में बहुत सारा सामान इधर-उधर बिखरा मिला था। उसी में एक कमरे से राज ने एक बड़ा सा रैन्च लिया, फिर सभी लोग मकान के पिछले हिस्से में पहुंचे।

वे स्टोर रूम के लकड़ी के पुराने लेकिन मजबूत लगने वाले दरवाजे के सामने खड़े थे।

दरवाजे की जंग लगी कुण्डी पर बड़ा सा ताला लटका हुआ था।

''ठीक है!"-राज नेे एक बार अपने साथियों की ओर देख कर सिर हिलाया, फिर रैंच को जोर से ताले पर मारा।

जंगल के सन्नाटे में रैंच के ताले से टकराने की जोरदार आवाज दूर-दूर तक गूंज उठी।

ताले को कुछ नहीं हुआ।

राज ने फिर वार किया।

उस बार रैंच के ताले से टकराने की जोरदार आवाज के बीच ही किसी बच्चे के खिलखिलाने की आवाज भी गूंज उठी।

सब सन्न रह गये।

उन्होंने चारों ओर देखा लेकिन कहीं कोई और नजर नहीं आया।

''य...ये...आवाज कैसी थी ?"-प्रीति भयभीत स्वर में बोली।

''वैसी ही"-मोहिनी बोली-''जैसी कल उस कब्रिस्तान में हमने सुनी थी।"

सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे, फिर सबकी नजरें राजके चेहरे पर टिक गईं।

''क्या हुआ?"-उन्हें इस तरह अपनी ओर घूरते पाकर राज के मुंह से बरबस ही निकल गया।

''तुम बताओ?"-डोंगरा बोला।

''मैं क्या बताऊं?"-राज उखड़े स्वर में बोला।

''तुम्हीं तो पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हो। तुम नहीं तो और कौन बताएगा ?"

राज ने गहरी सांस ली।

वहां तो पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर होना भी गुनाह था।

''मैं तुम लोगों को डराना तो नहीं चाहता था"-फिर वो बोला- ''लेकिन अब तुम लोग पूछ ही रहे हो तो मुझे लगता है, ये उसी बच्चे की आत्मा है, जिसकी कब्र कल हमने उस कब्रिस्तान में देखी थी।"

डोंगरा का चेहरा फक्क पड़ गया। बाकी के चेहरों पर भी गम्भीरता की परत चढ़ गई।

''लेकिन

"-फिर राज ने जल्दी से जोड़ा-''जरूरी नहीं कि ऐसा ही हो। फिलहाल हमें अपना ध्यान रिंकी को ढूंढने पर केन्द्रित रखना चाहिए।"

''हां।

"-डोंगरा ने सिर हिलाया- ''हमें जल्दबाजी नहीं करनी है। हमें सही वक्त का इंतजार करना चाहिए...।"

''इंतजार?"-मोहिनी लगभग चीखती-सी बोली- ''किस चीज का इंतजार ? जब तक उस बच्चे का भूत निकलकर हमारे सामने नहीं आ जाता? जब तक रिंकी की तरह हममें से तीन-चार लोग और गायब नहीं हो जाते? जब तक हममें से एकाध मर नहीं जाता...?"

''मोहिनी...।"-अनुराग ने उसे रोकने की कोशिश की।

''नहीं।"-मोहिनी तेज स्वर में बोली-''मुझे बोलने दो। कोई बता सकता है रिंकी इस वक्त कहां है? किस हालत में है? तुम लोगों की बातों में आकर यहां आकर मैंने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती की है। उस कब्रिस्तान में वो आठ कब्रें किसके लिये खोदी गईं हैं? अब...अब मुझे नहीं लगता कि हममें से कोई भी यहां से जिंदा वापस जा पायेगा। "-कहकर मोहिनी ने अपना चेहरा अपने दोनों हाथों में छिपा लिया।

किसी के मुंह से बोल न फूटा।

जो अनकहा था, वो मोहिनी ने कह दिया था।

सब कुछ देर अपनी जगह पर पत्थर की मूरत से बने खड़े रहे।

फिर राज ने रैंच उठाया और ताले पर दोबारा वार किया।

ताला टूट कर जमीन पर जा गिरा।

ताले के उस तरह अचानक टूट जाने से भी राज हैरान हुए बिना नहीं रह सका। उसने पिछले दो वार काफी जोर से किए थे, जिनसे ताले को टस से मस नहीं होते देख कर उसे लग रहा था कि उसे आठ-दस वार करने होंगें, जिसके चलते इस बार उसने ताले पर जोर से वार भी नहीं किया था।

लेकिन पिछले दो शक्तिशाली वारों को आराम से झेल गया बेहद मजबूत सा दिखने वाला वो ताला तीसरे वार में अचानक ही टूट गया।

राज ने धक्का देकर स्टोर रूम का दरवाजा खोला। दरवाजे के निचले हिस्से वहां जमी धूल में धंस गए थे

, जिससे दरवाजे को धक्का देकर खोलना पड़ा।

अंदर बड़े से हॉल जैसा विशालकाय स्टोर रूम उनके सामने था।
 
स्टोर रूम में बहुत सारा सामान रखा था। बड़ी पेटियां, बोरे, कई तरह के औजार, जिनमें खेती के औजारों से लेकर और भी कई तरह के पुराने औजार शामिल थे। हर चीज पर चढ़ी धूल की मोटी परत दूर से ही दिखाई दे रही थी, जो इस बात की गवाही दे रही थी कि बरसों से उस सामान को हिलाया तक नहीं गया है।

लेकिन सबकी नजरें एक जगह पर टिक कर रह गईं।

उस स्टोर रूम के बीचों-बीच वाले हिस्से पर।

जहां जमीन पर...

...जहाँ रिंकी बेहोश पड़ी थी।

''रिंकी!"-मोहिनी चीख मारकर रिंकी की ओर लपकी। राज ने उसे रोकने की कोशिश करनी चाही लेकिन तब तक वो रिंकी के पास पहुंच चुकी थी।

''रिंकी!"-मोहिनी धूल भरी जमीन पर बेहोश पड़ी रिंकी को लगभग झंझोड़ते हुए-सी बोली-''रिंकी...।"

''ये बेहोश है।"-अनुराग बोला, वो भी उनके नजदीक पहुंच चुका था-''इसे कमरे में ले चलते हैं।"

''हां।"-मोहिनी ने सहमति में सिर हिलाया। रिंकी के वापस मिलने के बाद उसके शरीर में तो जैसे जान ही लौट आई थी। उसका मुरझाया चेहरा एक बार फिर खिल उठा था।

डोंगरा रिंकी को उठाने के लिए आगे बढ़ा लेकिन उसकी परवाह न करते हुए अनुराग ने रिंकी को किसी गुडिय़ा की तरह बांहों में उठा लिया और उसे लेकर दरवाजे की ओर बढ़ा।

राज दरवाजे पर खड़ा गम्भीर निगाहों से उन्हें देख रहा था। डॉली भी उसके साथ थी।

अनुराग ने एक नजर राज और डॉली पर डाली, फिर स्टोर रूम से बाहर निकल गया।

सब उसके पीछे-पीछे मीटिंग रूम में पहुंचे। वहां रिंकी को लिटाने के लिये कुछ नहीं था इसलिये अनुराग उसे बांहों में लिये हुए सीढिय़ां चढऩे लगा, जहां ऊपर बैडरूम थे।

बाकी लोग उसके पीछे थे।

सीढिय़ों पर चढ़ते समय अचानक अनुराग को कुछ अजीब-सा अहसास हुआ। उसका ध्यान अपने-आप ही अपनी गोद में रिंकी के चेहरे की ओर चला गया।

अनुराग के पैर डगमगा उठे।

रिंकी की आंखें खुली हुईं थीं और वो एकटक उसी की ओर देख रही थी।

उसके कदम सचमुच भटक गए। पीछे से दो हाथों ने उसे मजबूती से सहारा दिया वरना वो शायद डगमगा कर नीचे ही गिर जाता।

रिंकी तब भी एकटक उसी की ओर देख रही थी। उसकी आंखें भी सामान्य तरह से खुली नहीं लग रहीं थीं बल्कि काफी फैली हुई लग रहीं थीं, जैसे कटोरियों से बाहर निकल आएंगीं।

और वो जिस विचित्र ढंग से उसे देख रही थी, उससे अनुराग को अपनी रीढ़ की हड्डी में सिहरन सी दौड़ती महसूस हुई।

''क्या हुआ?"-पीछे से राज की आवाज सुनाई दी-''अभी तुम सीढिय़ों से गिरने ही वाले थे।"

''हां?"-अनुराग जैसे ट्रांस की अवस्था से बाहर निकला-उसने गर्दन घुमाकर पीछे की ओर देखा। पीछे राज और उसके पीछे बाकी लोग भी उसी की ओर देख रहे थे।

अनुराग का चेहरा पीला पड़ गया था।

उसकी वो हालत देख कर राज का चेहरा और भी गम्भीर हो गया।

फिर अनुराग ने किसी तरह अपने अंदर की सारी हिम्मत को समेटा और बिना रिंकी के चेहरे की ओर देखे दृढ़ता से सामने की ओर देखते हुए सीढिय़ां चढऩे लगा।

पता नहीं क्यों, अचानक उसे रिंकी से डर-सा लगने लगा था।

अंदर एक कमरे में जाकर उसने रिंकी को पलंग पर लिटा दिया और फिर तेजी से पीछे हट गया।

रिंकी को बिस्तर पर लिटाने के बाद न जाने क्यों उसे ऐसा लग रहा था, जैसे बहुत बड़ी मुसीबत से उसका पीछा छूट गया हो।

''रिंकी।"-सीढिय़ां चढ़ते समय पीछे हो गई मोहिनी लपककर रिंकी के पास पहुंची, फिर वो बाकी लोगों की ओर घूम कर खुशी भरे स्वर में बोली-''इसे...इसे...होश आ गया है।"

अनुराग के लिए वो नई बात नहीं थी। उसे तो सीढिय़ों पर ही पता चल गया था।

सभी ने रिंकी के पलंग को घेर लिया।

राज की नजरें अनुराग के चेहरे पर थीं। अनुराग ने भी राज की ओर देखा। राज ने उसकी आंखों में दिख रहे खौफ को पढ़ लिया था।

''रिंकी!"-डोंगरा कुछ ज्यादा ही भावुक हो गया था-''तुम कहां चली गईं थीं? हम सब...हम सब कितने डर गए थे...।"

''तुम चीखी क्यों थीं ?"-डॉली गम्भीर स्वर में बोली।

रिंकी ने डोंगरा की बात की ओर जैसे ध्यान ही नहीं दिया। वो डॉली से बोली-''मैंं चीखी थी?"

''हां। तुम्हारी चीख की आवाज हम सबने सुनी थी।"

''मुझे याद नहीं।"-रिंकी बोली।

''तुम स्टोर रूम के अंदर कैसे पहुंचीं ?"-अतुल बोला।

''मैं स्टोर रूम में थी?"-रिंकी आश्चर्य व्यक्त करते हुए बोली।

''हां। हम तुम्हें वहीं से तो लेकर आये हैं।"-मोहिनी, जो उसके बगल में बैठ कर उसके सिर पर प्यार से हाथ फेर रही थी, बोली।

''मुझे तो याद नहीं।"-रिंकी अनजान बनती हुई बोली-''मैं तो बेहोश थी। तुम्हीं लोग बताओ मेरे साथ क्या हुआ था।"

''तुम बेहोश कैसे हुईं?"-राज बोला। हालांकि उसे अपने सवाल का सही-सही जवाब मिलने की उम्मीद कम ही थी।

''मैं डॉली के साथ किचन में नाश्ता बना रही थी। फिर मैं वॉशरूम जाने के लिए गई थी। रास्ते में ही मुझे चक्कर आया और मैं बेहोश हो गई।"

सबने सवालिया निगाहों से एक-दूसरे की ओर देखा।

रिंकी क्या कह रही थी ?

वो घर के अंदर बेहोश हुई थी तो स्टोर रूम में कैसे पहुंची?

उनमें से किसी के पास इस बात का जवाब नहीं था।

वो सब लोग घर के बाहर बैठे हुए थे। रिंकी के मिलने के बाद डोंगरा और मोहिनी उल्लासित थे। वहीं, अनुराग काफी परेशान लग रहा था।

राज और डॉली गम्भीर थे। जिन हालातों में रिंकी मिली थी और उसके बाद वो जैसा बर्ताव कर रही थी, उसे वो लोग इतनी आसानी से नजरअंदाज नहीं कर सकते थे।

रिंकी एक कुर्सी पर बैठी खोई-खोई सी सामने की ओर देख रही थी। वो पहले भी कम ही बोलती थी लेकिन स्टोर रूम से मिलने के बाद तो वो और भी ज्यादा गुमसुम लगने लगी थी।

''रिंकी।"-अचानक डॉली बोली।

''हां!"-रिंकी ने चौंक कर उसकी ओर देखा , जैसे नींद से जागी हो।

''कोई परेशानी है क्या ? बहुत गुमसुम लग रही हो?"-डॉली ने पैनी निगाहों से उसके चेहरे को देखते हुए कहा।

''नहीं।"-वो वैसे ही खोई-खोई सी बोली-''ऐसा लग रहा है, जैसे कई सालों की नींद से जागी हूं।"

इससे पहले वो लोग उसकी उस विचित्र बात पर कुछ कह पाते, अचानक मोहिनी की आवाज ने सबका ध्यान खींच लिया।

''वो लोग आ गए।"

सबकी नजरें उस घर की ओर आने वाले रास्ते पर टिक गईं। उस पर जय और प्रीति आते दिख रहे थे लेकिन...।

पैदल।वे बिना कार के आ रहे थे।

रिंकी को छोड़कर सब उठ खड़े हुए

, जैसे उन दोनों का स्वागत करने वाले हों।
 
जय और प्रीति उनके पास पहुंचे। दोनों चेहरे से काफी थके लग रहे थे। लेकिन रिंकी पर नजर पड़ते ही उनके चेहरे खिल उठे।

''थैंक गॉड!"-प्रीति बोली-''रिंकी तुम ठीक तो हो? क्या हुआ था तुम्हें? कहां चली गई थीं तुम?"

रिंकी ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया

, उल्टे डोंगरा ने जय से पूछा-''क्या हुआ? तुम लोग तो पुलिस को लेकर आने वाले थे न? और तुम्हारी कार कहां है?"

''अंदर चल कर बताता हूं।"-जय थके स्वर में बोला-''या सब कुछ यहीं पूछ लोगे?"वे लोग उनके रास्ते से हट गए।

कुछ ही देर में वे सब 'मीटिंग रूम' में बैठे थे।

''क्या हुआ?"-डोंगरा जैसे बेसब्रा हो रहा था-''अब तो बताओ तुम लोग पुलिस लेकर क्यों नहीं आए? कार कहां छोड़ दी?"

''कार यहां से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर है।"-जय बोला।

''वहां क्या कर रही है?"

''अपने ठीक होने का इंतजार।"

''क्या?"

''उसमें कुछ खराबी आ गई थी। हम उसे ठीक नहीं कर पाए तो मजबूरन उसे वहीं छोडऩा पड़ा।"

''मतलब तुम लोग सड़क तक भी नहीं जा पाए?"

''पैदल जाना पड़ा। सड़क पर कोई गाड़ी नहीं दिखी।"

''कार खराब थी तो तुम लोग उतरकर पैदल जा सकते थे।"-मोहिनी बोली-''हो सकता है आगे सड़क पर कोई गाड़ी दिख जाती, जिससे लिफ्ट लेकर तुम लोग...।"

''तुम्हें क्या हुआ है?-अचानक अनुराग प्रीति से बोला। प्रीति का चेहरा भी उड़ा-उड़ा लग रहा था। जाने क्यों अनुराग को ऐसा लगा, जैसे प्रीति ने भी कुछ ऐसा देखा था, जो उसने भी देखा था।

''हम कार से जा रहे थे"-प्रीति बोली, उसका स्वर ऐसा था, जैसे वो जो बोल रही थी, उस पर उसे खुद भी यकीन नहीं हो पा रहा था-''तो अचानक एक बड़ा सा पेड़ टूटकर हमारे रास्ते में गिर गया।"

''अचानक?"-मोहिनी हैरानी से बोली।

''हां।"-प्रीति ने वैसे ही अजीब से स्वर में कहा-''न तो कोई तेज हवा चल रही थी। और न ही कुछ और था वहां, जिससे लगता कि वो पेड़ गिरा हो। वो पेड़ अचानक ही टूटकर हमारे रास्ते में आ गिरा। अगर...अगर जय ने एकदम से ब्रेक नहीं लगाए होते तो हमारी कार निश्चित रूप से उस पेड़ से टकरा ही जाती। जय हमेशा से ही बहुत सावधानी से कार चलाता है। जय की जगह अगर कोई और होता तो शायद कार उस पेड़ से टकरा ही जाती।"

''एकदम से पेड़ कैसे टूट गया?"-राज के मुंह से निकला।

''यही तो मुझे भी समझ नहीं आ रहा है।"-जय बोला-''ऊपर से वो काफी बड़ा पेड़ था। रास्ते में गिर गया तो उसके दूसरी ओर रास्ता तक दिखाई नहीं दे रहा था। और उसी के बाद कार भी अचानक खराब हो गई। मैंने काफी चैक किया लेकिन कार में क्या खराबी हुई थी, समझ नहीं पाया। और तुम लोगों को क्या लगता है, मैंने और प्रीति ने सड़क पर जाकर लिफ्ट लेने की कोशिश नहीं की? हम उस बड़े पेड़ के बगल से किसी तरह निकलकर पैदल ही एक-डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर सड़क तक पहुंचे और वहां करीब एक-दो घंटे तक इंतजार करते रहे लेकिन कोई गाड़ी वहां से नहीं गुजरी। आखिरकार हमको वापस ही लौटना पड़ा।"

उनके साथ जो गुजरी, उसे सुनकर सबके मुंह पर जैसे ताले लग गए।

सब एक-दूसरे का चेहरा देख रहे थे।

ये उनके साथ हो क्या रहा था?

एक के बाद एक अजीब घटनाएं।

पहले रिंकी का इस तरह रहस्यमयी ढंग से गायब हो जाना। कब्रिस्तान में खुदी वो आठ ताजा कब्रें। रिंकी का रहस्यमयी ढंग से स्टोर रूम के अंदर मिलना। जय और प्रीति के रास्ते में पेड़ का गिर जाना। कार का अपनेआप खराब हो जाना। फिर सड़क पर उन्हें एक भी गाड़ी नहीं मिलना।

वहां आखिर हो क्या रहा था ?''रिंकी कहां मिली ?"-जय ने पूछा।

मोहिनी ने उन्हें पूरा किस्सा बताया।

''तुम स्टोर रूम के अंदर कैसे पहुंचीं?"-जय हैरानी से रिंकी से बोला।

''स्टोर रूम!"-अचानक रिंकी जोर से चीख उठी।

सब चौंक उठे।

रिंकी के चेहरे पर अजीब सा जुनून दिखाई देने लगा था

, उसकी आंखें भी चढ़ी हुईं सी लग रहीं थीं।

''स्टोर रूम....स्टोर रूम...स्टोर रूम...!"-रिंकी फिर चीखी-''स्टोर रूम का नाम ले-लेकर तुम लोगों ने मेरा दिमाग खराब करके रख दिया है। मैं जब घर के अंदर बेहोश हुई थी तो स्टोर रूम में कैसे जा सकती हूं? तुम लोग इस तरह की बातें करके मुझे पागल कर दोगे। मैं ऊपर जा रही हूं।"-फिर वो अचानक उठ खड़ी हुई और अंदर की ओर बढ़ गई।

सब हक्के-बक्के से उसे जाते देखते रहे।

उसका ये नया रूप उनकी समझ से परे थे।

अनुराग को अपने अंदर का अनकहा डर साकार रूप लेता नजर आ रहा था।

और राज और डॉली को भी इस बात का अहसास हो रहा था कि हालात कौन-सा रूख अपना रहे थे।

वो वक्त नजदीक आ रहा था, जब उन्हें डर से भागने की जगह डर को स्वीकार कर लेना चाहिए था।

रात को सब सोने की तैयारी कर रहे थे।

दिन की घटनाओं ने सबको बुरी तरह परेशान कर दिया था। डॉली और प्रीति ने डिनर तैयार किया

, जिसे सबने आधे-अधूरे मन से खाया।
 
रिंकी ऊपर अपने कमरे में जाने के बाद एक बार भी नीचे नहीं आई थी। न ही उसने खाना खाया। मोहिनी ने बताया कि उसे हल्का बुखार था और जगाए जाने पर वो काफी नाराज हो रही थी

, जिसके चलते उन्होंने उससे रात में खाने के लिए भी ज्यादा जिद नहीं की। वो बिना खाना खाए ही सो गई।

रिंकी की तबीयत खराब होने से अब वो लोग और भी ज्यादा परेशान हो गए थे।

खाना खाने के बाद उन्होंने आपस में भी ज्यादा बातचीत नहीं की।

रात की पहली शिफ्ट में डोंगरा और अनुराग ने निगरानी ड्यूटी संभाली और बाकी सब अपने कमरों में सोने चले गए।

रात में अचानक कुछ अजीब सी आवाज सुनकर राज की नींद खुल गई।

उसने इस तरह अचानक नींद खुलने का कारण जानने के लिये इधर-उधर देखा। थोड़ी ही दूर पर दूसरे पलंग पर जय सोया हुआ था।

लेकिन वो सोया हुआ नहीं लग रहा था।

ऐसा लग रहा था

, जैसे वो धीरे-धीरे कांप रहा था।

''जय!

"-राज ने उसे आवाज दी।

कोई प्रतिक्रिया नहीं।

''जय!

"-इस बार राज ने उसे जोर से आवाज दी और पलंग से उतरकर उसके पास पहुंच गया।

जय का कांपना अब तेज हो गया था और वो बेचैनी से सिर इधर से उधर कर रहा था।

''जय!

"-उसे जगाने के इरादे से राज ने उसे पकड़कर हिलाना चाहा लेकिन जैसे ही उसने जय को छुआ

, उसके हाथ उठे और राज की गर्दन पर कस गये।

राज ने चौंक कर अपनी गर्दन को उसकी पकड़ से आजाद कराने की कोशिश की लेकिन जय के हाथ उसकी गर्दन पर कसते ही जा रहे थे।

आधे मिनट से भी कम समय में राज को समझ आ गया कि उसे किसी भी हालत में जय की पकड़ से अपनी गर्दन छुड़ानी ही थी। उसने दोनों हाथों से जय के चंगुल से अपने गले को आजाद करने की कोशिश करते हुए खुद को पूरी ताकत से पीछे धकेला। इस कोशिश में उसे कामयाबी भी मिली और उसकी गर्दन एक झटके से जय के हाथों की कैद से आजाद हो गई लेकिन राज भी अपना संतुलन बनाये नहीं रख सका और लडख़ड़ाकर पीछे जा गिरा।

तब तक उस कमरे से आ रही आवाजें सुनकर बाकी लोग भी अंदर आ गए।

राज को इस तरह जमीन पर पड़े देखकर सभी हैरान थे।

''क्या हुआ

, राज

?"-सबसे पहले डॉली उसके पास पहुंची-

''तुम जय का नाम लेकर क्यों चिल्ला रहे थे

?"

राज अपनी गर्दन सहलाते हुए जमीन से उठा। उसने देखा कि जय भी उठ बैठा था और इस तरह फटी-फटी आंखों से उसकी ओर देख रहा था

, जैसे अभी-अभी उसने राज क ी नहीं बल्कि राज ने ही उसकी गला दबाने की कोशिश की हो।

''यहां आखिर हो क्या रहा है

?"-डोंगरा झुंझलाए स्वर में बोला-

''तुम लोग कभी चैन से नहीं रह सकते क्या

? कल तुम्हें दौरा पड़ा था। आज तुम दोनों फिर कोई नया तमाशा कर रहे हो।

"

डॉली ने सख्त निगाहों से डोंगरा की ओर देखा

, फिर जय से बोली-

''तुम्हीं कुछ बताओ। क्या हो रहा था यहां पर

?"

जय ने डॉली की ओर देखा। उसकी आंखों में भय और उलझन दोनों के मिले-जुले भाव थे।

''ये नींद में कांप रहा था।

"-राज बोला-

''मैंने इसे जगाने की कोशिश की तो ये मेरा ही गला दबाने लगा।

"

''मैंं...

"-जय अटकते से स्वर में बोला-

''तुम्हारा गला दबा रहा था

?"

''हां। और वो भी पूरी लगन और मेहनत के साथ।

"

जय ने एक बार अपने चारों ओर देखा

, फिर उसने गहरी सांस ली।

''थैंक गॉड!

"-वो बोला-

''वो सब सपना ही था।

"

''कैसा सपना

?"-राज बोला।

''कल तुमने सपना देखा था।

"-पीछे से अनुराग बोला-

''आज इसने देख लिया। लगता है इस मकान का सबसे ज्यादा असर तुम लोगों पर ही पड़ा है।

"

''क्या देखा तुमने

?"-अनुराग की बात को नजरअंदाज करते हुए

राज

जय से बोला।

''वो काफी अजीब सपना था

"-जय ऐसे बोला

, जैसे अभी भी नींद से पूरी तरह जगा न हो।

''कैसा अजीब सपना

?"-इस बार अनुराग ने उससे सवाल किया।

''मैंने देखा

"-जय जैसे शून्य में ताकते हुए बोला-

''कि मैं नींद से उठकर नीचे गया। नीचे हॉल पूरा खाली था। फिर मैं रात में ही दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। सब कुछ इतना असली जैसा लग रहा था कि...कि मुझे अब भी लग रहा है

, जैसे वो सब सच में हुआ हो। मैं दरवाजा खोलकर बाहर तो निकल रहा था लेकिन मेरा मन...मन मुझे चीख-चीखकर बाहर जाने से मना कर रहा था। लेकिन मैं अपने ही दिमाग की बात न मानकर दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। और बाहर...।

"-कहते-कहते जय खामोश हो गया।

''बाहर क्या

?"-अनुराग सस्पेंस भरे स्वर में बोला।

''बाहर पूरा मैदान खाली था। कुछ देर मैं वहीं खड़ा रहा। फिर अचानक...अचानक बाहर बहुत सारे कटे हुए हाथ

, पैर

, सिर वगैरह दिखाई देने लगे।

"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

''फिर

?"-राज की गम्भीर आवाज ने सन्नाटे को भंग किया।

''वो...वो जमीन से निकल रहे थे...मैं उन्हें देखकर चीखना चाहता था। लेकिन मैं चीख नहीं पा रहा था। लग रहा था

, जैसे...जैसे किसी ने मेरा गला पकड़ लिया हो...। फिर मुझे अपने गले पर दो हाथ महसूस हुआ...मैंने देखने की कोशिश की कि वो हाथ किसके थे...अंधेरे में मेरे सामने एक आदमी ऐसे प्रगट हुआ...जैसे...जैसे धुएं से बन रहा हो...। वो मेरा गला दबाने की कोशिश कर रहा था। वो बहुत भयानक था।

"-जय ने जोर से झुरझुरी ली और आंखें मूंद लीं।

''फिर?"-डॉली बोली।

''फिर मैंने उसके चंगुल से आजाद होने के लिए दोनों हाथों से उसका गला पकड़ लिया। मैं उसे जान से मार देना चाहता था। इतना गुस्सा...इतना आवेश...मैंने कभी महसूस नहीं किया। मैं पूरी ताकत से उसका गला दबा रहा था। फिर अचानक मेरी नींद खुल गई।

"

राज ने डॉली की ओर देखा। डॉली का चेहरा भी बेहद गम्भीर हो गया था।
 
कमरे में रिंकी और मोहिनी को छोड़कर सब लोग उपस्थित थे। मोहिनी को रिंकी पर बेहद प्यार आ रहा था। स्टोर रूम में रिंकी के मिलने के बाद से वो उसका ऐसे ख्याल रख रही थी

, जैसे रिंकी सचमुच ही उसकी छोटी बहन हो।

''भूल जाओ इसे।

"-राज बोला-

''वो एक डरावना सपना था

, बस।

"

राज जय को आश्वासन तो दे रहा था लेकिन उसे खुद अपनी आवाज खोखली महसूस हो रही थी।

जय ने राज की ओर देखा और बोला-

''हां। बस डरावना सपना ही तो था। जैसे तुमने देखा था।

"

राज उसकी बात के जवाब में कुछ नहीं कह सका।

उस रात फिर उनमें से कोई भी सो नहीं पाया।

तीसरा दिन

प्रीति अपने कमरे से बाहर आई।

बाकियों की तरह वो भी रात भर सो नहीं पाई थी। वहां हो रही अजीब घटनाओं ने सबका जीना हराम कर रखा था।

बाहर उसे गलियारे में पड़ी कुर्सी में अनुराग बैठा दिखाई दिया।

अनुराग के साथ जय को निगरानी ड्यूटी पर होना चाहिए था।

"जय कहां है

?"-प्रीति उसके सामने खड़े होकर अपने बालों को हाथ से कुरेदते हुए बोली।

"जय और डॉली नीचे गए हैं।"-अनुराग बोला-"डॉली सबके लिए चाय बना रही है। जय भी उसी के साथ गया है।"

प्रीति सीढिय़ों से नीचे उतरी। गलियारे के अंत में किचन का दरवाजा खुला दिखाई दे रहा था और डॉली की पीठ दिख रही थी

, जो कि चाय बनाने में व्यस्त थी।

प्रीति

'मीटिंग रूम

' में पहुंची। उसकी आंखें जय को तलाश रहीं थीं।

उसे ये देखकर हैरानी हुई कि बाहर का दरवाजा खुला हुआ था। सूर्योदय में अभी समय बाकी था। बाहर अब भी अंधेरा छाया हुआ था।

प्रीति बाहर आई तो उसने पाया कि जय दरवाजे के आगे सीढिय़ों पर बैठा हुआ सामने देख रहा था।

प्रीति भी उसके बगल में ही बैठ गई।

जय ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की।

प्रीति कुछ देर उसी की तरह सामने देखती रही

, जिधर वो देख रहा था। सामने वही छोटे से मैदाननुमा आंगन के पार वही कच्चा रास्ता दिख रहा था

, जिससे वो लोग करीब दो दिन पहले वहां आए थे।

अंधेरे के कारण उस रास्ते को देखने पर डरावना-सा अहसास हो रहा था।

सुबह तड़के का समय होने के कारण वातावरण में ठण्ड भी अधिक थी। प्रीति को चिंता हुई। जय जाने कब से वहां बैठा था।

''क्या हुआ

?"-वो जय की बांह पकड़ते हुए प्यार भरे स्वर में बोली।

''कुछ नहीं।

"-जय ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया।

जय के स्वर में गम्भीरता को महसूस कर प्रीति चौंकी। आम तौर पर जय कम ही गम्भीर रहता था। हर बात को मजाक में उड़ा देना तो उसकी आदत में शुमार था।

''कुछ तो बात है।

"-प्रीति का स्वर भी गम्भीर हो गया-

''जो तुम मुझे बता नहीं रहे।

"

जय ने गम्भीर निगाहों से प्रीति की ओर देखा

, फिर सामने देखता हुआ बोला-

''मुझे लगता है मैंने तुम सबको यहां लाकर बहुत गलत किया है।

"

''क्या

?"

''हां।

"

''क्यों

?"

''यहां जो कुछ भी हो रहा है...सब काफी अजीब है। और भयानक भी। अब तो मुझे भी डर लगने लगा है।

"

प्रीति को बरबस ही हंसी आ गई।

''क्या हुआ

?"-जय ने चौंक कर उसकी ओर देखा।

''कुछ नहीं।

"-प्रीति हंसी रोकने की कोशिश करती हुई बोली।

''नहीं

, बताओ न

, मैंने हंसने वाली कौन सी बात कह दी

?"

''तो और क्या कहा

? डर-सा लग रहा है। अरे

, ये तो मुझे कहना चाहिए था। तुम मर्द होकर इस तरह डरने की बात करोगे तो हंसी तो आएगी ही।

"

जय की नजरें फिर सामने की ओर चली गईं।

''मर्द-औरत वाली बात नहीं है।

"-वो खोए-खोए से स्वर में बोला-

''मुझे लग रहा है जैसे...जैसे ये ऐसी जगह है जहां किसी को नहीं होना चाहिए। हम लोगों ने यहां आकर गलती कर दी है। और इस गलती का सबसे ज्यादा बोझ मुझी पर है क्योंकि मैं ही तुम सबको यहां लेकर आया हूं।

"

''कम ऑन!

"-प्रीति उसकी बांह पकड़कर उससे और भी ज्यादा सटते हुए बोली-

''दो दिन तो बिता चुके हैं हम यहां। आज तो आखिरी दिन है। कल रिंकी के गायब होने पर मैं सचमुच बहुत डर गई थी लेकिन अब तो वो भी मिल गई है। बस

24 घंटों की बात और है। फिर हमें इस जगह से छुटकारा भी मिल जायेगा और हम अमीर भी हो जायेंगें। हमारे पास पैसा ही पैसा होगा। मैं

, तुम

, अनुराग और मोहिनी

, जहां चाहेंगें

, वहां घूमने जाएंगें। जो चाहेंगें

, वो करेंगें। और क्या पता

, हमें अपने इस सफर में दो और नए साथी मिल जाएं। अनुज और डॉली भी हमारे साथ चलने के लिए राजी हो जाएं।

"

''वो राजी नहीं होंगें। और फिलहाल सबसे बड़ा बात तो यही होगी कि हम यहां से किसी तरह सुरिक्षत निकल जाएं।

"

''तुम भी पता नहीं क्या-क्या सोच रहे हो। अरे

, एक-दो डरावने सपने देखकर कोई मर थोड़े ही जाता है।

"-कहते हुए प्रीति ने सिर उसके कंधे पर टिका दिया।

जय कुछ नहीं बोला। वो सामने अंधेरे में डूबे उस रास्ते को देखता रहा

, जिससे वो उस मनहूस जगह पर आये थे।

प्रीति का कहना भी सही था।

एक-दो डरावने सपने देखकर कोई मर थोड़े ही जाता है।

सुबह हो चुकी थी।

वो सब मीटिंग रूम में बैठे नाश्ता कर रहे थे। सिवाय रिंकी और मोहिनी के।

रिंकी आज भी अभी तक नीचे नहीं आई थी। मोहिनी भी शायद उसी के पास डटी हुई थी।

''मोहिनी कहां हैं

?"-अनुराग नाश्ता करते हुए बोला-उसे नाश्ता नहीं करना क्या

?"

''रिंकी और अपने लिए नाश्ता लेकर ऊपर गई थी।

"-प्रीति बोली-

''कह रही थी रिंकी कुछ भी खाने से मना कर रही है। उसे बुखार भी है।

"

अनुराग खाते खाते रुक गया। उसने राज की ओर देखा।

''अभी तक उसका बुखार नहीं उतरा

?"-राज डॉली से बोला।

''मोहिनी तो यही कह रही थी। कह रही थी उसके साथ ही नाश्ता करेगी और जिद करके उसे भी अपने साथ ही कुछ खिला देगी।

"

''कल से बुखार है।

"-प्रीति चिंतित स्वर में बोली-

''मेरे ख्याल से...हमें उसका टेस्ट करवा लेना चाहिए।

"

''टेस्ट

?"

''कोरोना टेस्ट।

"

कमरे में सन्नाटा-सा छा गया।

''रिंकी को

"-डोंगरा बोला-

''कोरोना कैसे हो सकता है

?"

''वो अभी पिछले दिनों

"-जय डोंगरा से बोला-

''किसी ऐसे संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में आई थी क्या

? या आप...

?"

''नहीं।

"-डोंगरा परेशान-सा दिखने लगा-

''कुछ लोग शहर में पॉजीटिव मिले हैंं लेकिन मेरे तो ऑफिस की छुट्टी चल रही थी। घर पर ही रहकर ऑनलाइन काम देख रहा था। बहुत कम लोगों से मिलना-जुलना हुआ है और ऐसे किसी भी व्यक्ति के पॉजीटिव मिलने की खबर नहीं है

, जिससे मेरी मुलाकात हुई हो।

"

''और रिंकी

?"

''वो तो वैसे भी ज्यादातर समय घर पर ही रहती है। हां

, दूधवाले वगैरह आते हैं तो उनसे सामान जरूर लेती है लेकिन उनके भी किसी के पॉजीटिव होने जैसी जानकारी अब तक मुझे नहीं है।

"

''फिर उसे अचानक ये बुखार कैसे आ गया

?"-अनुराग बोला।

''और आ भी गया

"-डोंगरा परेशान सा बोला-

''तो हम उसका कोरोना टेस्ट कैसे करवा सकते हैं

? यहां तो हमारे पास कोई साधन भी नहीं हैं।

"

''आज आखिरी दिन है।

"-जय धीमे से बोला-

''ये दिन गुजार कर हम इस मुसीबत से छुट्टी पा सकते हैं। फिर हम आराम से शहर वापस लौटकर रिंकी की जांच करा सकते हैं।

"

अनुराग ने जय को ऐसे देखा

, जैसे उसे अपनी आंखों पर यकीन न आ रहा हो।

''क्या हुआ

?"-उसे ऐसे अपनी ओर देखते पाकर जय बोला।

''आखिरी दिन

? आखिरी दिन

? आखिर कब तक हम यहां हाथ पर हाथ धर कर बैठे आखिरी दिन का इंतजार करते रहेंगें

? कब तक

? जब तक सचमुच में हमारा आखिरी दिन नहीं आ जाता

?"-कहते हुए उसने मेज पर इतनी जोर से हाथ मारा कि मेज पर रखी प्लेटें तक उछल गईं। गुस्से में उसकी आवाज भी तेज हो गई थी।

''आखिर तुम इतने नाराज क्यों हो रहे हो

?"-जय बोला-

''अगर तुम लोग अभी चलना चाहते हो तो अभी चलो यहां से। मैंने कब मना किया है

? मैं तो कल भी गया था। लेकिन रास्ता बंद होने के कारण वापस लौट कर आना पड़ा...।

"

''मुझे तुम्हारी उस बात का भी भरोसा नहीं है।

"-अनुराग चीख कर बोला-

''हो सकता है तुमने और प्रीति ने ये प्लान बनाया हो

, जिससे हम यहां तीन दिन तक रूक सकें और वापस लौटकर हमें मनगढ़ंत कहानी सुना दी।

"

''क्या बकवास कर रहे हो

?"-इस बार जय भी उछलकर खड़ा हो गया-

''तुम्हें लगता है हम तुम्हारे साथ धोखा कर रहे हैं

? तो जाओ जाकर देख लो। रास्ते में वो पेड़ अब भी गिरा होगा। वहां हमारी कार भी खड़ी होगी। फिर तुम उस पेड़ के ऊपर से चढ़कर सड़क तक चले जाना। हो सकता है तुम्हारी किस्मत हमसे अच्छी हो और तुम्हें कोई गाड़ी मिल जाए। गाड़ी न भी मिले तो तुम पैदल ही चले जाना। क्योंकि मैं और प्रीति तो झूठ बोलकर तुम्हें यहां फंसाने की कोशिश कर रहे हैं न...

?"

''देखो

"-राज उन दोनों के बीच में आते हुए बोला-

''ये समय गुस्से से नहीं बल्कि शांति से काम लेने का है। हम सभी यहां फंसे हुए हैं। जो भी कदम उठाना है

, सोच समझकर उठाना है।

"

''मोहिनी कहां है

?"-अनुराग बोला-

''उसे बुलाकर लाओ।

"

''तुम्हें एकदम से मोहिनी की इतनी ज्यादा फिक्र कैसे होने लगी

?"-प्रीति बोली

, जो कि अनुराग द्वारा उस पर और जय पर लगाए गए आरोप से साफ नाराज दिख रही थी-

''तुम तो हमेशा उस पर चिल्लाते ही रहते हो।

"

''अगर उस रिंकी को कोरोना है तो उसके पास किसी को नहीं रहना चाहिए।

"-अनुराग अब भी गुस्से में लग रहा था लेकिन ऐसा लग रहा था कि वो अपनी आवाज को संयमित रखने की कोशिश कर रहा था-

''मोहिनी को उसके पास छोडऩा खतरनाक है।

"

''लेकिन वो तो कल से ही उसके साथ है।

"-डॉली बोली-

''उस समय हमें ऐसा कोई ख्याल ही नहीं आया।

"

''वो सब मैं नहीं जानता।

"-अनुराग सख्त स्वर में बोला-

''मोहिनी को रिंकी के पास से लेकर आओ। दोनों को आइसोलेट कर दो। लेकिन अलग-अलग। मैं मोहिनी को अब उस रिंकी के साथ एक पल भी नहीं रहने देना चाहता।

"

''ठीक है।

"-डॉली सीढिय़ों की ओर बढ़ते हुए बोली-

''मैं मोहिनी से बात करती हूं।

"
 
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