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Horror मौत की चाल

सभी उस कब्र के पास पहुंचे। वो बाकी कब्रों से थोड़ी बड़ी थी।

उस कब्र का टूम्बस्टोन भी काफी बड़े आकार का था। उस पर पत्थर पर ही खोदकर लिखा गया था-

हेयर लाइज रॉबर्ट कीन

हू लिव्ड अपॉन ह्यूमन ब्लड

(यहां जेम्स कीन सोया हुआ है। जो इंसानी खून पर जीवित रहा।)

''ओ माई गॉड!

"-मोहिनी ने अपने मुंह पर हाथ रख लिया।

सिर्फ मोहिनी ही नहीं

, कब्र पर लिखी इबारत पढ़कर वहां उपस्थित हर शख्स स्तब्ध रह गया।

''शायद हमें यहां नहीं आना चाहिए था।

"-राज गम्भीर स्वर में बोला।

कोई कुछ नहीं बोला।

तभी बादलों की गडग़ड़ाहट ने सबका ध्यान आकृष्ट किया। सबकी नजरें ऊपर की ओर उठ गईं। यकायक आसमान में इतने घने काले बादल घिर आए थे कि दिन के समय ही रात जैसा अहसास होने लगा था।

वे सब लोग कब्रिस्तान से बाहर निकले और वापस उसी मकान की ओर बढ़ गए।

बारिश की हडबडी में किसी ने किसी ने कब्रिस्तान का गेट बंद करने की ओर ध्यान नहीं दिया।

कब्रिस्तान से वापस लौटते समय जब वे लोग पेड़ों के बीच से गुजर रहे थे तो डॉली एक जगह ठिठक गई।

उसे वहां रूकते देखकर डोंगरा भी ठिठक गया हालांकि बाकी लोग आगे थे इसलिए किसी ने ध्यान नहीं दिया।

डॉली गौर से जमीन के उस हिस्से को देख रही थी।

वहां जमीन पर हर जगह घास थी लेकिन जमीन का वो हिस्सा घासविहीन था। उसे देखकर ऐसा लग रहा था

, जैसे वहां हाल ही में खुदाई करके फिर मिट्टी पाट दी गई हो।

डॉली ने डोंगरा की ओर देखा।

डोंगरा के होंठों पर मुस्कान आ गई। उसने स्वीकृति में सिर हिलाया।

''ओह!

"-डॉली के मुंह से निकला।

''तीन दिन बाद।

"-कहकर डोंगरा उसे अपने पीछे आने का इशारा करते हुए बाकी लोगों के साथ हो लिया।

डॉली ने भी एक नजर जमीन के उस हिस्से पर डाली

, फिर तेजी से चलते हुए बाकी सबके साथ हो ली।

जब तक वे घर के अंदर पहुंचे

, तब तक बाहर जोरदार बारिश शुरू हो चुकी थी।

वे लोग बाहरी कमरे में ही एक साथ बैठे

, जिसे

'मीटिंग रूम

' का नाम दिया गया था।

उस समय उनके बीच चर्चा का हॉट टॉपिक उनकी हालिया खोज वो पुराना कब्रिस्तान ही था।

''इतनी वीरान जगह में कब्रिस्तान होना अजीब नहीं है

?"-प्रीति बोली।

''वो कब्रिस्तान अभी का नहीं है।

"-अनुराग बोला-

''काफी पुराना है। उस समय यहां लोग रहते होंगें। आसपास कोई बस्ती वगैरह होगी।

"

''लोग रहते थे

"-प्रीति अनुराग की ओर घूमी-

''तो चले क्यों गए

?"

''क्या पता क्यों चले गए

?"-अनुराग ने कंधे उचका दिए-

''होगी कोई वजह। मैंने यहां का इतिहास जानने का ठेका थोड़े ही ले रखा है।

"

''लेकिन उस कब्रिस्तान को ढूंढने का ठेका तो लिया था।

"-मोहिनी नाराजगी भरे स्वर में बोली।

''कम ऑन

, मोहिनी। छोटी सी बात का बतंगड़ मत बनाओ।

"

''क्या मतलब छोटी-सी बात

? जब हमसे साफ-साफ कहा गया था कि हमें जंगल में नहीं जाना है

, यहीं इसी मकान के दायरे में रहना है तो तुम्हें जंगल में जाने की क्या जरूरत थी

? न तुम वहां जाते और न हमें वहां कब्रिस्तान होने का पता चलता।

"

''तुम कुछ ज्यादा ही एक्साइटेड हो रही हो। वो एक कब्रिस्तान ही तो है। वहां से कोई हमें खाने नहीं आ रहा है।

"

मोहिनी ने गुस्से में फिर कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन फिर सिर को इनकार में हिलाते हुए चुप ही रही।

''वैसे मुझसे पूछो तो

"-जय बोला-

''उस

'कॉफिन मैन

' के सामने तो वो कब्रिस्तान बिल्कुल भी अजीब नहीं है।

"

''ये तो बिल्कुल सही बात है।

"-अनुराग बोला-

''बहुत दिमाग खराब किया उसने कल रात। मन तो कर रहा था उसे सबक सिखा ही दूं...।

"

''तुम उसे सबक सिखाते

?"-मोहिनी उपहासपूर्ण स्वर में बोली-

''उसे ताबूत से निकलते देखकर सबसे पहले तो तुम्हारा चेहरा ही फक्क पड़ गया था।

"

''बकवास मत करो

"-अनुराग झुंझलाया-

''वो एकदम से जिस तरह वो ताबूत से बाहर निकला

, उससे मैं बस थोड़ा चौंक गया था।

"

''ही ही ही।

"

''और वैसे भी तुमसे ज्यादा ही लम्बा था वो।

"-प्रीति भी मोहिनी की साइड लेते हुए बोली।

''लम्बा होने से कुछ नहीं होता। वो ठण्डे-ठण्डे बात कर रहा था इसलिए बर्दाश्त कर गया। अगर हम लोगों को टच वगैरह करने की कोशिश करता तो उसकी दुर्गति कर देनी थी मैंने।

"

''वो तो हमारी सुरक्षा के बारे में ही बात कर रहा था।

"-राज सोचपूर्ण स्वर में बोला।

''क्या मतलब

?"-अनुराग ने चौंककर उसकी ओर देखा।

''उसने हमें यहीं रहने के लिए कहा था। जंगल में जाने से मना किया था।

"

''फिर वही बात। यार

, चले भी गए तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा

?"

राज ने जवाब में कुछ नहीं कहा। वो किसी सोच में डूबा लग रहा था।

''कब्रिस्तान में हमें जो बच्चे की हंसी सुनाई दी थी

"-जय राज से बोला-

''उसी के बारे में सोच रहे हो न

?"

''हां।

"-राज ने स्वीकृति में सिर हिलाया-

''पहले वो बच्चे का हंसना

, फिर एक बच्चे की कब्र का मिलना...।

"

''छोड़ो यार ये सब बातें!

"-अनुराग बोला-

''अब तो वापस लौट आए न। अब नहीं जाएंगें उस कब्रिस्तान में। ठीक है

?"

कोई कुछ नहीं बोला।

''केयरटेकर साहब दिखाई नहीं दे रहे।

"-अचानक अनुराग का ध्यान इस बात की ओर गया कि डोंगरा उनके साथ नहीं था।

''वो बाहर गए हैं।

"-मोहिनी बोली।

''अरे! मैंने ध्यान नहीं दिया।

"

तभी दरवाजे पर डोंगरा नजर आया। बारिश से बचने के लिए उसने एक हाथ में छतरी पकड़ रखी थी

, जिसके किनारों से पानी की बूंदें टपक रहीं थीं। दूसरे हाथ में उसने एक संदूक पकड़ा हुआ था।

''सन्दूक। सन्दूक। सन्दूक।

"-अनुराग ऐसे बोला

, जैसे कविता पढ़ रहा हो-

''आखिर कितने सन्दूक हैं आपके पास

?"
 
डोंगरा मुस्कुराया। उसने संदूक एक तरफ दीवार से सटकर रखी एक छोटी मेज पर रखा

, फिर छाता बंद करते हुए बोला-

''बस ये आखिरी है।

"

''अब इसमें क्या रखवायेंगें आप हम लोगों से

? हम लोगों के सिर

?"

''कपड़े उतरवा लेगा।

"-जय इतने धीरे से बुदबुदाया कि उसके बगल में बैठे अनुराग को ही सुनाई दिया-

''नंगे घूमने के लिए बोलेगा।

"

''नहीं।

"-डोंगरा वहां खाली पड़ी इकलौती कुर्सी पर बैठते हुए बोला-

''इसमें कुछ रखना नहीं है। इसमें से निकालना है।

"

''क्या है इसमें

?"-राज बोला।

''ये आप लोगों को रात में ही पता चलेगा।

"

''रात में

?"-मोहिनी बोली।

''हां।

"-अनुराग ने तुरंत मोहिनी की बात पकड़ी-

''अब रात में निकलेगा तो जाहिर है भूत ही होगा इस सन्दूक में।

"

''दरअसल

"-डोंगरा बोला-

'' 'पैरानॉर्मल होल्ड

' की ओर से मेरे द्वारा आपको दिया जाने वाला ये इकलौता टास्क है। मेरे ख्याल से हमारे होस्ट द्वारा भी आपको यहां कुछ टास्क दिए जाने थे लेकिन

'कॉफिन मैन

' ने तो इस बारे में कुछ नहीं कहा। उसने तो बस जंगल में नहीं जाने और स्टोर रूम में नहीं जाने के लिए ही कहा और गायब हो गया।

"

''यानि उस सन्दूक में क्या है

"-राज बोला-

''ये जानने के लिए हमें रात तक का इंतजार करना पड़ेगा

?"

''रात आठ बजे तक। तब तक हम खाना-पीना करके फुर्सत में हो चुके होंगें। तभी वो सन्दूक खुलेगा और तभी पता चलेगा कि टास्क क्या है

?"

''तो रात में ही लाते इस मुसीबत को।

"-जय गहरी सांस लेकर बोला-

''अभी से लाकर हमारी जान गले में अटका देने से क्या सुख मिला आपको

?"

उसकी बात से डोंगरा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

''वैसे आपको तो पता ही होगा उस सन्दूक में क्या है

?"-अनुराग गहरी निगाहों से डोंगरा को देखते हुए बोला।

''पता

? मुझे रत्ती भर भी आइडिया नहीं है कि उसमें क्या है।

"

''तो अभी खोलकर देख लें

? यहां कौन देखने वाला है

?"

''रूल मिस्टर अनुराग! आपकी नियमों को तोडऩे में बहुत दिलचस्पी रहती है। ये मत भूलिए कि इस कैम्प के कुछ छोटे-मोटे रूल भी हैं

, जिनका पालन कर लेंगें तो हमारी शान नहीं घट जाएगी। और वैसे भी मुझे तो यहां भेजा ही इसलिए गया है कि मैं सुनिश्चित करूं कि कैम्प का संचालन रूल के मुताबिक हुआ या नहीं।

"

''तो उस कब्रिस्तान में जाने के लिए भी आप हमारे कोई पॉइंट काटने वाले हैं क्या

?"-जय की भंवें उठीं।

''नहीं। उसके लिए मैं कुछ नहीं करूंगा। जंगल में न जाने के लिए

'कॉफिन मैन

' ने कहा था। अगर बाद में मुझसे पूछा जाता है कि तो मुझे जरूर बताना होगा कि आप लोग वहां गए थे। वरना मुझे इसके लिए आप पर कोई कार्यवाही करने के निर्देश नहीं हैं।

"

''उस कब्रिस्तान का झंझट कम था

"-अनुराग बोला-

''जो अब आप ये सन्दूक उठा लाए। अब रात तक यही सस्पेंस बना रहेगा कि साले सन्दूक में है क्या

?"

''बियर विद अस

, मिस्टर अनुराग।

"-डोंगरा सांत्वना भरे स्वर में बोला-

''मेरे पास तो ये सन्दूक पिछले तीन दिन से है। आपको तो कुछ ही घंटों में पता चल जायेगा कि उसमें क्या है। वैसे जहां तक मेरा अंदाजा है कोई खास चीज नहीं होगी। आप लोगों के लिए कोई टास्क ही है।

"

अनुराग खामोश हो गया।

आठ बजे से पहले ही वे सब डिनर करके फुर्सत से

'मीटिंग रूम

' में आकर बैठ गए थे।

सभी ये जानने के लिए उत्सुक थे कि उस सन्दूक में से क्या निकलने वाला था।

ठण्ड कल के मुकाबले अधिक थी इसलिये अनुराग ने आतिशदान में लकडिय़ां भी जला ली थीं

, जिससे कमरे में गर्माहट थी। लकडिय़ां लेने उसे घर से बाहर नहीं जाना पड़ा था। वहीं एक कमरे में उसे लकडिय़ों का ढेर मिल गया था

, जो शायद आतिशदान के लिये ही वहां रखी गईं थीं।

अंदर वाले कमरे में एक बड़े साइज की पुरानी मेज रखी थी

, जिसे उन्होंने लाकर उस कमरे के बीचों-बीच रख दिया था। डोंगरा जो सन्दूक लाया था

, वो उसी मेज पर रखा था।

''खोलो इसे!

"-प्रीति दोनों हाथ आगे बढ़ाकर कमरे के बीचों-बीच एक छोटी मेज पर रखे उस दूसरे सन्दूक की ओर इशारा करते हुए बड़े फर्माइशी ढंग से बोली।

''अभी रूको।

"-राज ने कहा।

''क्यों

?"

''अभी

7.59 हुआ है। आठ बजने में एक मिनट बाकी है।

"

''वाह। कमाल की समय की पाबंदी है।

"

राज कुछ नहीं बोला।

''यहां ठण्ड बहुत है।

"-मोहिनी ने दोनों हाथों से अपनी जैकेट के सामने के हिस्से को पकड़कर जैकेट को अपने शरीर पर कसते हुए कहा।

''जंगल के कारण।

"-अनुराग बोला-

''यहां बहुत घने पेड़ हैं

, जिनसे वातावरण में आद्र्रता अधिक है।

"

मोहिनी ने स्वीकृति में सिर हिलाया

, साथ ही वो धीमे से आतिशदान के और करीब खिसक गई। आतिशदान के बिल्कुल पास बैठी अपने हाथ सेंक रही प्रीति उसकी ओर देखकर मुस्कुरा दी। जवाब में मोहिनी भी मुस्कुराई।

आठ बजते ही डोंगरा आगे बढ़ा और उसने वो दूसरा सन्दूक खोला।

सन्दूक में जो कुछ था

, उसे देखकर वो हैरान हुए बिना नहीं रह सके।

एक पुराना

, बहुत पुराना टेप रिकॉर्डर!

और एक अजीब सा मोटा-सा कागज

, जो कि कागज कम

, चमड़े या ऐसी ही किसी चीज का टुकड़ा अधिक लग रहा था।

उस टुकड़े पर बड़े-बड़े सुर्ख लाल अक्षरों में एक ही शब्द लिखा था।

डोंगरा खामोशी के साथ उस शब्द को घूरता रहा।

''क्या लिखा है

?"-जय उत्सुकता के साथ बोला।

डोंगरा कुछ नहीं बोला तो राज ने वो टुकड़ा उसके हाथ से ले लिया और उसे पढ़ा।

''भूत।

"-फिर राज बोला-

''इस पर भूत लिखा है।

"

चेहरे पर हैरानी के भाव लिए जय ने उसके हाथ से वो टुकड़ा ले लिया। उसने उस पर लिखे शब्द पर नजर डाली।

राज सच कह रहा था।

उसने बाकी लोगों की ओर देखा।

सबको जैसे सांप सूंघ गया था।

''इसका क्या मतलब हुआ

?"-फिर प्रीति बोली।

''एक खाली कैसेट

, एक पुराना टेप रिकॉर्डर और इस चमड़े के टुकड़े पर लिखा है भूत। लेकिन अब सवाल ये है कि हमें क्या करना है

?"

डोंगरा ने टेप रिकॉर्डर के ऊपर लगे बटनों में से एक बटन दबाया

, खट् की आवाज के साथ कैसेट वाला खांचा खुल गया

, जिसमें उसने खाली कैसेट फंसाया और खांचे को वापस बंद कर दिया और रिकॉर्डिंग का बटन दबा दिया।

कैसेट में रिकॉर्डिंग शुरू हो गई।

''मुझसे कहा गया था

"-डोंगरा गम्भीर स्वर में बोला-

''आप लोगों का टास्क होगा इस सन्दूक में दिए सब्जेक्ट पर चर्चा करना। सन्दूक में से निकले टेप रिकॉर्डर और कैसेट से साफ है कि हमें अपनी बातचीत के सेशन को रिकॉर्ड भी करना है। चर्चा पूरी होने के बाद मुझे इस सन्दूक से निकला सारा सामान ज्यों-का-त्यों वापस सन्दूक में बंद करके सन्दूक को सील करने के निर्देश हैं। तीन दिन बाद इन्हें कंपनी को सौंप दिया जायेगा।

"

''रात के इस वक्त

"-मोहिनी बोली-

''इस जगह हमें भूत पर चर्चा करनी है

?"

''उन लोगों के पास कोई और टॉपिक नहीं था क्या

?"-प्रीति भुनभुनाई।

डोंगरा मुस्कुराया और वापस अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गया।

''मेरे ख्याल से

"-फिर वो बोला-

''हम सबको अपनी-अपनी कुर्सियां टेबल के और पास ले आनी चाहिए

, जिससे हमारी आवाजें टेप रिकॉर्डर में और भी अच्छे से रिकॉर्ड हो सकें।

"

सबने सुझाव पर अमल किया।

वे अपनी कुर्सियां उठाकर मेज पर रखे टेप रिकॉर्डर के और नजदीक खिसक आए। अब उनके बीच का घेरा और भी छोटा हो गया था।

''तो

"-डोंगरा राज से बोला-

''शुरूआत आप ही करिये।

"

''मैं

?"-राज बोला।

''आप और मिस डॉली। आखिर आप दोनों पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हैं। भूत के विषय में आपसे ज्यादा और कौन जानता होगा

? और मुझे ये जानने में भी काफी दिलचस्पी है कि आप इस दिलचस्प और गैर परंपरागत पेशे में कैसे आए

?"

''ये कोई पेशा नहीं है

, डोंगरा साहब।

"-राज गहरी सांस लेकर बोला।

''फिर

? फिर क्या है

?"

''ये एक शोध का क्षेत्र है।

"

''शोध करना भी तो पेशा ही होता है। आखिर रिसर्च स्कॉलर्स को शोध करने का पैसा मिलता है।

"

''आप ऐसा कह सकते हैं। लेकिन मेरे हिसाब से शोध करना एक जुनून होता है। कुछ जानने की दिलचस्पी

, कुछ ऐसा पता करने की महत्त्वाकांक्षा जो बहुत कम लोग जानते हों या अब तक कोई भी न जान पाया हो।

"

''शोध तो ऐसी चीजों पर किए जाते हैं

, जो वास्तविक होती हैं। जिनका अस्तित्त्व होता है। जैसे विज्ञान।

"

''विज्ञान क्या है

?"-राज बोला।

''चीजों को भौतिक

, रसायनिक या जैविक रूप से तथ्यों

, प्रयोगों

, साक्ष्यों के आधार पर समझना ही विज्ञान है।

"

''क्या पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर ऐसा नहीं करते

? क्या पैरानॉर्मल साइंस नहीं होता

?"

सब राज को देखते रहे।

''पैरानॉर्मल साइंस भी है। लेकिन सब लोगों को इसकी जरूरत नहीं पड़ती। इसलिये लोग इसका मजाक उड़ाते हैं। एक स्वस्थ्य आदमी-जो कभी बीमार न पड़ता हो-डॉक्टरों का मजाक उड़ा सकता है। उसे चिकित्सा विज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं होता कि चिकित्सा विज्ञान का अस्तित्त्व ही नहीं है। एक ट्रेन ड्राइवर का इस बात से कोई वास्ता नहीं होता कि प्लेन कैसे उड़ाया जाता है

? इसलिये अगर कभी उसे इस बारे में चर्चा करने को कहा जाये तो वो प्लेन हवा में उड़ाने का भी मजाक उड़ा सकता है। विज्ञान की ही ऐसी कई शाखाएं हैंं

, जिनका आम लोगों ने नाम तक नहीं सुना होता। जिनके बारे में आम आदमी सुनेगा तो वो उसे एकदम फिजूल लगेंगीं। उसे पर फूटी कौड़ी खर्च करना भी पैसा बर्बाद करना ही लगेगा। लेकिन लोग अरबों रूपए खर्च कर विज्ञान के उन क्षेत्रों में दिन-रात प्रयोग कर रहे हैं। न सिर्फ पैसा लगा रहे हैं बल्कि मेहनत भी कर रहे हैं। दिन-रात एक करके विज्ञान के रहस्यों का पता लगाने

, नई खोजें करने में जुटे हुए हैं। क्या उन्हें इस बात की चिंता होनी चाहिए कि आधी से ज्यादा आबादी ने उस साइंस फील्ड का नाम भी नहीं सुना

, जिसमें वे काम कर रहे हैं

? पैरानॉर्मल साइंस भी इसी तरह है। जो चीज समझ में नहीं आती

, उसका मजाक उड़ाना आसान होता है। क्योंकि उसे समझना मुश्किल होता है।

"

''इसमें अंतर है।

"-डोंगरा बोला-

''प्लेन उड़ता है। सब जानते हैं। भूत होते है या नहीं

, ये सब नहीं जानते हैं। किसी के पास भी इस बात के अकाट्य प्रमाण नहीं हैं कि भूूत होते हैं या नहीं। प्रमाण तो दूर की बात

, किसी ने देखा तक नहीं है।

"

''जो चीज दिखती ही नहीं हो

"-डॉली बोली-

''उसे देखेंगें भी कैसे

?"

''करैक्ट।

"-राज बोला-

''और इसीलिये पैरानॉर्मल साइंस का कुछ लोग-बल्कि बहुत सारे लोग-मजाक उड़ाते हैं। क्योंकि हम भूत का अस्तित्त्व साबित ही नहीं कर सकते। पैरानॉर्मल का मतलब सिर्फ भूत ही नहीं होता। ऐसी घटनाएं

, जो मानव समझ से परे हों

, सामान्य विज्ञान जिन्हें एक्सप्लेन न कर सकता हो

, पैरानॉर्मल की श्रेणी में आती हैं।

"

''लेकिन हम यहां भूतों के अस्तित्त्व के बारे में चर्चा कर रहे हैं।

"-अनुराग बोला-

''अगर भूत दिखता नहीं है तो उसकी उपस्थिति का पता कैसे चलता है

?"

''प्रेतात्माएं स्वयं अपनी उपस्थिति का अहसास कराती हैंं।

"-डॉली बोली-

''आसपास की चीजों से छेड़छाड़ करके। या फिर कभी हवा के किसी झोंके के रूप में। तापमान में परिवर्तन से भी। जैसे गर्म माहौल में अचानक बिना किसी कारण के ठण्डक का अहसास हो या ठण्डे माहौल में गर्म हवा के झोंके के रूप में।

"

उनके बीच पड़े टेप रिकॉर्डिर में कैसेट में सब रिकॉर्ड हो रहा था।

''इससे मुझे याद आया

"-अनुराग ने चुटकी बजाई-

''तुम लोगों के इक्विपमेंट कहां हैं

?"

''कैसे इक्विपमेंट

?"-राज की भंवें उठीं।

''मैंने सुना है पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर अपने साथ कुछ यंत्र जैसे रखते हैं

, जिनसे उन्हें आसपास भूत-प्रेत की उपस्थिति का अहसास हो जाता है। जैसे वो क्या कहते हैं उसे

, हां

, ईएमएफ रीडर।

"

राज और डॉली दोनों मुस्कुराए।

''क्या हुआ

? ऐसे इक्विपमेंट नहीं होते क्या

?"-अनुराग बोला।

''होते हैं।

"-डॉली बोली-

''लेकिन उनकी विश्वसनीयता अधिक नहीं होती। इसलिए हम उनका इस्तेमाल नहीं करते।

"

''ओह!

"

''वैसे भी मैंने सुना है ये इक्विपमेंट्स काफी महंगे आते हैं।

"-डोंगरा बोला-

''और मुझे संदेह है कि भूत-प्रेत पर रिसर्च करने के भी कोई पैसे देता होगा। जब पैसे ही नहीं होंगें तो कहां के इक्विपमेंट्स!

"

''ये बात वो शख्स कह रहा है

"-अनुराग मजाक उड़ाने वाले अंदाज में बोला-

''जो खुद एक भूत-प्रेतों पर आधारित फनहाउस बनाने वाली कंपनी द्वारा खरीदे गए भूत बंगले का केयरटेकर है।

"
 
डोंगरा ने घूरकर अनुराग को देखा और कोई सख्त बात कहने के लिए मुंह खोला ही था लेकिन बीच में ही राज बोल पड़ा-

''आपका कहना सही है डोंगरा साहब। भूत-प्रेत पर शोध करने के कोई पैसे नहीं देने वाला। खासतौर पर सरकार तो बिल्कुल भी नहीं। तो आप कह सकते हैं कि पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर होना मेरे लिए रोजी-रोटी का जरिया नहीं है। ये काम में पार्टटाइम

, अपनी रूचि के कारण ही करता हूं। प्रोफेशनली मैं एक राइटर हूं।

"

''राइटर

? किस तरह की किताबें लिखते हो आप

?"

''फिक्शन। मेरी अब तक दो किताबें प्रकाशित हो चुकीं हैं। दोनों हिस्टोरिकल थ्रिलर हैं। लेकिन मैं इस जोनर से काफी उकता गया था। और लिखने के लिए कुछ नया ढूंढ रहा था। आप ही की तरह मिस्टर डोंगरा

, मुझे भी भूत-प्रेतों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था

, जब तक मेरी मुलाकात दिल्ली के मशहूर पैरासाइकोलॉजिस्ट डॉ. सतीश भारद्वाज से नहीं हो गई।

"

''डॉ. सतीश भारद्वाज!

"-प्रीति ने चुटकी बजाई-

''मैंने ये नाम सुना है।

"

''डॉ. भारद्वाज काफी मशहूर हस्ती हैं।

"-डॉली बोली।

''उनसे मिलने के बाद ही मुझे पता चला कि भूत-प्रेतों की भी एक अलग दुनिया है

, जिस पर शोध किए जाने की आवश्यकता है। ज्यादातर लोग भूत-प्रेतों के अस्तित्त्व को सीधे नकारकर पल्ला झाड़ लेते हैं और इस विषय पर बात करना भी पसंद नहीं करते या करते भी हैं तो बस मजाक ही उड़ाते हैं। और जो मानते हैं

, वे डरते हैं। खुद को इस सबसे दूर रहना चाहते हैं। हम पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर का काम है भूत-प्रेतों पर रिसर्च कर उनकी सच्चाई दुनिया के सामने लाना।

"

''लाए आप

?"

''क्या

?"

''भूत-प्रेतों की सच्चाई। दुनिया के सामने।

"

''नहीं।

"-डोंगरा की आवाज मेें व्यंग को महसूस करने के बावजूद राज शांत स्वर में बोला-

''अगर आप एकदम सीधे मुझसे पूछेंगें तो मुझे भी कहना ही होगा कि पूरी तरह तो मुझे भी भूत-प्रेतों पर विश्वास नहीं है।

"

''अरे। तब कैसे पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हुए आप

? जो खुद ही भूत-प्रेतों पर विश्वास नहीं करता वो दूसरों को क्या विश्वास दिलाएगा उनके होने का

?"

''शायद आप गलत समझ रहे हैं। पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर होने का मतलब भूत-प्रेतों पर विश्वास करना या दूसरों को भूत-प्रेतों का विश्वास दिलाना नहीं होता। पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटिंग से मतलब है ऐसी घटनाओं की छानबीन कर उनकी सच्चाई का पता लगाना

, जिन्हें पारलौकिक माना जाता है। रहस्यमयी

, अनसुलझी घटनाओं की सच्चाई का पता लगाना।

"

''ओह!

"-डोंगरा ने समझने वाले भाव से सिर हिलाया-

''तो अब तक ऐसी कितनी घटनाओं का पर्दाफाश किया है आपने

?"

''एक भी नहीं।

"

''अरे।

"

''जी हां। जैसा कि मैं आपको बता रहा था कि डॉ. सतीश भारद्वाज से हुई मुलाकात ने भूत-प्रेतों के अस्तित्त्व को लेकर मेरी विचारधारा को बहुत हद तक बदल दिया। वे इस क्षेत्र के बहुत बड़े जानकार हैं

, रिसर्चर हैं और और भी बहुत कुछ हैं। मेरी डॉली से भी मुलाकात उन्हीं के माध्यम से हुई थी। डॉली उन्हीं के यहां काम करती थी।

"

''फिर तो सच पूछो तो

"-प्रीति डॉली को कोहनी मारते हुए शरारती अंदाज में धीमे से फुसफुसाई-

''राज के पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर बनने में सबसे बड़ा हाथ तुम्हारा ही है।

"

''शटअप!

"-डॉली भी उतने ही धीमे से बोली।

''डॉ. भारद्वाज से हुई मुलाकात में उन्होंने मुझे अपने सारे जीवन के रिसर्च के बारे में बताया

, उन्होंने मुझे बताया कि किस तरह उन्होंने वर्षों तक भूत-प्रेत

, आत्माओं के संसार की सच्चाई जानने के लिए शोध किए

, विदेशों में पैरानॉर्मल रिसर्च के क्षेत्र में सक्रिय लोगों से मिले

, ऐसी जगहों पर गए

, जो हॉन्टेड जगहों के रूप में कुख्यात थीं और उन्हें ऐसे कई अनुभव हुए

, जिनके बाद अब उन्हें आत्माओं के अस्तित्त्व को लेकर किसी तरह का संदेह नहीं रह गया।

"

''यानि उन्होंने भूत देखे हैं

?"

''उन्होंने स्पष्ट रूप से तो ये मुझसे कभी नहीं कहा लेकिन जहां तक मेरा ख्याल है इस सवाल का जवाब हां है।

"

''ये तो घुमाने वाली बात हो गई।

"

''कुछ बातें कई बार सीधी कहने की जरूरत नहीं होती

, मिस्टर डोंगरा। जैसे लोग सांस लेते हैं लेकिन चिल्लाते नहीं घूमते कि वे सांस ले रहे हैं। लोग खाना खाते हैं लेकिन चिल्लाते नहीं घूमते कि उन्होंने खाना खा लिया है।

"

''मतलब

?"

''मतलब जो लोग भूत-प्रेतों के अस्तित्त्व से वाकिफ हैं

, वे भी चिल्लाते नहीं घूमते कि उनकी मुलाकात भूत से हुई है। और वैसे भी बहुत से लोग तो इस बात पर विश्वास ही नहंी करते। गम्भीरता से नहीं लेते। मजाक में उड़ा देते हैं। जो कि और भी शर्मनाक और हतोत्साहित करने वाला होता है।

"

''हतोत्साहित करने वाला

? क्यों

? भूत-प्रेत से मुलाकात होना क्या कोई इतनी बड़ी घटना होती है कि मुलाकात करने वाले का सम्मान किया जाना चाहिए

?"

''नहीं मिस्टर डोंगरा। उस नजरिए से नहीं होती

, जिस नजरिए से आप देख रहे हैं। लेकिन एक पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर के लिए होती है

, जिसने अपना जीवन ही इस उद्देश्य को समर्पित किया हो कि वो इस अनसुलझे रहस्य की गुत्थी को सुलझा कर ही रहेगा। ऐसा शख्स

, जो अपनी जान खतरे में डालकर भूत-प्रेत

, आत्माओं से सम्बन्धित कोई जानकारी दुनिया के सामने लाने की कोशिश करे और उसकी बातों का मजाक उड़ाया जाए तो ये हतोत्साहित करने से भी कहीं आगे की चीज है।

"

''राइट!

"-अनुराग बोला।

''चलिए

"-डोंगरा बोला-

''डॉ. भारद्वाज ने अपनी आंखों से कोई भूत-प्रेत देखा या नहीं

, ये तो वही बता सकते हैं लेकिन आपका क्या

? आप और मिस डॉली तो पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हैं। काफी अरसे से इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। क्या आप लोगों ने कोई भूत देखा है

?"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

सबकी नजरें राज और डॉली पर थीं।

''नहीं।

"-राज बोला-

''हम अब तक कई ऐसी जगहों पर जा चुके हैं

, जो हॉन्टेड प्लेसेज के रूप में कुख्यात हैं। लेकिन हमने अब तक कोई भूत नहीं देखा।

"

''ऐसी जगहों पर हमने कुछ अजीब चीजें

, कुछ अजीब घटनाएं जरूर नोट कीं

"-डॉली बोली-

''लेकिन सचमुच में हमारा किसी भूत-प्रेत जैसी चीज से सामना नहीं हुआ।

"

''ऐसी जगहों पर भी जो हॉन्टेज प्लेसेज के रूप में कुख्यात हैं

?"-डोंगरा बोला।

''हां। वैसे इस बारे में डॉ. भारद्वाज का कहना है कि भूत-प्रेत या आत्माएं किसी को अपनी उपस्थिति का अहसास कराना चाहें

, तभी सामने आते हैं। वरना आम तौर पर वे अंधेरे की दुनिया में ही रहना पसंद करते हैं। यही कारण है कि उनकी दुनिया इतनी रहस्यमयी है। इतनी कि उनके अस्तित्त्व पर ही प्रश्रचिह्न लगा हुआ है।

"

''तो जब आपने किसी भूत को देखा ही नहीं

"-डोंगरा बोला-

''तो इस बात का सबूत ही क्या है कि भूत होते हैं

?"

''आप जीवित हैं या नहीं

?"

अचानक उस सवाल पर डोंगरा अचकचा गया।

''ये कैसा सवाल हुआ?

"-वो बोला।

''आपका ये दिमाग जो

24 घंटे काम करता है

, यहां तक कि नींद में भी सक्रिय रहता है और शरीर की तमाम क्रियाओं का संचालन करता है

, सपने दिखाता है

, सैंकड़ों

, बल्कि हजारों कम्प्यूटरों जितना डेटा एकत्र करके रखता है

, आपको क्या लगता है आपकी मौत के बाद ये एकदम से खत्म हो जाएगा

?"

''मतलब

?"

''मतलब यही कि जो शक्ति शरीर को चलाती है

, दिमाग का संचालन करती है

, जिसे कुछ लोग आत्मा भी कहते हैं

, कई बार मृत्यु के बाद भी अपना स्वतंत्र अस्तित्त्व बनाए रखती है। उसे ही भूत या आत्मा की संज्ञा दी जाती है।

"

''अगर ऐसा है तो इतनी हत्याओं की घटनाएं होती हैं। उनमें मरने वालों की आत्माएं

, उनके भूत खुद हत्यारे को मार कर या उनका खून पीकर अपना बदला क्यों नहीं ले लेते

? विश्वयुद्ध में बेतादाद में लोग मारे गए

, उनकी आत्माएं

, उनके भूत क्या अब भी पृथ्वी पर ही विचरण कर रहे हैं

? कर रहे हैं तो लोगों को दिखते क्यों नहीं

?"

''यही तो रहस्य हैं

, जिनका पता लगाना है।

"

''ये तो टालने वाली बात हुई। सवाल से भागने की कोशिश हुई।

"

''आप गणित के बारे में क्या जानते हैं मिस्टर डोंगरा

?"

''अब ये गणित कहां से आ गया

?"

''मेरे सवाल का जवाब दीजिये। मेरी तरह सवाल से भागिये मत।

"

''मैंने मैथ्स से स्नातक किया है।

"-वो गर्व से बोला।

''दैट्स गुड। तो अब आप ही बताइए

, एक गणित का लम्बा-चौड़ा सवाल आपको हल करने के लिए दिया जाता है। लेकिन उसके बीच के एक खास हिस्से को गायब कर दिया जाता है। क्या अब आप उस सवाल को हल कर सकेंगें

?"

''अरे। ऐसा कैसे हो सकता है

? हिस्सा गायब करना तो दूर की बात

, गणित में तो अगर एक चिह्न बदल गया तो पूरा सवाल गड़बड़ा सकता है। गड़बड़ा क्या सकता है

, उसे हल करना ही मुश्किल हो जायेगा।

"

''इसी में आपके सवाल का जवाब छिपा है।

"

''वो कैसे

?"

''भूत कैसे बनते हैं

?"

''मैं कैसे जानूंगा

? मैंने आपको बताया न कि मैं तो भूत-प्रेत पर विश्वास ही नहीं करता।

"

''आम धारणा के अनुसार ही बताइये। जो आपने सुन रखा है

, उसी के आधार पर बताइये।

"

''मरने के बाद ही भूत बनते हैं।

"

''बिल्कुल। मौत खुद एक ऐसा रहस्य है

, जिसे आज तक वैज्ञानिक तक नहीं सुलझा पाए हैं। मौत के बाद क्या होता है

? आत्मा

, चेतना या उस ऊर्जा को जो भी नाम दे दो

, वो कहां जाती है

? तो जब इंसान मौत के रहस्यों को ही नहीं सुलझा पाया है तो मौत के बाद की चीजों को समझ पाना

, उनके बारे में निश्चित रूप से कुछ भी कह पाना तो लगभग असम्भव जैसा ही है। यानि जिस तरह गणित का सवाल हल करने के लिए उसकी पूरी जानकारी होनी जरूरी है
 
, उसी तरह भूत-प्रेतों की दुनिया के रहस्यों को सुलझाने के लिए मौत के बाद की दुनिया के रहस्य को सुलझाना बेहद जरूरी है कि आखिर मौत के बाद शरीर को संचालित करने वाली ऊर्जा कहां जाती है

? समझ लीजिए

, यही उस गणित के सवाल का गायब हिस्सा है

, जिसके बिना भूत-प्रेतों से जुड़े रहस्यों को समझ पाना यानि पूरे सवाल को हल कर पाना बेहद मुश्किल है।

"

''और जितना मैं मैथ्स को जानता हूं

"-अनुराग बोला-

''उसके आधार पर कह सकता हूं कि मैथ्स को कोई भी ऐसा सवाल जो हल न हो रहा हो

, किसी भयानक से भी भयानक भूत से भी ज्यादा डरावना है।

"

अनुराग की उस बात पर सभी हंस पड़े।

''तो जब ये इतना अनसुलझा है

"-डोंगरा बोला-

''उस हिसाब से तो फिर भूत-प्रेतों के रहस्य को सुलझाया ही नहीं जा सकता। फिर उनकी चर्चा करने या उन पर शोध करने का क्या फायदा

?"

राज हंस पड़ा।

''क्या हुआ

?"-डोंगरा की भंवें तन गईं-

''मैंने कोई हंसी की बात कह दी क्या

?"

''आपने बच्चों जैसी बात की है। मान लीजिये

, डोंगरा साहब

, आप एक एग्जाम हॉल में बैठे हैं। उसमें आपके पेपर में मैथ्स का एक दस नम्बर का सवाल है और ये दस नम्बर आपके लिये बेहद बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। आप चाहते हैं कि किसी भी तरह ये दस नम्बर आपको मिल ही जायें। दस नहीं तो कम से कम उनमें से दो-तीन

, पांच नम्बर तो मिल ही जायें। पूरे दस मिल जायें तो बात ही क्या है! लेकिन प्रश्रपत्र में प्रिंटिंग मिस्टेक के कारण उस सवाल में कहीं एक निशान-जोड़ या घटाने या गुणा-भाग का या कोई और इम्पोर्टेट अंक मिसिंग है

, जिसकी वजह से आप उसे बना नहीं सकते। अब आप क्या करेंगें

?"

डोंगरा कुछ क्षण खामोश रहा

, फिर बोला-

''मैं उस सवाल को बनाने की कोशिश करूंगा।

"

''चाहे वो न बन रहा हो

?"

''बिल्कुल।

"

''यानि आप हाथ पर हाथ धरके नहीं बैठ जायेंगें

?"

''ओह!

"-बात डोंगरा के भेजे में घुसी।-

''ओह!

"

''एग्जैक्टली। और मैं आपसे कहना चाहूंगा कि अगर आप उस सवाल पर मेहनत करेंगें

, उसे पूरे ध्यान से बनाने की कोशिश करेेंगें

, और आपकी तैयारी अच्छी है

, आपका मैथ्स स्ट्रांग है तो आप उस प्रिंटिंग मिस्टेक को भी समझ जायेंगें और प्रश्रपत्र की गलती को नजरअंदाज करते हुए सवाल को पूरा सही-सही हल कर देंगें। और आपका पेपर जांचने वाला भी फिर आपको उस सवाल पर पूरे-पूरे ही नम्बर देगा क्योंकि उसे प्रिंटिंग मिस्टेक से कोई लेना-देना नहीं है। वो सवाल जानता है और उसका हल भी। क्या मैं गलत कह रहा हूं

?''

''नहीं।

"-डोंगरा ने इनकार में सिर हिलाया-

''प्रश्रपत्रों में प्रिंटिंग मिस्टेक तो कई बार देखने को मिल जाती है। इंटेलीजेंट स्टूडेंट खुद ही सवाल को समझ जाते हैं।

"

''बस। तो भले ही वैज्ञानिक अभी मौत के रहस्य को नहीं सुलझा पाए हैं और भूत-प्रेतों

, आत्माओं की दुनिया रहस्यों के साये में है लेकिन पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेशन ऐसा ही प्रयास है एक अधूरे सवाल को हल करने का।

"

''आपका समझाने का तरीका इम्प्रैसिव है

, मिस्टर राज। ये बात तो माननी ही पड़ेगी।

"-डोंगरा प्रशंसात्मक स्वर में बोला।

राज उसकी बात पर मुस्कुरा दिया।

''लेकिन सवाल तो अपनी जगह पर कायम है

"-अनुराग बोला-

''एक पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर के रूप में जब तुम दोनों भूत-प्रेतों के अस्तित्त्व को साबित नहीं कर सकते

, तुम्हारा कहना है कि कई हॉन्टेड मानी जाने वाली जगहों पर जाने पर भी आज तक तुम लोगों ने कोई भूत नहीं देखा तो इससे तो यही साबित होता है न कि भूत होते ही नहीं है।

"

''नहीं। नहीं साबित होता।

"-राज बोला।

''कैसे

?"

''मान लो मुझे पता नहीं है कि हवा अदृश्य है। लेकिन मुझे हवा को ढूंढना है। तो मैं चाहे कुछ कर लूं

, हवा को नहीं ढूंढ सकता।

"

''मतलब?"

''समझ लो भूत-प्रेतों के साथ भी ऐसा ही है। वे दिखते नहीं हैं। या उसे ही दिखते हैं

, जिसे वे दिखना चाहते हैं। सम्भव है इसीलिए मेरा

, डॉली का या इस कमरे में बैठे किसी और शख्स का आज तक किसी भूत से सामना नहीं हुआ।

"

''मुझे तो ये घुमाने वाली बात ही लगती है। सामना नहीं हुआ

, देखा नहीं तो हम साबित कैसे करें

, मानें कैसे कि भूत होते हैं

?"

''ये तुम पर डिपेंड करता है। एक डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाला शख्स जब किसी बीमारी के बारे में

, उसके इलाज के बारे में पढ़ता है तो क्या वो इस जिद पर अड़ा रहता है कि जब तक उसे वायरस के दर्शन नहीं होंगें

, तब तक वो ये नहीं मानेगा कि वायरस होते भी हैं

? या होते भी हैं तो वे ऐसा कुछ करते भी हैं

, जिससे बीमारी फैलती है।

"

''लेकिन वायरस तो होते हैं।

"

''एक डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे शख्स के लिए भूत की तरह ही होते हैं

, जब तक वो उन्हें अपनी आंखों से न देख ले।

"

''लेकिन वो किताबों में उनके चित्र वगैरह तो देख सकता है।

"

''चित्र मैं भी तुम्हें भूत-प्रेतों के कितने ही दिखा सकता हूं। देखने हैं

?"

''लेकिन भूत-प्रेतों के चित्र कल्पना के आधार पर बने होते हैं। असली नहीं होते।

"

''वायरस के भी असली चित्र तुम्हें कम ही देखने को मिलेंगें।

"

''लेकिन वायरस का अस्तित्त्व वैज्ञानिक तौर पर साबित किया जा चुका है।

"

''और भूत-प्रेतों का अस्तित्त्व वैज्ञानिक तौर पर साबित किया जाना अभी बाकी है। बस इतनी सी बात है। या हो सकता है कि ये साइंस की पहुंच से ही परे हो। शायद इसीलिए साइंस इन सब चीजों को अब तक नहीं समझ पाया है।

"

''अच्छा ठीक है।

"-अनुराग बोला-

''चलो

, तुमने भूत नहीं देखा। लेकिन ऐसी कोई घटना तो बताओ

, जो भूत-प्रेतों से सम्बन्धित हो या उनके अस्तित्त्व को साबित करती हो। मैं तुमसे उस घटना का कोई सबूत भी नहीं मांगूंगा। तुम अपनी ईमानदारी से ही बताओ कि क्या ऐसी कोई घटना है

?"

राज के होंठ भिंच गए।

''यानि नहीं है।

"-अनुराग बोला।

''ऐसी कई घटनाएं हैं।

"-फिर राज बोला-

''लेकिन उनके बारे में विस्तार से चर्चा करते रहे तो पूरी रात निकल जायेगी। मैं तुम्हें उनमें से एक घटना के बारे में बताता हूं

, जो मुझे काफी दिलचस्प लगी और मैं इस घटना की मुख्य किरदार से मिलना चाहता हूं।

"

''की

?"-जय बोला-

''वो किरदार कोई औरत है

?"

''एक टीनएजर लड़की। उसका नाम क्लेयर स्मिथ है। ये केस काफी पहले डॉ. सतीश भारद्वाज के पास आया था और उन्हीं की मार्फत मुझे इसके बारे में पता चला। क्लेयर स्मिथ नाम की ये लड़की क्लेयरवोयेंट है। मतलब इसके पास एक खास ताकत है

, जिससे वो अतीत में हुई या भविष्य में होने वाली घटनाओं को महसूस कर सकती है। लेकिन उसकी ये ताकत उसे मौत के बाद की दुनिया में अस्तित्त्व रखने वाली ताकतों के प्रति वल्नरेबल बना देती हैं। कमजोर बना देती हैं। ऐसी किसी भी जगह

, जहां कुछ बहुत बुरी घटना हुई हो या होने वाली हो

, जाना उस लड़की को मानसिक रूप से बुरी तरह प्रभावित करता है। उसे उस घटना की झलकियां दिखाई देती हैं

, जिससे उसके दिमाग पर काफी विपरीत प्रभाव पड़ता है। कुछ ही दिनों पहले की बात है

, संयोग से ये लड़की-क्लेयर-एक ऐसी जगह पर थी

, जहां एक कत्ल हो जाता है। फिर क्लेयर को उस लड़की की आत्मा दिखाई देती है

, जो मर चुकी थी।

"

कमरे में केवल राज की आवाज गंूज रही थी। हर कोई दम साधे उस विचित्र घटना के बारे में सुन रहा था।
 
''फिर वो आत्मा क्लेयर के शरीर पर कब्जा कर लेती है

, जिसे भूत-प्रेत विशेषज्ञों की भाषा में

'पजेशन

' कहा जाता है। और क्लेयर के ही हाथों से उसके पिता की हत्या कर देती है। अब दोषी कौन हुआ

? क्लेयर

? या उस लड़की की प्रेतात्मा

, जिसने क्लेयर के माध्यम से उसके पिता का खून करवाया

?"

''प्रेतात्मा।

"-मोहिनी के मुंह से निकला।

''एग्जैक्टली। लेकिन इस कमरे में बैठे ज्यादातर साहेबान की तरह ही कानून भी तो भूत-प्रेतों पर विश्वास नहीं करता। तो उनकी नजर में कातिल कौन है

?"

''क्लेयर।

"-डोंगरा मंत्रमुग्ध स्वर में बोला।

''जी हां। और अब समस्या ये है कि उस बेचारी लड़की को-जो पहले ही अपने ही हाथों से अपने पिता की हत्या होने के गम में घुल-घुलकर मरी जा रही है-कानून से कैसे बचाया जाये

? ये तो अच्छा हुआ कि इस केस की जांच में जो इंस्पैक्टर लगा था

, वो भला आदमी निकला और उसके कुछ साथी भी उस लड़की की सहायता के लिए प्रयास कर रहे हैं वरना पता नहीं उस बेचारी लड़की का क्या होता

?"

''ये सच्ची घटना है

?"-अनुराग ऐसे बोला

, जैसे उसे विश्वास न आ रहा हो।

''डॉ. सतीश भारद्वाज काफी समय से क्लेयर का केस देख रहे हैं। ये सब मुझे उन्हीं से पता चला है। मैंने क्लेयर की तस्वीर

, वीडियो से लेकर उसकी मेडिकल हिस्ट्री वगैरह भी देखी है। शायद किसी दिन उससे मुलाकात भी हो जायेगी।

"

''जैसा तुमने बताया

"-जय बोला-

''उस हिसाब से तो ये जगह तुम्हारी उस क्लेयर के लिए काफी खतरनाक है।

"

राज ने प्रश्रसूचक भाव से उसकी ओर देखा।

''अरे भाई

"-जय बोला-

''जब वो ऐसी किसी जगह पर नहीं जा सकती

, जहां कुछ गलत हुआ हो

, तो ये तो दुनिया के टॉप

10 हॉन्टेड प्लेसेज में से एक है।

"

''राइट!

"-प्रीति ने जय का साथ दिया-

''यहां तो बेचारी का सर्किट ही उड़ जायेगा।

"

''मैं भी ऐसी लड़की से मिलना चाहूंगीं

"-प्रीति बोली-

''जो भविष्य देख सकती हो।

"

''वो ऐसा अपनी मर्जी से नहीं करती। उसे कुछ झलकियां जैसी दिखतीं हैं। ऐसा किन्हीं खास सिचुएशन में ही होता है। समझ लो

, जैसे चुम्बक पास लाने पर लोहा उसकी ओर खिंचता है। जिस तरह सपनों पर हमारा बस नहीं होता

, उसी तरह क्लेयर भी मनचाहे ढंग से अतीत या भविष्य की किसी घटना को नहीं देख पाती हालांकि...।

"-बोलते-बोलते राज चुप हो गया।

''हालांकि क्या

?"-मोहिनी उत्सुक स्वर में बोली।

''डॉ. भारद्वाज का कहना है कि क्लेयर की शक्ति को नियंत्रित किया जा सकता है। वो अगर कन्सेन्ट्रेट करे

, प्रयास करे तो अपनी इस ताकत को अपने काबू में कर सकती है।

"

''इंट्रेस्टिंग है।

"-जय बोला।

''और ऐसे और भी कई केसेज हैं। डॉ. भारद्वाज के पास एक पूरा आर्काइव भरा पड़ा है

, जिसमें आपको ऐसे अनेक मामलों के बारे में पढऩे को मिल जायेगा। लेकिन जैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि अगर हम उन पर चर्चा करते रहे तो पूरी रात ही बीत जायेगी

, फिर भी मैं उनमें से आधे केसेज के बारे में भी नहीं बता पाऊंगा। और आपका वो सवाल अपनी जगह पर कायम ही रहेगा कि मैंने भूत देखा ही नहीं है तो मैं उसे साबित कैसे करूं

? मैं वो डिबिया भी लाना भूल गया

, जिसमेें मैंने भूत को कैद करके रखा है वरना उसे ही खोलकर आपको भूत के दर्शन करा देता।

"

राज की उस बात पर सबके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

''नहीं।

"-फिर अनुराग ने इनकार में सिर हिलाते हुए कहा-

''मैंने तुमसे कहा था न कि तुम अपनी ईमानदारी से ऐसी किसी घटना के बारे में बताओ। तुमने बताया। मैंने विश्वास कर लिया। दैट्स ऑल।

"

''मैं तो भूत-प्रेतों के बारे में इतना ही जानता हूं

"-जय बोला-

''कि तुम किसी भी ऐसी जगह चले जाओ

, जहां चालीस-पचास लोग हों

, जैसे किसी स्कूल की कोई क्लास या ऐसी ही कोई जगह

, तो वहां तुम्हें ऐसा एक भी शख्स नहीं मिलेगा

, जिसने भूत-प्रेतों के बारे में न सुन रखा हो।

"

''राइट।

"-डोंगरा बोला।

''लेकिन उनमें से ऐसा भी कोई शख्स नहीं होगा

"-इस बात पर जय ने ज्यादा जोर दिया-

''जिसने अपनी आंखों से भूत देखा हो।

"

''डबल राइट।

"-डोंगरा बोला।

''और अगर उनमें से किसी ने भूत देखा भी होगा

"-राज बोला-

''और उसे साबित करने को कह दिया जाये कि उसने देखा है

, तो वो कैसे साबित करेगा

?"

जय को कोई जवाब नहीं सूझा।

कुछ क्षण कमरे में सन्नाटा छाया रहा।

''मुझे कुछ पूछना है।

"-मोहिनी हाथ उठाकर ऐसे बोली

, जैसे किसी स्कूल की क्लास में बैठी हो और टीचर से कुछ पूछना चाहती हो।

''पूछो।

"-राज बोला।

''जैसा कि हमारे यहां कदम रखने से पहले हमसे वो सब धार्मिक प्रतीक चिह्नों वाली चीजें

, लॉकेट

, ब्रेसलेट वगैरह उतरवा लिये गये। क्या सचमुच भूत-प्रेत ऐसी चीजों से डरते हैं

? डरते हैं तो क्यों

? आखिर दुनिया में सब कुछ तो ईश्वर की सत्ता ही है। ऐसी तो कोई जगह नहीं है

, जहां भगवान न हो। फिर किस्से-कहानियों में ऐसा क्यों दिखाया जाता है कि धार्मिक प्रतीक चिह्नों वगैरह से भूत-प्रेत डर कर भाग जाते हैं। अगर ऐसा सचमुच होता है तो उस हिसाब से तो भूत-प्रेत का अस्तित्त्व ही नहीं होना चाहिए फिर।

"

''वो एक स्टंट था

"-डोंगरा गर्दन इनकार में हिलाते हुए बोला-

''बस आप लोगों को थोड़ा डराने के लिए। ऐसे गेम्स में पर्टीसिपेन्ट्स के दिमाग पर साइकोलॉजिकल इफैक्ट पैदा करने के लिए ही कंपनी इस तरह के चोंचले करती है। इसमें डरने जैसी कोई बात नहीं है।

"

''मैं इस पॉइंंट पर डॉ. भारद्वाज के विचार आपको बताता हूं।

"-राज गहरी सांस लेकर बोला-

''उनका मानना है कि मृत्यु के पश्चात आत्मा को संसार में रूकने का नियम नहीं है। और जो आत्माएं जबर्दस्ती रूकती हैं

, उन्हें ईश्वर का डर होता है। अब चाहे ईश्वर कह लीजिए या दुनिया को चलाने वाली परमशक्ति। और ये आत्माएं उस शक्ति के सामने बेबस होती हैं। यही कारण है कि धार्मिक चिह्नों से ये घबराती हैं। क्योंकि वो ईश्वरीय ताकत का अंश समेटे होती हैं। जैसे जेल से भागा अपराधी पुलिस को देखकर डर जाता है

, उसी तरह ये आत्माएं धार्मिक चिह्नों से घबराती हैं। उनसे दूर भागती हैं। और इसमें आपके सवाल का जवाब भी शामिल है

, डोंगरा साहब

"-राज डोंगरा से बोला-

''आपने कहा था न कि सभी मरने वाले भूत क्यों नहीं बन जाते

? क्योंकि शायद वे भूत बनना ही नहीं चाहते। वे जीवन-मृत्यु के चक्कर से मुक्ति पाना चाहते हैं। परमशक्ति के पास वापस लौट जाते हैं। या उनका पुनर्जन्म हो जाता है। या और कुछ भी हो सकता है। कुछ ही भूत के रूप में अपना अस्तित्त्व बचाए रखते हैं। ऐसा वे क्यों करते हैं

, किन परिस्थितियों में

, किस आधार पर करते हैं

, ये सभी रहस्य है। हालांकि एक प्रचलित मान्यता तो यही है कि मरते समय किसी व्यक्ति की कोई बहुत इच्छा पूरी न हो पाए तो उसकी आत्मा इसी लोक में भटकती रहती है।

"

''लेकिन ऐसा तो बहुत पहले से माना जाता है।

"-डोंगरा बोला-

''किस्से कहानियों में सालों

, दशकों बल्कि सदियों से ये सब कहा जाता रहा है। तो तब लोग ये सब कैसे जानते थे

? क्या तब भी पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर होते थे

?"

''बिल्कुल होते थे।

"

''क्या

?"

''क्या मैथ्स की पढ़ाई कोई आज से या सिर्फ दस-बीस साल पहले से ही शुरू हुई है

? आर्यभट्ट कौन थे

? क्या अंतरिक्ष विज्ञान के बारे में लोगों ने तब पढऩा शुरू किया था

, जब पहला रॉकेट अंतरिक्ष में भेजा गया था

? गैलीलियो कौन था

? कॉपरनिकस कौन था

? इन्हीं की तरह ही पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेशन का कार्य भी सदियों से किया जाता रहा है। भूत-प्रेतों से जुड़ी ये जितनी भी जानकारी है

, उन्हीं की मेहनत और प्रयासों के बल पर मिल पाई है। लेकिन वो लोग गले में ढोल लटकाकर उसे पीटते नहीं घूमते थे कि हमने ये खोज कर ली है

, हमारा नाम अखबार में छापो। हमें न्यूज चैनलों पर दिखाओ। हम पर डिबेट बैठाओ। विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े खोजकर्ताओं को इतना अपार यश इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि विज्ञान की ओर लोगों का झुकाव ज्यादा रहा। लोगों ने उसे अपने दैनिक जीवन के उपयोग के लिए चुना। क्योंकि विज्ञान का रास्ता कदरन आसान था। आपको लिखी हुई निश्चित बातों को पढऩा था और उनके सहारे आगे बढऩा था। कोई तपस्या नहीं करनी थी। कोई आत्मशक्ति नहीं जगानी थी

, जिससे आप अपनी सोच को इतने ऊंचे स्तर तक ले जा सको कि हजारों साल पहले-जब आज की तरह संसाधन भी नहीं हुआ करते थे-ऐसे गं्रंथों की रचना कर सको

, जिनमें जीवन का सार छिपा हो। मैं इसी कमरे में बैठे लोगों से पूछता हूं कि आपमें से कितने हैं

, जिन्हें कॉपी-पैन पकड़ा दिया जाये तो वे एक कहानी भी लिख सकते हैं

? क्या आप आज से हजारों साल पहले ऋग्वेद

, यजुर्वेद

, अथर्ववेद

, सामवेद जैसे ग्रंथों की रचना कर सकते थे

? मैं तो नहीं कर सकता था। मैं तो उनका एक परसेंट भी नहीं कर सकता था। अध्यात्म और आत्मचेतना की रहस्यपूर्ण लेकिन शक्तिशाली दुनिया को लोग खोखली मानकर उससे दूर भागने लगे। उसे नकारने लगे। मजाक उड़ाने लगे। हर चीज पर सवाल उठाने लगे। वो भी इस माइण्डसैट के साथ कि उन्हें जवाब सुनना ही नहीं है। सुनना भी है तो मानना नहीं है। यही कारण है कि अध्यात्म और विज्ञान के बीच दूरी इतनी बढ़ती चली गई कि आज अध्यात्म से जुड़ी बातों को नकारने के लिए

, उनका मजाक उड़ाने के लिए विज्ञान का इस्तेमाल हथियार की तरह करने लगे हैं। लोग कहते हैं कि वैज्ञानिक रूप से साबित करो

, तभी हम इस चीज को मानेेंगें वरना नहीं मानेंगें। लेकिन ऐसा आमतौर पर वही लोग कहते हैं

, जो खुद विज्ञान को ठीक तरह से नहीं समझते।

"

''क्या मतलब

?"-डोंगरा बोला।

''लोगों ने विज्ञान की मजबूरी नहीं देखी। उन्हें बस दूर से विज्ञान की दुनिया बड़ी चमक-दमक वाली

, बड़ी रौबदार दिखाई देती है

, जैसे सारे सवालों के जवाब विज्ञान में ही छिपे हों। लेकिन विज्ञान के ही क्षेत्र में जो शीर्ष पर हैं

, वे खुद अपने सवालों के जवाब पाने के लिए भटक रहे हैं। दुनिया कैसे बनी

? जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई

? मरने के बाद जीवन का अस्तित्त्व पूरी तरह समाप्त हो जाता है या कुछ और भी होता है

? इन सब सवालों के जवाब पाने में दशकों से वैज्ञानिकों के पसीने छूट रहे हैं और अब भी वे घिसट-घिसट कर ही जवाबों की ओर बढ़ पा रहे हैंं। प्रत्यक्ष उदाहरण कोरोना के रूप में सबके सामने है। इतने शक्तिशाली

, समर्थ

, टेक्नोलॉजिकल रूप से एडवांस्ड होने के बावजूद इस वायरस ने आज पूरी दुनिया को घुटनों पर ला दिया है। तमाम देशों के इतने वैज्ञानिक अपनी पूरी क्षमता

, बेशुमार संसाधनों के साथ इस बीमारी का इलाज ढूंढने में लगे हैं लेकिन क्या वे ढूंढ पाए

? लास्ट मैंने चैक किया था

, तब तक तो नहीं।

"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

''तो क्या अध्यात्म से कोरोना का इलाज सम्भव है

?"-कुछ क्षण की खामोशी के बाद डोंगरा बोला।
 
''आयुर्वेद। बीमारियों के इलाज के विज्ञान का आध्यात्मिक पहलू आयुर्वेद है। कोरोना के इलाज में आयुर्वेदिक तौर-तरीकों का उपयोग किए जाने के बारे में तो आपने सुना ही होगा। और सुना है इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। वैसे भी अध्यात्म से कोरोना के इलाज के बारे में पूछना तो वैसा ही है

, जैसे किसी आदमी को दो रास्तों में से एक चुनना हो और एक रास्ते पर बहुत दूर चलने के बाद वो ये चाहने लगे कि काश

, वो उस दूसरे रास्ते में उसी जगह पर होता

, जहां इस रास्ते पर इतना चलने के बाद पहुंचा था। क्या ऐसा सम्भव है

? जिस चीज में आपने कभी इंट्रेस्ट नहीं लिया

, उसका हमेशा मजाक उड़ाया

, उसे समझने की कोशिश भी नहीं की

, अब आप चाहते हैं वो एकदम से आपके लिए जीवन रक्षक बन जाए

? वैसे मेरा मानना तो ये है कि अगर अध्यात्म का सहारा लिया गया होता तो दुनिया के पास न सिर्फ ऐसी बीमारियों के इलाज होते बल्कि शायद ऐसी बीमारियां फैलने की नौबत ही नहीं आती।

"

''बात में दम है।

"-अनुराग बोला।

''कोरोना से बचाव के लिए जिस सैनिटाइजेशन की बात की जाती है

, क्या वो पुराने समय से हमारे जीवन पद्धति में शामिल नहीं था

? क्या हम हाथ-मुंह अच्छी तरह धोकर खाना नहीं खाते थे

? क्या सूर्य नमस्कार कर समय पर भोजन कर

, रात में समय पर सो कर और सुबह समय पर जागकर अपनी इम्यूनिटी को मजबूत नहीं करते थे

? आज जिस सोशल डिस्टेंसिंग की बात की जा रही है

, क्या वो पहले हमारी जीवन पद्धति में नहीं थी

? क्या हम दूर से ही लोगों को नमस्कार नहीं करते थे

? या पहले से ही अंग्रेजों की तरह शेक हैण्ड करते आ रहे थे

? आज इतनी सावधानी से जीने

, तमाम तरह के प्रोटीन-विटामिन की गोलियां

, पाउडर वगैरह खिलाने के बाद भी थोड़ी-सी बारिश में भीगने पर बच्चे को जुकाम हो जाता है और मां-बाप उसे लेकर हॉस्पिटल दौड़ पड़ते हैं। लेकिन बनारस

, लखनऊ जैसी जगहों में मैं आज भी ऐसे लोगों को जानता हूं

, जो कड़ाके की ठण्ड में भी सुबह मुंह अंधेरे उठकर नदी में स्नान कर लिया करते हैं और मजाल है

, जो जरा-सा ठिठुर कर दिखा दें

, सर्दी-जुकाम उन्हें छू भी जाए।

"

कमरे में शांति छा गई।

''रात काफी हो गई है।

"-डोंगरा हाथ में बंधी घड़ी पर नजर मारते हुए बोला-

''किसी और को कुछ कहना है इस टॉपिक पर। या खत्म करें

?"

कोई कुछ नहीं बोला।

''खत्म करते हैं फिर!

"-डोंगरा बोला।

''मेरे कुछ सवाल हैं।

"-अचानक डॉली बोली।

सबकी नजरें डॉली की ओर उठ गईं।

''मैं चाहती हूं आप लोग इसका जवाब हाथ उठाकर दें। जिससे किसी तरह की बहसबाजी की नौबत न आए। और इसमें ज्यादा टाइम भी न लगे। मंजूर

?"

''ठीक है।

"-प्रीति बोली-

''सवाल पूछो।

"

''जिस-जिस को यकीन है कि भूत-प्रेतों का भी अस्तित्त्व होता है

, वो हाथ उठाए।

"

राज ने हाथ ऊपर किया।

''सिर्फ एक

?"-डॉली बोली-

''चलो

, ठीक है। अगला सवाल

, आज सुबह कब्रिस्तान में जब हमने उस बच्चे की हंसी की आवाज सुनी थी तो कौन-कौन डरा था?

"

सभी ने हाथ खड़े कर दिए।

''ओके।

"-डॉली ने सिर हिलाया-

''अब तीसरा और आखिरी सवाल-आप में से कितने लोग मानते हैं कि कब्रिस्तान में हमने जिस बच्चे की खिलखिलाहट की आवाज सुनी थी

, वो डेविड था।

"

''डेविड

?"-अनुराग हैरानी से बोला।

''डेविड कीन। जिसकी कब्र हमने वहीं ढूंढ निकाली थी।

"

कमरे में सन्नाटा छा गया। सब एक-दूसरे का मुंह देखने लगे।

तभी अचानक कमरे में गर्म हवा के झोंके ने सबको चौंका दिया।

हवा का वो झोंका इतना गर्म था कि एक सेकेंड के लिए उन सबको ऐसा अहसास हुआ

, जैसे वो किसी भट्ठी में बैठे हों।

सब स्तब्ध रह गए।

कुछ देर कमरे में सन्नाटा छाया रहा।
 
उस जोरदार ठण्ड में कमरे को गर्म रखने के लिए उन्हें आतिशदान में आग जलानी पड़ रही थी। वो लोग घर के सारे खिड़की-दरवाजे अच्छी तरह बंद करने के बाद ही वहां बैठे थे। फिर एकदम से वो गर्म हवा का झोंका कहां से आया ?

''ये गर्म हवा तुम्हारे उस कब्रिस्तान का जिक्र करने के साथ ही आई।

"-प्रीति डॉली से बोली।

डॉली ने कमरे में इधर-उधर नजरें दौड़ाईं

, जैसे वहां मौजूद लोगों के अलावा भी किसी को ढूंढ रहा हो।

''अब मुझे क्या पता था

"-फिर वो बोली-

''कि ऐसा कुछ होगा। वैसे ये था क्या

?"

''जो भी था

"-मोहिनी ने झुरझुरी ली-

''डरावना था।

"

''मेरा सवाल।

"-डॉली ने अपना सवाल दोहराया लेकिन इस बार उसकी आंखें उनके चेहरों पर नहीं थीं बल्कि कमरे में इधर-उधर भटक रहीं थीं-

''आप में से कितनों को लगता है कि कब्रिस्तान में हमने जिस बच्चे के हंसने की आवाज सुनी थी

, वो वही था

, जिसकी कब्र हमने बाद में ढूंढ निकाली थी

?"

कोई कुछ नहीं बोला।

''तो मैं इसे आप सबकी न समझूं

? या ये समझूं कि आप अपने मन की बात को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं।

"

इस बार भी कोई कुछ नहीं बोला। टेबल पर रखे उनके हाथों में कसमसाहट हो रही थी

, जिससे पता चल रहा था कि उनमें से कुछ के हाथ उठना चाह रहे थे लेकिन वे अपने डर को सबके सामने नहीं आने देना चाहते थे।
 
वो सेशन खत्म होने के बाद डोंगरा ने टेप रिकॉर्डर और भूत लिखी हुई वो पर्ची वापस उसी सन्दूक में रखकर उसे पहले की तरह ही बंद कर दिया। रात भी ज्यादा हो गई थी इसलिए उसके बाद सब सीधे अपने कमरों में सोने चले गये।

रात में अचानक कुछ आहट सुनकर राज की नींद खुल गई। आंख खुलते ही उसकी नजर एक तरफ दीवार पर लटकी घड़ी पर पड़ी।

रात के

3.15 बज रहे थे।

राज को हैरानी हुई।

दो बजे से उसकी और डोंगरा की निगरानी की ड्यूटी शुरू होने वाली थी।

किसी ने उसे जगाया क्यों नहीं

?

राज बिस्तर पर उठ बैठा

, तभी उसे बिस्तर के दूसरी ओर किसी के बैठे होने का अहसास हुआ।

लेकिन न जाने क्यों उसकी गर्दन घुमाकर उस ओर देखने की हिम्मत नहीं हुई।

उल्टे उसके दिमाग में कई तरह के विचार घुमडऩे लगे।

इतनी रात को उसकी बगल में कौन बैठा हो सकता है

?

वहां तो कुर्सी भी नहीं रखी थी।

फिर

?

न जाने क्यों राज ने अपने अंदर एक अनजाने भय को सिर उठाते हुए महसूस किया।

उसने धीरे से गर्दन घुमाकर देखा।

कोई बैठा तो था।

वो एक युवक शख्स था

, जिसकी उम्र

2530 वर्ष के आसपास होगी। वो एकटक राज की ओर ही देख रहा था।

उसका चेहरा खून से रंगा हुआ था।

राज ने उस युवक को अपनी सारी जिंदगी में कभी नहीं देखा था।

राज की नजरें उसके चेहरे पर दिख रहे दो छेदों से चिपक कर रह गईं। एक छेद दांयीं आंख के नीचे था और दूसरा चेहरे के बांयीं ओर। वो छेद काफी बड़े-बड़े थे और उनके आर-पार दिखाई दे रहा था।

राज को ऐसा लगा

, जैसे उसका पूरा शरीर ठण्डा पड़ गया हो। उसनेे मजबूती से पलंग पर बिछी चादर को पकड़ लिया

, जैसे वही उसका एकमात्र सहारा हो। लेकिन चादर पकडऩे में चादर जैसी नहीं लग रही थी। वो तो कुछ और चीज थी। लम्बी और बेलनाकार।

वो युवक अपनी जगह पर स्थिर बैठा एकटक राज को देखे जा रहा था। उसकी आंखें इतनी फैली हुईं थीं कि लग रहा था जैसे कटोरियों से बाहर निकल आएंगीं। जैसी

'कॉफिन मैन

' की आंखें थीं। राज चाहकर भी उसके चेहरे से नजरें नहीं हटा पा रहा था। उसका थोड़ा-बहुत ध्यान हट पाता था तो उसके चेहरे पर बने उन भयानक छेदों पर से होने के बाद फिर युवक की आंखों पर ही चला जाता था।

कौन था वो

?

अचानक राज को अपनी सांसें उखड़ती हुई महसूस होने लगीं। उसका शरीर कांपने लगा। उसने अपने को कंट्रोल करने की काफी कोशिश की लेकिन वो कामयाब नहीं हो पाया। उसका शरीर जोरों से कांपने लगा। वो इतनी जोर-जोर से कांप रहा था कि उसे लगने लगा कि अब उसका कांपना कभी बंद नहीं होगा।

तभी अचानक हर ओर अंधेरा छा गया। पलंग

, बगल में बैठा वो भयानक युवक

, वो कमरा

, सब कुछ गायब हो गया। राज को बस ऐसा लग रहा था

, जैसे उसके कांपते शरीर के अलावा दुनिया में और कुछ भी नहीं था।

उसने अपना ध्यान केन्द्रित करने की कोशिश की।

उसके हाथ में कुछ था

, जिसे उसने चादर समझकर पकड़ा हुआ था।

राज ने झट से आंखें खोल दीं।

हालांकि शरीर की उस सामान्य सी क्रिया के लिये उसे ऐसा लगा

, जैसे उसे अपने पूरी शरीर की ताकत लगानी पड़ी हो।

वो अब भी बुरी तरह कांप रहा था।

उसके इधर-उधर सब लोग इकट्ठे थे।

अनुराग

, जय

, डोंगरा

, डॉली

, प्रीति

, मोहिनी

, रिंकी।

सबके होश उड़े हुए लग रहे थे।

''ट...टाइम...

"-अपने होश और बुरी तरह कांपते शरीर को काबू करने की कोशिश करते हुए राज बोला

, उसे अपना गला बिल्कुल सूखा हुआ लग रहा था।

''क्या

?"-अनुराग बोला। उसकी आवाज कहीं दूर से आती हुई लग रही थी।

''टाइम...टाइम क्या...हुआ है

?"-राज बड़ी मुश्किल से बोल पाया।

''12.30"-जय बोला-

''12.30 हो रहा है। लेकिन तुम्हें क्या हो रहा है

?"

राज चाह कर भी अपने शरीर के बुरी तरह कांपने पर नियंत्रण नहीं कर पा रहा था। फिर उसने किसी चीज पर ध्यान केन्द्रित करने की सोची। शायद ध्यान एकाग्र करने से उसका कांपना रूक जाए।

वो चीज

, जिसे उसने चादर समझकर पकड़ा हुआ था

, लेकिन कहीं से भी चादर नहीं लग रही थी।

राज ने गर्दन घुमाकर देखा। वो जय की कलाई थी।

उसका हाथ मजबूती से जय की कलाई पर कसा हुआ था।

शायद नींद में ही उसने जय की कलाई पकड़ ली होगी

, जिसे वो सपने में चादर समझ रहा था।

फिर उसके शरीर का कांपना धीरे-धीरे कम होने लगा। उसके हवास वापस आने में कुछ समय लगा।

''क्या हो गया था तुम्हें

?"-डॉली बोली। राज ने डॉली की ओर देखा। डॉली का चेहरा गम्भीर था और वो एकटक उसे ही देख रही थी।

राज ने अपने अगल-बगल कमरे में नजर डाली।

सब कुछ वैसा ही था।

बस उसके बगल में वो भयानक आदमी नहीं था।

टाइम कन्फर्म करने के लिए उसने घड़ी पर नजर डालने की सोची लेकिन फिर वो उस ख्याल से ही सहम गया।

घड़ी में टाइम देखने से ही तो उस सबकी शुरूआत हुई थी।

''क्या हुआ था तुम्हें

?"-अनुराग उसके कंधे पर हाथ रखकर गम्भीर स्वर में बोला।

''कुछ नहीं।

"-राज थके-से स्वर में बोला

, उसने महसूस किया कि कपड़ों के अंदर उसका पूरा शरीर पसीने से नहाया हुआ था-

''एक डरावना सपना था।

"-हालांकि उसे सिर्फ

'एक डरावना सपना

' कह कर दिमाग से भुला सकने की हिम्मत राज को अपने अंदर महसूस नहीं हो रही थी।

वो कहीं से भी सपने जैसा नहीं था।

उतना जीवंत सपना राज ने कभी नहीं देखा था।

वो निश्चित रूप से...।

राज ने उस ख्याल को दिमाग से झटक देना चाहा।

''क्या सपना था

?"-जय बोला-

''क्या देखा तुमने सपने में

?"

''ऐसा क्या देख लिया

"-डॉली बोली-

''जिससे तुम इतना डर गए थे

?"

राज ने डॉली को देखा।

वो डरने की बात कर रही थी। जबकि राज को ऐसा लग रहा था

, जैसे उसने अभी-अभी मौत को करीब से महसूस किया हो।

उसने उन सबको बताया कि किस तरह उसकी नींद खुली और नींद खुलने पर उसने

'क्या

' देखा था।

सुनकर सबकी जबान पर जैसे ताले लग गए।

कमरे में बिल्कुल सन्नाटा छा गया।
 
''मुझे अब तक यकीन नहीं आ रहा है

"-राज धीमे स्वर में बोला-

''कि वो सपना था। इतना जीवंत सपना मैंने आज तक नहीं देखा। बिल्कुल यही कमरा

, ऐसा ही सब कुछ

, मैंने घड़ी में टाइम भी देखा था

, उसमें

3.15 बज रहे थे। और वो आदमी...वो तो ऐसा लग रहा था

, जैसे...जैसे मैं उसे हाथ बढ़ाकर छू सकता हूं।

"

''लेकिन था तो सपना ही।

"-जय बोला।

''वही तो।

"-राज बोला-

''वही तो मैं समझ नहीं पा रहा हूं। आखिर...आखिर कोई सपना इतना असली कैसे लग सकता है कि...कि जागने के बाद भी उसके सपना होने पर यकीन न आये। अगर वो सपना था तो फिर...इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि ये हकीकत है।

"

कोई कुछ नहीं बोला।

''उस सपने के बारे में कोई और खास बात

?"-डॉली ने चुप्पी तोड़ी।

''हां।

"-राज ने सिर हिलाया-

''उस आदमी...का चेहरा मैंने अपनी सारी जिंदगी में कभी नहीं देखा।

"

''तो

?"-प्रीति बोली।

''तो

?"-राज ने प्रीति की ओर देखा-

''जिस आदमी को मैंने कभी देखा ही नहीं

, वो मेरे सपने में कैसे आ सकता है

?"

''तुमने उसे कभी देखा होगा।

"-प्रीति बोली-

''फिर तुम उसे भूल गए होगे।

"

''नहीं। मैंने उसे कभी नहीं देखा।

"

''हो सकता है टीवी पर देखा हो। किसी फिल्म में देखा हो। कहीं भीड़ में देखा हो। हम कई लोगों को देखते हैं और भूल जाते हैं। सबकी सूरतें हमेशा याद नहीं रख सकते। कई बार हम फिल्म स्टार्स को भी सपने में देख लेते हैं। वैसे भी ऐसा कोई रूल थोड़े ही है कि जिसे कभी नहीं देखा हो

, वो सपने में नहीं दिखाई दे सकता। आखिर सपने एक तरह की कल्पना ही तो होते हैं। हो सकता है कि तुम्हारे दिमाग ने बस उस आदमी की कल्पना कर ली हो...।

"

राज ने प्रीति की ओर ऐसे देखा

, जैसे उसे उसकी बात का जरा भी यकीन न हो।

''अगर मैंने उस आदमी की कल्पना कर भी ली थी

"-राज बोला-

''तो वैसी कल्पना क्यों की

? वो खून से रंगा चेहरा

, उसके चेहरे में वो दो भयानक सुराख

, जिनके आर-पार तक दिखाई दे रहा था

? इसकी भी कोई वजह बता सकती हो

?"

प्रीति खामोश हो गई।

''भूल जाओ ये सब!

"-जय उसका कंधा थपथपाते हुए बोला-

''वो बस एक सपना था। डरावना था लेकिन सपना ही था। अब तुम जाग गये हो और सपने से डरने की कोई जरूरत नहीं।

"

''तुम्हारे दिमाग पर यहां के माहौल का असर हो गया है

"-डोंगरा बोला-

''और कोई बात नहीं है। चिंता मत करो। आराम से सो जाओ। आज मैं अकेले निगरानी ड्यूटी कर लूंगा।

"

''राज की जगह आपके साथ मैं रहूंगा।

"-जय डोंगरा से बोला।

''नहीं।

"-राज बोला-

''निगरानी ड्यूटी पर तो मैं ही रहूंगा। तुम डबल शिफ्ट करोगे तो नींद पूरी नहीं कर पाओगे। वैसे भी फिलहाल सोने की हिम्मत मुझमें नहीं है। इस वक्त तो अगर कोई असली भूत भी सामने आ जाए तो उसका सामना कर सकता हूं। लेकिन नींद में इस तरह का भयानक सपना और नहीं देखना चाहता।

"

''ठीक है।

"-डोंगरा बोला।

कुछ देर राज के पास ही रूकने के बाद सब अपने-अपने कमरों में लौट गए।

बाहर जंगल से आ रही किसी कीड़े और कभी-कभी किसी जानवर के बोलने की आवाज रात के माहौल को और भी रहस्यमयी और डरावना बना रही थी।

नींद तो उन सबकी आंखों से कबकी उड़ चुकी थी।
 
दूसरा दिन

सुबह डॉली और रिंकी ने किचन की ड्यूटी संभाली।

रिंकी ज्यादा बात नहीं करती थी। उन सबमें सबसे कम बोलने वाली वो ही थी। वो लोग जब साथ बैठते थे

, तब भी रिंकी की जुबान पर ज्यादातर ताला ही लगा रहता था। और डॉली भी अनावश्यक रूप से ज्यादा बात करने वालों में से नहीं थी। दोनों शांतिपूर्वक ही किचन में सबके लिए नाश्ता बनाने में जुटी थीं। वैसे भी डॉली रात में राज ने जो सपना देखा था और उसे देखने के बाद उसकी जो हालत हो गई थी

, उसी के बारे में सोच रही थी।

''औरतजात का नाम बदनाम कर दिया।

"-तभी किचन के दरवाजे से आवाज सुनकर वे दोनों ही चौंके।

दरवाजे पर अनुराग खड़ा था।

''क्या हो गया

?"-डॉली बोली।

''क्या क्या हो गया

? तुम दो-दो लड़कियां हो यहां और किचन से बर्तनों की खट-पट के अलावा एक आवाज तक नहीं आ रही। इसीलिए प्रीति ने मुझे देखने के लिये भेजा है कि किचन में सब कुछ ठीक तो है।

"

''सब कुछ ठीक है।

"-डॉली बोली-

''और रात में मुझे कोई डरावना सपना भी नहीं आया

, जिसे देखकर मैं नींद में ही गला फाड़कर चीखने लगूं और सूखे पत्ते की तरह थर-थर कांपने लगूं।

"

अनुराग हंसा। फिर तत्काल संजीदा भी हो गया।

''सचमुच मैं राज की हालत देखकर थोड़ा डर सा गया था।

"-वो गम्भीर स्वर में बोला।

''हम सभी डर गए थे।

"

''वैसे क्या सचमुच सपने में हम किसी ऐसे आदमी को देख सकते हैं

, जिसे हमने असल जिंदगी में कभी नहीं देखा हो

? मुझे तो विश्वास नहीं है।

"

''हो सकता है। वैसे यहां से लौटने के बाद मैं इस बारे में डॉ. भारद्वाज से चर्चा जरूर करूंगी।

"

''नाश्ते में क्या है

?"

''सैंडविच और कॉफी।

"

''ओके। जल्दी जल्दी हाथ चलाओ। बाहर भूखे भेडिय़े इंतजार कर रहे हैं।

"

''ठीक है। मैं जल्दी-जल्दी हाथ चलाती हूं। तुम जल्दी-जल्दी पैर चलाओ और यहां से रूख्सत हो।

"

अनुराग ने आदेश का पालन किया।

राज

, जय

, डोंगरा

, प्रीति और मोहिनी बाहर आंगन में कुर्सियां डाले बैठे थेे।

वहां तीन खाली कुर्सियां और पड़ी थीं।

''ये अनुराग क्या किचन में जाकर ही बस गया

?"-प्रीति बोली।

''ब्रेकफास्ट लाने में मदद कर रहा होगा उनकी।

"-मोहिनी बोली।

''मैं अभी थोड़ी देर में आता हूं।

"-अचानक राज उठ खड़ा हुआ।

''किधर

?"-प्रीति ने प्रश्रवाचक भाव से उसकी ओर देखा।

''वो कब्रिस्तान

, जिसे कल हमने ढूंढा था।

"

कब्रिस्तान का जिक्र सुनते ही सब अलर्ट हो गए।

''क्यों

?"-मोहिनी बोली-

''उस कब्रिस्तान में क्या है

?"

''कुछ नहीं है। लेकिन फिर भी मेरा मन वहां का एक चक्कर लगाने का हो रहा है।

"

''कब्रिस्तान में एक चक्कर लगाने का

'मन

' हो रहा है!

"-प्रीति बोली-

''ये हुई न

101 परसेंट असली पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर वाली बात।

"

''तो तुम क्या अकेले ही जाओगे

?"-मोहिनी बोली-

''थोड़ा रूक जाओ। ब्रेकफास्ट करके सभी साथ ही चलते हैं।

"

''ब्रेकफास्ट में अभी टाइम है

"-राज बोला-

''और मैं वहां अकेले ही जाना चाहता हूं। थोड़ी ही देर में वापस आ जाऊंगा।

"

''इस तरह अकेले जाने की कोई खास वजह

?"-प्रीति की भंवें उठीं।

''ऐसी कोई खास वजह नहीं है। अगर कुछ खास होगा तो मैं आकर बताऊंगा ही।

"

फिर अतुल मकान के बगल के रास्ते से होते हुए पीछे की ओर चला गया

, जहां थोड़ी ही दूर जंगल में वो पुराना कब्रिस्तान था

, जहां कल उन लोगों ने किसी बच्चे के हंसने की आवाज सुनी थी।

''मुझे इसका इस तरह अकेले वहां जाना ठीक नहीं लग रहा।

"-डोंगरा चिंतित स्वर में बोला-

''खास तौर पर राज के साथ रात में जो हुआ

, उसके बाद तो मैं ऐसी किसी हरकत को लेकर बिल्कुल भी सहमत नहीं हूं।

"

''हैलो!

"-जय हाथ लहराते हुए बोला-

''रात में राज के साथ कुछ नहीं हुआ। उसने केवल एक सपना देखा था। यहां के माहौल का असर हो गया था उसके दिमाग पर। और उन बातों का भी

, जो हम भूत-प्रेत

, आत्माओं के अस्तित्त्व के बारे में करते रहे थे। इसके अलावा कोई बात नहीं है।

"

''लेकिन वो कह रहा था कि उसने सपने में जिस आदमी को देखा था

, उसे उसने जिंदगी में कभी नहीं देखा था।

"

''तो

? इससे क्या हुआ

? दिमाग कभी-कभी खुद भी कल्पनाएं कर लेता है। इस बात को जबर्दस्ती बढ़ाने की जरूरत नहीं है।

"

डोंगरा चुप हो गया लेकिन उसके चेहरे पर से अनिश्चय के भाव नहीं गए।

''और उसकी वो हालत

?"-प्रीति बोली-

''मैं राज को अच्छी तरह जानती हूं। वो इस तरह आसानी से डरने वालों में से नहीं है। लेकिन कल रात...वो जिस तरह कांप रहा था...मेरे लिये तो यकीन करना भी मुश्किल है। मैं उसे केवल एक सपने का असर नहीं मान सकती।

"

''तो तुम ही बता दो वो क्या था

?"-जय बोला।

''कहीं ऐसा तो नहीं कि वो...वो सचमुच उसके साथ हुआ हो।

"

''अच्छा

?"-मोहिनी बोली-

''लेकिन हमने तो उसे किसी भूत-प्रेत से जूझते हुए नहीं बचाया था। हमने तो उसे केवल नींद से जगाया था। तुम लोग बेकार एक मामूली से सपने को इतना तूल देने पर तुले हुए हो।

"

''अगर तुम मेरे जितनी अच्छी तरीके से राज को जानती होतीं तो तुम भी कभी ये विश्वास नहीं करतीं कि जिस चीज ने उसे इतना डरा दिया

, वो केवल एक मामूली सपना था।

"

''ओके। राज ने सपना नहीं देखा था। उसने साक्षात भूत देखा था। अब ठीक

?"

प्रीति ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला

, फिर होंठ भींच लिए।

''बहादुर तो वो है।

"-डोंगरा ने स्वीकार किया-

''अभी ही देखो। अकेला उस कब्रिस्तान में गया है। पता नहीं क्या करने

?"

''किसी कब्र पर धार मारकर न आ जाए।

"-जय बड़बड़ाया-

''ऐसा किया तब तो भूत पक्का पीछे पड़ जाएगा हमारे।

"

''जय!

"-प्रीति उसके कंधे पर हल्के से हाथ मारते हुए नाराजगी भरे स्वर में बोली।

तभी अनुराग किचन से वापस आ गया।

''राज कहां गया

?"-उसने आते ही पूछा।

''कल यहां हमने जो उसकी ससुराल ढूंढी थी

"-जय बोला-

''वहीं गया है।

"

''ससुराल

?...ओह।

"-अनुराग को बात देर से समझ में आई। फिर उसने पलटकर मकान की ओर देखा

, जिसके उस पार पिछले हिस्से में आगे जंगल में वो पुराना कब्रिस्तान था।

''लेकिन तुम सब लोग तो यहीं जमे हुए हो।

"-फिर अनुराग चिंतित स्वर में बोला।

''तो हम सब लोग कहां चले जाएं

?"-जय मुंह बना कर बोला।

''हमने साथ चलने को कहा था

"-मोहिनी जल्दी सेे बोली-

''लेकिन उसने कहा वो अकेले ही जाना चाहता है।

"

''ए रियल पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर!

"-प्रीति ने कहा।

''मैं उसके पास जाता हूं।

"-अनुराग जाने लगा।

''अरे

, बैठो।

"-मोहिनी ने उसका हाथ पकड़कर उसे बैठने का इशारा करते हुए कहा-

''पीछे ही तो गया है। अभी पांच मिनट में आ जायेगा। दिन में भी इतना डरने लगे तब तो हो गया।

"

मोहिनी के आग्रह करने पर अनुराग बैठ गया लेकिन उसके चेहरे से चिंता के भाव नहीं गये।
 
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