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हिना ने दो दिन बाद स्कूल जाना शुरू कर दिया ।उसकी तबियत सामान्य हो गई थी। चेहरे की सुीं तो आहिस्ता-आहिस्ता वापिस आई। इसमें कुछ दिन लगे, लेकिन कमजोरी दो दिन में ही दूर हो गई थी। नशे की सी अवस्था भी न रही, वह फिर से नार्मल को गई।पेट पर सांप के डसने के निशान मौजूद थे। पहले वे दो नन्हें गड्ढे से थे, जिनकी रंगत नीली-सी थी, अब वह दोनों गड्ढे भरकर दानों का रूप ले चुके थे व लालिमायुक्त नजर आते थे।हिना इस मामले को प्रयत्नोपरान्त भी समझ नहीं पाई थी। सुनहरे सांप को उसने अपनी आंखों से देखा था। सांप ने उसे डसा भी था कि पेट पर इसकी निशानी मौजूद थी। लेकिन इस डसने का प्रभाव किसी भयावह रूप में सामने नहीं आया था।
हिना ने इस मामले को अपने तक ही रखा था। किसी को कुछ नहीं बताया था ।अगर यह सब समीर राय जान गया होता जो जाने उस पर क्या गुजरती ? क्योंकि अपनी बेटी हिना में तो उसकी जान थी ।यही वजह थी कि जब वह हिना के साथ मुम्बई शिफ्ट हुआ था तो उसने हिना को सख्ती से सचेत कर दिया था कि वह किसी को अपनी फैमिली बैक-ग्राउण्ड के बारे में कुछ न बताये। उसने तो उसे किसी को अपना नाम तक बताने से मना कर दिया था। फिर कुछ समय बाद सिर्फ 'समीर साहब' बताने की इजाजत दी थी ।इसकी वजह साफ थी कि एक तो रोशगढ़ी में कुछ 'रहस्यमयी शक्तियां' हिना के पीछे लग गई थीं..फिर कंगनपुर वालों से दुश्मनी का अन्देशा भी था। हालांकि राजा सलीम अब जिन्दा नहीं था...पर सावधानी व सतर्कता जरूरी थी उन घटनाओं को अब दस साल हो चुके थे।
समीर राय हिना की तरफ से कुछ निश्चित हो चुका था। वह खुशा था कि रोशनगढ़ी से उसका शिफ्ट हो जाना लाभदायक ही सिद्ध हुआ था ।हिना हालांकि अभी पन्द्रहवें साल में लगी थी, लेकिन उसने कदकाठ खूब निकाला था। वह देखने में सोलह-सत्रह बरस की लगती थी। समीर राय चाहता था कि हिना के लिए कोई अच्छा-सा वर देख रखे...कि वह हिना की शादी जल्दी करना चाहता था। वह अपने आस-पास के लड़कों पर नजर रखे हुए था ।एक रात रोशनगढ़ी से नफीसा बेगम का फोन आया नफीसा बेगम का फोन आना कोई अनहोनी बात न थी। वह खैरियत पूछने-बताने को फोन करती ही रहती थी। लेकिन यह फोन कयामत की खबर लाया ।नफीसा बेगम ने बड़े चाव के साथ बताया-"बेटा, मैं हिना की बात पक्की कर रही हूं। कल रोशनगढ़ी आ जाओ... ।'
"क्या..?" समीर राय सिर पकड़कर बैठ गया। यह एक बेआवाज धमाका था। ऐसा धमाका जिसने समीर राय के जिस्म में नहीं, उसकी रूह में छेद किये थे।उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि मां को यह अचानक हुआ क्या है ? हिना कौन-सी इतनी बड़ी हो गई थी कि उसके रिश्ते आने बन्द होने वाले थे। अभी तो हिना की उम्र ही क्या थी, अभी तो उसने अपनी जिन्दगी की पन्द्रहवीं सीढ़ी पर ही कदम रखा था। वह एक खानदानी और ऐसी हसीन लड़की थी कि उसके लिये रिश्तों की क्या कमी
थी।फिर, यह मां ने जाने कहां बात पक्की करने की हामी भी ली। उसे यकीन था कि मां ने अपने आठ भाइयों की औलाद में से ही किसी को चुना होगा ।समीर राय को मां का यूं इतना बड़ा फैसला, उससे मशवरा किये बिना, ले लेना पसन्द नहीं आया था। लेकिन समीर राय ने फोन पर ज्यादा बात नहीं की, अपने रोष पर काबू पाते हुए सिर्फ इतना कहा-"अम्मी, मैं कल आ रहा हूं। मेरा इंतजार करें। हिना का हाथ मैं जरा सोच समझ कर ही किसी के हाथ में दूंगा...।
"नफीसा बेगम को बेटे का जवाब पसन्द नहीं आया और ना ही उसका लहजा । समीर राय ने यह भी नहीं पूछा था कि-मां, कौन लड़का है और उसका नाम क्या है ?समीर राय दूसरे ही दिन रोशनगढ़ी पहुंचा तो वह लड़का हवेली में आया हुआ था। लड़के के मां-बाप नहीं थे। समीर राय का अंदाजा गलत न था। वह लड़का सातवें मामू का पांचवां बेआ था। उम्र तो खैर उसकी ठीक थी, यही कोई बीस-इक्कीस का होगा...पर बाकी कुछ ठीक नहीं था।लड़के को देखकर समीर राय को अपनी मां की अक्ल पर रोना आया लड़का सिर्फ मैट्रिक पास था...रंग का काला...पहलवानों जैसा कद-काठ...बगल में रिवाल्वर कंधे पर गोलियों की पेटी.चकाचक सफेद कपड़े... समीर राय मां को ड्राइंगरूम से अपने कमरे में ले आया व अपने आवेश पर काबू पाने की कोशिश करते हुए बड़े धीमे लहजे में बोला-"अम्मी, आपने यह लड़का चुना है अपनी हिना के लिए। अम्मी, क्या वह तुम्हारी पौत्री नहीं...?"अरे तभी तो उसके लिये फतह मोहम्मद को पसन्द किया है। वह फैज भाई का सबसे लायक बेटा है...।''अम्मी, क्या यह एम.ए. किये हुये है..?" समीर राय के लहजे में व्यंग था।
"लो सुन लो। उसे भला बी.ए., एम.ए. करने कीक्या जरूरत। कौन-सी नौकरी करनी है। अरे, जमींदारी ही तो करनी है... |
"और मां शक्ल-सूरत ? आपने अपनी हिना को तो देखा होगा...।" समीर राय ने फिर वार किया।
अपनी हिना के लिए बहुत अच्छा है। फिर मर्द की सूरत कब देखी जाती है। जमींदार बाप का जमींदार बेटा है... । छ: फुट का जवान है और हमें क्या चाहिये... ।'
"अम्मी...मुझे इस लंगूर को नहीं देनी अपनी बेटी...।" समीर राय को साफ व सख्त शब्दों में कहना ही पड़ा-"और अम्मी जान, एक बात और गौर से सुन लें...आपको अब हिना का रिश्ता ढूंढने की कोई जरूरत नहीं है...।''
"तो क्या जिन्दगी भर बैठाये रखेगा अपनी बेटी को भी.?"
"अम्मी...अभी उसकी उम्र ही क्या है। पन्द्रहवें में लगी है। लड़कियों की शादी जल्दी कर देने के हक में मैं भी हूं। लेकिन अब इतनी जल्दी में भी नहीं हूं कि किसी लंगूर के हाथ में उसका हाथ पकड़ा दूं..।"
"लेकिन बेटा...मैंने तो फैज भाई को जुबान दे दी है... ।'
"मां...यह तो आपने अक्लमंदी का सबूत नहीं दिया।" समीर अपना गुस्सा दबाते बोला-"आप अपने भाई से कह दें कि हिना अभी पढ़ रही है और मैं अभी सात-आठ साल तक उसकी शादी नहीं करने वाला...।''
"अगर वो इसके लिये भी राजी हो गये तो..?" मां ने अंदेशा जाहिर किया।
फिर मुझे खुदकशी करनी होगी...।'' समीर राय ने झुंझला कर कहा।
"अच्छा, ठीक है। मैं उन्हें किसी तरह टालती हूं। अब तू उनके सामने न पड़ना। बेहतर यही है कि फौरन वापिस चला जा...।" नफीसा बेगम ने राह दिखाई।
"ठीक है, अम्मी
! मैं वापिस जा रहा हूं...।"और समीर राय हवेली से यूं भागा जैसे उसके पीछे डाकू पड़े हों ।पता नहीं नफीसा बेगम ने अपने इस भाई को क्या पट्टी पढ़ाई कि वह चुपचाप अपने बेटे को लेकर हवेली से चला गया। वह बात न नफीसा बेगम ने बेटे को बताई और ना ही समीर राय ने अपनी मां से पूछा।
हिना ने इस मामले को अपने तक ही रखा था। किसी को कुछ नहीं बताया था ।अगर यह सब समीर राय जान गया होता जो जाने उस पर क्या गुजरती ? क्योंकि अपनी बेटी हिना में तो उसकी जान थी ।यही वजह थी कि जब वह हिना के साथ मुम्बई शिफ्ट हुआ था तो उसने हिना को सख्ती से सचेत कर दिया था कि वह किसी को अपनी फैमिली बैक-ग्राउण्ड के बारे में कुछ न बताये। उसने तो उसे किसी को अपना नाम तक बताने से मना कर दिया था। फिर कुछ समय बाद सिर्फ 'समीर साहब' बताने की इजाजत दी थी ।इसकी वजह साफ थी कि एक तो रोशगढ़ी में कुछ 'रहस्यमयी शक्तियां' हिना के पीछे लग गई थीं..फिर कंगनपुर वालों से दुश्मनी का अन्देशा भी था। हालांकि राजा सलीम अब जिन्दा नहीं था...पर सावधानी व सतर्कता जरूरी थी उन घटनाओं को अब दस साल हो चुके थे।
समीर राय हिना की तरफ से कुछ निश्चित हो चुका था। वह खुशा था कि रोशनगढ़ी से उसका शिफ्ट हो जाना लाभदायक ही सिद्ध हुआ था ।हिना हालांकि अभी पन्द्रहवें साल में लगी थी, लेकिन उसने कदकाठ खूब निकाला था। वह देखने में सोलह-सत्रह बरस की लगती थी। समीर राय चाहता था कि हिना के लिए कोई अच्छा-सा वर देख रखे...कि वह हिना की शादी जल्दी करना चाहता था। वह अपने आस-पास के लड़कों पर नजर रखे हुए था ।एक रात रोशनगढ़ी से नफीसा बेगम का फोन आया नफीसा बेगम का फोन आना कोई अनहोनी बात न थी। वह खैरियत पूछने-बताने को फोन करती ही रहती थी। लेकिन यह फोन कयामत की खबर लाया ।नफीसा बेगम ने बड़े चाव के साथ बताया-"बेटा, मैं हिना की बात पक्की कर रही हूं। कल रोशनगढ़ी आ जाओ... ।'
"क्या..?" समीर राय सिर पकड़कर बैठ गया। यह एक बेआवाज धमाका था। ऐसा धमाका जिसने समीर राय के जिस्म में नहीं, उसकी रूह में छेद किये थे।उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि मां को यह अचानक हुआ क्या है ? हिना कौन-सी इतनी बड़ी हो गई थी कि उसके रिश्ते आने बन्द होने वाले थे। अभी तो हिना की उम्र ही क्या थी, अभी तो उसने अपनी जिन्दगी की पन्द्रहवीं सीढ़ी पर ही कदम रखा था। वह एक खानदानी और ऐसी हसीन लड़की थी कि उसके लिये रिश्तों की क्या कमी
थी।फिर, यह मां ने जाने कहां बात पक्की करने की हामी भी ली। उसे यकीन था कि मां ने अपने आठ भाइयों की औलाद में से ही किसी को चुना होगा ।समीर राय को मां का यूं इतना बड़ा फैसला, उससे मशवरा किये बिना, ले लेना पसन्द नहीं आया था। लेकिन समीर राय ने फोन पर ज्यादा बात नहीं की, अपने रोष पर काबू पाते हुए सिर्फ इतना कहा-"अम्मी, मैं कल आ रहा हूं। मेरा इंतजार करें। हिना का हाथ मैं जरा सोच समझ कर ही किसी के हाथ में दूंगा...।
"नफीसा बेगम को बेटे का जवाब पसन्द नहीं आया और ना ही उसका लहजा । समीर राय ने यह भी नहीं पूछा था कि-मां, कौन लड़का है और उसका नाम क्या है ?समीर राय दूसरे ही दिन रोशनगढ़ी पहुंचा तो वह लड़का हवेली में आया हुआ था। लड़के के मां-बाप नहीं थे। समीर राय का अंदाजा गलत न था। वह लड़का सातवें मामू का पांचवां बेआ था। उम्र तो खैर उसकी ठीक थी, यही कोई बीस-इक्कीस का होगा...पर बाकी कुछ ठीक नहीं था।लड़के को देखकर समीर राय को अपनी मां की अक्ल पर रोना आया लड़का सिर्फ मैट्रिक पास था...रंग का काला...पहलवानों जैसा कद-काठ...बगल में रिवाल्वर कंधे पर गोलियों की पेटी.चकाचक सफेद कपड़े... समीर राय मां को ड्राइंगरूम से अपने कमरे में ले आया व अपने आवेश पर काबू पाने की कोशिश करते हुए बड़े धीमे लहजे में बोला-"अम्मी, आपने यह लड़का चुना है अपनी हिना के लिए। अम्मी, क्या वह तुम्हारी पौत्री नहीं...?"अरे तभी तो उसके लिये फतह मोहम्मद को पसन्द किया है। वह फैज भाई का सबसे लायक बेटा है...।''अम्मी, क्या यह एम.ए. किये हुये है..?" समीर राय के लहजे में व्यंग था।
"लो सुन लो। उसे भला बी.ए., एम.ए. करने कीक्या जरूरत। कौन-सी नौकरी करनी है। अरे, जमींदारी ही तो करनी है... |
"और मां शक्ल-सूरत ? आपने अपनी हिना को तो देखा होगा...।" समीर राय ने फिर वार किया।
अपनी हिना के लिए बहुत अच्छा है। फिर मर्द की सूरत कब देखी जाती है। जमींदार बाप का जमींदार बेटा है... । छ: फुट का जवान है और हमें क्या चाहिये... ।'
"अम्मी...मुझे इस लंगूर को नहीं देनी अपनी बेटी...।" समीर राय को साफ व सख्त शब्दों में कहना ही पड़ा-"और अम्मी जान, एक बात और गौर से सुन लें...आपको अब हिना का रिश्ता ढूंढने की कोई जरूरत नहीं है...।''
"तो क्या जिन्दगी भर बैठाये रखेगा अपनी बेटी को भी.?"
"अम्मी...अभी उसकी उम्र ही क्या है। पन्द्रहवें में लगी है। लड़कियों की शादी जल्दी कर देने के हक में मैं भी हूं। लेकिन अब इतनी जल्दी में भी नहीं हूं कि किसी लंगूर के हाथ में उसका हाथ पकड़ा दूं..।"
"लेकिन बेटा...मैंने तो फैज भाई को जुबान दे दी है... ।'
"मां...यह तो आपने अक्लमंदी का सबूत नहीं दिया।" समीर अपना गुस्सा दबाते बोला-"आप अपने भाई से कह दें कि हिना अभी पढ़ रही है और मैं अभी सात-आठ साल तक उसकी शादी नहीं करने वाला...।''
"अगर वो इसके लिये भी राजी हो गये तो..?" मां ने अंदेशा जाहिर किया।
फिर मुझे खुदकशी करनी होगी...।'' समीर राय ने झुंझला कर कहा।
"अच्छा, ठीक है। मैं उन्हें किसी तरह टालती हूं। अब तू उनके सामने न पड़ना। बेहतर यही है कि फौरन वापिस चला जा...।" नफीसा बेगम ने राह दिखाई।
"ठीक है, अम्मी
! मैं वापिस जा रहा हूं...।"और समीर राय हवेली से यूं भागा जैसे उसके पीछे डाकू पड़े हों ।पता नहीं नफीसा बेगम ने अपने इस भाई को क्या पट्टी पढ़ाई कि वह चुपचाप अपने बेटे को लेकर हवेली से चला गया। वह बात न नफीसा बेगम ने बेटे को बताई और ना ही समीर राय ने अपनी मां से पूछा।