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Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा )

वक्त ने बहुत तेजी से करवट ली ।समय का स्थ..अपनी द्रुतगति से दौड़ता रहा। समय बीतता गया। दिन–महीने और साल। यूं ही खुशी-खुशी दस साल बीत गये। वक्त बीतने का किसी को अहसास ही नहीं हुआ। हिना देखते-ही-देखते बड़ी हो गई थी।उसे अग पन्द्रहवां साल लगने को था। वह क्या से क्या हो गई थी। उसकी आंखों में सितारे भरे थे...चेहरे पर चांद रोशन था और बदन जैसे चांदनी में नहाया हुआ था। वह तो वैसे ही बड़ी सुन्दर थी... । अब तो जैसे कयामत हो गई थी। जिधर से गुजरती बहारें बिखर जातीं। जब वह इन्टर कालेज में थी! जब वह अपनी गाड़ी से उतर कर कालेज के गेट में दाखिल होती, एक हंगामा उठता. हर तरफ शोर मच जाता।

- "वो देखो.हिना आ गई।"

लड़कियां उस पर इस तरह गिरतीं, जैसे 'शमा पर 'परवाने' गिरते हैं |हिना जितनी हसीन थी, अन्दर से उतनी ही मासूम थीं उसकी सूरत ही भोली-भाली नहीं थी...दिल भी भोला भाला था। उसे अपने सौंदर्य-अपने यौवन पर नाज न था. ना उसे बड़े बाप की बेटी होने का घमण्ड था ।वह हर लड़की से बेतकल्लुफ हो जाती थीं बेबाकी से बात करती थी, अगर उसे अहसास हो जाता कि कोई लड़की उसे हसरत से देख रही है...बात करना चाहती है, लेकिन झिझक रही है, तो ऐसी लड़की से वह खुद आगे बढ़कर बात कर लेती थी ।फिर लड़कियां उसकी दीवानी क्यों न होती। सारी लड़कियां ही तो उस पर जान देती थीं। पूरा गर्ल्स कालेज उस पर फिदा था। लड़कियां तो लड़कियां, कालेज की लैक्चरार भी उसक तरफ आकर्षित थीं। वे पढ़ाते-पढ़ाते उसके चेहरे में खो जाती थीं और समीर राय तो जैसे देखकर जीता था। नफीसा बेगम उस पर 'सदके वारी' जाती थी।हिना को आये दस साल बीत गये थे लेकिन समीर राय ने अभी तक शादी नहीं की थी।

मां चाहती थी कि वह मायरा से शादी कर ले...समीर मायरा को पसन्द नहीं करता था। वह हवेली आ जाती तो समीर राय उसके साथ वक्त भी गुजार लिया करता थां लेकिन नफीसा बेगम जब भी उपयुक्त अवसर देखकर उससे शादी का जिक्र करती तो...समीर किसी नये घोड़े की तर विदक जाता था। मां, जिद्द करती तो वह हाथ जोड़कर बैठ जाता था।

"अम्मी..मुझे माफ कर दो। मुझसे इन्कार करा कर...क्यों मुझे गुनहागार बनाती हैं। अम्मी, आप तो मेरी जन्नत हैं..मेरे हाथ से क्यों निकलना चाहती हैं....।" वह अनुनयपूर्ण लहजे में कहता ।

"मैं कब कहती हूं कि तू इंकार कर...मैं कब चाहती हूं कि गुनाह का अहसास तुझे कचोटे...।" नफीसा बेगम भी बहस पर उतर आती-"तू आखिर कब तक अकेला रहेगा?"

"मैं अकेला कब हूं, मां... । आप हैं मेरे साथ...हिना है हमारे पास...।"

"मैं कब तक जिन्दा रहूंगी... । मैं सोचती हूं. मेरे बाद कौन करेगा तेरी शादी...कौन करेगा तेरी फिक्र...।" नफीसा बेगम सचमुच ही चिन्तित हो उठती ।

"लेकिन मुझे तो इस हवेली में एक दुल्हन चाहिये...।" मां अधिकारपूर्ण जिद्द पर उतर आती।

"अम्मी जान..मैं अब बूढ़ा हो गया हूं..।" वह एकदम पैंतरा बदलता।

"लो..अब कर लो बात।" मां का मुंह बन जाता-

"सुन लो यह नया बहाना। शादी न करने के सौ बहाने बना लो..मगर खबरदार अपने आपको बूढा मत कहना!"

"क्यों मां..?" वह चकित-सा मां की सूरत देखता।"तू खुद को बूढ़ा कहेगा, जिसकी उम्र चालीस इक्तालीस है...तो फिर मैं खुद को क्या कहूंगी। देख, मैं तो खुद को बूढी कहने से रही-"नफीसा बेगम ने खिन्नता दर्शाई ।यूं यह संजीदा बात प्रायः मसखरेपन की नजर हो जाती और यह मसखरापन समीर राय बीते कई बरसों से कर रहा था। वह अपनी मां की इस संजीदा ख्वाहिश को ऐसे ही हंस कर टाल जाता लेकिन मायरा ने यह बात शायद अपने दिल पर लिख ली थी। उसकी चाहत भी छिपी नहीं रही थी। उसने भी अब तक शादी नहीं की थी।

जब भी उसकी शादी की बात चलती...उसकी आंखें में आंसू भर आते ।

“मा..मैं शादी नहीं करूंगी...।'' उसका जवाब होता। आखिर मैं तुझे कब तक बिठाये रखू।"

मां दुख से कहती-"किसकी आस लिए बैठी है तू.?"

"मां, मुझे किसी की आस नहीं। बस, मैंने नहीं करनी शादी...अगर आपने जबरदस्ती की अम्मी जान, तो खुदा की कसम मैं जहर ख लूंगी...।" वह खुद को संभालते एकदम आंसू पोंछ लेती, जैसे जहर खाने का पुख्ता इरादा रखती हो ।समीर राय को मायरा के इस निरन्तर इंकार का अहसास था..लेकिन वह क्या करता? उसके पास अपना कुछ नहीं था..वह तो सब कुछ नमीरा के नाम कर चुका था। वह बिल्कुल खाली झोली था...वह किसी से शादी करके उसे क्या देता।उसे तो बस सिर्फ अपनी हिना की फिक्र थी।हिना ही अब उसकी जिन्दगी थी। हिना को देखकर उसकी आंखों के चिराग रोशन होते थे। हिना उसकी आंखों का नूर थी... उसके दिल का सुकून थी हिना ही थी जो हर पल उसकी सोचों में रहती थी जब उन रहस्यमय हस्तियों ने हिना पर दोबारा कब्जा करना चाहा तो वह भीतर से कांप कर रह गया। हालांकि वक्ती तौर पर उसने उन पर विजय पा ली थी, लेकिन हर वक्त का धड़का उसके साथ लग गया था। उसने फौरन रोशनगढ़ी छोड़ने का फैसला कर लिया। वह हिना के साथ स्थाई रूप से मुम्बई आ गया। यहां आकर उसने बांद्रा वाला अपना बंगला आबाद किया। छांट-छांट कर नौकर रखे...सुरक्षा के

उत्कृष्ट प्रबन्ध किए। हिना का एक अच्छे स्कूल में एडमिशन कराया...और वह स्वयं हिना को स्कूल छोड़ने व लेने जाता था ।नफीसा बेगम का रोशनगढ़ी में रहना जरूरी था। हवेली खाली छोड़ी जा सकती थी ना जमींदारी। जमीनों और जायदाद के सौ झगड़े थे...उन्हें देखने वाला भी कोई चाहिये था |बहरहाल, हिना एक बार जो रोशनगढ़ी से आई थी तो फिर पलट कर हवेली नहीं गई थी। हां, नफीसा बेगम जरूर आती-जाती रहती थी।यूं दस साल इस तरह बीत गये, जैसे दस माह हों, दस दिन हों, दस

घन्टे हों।

बहुत पहले...लगभग दस ससाल पहले तांत्रिका और भविष्यवक्ता अरूणिमा ने हिना के बारे में समीर से कहा था कि-'इस लड़की पर इसका पन्द्रहवां साल बहुत भारी होगा...।'उसने बस इतना ही कहा था..यह नहीं बताया था कि क्या होगा। उसके बाद भी अरूणिमा से कई मुलाकातें हुई थी, लेकिन इस सिलसिले में उस ‘पहुंची हुई ने न कुछ और बतारया था और न ही समीर राय ने उससे कुछ पूछा था ।अरूणिमा की यह भविष्यवाणी आई...गई ही हो गई थी और अब वह कयामत का साल आ पहुंचा था। अरूणिमा की वह भविष्यवाणी तो समीर राय के दिमाग से उतर गई थी। कोई नहीं जानता था..ना किसी के जहन में था यह पन्द्रहवां साल इस हसीन लड़की पर क्या कयामत ढायेगा ।समीर राय हिना का बर्थ-डे बड़ी धूमधाम से मनाया करता था ।हिना की बीसियों सहेलियों के साथ नफीसा बेगम और मायरा इस फंक्शन में जरूर शामिल होती थीं। खानदान के दूसरे लोग भी आते थे।हिना की पन्द्रहवीं सालगिरह ज्यादा दूर न थी कि-एक दिन क्या हुआ? यह जन्मदिन से बहुत पहले की बात है। मेथ' का पीरियड था। मैडम...पूर्ण एकाग्रता के साथ किसी प्राब्लम' का हल समझा रही थी कि क्लास-रूम के दरवाजे पर एकदम शोर-सा हुआ। कोई लड़की, 'सांप-सांप' कहती हुई भागी।और जब सांप की आवाज हिना के कानों में पड़ी तो उसकी अवस्था एकदम बदल गई। उसके बदन में जैसे एक करंट-सा दौड़ गया। वह जैसे बेअख्तयार ही अपनी सीट से उठी और मैडम से बाहर जाने की अनुमति लिए बिना...दौड़ती हुई क्लास रूम से बाहर निकल गई।उसने जल्दी ही बरामदे में जाती हुई लड़की को जा लिया। उसने उस लड़की के साथ भागते हुए पूछा-"क्या हुआ...? मुझे बताओ..? कहां है सांप ?"

"वह, उधन लाइग्ररी में... ।'' उस लड़की ने बताया।"तुम कहां जा रही हो?" हिना ने पूछा।

"मैं प्रिन्सिपल को बताने जा रही हूं...। वह बोली तो हिना ने उसका हाथ पकड़ कर उसे रोक लिया और उसे लाइब्रेरी की तरफ घसीटते हुए बोली-"आओ, मेरे साथ...।

"फिर जब वह लाइब्रेरी में पहुंची तो अच्छा खासा हंगामा मचा हुआ था, लड़कियां दरवाजे पर खड़ी चीख रही थीं। आहिस्ता-आहिस्ता यह खबर हर क्लास तक पहुंच गई कि लाइब्रेरी में सांप निकल आया है। देखते-ही-देखते बहुत-सी लड़कियां लाइब्रेरी के सामने इकट्ठा हो गई। कहां है सांप, मुझे बताओ... I' हिना लाइब्रेरी में घुसते हुए बोली ।

“तुम क्या करोगी। प्रिन्सिपल मैडम को आने दो। आफिस से किसी मर्द को बुलाओ...।

" कई लड़कियों ने उसे रोका।'अरे, हटो...।" हिना ने झटका देकर लड़कियों को परे किया और अंदर घुस गई |लाइब्रेरी में इस वक्त कोई नहीं था। लाइब्रेरियन भी अन्दर मौजूद न थी। लाइब्रेरी के दरवाजे से विभिन्न आवाजें आ रही थीं। सांप उपन्यासों वाले शेल्फ के पीछे था। कोई कह रहा था-"मेज पर था...।

"कोई कह रहा था-"नहीं, कुर्सी के नीचे था।

"जितने मुंह उतनी बातें' वाली स्थिति थी।हिना ने लाइब्रेरी के मध्य में खड़े होकर जायजा लिया। उसके चेहरे पर अजीब से भाव थे, वह गहरे-गहरे सांव ले रही थी और उसकी आंखों में एक खास चमक-सी बढ़ती जा रही थी। वह अपनी गर्दन को कुछ इस तरह धीरे-धीरे घुमा रही थी..जैसे किताबों व शैल्फों में छिपे हुये सांप को देखने की कोशिश कर रही हो ।फिर 'वो' उसे अचानक ही नजर आ गया। वो सांप...हिना के अंदर आते ही एक शैल्फ के पीछे से बाहर निकल आया था और फर्श पर तेजी से रेंगता हुआ उसी की तरफ बढ़ रहा था |

दरवाजे पर खड़ी लड़कियों की नजरें हिना की तरफ बढ़ते हुए सांप पर पड़ी तो सबकी चीखें निकल गई। वे ऊंची आवाज में कह रही थीं-"हिना..भागकर वापिस आ जाओ...निकल आओ बाहर...सांप तुम्हें काट लेगा। लेकिन हिना को अब कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी। सांप को देखकर उस पर तो जैसे कोई जुनून छा गया था। अचानक ही उसका बचपन उसके सामने आ गया था वह लाल ईटों वाले फर्श पर दौड़ती फिर रही थी और छोटे-बड़े सांप उसके आस-पास घूम रहे थे। वह जिस सांप को चाहती हाथ में पकड़ लेती।यह तो था उसका बचपन। उसे किसी सांप से भला क्या खौफ आना थांउसकी निगाहें सांप पर टिकी हुई थीं। सांप रेंगते-रेंगते रुक गया। उसने अपना रुख बदल कर कुण्डली बनाई और फन फैलाकर हिना को देखने लगा। वो अब हिना से चंद कदम के फासले पर था ।हिना ने गुस्से से उसकी तरफ देखा...बेअख्तयार उसकी तरफ बढ़ी व फिर डांटकर उससे बोली-"शर्म नहीं आती...लड़कियों को डराता है... वो एक काले रंग का चमकदार, दो-ढाई फुट का आम-सा सांप था, न जाने कहां से भटकता हुआ इधर आ निकला था। हिना को देखकर वो झूमने लगा था।
 
वह बड़ी दिलचस्पी से हिना को निहार रहा था ।फिर उसने अपना फन फर्श पर रखा और बड़ी तेजी से सरसराता हुआ एक तरफ चला और यही वक्त था जब उस सांप पर काबू पाया जा सकता था ।कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था, हिना...एक लड़की... ऐसा कर गुजरेगी। शायद इसका अंदाजा उस सांप को भी नहीं था कि हिना किसी चील की तरह उस पर झपटेगी और उसे दुम से पकड़ कर उठा लेगी और उसे इतना मौका भी नहीं देगी कि वो पलट कर उसके हाथ पर काट सके |हिना ने पलक झपकते ही उसकी दुम पकड़ कर उसे उठाया और एक खास अंदाज से झटका दिया। इस झटके ने उसका जोड़-तोड़ खोल दिया। वो पलट कर वार करने के काबिल ही न रहा। हिना ने बड़ी फुर्ती से सांप को फर्श पर पटका औ अपना जूता उसके फन पर रखकर उसे बड़ी बेदर्दी से रगड़ दिया ।सांप में 'जोड़-तोड़ टूटने के बाद जो रही-सही जान थी, वह फन कुचलने के साथ ही निकल गई। फिर हिना ने इस 'नर-सर्प' को दुम से पकड़ कर उठा लिया और बड़े इत्मीनान के साथ दरवाजे की तरफ बढ़ी |लड़कियां फटी-फटी आंखों से उसे देख रही थीं। हिना जब दरवाजे के निकट पहुंची तो लड़कियां चीखती हुई भागीं। इस बीच पूरा स्कूल ही खाली हो चुका था। लड़कियां क्लासें छोड़ मैदान में इकट्ठी हो चुकी थीं प्रिन्सिपल भी हांफती-कांपती पहुंच गई थी और जब उन्होंने हिना के हाथ में सांप देखा, जिसे वह रस्सी की तरह लहराती हुई ला रही थी..तो वह तो जैसे सकते में ही आ गई।

हिना के इस कारनामे पर उन्हें यकीन न आया...लेकिन जो कुछ था उनके सामने था। वह जो देख रही थी उसे झुठला भी तो नहीं सकती थी।हिना पहले ही पूरे कालेज में चाहे जाने वाली लड़की थी. इस घटना ने उसे प्रियता के शिखर पहुंचा दिया। साथ ही यह भी हुआ कि कुछ लड़कियां उससे डरने भी लगी कि कभी-कभी उन्हें हिना की आंखों में एक रहस्मयी-सी चमक देखने को मिल जाती थी।फिर एक और घटना घटी और यह हिना के जन्मदिन से कुछ ही दिन पहले की बात है-दिलदार और उसकी बीवी सरवारी इस बंगले के पुराने नौकर थे। उनकी एक बेटी थी सितारा...और भी बच्चे थे, लेकिन यह सितारा हिना की हमउम्र थी। सितारा एक शालीन स्वभाव व मधुर व्यवहार वाली लड़की थी। हिना उसे बहुत पसन्द करती थी। वह सितारा को नौकरानी कम, सहेली ज्यादा समझती थी।इस बंगले के पिछवाड़े, दीवार पर रात की रानी की बेल चढ़ी हुई थी। वह खासी घनी थी और रात को उसकी महक पूरे बंगले में फैल जाती थी। बंगले के पिछवाड़े एक खूबसूरत लॉन और उसमें चारों तरफ फूलों

के पौधे लगे हुए थे। लॉन में मखमली घास उगी हुई थी ।चांदनी रात में इस घास पर हिना को टहलने का बड़ा शौक था। उसके साथ सितारा भी होती थी। दोनों टहलती हुई दुनिया जहान की बामें किया करती थीं। सितारा आठवीं पास करके घर बैठ गई थी, जबकि हिना की पढ़ाई जारी थी। हिना चाहती थी कि सितारा भी आगे बढ़े, लेकिन उसके मां-बाप की सोच थी कि अगर वह ज्यादा पढ़-लिख गई तो फिर बिरादरी में उसके लिए वर ढूंढ पाना मुश्किल हो जाएगा ! सो सितारा की पढ़ाई छुड़ा दी गई और उसने हिना का काम-काज संभाल लिया |बहरहाल, इस शाम सितारा अपने क्वार्टर से निकल कर बंगले की तरफ बढ़ी तो अचानक उसकी नजर 'रात की रानी' पर पड़ी। उसकी जड़ में उसे एक सुनहरा चमकीला सांप नजर आया। वो सरसराता हुआ बेल पर चढ़ रहा था सांप देखकर वह सरपट भागी। उसकी मां सरवरी, किचन में चाय बना रही थी, भागकर किचन में पहुंची और मां को बताया-"अम्मा...अम्मा...रात की रानी पर सांप... ।'"

"हें, सांप...।" चूल्हे पर से केतली उतारती सरवरी का हाथ कांपा-"अरी, यह क्या कर रही है तू..।"

"सांप, अम्मा ! सांप... | मैंने खुद देखा है...।'

' ''अच्छा, चल आ..मेरे साथ...।” सरवरी चाय छोड़कर बाहर जाने लगी।"अम्मा..अब्बा को साथ ले चलो...मुझे डर लगता है।

''तू आ तो...तेरा बाप कौन-सा तीसमार खां है, उसे तो कुत्ते कीशक्ल देखकर कंपकंपी आती है।" सरवरी उसका हाथ पकड़ते हुए बोली-"आ तू मेरे साथ...।'

'जब मां-बेटी दोनों बाहर निकलकर पिछवाड़े गईं और उन्होंने 'रात की रानी' पर नजर दौड़ाई तो वहां उन्हें कोई सांप नजर नहीं आया...अलबत्ता एक अजीब-सी खुशबू जरूर फैली हुई थी ओर यह खुशबू ‘रात की रानी' की खुशबू से अलग थी ।पर फिर...वही सांप सरवरी को भी दिखाई दे गया। सुनहरे रंग का वह सांप अब 'रात की रानी' के पत्तों में सरसरा रहा था। सांप देख वह बंगले से किसी को बुलाने के लिए भागी। सामने ही अपना शौहर दिलदार नजर आया। सरवरी उसके साथ फौरन वापिस गई। लेकिन अब वो सांप वहां से गायब हो चुका था ।हां...वहां. वह अनूठी खुशबू अब भी फैली हुई थी।और फिर..यू वह सुनहरा सांप कभी एक नौकर को और कभी दूसरे नौकर को और विभिनन जगहों पर दिखाई देता रहा। ड्राइवर महमूद उसे देखकर अपने क्वार्टर से लाठी निकार कर लाया। लेकिन अब वहां सांप नहीं था। महमूद ने उस सांप को इधर-उधर तलाशा भी...पौधों और पत्तों में देखा, लेकिन वो कहीं नजर नहीं आया। अलबत्ता एक तेज खुशबू वहां जरूर फैली हुई थी।हिना का कमरा 'रात की रानी' के उस पौधे के ऐन सामने था। अगर उसके कमरे के पर्दे हटे हुए हों तो रात की रानी' को वहां से साफ-स्पष्ट देखा जा सकता था। सांप दिखाई देने की खबर अभी तक हिना को नहीं दी गई थी। कोई खास वजह नहीं, बस उसे एक लड़की । समझ कर ही उसे इस बारे में कुछ नहीं बताया गया था कि कहीं 'सांप निकलने की खबर सुनकर वह डर-वर न जाए। इन नौकर-चाकरों को भला यह बात कहां मालूम थी कि हिना सांपों से डरने वाली नहीं, बल्कि उन्हें डराने वाली थी।फिर एक शाम इस सुनहरे सांप पर समीर राय की भी नजर पड़ गई।उसने गेट पर मौजूद गार्डों को बुलवा भेजा...खुद इस सांप पर नजर रखी। पर फिर जैसे ही गार्ड पिछवाड़े पहुंचे और उन्हें सांप के बारे में बताने के लिए समीर राय की जरा जरन सांप पर से हटी और उसने दो बारा 'रात की रानी' की तरफ देखा तो सांप अपनी जगह से गायब था ।गार्डों ने दूसरे नौकरों के साथ मिलकर पूरा बगीचा छान मारा। एक-एक पत्ता टटोल लिया मगर वह सुनहरा सांप फिर कहीं नहीं मिला |सांप गायब था और एक अनूठी-सी मादक खुशबू मौजूद थी।

घर के हर प्राणी ने उस सुनहरे सांप को देखा था। अगर नहीं देखा था तो सिर्फ हिना ने नहीं देखा था ।सुनहरा सांप देखकर समीर राय का खौफजदा होने की हद तक चिन्तित हो उठना स्वाभाविक था। वह हिना के बचपन की कहानी से वाकिफ था। हिना ने वे तमाम बातें जो उसे अपने बारे में याद थीं...सब अपने अब्बू को सुना डाली थीं, हिना खूबसूरत थी तो जहीन भी बहुत थी। उसका दिमाग और उसकी याददाश्त बहुत तेज थी। वह एक ही नजर में बहुत-सी बातों को समझ लिया करती थी।समीर राय ने सोचा...और फिर जरूरी समझा कि सांप के बारे में हिना को बता दिया जाये। वो सांप दिन ढलने से कुछ पहले नजर आता था। शाम को हिना घर पर नहीं होती थी। उसने एक ट्यूशन-एकाडेमी ज्वाइन की हुई थी। वहां से वह शाम के बाद ही वापिस आती थी। शायद यही वजह थी कि रात की रानी' पर सरसराते उस सुनहरे सांप पर उसकी नजर नहीं पड़ी थी और किसी नौकर-नौकरानी में यह जुर्रत नहीं थी कि समीर राय की अनुमति के बिना हिना को कुछ बताये। सितारा को उसकी मां ने खास चेतावनी दे दी थी कि वह इस बारे में हिना बीवी से हर्गिज बात न के, और सितारा को यह बात पचाने में सचमुच ही बड़ी मुश्किल हुई थी इस सुनहरे सांप के निरन्तर दिखाई देने ने समीर राय को फिक्रमंद कर दिया था। उसने हिना को बताने का फैसला किया कि हिना को होशियार करना भी जरूरी हो गया था। फिर एक उत्कण्ठा भी अब समीर राय के जहन में उभर रही थी कि शायद हिना इस बारे में कुछ जानती हो कि आखिर उसका नाता 'सर्पलोक' के प्राणियों से रहा है। एक अविश्वसनीय बात होते हुए भी समीर राय अपनी बेटी की उस कहानी को अपने जहन से नहीं निकाल पाया था ।सो उस दिन रात का खाना खाने के बाद समीर राय ने हिना से कहा-"आओ बेटा ! ऊपर चलो, वहां बैठकर कॉफी पीएंगे।

"चलिये, अब्बू !" हिना फौरन राजी हो गई। फिर उसने एक नजर अपने बाप पर डाली, बाप के चेहरे पर कोई भाव न था। लेकिन ऊपर चलकर कॉफी पीने की ख्वाहिश अपने आपमें कई सवाल लिये हुए थी। इतना बड़ा बंगला था। नीचे कई कमरे थे। समीर राय का अपना बेडरूम भी था। ऊपर का बेडरूम भी समीर राय के प्रयोग में था।

"बाबा... । क्या कोई खास बात है..?" सीढ़ियां चढ़ते हुए हिना ने पूछ ही लिया था। इस बात का अहसास तुम्हें कैसे हुआ.?"

"आपने कभी ऊपर वाल कमरे में कॉफी पीने की बात नहीं की...।'

"भई, वाह ! मान गये तुम्हारी जहानत को... |

"इसका मतलब है कि वाकई कोई खास बात है...।" हिना ने अब्बू की तरफ शोखी से देखा ।

"अरे, नहीं बेटा ! तुम्हारा बर्थ-डे नजदीक है, सोचा प्रोग्राम फाइनल कर लिया जाये ! तुम किन-किन को बुलाना चाहोगी...ऊपर बैठकर गेस्ट्स की लिस्ट बना डालेंगे।" समीर ने बाता बनाई।

"बाबा...क्या सच में कोई और बात नहीं..?" हिना ने कमरे में प्रवेश करते फिर पूछा ।समीर राय हंस दिया-"सच कहूं तो बात है। आओ, तुम्हें सच बताऊ..।' समीर राय सोफे पर बैठते हुए बोला ।हिना धम्म से सोफे पर बैठ गई, वह खुश थी कि उसका अंदाजा सही निकला था। उसने पूछा-"हां, बताइये...क्या खास बात है ?"

"बेटा...! बंगले के पिछवाड़े की दीवार पर 'रात की रानी' की जो बेल चढ़ी हुई है।" समीर राय कहते-कहते रुक गया।

"हां, उसे क्या हुआ..?" हिना ने चौंककर अब्बू की तरफ देखा-"बड़ी फैली हुई बेल है। रात को मस्त कर देने वाली खुशबू फैलती है। मैं रात को अक्सर वहां टहलती हूं। अब्बू..चांदनी रात में तो खुशबू का लुत्फ ही कुछ और होता है....।

''मैं जानता हूं कि तुम वहां टहलती हो...।" समीर राय संजीदा हो गया-"इसीलिये यह सब तुम्हें बताना जरूरी हो गया है।“

क्या, अब्बू..?" वहां आपने क्या कोई जिन्न–विन्न देख लिया..?" हिना हंसी।जिन्न तो नहीं, लेकिन एक सांप जरूर देखा है...।''

"सांप..?" हिना जो सोफे पर नीमदराज हो गई थी, एकदम उठकर बैठ गई-"कैसा सांप ?"

"वह एकदम सुनहरा सांप है...चमकता हुआ। ऐसा सांप मैंने आज तक नहीं देखा...।" समीर ने बताया।

“बाबा...वह सांप आपने कब देखा ?" हिना अब संजीदा थी।"यह कल शाम की बात है...।"

"तो आपने मुझे बताया क्यों नही..?'

'"पहले सोचा था कि बताऊं..लेकिन वह सांप कई दिनों से बराबर नजर आ रहा है। घर के कई नौकर भी उसे देख चुके हैं, और

खतरनाक बात यह है कि वो सांप फौरन ही गायब हो जाता है, मैंने सोचा तुम्हें बता दू...कहीं हमरी बेटी डर न जाए... ।' समीर राय सहज बना रहा था।

"आप परेशान न हों, अब्बू । मैं सांपों से बिल्कुल नहीं डरती। आपको बता चुकी हूं कि मेरा बालपन सांपों से खेलते हुए गुजरा है। मैं अभी जाकर 'रात की रानी' का जायजा लेती हूं।" हिना ने इत्मीनान से कहा ।"अब वहां जाना बेकार है। वो सांप दिन ढलने से थोड़ा पहले मलगजे अन्धेरे में नजर आता है...।

"ओह, यानि कि उस वक्त जब मैं ट्यूशन ले रही होती हूं। ठीक है, कल छुट्टी है, मैं शाम को देखूगी।

"बेटा..पता नहीं क्यों मेरा दिल घबरा रहा है...।" समीर राय ने अपनी परेशानी जाहिर की। पर क्यों, अब्बू..?

" हिना अपने बाप का चेहरा देखते बोली।“मैं सोच रहा हूं कि इस 'रात की रानी' को कटवा दूं। न रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी... |

"ओह, नो पापा ! ऐसी मस्त खुशबू बिखेरने वाले पौधे को मैं कभी न कटने दूंगी। आप बिल्कुल परेशान न हों। मैं जरा एक नजर उस सांप को देख लूं..फिर आपको बातऊंगी कि क्या करना है।" हिना ने तसल्ली देते लहजे में कहा-"मुझे कुछ नहीं होगा...आप बिल्कुल फिक्र न करें।"

"अल्लाह करे ऐसा ही हो...।"

समीर राय ने ठण्डी सांस ली।
 
अगले दिन एकेडमी की छुट्टी थी।हिना शाम को घर पर ही रही। शाम को जब सितारा उसके कमरे में चाय लेकर आई तो उसने एक उंगली के इशारे से उसे अपनी तरफ बुलाया-"इधर आओ... ।"उसके बुलावे का अंदाज ऐसा था कि सितारा को खटक गई, लेकिन हिना के चेहरे पर उसे किसी खिन्नता के भाव नजर नहीं आए थे। बहरहाल, एक उंगली के इशारे के इस अंदाज से जाहिर होता था जैसे सितारा से कोई कसूर हो गया है। वह ट्रे शीशे की सेन्टर-टेबल पर रखकर हिना की तरफ बढ़ी-"जी, बीवी...।'

"जी बीवी की बच्ची..तुझे शर्म नहीं आई...।" हिना ने खफगी के साथ कहा।

"हाय, बीवी ! क्या हुआ ? मुझसे क्या कसूर हुआ ?"

"वैसे तो तू मुझसे दुनिया भर की बातें करती है, लेकिन जो बात मुझसे छिपाने की न थी, वह छिपा गई। तुझे शर्म नहीं आती...।''

"आती है बीवी.क्यों नहीं आती... |"

"तो फिर उस सुनहरे सांप वाली बात मुझे क्यों नही बताई.?''वो...वो..मां ने सख्ती से मना कर दिया था, इसलिए बीवी...।

'"क्यों.?" हिना ने पूछा ।

“मालिक का यही हुक्म था जी...। उन्होंने मां को हिदायत की थी कि मैं आपको कुछ न बताऊं।'

"अब उन्होंने खुद ही सारा वाकयसा मुझे सुनाया है... ।' हिना ने हंसते हुए कहा ।

"वह बता सकत हैं...वह मालिक हैं....।" सितारा धीरे से बोली । तो भी तो मुझे बता सकती थी। मैं तेरी मालकिन हूं...।

" हिना ने कहा ।"आपका तो जवाब ही नहीं है। आप तो बड़ी प्यारी मालकिन हैं। ऐसी मालकिन अल्लाह सबको दे...।" सितारा ने दुआ के लिए हाथ उठाए।

"अच्छा..अब ज्यादा बातें न बना, ला चाय दे मुझको और फिर चल मेरे साथ...।''

"कहां बीवी...?'' वह हैरान हुई।"जरा बाहर चलकर बैठेंगे।

‘रात की रानी' की खुशबू का लुत्फ लेंगे... ।” हिना मुस्कुराई ।

"हाय, बीवी नहीं...। मुझे तो अब उधर से गुजरते हुए भी डर लगता है। सितारा कम उसी तरफ बढ़ाते हुए बोली। मैं चलूंगी तेरे साथ। फिर डर काहे का... |

"हाय, बीवी...आप क्या सपेरिन हैं ?"

"हां, और नहीं तो क्या। मुझे देखकर बड़े-बड़े सांपों की सिट्टी गुम हो जाती है...।

"हां, हो जाती होगी...।' सितारा सिर हिलाते बोली-"आप इतनी हसीन जो हैं। हिना चाय चुसकती रही ।सितारा कुछ देर उसे प्यार से निहारती रही, फिर बोली-"बीवी, एक बात पूछं. ?"

"हां, पूछ...।"बीवी. आप इतनी खूबसूरत क्यों हैं.?" सितारा ने बड़े अपनत्व से पूछा ।

''बेवकूफ...तू कब बड़ी होगी...?" हिना हंस दी थी ।फिर चाय पीकर वह सितरों के साथ पिछवाड़े के लॉन में आ गई। सूरज बंगलों के पीछे जा छिपा था। अन्धेरा धीरे-धीरे बढ़ रहा था। हिना ने पहले तो दूर से 'रात की रानी' का जायजा लिया.फिर जरा करीब होकर उसे देखांसितारा उसके पीछे उसकी ओट में रही। उसके दिल में सांप की दहशत बैठी हुई थी ।फिर हिना अन्धेरा होने तक वहां रही। टहलती रही..बैठी रही। लेकिन उसे वहां कोई सांप नजर नहीं आया।
 
आज की शाम बहुत हसीन थी।और क्या न होती। आज हिना का बर्थ-डे था। आज उसे पन्द्रहवां साल लग गया

था ।पूरा बंगला मेहमानों से खचा-खच भरा हुआ था। रोशनगढ़ी से बाहर के मेहमान भी आए हुए थे।बंगला रोशनी में नहाया हुआ था। हर तरफ रंग-ओ-नूर की बारिश थी। खनकते कहकहे थे। मनमोहक मुस्कुराहटें थीं। थ्री-पीस सूट में समीर राय बहुत स्मार्ट लग रहा था। नफीसा बेगम के तो जैसे पांव ही जमीन पर न पड़ रहे थे। वह तो आज भी वैसे ही फिट-फार थी जैसे दस बरस पहले। वक्त की गर्दिश ने उसका कुछ नहीं बिगाड़ा था ।मामू–मामियां सब थीं तो मायरा भी मौजूद थी। मायरा काले लिबास में थी और खूब निखरी हुई दिखाई दे रही थी। वह सोफे पर इत्मीनान से बैठी थी।

समीर राय कई बार उसके सामने से गुजरा था। दोनों ने एक-दूसरे को देखा था। निगाहें मिली थी तो दोनों हौले से मुस्कुरा दिये थे। जाने क्यों ?आज की शाम जिसके नाम थी, उसकी दीद तो पत्थर कर देने वाली थी आज के इस समारोह के लिए हिना ने खास लिबास सिलवाया था। वह इस गोल्डन लिबास में कोई अप्सरा लग रही थी। वैसे भी वह इतनी सुन्दर थी कि इस दुनिया की लगती ही न थी। वह अपनी सहेलियों के साथ बंगले के लाउंज में बैठी थी। संगीतमय सुरीले कहकहे बिखर रहे थे। चुटकुले सुनाये जा रहे थे। फिकरे कसे जा रहे थे।हिना के बराबर में हेमा बैठी थी। हेमा, हिना की स्कूल की दोस्त थी और हिना के बहुत करीब थी। हिना उसे शोखी से 'हेमा मालिनी' कहा करती थी।हेमा को जब हिना ने बर्थ-डे पर इन्वाइट किया था तो वह थोड़ा हिचकिचाई थी-"कैसे आऊं...?

''क्या प्राब्लम है...?" हिना ने जानना चाहा।

"यार..रात हो जागगी... | मैं अकेले कैसे वापिस आऊंगी..?"

"तुम अपनी गाड़ी के बजाय टैक्सी में आ जाना। इधर से मैं अपने ड्राइवर को साथ भिजवा दूंगी... |

"मेरी किस्मत में क्या ड्राइवर ही रह गया है...?" हेमा ने उसे तिरछी निगाहों से देखा।

"क्या करूं..मेरा कोई भाई नहीं है ना...वरना अपने भाई को तेरे साथ कर देती... | हिना ने हंसकर कहा, फिर उसे एकदम से ख्याल आया-"पर तेरा तो भाई है ना। हेमा तू उसके साथ क्यों नहीं आ जाती..?"

"जरा रैस्पेक्ट से...।" हेमा ने आंखें तिरेरी-

"वह मेरे बड़े भाई हैं...।"

"सॉरी यार... । हां, तुम उनके साथ आ जाओ...रात को उनके साथ ही चली जाना...

''बर्थ-डे में इन्वाइटी मैं हूं, वह भला क्यों आने लगे। जानती नहीं मेरे भाई बड़ी नाक वाल हैं...।" हेमा हंसी।

"मैं कौन-सी उनकी नाक काट रही हूं..।" हिना शोखी से बोली।"तुम्हें उन्हें भी इन्वाइट करना होगा...।

" हेमा कुछ सोचती हुई बोली।"नो प्राब्लम ! तुझे बुलाने के लिये तो मैं किसी काले देव को भी दावत दे सकती हूं..।''

"खबरदार, जो मेरे भाई को देव कहा...वो भी काला। वह तो प्रिन्स है...राजकुमार हैं..देखेगी तो अपनी उंगली काट बैठेगी...।''

"कामदेव हैं क्या..?" हिना ने उसे घूरते हुए पूछा ।

“ऐसा ही समझ लो....।'' हेमा ने उसे तिरछी नजरों से देखा ।

"अच्छा...फिर तो देखना ही पड़ेगा... | बोल, किस तरह बुलावा दूं.?"

"फोन पर रिक्वेस्ट कर लेना...।''

"चल मंजूर... ।' फिर हिना ने उनसे फोन पर बात की तो थोड़े संकोच के बाद उन्होंने हामी भी ली। लेकिन आज की शाम को उन्हें कहीं और भी जरूरी जाना था इसलिये वह हेमा को छोड़कर और वक्त पर वापसी का वायदा करके चला गया था ।हिना से उसकी मुलाकात नहीं हो सकी थी।जब सारे मेहमान आ चुके और सारी तैयारियां हो चुकी तो समीर राय ने हिना को बाहर बुलवाया। वह अपनी सहेलियों के झुरमुट में लॉन में आ गई। शीशे की एक खूबसूरत मेज पर एक बड़ा-सा केक रखा था। हिना ने केक काटा तो हर तरफ 'हैप्पी बर्थ-डे' का शोर मच गया ।खाने के बाद 'म्युजिकल प्रोग्राम' रखा गया था। समीर राय को गजलें सुनने का हमेशा से शौक था। उसने एक नामी सिंगर को बुलवाया हुआ था। खाने के बाद जब गिने-चुने व खास लोग रह गये तो इस सिंगर ने अपनी खूबसूरत आवाज में एक गजल छेड़ी। इस सिंगर की जहां आवाज अच्छी थी वहीं उसका चुनाव भी लाजवाब था जब उसने पहली गजल छेड़ी-“जब से तूने मुझे दीवाना बना रखा है...।"तो उसका जोरदार तालियों की गूंज के साथ स्वागत किया गया। गजलें गाई जाती रहीं। रात भीगती रहीं। आनन्दपूर्ण क्षण वक्त के पहाड़ से टूट-टूट कर बरसते रहे ।ऐसी संगीतमय शामें भी तो समीर राय की जान रही थीं। इन्हीं संगीत भरी शामों ने ही तो उसे लूटा था। इसी नशे ने तो उसे उसकी नमीरा को छीन लिया था। इस दुनिया से गये नमीरा को लगभग पन्द्रह साल हो गये थे..लेकिन समीर उसे अभी तक नहीं भुला पाया था और ऐसी शामें नमीरा की याद को और भी गहरा व ताजा कर दिया करती थी। जिन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं,मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूंगा।"

सिंगर गा रहा था और समीर राय के दिल पर टप-टप आंसू गिर रहे थे। फिर वह जब्त न कर पाया। संयम जाता रहा। वह बड़ी सावधानी से, बड़े सहज अंदाज में उठा जैसे किसी जरूरत पर उठा हो...लेकिन मायरा जानती थी कि वह यह दर्दीली गजल छोड़कर इस महफिल से क्यों उठा है।मायरा ने उसे बंगले की इमारत की तरफ जाते देखा तो वह ना चाहते हुए भी उसके पीछे चली । मायरा ने समीर राय को ढूंढ लिया। वह अपने बैडरूम में अपना हाथ आंखों पर रखे, जाने किस दुनिया में खोया हुआ था |

बैडरूम में टेबल-लैम्प रोशन था, लाल रंग के शेड का प्रतिबिम्ब उसके चेहरे पर पड़ रहा था। मायरा, उसे कुछेक क्षणों तक यूं ही देखती रही। सोचती रही कि उसे अपनी आमद का अहसास कराये या जिस तरह आई है वैसे ही खामोशी से लौट जाये। लेकिन वह यहां खुद से कहां आई थी...जो खुद से लौट भी जाती। उसे अपने आप पर नियंत्रण कब था ।वह बहुत धीरे उसके बैड पर बैठी और उसका हाथ पकड़ कर बड़ी कोमालता से उसकी आंखों से हटाया। हाथ हटा तो उसने देखा कि समीर राय की आंखें आसुओं से भरी हुई हैं। हड़बड़ाई आंखों से ही समीर ने हाथ हटाने वाली को देखा। कुछ नजर नहीं आया। एक तो रोशनी कम थी.दूसरे उसकी आंखें आंसुओं से भरी हुई थीं।फिर भी उसने जान लिया कि वह कौन है ?

"जब दर्दीली गजलें सुनने का शौक है तो अपने अंदर सुनने का हौसला भी रखा।" मायरा ने दुखी लहजे में कहा ।

"मायरा..मैं इस वक्त अकेले रहना चाहता हूं। प्लीज, मुझे तन्हा छोड़ दो...।" समीर राय ने बमुश्किल कहा।

मैं नहीं छोडूंगी तुम्हें तन्हा।' वह अपनत्वपूर्ण स्वर में बोली-"तुम कैसे मर्द हो? तुम्हारी 'क्लास और रुतबे के मर्द तो चार-चार शादियां करते हैं और इस कोरम (संख्या) को भी टूटने नहीं देते। एक मरती है तो फौरन दूसरी कर लेते हैं, और एक तुम हो कि पन्द्रह साल से एक ही को रोये जा रहे हो, आखिर कब तक रोओगे उसे..?"

"मायरा.. नमीरा को नहीं भूल सकता।" उसने अपनी बेबसी जाहिर की।

"तुम उसे भुलाना नहीं चाहते। तुम्हें अपने गम से इश्क हो गया है...।" मायरा ने जैसे उसे 'आईना दिखाया।

"चलो, यही समझ लो...।" समीर ने जैसे हथियार डाल दिये। लेकिन मैं तुम्हें यूं सिसक-सिसक कर मरने नहीं दूंगी...।"

"तुम कौन । हो..?" समीर राय के लहजे में कटुता भर आई थी।

मैं कोई नहीं हूं..मैं जानती हूं कि मैं कोई नहीं हूं। मैं अगर काई होती तो तुम्हें ठीक कर देती....।" मायरा भी अंदर से सुलग उठी।
 
"तुम अपनी हदें फलांग रही हो मायरा...।" समीर को उसका यह अधिकारपूर्ण हस्तक्षेप रास नहीं आया था-"प्लीज, तुम यहां से जा सकती हो।

"जाती हूं...।" यह कहकर मायरा एक झटके से उइ गई-"लेकिन एक बात याद रखना, मैं अगर सचमुच चली गई तो बहुत पछताओगे...।"

समीर राय उसे जाता हुआ देखता रहा। मायरा जब दरवाजे पर पहुंच गई तो समीर बेअख्तयार हो बोल उठा-"सुनो... ।'

"मायरा ठिठकी और मुड़ी, लेकिन कुछ बोली नहीं।

"तुम आखिर कहना क्या चाहती हो मायरा..?"

समीर राय असहाय-सा बोला।

"कुछ नहीं...।" मायरा ने एक झटके से कहा और फौरन बाहर निकल गई।समीर राय की समझ में कुछ न आया कि मायरा आखिर क्या चाहती है ? हां, उसकी आमद से इतना जरूर हुआ था कि वह अपना गम भूल गया था |मायरा शायद वही चाहती

थी।

.

हिना ने भी अपने अब्बू को उठते हुए देखा था ।और समझ गई थी कि गजलों से उठने वाले किस दर्द ने उन्हें उठने को मजबूर किया है। वह अब बच्ची नहीं थी। अपने बाप की मनोदशा व जज्बात का अहसास था उसे। वह समझ गई थी कि अब्बू किसी एकान्त की तलाश में उठ गये हैं। ऐसे तड़पाते क्षणों में वह ऐसा ही तो करते थे।समीर राय प्रायः कहा करता था कि हिना ने उसकी जिन्दगी बचा ली है...वरना वह तो जाने कब का मर चुका होता हिना, अब्बू के लिए तड़प उठी, और अभी वह उठने की सेच ही रही थी कि हेमा ने अचानक कहा-"अच्छा हिना, अब मैं चलूंगी...।''

"क्यों भई, अपने भाई को तो आने दो...।" हिना बोली।

"वह आ गये हैं. मुझे नजर आ रहे हैं... "

"अच्छा , कहां हैं...जरा मुझे भी मिलवाओ। मैं उनसे पूछू तो सही कि क्या इस तरह आया जाता है किसी की सालगिरह में... " हिना हंसते हुए उठ खड़ी हुई।

"चल, पूछ ले...।" हेमा ने कदम बढ़ाते कहा ।हिना उसके साथ हो ली।इस वक्त मेहमानों की संख्या बहुत कम रह गई थी। वे दोनों जब मेहमानों के बीच से 'स्वीमिंग पूल' की तरफ बढ़ी तो हिना को वहां खड़ा वह नवयुवक दूर ही से नजर आ गया। वह 'तरूण-ताल' के किनारे खड़ा साकत पानी में अपना अक्स देख रहा था। फिर उसने इस पानी में जैसे एक 'सुनहरी जलपरी' को देखा। उसने घूमकर देखा..सुनहरी लिबास मे हिना उसकी बहन के साथ पीछे खड़ी थी। भाई..यह है मेरी सहेली हिना...।" हेमा ने उनका परिचय कराया "और हिना यह हैं गौतम ।

'"कामदेव...।" हिना शोख लहजे में लेकिन बहुत धीरे से बोली। वह गौतम को निहार रही थी।"क्या मैंने गलत कहा था...देख लिया ना तूने। हैं ना साक्षात् कामदेव... । हेमा ने भी हौले से कहा ।हिना, गौतम की तरफ देख रही थी। फिर दोनों की नजरें मिलीं। यूं लगा जैसे दो बिछुड़े..अचानक सामने आ गये हों। नजरें मिली तो फिर हट नहीं सकीं। फिर जैसे नजर-से-नजरर की बात चली |ढूंढती थी जिसे नजर वह तुम ही तो होवक्त की धुन्ध में थे जो गुमवह तुम ही तो हा कि जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिएतू अब से पहले सितारों में बस रही थी कहींतुझे जमीं पर बुलाया गया है मेरे लिए। कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी।दिल के सोचे हुये तारों में खनक जाग उठी ।मेरी आंखों पर झुकी रहती थी जिसकी नजरेंतुम वही मेरे ख्यालों की परी हो कि नहींकहीं पहले की तरह फिर तो न खो जाओगी |जो हमेशा के लिए हो, वह खुशी हो कि नहींमैंने शायद तुम्हे पहले भी कहीं देखा है।

वे दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे...और हेमा उन दोनों को देख रही थी। फिर उससे रहा नहीं गया। वह धीरे से खखारी और बोली

"अरे भई ! यह बताएं कि क्या आप लोग एक-दूसरे को पहले से जानत हैं ? किसी जमाने के बिछड़े हुये मिले हैं ? आखिर क्या मामला है ? कुछ हमें भी तो बताएं...।"

तब अचानक दोनों को होश आया। तन्द्रा टूटी, दोनों ने एक दूसरे को अजनबी निगाहों से देखा।"आपसे मिलकर खुशी हुई...।" हिना ने कहा।

"मुझे भी...।" गौतम बोला।

"लेकिन आप दानों को मिलाकर शायद मैं मुश्किल में पड़ गई हूं...।" हेमा हंस दी।

वह क्यों..?" दोनों ने समवेत स्वर में पूछा था।

इसलिए कि दोस्त, दोस्त न रहा..भाई, भाई न रहा... । हेमा ने बारी-बारी से दोनों की तरफ देखते हुए कहा ।हेमा की बात सुन उन दोनों की निगाहें एक साथ झुक गई थीं।चोरी पकड़ी जाने की लज्जा के सबब शायद ऐसा हुआ था।

“जी, अब हमें इजाजद दें। हम चलते हैं...।" गौतम खुद को संभालते हुए बोला ।

"अच्छा...।" हिना धीरे से बोली ।

"अरे वाह... | बड़े आराम से जाने की इजाजत दे दी। तू तो भैया से लड़ने के लिए आई थी...।" हेमा ने उसके बाजू पर चुटकी भरी।

"हां, हिना जी। मैं क्षमाप्रार्थी हूं, मुझे आने में देर हो गई। आपको सालगिरह मुबारक हो...।" गौतम को जैस अब होश आया था।

आपने खाना खाया..?" हिना ने भी औपचारिकता निभाई।

"थैक्स..मैं खाना खाकर आ रहा हूं...

''आप मुनासिब समझें तो थोड़ा-सा केक चख लें...।" हिना ने हेमा की तरफ देखा।

"अरे, मुझे क्या देखती है...।" हेमा चहकी।

"क्यों नहीं..।" गौतम बोल उठा-"चलिए...।

"प्लीज...।" हिना ने हाथ से इशारा किया ।हिना उन दोनों को ड्राइंगरूप में ले आई...सितारा से केक और कॉफी लाने को कहा। हिना व हेमा सोफे पर इकट्ठी बैठ गई थीं और गौतम उनके सामने वाले सोफे पर जा बैठा था। हिना ने निगाहें उठाकर गौतम की तरफ देखा। गौतम पहले से उसकी तरफ देख रहा था।"तुझे जमीन पर उतारा गया है मेरे लिए...

"बाहर से आवाज आ रही थी। सिंगर दिल पर असर करने वाली आवाज में गा रहा था। दोनों के नयन एक-दूसरे में उलझे हुए थे।प्रायः ऐसा ही होता है कि पहली नजर ही अपना असर दिखा जाती है। किसी को देखकर दिल एकदम पुकार उठता है-

"ढूंढती थी जिसे नजर वह तुम ही तो हो...। शायद यहां भी ऐसा ही था और प्यार तो वह जज्बा है जो ना ऊंचा-नीच देखता है ना जात-धर्म। प्यार होना होता है और हो जाता है बस !यहां भी शायद कुछ ऐसा ही था।

पन्द्रहवें बरस की यह पहली रात थी |भविष्यवक्ता अरूणिमा ने कहा था कि इस लड़की पर पन्द्रहवां साल बड़ा भारी होगा। वह पन्द्रहवां साल आ पहुंचा था ।कयामत की रात सिर पर थी।हिना अपने शवन-कक्ष में निद्रामग्न थी। नर्म मुलायम तकिये पर उसके रेशमी बाल फैले हुए थे। ढीले-ढाले नाईट सूट में बड़े पुरसुकून अंदाज में लेटी हुई थी। कमरे में नीले रंग का नाईट बल्ब रोशन था। नीलाहट लिये रोशनी में हिना का सुरत-सौंदर्य अपना जादू जगा रहा था ।वह सपनों की वादी में किसी तितली की तरह उड़ती फिर रही थी। उसे क्या मालूम था कि आज की रात क्या होने वाला है। वक्त कैसी करवट लेने वाला है ? किस्मत क्या गुल खिलाने वाली है ?इस वक्त रात के तीन बज रहे थे।चारों तरफ पूर्ण सन्नाटा व्याप्त था।ऐसे में 'वो' अचानक ही पर्दे के पीछे से नमुदार हुआ ।'वो' एक सुनहरा सांप था ।उसका जिस्म चमकदार था और उस पर छोटे-छोटे गोल निशान थे। ये निशान रंगीन व बेहद चमकदार थे। यही लगता था जैसे उसके सुनहरे बदन पर विभिन्न रंगों के 'पत्थर' जड़े हुये हों। उसके सिर पर भी एक चमकदार 'पत्थर' था...जिससे किरणें फूट रही थीं। यही लग रहा था जैसे यह 'मणिक' उसके सिर का ताज हो ।उसकी द्विशाखी काली जिव्हा बार-बार बाहर लपलपा रही थी।वो पर्दे से उतर कर हिना के बैड की तरफ बढ़ा। कमरे में एक अनूठी-सी सुगन्ध फैल गई और बड़ी ही मस्त कर देने वाली थी यह खुशबू भी हिना के रेशमी लम्बे बाल तकिये से होते हुये बैड के किनारे तक चले गये थे।
 
वह सुनहरी सांप इन बालों की लहरों में घूमता हुआ ऊपर आया और फिर कुण्डली मारकर बैठ गया और अपना फन फैलाकर अपनी काली व चमकीली आंखों से हिना के सुप्त सौंदर्य को निहारने लगा।'वो' हिना के सौंदर्य व मनमोहिनी सूरत में मग्न था और हिना ख्वाबों की हसीन वादियों में घूम रही थी। उसके इस सपने में हेमा का भाई गौतम ही उसके साथ था। वह गौतम का हाथ पकड़े भागती चली जा रही थी। दोनों बेहद खुश थे। फिजा में कहकहे बिखर रहे थे। फिर अचानक बादल के एक टुकड़े ने उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया। दोनों गड़बड़ा गये। हाथ छूट गये। कुछ क्षणों बाद जब बादल छंटे तो हिना ने खुद को पहाड़ी पर तन्हा अकेली पाया |उसने घबराकर इधर-उधर देखा और उसी वक्त उसकी आंख खुल गई।वह अपने कमरे में अपने बैड पर थी और उसके सामने एक सांप फन फैलाये उसे मंत्र-मुग्ध-सा देख रहा था। हिना पहले तो समझ ही न पाई कि ख्वाब कौन-सा था..वह, जहां हसीन वादियों में वह और गौतम घूम रहे थे और एक बादल के टुकड़े ने उन्हें जुदा कर दिया था या फिर ख्वाब यह है कि एक सुनहरा सांप उसके चेहरे के बिल्कुल निकट फन फैलाये खड़ा है ?इससे पहले कि हिना कोई फैसला कर पाती. इस सुनहरे सांप की आंखों से लहरें-सी निकली और हिना की आंखों में समा गई ।हिना पर फौरन अर्द्धबेहोशी-सी छा गई।उसकी आंखें खुली थीं। वह एक सुनहरे सांप को अपनी आंखों के सामने देख रही थी, मगर वह फैसला नहीं कर पा रही थी कि वह क्या करे। उसके दिमाग में जैसे धुआं-सा भरता जा रहा था। उसके हाथ-पैरों में जैसे हरकत कर पाने का सामर्थ्य भ्ज्ञी नहीं रहा था।फिर वह सांप उसके मरमरी बदन पर फिसलने लगा। सांप ने उसके उफनते यौवन को जैसे अपनी गिरफ्त में लिया और फिर यह गिरफ्त सख्त-से-सख्त होती चली गई।और हिना अपने आप से बेखबर होती जा रही थी।

सितारा हिना के कमरे का कई बार चक्कर लगाकर जा चुकी थी ।उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि आज बीवी को क्या हो गया है। स्कूल की आज छुट्टी थी और सितारा जानती थी कि छुट्टी वाले दिन हिना देर से उठती थी...लेकिन इतनी देर से भी नहीं...आज तो हद ही हो गई थी।दरवाजा अंदर से बंद था, नहीं तो सितारा खुद अंदर जाकर उसे जगा देती। सितारा पहले तो दरवाजा खुलने का इंतजार करती रही...जब दरवाजा नहीं खुला तो उसने आहिस्ता से दस्तक दी। आहिस्ता से दस्तक देने का कोई असर नहीं हुआ तो उसने जरा जोर से दरवाजा खटखटाया और साथ ही पुकारा भी-"बीवी दरवाजा, खोलें...।"

लेकिन हिना के कान पर जूं ता नहीं रेंगी। सितारा पेरशान होकर अपनी मां सरवरी के पास किचन में पहुंची व चिन्तित स्वर में बोली-"अम्मा, हिना बीवी अभी तक नहीं जागी।"

"अरी सोने दे, रात देर से सोई होगी...।" सरवरी ने डांटते हुए अंदाज में कहा।

कितनी ही देर से सोई हों, लेकिन इतनी देर से तो वह कभी नहीं उठती...अम्मा, तुझे पता है इस वक्त क्या बजा है..?"

"क्या बजा है ?" सरवरी ने सब्जी काटते हुए पूछा ।

“साढ़े बारह बज रहे हैं अम्मा...साढ़े बारह...।'

"हे...।" सरवरी को अचानक होश आया–“यह तो वाकई चिंता की बात थी,

जोर से दरवाजा खटखटाया तूने..?"

"हां, अम्मा ! इतने जोर से कि बस टूटने की कसर रह गई... ।' सितारा ने बताया।"

अच्छा, ठहर मैं चलती हूं।" सरवरी सब्जी एक तरफ सरकाते हुए बोली।"

अम्मा, दरवाजा पीटने से कुछ नहीं होगा...तू वहां जाकर क्या करेगी...?"

"अरी, तू आ तो...।'' वह किचन से निकलते हुए बोली ।

"अम्मा सुन तो...एक तरकीब समझ में आती है...।"

"वह क्या..?" सरवरी ने पूछा।

"लाउंज से उसके कमरे में फोन करते हैं। फोन की घन्टी सुनकर वह जरूर उठ जाएगी।"

"ठीक...।" सरवरी की समझ में आ गई-"चल, फोन करके देख ले.. ।

सितारा ने लाउंज में रखे फोन से हिना के कमरे वाले फोन का नम्बर मिलाया व रिसीवर कान से लगाकर अपनी मां को देखने लगी-।

"घन्टी बज रही है, अम्मा...

"तीन-चार घंटियां बजने के बाद भी हिना ने रिसीवर न उठाया तो सितारा फिर बोली-"वह तो फोन भी नहीं उठा रही है...। वह कमरे में है भी..?"

"घन्टी बजने दे...।" सरवरी बोली-“कबमरे से वह आखिर कहां जाएंगी...।"

सितारा रिसीवर कान से लगाए घन्टी की आवाज सुनती रही...फिर सहसा उधर से किसी ने रिसीवर उठाया। सितारा के चेहरे पर खुशी की लहर फैल गई-"उठा लिया...।" उसने अपनी चमकती आंखों से सरवरी को देखा।

"चलो, शुक्र है...।''

हो, हैल्लो...।" सितारा हिना के बोलने से पहले बोली।

हैल्लो।" हिना की नींद भरी आवाज आई।

बीवी..बीवी..मैं सितारा बोल रही हूं। दरवाजा खोलें ना। क्या आज उठने का इरादा नहीं है ? जरा टाइम भी तो देखें, साढ़े बारह बज रहे हैं... | आप । खैरियत से तो हैं..?'

"अच्छा, सितारा ! ठहरो मैं खोलती हूं दरवाजा...।" उधर से बदस्तूर नींद में डूबी आवाज आई फिर रिसीवर रख दिया गया |सितारा ने भी रिसीवर रखा व मां से बोली-"अम्मा, बीवी जाग गई हैं, मैं उनके पास जाती हूं... | नाश्ते का पूछकर आती हूं।"

"हां, पूछ ले। वैसे तो अब खाने का वक्त हो चला है...।" सरवरी ने कहा व किचन की तरफ चली गई |सितारा भागकर हिना के कमरे की तरफ आई।

हिना दरवाजा खोल चुकी थी। सितारा खुले दरवाजे से भीतर आई ता, वह तकिये ऊंचे किये निढाल-सी पड़ी थी।"

अरे, बीवी क्या हुआ..?" सितारा बैड की तरफ लपकी।हिना ने आंखें खोल दी.और एकटक सितारा को देखने लगी। इस तरह देखने पर सितारा सहम-सी गई। हिना का अंदाज ही कुछ ऐसा था। वह खोये-खोये अंदाज में उसे देख रही थी।

हाय...बीवी...यह आप ऐसे क्यों देख रही हैं...?" वह परेशान होकर बोली ।

तुम सितारा हो...?" हिना ने जैसे उसे पहचानने की कोशिश करते पूछा था।

"न बीवी.ऐसी बातें न करें मैं बहुत डरती हूं ऐसी बातों से...।

हिना ने कोई जवाब नहीं दिया...धीरे से अपनी आंखें बंद कर लीं।

"बीवी...बीवी...आंखें खोलें...।

"हां.क्या...।" हिना ने आंखें खोलने की कोशिश में आंखें फाड़ी...लेकिन शायद भीतरी अवस्था से बेबस, आंखें खुली न रख सकी।

''बीवी...क्या हुआ आपको...?" सितारा ने घबरा कर उसका बाजू पकड़कर हिलाया।"

मुझे मितली-सी आ रही है, तू एक गिलास पानी में नींबू निचोड़ कर ला..।" हिना ने आंखें, बंद किए-किए कहा ।

सितारा भागती हुई कमरे से निकली...फिर दो नींबू गिलास में निचोड़, पानी भरा और दौड़ती हुई वापिस गई। सरवरी उस वक्त किचन में नहीं थी। वह समीर राय का कमरा साफ करके निकली थी कि उसने सितारा को गिलास लिए भाग कर हिना के कमरे की तरफ जाते देखा तो उसका माथा ठनका |वह भी उसके पीछे हो ली।जब सरवरी हिना के कमरे में दाखिल हुई तो हिना गिलास मुंह से लगाए नींबू मिला पानी पी रही थी।
 
"क्या हुआ बीवी को...?" उसने सितारा से पूछा और दौड़कर हिना का माथा छुआ।

हिना ने गिलास मुंह से हटाकर सरवरी को भी अनजान नजरों से देखा ।

"अम्मा, यह बीवी इस तरह क्यों देख रही हैं..मुझे डर लग रहा है...।" सितारा ने सहमी-सीधीमी आवाज में पूछा।

"अरी, चुप हो...तुझे हर वक्त डर ही लगता रहता है...।" सरवरी ने अपनी बेटी को डांटा और फिर हिना की तरफ आकर्षित हुई-"क्या हुआ बीवी...जी मितला रहा है ?"

हिना ने 'हां' में सिर । हिलाया.. मुंह से कुछ न बोली।"आपके डॉक्टर के पास ले चलें..?" सरवरी चिन्तित स्वर में बोली।

"नहीं..मैं अभी ठीक हो जाऊंगी...।" हिना आंखें मूंदे ही बोली और फिर आश्चर्यजनक तौर पर नींबू पानी पीकर उसकी तबियत संभल गई। वह थोड़ी देर बाद उठकर बैठ गई। कुछ देर खामोशी से बैठी रही। फिर अपने कमरे में चारों तरफ नजरें घुमाई...कुछ इस तरह जैसे कमरे में कोई चीज तलाश कर रही हो।सितारा उसके पास बैठी थी। सरवरी नाश्ता बनाने चली गई थी।सितारा हिना के गोरे-गोरे पांव अपनी गोद में रखे बहुत धीरे से दबा रही थी। थोड़ी देर बाद हिना ने अपने पांव खींच लिए।

"बस...अब मैं जरा नहा लूं...।" वह बोली।

हां, बीवी... । पर आपकी तबियत तो ठीक है ना..?

"हां...काफी हद तक.... ।

'"आपको हुआ क्या था..?" सितारा ने पूछा ।

"मुझे खुद नहीं मालूम...लेकिन कोई गड़बड़ जरूर है...।" बिस्तर से उठते हुए उसका बदन टूट रहा था। उसने अपने दोनों हाथ उठाकर अंगड़ाई ली, फिर एक ठंडी सांस लेकर दोनों हाथ छोड़ दिए।'

"हाय बीवी...अंगड़ाई लेते हुए आप कितनी प्यारी लगती हैं, जरा एक बार और लें तो...।" सितारा ने हंसते हुए कहा ।

"ज्यादा बक-बक नहीं करते...।" हिना ने उसके सिर पर हल्की-सी चपत लगाई और बाथरूम की तरफ बढ़ गई।बाथरूम पूर्णतया आधुनिक साजो-सामान से सुसज्जित था। दीवारों पर आमने-सामने आईने लगे हुए थे। बाथरूम में प्रवेश करके हिना ने दरवाजा बंद किया और वाश बेसिन के सामने खड़े होकर उसने अपने चेहरा देखा...चेहरा सफेद पड़ा हुआ था...ऐसा महसूस होता था

जैसे वह किसी भयंकर बीमारी से उठी हो ।एक ही रात में आखिर यह उस पर क्या बीत गई ?फिर उसे अपने दो ख्वाब याद आए। वह हेमा के भाई के साथ वादियों में उड़ती फिर रही थी कि एक बादल ने उन्हें ढक लिया और जब वह बादल उड़ा तो वहां गौतम नहीं था। उसने घबरा कर ही इधर-उधर देखा था कि उसी क्षण उसकी आंख खुल गई थी।फिर उसे अपने बिस्तर पर एक सुनहरा सांप फन उठाये नजर आया। उस संप की चमकीली आंखों से लहरें-सी निकलीं और उसे कुछ होश न रहा। उसके बाद...अभी थोड़ी देर पहले उसकी आंख टेलीफोन की घन्टी पर खुली। उसने बड़ी मुश्किल से उठकर दरवाजा खोला। उसकी तबियत बोझिल थी। शायद कमजोरी थी। जी मितला रहा था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि उसे हुआ क्या है और अब उसकी यही मनोदशा, अपना चेहरा देखकर थी। वह अपना चेहरा देखकर फिक्रमंद हो गई थी। उसका चेहरा लालिमा लिये हुये था..लेकिन अब वही चेहरा सफेद पड़ा हुआ था। वह कुछ देर अपने चेहरे को देखती रही...फिर उसने नल खोलकर अपने मुंह पर पानी के छपाके मारे ।वे दोनों घटनाएं चूंकि एक वक्त घटी थीं, इसलिए उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि कौन-सा वाकया ख्वाब है और कौन-सा हकीकत ।फिर उसे ख्याल आया कि हेमा के भाई गौतम के साथ हसीन वादियों में घूमने का वाकया तो किसी तौर हकीकत नहीं हो सकता। गौतम से तो उसकी आज ही रात को मुलाकात हुई थी। हां...वह उस ‘कामदेव' का ख्वाब जरूर देख सकती थी किवह उसके मन को भा गया था। लेकिन उसे वह सांप वाली घटना भी हकीकत महसूस नहीं होती थी। अगर हकीकत होती तो वह उठकर सांप को मारने की कोशिश करती...क्योंकि उसे सांपों से कतई डर नहीं लगता था ।लेकिन वह तो सांप देखते ही होश गंवा बैठी थी..और इसका मतलब था कि उस सुनहरे सांप को भी उसने ख्वाब में देखा था।अभी वह शॉवर के नीचे खड़ी हुई थी और शॉवर को खोलना ही चाहती थी कि उसकी नजर सामने के बड़े आईने पर ठहर गई। वह बेअख्तयार ही आईने की तरफ बढ़ी ताकि उसने जो कुछ देखा था...उसे रोशनी में अच्छी तरह देख सके ।और उसे अपने पेट पर दो नन्हें सुराख नजर आये थे ।उसने घबराकर अपने पेट की तरफ देखा। वहां वाकई पास-पास दो नन्हें निशान मौजूद थे...जो नीलापन लिये हुए थे और यह स्पष्ट रूप से किसी सांप के काटने के निशान थे।तो क्या रात को उसे किसी सांप ने डसा ?यह सोचकर ही हिना दो दिन तक पढ़ने न जा सकी।वह पहले दिन पढ़ने नहीं गई तो, हेमा स्कूल में बहुत बोर हुई। हिना के बिना उसे स्कूल सूना लगता था। वह चिन्तित भी हो उठी। थी।स्कूल से घर पहुंचते ही उसने पहला काम हिना को फोन करने का किया। उसने हिना का नम्बर मिलाया..उधर से दूसरी घन्टी पर रिसीवर उठा लिया गया।

"हां जी...कौन..?" यह सरवरी की आवाज थीं हिना हैं...जरा उनसे बात कराओ...मैं हेमा बोल रही हूं...।"

"जी. बीवी...।" सरवरी ने माउथपीस पर हाथ रखकर हिना की तरफ देखा ।

"कौन है...?" हिना ने पूछा ।

"हेमा बीवी हैं..।" सरवरी ने रिसीवर उसकी तरफ बढ़ाते हुए बताया।

"हैल्लो, माई डियर हेमा मालिनी...।" हिना अपनी आवाज में शगुफ्तगी पैदा करते हुए बोली। हेमा मालिनी की मौसी...आज स्कूल क्यों नहीं आई..?" हेमा ने गुस्सा दिखाया।

"जागती आंखों से रात भर तेरे भाई के ख्वाब देखती रही..सुबह दोपहर को आंख खुली, सो स्कूल नहीं आ सकी...।" हिना ने शोखी से जवाब दिया।

"लो भई...तो एक ही मुलाकात मे यह हाल हो गया..?" हेमा ने ठण्डा सांस भरते पूछा । अब मैं क्या करूं । तेरा भैया 'कामदेव' है ना...जो देखे वो अपनी नींद गवां बैठे...।"

"तेरा भैया...तेरा भैया क्या कर रही है... | मेरे भैया का एक प्यारा-सा नाम भी तो है...।

''हां..है तो। पर मुझे तो उनकी मोहिनी सूरत और मीठी आवाज के सिवाय कुछ याद नहीं। शायद तूने अपने भाई का नाम बताया ही नहीं था।" हिना ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया। बताया था... | बताया तो था कि उसका नाम गौतम है...।"

"गौ...त...म...।" हिना ने शोखी से दोहराया-"सच ही बड़ा प्यारा नाम है। तेरे भैया की तरह...और उनकी आवाज माश अल्ला बोलते हैं तो लगता है जैसे कोई शायर गजल सुना रहा हो। कहीं वह कोई शायर...कवि तो नहीं हैं..।

"बकायदा शायर तो नहीं, अलबत्ता कभी-कभी कुछ कह लेते हैं...।" हेमा ने भाई की बड़ाई की "छपवाते नहीं बस लिख कर रख लेते हैं। किसी को सुनाते भी नहीं...।"

"कोई सुनने वाला न होगा...।” हिना ने छेड़ा।

"सुनने वाले बहुत..बल्कि सुनने वालियां..." । हेमा ने हंसकर कहा।

“खबरदार, जो किसी सुनने वाली का जिक्र किया तो...कत्ल कर दूंगी...।" हिना ने अजीब से लहजे में कहा।

"अरे, यार. क्या तू सीरियस है..?" हेमा को हिना के लहजे ने चौंकाया थां

"हां, मैं सीरियस हूं..।" हिना ने सचमुच ही बड़ी संजीदगी से जवाब दिया-"देख हेमा, अपने भैया का अब ख्याल रखना, कोई लड़की उनके नजदीक न आने पाये...।" उसने जैसे चेतावनी दी।

"हाय, हिना... । अगर यह बात भैया सुन लें तो, मारे खुशी के पागल ही हो जाएं... । हेमा घबरा-सी गई थी। तो सुना देना उनको...पागल कर देना उन्हें..।" हिना के लहजे में प्यार भर आया था।

"अच्छा तो यह बता ना कि आज स्कूल क्यों नहीं आई.?" हेमा ने विषया बदला, वह हिना का मसखरापन अब ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर सकती थी।

"यार, तबियत ठीक नहीं है मेरी...।" हिना ने सच्चाई बताई।

"अरे क्या हुआ..?" हेमा परेशान हो गई। बस यही तो मालूम नहीं है कि क्या हुआ...तू देखेगी तो देखकर हैरान हो जाएगी.बल्कि परेशान हो जाएगी...।''

अरे, ऐसा क्या हुआ..एक रात में..?"और हिना ने बताया-"यूं लगता है जैसे जिस्म से सारा खून निचुड़ गया है. पीली पड़ गई हूं...दिल पर अजीब दहशत-सी है...। हालत अभी भी उनींदगी की सी है...नींद सता रही है। साढ़े बारह बजे सोकर उठी हूं। सितारा बेचारी दरवाजा पीट-पीट कर हलकान हो गई। फिर उसने फोन की घन्टी बजा कर मुझे उठाया। वह तो अच्छा हुआ, अब्बू घर पर नहीं थे, वरना मुसीबत ही आ जाती... | अब तक छः डॉक्टर सिर पर खड़े होते... |

"ओह... । हेमा यह सुन और ज्यादा परेशान हो उठी, उसने पूछा-“यह बता कल स्कूल आ रही है या नहीं..?"

"हिम्मत रही तो जरूर आऊंगी...।" हिना ने कहा था ।लेकिन दूसरे दिन वह फिर स्कूल नहीं जा सकी। हेमा फिक्रमंद-सी घर पहुंची। वह हिना के लिये चिन्तित थी। उसने जल्दी-जल्दी खाना खाया। थकी हुई थी. कुछ देर आराम किया । सो कर उठी तो उसका भाई गौतम कहीं बाहर जाने की तैयारी में था ।उसने गौतम को हिना के बारे में बताया कि वह दो दिन से पढ़ने नहीं आ रही है. बीमार है, तो गौतम यह सुनकर सोच में डूब गया। बहन की यह सहेली हिना उसके हवासों पर छाई हुई थी। उसका मन चाहा कि हेमा से कहे कि चला, उसका कुशल-क्षेम पूछने चलें। लेकिन वह कह न सका और महज अपनी बहन को देखता रह गया।"मुझे क्यों घूर रहे हैं..? मैंने थोड़ा ही उसे बीमार किया है... । हेमा ने अपने भाई को तिरछी नजरों से देखा।“मुझे लगता है कि तूने ही नजर लगाई है। बर्थ-डे वाले दिन उसकी तारीफ करते नहीं थक रही थी।
 
हेमा ने अपने भाई को तिरछी नजरों से देखा।“मुझे लगता है कि तूने ही नजर लगाई है। बर्थ-डे वाले दिन उसकी तारीफ करते नहीं थक रही थी।

" गौतम उसे घूरते हुए बोला ।"अरे वाह..मैं उसे क्यों नजर लगाती..नजर उसे आपकी लगी होगी। नदीदों की तरह एकटक देखे जा रहे थे उसे..।"

चंचल हेमा ने भी जवाबी हमला किया। पर हिना को हुआ क्या है.?"

गौतम ने संजीदा होते पूछा। फोन पर बात हुई थी...कह रही थी तबियत बहुत खराब है और वह समझ नहीं पर रही है ऐसा क्यों है...।"

हेमा ने बताया।"तुम फिर भी उसे देखने नहीं गई।''

"किसके साथ जाती...।" हेमा तपाक से बोली, फिर पूछा-"भैया आप कहां जा रहे हैं ? आप चलें न मेरे साथ ।"

"मैं एक दोस्त के यहां जा रहा था। खैर चलो, तुम्हारे साथ चलता हूं। दोस्त को फोन कर देता हूं..।"

भैया का जवाब सुनकर हेमा को हैरानी हुई। यह तवक्कों नहीं थी कि गौतम भैया यूं फौररन तैयार हो जाएंगे। उसका तो ख्याल था कि जाने की बात पर वह छ: बहरने बनाएगा और गाड़ी की चाबी घुमाता हुआ, बड़ी इत्मीनान से उसके सामने से गुजर जाएगा।"भैया ! आप यह एक-दो दिन में कुछ ज्यादा ही मेहरबान नहीं हो गये हैं..?"

हेमा ने उसके साथ गाड़ी में बैठने के बाद उससे पूछा ।"तुम क्या कहना चाह रही हो.।"

गौतम ने गाड़ी स्टार्ट करते उसे घूरा-"एक तो तुम्हारी फ़ैन्ड के पास ले जा रहा हूं ऊपर से तुम बातें बना रही हो... | न जाऊं..?''

"अरे नहीं भैया.नाराज न हो...।" हेमा सम्भल कर बैठ गई।

बंगले के ऊंचे गेट पर गाड़ी रुकी तो एक गार्ड बड़ी मुस्तैदी से चलता हुआ उनके निकट आया...जबकि दूसरा गार्ड गेट पर ही खड़ा रहा।

"यस, सर...!" गाड़ी के निकट आने वाले ने आद से पूछा ।

गौतम की बजाय जवाब हेमा ने दिया-"हिना बीवी से मिलना है, मेरा नाम हेमा है। मैं हिना की दोस्त हूं...।

"जी...आप एक मिनट रुकें... ।” गार्ड यह कहकर वापिस चला गया। उसे ऊंचे बड़े गेट में बने एक छोटे गेट से वह अंदर चला गया। बड़ी जबरदस्त सिक्यूरिटी है...खैर तो है..?" गौतम ने पूछा।"

यह सब हिना के लिए है...।" हेमा ने बताया।

"अच्छा...क्या वह पढ़ने भी गार्ड के साथ जाती है...?'

"हां, भैया...।" हेमा ने बताया-"भैया, हिना की मम्मी नहीं हैं...खुद हिना भी बचपन में गुम हो गई थी...।

''अच्छा, क्या हुआ था ?" गौतम ने दिलचस्पी दिखाई ।

हेमा कोई जवाब देती...उससे पहले ही गार्ड अंदर से निकला और उसने गेट के दोनों पट खोल दिये। गौतम अपनी गाड़ी अंदर ले गया |गार्ड ने इन्टरकॉम पर हेमा के आने की सूचना दी थी। हेमा, उसके अन्दर आने की इजाजत देकर खुद भी बंगले के बरामदे में पहुंच गई थी। वे दोनों गाड़ी से उतरे तो हिना सामने ही खड़ी थी।उसने दोनों को ले जाकर ड्राइंगरूम में बैठाया। हेमा हिना के साथ सोफे पर बैठी थी, जबकि गौतम उनके सामने वाले सोफे पर बैठ गया था ।गौतम ने हिना का चेहरा देखा तो कुछ परेशान–सा हो गया। उसका चेहरा फीका-सा हो रहा था। वह खासी कमजोर दिखाई दे रही थी। इससे पहले कि हेमा उसका हाल-अहवाल पूछती,

गौतम बेअख्तयार बोल पड़ा-"यह क्या हुआ आपको..?"

"कुछ पता नहीं...।" हिना भी उसकी आंखों में झांकते हुए बोली-"जो कुछ हुआ, अचानक ही हुआ। बर्थ-डे की रात अच्छी भली थी। सुबह सोकर उठी तो हालत खराब थी।

"डॉक्टर को दिखाया...।''

"पापा...सुबह-शाम डॉक्टर बदल रहे हैं। उनका बस नहीं चल रहा, वरना वह तो हर घन्टे डॉक्टर बदल दें....।

''हां, जाहिर है वह परेशान होंगे...तेरी हालत ही कुछ ऐसी हो रही है और फिर तुम्हीं तो उनकी आंखों का नूर हो...।''

"आखिर बीमारी क्या है..?" गौतम ने पूछा ।

“शायद कोई नहीं... । अभी तक कोई डॉक्टर कुछ डाइग्नोज नहीं कर पाया है...बस हर डॉक्टर अपनी-अपनी दवा लिखकर

पकड़ा देता है...।" हिना फीकी-सी मुस्कान के साथ बोली।

"अरी..तुझे कहीं सचमुच ही मुहब्बत तो नहीं हो गई है....।" हेमा उसके कान में धीरे से बोली, इतने धीरे से कि गौतम प्रयत्नोपरान्त कुछ नहीं सुन सका। हां...कुछ ऐसा ही मामला है...।" हिना की निगाहें बेअख्तयार ही गौतम की तरफ उठ गई थीं।गौतम उसकी इन नजरों की ताब न ला सका और अपनी निगाहें झुका लीं ।तभी सितारा चाय लेकर आ गई।और फिर अभी वे चाय का आनंद ही उठा रहे थे कि समीर राय हिना को ढूंढता हुआ ड्राइंगरूम में आ गया।

"अच्छा तो तुम यहां हो...।'' वह बोला और फिर उसकी निगाह हेमा व गौतम पर पड़ी।

"पापा...इनसे मिलें..यह मेरी सहेली है हेमा..और यह इनके भैया हैं गौतम...।" हिना ने उन दोनों का परिचय कराया।

तो यह है हेमा... ।" समीर राय अपनत्व से बोला। फिर उसकी नजर गौतम पर टिक गई ।

और हेमा-यह मेरे अब्बू हैं-।" हिना बोली और फिर कनखियों से गौतम की तरफ देखते बताया-"म्यूजिक पापा की जान है।

"बहुत खुशी हुई आपसे मिलकर...।" गौतम ने खड़े होते हाथ जोड़ दिये थे।

स्मार्ट-सजीले गौतम को देखकर जाने क्यों समीर को अपनी जवानी याद आ गई थी। मैं भी बहुत खुश हुआ हूं तुम्हें देखकर...।" समीर राय ने मुस्कुराकर कहा।"

और अंकल मुझे देखकर आपको कुछ नहीं हुआ...?" हेमा ने हंस कर कहा |उसकी इस शोखी पर समीर राय बेसाख्ता हंसा और उसके निकट पहुंचकर उसके सिर पर हाथ रखते हुये बोला-“भई, तुम्हारा तो कोई जवाब ही नहीं...तुम तो बहुत प्यारी-सी हो... ।'

'हां...अब हुई न बात...।" हेमा ने अपने भाई की तरफ देखते कहा । बैठो, बेटा...! चाय पीओ...।" समीर राय ने गौतम से कहा और फिर से सम्बोधित हुआ-"हां, भई ! अब तुम कैसी हो...?"

"अब्बू..मैं बिल्कुल ठीक हूं.।" हिना बोली ।
 
"ठीक क्यों न होगी...सहेली की शक्ल जो नजर आ गई है...।" कहते हुये समीर राय हेमा से बोले-"भई, तुम रोज आ जाया करो...

''अब्बू...आप क्या सोचते हैं मैं घर पर ही बैठी रहूंगी। मैं कल स्कूल जाऊंगी। पढ़ाई का हर्जा हो रहा है...।"

"जरूर बेटा....। स्कूल भी चली जाना। पहले तुम्हारी तबियत तो ठीक हो जाये...।" समीर राय चिन्तित-सा बोला। अब्बू, आप बैठे ना...खड़े क्यों हैं..?"

"नहीं..मैं अब चलूंगा। तुम याद करके दवा जरूर ले लेना...।''

"जी, अब्बू... | मैं ख्याल रखूगी। कोई बच्ची तो हूं नहीं... "

"अच्छा, गौतम बेटे...।" समीर राय गौतम से बोला-"फिर मिलेंगे...।" इसके बाद उसने हेमा के सिर पर हाथ रखा-"बेटा, आते रहा करो...।''

"जी अंकल...जरूर...।" हेमा ने खुशदिली से कहा ।समीर राय के चले जाने के बाद हेमा फिर सोफे में धंस गई और हिना पर झूलते हुए बड़ी शोखी से कहा-"यार, तुम्हारे पापा तो बड़े शानदार हैं...।''

और बहुत मेहरबान भी..।" गौतम भी चुप न रहा था। हां...सच ही में पापा अपने जैसे अकेले हैं...।" हिना गद्-गद्-सी बोली-"मेरी मां से उन्हें इस कदर मुहब्बत है कि आज तक दूसरी शादी नहीं की। दादी ने बहुत दबाव डाला...लेकिन पापा टस-से-मस नहीं हुये। खुद मैंने भी कहा। सच हेमा, जब मैं अपने अब्बू को तन्हा देखती हूं तो मेरा दिल दुखता है। मगर वह हंसकर टाल जाते हैं...।

"कोई जवाब नहीं देते..?"

"क्यों नहीं देते..?" हिना बोली-"कहते हैं...तुम कैसी बेटी हो जो सौतेली मां के लिए इस कदर परेशान हो...।

"यह सुनकर गौतम हंस पड़ा-"ठीक ही तो कहते हैं... । इस दिन वे दोनों हिना के साथ काफी देर तक बैठे गपशपप करते रहे

और हिना का भी दिल लगा रहा।

रात को हेमा अपने बिस्तर पर लेटी कोर्स की एक किताब पढ़ रही थी कि गौतम उसके कमरे में आया। हेमा ने किताब बन्द की व अपने भाई के चेहरे को गौर से देखते हुए मुस्कुराई । खैरियत...?" उसने पूछा ।

"हां, सब खैरियत है।" गौतम ने एक कुर्सी उठाकर बैड के करीब रखी व उस पर जमते हुए बोला-"क्या हो रहा था ?"

"एग्जाम सिरपर हैं भैया। थोड़ा सिर-खपाई कर रही थी-|

"ओह ! खैर ! एक बात बताओ हेमा...।" गौतम गम्भीर होते हुए बोला ।

"भैया ! आप तो सीरियस हो रहे हैं। क्या मामला है...?" हेमा जरा सम्भल कर बैठ गई।

"हेमा, तुझे अपनी यह सहेली हिना कैसी लगती है...?'' गौतम ने एक अप्रत्याशित सवाल किया। वह मेरी सहेली है भैया। स्कूल में हम एक-दूसरे के साथ रहती हैं, शोख है...हंसमुख है...लाखों में एक है। वह मुझे बहुत अच्छी लगती है...पर भैया ! आप यह क्यों पूछ रहे हैं..?"

.. "हेमा... | इसका मतलब है कि अब हम एक-दूसरे के 'रकीब' बनने वाले हैं..।"

"रकीब...।" हेमा की समझ में पहले तो इस शायराना शब्द का मतलब नहीं आया, फिर समझ में आया कि रकीब तो किसी एक को चाहने वाले दो प्रतिद्वन्दियों को कहते हैं। वह एकदम मुस्कुराकर बोली-"बहन से भी शायराना अंदाज में बात कर रहे हैं। अच्छा तो आप भी मेरी पंक्ति में खड़े हो गये। यह तो बहुत बुरी बात है भैया...।

'"कोई किसी को अच्छा लगे तो इसमें बुराई की क्या बात है...।"

गौतम उसकी आंखों में झांकते हुए बोला-"हेमा मैं तुम्हारी इस सहेली को पसन्द करने लगा हूं। मैं उससे शादी करना चाहता हूं।"आप जानते हैं कि आप क्या कह रहे हैं...?" हेमा के चेहरे पर उदासी छा गई।

"हां...मैंने जो कुछ कहा है बहुत सोच समझ कर कहा है...।" गौतम के लहजे में दृढ़ता थी। आपने सोचा ही तो नहीं। अगर सोचा होता तो ऐसी बात हर्गिज जुबान पर न लाते...।"

"किसी को पसन्द करना, क्या गुनाह है..?"

"पसन्द करना तो गुनाह नहीं, लेकिन शादी की बात करना गुनाह है...।" गौतम बोला-"तुम शायद जाति-धर्म का सोचकर ऐसा कह रही हो । बड़े घरानों में अब यह रूढ़िवादी ख्याल नहीं है। और समीर राय आधुनिक ख्यालों के पढ़े-लिखे सज्जन व्यक्ति लगे हैं मुझे।''

"मैं इसकी बात नहीं कर रही। हालांकि यह प्राब्लम भी अपनी जगह है। अपनी पसन्द से शादी करना या सोचना गलत नहीं है भैया, लेकिन सिर्फ उनके लिए जिनकी मंगनी न हुई हो। हेमा ने जैसे भाई को याद दिलाया।

"मैं इस मंगनी को नहीं मानता..।" गौतम विफर उठा।"

आपके ना मानने से क्या होगा।" हेमा संजीदा थी-"यह शादी ने हमारे बड़ों ने तय की है। इस मंगनी से इंकार सम्भव नहीं, आखिर नेहा का क्या अपराध है फिर यह रिश्ता हमारे दादा ने किया था, और...।'

'यह मुझसे दो साल बड़ी है...।" गौतम उसकी बात काटते बोला।
 
"दो । साल का फर्क कोई फर्क नहीं होता। जिस आधुनिकता की दुहाई देते आप एक मुस्लिम परिवार से नाता जोड़ने को दुहाई दे रहे हैं..उसी आधुनिकता के चलते उम्र में पांच-सात या दस साल का अंतर कोई अर्थ नहीं रखता।

फिर आप दादा की हैसियत और उनके गुस्से से भी अनजान नहीं हैं। मैं तो आपको ऐसा कोई दुस्साहस कर दिखाने की सलाह नहीं दूंगी...

"लेकिन हेमा, मैं यह तय कर चुका हूं कि अगर मुझे पसन्द नहीं किया तो मैं यह शादी करके रहूंगा।"

"लेकिन भैया, क्या यह एक तरफ फैसला नहीं है ?" हेमा ने बातचीत का रुख बदला। मैं समझा नहीं..?''

"आप हिना से शादी तभी कर सकेंगे ना, जब हिना और उसके पापा-दादी इस शादी पर रजामन्द होंगे। आज आपने उसके पापा को भी देख लिया। मुझे तो वह किसी राजा-महाराजा से कम नजर नहीं आते... ["

"मैंने तुम्हारी इस सहेली की आंखों में अपने लिए पसन्दगी के भाव देखे हैं...।" गौतम ने जेसे अपनी दावेदारी में तर्क दिया ।हेमा अब संजीदा ही नहीं चिन्तित भी नजर आ रही थी ।वह बोली, “यह दो मुलाकातों में आखिर हिना ने ऐसा क्या जादू कर दिया...।'' वह बड़बड़ाई। कुछ होने के लिए हेमा एक क्षण भी बहुत होता है। कभी 'इस एक क्षण' का अहसास हमें तत्काल हो जाता है और कभी इस क्षण का पता कुछ दिन बाद चलता है। लेकिन यह खेल होता-'एक क्षण' का ही है... |

"भैया ! हिना ने इन दो मुलाकात में आपको फिलास्फर भी बना दिया। अब आगे की मुलाकातें भगवान जाने क्या रंग लायेंगी। भैया ! मैं अब आपको उसके घर लेकर नहीं जाऊंगी...।" भयभीत हेमा ने जैसे अपना फैसला सुनाया। ऐसे ही अवसरों के लिए माएं होती हैं, अगर आज मम्मी होती तो वह मुझे मायूस न करती...।"और ऐसे ही मौकों के लिए बाप होते हैं, अगर आज हमारे पापा होते तो वह आपको ऊंच-नीच समझाते। आपको हर्गिज बहकने नहीं देते...।" हेमा ने उलट वार किया।

“बुरा हो उस शैतान का, जिसने हमारे मां-बाप की जान ली।" गौतम के चेहरे के भाव बदले...वह एकदम सुलग उठा-"जी चाहता है कि उसे जिन्दा करूं और फिर गिन-गिनकर उससे अपने मां-बाप के कत्ल का हिसाब लूं... ।''

"ताया बताते हैं कि उसका बहुत बुरा अंता हुआ। वो पहले अंधा हुआ, फिर मोहताज व अपाहिज । अपाहित ऐसा कि महीनों बिस्तर पर पड़ा सिसकता रहा... । सजा तो वह अपनी जिन्दगी में ही पा गया, भैया...।" मां-बाप की चाह ने हेमा को भी उदास कर दिया था।

"बस भाई ! यही वह सत्य है जिसे हम समझ लें तो इंतकाम की आग में जलकर कभी अन्धे न हों-/" हेमा ठण्डा सांस भरते बोली-“एक हत्यारे को मारकर खुद कातिल बनना एक मूर्खता ही तो है...।"

"नहीं। हत्यारे को मारकर दिल की आग तो ठण्डी होती है...।" गौतम का खून खौल उठा था...उसने दलील दी। मैं नहीं समझती कि कभी ऐसा होता होगा। किसी की जान लेना खुद को खतरे में डालना है। हां...हत्यारे को माफ कर देना या सब्र कर लेना जरूर दिल की आग को ठण्डा करने का कारण बन सकता है। रब सब्र करने वालों के साथ होता है और जुल्म करने वालों को वह कभी नहीं बख्शता। अब देख लें, रोशनगढ़ी के रोशन राय का क्या हश्श हुआ, उसके अंजाम को सबने देखा....।"

"चलो. छोड़ो.. इन पुरानी बातों को, बात कहां से कहां निकल गई।

गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा।" गौतम बोला-"हां तो मैं कह रहा था...।" वह कहते-कहते रुक गया और

अनुराध पूर्ण नजरों से अपनी बहन को देखने लगा ।हेमा के बस में होता तो वह कल ही उन दोनों की शादी करवा देती...लेकिन वा जानती थी कि उसका भाई क्या मांग रहा है।वह अपने भाई को आग से खेलने की इजाजत हर्गिज नहीं दे सकती थी। पर उसने साफ शब्दों में व सख्ती से इंकार करना बुद्धिमत्ता न समझा और धीरे से बोली-"अच्छा, भैया ! मैं इस बारे में हिना से बात करने की कोशिश करूंगी। उसकी रजामन्दी के बिना तो यह बात आगे नहीं बढ़ सकती।

''हेमा, उससे कह देना कि अगर वह मुझसे शादी के लिए राजी न हुई तो फिर वह किसी और की भी नहीं हो सकेगी...।' गौतम ने बड़े तीखे लहजे में कहा और फिर तुरन्त कमरे से निकल गया |भाई का यह रूप व यह रवैया हेमा के लिए बिल्कुल नया था। हेमा तो उसे बड़ा नर्मदिल, शालीन स्वभाव शायराना मिजाज रखने वाला लड़का समझती थी, पर आखिर था

तो वह भी एक जमींदार घराने का। उसका यह रूप.शायद खून ने ही अंततः अपना रंग दिखाया था।
 
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