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उठते हुए हिचकिचाई वह आहिस्ता से नजमा से बोली ।"नहीं आया... आप ही जायेंगे। यही ठीक रहेगा...।
“नजमा की बजाय रायशा ने जवाब दिया ।"अच्छा, ठीक है...।" नफीसा बेगम उठी व अरूणिमा की मां रजनी के साथ ड्राइंगरूम से निकल गई और फिर रजनी जिस कमरे में नफीसा बेगम के साथ पहुंची... उसमें सब्ज रंग का एक सादा-सा कालीन बिछा हुआ था और सफेद कवर चढ़े दो गाव तकिये रखे थे। कमरे में कोई न था! रजनी ने नफीसा बेगम को बैठने का इशारा किया और बोली-"आप तशरीफ रखें...वह अभी आती है...।"यह कहकर वह बाहर चली गई। उसके जाने के बाद नफीसा बेगम ने एक निरीखणात्मक नजर कमरे पर डाली और गाव तकिये का सहार लेकर बैठ गई। उसकी नजरें भीतरी बंद दरवाजे पर थीं।कुछ ही देर बाद एक छोटी-सी लड़की कमरे में दाखिल हुई। उसकी उम्र मुश्किल से पन्द्रह साल की थी। नफीसा बेगम ने उसे देखा...और यही समझा कि कोई पैगाम वगैरह लेकर आई है...कि अरूणिमा कहीं व्यस्त है।लेकिन ऐसा न था। वह खुद ही अरूणिमा थी। इकहरे बदन की बालकटी अरूणिमा। वह पूरे इत्मीनान के साथ दूसरे गांव तकिये का सहारा लेकर बैठ गई।उसमें गहरी नजरों से नफीसा बेगम का जायजा लिया और फिर मुस्कुराते हुये बोली-"रोशनगढ़ी की हवेली की मल्लिका को आखिर हम से क्या काम पड़ गया..?"यह सुनकर नफीसा हैरान रह गई। टी०वी० सीरियलों की रोमांटिक अभिनेत्री-सी दिखती इस लड़की ने कैसे जाना कि वह कौन है और कहां से आई है। तभी उसे नजमा भाभी की यह टिप्पणी याद आई कि 'वहां चलकर देखना कि वह लड़की क्या कर सकती है। अरूणिमा ने मुंह खोलते ही नफीसा को हैरत में डाल दिया था। अब आगे वह न जाने क्या-क्या रहस्योद्घाटन करने वाली थी। मैं अपने बेटे के सिलसिले में आई थी...।"
नफीसा ने फौरन जवाब दिया।"क्या हुआ आपके इकलौते बेटे को..?" अरूणिमा ने उन्हें गहरी नजरों से देखते हुए पूछा नफीसा फिर हैरान हुई । अरूणिमा ने 'इकलौता बेटा कहकर एक और धमाका किया था। नफीसा को यकीन हो चला कि नजमा उसे सही जगह लेकर आई है कि उसकी समस्या जरूर हल हो जाएगी... अब नफीसा बेगम ने हर वह बात बता दी जो जरूरी थीं वह लड़की अरूणिमा पूर्ण एकाग्रता के साथ नफीसा बेगम की विपक्ष सुनली रहीं। नफीसा बेगम खामोश हुई तो अरूणिमा संजीदगी से बोली-"हमें आपके बेटे का पैन-कलम चाहिये होगा...।"अरूणिमा शायद यह भी जानती थी कि नफीसा बेगम समीर राय की 'इस्तेमाल की किसी चीज के तौर पर उसका पैन लेकर आई हैं ।
नफीसा एकदम बोली-“मैं लाई हूं, बोली ।"नफीसा बेगम ने पैन अपने पर्स से निकालकर अरूणिमा के हवाले कर दिया। उस कोमलागी भविष्यवकता और 'आमिल' ने इस बन्द पैन को एक नजर देखा और फिर अपने बांए हाथ में दबा लिया। उसकी हिरणी सी चपल आंखों एक वेषेनी सी दिखने लगी थी।"एक सवाल पूछ सकती हूं.?" नफीसा बेगम ने धीरे से पूछा ।
“जी, पूछिये...।" अरूणिमा ने अनुमति दी।“
क्या समीर राय ने वाकई अपनी नमीरा को देखा है..?"
अरूणिमा ने तत्काल जवाब दिया-"जी हां, यह सच है..।
''क्या नमीरा जिन्दा है..?" नफीसा का यह दूसरा सवाल स्वाभाविक था।
"नहीं. यह गलत है।
"इसका मतलब है कि नमीरा मर चुकी है...?"
"निस्सन्देह... । यकीनन... । अरूणिमा ने दृढ़ शब्दों में कहा।
"नमीर मर चुकी है. इसके बावजूद दिखाई दे रही है। यह सब क्या गोरखधंधा है?"
"आप इस बाल को समझ नहीं सकेंगी।" अरूणिमा की संजीदगी बरकरार थी- "अब आप चाहती क्या हैं..यह बताएं।"
""मैं अपने बेटे को नमीरा की यादों से अलग करना चाहती हूं। ये यादें उसे पागल किये हुये हैं...।
"ऐ बात बताएं...।" अरूणिमा ने नफीसा बेगम की आंखों में झांकते हुए पूछा-"क्या आपको अपनी पौत्री याद नहीं आती..?"
"क्या वह जिन्दा है...।" नफीसा ने चकित हो पूछा।
"हां...वह जिन्दा है और ऐसी प्यारी...ऐसी खूबसूरत बच्ची तो दूर-दूर तक दूसरी नहीं है। उसे आप भूले हुए हैं । पहले हम उस बच्ची के लिए कुछ करते हैं...फिर नमीरा की समस्या देखेंगे... । आपकी बहू नमीरा का मसला जरा टेढ़ा है। यूं उस बच्ची को भी पाना आसान नहीं है । वह बच्ची बड़े 'शैतानों'-'शबीसों के बीच फंसी हुई है...।
“नजमा की बजाय रायशा ने जवाब दिया ।"अच्छा, ठीक है...।" नफीसा बेगम उठी व अरूणिमा की मां रजनी के साथ ड्राइंगरूम से निकल गई और फिर रजनी जिस कमरे में नफीसा बेगम के साथ पहुंची... उसमें सब्ज रंग का एक सादा-सा कालीन बिछा हुआ था और सफेद कवर चढ़े दो गाव तकिये रखे थे। कमरे में कोई न था! रजनी ने नफीसा बेगम को बैठने का इशारा किया और बोली-"आप तशरीफ रखें...वह अभी आती है...।"यह कहकर वह बाहर चली गई। उसके जाने के बाद नफीसा बेगम ने एक निरीखणात्मक नजर कमरे पर डाली और गाव तकिये का सहार लेकर बैठ गई। उसकी नजरें भीतरी बंद दरवाजे पर थीं।कुछ ही देर बाद एक छोटी-सी लड़की कमरे में दाखिल हुई। उसकी उम्र मुश्किल से पन्द्रह साल की थी। नफीसा बेगम ने उसे देखा...और यही समझा कि कोई पैगाम वगैरह लेकर आई है...कि अरूणिमा कहीं व्यस्त है।लेकिन ऐसा न था। वह खुद ही अरूणिमा थी। इकहरे बदन की बालकटी अरूणिमा। वह पूरे इत्मीनान के साथ दूसरे गांव तकिये का सहारा लेकर बैठ गई।उसमें गहरी नजरों से नफीसा बेगम का जायजा लिया और फिर मुस्कुराते हुये बोली-"रोशनगढ़ी की हवेली की मल्लिका को आखिर हम से क्या काम पड़ गया..?"यह सुनकर नफीसा हैरान रह गई। टी०वी० सीरियलों की रोमांटिक अभिनेत्री-सी दिखती इस लड़की ने कैसे जाना कि वह कौन है और कहां से आई है। तभी उसे नजमा भाभी की यह टिप्पणी याद आई कि 'वहां चलकर देखना कि वह लड़की क्या कर सकती है। अरूणिमा ने मुंह खोलते ही नफीसा को हैरत में डाल दिया था। अब आगे वह न जाने क्या-क्या रहस्योद्घाटन करने वाली थी। मैं अपने बेटे के सिलसिले में आई थी...।"
नफीसा ने फौरन जवाब दिया।"क्या हुआ आपके इकलौते बेटे को..?" अरूणिमा ने उन्हें गहरी नजरों से देखते हुए पूछा नफीसा फिर हैरान हुई । अरूणिमा ने 'इकलौता बेटा कहकर एक और धमाका किया था। नफीसा को यकीन हो चला कि नजमा उसे सही जगह लेकर आई है कि उसकी समस्या जरूर हल हो जाएगी... अब नफीसा बेगम ने हर वह बात बता दी जो जरूरी थीं वह लड़की अरूणिमा पूर्ण एकाग्रता के साथ नफीसा बेगम की विपक्ष सुनली रहीं। नफीसा बेगम खामोश हुई तो अरूणिमा संजीदगी से बोली-"हमें आपके बेटे का पैन-कलम चाहिये होगा...।"अरूणिमा शायद यह भी जानती थी कि नफीसा बेगम समीर राय की 'इस्तेमाल की किसी चीज के तौर पर उसका पैन लेकर आई हैं ।
नफीसा एकदम बोली-“मैं लाई हूं, बोली ।"नफीसा बेगम ने पैन अपने पर्स से निकालकर अरूणिमा के हवाले कर दिया। उस कोमलागी भविष्यवकता और 'आमिल' ने इस बन्द पैन को एक नजर देखा और फिर अपने बांए हाथ में दबा लिया। उसकी हिरणी सी चपल आंखों एक वेषेनी सी दिखने लगी थी।"एक सवाल पूछ सकती हूं.?" नफीसा बेगम ने धीरे से पूछा ।
“जी, पूछिये...।" अरूणिमा ने अनुमति दी।“
क्या समीर राय ने वाकई अपनी नमीरा को देखा है..?"
अरूणिमा ने तत्काल जवाब दिया-"जी हां, यह सच है..।
''क्या नमीरा जिन्दा है..?" नफीसा का यह दूसरा सवाल स्वाभाविक था।
"नहीं. यह गलत है।
"इसका मतलब है कि नमीरा मर चुकी है...?"
"निस्सन्देह... । यकीनन... । अरूणिमा ने दृढ़ शब्दों में कहा।
"नमीर मर चुकी है. इसके बावजूद दिखाई दे रही है। यह सब क्या गोरखधंधा है?"
"आप इस बाल को समझ नहीं सकेंगी।" अरूणिमा की संजीदगी बरकरार थी- "अब आप चाहती क्या हैं..यह बताएं।"
""मैं अपने बेटे को नमीरा की यादों से अलग करना चाहती हूं। ये यादें उसे पागल किये हुये हैं...।
"ऐ बात बताएं...।" अरूणिमा ने नफीसा बेगम की आंखों में झांकते हुए पूछा-"क्या आपको अपनी पौत्री याद नहीं आती..?"
"क्या वह जिन्दा है...।" नफीसा ने चकित हो पूछा।
"हां...वह जिन्दा है और ऐसी प्यारी...ऐसी खूबसूरत बच्ची तो दूर-दूर तक दूसरी नहीं है। उसे आप भूले हुए हैं । पहले हम उस बच्ची के लिए कुछ करते हैं...फिर नमीरा की समस्या देखेंगे... । आपकी बहू नमीरा का मसला जरा टेढ़ा है। यूं उस बच्ची को भी पाना आसान नहीं है । वह बच्ची बड़े 'शैतानों'-'शबीसों के बीच फंसी हुई है...।