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Horror अगिया बेताल

और मेरे लिए यह रात और भी कठिन थी। मैं उसे गन्दी भावना से कैसे देख सकता था। उसके प्रति तो मेरे मन में आदर था। यह मुझसे कैसे हो सकेगा ?

नहीं – मैं उसके सामने ही नहीं पडूंगा... पर ऐसा कब तक होगा... उसके बिना मैं कर भी क्या सकता हूँ।

और वह अपने दिल में क्या सोच रही होगी। क्या वह चाहती है की मैं गन्दी हरकतें शुरू कर दूँ।

सचमुच कितनी भारी परीक्षा थी। मैं इस परीक्षा में स्वयं को असफल महसूस कर रहा था।

मैं ऐसा नहीं सोच सकता।

दूसरा दिन सोचों में गुजरा : जंगल में बैठा रहा। रात होते ही वह मुझे लेने आ गई। रात भी पिछले दिन की तरह गोश्त खाया। आज इतनी झिझक नहीं हुई।

जब मैं अपने कमरे में पहुंचा और बिस्तरा टटोलने लगा तो मेरा हाथ किसी गर्म वस्तु से टकराया। मैंने एकदम हाथ हटा लिया।

“कौन ?” मैंने पूछा।

“मेरे अलावा और कौन हो सकता है?”

“आप यहाँ – मेरे बिस्तर पर।”

“हाँ तांत्रिक ! क्या मेरा यहाँ लेटना बुरा लगा ?”

“नहीं... तो क्या मुझे दूसरे कमरे में सोना पड़ेगा ?”

वह तड़प कर बोली – “तुम महापुरुष नहीं, बल्कि तांत्रिक बन रहे हो। तुम्हे इसी बिस्तरे पर सोना होगा।”

“तो आप उठिये।”

“रोहताश ! तुम्हारे विचार आज भी वैसे हैं। तुम क्या बुरे आदमी बनोगे। तुम पहली ही परीक्षा में असफल रहे हो, तुम्हारी यह साधना बेकार रहेगी। अब भी कुछ नहीं बिगड़ा, मेरा कहना मानो तो यह हठ छोड़ दो।

“नहीं, यह कभी नहीं हो सकता।”

“तो आगे बढ़ो और बुराई की आग में कूद पड़ो। तुम्हारे उद्देश्य के लिए मैं बलि का बकरा हूँ। मैं तुम्हें हर बुराई की ओर ले चलूंगी... आओ देर न करो... मैं तुम्हारी झिझक मिटा देना चाहती हूँ। मैं तुम्हारी सहायक हूँ न...।”

“लेकिन आपका और मेरा रिश्ता...।”

“बकवास है सब – तांत्रिक का किसी से कोई रिश्ता नहीं होता।”

उसने मेरे हाथ थाम लिये।

“मैं तुम्हारी सहायता कर रही हूँ। तुम सबसे बड़ी बुराई के पथ पर बढ़ोगे... लो मुझे छूकर देखो... आग अपने आप लग जायेगी।”

मेरे माथे पर पसीना तैर रहा था।

मैंने अपना काँपता हाथ आगे बढाया ... तो बुरी तरह चौंक पड़ा। मैंने महसूस किया वह वस्त्र उतारे हुए है।

“डरो नहीं।”

और वह मुझसे लिपट गई।

तांत्रिक... बेताल... घृणित कार्य... मेरे मस्तिष्क में बिजलियाँ कौंधने लगी। धीरे-धीरे बुराई का चेहरा उभरने लगा। मेरी शराफत बेनकाब हो गई, चेहरा कठोर हो गया और मैं धीरे-धीरे उसे धकियाता हुआ बिस्तरे की तरफ ले गया।

मैं उसके चेहरे के भावों को नहीं पढ़ सकता था।

शायद वह यह तय कर चुकी थी कि उसका कोई अस्तित्व नहीं है।

उस रात मैंने सबसे पहला बुरा काम किया। और मेरे दिमाग में ठहरी एक दीवार ढह गई। मुझे लगा अब दुनियां में कोई स्त्री ऐसी नहीं जिसके प्रति मैं शराफत दिखाऊँ। सबसे बड़ा गुनाह तो कर चुका था।

वह सच कहती थी – इस बुराई के बाद मेरी हर झिझक दूर हो जायेगी। सचमुच मेरी भावना काफी बदल चुकी थी। अब मुझे उससे कोई भी सहानुभूति नहीं हो रही थी।

क्योंकि अब हमारे बीच औरत मर्द का रिश्ता था।

उस घटना के बाद धीरे-धीरे मेरी हिंसक प्रवृति भी जागती रही। मेरे भीतर अनोखा परिवर्तन हो रहा था। अब तो मैं कभी-कभी कच्छा मांस भी खाने लगा था।

बकरे की गर्दन पर छुरी चलाते हुए मुझे जरा भी हिचक नहीं होती। मौत की आवाजें मुझे मधुर लगने लगी और भुजाओं में बल आने लगा। इस प्रकार दिन बीत रहे थे।

इस बीच दो बार ठाकुर का आदमी वहाँ आया था और चन्द्रावती को दो रातें ठाकुर की गढ़ी में बितानी पड़ी थी। चन्द्रावती अब धीरे-धीरे गढ़ी के बारे में पूरी जासूसी कर रही थी।

वह मुझे उस बारे में बताया करती थी।

ठाकुर को मेरे बारे में कोई खबर नहीं। वह हर समय अय्याशी में डूबा रहता था। भैरव प्रसाद काले पहाड़ पर जा चुका था।
 
गढ़ी में कुल मिला कर चालीस इंसान रहते थे। आठ घोड़े और बंदूकों से लैस पहरेदार भी वहीं रहते थे।

मैं चन्द्रावती द्वारा लाई गई जानकारी को मस्तिष्क में सुरक्षित रखता था।

इसी प्रकार तेईस दिन बीत गए। मेरा प्रथम चरण पूरा हो चुका था। अपने भीतर से उठने वाली दुर्गंध मुझे प्रिय लगती थी। अब मुझे उस दिन तक अपनी साधना का यह चरण जारी रखना था, जब तक चाँद की आंठ्वीं तारीख न आती। मैंने यह ड्यूटी चन्द्रावती पर छोड़ रखी थी कि वह मुझे बताये आठवीं तारीख कब आ रही है।

अगर आकाश पर बादल छा जाते है तो मेरी यह साधना भंग हो जायेगी... यह बड़ी कठिन थी... ना जाने कब पूरी होती है।

उसने मुझे बताया कि बारह रोज बाद चाँद की आठवीं तारीख आएगी। इस प्रकार मैंने प्रथम चरण में बारह दिन और बिताये।

सबसे बड़ी बात यह थी की अब मैं आदी हो गया था। मुझे इस दिनचर्या में अब कोई कठिनाई नहीं महसूस होती थी। अब तो मैं इसी स्थिति में रह कर सालों गुजार सकता था।

मैं जंगली पशु जैसा बन गया था।

मेरी दाढ़ी और बाल काफी बढ़ चुके थे, जो आपस में चिपककर रह गये थे। उनमें जुएँ भर गये। वस्त्रों पर चिल्लारों ने अड्डे बना लिए थे, पर मुझे इसकी जरा भी तकलीफ नहीं होती थी।

नाखून काफी नोकीले हो चुके थे।

चन्द्रावती कहती थी कि अब मैं काफी भयानक नजर आने लगा हूँ। कोई आसानी से पहचान भी नहीं सकता। यह सुनकर मुझे ख़ुशी होती।

आखिर बारहवां दिन भी आ गया।

वह यह देखती रही थी की चाँद किस दिशा से उदय होता है। उसके उदय होने से पहले ही वह मुझे उस दिशा में मुख करके छोड़ आई। मैंने वस्त्र उतारे हुए थे।

शमशान में भयानक सन्नाटा छाया हुआ था। वह काफी हिम्मत वाली स्त्री थी, जो मुझे उस वक़्त वहां छोड़ आई। उसके जाने के बाद मैं अकेला रह गया। यह अनुमान लागना उसका काम था कि चाँद किस वक़्त मेरे सर से गुजर कर पीठ की तरफ चला जाएगा। परीक्षा की विकट घड़ी मेरे सामने थी।

यह कल्पना कितनी भयानक थी की मैं शमशान पर रात के बियाबान अन्धकार में नग्न खड़ा था। लेकिन अब मैं इतना निर्भीक हो गया था कि शमशान मेरे लिए कोई महत्वा नहीं रखता था। हाँ सारी रात खड़े रहना अवश्य तकलीफदेह था।
 
वह मुझसे काफी दूर थी पर चाँद उदय होने पर उसने सीटी बजाकर मुझे सचेत करना था। लगभग आधा घंटे बाद सीटी की धीमी आवाज मेरे कानों में पड़ी और चेहरा सीधा किया – पलके उठाई और मन्त्रों का उच्चारण शुरू कर दिया।

इसी स्थिति में मुझे चार घंटे बिताने पड़े। दूसरी सीटी बजने पर मैंने साधना ख़त्म की। इस बीच सन्नाटे का दम तोडती नदी की धरा कल...कल... करती रही।

कभी-कभी ठंढी हवा मेरे बदन को सिहरन भेज देती।

वापिस लौटते समय मेरा सर भारी हो रहा था। मैंने व्रत तोड़ा और सो गया। सोते- सोते सुबह हो गई अतः मैं दिन चढ़े तक सोता ही रहा।

इस प्रकार दूसरा चरण प्रारंभ हो गया...छः रातें बीतने के बाद मैंने कुछ विचित्रता महसूस की। छठी रात मैंने नगाड़ो का भयानक शोर सुना फिर कोई जोर-जोर से हुंकार भरता रहा... उसके बाद ऐसा लगा जैसे साँपों ने घेर लिया हो... यह सब मुझे छठी रात महसूस हुआ – लेकिन मैं जरा भी भयभीत नहीं हुआ।

सातवीं रात किसी ने मुझे धक्का देना चाहा – पर मैं अडिग रहा फिर मेरे गाल पर जोरदार तमाचा पड़ा। मैं हटने वाला नहीं था, चाहे मेरी मौत वहीं हो जाती।

गनीमत थी मुझे कुछ दिखाई नहीं देता था पर वह सब कुछ मुझे महसूस होता था। सातवीं रात के अंतिम पहर मैंने एक सिर कटे खौफनाक भैंसे को अपनी तरफ खून का फौव्वारा फेंकते अनुभव किया फिर वह मुझे रौंदने के लिए दौड़ पड़ा।

अब मुझे विश्वास हो चला था कि बैतालिक और तंत्र-मंत्र ढोंग या झूठ नहीं। इस दुनिया में हमारी दुनिया के अलावा और भी अदृश्य संसार है। अब मेरा उत्साह काफी बढ़ चुका था।

परन्तु आठवीं रात दुर्भाग्यपूर्ण थी। आसमान पर बादल छा गए और चाँद उसमें छिप गया। इस प्रकार आठवीं रात ही दूसरे चरण की साधना भंग हो गई। मुझे बहुत कोफ्त महसूस हुई। अब मुझे प्रारंभ से यह साधना अगले पक्ष में करनी थी।

लेकिन मैंने धैर्य नहीं छोड़ा।

अगले पक्ष का इंतज़ार करने लगा।

अब मैं यह साधना किसी सूरत में आधी नहीं छोड़ सकता था।

अगला पक्ष प्रारंभ होते ही मैं पुनः तैयार हो गया। उस वक़्त तक मेरे शारीर पर आधा-आधा इंच मैल जम चुका था और बालों ने जटाओं का रूप धारण करना शुरू कर दिया था।

आठवीं तारीख आते ही साधना फिर से शुरू हो गई। इस बार मैं हल्कापन महसूस कर रहा था। छठे दिन वैसी ही क्रियाएं जारी हो गई। विभिन्न प्रकार से मुझे भयभीत किया जाता रहा। सातवीं रात इसने उग्र रूप धारण कर लिया।

आठवीं रात ऐसा लगा जैसे मेरे सर पर आग का गोला झन्नाटे की आवाज पैदा करता चक्कर काट रहा... फिर...

फिर तीसरे तीसरे घंटे एक चमत्कार हुआ।

मैं चौंक पड़ा जब मैंने आग का अलाव अपने सामने नाचते देखा। मुझे विश्वास नहीं हुआ की मैं देख सकता हूँ। मेरा ह्रदय गदगद हो उठा। मैं शमशान का दृश्य स्पष्ट देख रहा था।

पर यह ख़ुशी सिर्फ शमशान के उस दृश्य तक ही सीमित रही। वापसी पर मैं पुनः अंधा था। मैंने इस घटना का कोई जिक्र चन्दा से नहीं किया। यूँ भी मैं वहां घटने वाली किसी घटना का जिक्र नहीं करता था।

पर मुझे विश्वास हो गया था कि जल्दी मेरे नेत्रों की ज्योत वापिस लौट आएगी।

नौवीं रात मुझे एक नहीं कई खौफनाक दृश्य दिखाई पड़े। भयानक चेहरे व बड़े-बड़े दांत... वे सब मुझे नोच रहे थे... तरह-तरह की आवाजें पैदा करते थे। कभी-कभी चारो तरफ आग लग जाती और मुझे ऐसा लगता जैसे कुछ देर और रहा तो जलकर राख हो जाऊंगा।

लेकिन अब मैं पीछे हटने वाला नहीं था।
 
दसवीं रात ऐसी कोई घटना नहीं घटी। शान्ति छाई रही... फिर मुझे दूर बहुत दूर धुन्ध में एक छाया दिखाई दी। वह काफी देर से मुझे निहार रही थी पर खाका अस्पष्ट था।

यह कम आश्चर्य की बात नहीं थी कि मैं वहां देख सकता था और वैसे अंधा था।ग्यारहवीं रात हवा में तीखापन था... धुंध सी फिर छा गई और इस बार भी वही छाया दिखाई पड़ी। उसका आकार कुछ बढ़ गया था और आज वह और निकट आ गई थी। लेकिन स्पष्ट कुछ न था।

इस प्रकार जैसे-जैसे दिन बीतते गए वह छाया और भी नजदीक आती गई। मैं अब उसे टकटकी बांधे देखता था। उसका आकार मुझसे कुछ अधिक लंबा हो गया था। बीसवीं रात छाया स्पष्ट नजर आई। वह लाल वस्त्र धारण किये किसी शहजादे जैसा था। उसका शारीर लगभग सात फिट लंबा था और शरीर कसरती नजर आता था। उसकी कलाई में चमकीली पत्तियां पड़ी थी। सीने पर भी वैसी ही चमकीली पट्टी थी।

उसका माथा काफी चौड़ा था और आँखें खौफ की प्रतीक थी। उसके लाल लबादे से कभी-कभी आग के शोले उठते थे।

इक्कीसवीं रात वह कुछ बोल पड़ा।

मैंने सुना वह कह रहा था – “क्यों पीछे पड़े हो... जाओ अभी भी वक़्त है।”

मैंने उसकी एक ना मानी। उसके स्वर में बाइसवीं रात गिड़गिड़ाहट थी। इक्कीसवीं रात तो वह धमकी भरे स्वर में बोल रहा था। वह बार-बार मुझे वापिस जाने के लिए गिड़गिड़ाता रहा।

मुझे उसकी बातें सुन-सुनकर आनंद की अनुभूति हो रही थी। वह इस बात की दुहाई देता रहा की उसका घर संसार तबाह हो जायेगा। उसने मुझे बहुत से लालच भी दिए पर मैंने कोई उत्तर नहीं दिया न उससे यह पूछा कि वह कौन है।

तेइसवीं रात साधना की आखिरी रात थी। उस रात वह जोरदार कड़कड़ाहट की ध्वनि के साथ प्रकट हुआ।

“मैं हाजिर हूँ मेरे आका।” वह घुटनों के बल झुकते हुए बोला – “अगिया बेताल आपकी सेवा में हाजिर है।”

“अगिया बेताल।” मेरे मुह से स्वर निकला – “आज से तुम मेरे गुलाम हो।”

“इससे पहले मेरी कुछ शर्तें है। जब आप उन शर्तों को पूरी कर देंगे तो मैं आपका गुलाम बना रहूंगा।”

“अपनी शर्तें बताओ।”

“तो सुनो।” वह सीधा खड़ा हो गया – “आपने मुझे तेईस रोज की साधना से प्राप्त किया है... इसलिए मेरी शक्ति तेईस दिन तक रहेगी। हर तेइसवें दिन मैं नरबलि लूँगा तभी मैं तुम्हारे साथ रहूंगा – बोलो मुझे तेइसवें रोज बलि दोगे।”

कुछ सोचकर मैंने कहा – “दूंगा।”

दूसरी बात – आप किसी धार्मिक स्थान में आज के बाद कदम नहीं रखोगे – मंजूर।”

“मंजूर...।”

“किसी धार्मिक आदमी पर मेरा प्रयोग नहीं करोगे।”

“मंजूर...।”

“मैं सिर्फ हानि पहुंचा सकता हूँ, मुझे सिर्फ विनाश का काम लेना होगा या व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति के लिये।”

“मंजूर...।”

“और यदि आपने इन बातों का पालन न किया तो...।”

“तो तुम जो चाहो कर सकते हो।”

“ठीक है... अब अगिया बेताल आप का गुलाम है... बोलिए क्या हुक्म है मेरे लिए...।”

“तुम्हें अपने पास बुलाने का क्या तरीका है ?”

“जब भी आप मंत्र का उच्चारण करेंगे मैं हाजिर हो जाऊंगा... चाहे आप जहाँ हो। मैं सिर्फ आपको नजर आऊंगा...मेरा दूसरा रूप आग का गोला है। वह बरगद मेरा घर है... मेरे अधीन सभी बेताल उस पर उलटे लटके रहते है। मैं उनका शहजादा हूँ।

“बेताल... मैं सबसे पहले अपनी आँखों की रौशनी चाहता हूँ।”

“मैं देख रहा हूँ। कालिया मसान आपकी आँखों में घुसा बैठा है और यह किसी तांत्रिक का करतब है। यह कालिया मसान अँधेरे का बादशाह है और मैं रौशनी का। इसे सिर्फ मैं ही परास्त कर सकता हूँ। अभी आप इसका नजारा देखेंगे।

कुछ क्षण बाद ही बेताल हाथ फैलाकर खड़ा हो गया। मुझे ऐसा लगा जैसे आँखों में सुइयां चुभ रही हो उसके बाद जोरदार धमाका हुआ और मैंने एक काले भुजंग शैतान को जमीन पर गिरते देखा।

बेताल उसके सीने पर सवार था।

वह बेताल से मुक्त होने की पुरजोर शक्ति लगा रहा था। पर उसका हर वार असफल हो रहा था।

“बोल मसान.... किसका दास है तू... तुझे मेरे आका की आँखों में किसने भेजा... बता।”

“ब...बताता हूँ।” वह मिमियाया।

अगिया बेताल ने उसके बाल मुट्ठी में जकड़ लिये। कालिया मसान कराहने लगा।

“मैं भैरव तांत्रिक का दास हूँ।” वह बोला।

“कहाँ रहता है तेरा गुरु ?”

“काले पहाड़ पर...।”

“हरामजादे अब इधर का रूख न करना...वरना जड़ से नाश कर दूंगा।”

“इस कमीने को मार डालो बेताल।” मैंने कहा – “इसने मुझे बहुत दुःख पहुँचाया है।”
 
कालिया मसान मेरे पैरों पर गिर पड़ा।

“मुझे माफ़ कर दो... मेरा कोई कसूर नहीं...।” वह गिड़गिड़ाया।

“यह ठीक कहता है आका... इस बेचारे का क्या कसूर...यह तो हुक्म का गुलाम है। चल बे मसान.. अब यहां से भाग जा और अपने गुरु की चोटी पर चढ़ जा... उसे बता देना बेताल ने भेजा है।”

कालिया मसान भाग खड़ा हुआ।

“अब आप सब कुछ देख सकते है आका।”

सचमुच मुझे सब कुछ नजर आ रहा था। भोर हो रही थी। मैंने बेताल को विदा दी और वापसी के लिए चल पड़ा।

मैं चन्द्रावती के पास पहुंचा। उसे लपककर सीने से लगाया और उसका मुंह चूम लिया। मैंने उसको भोगा था पर उसका खूबसूरत जिस्म देखा नहीं था। आज मुझे वह अत्यंत सुन्दर लग रही थी।

“मैं देख सकता हूं... सारी दुनिया देख सकता हूं।” मैंने कहा – “और सबसे पहले मैं तेरा भीतरी रूप देखना चाहता हूँ।”

“जो हुक्म तांत्रिक।”

कहने की बात नहीं थी कि मैं पूर्णतया बदल चुका था। अब मैं जालिम इंसान था और अगिया बेताल जैसी शक्ति मेरी गुलाम थी। कहने की बात यह भी नहीं थी कि चन्द्रावती अब मेरी लौंडी थी।

“तू ठाकुर के घर नहीं जायेगी आज के बाद।”

“आपका हुक्म सर आँखों पर...।”

उसके बाद वह मेरे आदेश का पालन करने लगी।

***

मेरी शक्ल अत्यधिक भयानक हो चुकी थी... मेरे कहकहों में दहशत थी और आवाज बर्फ के सामान ठंढी प्रतीत होती थी। मेरी आँखें हर समय आग उगलती प्रतीत होती थी।

दो दिन तक मैं शांत मन से अपनी योजना के बारे में सोचता रहा। सबसे पहले मुझे यह जानना था की ठाकुर के पास सुरक्षा का क्या प्रबंध है। मैं अपनी व्यूह रचना में ऐसी कोई कमी नहीं छोड़ना चाहता था जो उसे बचने का अवसर मिल जाए।

दूसरे दिन की शाम हो गई थी।

शाम ने जैसे ही रात का आवरण पहना, मैं सैर सपाटे की इच्छा से बाहर बाहर निकल गया। हवा में शीतलता थी और शमशान सन्नाटे में खोया हुआ था। मैं उन जगहों पर घूमता रहा, जहाँ मैं साधना के दौरान आया जाया करता था।

अचानक मैंने घोड़े के टापों का स्वर सुना... यह टापें जंगल के रास्ते हो कर आ रही थी। मैं एक झाड़ी में छिप कर बैठ गया। ये दो सवार थे। वे बड़ी तेज़ी के साथ उस और बढ़ रहे थे, जहाँ हमारा मकान था।

मैंने तुरंत वापसी की तैयारी कर ली।

जैसे ही मैं मकान के करीब पहुंचा, मैंने दोनों सवारों को रुकते देखा। वे घोड़े बाँधकर मकान के अंदर जा रहे थे।

दरवाज़ा पहले से ही खुला था।

मैं दीवारदीवार के सहारे-सहारे आगे बढ़ा और एक खिड़की के रास्ते अंदर दाखिल हो गया। फिर धीरे-धीरे मैं उस कमरे के द्वार पर पहुंचा, जिसके भीतर से बातचीत का स्वर उभर रहा था।

“अभी...इसी समय।” किसी पुरुष का स्वर था।

“लेकिन आज मेरी तबियत ठीक नहीं है।” चन्द्रावती कह रही थी – ठाकुर से कह देना कल आ सकूंगी।”

अचानक दूसरा पुरुष बोला – “हमें हुक्म है की तुम्हें हर हाल में गढ़ी में पहुंचाया जाये।”

“तो क्या जबरदस्ती।”

“अगर तुम अपनी इच्छा से नहीं चलती तो ऐसा भी हो सकता है।”

“अच्छा ! आप लोग जरा तशरीफ़ रखिये, मैं अभी तैयार होकर आती हूँ।”

“ठीक है ज्यादा देर न करना।”
 
वह कमरे से बाहर निकल रही थी, इसलिए मैं वहां से खिसक गया। आगे जाकर मैं एक दरवाजे की आड़ में खडा हो गया। जैसे ही वह पास से गुजरी मैं उसका नाम लेकर फुसफुसाया।

वह ख़ामोशी के साथ उसी कमरे में आ गई।

“तुम यहीं हो तांत्रिक।” उसने कहा।

“हां...और तुम इसकी बात मान लो।”

“तो क्या मैं चली जाऊं।”

“बिल्कुल...मुझे उसकी वर्तमान स्थिति जाननी है।”

“जैसा आप का हुक्म।”

थोड़ी देर बाद वह उसी कमरे में लौट गई और दस मिनट के भीतर ही वह उस जगह से रवाना हो गई। उसके जाते ही मैंने खोपड़ी निकाल कर मन्त्रों का जाप किया। एक चमकता शोला नाचता हुआ आया और उसने लौह पुरुष अगिया बेताल का रूप धारण कर लिया।

“बेताल।”

“हुक्म दो आका।”

“चन्द्रावती ठाकुर भानुप्रताप की गढ़ी में जा रही है... तुम उसका पीछा करो और मुझे खबर दो कि वहां क्या हो रहा है। ठाकुर ने किस इरादे से बुलाया है।”

“जो हुक्म आका।”

बेताल चला गया और मैं निश्चिंत होकर बैठ गया। लगभग एक घंटे बाद अचानक मैंने दीवार के सामने अलाव जलता देखा। आग के भीतर धीरे-धीरे गढ़ी का दृश्य आता जा रहा था। मैं समझ गया कि बेताल का करिश्मा है।

चन्द्रावती एक गुप्त मार्ग से गढ़ी के भीतर ले जाई जा रही थी... यह एक सुरंग का रास्ता था और उसी खण्डहर से आरम्भ होता था, जिसमें मैं एक बार फंसकर रह गया था। चन्द्रावती की आँखों पर पट्टी बंधी थी।

फिर एक खण्डहर जैसे कमरे में उसकी पट्टियाँ खोल दी गई। सामने एक खौफनाक शक्ल का दैत्याकार व्यक्ति खड़ा था और उसके हाथ में एक कोड़ा था... वह कमर तक नंगा था... वह व्यक्ति जल्लाद नजर आता था।

मार्ग बंद हो गया। उस पर एक बन्दूक धारी खड़ा था।

उसी समय एक आदमकद दरवाजे से चमकीले लिबास पहने लम्बी मूंछों वाला व्यक्ति भीतर आया। उसके गले में मोतियों की माला थी और हाथों की उँगलियाँ अंगूठियों में छिपी थी।उसका व्यक्तित्व किसी राजा-महाराजा से कम नहीं था।

उसके कानों में सोने के छोटे-छोटे कुंडल पड़े थे।

आग पर वह दृश्य किसी चलचित्र की तरह नजर आ रहा था। मैं उसे देख-देख कर आनंदित हो रहा था।

उसके होठ हिल रहे थे। जान पड़ता वह कुछ कह रहा था। पर उसकी आवाज मुझ तक नहीं पहुच रही थी। मैं चुपचाप दृश्य देखता रहा।

चन्द्रावती भी कुछ कह रही थी।

अचानक कोड़े वाला व्यक्ति हिला और अपने भारी कदम उठाता हुआ चन्द्रावती के पास पहुंचा, उसके बाद चन्द्रावती के जिस्म पर कोड़े बरसाने लगा ... चन्द्रावती दो ही कोड़ो में जमीं पर गिर पड़ी। मेरा लहू उबल पड़ा।

वह जल्लाद बड़ी बेरहमी से कोड़े बरसा रहा था।
 
Kapil 77 wrote: ↑ 28 May 2020 09:53
डाली शर्मा जी आपकी स्टोरी बहुत अच्छी है इसमें कोई शक नहीं स्टोरी में थोड़ा सा सेक्स बी डालिए डाली शर्मा जी वह भी पढ़ने में मजा आता है सर स्टोरी पढ़ने में आपका दोस्त//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg
 
चन्द्रावती की वह दशा मुझसे असहनीय हो गई। अंत में उस शाही व्यक्ति ने चंद्रावती के बाल पकड़ कर उसके चेहरे पर तमाचे मारे।

“बेताल.... अगिया बेताल....।”

मैंने मन्त्रों का उच्चारण करके बेताल को पुकारा। आग का दायरा सिमट कर इंसानी रूप में बदल गया। बेताल सामने खड़ा था।

“चन्द्रावती पर यह जुल्म क्यों हो रहा है?” मैंने पूछा।

“यह आपके बारे में पूछताछ कर रहा है।”

“क्यों...?”

“उसे सन्देह हो गया है कि आपने भैरव तांत्रिक का जादू काट दिया है, जिसे अगिया बेताल ही काट सकता है।”

“चन्द्रावती ने क्या कहा ?”

“वह अधिक पीड़ा सहन नहीं कर सकती है।”

“तो उसने बता दिया है।”

“हाँ आका... उसने ठाकुर भानुप्रताप को कहा कि अब उसकी तबाही सर पर आ गई है, उसने फौरन भैरव तांत्रिक के लिए सन्देश भिजवा दिया है, शायद वह कल तक पहुँच जायेगा आका। अगर भैरव ने उस औरत पर जादू चला दिया तो आप मुसीबत में फंस जायेंगे, क्योंकि वह आपके सब राज जानती है और आपकी एकमात्र सहायक रही है।”

“तब तो हमें उसे छुड़ा ना पड़ेगा। क्या भैरव तांत्रिक तुम्हें परास्त कर सकता है ?”

“उसके पास दूसरी शक्तियां है। वह मेरा रास्ता रोक सकता है।दरअसल बेताल ऐसी किसी शक्ति के वश में नहीं आता जो पहले उसके दुश्मनों को गुलाम बना चुका होता है। अधिकांश लोग बेताल को सिद्ध नहीं करते, क्योंकि उसके बाद तांत्रिक दूसरी शक्ति प्राप्त करने योग्य नहीं रहता और वे दोनों एक दूसरे के गुलाम रहते है।”

“तो इसका कोई उपाय सुझाओ।”

“उपाय है।”

“भैरव के आने से पहले चन्द्रावती को उस कैद से मुक्त करा लिया जाये और किसी ऐसी जगह पलायन कर लिया जाये जिसके बारे में उनको पता न हो...।”

“ऐसी कौन-सी जगह है, जो सुरक्षित रहेगी...।”

“मैं आपको एक जंगली गुफा में ले चलूँगा...आपको सारी सुविधा वहां मिल जाएगी। इस गुफा के आस-पास बेतालों के कई ठिकाने है। एक प्रकार से वह मेरी ससुराल है और वे लोग बड़े शक्ति संपन्न है... उसके राज्य में बड़े से बड़ा जादू नहीं चल पाता।”

“ऐसा क्यों...?”

“हम लोग—जिन्न बेताल या भूत-प्रेत आपस में कुछ शर्तों पर समझौता कर लिया करते है... जैसे आप लोगों की दुनिया में देश की सीमा बाँध दी जाती है और उसे पार करना गैर-कानूनी होता है, उसी तरह हम लोगों की दुनिया है। फर्क सिर्फ इस बात का है कि हमारी दुनिया अदृश्य है और आपकी दुनिया दृश्य वान। हम लोग आपकी दुनिया में दखल नहीं देते, जब तक कोई इंसानी शक्ति प्रेरित न करे... परन्तु हम कभी-कभी नाराजगी अवश्य प्रकट कर देते है, फिर भी भारी नुक्सान नहीं पहुंचाते...

मुझे अभी यह नहीं मालूम कि भैरव तांत्रिक के पास कौन-कौन से शस्त्र है, और जब तक यह पता नहीं चलता सुरक्षा जरूरी है।”

“ठीक है... पर चन्द्रावती को कैसे छुड़ाया जाए ?”

“अभी तो बहुत सरल है। आप वहां चलिए... मैं आपके साथ हूँ।”

“मैं तैयारी करता हूँ।”

“तो मैं आपके लिए सवारी की व्यवस्था करूँ...बाहर आपको मेरी सवारी मिल जायेगी।”
 
कुछ देर बाद ही जब मैं बाहर पहुंचा तो वहां एक काला घोडा तैयार खडा था। वह काफी मुस्तैदी के साथ खड़ा था। उसकी पीठ पर एक सुनहरी जीन लगी थी। मैंने उसकी पीठ थपथपाई और उस पर सवार हो गया। घोडा मेरा इशारा पाते ही अपने पथ पर बढ़ गया। वह बड़ी तेज़ गति से भाग रहा था...और उसके लिए मार्ग समझाने की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही थी।

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एक घंटे के भीतर-भीतर घोडा खंडहरों के पास पहुँच गया। मैंने उसे एक वृक्ष के नीचे छोड़ दिया। उसी समय मैंने बेताल को याद किया।

“चलते रहिये... मैं साथ-साथ हूँ।” बेताल का संकेत मिला।

मैं खण्डहर की ओर बढ़ गया।

खण्डहर से खुलने वाली गुप्त सुरंग का रास्ता बेताल खोलता गया। सुरंग खाली थी। उसमें गहरा अन्धकार छाया हुआ था।

सुरंग के किनारे सीढियों का रास्ता था। यह सीढियां और सुरंग की दीवारें सीलन से भरी हुई थी।

सीढियाँ पार करके जंग लगी लोहे की जंजीर खिंच गई। सामने का रास्ता खुलते ही मैं गलियारे में आ गया।

गलियारे में मशाल जल रही थी।

जैसे ही मैंने वहां कदम रखा सामने चौकसी पर बैठा एक व्यक्ति चौंक पड़ा। दूसरे ही पल वह अपनी बन्दूक संभाल कर खड़ा हुआ। परन्तु उसकी बन्दूक एक पल बाद ही उसके हाथ से निकल कर हवा में तैर गई। वह बौखला कर उपर की तरफ देखने लगा। सहसा बन्दूक का कुन्दा उसके सर पर जा टकराया। वह एक ही हमले में जमीन पर आ गिरा उसके बाद उठ ना सका।

मैंने आगे बढ़कर दरवाजे को खोला जिस पर बन्दूकधारी तैनात था।

अब मैं उस कैदखाने में दाखिल हुआ, जिसमें चन्द्रावती को बांधकर डाला हुआ था। वहां कोई रक्षक नहीं था। शायद चन्द्रावती के कैद से भाग निकलने की कल्पना भी ठाकुर नहीं कर सकता था। अज्ञात बेताल हर ओर से मेरी हिफजात करने में तल्लीन था।

मैंने चंद्रावती को खोला, वह बेहोश पड़ी थी, मैंने उसे उसी स्तिथि में उठा लिया और बाहर की तरफ निकल पड़ा। मार्ग में कोई बाधा नहीं आई, बड़ी सरलता से खण्डहर के बाहर निकल गया।गढ़ी में उस वक़्त भी सन्नाटा छाया हुआ था। किसी को भी खबर नहीं थी कि गढ़ी में क्या हो रहा है।

मैंने चन्द्रावती को घोड़े पर लिटाया और फिर स्वयं सवार हो गया।

मैंने बेताल को फिर याद किया।

“आप चिंता न करें... घोड़ा आपको सुरक्षित मुकाम पर ले जायेगा। हमें जल्दी से जल्दी ठाकुर की सरहद से बाहर निकल जाना चाहिए।”

“ठीक है।”

इतना कह कर मैंने घोडा फिर दौड़ा दिया, मेरे लिए अब कोई बात आश्चर्यजनक नहीं थी, यह भी नहीं की घोडा अपने आप सही मुकाम की ओर कैसे बढ़ रहा है।

उस वक्त मुझे अपने भविष्य की कोई चिंता नहीं थी। मैं अपने भीतर एक खूंखार व्यक्तित्व छिपाए बढ़ रहा था। चलते-चलते सुबह की लालिमा फूट पड़ी और एक भयानक जंगल का रास्ता शुरू हो गया।यह जंगल काफी लम्बा और खतरनाक जानवरों से भरा-पूरा लगता था। किसी मनुष्य के इस ओर आने की कल्पना नहीं की जा सकती थी।

कई बार शेर चीतों के दर्शन हुए। हमें देखते ही वे रास्ता छोड़ देते थे। किसी ने भी घोड़े पर हमला करने का प्रयास नहीं किया। शायद इसलिए कि जानवर छिपी हुई शक्तियों को भी देख लेते है।

आखिर दोपहर ढलते ही घोडा एक गुफा में जा कर रुक गया मैंने गुफा में प्रवेश किया। यह गुफा ऐसी लगती थी जैसे यहाँ पहले भी लोग आते-जाते या ठहरते रहें है। इसकी दीवारें तराशे गए पत्थरों से बनी थी। इससे पता लगता था की इसे इन्सानों ने बनाया है, यह जानवरों की प्राकृतिक गुफा नहीं है।

मैंने चन्द्रावती को एक स्थान पर लिटा दिया।

मैंने बेताल को पुकारा।

बेताल गुफा में ही उपस्थित था।

“यहाँ रहने या खाने पीने का सामान नहीं है।”

“वह अभी आ जाता है आका।”

कुछ देर बाद वहां सभी उपयोगी सामान आ गया। हमारे घर का सारा सामान वहाँ आ रहा था। बेताल ने अपना वचन पूरा किया।

थोड़ी देर बाद चन्द्रावती को भी होश आ गया।
 
“क्या खबर लाये हो बेताल ?”

“ठाकुर की गढ़ी में पहुंचना मेरे लिए अब संभव नहीं। वहां के हालत मुझसे समझौता नहीं कर सकते।”

“उसकी वजह बेताल।”

“भैरव के बाईस दैत्य वहां मौजूद है जब तक ये दैत्य भगाए नहीं जाते, तब तक वहां मेरा साया नहीं पड़ सकता, उन्होंने गढ़ी को अपनी सरहद में बाँध रखा है।”

“तो यह काम कैसे होगा ?”

“उसकी एक तरकीब है, गढ़ी की चार दिशाओं में भैरव ने चार हांडियां गाड़ रखी है इनमें उसका टोटका बंद है – जब तक वे हांडियां बाहर नहीं निकल आती और उन्हें किसी दूसरी जगह नहीं पहुंचाया जाता तब तक कुछ नहीं हो सकता। मैं बाईस जिन्नों का एक साथ मुकाबला नहीं कर सकता।”

“लेकिन यह काम कैसे होगा... क्या तुम्हे मालूम है की वे हंडियां कहाँ गड़ी हैं।”

“नहीं – यह मुझे पता नहीं... इसके लिए हमें ठाकुर के किसी विश्वास पात्र आदमी को तोड़ना होगा। मेरे ख्याल से शमशेर सिंह उसका सबसे वफादार साथी है और उस पर तभी अधिकार जमाया जा सकता है जब वह गढ़ी से बाहर रहे। इसके लिए गढ़ी में कोई जासूस भेजना उपयुक्त होगा ताकि वह शमशेर का अता-पता रखे।”

“यह काम कौन करेगा ?”

“गढ़ी का मेहतर कर सकता है वह कस्बे में रहता है... आपको उससे मिलना होगा, उसे आतंकित करना होगा... उसका एक बेहतरीन तरीका है... मेहतर की बीवी गर्भवती है... मैं उसके पेट में घुस जाता हूँ... और उसे आतंकित करता हूँ... ठीक वक़्त पर आप उसके घर पर पहुँच जाइये। वह अपनी बीवी की जान बचाने के लिये समझौता कर लेगा... अब आप जा कर बेताल वाली खोपड़ी उसके घर के आँगन में गाड़ आइये... तो मैं वहां किसी के भी भीतर समा जाउंगा...।”

“ठीक है...मैं तैयार हूँ।”

तंत्र विद्या में मैं अनाड़ी था, पर धीरे-धीरे सीख रहा था। मैं तुरंत चल पड़ा और अगली रात कस्बा सूरजगढ़ पहुंचा। बेताल ने मुझे बता दिया था कि मुझे सावधान रहना होगा क्योंकि गढ़ी के गुण्डे मुझे तलाश करते फिर रहें है।

“उस मेहतर का क्या नाम है ?”

“कल्लू मेहतर... वह मेहतरों की बस्ती में सबसे नुक्कड़ वाले मकान में रहता है। कभी-कभी उसकी सुंदर औरत भी काम पर जाती है।” वहां जा कर मैंने बेताल से मालूम किया।

आधी रात के वक़्त किसी खौफनाक औघड़ बाबा की तरह मैं उस मेहतर के प्रांगण में सांस ले रहा था।

अचानक एक कमरे में से किसी औरत के बोलने की आवाज़ सुनाई दी ............... नही न कल्लू ये नही करूँगी |

मैं चौंका........ये आवाज़ तो कल्लू की पत्नी की लगती है, उत्सुकतावश मैने कमरे के दरवाजे से कान लगा दिए तभी दूसरी आवाज़ ने मुझे रुकने पर विवश कर दिया...........

अरे मुँह में नही लोगी तो सुखा ही घुसाऊँ फिर ? ये आवाज़ कल्लू मेहतर की ही थी और अब मै लगभग सारा माजरा समझ चुका था | मैंने सोचा की अगर दरवाजा खोला तो ये दोनों सतर्क हो जाएँगे और मेरे हाथ कुछ भी नही लगेगा | मैंने देखा की पुराना होने के कारण दरवाजे में कई ज़गह दरारें और छोटे छोटे सुराख थे |

मैंने जल्दी से एक सुराख पर अपनी आँख लगा दी | अंदर का माजरा देख कर मेरे होश उड़ गए | कल्लू की पत्नी केवल ब्रा और पैंटी में एक चद्दर पर लेटी हुई थी और उसने अपने एक हाथ में कल्लू मेहतर का लण्ड पकड़ रक्खा था | कल्लू मेहतर पूरा नंगा था और उसका एक हाथ अपनी पत्नी की

चुचीयों पर था और दुसरा हाथ पैंटी के उपर से ही उसकी चूत को सहला रहा था |

तभी कल्लू की पत्नी बोली ..... सुखा क्यों मैंने कहा था न की वैसलीन ले आना बाजार से |
 
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