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Horror अगिया बेताल

“तुम तो डॉक्टर हो, इतना अधिक निराश होने से बात नहीं बनेगी... आजकल तो आँखें कोई बड़ी समस्या नहीं। इंसान यदि जन्मजात अँधा न हो तो उसे नेत्र ज्योति दी जा सकती है। कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है कि लम्बी बेहोशी या बीमारी में कोई अंग काम करना बंद कर देता है पर वह अस्थाई होता है, परन्तु इलाज़ करने से हल निकल आता है। इस बारे में तुम तो मुझसे अधिक जानते होगे। मैं तो इतना जानता हूँ इसी प्रकार एक बार मेरा दायाँ हाथ बेकार हो गया था पर दो महीने बाद ठीक हो गया। हौसला छोड़ने से काम नहीं बनता।”

वह मुझे सान्त्वना देता रहा।

कुछ समय बाद उत्तेजना कम हुई और बुद्धि काबू में आई।

“हम आज ही सूरज गढ़ के लिए रवाना हो जाते है।”

“तुम मेरे साथ क्यों कष्ट कर रहे हो ?”

“यह कष्ट नहीं कर्त्तव्य है। आज की दुनिया में तो इश्वर भी इतना व्यस्त हो गया है कि वह अपने बन्दों को कर्त्तव्य निभाने का अवसर ही नहीं देता और जब देता है तो इंसान कर्त्तव्य भूल कर अपने स्वार्थ में डूबा रहता है या उसे अपने ही कामों से फुर्सत नहीं मिलती और वह नरक का भोगी बन जाता है। क्या जाने यह मेरी परीक्षा ही हो... क्या जाने तुम्हारे स्वर्गीय पिता की आत्मा ने मुझे तुम्हारी सहायता के लिए प्रेरित किया हो।”

“तुम बहुत अच्छे विचारों के आदमी मालूम पड़ते हो, काश कि मैं तुम्हें देख सकता।”

“देखने में मेरे पास कोई ख़ास बात नहीं। न मैं बांका छबीला नौजवान हूँ और न बड़ी दाढ़ी और लम्बी बाल वाला धर्मात्मा... मैं तो चेहरे से खूसट नजर आने वाला व्यक्ति हूँ... जिसके चेहरे पर दाढ़ी की जगह झाड़ी के सूखे तिनके है... और भद्दी मूंछे.... गाल पर बारूद से जल जाने के कारण धब्बा है और आँखे किसी क्रूर फौजी जनरल जैसी... शरीर पर खाकी पोशाक है... हाथ में बन्दूक... मेरा हुलिया एक डकैत से भी बदतर है... हाँ शारीर मजबूत अवश्य है, इसलिए जंगली जानवरों से नहीं डरता।”

“काफी दिलचस्प आदमी लगते हो।”

“हद से अधिक जानवर भी यही सोचते है, इसलिए पास भी नहीं फटकते... अच्छा तुम थोड़ी देर आराम करो, इतने मे मैं तैयारी करता हूँ।

मेरी पीठ के नीचे रबर के तकिये रख कर वह कहीं चला गया।

शाम को हमने यात्रा शुरू की और अगले दिन सूरजगढ़ पहुँच गए। मेरे बताये पते के अनुसार वह कस्बे में गया। इस बीच उसने मुझे कस्बे से बाहर ही छोड़े रखा।

जब वह लौटा तो बोला – “तुमने सच कहा। वह मकान जल कर राख हो गया है। कोई आदमी कुछ बताता ही नहीं। क्या सूरज गढ़ी के ठाकुर का इतना दबदबा है ?”

“मैं पहले ही कह चुका था।”

“न जाने तुम्हारी सौतेली मां का क्या हुआ... खैर... विक्रमगंज चलते है।वहीं थाना पड़ता है... वहाँ एक हाकिम से मेरी जान पहचान है। मैं नहीं चाहता की तुम्हें पुनः कोई चोट पहुंचे और रहा मेरा सवाल... तो मैं तब तक शिकार पर हाथ नहीं डालता जब तक उसकी ताकत का पूरा-पूरा हिसाब-किताब न लगा लूँ... मैं तो फौजी उसूलों पर चलता हूँ... वार सही जगह होनी चाहिये... फिर बड़े से बड़ा महारथी धराशाई हो जाता है।”

हम लोग विक्रमगंज की ओर चल पड़े। उसके पास अपनी जीप थी, जिसमे सभी जरूरी सामान हर समय रहता था। मेरे शरीर में हल्की-हल्की पीड़ा उस वक़्त भी थी।

हमने विक्रमगंज के थाने में रिपोर्ट लिखवाई। वे लोग गढ़ी वालों के खिलाफ कोई रिपोर्ट लिखने के लिए तैयार नहीं थे। परन्तु मेरे उस दोस्त ने फौजी रुआब दिखाया तो वे मान गए।

“अब मैं अपने उस हाकिम दोस्त से मिलूँगा –अरे हाँ... तुम यहीं तो रहते हो... मैं चाहता हूँ अब तुम आराम करो... यह दौड़धूप मैं कर लूंगा।

मैंने अपना पता बता दिया।

उस वक़्त मैं दो कमरों के एक सरकारी मकान में अकेला रहता था। अभी मैं यहाँ नया-नया आया था... नौकर नहीं रखा था... वहां मुझे बहुत कम लोग जानते थे। इन दिनों मैं पंद्रह रोज की छुट्टी पर था।

***
 
एक महीना बीत गया। मेरे कष्टप्रद दिनों का एक माह... यह तीस दिन तीस साल से भी अधिक भयानक थे। इस बीच मैंने अपनी आँखों की रौशनी पाने के लिए हर चंद दौडधूप की थी। पर कोई नतीजा नहीं निकला। जिस नेत्र विशेषज्ञ ने देखा , मेरी आँखों को सामान्य बताया और जब नेत्र सामान्य थे तो अंधेरा कैसा... मेरे केस को देखकर बड़े-बड़े डॉक्टर अचंभित हो गये थे।

इस बारे में मैंने चाचा जी को कोई खबर नहीं दी थी। मेरे साथ अर्जुन ने काफी दौड़धूप की थी, पर वह निराशावादी नहीं था।

एक दिन मैंने उससे कहा –

“अब तुम क्यों मेरे साथ समय नष्ट कर रहे हो... मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो अर्जुन।”

“मैंने आज तक हार नहीं मानी... और अब भी नहीं मानूंगा... मैं जानता हूँ इश्वर इतना बेरहम नहीं है... एक दिन तुम्हारी आँखों में रौशनी लौट आएगी।”

“हां सो तो है... फिर भी मैं अपना पता छोड़े जा रहा हूँ... तुम कहीं न जाना दोस्त और कोई मुसीबत हो तो किसी से पत्र लिखवाकर डाल देना... हालाँकि मैं घुमक्कड़ हूँ फिर भी जो पता छोड़ रहा हूँ , वहां से तुरंत मुझ तक खबर पहुँच जायेगी।”

अर्जुनदेव चला गया। मेरे लिए तो वह अब तक भी अजनबी था। वह मेरे उस वक़्त का मित्र था, जब मेरे नेत्रों की ज्योति छिन गई थी। मुसीबत के दिनों का साथी भुलाए नहीं भूलता। अर्जुनदेव तो एक अच्छा दोस्त था। वह मेरी डायरी में अपना पता अंकित कर गया था।

अर्जुनदेव के जाने के बाद तीन दिन बीते थे, कि एक पुलिस कांस्टेबल मेरे पास आया।

“आपको थाने बुलाया है।” उसने कहा।

“क्यों ?” मैंने पूछा।

“आपने जो रिपोर्ट दर्ज कराई थी,उस सम्बन्ध में दरोगा जी आपसे बात करना चाहते हैं।”

मैंने उसका हाथ पकड़ा और थाने पहुँच गया। मेरे साथ मेरा स्थानीय दोस्त भी था। मैं जसवीर सिंह नामक थानेदार के सामने जा पहुंचा। उसने मुझे बैठने के लिए कहा।

“मैंने उस केस की जांच पूरी कर ली है।” वह बोला “मैंने तो उसी रोज इशारा किया था कि कोई लाभ न होगा। लेकिन आपने हमारे एस० पी० से संपर्क करके जांच के लिए विवश करवाया और अब जांच पूरी हो गई है।”

“मैं जानना चाहता हूँ”

“इसीलिए बुलाया है। आपकी सौतेली मां चन्द्रावती का पता लग गया है। वह अपने नए मकान में रह रही है। उसके बयानों से आपकी रिपोर्ट झूठी साबित होती है।”

“जी...।”

“जी हाँ... चन्द्रावती का बयान है की आग उसकी गलती से लग गयी थी। हवा के कारण लालटेन कपड़ों के ढेर पर गिर गई थी और जब उसकी आँख खुली तो आग बेकाबू हो चुकी थी। किसी तरह वह अपनी जान बचा कर बाहर निकलने में सफल हो सकी। उसका कथन है कि उस रात तुम घर मे मौजूद नहीं थे।”

कुछ पल रुक कर वह बोला –

“और घर जल जाने के कारण वह अपने किसी रिश्तेदार के पास चली गई थी। कस्बे में उसका कहीं ठिकाना नहीं था। कुछ दिन बाद वह लौट आई और नए मकान में रहने लगी।

“तुम्हारी रिपोर्ट में जो बातें दर्ज है वह उस रात की घटना से कोई तालमेल नहीं रखती, ऐसा लगता है तुमने वह रिपोर्ट ठाकुर से व्यक्तिगत रंजिश के कारण लिखवाई है”

“ऐसा नहीं है... हरगिज नहीं।” मैंने मुट्ठियाँ भींचकर कहा।

“उत्तेजित होने की आवश्यकता नहीं।”

“इंस्पेक्टर साहब ! आप मेरी आँखे देख रहें है – इन आँखों ने उस रात के बाद कोई दृश्य नहीं देखा। इन आँखों में आग का वह दृश्य आज भी मौजूद है, ये आँखें उस रात की घटना की साक्षी है।”

“मुझे तुमसे सहानुभूति है। कोई दूसरा होता तो मैं झूठी रिपोर्ट दर्ज कराने के आरोप में उसे गिरफ्तार कर लेता।”

“मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता, उसने ऐसा बयान क्यों दिया ?”

“मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता। मैंने अपनी छानबीन पूरी कर ली – तुम्हें यही सूचित करना था। अब तुम जा सकते हो।”

मेरे पास चारा भी क्या था, लेकिन मैं थाने से निकलते वक़्त बहुत उत्तेजित था। मेरा सर घूम रहा था और टांगे कांप रही थी। अगर मेरा दोस्त मुझे सहारा न दिया होता तो मैं लड़खड़ा कर गिर पड़ता। धीरे-धीरे लाठी का सहारा ले कर मैं गेट तक पहुंचा तभी जीप रुकने की आवाज सुनाई दी। जीप थाने से निकल रही थी, वह पीछे से आई थी।

“सुनो।” उसी थानेदार का स्वर सुनाई पड़ा।

मैं ठिठक कर रुक गया, शायद मुझे ही पुकारा हो।
 
उसने मुझे ही पुकारा था।

“तुम्हें एक नेक सलाह देना चाहूँगा।” वह बोला – “गढ़ी वालों से उलझ कर किसी ने सफलता प्राप्त नहीं की बल्कि खुद को मिटा दिया। मुझे पूरा विश्वास है की बात तुम्हारी समझ में आ गई होगी।”

जीप आगे बढ़ गई।

उसकी बातें नश्तर की तरह सीने में उतर गई। सूरजगढ़ी... गढ़ी का ठाकुर... उसने मेरी दुनिया बर्बाद कर दी है... और चन्द्रावती... उसने भी साथ नहीं दिया – क्या उसे मालूम नहीं की मैं अन्धा हो गया हूं। अवश्य मालूम होगा – तो उसने ऐसा बयान क्यों दिया....।”

“क्यों..?”

इस क्यों का जवाब मुझे नहीं मिल पा रहा था।

और ठाकुर प्रताप जिसकी मैंने शक्ल भी नहीं देखी, क्या वह इतनी बड़ी ताकत है कि जिसकी चाहे जिंदगी उजाड़ दे।

मेरे सीने में बगावत थी।

मैं इसका बदला लूंगा।

बदला...।

प्रतिशोध की आग सीने में धधकती जा रही थी।

अगर मुझे अपनी जान भी देनी पड़ी तो भी मैं उसे सबक पढ़ाऊँगा... मेरी जिंदगी की अब तो कोई कीमत रही ही नहीं है।

अनेक आशंकाओं के बादल दिमाग में घुमड़ रहे थे



आज फिर वैसा ही पानी बरस रहा है... वैसी ही तूफानी रात लगती है। मेरे लिए तो सारा संसार अँधेरे की दीवार है... पर आज तो अवश्य रात और भी भयानक काली होगी।

एक सवार आगे बढ़ रहा है।

वह सवार मैं ही तो हूं।

घोड़े की लगाम आज शम्भू ने थामी है... वह अच्छी काठी भी चला लेता है। मैंने उसे चिट्ठी डालकर गाँव से बुलाया है - क्योंकि वह मेरे भरोसे का आदमी है।

मुझे याद आया दो रोज पहले शम्भू मेरी हालत देख कर कितना रोया था, वह मेरे पिता का खैरख्वाह भी रह चुका था और मुझे साहब बहादुर कहता था।

वह मेरे लिए प्राणों की आहुति दे सकता था।

शम्भू मेरे हुक्म का पालन कर रहा था। बरसात तो इस क्षेत्र में अक्सर होती थी और आये दिन घटायें छाई रहती थी।

इस रात भी मूसलाधार पानी बरस रहा था।

और मैं दृढ संकल्प लिए आगे बढ़ रहा था।

बड़ी खामोशी से यात्रा जारी थी। कभी-कभी मैं उससे पूछ लेता की हम कहाँ तक आ पहुंचे हैं, तो वह संक्षिप्त सा जवाब दे देता।

मेरी यह यात्रा अत्यंत गोपनीय थी इसलिए रात का सफ़र तय किया था। जबकि मेरी समझ में अभी तक यह बात नहीं आई थी की मैं वहां जा कर क्या करूँगा।

बस इतनी ही बात तय समझी थी की मैं सर्वप्रथम चन्द्रावती से मिलूंगा जो मेरी नामचारे की मां है। मुझे उससे विश्वासघात का कारण पूछना था।

काफी देर बाद मैंने उससे पूछा।

“अब कितनी दूर है शम्भू ?”
 
“बस साहब बहादुर पहुँचने ही वाले हैं... शमशान के पास आ गये है। नदी का शोर नहीं सुनाई देता क्या ?”

“सुनाई पड़ा था, इसलिए पूछा है। क्यों शंभू उस रात वाली बात याद है ?”

“किस रात की साहब बहादुर...?”

अरे जिस रात हम पिछली बार इस रास्ते से आये थे।”

“याद है साहब बहादुर।”

“उस रात हमने शमशान घाट पर कुछ अजीब आग देखी थी।”

“हां साहब बहादुर... अगिया बेताल।”

“क्या वह फिर कभी भी दिखाई दी ?”

“साहब बहादुर... आप तो उन बातों को मजाक समझते है न...।”

“मैं अदृश्य शक्तियों पर विश्वास नहीं करता।”

“साहब बहादुर...।” अचानक शम्भू का कम्पित स्वर सुनाई दिया और घोडा रुक गया।

“क्या बात है शम्भू – घोडा क्यों रोक दिया ?”

“वह इधर ही आ रहा है...।”

“कौन ?”

“ब... बेताल...”

“क्या बक रहा है ?”

“आज भी वैसा ही हो रहा है साहब बहादुर... हे भगवान्.... वह हवा में तैरता हमारी तरफ आ रहा है...।” शम्भू की आवाज़ घर्रा गई – “साहब बहादुर... आप जरा...।”

अचानक सूं... सां... जैसी तेज़ ध्वनि गूंजी। शम्भू ने कुछ कहा था पर उसकी आवाज़ उस ध्वनि में डूबकर रह गई और मुझे कुछ सुनाई नहीं पड़ा कि उसने क्या कहा था।

उसी क्षण घोडा हिनहिनाया और फिर भूचाल की तरह दौड़ पड़ा।

“साहब ब...ब...हा...दु..र.......।” शम्भू की चीत्कार दूर होती चली गई।

अगर मैं तुरंत संभलकर घोड़े की पीठ से चिपक न गया होता तो न जाने किस खड्डे में जा गिरता। मैंने उसकी गर्दन के बाल बड़ी मजबूती के साथ पकड़ लिए थे। वह पागलों के सामान भड़ककर भाग रहा था।

मेरे लिए यह दौड़ अंधे कुएं जैसी थी और भय मुझ पर छाया हुआ था।

अचानक वह जोर से उछला और मेरा संतुलन बिगड़ गया और फिर मैं जमीन पर लुढ़कता चला गया। शरीर के कई अंग रगड़ खाते चले गये।

आँखों में कीचड़ धंस गई और नाक मुँह का बुरा हाल था। हांथों में मिटटी आ गई, जो गीली होने के कारण दलदली मिटटी का रूप धारण कर चुकी थी।

तेज फुहार और हवा की सांय-सांय के बीच मुझे अपना दम घुटता हुआ प्रतीत हुआ। घुटने और कोहनियाँ छिल गई थी।

कुछ देर के लिए मस्तिष्क सुन्न पड़ा रहा। शरीर में चीटियां सी रेंगती प्रतीत हो रही थी। फिर कुछ मिनट तक मैं उसी स्थिति में पड़ा रहा। उसके बाद उठने का प्रयास किया।
 
उठते ही जो पाँव फिसला और इस बार जो गिरा तो महसूस किया कि मैं पानी के गार में हूँ। वह काफी गहरा था, पाँव नीचे नहीं टिक रहे थे। मैं हाथ पाँव मारने लगा। किसी तरह किनारा हाथ आया, परन्तु वहां दलदल थी और मेरे पाँव उसमे धंसे जा रहे थे।

एक बार फिर मौत मेरी आँखों के सामने नाचने लगी संयोगवश मेरे हाथ में किसी वृक्ष का तना आ गया। उसे थाम कर मैंने पूरी शक्ति के साथ दलदल से बाहर निकलने का संघर्ष जारी कर दिया।

किस्मत अच्छी थी, जो अंधे के हाथ बटेर आ गई। मैं सिर्फ अपने जूते खोकर बाहर निकल आया और तूफ़ान का मुकाबला करता हाथ फैलाये पगों से जमीन टटोलने लगा।

मुझे यह नहीं मालूम था कि मैं किस दिशा में जा रहा हूँ और आगे का रास्ता मेरे लिए ठीक भी है या नहीं। मैं तो केवल ऐसा स्थान तलाश करने के लिए आगे बढ़ रहा था, जहाँ राहत की सांस ले सकूँ।

आखिर मेरे हाथ किसी कटीले तार से टकराये। मैंने उसे टटोल कर देखा –शीघ्र ही मेरी समझ में आ गया की ऐसे तार सरहद बाँधने के लिए खींचे जाते है। मैंने अपनी याददाश्त पर जोर दिया। यहाँ कौन सी ऐसी जगह है जहाँ तार खिचे होने चाहिए और घोडा मुझे कितनी दूर तक ले गया होगा।

यह बात शीघ्र मष्तिष्क में आ गई की मैं अधिक दूर नहीं जा पाया था। उसकी पीठ पर मैंने कुछ ही मिनट बिताये होंगे इसका मतलब मैं शमशान घाट के आस पास था।

और शमशान के पास तो एक ही घर है, जिसकी सरहद पर तारें खिंची है। यह तो स्वयं हमारा नया मकान होना चाहिए।

तो क्या मैं अनजाने में अपनी मंजिल तक पंहुच गया था, इसकी पुष्टि के लिए मैं तार के सहारे आगे बढ़ा। कुछ मिनट बाद ही मेरे हाथ लकड़ी के फाटक से टकराए, जो टूटा फूटा था।

अब मुझे विश्वास हो गया था कि मैं मंजिल पर पहुँच गया हूँ।

मैंने देर नहीं की और फाटक के भीतर समा गया। तूफ़ान अब भी जोरों पर था , हवा चीत्कार कर रही थी और नदी की उफनती धारा का स्वर स्पष्ट कानों में पड़ रहा था।

बुद्धि सजग थी।

दोनों हाथ फैलाए आगे बढ़ता रहा। अंत में दीवार छू गई, फिर मुख्य द्वार तक पहुँचने में अधिक देर नहीं लगी।

द्वार बंद था।

मैंने उसकी सांकल जोर-जोर से बजानी शुरू कर दी। और तब तक बजाता रहा जब तक भीतर की आवाज सुनाई नहीं पड़ी।

“कौन...कौन है ?”

आवाज मेरे कानों में धीमी पड़ी थी। मैंने महसूस किया की वह स्त्री की आवाज थी। एक बार फिर आवाज उभरी।

“मैं रोहताश...।” मैंने यथा शक्ति चीखकर कहा। मुझे डर था, कहीं हवा की सांय-सांय और वर्षा की तड़फती बूंदों में मेरी आवाज दब कर ना रह जाये।

कुछ पल बीते।

फिर दरवाजे की चरमराती ध्वनि सुनाई पड़ी। मुझे अपने चेहरे के पास ताप सा अनुभव हुआ।

“रोहताश...।” स्त्री का धीमा स्वर।

“हाँ... मैं रोहताश हूँ... यह मेरे चेहरे के सामने क्या है।”

“ओह... रोहताश... यह तुम्हारा क्या हुलिया बना है...।”

“कौन हैं आप ?”

मैंने मन की शंका मिटाने के लिए पूछा।

मैं चन्द्रावती हूँ... इस घर की अभागी औरत। अरे... आओ...आओ...भीतर आओ...क्या तुम मुझे पहचान नहीं रहे हो...।”

“मुझे सहारा चाहिये...।”

मैंने हाथ फैलाया।

एक गर्म नाजुक हाथ मेरे हाथ से टकराया और फिर मेरे पाँव बढ़ गए।

“तुम यहां बैठो... मैं दरवाज़ा बंद करके आती हूँ... अकेले ही हो न....।”

“हाँ... फिलहाल तो अकेला ही हूँ।”

वह चली गई।

मैंने इधर-उधर टटोला और एक चारपाई पर हाथ लगते ही मैं उस पर बैठ गया बाहर के तूफ़ान से राहत मिली तो मैं अपने चेहरे का कीचड़ साफ़ करने लगा।

थोड़ी देर बाद पदचाप सुनाई दी।

“यह तुम्हारी क्या हालत बन गई है ?” स्वर में कम्पन था।

मैं नहीं जानता मुझे यह दिन क्यों देखने पड़े हैं।”

“लेकिन तुम तो ऐसे लग रहे हो जैसे दलदल से लड़कर आये हो।”
 
“ओह्ह – वह तो मामूली ठोकर थी... और जब कोई अंधा ठोकर खाता है तो... उसके लिए ऐसी ठोकरें और भी मामूली हो जाती है, क्योंकि उसका सारा जीवन ठोकरों में बीतता है।”

“हे भगवान्... तो यह सच है ?”

“क्या ?”

“यही कि तुम्हारी आँखें।”

“चली गई यही न...।, मैं हंस पड़ा – “लेकिन आपको इससे दुःख क्यों है ?”

“दुःख...।” एक आह सुनाई पड़ी – “खैर छोड़ो ! तुम मुझे नहीं समझ सकते। यह बताओ कि यहाँ तक अकेले कैसे पहुँच गए ?”

“न पहुँचता तो सारा जीवन पश्चाताप में बीतता। यहाँ तो मैं चंद सवालों का जवाब मांगने आया हूँ।”

“क्या वे सवाल अभी पूछोगे ?”

“जितनी जल्दी पूछ लूंगा... उतनी ही राहत महसूस होगी... बहुत बड़ा बोझ है।”

सन्नाटा।

“क्या आप मेरे सवालों का जवाब देंगी ?”

“मैं जानती हूँ तुम क्या पूछना चाहते हो... और मुझे मालूम था तुम एक दिन यहाँ अवश्य आओगे लेकिन रोहताश... यदि मेरा कहना मानो तो सवेरा होते ही वापिस लौट जाना...।”

“कहाँ ?”

““अपनी दुनिया में।”

“कौन सी दुनिया... कैसी दुनिया... अंधे की दुनिया तो सिर्फ अँधेरा होता है और यह हर पल उसके साथ रहता है।” मैं जरा जोर से बोला।

“तुम समझते क्यों नहीं... मैं नहीं चाहती की तुम इस झमेले में पड़ो।”

“यह सोचना मेरा काम है – आपकी सलाह के लिए धन्यवाद ! मैं नहीं जानता था कि आप इतनी कायर हैं। उस दिन तो आपकी बातों से कुछ और ही अंदाजा होता था, पर मैं अब समझ गया हूं वे बातें भावुकता में कही गयी थी और भावुकता में इंसान न जाने क्या-क्या कह जाता है। लेकिन हकीकत एक कड़वा घूँट है।”

“क्या मतलब है तुम्हारा ?”

“मतलब...। मैंने लम्बी सांस खींची और फिर सख्त स्वर में पूछा – “उस रात आग कैसे लगी थी ?”

“यह बात एक पुलिस इंस्पेक्टर भी पूछने आया था।”

“लेकिन वह झूठ है... और आपने वह झूठ बोलकर मेरे अरमानों का खून किया है...आपने मेरे साथ विश्वासघात किया है।”

“विश्वासघात नहीं रक्षा की है।”

कैसी रक्षा... किस बात की रक्षा ?”

“रोहताश ! जरा शांत होकर सोचो... जिसने अपनी आँखों के सामने अपने पति को मरते देखा... और जिसकी दुनिया लुट चुकी हो... जिसके पास अपना कुछ कहने को बाकी न रहा हो...वह विश्वासघाती नहीं हो सकती।”

“तो आपने इतना बड़ा झूठ क्यों बोला ?”

“क्या तुम अभी सब जानकार रहोगे...?”

“हाँ... इसी वक़्त।”

“तो सुनो सच्चाई क्या थी।” एक पल चुप रहने के बाद उसने कहा – “यह तो तुमसे छिपा न होगा कि उस रात मेरा अपहरण कर लिया गया था। तुम्हारे लिए इतना ही जानना काफी है कि उस रात जो कुछ हुआ उसके जिम्मेदार गढ़ी के लोग है। वे तुम्हें जान से ख़त्म कर देना चाहते थे और वह कुत्ता ठाकुर मेरी अस्मत लूटना चाहता था। इसलिए मेरा हरण कर लिया गया और तुम्हें ज़िंदा जलाने के लिए मकान में आग लगा दी गई। मुझ बदनसीब के साथ क्या बीती यह बताते हुए मेरा कलेजा भी काँप उठता है। मैं तो डूब मरती लेकिन मुझे ज़िंदा रहना पड़ा और उस रात जब वे तुम्हे बेहोश हालत में गढ़ी के भीतर लाये तो ठाकुर ने उस काले शैतान तांत्रिक को हुक्म दिया की जादू से तुम्हें मार दे और उसके बाद लाश जंगल में फेंक दी जाती। मैंने ठाकुर का पैर पकड़ लिया और उस जालिम से तुम्हारे प्राणों की भीख मांगी वह तुम्हें इसलिए मार देना चाहता था क्योंकि किसी ने उसे खबर दी थी कि तुमने “अगिया बेताल” सिद्ध किया हुआ है। तुम्हारे पिता भी बेताल सिद्ध करना चाहते थे ताकि तांत्रिक भैरव जो ठाकुर की मदद के लिए आया है उसका जादू काटा जा सके... और जरूरत पड़ने पर भैरव सहित ठाकुर खानदान का विनाश कर सके। तंत्र विद्या के बारे में अधिक कुछ नहीं जानती, सिर्फ विश्वास करती हूँ कि जादू सब कुछ कर सकता है।”
 
भानुप्रताप को संदेह था कि कहीं तुम अपने पिता का बदला न लो और बेताल का प्रयोग उस पर न शुरू कर दो। मैंने गिड़गिड़ा कर उसे बहुतेरा समझाया कि बेताल वाली बात झूठ है। उसे थोड़ा -थोड़ा यकीन हो गया।

और पूरा विश्वास तब हुआ जब भैरव तांत्रिक ने अपने जादू का जोर तुम पर चलाया। उसका कथन था कि तुम्हारे साथ यदि बेताल होगा तो तुम जाग जाओगे अन्यथा तुम्हारी नेत्रों की रौशनी छिन जाएगी।

मैं चीख पड़ी... ऐसा जादू न चलने की विनती की पर ठाकुर ने एक ना सुनी।मैं जानती थी तुम नहीं जागोगे... और ऐसा ही हुआ।

बाद में ठाकुर ने कहा की दुश्मन को ज़िंदा रखना ठीक नहीं.... चाहे वह तांत्रिक विद्या न जानता हो, तो भी खतरनाक है...।

मैं फिर गिड़गिड़ाई। मैंने कहा एक अँधा इंसान किसी का क्या बिगाड़ सकता है। काफी कोशिश के बाद उसने एक शर्त रखी और मैंने मान ली।

उसकी शर्त के अनुसार मुझे उसकी रखैल बने रहना था, तब तक जब तक वह चाहता। जब वह चाहेगा मुझे बुला लेगा और जंगली पशु की तरह रौंदता रहेगा। तुम्हारे प्राणों के सामने यह शर्त मुझे बौनी सी लगी और मैं मान गई।

फिर उसके आदमी तुम्हें किसी जंगल में छोड़ आये। और मैं वही रही। उसने जो चाहा, मेरे साथ किया। उसके बाद एक दिन जब उसे ज्ञात हुआ कि उस काण्ड पर पुलिस उसकी जांच कर रही है। उसने मुझे धमकी दी कि यदि सच्चाई बताई तो वह तुम्हारी जान ले लेगा। मैं उसकी शक्ति देख चुकी थी। मैं जानती थी, उससे टक्कर लेना अपनी जान गवाना है। मुझे भय था कहीं वह सचमुच तुम्हें न मार दे। और इसी कारण इस नए मकान में आ कर मुझे वह झूठ बोलना पड़ा।

रोहताश ! अगर अब भी इस अबला को तुम विश्वसघातनी समझते हो तो जो सजा चाहे दे सकते हो। बस सच्चाई मैंने सामने रख दी।”

मैं बुत की तरह खामोश हो गया।

मुझे दुःख हुआ की मैंने उसके प्रति कडुवे शब्दों का प्रयोग किया था। वह तो मुझसे अधिक दुःख भोग रही थी। फिर भी बेजान हाड़ मांस के शारीर को लिए जी रही थी।

“ओह ! मुझे माफ़ कर देना।”

“मैं इस योग्य कहाँ हूँ... पर तुम्हें एक सलाह दे सकती हूँ... सवेरे वापिस लौट जाना। अगर उस जालिम को पता लग गया तो तुम अपने प्राण संकट में डाल दोगे... तुम्हे बचाने के लिए अब मेरे पास कुछ भी तो नहीं। मैं अबला स्त्री अपना आखिरी शस्त्र भी खो चुकी हूँ।”

“विश्वास रखिये... अब आपको मेरी हिफाजत की आवश्यकता नहीं पड़ेगी...। लेकिन यह भी नहीं होगा की गढ़ी वाले चैन की सांस ले लेंगे। मैं आखिरी दम तक उससे लडूंगा... और मैं जानता हूँ एक दिन उसे अपने पापों का फल अवश्य भोगना पड़ेगा।”

“क्या मतलब... क्या तुम गढ़ी वालों से बदला लोगे।”

“आपकी बात मैं मान लूंगा... यहाँ से चला जाऊँगा परन्तु आपको मेरे पिता की सौगंध यदि मुझे इस काम से रोका।”

नहीं...नहीं...।” वह रो पड़ी – “रोहताश ! मुझे ऐसी सौगन्ध मत दो... तुम अपने शब्द वापिस ले लो।”

“मैं यह फैसला कर चुका हूँ।”

“लेकिन तुम...तुम क्या कर सकोगे... कैसे करोगे ?”

“जो भी रास्ता सुझाई देगा... चाहे वह पाप का रास्ता हो।”

उसने मेरे कन्धों पर हाथ रख दिए।

“रोहताश ! क्या तुम मेरी कुर्बानी पर पानी फेर देना चाहते हो।”

“नहीं... आपकी कुर्बानी का हिसाब लेना चाहता हूँ। आप मुझे रोक नहीं सकती, हां... यदि मेरी सहायता कर सकती हैं तो बोलिए... हाँ या ना....। मैं दूसरी बात नहीं सुनना चाहता।”

ख़ामोशी छा गई।

अचानक जोरों से बादल गरजे... दरवाजे, खिडकियों के पट बज उठे।

“बोलिये मेरी सहायता करेंगी।”

वह चुप रही।

मैंने उठते हुए यही बात दोहराई।

उसके हाथों में हरकत हुई। और वह चीख पड़ी।

“हां...हां...मैं बदला लूँगी... मैं उस कुत्ते से बदला लूंगी।”

फिर उसने मुझे अपने सीने से लगा लिया।

***
 
सारी रात अनेक विचारधाराओं में बीती। मैं करवटें बदल-बदल कर यही सोचता रहा कि ठाकुर से कैसे बदला लूँ। सारी घटनाएँ मेरे मष्तिष्क में चलचित्र की तरह घूमती रहीं। पर कोई निश्चय नहीं ले पा रहा था।

रह-रह कर मेरे मस्तिष्क में एक ही बात गूंजती।

आखिर “अगिया बेताल” का नाम इतनी बार क्यों सुना... आखिर उसने सिर्फ यह जानकार की मैंने बेताल सिद्ध किया है, मुझे क्यों मार देना चाहा... और फिर शम्भू का चीखना... वह विचित्र आवाज़, घोड़े का भड़कना।

क्या सचमुच बेताल है।

अगर तंत्र में शक्ति न होती तो मेरे नेत्रों की ज्योति क्यों चली जाती।

गढ़ी वालों के उपर एक तांत्रिक की छाया है... वह भी तो मेरा शत्रु है... फिर इतने खौफनाक लोगों से मैं अँधा कैसे निपट सकता हूँ।

हर बात मस्तिष्क में चक्कर काटती और एक चक्रव्यूह के सामान घूम फिर कर एक ही खाने में स्थिर हो जाती।

“अगिया बेताल ?”

आखिर अगिया बेताल क्या है ?

अगर मैं उसे सिद्ध कर लूँ तो...।

सारी रात इसी दुविधा में गुजरी सवेरे मुझे लगा जैसे मेरी सारी समस्याओं का हल “अगिया बेताल” ही है।

***

मैं अगिया बेताल सिद्ध करना चाहता हूँ।”

मेरा यह निर्णय सुन कर किसी को भी आश्चर्य हो सकता था और उसे होना भी चाहिए था, परन्तु ऐसा नहीं हुआ।

उसने शांत स्वर में कहा – “मैं जानती हूँ इसके सिवा कोई चारा भी नहीं। लेकिन मैं यह नहीं चाहती थी कि तुम इस घृणित जिंदगी के फेर में पड़ो। परन्तु तुमने जो कुछ रात तय किया उस बड़े काम को सिर्फ अगिया बेताल पूरा कर सकता है और जिस दिन उसका जादू कट गया तुम्हारी आँखों की रौशनी वापिस आ जाएगी।”

“लेकिन मैं इस विद्या के बारे में कुछ भी तो नहीं जानता।”

“शायद तुम्हारे पिता की इच्छा यही है की जो काम वह न कर सके उसे तुम पूरा कर लो... आदमी जब किसी उद्देश्य प्राप्ति की दिल से ठान लेता है तो सब कुछ कर सकता है। लेकिन रोहताश – क्या तुम अंतिम बार सोच चुके।”

“हाँ मैंने सारी रात सोचा है और इसी नतीजे पर पहुंचा हूं कि यदि अगिया बेताल में सचमुच शक्ति है तो मैं वह पहला व्यक्ति हूँगा जो उसे प्राप्त करने के लिए सब कुछ अर्पित कर दूंगा।”

“यहाँ एक बहुत पुरानी पुस्तक राखी है... वह पुस्तक तुम्हारे पिता ने मंगाई थी। उसमे अगिया बेताल सिद्ध करने का तरीका लिखा है। लेकिन मैंने जो पढ़ा, वह बड़ा भयानक है।

“कैसा भी हो... मैं हर खतरे में कुदूंगा। मुझे वह पुस्तक पढ़कर सुनाओ।”

थोड़ी देर बाद वह पुस्तक ले कर आ गई।

“मैं ले आई हूँ।”

“और मैं सुनने के लिए तैयार हूँ।”

“तो सुनो... मैं इसका पहला पेज पढ़ कर सुनाती हूं।” कुछ पल मौन रहने के बाद उसने पढना शुरू किया।

इस पुस्तक को पढने से पूर्व पाठक को यह विदित कर देना अनिवार्य है कि यह पुस्तक “अगिया बेताल” के विषय में सम्पूर्ण विवरण लिए है, एवं अलौकिक संसार के रहस्यपूर्ण तंत्र-मंत्र से ओत प्रोत है। परन्तु इसे पढ़ कर कोई भी प्रयोग करने से प्रथम यह समझ लेना चाहिए की यह क्रियाएं अत्यंत घृणित है। इंसान इस दुराग्रह में फंसने के पश्चात कभी मुक्त नहीं हो पाता। उसके लिए सभी सांसारिक सुख समाप्त हो जाते है और वह एक गंदा जीवन जीता रहता है। कोई भी तांत्रिक इस संसार का सबसे घृणित निम्न स्तर का मानव समझा जाता है, जिसके लिए स्वर्गलोक के द्वार हमेशा के लिए बंद हो जाते है। अतः मेरा नम्र निवेदन है की कोई भी इस गंदे जीवन में पदार्पण न करें। यह पुस्तक मात्र मनोरंजन के उद्देश्य से रची गई है, और सत्यता पर आधारित है।

इतना पढ़कर वह खामोश हो गई।

“मैं सुन चुका – आगे पढ़िए।” मैंने कहा।

और वह पढने लगी।

***
 
उस सारी पुस्तक को सुनने के बाद मेरे मस्तिष्क में विशेष परिवर्तन आता गया। मैं अपने निश्चय से पीछे नहीं हटना चाहता था। मुझे आभास हुआ जैसे मैं संसार के सुखों से दूर होता जा रहा हूँ और एक गंदा आदमी बन गया हूं।

बेताल की साधना कितनी घृणात्मक थी, इंसान काँप उठे और ऐसा करने के लिए कोई बिरला ही तैयार हो।

जो कुछ उसमे मौजूद था वह सचमुच भयानक था।

बेताल की साधना का प्रथम चरण प्रारंभ होते ही नहाना और वस्त्र बदलना वर्जित था। इस चरण में रह कर कम से कम तेईस दिन बिताने थे और इस बीच भोजन भी आम इंसानों से भिन्न था।

भोजन के लिए कुछ शर्तें थी... मुर्दे की खोपड़ी में आग जलाकर उबला हुआ मुर्दा मांस जिसका मांस खाना हो उसे मरे हुए चौबीस घंटे का समय बीत जाना चाहिए। इस मांस को या तो कच्चा या मुर्दे की खोपड़ी पर उबाल कर खा सकते थे। इसके अलावा मैला (मॉल-मूत्र) का सेवन किया जा सकता था। अन्य कोई सेवन नहीं की जा सकती थी।

सोते समय मुर्दे की खोपड़ी सिरहाने के पास होनी चाहिए।

इस प्रकार कम से कम तेईस दिन... अधिक चाहे जितने हो जाए, गुजारने थे। जितना समय अधिक होगा साधना उतनी ही पुष्ट होगी। यह था प्रथम चरण।

प्रारंम्भ करते ही समस्त अच्छे विचारों का त्याग।

हर किसी के प्रति घृणित विचार।

हर स्त्री के प्रति अशुद्ध भावना, चाहे यह कोई भी हो।

हिंसक जाग्रति... किसी पर दया न करना... कपट की हर कला सोचना और सिर्फ विनाश की भावना जगाना। किसी को जीवन देने की कल्पना ना करें सिर्फ पैसे से प्यार करें, किसी जीवित प्राणी से नहीं।

जब तक बेताल सिद्ध नहीं हो जाता अपना ठिकाना ना छोड़ें और ना किसी पर यह बात प्रकट करें। एक सहायक रखने की छूट परन्तु साधना के वक़्त वह पास भी ना फटके।

निवास – शमशान के निकट।

निवास में कोई भी पवित्र वास्तु न रहे और न इस बीच उसकी सफाई की जाये। रहने के कमरे में कोई धुला वस्त्र ना रहे...बिछौना भी एक ही रहे।

अब बेताल का दूसरा चरण प्रारंभ होता है, रोजमर्रा की बातें वही रहेंगी अर्थात खाना और रहन-सहन में कोई परिवर्तन नहीं होगा।

दूसरे चरण में चाँद की उपासना थी। वह इस प्रकार थी –

चन्द्रमा की आठवीं तारीख से यह साधना प्रारंभ होती है। चाँद उदय होते ही शमशान घाट पर नग्न खड़ा होना। मुँह चन्द्रमा की तरफ रहे और उसे निहारता रहे। इसी स्तिथि में तब तक खड़े रहना है जब तक चाँद सर से ऊपर से गुजरकर पीठ पीछे न चला जाए। जब उसकी रौशनी पीठ की तरफ चली जाए तो साधना पूर्ण हो जाती है।

उक्त क्रिया लगातार तेईस रातों तक होनी चाहिए। बीच में नागा होने पर दूसरे चरण की साधना शुरू से दुबारा करनी पड़ती है। इस बीच किसी प्रकार की आवाज या खौफनाक नजारा देखने में आ सकता है। डरने से न सिर्फ साधना असफल हो जाती है वरन हानिकारक भी हो सकती है।

अगिया बेताल निर्बल और डरपोक के पास आना भी पसंद नहीं करता - उसकी परीक्षा लेता रहता है।

इस साधना के दौरान व्रत अनिवार्य है और चाँद की उपासना के बाद रोज उसी प्रकार का खाना खाना चाहिए। इस बीच कोई विघ्न ना डाले... खाना स्वंय बनाना होगा... मॉस भी स्वंय लाना होगा।

जब यह क्रिया तेईस रोज तक संपन्न हो जायेगी तो “अगिया बेताल” सामने हाजिर हो जाएगा और अपनी शर्त रख देगा। ध्यान रहे उसकी शर्तों का पूर्णतया पालन हो तभी बेताल कब्जे में रहेगा।

चन्द्रमा साधना के दौरान इस मंत्र का तेईस बार जाप करें। अलग-अलग धर्मो के लिए अलग-अलग मंत्र है।

(नोट – मंत्र नहीं दिया जा रहा है, ताकि कोई इस क्रिया को न करे –पुस्तक का उद्देश्य मात्र मनोरंजन है।)

उन् बातों को सोचते-सोचते मस्तिष्क में भारीपन आता जा रहा था और मैंने महसूस किया की मेरे विचार उसी अनुरूप बदलने लगे हैं।

पुस्तक में अगिया बेताल के कारनामों का जिक्र एवं विभिन्न प्रकार के कार्यों को पूर्ण करने के लिए तंत्र विद्याएँ लिखी थी। पर मैं उस वक़्त सिर्फ बेताल को सिद्ध करने की सोच रहा था।

कैसा होगा बेताल !

क्या पहाड़ जैसा ऊंचा...।

या तिनके जैसा।

उसका रूप कैसा होगा ? मैं इसी बारे में कल्पना करता रहा।

***
 
आखिर यह दिन भी आ गया जब बैतालिक साधना का प्रथम चरण शुरू हो गया। मैंने सवेरे-सवेरे शमशान के तट पर स्नान किया और साधना के वस्त्र पहन लिए। उस वस्त्र को धारण करते ही मैंने संसार के सुखों का त्याग कर दिया था और अपने आपको एक गन्दी जिंदगी में धकेल दिया था।

गढ़ी वालों से यह गतिविधि छिपी रहे, इसलिए तय हुआ था कि मैं दिन भर जंगल में रहूँ और रात होते ही लौट आऊं। इस बीच शम्भू भूला भटका आया था। चन्द्रवती ने उसे यह कह कर लौटा दिया कि मैं वहां नहीं पहुंचा।

आवश्यक था कि मैं लोगों से कम ही संपर्क रखूं। चन्द्रावती दो तीन बकरे खरीदकर ले आई थी और मैंने एक को अपने हाथों से मार डाला था। मेरे हाथ उस वक़्त काँप रहे थे परन्तु थोड़ी देर बाद बकरे का खून देखकर कंपकंपी समाप्त हो गई।

मेरा मन अब डिगने वाला नहीं था। बकरे का मृत शारीर मकान के एक भाग में डाल दिया गया था, जिसका मांस मुझे खाना था।

इसी प्रकार मुर्दे की खोपड़ी भी प्राप्त कर ली गई थी। अब साधना बाकायदा शुरू हो गई थी।

मेरे रास्ते में सिर्फ मेरी आंखें रुकावट थी, पर अब काम इस प्रकार हो रहा था कि आँखें चन्द्रावती की थी और जिस्म मेरा।

मैं अपने मन में हर गन्दी भावना का समावेश कर लेना चाहता था, अपने आप को क्रूर बनाने लगा।

चेहरे पर भयंकरता लाने की कोशिश जारी हो गई।

पहली रात जब खोपड़ी पर आग जलाई तो दिल धड़कता रहा, तबियत घबराने लगी पर इसी घबराहट पर मैंने जल्दी काबू पा लिया।

मैं मांस उबालने लगा।

कुछ देर बाद जब मांस उबल गया तो उसे चखते ही भूख गायब हो गई, दिल डूबने लगा। एक तो मैं मांसाहारी था ही नहीं, ऊपर से ऐसा मांस जिसमे सडान्ध सी आ रही हो। फिर मैंने अपने को संतुलित किया और दिल कड़ा करके खाने लगा।

थोड़ा सा मांस खाकर शेष फेंक दिया। उसके बाद खोपड़ी उठाकर घूरने लगा, हलांकि मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, पर मैं उसकी कल्पना करने लगा।

उसके बाद मैं सोने के लिए अपने कमरे में पहुंचा। अब मैं भी इस मकान के हर भाग में पहुँच जाता था और अपने मतलब की वस्तु ख़ोज लेता था।

थोड़ी देर बाद आहट हुई।

क़दमों की चाप से ही अनुमान लगा लिया कि मेरी सौतेली मां है। इस घर में हम दो ही तो प्राणी थे।

“कैसा रहा आज का दिन ?” उसने पूछा।

“बड़ा मुश्किल।”

“धीरे-धीरे हर मुश्किल आसान हो जायेगी।”

“हाँ सोचता तो हूँ”

“तुम मुझे देख तो नहीं सकते, पर महसूस तो करते हो।”

“हाँ...।”

“क्या महसूस करते हो ?”

“एक देवी औरत... जो मेरी शक्ति की प्रेरणा है।”

वह मौन हो गई।

“चली गई क्या ?”

“नहीं यहीं पर हूँ।”

“तो कुछ बोलिए... आज सुबह से गूंगा बन कर बैठा रहा।”

“तुम कड़ी परीक्षा से गुजर रहे हो और मैं यह नहीं चाहती कि तुम्हें कहीं भी असफलता मिले। परन्तु महसूस कर रहीं हूं की तुम आसानी से अपने चाल-चलन को नहीं बदल पाओगे।”

“क्यों... कैसे जाना। अभी तो पहला रोज है।”

“कितने खेद की बात है कि मैं तुम्हें कुकर्मी बनने की सलाह दे रही हूँ।”

“आप क्यों... मैं खुद बन रहा हूँ।”

“लेकिन तुम्हें बनाने में मुझे सहयोग देना पड़ेगा। अभी-अभी तुमने कहा था कि तुम मुझे देवी की तरह महसूस करते हो...और शक्ति की प्रेरणा महसूस करते हो, जबकि तांत्रिक किसी जीते-जागते को ऐसा नहीं समझता। वह अपने को सर्वोपरी समझता है और शेष को कीड़े मकोड़े।”

“ओह... मैं तो भूल ही गया था... तो मुझे आपको भी उस नजर से देखना होगा।”

“मैं यही कहने आई हूँ। मैं देखना चाहती थी कि तुम कितना बदले हो। तुम्हें तुरंत बदलना है – और मुझे भी उसी नजर से देखना है, जैसे अन्य औरतों को...। कल से ध्यान रहे – शुभ रात्रि।”

वह चली गई।
 
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