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रंगीला लाला और ठरकी सेवक

इसी श्रंखला में एक दिन लाला का मन रंगीली की गान्ड मारने का हुआ, वो इस समय रंगीली को घोड़ी बनाकर चोद रहे थे…!

दिनो-दिन मोटी होती जा रही उसकी गान्ड देखकर लाला का मन उसकी गान्ड चोदने का हो गया.., वो उसके कूल्हे को थप-थपाकर बोले…

आअहह…मेरी रानी, तुम्हारी ये गान्ड तो दीनो-दिन गदरती जा रही है, उउउफ़फ्फ़.. क्या मस्त मक्खन जैसे गोल-गोल चूतड़ हैं तुम्हारे. मन कर रहा है इसी में अपना लंड डालकर चोद डालूं…!

रंगीली अपनी गान्ड को उनके लंड पर पटकते हुए उनकी तरफ मूह मोड़ कर अपनी नशीली नज़र डालकर बोली – हाईए…लाला जी, ये भी कोई मारने की चीज़ है भला..,

आप भी ना दिनो-दिन नये-नये सुगल सीखते जा रहे हो…!

लाला जी ज़ोर्से धक्का लगाते हुए बोले – ससुउउ…आअहह…मेरी सोन चिरैया…ये कोई नया सुगल नही है…, सेठानी की भी मे कयि बार चोद चुका हूँ, इसको चोदने में बहुत मज़ा आता है…

एक बार डलवाके तो देख, रोज़ गान्ड मारने को ना कहे तो कहना…!

रंगीली मादकता से भरी हुई सिसकी लेकर बोली – सस्स्सिईईईई…आअहह…सही कह रहे हैं…?,

लाला जी – हां रानी !

ये कहकर उन्होने अपनी बीच की उंगली अपने मूह में डालकर लार से गीली की, और वो उसकी गान्ड के भूरे रंग के छेद जिसके आस-पास कत्थयि रंग का फूलनुमा घेरा था में धीरे से डाल दी…

गान्ड में उंगली जाने से रंगीली चिंहूक पड़ी, और उसने अपनी गान्ड के छेद को लाला की उंगली पर ज़ोर्से कस दिया…!

साथ ही उसकी चूत में और ज़ोर्से चींटियाँ सी काटने लगी, और वो और ज़ोर्से सिसकियाँ मारते हुए अपनी चूत को लाला के लंड पर पटकने लगी…!

वो सिसकते हुए बोली – हाए लाला जी ये क्या किया आपने, मेरी चूत में खुजली और बढ़ गयी, चोदो राजा, और ज़ोर से फाडो मेरी चूत…आअहह…हाईए…मईए…तो गयी री…ईईईईई…..!

रंगीली लाला जी से पहले झड चुकी थी, और ये कमाल था, लाला की मोटी उंगली का उसकी गान्ड में डालना…!

लाला ने चुतरस से सना हुआ अपना लंड बाहर खींच लिया, और वो उसे उसी मुद्रा में किए हुए उसकी गान्ड के छेद को अपनी जीभ से चाटने लगे…!

रंगीली को अपनी गान्ड में गुद-गुदि सी होने लगी, उसे लाला की जीभ अपनी गान्ड के छेद पर बहुत अच्छी लग रही थी,

धीरे-धीरे उसका मन होने लगा कि लाला की जीभ किसी तरह उसके गान्ड के अंदर जाकर चाटे…!

सो वो आअहह…भरते हुए बोली – हाईए…लाला जी, अपनी जीभ को थोड़ा अंदर करो ना…!

अनुभवी लाला समझ गया, कि इसे गान्ड में मज़ा आरहा है, अतः उसने उसे चाटना बंद कर दिया, और अपनी उंगली फिर से उसकी गान्ड में डालते हुए बोले –

रानी , जीभ तो जीभ होती है, अंदर तो लंड ही जा पाएगा, तुम कहो तो डाल दूँ…

रंगीली कराह कर बोली – हाए राजाजी, दर्द तो नही होगा ना,..?

लाला – नही दर्द नही होने दूँगा, तुम देखती जाओ..

रंगीली – हाए तो डालो ना..,

उसकी रज़ामंदी पाकर लाला खुश हो गया, और पीन्शोप से एक दिया लाकर उसका तेल उसकी गान्ड के छेद पर डाला, उंगली डालकर अंदर तक उसे चिकना किया…

फिर थोड़ा सा तेल अपने मूसल पर चुपड कर उसे गान्ड के छेद पर टिकाया, और एक तगड़ा सा धक्का दे मारा…..!

आआईयईई….मैयाअ रीि…..लाला जी फट गयी…मेरी गान्ड….हाईए…दैयाआ…. निकालो ईसीए…

लाला ने उसके कूल्हे को सहला कर कहा – बस रानी आधा तो चला गया, अब थोड़ा सा और सहन कर ले, फिर मज़े ही मज़े…हैं…!

रंगीली कराहते हुए बोली – उउउफफफ्फ़… तो थोड़ा रूको, मुझे साँस लेने दो..!

लाला रुक कर उसकी पीठ चाटते हुए, एक हाथ से उसकी चुचियों को मसल्ते रहे..फिर जब उसे कुछ राहत हुई, तो उन्होने अपने लंड को थोड़ा बाहर खींचा,

तुम थोड़ा अपनी गान्ड को ढीला रखना रानी, ये कहकर लाला ने अपनी साँस रोक कर एक तगड़ा सा धक्का देकर पूरा लंड उसकी संकरी गान्ड में फिट कर दिया…,

रंगीली के फरिस्ते कून्च कर गये, उसे अपनी गान्ड चीरती हुई सी लगी…

वो रोते हुए बोली – बड़े निर्दयी हो लाला जी, फाड़ ही दी मेरी गान्ड, हाए मैयाअ मोरी, अब तो निकाल लो..., कहीं मज़ा नही है इसमें.. झूठ बोलकर डाल दिया…!

बस इतना ही प्यार करते हैं हमसे, अपने मज़े के लिए दूसरे को दर्द देना, क्या यही प्रेम है.. रंगीली ने रोते हुए ढेर सारी शिकायत कर डाली…!

लाला जी उसकी पीठ चूमकर बोले – ऐसा बिल्कुल नही है मेरी रानी, तुमने खुद ही तो कहा था, कि डाल दो…!

रंगीली – तो हमें क्या पता था, कि इतना दर्द होगा, अब डाले क्यों पड़े हो, अब तो निकालो अपने खूँटे को…, या दम लेकर ही मानोगे…!

लाला ने अपने खूँटे को ज्यों का त्यों गान्ड में गाढ़े रखा, लेकिन उनके हाथ अब उसके मादक बदन पर फिरने लगे थे, कभी वो उसकी पीठ चूमते, कभी चुचियाँ सहलाते…, कभी चूत सहलाते…

नतीजा, रंगीली अपना दर्द भूल गयी, और उसपर चुदाई की खुमारी छाने लगी, उसकी गान्ड हिलने लगी,

लाला ने छोटे-छोटे धक्के देना शुरू किया, अब उसकी गान्ड की अन्द्रुनि दीवारें सेन्सेशन के कारण कुछ ढीली होकर चिकनाने लगी, और उसे भी मज़ा आने लगा…!

लाला अब उसकी चूत सहलाते हुए ज़ोर-ज़ोर से धक्के देने लगे, कुछ देर में ही लाला का लंड जबाब दे गया, और उन्होने उसकी कसी हुई गान्ड के सुराख में अपनी पिचकारी छोड़ दी…

अपनी गान्ड में गरम गरम वीर्य की बौछार से रंगीली की चूत ने भी अपना पानी छोड़ दिया, और वो बिस्तर पर औंधे मूह पसर कर हाँफने लगी…!

उसके उपर लाला पड़े हुए अपनी साँसों को इकट्ठा करने की कोशिश कर रहे थे…!

रंगीली की गान्ड का उद्घाटन करके लाला आज बड़े खुश थे, उन्हें ऐसा लग रहा था, मानो उन्होने कोई बहुत बड़ा अभेद्य क़िल्ला फ़तह कर लिया हो….!

...................

रो-धोकर कल्लू 12वी कक्षा में पहुँच गया था, लाला की बड़ी बेटी प्रिया अब उससे मात्र एक क्लास पीछे यानी 11वी में थी, और छोटी सुप्रिया 9थ में पहुँच गयी…

साथ ही जहाँ कल्लू थोड़ा सावला था वहीं दोनो बेटियाँ 18 साल की होने के बाद ही भरे हुवे बदन की मालकिन बन गयी थी...

इधर रंगीली का बेटा शंकर, दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ रहा था, उसे भी उसने गाओं के स्कूल में पढ़ने डाल दिया था...

इस उमर में ही वो इतना सुंदर और तेज दिमाग़ था, कि हर कोई उसको प्यार करने लगता..!

रंगीली उसे सबकी नज़रों से बचाकर उसकी मालिश करना, मेहनत करना, खाने पीने का पूरा ख़याल रखना इस तरह से करती जैसे उसे वो किसी बहुत बड़े मकसद के लिए तैयार कर रही हो…!

इसी बीच उसने अपने पति से एक बेटी को भी जन्म दिया, जिसे शुरू से ही उसने अपने दादा दादी के और पिता के पास छोड़ दिया.., और जब भी उसे मौका मिलता वो शंकर को लेकर अपनी बेटी के पास चली आती…!

ऐसा नही था कि वो उसे प्यार नही करती, हल्के से साँवले रंग की सलौनी उसकी बिटिया भी सुंदर सी गुड़िया थी, बिल्कुल अपनी माँ की छवि,

लेकिन शकरा के लालन पालन में कोई बाधा ना पड़े इसके लिए वो उसे अपने साथ हवेली में नही रखती थी, वरना लाला को भी एतराज हो सकता था…!

शंकर अपनी छोटी बेहन को बेहद प्यार करता था, उसका बस चलता तो वो उसे हर समय अपनी गोद में लिए खेलता रहता, लेकिन रंगीली उसे इसका ज़्यादा मौका नही देती.

उसने शंकर को अभी से इतना अनुशासित बना दिया था, सुबह उठते ही वो शौच इत्यादि से निपट कर उसकी तेल मैलिश करती,

शरीर का ऐसा कोई अंग शेष नही छोड़ती, जहाँ वो मालिश ना करती हो, ख़ासकर उसकी छोटी सी लुल्ली (सू-सू) को अच्छे से मसल-मसल कर मालिश करती, उसके बाद उससे डंड, और बैठक लगवाती…!

शुरू शुरू में वो ना नुकुर करता था, तो वो दो चार डंडे भी फटकार देती..

फिर वो उसे प्यार भी उतना ही करती, जिससे वो उसकी हर बात मानने को तैयार रहता था…!

 
इधर रंगीली ने कल्लू की खुराक से कटौती करना शुरू कर दिया, और बादाम पिसता के पेस्ट की जगह वो धीरे-धीरे उसे दूध के साथ केले की जड़ का पेस्ट मिलाकर पिलाने लगी…!

इसी बीच कल्लू कुछ ग़लत लड़कों की संगत में भी पड़ गया, वो स्कूल से पढ़ने के बहाने शहर जाता, अपने दोस्तों के साथ पिक्चर देखना, शराब पीना…

पैसों की उसको कोई कमी नही थी, जितना माँगता उसकी माँ उसे पकड़ा देती, धीरे-धीरे उसने ग़लत औरतों के साथ भी संबंध बना लिए, जो अपने शरीर का इस्तेमाल करके उससे पैसे ऐंठती रहती थी..

कुल मिलकर कल्लू वो सारे काम करने लगा, जिन्हें करने की सलाह कोई भला मानुष कभी अपनी औलाद को नही दे सकता…

समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता जा रहा था, दो साल 12थ में बिताने के बाद कल्लू ले दे कर 12वी पास कर ही गया, और उसी के साथ लाला की बड़ी बेटी प्रिया ने भी 12वी पास कर ली…,

कल्लू की बुरी आदतों के बारे में इधर उधर से लाला के कान में भनक पड़ ही गयी, वो उसे लेकर चिंतित होने लगे….

अब लाला को कल्लू से कोई नौकरी तो करानी नही थी, इसलिए उसे ग़लत रास्ते पर चलने से रोकने के लिए अपने ही टक्कर के अपने इलाक़े के एक दूसरे सेठ की लड़की के साथ उसकी शादी करदी…!

और वैसे भी वो 22 साल का हो गया था, शादी लायक तो हो ही गया था…

कल्लू की दुल्हन सुषमा 19 साल की, सुंदर गोरी चिटी, छर्हरे बदन की लड़की थी, कुल मिलकर कल्लू के भाग ही खुल गये एक सुंदर सी पत्नी पाकर..!

प्रिया ने आगे की पढ़ाई करने के लिए शहर के कॉलेज में अड्मिशन ले लिया और वहीं हॉस्टिल में रहकर पढ़ाई करने लगी,

वो भी अब एक कमसिन जवानी से भरपूर सुंदर माल हो चुकी थी, आच्छे ख़ान-पान की वजह से उसके अंगों में कुछ ज़्यादा ही जवानी आ चुकी थी…!

इधर शंकर भी अगली क्लास में पहुँच गया था, वो स्कूल के सभी तरह के खेल कूद और पढ़ाई में हमेशा अब्बल ही आता था,

रंगीली अपने बेटे की सफलताओं पर मन ही मन खुश होती, लेकिन उसने अपनी ये खुशी कभी अपने बेटे तक को भी जाहिर नही होने दी…!

वो बस उसे और आगे बढ़ने की ही प्रेरणा देती रहती थी…!

कल्लू ने शादी के बाद इधर-उधर मुँह मारना कम कर दिया, अब घर में रस मलाई के होते हुए कोई सड़े हुए खाने पर मुँह क्यों मारेगा…

जल्दी ही कल्लू की पत्नी गर्भवती हो गयी, और दो साल के भीतर-भीतर उसने एक सुंदर सी कन्या को जन्म दिया…, जिसका नाम गौरी रखा गया…!

देखते ही देखते 3 साल और बीत गये, लाला ने अपनी दोनो बेटियों का ब्याह कर दिया, अच्छे ख़ासे दहेज के कारण दोनो बेटियाँ शहर के अच्छे कारोबारियों के यहाँ पहुँच गयी थी…!

लेकिन बेटी के जन्म के 3 साल के बाद भी कल्लू की पत्नी को कोई दूसरा बच्चा नही हुआ, तो सेठ और सेठानी दोनो बैचैन हो उठे…!

अब उन्हें दिनो-रात ये चिंता सताए रहती कि क्या वो कभी अपने पोते का मुँह देख पाएँगे या नही, उनकी जयदाद संभालने वाला वारिश पैदा होगा या नही…!

उन्हें कहीं ना कहीं ये लगने लगा कि हो ना हो, कहीं बहू में बेटा पैदा करने के गुण नही है, सेठानी तो कल्लू का दूसरा ब्याह करने की सोचने लगी…!

उनको अपने वारिश को पाने की चाह इतनी बल्बति हो गयी कि आनन फानन में उन्होने मध्यम परिवार की एक लड़की से कल्लू की दूसरी शादी करा दी…!

कल्लू की दूसरी पत्नी इतनी सुंदर तो नही थी, एक ग़रीब बनिया की बेटी, मध्यम कद काठी और रंग रूप वाली एक साधारण सी लड़की नाम था लाजो,

आनन फानन में कल्लू को घर में ही नयी चूत चोदने को मिल गयी, शराब के जाम चढ़कर उसने लाजो के साथ भी सुहागरात मना डाली….!

खेली खाई लाजो, कल्लू के 4 इंच के लंड से उसकी चूत भी गीली नही हो पाई, वो जैसे ही गरम हुई, कल्लू का लंड अपनी लार टपका चुका था,…!

लाजो कल्लू के उपेर चढ़ दौड़ी और अपनी वासना की आग में ये भी भूल गयी कि आज उसकी सुहागरात उसके पति के साथ है, कहीं खेतों में अपने यार से नही चुद रही..

लाजो चिल्लाते हुए बोली – ये क्या है पति देव… तुम तो अभी से हाँफने लगे, ऐसे ही बेटा पैदा करोगे..?

अरे अब ये भैसे की तरह हाँफना बंद करो, और चोदो मुझे, बहुत खुजली हो रही है मेरी चूत में…!

बाजू के कमरे में अपनी बच्ची को दूध पिलाती कल्लू की पहली बीवी सुषमा ये सब सुन रही थी, और मन ही मन सेठ सेठानी को गालियाँ दे रही थी…

साली नीच छिनाल कुतिया, अपने बेटे को तो बब्बर शेर समझ रही थी, उन्न्नह बहू में बेटा पैदा करने वाले गुण नही हैं…

और करवा दे दो चार ब्याह अपने हिजड़े बेटे के, खिलाती रहना पोता…!

अच्छा हुआ ये लाजो आ गई, ये तुम्हारी असलियत दिखाएगी अब…ऐसे ही कुछ बड़बड़ाती हुई सुषमा अपनी बच्ची के सिर पर हाथ फेरती अपना दूध पिलाती रही…

उधर लाजो की खीज़ का कल्लू के उपर कोई असर नही था, वो तो कब का नींद में डूब गया, और लाजो उसकी लुल्ली से खेलते खेलते इस आस में कि शायद ये फिर कुछ कमाल दिखा दे,

लेकिन कल्लू का करेंट तो शराब और नींद से कबका ख़तम हो चुका था, इसलिए लाजो की सारी कोशिशें बेकार थी…

थक कर वो अपनी चूत में दो-दो उंगलियाँ पेल कर अपनी चुचियों को मसल्ते हुए कल्लू को हज़ार गालियाँ सुनाती हुई अपना पानी निकालने की कोशिश करने लगी…!

 
रंगीली का बेटा शंकर अब बड़ा हो रहा था, अभी से ही वो किसी सजीले नौजवान सा दिखने लगा था…!

लाला जी उस पर जान छिडकते थे, लेकिन सेठानी को वो एक आँख नही भाता था, कल्लू की नाकामी और ग़लत हरकतों से वो चिड-चिड़ी सी हो गयी थी...,

अपनी खीज वो रंगीली और दूसरे नौकरों पर निकालती रहती…!

वाकई शरीर के हिसाब से शंकर की चोचो (लिंग) का साइज़ भी अब अच्छा ख़ासा होने लगा था, और उसमें अब अकड़न पैदा होना शुरू हो गयी थी…

जब उसकी माँ उसके बदन की मालिश करती, तो साथ साथ में अभी भी उसके लिंग की मालिश करना नही भूलती, लेकिन अब उसका लिंग मालिश के दौरान सख़्त होने लगता,

जिसे रंगीली अपनी मुट्ठी में लेकर खूब आगे पीछे करती, और हर दिन उसका साइज़ मापने बैठ जाती…!

अभी से उसे अपने बेटे का लंड लाला जी के लंड की टक्कर का लगने लगा था, जिसे देखकर उसकी भावनायें बदलने लगती..., ना चाहते हुए भी उसकी चूत गीली हो जाती…!

शंकर को भी अब मालिश के दौरान अजीब सी उत्तेजना का एहसास होने लगा था, एक दिन वो बोला भी…

माँ, अब तू मेरी मालिश करना बंद कर्दे, अब में बड़ा हो गया हूँ, मे खुद अपना ख़याल रख सकता हूँ…!

रंगीली ने झिड़कते हुए उसे जबाब दिया – अच्छा ! कितना बड़ा हो गया है, 8 जमात क्या पास करली, अपने आप को बहुत बड़ा सूरमा समझने लगा है,

चुपचाप से लेटा रह, मेरे लिए तो तू अभी भी मेरा नन्हा सा शंकर ही है…!

शंकर – पर माँ, जब तू मेरी चोचो को पकड़ती है, तो मुझे अजीब सी गुद-गुदि जैसी होती है.., और मुझे लगने लगता है जैसे मुझे मूत आने वाला हो..!

रंगीली – लेकिन मेने तो देखा नही कभी तेरा मूत निकलते…!

शंकर – नही बस ऐसा लगता है, और उसके बाद इसका साइज़ कितना बढ़ जाता है ये तो तूने भी देखा ही है…, कभी कभी तो ऐसा लगता है कि कहीं ये फट ना जाए…!

रंगीली – तू कहीं इसको अपना हाथ तो नही लगाता,

शंकर – नही माँ, मन तो करता है, कि इसे हाथ में लेकर खूब ज़ोर्से मसलूं, हिलाऊ, लेकिन तूने मना किया है ना, तो अपना मन मार कर रह जाता हूँ…!

रंगीली उसके बालों में अपने तेल से सने हुए हाथों की उंगलियों से मालिश करते हुए बोली – शाबास मेरा बहादुर बेटा, यही तो में चाहती हूँ, कि तू अपने मन को काबू में करना सीखे..., दिमाग़ का इस्तेमाल करे..!

इस मन का क्या है बेटा, ये तो चंचल है, कुछ भी सोचने लगता है, लेकिन दिमाग़ हमें बताता है कि हमारे लिए क्या सही है और क्या ग़लत…!

शंकर – लेकिन माँ, मेरे साथ ऐसा होता क्यों है, कहीं ये कोई बीमारी तो नही है..?

रंगीली – नही मेरे लाल, ये कोई बीमारी नही है, और मेरे शेर बेटे को कोई बीमारी हो भी नही सकती,

धीरज रख बेटा, तेरी हर बात का जबाब मिलेगा तुझे, अभी बस इतना समझ… तेरी माँ जो कह रही है वो सिर्फ़ और सिर्फ़ तेरी भलाई के लिए है…!

शंकर कुछ ना समझते हुए भी हां में अपना सिर हिला देता…!

शंकर की मालिश करते वक़्त रंगीली अक्सर गरम हो जाया करती, वो वहाँ से अपनी गीली चूत हाथ से दबाए लाला जी की खोज में निकल पड़ती और मौका लगते ही वो उनकी गोद में समा जाती…!

लेकिन लाला जी की अब उमर बढ़ रही थी, वो अब लगभग 55 साल को पार कर रहे थे, तो अब एक भरपूर जवान औरत को संतुष्ट करना अब उनको थोड़ा मुश्किल होने लगा था…

भले ही वो कितना ही अच्छा खा पी रहे हो लेकिन बमुश्किल, एक बार के बाद अब उनका लंड जल्दी खड़ा नही हो पाता था, वहीं उन्ही के द्वारा बिगाडी गयी रंगीली की आदतें,

जिसे कम से कम लगातार दो बार जब तक जम के चुदाई ना मिले, उसकी चूत की खुजली नही मिट पाती थी…!

ये तो अच्छा था, कि उसकी कोशिशों से रामू थोड़ा चोदने लायक हो गया था, जिससे उसका काम चल रहा था…!

लेकिन अब उसके अपने बेटे की चोचो, जो अब अच्छी ख़ासी अक-47 राइफल बनती जा रही थी, उसकी सख्ती देखकर उसे उन दोनो के लंड फीके नज़र आने लगे थे…!

खैर इसी तरह समय गुजर रहा था…! और शंकर इस कच्ची उमर में ही लगभग 6 फीट लंबा, 40” का मजबूत कसरती सीना हो गया था उसका,

6 पॅक वाले हीरो अपने आपको खुदा समझने लगते हैं, यहाँ तो रंगीली मेहनत करते करते उसका रोज़ बल्टियों पसीना निकलवाति थी, इस वजह से उसका पूरा शरीर ही स्टील की बॉडी बनता जा रहा था…,

एक दम सुर्ख चेहरा…हल्की-हल्की मूँछे निकलना अभी शुरू हो रही थी, माने रोंगटे आ रहे थे...,

शंकर की लाडली बेहन सलौनी भी जो मात्र उससे 3-3.5 साल ही छोटी थी, उसी के साथ स्कूल में जाती थी…!

साँवली सलौनी अपनी माँ की छवि नटखट गुड़िया अपने भैया की दुलारी सलौनी उसकी साइकल के आगे बैठकर अपने आप को किसी राजकुमारी से कम नही समझती थी…

लाला जी ने ये साइकल उसे उसके जन्म दिन पर भेंट की थी, जब वो 9वी क्लास में पहुँचा था, उससे पहले तो वो घर से 3किमी दूर अपने स्कूल दौड़ते दौड़ते ही आता- जाता था,

जब उसकी गुड़िया स्कूल जाने लगी तो वो उसे अपनी पीठ पर लाद कर ही दौड़ लेता..

वो उसकी पीठ पर उपर नीचे होती हुई, ऐसे महसूस करती जैसे किसी घोड़े की सवारी कर रही हो.., कभी कभी वो उसके कंधों पर ही उच्छल कर बैठ जाती थी…!

कभी-कभी वो उसके गले से लटक जाती, शंकर उसको फूल की तरह हवा में उछाल देता, वो खिल-खिलाती हुई हवा में 10 फुट तक उपर चली जाती, और नीचे आते हुए उसे बड़ा मज़ा आता…!

अपने भाई के बाजुओं की ताक़त पर उसे पूरा भरोसा था, कि वो उसे गिरने नही देगा, सो वो इस तरह के खेल का भरपूर आनंद लेती…!

लेकिन अब वो बड़ी हो रही थी, बचपन में खेले गये अपने भाई के साथ वाले खेल, जाने कहाँ-कहाँ उसके हाथ लगते थे, आज उन पलों को सोच-सोच कर वो गुद-गुदि से भर जाती…!

वो सोचती कि काश भैया को ये साइकल ना मिली होती, तो वो आज भी उसकी पीठ और कंधों की सवारी कर रही होती, भैया के हाथ मेरे छोटे से इन चुतड़ों पर होते…!

ये सोचते ही वो उन्हें अपने हाथ से ही सहला देती.., कितना मज़ा आता उसे अगर ऐसा होता तो….?

एक दिन शाम को हवेली में अपने भाई के साथ पढ़ाई के बाद खेलते-खेलते सलौनी को अंधेरा हो गया, गाओं में लाइट तो होती नही, सो माँ के कहने पर शंकर उसको छोड़ने घर तक चल दिया…!

 
रास्ते में सलौनी बोली – भैया, कितने दिन हो गये, जब से ये मुई साइकल आपको मिली है, तबसे कभी आपने मुझे अपनी पीठ पर नही बिठाया…!

शंकर उसकी बात सुनकर फ़ौरन झुक कर खड़ा हो गया और बोला – अरे तो इसमें क्या ले आ हो जा सवार अपने घोड़े की पीठ पर…

सलौनी पीछे से जंप मारकर उसकी पीठ पर सवार हो गयी, और अपने भाई के बलिष्ठ कंधो को पकड़कर, अपनी दोनो टाँगें उसकी कमर के इर्द-गिर्द लपेट दी…

शंकर ने अपनी बेहन की कोमल पतली सी कलाईयों को पकड़ कर उसे अपनी पीठ पर अच्छे से बैठने के लिए उपर को सरकाया…!

सलौनी के कच्चे नीबू, जैसे ही उसकी पत्थर जैसी शख्त पीठ से रगडे, आनंद के मारे सलौनी का पूरा शरीर झन झना उठा…!

भैया मेरे बाजुओं में दर्द होने लगा है लटके-लटके, ज़रा मुझे पीछे से पकडो ना, सलौनी अपने दिमाग़ के घोड़े दौड़ाते हुए कुछ देर बाद बोली…

शंकर ने अपनी दोनो बाजू एक के उपर दूसरी रख कर उसके गोल-गोल छोटी बॉल जैसे चुतड़ों को नीचे से सहारा दिया…!

ओफ़्फूओ…भैया ! ऐसे नही, अलग अलग हाथों से मेरी टाँगों को पकडो ना…!

निर्मल मन शंकर एक छोटी सी गुड़िया की बातों में आ गया, वो तो उसे अभी भी पहले वाली छोटी सी प्यारी सी गुड़िया ही समझ रहा था,

सो उसने अपने बड़े बड़े हाथों में उसकी मुलायम मक्खन जैसी जांघों को पकड़ लिया…, सलौनी, जो अब तक अपनी दोनो टाँगों को उसके दोनो तरफ फैलाए उसके शरीर से लपेटे थी, उन्हें आपस में जोड़ने लगी…!

शंकर की उंगलियाँ उसकी छोटी सी अन्छुई मुनिया से मात्र दो अंगुल ही दूर थी, जिन्हें और नज़दीक लाने की तिकड़म वो सोचने लगी…,

शंकर अपनी मस्त मौला चाल से अपनी बेहन को पीठ पर लटकाए घर की तरफ बढ़ रहा था, इस बात से पूरी तरह अंजान की उसकी छोटी बेहन अपने दिमाग़ में क्या खिचड़ी पका रही है…!

वो हिल-हिल कर खूब कोशिश में थी, की कैसे भी उसे उसकी मंज़िल मिल जाए, लेकिन शंकर की मजबूत पकड़ ज़रा भी अपनी जगह से नही हिल पा रही थी…!

सलौनी ने अपना पूरा वजन शंकर के हाथों के उपर डाल दिया और बोली – भैया मे नीचे खिसक रही हूँ, थोड़ा उपर करो ना…!

बस इस बार उसकी तरक़ीब काम कर गयी, शंकर ने हल्का सा झटका देने के लिए एक क्षण के लिए अपने हाथों की पकड़ को ढीला किया,

और उसी क्षण का लाभ लेते हुए सलौनी ने अपनी मुनिया के दोनो तरफ के होंठों को उसके दोनो हाथों की उंगलियों से सटाते हुए अपनी जांघों को ज़ोर्से भींच लिया…!

उसका हाथ लगते ही सलौनी की मुनिया खुशी से झूम उठी, पहली बार किसी मर्द के स्पर्श को अपने उस नाज़ुक जगह पर होते ही वो आसमानों में उड़ने लगी,

शरीर के सारे तार झन-झना उठे, उसके रोंगटे खड़े हो गये, अपनी जांघों को उसके हाथों पर ज़ोर्से कसते हुए उसकी मुनिया ने अपनी लार टपका दी, जो आधी बाहर आ चुकी थी और उसका दूसरा सिरा अभी भी अंदर ही था…..!

इतने में उसका घर आ गया, चौक में पड़ी चारपाई पर घूमकर उसने उसे चारपाई पर पटक दिया…!

सलौनी अपनी आँखें बंद किए चारपाई पर पड़ी हुई थी, अपनी उसी खुमारी में, उसे होश ही नही था कि वो किस स्थिति मैं, जबकि उसकी स्कर्ट उपर उठी हुई थी, जिसमें से उसकी सफेद रंग की कच्छि साफ दिखाई दे रही थी…

शंकर को कच्छि कुछ गीली सी दिखी, उसने सलौनी से पुछा – गुड़िया तेरा पेसाब निकल गया क्या…?

सलौनी एकदम चोन्क्ते हुए बोली – नही तो..!

शंकर – तो ये तेरी कच्छि कैसे गीली हो रही है…?

सलौनी ने झटके से सिर उपर करके देखने की कोशिश की लेकिन उसे कुछ नही दिखा, फिर उसने अपना हाथ अपनी मुनिया के उपर ले गयी, तो सचमुच उसकी उंगलियाँ चिप-चिपि हो गयी…!

वो शर्मकार झट से चारपाई से खड़ी हो गयी, और बोली – हो सकता है भैया, ग़लती से निकल गया होगा, मे पेसाब करके आती हूँ, ये कहकर वो नज़र चुराकर वहाँ से भाग गयी…..!

नाली पर खड़े होकर सलौनी ने अपनी स्कर्ट को उपर किया, और कच्छि नीचे करके जैसे ही अपनी मुनिया के उपर हाथ लगाया, उसकी उंगलियाँ रस से चिप-चिपा गयी,

आअहह…कितना गाढ़ा और लस लसा था वो, एक दम चासनी की लाट की तरह खींच कर लंबा होता चला गया,

सलौनी ने अपने हाथ को नाक के पास लाकर सूँघा, उसमें से कस्तूरी की तरह सुगंध उठ रही थी, जिसे सूंघते ही वो मदहोश हो गयी, और उसके मुँह से एक कामुक सी सिसकी…फुट पड़ी…

आअहह…भैयाअ…ये कैसा जादू किया है आपके हाथों ने……..!

इन सब बातों से अंजान, रंगीली का शेर शंकर जैसे ही हवेली जाने के लिए वापस मुड़ा, उसका सामना घर में घुस रहे उसके धर्म पिता.. अरे अपने रामू भैया, जो लाला के खेतों से काम करके लौट रहे थे उनसे हो गया…!

रामू जो बमुश्किल उसके सीने तक आ रहा था बोला– अरे शंकर बेटा ! आज सूरज पश्चिम ते कैसे निकल आयो…, मेरा मतलब आज हवेली ये छोड़ यहाँ का कर रहो ये..…?

शंकर – राम राम बापू, वो सलौनी लेट हो गयी थी, उसे ही छोड़ने आया था..

तभी उसकी दादी दुलारी भी आ गयी और बोली – अरे बेटा तनिक हमाए झोर भी बैठ ले कर…!

वो कुछ देर उन लोगों के पास बैठ कर हवेली लौट लिया….!

शंकर की मर्दानी शेर जैसी चाल, उसके रंग रूप और कसरती बदन पर स्कूल में उसके बड़े क्लास की लड़कियाँ भी मक्खियों की तरह उसके आस-पास भिन-भिनाति रहती थी…!

लेकिन वो अपनी माँ का आग्याकारी पुत्र, इन सब चीज़ों से परे, उसे बस माँ जो कहेगी वही सही वाली स्थिति में था…!

ना किसी से कोई ज़्यादा लेना देना, अपनी राह जाना, अपनी राह आना….! पढ़ने और खेल कूद में हमेशा अब्बल, सो सारे टीचर्स की पहली पसंद… ऐसा था रंगीली का शंकर….!

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कल्लू की दूसरी पत्नी लाजो इतने अच्छे संसकारों वाली नही थी, जो कि सुषमा की तरह संकोच बस हर तरह की बात को अपने अंदर ही दफ़न कर ले…

कल्लू की मर्दानगी की पोल तो उसके उपर पहली रात को ही खुल गयी थी…, वो समझ गयी कि बेटा पैदा करना इसके बस की बात नही है...,

पहली पत्नी से बेटी भी कैसे पैदा हो गयी ये भी बड़े अचरज की बात है…!

उसने तय कर लिया कि अगर इस घर पर राज करना है तो बेटा पैदा करना ही पड़ेगा, और कैसे पैदा करना है इस बारे में वो सोचने लगी…!

 
वो एक ऐसी माँ की बेटी थी, जो इधर उधर की खबर रखने में और पहुँचाने में माहिर होती हैं.., तो जाहिर सी बात है कि माँ के गुण तो बेटी में पहले से ही होने चाहिए…!

अपनी इसी सोच के कारण उसकी नज़र शंकर पर पड़ी, जिसके लिए पूरी हवेली में कहीं भी आने-जाने पर कोई रोक-टोक नही थी…!

तेज स्वाभाव लाजो, ये भली भाँति जानती थी, कि शंकर अभी नादान है, कच्चा है, अगर अभी से इस पर डोरे डाले जायें, इसे अपने जाल में फँसाया जाए, तो उसका काम आसान हो सकता है…!

अपनी इसी सोच को कार्यान्वित करने के लिए वो हर समय उसपर नज़र रखने लगी,

काम-धाम तो कोई था नही, सो लग गयी उसे अपने जाल में फँसाने…!

एक दिन अपनी माँ के कहने पर शंकर रसोई घर से कुछ समान लेने गया, मौका देखकर लाजो भी उसके पीछे-पीछे लपक ली….,

वो समान लेकर निकल ही रहा था, कि लागो ने उसे शहद भरे स्वर में पुकारा – शंकर भैया, ज़रा सुनो तो…!

वो उसकी आवाज़ सुनकर ठिठक गया, और बोला – जी छोटी भाभी, कुछ काम था ?

लाजो – हां, मे वो अखरोट देख रही थी, कहीं दिखाई नही दे रहे, ज़रा देखो तो उपर कहीं तो नही रखे…!

उसने अपने हाथ का समान नीचे रखा, और उपर अलमारी के खाने से अखरोट का डिब्बा ढूँढने लगा…!

उसने जैसे ही अपने हाथ उपर किए, वो उसके ठीक सामने आकर उससे सत्कार खड़ी हो गयी, और अपने पंजों पर उचक-उचक कर अपनी गान्ड को उसके लंड के पास लेजाने की कोशिश करती हुई बोली –

इधर देखो तो, उधर देखो तो, यहीं कहीं होंगे, गये कहाँ…, ज़रा अच्छे से देखो, ये कहकर उसने अपनी गान्ड को उसके आगे ज़ोर्से घिस डाला…

लाजो की गुद-गुदि गान्ड की गर्मी पाकर उसका जवान लंड एक सेकेंड में ही खड़ा हो गया, और ढीले-ढाले पाजामे के कपड़े को तानकर उसकी गान्ड की दरार के उपर ठोकर मारने लगा…

खेली खाई लागो, उसके लंड की सख्ती को अच्छे से पहचान कर मस्ती से भर गयी..! वो अपनी गान्ड को और ज़्यादा पीछे को दबाकर मज़े लेने लगी…!

कुछ देर उपर देखने के बाद शंकर ने कहा – यहाँ तो कहीं नही दिखाई दे रहा छोटी भाभी…!

उसने उसके पाजामे के उपर से ही उसके लंड को अपनी मुट्ठी में लेकर कहा – जाने दो, मुझे जो चाहिए था वो मिल गया…!

शंकर ने उसकी तरफ देख कर कहा – क्या मिल गया आपको…?

वो उसकी आँखों में झाँकते हुए उसके लंड को मसलकर बोली – ये तुम्हारा खिलौना…आअहह…क्या मस्त है, इसे खेलने के लिए दोगे मुझे..?

शंकर ने उसकी कलाई पकड़कर अपने लंड को छुड़ाते हुए कहा – छोड़िए इसे, ये कोई खिलौना नही है, मेरी सू-सू है…! शायद कोई ग़लत फहमी हुई है आपको…!

लंड को छोड़ कर वो उसके बदन से लिपट गयी, आअहह…शंकर भैया, आपको नही पता, इससे खेलने में बड़ा मज़ा आता है, खेलकर तो देखो एक बार…!

शंकर ने अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा – मुझे नही आता खेलना ऐसा कोई खेल, जाने दीजिए वरना माँ की डाँट पड़ेगी, उसका समान देना है…!

वो दाँतों से अपना नीचे का होंठ काट कर उसकी आँखों में झाँकते हुए बोली – आअहह.. राजा, ताड़ की तरह इतने लंबे और तगड़े हो रहे हो…

माँ के पल्लू से कब तक बँधे रहोगे, थोड़ा जिंदगी के मज़े लेना सीखो राजा.., तुम्हें खेलना नही आता तो मे सीखा दूँगी ये खेल…!

शंकर इतना भी नादान नही था, वो कुछ- कुछ उसकी मंशा समझने लगा, लंड तो उसका भी अकड़ ही चुका था, लेकिन माँ की अवग्या वो नही कर सकता था,

उसे बस इतना पता था, कि उसकी माँ जब तक नही कहेगी, वो किसी के साथ कुछ भी नही करेगा, वो मेरा भला चाहती है…

उसने ज़बरदस्ती से उसके बाजुओं को पकड़कर अपने बदन से अलग करते हुए बोला – मुझे नही सीखना आपका कोई खेल,

फिर झट-पट से अपना समान उठाया, और लंबे-लंबे डॅग भरते हुए तेज़ी से वहाँ से निकल गया…!

खिसियानी लाजो, कुछ देर वहीं खड़ी भुन-भुनाती रही, फिर बुदबुदाते हुए बोली

कब तक बचेगा बच्चू, मे भी ऐसी जोंक हूँ जो एक बार चिपक गयी तो छूटेगी नही…!

उधर जब शंकर अपनी माँ के पास पहुँचा तो उसने देरी से आने का कारण पुछा, अभी वो उसकी बात का कोई जबाब भी नही दे पाया था कि तभी उसकी नज़र उसके पाजामे में बने तंबू पर पड़ी…!

उसने आव ना देखा ताव, दो गाल पर तमाचे चटका दिए बेचारे के, और तमक कर बोली – तुझे जिस काम के लिए मना करती हूँ, तू वही काम क्यों करता है…!

वो बेचारा तो वहीं खड़े खड़े जड़ हो गया, उसकी मार का उसपर कोई असर नही हुआ, क्योंकि उसके शरीर का हर एक अंग इतना मजबूत था, कि रंगीली जैसी कोमलांगी के ही हाथ के थप्पड़ों से उसपर क्या असर होना था,

उल्टा वो सोचने लगा कि कहीं माँ के हाथ में चोट तो नही आ गई…!

लेकिन वो ये सोचने लगा कि मेने तो कोई जबाब भी नही दिया फिर माँ ने उसे किस बात के लिए मारा…?

दो थप्पड़ जड़ने के बाद उसे खुद को दर्द हुआ और तड़प कर बोली – बेटा तू क्यों समझना नही चाहता है…?

शंकर – तू क्या कह रही है माँ..., मेरी तो कुछ समझ में नही आ रहा, तूने जो सवाल किया, पहले उसका जबाब तो सुन लेती कि मुझे देर कैसे हुई…!

रंगीली – वो तू बाद में बताना, पहले ये बता, ये तेरा पाजामा इतना उठा हुआ क्यों है आगे से…?

 
शंकर की अब समझ में आया कि माँ गुस्सा किस बात से है, सो उसके हाथ सहलाते हुए बोला – पहले ये बता तेरे हाथ में चोट तो नही लगी…?

पिटने के बाद भी अपने लाड़ले को उसकी फिकर करते देख वो तड़प उठी, और उसे अपने कलेजे से लगाकर बोली – तूने जबाब नही दिया बेटा..?

शंकर – दोनो बातों का जबाब एक ही है माँ, फिर उसने रसोईघर में उसके साथ हुए वाकिये का ज्यों का त्यों विवरण कह सुनाया…!

रंगीली मुँह फाडे ठगी सी ये सब सुनती रही, लाजो के उपर उसे इस कदर गुस्सा आ रहा था, अगर उसका वश चलता तो वो उसका खून पी जाती,

अपनी भावनाओं को काबू में रखते हुए वो बोली – देख बेटा, आगे से तू उस डायन के आस-पास भी मत जाना, भले ही वो तुझे बुलाने की कोशिश क्यों ना करे…

अगर फिर भी वो तेरे पीछे पड़ी रहे, और किसी काम के बहाने से बुलाने की कोशिश करे तो कह देना, माँ से पूछो.. ठीक है,

और हाँ, अब स्कूल से आकर तू ज़्यादा से ज़्यादा सलौनी के पास रहकर वहीं अपने बापू के घर,

वो भी तेरे साथ अच्छे से पढ़ाई कर लिया करेगी.. ठीक है.., इतना कहकर उसने अपने बेटे का माथा चूम लिया…

शंकर अपनी माँ को हां बोलकर अपनी पढ़ाई करने अपनी बेहन सलौनी के पास चल दिया….!

लेकिन इस घटना ने शंकर के कोमल मन के तारों को ज़रूर छेड़ दिया था,

ये उमर ही ऐसी होती है, जो भी नया अनुभव होता है और मन को अच्छा लगता है, दिमाग़ भी उसी की तरफ भागने की कोशिश में लग जाता है…

ये तरुण अवस्था दिमाग़ की वजए मन के आधीन रहती है, दिमाग़ तो सिर्फ़ किताबी ज्ञान लेने के लिए ही उपयोग होता है…

आज पहली बार उसे अपनी माँ के अलावा किसी दूसरी प्रौढ़ स्त्री के शरीर का स्पर्श हुआ था, वो भी उसके ऐसे अंगों पर जहाँ वो पहले से ही नियंत्रण कर पाने में अपने को असमर्थ पाता था…

उसके इसी अनुरोध पर उसने अपनी माँ से भी अपने लिंग की मालिश करवाना बंद कर दिया था,

क्योंकि वो उसका हाथ लगते ही किसी बिगड़ैल घोड़े की तरह हिनहीना कर खड़ा हो जाता था जिसे शांत करने में उसे काफ़ी वक़्त लग जाता…!

चलो वो तो उसकी माँ थी, जो बचपन से ही उसकी परवरिश करती आ रही थी, लेकिन आज तो किसी दूसरी औरत ने तो ऐसी हरकतें की उसके साथ की वो चाहकर भी उन्हें अपने मन से निकाल नही पा रहा था…

पूरे दिन वो ऐसे ही विचारों में खोया रहा, बेमन से रात का खाना खाकर जैसे तैसे वो सो गया………..……….!

............................

आज स्कूल में कबड्डी का मॅच था, शंकर की टीम ने 12थ क्लास की टीम को चॅलेंज दिया था, जो पुरे स्कूल में टॉप पर थी…

शंकर को छोड़ कर उसकी क्लास के ज़्यादातर बच्चे सामने वाली टीम के सामने बच्चे जैसे ही लग रहे थे, तो वो विपक्षी टीम के सामने ज़्यादा देर तक खड़े ही नही रह पाए, अकेला शंकर ही ऐसा था जो उनसे टक्कर ले पा रहा था…,

आख़िर अपनी मेहनत और ताक़त के दम पर वो फाइनल राउंड में जीत ही गया….!

लेट होने की वजह से सलौनी अपनी सहेलियों के साथ घर चली गयी थी,

वो अकेला ही पसीने से तर सावन के मौसम में, मस्त साइकल पर हवा के झोंकों का मज़ा लेता हुआ घर की ओर आरहा था…

कि अचानक से तेज बारिश होने लगती है, बारिश इतनी तेज थी कि उसे साइकल चलाना दूभर हो गया, आख़िर में वो एक पेड़ के नीचे जाकर खड़ा हो गया…

कपड़े पानी से तर होकर उसके बदन से चिपक चुके थे, उसका लंड पाजामे से ऐसा दिख रहा था जैसे उसके उपर कोई कपड़ा ही ना हो…!

अचानक एक युवती पास के खेत से निकल कर उस पेड़ की तरफ बढ़ी चली आरहि थी, उसके बदन पर मात्र एक झीने कपड़े की साड़ी लिपटी हुई थी जो भीगने के कारण उसके बदन से चिपकी हुई थी…!

19-20 साल की वो युवती उससे कुछ ही फ़ासले पर आकर खड़ी हो गयी, और शंकर को तिर्छि नज़र से देख कर मंद मंद मुस्कराने लगी…!

पहली बार उसने उस युवती पर भरपूर नज़र डाली, वो उसके मादक बदन के कटाव में खो गया…

झीनी साड़ी बदन से चिपकी हुई थी, जिसमें से उसके अनार जैसी चुचियाँ साफ नुमाया हो रही थी, गोरा बदन होने के कारण उस भीगी हुई सारी से साफ-साफ दिख रहा था…

शंकर की नज़र उपर से नीचे तक उसकी कामुक काया पर फिसलने लगी, अपने को लाख रोकने की कोशिश के बाद भी वो उसके रूप लावण्य को देखने से रोक नही पा रहा था…

उठे हुए अनारों के शिखर पर उसे दो जंगली बेर कहो या अधपके जामुन जैसे निपल जो उसकी गीली साड़ी के कपड़े से बाहर झाँक रहे रहे थे…

धीरे-धीरे उसकी नज़र फिसल कर उसके नीचे की तरफ बढ़ी, पतली सी कमर के उपर उसका सपाट पेट जिसके बीचो बीच हल्की सी गहराई लिए उसका नाभि कुंड…

फिर जैसे ही उसकी नज़र उसके योनी प्रदेश पर गयी, शंकर की साँसें ही जैसे अटक गयी, गीली साड़ी की सीलबटों के पीछे उसे कुछ दिखा तो नही, लेकिन वहाँ की भौगौलिक स्थिति वो भली भाँति भाँप चुका था…

नीचे दो केले के तने जैसी उसकी चिकनी गोरी जांघे…उसकी आहह.. निकल गयी ये सब देख कर…, वो युवती उसे रति का प्रतिरूप दिखाई दे रही थी…!

कामदेव के स्वरूप इस नाव युवक को अपनी ओर इस चाहत भरे अंदाज से निहारते देख वो युवती, एक कामुक सी मुस्कान बिखेरती हुई धीरे-धीरे उसके नज़दीक आने लगी…

वो निरंतर उसकी आँखों में देखे जा रही थी, शंकर मानो उसके रूप जाल से सम्मोहित ही हो गया था…

 
पास आकर उस युवती ने बड़े नशीले अंदाज में उसका हाथ पकड़ा और उसे पेड़ के तने की तरफ ले जाने लगी, वो किसी सम्मोहन से बँधा चुपचाप उसके पीछे – पीछे चल दिया…!

युवती ने उसे तने से पीठ टिका कर बिठा दिया, और खुद अपना आँचल नीचे करके उसकी गोद में बैठ गयी…!

उसकी मादक, भरी हुई मुलायम गद्देदार गान्ड का एहसास होते ही उसका लंड पाजामे के अंदर खड़ा हो गया…!

आँखों के सामने उसके गोल-गोल इलाहाबादी अमरूद जैसे दूधिया उभर, जिनके शिखर पर कंचे जैसे गोल-गोल कड़क निपल, जो बारिश के ठंडे पानी से और ज़्यादा कड़क हो गये थे…

उस युवती ने उसके हाथ पकड़ कर अपने अनारों पर रख कर दबा दिए, शंकर किसी मशीन अंदाज में उन्हें धीरे-धीरे मसल्ने लगा…,

उस युवती ने एक मीठी सी आअहह भरते हुए उन्हें और आगे को कर दिया, और अपने दहक्ते होंठ उसके होंठों से जोड़ दिए…!

अब वो युवती धीरे धीरे नीचे को खिसकाने लगी, और उसकी टाँगों के बीच आकर उसने उसका पाजामा खींच कर उसके बदन से अलग कर दिया…!

और खुद खड़ी होकर अपनी उस नाम मात्र की गीली साड़ी के आवरण को भी अपने बदन से अलग कर दिया….

पहली बार शंकर को उसकी मांसल जाँघो के बीच का योनि प्रदेश दिखाई दिया.., बिना बालों की उसकी चिकनी चमकदार योनि की दो फांकों के बीच उसे एक दरार सी दिखाई पड़ी…!

पहली बार किसी औरत की यानी वो भी इतनी सुंदर, कामुक, देखकर शंकर का दिल रेल के एंजिन की तरह धड़कने लगा….,

उसका दिल किया कि उठकर उसकी दरार को खोलकर देखे, लेकिन उसे अपनी इच्छा को वहीं दफ़न करना पड़ा,

क्योंकि तभी वो युवती घूम गयी, और फिर जो दृश्य उसकी नज़रों के सामने था वो उसके लिए किसी कयामत से कम नही था…

उसकी पतली सी कमर के नीचे दो गोल-गोल बॉल जैसे नितंब, जिनके बीच एक पतली सी दरार जिसकी गहराई का उसे कोई पता नही था, किसी पतली रेखा सी लगी…!

वो युवती बड़े कामुक अंदाज से दो कदम आगे बढ़ी, उसके चलने से उसके वो दोनो गोल-गोल मटके जैसे नितंब उस पतली सी दरार में घर्षण पैदा करते हुए उपर नीचे होने लगे…!

शंकर किसी किन्कर्तव्य विमूढ़ की तरह उन्हें आँखें फाडे बस देखे जा रहा था… कुदरत की इस असीम कारीगरी को वो किसी तमाशबीन की तरह बैठा देखता रहा…

उसकी उत्तेजना ऐसे कामुक बदन को देख कर निरंतर बढ़ती जा रही थी, उस बदन को आतिशीघ्र भोगने की उसकी लालसा बलवती होती जा रही थी,

वो अपने आप पर काबू नही रख सका और अपनी जगह से खड़े होने का मन बना लिया…

कि तभी वो युवती उसकी तरफ पलटी, और बड़े कामुक अदा से मुस्कराते हुए उसने उसकी तरफ देखा…

मानो पुछ रही हो, कि बोलो कैसा लगा ये कुदरत का करिश्मा…!

वो धीरे-धीरे चलते हुए उसके पास पहुँची और उसकी टाँगों के बीच बैठकर उसने उसके लंड को अपनी मुट्ठी में ले लिया, जैसे कोई सपेरा, अपने सबसे पसंदीदा नाग का फन अपने हाथ में लेता है…

दो-तीन बार उसने उसे अपने हाथ से उपर नीचे किया, जिसका सुपाडा अभी अच्छे से खुल भी नही पा रहा था…, शंकर की उत्तेजना अपनी चरम सीमा पर थी…

फिर उस युवती ने उसकी आँखों में झाँकते हुए उसके लंड को चूम लिया….!

आअहह…..उसके दहक्ते होंठों का स्पर्श अपने लंड पर महसूस करते ही उसकी कमर स्वतः ही हवा में उठ गयी.. और उसके मुँह से सिसकी निकल गयी…

 
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