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रंगीला लाला और ठरकी सेवक

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Guest
रंगीला लाला और ठरकी सेवक

मित्रो एक और कहानी नेट से ली है इसे आशु शर्मा ने लिखा है मैं इसे हिन्दी फ़ॉन्ट मे आरएसएस पर पोस्ट कर रहा हूँ मेरी ये कोशिस आपको कैसी लगती है अब ये देखना है और आपका साथ भी सबसे ज़रूरी है जिसके बगैर कोई भी लेखक कुछ नही कर सकता हमारी मेहनत तभी सफल है जब तक आप साथ हैं ................ चलिए मित्रो कहानी शुरू करते हैं ................



झुक कर बैठक में झाड़ू लगा रही रंगीली को जब ये एहसास हुआ कि उसके पीछे कोई है, तो वो झट से खड़ी होकर पलटी,

अपने ठीक सामने खड़े अपने मालिक, सेठ धरमदास को देख वो एकदम घबरा गयी, और अपनी नज़र झुका कर थर-थराती हुई आवाज़ में बोली-

क.क.ककुउच्च काम था मालिक…?

धरमदास ने आगे बढ़कर उसके दोनो बाजुओं को पकड़कर कहा – हां हां ! बहुत ज़रूरी काम है हमें तुमसे, लेकिन सोच रहे हैं तुम उसे करोगी भी या नही..

रंगीली ने थोड़ा अपने बाजुओं को उनकी गिरफ़्त से आज़ाद करने की चेष्टा में अपने बाजुओं को अपने बदन के साथ भींचते हुए कहा – मे तो आपकी नौकर हूँ, हुकुम कीजिए मालिक क्या काम है..?

सेठ धरमदास ने उसके बाजुओं को और ज़ोर्से कसते हुए कहा – जब से तुम हमारे यहाँ काम करने आई हो, तब से तुमने मेरे दिन का चैन, रातों की नींद हराम कर रखी है…

लाख कोशिशों के बाद भी तुम अभी तक हमसे दूर ही भागती रहती हो,

ये कहकर उसने एक झटके से रंगीली को अपने बदन से सटने पर मजबूर कर दिया,

वो सेठ जी की चौड़ी चकली छाती से जा लगी..

उसके गोल-गोल चोली में क़ैद, कसे हुए कच्चे अमरूद ज़ोर्से सेठ की मजबूत छाती से जा टकराए, उसको थोड़ा दर्द का एहसास होते ही मूह से कराह निकल गयी…

आअहह… मलिक छोड़िए हमें, झाड़ू लगाना है, वरना मालकिन गुस्सा करेंगी…

रंगीली के हाथ से झाड़ू छुटकर नीचे गिर चुका था, उसने अपने दोनो हाथों को सेठ के सीने पर रख कर, ज़ोर लगाकर सेठ को अपने से अलग करते हुए बोली –

य.य.यईए…आप क्या कर रहे हैं मालिक, भगवान के लिए ऐसा वैसा कुच्छ मत करिए मेरे साथ..

हम तुम्हें बहुत प्यार करते हैं रंगीली, आओ हमारी बाहों में समा जाओ, ये कहकर उसने फिरसे उसे अपनी ओर खींच लिया, और उसके सुडौल बॉली-बॉल जैसे चुतड़ों को अपने बड़े-2 हाथों में लेकर मसल दिया…

दर्द से बिल-बिला उठी वो कमसिन नव-यौवना, आआययईीीई…माआ…, फिर अपने मालिक के सामने गिड-गिडाते हुए बोली –

भगवान के लिए हमें छोड़ दीजिए मालिक, हम आपके हाथ जोड़ते हैं,

लेकिन उसकी गिड-गिडाहट का सेठ धरमदास पर कोई असर नही हुआ, उल्टे उनके कठोर हाथों ने उसके नितंबों को मसलना जारी रखा…

फिर एक हाथ को उपर लाकर उसके एक कच्चे अनार को बेदर्दी से मसल दिया…

दर्द से रंगीली की आँखों में पानी आगया, अपनी ग़रीबी और बबसी के आँसू पीकर उसने एक बार फिरसे प्रतिरोध किया, और सेठ को धक्का देकर अपने से दूर कर दिया…

फिर झाड़ू वही छोड़कर लगभग भागती हुई वो बैठक से बाहर चली गयी….!

 
सेठ अपने चेहरे पर मक्कारी भरी हँसी लाकर, अपने आधे खड़े लंड को धोती के उपर से मसल्ते हुए मूह ही मूह में बुद्बुदाया…

कब तक बचेगी रंगीली, तेरी इस मदभरी कमसिन जवानी का स्वाद तो हम चख कर ही रहेंगे, भले ही इसके लिए हमें कुच्छ भी करना पड़े,

तुझे पाने के लिए ही तो हमने इतना बड़ा खेल खेला है, अब अगर तू ऐसे ही निकल गयी तो थू है मेरी जवानी पर ………

बात 70 के दसक की है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गाओं, जहाँ के सेठ धरम दास जो इस गाओं के ही नही आस-पास के तमाम गाँव में सबसे धनी व्यक्ति थे…

वैसे तो इनके पिता की छोड़ी हुई काफ़ी धन दौलत थी इनके पास फिर भी ये गाओं और आस पास के सभी वर्गों के लोगों को सूद पर धन देकर, उससे सूद इकट्ठा करके अपने धन में और दिनो-दिन बढ़ोत्तरी करते जा रहे थे.

ब्याज दर ब्याज, जो एक बार इनके लपेटे में आ गया, समझो कंगाल ही हो गया..

घर, ज़मीन गिरबी रख कर भी उसे छुटकारा नही मिला और आख़िरकार वो उसे गँवा देनी ही पड़ी…

इस तरह से ना जाने कितनी ही एकर ज़मीन सेठ धरमदास अपने नाम कर चुके थे.

धर्म दास की पत्नी पार्वती देवी, एक मध्यम रंग रूप की छोटे से कद की मोटी सी, बड़ी ही खुर्राट किस्म की औरत थी.

किसी तरह से इनके 3 बच्चे पैदा हो गये थे, जिनमें सबसे बड़ा बेटा कल्लू था.

उसके बाद दो लड़कियाँ पैदा हुई, क्रमशः कल्लू से 4 और 6 साल छोटी थी…

माँ का दुलारा कल्लू, पढ़ने लिखने में बस काम चलाऊ ही था, किसी तरह से पास हो जाता था… लेकिन लड़कियाँ काफ़ी तेज थीं.

सेठ का मन अपनी सेठानी से तो कब का ऊब चुका था, अब तो वो अपने पैसे के दम पर बाहर ही अपनी मलाई निकालते रहते थे…

कभी कभी तो किसी बेचारी ग़रीब दुखियारी औरत को ही, इनका सूद पटाने के चक्कर में इनके लंड के नीचे आना पड़ जाता था…

सूद तो खैर क्या पटना था, बदले में उसे आए दिन किस्त जमा करने आना ही पड़ता था…और अगर वो सेठ को ज़्यादा दिन तक नज़र नही आई, तो उनके मुस्टंडे जा धमकते उसके घर बसूली के बहाने…

अब थोड़ा सेठ धरमदास के व्यक्तित्व का भी जिकर हो जाए…

38 वर्स के सेठ धरम दास, गोरा लाल सुर्ख रंग, 5’8” की मध्यम हाइट, पेट थोड़ा सा बाहर को निकला हुआ, लेकिन इतना नही कि खराब दिखे…

हल्की-हल्की मूँछे रखते थे, हर समय एक फक्क सफेद धोती, के नीचे एक घुटने तक का पट्टे का घुटन्ना (अंडरवेर) ज़रूर पहनते थे..

उपर एक सफेद रंग की हाथ की सिली हुई फातूरी (वेस्ट) जिसमें पेट पर एक बड़ी सी जेब होती थी…

घर पर वो ज़्यादा तर इसी वेश-भूसा में पाए जाते थे, लेकिन कहीं बाहर जाना हो तो, उपर एक हल्के रंग का कुर्ता डाल लेते थे.

इतनी सारी खूबियों के बावजूद उनका सुबह-2 का नित्य करम था, कि नहा धोकर लक्ष्मी मैया की पूजा करके, माथे पर इनके सफेद चंदन का तिलक अवश्य पाया जाता था…

देखने भर से ही सेठ बड़े भजनानंदी दिखाई देते थे, लेकिन थे नंबरी लंपट बोले तो ठरकी...

जहाँ सुंदर नारी दिखी नही कि, इनकी लार टपकना शुरू हो जाती थी…

सेठ की तीन मंज़िला लंबी चौड़ी हवेली, गाओं के बीचो बीच गाओं की शोभा बढ़ाती थी…

मेन फाटक से बहुत सारा लंबा चौड़ा खुला मैदान, उसके बाद आगे बारादरी, जिसके बीचो-बीच से एक गॅलरी से होते हुए अंदर फिर एक बड़ा सा चौक, जिसके चारों तरफ बहुत सारे कमरे…

सेठ की गद्दी (बैठक) हवेली के बाहरी हिस्से में थी, एक बड़े से हॉल नुमा कमरे के बीचो-बीच, एक बड़े से तखत के उपर मोटे-मोटे गद्दे, जिसपर हर समय एक दूध जैसी सफेद चादर बिछि होती थी,

तीन तरफ मसंद लगे हुए, और तखत के आगे की तरफ एक 3-4 फीट लंबी, 1फीट उँची, डेस्क नुमा लकड़ी की पेटी, जिसके उपर उनके बही खाते रखे होते थे…!

अपनी बसूली की श्रंखला में ही एक दिन दूर के गाओं में इनकी नज़र रंगीली पर पड़ गयी…

 
गोरा रंग छर्हरे बदन <18 वर्ष की रंगीली रास्ते के सहारे अपने जानवरों के वाडे में घन्घरा-चोली पहने अपने पशुओं के गोबर से उपले बना रही थी…

बिना चुनरी के उसके सुन्दर गोले-गोरे अल्पविकसित उभार उसकी कसी हुई चोली से अपनी छटा बिखेर रहे थे,

पंजों के उपर बैठी जब वो उस गोबर को मथने के लिए आगे को झुकती तो उसके अनारों के बीच की घाटी कुच्छ ज़्यादा ही अंदर तक अपनी गहराई को नुमाया कर देती…

रास्ते से निकलते सेठ धरमदास की ठरकी नज़र उस बेचारी पर पड़ गयी…, वो तुरंत वहीं ठिठक गये, और खा जाने वाली नज़रों से उसकी कमसिन अविकसित जवानी का रस लेने लगे…

उन्हें खड़ा होते देख, साथ चल रहे उनके मुनीम भी रुक गये और अपने मालिक की हरकतों को परखते ही चस्मे के उपर से उनकी नज़रों का पीछा करते हुए रसीली की कमसिन जवानी को देखते ही अपनी लार टपकाते हुए बोले –

ये बुधिया बघेले की बेटी है मालिक,

सेठ – कॉन बुधिया…?

मुनीम – वोही, जिसकी ज़मीन और मकान दोनो ही हमारे यहाँ गिरबी रखे हैं…

ये सुनकर सेठ की आँखें रात के अंधेरे में जगमगाते जुगनुओ की मानिंद चमक उठी…

मुनीम की बात सुनते ही सेठ के लोमड़ी जैसे दिमाग़ ने वहीं खड़े-खड़े इस कमसिन सुंदरी को भोगने का एक बहुत ही शानदार प्लान बना लिया…, और उनकी आँखें हीरे की तरह चमक उठी…

अपने सेठ की आँखों की चमक को पहचानते ही मुनीम बोला – बुधिया को बुलाऊ सरकार…

सेठ ने मुस्कुराती आँखों से अपने मुनीम की तरफ देखा और अपनी धोती को उपर करने के बहाने, अंगड़ाई ले चुके लंड को मसलते हुए बोले –

तुम सचमुच बहुत समझदार हो मुनीम जी…. चलो बुधिया के पास चलते हैं…

बुधिया का घर उसके जानवरों के बाँधने वाली जगह यानी घेर से थोड़ा चल कर गाओं के अंदर था,

कच्चे मिट्टी के अपने छोटे से घर के आगे बने चबूतरे पर चारपाई पर बैठा बुधिया, अपने दो पड़ौसीयों के साथ हुक्का गडगडा रहा था,

सबेरे-सबेरे जन्वरी फेब्रुवरी के महीने में खेती-किसानी का कोई खास काम तो होता नही, गाओं में लोग बस ऐसे ही आपस में बैठ बतिया कर समय पास करते हैं…

हुक्का गडगडाते हुए उसकी नज़र उसके घर की तरफ आते हुए सेठ धरमदास और उसके मुनीम पर पड़ी…

बेचारे के तिर्पान काँप गये, सोचने लगा, आज सबेरे-सबेरे ये राहु-केतु मेरे घर की तरफ क्यों आ रहे हैं, अभी कुच्छ महीने पहले ही तो बसूली करके ले गये हैं..

अब अगर इन्होने कोई माँग रख दी, तो.. ? ये सोचकर वो अंदर तक काँप गया…

4 बच्चों और खुद दो प्राणी को पालने लायक ही अनाज बचा था बेचारे के पास,

अब और इसको कुच्छ देना पड़ा तो…, भूखों मरने की नौबत आ सकती है…!

अभी वो हुक्के की नई (नली का सिरा जिसे मूह में देकर धुए को सक करते हैं) को उंगली के सहारे मूह पर लगाए इन्ही सोचों में डूबा हुआ ही था, तब तक वो दोनो उसके चबूतरे तक पहुँच गये,

बुधिया के दोनो पड़ौसी सेठ को देख कर चारपाई से खड़े होकर दुआ-सलाम करने लगे, तब जाकर उसकी सोच को विराम लगा,

वो फ़ौरन हुक्के को छोड़ खड़ा हुआ और अपनी खीसें निपोर कर बोला – राम-राम सेठ जी, आज सबेरे-सबेरे कैसे दर्शन दिए…?

सेठ – राम-राम बुधिया… कैसे हो भाई… सब कुशल मंगल तो है ना…?

बुधिया– आप की कृपा से सब कुशल मंगल है सेठ जी…आइए, कैसे आना हुआ..?

सेठ – बस ऐसे ही गाओं में आए थे, कुच्छ लोगों से हिसाब-किताब वाकी था, सोचा एक बार तुम्हारे हाल-चाल भी पुच्छ लें…

बुधिया हिसाब-किताब की बात सुनकर फिर एक बार अंदर ही अंदर काँप गया, लेकिन अपने दर्र पर काबू रखने की भरसक कोशिश करने के बाद भी उसकी आवाज़ काँपने लगी और हकलाते हुए बोला –

ल .ल्ल्लेकींन…सेठ जी मेने तो इस बरस का हिसाब कर दिया था…

सेठ उसकी स्थिति भली भाँति समझ चुके थे, सो उसे अस्वस्त करते हुए बोले – अरे तुम्हें फिकर करने की ज़रूरत नही है बुधिया…तुमसे तो बस ऐसे ही हाल-चाल जानने चले आए…!

सेठ जी की बात सुनकर उसकी साँस में साँस आई, और एक लंबी गहरी साँस छोड़ते हुए बोला – तो फिर बताइए सेठ जी ये ग़रीब आपकी क्या सेवा कर सकता है..

सेठ – सेवा तो हम तुम्हारी करने आए हैं बुधिया, सुना है तुम्हारी बेटी जवान हो गयी है, शादी-वादी नही कर रहे हो उसकी…!

भाई बुरा मत मानना, जवान बेटी ज़्यादा दिन घर में रखना ठीक बात नही है..

बुधिया – हां सेठ जी शादी तो करनी है, लेकिन ग़रीब आदमी के पास इतना पैसा कहाँ है,

अब आपसे तो कुच्छ छुपा हुआ नही है, जो होता है उसमें से आपका क़र्ज़ चुकाने के बाद उतना ही बच पाता है, कि बच्चों के पेट पाल सकें…

शादी में लड़के वालों को लेने-देने, उनकी खातिर तबज्जो करने में बहुत खर्चा लगता है,

अब नया क़र्ज़ लूँ तो उसे चुकाने के लिए कहाँ से आएगा, यही सब सोचकर अभी तक चुप बैठा हूँ…!

 
बुधिया की बात सुनकर, सेठ जी ने एक अर्थपूर्ण नज़र से अपने मुनीम की तरफ देखा, और फिर बड़े ही अप्नत्व भाव से बोले –

देखो बुधिया, तुम्हारी बेटी इस गाओं की बेटी, अब हमारा संबंध इस गाओं से भी है, तो बेटी की शादी में मदद करना हमारा भी कुच्छ फ़र्ज़ बनता है..

अगर तुम्हें कोई एतराज ना हो, तो हम तुम्हें वो रास्ता बता सकते हैं, जिससे तुम्हारे उपर कोई भार भी ना पड़े, और लड़की भी एक सुखी परिवार में पहुँच जाए…

सेठ की बात सुनकर बुधिया को लगा कि आज उसके यहाँ सेठ के रूप में साक्षात भगवान पधारे हैं, सो उनके हाथ जोड़कर बोला – वो क्या रास्ता है सेठ जी,

अगर ऐसा हो गया तो जीवन भर में आपके चरण धो-धोकर पियुंगा…

सेठ जी मुस्कुरा कर बोले – अरे नही भाई, ये तो हम गाओं की बेहन-बेटी के नाते कर रहे हैं..., तुम्हारी बेटी सुखी रहे बस…

हमारे गाओं के रामलाल को तो तुम जानते ही होगे, अरे वोही जिसका बेटा रामू रेलवे में नौकरी करता है,

उसके पास कुच्छ ज़मीन जयदाद भी है, तुम्हारी बेटी राज करेगी वहाँ…

अगर हां कहो तो हम रामलाल से बात चलायें,

बुधिया - पर सेठ जी, वो लड़का तो कद में छोटा है, और कुच्छ रंग भी हेटा है..मेरी बेटी रंगीली तो उससे ज़्यादा लंबी है और रंग की भी बहुत सॉफ है, जोड़ी कुच्छ अजीब सी नही लगेगी.

सेठ जी – देखलो भाई, हमने तो सोचा था, रामलाल भी अपना आदमी है, तुम भी हमारे अपने ही हो, लेन-देन की कोई बात नही रहेगी,

और रही बात बारातियों की खातिर तबज्ज़ो की, अगर तुम ये रिस्ता मंजूर करते हो, तो उसका खर्चा एक बेटी के कन्यादान स्वरूप हम अपनी तरफ से उठा लेंगे…!

इतना अच्छा प्रस्ताव सुनकर बुधिया सोच में पड़ गया, अब वो सोचने लगा कि चलो थोड़ा बहुत जोड़ा 19 -20 भी हो तो क्या हुआ,

4 बच्चों में से एक लड़की का जीवन तो संवर जाए, और सेठ जी की कृपा से शादी भी फोकट में हो जाएगी… !

सेठ – किस सोच में पड़ गये बुधिया, भाई मुझे तो अपने लोगों की चिंता है इसलिए इतना कहा है, वरना मुझे क्या पड़ी… तुम्हारी लड़की जब तक चाहो घर में बिठाकर रखो…

बुधिया – नही ऐसी बात नही है सेठ जी, आप तो हमारे अन्न दाता हैं, मे रंगीली की माँ से एक बार बात करके आपको जबाब देता हूँ, वैसे आप मेरी तरफ से तो हां ही समझो…

उसकी बात सुनकर सेठ के मन में लड्डू फूटने लगे, उसको पता था, कि इतने अच्छे प्रस्ताव को ये ग़रीब आदमी ठुकराने से रहा और रामलाल वही करेगा जो हम कहेंगे…

सेठ – अच्छा तो बुधिया हम चलते हैं, अपनी पत्नी से बात कर्लो, फिर तसल्ली से बता देना, उसके बाद ही हम रामलाल से बात करेंगे, ठीक है..

बुधिया हाथ जोड़कर – जी सेठ जी राम – राम…..

दो महीने बाद ही रंगीली रामू की पत्नी के रूप में शादी करके सेठ के गाओं आ गयी,

अब यहाँ रामू के घर परिवार के बारे में बताना भी ज़रूरी है…

रामलाल के भी 4 बच्चे थे, दो बेटियों की शादी करदी थी जो रामू से बड़ी थी…

सबसे बड़ा एक लड़का और है भोला नाम का जो कम अकल, किसी काम का नही बस गाय भैसे चराने के मतलव का ही है…

कम अकल होने की वजह से कोई अपनी लड़की ब्याहने को तैयार नही हुआ सो बेचारा कुँवारा ही रह गया…

रामू सबसे छोटा था, जो बचपन से काम के बोझ का मारा, ज़्यादा लंबा ही नही हो पाया, यही कोई 5 फुट के आस-पास ही रह गया, जबकि रंगीली की हाइट 5’4” के करीब थी…

पक्का रंग, रेलवे यार्ड में खल्लासी का काम करता है, सारे दिन माल गाड़ियों से समान ढोते-ढोते बेचारे की शाम तक कमर लचक जाती है, ब मुश्किल दो दिन की छुट्टी लेकर दूल्हा बना था…

रंगीली की सखी सहेलियाँ दूल्हे को देख कर कुच्छ दुखी हुई, बेचारी के भाग ही फुट गये, हम सब सहेलिओं में सुंदर है,

और इसका दूल्हा…, अब होनी को कॉन टाल सकता है, भाग में जैसा लिखा है, होकर रहता है… पर चलो जीजा जी कुच्छ कमाते तो हैं…, रंगीली सुखी रहेगी.

खैर रंगीली ने अपने दूल्हे की सुंदरता के बारे में अपनी सहेलियों से ही सुना, देखने का मौका उसे सीधा उसकी सुहाग रात को ही मिला वो भी शादी के तीन दिन बाद सारे देवी-देवताओं की मान-मुनब्बत करने के बाद…

वो भी एक छोटी सी केरोसिन की डिब्बी के उजाले में, सो सही सही अनुमान भी नही लगा कि रंग काला है या पीला.. हां थोड़ी लंबाई ज़रूर कम लगी…

फिर जब सेज सैया पर (एक चरमराती चारपाई) नये बिच्छावन के साथ, पति के साथ संसर्ग हुआ… तो उसे बड़ा झटका सा लगा…

 
सहेलियाँ तो कहती थी, कि प्रथम मिलन में बड़ी तकलीफ़ों का सामना करना पड़ता है, खून ख़राबा तक हो जाता है,

लेकिन यहाँ तो उसके पति ने सीधा उसका लहंगा उपर किया और अपनी लुल्ली अंदर डाल दी, उसे लगा जैसे किसी ने उसकी चूत में उंगली डाल कर 10-15 बार अंदर बाहर की हो,

नयी नवेली मुनिया, शुरू के एक दो बार उसे हल्का सा दर्द फील हुआ, जिसे वो पैर की उंगली में लगी किसी ठोकर समझ कर झेल गयी…

फिर कुच्छ झटकों के बाद जब उसे भी थोड़ा मज़ा सा आना शुरू हुआ ही था कि तब तक उसका पल्लेदार पति, अपना पानी छोड़ कर उसके उपर पड़ा भैंसे की तरह हाँफने लगा…..!

माँ के घर से विदा होते वक़्त रंगीली की माँ और दूसरी बड़ी-बूढ़ी समझदार औरतों ने उसे कुच्छ ज्ञान की बात कहीं थी, मसलन :

पति की आग्या का पालन करना, सास ससुर की सेवा…, पति परमेश्वर होता है, वो जैसा रखे उसी को मान सम्मान देते हुए स्वीकार कर लेना…बल्ला..बल्ला..बल्लाअ..

सौ की एक बात, उन बातों को ध्यान में रखते हुए रंगीली अपने नये परिवार में अपने आप को ढालने की कोशिश करने लगी…

कुच्छ दिन तो उसकी बड़ी ननदे उसके पास रही, जिसकी वजह से उसका दिल एक नयी जगह पर लगा रहा, लेकिन जब वो अपने-अपने घर चली गयी, तो उसे वो घर काटने को दौड़ने लगा…

5 फूटिया 45 किलो का पति, सुवह 5 बजे ही अपनी मेहनत मजूरी के लिए निकल जाता, सारे दिन गधे की तरह रेलवे यार्ड में लदता, देर रात को आख़िरी गाड़ी से लौटता, खाना ख़ाता और 5 मिनिट में ही उसके खर्राटे गूंजने लगते…!

नव-यौवना रंगीली, जो ठीक तरह से ये भी नही जान पाई कि चुदाई होती क्या है, सुहागरात के नाम पर उसके पति परमेश्वर ने उसकी सोई हुई काम-इक्षा से उसका परिचय करा दिया था.

इससे अच्छा तो उसके व्याह से पहले ही थी, कम से कम उसकी मुनिया सिर्फ़ मूतना ही जानती थी,

लेकिन अब उसे उसके असली उपयोग के बारे में भी पता लगवा दिया था…!

बमुश्किल वो उसके उपर हफ्ते दस दिन बाद एक बार ही सवारी करता, वो भी जब तक वो दौड़ने के लिए तैयार होती उससे पहले ही खुद खर्राटे लेते हुए सो जाता, रंगीली बेचारी रात भर जिस्म की आग में तड़पति रहती…

अब बेचारी अपनी दूबिधा कहे तो किससे कहे, बूढ़े सास-ससुर जो वक़्त की मार ने समय से पहले ही उन्हें और बूढ़ा कर दिया था, वो अपनी पुत्र बधू की दूबिधा को भला क्या समझते…

बस कभी कभार नहाते समय, थोड़ा बहुत हाथ से सहला लेती जिससे उसकी काम इच्छा और ज़्यादा भड़कने लगती,

उसको तो अभी तक ये भी पता नही था कि उंगली डालकर भी जिस्म की आग शांत की जा सकती है, उसके दिमाग़ में तो यही था, कि मर्द जब अपना लंड डालता और निकालता है…बस उतना ही है,

असल मज़ा किसे कहते हैं कोई बताने वाला भी तो नही था…

रामू की ज़मीन भी लाला के यहाँ गिरबी पड़ी थी, उसे कोई करने वाला भी नही था, ससुर अपने पागल बेटे को लेकर थोड़ा बहुत लगा रहता…

सेठ का कर्ज़ा बदस्तूर जारी ही था, रामू मेहनत मजूरी करके जो कुच्छ कमाता, उसमें से आधी किस्त ब्याज के नाम पर लाला हड़प लेता…

घर के काम काज, सास ससुर की सेवा ही रंगीली की दिनचर्या बन गयी थी...,

अभी शादी को 2 महीने भी नही बीते थे कि एक दिन लाला आ धम्के उसके घर, मुनीम ने लंबा चौड़ा वही-ख़ाता खोल कर उनके सामने रख दिया,

बेचारे रामू और उसके माँ-बाप की सिट्टी-पिटी गुम, तभी दयालु ह्र्दय लाला ने ही उन्हें एक राह सुझाई….!

रामलाल, क्यों ना अपनी बहू को हमारे घर काम करने के लिए भेज दे, उसकी एबज में हम तुमसे ब्याज नही लिया करेंगे, और रामू की कमाई से तुम्हारा घर अच्छे से चलने लगेगा…

अँधा क्या चाहे – दो आँखें, ये बात फ़ौरन उन तीनो के भेजे में घुस गयी, और उसी शाम उन्होने रंगीली को लाला के यहाँ काम पर जाने के लिए राज़ी कर लिया…!

घूँघट में खड़ी अपने पति के परिवार की व्यथा जानकार उसने अपना सर हिलाकर हामी भर दी, सोचा नयी जगह पर काम करने से कुच्छ तो मन भटकने से बचेगा…

गाओं की नयी-नवेली बहू, गली गलियारे का भी पता नही होगा, लाला का घर कैसे मिलेगा यही सोच कर दूसरे दिन सास खुद अपने साथ लेजा कर उसे लाला की हवेली छोड़ आई….

लाला धरमदास ने अपनी सेठानी को रंगीली के बारे में पहले ही बता दिया था... सो उसके पहुँचते ही उसे काम बता दिए गये,

अब बेचारी पर काम की दोहरी ज़िम्मेदारी पड़ने लगी, पति के काम पर जाने से 1 घंटा पहले उठना यानी 4 बजे… उसके लिए खाने का डिब्बा तैयार करना,

घर का झाड़ू कटका करके 8 बजे तैयार होकर लाला के घर पहुँचना, शाम तक सेठानी उससे ढेरों काम करती, हां लेकिन दूसरे नौकरों की तरह दोपहर का खाना पीना उसका वहाँ हो जाता था…!

 
कुच्छ पुरानी खुर्राट नौकरानियाँ जो बस सेठानी की चापलूसी में ही लगी रहती, और अपने हिस्से का काम भी रंगीली जैसी सीधी-सादि नयी नौकर से ही करवाती..

फिर कुच्छ दिन बाद सेठ ने धीरे से सेठानी को बातों में लगा कर रंगीली को अपने निजी कामों, जैसे बैठक की साफ-सफाई, बही खातों को व्यवस्थित करना आदि कामों के लिए लगवा लिया…

अब वो जब अपने कामों में व्यस्त रहती, और सेठ जी उसके नव-यौवन का रसस्वादन बोले तो चक्षु-चोदन करते रहते…

काम के बहाने अपने बही खातों को इधर से उधर रखवाने के बहाने वो उसके शरीर का स्पर्श भी करने लगे…

निश्चल मन, अल्हड़ रंगीली, लाला के मनोभावों को भला क्या पढ़ पाती, बस उसे स्वाभिवीक बात समझ कर नज़र अंदाज कर दिया करती…!

धीरे-धीरे सेठ ने उसे घूँघट ना करने पर भी राज़ी कर लिया, ये कहकर कि मेरे लिए तो तेरे मायके और ससुराल वाले एक जैसे हैं…!

लाला की गद्दी के पीछे की तरफ दीवार से लगी हुई एक लाइन से लकड़ी की अलमारियाँ बनी हुई थी, जिनमे उनके बाप दादाओं के जमाने तक के बही खाते भरे हुए थे…!

एक दिन लाला ने रंगीली से उन बही खातों से धूल साफ करने के लिए कहा – वो उसका जहाँ तक हाथ पहुँच सकता था उस उँचाई से धूल सॉफ करने लगी…!

लाला – अरे पहले उपर से सॉफ कर वरना बाद में नीचे धूल लगेगी…!

रगीली उनकी बात सुनकर बैठक से बाहर की तरफ जाने के लिए मूडी, लाला ने उसका मन्तव्य समझते ही फ़ौरन कहा – अरे कहाँ चली…?

उसने कहा – मालिक हम कोई स्टूल लेकर आते हैं, वरना उपर तक हाथ नही पहुँचेगा…!

लाला – अरे तो हम हैं ना, तू फिकर क्यों करती है, फूल सी बच्ची को तो मे ऐसे ही आराम से उठा लूँगा, तू सॉफ कर देना…

लाला की बात पर वो हिच-किचाई, और बोली – नही मालिक, आप हमें उठाएँगे, अच्छा नही लगेगा…

लाला – अरी बाबली ! हमसे क्या शरमाना, मे तो तेरे पिता जैसा हूँ, क्या कभी अपने बाप की गोद में नही बैठी तू…?

रगीली अपनी नज़रें नीची किए हुए ही बोली – वो तो हम बचपन में बहुत बार बापू की गोद में खेले रहे… पर अब आपकी गोद में कैसे…

नही नही ! हमें बहुत लाज आएगी, हम स्टूल ही लिए आते हैं..

लाला को लगा कि मामला उल्टा होता नज़र आ रहा है, सो फ़ौरन अपनी आवाज़ में रस घोलते हुए अपने शब्दों को चासनी में लिपटा कर बोले –

तू तो खमखाँ शर्म कर रही है बिटिया…, है ही कितनी जगह, 4-6 खाने ही तो हैं, उसके लिए इतने भारी स्टूल को उठाकर लाएगी, और फिर ना जाने कहाँ पड़ा होगा…!

चल तू झाड़ू और कपड़ा पकड़, हम तुझे सहज ही उठा लेंगे, है ही कितना वजन..? फूल सी बच्ची ही तो है…!

लाला की ऐसी रस भरी बातें सुनकर रंगीली की झिझक कुच्छ कम होती जा रही थी, सो वो हँसते हुए बोली –

क्या बात कर रहे हैं मालिक, इतनी हल्की भी नही हूँ मे, एक मन (40किलो) से तो बहुत ज़्यादा हूँ…!

लाला – कोई बात नही, तू चिंता ना कर हम तुझे आराम से संभाल लेंगे.., अब ज़्यादा बात ना बना और जल्दी काम शुरू कर…

सरल स्वाभाव रंगीली सेठ की बातों में आ गई, अपनी चुनरी के पल्लू को कमर में खोंस कर अपनी चोली को ढक लिया, और बोली – ठीक है मालिक फिर उठाइए हमें…!

लाला – ज़रा रुक, हम अपनी धोती को निकाल कर अलग रख देते हैं नही तो धूल गिरने से गंदी होगी, और हां तू भी अपनी चुनरी को अलग रख्दे, धूल चढ़ेगी बेकार में…!

ये कहकर लाला ने अपनी धोती उतार कर गद्दी पर रख दी, और मात्र अपने पट्टे के घुटने में आ गये,

बातों में फँसाकर उन्होने रंगीली की चुनरी भी अलग रखवा दी..,

और फिर रंगीली के पीछे जाकर उसे अपनी बाहों में लेने के लिए तैयार हो गये….!

सेठ धरमदास ने रंगीली को पीछे से उठाने के लिए जैसे ही अपने हाथ आगे किए, रंगीली बोली – देखना मालिक कहीं हम गिर ना जाएँ…!

उसके एक हाथ में झाड़ू और दूसरे में एक मोटा सा कपड़ा था, उसने जैसे ही अपने दोनो हाथ उपर उठाए, सेठ के बड़े-बड़े हाथ उसकी बगलों पर जम गये…!

रंगीली के लिए तो ये शायद साधारण सी बात रही होगी, लेकिन लाला के बदन में मादकता से परिपूर्ण बिजली की भाँति एक लहर सी दौड़ गयी…!

मजबूर और छिनाल औरतों के साथ मूह काला करते रहने वाले लाला के हाथों में एक कमसिन कली का बदन आते ही उसके बदन में अजीब सी कंपकपि सी दौड़ने लगी…!

एक नव-यवना के सानिध्य के एहसास ने उसके खून में उबाल पैदा कर दिया, और बादाम युक्त दूध और हलवा खाने वाले लाला का लंड एक सेकेंड में ही उछल कर खड़ा हो गया…

लाला के शरीर में ताक़त की कोई कमी नही थी, सो उसने ब-मुश्किल 48-50 किलो की रंगीली को किसी बच्ची की तरह उठा लिया…!

हाथों के अंगूठे और तर्जनी उंगली के बीच की गोलाई वाला भाग उसकी कांख (आर्म्पाइट) पर फिट होगया,

 
लाला के बड़े-बड़े हाथों की उंगलियाँ रंगीली की कच्चे अमरूदो जैसी अविकसित गोलाईयो के बगल से उनकी कठोरता का स्वाद लेने लगी…!

शायद ही किसी मर्द के हाथों का स्पर्श अभी तक हुआ हो उसकी इन गोलाईयों पर, सो लाला की उंगलियों का स्पर्श पाकर वो अंदर तक सिहर गयी…, और उसका पूरा बदन बिजली के झटके की तरह झन-झना गया…!

आज शायद पहली बार उसे ये एहसास हुआ, कि उसके सीने के ये उभार भी खाली दिखाने या बच्चे को दूध पिलाने के लिए नही है, इनका भी शायद कोई ज़रूरी उपयोग होता होगा…!

लाला की लंबाई, रंगीली से 4-5” ज़्यादा थी, वो उसे कोई एक फुट ही उपर उठा पाया था,

धरम लाला का 7” लंबा और खूब मोटा लंड एकदम सीधा खड़ा होकर रंगीली के कुल्हों और जांघों के जोड़ों के बीच जा घुसा…!

रगीली के नितंब और जांघें किसी अधेड़ औरत की तरह इतने मांसल तो नही थे, फिर भी एक कोमलांगी के बदन का मखमली एहसास लाला के लंड की साँसें रोकने के लिए काफ़ी था…!

भले ही वो घाघरा पहने थी, फिर भी लाला का घोड़ा ऐसा मस्त अस्तबल पाकर हिनहिनने लगा…!

रंगीली अपनी जांघों के जोड़ों के बीच किसी सोट जैसी चीज़ को फँसा पाकर सोच में पड़ गयी,

मालिक के दोनो हाथ तो उसकी बगलों के नीचे लगे हुए हैं, फिर ये तीसरी चीज़ क्या है…, लेकिन जल्द ही उसे मर्द के शरीर की भौगौलिक स्थिति का भान हुआ…!

वो बुरी तरह सिहर गयी, मन ही मन सोचने लगी, हे राम ये क्या है…, लंड तो उसने अपने पति का भी देखा था, वो तो उंगली से थोड़ा ही मोटा था, फिर ये ?

नही..नही ! ये वो नही हो सकता.. ये तो कुच्छ और ही चीज़ होगी…

अभी वो इस असमंजस से बाहर भी नही निकल पाई, कि लाला ने उसे थोड़ा सा नीचे को कर दिया,

इसी के साथ रंगीली की छोटी सी गान्ड की दरार किसी बबूल के डंडे की खूँटि जैसे लंड पर टिक गयी…!

गान्ड के छेद पर दबाब पड़ते ही रंगीली की चूत में सुरसूराहट सी होने लगी...,

ये देखकर वो हैरान रह गयी, कि ये आज उसे कैसे-कैसे अजीब तरह के एहसास हो रहे हैं…!

उसे सेठ के लंड पर गान्ड रखने में बहुत अच्छा लग रहा था, इधर उसकी गोलाईयों पर उनकी उंगलियों का एहसास दूसरी तरह की मस्ती दे रहे थे…

वो एक अजीब तरह की मस्ती में डूबती जा रही थी…!

इससे पहले कि वो इस मस्ती को कुच्छ देर और फील करती, की लाला जी बोले - हाथ पहुँच गया तेरा रंगीली उपर तक…?

वो जैसे नींद से जागी हो, और अपनी चेतना में लौटते हुए बोली – अभी थोड़ा और उपर उठाना पड़ेगा मालिक, अलमारी के उपर की धूल दिखाई नही दे रही…!

लाला – भाई, इस तरह से तो और उँचा नही कर सकता मे तुम्हें, एक काम करते हैं, दूसरी तरह से उठाता हूँ, इतना कहकर उसने धीरे-2 रंगीली को नीचे उतारा…!

जैसे-जैसे उसका भार लाला जी के लंड पर पड़ता जा रहा था, वो नीचे को अपनी गर्दन झुकाने पर मजबूर होता चला गया,

रंगीली की गान्ड की दरार पर एक साथ ही दबाब और बढ़ा और उसके मूह से ना चाहते हुए एक सिसकी निकल गयी…!

लंड उसकी दरार में घिस्सा लगाते हुए उसकी कमर पर जा लगा..., इसी के साथ उसके पैर ज़मीन पर टिक गये…!

अब रंगीली के मन में ये तीव्र जिग्यासा हुई, कि आख़िर वो खूँटे जैसी चीज़ थी क्या, सो नीचे आते ही वो फ़ौरन लाला जी की तरफ घूम गयी,

और जैसे ही उसकी नज़र अपने मालिक के घुटन्ने में क़ैद कालिया नाग पर पड़ी…, वो अंदर तक सिहर गयी…!

हे राम ! ये तो वोही चीज़ है, शायद मेरी सहेलियाँ ऐसे ही किसी लंड के बारे में बोलती थी, कि बहुत दर्द देता है, खून ख़राबा तक होता है…!

रंगीली को अपने लंड पर नज़र गढ़ाए हुए देख कर सेठ धरमदास के चेहरे पर एक अर्थपूर्ण मुस्कान तैर गयी, वो उसका हाथ पकड़ कर बोले –

क्या देख रही है रंगीली…?

लाला की बात सुनकर वो एकदम हड़बड़ा गयी, बोली – कककुकच्छ नही मालिक, चलो अब कैसे उपर उठाओगे…

लाला – हां चल, उठाता हूँ, और फिर उन्होने अलमारी की तरफ अपनी पीठ कर ली और उसको अपनी तरफ पलटकर जांघों के बाहर से हाथ लपेट कर उसे उपर उठा लिया…!

अब रंगीली आसानी से अलमारी की उपरी सतह को भी अच्छे से देख सकती थी, लेकिन इस स्थिति में लालजी का मूह ठीक उसके उभारों की घाटी के मुहाने पर था…

रंगीली ने सबसे पहले झाड़ू से उस सतह की धूल सॉफ की, ना जाने कितने दिनो से उसे सॉफ नही किया था, सो ढेर सारी धूल जमा हो रही थी…!

उसने जैसे ही झाड़ू से धूल को नीचे गिराया, आधी धूल उन दोनो के उपर गिरी,

चूँकि रंगीली का सर तो उपर था, सो धूल का भाग उसके उपर तो कम गिरा..

लेकिन सेठ जी की खोपड़ी धूल से अट गयी, कुच्छ धूल के कन उनकी आँखों में भी चले गये…!

बिलबिला कर उन्होने अपनी आँखें मींच ली और अपने धूल से सने चेहरे को रंगीली की चोली से रगड़ते कुए बोले –

ये क्या गजब कर दिया तूने, सारी धूल मेरे उपर ही डाल दी…

क्षमा करना मालिक ग़लती से गिर गयी, लेकिन मे भी क्या करती, उपर हाथ किए हुए अंदाज़ा नही लगा..., आप छोड़ दीजिए हमें और अपना चेहरा सॉफ कर लीजिए…

सेठ भला ऐसे मौके को हाथ से कैसे जाने देता, सो अपनी नाक को उसके उभारों के बीच रगड़ते हुए बोला –

कोई बात नही रंगीली, अब गंदे तो हो ही गये है, तुम ठीक से उपर की सफाई कर्लो…!

जितनी देर उसने उपर की सफाई की, उतनी देर लाला जी उसके अविकसित उभारों में अपना मूह डाले अपने होठों, नाक, गालों और कभी-कभी जीभ से भी उसी घाटी को चाटते रहे, रगड़ते रहे…

मालिक की इस हरकत से रंगीली भी खुमारी में डूबने लगी थी…

 
फिर जब उपर का पोर्षन अच्छे से सॉफ हो गया, तो वो बोली – मालिक उपर का हो गया, अब हमें थोड़ा नीचे कर्लो…!

हरामी लाला ने पहले से ही अपने हाथो से उसे इस तरह से पकड़ा था, कि उसका घाघरा घुटनों तक आ गया था,

फिर जैसे ही उसने रंगीली को थोड़ा और नीचे को सरकाया, वो सरक कर उसकी जांघों तक चढ़ गया…!

और सबसे ख़तरनाक काम ये हुआ कि उनका खूँटा उसकी चूत के ठीक नीचे पहुँच गया…!

अपनी मुनिया के मुलायम होठों के उपर लोहे जैसी शख्त चीज़ का एहसास होते ही, रंगीली तड़प उठी…, सोने पे सुहागा, नीचे सरकते हुए उसके कच्चे अमरूद लाला की कठोर छाती से रगड़ गये…

उसने अपने कुल्हों को थोड़ा पीछे को किया ये सोचकर की शायद उस खूँटे से अपनी मुनिया को अलग कर लेगी, लेकिन ठीक इसके उलट उसका टोपा उसकी फांकों के बीच आगया,

वो कराहते हुए बोली – आअहह…मालिक ! थोड़ा उपर उठाओ ना…!

लाला की मस्ती धीरे-2 चरम पर पहुँच रही थी, सो उसने उसकी बात को अनसुना करते हुए उसे और ज़ोर्से कस लिया,

और उसकी गान्ड के नीचे एक हाथ रखकर वो अपनी कमर को आगे पीछे करने लगे…, हवा में लटकी रंगीली कुच्छ करने की स्थिति में नही थी,

खूँटे जैसे लंड की ठोकर उसकी मुनिया के होठों पर पड़ रही थी, शुरू के लम्हों में उसे लंड के दबाब ने कुच्छ परेशान किया लेकिन धीरे-2 अप्रत्याशित रूप से उसकी मुनिया गीली होने लगी, जिसका उसे कतयि अंदाज़ा नही था…

उसे लगा, कहीं उसे मासिक धर्म (पीरियड) तो नही होने लगे, सो कराह कर बोली – आअहह मालिक हमें नीचे उतारो, सॉफ हो गया...!

लाला अपने चरम पर पहुँच चुके थे, सो उसे थोड़ी देर और कसकर जकड़े कमर चलाते हुए बोले – आहह… थोड़ा और अच्छे से सॉफ होने दे…,

रंगीली की मुनिया से भी लगातार रस बरसने लगा था, लाला ने दो चार बार ज़ोर्से कमर चलाई…और फिर आख़िरकार अपनी पिचकारी घुटन्ने (अंडरवेर) में ही छोड़ दी…!

इस घटना के बाद रंगीली को अपने शरीर के अंगों की एहमियत का पता चलने लगा, एकांत मिलते ही वो उनपर नये-नये प्रयोग करने लगी, मसलन,

अपनी कच्ची चुचियों को हाथ से सहला कर देखती, और फिर लाला जी के साथ हुई घटना के दौरान जो आनंद आया था, उससे उसकी तुलना करती…,

फिर अपनी मुनिया को सहलाती, कभी ज़ोर्से रगड़ती, लेकिन उतना मज़ा नही आता, जितना वो उस दिन ली थी…

उसने इस सब का यही निष्कर्ष निकाला, कि मर्द के साथ करने और अपने हाथ से करने में ज़मीन आसमान का अंतर है,

अब वो जब भी मौका लगता, सोते हुए अपने पति का हाथ अपने अंगों पर रखकर दबाती, लेकिन नारी सुलभ, वो खुलकर बोल नही पाती की ऐसा सब उसके साथ करो…

ना जाने वो उसके बारे में क्या सोचने लगे…, इधर उसे अपनी माँ की सीख भी याद आती, इस वजह से वो दूसरे मर्द के बारे में तो अपने मन में कोई बुरा ख्याल भी नही आने देती…!

उधर लाला की लालसा रंगीली को पाने के लिए दिनो दिन बल्बति होती जा रही थी, उस दिन के उनके प्रयास से उन्हें लगने लगा कि वो भी शायद यही चाहती है,

लेकिन जब वो उनके सामने आती, और वो कुच्छ इशारों-इशारों में उसको कुच्छ बोलना चाहते थे इस बारे में.., जिसे वो बेचारी अंजान कली भला क्या समझ पाती..!

वो तो लाला जी की आदत समझ कर अपने काम में लग जाती..., पर हां ! अब वो उनकी नीयत को पहचानने लगी थी…!

वो समझने लगी थी, कि उसका लंपट, ठरकी मालिक उससे क्या चाहता है.., जिसे वो किसी भी कीमत पर नही होने दे सकती…!

भले ही उसका मरियल थकेला पति उसकी प्यास बुझाने में असमर्थ हो लेकिन वो किसी गैर मर्द को अपने पास नही फटकने देगी…

इधर दिनो-दिन लालजी का लंड बग़ावत करने पर उतारू होता जा रहा था, वो उसे देखते ही किसी बिगड़ैल घोड़े की तरह उनके घुटन्ने में भड़क उठता, जिसे वो किसी तरह तोड़-मरोड़कर शांत करते रहते…!

लाला चाहे कितना ही लंपट सही, लेकिन अपनी सेठानी से उसकी गान्ड बहुत फटती थी, इस वजह से वो कम से कम घर के अंदर किसी भी नौकरानी के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती नही कर सकते थे…

खैर किसी तरह दिन निकल रहे थे, जो ख़ासकर लाला के लिए बड़े भारी गुजर रहे थे… !

आख़िरकार वो दिन भी आगया, जो इस कथानक के इन दोनो पात्रों की जिंदगी ही बदल देने वाला था…!

बैठक में झाड़ू लगा रही रंगीली को देख कर सेठ धरमदास चुपके से बैठक में घुस आए,

झुकने से उसके गोल-गोल नितंब उसके घाघरे से उभरकर उनके मन को ललचा रहे थे, फिर जब उनसे कंट्रोल नही हुआ,

तो चुप-चाप जाकर वो उसके पीछे खड़े हो गये और उसके बॉली-बॉल जैसे नितंब को सहला दिया…

रंगीली चोंक कर खड़ी हो गयी, उन्होने उसे ज़बरदस्ती अपनी बाहों में जकड लिया, और उसके अंगों से खेलने लगे…

वो मिन्नतें करती रही, भगवान की दुहाई देकर अपने आप को छोड़ने के लिए बोलती रही, लेकिन उन्होने उसे अपनी मजबूत गिरफ़्त से आज़ाद नही होने दिया…

अंततः उसने मालिक और नौकर के लिहाज को ताक पर रख कर विरोध करना शुरू कर दिया, और जैसे तैसे अपने को उनकी गिरफ़्त से आज़ाद किया, और मौका लगते ही फ़ौरन वहाँ से भाग गयी…

वहाँ से सीधी वो अपने घर पहुँची, और अपने कोठे में चारपाई पर औंधे मूह पड़कर अपनी बेबसी पर सूबक-सूबक कर रोने लगी…!

अपनी बहू को तेज़ी से घर में घुसते हुए, और फिर इतनी देर से कोठे से बाहर ना आते देख उसकी सास दुलारी कुच्छ अनिष्ट की आशंका लेकर उसके कोठे में आई,

बहू को यूँ औंधे मूह पड़े सूबक-सूबक कर रोते देख वो घबरा उठी…!

उसने उसकी पीठ पर हाथ रख कर सहलाते हुए पुछा – क्या हुआ बहू….? ऐसे क्यों रो रही है, सेठानी ने कुच्छ कहा क्या…?

रोते – रोते अपनी सास के सवालों का क्या जबाब दे रंगीली सोचने लगी, अगर वो इन्हें सच्चाई बता भी देती है, और अगर लाला ने नकार दिया,

और अगर उल्टे उसी पर कोई चोरी-चाकारी का इल्ज़ाम लगा दिया तो, वो और ज़्यादा परेशान कर सकता है, ये सोचकर अपने घर को मुसीबतों से बचाने की गर्ज से सुबक्ते हुए बोली –

माँ-बापू की याद आ रही है, अपने भाई बहनों को इतने दिन से नही देखा है, मुझे अपने घर भिजवा दीजिए…!

दुलारी – अरे बहू तो इसमें रोने की क्या बात है, शाम को रामू आएगा, उसको बोलकर कल उसे लेकर चली जाना…!

रंगीली – उन्हें तो अपने काम से ही छुट्टी कहाँ मिलती है, मुझे अभी जाना है, ससुरजी को बोलो छोड़ आएँगे, दूर ही कितना है.. एक घंटे में पहुँच जाएँगे…

दुलारी – चल ठीक है, पूछती हूँ उनको, अब चुप हो जा…

कुच्छ देर के बाद रंगीली सर पर समान की पोटली लिए घूँघट निकाले अपने ससुर के पीछे-2 अपने गाओं की तरफ चल दी…

 
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