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रंगीला लाला और ठरकी सेवक

आने-जाने के साधन कुच्छ थे नही, सो बेचारे कडकती धूप में पैदल ही चल दिए, और डेढ़-दो घंटे का सफ़र तय करने के बाद वो अपने मैके पहुँच गयी…

खूब रोई वो अपनी माँ के गले से लगकर…, माँ को भी इतने दिन अपनी बेटी के बिछड़ने से रोना आ ही गया…!

ससुर को वापस भेज दिया ये कहकर, अब वो कुच्छ दिन अपनी माँ के पास ही रहेगी..., इसमें कोई विशेष बात भी नही थी…

शादी के बाद पहली बार वो अपने घर आई थी, आमतौर पर शादी के बाद 6-8 महीने लड़कियाँ अपने मैके में रह ही जाती हैं, सो ससुर उसे छोड़ कर कर चले गये…!

उधर जब एक दो दिन रंगीली काम पर नही आई, तो चौथे दिन मुनीम आ धमका रामलाल के यहाँ, तब पता चला कि वो तो अपने मैके चली गयी…!

जब ये बात लाला को पता चली कि उसने अपने घर उस घटना के विषय में कुच्छ नही बताया है, तो वो समझने लगा,

कि कहीं ना कहीं रंगीली उसके साथ ये रिस्ता बनाना चाहती है, लेकिन झिझक रही है जिसे अब उसे जल्द से जल्द दूर करना होगा.

उधर श्रवण मास शुरू होने को था, तो धीरे-धीरे करके गाओं की दूसरी नव विवाहित सखी सहेलियों का भी आना शुरू हो गया,

जब वो आपस में मिल बैठकर अपनी ससुराल और पति के साथ बिताए हुए पलों के बारे में बातें करती, इससे रंगीली अपने दुख को भूल इन बातों में अपनी रूचि लेने लगी…

कोई-कोई कोरी गप्प भी मारती थी, अपनी ससुराल और पति के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बताती…, जो भी हो अच्छा टाइम पास होता उसका दोपहर के वक़्त..

इसी दौरान रंगीली की एक खास सखी चमेली एक दिन उसके घर आई, उसकी शादी भी रंगीली से कुच्छ दिन पहले ही हुई थी…

सुंदरता में वो रंगीली के कहीं आस-पास भी नही फटकती थी, शादी के पूर्व एक सुखी-ठितूरी सी युवती थी…!

लेकिन आज उसे देखते ही रंगीली मूह बाए उसे देखती ही रह गयी, क्या रंग-रूप निखर आया था उसका…

जहाँ उसका शरीर हड्डियों का ढाँचा नज़र आता था, वहीं चन्द महीनों में ही उसका बदन भर गया था, और वो 32-28-34 के फिगर की एक पटाखा माल नज़र आ रही थी, जो किसी भी मर्द का लंड खड़ा कर्दे..!

ख़ासकर उसकी गोलाइयाँ जहाँ नीबू के आकर की हुआ करती थी, आज वो इलाहाबादी अमरूद जैसी हो गयी थी, और गान्ड तो बस पुछो ही मत…

जब कसे हुए घाघरे में कमर मटका कर चलती, तो मानो दो फुटबॉल आपस में मिला दिए हों…!

रंगीली उसे देखते ही हाथ पकड़ कर अंदर ले आई और दोनो सखियाँ एक दूसरे को बाहों में लिए पूरे आँगन में नाचने लगी…

इसी दौरान रंगीली के हाथ उसके नाज़ुक अंगों पर चले गये और उनका आकार और पुश्टता मापते हुए बोली –

अरी चमेली ! तू तो कितनी सुंदर हो गयी है री, ये हड्डियों का ढाँचा इतना जल्दी एक भरपूर औरत में कैसे तब्दील हो गया…?

चमेली – लेकिन तू कुच्छ बुझी-बुझी सी लग रही है, क्या बात है…जीजाजी तुझे अच्छे से प्यार नही करते…? या खाने पीने को अच्छा नही मिलता…?

रंगीली – ऐसी कोई बात नही है, सब मुझे अच्छे से रखते हैं, और सभी प्यार करते हैं…

चमेली – अरी में सभी की बात नही कर रही, मे तो बस तेरे पति के बारे में पूछ रही हूँ, क्या वो तुझे बिस्तर पर पूरा सुख देते हैं…?

रंगीली – पूरा सुख से तेरा क्या मतलव है…?

चमेली – अब तुझे कैसे समझाऊ…? अच्छा छोड़ पहले ये बता तेरी सुहागरात कैसी थी, कितना मज़ा किया तुम दोनो ने…?

चमेली की बात सुनकर रंगीली थोड़ा शरमा गयी, वो अपने होंठ काटते हुए बोली – मुझे नही पता,

पता नही तू क्या बात कर रही है, ऐसे भी कोई बता सकता है भला अपनी सुहागरात के बारे में..

चमेली समझ गयी की रंगीली को कुच्छ तो दुख है, वो उसकी शादी के वक़्त मौजूद तो नही थी, लेकिन दूसरी सहेलियों से उसने उसके पति के बारे में सब सुन रखा था…

इसलिए उसने भाँप लिया कि उसका पति उसे वो सुख नही दे पा रहा जो उसे मिल रहा है, अतः वो उसके हाथों को अपने हाथों में लेकर बोली –

अरी उसमें क्या शरमाना, ये तो सभी लड़कियों के साथ होता है, बताना क्या-क्या किया.., हम भी तो सुनें मेरी प्यारी सखी ने कैसे कैसे मज़े लिए..? उसके बाद मे भी अपने बारे में सब बताउन्गी…!

ना चाहते हुए भी रंगीली को वो सब बताना पड़ा जो उसकी सुहागरात और फिर उसके बाद उसके साथ उसके पति द्वारा किया जा रहा था…

उसकी सुहागरात का किस्सा सुनकर चमेली को बड़ा दुख हुआ…, वो बड़े दुखी स्वर में बोली – इसलिए तू इतनी बुझी-बुझी सी लग रही है,

एक औरत शादी के बाद वाकी सारे दुखों को दरकिनार कर सकती है, अगर उसे उसका पति बिस्तर पर सच्चा सुख दे सके,

वरना उसके बदन की आग अंदर ही अंदर उसे जलाती रहती है, और वो औरत किसी गीली लकड़ी की तरह जीवन भर सुलगती रहती है…

चमेली के द्वारा कहे गये शब्द उसे एकदम अपने उपर सही फिट बैठते दिखाई दे रहे थे, और उसकी हिरनी जैसी कजरारी आँखें अनायास ही नम हो उठी,

लेकिन तुरंत ही अपने मनोभावों पर काबू करते हुए बोली – ये सब छोड़, तू अपने बारे में तो बता, तेरी सुहागरात कैसी रही…..?

चमेली मुस्कुराती हुई, उसके हाथों को पकड़कर बोली – अच्छा तुझे मेरी सुहागरात के बारे में सुनना है,

तो चल कहीं एकांत में बैठकर बताती हूँ, यहाँ चाची आगयि तो बात पूरी नही हो पाएगी…!

फिर वो उसका हाथ पकड़कर अपने घेर (जहाँ जानवरों को रखा जाता है) में लेगयि, उसकी मस्तानी चाल से उसके कलश जैसे मटकते चूतड़ देखकर रंगीली अपने कुल्हों पर हाथ लगाकर देखने लगी लेकिन वहाँ उसे इतनी थिरकन नही लगी…

वो मन ही मन सोचने लगी कि सुखी लकड़ी जैसी चमेली के चूतड़ इतने मोटे-मोटे कैसे हो गये…, काश मेरे भी ऐसे होते…!

घेर में पहुँचकर दोनो सखियाँ एक झाटोले सी चारपाई पर बैठकर बातें करने लगी, चमेली अपनी सुहागरात के बारे में बताते हुए इतनी एक्शिटेड थी, खुशी उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी…

चमेली – तुझे तो पता ही है, मेरे पति एक फ़ौजी हैं, थोड़ा कड़क मिज़ाज हैं, और सच कहूँ तो मर्द कड़क स्वाभाव ही होना चाहिए, तभी तो वो मर्द कहलाता है..

खैर, सुहाग सेज पर मे सिकुड़ी सिमटी सी बैठी थी, कि तभी किसी के आने की आहट मुझे सुनाई दी, मेने फ़ौरन अपना घूँघट निकाल लिया और घूँघट की ओट से ही दरवाजे की तरफ देखा…

मेरे पति हल्के से शराब के नसे में झूमते हुए मेरे पास आकर बैठ गये, और मेरे कंधे पर अपना हाथ रखा, मे डर और लज्जावस अंदर तक सिहर गयी…

मेरा शरीर काँपने लगा, तो वो बोले – अरे, तुम इस तरह काँप क्यों रही हो..? तबीयत ठीक नही है क्या तुम्हारी…!

मेने मूह से जबाब देने की बजाय, गर्दन ना में हिला दी, वो समझे कि मे कह रही हूँ कि तबीयत सही नही है, सो बोले.. तो चलो तुम्हें डॉक्टर के पास ले चलता हूँ..

फिर मुझे बोलना ही पड़ा – नही जी मे ठीक हूँ, मुझे कुच्छ नही हुआ…

वो – तो इस तरह काँप क्यों रही हो…?

मे – बस ऐसे ही, थोड़ा डर सा लग रहा है…

वो हंस कर बोले – किससे, यहाँ मेरे अलावा तो कोई नही है, फिर किससे डर रही हो?

मे – जी आपसे, मेरी सहेलियाँ कहती थी कि पहली रात को पति बहुत परेशान करते हैं..

मेरी बेवकूफी भरी बात सुनकर वो ठहाका मार कर हँसने लगे, मे उनके चेहरे को देखने लगी…

फिर उन्होने मेरा घूँघट हटा दिया, और मेरे गालों को बड़े प्यार से सहलाते हुए बोले – तुम्हारी सहेलियाँ ठिठोली कर रही होंगी, आज के बाद तुम्हारा सारा डर दूर हो जाएगा..

ये कहकर उन्होने मुझे पलग पर लिटा दिया, और खुद मेरे बगल में बैठ कर अपने हाथ से मेरे गालों को सहलाया, फिर गर्दन, फिर मेरे सीने को…

इस तरह बिना कपड़े निकाले उन्होने मेरे पूरे बदन पर अपने हाथ से सहलाया..

तू विस्वास नही करेगी, उनके हाथ के स्पर्श से ही मेरे पूरे बदन में अजीब सी सनसनाहट फैल गयी, डर का तो कहीं नामो-निशान भी नही रहा..

मेरा विरोध ना जाने कहाँ चला गया… फिर उन्होने एक एक करके मेरे सारे कपड़े निकाल दिए, और खुद भी निवस्त्र होकर मेरे बगल में लेट गये…

मे तो किसी कठपुतली की तरह बस पड़ी थी…

 
मेरे सूखे से बदन को देखकर वो बोले – तुम तो बहुत कमजोर हो, पता नही मुझे कैसे झेल पाओगी..

मेने झट से कह दिया – हम देखने के लिए ही कमजोर लगते हैं, शक्ति बहुत है, सारे काम कर लेते हैं..

वो हंस कर बोले – अच्छा, देखते हैं कितनी शक्ति है तुम्हारे अंदर…

उसके बाद वो मेरे नग्न शरीर को सहलाने लगे, आअहह…क्या बताऊ रंगीली, उनके हाथ का स्पर्श पाकर मेरा शरीर उत्तेजना से भरता चला गया,

मे किसी जल बिन मछलि की तरह तड़पने लगी…, मेरी टाँगों के बीच में खुजली सी होने लगी, और उन्हें मेने कसकर भींच लिया…!

वो मेरे हल्के से फूले हुए गालों को चाटने लगे, और फिर मेरे होठों का चुंबन लेकर उन्हें चूसने लगे,

वो बोले, तुम भी मेरा साथ दो चमेली, मज़ा आएगा…, तो मे भी ऐसे ही उनके होठों को चूसने लगी,

फिर उन्होने मेरे मूह में अपनी जीभ डाल दी, हाई री दैया… क्या बताऊ, जैसे ही उनकी जीभ मेरी जीभ से टकराई, अपने आप मेरी जीभ उनकी जीभ के साथ अठखेलियाँ करने लगी…

मुझे इस खेल में अजीब सा आनंद मिलने लगा…,

5 मिनिट के बाद वो नीचे की तरफ बढ़े और मेरी नीबू जैसी कच्ची चुचियों के आस-पास अपनी जीभ से चाटने लगे…

मज़े के मारे अपने आप मेरे मूह से सिसकियाँ निकलने लगी…सस्स्सिईईई….आअहह…

और मे अपने पैरो को भींचे, एडियों को बिस्तेर पर रगड़ने लगी..

फिर जैसे ही उन्होने अपने बड़े-बड़े हाथों में मेरे नीबुओं को क़ैद करके मसला.. एक मीठे दर्द की लहर मेरे बदन में दौड़ गयी…

लेकिन तू विश्वास नही करेगी रंगीली, उस दर्द में भी मुझे एक अलग ही मज़ा आ रहा था… वो जैसे –जैसे मेरे नीबुओं को मसल रहे थे, मेरी चूत से पानी सा निकलने लगा…

अब वो मेरी कच्ची चुचियों को मूह में भरकर चूसने लगे और एक हाथ मेरी चूत के उपर फिराया जो एकदम गीली हो चुकी थी…

मेरी तो साँसें ही अटकी पड़ी थी, फिर जैसे ही उन्होने मेरी चूत में अपनी एक मोटी सी उंगली डाली, मे दर्द से बिला-बिला उठी,

वो समझ गये कि मेरी चूत एकदम कोरी है, इसका उद्घाटन उंगली से करना ठीक नही है…सो वो मेरी टाँगों के बीच में आकर बैठ गये…

मे उन्हें किसी अजूबे की तरह बस देखे जा रही थी, क्योंकि उनकी एक-एक हरकत मुझे जन्नत की सैर करा रही थी, तो बीच में अपनी टाँग अड़ाकर दोनो का मज़ा क्यों खराब करती…

रंगीली, चमेली की सुहागरात के सीन में एकदम खो चुकी थी, वो इस समय चमेली की जगह अपने आप को रखकर इमेजिन कर रही थी…

फिर जैसे ही चमेली ने कहा कि उसके पति ने उसकी गीली चूत को जीब से चाटा…

रंगीली के मूह से सिसकी निकल पड़ी…सस्सिईईई…..आअहह…उसकी खुद की चूत गीली होने लगी थी…

चमेली ने उसके कंधे पकड़ कर हिलाते हुए कहा – तुझे क्या हुआ रंगीली..?

वो झेंपकर बोली – कुछ नही तू आगे सुना…

वो मेरी चूत को चाटते हुए जब उसके दाने (भज्नासा) को अपने होठों में दबाकर चूस्ते, मुझे ऐसा लगता की में बिना कुच्छ अंदर डाले ही झड़ने लगूंगी..

और हुआ भी यही, मे ज़्यादा देर तक अपने आपको नही रोक पाई, और उनके मूह में मेने अपना पानी छोड़ दिया…

हाई री रंगीली, जानती है, वो मेरा सारा चूतरस पी गये, और एक-एक बूँद को चाट लिया…मेरी तो हालत ही खराब थी, जिंदगी में पहली बार इतना पानी निकला था मेरी मुनिया से…

फिर उन्होने अपना 7” लंबा और खूब मोटा सोट जैसा कड़क लंड मेरे हाथ में पकड़ा दिया..., पहली बार मेने किसी मर्द का खड़ा लंड देखा था…,

मेरे तो तिर्पान काँप गये…, एक हाथ अपने मूह पर रख कर बोली – हाईए…दैयाआ….ये क्या है जी…,

वो हंस कर बोले – इसे लंड कहते हैं मेरी जान, अब ये तुम्हारी चूत के अंदर जाने वाला है

मेने डरते हुए कहा – हाई राम इसे कैसे झेल पाउन्गि, मेरी चूत तो इतनी छोटी सी है…, प्लीज़ इसे मत डालो, नही तो मे मर जाउन्गि…

उन्होने प्यार से मेरे गाल को सहलाया, और बोले – आज तक कोई मरा है, जो तुम मर जाओगी, ये अंग तो लचीले होते हैं, ज़रूरत के हिसाब से अपना आकार बना लेते हैं..

हां पहली बार थोड़ी सी तकलीफ़ तो हर किसी को होती है, पर तुम चिंता मत करो, मे बड़े प्यार से इसे अंदर कर दूँगा, अब तुम थोड़ा इसे अपने मूह में लेकर गीला करो..

मेने चोन्क्ते हुए कहा – क्याअ…?? मूह में..?? नही नही मुझसे ये नही होगा…

मेरे वो बोले – क्यों इसमें ऐसा क्या विष लगा है, मेने भी तो तुम्हारी चूत चाटी

ना.., लो नखरे मत करो, सभी लड़कियाँ इसे चुस्ती हैं, तुम्हें भी अच्छा लगेगा..

ना चाहते हुए, बुरा सा मूह बनाकर मेने उसे पहले चाटा, उसके मूह पर एक सफेद पानी की बूँद जैसी लगी थी, जो मेरे मूह में जाकर घुल गयी,

उसका कसैला सा स्वाद मुझे अच्छा लगा, और में उसे मन लगाकर चूसने लगी..

 
थोड़ी देर लंड चुस्वा कर वो फिर से मेरी टाँगों के बीच आए, और अपना मूसल जैसा लंड मेरी गीली चूत के बंद होंठों के उपर रगड़ दिया…

उत्तेजना में मेरी तो कमर ही हिलने लगी, फिर उन्होने जैसे तैसे करके मेरी चूत के छोटे से छेद को खोला, और उसके मूह पर अपने लंड का मोटा टमाटर जैसा सुपाडा रखकर दबा दिया…

मेने कस कर अपनी आँखें बंद करली, और आने वाली मुसीबत का सामना करने के लिए अपने आप को तैयार करने लगी…….!

मेने कस कर अपनी आँखें बंद करली, और आनेवाली मुसीबत का सामना करने के लिए अपने आप को तैयार कर लिया…….!

रंगीली चमेली की सुहागरात के सीने में इस कदर खोई हुई थी, मानो चमेली की नही उसकी सील टूटने वाली हो, सो उसने एक झुर झुरी सी अपने अंदर महसूस की,

उसने अपनी जांघों के बीच गीलापन बढ़ता महसूस किया.., चमेली अपनी कथा सुनने में मगन थी, और रंगीली किसी गूंगे के गुड के स्वाद की तरह बस उसके चेहरे पर नज़रें गढ़ाए हुए थी…

चमेली ने आगे एक नज़र अपनी प्यारी सखी पर डाली, जो इस समय अपनी टाँगों को कस कर भींचे हुए बस उसे ही देखे जा रही थी…!

एक सेक्सी स्माइल करते हुए चमेली बोली – तुझे में क्या बताऊ रंगीली, उनके लंड का एकदम गरम दहक्ता सा सुपाडा इतना ज़्यादा मोटा था की मेरी मुनिया के छेद को चौड़ा करके उसके उपर रखने के बाद भी वो मेरी चूत की पतली पतली फांकों के बाहर तक निकला हुआ महसूस कर रही थी मे…

मेरी साँसें इतनी तेज़ी से चल रही थी मानो मीलों दौड़ लगाके आई हूँ…

उन्होने मेरी पतली मुलायम जांघों को अपने मजबूत कसरती पाटों के उपर रखा हुआ था, मेरे नीबुओं को सहला कर वो मेरे उपर झुके, और मेरे रसीले, डर से थर-थर काँप रहे होंठों पर अपने होंठ रख दिए…

मेने अपनी आँखें खोलकर उनकी तरफ देखा, उनका लंड मेरी मुनिया के मूह पर अटका हुआ ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे किसी ने ज़बरदस्ती किसी का मूह बंद कर रखा हो…

उनके मेरे उपर झुकने से उनके लंड का दबाब मेरी चूत पर बढ़ गया, जिससे मेरी कराह निकल गयी….आअहह…माआ…

उन्होने मेरे होंठों को कस कर अपने होंठों में जप्त करते हुए हल्का सा झटका अपनी कमर में लगा दिया…!

मूह के अंदर ही अंदर मेरी चीख निकल गयी, और उनका लंड मेरी चूत की झिल्ली पर जा अटका…, मेरी तो जैसे जान ही अटक गयी,

उनके बालों को अपनी मुट्ठी में पकड़ कर मेने उनके चेहरे को अपने से अलग करना चाहा लेकिन कामयाब नही हो पाई…,

मेने फिर से कस कर अपनी आँखें मींच ली, उन्होने अपने लंड को थोड़ा सा बाहर निकाला, मुझे कुच्छ राहत सी हुई, कि चलो जान बची, शायद इन्हें मेरे उपर दया आ गई होगी…

लेकिन मेरा सोचना एकदम ग़लत साबित हुआ, क्योंकि तभी उन्होने एक तेज धक्का मेरी चूत में मार दिया….च्चाअरररर…की आवाज़ के साथ उनका लंड मेरी चूत की झिल्ली को फाड़ता हुआ, तीन-चौथाई अंदर समा चुका था…

ना जाने कहाँ से मुझमें इतनी शक्ति आ गई, उनका मूह ज़ोर देकर पीछे को हटा दिया, और अपने होंठों को आज़ाद करते ही मे बुरी तरह से चीख पड़ी…

अररीई….मैय्ाआ…र्रिि….मररर…गाइिईई…रीईई….बचाऊओ…मुझीए…

उन्होने झट से एकबार फिर मेरे होंठों को जप्त कर दिया… लेकिन आगे धक्का नही लगाया, और मेरे नीबुओं को सहलाने लगे…

मेरे छोटे-छोटे चुचकों (निपल्स) को अपनी उंगली के पोर से सहलाया…, ऐसा करने से मेरे चूत के दर्द में कुच्छ राहत सी लगी, और वो गीली होने लगी…

उन्होने मेरे होंठों को चूसना अब बंद कर दिया…, मेने लगभग हान्फ्ते हुए कहा – बहुत जालिम हैं आप, मेरी जान निकाल दी…

उन्होने मेरे गालों को सहलाते हुए कहा – अरे मेरी रानी, तुम्हारी जान निकालकर मुझे क्या मिलेगा…, ये तो पहली बार सबको झेलना ही होता है…,

थोड़ी देर ठहर कर उन्होने अपने लंड को बाहर निकाला, मेरी चूत अंदर से कुच्छ खाली सी हो गयी, लेकिन अगले ही पल और एक तगड़ा सा धक्का मार दिया…

मे एक बार फिर दर्द से तड़प उठी, लेकिन इस बार मेने चीखना बेहतर नही समझा, क्योंकि जो होना है वो तो होकर ही रहेगा, तो हाइ-तौबा करने से ही क्या लाभ..

लेकिन दर्द से मेरी आँखों में आँसू आ गये…अब मुझे उनका लंड एकदम अपने पेडू यहाँ, चमेली ने अपने पेट की निचली सतह पर हाथ लगा कर बताया, महसूस हो रहा था…

उनका वो मोटा ताज़ा लंड मेरी छोटी सी चूत में ना जाने कैसे समा गया, और ऐसा फिट हो गया, मानो बिना खड्डा किए कोई खूँटा ज़मीन में गाड़ दिया हो…

मेरी चूत के पतले-पतले होंठ, उनके लंड के चारों तरफ इस तरह कस गये थे मानो किसी रब्बर की रिंग में एक मोटी सी रोड जबदस्ती फिट कर दी हो…!

दर्द से मे अंदर ही अंदर छ्ट-पटा रही थी, मेरी आँखों से पानी निकल रहा था…, लेकिन उन्होने मुझ पर कोई रहम नही किया, और धीरे-धीरे अपने खूँटे को अंदर-बाहर करने लगे…

हाए रंगीली, तुझे मे कैसे बताऊ, दो-चार बार के अंदर बाहर करने से तो मुझे ऐसा लगा, कि मेरी चूत की अंदर की चमड़ी भी उनके खूँटे के साथ ही बाहर ना चली जाए…

लेकिन फिर कुच्छ ही देर में मेरी चूत के श्रोत से पानी फूटना शुरू हो गया, जिससे उनका लंड आराम से अंदर बाहर होने लगा, और साथ ही मेरा दर्द ना जाने कहाँ छूमन्तर हो गया, और मुझे मज़ा आने लगा…

 
अब मेरे दर्द भरी कराह सिसकियों में बदल गयी, मे भी अपनी गान्ड उठा-उठाकर चुदाई का मज़ा लेने लगी…

जो लंड कुच्छ देर पहले मुझे 1-1 इंच लेना भारी पड़ रहा था, अब में खुद उसे ज़्यादा से ज़्यादा अंदर लेने के लिए कोशिश करने लगी…!

उनके धक्के अब लगातार तेज और तेज होते जा रहे थे, उसी ले में मेरी गान्ड भी नीचे से अपने आप उचक-उचक कर लंड लेने के लिए उछल्ने लगी…

हम दोनो पसीने से तर-बतर हो गये थे, फिर मुझे लगा जैसे मेरे अंदर से किसी ने पानी का मुहाना खोल दिया हो..

मेने अपनी टाँगें उनकी गान्ड के उपर लपेट ली, और उन्हें कस कर जकड़ते हुए मे झड़ने लगी…

कम से कम दो-तीन मिनिट तक लगातार मेरा पानी निकलता रहा, तब जाकर में शांत हुई,

आअहह… वो क्या सुख था मेरी सखी, मन कर रहा था जैसे इसी सुख में ही मेरी जान क्यों ना निकल जाए लेकिन ये लम्हा कभी ख़तम ना हो…!

उन्होने भी दो-चार तगड़े धक्के लगाए और उन्होने भी मेरी चूत की गहराइयों में अपने गाड़े-गाड़े वीर्य की धार छोड़ दी…,

हाए ही दैयाअ….ऐसा लगा जैसे किसी ने जलती भट्टी में पानी का छिड़काव कर दिया हो…

मेरी चुत की गर्मी एक दम शांत हो गयी, और मे बेसूध होकर उनकी बाहों में पड़ी रह गयी…

मुझे ये होश नही रहा कि कब वो मेरे उपर से उतरकर बगल में आ गये,

फिर उन्होने मेरी सफेद रंग की कच्छी से ही अपना लंड साफ किया जिसपर खून और मेरा कामरस लगा हुआ था…

जब वो मेरी खून और वीर्य से सराबोर चूत को साफ करने लगे, तब मुझे एक टीस सी लगी और मेने अपनी आँखें खोलकर उनकी तरफ देखा…

मेरी बगल में आकर वो फिर से मेरे बदन को सहलाने लगे.., लेकिन अब मुझे अपनी चूत में कुच्छ दर्द का आभास हो रहा था…

लेकिन जैसे-जैसे उनके हाथ मेरे बदन पर चल रहे थे, मेरे बदन में फिर एक बार सनसनी सी दौड़ने लगी…

उन्होने मेरी पतली कमर को अपने हाथों में लिया और मुझे पकड़ कर पलटा दिया, और बिस्तर पर घोड़ी की तरह घुटनों पर कर दिया…

खुद मेरी गान्ड के पीछे आ गये, उन्होने मेरी छोटी सी गान्ड को सहलाया, फिर उसे चूमा, चाटा, अपना मूह मेरी गान्ड की दरार में डाल दिया और पीछे से मेरी गान्ड और चूत को चाटने लगे…

मे अपनी चूत के दर्द को भूलकर फिर से मस्ती में भर उठी, और अपनी गान्ड मटकाते हुए अपनी चूत और गान्ड चटवाने लगी…!

कुच्छ देर चाटने के बाद उन्होने फिर अपने लंड को पीछे से मेरी चूत के छेद पर रखा, और धीरे-धीरे करके पूरा लंड जड़ तक अंदर डाल दिया…

मे एक बार फिर दर्द से कराह उठी, लेकिन अब पहले जैसा दर्द नही हुआ, कुच्छ देर वो पूरा अंदर करके यूँही ठहरे रहे, और फिर धीरे-2 धक्के लगाने शुरू कर दिए…

कुच्छ ही धक्कों के बाद मुझे भी मज़ा आने लगा, और मे भी अपनी गान्ड पटक-पटक कर उनके लंड को लेने लगी…!

मीज-मीज कर उन्होने मेरी छोटी सी चुचियों को लाल कर दिया था, लेकिन मुझे दर्द के साथ-साथ मज़ा भी आ रहा था…

उस दिन के बाद से दो महीने तक वो रहे, हम दोनो सारी-सारी रात भरपूर चुदाई का मज़ा उठाते रहे,

उन्हें पीछे से चोदने में ही ज़यादा मज़ा आता था, उसी का परिणाम तू देख मेरी गान्ड और चुचियाँ कैसी हो गयी हैं…

सच कहूँ रंगीली, इस दुनिया में किसी औरत के लिए अगर कोई परम सुख है, तो वो एक भरपूर मर्द के मोटे तगड़े लंड से चुदने में है…!

उनके चले जाने के बहुत दिनो तक मेरी चूत की खुजली रात-रात भर मुझे सोने नही देती थी, जैसे-तैसे मन मसोस कर दिन गुज़ारे मेने,

फिर एक दिन मेने चुपके से एक चिट्ठी उनको लिख ही दी, वो एक हफ्ते की छुट्टी लेकर आगये… और उस एक हफ्ते, मेने उन्हें सोने ही नही दिया…!

चमेली की चुदाई की दास्तान सुनकर रंगीली की मुनिया गरम होकर लगातार रस बहाती रही, फिर जब चमेली अपने घर चली गयी,

वो दौड़कर नाली पर पहुँची और अपना घाघरा उठाकर देखा, उसकी दोनो जांघें उसके कामरस से चिपचिपा रही थी..

चमेली की बातें याद करके रंगीली फिर से दुख के सागर में डूब गयी… वो सोचने लगी कि काश ! उसका पति भी उसे ऐसे ही सुख दे पाता…!

बहरहाल चमेली और गाओं की दूसरी सखी सहेलियों से बात-चीत करके रंगीली का समय पास हो रहा था, लेकिन वो अब रात के सुनेपन से बुरी तरह जूझ रही थी..

जबसे उसने चमेली और दूसरी लड़कियों से उनके रति सुख के बारे में सुना था, तबसे वो तिल-तिल अपने जिस्म की आग में झुलस रही थी…!

लाला जी के साथ हुई सफाई के दौरान की छेड़-छाड़ को याद करके वो अप्रत्याशित रूप से गरम हो जाती,

 
उसे लाला का अपने उभारों के पास वो स्पर्श, उनके घुटन्ने में फुफ्कार्ता हुआ उनका कालिया नाग, उसकी अपनी मुनिया के होंठों पर महसूस होने वाली उसकी वो ठोकर, वो रगड़..

सोचकर ही उसकी चूत गीली होने लगती..., मन के किसी कोने में उसे लगने लगा, कि अगर चमेली जैसा शारीरिक सुख लेना है, तो लाला के अतिरिक्त और कोई चारा उसके पास नही है…

लेकिन दूसरे ही पल वो अपने माँ-बापू के दिए संस्कारों में उलझ जाती, और उसे फिर से उसका पतिव्रत धर्म दिखाई देने लगता…

उसका काम में मन नही लगता, अपने छोटे भाई-बहनों के प्रति भी वो उदासीन रहने लगी…

अपनी बेटी की मनो-दशा देख कर उसकी माँ व्यथित हो गयी, उसने उससे इसका कारण जानना चाहा, लेकिन उसने इसका कोई ठोस जबाब नही दिया…!

उधर सेठ धर्मदास ने जबसे रंगीली के बदन का स्पर्श सुख लिया था, तभी से उनका दिलो-दिमाग़ बस उसी को पाने के लिए सोचता रहता,

वो अगर चाहते तो उसे जोरे जबदस्ती उठवा कर भी भोग सकते थे, लेकिन वो उसके मामले में प्यार से हल निकालना चाहते थे…!

उसके कई सारे कारण उनके दिल और दिमाग़ ने पेश कर दिए :

1) वो उसे दिल से चाहने लगे थे, उनके जीवन में, उनके दिल पर रंगीली जैसी कमसिन बाला ने पहली बार दुस्तक दी थी,

2) रंगीली के सामने उसकी व्यक्तिगत कोई मजबूरी नही थी, जिसके चलते वो उनकी जबदस्ती को सहन करती…

अगर उसने विरोधाभास आत्महत्या करने जैसा कदम उठा लिया तो….लाला मुसीबत में पड़ सकते थे, समाज में उनका अस्तित्व ख़तम हो सकता था…

भले ही वो पैसे के दम पर बच निकलें लेकिन फिर कोई रंगीली उनके जीवन में संभव नही थी…

इन सब कारणों को ध्यान में रखकर लाला सब्र से काम लेना चाहते थे…!

इसी बीच एक दिन उनका दौरा रंगीली के गाओं में हुआ, अपने काम निपटाकर वो बुधिया के घर की तरफ निकल लिए…

इस आस में की शायद कोई बात बन जाए…

लाला को आया देखकर बुधिया एक पैर पर खड़ा हो गया, और क्यों ना हो, लाला की मेहरबानी की वजह से उसकी बेटी का ब्याह जो फोकट में हो गया था…

दुआ सलाम के बाद लाला ने रंगीली की बात चला ही दी, फिर खैर खबर लेने के बाद वो बोले –

बुधिया, तुम्हारी बेटी कहाँ है, हमें उससे मिलना था, उसके पति की एक सूचना देनी थी उसको…!

संकोच वस भला एक पिता कैसे पुछ्ता कि उसके पति ने उसके लिए क्या संदेशा भेजा है, सो अपनी पत्नी को कहकर लाला की एक अकेले कोठे में मुलाकात करवा दी…!

पहले तो रंगीली मुलाकात करने से मना करने वाली थी, लेकिन फिर कुच्छ सोचकर वो मिलने के लिए तैयार हो गयी…

रंगीली को सामने देख कर लाला ने बड़े मीठे शब्दों में उससे पुछा –

काम पर क्यों नही आ रही रंगीली, पता है तेरे बिना मेरे मन-मुताविक काम कोई नही कर पाता…!

रंगीली – मुझे अपने मैके की याद आ रही थी, सो चली आई, कुच्छ दिन रहकर आउन्गि, तभी काम पर लौट सकूँगी…

लेकिन मालिक ! अब मे आगे से आपकी बैठक का काम नही करूँगी, चाहे आप काम पर रखो या निकाल दो…!

रंगीली के ये शब्द सुनकर लाला को अपनी योजना धारसाई होती नज़र आने लगी.., लेकिन वो हार मानने वालों में से नही थे, सो बोले –

क्यों..? मेरी बैठक का काम करने में तुझे क्या आपत्ति है..? उल्टा और काम कम करना पड़ता है, तू कहे तो वाकी के सभी काम बंद करवा दूँगा…

रंगीली अपनी नज़रें झुकाए हुए ही बोली – हमें आपसे डर लगने लगा है..

लाला – डर..! किस बात से ? क्या तू उस्दिन की बात को लेकर चिंतित है…? देख रंगीली, अब तू चाहे माने या ना माने, हम तुझे सच्चे दिल से चाहने लगे हैं..

अब तेरे बिना जी नही लगता, तेरे लिए हम कुच्छ भी करने को तैयार हैं, बस तू एक बार हां करके देख, फिर जो कहेगी वैसा ही होगा…!

लाला की बात सुनकर रंगीली ने एक बार अपनी नज़र उठाकर उनकी तरफ देखा…, और बोली – किस बात के लिए हां कर दूँ…?

लाला – हम तुझे अपनी बाहों में लेकर प्यार करना चाहते हैं रंगीली, इसके एबज में सारे जहाँ की खुशियाँ हम तेरी झोली में डाल देंगे…

रंगीली – मेरे पति और समाज का क्या करेंगे आप…?

लाला – वो तुम सब हम पर छोड़ दो, हम वादा करते हैं, अपने प्यार की भनक हम किसी को नही लगने देंगे…!

रंगीली – जिसे आप प्यार कह रहे हैं, वो आपकी हमारे जिस्म को पाने की ललक भर है, इसे प्यार नही हवस कहते हैं मालिक…

और जब दिल भर जाता है, हवस शांत हो जाती है तब हम जैसी औरतों को आप चूसे हुए आम की गुठली की तरह कूड़े करकट में फेंक देते हो..!

रंगीली झोंक-झोंक इतनी तीखी बात कह तो गयी, लेकिन फिर उसे डर सताने लगा, क्योंकि लाला अगर अपनी पर आ गया, तो वो उसके दोनो परिवारों को तबाह कर सकता है,

यही नही, वो जब चाहे उसे भी रौंद सकता है, और चाहकर भी कोई कुच्छ नही कर पाएगा…

 
इसी डर में डूबी अब वो लाला की प्रतिक्रिया जानने का इंतेज़ार कर रही थी, उसे पूरा विश्वास था, कि अब लाला अपना असली रूप ज़रूर दिखाएगा..…!

लेकिन इसके ठीक उलट लाला उसके सामने अपने घुटनों पर बैठ गये, और हाथ जोड़कर बोले –

तो फिर तुम्ही बताओ, कैसे यकीन दिलाएँ कि हम तुम्हें सच्चे दिल से पाना चाहते हैं…, मानता हूँ कि मे हवस का पुजारी हूँ, लेकिन तुम्हारे लिए वोही हवस दीवानगी का रूप ले चुकी है..

चाहो तो हम स्टंप पेपर पर लिख कर दे सकते हैं, हम तुम्हें हमेशा यूँ ही प्यार करते रहेंगे…, जैसे तुम रहना चाहोगी वैसे रखेंगे…!

रंगीली को लाला से ऐसे व्यवहार की बिल्कुल अपेक्षा नही थी, वो समझ गयी, कि सेठ धरमदास उसे सच्चे दिल से पाना चाहते हैं,

और फिर वो भी तो कहीं ना कहीं यही चाहती है.., क्षण मात्र के लिए ही सही, उसके मन में भी तो ये ख़याल आया ही था…

सो हाथ जोड़कर बोली – बस कीजिए मालिक भगवान के लिए आप खड़े हो जाइए, हमें आप की बात मंजूर हैं…!

उसके मूह से ये शब्द सुनते ही लाला खड़े हो गये, और लपक कर उसके कंधे पकड़कर बोले – तुम्हारे मूह से ये शब्द सुनने के लिए हमारे कान तरस गये थे रंगीली, तुम नही जानती आज हम कितने खुश हैं..

रंगीली ने उनके सीने पर अपने हाथ का दबाब देकर अपने से अलग करते हुए कहा – लेकिन हमारी भी कुच्छ बातें आपको माननी पड़ेंगी…!

लाला तपाक से बोले – तुम जो कहोगी वैसा ही होगा, बोलो क्या चाहती हो हमसे…?

रंगीली – हमारे दोनो परिवारों के बही-खाते आपको जलाने होंगे, और वादा करना होगा कि आज के बाद कभी उनसे क़र्ज़ बसूली नही करेंगे…,

और मुझे जो काम अच्छा लगेगा वही करूँगी…, मेरे घर में जब मेरी ज़रूरत होगी कोई रोक-टोक नही होगी…

लाला ने लपक कर उसे अपने सीने से लगा लिया, और बोले – हम पहले ही कह चुके हैं, जैसा तुम चाहोगी वैसा ही होगा, हम तुम्हारे सामने वो सब बही खाते जला देंगे…

रंगीली – फिर ठीक है, अभी आप हमें छोड़िए, और यहाँ से जाइए, जन्माष्टमी करके हम अपनी ससुराल लौट जाएँगे… तब तक आपको हमारा इंतेज़ार करना पड़ेगा…

लाला – तुमने हां कर दी, हमारे लिए यही बहुत है, अब हम तुम्हारा बेसब्री से अपनी हवेली पर इंतेज़ार करेंगे…

इतना कहकर लाला कोठे से बाहर निकल गये…, और रंगीली कुच्छ देर वहीं खड़ी आनेवाले समय के बारे में सोचती रही…, लेकिन अब उसे किसी बात की कोई ग्लानि नही थी…!

उसके लिए ये घाटे का सौदा नही था, एक तरफ तो वो अपने जिस्म की अंबूझी प्यास से जूझ रही थी उससे निजात मिल सकती थी, दूसरे उसके दोनो परिवार उसके इस बलिदान से सुख से जीवन व्यतीत कर सकेंगे…!

उसके दिलो-दिमाग़ ने उसके द्वारा लिए गये इस फ़ैसले को सही ठहराया, उसने अब इसके लिए अपना मन पक्का कर लिया था,

अपने इस निर्णय से वो पूरी तरह संतुष्ट होकर खुशी खुशी अपने घर के कामों में लग गयी……….!

इसी बीच रंगीली की आँखों के सामने एक ऐसी घटना घटित हुई, जिसके कारण उसे अपने निर्णय को और बल मिल गया…,

एक दिन वो सुबह ही सुबह अपने जानवरों को चारा डालने अपने घेर की तरफ जा रही थी, भोर का हल्का सा अंधेरा अभी वाकी था…

उसके घेर से पहले पारो चाची का घेर था, जिसमें जानवरों के भूसा रखने के लिए एक छोटी सी कोठरी बनी हुई थी, जिसका एक रोशनदान रास्ते की तरफ था…!

जैसे ही रंगीली उनके उस कोठे के बराबर से गुज़री, अंदर से कुच्छ अजीब सी आवाज़ों को सुनकर उसके पैर ठिठक गये…!

ध्यान से सुनने पर पता लगा कि अंदर से एक मर्द और औरत की बात-चीत की आवाज़ें आ रही थी..

उसने सोचा पारो चाची और चाचा कुच्छ काम कर रहे होंगे, ये सोचकर वो जैसे ही आगे बढ़ी….

आअहह….जेठ जी, और ज़ोर से पेलो…, फाड़ डालो मेरी चूत को, आपके भाई से तो कुच्छ नही हो पाता…!

पारो चाची की ऐसी कामुक आहें सुनकर वो भोंचक्की सी रह गयी, और अंदर का नज़ारा देखने की तीव्र इच्छा उसके मन में जाग उठी…

उसने फ़ौरन उचक कर रोशनदान को पकड़ा और अंदर झाँक कर देखा, अंदर का नज़ारा देख कर उसकी आँखें फटी रह गयी,

पारो चाची अपना लहंगा उठाए घोड़ी बनी हुई थी और उनके जेठ पीछे से ढकधक उनकी चूत में अपना लंड पेल रहे थे…

जेठ – ले साली छिनाल कुतिया, कितनी बड़ी चुड़ैल है तू, रात को शमु का लंड लिया होगा, और सुबह-सुबह मेरे पास आगयि…

पारो – आअहह… क्या करूँ जेठ जी, उनके छोटे से लंड से मेरी प्यास नही बुझ पाती, और वैसे भी वो जल्दी ही अपना पानी निकालकर हाँफने लगते हैं…

जेठ – हुन्न..हहुऊन्ण…चल ठीक है, हुउन्ण.. ले तू मेरा मूसल ही ले, तेरी जेठानी भी तो साली हुउन्न्ं…एक ही बार में गान्ड फैलाक़े सो जाती है… और फिर मुझे मूठ मारकर सोना पड़ता है..

पारो – हाए राम, मे क्या मर गयी हूँ जेठ जी, जो आप मूठ मारकर सोते हो, इशारा कर दिया करो, आपके लिए कभी मना किया है मेने…!

इस तरह चुदाई के बारे में बातें करते करते वो दोनो अपनी चुदाई में लगे थे,

उधर रोशनदान से गरमा-गरम चुदाई का सीन देख कर रंगीली की हालत खराब होने लगी…!

अब उसे अपने पंजों पर उचक कर रोशनदान पकड़ना भारी होने लगा…, इससे पहले कि उनकी चुदाई का समापन हो पाता, वो वहाँ से निकल ली…

 
अपने घेर में आकर वो भूसे के ढेर पर पसर गयी, उसकी खुद की साँसें भी सबेरे-सबेरे ऐसा गरमा-गरम नज़ारा देख कर उखड़ने लगी थी…

ना चाहते हुए भी उसका एक हाथ अपने घान्घरे के अंदर चला गया, और वो अपनी मुनिया को कच्छि के उपर से ही सहलाने लगी…

दूसरे हाथ से अपने एक अमरूद को मसल्ते हुए सोचने लगी, हाए राम ये पारो चाची अपने ही जेठ के साथ मूह काला कर रही है…

कहाँ तो ये मेरी विदाई के वक़्त कितना ज्ञान छोड़ रही थी साली, और यहाँ देखो कैसी अपने ही जेठ के सामने गान्ड औंधी करके खड़ी थी…

अपने लिए इसका पतिव्रत धर्म कहाँ चला गया, जो दूसरों को ज्ञान देती फिरती है साली हरामजादि छिनाल रंडी कहीं की…!

फिर उसे उसके शब्द याद आए, आपके भाई के छोटे से लंड से मेरी प्यास नही बुझती, और वैसे भी जल्दी ही पानी छोड़ कर हाँफने लगते है, मुझे अधूरा छोड़ कर सो जाते हैं…!

रंगीली सोचने लगी … उसके साथ भी तो यही सब हो रहा था…

रंगीली की काम वासना अपने अंगों को मसल्ने से बढ़ती ही जा रही थी, कभी उसे पारो चाची की मोटी गान्ड दिखाई देती, दूसरे ही पल उनके जेठ का वो काला सोट जैसा लंड..

जो उनकी चूत में अंदर बाहर हो रहा था, ये सब सोच कर ना जाने कब उसका हाथ अपनी कच्छी के अंदर चला गया, उसकी मुनिया उसके कामरस से भीग चुकी थी…

उसे ये होश ही नही रहा कि कब उसकी एक उंगली उसकी चूत के अंदर समा गयी जिसे वो सिसकते हुए अंदर बाहर करने लगी…

अपनी चोली के अंदर हाथ डालकर वो अपने चुचक (निपल) को मरोड़ने लगी, उत्तेजना के मारे उसकी आँखें बंद हो चुकी थी,

तेज़ी से अपनी उंगली को अपनी चूत में चलाते हुए रंगीली के मूह से अस्फुट से शब्द फूटने लगे…आअहह….सस्स्सिईइ….मालिक…चोदो..मुझीए…. आआईयईई… म्माआ…आआईयईईईईईईईईई..उउउफ़फ्फ़…और तेज़ी से पेलो….हहाआंन्न….आअंग्ग्घह… इसके साथ ही उसकी मुनिया ने ढेर सारा पानी उसके हाथ पर फेंक दिया…!

आज पहली बार उसकी चूत से इतना कामरस निकला था, वो आँखें बंद किए बुरी तरह हाँफ रही थी…!

फिर जब उसकी उत्तेजना पूरी तरह से शांत हो गयी, तो उसके चेहरे पर एक शुकून भरी मुस्कान आगयि…!

उसे झड़ने से पहले उसके मूह से निकले शब्द याद पड़ गये…और वो खुद से ही बुरी तरह शर्मा उठी…

वो सोचने लगी, कि जब लाला जी की कल्पना मात्र से ही इतना मज़ा आया है तो वो जब उसके उपर चढ़कर उसे चोदेन्गे तब क्या हाल होगा उसका…! सोच कर ही उसकी मुनिया फिर से फड़कने लगी…

अब उसने अटल निश्चय कर लिया, कि चाहे जो भी हो अब वो अपने बदन की अधूरी प्यास की आग में नही जलेगी…

उउन्न्ह….! पतिव्रत धर्म, नियम क़ानून, भाड़ में जाओ सब, तेल लागाएँ ऐसे नियम क़ानून जो जीवन भर एक ही लुल्ली से बाधे रहें…

ये सब किताबी और मन बहलाने की बातें हैं.. जो सिर्फ़ दूसरों पर ही लागू होती हैं, अपने बारे में कोई इन बातों को नही मानता…!

“पर उपदेश कुशल बहुतेरे..”

अब वो सारी बातें भूलकर मस्त रहने लगी, मौका लगते ही अपने अंगों के साथ खेलती रहती, और हर वो तरीक़ा इस्तेमाल करती जो उसे ज़्यादा से ज़्यादा मज़ा दे सकता था…!

लेकिन अपने मैके में रहते हुए किसी और मर्द से वो संबंध नही बनाना चाहती थी, जिससे उसके माँ-बाप को शर्मिंदा होना पड़े…

ऐसा नही था, कि गाओं के मर्द उसे अच्छे नही लगते थे, या उसे कोई पसंद नही करता था.

रंगीली जैसी नमकीन लड़की को भोगने की कामना तो इस गाओं का हर युवा पाले बैठा था…,

कुच्छेक ने तो उसका रास्ता रोक कर अपने मन की बात ही बोल दी थी, लेकिन उसने अभी तक किसी को घास नही डाली…!

वो अब अपने आपको सजने सँवरने भी लगी थी, गाओं के सीमित संसाधनों से जितना हो सकता था, वो उतने से ही अपने शरीर को किसी भी मर्द के आकर्षण के लायक बनाने का हर संभव प्रयत्न करती…!

आख़िर वो दिन भी आ पहुँचा जब उसे अपने ससुराल वापस जाना था, अपने पति को उसने खबर भिजवा दी थी कि उस दिन आकर वो उसे विदा करा ले जाए…

उधर लाला ने रंगीली के घर का काम छोड़ कर जाने का ठीकरा अपनी सेठानी के सर मढ़ दिया,

कि वो और उसकी चमचियाँ उस बेचारी सीधी सादी लड़की को परेशान करती थी, उससे ज़्यादा काम लेती थी, इसलिए वो काम छोड़ कर चली गयी…,

उसके बिना अब उनकी बैठक फिर से एक कबाड़े का डिब्बा हो गयी है, वो कितने अच्छे से उसे व्यवस्थित रखती थी…

जब सेठानी ने कहा कि आप अपने काम के लिए किसी और को ले लो, वो बैठक को सही कर देगी तो वो बोले –

कोई ज़रूरत नही हैं, सब की सब साली कामचोर और नकारा हैं,

हमने रामलाल को बोल दिया है कि उसे मनाकर वापस काम पर भेजे, अब हम उससे अपने हिसाब से ही काम कराएँगे, कोई और उसपर हुकुम नही चलाएगा…

वो मान भी गयी है, और अपने मायके से वापस आकर वो हमारे यहाँ काम पर वापस आ जाएगी..,

लेकिन याद रहे, अब कोई भी उसके काम में दखल नही देगा, हम उसे बताएँगे कि उसे क्या करना है और क्या नही…

इस तरह से रंगीली के आने से पहले ही सेठ धरमदास ने उसकी शर्त के मुतविक हवेली में मामला सेट कर दिया…!

 
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