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एक ही रात की बात थी जब उनका और आयेशा का मिलन हुआ। पर उनको ऐसा लगा जैसे सालों का साथ हो। पर एक ही पल में वह साथ छूट गया।
सुनीलजी अपने आपको रोक नहीं पाए और जोर शोर से फफक फफक कर रोने लगे। उनको रोते हुए सुनने वाला और सांत्वना देने वाला कोई नहीं था।
सुनीलजी एक चट्टान के पीछे आयेशा का बदन घसीट कर ले गए। फायरिंग जारी था और रुकने का नाम नहीं ले रहा था। सुनीलजी का वहाँ दुश्मनों की सरहद में रुकना खतरे से खाली नहीं था। कैसे भी कर उन्हें हिन्दुस्तान की सरहद में दाखिल होना जरुरी था। उनके पास आयेशा की बॉडी को दफनाने का समय ही नहीं था।
सुनीलजी ने आयेशा की बॉडी को खिसका कर चट्टान के पीछे ले जाकर कुछ डाल और पत्तों से उसे ढक दिया। फिर दिए धीरे वह उस कुटिया की और जमीन पर रेंगते हुए चल पड़े। कुछ देर चलने के बाद घनी झाडी में उन्हें वही नदी दिखाई दी। बिना सोचे समझे सुनील उसमें कूद पड़े। उतनी ही देर में उनपर फायरिंग होने लगी।
सुनीलजी ने पानी में डुबकी लगा कर गोलियों से बचने फुर्ती से पानी के अंदर तैरने लगे। पानी का बहाव तेज था। पहाड़ों से पानी निकल कर निचे की और फुर्ती से बह रहा था। बहाव इतना तेज था और पानी इतना गहरा था की कोई भी तैराक उस में कूदने का साहस नहीं करेगा।
यही जगह थी जहां पर सरहद में कुछ झरझरापन था। यहाँ सैनिक निगरानी कुछ कमजोर थी। इसका फायदा दुशमन के फौजी और आतंकवादी अक्सर उठाते रहते थे।
सुनीलजी की बाँह का घाव अब दर्द देने लगा था। वह थके हुए थे और उनको ऐसा लग रहा था की कहीं वह पानी में बेहोश ना हो जाएँ। जैसे तैसे हाथ पाँव मारते हुए वह निचे की और तेजी से पानी में बह रहे थे। जिस दिशा में वह जा रहे थे उन्होंने अंदाज लगाया की वह हिन्दुस्तानी सरहद में दाखिल हो चुके हैं। गोलियों की फायरिंग भी बंद हो चुकी थी।
सुनीलजी ने अपना सर पानी से बाहर निकाला और देखा की दूर दूर में वह कुटिया नजर आ रही थी। सुनीलजी तैरते हुए नदी के किनारे आ गए। उनके बाँहों में सख्त दर्द हो रहा था। उनको ट्रीटमेंट की जरुरत थी। वह लुढ़कते हुए पानी के बाहर निकले। पर बाहर निकल कर थोड़ा चलने पर ही ढेर होकर गिर पड़े। थोड़ी देर बाद जब वह होश में आये तो पाया की वह तो वहीं नदी के किनारे लेटे हुए थे और कुछ मछवारे उनको ऊपर से देख रहे थे।
उनमें से एक मछवारे ने उन्हें हाथ का सहारा देकर उठाया। उस मछवारे ने सुनीलजी से कहा, “तुम्हारे घाव से खून निकल रहा है। इस तरफ डॉ. खान का शफाखाना है। वहाँ जाइये और अपना इलाज कराइये। इंशाअल्लाह ठीक हो जाएगा।”
सुनीलजी वहाँ से लड़खड़ाते लुढ़कते हुए डॉ. खान के शफा खाने पर पहुंचे और वहाँ पहुँचते ही उन्होंने दरवाजे की घंटी बजाई। उनके पाँव से जमीन जैसे खिसक गयी जब सुनीलजी ने डॉ. खान के शफाखाने का दरवाजा खोला।
सुनीलजी का हाल देख कर सुनीलजी बड़े ही आश्चर्य और आघात से सुनीलजी को देखने लगे। सुनील जी के सारे कपडे एकदम भीगे हुए पर खून के लाल धब्बों से पूरी तरह रंगे हुए थे। उनकी एक बांह से खून निकल रहा था। सुनीलजी ने फ़ौरन सुनीलजी को अंदर बुला लिया और दरवाजा बंद करते बुए पूछा, “क्या हुआ सुनीलजी? यह क्या है…….?”
इससे पहले की सुनीलजी अपनी बात पूरी करे, सुनीलजी सुनीलजी से लिपट गए और फफक फफक कर रो पड़े। उनकी आँखों से आंसूं रुकने का नाम ही नाहीं ले रहे थे। सुनीलजी ने उनको अपना कमीज निकाल ने के लिए कहा। यह सब आवाजें सुनकर बिस्तरे पर नंगी सो रही ज्योति जाग गयी और चद्दर को बदन पर लपेटे बिस्तरे में बैठ गयी। उसने अपने पति का खून में लथपथ हाल देखा तो ज्योति की तो जान ही निकल गयी।
ज्योति को होश ही नहीं रहा की उसने बदन पर कोई भी कपड़ा नहीं पहना था। जब ज्योति बिस्तर से उठ खड़ी हुई तब उसे अपनी नग्न हालात का अंदाजा लगा। फ़ौरन उसने बिस्तर से ही चद्दर उठाई, अपने आपको ढका और भागती हुई आकर जार जार रोते हुए अपने पति से लिपट गयी। सुनीलजी की आँखों से आंसूं की गंगा जमुना बह रही थी। सुनीलजी ने उनको गले लगा कर सुनीलजी को काफी सांत्वना देनेका प्रयास किया।
ज्योति और सुनीलजी ने पूछा की क्या सुनीलजी को कहीं घाव है? तब सुनील जी ने अपने कमीज की आस्तीन उठाकर बाँह पर लगे हुए घाव को दिखाया।
सुनीलजी भाग कर डॉ. खान के एक अलमारी में रखे हुए घाव पर पट्टी बगैरह लगा ने वाले सामान को उठा लाये और उन्होंने और ज्योति ने उनकी मरहम पट्टी की।
ज्योति भी अपने पति से गले लग कर उनको ढाढस देने की कोशिश करने लगे। कुछ समय बीतने पर जब सुनीलजी कुछ शांत हुए तो उन्होंने अपनी कहानी सुनीलजी और ज्योति को बतानी शुरू की।
सुनीलजी ने कहा, “सुनीलजी, मैंने आज तक मेरी जिंदगी में पटाखा फोड़ने वाली बन्दुक भी नहीं चलायी थी। पर आज रातको ना सिर्फ मैंने आपका असली फौजी रूप देखा जिसमें आपने एक हट्टेकट्टे आदमी को गोली से भून दिया पर मैंने अपने हाथों से दुश्मन के एक फौजी को एक कटार से मौत के घाट भी उतार दिया। उतना ही नहीं, कुछ ही देर के बाद मैंने एक आतंकवादी को भी मेरी बन्दुक से मार गिराया। मेरे सामने मैंने मेरी ही करीबी महिला साथीदार को दुश्मन की गोलियों से छलनी होते हुए देखा।
सुनीलजी की बात सुन सुनीलजी और ज्योति दोंनो चकमें आ गए। सुनीलजी की महिला साथीदार? वह कौन थी? सुनीलजी और ज्योति पहले सुनीलजी की और फिर एक दूसरे की और प्रश्नात्मक नजर से देखने लगे।
सुनीलजी ने बताया की कैसे वह उस रात को सुनीलजी से अलग होने के बाद अँधेरे में चलते चलते नदी किनारे एक गॉंव से कुछ दूर पहुंचे और वहाँ उन्होंने कुछ बन्दुक की फायरिंग की आवाज सुनी।
उसके बाद उन्होंने अपनी सारी कहानी बताई जिसमें की उन्होंने एक दुशमन के मुल्क की लड़की की जान कैसे बचाई और काफी रात तक गुफा में छुपे रहने के बाद जब उस लड़की ने उनसे वादा किया की वह उन्हें सरहद पार करा देगी तब वह दोनों छुपते छुपाते गुफा से बाहर निकले। अचानक ही दुश्मन की और से आये हुए दहशतखोरों ने जब उन्हें देखा तो गोलियां दागनी शुरू कर दीं।
सुनीलजी जी ने भी जवाबी कारवाई करते हुए अपनी बन्दुक से एक आतंक वादी को ठार मार दिया, पर उस फायरिंग में उस लड़की जिसका नाम आयेशा था उसे गोली लगी। वह लड़की ने मरते हुए भी सुनीलजी को डॉक्टर के घर का रास्ता बताया जहां सुनीलजी को सुरक्षा मिलेगी और घाव का इलाज भी होगा।
सुनीलजी थकान से चूर हो गए थे। उनमें बोलने की भी ताकत नहीं थी। उन्होंने देखा की उनकी पत्नी ज्योति सुनीलजी के बिस्तर में नंगी सोई हुई थी। उन्हें समझने में देर नहीं लगी की क्या हुआ होगा। आखिर वह जो चाहते थे वह हुआ। पर उनमें हिम्मत नहीं थी की वह कुछ बोले।
उन्होंने हड़फड़ाहट में कपडे पहने हुए सुनीलजी को देखा और चद्दर में लिपटी हुई अपनी पत्नी ज्योति को भी देखा। पर आगे कुछ बोले उसके पहले वह बिस्तर पर ढेर हो कर गिर पड़े और फ़ौरन खर्राटे मारने लगे।
ज्योति और सुनीलजी एक दूसरे की और देखने लगे। ज्योति ने तुरंत आपने पति के पाँव स गीले जूते निकाले। फिर उनका शर्ट और पतलून भी निकाला। सुनीलजी के सारे कपडे ना सिर्फ भीगे हुए थे पर खून के लाल धब्बों से रंगे हुए और गंदे थे। ज्योति ने अपने पति के सारे कपडे एक के बाद एक निकाले और गरम पानी से कपड़ा भिगो कर अपने पति के पुरे शरीर को स्पंज किया।
इस दरम्यान सुनीलजी गहरी नींद में सोये हुए ही थे। ज्योति ने उन्हें पूरी तरह प्यार से निर्वस्त्र कर दिया और ज्योति और सुनीलजी ने बिस्तर में ठीक तरह स सुला कर और ऊपर से कम्बल बगैरह ओढ़ा दिया।
सुनीलजी को आराम से बिस्तरे में सुलाकर सुनीलजी फारिग हुए थे की डॉ. खान की आवाज उनको दरवाजे के बाहर से सुनाई दी।
डॉ. खान कह रहे थे, “कर्नल साहब, आज वैसे ही जुम्मा है। शफाखाना आज बंद है। प आज के पुरे दिन और रात को आराम करो दुपहर को और शामको मैं आप तीनों के लिए खाना ले कर आऊंगा। आप कल सुबह तक यहां ही रुकिए। आप तीनों ही थके हुए हैं। मैं एक गद्दा और भिजवा देता हूँ।
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सुनीलजी अपने आपको रोक नहीं पाए और जोर शोर से फफक फफक कर रोने लगे। उनको रोते हुए सुनने वाला और सांत्वना देने वाला कोई नहीं था।
सुनीलजी एक चट्टान के पीछे आयेशा का बदन घसीट कर ले गए। फायरिंग जारी था और रुकने का नाम नहीं ले रहा था। सुनीलजी का वहाँ दुश्मनों की सरहद में रुकना खतरे से खाली नहीं था। कैसे भी कर उन्हें हिन्दुस्तान की सरहद में दाखिल होना जरुरी था। उनके पास आयेशा की बॉडी को दफनाने का समय ही नहीं था।
सुनीलजी ने आयेशा की बॉडी को खिसका कर चट्टान के पीछे ले जाकर कुछ डाल और पत्तों से उसे ढक दिया। फिर दिए धीरे वह उस कुटिया की और जमीन पर रेंगते हुए चल पड़े। कुछ देर चलने के बाद घनी झाडी में उन्हें वही नदी दिखाई दी। बिना सोचे समझे सुनील उसमें कूद पड़े। उतनी ही देर में उनपर फायरिंग होने लगी।
सुनीलजी ने पानी में डुबकी लगा कर गोलियों से बचने फुर्ती से पानी के अंदर तैरने लगे। पानी का बहाव तेज था। पहाड़ों से पानी निकल कर निचे की और फुर्ती से बह रहा था। बहाव इतना तेज था और पानी इतना गहरा था की कोई भी तैराक उस में कूदने का साहस नहीं करेगा।
यही जगह थी जहां पर सरहद में कुछ झरझरापन था। यहाँ सैनिक निगरानी कुछ कमजोर थी। इसका फायदा दुशमन के फौजी और आतंकवादी अक्सर उठाते रहते थे।
सुनीलजी की बाँह का घाव अब दर्द देने लगा था। वह थके हुए थे और उनको ऐसा लग रहा था की कहीं वह पानी में बेहोश ना हो जाएँ। जैसे तैसे हाथ पाँव मारते हुए वह निचे की और तेजी से पानी में बह रहे थे। जिस दिशा में वह जा रहे थे उन्होंने अंदाज लगाया की वह हिन्दुस्तानी सरहद में दाखिल हो चुके हैं। गोलियों की फायरिंग भी बंद हो चुकी थी।
सुनीलजी ने अपना सर पानी से बाहर निकाला और देखा की दूर दूर में वह कुटिया नजर आ रही थी। सुनीलजी तैरते हुए नदी के किनारे आ गए। उनके बाँहों में सख्त दर्द हो रहा था। उनको ट्रीटमेंट की जरुरत थी। वह लुढ़कते हुए पानी के बाहर निकले। पर बाहर निकल कर थोड़ा चलने पर ही ढेर होकर गिर पड़े। थोड़ी देर बाद जब वह होश में आये तो पाया की वह तो वहीं नदी के किनारे लेटे हुए थे और कुछ मछवारे उनको ऊपर से देख रहे थे।
उनमें से एक मछवारे ने उन्हें हाथ का सहारा देकर उठाया। उस मछवारे ने सुनीलजी से कहा, “तुम्हारे घाव से खून निकल रहा है। इस तरफ डॉ. खान का शफाखाना है। वहाँ जाइये और अपना इलाज कराइये। इंशाअल्लाह ठीक हो जाएगा।”
सुनीलजी वहाँ से लड़खड़ाते लुढ़कते हुए डॉ. खान के शफा खाने पर पहुंचे और वहाँ पहुँचते ही उन्होंने दरवाजे की घंटी बजाई। उनके पाँव से जमीन जैसे खिसक गयी जब सुनीलजी ने डॉ. खान के शफाखाने का दरवाजा खोला।
सुनीलजी का हाल देख कर सुनीलजी बड़े ही आश्चर्य और आघात से सुनीलजी को देखने लगे। सुनील जी के सारे कपडे एकदम भीगे हुए पर खून के लाल धब्बों से पूरी तरह रंगे हुए थे। उनकी एक बांह से खून निकल रहा था। सुनीलजी ने फ़ौरन सुनीलजी को अंदर बुला लिया और दरवाजा बंद करते बुए पूछा, “क्या हुआ सुनीलजी? यह क्या है…….?”
इससे पहले की सुनीलजी अपनी बात पूरी करे, सुनीलजी सुनीलजी से लिपट गए और फफक फफक कर रो पड़े। उनकी आँखों से आंसूं रुकने का नाम ही नाहीं ले रहे थे। सुनीलजी ने उनको अपना कमीज निकाल ने के लिए कहा। यह सब आवाजें सुनकर बिस्तरे पर नंगी सो रही ज्योति जाग गयी और चद्दर को बदन पर लपेटे बिस्तरे में बैठ गयी। उसने अपने पति का खून में लथपथ हाल देखा तो ज्योति की तो जान ही निकल गयी।
ज्योति को होश ही नहीं रहा की उसने बदन पर कोई भी कपड़ा नहीं पहना था। जब ज्योति बिस्तर से उठ खड़ी हुई तब उसे अपनी नग्न हालात का अंदाजा लगा। फ़ौरन उसने बिस्तर से ही चद्दर उठाई, अपने आपको ढका और भागती हुई आकर जार जार रोते हुए अपने पति से लिपट गयी। सुनीलजी की आँखों से आंसूं की गंगा जमुना बह रही थी। सुनीलजी ने उनको गले लगा कर सुनीलजी को काफी सांत्वना देनेका प्रयास किया।
ज्योति और सुनीलजी ने पूछा की क्या सुनीलजी को कहीं घाव है? तब सुनील जी ने अपने कमीज की आस्तीन उठाकर बाँह पर लगे हुए घाव को दिखाया।
सुनीलजी भाग कर डॉ. खान के एक अलमारी में रखे हुए घाव पर पट्टी बगैरह लगा ने वाले सामान को उठा लाये और उन्होंने और ज्योति ने उनकी मरहम पट्टी की।
ज्योति भी अपने पति से गले लग कर उनको ढाढस देने की कोशिश करने लगे। कुछ समय बीतने पर जब सुनीलजी कुछ शांत हुए तो उन्होंने अपनी कहानी सुनीलजी और ज्योति को बतानी शुरू की।
सुनीलजी ने कहा, “सुनीलजी, मैंने आज तक मेरी जिंदगी में पटाखा फोड़ने वाली बन्दुक भी नहीं चलायी थी। पर आज रातको ना सिर्फ मैंने आपका असली फौजी रूप देखा जिसमें आपने एक हट्टेकट्टे आदमी को गोली से भून दिया पर मैंने अपने हाथों से दुश्मन के एक फौजी को एक कटार से मौत के घाट भी उतार दिया। उतना ही नहीं, कुछ ही देर के बाद मैंने एक आतंकवादी को भी मेरी बन्दुक से मार गिराया। मेरे सामने मैंने मेरी ही करीबी महिला साथीदार को दुश्मन की गोलियों से छलनी होते हुए देखा।
सुनीलजी की बात सुन सुनीलजी और ज्योति दोंनो चकमें आ गए। सुनीलजी की महिला साथीदार? वह कौन थी? सुनीलजी और ज्योति पहले सुनीलजी की और फिर एक दूसरे की और प्रश्नात्मक नजर से देखने लगे।
सुनीलजी ने बताया की कैसे वह उस रात को सुनीलजी से अलग होने के बाद अँधेरे में चलते चलते नदी किनारे एक गॉंव से कुछ दूर पहुंचे और वहाँ उन्होंने कुछ बन्दुक की फायरिंग की आवाज सुनी।
उसके बाद उन्होंने अपनी सारी कहानी बताई जिसमें की उन्होंने एक दुशमन के मुल्क की लड़की की जान कैसे बचाई और काफी रात तक गुफा में छुपे रहने के बाद जब उस लड़की ने उनसे वादा किया की वह उन्हें सरहद पार करा देगी तब वह दोनों छुपते छुपाते गुफा से बाहर निकले। अचानक ही दुश्मन की और से आये हुए दहशतखोरों ने जब उन्हें देखा तो गोलियां दागनी शुरू कर दीं।
सुनीलजी जी ने भी जवाबी कारवाई करते हुए अपनी बन्दुक से एक आतंक वादी को ठार मार दिया, पर उस फायरिंग में उस लड़की जिसका नाम आयेशा था उसे गोली लगी। वह लड़की ने मरते हुए भी सुनीलजी को डॉक्टर के घर का रास्ता बताया जहां सुनीलजी को सुरक्षा मिलेगी और घाव का इलाज भी होगा।
सुनीलजी थकान से चूर हो गए थे। उनमें बोलने की भी ताकत नहीं थी। उन्होंने देखा की उनकी पत्नी ज्योति सुनीलजी के बिस्तर में नंगी सोई हुई थी। उन्हें समझने में देर नहीं लगी की क्या हुआ होगा। आखिर वह जो चाहते थे वह हुआ। पर उनमें हिम्मत नहीं थी की वह कुछ बोले।
उन्होंने हड़फड़ाहट में कपडे पहने हुए सुनीलजी को देखा और चद्दर में लिपटी हुई अपनी पत्नी ज्योति को भी देखा। पर आगे कुछ बोले उसके पहले वह बिस्तर पर ढेर हो कर गिर पड़े और फ़ौरन खर्राटे मारने लगे।
ज्योति और सुनीलजी एक दूसरे की और देखने लगे। ज्योति ने तुरंत आपने पति के पाँव स गीले जूते निकाले। फिर उनका शर्ट और पतलून भी निकाला। सुनीलजी के सारे कपडे ना सिर्फ भीगे हुए थे पर खून के लाल धब्बों से रंगे हुए और गंदे थे। ज्योति ने अपने पति के सारे कपडे एक के बाद एक निकाले और गरम पानी से कपड़ा भिगो कर अपने पति के पुरे शरीर को स्पंज किया।
इस दरम्यान सुनीलजी गहरी नींद में सोये हुए ही थे। ज्योति ने उन्हें पूरी तरह प्यार से निर्वस्त्र कर दिया और ज्योति और सुनीलजी ने बिस्तर में ठीक तरह स सुला कर और ऊपर से कम्बल बगैरह ओढ़ा दिया।
सुनीलजी को आराम से बिस्तरे में सुलाकर सुनीलजी फारिग हुए थे की डॉ. खान की आवाज उनको दरवाजे के बाहर से सुनाई दी।
डॉ. खान कह रहे थे, “कर्नल साहब, आज वैसे ही जुम्मा है। शफाखाना आज बंद है। प आज के पुरे दिन और रात को आराम करो दुपहर को और शामको मैं आप तीनों के लिए खाना ले कर आऊंगा। आप कल सुबह तक यहां ही रुकिए। आप तीनों ही थके हुए हैं। मैं एक गद्दा और भिजवा देता हूँ।
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