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"मैं जिस कंपनी में काम करता हूं, वह इधर एक रिसार्ट बना रही है— उसी की तैयारियों के सिलसिले में आया हूं तो फिलहाल कुछ महीने इधर ही रहना है। अभी अकेला ही हूं लेकिन आगे और भी लोग आयेंगे। बात क्या है?" जानते-बूझते भी और ज्यादा समझने की गरज से उसने पूछा।
"वह जगह ठीक नहीं साहब— रात को मेंशन के अंदर जाने कौन-कौन सी भूतिया हरकतें होती हैं। कोई नहीं जान पाया, बस इतना ही पता है कि अगर कोई रात को अंदर रुक गया तो या सुबह मरा बरामद होगा या ऐसा।" कहने वाले ने सामने खाली कुल्हड़ से चाय सुड़कते पागल की तरफ इशारा किया।
"यह रोज़वेल मेशन में रात को रुका था?" राज ने हैरानी से उस पागल को देखा।
"जी— वर्ना यह भी आपकी ही तरह पढ़ा-लिखा शहरी बंदा था जो आपकी ही तरह किसी काम से इधर आया था। मेंशन की तरफ जाते वक्त यह भी यहां चाय पीने रुका था— मैंने मना किया था कि अगर वहां ठहरना ही है तो रात को अंदर के बजाय बाहर ठहरना, लेकिन बाबू पढ़ा-लिखा था, भूत-प्रेत, आत्मा, चुड़ैल वगैरह पर यकीन नहीं करता था तो रात अंदर ही रुका। फिर अगले दिन इसी हालत में बरामद हुआ था।" चाय वाले ने बताया।
"अगर इतनी ही प्राब्लम है उस जगह में, तो उसे बंद क्यों नहीं कर देता प्रशासन?" राज की भवें सिकुड़ीं।
"प्रशासन को क्या पड़ी है साहब... ठाकुर साहब चाहें तो बंद कर सकते हैं लेकिन उन्हें भी क्या पड़ी है। लोग आ के रुकते हैं तो इस बहाने उसकी कदर भी होती रहती है, वर्ना तो अब तक उनकी प्रापर्टी खंडहर बन चुकी होती।" साथ बैठे युवक ने बताया।
"कौन ठाकुर साहब?"
"जिनके पुरखों की छोड़ी वह जगह है... पहले कभी पिकनिक, या शिकार या मेहमानों के मनोरंजन के लिये आते रहते थे लेकिन फिर दसियों साल के लिये वह जगह वीरान पड़ी रही, जिस दौरान मौजूदा ठाकुर साहब विलायत में रहते थे। फिर जब वह यहां आ के बसे और इस प्रापर्टी की सुध ली, तब तक वहां जाने कौन सी असुरी शक्तियों का वास हो चुका था कि फिर वहां हादसे होने लगे और मशहूर हो गया कि वह जगह आसेबी है।"
"जब मशहूर ही हो गया तो लोग क्यों रुकते हैं वहां?"
"जगह बड़ी अच्छी है साहब... उधर ऊंचाई के आखिर में थोड़ी मैदानी जगह है, जिसे बाग की तरह संवारा गया है। वहीं एक झील है जिसका हुस्न अलग ही है। फिर वहां जो भी ख़तरा है, वह रात को मेंशन के अंदर रुकने पर है। दिन में कैसा भी कोई ख़तरा नहीं और रात के लिये ठाकुर साहब की तरफ से ही दो बड़े कैम्प लगा रखे गये हैं जहां रात गुजारी जा सकती है। तो क्या है न साहब आउटिंग और एडवेंचर के शौकीन लड़के-लड़कियों के ग्रुप आते रहते हैं। शूटिंग वाले भी आते हैं तो ऐसी मुर्दा जगह भी नहीं है। इसका इंतज़ाम एक खेम सिंह नाम के आदमी के हाथ रहता है जो मेंशन का केयर-टेकर है। लोग चाहते हैं तो घरेलू कामकाज के लिये नौकर-नौकरानी का भी इंतज़ाम कर देता है लेकिन वे रात को उधर नहीं रुकते।"
"क्या इसने कभी कुछ नहीं बताया कि रात को मेंशन में इसने क्या झेला था?" कहते हुए राज ने गर्दन से उस पागल की तरफ इशारा किया।
"होश में आये तब न बताये— बस दिखता होश में है, लेकिन होता नहीं।" कहने वाले ने तरस खाने वाले भाव से कहा।
एक पल को उसके दिमाग़ में आया था कि वह उस पागल से बात करे लेकिन उसकी आंखों से होशमंदी के आसार न नज़र आते थे तो टाल दिया। चाय पी कर उसने खाली कुल्हड़ वहीं रखे गंदे से डस्टबिन रूपी कनस्तर में डाला और उठ खड़ा हुआ।
"एक सिग्रेट दे दो चाचा और पैसे बताओ।" उसने चाय वाले से सम्बोधित होते हुए कहा।
जो ब्रांड वह पीता था, वह यहां मिलना नहीं था तो जो भी उपलब्ध था, उसी से काम चला लेना था। सिग्रेट लेकर उसने वहीं खड़े-खड़े सुलगाई और एक कश लेते हुए वॉलेट निकाल कर पैसे देने लगा।
"वहां रुक ही रहे हैं तो रात अंदर मत गुजारियेगा साहब।" चाय वाले ने चेतावनी भरे अंदाज़ में कहा।
उसने सहमति में सर हिला दिया— हालांकि अभी इस बारे में उसने कोई निर्णय लिया नहीं था।
पैसे दे कर उसने बैकपैक पीठ पर लादा और बैग उठा कर उस राह चल पड़ा, जिधर वह रोज़वेल मेंशन था। वक्त पांच के आसपास ही हुआ था लेकिन शाम के घिरने के आसार नज़र आने लगे थे। वैसे भी पहाड़ों में शामें जल्दी घिरती हैं— एक फ़िक्र यही थी कि अंधेरे के पांव पसारने से पहले वह मेंशन तक पहुंच जाये।
वैसे पर्यटन के नज़रिये से फलती जगहों पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट के रूप में कुछ न कुछ साधन मौजूद रहते हैं, लेकिन इत्तेफाक था कि उसके लिये कोई इंतज़ाम न हो सका था और वह आधे घंटे की पद यात्रा करके इस तिराहे तक पहुंचा था और पता नहीं अब मेंशन तक पहुंचने में कितने क़दम जमीन और नापनी पड़ेगी। जिस पगडंडी पर चल रहा था, वह कच्ची होते हुए भी इतनी चौड़ी तो थी कि दो छोटी गाड़ियां क्रास हो सकतीं और उसके दोनों तरफ पेड़ लगे थे जिनकी घनेरी छांव में शाम थोड़ा पहले ही गहरा जाती थी।
चलते-चलते बीस मिनट बाद उसे उस जगह के दर्शन हुए जिसे रोज़वेल मेंशन के नाम से जाना जाता था।
आसपास एक करीने से संवारा गया ख़ूबसूरत बाग़ था जिसमें कई तरह के पेड़ थे, जानवरों की आकृति में तराशी गई झाड़ियां थीं, आवारा जानवरों से बचाने लायक इंतज़ाम के साथ फूलदार पौधे और झाड़ थे, बीच-बीच में छोटी-छोटी नहर टाईप नालियों से अटैच कई छोटे पूल दिख रहे थे। हालांकि फव्वारे भी थे लेकिन बंद पड़े थे और इस बाग के पार एक पुराने जमाने की बनी इमारत दिख रही थी, जिसे रंग-रोगन के सहारे नया बनाये रखने की कोशिश की गई थी लेकिन शैली से उसके पुराने होने का पता चल रहा था... और इस पूरे इलाके को एक कंटीली बाड़ वाली चारदीवारी से घेरा गया था।
मेंशन के अगले हिस्से में ही दो सफेद रंग की बड़ी सी छोलदारियां दिख रही थीं और उन्हीं के पास खड़ा एक शख़्स दिख रहा था, जो जैसे उसी का इंतज़ार कर रहा था।
पास पहुंचने पर वह ज्यादा कायदे से दिखा— दरम्याने कद और इकहरे शरीर वाला साधारण शक्ल-सूरत का आम सा पहाड़ी व्यक्ति था जिसने गर्म पजामे और शर्ट के रूप में कपड़े भी साधारण ही पहन रखे थे... यह मेंशन का वही केयरटेकर खेम सिंह था।
"क्या साहब— इतनी देर लगा दी। मैं निकलने ही वाला था।" वह राज के नज़दीक पहुंचते ही शिकायत भरे स्वर में बोला।
"कोई सवारी ही न मिली जो जल्दी ले आती... क्या करता भई? घंटे भर से ऊपर हो गया पैदल चलते।" राज ने मुंह बनाते हुए कहा।
"खैर, अब आ गये हैं तो मैं चलता हूं साहब... यहां बैठने लेटने का सब इंतज़ाम बाहर ही मौजूद है। मुझे लगा था कि आपको खाने की ज़रूरत होगी तो अंदर किचन में बना के रख दिया है। यह रही चाबी... यह मेन चाबी है, अंदर चार बेडरूम हैं और सभी के लिये यह एक मास्टर-की है। आप चाहें तो नहा-धो कर फ्रेश हो लीजिये— पानी गर्म किया था जो शायद अब तक आधा ठंडा हो चुका हो। फिर खा-पी कर बाहर आ जाइयेगा। यहां इस कैम्प में आपके सोने का इंतज़ाम कर दिया है। किसी नौकर की ज़रूरत हो तो बता दीजिये, कल अरेंज कर देंगे और स्टे के हिसाब से जो राशन लगे, बता दीजियेगा तो कल ला देंगे।" खेम सिंह ने मशीनी भाव से जैसे रटे-रटाये शब्द दोहराये।
"वैसे यहां ही क्यों सोना है— अंदर क्यों नहीं सो सकता?" राज ने उसकी आँखों में झांका।
"आपको पता नहीं?" उसकी आंखों में आश्चर्य उतर आया।
"क्या?" राज ने भंवें उचकाईं।
"मम-मेरा मतलब है कि जो रोज़वेल मेंशन को लेकर बातें होती हैं। मुझे सच में नहीं पता कि वाकई ऐसा कुछ है या नहीं पर अगर बात डर या ख़तरे की है तो रिस्क क्यों उठाया जाये? इसीलिये ठाकुर साहब ने बाहर यह इंतज़ाम करवा रखा है... यहां कोई ख़तरा नहीं है किसी भी तरह का। आप आराम से सोइये रात को। मेंशन के अंदर भी रात गहराने तक तो कोई ख़तरा नहीं है... आप आराम से खा-पी कर बाहर सोने आ सकते हैं।" खेम सिंह ने कुछ अटकते और कुछ निगाहें चुराते बताया।
"और रात गहराने के बाद क्या ख़तरा है?" राज ने उसे घूरा।
"वव-वह... लोग अफवाहें उड़ाते हैं कि यहां असुरी शक्तियां वास करती हैं जो रात होने के साथ जाग जाती हैं— ऐसे में अंदर रुकना ठीक नहीं।" उसने थूक गटकने के साथ बताया।
"अफवाह ही हैं न... सच्चाई तो नहीं है। फिर क्यों डरना— मैं तो अंदर ही सोऊंगा।" राज ने लापरवाही से कहा।
"क्या फायदा रिस्क लेने का साहब— बेवजह डर की वजह से नींद ही खराब हो सकती है।" उसके चेहरे पर भय की रेखायें फैल गईं।
"देखा जायेगा।" राज ने कंधे उचकाये।
"आप अकेले ही हैं— मुझे तो बताया गया था कि कई लोग आने वाले हैं।" उसने फिर अटकते हुए पूछा।
"हां, लेकिन फिलहाल तो मैं अकेला ही आया हूं।"
"तो मैं जाऊं साहब।"
"हां जाओ... सुबह टाईम पर आ जाना, मुझे ज़रूरत पड़ेगी कई चीज़ों की।"
"ठीक है— लेकिन एक रिक्वेस्ट है साहब। बाहर ही सोइयेगा... हमें सच में नहीं पता कि रात में मेंशन के अंदर क्या होता है लेकिन कुछ रात अंदर गुज़ारने की जिद पर अड़े लोगों के साथ हादसे हो चुके हैं तो आपको मना कर रहा हूं कि आप बेजा ज़िद न पालें।" उसने जाते-जाते मुड़ कर दबे स्वर में कहा।
"ठीक है यार— अब जाओ भी।" राज ने उक्ताये भाव से कहा और इमारत की तरफ बढ़ लिया।
कुछ पल खेम सिंह वहीं खड़ा चिंतित दृष्टि से उसकी पीठ देखता रहा, फिर अफसोस में सर हिलाते वापस मुड़ गया।
"वह जगह ठीक नहीं साहब— रात को मेंशन के अंदर जाने कौन-कौन सी भूतिया हरकतें होती हैं। कोई नहीं जान पाया, बस इतना ही पता है कि अगर कोई रात को अंदर रुक गया तो या सुबह मरा बरामद होगा या ऐसा।" कहने वाले ने सामने खाली कुल्हड़ से चाय सुड़कते पागल की तरफ इशारा किया।
"यह रोज़वेल मेशन में रात को रुका था?" राज ने हैरानी से उस पागल को देखा।
"जी— वर्ना यह भी आपकी ही तरह पढ़ा-लिखा शहरी बंदा था जो आपकी ही तरह किसी काम से इधर आया था। मेंशन की तरफ जाते वक्त यह भी यहां चाय पीने रुका था— मैंने मना किया था कि अगर वहां ठहरना ही है तो रात को अंदर के बजाय बाहर ठहरना, लेकिन बाबू पढ़ा-लिखा था, भूत-प्रेत, आत्मा, चुड़ैल वगैरह पर यकीन नहीं करता था तो रात अंदर ही रुका। फिर अगले दिन इसी हालत में बरामद हुआ था।" चाय वाले ने बताया।
"अगर इतनी ही प्राब्लम है उस जगह में, तो उसे बंद क्यों नहीं कर देता प्रशासन?" राज की भवें सिकुड़ीं।
"प्रशासन को क्या पड़ी है साहब... ठाकुर साहब चाहें तो बंद कर सकते हैं लेकिन उन्हें भी क्या पड़ी है। लोग आ के रुकते हैं तो इस बहाने उसकी कदर भी होती रहती है, वर्ना तो अब तक उनकी प्रापर्टी खंडहर बन चुकी होती।" साथ बैठे युवक ने बताया।
"कौन ठाकुर साहब?"
"जिनके पुरखों की छोड़ी वह जगह है... पहले कभी पिकनिक, या शिकार या मेहमानों के मनोरंजन के लिये आते रहते थे लेकिन फिर दसियों साल के लिये वह जगह वीरान पड़ी रही, जिस दौरान मौजूदा ठाकुर साहब विलायत में रहते थे। फिर जब वह यहां आ के बसे और इस प्रापर्टी की सुध ली, तब तक वहां जाने कौन सी असुरी शक्तियों का वास हो चुका था कि फिर वहां हादसे होने लगे और मशहूर हो गया कि वह जगह आसेबी है।"
"जब मशहूर ही हो गया तो लोग क्यों रुकते हैं वहां?"
"जगह बड़ी अच्छी है साहब... उधर ऊंचाई के आखिर में थोड़ी मैदानी जगह है, जिसे बाग की तरह संवारा गया है। वहीं एक झील है जिसका हुस्न अलग ही है। फिर वहां जो भी ख़तरा है, वह रात को मेंशन के अंदर रुकने पर है। दिन में कैसा भी कोई ख़तरा नहीं और रात के लिये ठाकुर साहब की तरफ से ही दो बड़े कैम्प लगा रखे गये हैं जहां रात गुजारी जा सकती है। तो क्या है न साहब आउटिंग और एडवेंचर के शौकीन लड़के-लड़कियों के ग्रुप आते रहते हैं। शूटिंग वाले भी आते हैं तो ऐसी मुर्दा जगह भी नहीं है। इसका इंतज़ाम एक खेम सिंह नाम के आदमी के हाथ रहता है जो मेंशन का केयर-टेकर है। लोग चाहते हैं तो घरेलू कामकाज के लिये नौकर-नौकरानी का भी इंतज़ाम कर देता है लेकिन वे रात को उधर नहीं रुकते।"
"क्या इसने कभी कुछ नहीं बताया कि रात को मेंशन में इसने क्या झेला था?" कहते हुए राज ने गर्दन से उस पागल की तरफ इशारा किया।
"होश में आये तब न बताये— बस दिखता होश में है, लेकिन होता नहीं।" कहने वाले ने तरस खाने वाले भाव से कहा।
एक पल को उसके दिमाग़ में आया था कि वह उस पागल से बात करे लेकिन उसकी आंखों से होशमंदी के आसार न नज़र आते थे तो टाल दिया। चाय पी कर उसने खाली कुल्हड़ वहीं रखे गंदे से डस्टबिन रूपी कनस्तर में डाला और उठ खड़ा हुआ।
"एक सिग्रेट दे दो चाचा और पैसे बताओ।" उसने चाय वाले से सम्बोधित होते हुए कहा।
जो ब्रांड वह पीता था, वह यहां मिलना नहीं था तो जो भी उपलब्ध था, उसी से काम चला लेना था। सिग्रेट लेकर उसने वहीं खड़े-खड़े सुलगाई और एक कश लेते हुए वॉलेट निकाल कर पैसे देने लगा।
"वहां रुक ही रहे हैं तो रात अंदर मत गुजारियेगा साहब।" चाय वाले ने चेतावनी भरे अंदाज़ में कहा।
उसने सहमति में सर हिला दिया— हालांकि अभी इस बारे में उसने कोई निर्णय लिया नहीं था।
पैसे दे कर उसने बैकपैक पीठ पर लादा और बैग उठा कर उस राह चल पड़ा, जिधर वह रोज़वेल मेंशन था। वक्त पांच के आसपास ही हुआ था लेकिन शाम के घिरने के आसार नज़र आने लगे थे। वैसे भी पहाड़ों में शामें जल्दी घिरती हैं— एक फ़िक्र यही थी कि अंधेरे के पांव पसारने से पहले वह मेंशन तक पहुंच जाये।
वैसे पर्यटन के नज़रिये से फलती जगहों पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट के रूप में कुछ न कुछ साधन मौजूद रहते हैं, लेकिन इत्तेफाक था कि उसके लिये कोई इंतज़ाम न हो सका था और वह आधे घंटे की पद यात्रा करके इस तिराहे तक पहुंचा था और पता नहीं अब मेंशन तक पहुंचने में कितने क़दम जमीन और नापनी पड़ेगी। जिस पगडंडी पर चल रहा था, वह कच्ची होते हुए भी इतनी चौड़ी तो थी कि दो छोटी गाड़ियां क्रास हो सकतीं और उसके दोनों तरफ पेड़ लगे थे जिनकी घनेरी छांव में शाम थोड़ा पहले ही गहरा जाती थी।
चलते-चलते बीस मिनट बाद उसे उस जगह के दर्शन हुए जिसे रोज़वेल मेंशन के नाम से जाना जाता था।
आसपास एक करीने से संवारा गया ख़ूबसूरत बाग़ था जिसमें कई तरह के पेड़ थे, जानवरों की आकृति में तराशी गई झाड़ियां थीं, आवारा जानवरों से बचाने लायक इंतज़ाम के साथ फूलदार पौधे और झाड़ थे, बीच-बीच में छोटी-छोटी नहर टाईप नालियों से अटैच कई छोटे पूल दिख रहे थे। हालांकि फव्वारे भी थे लेकिन बंद पड़े थे और इस बाग के पार एक पुराने जमाने की बनी इमारत दिख रही थी, जिसे रंग-रोगन के सहारे नया बनाये रखने की कोशिश की गई थी लेकिन शैली से उसके पुराने होने का पता चल रहा था... और इस पूरे इलाके को एक कंटीली बाड़ वाली चारदीवारी से घेरा गया था।
मेंशन के अगले हिस्से में ही दो सफेद रंग की बड़ी सी छोलदारियां दिख रही थीं और उन्हीं के पास खड़ा एक शख़्स दिख रहा था, जो जैसे उसी का इंतज़ार कर रहा था।
पास पहुंचने पर वह ज्यादा कायदे से दिखा— दरम्याने कद और इकहरे शरीर वाला साधारण शक्ल-सूरत का आम सा पहाड़ी व्यक्ति था जिसने गर्म पजामे और शर्ट के रूप में कपड़े भी साधारण ही पहन रखे थे... यह मेंशन का वही केयरटेकर खेम सिंह था।
"क्या साहब— इतनी देर लगा दी। मैं निकलने ही वाला था।" वह राज के नज़दीक पहुंचते ही शिकायत भरे स्वर में बोला।
"कोई सवारी ही न मिली जो जल्दी ले आती... क्या करता भई? घंटे भर से ऊपर हो गया पैदल चलते।" राज ने मुंह बनाते हुए कहा।
"खैर, अब आ गये हैं तो मैं चलता हूं साहब... यहां बैठने लेटने का सब इंतज़ाम बाहर ही मौजूद है। मुझे लगा था कि आपको खाने की ज़रूरत होगी तो अंदर किचन में बना के रख दिया है। यह रही चाबी... यह मेन चाबी है, अंदर चार बेडरूम हैं और सभी के लिये यह एक मास्टर-की है। आप चाहें तो नहा-धो कर फ्रेश हो लीजिये— पानी गर्म किया था जो शायद अब तक आधा ठंडा हो चुका हो। फिर खा-पी कर बाहर आ जाइयेगा। यहां इस कैम्प में आपके सोने का इंतज़ाम कर दिया है। किसी नौकर की ज़रूरत हो तो बता दीजिये, कल अरेंज कर देंगे और स्टे के हिसाब से जो राशन लगे, बता दीजियेगा तो कल ला देंगे।" खेम सिंह ने मशीनी भाव से जैसे रटे-रटाये शब्द दोहराये।
"वैसे यहां ही क्यों सोना है— अंदर क्यों नहीं सो सकता?" राज ने उसकी आँखों में झांका।
"आपको पता नहीं?" उसकी आंखों में आश्चर्य उतर आया।
"क्या?" राज ने भंवें उचकाईं।
"मम-मेरा मतलब है कि जो रोज़वेल मेंशन को लेकर बातें होती हैं। मुझे सच में नहीं पता कि वाकई ऐसा कुछ है या नहीं पर अगर बात डर या ख़तरे की है तो रिस्क क्यों उठाया जाये? इसीलिये ठाकुर साहब ने बाहर यह इंतज़ाम करवा रखा है... यहां कोई ख़तरा नहीं है किसी भी तरह का। आप आराम से सोइये रात को। मेंशन के अंदर भी रात गहराने तक तो कोई ख़तरा नहीं है... आप आराम से खा-पी कर बाहर सोने आ सकते हैं।" खेम सिंह ने कुछ अटकते और कुछ निगाहें चुराते बताया।
"और रात गहराने के बाद क्या ख़तरा है?" राज ने उसे घूरा।
"वव-वह... लोग अफवाहें उड़ाते हैं कि यहां असुरी शक्तियां वास करती हैं जो रात होने के साथ जाग जाती हैं— ऐसे में अंदर रुकना ठीक नहीं।" उसने थूक गटकने के साथ बताया।
"अफवाह ही हैं न... सच्चाई तो नहीं है। फिर क्यों डरना— मैं तो अंदर ही सोऊंगा।" राज ने लापरवाही से कहा।
"क्या फायदा रिस्क लेने का साहब— बेवजह डर की वजह से नींद ही खराब हो सकती है।" उसके चेहरे पर भय की रेखायें फैल गईं।
"देखा जायेगा।" राज ने कंधे उचकाये।
"आप अकेले ही हैं— मुझे तो बताया गया था कि कई लोग आने वाले हैं।" उसने फिर अटकते हुए पूछा।
"हां, लेकिन फिलहाल तो मैं अकेला ही आया हूं।"
"तो मैं जाऊं साहब।"
"हां जाओ... सुबह टाईम पर आ जाना, मुझे ज़रूरत पड़ेगी कई चीज़ों की।"
"ठीक है— लेकिन एक रिक्वेस्ट है साहब। बाहर ही सोइयेगा... हमें सच में नहीं पता कि रात में मेंशन के अंदर क्या होता है लेकिन कुछ रात अंदर गुज़ारने की जिद पर अड़े लोगों के साथ हादसे हो चुके हैं तो आपको मना कर रहा हूं कि आप बेजा ज़िद न पालें।" उसने जाते-जाते मुड़ कर दबे स्वर में कहा।
"ठीक है यार— अब जाओ भी।" राज ने उक्ताये भाव से कहा और इमारत की तरफ बढ़ लिया।
कुछ पल खेम सिंह वहीं खड़ा चिंतित दृष्टि से उसकी पीठ देखता रहा, फिर अफसोस में सर हिलाते वापस मुड़ गया।