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Horror आसुरी शक्तियां

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Horror आसुरी शक्तियां

1-- उस रात इन्साफ

2-- रोज़वेल मेंशन

3-- नाईट वॉकर

4--

उस रात इन्साफ

हरेक की जिंदगी में कुछ बातें, कुछ लम्हे, कुछ किस्से, कुछ घटनायें ऐसी जरूर होती हैं जो उसकी मेमोरी में हमेशा के लिये सुरक्षित हो जाती हैं। कुछ ऐसी घटनायें, जहां आखिर में लगा सवालिया निशान कभी न ख़त्म हो पाये— ऐसी न भुला सकने वाली स्मृतियों में अपना एक खास मकाम बना कर रखती हैं।

अब चूंकि मैं पुलिस की नौकरी में रहा हूं, जहां पूरे कैरियर के दौरान जाने कितने अनसुलझे केस भी मेरी स्मृतियों में दर्ज हुए हैं तो ऐसा नहीं है कि मैं सवालिया निशान छोड़ जाने वाली घटनाओं में सभी को याद रख सकूं— हां, लेकिन कुछ घटनायें तो फिर भी होती हैं जो अपना अलग ही मकाम रखती हैं। ऐसी ही एक घटना है— जब भी कभी मेरे सामने भूत-प्रेत, आत्मा वगैरह की कोई बात हो, तो मेरी स्मृतियों में ऐसे हलचल मचा देती है जैसे किसी झील के शांत पानी में कोई पत्थर फेंक दिया गया हो।

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हां, मैं अपने बारे में बताना भूल गया... मेरा नाम राज है, उपनाम इसलिये नहीं बताऊंगा कि उससे जाति झलकती है और मैं इस कहानी के किरदार के रूप में बस एक इंसान ही रहना चाहता हूं। पुलिस सेवा में सफलता पूर्वक पैंतीस साल गुजार कर रिटायर हो चुका हूं और अब चंडीगढ़ में रहता हूं। ज्यादातर वक्त घर में पोतों के साथ खेलने, या सुबह शाम पार्क में अपनी उम्र के लोगों के साथ गप्पे लड़ाने में गुज़रता है।

बचपन से धर्म में कोई खास रूचि न रही तो ज्यादातर धार्मिक विश्वासों से दूर ही रहा हूं। इस नाते किसी भी तरह के अंध-विश्वास के खिलाफ सख़्ती से ही पेश आया हूं हमेशा से, और भूत-प्रेत, आत्मा जैसे किसी भी विचार को बड़ी कठोरता से नकारता रहा हूं। मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी किसी ने मेरे सामने इन चीजों पर यक़ीन जताया हो और मैंने उसे डपटा न हो। फिर भी... मेरी ज़िंदगी में एक ऐसी घटना ज़रूर हुई है, जिसका सही मतलब मेरी कभी समझ में न आ पाया और आज तक उस पर लगा सवालिया निशान वैसे ही बरकरार है।

आज शाम जब हम कुछ बूढ़े पार्क में जमा हुए थे तो सिह साहब कल रात उनके साथ हुआ एक वाक्या बताने लगे, जो किसी आत्मा से मुठभेड़ होने को लेकर था। जहां बाकी साथी सिह साहब की हां में हां मिलाने लग गये और अपने साथ कभी हुआ ऐसा ही कोई अनुभव बताने लग गये— वहीं मैं लगातार उनकी बातों के खिलाफ बहस करता रहा लेकिन ज़ाहिर है कि उन धार्मिकों के बीच मैं अकेला अर्ध-नास्तिक टाईप शख़्स था तो चली उनकी ही।

फिर वापस घर आ कर जब रात को बिस्तर के हवाले हुआ तो दिमाग़ में वैसी ही एक घटना हलचल मचाये हुए थी, जिसका सामना मैंने किया था, लेकिन जिस मुअम्मे को न कभी मैं सुलझा पाया और न ही किसी को बता ही पाया।

बात आज से करीब चालीस साल पहले की है, उन दिनों मैं ताजा-ताजा ही ज्वाईन हुआ था और एक ऊर्जा से भरा हुआ नौजवान था जो अपनी परफार्मेंस से अपने अधिकारियों को जल्द-से-जल्द प्रभावित कर लेना चाहता था। मेरी ज्वाइनिंग पीलीभीत में हुई थी और पुश्तैनी घर सोमना हुसैनपुर में था तो इसी के बीच दौड़ चलती रहती थी।

मुझे आज भी वह दिन उसी तरह याद है, और याद हैं उससे जुड़ी सारी घटनाएं— ठीक उसी तरह जैसे अभी हाल ही में गुज़री हों।

उस दिन शाम से ही मौसम ख़राब था और आकाश बादलों से घिरा हुआ था— पानी कहीं तेज़ बरसने लगता था तो कहीं टिपटिपाने लगता था। हवा कभी हौले-हौले तन सहलाने की अवस्था में आ जाती तो कभी उखाड़ फेंकने पर उतारू हो जाती। बादलों की घनगरज का सिलसिला भी रुक-रुक कर जारी था— रास्ते के किनारे मौजूद पेड़ किसी-किसी पल में एकदम शांत दिखते तो किन्हीं पलों में मस्ती में झूमने लगते।

मैं ड्यूटी के लिये उस शाम पीलीभीत लौट रहा था... यह सन अस्सी के आसपास की बात है। सड़क पहले से ही खस्ताहाल थी और इस बारिश ने तो रास्ते की हालत ही ख़राब कर रखी थी। खटारा सी जीप अपनी सामर्थ्य भर उन हालात और उस रास्ते का सामना कर रही थी, लेकिन मैं परेशान हाल लगातार यही सोच रहा था कि वह कहीं रास्ते में दगा न दे जाये... आसपास तो कोई आबादी भी नहीं थी कि शरण मिल सकती।

फिर जब ओरैया क्रास हो चुका तो एक जगह आखिरकार जीप ने हाथ खड़े कर दिये।

न चाहते हुए भी मुंह से कई अपशब्द निकल गये।

झुंझलाहट में स्टेयरिंग पर हाथ मार कर रह गया। आसपास कोई भी ऐसी चीज़ नहीं थी जिससे उम्मीद की जा सकती। बस पानी से भीगे झूमते पेड़ खड़े थे या इधर-उधर पानी से भरे थाल दिख रहे थे। कोई घर, गुमटी या इंसान तो ऐसे मौसम में क्या ही दिखता— कोई आवारा जानवर तक नहीं दिख रहा था कि उसे देख के ही तसल्ली होती कि चलो कोई तो है जो ऐसे मौसम में मेरी तरह घर से बाहर है।

बूंदें हल्की हुईं तो उतर कर बोनट खोला लेकिन कम से कम मैं इतना सक्षम तो नहीं था कि किसी बारीक फॉल्ट को पकड़ लेता... और कोई बड़ा, नजर में आने लायक दोष तो दिख नहीं रहा था जो वह यूं रूठ कर खड़ी हो गई थी।

मायूस हो कर वापस अंदर आ बैठा और सोचने लगा कि ऐसी स्थिति में क्या किया जा सकता था। अंधेरा तेजी से बढ़ता जा रहा था तो तय था कि कोई मदद मिलने की उम्मीद भी उसके बढ़ने के साथ ही कमज़ोर हो रही थी।

जंगल से लगा इलाका था तो जानवरों का ख़तरा तो रहता ही था— बस मौसम ही था, जिसके चलते उम्मीद कर सकता था कि जानवर भी ऐसे में अपने ठिकानों पर नाउम्मीदी की हालत में सिमटे पड़े होंगे।

यूं ही बैठे-बैठे आधा घंटा और गुज़र गया— अंधेरे ने पूरी तरह अपनी हुक्मरानी स्थापित कर ली। अब बस बीच-बीच में चमक उठती बिजली ही थी जो उसे भेद कर आसपास का नज़ारा दिखा देती थी। बूंदाबांदी तो वक्त गुज़रने के साथ और कमज़ोर हो गई थी लेकिन हवायें अभी भी एकदम आक्रामक थीं।

अचानक एक तरफ एक साया चमका— दिल ने ज़ोर से धड़क कर प्रतिक्रिया दी। उसे देख पाना भी इसलिये संभव हुआ था कि उसी पल कहीं दूर बिजली कड़की थी, जिसकी कमज़ोर पड़ती चमक वहां तक चली आई थी।

साया इंसानी था— यह देख कर राहत ज़रूर महसूस हुई, लेकिन दिमाग़ इस सवाल में फिर भी उलझ गया कि भला ऐसे मौसम में और ऐसी जगह कोई इंसान क्या कर रहा था।

फिर उसके पास आने पर उसका आभास होने लगा और मैं सतर्क हो कर बैठ गया। हाथ होलस्टर पर पहुंच गया कि ख़तरे की सूरत में उंगलियां रिवॉल्वर से दूर न रहें।

फिर वह साया पैसेंजर साईड की तरफ़ एकदम पास आ खड़ा हुआ... मैंने ख़ुद से कुछ बोलने की कोशिश नहीं की।

"क्या बात है साहब... ऐसे मौसम में आप ऐसी जगह इतनी देर से थमे खड़े हैं... कोई परेशानी है क्या?" उस साये ने पूछा— आवाज़ जनानी थी, जिसे सुन कर मुझे राहत भरी हैरानी हुई और मैंने होलस्टर से हाथ वापस खींच लिया।

"हाँ— गाड़ी खराब हो गई है। क्या यहां किसी तरह की मदद मिल सकती है?" मैंने स्वर में याचना का पुट लाते हुए कहा।

"अब इस वक्त कोई मिस्त्री तो यहां नहीं मिलेगा— सुबह ही आगे जो बस्ती है मैदना की... वहां से आप ला सकते हैं किसी को।" आवाज़ से अंदाज़ा हो रहा था कि वह कोई लड़की ही थी।

"तो मतलब यह तूफानी रात मुझे इसी तरह गुज़ारनी पड़ेगी।" मैंने किसी हद तक मायूसी से कहा।

"लेकिन इस तरह रास्ते में और खुली जीप में रात गुज़ारना तो ठीक नहीं।" लड़की ने चिंता जताई।

"कर भी क्या सकते हैं— यहां तो आसपास कोई ऐसी जगह भी नहीं दिखती कि रात भर के लिये शरण मिल सके।" मैंने निराशा जताई।

"नहीं— ऐसा नहीं है, मैं पास ही रहती हूं अपने बाबा के साथ। आप बुरा न मानें तो वहां रात गुज़ार सकते हैं।" उसके स्वर में आग्रह का पुट था, जिसे मैं इग्नोर न कर पाया।

"ओके।" कुछ देर सोचने के बाद मैंने कंधे गिराते हुए कहा और इग्नीशन से चाबी निकालते हुए नीचे उतर आया।

कुछ छिटकी हुई बूंदों ने भीगी और कीचड़ जैसी हो चुकी ज़मीन पर उतरते ही मेरा स्वागत किया— लेकिन वे मुझे परेशान कर पाने में सक्षम नहीं थीं। उसने अपने पीछे आने का इशारा किया तो मैं ज़मीन पर पानी, कीचड़ और सूखी ज़मीन के बीच अंतर ढूंढने की नाकाम कोशिश करते हुए उसके पीछे बढ़ लिया। वह लंबाई में मुझसे थोड़ी कम थी, लेकिन सेहत ठीक-ठाक थी। नीचे उसने क्या कपड़े पहने थे— वह अंधेरे में देखना या समझना मेरे लिये मुश्किल था, लेकिन ऊपर से एक बरसाती ओढ़ रखी थी, यह मैं देख सकता था। वह बरसाती का सर पर निकला हुड ही था, जिसके पीछे अंधेरे में उसका चेहरा भी खो गया था।
 
अब उस पर ज्यादा ध्यान देने से बेहतर था कि मैं अपने बारे में सोचता— हालांकि मुझे कोई आफत नहीं थी कि रात ही पीलीभीत पहुंचना था, सुबह भी पहुंच सकता था। बात बस इतनी थी कि रात ही पहुंच कर एक भरपूर नींद ले लेता था तो सुबह पूरी ताज़गी के साथ दिन की शुरुआत करता— अब रात का कुछ पता ठिकाना नहीं था, कि कैसी गुज़रने वाली थी... लेकिन किसी छत के नीचे शरण मिल रही थी, यही क्या कम था। खुले में रहते जीप में रात गुज़ारने से तो यह हर हाल में बेहतर था।

उस जगह से थोड़ा आगे बढ़ते ही एक पेड़ों के झुरमुटे के पीछे किसी तरह के निर्माण की झलक मिली। उसकी तरफ़ बढ़ते हुए जब दूर कहीं बिजली चमकी तो दिखा कि वह मज़ार थी, जिसे बाकायदा चार खम्बों पर खड़ी छत और चार फुट ऊंची बाउंड्री के ज़रिये घेरा गया था। उसके साथ ही लगी एक कोठरी भी मौजूद थी— जो मेरे ख़्याल से उसका ठिकाना होना चाहिये था।

किसी तरह कीचड़ बनी मिट्टी से बचते उलझते हम वहां तक पहुंचे तो उसने कोठरी के दरवाज़े पर लगी सांकल खोली और अंदर हो गई। महज़ कुछ सेकेंड में ही वापस आई तो उसके हाथ में पानी से भरी बाल्टी और मग था।

"पैर धो लीजिये— गंदे हो गये होंगे।" उसने बाल्टी ज़मीन पर रख कर मग मेरी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा था।

बिना कुछ बोले मैंने मग ले लिया और अपने पैर धोने लगा जो इस वक़्त जूतों के बजाय चप्पल में थे। इस वक़्त मैं जा ज़रूर पुलिस जीप से रहा था लेकिन सिविल ड्रेस में था तो पैरों में भी जूतों के बजाय चप्पलें ही थीं। पैर धो कर अंदर हुआ— तो वह एक ताख में रखी लालटेन जला रही थी, जिसके जलते ही कमरे में कांपता, पीला प्रकाश फैल गया।

अब मैं लालटेन के मरियल मगर फिर भी गनीमत प्रकाश में देख सकता था कि वह बेहद मामूली रिहाइश की गवाही देता था। एक लकड़ी की अलमारी थी, जिस पर कुछ खाने-पकाने वाला सामान रखा था। ज़मीन पर उससे सटा ही एक स्टोव रखा था तो उसके एकदम विपरीत दीवार में एक डोरी बंधी थी, जिस पर कुछ कपड़े टंगे थे और नीचे एक आदमी के लेटने लायक तख्त बिछा था। तख्त के ऊपर रोल किया बिछौना और तकिया मौजूद थे, तो नीचे की तरफ़ एक संदूक मौजूद था। उसी कोने में एक खजूर चटाई रोल करके खड़ी की गई थी। कोठरी की ज़मीन कच्ची ही थी और इधर-उधर बिखरी मिट्टी देख अंदाज़ा होता था कि जैसे अंदर खुदाई की गई हो। ऐसी किसी जगह की तलाश में मैंने नज़र दौड़ाई तो तख्त के नीचे ही लगा कि जमीन खोद कर वापस बराबर की गई थी लेकिन ठीक से बराबर हो नहीं पाई थी। वहीं नीचे ज़मीन खोदने लायक फावड़ा भी पड़ा था।

"यहां तुम अपने पिता के साथ रहती हो?" मैंने उसकी तरफ़ घूमते हुए कहा।

अब उसने सर पर मौजूद हुड हटा दिया था और बरसाती उतार रही थी। मैं उसकी सूरत और शरीर देख सकता था। वह लंबाई में पांच फुट से कुछ ऊपर रही होगी, बदन गुदाज था और गोल चेहरे पर बच्चों जैसी मासूमियत मौजूद थी। हालांकि वह बच्ची नहीं, बल्कि भरे-पूरे शरीर की नवयौवना थी और उसकी काली गहरी आँखें उसके व्यक्तित्व में खास आकर्षण का केन्द्र थीं।

"जी... वैसे तो यहां कोई नहीं रहता लेकिन कभी उर्स के टाईम, तो कभी मज़ार की साफ़-सफ़ाई के लिये हम इधर आ जाते हैं। अब आते हैं तो रात को यहीं ठहरना होता है— उसी हिसाब से यहां ज़रूरत भर थोड़ा-बहुत सामान रहता है।" उसने बरसाती उतारने के बाद डोरी पर डालते हुए कहा।

"क्या तुम्हारे वालिद यहां के मुजाउर हैं?"

"मुजाउर कह लीजिये— खादिम कह लीजिये, जो भी हैं वही हैं। सुलेमान शाह हमारे ही शिजरे के एक पहुंचे हुए बुजुर्ग थे, जिनकी यह मज़ार है तो इसकी देखभाल की ज़िम्मेदारी हमारे ही खानदान की चली आ रही है। वैसे अब्बू हकीम भी हैं लेकिन अपने खादिम होने का फर्ज निभाने से पीछे नहीं हटते।"

"कहां हैं वह? भला ऐसे मौसम में तुम्हें यहां अकेला छोड़ कर कहां चले गये?"

"गये तो अच्छे काम से ही हैं। हम ओरैया में रहते हैं और हर जुमेरात साफ-सफाई के लिये आ जाते हैं। मौसम ठीक हुआ और कोई साधन मिल गया तो वापस लौट जाते हैं, वर्ना रात यहीं रुक जाते हैं। आज भी शायद मौसम बिगड़ने से पहले वापस लौट जाते लेकिन आगे एक गांव है अहमदपुर, वहां के एक पंडित जी हैं, उनकी पत्नी की तबियत कुछ खराब हो गई थी एकदम से... तो वे साईकिल से ओरैया गये थे उन्हें बुलाने, लेकिन वहां से जब हमारे यहां होने का पता चला तो यहां आ गये। फिर अब्बू उनके साथ चले गये और लगता है कि बिगड़े मौसम की वजह से वहीं फंसे रह गये।"

"तुम्हारी फिक्र न होगी उन्हें— ऐसी जगह अकेले रुकना तो तुम्हारे लिये भी ठीक नहीं।"

"क्यों भला? जानवरों का ही तो ख़तरा रहता है— तो कुंडी लगा के सो जाते हम। वहां घर पे भी तो होता है ऐसा... अब्बू का मेरे सिवा और है ही कौन, तो कभी-कभार जब किसी मरीज को देखने दूर गांव चले जाते हैं, तो पीछे मुझे अकेले ही तो रहना पड़ता है घर पे।"

"डर नहीं लगता?"

"पहले लगता था— अब नहीं लगता। जब इंसान किसी चीज़ का अक्सर सामना करने लगे तो आदत पड़ जाती है। आप कुछ खायेंगे? यहां बस थोड़ा आटा और नमक प्याज लेकर ही आये थे हम, तो वही है। आप चाहें तो मैं दो रोटी बना देती हूं, प्याज के साथ खा लीजियेगा।"

"अरे नहीं— उसकी ज़रूरत नहीं। खाना मौसम देखते मैं घर से ही खा कर चला था तो उसकी कोई परेशानी नहीं... तुमने खा लिया?" मैंने बात करते हुए तख्त पर बैठ गया था तो उसने भी कोने में रखी लिपटी हुई चटाई उठा कर ज़मीन पर बिछा ली थी और नीचे ही बैठ गई थी।

"हां, दोपहर में खाया था न... हम तो ग़रीब लोग हैं, एक वक़्त ही खा कर गुज़ारा करते हैं। जो थोड़ा बहुत पास होता है तो अगले वक़्त के लिये बचा कर रखते हैं।"

"तो मुझे क्यों खिलाये दे रही थी फिर? इंसान एक वक़्त न भी खाये तो आफत नहीं आ जाती।"

"आप मेहमान हैं साहब— आपकी ज़रूरत पहले देखी जायेगी। यही मेरे अब्बू ने सिखाया है मुझे।"

"मेहमान नहीं मुसाफिर— जो इत्तेफाक से आ भटका है इधर। मेरा कोई हक़ तुम्हारे हिस्से की रोटी पर नहीं। तुम ऐसे मौसम में बाहर किसलिये भटक रही थी, वह भी बरसाती पहन कर?"

"शायद बाबा ने आपको लिवा लाने भेजा था... जाने क्यों, थोड़ी घबराहट हो रही थी तो अब्बू की उम्मीद में सड़क की तरफ़ चली गई थी कि शायद वापस आते हुए दिख जायें। वह तो नहीं दिखे, आप दिख गये... आप पुलिस में ड्राईवर हैं?" उसने इतनी मासूमियत से पूछा था कि मुझे इनकार करते न बना।

"हं-हां— ड्राईवर, वही हूं... साहब के लिये जीप ले कर पीलीभीत जा रहा था कि यहां आ कर खराब हो गई। क्या कहा जाये— ऐसे मौसम में शायद निकल कर ही ग़लती कर दी, लेकिन साहब लोगों के लिये सुबह से पहले थाने जीप भी पहुंचानी ज़रूरी थी।" मैंने कंधे उचकाते अपनी बेबसी जताई।

"आप कहां रहते हैं?"

"सोमना हुसैनपुर घर है लेकिन अब तो नौकरी के सिलसिले में पीलीभीत ही रहता हूं।"

"आपके घर में कौन-कौन है?" उसने दिलचस्पी से पूछा।

"माँ है, बाबूजी हैं, एक बड़े भाई हैं, भाभी हैं, एक भतीजा है और एक छोटी बहन भी है।"

"आपके भाई भी पुलिस में नौकरी करते हैं?"

"अरे नहीं— वह तो पिताजी की तरह किसान हैं। मेरे खानदान में मैं अकेला ही हूं, जो नौकरी करने निकला हूं। बाकी सब पीढ़ियों से बस किसान ही रहे हैं।"

"यह आपके यहां पे क्या है— उभरा-उभरा?"

उसके इशारे पर मैंने नीचे देखा— शर्ट के नीचे छुपा होलस्टर अपने उभार से अपना पता दे रहा था। मैं उसे थपथपाते धीरे से हंस पड़ा।

"रिवॉल्वर है— अब ड्यूटी का ज्यादातर हिस्सा इधर जंगलों में ही गुज़रता है तो जंगली जानवरों का ख़तरा तो रहता ही है। कुछ हिफाज़त का इंतज़ाम साथ रहता है तो डर नहीं लगता।"

"हां यह तो है— मतलब कोई शेर, चीता, भेड़िया आ जाये तो इससे बंदूक की तरह उसको गोली मार सकते हैं?"

"हां, यह बंदूक ही होती है— बस इसका साईज़ छोटा होता है और इससे एक बार में छः गोलियां चल सकती हैं। अच्छा, यह बताओ कि यहां तुम्हारे बाबा भी नहीं और तुम अकेले ही हो— फिर भी एक आदमी को ऐसे मौसम में पनाह देने के लिये ले आई। तुम्हें डर नहीं लगा?"

"किस बात का डर?" उसके चेहरे से उलझन झलकी।

"उसी बात का, जिसके पीछे एक लड़की को अजनबी मर्दों से डरना चाहिये। मैं तुम्हें नुकसान पहुंचा सकता हूं— तुम्हारे साथ ज़बर्दस्ती कर सकता हूं।"

"जो मुझे ठीक लगा, वह मैंने किया— जो आपको ठीक लगे, वह आप कीजिये। मेरे नसीब में अगर वह सब लिखा है तो मुझे झेलना ही है।" कहते हुए वह एकदम मायूस हो गई और उसका चेहरा बुझ गया।
 
"अरे नहीं-नहीं— डरो मत। ऐसा कुछ नहीं— मैं अच्छा आदमी हूं, जब तक मैं यहां हूं, तुम्हारी हिफाज़त वैसे ही करूंगा जैसे कोई भाई अपनी छोटी बहन की करता है। मुझे थोड़ा अजीब लगा कि तुम अगर ऐसे ही किसी पर भी भरोसा कर लेती हो, तो क्या सोचती हो। क्या तुम्हें डर नहीं लगता कि सामने वाला बुरा भी हो सकता है, जो तुम्हें नुकसान पहुंचाने लग जाये।"

"जानती हूं... लेकिन कुछ इल्म तजुर्बों के बाद ही हासिल होते हैं। काश... कि सभी मर्द आप जैसे ही सोचते।" उसने गहरी उदासी के साथ कहा।

"सब तो नहीं ही सोचेंगे— सब सोचने लगें तो पुलिस की ज़रूरत ही क्यों रह जाये। क्यों किसी कृष्ण को अवतार लेना पड़े। खैर... तुम ऊपर लेट जाओ, मैं नीचे सो जाता हूं। लालटेन धीमी कर दो, वर्ना तेल चुक जायेगा।" मैंने उठते हुए कहा।

"नहीं— मैं यहीं लेटती हूं, मैं यहीं ठीक हूं। अब्बू ऊपर लेटते हैं— आप उनकी जगह ही सही हैं।" उसने भी उठते हुए कहा और तख्त पर समेटे बिस्तर को ठीक से फैला दिया।

फिर उसी में से एक बिछौना, एक चादर और एक तकिया लेकर नीचे चटाई पर बिछा लिया और लालटेन की बत्ती कम कर दी, जिससे वह बस जुगनू जैसी रह गई। हालांकि इतने अंधेरे में तो उतना प्रकाश भी काफी था। हमारे वहां पहुंचने के कुछ पल बाद ही बूंदे फिर तेज़ हो गई थीं और अब बाकायदा शोर के साथ तेज़ बारिश होने लगी थी। यानि उसके पिता के ऐसे में वापस आ पाने की उम्मीद न के बराबर ही थी। मुझे ख़राब लग रहा था, एक जवान लड़की के साथ इस तरह एक छोटी सी कोठरी में रात बिताना... लेकिन इसके सिवा चारा भी क्या था? बाहर तो वैसे भी सुरक्षित नहीं था।

तत्पश्चात, उसने मुझसे ही कुंडी लगाने को कहा— जो मैंने लगा दी और फिर हम अपनी निर्धारित जगहों पर लेट कर जैसे अपनी-अपनी सोचने लगे।

"भादौं में बारिश भी कैसे टूट-टूट कर होती है... लगता है जैसे आसमान में बांध के कपाट खोल दिये जाते हों।" कुछ पल की खामोशी के बाद उसने कहा।

"ऐसा लग रहा है जैसे यहां खुदाई की गई हो— तख्त के नीचे। इसकी क्या ज़रूरत पड़ गई?" उसकी बात पर ध्यान देने के बजाय मैंने अपने पुलिसिया मिज़ाज से ताल्लुक रखता सवाल पूछा।

"मुझे ख़ुद को दफन करना था शायद... लेकिन फिर हिम्मत नहीं पड़ी तो पाट दिया गड्ढा। मौत कितनी मुश्किल होती है न? जब मौत की तरफ़ बढ़ते हुए सांसें ठहरने लगती हैं, तो कितनी छटपटाहट होती है न?" उसने अजीब से अंदाज़ में कहा कि उसके शब्दों का ठंडापन महसूस करके मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

"क्यों ऐसा सोचती हो— अभी तो ज़िंदगी शुरु हुई है तुम्हारी और अभी से मौत के बारे में सोचने लगी।"

"किसी ग़रीब के घर खूबसूरत लड़की के रूप में जन्म लेना कम परेशानी का सबब है? उस बाप के दिल से पूछिये, जिसकी बेटी उसके सामने पेड़ हुई जा रही हो, और उसके पास पल्ले बेटी को ब्याहने के लिये कुछ न हो।" उसकी आवाज़ में एक दर्द था।

"ऐसा क्यों— तुम्हारे अब्बा तो हकीम हैं न, और हकीम-वैद्य लोग तो अच्छा कमा लेते हैं।"

"गांव में कौन अच्छा कमा लेता है बाबू— सब अपने जैसे ग़रीब ही तो मरीज होते हैं। पैसे तो कभी-कभार कोई दे जाता है, वर्ना कोई कुछ पकड़ा जाता है तो कोई कुछ और कईयों के पास तो देने के लिये कुछ भी नहीं होता, तो बस दुआयें दे जाते हैं। फिर अब्बू का मिज़ाज भी अजीब है— लोग तो मज़ारों के चढ़ावे से भी घर चला लेते हैं लेकिन उन्हें यह भी गवारा नहीं। हमेशा जैसे देने का ही मिज़ाज रहा है— लेना तो जैसे जानते ही नहीं।"

"ओह... वैसे अगर तुम शादी करके चली जाओगी तो पीछे उन्हें देखने वाला कौन बचेगा?"

"कोई नहीं— यही बात तो और मरने नहीं देती।"

"इतनी सी उम्र में यह सब बड़ी-बड़ी बातें मत सोचो। सबका गुज़र-बसर हो ही जाता है— ग़रीबी तो पूरे देश में है, लेकिन लोग जी ही रहे हैं। सो जाओ— अरे हां, मैंने तुम्हारा नाम भी नहीं पूछा अब तक।"

"नाम तो आपका भी नहीं पूछा मैंने— क्या यह काफी नहीं कि हम इंसान हैं?"

"बिलकुल काफी है, लेकिन इंसान करोड़ों हैं धरती पर तो सबको अलग-अलग पहचानने के लिये नाम की ज़रूरत पड़ती ही है। वैसे मेरा नाम राज है... और तुम्हारा?"

"रोशनी... जब पैदा हुई थी तो अब्बू को लगा था कि उनकी ज़िंदगी में एक रोशनी आई है, और वही नाम रख दिया मेरा— लेकिन जल्दी ही अंधेरा फैल गया मेरे आने से। बड़ा भाई नदी में डूब के मर गया और अम्मा हैजे से मर गई।" उसके स्वर में गहरा दुख था।

मुझे पलट के कुछ बोलते न बना तो चुप ही रह गया। सांत्वना दे सकता था लेकिन मुझे पता था कि वे खोखले शब्द होते मेरे। हम दोनों ने अपने बीच सन्नाटे को जगह दे दी और सोने की कोशिश करने लगे। हालांकि रूटीन के हिसाब से यह मेरे सोने का वक़्त नहीं था और यह कुछ जल्दी ही सोने वाली बात थी, लेकिन जब करने को कुछ भी न हो और सोने के लिहाज से बढ़िया मौसम हो तो आदमी को नींद आ ही जाती है... मुझे भी आ गई और गहरी नींद सो गया।

जल्दी सोया था तो नींद भी जल्दी ही पूरी हो गई— कुछ देर वैसे ही पड़े-पड़े बाहर के मौसम का अंदाज़ा लगाया। बाहर बारिश थमी हुई थी और कोठरी के अंदर घुप्प अंधकार फैला था। आँखें मिचमिचाते हुए रेडियम डायल वाली रिस्टवॉच पर नज़र डाली तो सुबह के चार बज चुके थे। हालांकि अंधेरे से पता चलता था कि बाहर बारिश भले न हो रही हो, लेकिन बादलों ने आसमान अभी भी ढंक रखा होगा, वर्ना अब तक हल्की-फुल्की रोशनी तो हो ही जाती। लालटेन भी शायद तेल खत्म होने के साथ ही अलविदा कह गई थी और अपनी जगह लेटे, घड़ी के डायल को देखने के सिवा कुछ और देख पाने की हालत नहीं थी मेरी।

सो, आधा घंटा वैसी ही हालत में और पड़ा रहा।
 
फिर यह अहसास हुआ कि कोठरी के अंदर स्थापित सन्नाटे में अकेले मेरी ही सांसों की आवाज़ गूंज रही थी। कुछ चौंकते हुए आँखें खोल कर वहां देखा, जहां रोशनी लेटी थी— लेकिन ऐसा लगा नहीं कि वह लेटी थी। मैंने दो-तीन आवाज़ें दी उसे— लेकिन कोई प्रतिक्रिया न मिली। फिर समझ में आया कि एक तरह से सुबह तो हो ही चुकी थी, तो शायद शौच आदि के लिये गई हो। यह सोच कर निश्चिंत हो, फिर वैसे ही लेट गया।

आधा घंटा और गुज़र गया, लेकिन उसकी वापसी न हुई तो मेरी चिंता बढ़ी। मुझे जगे हुए एक घंटा हो चुका था और अगर वह मेरे जागने से एन पहले भी निकली थी, तो भी अब तक उसे गये घंटा भर हो चुका था और इतना वक़्त तो कैसे भी नहीं लगना चाहिये। एक तरह से जंगली इलाका था, जानवरों का ख़तरा तो हमेशा ही रहता था— कहीं किसी ख़तरे में न पड़ गई हो?

यह ख़्याल आते ही एकदम हड़बड़ा कर उठ बैठा।

अब कोठरी में मौजूद रोशनदान और अधटूटी खिड़की के सहारे बाहर की हल्की रोशनी अंदर आने लगी थी— और यह देख कर मुझे झटका लगा कि उसका बिस्तर, चादर, तकिया सब ऐसे ही समेट कर जैसे तख्त के नीचे डाल दिया गया था और चटाई वापस लपेट कर उसी कोने में खड़ी कर दी गई थी, जहां कल रात देखी थी। मुझे समझ में नहीं आया कि बिस्तर हटाने की इतनी भी क्या आफत थी।

फिर जब उठ कर दरवाज़े तक पहुंचा तो यह देख कर सन्न रह गया कि वहां अंदर से ही कुंडी अब भी लगी हुई थी, जैसी कल मैंने लगाई थी।

अगर कोठरी अंदर से अभी भी बंद थी तो आखिर वह कहां चली गई? मैंने इधर-उधर देखा, तख्त के नीचे देखा— लेकिन वहां कुछ नहीं था। मेरी धड़कनें अनायास ही बढ़ गईं और स्नायुओं में तनाव पैदा हो गया। ऐसी हालत में यह कैफियत किसी की भी होती। घबराहट में हाथ-पांव फूल गये। किसी तरह ख़ुद को संभालते दरवाज़ा खोला तो बाहर की नम हवा झोंके के साथ भीतर घुसी। बाहर बादलों के बावजूद अब भोर का उजाला फैलने लगा था, लेकिन अच्छी बात थी कि बारिश बिलकुल थमी हुई थी। दूर-दूर तक वहां कोई इंसान तब भी नहीं दिख रहा था और हर तरफ़ सन्नाटा भी ऐसा ही खिंचा था कि जैसे इंसान तो छोड़ो, जानवर भी उधर न हो।

कुछ गहरी सांसें लेकर ख़ुद को संभाला और वापस कोठरी के अंदर का अवलोकन किया।

यह अजीब था कि चटाई तो रोल करके कायदे से उसकी जगह पहुंचा दी गई थी, लेकिन बिछौना, चादर और तकिया ऐसे लतिया कर तख्त के नीचे धकेल दिया गया था, जैसे उसकी कोई वैल्यू ही न हो। मैंने अपना होलस्टर उठा कर लटकाया, पैरों में चप्पलें पहनीं— तब लालटेन की तरफ़ ध्यान गया कि वह कैसे बुझी। उसे उठा कर हिलाया तो अंदर तेल था, यानि अपने आप नहीं बुझी थी बल्कि उसे बुझाया गया था— लेकिन किसने? अंदर तो मेरे सिवा कोई और था ही नहीं। अगर रोशनी कोई धोखा, कोई भ्रम नहीं थी तो वह बंद कोठरी से ग़ायब कहां हो गई? क्या वह कोई भूत-प्रेत थी, कोई आत्मा थी? मैं कोई बहुत धार्मिक आदमी नहीं था तो इन सब बातों पर मेरा यक़ीन न के बराबर था... लेकिन अगर ऐसा वाक़ई नहीं था, तो फिर रोशनी का क्या चक्कर था?

मैं हैरान-परेशान, वहीं तख्त पर बैठ कर सोचने लगा।

प्रकाश कुछ और बढ़ा तो कोठरी का मुआयना किया... मिट्टी के गारे से जुड़ी ईंटों की दीवारें थी, जिस पर मिट्टी ही लेप कर नीचे से उन्हें कवर किया गया था। छत धन्नी, पटरे और मिट्टी से बनी थी जो भारी बारिश की वजह से सील रही थी। सीली हुई तो दीवारें भी सब थीं और यही वजह थी कि एक दीवार पर कोयले से बनाई कुछ आकृतियां तब दिख पाईं, जब खुले दरवाज़े से आती रोशनी कुछ और बढ़ गई थी। वे आकृतियां दिखीं, तो ग़ौर से उन्हें देखने लगा— प्रथम दृष्टया तो यही लगता था जैसे किसी बच्चे ने कोयला पा कर दीवार पर आड़ी-टेड़ी चिंघाटें खींच दी हों... लेकिन ग़ौर से देखने पर अंदाज़ा होता था कि वे इंसानी आकृतियां बनाई गई थीं, जिसमें एक तो लड़की की आकृति थी, जो जैसे सामने से देखने वाले को फूल दे रही थी। बाकी तीन आकृतियां आदमियों की थीं जो ऐसे तो साधारण से रेखा-चित्र ही थे लेकिन लगता था कि जैसे उन आकृति के भीतर कुछ विकृतियों या चिन्हों को अंकित किया गया था। मसलन एक के दाढ़ी थी लेकिन औरतों जैसे लंबे बाल थे, तो एक के चेहरे पर बायें गाल पर एक निशान था, जबकि तीसरे के शायद बाल घुंघराले थे और मूंछें भी एंठी हुई थीं। पता नहीं इन चित्रों का कोई मक़सद था या यह ऐसे ही बस बना दिये गये थे।

बहरहाल, जब मैं उस कोठरी से रवाना हुआ तो छः बज चुके थे। दरवाज़ा मैंने बाहर से ही कुंडी लगा कर बंद कर दिया था— जैसी हालत में कल आते वक़्त मिला था।
 
गीली ज़मीन पर कीचड़ से बचते, वापस टूटी सड़क वाले कच्चे-पक्के रास्ते पर पहुंचा तो जीप अपनी जगह मौजूद मिली। पीछे जो गुज़री थी, उसे देखते तो लग रहा था कि कहीं वह भी न अपनी जगह से ग़ायब मिले। कुछ देर इंतज़ार किया तो एक साईकिल वाला उधर आता दिखा। हालांकि ख़राब होने के बावजूद चालू रोड ही था, लेकिन मौसम के चलते इतनी वीरानी का शिकार थी। उस साईकिल वाले को रोक कर, उससे धक्का लगवा कर जीप सड़क से उतार कर किनारे की— ताकि दूसरों के लिये रास्ता न बधित हो। फिर उससे किसी मिस्त्री के बारे में पूछा तो उसने ओरैया के ही एक लड़के के बारे में बताया जो ओरैया में ही गाड़ी का काम करता था। रोशनी ने बीती रात कहा था कि कोई मैदना की तरफ़ ही मिस्त्री मिलेगा, लेकिन उसका कहना था कि वहां कोई मोटर मैकेनिक नहीं।

तब कुछ देर और इंतज़ार करना पड़ा और फिर उस सड़क पर आवाजाही चालू हुई तो ओरैया की तरफ़ जाते एक ट्रैक्टर से लिफ्ट लेकर ओरैया पहुंचा, जहां पहले तो एक घर में मौजूद लैंडलाईन से अपने थाने फोन करके अपनी स्थिति की सूचना दी, और फिर उस मिस्त्री को पकड़ा। उसके पास भी दूर जाने लायक कोई साधन फिलहाल उपलब्ध नहीं था तो उसे साथ लिये, फिर पुलिसिया रौब के दम पर लिफ्ट लेनी पड़ी। दस-पंद्रह मिनट में वापस उस जगह पहुंचे तो वह अपने काम से लगा।

वह एक छब्बीस-सत्ताईस वर्षीय युवक था जो वैसे तो दिखने में ठीक-ठाक ही था लेकिन हुलिया ऐसा बना रखा था कि जैसे महीनों नहाता ही न हो।

"सुनो— क्या नाम है तुम्हारा?" मैंने उसके पास ही टेक लगाते हुए पूछा।

"जहीर— जहीर अहमद।" उसने संक्षिप्त सा जवाब दिया।

"कब से रहते हो ओरैया में?"

"जब से पैदा हुआ साहब— यहीं का हूं, बस चार-पांच साल पीलीभीत रहा हूं काम सीखने के चक्कर में। फिर वापस यहीं।"

"इतनी पिद्दी सी जगह में गुज़ारे लायक कमा लेते हो?"

"न... यह मेन काम थोड़े है साहब। थोड़ी खेती है— तो दोनों मिला कर चल जाता है। पीलीभीत रहूं तो ज्यादा कमा सकता हूं लेकिन इधर बाप अकेला पड़ जायेगा।"

"इधर एक मज़ार है— जानते हो?" मैंने उसी तरफ़ इशारा करते हुए पूछा, जिधर मेरी रात गुज़री थी।

"हां, सुलेमान शाह बाबा की मज़ार है— कभी-कभी हाजिरी देने आता हूं मैं भी।"

"कोई देखभाल करता है उसकी या ऐसे ही लावारिस पड़ी रहती है?" मैंने उसे टटोलने की गरज से पूछा।

"लावारिस क्यों रहेगी— करते हैं न, बाबा के ही विरसे से भूरे चाचा। वैसे नाम तो उनका नब्बन है, पर सब भूरे चाचा ही कहते हैं।" जवाब देने के बाद वह कुछ पल रुक कर सोचने लगा और फिर अफसोस से सर हिलाते हुए बोला— "अब पता नहीं कि कर पायें कि न कर पायें।"

"क्यों— अब क्या हो गया?" मैंने दिलचस्पी से पूछा— आखिर मेरी जिज्ञासा भी अपनी जगह मौजूद थी कि कल रात के तमाशे का अर्थ क्या था।

"क्या बतायें साहब— पागल हो गये हैं एकदम... हर पल बस अपनी बेटी को दीवानों की तरह ढूंढते फिरते हैं। आसपास के लोग उन्हें संभालने की कोशिश करते हैं लेकिन फिर निकल जाते हैं।"

"क्यों— क्या हो गया उनकी लड़की को?" मेरा दिल ज़ोर से धड़का था।

"क्या जाने क्या हुआ... हमको तो बस इतना ही पता चल पाया कि पिछली जुमेरात मज़ार की साफ-सफाई के लिये आये थे उसे लेकर— हमेशा की तरह। फिर मौसम बिगड़ गया तो यहीं रुक गये— हालांकि पहले भी रुकते रहे हैं तो कोई नई बात थोड़े थी। बस नया यह हुआ कि अहमदपुर वाले पंडित जी की घरवाली की तबियत ज्यादा खराब हो रही थी तो उन्हें ढूंढते पंडित जी यहीं पहुंच गये और चचा को लिवा ले गये। अरे हां, आपको बताये नहीं— भूरे चचा हकीम भी थे और आसपास तो अकेले वही थे जो थोड़ा बहुत इलाज कर देते थे। अब लेने को तो इस वादे पे ले के चले गये कि कैसे भी करके ख़ुद छोड़ जायेंगे लेकिन जा के पता चला कि पंडिताईन स्वर्ग सिधार गईं— तो उनकी हालत ही न बची कि चचा को छोड़ने की सुध रहती। फिर उस रात भी बारिश ऐसी थी कि सुबह ही थमी थी। बेटी को इस उम्मीद में छोड़ गये थे कि वह ख़ुद को संभाल सकती है लेकिन सुबह वापस लौटे तो रोशनी ग़ायब थी।

रोशनी... भूरे चचा की बेटी। चचा ने चीख-पुकार मचाई तो लोगों ने भी ढूंढने की कोशिश की, लेकिन वह कहीं न मिली। पता नहीं क्या हुआ उसका... लौटे थे तो दरगाह के साथ वाली जो कोठरी है, जहां यह लोग रुकते थे— उसका दरवाज़ा खुला मिला था। तो अब यह तो पता है कि वह बाहर निकली लेकिन आगे पता नहीं कि जानवर उठा ले गये या कोई आदमी उठा ले गये। आसपास खोजा तो गया लेकिन ऐसा कुछ मिला ही नहीं कि कुछ भी अंदाज़ा होता।" वह बताता जा रहा था और मेरा दिमाग़ घूमता जा रहा था— अगर वह पिछली जुमेरात ही ग़ायब हो चुकी थी तो कल का तमाशा मुझे किस वजह से दिखा रही थी।

"यह पक्का पिछली जुमेरात की बात है न? मतलब हफ्ता भर से रोशनी को किसी ने नहीं देखा?"

"नहीं साहब— एक बार ग़ायब होने के बाद कौन मिलता है। सदमे से चचा की तो दिमाग़ी हालत तक बिगड़ गई। कभी उनकी बीवी और दो बच्चे थे लेकिन फिर बेटा डूब के मर गया और बीवी हैजे से, तो अकेली बेटी ही बची थी जो उनके लिये सबकुछ थी। पागलों की तरह तो चाहते थे उसे— इस तरह ग़ायब हो जायेगी तो सदमा तो लगना ही था।

"पुलिस के पास गये थे?"

"आप ख़ुद पुलिस में हो, पता तो है आपको कि ऐसी हालत में ग़रीब के साथ पुलिस क्या करती है। यह कह के भगा दिया था कि किसी लड़के के साथ भाग गई होगी। चचा की हालत नहीं देखी जाती— लेकिन हम भी क्या कर सकते हैं।"

फिर मैंने और कुछ नहीं पूछा और वह अपने काम में लग गया। मैं सोच में पड़ गया कि जो रात को मैंने महसूस किया, आखिर वह क्या था? वह लड़की ख़ुद को रोशनी बता कर यह तमाशा क्यों कर रही थी? क्या वह कोई उसकी खास सहेली थी जो इस तरह उसका केस मेरी जानकारी में लाना चाहती थी? पर ऐसा कैसे हो सकता है... किसी को क्या पता कि कल शाम खराब मौसम में मैं इधर से गुजरूंगा और मेरी जीप भी ख़राब हो जायेगी? यह तो इत्तेफाक की बात थी।

"साहब— स्टार्ट करो।" उसने मुझसे कहा तो मैं अपने ख्यालों से बाहर आया।

वापस सीट पर जा कर बैठा और चाबी लगा कर घुमाई तो पहले प्रयास में ही स्टार्ट हो गई। वह बोनट गिरा कर मेरे पास आ खड़ा हुआ।

"यह इलाका कौन सी चौकी में आता है? मतलब किसके पास गये थे वह लोग रिपोर्ट लिखाने?"

"ओरैया वालों के पास ही।"

"अच्छा, चलो मैं भी उधर ही चल रहा हूं— छोड़ दूंगा तुम्हें। पैसे कितने हुए वैसे तुम्हारे?" मेरे कहने पर वह आगे से घूमता मेरे पहलू में आ कर बैठ गया और मैंने यू टर्न लेते जीप वापस ओरैया की तरफ़ बढ़ा दी।

"अब आपसे क्या पैसे लें साहब— जो मन करे दे दीजिये।" उसने दांत निकालते कहा तो मैंने जेब से बीस रुपये निकाल कर उसे दे दिये।

"यह जो लड़की थी— रोशनी, क्या इसका चक्कर था किसी लड़के के साथ? मतलब ऐसा कोई लड़का था क्या इसकी ज़िंदगी में, जिसके साथ यह भाग सके?" थोड़ी देर बाद मैंने फिर पूछा।

"अरे न साहब— तौबा। बहुत सीधी और शरीफ लड़की थी। उसकी जान अब्बा में और अब्बा की जान उसमें बसती थी। आँख उठा कर न देखती थी किसी को— चक्कर तो दूर की बात है। फिर बस्ती में बड़ी इज्ज़त है चचा की... हम सबके लिये वह हमारी बहन ही जैसी थी। ऐसा कुछ होने की दूर-दूर तक गुंजाइश नहीं— लेकिन अब पुलिस का क्या कहा जाये साहब... जो चाहे कह दें, कौन रोक लेगा उन्हें।" आखिर के शब्द बोलते वक़्त उसके अंदाज़ में पुलिस के प्रति मौजूद एक स्वाभाविक घृणा उभर आई।

"अच्छा— क्या रोशनी की कोई सहेली भी थी, जो सबसे खास हो, जो उसे अपनी बहन की तरह ही चाहती हो?"

"सहेलियां तो कई हैं उसकी और लगभग सबकी खास ही है— अब कोई एक नाम मैं कैसे लूं।"

"हम्म।"

बाकी रास्ता खामोशी से कटा।

उसे छोड़ कर जब चौकी पहुंचा और वहां लोगों से उस केस की ख़बर ली तो सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। पहले तो उन्हें तबियत से झाड़ा और फिर रिपोर्ट दर्ज करवाई। तदुपरांत वहीं से कुछ लोगों को लेकर भूरे उर्फ नब्बन मियां के घर की तरफ़ रवाना हुआ।
 
छोटी सी आबादी थी तो घर ढूंढने में कोई दिक्कत न आई, लेकिन वे ख़ुद तो घर मिले नहीं। तब आसपास के लोगों से रोशनी की सभी सहेलियों को वहीं बुला के लाने को कहा। शायद इसके पीछे यही उम्मीद थी कि इस बहाने वह लड़की भी सामने आयेगी, जो कल रोशनी बन के मिली थी। कुल आठ लड़कियां थीं— जो रोशनी की ही हमउम्र थीं और सभी के बारे में यही मत था कि वे उसकी खास सहेलियों में शामिल थीं, लेकिन उनमें वह लड़की न निकली। उनसे कोई काम की जानकारी भी हाथ न लगी। रोशनी के चरित्र को लेकर भी न सिर्फ उन लड़कियों का ही, बल्कि उनके घर वालों का भी स्पष्ट रूप से वही दावा था जो मैं ज़हीर के मुंह से सुन चुका था। यानि इस बात की कोई संभावना नहीं थी कि वह किसी के साथ भागी हो या कोई उसे भगा ले गया हो।

अब दो संभावनायें बचती थीं— पहली तो यही कि शायद रात या तड़के वह शौच वगैरह के लिये निकली हो और कोई गुलदार या भेड़िये उठा ले गये हों, या फिर कोई आदमी या एक से ज्यादा लोग उसे उठा ले गये हों।

कल रात वाली लड़की के चक्कर में मैंने बस्ती की बाकी बची वे सारी लड़कियां भी चेक कर लीं, जो कल रात वाली लड़की की उम्र की रही होंगी— लेकिन वह उनमें भी नहीं थी। एक बड़ी मुश्किल यह थी कि वहां किसी के पास भी रोशनी का एक फोटो तक उपलब्ध नहीं था। न उसके पिता के पास ही होने की कोई संभावना जताई गई... ऐसे में ज़बानी हुलिये से ही काम चलाना था और जब सबने रोशनी का हुलिया बताने की कोशिश की तो मोटे तौर पर वह उसी लड़की से मेल खाता था, जो कल रात मुझे मिली थी।

पता नहीं क्या माजरा था? अगर वह ग़ायब नहीं हुई थी और वहीं छुप कर रह रही थी तो भला इसके पीछे क्या मकसद हो सकता है। कम से कम कोई बाप की मुहब्बत से भरी बेटी तो ऐसा करना हर्गिज़ न गवारा करेगी— जिसका बाप सदमे का शिकार हो कर पागल ही हो जाये। जाने क्या चक्कर था— समझ से ही बाहर था। बाकी केस तो एक अपराध के तौर पर समझा जा सकता था, लेकिन बीती रात मेरे साथ हुआ तमाशा किसी भी एक्सप्लेनेशन से बाहर था। वह बात इतनी अजीब थी कि मेरी किसी को बताने की हिम्मत ही नहीं पड़ रही थी। लोग कहीं मुझे भी दिमाग़ी खलल का शिकार न समझने लग जायें।

फिर जब हम वहां से वापसी कर रहे थे— तब कहीं से भटकते हुए भूरे मियां भी आ गये।

देख कर ही मन द्रवित हो गया... ऐसी हालत बना रखी थी। कपड़े गंदे हो रहे थे, कुर्ता तो कई जगह से फट-नुच भी गया था। शायद कटीली झाड़ियों में घुसने की कोशिश की होगी। दाढ़ी और सर के खिचड़ी बाल उलझे हुए थे और आँखों से ही वहशत टपक रही थी। पुलिस की गाड़ी और बावर्दी लोगों को देख कर वह एकदम झपटते हुए हमारे पास आये थे कि शायद हम उनकी बेटी की कोई ख़बर लाये थे... लेकिन हमें चुप देख कर मायूस हो गये थे और वहीं बैठ कर रोने लगे थे। हमें समझ में नहीं आया कि हम उन्हें क्या समझायें। फिर भी मैंने आगे बढ़ कर उन्हें समझाने की कोशिश की तो उन्होंने मेरा हाथ झटक दिया और रोते हुए एक तरफ़ भाग गये।

भारी मन से हम वापस हुए।

फिर चौकी वालों को आसपास के इलाकों में गश्त, छानबीन करने से लेकर मुखबिरों के ज़रिये कोई ख़बर निकालने की हिदायत देकर मैं पीलीभीत के लिये निकल खड़ा हुआ था। आखिर मुझे भी अपनी हाजिरी दर्ज करानी थी।

उस रात जब मैं बिस्तर में लेटा था तो पिछली रात का पूरा वाक्या मेरी आँखों के आगे नाच रहा था और मैं एक-एक बात को याद करने की कोशिश कर रहा था। हर छोटी बात, जो उसने कही और हर छोटा इशारा, जो उसने किया हो। देर रात तक माथा पच्ची करने के बाद मुझे कुछ चीज़ें तो समझ में आईं— लेकिन उस कनक्लूजन तक पहुंचने के लिये मुझे एक अवैज्ञानिक बात को 'सपोज' करना पड़ा, जिस पर वैसे मेरा कोई यक़ीन नहीं था। यानि उस लड़की को बजाय किसी जीती-जागती लड़की के, एक आत्मा के रूप में तस्लीम करना पड़ा— तब कुछ सवालों के जवाब हल होते दिखे।

सुबह मैं बाज़ाब्ता तौर पर ओरैया की ओर रवाना हुआ और चौकी तक पहुंचा, जिनके पास कल से आज तक के बीच मिली कोई भी नई सूचना नहीं थी। पता नहीं कुछ किया भी था या मुझे बस ऐसे ही टरका दिया था कि मैं अपना सर्कल देखूं और वे कुछ लीपापोती करके केस दफन कर दें।

मैंने उनसे इस इलाके के नोन क्रिमिनल्स की फाईल निकलवाई और उसमें मौजूद उन अपराधियों की शक्लों पर ग़ौर करने लगा, जो किसी न किसी अपराध के चक्कर में पुलिस रिकॉर्ड बनवा चुके थे। मैं उनके चेहरों में वे चिन्ह देखने की कोशिश कर रहा था जो दरगाह वाली कोठरी की दीवार पर उकेरी गई आकृतियों में दर्शाये गये थे। यह बिल्कुल ज़रूरी नहीं था कि वे आकृतियां वाक़ई किन्हीं अपराधियों की थीं और वे अपराधी पुलिस रिकॉर्ड में भी दर्ज हों— लेकिन मैं तुक्का भिड़ाने की कोशिश कर रहा था।

पूरी फाईल में दो ऐसे लोग दिखे, जिनके बाये गाल पर कटे का निशान था— शायद चाकूबाजी के कारण। दोनों ही छंटे हुए बदमाश थे। उन आकृतियों के हिसाब से अकेली यही पहचान कुछ कारगर हो सकती थी, वर्ना गर्राबी मूंछों और घुंघराले बालों वाले तो पता नहीं कितने लोग होते पीलीभीत तक, या दाढ़ी मूंछ के साथ लंबे बालों वाले— जो साधू टाईप बंदा भी हो सकता था और कोई बिना पगड़ी का सरदार भी। एहतियातन पूछा तो ज़रूर उन दोनों के बारे में कि शायद किसी अपराधी के हुलिये से मेल खाते हों, जो पुलिस रिकॉर्ड से बाहर हों— लेकिन उन्हें कम से कम ऐसे किसी अपराधी के बारे में जानकारी नहीं थी। मैंने उन दोनों पिक किये लोगों की गतिविधियों के बारे में पता करने को कह दिया— खास कर पिछले बृहस्पतिवार की।

फिर चौकी से पूरी टीम लेकर उस मज़ार तक पहुंचा था— जहां कोठरी का दरवाज़ा अब भी वैसे ही बंद था, जैसे मैं बंद करके गया था।
 
दरवाज़ा खोला गया।

"इस तख्त को हटा कर बाहर रखो और इस संदूक को भी... फिर इस जगह को खोद के देखो। मुझे लगता है कि हाल ही में यहां कुछ तो दबाया गया है।" मैंने साथ आये हवल्दारों को निर्देशित करते हुए कहा।

चौकी इंचार्ज समेत पांच लोग थे— पांचों ही लग गये तो तख्त और बाकी सामान बाहर रख दिया गया। अब वहां फावड़ा तो एक ही था तो एक हवल्दार ज़मीन खोदने लग गया।

"यह फावड़ा यहां भला किसलिये होगा?" मैंने चौकी इंचार्ज सुखबीर से सम्बोधित होते हुए कहा।

"घास वगैरह हटाते थे भूरे मियां। अब जंगल ही तो है आसपास— साल में एक दिन छोड़ बाकी वीरान ही तो रहती है यह जगह। तो जुमेरात-जुमेरात आ कर दोनों बाप-बेटी साफ-सफाई कर जाते थे। ऐसे में झाड़ू और फावड़े की ज़रूरत तो रहती ही है।"

"इन चित्रों को किसने बनाया होगा?" मैंने दीवार पर बनी एकदम हल्की पड़ चुकी आकृतियों की तरफ़ इशारा किया— जो अब जैसे मिटना चाहती हों।

"क्या पता— शायद उसी लड़की ने बनाया होगा, या हो सकता है कि भूरे मियां यह बचकानी हरकत कर गये हों।" सुखबीर आँखें सिकोड़ कर बड़े ग़ौर से उन रेखा-चित्रों को देखता हुआ बोला।

"लेकिन कोई भी क्यों बनायेगा? क्या मतलब हुआ इसका?"

"अब क्या कह सकते हैं... अच्छा तो आप इन्हें ही कोई अपराधी समझ कर पुलिस रिकॉर्ड में ढूंढ रहे थे।" बड़ी देर से उसकी समझ में आ पाया— "लेकिन आपको कैसे पता कि यहां यह सब बना है?"

"मुझे इस घटना के बारे में उसी मोटर मैकेनिक ने बताया था तो सरसरी तौर पर मैंने इधर आ कर देखा था कि शायद इधर कोई लिंक मिल जाये। तभी तो मुझे इस केस के बारे में पता चला— वर्ना कौन सी आकाशवाणी होनी थी।" मैं साफ झूठ बोल गया— सच तो बता भी नहीं सकता था कि मैंने परसों रात यहीं गुज़ारी थी।

"साहब— कुछ है।" तभी खोदने वाला हवल्दार थमकता हुआ बोला और हम सभी चौंक कर उसकी तरफ़ देखने लगे।

खोदने के साथ ही एक क़िस्म की बदबू हवा में भरने लगी थी, जिसे पुलिस वालों को पहचानने की ट्रेनिंग दी जाती थी और इस वजह से ही हम यह उम्मीद भी कर रहे थे। तो जब हवल्दार ने ज़मीन के अंदर से उभरते एक कपड़े की तरफ़ इशारा किया तो हमारे शक की पुष्टि भी हो गई... वह कोई लाश थी, जो वहां दफनाई गई थी। अब किसकी लाश थी— यह तो बाहर आने के बाद ही पता चलना था, मगर अंदाज़ा था कि वह रोशनी की ही लाश होनी चाहिये थी।

मैंने संभाल कर निकालने को कहा और ख़ुद बाहर आ गया।

अंदर बदबू बढ़ने से सबने नाक से रुमाल लगा लिया था— कोठरी की खिड़कियों को भी खोल दिया गया था ताकि बदबू बाहर निकले और फ्रेश हवा अंदर जाती रहे। मुझे इस बात का शक था, इसलिये ज़रूरी इंतज़ाम के साथ ही आया था, जिसका जवाज़ अब उन लोगों की समझ में आया जब उन्होंने हफ्ता भर पुरानी सड़ती हुई लाश निकाली। हालांकि उसका चेहरा काफी बिगड़ चुका था, लेकिन मैं पहचान सकता था कि वह रोशनी की ही लाश थी। फिर भी जीप से दो लोगों को दौड़ा दिया गया, जो भूरे मियां के पड़ोसियों को पकड़ लाये, जिन्होंने रोशनी को बचपन से बड़े होते देखा था। उन्होंने भी तस्दीक की— कि वह रोशनी ही थी। उसके शरीर पर कपड़े की चिंदियां ही बची थीं, जो बताती थीं कि मारने से पहले उसकी काफी खराबी की गई थी।

फिर आगे की कार्रवाई शुरु हुई तो मैं वहां से हट के अपने थाने वापस चला आया। पता था कि अब यह ख़बर आग की तरह आसपास फैलेगी और जब सबको पता चल ही जायेगा तो भूरे मियां को भी पता चल ही जाना था। फिर उस बाप का रद्देअमल देखने की ताब मैं न जुटा सका, इसलिये हट लेना ही बेहतर लगा।

थाने पहुंच कर मैंने अपने यहां के नोन-क्रिमिनल्स का रिकॉर्ड भी चेक किया। कुछ मिलते-जुलते लोग चिन्हित किये और उनकी गतिविधियों के बारे में पता लगाने को आदमी दौड़ा दिये। शाम को अपने सारे मुखबिरों तक यह ख़बर पहुंचवा दी कि इस टाईप के ऐसे सभी लोगों के बारे में पता करके बतायें, जो मर्डर कर सकते हों। इस पड़ताल के लिये पीलीभीत से लेकर सोमना तक का इलाका तय किया था।

रोशनी की मृत देह पोस्टमार्टम के लिये पीलीभीत ले आई गई थी और रात तक पोस्टमार्टम भी हो गया था। अंदाज़े के मुताबिक उसके साथ न सिर्फ बलात्कार और शारीरिक हिंसा की गई थी और तब उसे गला घोंट कर मारा गया था— बल्कि एक बात हमारे अंदाजे से बाहर थी, कि उसके साथ जबर्दस्ती ही अप्राकृतिक संभोग भी किया गया था। रिपोर्ट देख कर ग़ुस्सा भी बहुत आया और तकलीफ भी बहुत हुई... परसों रात मिली उस लड़की का मासूम चेहरा देर तक आँखों के सामने नाचता रहा था।

सुबह-सवेरे ही डेडबॉडी ओरैया पहुंचवा कर मैंने अपनी देख रेख में ही दस बजे उसे दफन करवा दिया था। जैसी कि अपेक्षा थी— बेटी के इस हाल की ख़बर भूरे मियां को लग चुकी थी और वह तकलीफ की ज्यादती से बेहोश ही हो गये थे, फिर रात को होश में आया था तो रात भर रोते ही रहे थे। आसपास के लोग अच्छे थे कि घर के बुजुर्ग की तरह ही उनका ख्याल रखा था— लेकिन कोई उनके ग़म को तो नहीं दूर कर सकता था। बमुश्किल तदफीन में किसी तरह उन्हें कब्रिस्तान लाया गया था लेकिन उन्हें संभालना मुश्किल हो रहा था, तो वहां से हटा दिया गया था।

दो दिन के अंदर मेरे नेटवर्क ने पीलीभीत से सोमना तक के उन आकृतियों से मिलते-जुलते बाईस लोगों की डिटेल ला कर दी थी— यह सभी अपराधिक प्रवृत्ति के थे। कुछ का रिकॉर्ड पुलिस के पास था तो कुछ अभी तक रिकॉर्ड से बाहर थे। पिछले बृहस्पतिवार की उनकी गतिविधियों के बारे में जब उनसे पूछा गया, तो कुछ बता पाये, तो कुछ को या तो याद नहीं था, या बताते नहीं बना।

अच्छे से पुलिसिया अंदाज़ में खातिरदारी करने के बाद जब अलग-अलग उन्हें बिठा कर, उन पर सीधे इल्जाम लगाया गया कि उन्होंने एक लड़की का मर्डर किया है, तो सब मुकर गये। एक भी ऐसा बंदा उनमें अलग न हो पाया— जिस पर उस रात दरगाह पर होने का शक किया जा सकता।

जब कोई और तरीका न सूझा तो मैंने एक तुक्का भिड़ाने की ठानी। मैंने उन सभी को एक जगह लाकर कहा कि बीते बृहस्पतिवार को रामपुरा में एक लड़की का मर्डर हुआ था, जिसके शक के दायरे में वे सारे लोग हैं। अब अगर वे किन्हीं दो लोगों से इस बात की गवाही दिला सकते हैं जो कह सकें कि वह उस रात रामपुरा से दूर कहीं था, तो उन्हें अभी ही निजात मिल जायेगी— वर्ना वे सारे ही तोड़े भी जायेंगे और शक के आधार पर जेल में सड़ाये भी जायेंगे। गवाही के लिये उन्हें गवाह तक जाने का मौका नहीं मिलेगा कि वे उन्हें अपने पक्ष में गवाही देने के लिये राज़ी कर सकें, बल्कि उन्हें गवाहों के बारे में बताना होगा और पुलिस ख़ुद उन्हें लेकर आयेगी।

अब बाईस में से आठ की तो नानी मर गई कि उनके पास कोई गवाह ही नहीं था, या जो थे भी तो उन्हें लेकर वे मान चुके थे कि उनके पक्ष में कोई गवाही देने नहीं आयेगा। कोई बड़ी बात नहीं थी— सभी अपराधिक प्रवृत्ति के थे तो पक्का किसी न किसी कांड से लिप्त रहे होंगे। ऐसे में साथ में शामिल बंदे गवाही के लिये थाने तो आने से रहे। बाकी सात ऐसे थे जो एक गवाह उपलब्ध करा सकते थे जो कि उनकी पार्टनर थी— मतलब बकौल उनके वे उस रात किसी लड़की या औरत के साथ थे। बाकी बचे सात लोग, दो गवाहों को बुलाने को राज़ी हुए तो उनके उन गवाहों के पते लेकर रात ही पुलिस वाले दौड़ा दिये, इस आदेश के साथ कि सुबह दस बजे वे थाने में हाजिरी दें। माजरा किसी को कुछ नहीं बताया गया।

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वह रात बड़ी बेचैनी में गुज़री... जो तुक्का भिड़ाया था, क्या वह किसी काम भी आना था? कायदे से तो यह ही तय नहीं था कि उस रात रोशनी से बेरहमी करने वाले कोई आदतन अपराधी ही थे, कोई नशेड़ी-गंजेड़ी मौका देख कर जानवर बन गये लोग भी हो सकते थे... या थे भी तो इस इलाके के बजाय कहीं बाहरी हो सकते थे, जो इधर से इत्तेफाकन गुज़रते ख़राब मौसम के चलते शरण की चाह में दरगाह तक पहुंचे हों और वहां उसे अकेला पा कर अपनी औकात पे उतर आये हों। या यह भी हो सकता था कि जो आठ लोग कोई गवाह पेश कर पाने में असमर्थ थे, असली अपराधी इन्हीं में से कोई हो और वह जान रहा हो कि उस रात उस अपराध में शामिल होने के चलते वे गवाही देने नहीं आयेंगे, भले पुलिस यह गवाही किसी और सिलसिले में तलब कर रही हो।

अब हफ्ता भर पुरानी बात थी और कोई चश्मदीद भी नहीं सामने आया था तो कायदे से ऐसे में असली ज़िम्मेदार का पकड़ा जाना लगभग असंभव सी ही बात थी— ऐसे में तुक्के भिड़ाने के सिवा और कुछ किया भी तो नहीं जा सकता था।

हां, एक बात और... इन बाईस में तीनों ही तरह के लोग मिक्स थे— मतलब गाल पर कटे के निशान वाले, मूंछ और घुंघराले बाल वाले और दाढ़ी के साथ लंबे बाल वाले भी, जिनमें एक सरदार भी था। पहली कोशिश यही समझने की थी कि उनमें कोई तीन या दो, क्या कभी आपस में साथी भी रहे थे— लेकिन उनमें कोई किसी का साथी नहीं था। इतना था कि कुछ लोग एक दूसरे को जानते थे तो कुछ सिर्फ नाम से कुछ लोगों को जानते थे— लेकिन आपस में साथी कोई किसी का नहीं था।

जैसे-तैसे रात कटी तो अगले दिन का जतन शुरु हुआ।

दस बजे तक वे सभी चौदह लोग आ गये, जिन्हें बुलाया गया था... और यह देख कर मेरी बांछें खिल गईं कि उनमें कम से कम एक जोड़ी मेरी अपेक्षा पर खरी उतरती थी, जबकि बाकी बारह लोगों में कोई भी उस हुलिये का नहीं था।

अब इस तरह जो लोग पिक किये, उनमें जो बंदा हमारी कस्टडी में था, वह चेतई नाम का वह बदमाश था, जिसके बायें गाल पर चाकू का निशान था और यह उन दो में से एक था, जिनके क्रिमिनल रिकॉर्ड के ज़रिये ओरैया चौकी में उन्हें पिक किया था और उसके बुलाये दो गवाहों में एक तनी हुई मूंछों और घुंघराले बाल वाला था तो दूसरा बढ़ी दाढ़ी और लंबे बाल वाला साधू था।

इन तीनों की पृष्ठभूमि यह थी कि चेतई बदमाश आदमी था, चोरी डकैती उसका पेशा था और इस चक्कर में दो बार जेल की हवा खा चुका था। वह लंबे बाल वाला हरखू था जो फुलहर में कोई अड्डा बनाये था और वहीं बाबागिरी करता था जबकि वह घुंघराले बाल वाला बचनू था, जो मैदान में एक लकड़ी की ठेकी पर लकड़ी की चिराई का काम करता था। मैंने तीनों को एक बैरक में इकट्ठा किया।

"हां तो बताओ कि पिछले बृहस्पत को कहां थे तुम लोग... लेकिन उससे पहले यह बताओ कि तुम्हारा आपस में रिश्ता क्या है?" मैंने उनके सामने स्टूल पर बैठते हुए कहा।

"साहब— दोस्त हैं हम।" जवाब हरखू ने दिया।

"एक डकैत, एक लकड़ चिर्रा और एक बाबा... दोस्त हो वाक़ई।" मैंने चेतई को घूरा।

"साहेब— मजूर ही हन हम सबय... हरखू का तो कईये बार भीख भी मांगयक पड़त हय।" चेतई ने जैसे आह सी भरते हुए कहा।

"हम्म... तो कहां थे पिछले बृहस्पत की रात?"

"हरखू केरे अड्डे पर रहै साहब— फुलहर मा। उस दिन बचनू का थोड़ी दारू मिल गई रहय और मौसम भी रहय तो हम उधरेन जमघट लगाय लिये रहन।"

"इस बात की गवाही दे सकता है कोई कि तुम तीनों उस रात फुलहर में थे? ध्यान रहे कि रात की पूछ रहा हूं, सुबह की नहीं। लगभग रात भर पानी बरसा था तो आवाजाही की गुंजाइश तड़के ही बनी थी। अगर फुलहर में थे तो किसी ने तो देखा ही होगा न?"

"साहेब— आप हमका बुलाये हव चेतई की गवाही केरी खातिर, कि हम अप्पन गवाही ढूंढय... अरे हम तीनव एक दुसरिया केरे गवाह हन तो— फिर और केहुक गवाही काहे चाही।" बचनू ने जैसे शिकायत की।

"झूठ बोला था हमने कि तुम्हें इसकी गवाही के लिये बुलाया गया है। दरअसल हमें पता है कि तुम तीनों पिछले बृहस्पत को सुलेमान शाह की दरगाह पर थे मौसम बिगड़ने के टाईम। वहां कोठरी से जो फिंगर प्रिंट्स मिले थे, उनमें एक जोड़ी का मिलान हमने इसके फिंगर प्रिंट्स से कर लिया था, फिर एक गवाह ने भी तुम तीनों को उधर जाते देखा था लेकिन वह पहचानता नहीं था किसी को... बस उसके बताये हुलिये के आधार पर हमने इतने आदमी उठवाये थे क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले। उसके बाद फिंगर प्रिंट्स से यह एक तो क्लियर हो गया लेकिन यह नहीं पता था कि उस रात इसके साथी कौन थे तो रामपुरा के एक केस से बचाने के बहाने कहीं और होने की गवाही देने का झांसा देकर तुम दोनों को बुलाया गया था। अब तुम दोनों के फिंगर प्रिंट्स भी मैच करा लिये जायेंगे।" एक तरह से मैंने ब्लफ ही मारा था लेकिन मेरे शब्द सुनते ही तीनों का चेहरा फक् पड़ गया था और एकदम से वे ऐसे ढीले पड़ गये थे जैसे गुब्बारे से हवा निकल गई हो।

यानि तीर सही निशाने पर बैठा था— मेरा तुक्का सही भिड़ गया था और शिकार ख़ुद चल के मेरे जाल में आ गये थे।

"अब यह बताओ कि उस रात का सच ऐसे ही बताओगे, या पूरा दिन हड्डी-पसली तोड़े जाने के बाद। जो दुर्गति तुम लोगों ने उस मासूम लड़की की करी थी, उसे देख थाने का हर सिपाही भरा बैठा है... तो जी भर के भड़ास निकालेंगे सब। तय कर लो कि कब बोलना है?"

"नशे मइहां रहंय साहेब— होई गई ग़लती।" थोड़ी देर बाद चेतई सर झुकाये बोला तो मैंने उसके मुंह पर ही लात जड़ दी और वह 'हुच' करता पीछे लुढ़क गया।

"तू बता— ड्रामा नहीं, सीधे एकदम फ्लैट अंदाज़ में। सफाई मत देना कि नशे में थे तो ग़लती हो गई— वर्ना पिछवाड़े में यह पूरा डंडा घुसा दूंगा। सीधे-सीधे बोल।" मैंने बचनू से मुखातिब होते हुए कहा।

"आप का मालूम हय साहेब, हम दिन मा कुच्छौ करत हंय, लेकिन रात मा चोरी डकैती ही करत हंय। वय दिन भी येहे प्रोगराम रहै लेकिन मौसम बिगड़ गवा। तब बचैयक खातिर हम दरगाह पहुंच गै। हुवां पता चला के खादिम केरी लड़किया कोठरिया मा रहै— हमरे पास दारू रहैय तो हम मज़ार पर बइठ के पियई लगे। रात मइहां थोड़ा भुखाये तो किवाड़ खटखटाय केरे खावईक मांगेन कुछ। वा जब देईक खातिर दरवज्जा खोलिस तो ऊका देख के हमरी नियत डोल गई... नशा तो सर पइहां सवार रहिबै करी... फिर अंदर घुसि गेन और जौन बन पड़ा, सब कई डालेन... होश रहिबय नाय करै तो का बताई का-का करै।" बचनू कुछ कांपते हुए बोलता चला गया।

"मारा क्यों मगर उसे?" मैंने बमुश्किल अपने गुस्से को दबाया।

"पतय कहां चला साहेब के कब मरि गई— ऊ तो बहुत चिल्लाय रही रहै तो हम तीनौक गुस्सा आय रहा रहै तो हम मरबउ-पिटबउ करै तो मुंहऊ दाबै। अब पता नाय, कब का चीज जादा होई गई... लेकिन जब सब कय चुकेन तो देखा कि वा मरिन गई। तब हुंवई जमीन खोदिक गाड़ दिये रहेन।"

"और चीख़-चिल्ला क्यों रही थी?"

तीनों ने कुछ बोलने के बजाय एक दूसरे की तरफ़ देखा।

"क्योंकि तुम लोगों को सिर्फ उसकी आबरू से ही नहीं खेलना था, बल्कि जानवरों की तरह भंभोड़ रहे थे तुम लोग उसे... उसके शरीर के साथ बेरहमी कर रहे थे, न सिर्फ आगे से बल्कि पीछे से भी। किसकी हरकत थी वह?" मैंने मुट्ठियां भींचते तीनों को देखा तो बचनू और हरखू की नज़रें चेतई पर चली गईं और मैंने अपना आपा खोते उसे ठोकरों पर रख लिया।
 
गुबार कुछ निकला तो थमा और हवल्दारों की तरफ़ देखते हुए कहा— "कोर्ट में तो इन्हें कल पेश करेंगे, वहां इनका जो बने, सो बने— लेकिन यहां इन्हें कम से कम इतना सबक तो सिखाओ कि यह ज़िंदगी भर सीधे खड़े न हो सकें।"

वहां से मेरे हटते ही उनकी चीखें चालू हो गई थीं।

मेरे सीने से जैसे एक बोझ हट गया था और तीन दिन से भरा ग़ुस्सा कुछ हद तक कम हो गया था। देखा जाये तो यह बड़ी कामयाबी थी— हफ्ते भर पहले का एक केस, जो लगभग दफन हो चुका था, मेरी वजह से न सिर्फ प्रकाश में आया, बल्कि चार दिन के अंदर अपराधी भी पकड़े गये। इस कामयाबी का सेहरा मेरे ही सर बंधा लेकिन यह मैं ही जानता था कि इसकी ज़िम्मेदार मुझे उस रात मिली वह लड़की थी, जो पता नहीं क्या थी। मैं आज तक न समझ पाया कि उस रात मुझे मिला तजुर्बा मैं किस खाते में फिट करूं।

उस रात जब सोकर अगली सुबह उठा तो मेरे क्वार्टर के दरवाज़े पर एक कागज़ पर रखे कुछ गुलाब के फूल मिले थे— कागज़ पर शायद चाक से वही तस्वीर बनाई गई थी, जो मैंने दरगाह वाली कोठरी में देखी थी... एक लड़की का रेखा-चित्र, जो अपने देखने वाले को फूल दे रही थी। यहां फूल वास्तविक थे, जो उस कागज़ पर रखे थे। मैंने रात ड्यूटी निभाने वालों से पूछा इस विषय में— लेकिन किसी ने भी किसी को नहीं देखा था। बस ऐसा लगा जैसे उस लड़की की रूह मुझे शुक्रिया कह गई हो। मैंने भी फिर ज्यादा इनक्वायरी करने की कोशिश नहीं की।

बेटी के अपराधियों का पकड़ा जाना या उनका बुरा अंजाम भी भूरे मियां की मनोदशा न बदल सका। उनका सदमा इतना बड़ा था कि वे धीरे-धीरे पूरी तरह पागल हो गये थे और उस घटना के तीन महीने बाद उसी सड़क पर एक ट्रक के नीचे आ कर मारे गये थे। मुझे ख़बर मिली थी तो बहुत दुख हुआ था उनकी मौत का... लेकिन उनकी जो हालत हो चुकी थी, शायद वहां मौत में ही उनके लिये मुक्ति थी।

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आज उस घटना को चालीस साल से कुछ ज्यादा ही वक़्त हो गया होगा, लेकिन आज भी वह घटना एक मुअम्मे की तरह मेरी स्मृतियों में मौजूद है। एक अपराधिक घटना हुई और एक हफ्ते बाद मुझे एक तूफानी रात, बीच रास्ते मिली एक लड़की की वजह से उस घटना का खुलासा हुआ, लेकिन वह लड़की क्या थी? कौन थी? यह मेरी समझ में कभी नहीं आ सका।

मेरा भूत-प्रेत, आत्मा वगैरह पर यक़ीन नहीं... मुझे इतना पता है कि शरीर में कोई आत्मा जैसी शक्ति हो सकती है लेकिन शरीर से अलग वह बस सूक्ष्म रूप में ही होगी। उसका सशरीर हो पाना संभव नहीं और किसी भी क्रिया को करने के लिये शरीर की ज़रूरत पड़ती है, शारीरिक अंगों की ज़रूरत पड़ती है जो मृत्यु के पश्चात किसी भी तरह के अंतिम संस्कार के सहारे या ऐसे भी लाश छोड़ दी जाये तो भी सड़ जातें हैं और मिट्टी हो जाते हैं... तो ऐसी स्थिति में कैसे कोई आत्मा देख, सुन, बोल सकती है, चल सकती है या बिना हाथों का इस्तेमाल किये कुछा उठा-रख सकती है? फिर उस लड़की ने वह सब किया, जो बिना भौतिक शरीर के संभव ही नहीं— तो वह आत्मा कैसे हो सकती है? या आत्मा को लेकर हमारा ज्ञान अधूरा है अभी... पता नहीं! मैं कभी नहीं समझ पाया इस किस्से को।

हम वैज्ञानिक सोच के लोग ऐसी हर अतार्किक बात को सीधे ठुकरा देते हैं लेकिन यह अपनी जगह सही है कि हमारी ज़िंदगी में ऐसा कुछ न कुछ ज़रूर हुआ होता है, जिसे समझने में हमारी बुद्धि फेल हो जाती है, जो तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरती— लेकिन होती खरी वास्तविकता है न कि कोई भ्रम। मेरी ज़िंदगी की भी यह एक ऐसी ही घटना थी, जिस पर लगा सवालिया निशान कभी न हट पाया।

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Horror रोज़वेल मेंशन

राज के लिये वह जगह तो बड़ी अच्छी थी, जहां चारों तरफ हरे-भरे हरियाली से आच्छादित पहाड़ों का मनोरम नज़ारा था और दूर बर्फ से ढकी चोटियां ऐसे भ्रम देती थीं जैसे आकाश पर किसी कुशल चित्रकार ने कूची फेर दी हो। मौसम उसके अनुकूल था तो हल्की ठंड से भी कोई शिकायत नहीं थी। यह जगह हिमाचल के ऊपरी इलाके में आती थी जहां पहाड़ों के एतबार से मध्यम आकार की आबादी थी और पर्यटन के नज़रिये से यह जगह तेज़ी से विकसित हो रही थी।

वह एक सिविल इंजीनियर था और अपनी कंपनी के काम से यहां आया था— कंपनी वहां अपना एक प्रोजेक्ट शुरू कर रही थी, जिस सिलसिले में राज को दिल्ली से यहां आना पड़ा था और कुछ महीनों के लिये उसे यहीं कयाम करना था।

अब वह किसी तरह ऊना तक ट्रेन और आगे बस के सहारे यहां तक पहुंच तो गया था लेकिन अब यहां आकर एक समस्या खड़ी हो गई थी कि फिलहाल कंपनी की तरफ से उसके रहने का इंतज़ाम नहीं हो पाया था। अपनी तरफ से उन्होंने रोज़वेल मेंशन नाम की जिस जगह का चयन किया था, फर्दर इन्क्वायरी में वह जगह उसके रहने के लिहाज से ठीक नहीं निकली थी तो एक दो दिन उसे किसी तरह ख़ुद के भरोसे गुज़ारने को कहा गया था कि इस बीच कोई और इंतज़ाम कर लिया जायेगा।

आखिर रोज़वेल मेंशन में क्या दिक्कत थी? यह पूछने पर पता चला कि उस जगह की इमेज ठीक नहीं थी और वह एक हांटेड प्लेस के तौर पर मशहूर है। दिन में तो वह जगह सामान्य ही रहती है लेकिन वहां रात गुज़ारना ख़तरनाक हो सकता है। वहां रात को कई तरह के हादसे हो चुके थे और कुछ मौतों के साथ, कुछ लोग पागल तक हो चुके थे। वह जगह शिमला के एक धनी सेठ की थी, जिसका एक लोकल केयरटेकर भी था, जो उसकी देख-रेख करता था। दिन में तो लोग उधर रुकते थे लेकिन रात को अगर वहां सोना होता था तो मेंशन के बाहरी प्रांगण में कैम्प लगा कर ही सोते थे। अंदर सोने में समस्या थी... लेकिन वाकई में वहां रात को क्या होता था, इस बात का पता किसी को नहीं था। कोई बताने वाला ठीक-ठाक हालत में कभी सुबह बरामद ही नहीं हुआ जो कुछ बता सकता।

अब वहां स्टे करके रात बाहर कैम्प में गुज़ारने का ऑप्शन तो उसके पास भी था, लेकिन कंपनी अपनी तरफ़ से नहीं चाहती थी कि वह उसे ऐसी जगह रहने पर मजबूर करे, तो या उसी तरह रोज़वेल मेंशन में रहने या अपने तौर पर एक दो दिन के लिये कोई इंतज़ाम कर लेने का विकल्प उस पर छोड़ दिया गया था।

वह आधुनिक दौर का वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला युवक था जो इन दकियानूसी बातों से ख़ुद को दूर ही रखता था... इसलिये उसे शायद इस बात से तो फ़र्क नहीं पड़ता था कि वहां कोई पैरानार्मल एक्टिविटीज होती हैं, लेकिन इस बात का अंदेशा ज़रूर था कि इन तमाशों की आड़ में वहां कुछ ग़ैरकानूनी गतिविधियां हो रही हो सकती हैं, खामखाह की बहादुरी दिखाने के चक्कर में हो सकता है कि वह उन गतिविधियों का शिकार हो जाये। तो बेहतर यही था कि पहले उस जगह को जांच-परख ले, फिर कोई अंतिम निर्णय ले।

और यही वजह थी कि बैकपैक पीठ पर लादे और एक बड़ा बैग सीधे हाथ में लटकाये वह आबादी से एकदम बाहर की तरफ स्थित रोज़वेल मेंशन की तरफ बढ़ रहा था।

हरे-भरे पेड़ों के साये में ऊंचाई की तरफ बढ़ते वह यही सोच रहा था कि कहीं और सर खपाने से बेहतर है कि वह रोज़वेल मेंशन में ही डेरा जमाये... अंदर सोते नहीं बनेगा तो बाहर सो जायेगा।

चलते-चलते एक तिराहे पर पहुंच कर उसे थमना पड़ा।

अब यहां से दो रास्ते आगे जाते थे... एक तो समतल ही था जिस पर आगे जा कर बीस-पच्चीस मकानों वाली एक आबादी मौजूद थी जबकि दूसरा और चढ़ाई का था जहां आगे एक मनोरम जगह पर रोज़वेल मेंशन मौजूद था जो अतीत के किसी दौर में शाही लोगों के लिये रेस्ट हाउस हुआ करता था।

तिराहे पर एक चाय का होटल था जहां एक लकड़ी के खोखे में बड़ी उम्र का चायवाला अपने गुटखे-सिग्रेट, चाय-नाश्ते वाले साजो-सामान के साथ मौजूद था तो सामने लकड़ी की दो बेंचें भी मौजूद थीं जिन पर तीन लोग बैठे आपस में गप्पे लड़ा रहे थे। राज के पहुंचने पर वे सभी चुप हो कर उसकी तरफ़ आकर्षित हो गये थे।

राज ने हाथ में थमा बैग बेंच के खाली हिस्से पर रखा और पीठ पर टंगा बैग उतारते हुए आसपास का अवलोकन किया... दो लोग पैदल, तो दो साईकिल से उस रास्ते पर जा रहे थे जिधर आबादी थी— जबकि जिस रास्ते से वह आया था, उस पर एक महिला सर पर किसी तरह की गठरी लादे चली आ रही थी। उसी तिराहे पर एक बड़ा सा ओक का पेड़ था जिसके नीचे उसे गोल घेर कर एक कच्चा चबूतरा बना दिया गया था।

उस चबूतरे पर एक अजब हाल शख़्स कुल्हड़ में चाय लिये बैठा इस तरह बड़बड़ा रहा था जैसे किसी से बातें कर रहा हो, जबकि वहां वह अकेला ही था। फिर उसने ऐसे चुटकी बजाई जैसे उंगलियों में दबी सिग्रेट की राख झाड़ रहा हो, और उस हाथ को होंठों से लगा कर ऐसे ज़ोर की सांस खींची, जैसे सिग्रेट का कश लगा रहा हो। हालांकि उसका हाथ या उंगलियां खाली ही थीं। फिर वह दूसरे हाथ में थमे कुल्हड़ को ज़मीन पर रख कर चबूतरे पर ही उल्टा खड़ा होने की कोशिश करने लगा, लेकिन अपनी कोशिश में कामयाब न रहा और चबूतरे से नीचे गिर कर झुंझलाये अंदाज़ में शायद गालियां बकने लगा।

राज की दिलचस्पी देख वहां बैठे लोग भी उसी तरफ़ देखने लगे थे और उस शख़्स की हरकत पर हंसने लगे थे। राज ने निगाहें मोड़ कर कौतहूल से उन्हें देखा।

"पागल है साहब— दिन भर यही सब करता फिरता है।" तीनों में से वह बोला जो उनमें सबसे उम्रदराज और चाय वाले की ही उम्र का था— बाकी दोनों कम उम्र ही थे।

"हम्म।" राज ने समझने वाले भाव में सर हिलाते हुंकार भरी और चाय वाले से सम्बोधित होते हुए बोला— "एक चाय तो पिलाना चाचा।"

'जी बाबूजी' की शाब्दिक प्रतिक्रिया के साथ ही वह शख्स अब तक दूध के बर्तन के नीचे हौले-हौले जलते स्टोव में पम्प मारने लग गया और हवा में मौजूद मिट्टी का तेल जलने की गंध कुछ और तेज़ हो गई। बर्नर से निकलती लपटों ने ज़ोर पकड़ा तो उसने भगोना हटा कर केतली रख दी, जिसमें पहले से चाय मौजूद थी और कुछ भाप छोड़ने के सिग्नल के साथ ही उसने एक कुल्हड़ में चाय उड़ेल कर राज की तरफ बढ़ा दी। इस बीच राज बेंच पर बैठ कर उसी पागल की तरफ देखता रहा था, जो अब फिर से चबूतरे पर बैठ कर चाय पीने लगा था। दूसरे लोग चुप ही हो गये थे— शायद साहब के सामने बकैती से परहेज कर रहे थे।

कुल्हड़ में पहुंच कर पकी मिट्टी के आगोश में सोंधी हो चुकी चाय के पहले घूंट के साथ उसे वह स्वाद आया जिसकी तलाश में वह अक्सर उन निम्नस्तरीय होटलों पर चला जाता था, जो डिस्पोजल या शीशे के गिलासों के बजाय कुल्हड़ में चाय देते थे।

तभी फोन बजा तो उसे इस बात की राहत भी मिली कि मोबाईल की शान के मुताबिक अभी तक वह आउट ऑफ कवरेज एरिया नहीं हुआ था। उसने जेब से मोबाइल निकाला तो यामिनी की कॉल थी।

"हां स्वीटहार्ट।" उसने कॉल रिसीव करते हुए कहा— यामिनी उसकी एक साल पुरानी बीवी थी जो अभी तक नई बनी हुई थी।

"पहुंच गये?" उधर से टूटती हुई आवाज़ आई।

"बस अभी पहुंचा हूं यहां लेकिन अपने ठिकाने पर अभी भी नहीं पहुंचा हूं... मतलब रास्ते में ही हूं।"

खराब नेटवर्क की वजह से इधर से उसे अपनी बात रिपीट करनी पड़ी और उधर से यामिनी को टुकड़ों-टुकड़ों में अपनी बात दोहरानी पड़ी, जिसका सार यह था कि क्या वह जगह ऐसी थी जहां वह कुछ महीनों के लिये रहना प्रफर कर सकती। जवाब में उसने यही कहा कि पहले ठीक से पहुंच कर जगह को समझने तो दो— फिर व्हाट्सअप पर बताता हूं। कॉल कट करके स्क्रीन पर नज़र डाली तो नेटवर्क तड़प रहे थे।

"इधर नेटवर्क नहीं रहता क्या?" उसने पास बैठे युवक से पूछा।

"इधर बीएसएनएल का तो रहता है, बाकी बहुत कमज़ोर रहते... वे उधर आबादी में ठीक रहते हैं।" युवक ने बताया।

"यह रोज़वेल मेंशन किस तरफ़ पड़ेगा?" उसने फोन वापस जेब के हवाले करके चाय पर फोकस करते हुए पूछा।

"इधर— लेकिन आप क्यों पूछ रहे हैं?" उस युवक के साथ बाकी लोग भी कुछ चौंक कर उसकी तरफ़ देखने लगे थे।

"क्योंकि कुछ महीनों के लिये मुझे उधर रहना है।" उनके असहज होने को वह महसूस कर सकता था— "लेकिन आप इतना चौंक क्यों रहे हैं?"

कुछ बोलने के बजाय वे आपस में एक दूसरे की सूरतें देखने लगे। चाय वाला भी उसकी तरफ आकर्षित हो गया था और चिंताजनक दृष्टि से उसे देखने लगा।

"अगर घूमने फिरने के लिये आये हैं तो कस्बे में रुकना चाहिये था... इधर तो लड़के लपाड़ी आते हैं कैम्पिंग के लिये। दिन भर रुकते हैं और शाम को कस्बे की तरफ निकल जाते हैं या वहीं बाहर कैम्प लगा लेते हैं। अकेला तो कोई नहीं जाता उधर रुकने।" उनमें से वह बोला जिसने सामने दिखते पागल के बारे में बताया था।
 
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