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Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा )

हिना ने आंखें खोल दीं। उसने पहले उन दोनों को खाली-खाली नजरों से देखा...फिर एकदम झटके से उठकर बैठ गई। फिर उसे अपनी बेलिबासी का अहसास हुआ। वह एकाएक परेशान हो उठी। सितारा ने अलमारी से चादर निकालकर उसकी तरफ फेंकी।

और अब हिना की नजरें अपने पेट पर पड़ीं। वहां दो नन्हें-नन्हें गड्ढों की और बढ़ोत्तरी हो चुकी थी और वह अत्यधिक कमजोरी भी महसूस कर रही थी। वह जैसे-तैसे बेड से उठी। मुंह-हाथ धोकर कपड़े पहने। उसका चेहरा गर्म हो रहा था। यूं लग रहा था जैसे वह आग के सामने से उठकर आई हो।

वह बाथरूम से निकल गई। उसे चक्कर आ रहे थे और मितली-सी भी हो रही थी। सितारा बाथरूम के दरवाजे के बाहर ही खड़ी थी। हिना डोलने लगी तो उसने थाम लिया और सहारा देकर बेड तक ले आई।

हिना निढाल होकर बेड पर गिर पड़ी।

"बीवी... नींबू पानी पीएंगी...?" सितारा ने पूछा।

"हां सितारा! ले आ...। कहां है...?" हिना बेताबी से बोली।

सितारा ने साइड टेबल पर रखा हुआ गिलास उठाकर उसकी तरफ बढ़ाया- "यह लें बीवी! मैं जानती थी आपको इसकी जरूरत पड़ेगी। मैं अभी बनाकर लाई हूं...।"

हिना ने आभारी निगाहों से उसको देखा और गिलास उसके हाथों से लेकर गटागट पी गई। कुछ ही देर में उसकी हालत बेहतर हो गई। उसने आंखें खोल दी व तकिये से टेक लगाकर बैठ गई। सितारा ने उसके पैर अपनी गोद में रख लिए और धीरे-धीरे दबाने लगी।

"बीवी...यह आपको क्या हो जाता है...?" सितारा ने चिन्तित स्वर में पूछा।

"पता नहीं...।" हिना ने नजरें चुराई। वह क्या जवाब देती।

"बीवी...आज तो आपने मेरी जान ही निकाल दी थी...।"

"मैंने... क्यों...?" हिना ने पूछा।

"बीवी... आज जब मैं आपको उठाने के लिए कमरे में आई तो मैंने आपको एक काली चादर में पाया।"

"काली चादर...!" हिना हैरान हुई "काली चादर कहां से आ गई?"

"आप एक काली चादर ओढ़े हुए थीं और चादर के अन्दर एक सांप था, जब वह सांप चादर से बाहर आया तो उसे देखकर मेरे होश उड़ गए। मैं चीखती हुई बाहर भागी। बाहर अम्मा मिल गई। उसके साथ आई तो यहां वो काली चादर थी न सांप था।" वह बताते हुए सितारा के हाथ-पांव ठण्डे होने लगे-“बीवी...यह सब क्या है?"

"मैं क्या बताऊ सितारा...!" हिना उलझे हुए अंदाज में बोली।

"बीवी....किसी मौलवी... ओझा को दिखायें। आप पर कहीं कोई साया तो नहीं हो गया? आप इतनी खूबूसरत जो हैं...।" सितारा ने अपनी सोच अनुसार अन्देशा व्यक्त किया।

"सितारा शायद तू ठीक कहती है...।" हिना सोचपूर्ण लहजे में बोली- "मेरी खूबसूरती शायद मुझे कहीं का न छोड़ेगी। ऐसी खूबसूरती का क्या फायदा जो जी का जंजाल बन जाये... ।"

"अल्लाह मालिक है बीवी! आप परेशान न हों... सब ठीक हो जायेगा।" सितारा ने उसे तसल्ली दी।

इसी क्षण हिना के दिमाग में किसी सांप की फुफकार गूंजी। वह चौंककर सितारा को घूरने लगी।

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सुबह सुहेल की आंख खुली तो वह बहुत खुश था। खुश होता भी क्यों नहीं। हिना उसकी हो चुकी थी। इस सोच के साथ ही उसके बदन में जैसे बिजली-सी भर गई। वह बिस्तर से उछलकर खड़ा हो गया। दोनों हाथ उठाकर एक बदन तोड़ अंगड़ाई ली और बाथरूम में जा घुसा। बेचारा कहां जानता था कि वह खुशी बस दो पल की है

नहा-धोकर बाहर निकला और ड्रेसिंग टेबल के सामने जा खड़ा हुआ। वह बाल संवार रहा था कि लाउन्ज में रखे फोन की घन्टी बजी। वह कंघा ड्रेसिंग टेबल पर डालकर बाहर निकला और रिसीवर उठाकर 'हेल्लो' कहना चाहा।

लेकिन उसकी आवाज गले में ही फंसकर रह गई। प्रयत्नोपरान्त भी उसकी जुबान पलट न सकी। दूसरी तरफ उसका कोई दोस्त था।

"हेल्लो... हेल्लो।" जवाब न पा उसने ही कहा था-"हेल्लो, सुहेल।"

इधर से सुहेल ने फिर जवाब देने की कोशिश की, लेकिन कुछ बोल न सका। उसकी जुबान पूरी तरह बन्द हो चुकी थी। इस ख्याल के आते ही कि उसकी जुबान बन्द हो चुकी है... वह परेशान हो गया। गूं-गूं के अलावा कोई आवाज ही नहीं निकल रही थीं। उसने घबराकर रिसीवर पटका और अपनी बहन हिना के कमरे की तरफ भागा।

हेमा कमरे में नहीं थी। वह कालेज जा चुकी थी। वह दौड़ता हुआ नीचे आया। मामू के बच्चे स्कूल जा चुके थे। मामू सुखदेव डायनिंग टेबल पर थे मामी किचन में थी! मामू सुखदेव की नजर जब उसके चेहरे पर पड़ी तो वह उछलकर खड़ा हो गया। सुहेल का चेहरा एकदम सुर्ख हो रहा था।

सुहेल वेअख्तियार ही मामू से जा लिपटा।

"क्या हुआ बेटे...?"

खुद से अलग करते मामू ने उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में भरते हुए पूछा-- "यह तुम्हारा चेहरा इस कद्र तमतमा क्यों रहा है...?"

सुहेल कोई जवाब देने की बजाय मामू से जा लिपट गया। तभी शोभा मामी नाश्ते की ट्रे लिए किचन से निकल आई। उसने सुहेल को अपने मामा से पागलों की तरह लिपटते देखा तो वह परेशान हो गई।

"अरे, क्या हुआ सुहेल...?" उसने ट्रे मेज पर रखी।

मामी की आवाज सुनकर वह मामू को छोड़कर मामी की तरफ लपका। मामी को कन्धों से थाम वह पागलों की तरह उन्हें देखने लगा। सुहेल का चेहरा लाल-भभूका हो रहा था... और आंखों में आंसू तैर रहे थे।

"खैर तो है, बेटा...?" मामी उसे घूरते हुए पूछा।

"कुछ बोलता ही नहीं...।" मामू सुखदेव ने सहमे लहजे में बताया।

सुहेल उनकी तरफ पलटा और बेबसी से अपने मुंह की तरफ इशारा कर बताया कि वो बोल नहीं पा रहा है।

"क्या! तुमसे बोला नहीं जा रहा है...?" उसका आशय समझते मामू ने तेजी से पूछा।

सुहेल ने सिर हिला हामी भरी।

"अरे, यह कैसे हुआ...?" मामू उसका हाथ पकड़ उसे वहीं पर बैठाते हुए बोले- "तुम इधर आराम से बैठो।"

फिर वह उसकी मामी से सम्बोधित हुआ-"जरा इसको पानी पिलाओ...।"

शोभा भागकर पानी ले आई। सुहेल ने पानी पी लिया, लेकिन उसकी जुबान नहीं खुली। फिर मामी को जितने टोटके आते थे, इस्तेमाल कर डाले... लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। सुहेल के गले में कोई तकलीफ न थी... जुबान में कोई खराबी न थी। इसके बावजूद उसके गले से आवाज नहीं निकल रही थी।

फिर शोभा ने मशवरा दिया-"आप सुहेल को फौरन हॉस्पिटल ले जाए ..इसे गले के स्पेशलिस्ट को दिखाएं...मामला सीरियस लगता है।"

"मैं भी यही सोच रहा हूं...।" सुखदेव ने सुहेल का हाथ पकड़ा - "चला भाई..." मामू सखदेव उसे लेकर एक बड़े हॉस्पिटल में पहुंचे। यहां का एक सीनियर ई.एन •टी• स्पेशलिस्ट सुखदेव का परिचित था। डॉक्टर ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर सुहेल की जुबान व गले की जांच की। उसे कोई खराबी नजर नहीं आई। फिर एहतियातन कुछ टेस्ट लिख दिये। वे टेस्ट करवा कर सुहेल घर आ गया और सुखदेव मामा अपने आफिस चले गये। हेमा कालेज से वापिस आ चुकी थी। मामी ने उसे सब कह सुनाया था। सुहेल ने जैसे ही घर में कदम रखा, हेमा दौड़कर उसके पास पहुंची।

"भाई, कैसे हो...?" उसने तड़पकर पूछा।

सुहेल अब सम्भला हुआ था। उसने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसकी मुस्कान में भी तो व्यथा छिपी हुई थी।

"तुम्हें क्या हुआ भाई? तुम्हें किसकी नजर लग गई?"

भाई की बेबसी पर हेमा के आंसू निकल आये। उसने भाई के हाथ थाम लिये थे।

सुहेल का सिर 'नहीं' में हिला-जैसे बहन को न रोने को कह रहा हो, फिर उसने बहन के दोनों हाथ अपनी आंखों से लगाये। हेमा ने अपनी उंगलियों पर नमी महसूस की। सुहेल की आंखें भी भीग चुकी थीं।

हेमा भाई को सामने ऊपर अपने कमरे में ले आई और उसके कागज-कलम रखकर बोली- "भाई, मुझे लिखकर बताओ...यह कैसे हुआ...?"

सब सुहेल ने सुबह से अब तक की सारी आपबीती लिख दी। उसने अन्त में लिखा-

"हेमा, मैं बोलने की शक्ति खो बैठा हूं। बोलना चाहता हूँ, लेकिन शब्द अदा नहीं होते। डॉक्टर के ख्याल से बिल्कुल फिट हूं। फिर भी उसने कुछ टेस्ट करवाए हैं... रिपोर्ट कल मिलेंगी। तुम परेशान न हो मेरी बहन । मैं जल्दी ही ठीक हो जाऊंगा। तुम मेरे लिये दुआ करो... और हां, हिना को बता देना कि उसका सुहेल गूंगा हो गया है। अब वह जिन्दगी भर उसकी सुनेगा...उससे कुछ नहीं कहेगा...।"

जब यह बात हिना को मालूम हुई तो वह तड़प उठी। उसके दिमाग में तत्काल 'किसी' के शब्द गूंजे-"जो मेरे तुम्हारे बीच आएगा...मैं उसे बर्बाद करे दूंगा...।"

और फिर...।

सुहेल उनके बीच आ गया था। हिना उसकी बीवी बन गई थी, तो क्या बर्वादी का सफर शुरू हो गया है? इसीलिए तो वह रोक रही थी। निकाह से इंकार कर रही थी। किसी ने उसकी नहीं सुनी और... और नतीजा सामने था।

हिना बेहद उदास हो गई। उसने हेमा को तसल्ली देने की कोशिश की...लेकिन उसका अपना चैन लुट गया था। यह हृदय विदारक खबर सुनकर वह सीधी अपने बाप के पास पहुंची। तबियत पहले ही ठीक न थी...इस खबर ने तो जैसे उसकी जान ही निकाल ली थी।

हिना निढाल-निढाल-सी समीर राय के कमरे में दाखिल हुई। समीर राय डैक से गजल सुन रहा था। हिना ने बटन दबा डैक बंद किया। आवाज बंद हुई तो समीर राय ने चौंक कर आंख खोली...।

और हिना को सामने पाया।

वह हड़बड़ा कर उठ बैठा। एक तो हिना का इस वक्त कमरे में आना और फिर चलता हुआ 'डैक' बंद कर देना...जरूर कोई असाधारण बात थी।

"क्या हुआ...बेटी...?" समीर राय ने उसका चेहरा गौर से देखा। वह पीली पड़ी हुई थी और आंखों से कमजोरी टपक रही थी।

"अब्बू...कुछ ठीक नहीं है...।" हिना उत्तेजित-सी -'मैंने मना किया था। आप नहीं माने। आपने मेरी एक नहीं बात सुनी...।" हिना बेड पर बैठ गई।

"कोई गड़बड़ हो गई...मुझे बताओ, क्या हुआ है...?"

"उसने सुहेल को गूंगा कर दिया है, सुहेल अपनी बोलने की ताकत खो बैठा है।" हिना उत्तेजना में वो बात भी कह गई जो उसने अभी तक खुल कर नहीं बताई थी।

“यह तुम क्या कह रही हो...क्या हुआ सुहेल को...?"

"वह गूंगा हो गया है, अब्बू।" हिना ने दुखी होकर कहा।

"तुम्हें किसने बताया...?" समीर राय ने तेजी से पूछा।

"अभी हेमा का फोन आया था...'

"अच्छा, तुम आराम से बैठो, मैं उससे बात करता हूं समीर बोला, व फिर बेड पर पड़ा अपना मोबाइल उठाया और हेमा से बात की।

हेमा ने सुबह से अब तक का हाल उन्हें सुना दिया। समीर ने फिर मामू सुखदेव से बात की... उन्होंने हॉस्पिटल में जो कुछ हुआ... वह बता दिया। दोनों ही परेशान थे। दोनों ने एक-दूसरे को तसल्लियां दीं व रिपोर्ट आने तक कोई कदम न उठाने का फैसला किया।

"हिना, तुम्हारे ख्याल में सुहेल के साथ क्या हुआ है... समीर राय ने मोबाइल बंद करके एक तरफ डालते हुए पूछा- ऐसा किसने किया है तुम किसका जिक्र कर रही हो...?"

"अब्बू... मुझे कुछ नहीं मालूम...।" हिना जैसे एकदम सहम गई। उसने घबराकर कमरे में चारों तरफ देखा।

आज सुबह हिना के कमरे में सरवरी और सितारा ने जो कुछ देखा था...समीर राय उससे अनजान था।

"मुझे यूं महसूस हो रहा है जैसे तुम कुछ छिपा रही हो...। 'किसी से डर रही हो। बोलो, बेटा! डरो मत...। हमें अपने दुश्मन के बारे में साफ तौर पर मालूम नहीं होगा तो हम उससे लड़ेंगे किस तरह...।" समीर राय बोला "तुम जो कुछ भी जानती हो मुझे सब साफ लफ्जों में बता दो...।"

"अब्बू... मैं कुछ नहीं जानती..." हिना ने दृढ़ लहजा अपनाने की कोशिश की।

"नहीं, हिना... मैं जानता हूं कि तुम बहुत कुछ जानती हो, तुम झूठ बोल रही हो... मुझसे छिपा रही हो, और मुझसे छिपा कर खुद हलकान हो रही हो। आज 'उसने' सुहेल की आवाज छीन ली है...हो सकता है कल 'वो' मुझे कोई नुकसान पहुंचा दे।" हकीकतन अब समीर को भी अन्देशे सताने लगे थे।

"नहीं, अब्बू। मैं सब कुछ बर्दाश्त कर सकती हूं, लेकिन यह बर्दाश्त नहीं कर सकती कि ' वो ' आपको कोई नुकसान पहुंचाए। अब्बू... मैंने यूं तो बहुत कुछ आपको बता रखा है...। मैंने काले लिबास वाले के बारे में भी आपको बताया था और... और आज सुबह सितारा ने जो कुछ मेरे कमरे में देखा वह भी सुन लीजिए...।"

"सितारा ने क्या देखा...?" समीर राय की परेशानी बढ़ती जा रही थी।

सितारा ने उसके कमरे में जो कुछ देखा था और जैसा देखा था...वह सब हिना ने निस्संकोच व सविस्तार सुना डाला।
 
समीर राय के होश उड़ चले - "यह... यह सब क्या है, बेटी?" वह बौखला कर बोला। "अब्बू...यह सब मेरे बचपन से मेरे साथ हैं...।"

हिना अब संयत व संजीदा थी- "मैं आपको अपने बचपन की बहुत-सी बातें बता चुकी हूं। जो बातें उस वक्त मेरे छोटे से जहन में साफ नहीं थीं.....वो अब स्पष्ट होकर मेरे सामने आ गई हैं। मैं बहुत कुछ समझ पा रही हूं...।"

"हां, बताओ बेटा। जो कुछ भी तुम जानती हो... समझ पा रही हो....सब पूरे इत्मीनान के साथ बताओ...।" सब कुछ जानने को आतुर समीर राय ने उसे हौसला दिया।

"मेरा बचपन एक तिलस्मी माहौल में बीता था, अब्बू... हिना याद करते बोली- "वहां एक हालनुमा कमरा था। उस कमरे में हजारों 'ताख' बने हुये थे और हर 'ताख' में एक बुत रखा हुआ था। उस कमरे का फर्श सुर्ख ईंटों का था, मैं उस फर्श पर दौड़ती-फिरती थी। वहां बेशुमार सांप होते थे। मैं उनमें खेला करती थी...।"

हिना की आंखों में यादों का अलाव रोशन था और वह यादों में खोई धीरे-धीरे बोल रही थी

"अब्बू...वहां उस मायावी लोक में उन 'बुतों का एक देवता था। चाहें तो आप उसे सांपों का बादशाह कह लें। उसके सिर पर एक सुनहरा सांप कुंडली मारे ताज की तरह सजा रहता था। उस बादशाह का नाम परमान था। सांपों के इस बादशाह ने मुझे अपने बेटे के लिए चुन रखा था। उसके बेटे का नाम रनतारो था। मैं जब तक वहां रही...मैंने कभी रनतारो को नहीं देखा था, बस उसके बारे में अजीब-अजीब किस्से सुने थे... जो उस वक्त मेरी समझ से ऊपर थे, लेकिन अब हर चीज आईने की तरह साफ हो चुकी है।

'अब्बू... कुछ अर्सा पहले रात की रानी पर जो सांप दिखाई देता था...वो रनतारो ही था। फिर बर्थ-डे वाली रात 'वो' मुझ तक पहुंचा।

उस रात उसने मुझे 'डंसा', अब उसका जब जी चाहता है, आता है और 'डंस' कर चला जाता है और अब शायद उसने रूप बदल लिया है। 'वो' अब स्याह लिबास में होता है और बिना आवाज' के मुझसे बातें करता है। अब्बू... 'वो' मेरे दिमाग में बोलता है। उसने मुझे धमकी दी थी कि अगर कोई उसके और मेरे बीच में आया तो ' वो' उसे बर्बाद कर देगा। अब्बू इसीलिए मैंने निकाह से इंकार कर दिया था। आपने मेरी बात नहीं मानी अब्बू...। अब आप नतीजा देख लें...।" हिना का स्वर भर्रा गया।

समीर राय की हैरतें बढ़ी थीं और बदहवासी भी। लेकिन उसने खुद को संभाला और बेटी को तसल्ली देते बोला- "तुम परेशान मत होवो, हिना। तुम्हारा बाप इतना कमजोर नहीं है कि वह एक सांप से डर जाए।"

उसने हिना के दोनों हाथ मजबूती से पकड़ लिए.... हिना के हाथ ठण्डे हो रहे थे। समीर राय कुछ क्षण बेटी के चेहरे को निहारता रहा, फिर आगे बोला-"यह तुमने बहुत अच्छा किया कि सब कुछ मुझे बता दिया। अगर पहले बता देती तो और भी अच्छा होता। खैर, कोई बात नहीं। तुम फिक्र छोड़ दो। मैं देखता हूं कि इस बारे में क्या किया जा सकता है...।"

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अगले दिन !

मामा सुखदेव, सुहेल के साथ हॉस्पिटल पहुंचे। टैस्ट रिपोर्ट आ चुकी थीं। वह रिपोर्ट लेकर डॉक्टर के कमरे में पहुंचे ही थे कि समीर राय भी वहां पहुंच गया।

डॉक्टर ने रिपोर्ट पढ़ीं व फिर बोला "रिपोर्ट तो सारी क्लीयर हैं। इन्हें गले की कोई 'प्रॉब्लम' नहीं है। अब एक मशवरा मैं आपको दूंगा।"

वह मामा सुखदेव से सम्बोधित थे।

"जी, कहिये..." मामू बोले।

"अगर आप उचित समझें तो इन्हें किसी मनोवैज्ञानिक को दिखा लें। कभी-कभी कोई भावनात्मक... सैन्टीमेंटल 'प्रॉब्लम' बोलने की ताकत को प्रभावित कर देती है...।" डॉक्टर ने मशवरा दिया।

"ठीक है, डॉक्टर! आपका शुक्रिया।" सुखदेव ने सहमति में गर्दन हिलाते कहा व उठ खड़ा हुआ। उसने समीर राय व सुहेल को भी उठने का इशारा किया था।

वे डॉक्टर का शुक्रिया अदा कर कमरे से बाहर निकल आए।

"क्या ख्याल है...साइकोटिस्ट को दिखाएं...?" सुखदेव ने समीर की राय जाननी चाही।

"दिखाने में क्या हर्ज है...।" समीर राय ने सहमति जतलाई । वह उन्हें हकीकत से आगाह कर खौफजदा नहीं करना चाहते थे। हालांकि हकीकत अब उससे छिपी नहीं थी।

फिर शहर के एक बड़े मनोवैज्ञानिक से अप्वाइंटमेंट लेकर उसी दिन सुहेल को उसे दिखाया गया। इस डॉक्टर ने लगभग एक घंटा सुहेल से एकांत में बातचीत की थी। डॉक्टर के तमाम सवालों के जवाब सुहेल ने लिख कर दिए। इन जवाबों को डॉक्टर ने बड़े गौर से पढ़ा और फिर सुहेल को अंदर ही छोड़कर खुद बाहर आ गया।

उसने मामू सुखदेव से सिर्फ एक सवाल पूछा- "किसी किस्म का कोई जहनी सदमा तो नहीं पहुंचा इन्हें...?"

"नहीं, ऐसा कुछ नहीं है।" मामू ने जवाब दिया, फिर एकदम ने बोले-"हां, एक बात जरूर है।"

"वह क्या...?"

"इसका निकाह हुआ है... एक दिन पहले! यूं समझें कि रात को निकाह हुआ और सुबह यह अपनी आवाज खो बैठा था।" सुखदेव ने बताया- "और डॉक्टर, आपके किसी सवाल से पहले मैं एक बात बिल्कुल साफ तौर पर बता देना चाहता हूं कि इसकी शादी इसकी मर्जी व पसन्द से हुई है। इस निकाह से उसे किसी सदमे की बजाय दिली खुशी है, हां, अगर इस खुशी के मारे यह गुंग होकर रह गया है तो मैं कह नहीं सकता...।" सुखदेव ने यह कहते हुए एक निगाह समीर राय पर डाली और पुनः डॉक्टर की तरफ आकर्षित हो गया।

डॉक्टर मुस्कुरा दिया, बोला- "कभी-कभी ऐसा भी होता है कि लोग अचानक खुशी की खबर सुनकर मर जाते हैं... उनका हार्टफेल हो जाता है। लेकिन यहां शायद यह मामला नहीं है। बहरहाल, मैं एक दवा लिखे देता हूं। इन्हें सात दिन खिलाएं, फिर आकर मुझे बताएं।"

डॉक्टर ने पर्ची पर दवा लिखकर मामू सुखदेव के हवाले की और फिर अपने असिस्टेन्ट को इशारा करके सुहेल को बाहर बुलवा लिया।

समीर राय, सुहेल के कंधे पर हाथ रख उसे बाहर ले आया समीर समझ रहा था

यह नहीं है, यह है... उसका, जो एक बिल्ली के बच्चे के साथ फुटपाथ पर बैठा है।

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