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हवेली की फिजा बड़ी अजीब-सी थी। नमीरा के बारे में कोई कुछ बताने को तैयार नहीं था। होंठ सिले हुए थे। साथ ही कई अनकही कहानियां नमीरा और उसकी बच्ची के बारे में गर्दिश कर रही थीं, लेकिन कोई किसी बात की पुष्टि करने को तैयार नहीं था। खुद मां-बाप का रवैया उलझा देने वाला था। नफीसा के चेहरे पर जो भाव थे... वह उनकी जुबान पर न थे और जो जुबान पर था, उनके चेहरे से मेल न खाता था।
नमीरा और उसकी नवजात बच्ची के पीछे कोई रहस्य जरूर था, लेकिन वह क्या रहस्य था, इसका सिर समीर क हाथ में नहीं आ रहा था। उसक बेचैनी....बेकरारी बढ़ती जा रही थी।
शायद उसी से गफलत हो गई थे।
अभी पन्द्रह दिन पहले ही तो समीर को नलमीरा का पत्र मिला था। वह बस, सिर्फ एक पंक्ति का पत्र था, लेकिन इस एक पंक्ति में एक वाक्य में ही जैसे एक पूरी दास्तान लिखी हुई थी। नमीरा ने लिखा था
"मैं खुद को बहुत अकेली महसूस करती हूं...हो सके तो मुझसे मिल जाओ.... ।"
इस संक्षिप्त से व्यथापूर्ण पत्र को पढ़कर समीर कुछ देर के लिए उदास हो गया था। उस शाम उसे एक म्यूजिक प्रोग्राम में जाना था। उसकी वक्त उसके दोस्त उसे लेने आ गये थे और वह उसे म्यूजिक कन्सर्ट में शामिल हो कुछ ऐसा व्यस्त हुआ कि नमीरा उसके जहन में निकल गई।
फिर मुम्बई की रंगीन शामों, संगीत भरी रातों, युनिवर्सिटी की हंसती-मुस्कुराती सुबहों में वह कुछ इस तरह गुम हुआ था कि प्रायःवह यह भी भूल जाता था कि वह कौन है।
नमीरा उसका चुनाव और उसकी पसन्द थी। वह उसे एक संगीत समारोह में मिली थी। उनकी यह पहली मुलाकाल ही बहुत गहरी साबित हुई। वे एक-दूसरे के दिलों में उतरते चले गये। नमीरा एक मध्यवर्गीय परिवार की लड़की थी। परिवार का नाता एक छोटे से शहर अमरोहा से था। उसके पिता बरसों पूर्व ही अमरोहा छोड़कर मुम्बई में आ बसे थे और यहां वह एक प्राइवेट फर्म में मैनेजर के पद पर थे।
_ नमीरा कुछेक मुलाकातों में ही समीर के दिल पर किसी स्टिकर की तरह चिपक गई। समीर राय ने 'प्रपोज' किया...शादी की पेशकश की और नमीरा शादी के लिए फौरन तैयार हो गई। लेकिन उसके मां-बाप ने कहा, जब तक समीर के घरवाले रिश्ता मांगने नहीं आते, वे रिश्ता नहीं करेंगे।
समीर ने अपने आपसे बात की। उसने खुले दिल होने का सबूत देते हुए नमीरा को अपनी बहू बनाने पर तो रजामन्दी जाहिर कर दी..... लेकिन अपने से छोटे लोगों के दर पर रिश्ता मांगने जोन से साफ इंकार कर दिया।
बिना उसके मां-बाप के आये....नमीरा का बाप रिश्ता देने पर तैयार नहीं था...और समीर का बाप रिश्ता मांगने पर राजी न था। परिणाम यह रहा-समीर व नमीरा का रिश्ता परम्पराओं के अनुसार न हो सका और समीर व नमीरा ने अपने तौर पर औपचारिकताएं पूरी कर ली। समीर ने अपने एक दोस्त के घर..अपने दोस्तों की मौजूदगी में चुपचाप नमीर से निकाह (विवाह) कर लिया।
जब नमीरा के मां-बाप को अपनी बेटी के इस दुस्साहस व संगीन कदम की सूचना मिली तो उन्होंने जिन्दगी भर के लिए उसका मुंह न देखने की कसम खा ली-और जब समीर, अपनी विवाहित नमीरा का लेकर हवेली पहुंचा तो उसके मां-बाप ने भी बड़े बुझे मन से उनका स्वागत कियां बाप तो बाप, समीर की मां को भी यह बात पसन्द नहीं आई थी। पसन्द न आने के बावजूद भी नफीसा ने नमीरा को हवेली से निकाल बाहर नहीं किया था। शायद इसलिए कि वह जानती थी कि अगर ऐसा किया तो समीर बिगड़ इसलिए कि वह जानती थी कि अगर ऐसा किया तो समीर बिगड़ जाएगा और वे दोनों अपने इकलौते बेटे से हाथ धोना नहीं चाहते थे।
नमीरा सुन्दर तो थी ही...खूबसूरत होने के साथ-साथ जहीन भी थी। उसने शीघ्र ही नफीसा बेगम को अपनी तरफ झुका लिया। सास-बहू के रिश्ते में जो ठण्डापन था...वह धीरे-धीरे कम होता गया। नमीरा ने अपनी जहानत और अपने मधुर व्यवहार से नफीसा बेगम के दिल में घर करना शुरू कर दिया।
इधर वह सास के दिल में घर करती जा रही थी तो समीर के दिल से निकलती जा रही थी। नमीरा का नशा उतरा जा रहा था। वह नमीरा को भूलता जा रहा था। समीर एन.ए. कर रहा था और होस्टल में रहता था। मुम्बई में, बांद्रा के इलाके में उसके बाप का बंगला था, लेकिन समीर को उसमें रहना पसन्द नही था। उसकी तो हवेली से जान जलती थी.फिर वह इतने बड़े बंगले में अकेला कैसे रहता। उस होस्टल ही रास आता था। दूसरो के साथ उनके बीच रहना पसन्द था। वह एक भावुक लेकिन दृढ़ निश्चय नौजवान था। जो दिल में समा जाता था...उसे कर गुजरता था। नमीरा से शादी भी उसने दिल में उठने वाले ज्वार-भाटा के प्रभाव में कर ली थी। अब वह जोश कम हो रहा था। वह नमीरा को हवेला में पहुंचाकर जैसे भूल ही गया था।
यहां तक कि नमीरा का एक पंक्ति वाला जज्बाती पत्र भी समीर के दिल के समुद्र में हलचल नहीं मचा सका था और यूं नमीरा अपने अकेलेपन का रोना रोती व उसे याद करती मर गई थी.... ।
समीर सोचे जा रहा था और जितना सोच रहा था, उसका गम, उसकी पीड़ा बढ़ती जा रही थी। उसका गला बार-बार रुंध जाता था। आंखें छलकी जा रही थीं।
नमीरा और उसकी नवजात बच्ची के पीछे कोई रहस्य जरूर था, लेकिन वह क्या रहस्य था, इसका सिर समीर क हाथ में नहीं आ रहा था। उसक बेचैनी....बेकरारी बढ़ती जा रही थी।
शायद उसी से गफलत हो गई थे।
अभी पन्द्रह दिन पहले ही तो समीर को नलमीरा का पत्र मिला था। वह बस, सिर्फ एक पंक्ति का पत्र था, लेकिन इस एक पंक्ति में एक वाक्य में ही जैसे एक पूरी दास्तान लिखी हुई थी। नमीरा ने लिखा था
"मैं खुद को बहुत अकेली महसूस करती हूं...हो सके तो मुझसे मिल जाओ.... ।"
इस संक्षिप्त से व्यथापूर्ण पत्र को पढ़कर समीर कुछ देर के लिए उदास हो गया था। उस शाम उसे एक म्यूजिक प्रोग्राम में जाना था। उसकी वक्त उसके दोस्त उसे लेने आ गये थे और वह उसे म्यूजिक कन्सर्ट में शामिल हो कुछ ऐसा व्यस्त हुआ कि नमीरा उसके जहन में निकल गई।
फिर मुम्बई की रंगीन शामों, संगीत भरी रातों, युनिवर्सिटी की हंसती-मुस्कुराती सुबहों में वह कुछ इस तरह गुम हुआ था कि प्रायःवह यह भी भूल जाता था कि वह कौन है।
नमीरा उसका चुनाव और उसकी पसन्द थी। वह उसे एक संगीत समारोह में मिली थी। उनकी यह पहली मुलाकाल ही बहुत गहरी साबित हुई। वे एक-दूसरे के दिलों में उतरते चले गये। नमीरा एक मध्यवर्गीय परिवार की लड़की थी। परिवार का नाता एक छोटे से शहर अमरोहा से था। उसके पिता बरसों पूर्व ही अमरोहा छोड़कर मुम्बई में आ बसे थे और यहां वह एक प्राइवेट फर्म में मैनेजर के पद पर थे।
_ नमीरा कुछेक मुलाकातों में ही समीर के दिल पर किसी स्टिकर की तरह चिपक गई। समीर राय ने 'प्रपोज' किया...शादी की पेशकश की और नमीरा शादी के लिए फौरन तैयार हो गई। लेकिन उसके मां-बाप ने कहा, जब तक समीर के घरवाले रिश्ता मांगने नहीं आते, वे रिश्ता नहीं करेंगे।
समीर ने अपने आपसे बात की। उसने खुले दिल होने का सबूत देते हुए नमीरा को अपनी बहू बनाने पर तो रजामन्दी जाहिर कर दी..... लेकिन अपने से छोटे लोगों के दर पर रिश्ता मांगने जोन से साफ इंकार कर दिया।
बिना उसके मां-बाप के आये....नमीरा का बाप रिश्ता देने पर तैयार नहीं था...और समीर का बाप रिश्ता मांगने पर राजी न था। परिणाम यह रहा-समीर व नमीरा का रिश्ता परम्पराओं के अनुसार न हो सका और समीर व नमीरा ने अपने तौर पर औपचारिकताएं पूरी कर ली। समीर ने अपने एक दोस्त के घर..अपने दोस्तों की मौजूदगी में चुपचाप नमीर से निकाह (विवाह) कर लिया।
जब नमीरा के मां-बाप को अपनी बेटी के इस दुस्साहस व संगीन कदम की सूचना मिली तो उन्होंने जिन्दगी भर के लिए उसका मुंह न देखने की कसम खा ली-और जब समीर, अपनी विवाहित नमीरा का लेकर हवेली पहुंचा तो उसके मां-बाप ने भी बड़े बुझे मन से उनका स्वागत कियां बाप तो बाप, समीर की मां को भी यह बात पसन्द नहीं आई थी। पसन्द न आने के बावजूद भी नफीसा ने नमीरा को हवेली से निकाल बाहर नहीं किया था। शायद इसलिए कि वह जानती थी कि अगर ऐसा किया तो समीर बिगड़ इसलिए कि वह जानती थी कि अगर ऐसा किया तो समीर बिगड़ जाएगा और वे दोनों अपने इकलौते बेटे से हाथ धोना नहीं चाहते थे।
नमीरा सुन्दर तो थी ही...खूबसूरत होने के साथ-साथ जहीन भी थी। उसने शीघ्र ही नफीसा बेगम को अपनी तरफ झुका लिया। सास-बहू के रिश्ते में जो ठण्डापन था...वह धीरे-धीरे कम होता गया। नमीरा ने अपनी जहानत और अपने मधुर व्यवहार से नफीसा बेगम के दिल में घर करना शुरू कर दिया।
इधर वह सास के दिल में घर करती जा रही थी तो समीर के दिल से निकलती जा रही थी। नमीरा का नशा उतरा जा रहा था। वह नमीरा को भूलता जा रहा था। समीर एन.ए. कर रहा था और होस्टल में रहता था। मुम्बई में, बांद्रा के इलाके में उसके बाप का बंगला था, लेकिन समीर को उसमें रहना पसन्द नही था। उसकी तो हवेली से जान जलती थी.फिर वह इतने बड़े बंगले में अकेला कैसे रहता। उस होस्टल ही रास आता था। दूसरो के साथ उनके बीच रहना पसन्द था। वह एक भावुक लेकिन दृढ़ निश्चय नौजवान था। जो दिल में समा जाता था...उसे कर गुजरता था। नमीरा से शादी भी उसने दिल में उठने वाले ज्वार-भाटा के प्रभाव में कर ली थी। अब वह जोश कम हो रहा था। वह नमीरा को हवेला में पहुंचाकर जैसे भूल ही गया था।
यहां तक कि नमीरा का एक पंक्ति वाला जज्बाती पत्र भी समीर के दिल के समुद्र में हलचल नहीं मचा सका था और यूं नमीरा अपने अकेलेपन का रोना रोती व उसे याद करती मर गई थी.... ।
समीर सोचे जा रहा था और जितना सोच रहा था, उसका गम, उसकी पीड़ा बढ़ती जा रही थी। उसका गला बार-बार रुंध जाता था। आंखें छलकी जा रही थीं।