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Horror अगिया बेताल

लबादे वाला आंधी-तूफान की तरह बीच के हिस्से में पहुँचा और उत्तर द्वार की तरफ लपक पड़ा। अब तक सारे मन्दिर में प्रकाश फैल गया था और खासी भगदड़ मची हुई थी, परन्तु वह अपने पथ पर अँधेरा फैलाते हुए उत्तर द्वार की तरफ बढ़ता ही चला गया । वह जानता था भीतर अधिक लोग नहीं रहते। तीनों पहरेदार होते हैं चौथा कुण्ड का जल्लाद है, जिसे इस प्रकार की भाग-दौड़ की आदत नहीं, एक पुजारी होगा, जिसे पश्चिम में पड़ने वाले पूजा कक्ष के अलावा किसी बात से सरोकार नहीं रहता । इनके अलावा सफाई करने वाला नौकर भी है, जो उसका सहयोगी पहले ही बन चुका है ।

उसे भीतर की सारी स्थिति का ज्ञान था। वहाँ अब भी एक ही आदमी उससे संघर्ष कर सकता था, परन्तु वह भी बुर्ज से रोशनी फेंकने में व्यस्त था । उसे नीचे उतरते देर लगेगी, और वह उतर भी गया तो... तो वह उसके सच्चे निशाने से बाहर नहीं होगा । परन्तु संयोग से वह मौत के लिये इतना फुर्तीला साबित नहीं हुआ। उससे पहले ही तमाम बाधाओं को पार करता हुआ वह उत्तर द्वार पर जा पहुँचा । द्वार पर उसका सहयोगी मौजूद था ।

द्वार खुला ।

वह तीर की तरह बाहर निकलता हुआ बोला - "अलविदा ।" उसके बाहर निकलते ही द्वार बन्द हो गया ।

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बच्चे का हरण करने वाला मजबूत काठी वाला यह व्यक्ति निरन्तर जंगल भेदन करता रहा । मठ की तरफ वाले रास्ते पर जाने की मूर्खता वह नहीं कर सकता था और सवेरे से पहले वह खतरे की सीमा से बाहर निकल जाना चाहता था । जैसे-जैसे वह दूर होता चला जायेगा, चौरंगी बाबा की पकड़ ढीली होती चली जायेगी ।

तपोवन की सीमा से बाहर पहुँचने में उसे बड़ी भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । सारी रात जंगल में मशालची घुड़सवार दनदनाते रहे । ये सब महामाया योगी का कातिल दस्ता था, जो जंगल का इंच- इंच छान लेना चाहता था। जैसे ही कोई घुड़सवार नज़र आता वह किसी-न-किसी वृक्ष पर चढ़कर छिप जाता । इस तरह वह भारी मुसीबत उठाता हुआ आगे बढ़ रहा था ।

यदि रात का अँधेरा न होता तो वह कभी का नज़रों में आ गया होता । सड़क अभी पांच मील दूर थी। एक बार उस इकलौती सड़क पर पहुँचने भर की देर थी फिर उसे पकड़ पाना कातिल दस्ते के लिये सपने जैसी बात हो जाती । रास्ता घंटे भर का था परन्तु कातिल दस्ते के कारण वह कई घंटों का हो गया था । वे लोग चारों दिशाओं में दौड़ रहे थे। वह उनका इरादा भी भांप चुका था ।

उनकी अधिकांश दौड़ और व्यूह रचना निकासी के मार्ग पर थी । वहाँ उन्होंने बड़ा सख्त जाल बिछा दिया था और इस समय उनकी व्यूह रचना से स्पष्ट आभास होता था कि वे उसे सुबह तक जंगल में ही छिपे रहने के लिये बाध्य कर देना चाहते हैं या रास्ता भटक जाने पर विवश कर देना चाहते हैं । इस वक्त शिकार को पकड़ने का उनका कोई इरादा नहीं था । किसी तरह सुबह होने तक इसी स्थिति में रखना चाहते थे । उसके बाद क्या शिकार बचकर निकल पायेगा ?

इस नाकाबंदी को उसने भी भांप लिया था, इसलिये व्यूह भेदने के लिये उसने पहाड़ी नदी का सहारा लिया, परन्तु इसके लिये उसे चन्द्र

बताल से खतरा पैदा हो सकता था। क्या वह ठण्डे जल में डूबे रहने पर विचलित न होगा ? रास्ते में उसने एक-दो बार उससे बातें की थीं। यह अभी नासमझ बच्चा था । बस एक ही बात अनुकूल साबित हो रही थी । वह निर्भीक बच्चा था । सारे रास्ते खामोश रहा । यह दौड़ उसे भली लग रही थी, एक बार उसने सहयोग भी दिया था और पीठ पर न चढ़कर उसके साथ पैदल भी चला था । इस निर्भीकता का कारण यह भी हो सकता था कि वह मन्दिर के पाखंड से आतंकित हो गया हो, जल्लाद के खौफनाक साये से मुक्ति पाना चाहता हो... सच बात यही थी कि वह यहाँ से भाग जाना चाहता था । चाहे किसी का सहारा क्यों न लेना पड़े । सहारा ईश्वर ने भेज ही दिया था ।

नदी मार्ग से बाहर निकलने पर दो मील का चक्कर पड़ जाता था, परन्तु इसके सिवा कोई चारा नहीं था। आगे के क्षेत्र में एक-एक कदम पर कातिल दस्ते की कड़ी नज़र थी । ?"

"मैं नदी के पानी में कूद रहा हूं।" उसने कहा- “तुम डरोगे तो नहीं

"मैं तो आग से नहीं डरता । पानी से क्या डरूंगा ?" वह अपनी महीन आवाज़ में बोला - "मुझे यहाँ से बाहर निकाल लो बाबा ।"

"ठीक है बेटे । कितना भी कष्ट क्यों न हो चिल्लाना नहीं ।"

चन्द्र बेताल से सहयोग मिलते ही वह जलधारा की तरफ मुड़ गया । दृढ़ निश्चय कर वह जल में उतर गया। सर का ज़रा सा भाग पानी से बाहर निकाले वह धारा में बहता रहा । ठीक निकासी के पास आते ही उसने पानी में गोता लगा लिया और धारा में तेजी के साथ बढ़ने लगा । कुछ क्षण में ही पीठ पर सवार चन्द्र बेताल बेचैनी से छटपटाने लगा । वह समझ गया था कि पानी उसके नाक-मुंह में घुस रहा है, पर वह इस बात को अच्छी तरह जानता था कि पानी में डूबे रहने पर भी बच्चा सही सलामत रहेगा ।

कुछ समय बाद वह साँस लेने ऊपर आ गया ।

आकाश पर तनी चाँदनी अब सुबह के उजाले में बदलने लगी थी । ओस के कारण ऊपर का पानी अत्यधिक ठण्डा हो गया था, उसका शरीर ठंड के कारण काँपने लगा था ।

इतनी देर में ही उसकी कुल्फी जम गई थी ।

धारा उसे अपने आप ही बहाये लिये जा रही थी ।

जब उसने खतरे की सीमा से बाहर महसूस किया तो वह तट की तरफ तैरने लगा । चन्द्र उसकी पीठ पर ही बेहोश हो गया था, पर इस बात की उसे अधिक परवाह नहीं थी । यूँ उसके कंधे बुरी तरह दुख रहे थे । शरीर काँप रहा था और जब वह बाहर निकला तो तत्काल आगे न बढ़ सका । उसने चन्द्र बेताल को पीठ से उतार कर लिटा दिया और स्वयं भी लेट गया ।

परचों की पिटारी भीग चुकी थी, परन्तु माउज़र सही सलामत थी, कारतूस प्लास्टिक के डब्बे में थे । अतः उसके भीगने की भी गुंजाइश नहीं थी ।

अभी खतरा टला नहीं था ।

यूँ वह जंगल के पहरेदारों से काफी दूर निकल आया था। भोर का उजाला तेज़ी के साथ फैलने लगा था । पक्षी चहल-पहल करने लगे थे और धीरे-धीरे जंगल जागता जा रहा था। उसने आधा घंटा उसी जगह

बिताया, तब तक चन्द्र को भी होश आ चुका था ।

"अगर हम दौड़ लगायें तो ठण्ड भाग जायेगी ।" उसने चन्द्र को समझाया ।

"मैं काफी तेज़ दौड़ लेता हूं ।" चन्द्र बोला ।

"तो हम दौड़ चले ?"

दोनों दौड़ने लगे। कुछ देर में ही ताज़ी हवा और शरीर की गर्मी ने उनमें नई स्फुर्ति भर दी । सारी थकान और कंपकंपी मिट गई। जिस वक्त सूरज का लाल गोला पूर्वोकाश पर उतरा वह सड़क के मुहाने पर पहुँच चुके थे । यहाँ झाड़ियों में एक पुरानी खटारा कार छिपी हुई थी ।

कार में पहुँचने के बाद उसने संतोष की साँस ली । "बाबा, क्या यह आपकी कार है ?"

"हाँ बेटा । मैं इसे यहीं छोड़ गया था ।" "आप कहाँ से आये हैं बाबा ?”

“धीरे-धीरे तुम्हें सब पता चल जायेगा बेटा । जब तुम बड़े होगे तो सब समझ जाओगे । इस वक्त तुम्हें जीवन देना आवश्यकता है । मैंने तुम्हें अपनी जान पर खेल कर प्राप्त किया है। इसलिये भी कि मेरी कोई संतान नहीं है। हम दोनों को कुछ-न-कुछ चाहिए इसलिये हम दोनों एक-दूसरे के पूर्वक साबित होंगे।"

चन्द्र का नासमझ मस्तिष्क उस उलझनपूर्ण बात को नहीं समझ

सका ।

कार सड़क पर दौड़ने लगी ।

चन्द्र बेहद प्रसन्न था ।

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आदिवासियों के गाँवों में एक पागल जोगी घूमा करता था, जिसे लोग मुलक्कड़ बाबा कहते थे। यह जोगी बच्चों को खूब प्यार करता था । बच्चे भी उससे खूब घुल जाते थे । उन्हें तरह-तरह की कहानियां सुनने को मिलती थीं। जो मुलक्कड़ बाबा ही उन्हें सुनाता था । मुलक्कड़ बाबा अपनी पोटली में बच्चों के लिये कुछ-न-कुछ खाने- पीने का मसाला भर कर रखता था । आदिवासियों के प्रत्येक गांव के बच्चे उसकी प्रतीक्षा करते रहते थे, वे अपने माता-पिता से मुलक्कड़ बाबा के बारे में पूछा करते थे ।

लम्बी दाढ़ी। बड़ी-बड़ी जटाएं। गले में रुद्राक्ष की मालाएं। शरीर पर लबादा, जो गले से लेकर पैर तक ढके रहता था । मुलक्कड़ बाबा का यही हुलिया था । यह पागल जोगी कौन था ? कहाँ से आता था ? इसे कोई आदिवासी नहीं जानता था । किसी ने जानने का प्रयास भी नहीं किया था । तपोवन तो साधु और योगी पुरुषों से भरा रहता था ।

बच्चों को प्यार करने वाला मुलक्कड़ बाबा आज हाईवे पर कार दौड़ा रहा था। कार की पिछली सीट पर चन्द्र बेताल लेटा था । उसने कार के शीशों पर परदे चढ़ाये हुए थे ।



कार चलाते चलाते उसने सर पर पग्गड़ बाँध लिया था । नकली दाढ़ी के बाल नोच-नोच कर सड़क पर उड़ा दिए थे। अब उसके चेहरे पर छोटी अधपकी दाढ़ी थी । उसने आँखों पर काला धूप का चश्मा चढ़ा लिया था । इस प्रकार उसका हुलिया पूरी तरह बदल गया था । अब उसे पहचान पाना दुर्लभ था ।

चन्द्र बेताल सा चुका था ।

मुलक्कड़ बाबा की निगाहें खाली पड़ी सड़क पर जमी थीं। जीवन में पहली बार उसने दिल की धड़कने तेज़ कर देने वाला कार्य किया था । चार साल उसने कैसे बिताये थे, वही जानता था। एक वर्ष तक वह पागलों की तरह सड़कों पर मारा-मारा फिरता रहा । उसे पागल खाने भेज दिया गया । जहाँ एक मानसिक चिकित्सक ने उसकी दिमागी हालत दुरुस्त कर दी । वह पूर्णतया स्वस्थ तो नहीं हुआ था परन्तु पहले से उसकी हालत काफी सुधर गई थी, उसमें सोचने समझने, अच्छे-बुरे की क्षमता आ गई थी ।

अर्ध विक्षिप्त स्थिति में होने के कारण वह यदि पागलपन का अभिनय करता रहे तो उसे बड़ा अच्छा लगता था और दूसरों का मनोरंजन कर उसे अज़ीम प्रसन्नता होती थी ।

आखिर यह मुलक्कड़ बाबा था कौन ? और इसने किसी बुद्धिमान शक्तिवान शातिर की तरह जान की बाज़ी लगाकर चन्द्र बेताल को क्यों हासिल किया ? इसके पीछे किसी का क्या उद्देश्य था, यह जानने के लिये पांच वर्ष पहले की घटनाओं को जानना होगा ।

चार वर्ष पहले की बात है ।

योग विद्या से दिलचस्पी रखने वाला एक पत्रकार मठ में आकर रहने लगा था । उसका नाम था 'धनंजय' । छ: माह के भीतर ही उसे मठ की गतिविधियों पर संदेह होने लगा। उसे समाचार पत्र के सम्पादक ने यही बताया था कि यहाँ रहकर वह किसी-न-किसी रहस्य की जड़ तक पहुँचेगा इसलिये उसे यहाँ भेजा गया था । अतः उसे दोनों उद्देश्य सफल होते नज़र आये । जहाँ यह योग विद्या सीख रहा था वहाँ चौरंगी बाबा के रहस्यमय परिवेश को समझने का प्रयास भी कर रहा था । आखिर उसने रोज़मर्रा की बातों को लेकर एक लेख लिखना शुरू किया। संयोग से वह लेख महामाया योगी की निगाह में आ गया । पत्रकार ने पैतरा बदला । अब वह वहाँ जासूस की सी स्थिति में नहीं रह सकता था । उसने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि वह योग पर कुछ रिसर्च कर रहा है और अपने समाचार पत्र के लिये किसी नई बात की तलाश में है ।

उसके बाद उसने चौरंगी बाबा और महामाया योगी से तरह-तरह के प्रश्न किये। चौरंगी बाबा को उसकी छिपी गतिविधि के कारण बेहद क्रोध आया और उन्होंने नेत्रों से चिंगारियां बरसाते हुए कहा - " तू मेरी परीक्षा ले रहा था मूर्ख । जा तेरा सर्वनाश हो चुका, तू इस संसार में खुद को अकेला पायेगा, तेरे परिवार का अनिष्ट हो चुका।"

उस वक्त चौरंगी बाबा के इस शाप का धनंजय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह एक घिसा हुआ, मंझा हुआ पत्रकार था । वह जानता था चौरंगी पाखंडी है। वह क्या किसी को शाप देगा । शाप की बातें तो पीछे छूट चुकीं । परन्तु वह यह भी महसूस करता था कि वहाँ रुकना अब खतरनाक हो सकता था इसलिये वह अधूरी जानकारी के साथ अपने शहर लौट गया ।

अपने घर पहुँचते ही उसपर ब्रज जैसा पहाड़ गिर पड़ा ।

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उसका मकान जल कर राख हो गया था और उसे केवल चार लाशें मिल पायीं । उसके परिवार में कोई भी जीवित नहीं रहा था। उसके दो लड़के, पत्नी, उसकी माँ, कुछ भी तो नहीं रहा था। ये सभी लाशें अधजली थीं और किसी को भी इस बारे में पता न था कि आग कैसे

लगी ? आग जब पूरी तरह फैल चुकी थी तब पड़ोसियों को पता चला था। किसी ने चीख-पुकार भी नहीं सुनी थी ।

धनंजय चीख मारकर बेहोश हो गया । उसकी दुनिया उजड़ चुकी थी ।

उसे चौरंगी बाबा का शाप याद आया ।

उसके पहुँचने से चौबीस घंटे पहले वह घटना घट चुकी थी । उसके आने तक चारों शव पुलिस की देख-रेख में सुरक्षित रखे गये थे। शवों के पोस्ट मार्टम की आवश्यकता नहीं समझी गई थी क्योंकि केस में किसी प्रकार की कोई उलझन नहीं थी। एक ही बात पुलिस इंस्पेक्टर के गले नहीं उतर रही थी कि इतने खुले मकान में जिसके तीन बाहरी दरवाज़े, चार खुली चौड़ी खिड़कियाँ और नीची बालकनी थी, वहाँ आग लगने के बाद कोई भी बाहर क्यों नहीं निकल पाया ? क्या चारों प्राणी बेसुध सो रहे थे ?

इंस्पेक्टर ने धनंजय से एक सवाल किया ।

"क्या चारों हॉल में सोते थे ?"

"नहीं, वहाँ कोई नहीं सोता था ।"

"फिर चारों के शव एक ही जगह यानी हॉल में क्यों पाए गये ? जिसकी एक खिड़की एक दरवाज़ा सीधा बाहर खुलता था । हैरत की बात है कि उनमें से किसी ने चीख-पुकार भी नहीं मचाई।"

इस घटना के तुरंत बाद ही धनंजय का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा और उसके बाद जल्द ही लोगों ने उसे पागल साबित कर दिया था । परन्तु पागलपन के दौरान भी लोगों ने उसके मुंह से चौरंगी बाबा और महामाया योगी को गलियां देते हुए सुना था। वह किसी भी आदमी को चौरंगी बाबा कहकर पत्थर फेंकने लगता था ।

इसका अर्थ था कि पागलपन के दौरान भी उसके दिमाग से इन दो व्यक्तियों की छाया नहीं उतर पायी थी और वह अपने परिवार के विनाश का कारण इन्हीं दो को समझता था ।

बाद में उसे पता भी चल गया था कि यह चौरंगी बाबा के आदेश से हुआ था । महामाया के कातिल दस्ते ने यह कार्य किया था । यह जानकारी उसे सूक्ष्म भेष में रहने के बाद प्राप्त हुई। वह मुलक्कड़ बाबा के रूप में यहाँ आया था, क्योंकि उसे पहले यह तय करना था कि वास्तव में उसके परिवार को नष्ट करने वाला कौन है ? क्योंकि उस हत्याकांड को उसने दुर्घटना कभी नहीं माना था । उसे पूरा विश्वास था कि इसके ज़िम्मेदार यही लोग हैं ।

पूरी जानकारी प्राप्त करने के बाद उसका फर्ज़ बनता था कि कातिलों को इससे भी बढ़कर सज़ा दे । वह अपनी योजना और अपने हाथों से सज़ा देना चाहता था । अपने चौदह साल और आठ साल के लड़के का सपना वह भुला नहीं पाया था । सुन्दर पत्नी भी उसके ख्वाब में आती रहती थी । उसका जीवन सिर्फ कातिलों को सज़ा देने के लिये शेष रह गया था ।

वह जल्दबाजी में कोई काम नहीं करना चाहता था । इसलिये उसने वक्त का इंतज़ार किया । इन्तज़ारी रंग लायी और अब उसे संतोष था कि वह योजना बद्ध तरीके से काम कर पायेगा ।

वह इतना शक्तिशाली नहीं था जो उन लोगों से टक्कर ले पाता । वह उनके सामने चींटी के समान था । और जिस ढंग की सज़ा उसके अर्ध-

विक्षिप्त मस्तिष्क में थी, वैसी तमन्ना तो कई जन्म लेने पर भी पूरी न होती, परन्तु इन सारी समस्याओं का हल उसे चन्द्र बेताल के भीतर

नज़र आ रहा था ।

निश्चित रूप से चन्द्र के भीतर अलौकिक शक्ति थी ।

उसने चन्द्र के बारे में खासी जानकारी प्राप्त की थी । मन्दिर के सहयोगी नौकर के अलावा मठ में उसके तीन और सहयोगी थे, जो इन दिनों धीरे-धीरे महामाया का विश्वास प्राप्त करते जा रहे थे । यह लोग वहाँ की प्रत्येक जानकारी उस तक पहुँचाते रहते थे । अतः चन्द्र बेताल क्या है और उसे चौरंगी अपने स्वार्थ को हल करने के बाद क्यों खत्म कर देना चाहता है यह बात उसके सामने खुली किताब की तरह थी ।
 
धनंजय को लगा वह अवसर आ गया है ।

ऐसे किसी अवसर को वह खोना नहीं चाहता था ।

यदि चौरंगी बाबा चन्द्र बेताल को खत्म कर देना चाहता था तो इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि उसे चन्द्र बेताल से खतरा था । चौरंगी बाबा अपने आस-पास किसी भी ऐसी शक्ति को जीवित नहीं देखना चाहता था जो उसे हानि पहुँचा सके। इस फेर में उसने न जाने कितनी हत्यायें करवाई थीं ।

"मुझे मालूम है, तुम बेताल पुत्र हो ।" वह कहता गया ।

"हालांकि यह बातें अविश्वसनीय हैं, परन्तु हमें इस पर विश्वास करना पड़ेगा। क्योंकि हमें ऐसी बात पर भी विश्वास करना पड़ा जो अविश्वसनीय थी। एक बच्चा आग की लपटों में जीवित कैसे रह सकता है ?"

वह मुस्कुराया

कार तेज़ रफ्तार से भाग रही थी ।

उसने कार एक ऐसे रेतीले कच्चे मार्ग पर मोड़ दी जो झील के किनारे दूर तक गया था। आग ताड़ के साधन छायादार वृक्ष थे । उन्हीं के बीच एक छोटा सा मकान नज़र आ रहा था, जिसका सेहन कटीले तारों की बाड़ से घिरा था। कार कटीले तारों के फाटक तक पहुँची, उसने हॉर्न बजाया। हॉर्न सुनते ही एक आदमी ने दरवाज़ा खोला, वह दौड़ता हुआ फाटक के पास आया। फाटक खोल कर वह एक तरफ हट गया । यह चौड़े कन्धों वाला... बांस जैसी सख्त और लम्बी टांगों वाला आदमी था, जिसके जिस्म पर रीछ की तरह घने बाल थे ।

वह व्यक्ति देखने से ही अत्यन्त फुर्तीला और बलवान दिखाई पड़ता

था ।

"यहाँ सब ठीक है बेंजो ?"

“हाँ। सब ठीक है।"

उसने कार रोड की तरफ बढ़ा दी । यह कार का खुला गैराज था, जिसमें कूड़ा बिखरा हुआ था। कार रोक कर उसने चन्द्र बेताल को देखा । वह अब भी सो रहा था ।

फाटक बन्द करके बेंजो वहाँ तक आ गया था ।

"इस बच्चे को सुरक्षा की आवश्यकता पड़ेगी ।" धनंजय ने कहा । “सुरक्षा के लिये इससे बेहतर जगह नहीं होगी। आप बेफिक्र रहें । क्या यही है वह करामाती बच्चा ?"

“हाँ । और शायद मैं इसे गोद ले लूं।"

'ओह मास्टर ! आपको बच्चों से इतना मोह क्यो है ?" "यह बात भी तुम्हें मालूम हो जायेगी ।”

बेंजो इस बात को नहीं जानता था कि मास्टर के दिल में क्या दर्द है । वह बच्चों से इतना मोह क्यों करता है ? बेंजो ईसाई था, घूंसेबाज़ था, ग़रीब घूंसेबाज़ ।

बेंजो ने एक कत्ल किया था और वह जेल से भागा हुआ एक

अपराधी था । वह काफी अरसे तक जंगल में छिपा रहा । आदिवासी गाँवों से खाना चुरा कर ले आया करता था। एक बार वह खाना चुराते हुए पकड़ा गया । आदिवासियों ने उसकी खूब जमकर मरम्मत की । उसे जान से मार दिया होता यदि बच्चों की एक टोली ने उन पर पत्थरों की बौछार न छोड़ी होती । बच्चों के इस हमले से आदिवासी तितर- बितर हो गये और बेंजो जान बचा कर भाग निकला। बाद में उसे मालूम हुआ कि मुलक्कड़ बाबा ने उसकी जान बचाई थी। बच्चों की उस फौज ने मुलक्कड़ बाबा के कहने पर ही उनपर हमला बोला था ।

मुलक्कड़ बाबा उसे जंगल में मिला और उसके बाद बेंजों मुलक्कड़ बाबा का भक्त हो गया। मुलक्कड़ बाबा ने उसे इस मकान में रखवाले के तौर पर रखा और बेंजो अपने मालिक की रहस्यमयी गतिविधियों से प्रभावित होता चला गया। बेंजो इस प्रतीक्षा में था कि उसका मालिक कब उसे किसी खतरनाक काम पर लगाता है, पर अभी तक ऐसा अवसर नहीं आया था। बस आता नज़र आ रहा था ।

उसने इस शरारती बच्चे के बारे में खूब सुना था और वह इस बात को अच्छी तरह जानता था कि उसका मालिक बच्चे का हरण कर लाया है । वह चौरंगी बाबा को वास्तविक रूप से नहीं जानता था अन्यथा उसे अपने मास्टर के इन करतब पर भारी आश्चर्य होता ।

उसने बच्चे को गोद में उठाया और मकान के भीतर ले जाकर एक साफ सुधरे बिस्तर पर लेटा दिया ।

धनंजय स्नान करके लौट आया ।

उसने बेंजो को बरामदे में बुलाया। बेंजो नाश्ता तैयार कर रहा था । वह नाश्ते के ट्रे लेकर बाहर खुले बरामदे में आया, जहाँ उसका मास्टर ढीले-ढाले वस्त्र पहने बैठा था ।

।”

“ज़रा यहाँ बैठो बेंजो," वह बोला - "मुझे तुमसे कुछ बातें करनी हैं

वे आवश्यक और नितान्त आवश्यक बातें होंगी। बेंजो मास्टर के चेहरे से ही भाप गया ।

वह चुपचाप हाथ बांधकर बैठ गया ।

"बेंजो । तुमने कत्ल कैसे किया था ?” उसने पूछा ।

'कत्ल ! हाँ, मुझे याद है मास्टर मैंने उसे कुल्हाड़ी से मारा था । उसके हाथ में अचानक बन्दूक न आती तो मैं कुल्हाड़ी लेकर उसकी गर्दन नहीं उड़ाता । मैं उसे घूंसों से मारना चाहता था ताकि मैं उसे तड़पता फिरता देख सकूं मगर अफसोस मैं उसपर एक ही घूंसा जमा पाया । उसने बन्दूक उठा ली लेकिन वह सेफ्टीकेच हटाने से पहले ही गर्दन कटा बैठा ।"

“उसका गुनाह क्या था ?"

"वह मेरी बहन को भगा कर ले गया था।" उसके चेहरे पर क्रोध आ गया, "मास्टर क्या आप सारी कहानी पूछेंगे ?"

"नहीं, मैं यही जानना चाहता था । तुम जैसा आदमी पेशेवर हत्यारा, पैसे का लालची नहीं बन सकता । कोई बड़ी बात ही रही होगी, जो तुम कत्ल करने के लिये प्रेरित हो गये। आगे की कहानी मैं नहीं पूछूंगा । मैं तुम्हें सिर्फ इतना बता देना चाहता हूं कि अगर मैं कुछ बुरा काम करूँ तो तुम समझ लेना कि मेरे पास बुरा काम करने के लिये तुमसे ज़्यादा बड़ी प्रेरणा मिली है। युद्ध यदि शुद्ध मानसिक वातावरण लेकर लड़ा जाये और मन में किसी प्रकार की दुविधा न हो तो युद्ध में शत्रु को विचलित करके पराजित कर देना आसान हो जाता है। गई रात को मैंने अकेले जोखिम उठाया है, मैं किसी को उसमें शामिल नहीं करना चाहता था, क्योंकि इस पहले कदम में यदि मैं चूक जाता तो मेरी मौत तय थी और सफल रहता तो मैं दुगने उत्साह के साथ जुट जाता। अब मेरे अन्दर दुगना उत्साह है। मैंने उसे एक चोट दे दी है, जिस कारण वह गलतियाँ करेगा और प्रत्येक गलती उसे अनिश्चित दलदल की ओर ले जायेगी ।"

बेंजो पत्थर के बुत की तरह खामोश था क्योंकि समझ में नहीं आ रहा था, मास्टर कहना क्या चाहता है ?

“इसलिये दोस्त बेंजो । आज के बाद इस बच्चे की सुरक्षा करना तुम्हारा फर्ज़ है, यदि इस बारे में जान लेनी या देनी पड़े तो समझ लेना तुम्हारे पास इसके लिये बहुत बड़ी प्रेरणा है। तुम्हारे लिये एक राइफल मैंने पहले ही ले रखी है। मैं जानना चाहता हूं कि तुम उसे चला सकते हो या नहीं ?"

"राइफल चला सकता हूं, परन्तु मुझे उससे अधिक अपने बाजुओं पर भरोसा रहता है । राइफल का कारतूस मिल तो सकता है पर मेरे

हाथ का वार नहीं... फिर भी दूर के लिये राइफल उपयुक्त है ।" या

"लोग इस बच्चे को फ़रिश्ता समझते हैं। आह ! उसने अपने पांवों पर खुद कुल्हाड़ी मारी है। अब यही बच्चा उसके विरुद्ध खुद प्रचार करेगा। पहले आदिवासियों को उसके विरुद्ध करना होगा, इसके लिये बच्चों को कुछ ऐसी बाते बतानी होंगी। जिससे वह लोगों को प्रभावित कर सके । आग का करिश्मा उसके हर बयान को ईश्वर का बयान

करिश्मा उस साबित कर ही देगा ।"

"क्या आप इसे चौरंगी बाबा के विरुद्ध इस्तेमाल करेंगे ?"

“हाँ, यह उसके लिये सबसे घातक शस्त्र होगा ।"

"ओह, इसका मतलब यह हुआ कि हमारा एक योगी पुरुष से मुकाबला है जिसके भक्त दुनिया भर में फैले हैं ?"

"बेशक, इसलिये मैं तुम्हें बता देना चाहता हूं कि बच्चे की सुरक्षा करना कितना जोखिम भरा काम है ।"

"जोखिम तो तब हो जब, बच्चे को किसी प्रकार का खतरा हो । उस सन्यासी से किसी को खतरा ही क्यों हो सकता है ?"

“मुझे उम्मीद थी कि उसके बारे में तुम्हारे यही विचार होंगे, इसलिये मैंने तुम्हें कुछ राज़ की बातें बताने का फैसला किया है। कहीं तुम अत्यधिक शक्तिवान होने के बावजूद भी कुत्ते की मौत न मारे जाओ ।

"आप निश्चिंत रहिये मास्टर ! मैं कुत्ते की नहीं बहादुरी की मौत मरना पसंद करता हूं । पर आपके लिये मैं किसी का भी कत्ल कर सकता हूं

"मैं तुम्हें निर्भीक होकर मैदान में भेजूंगा, इसके लिये मुझे चौरंगी की

असलियत से पर्दा उठाना होगा। सुनी और गोर से सुना ताकि अगर म मर भी जाऊं तो तुम यह लड़ाई जारी रखोगे । यह लड़ाई धर्म की लड़ाई है, इंसानियत की लड़ाई है, जो हर उस आदमी तक लड़ी जायेगी जो मेरे संपर्क में आता रहेगा ।"

वह बार-बार मुट्ठियाँ भींच रहा था, इससे स्पष्ट पता चलता था कि वह उत्तेजित हो गया है। उसने चौरंगी बाबा की खाल उतारना शुरू कर दी ताकि बेंजो को इस नकली खाल के भीतर छिपी भेड़िये की असली सूरत साफ नज़र आ सके ।
 
बरसों से मठ में ऐसी अशोभनीय घटना नहीं घटी थी। चौरंगी बाबा ने इस दुर्व्यवस्था के लिये महामाया को फटकार दी और उसे चुनौती दी कि चौबीस घंटों के अन्दर चन्द्र बेताल को सामने उपस्थित हो जाना चाहिए। साथ ही इस कृत्य को करने वाला अपराधी भी ज़िंदा या मुर्दा मिल जाना चाहिए। ज़िंदा या मुर्दा का अर्थ यह था कि इस मकसद के लिये महामाया अपने कातिल दस्ते को भी लगा सकता है ।

महामाया के पास दो जासूस कुत्तों की भी व्यवस्था थी । वह तुरंत खोज बीन में लग गया। उसने स्वयं जाकर घटनास्थल देखा, फिर कुत्तों को कुंड में ले गया । चन्द्र बेताल के वस्त्र सुंघाए, उसके बाद कुत्तों को उत्तरी द्वार पर ले गया ।

जंगल में पहुँचते ही वह घोड़े पर सवार हुआ और कुत्तों के पीछे-पीछे दौड़ पड़ा। जंगल में कातिल दस्ते के चार आदमी चप्पा-चप्पा छान चुके थे। एक घुड़सवार उसे रास्ते में मिला जो साथ हो लिया ।

“हैरत है महाराज । उस रात मैं भी यहाँ था। आखिर भूत-प्रेत या जिन्नात तो था नहीं। हमने निकासी पर नाकाबंदी भी की थी।"

“फिर भी वह निकला तो है ही ?" महामाया ने कहा - "बेवकूफी वाली बात मत करो। अभी पता लग जाता है कि उसने तुम लोगों को कैसे मूर्ख बनाया है । तुमसे अधिक होशियार ये कुत्ते हैं।"

वह निरुत्तर होकर रह गया ।

कुत्ते जंगल में सूंघते-दौड़ते एक स्थान पर पहुँचे। उस जगह पर पहुँचते ही महामाया के साथ आ रहा सवार चौंका । उसे अहसास हुआ कि सचमुच वह लोग मूर्खता कर बैठे थे ।

महामाया ने उस पर उड़ती निगाह डाली । वह बगलें झाँकने लगा ।

अब तुम कहोगे कि हम ऐसा सोच भी नहीं सकते थे।"

"नदी का जल बर्फ जैसा शीतल है।" वह बड़बड़ाया - "रात के अँधेरे में कोई आदमी यह रिस्क कैसे ले सकता है ? एक तो ठण्डा पानी, ऊपर से नुकीले पत्थर ।"

"बर्फ वहाँ नहीं बल्कि तुम लोगों के दिमाग पर जम गई है। जहाँ नोकदार पत्थर भी बज रहे हैं। मैं इस पानी में पांच घंटे तैर कर दिखा सकता हूं बेवकूफ । इसकी धारा के रुख पर तैरना तो और भी आसान होगा। दूसरा मतलब यह हुआ कि दृढ़ विश्वासी और निर्भीक होना चाहिये । उसे अपनी ज़िन्दगी का कोई मोह नहीं होगा, तभी तो वह इतने हैरतंगेज़ करिश्मे कर पाया । परन्तु अपनी पहचान का उसने न तो कोई निशान छोड़ा, न कोई सुराग, बहरहाल वह नदी में कूदा था और नदी मीलों दूर तक बहती है। आगे कुत्ते काम नहीं कर सकते । सुना तुमने ? उसका इरादा सड़क पर पहुँचना था जो यहाँ से अधिक दूर नही... हमार आदमा कर क्या रह ह ?

" आदिवासी गाँवों में देखते फिर रहे हैं ।"

"अगर वह सड़क पर पहुँचना चाहता है तो उसने आदिवासी गाँवों का रुख ही नहीं लिया होगा । वह यहाँ से दूर भाग जाने का प्रयास करेगा क्योंकि उसे हमारी शक्ति का अंदाज़ा है। अरे मैं यह क्यों भूल गया कि वह इतना सतर्क और चालाकी से कैसे काम कर गया । क्या उसे यहाँ के भेद ज्ञात हैं ? और नहीं तो क्या । कोई अनजान आदमी ऐसा खेल नहीं खेल सकता । क्या मन्दिर का उत्तरी द्वार रात्रि के समय बन्द नहीं रहता ?"

"वह भीतर से बन्द रहता है ।" जवाब मिला ।

"आया किस रास्ते से था ?"

"पता नहीं । यह भी हो सकता है कि वह दिन में ही वहाँ छिप गया हो । मन्दिर के भीतर पहुँच जाना इतना मुश्किल काम तो नहीं । अनाड़ी भी आ सकता है ।"

"लेकिन अनाड़ी सुरंग का रास्ता कैसे पायेगा ?" महामाया बड़बड़ाया - "खैर मैं देखूंगा कि उसने सुरंग का रास्ता कैसे पा लिया था। तुम लोग सड़क के दायें-बायें पड़ने वाली आदिवासियों की बस्ती छान डालो । यदि उसने किसी वाहन का इस्तेमाल नहीं किया होगा तो वह यहीं कहीं छिपा होगा ।"

इतना कहकर महामाया मन्दिर की ओर पलट पड़ा । जो शंका उसके मस्तिष्क में उत्पन्न होती थी, वह निर्मूल नहीं होती थी । वह इस बारे में सोच रहा था कि जब उक्त घटना घटी मन्दिर में कौन-कौन मौजूद था । भीतरी सहयोग के बिना वह आदमी इतना करतब नहीं दिखा सकता । इतना साहस किसमें है कि वह दिन के उजाले से ही मन्दिर में बैठ जाये और फिर उसे खुफिया रास्ते की जानकारी कैसे हुई ? उसे यह भी ज्ञात था कि उस समय सुरंग का पहरेदार जल्लाद सोने चला जाता है । पर वह इस बात को नहीं जानता था कि कुंड द्वार का हैंडल गुप्त मार्ग से जुड़ा है। यदि उसे इस बात का भी पता होता तो इस घटना का सिरा तलाश कर पाना भी कठिन होता

मन्दिर में उसका सहयोगी कौन है ? क्या कोई पुजारी ? इससे पहले रोहताश पुजारी रहता था, जो कि अब इस दुनिया में नहीं है ।

वह इसी उधेड़-बुन में फंसा वापिस लौटा और जाँच कक्ष में बैठ गया । ऐसे किसी पर संदेह करना जायज़ नहीं था । वास्तु स्थिति की जानकारी के लिये एक-एक की जाँच करनी होगी, अगर कोई उस धूर्त का सहयोगी निकला तो मालूम करना कोई कठिन काम न होगा ।

क्योंकि वह सम्मोहन क्रिया का प्रयोग कर सकता है, जिसके आगे सच्चाई को छिपाया नहीं जा सकता । यदि कोई मजबूत इंसान हो तो उसे दवाइयाँ खिला कर अर्ध निद्रा में पहुँचा कर सम्मोहन में लाया जाता है । सम्मोहन के बड़े-बड़े करतब उसने देखे थे । चौरंगी बाबा इस कला का महान ज्ञाता था, यदि बात उसके वश में न होती तो वह बाबा के सामने कर देता। जिन लोगों के मन में चोर होता है, उनका मस्तिष्क और दिल भीतर से कमज़ोर हो जाता है और ऐसे लोगों पर सम्मोहन बहुत जल्दी हो जाता है । उसके पास सच्चाई जानने के लिये बहुत से तरीके हैं। इस मामले में वह चौरंगी बाबा को परेशान नहीं करना चाहता था ।

उस रात मन्दिर में जितने भी आदमी थे उसने एक के बाद एक सभी को अलग-अलग कमरों में बन्द कर दिया । उनमें से प्रत्येक यहीं जानता था कि केवल उसे ही बन्द किया गया है। अपराधी को मानसिक रूप से कमज़ोर करने का यह पहला हथियार था । वह उसे अधिक से अधिक सोचने पर मजबूर कर देना चाहता था । यदि उनमें से कोई मठ का अपराधी था, तो निःसंदेह वह एक घंटे में काफी निर्बल हो जायेगा ।

परन्तु उसे इसमें सफलता नहीं मिली ।
 
थोड़ी देर बाद ही उसे सूचना मिली, मन्दिर में सफाई करने वाले नौकर की अचानक मृत्यु हो गई है । वह जिस कमरे में बन्द था उसी में मरा पाया गया, फिर वह इस मठ में आठ साल पुराना है, क्या वह सहयोगी था ?

महामाया योगी इस निश्चय पर नहीं पहुँच पाया कि उसने आत्म- हत्या की थी या किसी ने सफाई से उसका कत्ल कर दिया। परन्तु वह इस निश्चय पर अवश्य जा पहुँचा कि नौकर के सहयोग से ही वह घटना घटी थी । उसका रास्ता एक बार फिर अवरुद्ध हो गया । उसने तुरंत नौकर के कमरे की तलाशी लेने के लिये आदमी भेज दिया ।

परन्तु वहाँ से कोई प्रमाण नहीं मिला ।

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आग। आग । आग... "

सारी बस्ती में चीख पुकार मची हुई थी। यह आदिवासियों की बस्ती के मुखिया का घर था, जो धूं-धूं करके जल रहा था । आदिवासियों ने आग बुझाने का भरपूर प्रयास किया परन्तु आग काबू नहीं आ रही थी । मुखिया और उसका सारा परिवार बदहवास था । वे लोग आग जलने से पहले ही बाहर निकल आये थे और अन्य लोगों को आग बुझाने से रोक रहे थे ।

लोगों ने उन्हें पागल समझा ।

"सुनो सुनो भाइयों। फरिश्ता आग में नहा रहा है। उसका क्रोध मुझ पर है। मैं सज़ा का भागीदार हूं इसलिये मेरे झोंपड़े को नष्ट होने से न बचाओ । वरना मुझे भारी दंड सहना पड़ेगा ।"

जब कोई न माना तो मुखिया के तौर पर उसने पीछे हट जाने का आदेश दिया ।

"तुम लोग मुझे पागल समझ रहे हो, थोड़ी देर में आग का फरिश्ता बाहर आएगा, तब तुम्हें मेरी बात पर यकीन होगा ।"

मुखिया के बच्चे रेंग रहे थे और बीवी बेसुध पड़ी थी ।

मुखिया बार-बार झोंपड़े की तरफ हाथ जोड़कर दंडवत करता और अपने पापों के लिये क्षमा मांगने लगता ।

अचानक वे लोग स्तब्ध रह गये ।

किसी ने चीख कर कहा - "यह देखो दरवाज़े पर ।"

दरवाज़े के बीच जलती आग के साये में चन्द्र बेताल खड़ा था । आदिवासियों के मुंह से हृदयविदारक चीखें निकली। आग बुझाने वाले हाथ रुक गये और एक शोर सा उमड़ पड़ा। फिर मुखिया के कहने पर वे लोग शांत होने लगे ।

"देखो - मैं कहता था न वहाँ फरिश्ता स्नान कर रहा है। उसने मेरी विनती सुन ली और पापों को क्षमा कर दिया। तुम लोग भी अपने पाप कर्मों की क्षमा माँगो, वरना सारा गांव मारा जायेगा ।"

"अरे यह तो सचमुच वही फरिश्ता है, इसने बाबा की भूमि को पवित्र किया है।" कोई बोला ।

“हाँ वही है । लेकिन यह हमारे गांव में कैसे आया ?"

किसी ने लम्बे लेटकर प्रणाम करने के लिये कहा और उसने वैसा ही किया ।

अचानक चन्द्र बेताल की तेज़ फरफरी आवाज़ उन्हें सुनाई दी ।

“मुखिया बिंदों, अपने इन पुत्रों को मेरा सन्देश सुना दें... मैं इस धरती पर पाप का समूल नाश करने आया हूं । सुना दे मेरा सन्देश । तुम्हें मैंने माफ करके अपना पुत्र मान लिया ।"

मुखिया उठ खड़ा हुआ । उसके चेहरे पर भय की छाया तैर रही थी, फिर भी वह इस बस्ती का मुखिया था । वह जानता था कि जैसा वह हुक्म देगा, वैसा ही होगा, अब वह फरिश्ते का पुत्र है इसलिये उसकी आज्ञा मानना उसका परम कर्तव्य है ।

"मेरे साथियों... मेरे बच्चों..." वह ऊंचे स्वर में बोला, “हमारी यह बस्ती एक पाखंडी के कारण पाप से दूषित हो गयी है। वह पाप का घड़ा भर चुका है इसलिये फरिश्ते को स्वयं यहाँ जन्म लेना पड़ा और उसका सन्देश है कि हम पापी का कहा न मानकर उसके विरुद्ध युद्ध लड़ें अन्यथा पाप के साये हमारी बस्तियों का सर्वनाश कर देंगे और हम में से कोई भी जीवित नहीं बचेगा। एक दिन चारों तरफ आग ही आग होगी और हम सब उसमें जलकर राख हो जायेंगे ।"

"हम उस पापी के टुकड़े-टुकड़े कर देंगे।" आदिवासी बोले- "कौन पी के टुक है वह पापी ?"

"सुनकर तुम लोगों के पैरों तले ज़मीन सरक जायेगी । परन्तु हमें हिम्मत नहीं हारनी है। हमें सभी लोगों तक फरिश्ते का सन्देश पहुँचाना है ताकि यह धरती पवित्र बन सके, अब मैं तुम्हें इस पापी का नाम बताता हूं। वह पापी है 'चौरंगी बाबा' ।"

चौरंगी बाबा का नाम लेते ही उसकी ज़बान काँप गई। आदिवासियों का जोड़ा भी एकाएक ठण्डा पड़ गया । वह आपस में धीरे-धीरे कानाफूसी करने लगे ।

"मैं जानता हूं किसी पापी का अंत इतना सरल नहीं होता । यदि ऐसा होता तो फरिश्तों को इस भूमि पर अवतार लेकर न उतरना पड़ता ।" चन्द्र बेताल ऊंचे स्वर में बोला - "रावण को भी लंका के वासी देवता मानते थे, उसे कितनी सिद्धियां प्राप्त थीं, परन्तु उसको नष्ट करने के लिये भगवान राम को अवतार लेना पड़ा। क्योंकि रावण का अंत सरल न था और वह देवताओं की तरह पूजनीय था । जब रावण जैसा विद्वान पापी हो सकता है तो क्या यह अदना सा चौरंगी बाबा नहीं हो सकता ? यदि तुम लोग डरे तो सब का अनिष्ट होगा । जो भी इस नेक काम में हाथ बटाएगा वह स्वर्गिक सुख पायेगा । बच्चों मेरा सन्देश तुम तक पहुँच गया। अब मैं जाता हूं। तुम्हें अपना भला बुरा स्वयं सोचना है ।"

इतना कहकर चन्द्र बेताल आग के अन्दर चलता हुआ गायब हो गया । आग के अन्दर सुरक्षित रहने की इस अलौकिक शक्ति के बारे में वह कुछ भी नहीं जानता था । पर जो कुछ वह अनुभव करता था उससे ऐसा लगता था जैसे वह आम इंसानों जैसा नहीं है ।

इस क्यों का जवाब उसके पास भी नहीं था ।

ज्यों-ज्यों उसका शरीर विकसित होता जा रहा था उसकी बुद्धि भी सोचने समझने लायक होती जा रही थी। उसके बाजुओं में बल आने लगा था उसका दिल चाहता था कि वह हाथों का उपयोग ऐसे किसी काम पर करे जिसे आम इंसान न कर पाए ।

उसके हाथ मचलने लगे थे ।
 
जब वह अपना जादू दिखाकर झोंपड़े के पास पहुँचा तो वहाँ बेंजो उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। नजदीक ही झुरमुट में एक ऊंचे कद- काठी वाला अरबी नस्ल का घोड़ा खड़ा था, जिसकी कलेजी जैसी रंगत अन्धकार में सिमटी हुई थी । यदि बेंजो उसे झुरमुट से बाहर न निकालता तो किसी को उसकी उपस्थिति का आभास भी न हो पाता ।

यह घोड़ा दो रोज़ पहले धनंजय लेकर आया था। वह काफी चतुर और मालिक के प्रति वफादार मालूम पड़ता था । वह अशिक्षित और जंगली स्वभाव का नहीं था। मालिक के हलके इशारे को भी समझ लेता था ।

बेंजो चन्द्र के साथ घोड़े पर सवार हुआ और राइफल छिपाता हुआ जंगल की ओर बढ़ चला । आदिवासियों के गांव में अब भी स्तब्धता छाई हुई थी, शायद उनका अंतिम निर्णय हो रहा था ।

यह पहला करिश्मा था, धनंजय को इसका परिणाम देखे बिना ऐसी गतिविधियाँ तेज़ करके सारे वातावरण में चौरंगी के प्रति ज़हर भर देना था । इन्हीं आदिवासियों के कारण वह अपने को कितना सुरक्षित

समझता था ।

दुनिया जो समाचार चारों तरफ से मिलने शुरू हुए, उसने चौरंगी बाबा को हिलाकर रख दिया । आदिवासी गांवों में बगावत हो रही थी और चिंगारी कभी भी मठ की तरफ लपक सकती थी । उसके आदमी अभी तक नाकाम ही रहे थे।

और यदि वे किसी आदिवासी गांव में चन्द्र बेताल को देखकर हमला भी करते तो समस्या और भी गम्भीर हो जाती । इस प्रकार खुलेआम हत्या कर देने की इजाजत चौरंगी बाबा ने नहीं दी थी, इससे उसकी रही सही प्रतिष्ठा भी समाप्त हो जाती और आदिवासियों का क्रोध संभाल पाना उसके बलबूते से बाहर हो जाता । वह किसी ऐसी तरकीब से काम लेना चाहता था, जिससे साँप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे ।

अचानक उसे याद आया कि उसके पास तुरुप का इक्का है । अभी तक उसे विनीता का ध्यान ही नहीं आया था, जिसे उसने इन दिनों दूसरे आश्रम में भेज दिया था। वह आश्रम स्त्रियों के लिये खोला गया था और कुछ सुंदरियाँ आश्रम की देखभाल कर रही थीं। उन्हीं सुन्दरियों में विनीता भी थी ।

विनीता अब पूरी तरह उसके चंगुल में थी और ऐसी न जाने कितनी सुन्दर स्त्रियाँ थीं जो उसके एक इशारे पर अपना सबकुछ न्यौछावर कर सकती थीं । चौरंगी बाबा की यही विशेषता थी । रूप का ढाल बनाकर उसने बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों को चित कर दिखाया था । जिसने उसके चरण छूने में आनाकानी की उसके गले में ब्लैकमेलिंग का फंदा डाल दिया । वह बड़े-बड़े नेताओं का राजगुरू था और इससे बड़ी बात यह थी कि उसे ईश्वर के रूप में प्रचारित किया जा रहा था ।

ऐसे में कोई उसे पाखण्डी सिद्ध कर दे तो उसके सारे किये कराये पर पाना फिर सकता था । बहुत स शत्रु मुह उठा सकत थ और जिन्ह वह ब्लैक मेल करके किसी-न-किसी तरह दबाये हुए था वे अवसर का लाभ उठा सकते थे। इससे पहले कि यह समाचार शहरों तक पहुँचकर कोई बवाल मचाये वह तुरन्त इसका हल खोजना चाहता था ।

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यदि कोई फौज से उसपर हमला कर देता तो वह इतना न डरता पर बेताल के बेटे का यह करिश्मा उसके लिये टैंक तोपों से भी बढ़कर था । उसे अपनी मूर्खता पर क्रोध आया तब उसने एक गंदे छोकरे को फरिश्ता का हव्वा बनाकर पेश किया था। अब यह उसी की करनी का फल था ।

मुसीबत यह थी कि उसे मारा भी नहीं जा सकता था, शायद उससे बदला लेने वाला यह चाहता हो ।

उसने इस काम के लिये महामाया को पीछे हटाया और विनीता को बुला लिया । चन्द्र बेताल के लिये उसकी माँ तुरुप का इक्का साबित हो सकती थी । यदि चन्द्र बेताल को फरिश्ते का नाटक जारी रखना है तो वह अपनी माँ का अपमान कभी नहीं करेगा ।

विनीता उसे आसानी से प्राप्त कर सकती थी ।

दो दिन तक उसने अपनी अदृश्य शक्तियों का आह्वान किया । इस मामले में वह न तो कोई करिश्मा दिखा सकता था न अपनी सफाई । उसका ज्योतिष भी कारगर साबित नहीं हो रहा था । चन्द्र बेताल पर अलौकिक छाया है उसपर ऐसी किसी विद्या का प्रभाव नहीं पड़ सकता था । उसे केवल दिशा का आभास था, वह महसूस करता था कि वह इसी क्षेत्र में है, पर कहाँ ? सारे जंगल । घाटियाँ। गुफाएं । चट्टानें। ज़र्रे सब छान लिये गए थे उसके आदमी एक ही दिशा में बढ़ रहे थे । उन्हें आदेश था कि वह एक - एक इंच छानकर चलें, परन्तु चन्द्र बेताल कहाँ था ? वह तो हवा बना हुआ था ।

दो दिन बाद विनीता आई, उसने हमेशा की तरह चौरंगी बाबा को चरणामृत पेश किया और दासी की तरह शीश झुका कर बैठ गयी । चौरंगी बाबा के सामने एक सम्मोहित कर देने वाला वातावरण होता था और उससे नज़रें मिला पाना हंसी खेल नहीं था । उसकी आँखों में कभी बिजली की चमक का आभास होता तो कभी अंगारे दहकते प्रतीत होते । वह नज़रें और वाणी से ही किसी का ब्रेनवाश कर देने की क्षमता रखता था । वह शरीर पर भगवा दुशाला लपेटे रहता और नीचे मृगछाला धारण किये रहता था। उसके कंठ और कलाइयों में मालाएं लिपटी होती थीं । जो बिलकुल पतले सर्प जैसी नज़र आती थीं ।

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वह अपनी आयु एक सौ दस वर्ष की बताता था परन्तु उसकी दाढ़ी और सर का एक भी बाल सफेद नहीं हुआ था। उसके चेहरे पर नौजवानों जैसी चमक रहती थी ।



जब उसके सामने विनीता को प्रस्तुत किया गया तो वह पूरी तरह इस समस्या का हल खोज चुका था । माँ के द्वारा बेटे का कत्ल । यह एक आसान तरीका था जिसमें साँप भी मर जाता और लाठी भी न टूटती । इस प्रकार उसे अपने मुख्य दुश्मन तक पहुँचने में भी सफलता मिल जाती । जब तक वह छिपा है तभी तक सुरक्षित है जिस दिन उसका मुखौटा सामने आ जायेगा वह उसका आखिरी दिन होगा ।

"तुम्हारा बेटा मिल गया है।" वह धीमे स्वर में बोला- मैं जानता हूं अपने बेटे के लिये तुम कितनी दुःखी हो। इसी ग़म में तुम्हारा पति पागल अवस्था में कहीं चला गया । उस वक्त मैंने यह सब बताना

मुनासिब नहीं समझा। इसस तुम्हारा भावष्य प्रभावित हो सकता था

"आपकी दया दृष्टि से कुछ भी छिपा नहीं है। मैं तो आपके चरणों की दासी हूं । इस दुनिया में कैसा भी दुःख मुझे परेशान नहीं कर सकता । आपकी छत्र-छाया में कौन दुखी होगा भला ?"

“परन्तु एक माँ का बच्चा गुम हो जाये तो?"

"वह आपकी दृष्टि से ओझल नहीं हो सकता और जब तक आपकी दृष्टि में होगा सुखी रहेगा । वह इस मठ में जन्मा पुत्र है इसलिये मैं अकेली ही उसकी माता नहीं, वह मठ पुत्र है जिसकी रक्षा करना मेरा नहीं मठाधीश का कर्तव्य है । वह तो आपकी सन्तान है महामन ।"

“और यदि कोई मठ पुत्र कुपुत्र साबित हो जाये ?"

“तो उसे मठ में रहने का कोई अधिकार नहीं ।"

"

और यदि वह मठ के बाहर रहकर हम सबके लिये मुसीबत बन जाये तो ?"

'आप कहना क्या चाहते हैं महामन ?”

“सुनो ब्रह्म कन्या । वह तुम्हारे गर्भ से जन्मा पुत्र है, चूंकि जन्म से तुम्हारा ही उसपर पूर्ण अधिकार रहा है इसलिये उसकी जिन्दगी की स्वामिनी भी तुम ही हो। तुमने वह पुत्र मठ को दान किया परन्तु तुम्हारा वह खून इस योग्य नहीं निकला वह किसी राक्षस के सिखाये में आकर मठ को हानि पहुँचाने में आमादा है ।"

"वह बच्चा ?"

"वह बच्चा नहीं रहा, शैतान का बच्चा हो गया है। तुम जानती हो तुमने अपने गर्भ से किस पाप को धरती पर भेज दिया है। तुम सब जानती हो इसलिये तुम्हें कुछ बताने की ज़रूरत नहीं है। वह बेताल है और हमेशा बेताल रहेगा मनुष्य कभी नहीं हो सकता । जीवित रहने के लिये उसे एक दिन नरभक्षी भी बनना पड़ेगा, उसे सिर्फ दूसरों का रक्त जीवित रख सकेगा, ऐसी स्थिति में वह शैतान नहीं है तो क्या है ? तुम्हें चाहिए था कि पैदा होते ही उसका गला घोट देती ।"

"जी! पर मुझे क्या पता था! अगर आप मुझे यह सब पहले बताते तो मैं कभी का उसे खत्म कर देती । मेरे पास उसके लिये कोई ममता नहीं है ।"

चौरंगी बाबा उसके मुंह से यही शब्द कहलवाना चाहता था । इसलिये उसने इतनी घुमा फिराकर बात की थी। किसी की मृत्यु का आदेश वह सीधा नहीं देना चाहता था ।

"काश कि ऐसा हो सकता। मुझे उस समय खबर नहीं थी ।" चौरंगी बोला - " अब वह कहीं जंगल की गुफाओं में छिपा है और वह इंसानों का खून पीने के लिये बड़ा होता जा रहा है । परन्तु अभी उसमें भय है इसलिये एक राक्षस उसका साथ दे रहा है। बुराई को विकसित करने के लिये शैतानी शक्तियां तुरंत उपस्थित हो जाती हैं।"

"क्या मैं उससे मिल नहीं सकती ?"

“हाँ, इसलिये मैंने तुम्हें बुलाया है ताकि तुम एक ब्रह्मकन्या का कर्तव्य निभाकर अपने पुत्र की बुराई जड़ से खत्म कर सको । मेरे लिये एक माँ की ममता की भी परीक्षा होगी ।"

“बुराई किसी रूप में भी क्यों न हो, उसे मिटाना हमारा कर्तव्य है, इसके लिये माँ की ममता आड़े नहीं आ सकती ।"

तो जाओ ब्रह्मकन्या हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है, महामाया तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।"

"जो आदेश महामन ।" वह एक बांधी की तरह दोनों हाथ बांधे झुकी और उसी स्थिति में पीछे की तरह हटती चली गई। कुछ देर बाद ही वह महामाया के कक्ष में थी । महामाया के जासूसों ने खबर दी थी कि आदिवासी गाँवों के छोटे-बड़े मुखिया किस गुप्त स्थान पर मीटिंग कर रहे हैं। यह सारे मुखिया बाग़ी हो चुके हैं। निश्चय ही गुप्त स्थान पर मुखिया लोगों के बीच दुश्मन के उपस्थित रहने की भी संभावना है । अगले रोज़ स्थानीय देवी का मेला था। इस मेले में हर बार चौरंगी बाबा को देवता स्थल पर बैठाया जाता था परन्तु इस बार चौरंगी बाबा को नहीं बुलाया जा रहा था । वहाँ भी चन्द्र बेताल के आने की सम्भावना थी । किन्तु चन्द्र बेताल कहाँ किस समय प्रकट होगा कहा नहीं जा

सकता था I

महामाया योगी के पास एक योजना थी । इस प्रकार चन्द्र बेताल को सामने आना ही पड़ता ।

"तुम्हें इन आठों मुखियाओं के पास फरियाद लेकर जाना है, तुम अपने बेटे की तलाश में मारी-मारी फिर रही हो। तुम मठ छोड़कर आ गई हो ।"

इस प्रकार जब तुम जोगिन बनकर इन गाँवों में घूमोगी तो उसे तुमसे संपर्क करना ही पड़ेगा। तुम आदिवासियों के देवी पूजन मेले में भी जाओगी। हर किसी से अपने बेटे का पता पूछोगी । बस तुम्हारा काम फिलहाल इतना ही होगा। तुम्हारा बेटा तुम तक पहुँच जायेगा ।"

विनीता आज्ञा लेकर लेकर चल दी।

उसने भैरवी का रूप धरा और आदिवासी गाँवों की ओर आवागमन कर गई । महामाया प्रसाद ने इस बात का पूरा इंतज़ाम किया था कि वह जहाँ भी जाये, पूरी तरह नज़रों में रहे, उसने कुछ आदिवासियों को खरीद लिया था, यह लोग गुप्त रूप से उसके लिये काम कर रहे थे इस बार वह चारों तरफ से मजबूत जाल फेंकना चाहता था ।

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घोड़े की हिनहिनाहट का स्वर सुनते ही बेंजो की आँख एक दम खुल गई । उसकी निद्रा ही ऐसी थी, सोते हुए भी वह जागरूक रहता था । इसी कारण हल्की आहट से ही वह जाग जाता था । जब से उसके कंधे पर चन्द्र बेताल का भार पड़ा था । वह और भी सतर्क हो गया था ।

अरबी घोड़ा किसी छाया को देखते ही या रात बे-रात आहट सुनते ही हिनहिनाने लगता था । परिचित की आहट और छाया को पहचानने के बाद वह शांत हो जाता था इसके अलावा खुर पटक-पटक कर आसमान सर पर उठा सकता था। वह खुद भी चौकीदार था । न जाने उसका मालिक उस शानदार घोड़े को कहाँ से खरीदकर लाया था ।

बेंजो अपने रहस्यमयी मालिक के बारे में कुछ भी नहीं जानता था । उसके पास पैसा कहाँ से आता है ? उसके लिये कितने आदमी काम करते है ? और यह मकान उसने किस उपयोग के लिये बनाया है ? वह इस बारे में कुछ नहीं जानता था, परन्तु यह बात वह अच्छी तरह जान चुका था कि मास्टर पाखण्डी चौरंगी से बदला ले रहा है, क्योंकि चौरंगी ने उसका परिवार नष्ट किया है। यह जानकार उसे बड़ा आश्चर्य हुआ था कि चौरंगी संसार का दुष्टतम व्यक्ति है, ऐसे व्यक्ति को मार देना ही उसकी सज़ा नहीं बल्कि इसे ऐसी स्थिति में छोड़ देना चाहिए जो न वह

जी सके न मर सके ।

धनंजय ने उसका सुरक्षा गढ़ तोड़ दिया था, जो आदिवासी उसके लिये मजबूत किले का काम करते थे, वह सब उसके विरोधी बन चुके थे । देवी पूजन के बाद बाकायदा वह लोग मठ पर हमला बोलने वाले थे ।

एक गुप्त स्थान पर उनके मुखियाओं की अंतिम मीटिंग होनी थी । यदि यह मीटिंग ठीक से चली तो देवी के पूजन वाले दिन फरिश्ते के सामने बलि चढ़ाकर वे लोग शपथ ले लेंगे, उसके बाद मठ वासियों को भूमि खाली करने का अल्टीमेटम दे दिया जायेगा । अब चिंगारी को हवा देना ही शेष रह गया था । धनंजय मुलक्कड़ बाबा के रूप में उसकी जासूसी कर रहा था ।

देवी पूजन की रात तक उसे बेहद चौकस रहना था । इस रात तक चन्द्र बेताल की रक्षा का सारा भार उसके कन्धों पर था, इसलिये जब उसने घोड़े के हिनहिनाने का स्वर सुना तो वह एक दम उछलकर खड़ा हो गया। अँधेरे में ही उसने दीवार पर टंगी राइफल खींची और खिड़की के पास जा पहुँचा । उसने खिड़की का पर्दा हटाया । बाहर चाँदनी रात फैली थी। इस धूमिल से उजाले में फाटक तक का दृश्य साफ नज़र

आता था ।

और उसकी निगाह फाटक पर थी ।

फाटक के पास घोड़ा खड़ा था ।

फिर एक छोटी सी छाया प्रकट हुई। फाटक खुला और वह छाया सावधानी के साथ घोड़े की पीठ पर सवार हो गई । घोड़ा धीमी चाल चलता हुआ फाटक पार कर गया । उसकी समझ में नहीं आया कि यह कौन था, जो घोड़ा चुराये ले जा रहा था और क्या उस घोड़े को चुराना इतना आसान था ? अजनबी आदमी तो उसकी पीठ पर हाथ भी नहीं

रख सकता था।

फिर कौन से सम्मोहन में बंधा घोड़ा बाहर निकल गया था ?

ताड़ के वृक्षों की ओट में जाकर घोड़ा ओझल हो गया था। बेंजो चौंका। वह तेज़ी से मुड़ा और बराबर वाले कमरे में जा पहुँचा । उसके हाथ में टॉर्च आ गयी। उसने टॉर्च से उजाला किया। जिस बिस्तर पर उसने प्रकाश डाला था, वह खाली पड़ा था। फिर प्रकाश सारे कमरे में घूम गया, परन्तु चन्द्र बेताल कहीं नज़र नहीं आया ।

बेंजो के पांवों तले ज़मीन सरक गई ।

उसने जल्दी-जल्दी सारी इमारत देख डाली । चन्द्र बेताल का कहीं पता नहीं था । वह रोड की तरफ दौड़ पड़ा। उसने वह स्थान देखा जहाँ घोड़ा बंधा रहता था। टॉर्च का उजाला ज़मीन का निरीक्षण कर रहा था । वहाँ धूल और मिट्टी पर छोटे नंगे पांवों के निशान नज़र आ रहे थे । अब यह निश्चित हो गया था कि घोड़ा ले जाने वाला व्यक्ति चन्द्र बेताल ही है। उसके छोटे पांवों के चिन्ह वह अच्छे से पहचान सकता था । चन्द्र बेताल का पीछा करने का कोई भी साधन उसके पास नहीं था । इकलौती खटारा कार उसका मास्टर ले गया था ।

इस वीरान से मकान में ऐसा कोई भी साधन जुटाना न मुमकिन था । यह बात उसने लिये उलझन भरी थी । चन्द्र बेताल कहाँ गया है ? क्या वह अपनी इच्छा से गया था या कोई दूसरी बात थी ? फिर उसे कहीं जाना ही था तो वह अकेला क्यों गया ? इससे पहले वह कभी

अकला नहीं निकला था। वह बच्चा था और घुड़सवारी करना उसक बस का रोग नहीं था ।

यदि वह शत्रु के चंगुल में फंस गया तो ?

और क्या जाने शत्रु ने ही कोई जाल फेंका हो ?

राइफल पर उसकी पकड़ मजबूत हो गयी फिर उसने घोड़े को पकड़ने के लिये एक तेज़ लम्बी दौड़ लगाई परन्तु घोड़ा उसकी पहुँच से बाहर हो चुका था । हताश होकर वह लौट पड़ा और इमारत की छत पर जाकर शराब पीने लगा। शराब पीकर वह अपने मन को बहलाना चाहता था अन्यथा दुर्घटना तो घट ही चुकी थी । यदि अब चन्द्र बेताल लौट आया तो उसका भाग्य ही होगा अन्यथा वह किसी भी दिशा में जाकर चौरंगी बाबा के जासूसों से छिपा नहीं रह सकता था ।

छत पर बैठे-बैठे वह शराब और सिगरेट पीता रहा, फिर वह मुंडेर पर पीठ टिकाकर अधबैठा हो गया ।

चाँद धीरे-धीरे आकाश पट पर छाया कर रहा था। हवा के झोंकों में मीठी शीतलता थी जो झील के जल से छूकर आ रही थी। इस आरामदायक वातावरण में उसे नींद का झोंका आया और वह कुछ देर के लिये सो गया । फिर जब उसकी आँख खुली तो चिड़ियों का चहचहाना सुनकर वह सीधा हो गया। भोर हो चुकी थी उसने एक

अंगड़ाई ली और नीचे झाँका ।

एकाएक उसकी सारी सुस्ती दूर हो गई ।

घोड़ा शेड के नीचे खड़ा था । ‘’

उसने अपनी आँखें मलीं, परन्तु यह सपना नहीं था। वह तेज़ी के साथ नीचे उतरकर चन्द्र बेताल के कमरे में पहुँचा। वह अपने बिस्तर पर गहरी नींद सो रहा था। कमरे के द्वार पर वह ठिठक पड़ा । कुछ देर तक अपलक चन्द्र बेताल को लेटा देखता रहा फिर गहरी साँस

खींचकर धीरे-धीरे आगे बढ़ा ।

क्या उसने सपना देखा था ? सब कुछ ज्यों-का-त्यों है

नहीं, सब कुछ ज्यों-का-त्यों नहीं है । एक तब्दीली है ।

चन्द्र बेताल के वस्त्रों पर खून के छींटे हैं और उसका चेहरा फूल की तरह खिला हुआ लग रहा है। उसके मुंह पर भी एक-दो दाग हैं जो निश्चय ही रक्त के हैं, बेंजो की खोपड़ी भन्ना गई। उसकी समझ में कुछ

भी नहीं आ रहा था उसके शरीर पर खून के धब्बे कहाँ से आये क्या उसे चोट लगी है? उसने गौर से देखा, चोट के लक्षण कहीं नहीं थे। यदि चोट होती तो वह इस प्रकार नहीं सोता । अब यह निश्चित हो गया था कि वह बाहर जाकर किसी अप्रिय घटना से दो चार हुआ था ।

उस वक्त वह गहरी नींद में था इसलिये बेंजो बाहर चला गया कि जब वह जाग जायेगा तो स्वयं बता देगा ।

बेंजो अपने सुबह के कामों में लग गया, उसे इस लड़के से लगाव हो गया था । वह चमत्कारी बालक था, जो आग के बेटा लगता था । बेंजो आग का पुजारी था इसलिये इस बच्चे को वह श्रेष्ठ समझता था । कभी-कभी उसे देखकर बेंजो को अपने बच्चे की याद आ जाती थी जो न जाने अब कहाँ और किस हाल में होगा ।

चन्द्र बेताल के जागने पर उसने पहला प्रश्न यही किया - "क्या तुम

रात को कहीं गये थे ?"

"मुझे याद नहीं ।" वह चिंतित स्वर में बोला ।

"याद नहीं, पर यह खून के धब्बे तो याद दिला सकते हैं ?"

“कहा न मैंने मुझे इस बारे में कुछ भी याद नहीं और ऐसे सवाल फिर मत पूछना ।" इस बार वह क्रोध भरे स्वर में बोला । उसकी बातें अब बच्चों जैसी नहीं लग रही थीं वह पूर्णतया वयस्क महसूस होता था ।

“ठीक है तुम नहीं बताना चाहते तो ।"

"बेंजो, मुझे भूख लगी है। बेकार की बातों से क्या लाभ ? रोज़ की तरह नाश्ता लेकर आओ ।"

बेंजो कंधे झटक कर मुड़ा ।

" और सुनो।"

बेंजो रुका । उसने गर्दन मोड़कर देखा ।

“फिर कभी ऐसे सवाल मत पूछना ।" उसने चमकीली आँखों से बेंजो को घूरते हुए कहा ।

"मेरी बला से, मुझे क्या, मैं तो तुम्हारी हिफाज़त के लिये ।"

“जाओ दफा हो जाओ। मुझे किसी की हिफाज़त नहीं चाहिए मुझे बच्चा मत समझो। मैं तुम्हारे बराबर घोड़ा दौड़ा सकता हूं और तुमसे अच्छा निशाना मार सकता हूं यकीन न हो तो जब चाहे ताल ठोककर आ जाना।"

बेंजो के नेत्र आश्चर्य से फैल गये ।

"इस लड़के को इतनी बातें आ गयी हैं ?" उसने मन ही मन में कहा । उसने कोई जवाब नहीं दिया और नाराजगी से पाँव से दरवाज़े को ठोकर मारता बाहर निकल गया, जैसे कहकर गया हो - "मेरी बला से

|"

थोड़ी देर बाद वह उसे नाश्ता दे रहा था ।

जब तक वह नाश्ता करता रहा बेंजो सेवक की तरह हाथ बांधे खड़ा रहा ।

फिर उसने पूछा - " और कुछ चाहिए ?"

"नहीं। दफा हो जाओ ।"

" अगर तुम्हें देखकर मुझे अपने बेटे की याद न आ रही होती तो ॥”

"तो तू मेरी गर्दन तोड़ देता । है ना ? । जाकर घोड़े को चारा तो दे । वह भूखा होगा ।"

वह पैर पटकता हुआ बाहर चला गया। उसने सोचा इस बारे में वह मास्टर से ही बात करेगा। वह उलझन में था और चन्द्र बेताल के प्रति उसकी सहानुभूति समाप्त होती जा रही थी। वह घोड़े को चारा देने पहुँचा ।

चारा देने के बाद वह उसकी पीठ पर ब्रश मारने लगा । अचानक उसने फायर की आवाज़ सुनी। फायर की आवाज़ के साथ पक्षियों के फड़फड़ाने का शोर गूंजा और वह चौंक कर मुड़ा। उसी समय एक गोली और चली । वह दौड़ कर बाहर निकला ।

उसी समय उसने चन्द्र बेताल को देखा, जो हाथ में खून से लथपथ दो पक्षी थामे था। दूसरे हाथ में राइफल थामे वह बेंजो की तरफ पलट पड़ा ।

'देखा निशाना । यह जोड़ा आसमान में उड़ रहा था, जंगली कबूतर का जोड़ा है। मैंने इन्हें ढेर कर दिया ।"

उसके नेत्रों में विचित्र सी चमक थी। बेंजो उसे आश्चर्यजनक निगाहों से देख रहा था ।

“तुम घोड़ों की सफाई करो । मैं दोपहर के खाने का प्रबन्ध करता हूं । मुझे गरम गोश्त बहुत पसंद है ।"

"राइफल लेकर बाहर मत जाना ।"

"देखा जायेगा ।"

वह भीतर चला गया। बेंजो की समझ में नहीं आ रहा था कि वह राइफल का झटका कैसे बर्दाश्त कर गया । अभी उसे घोड़ा चलाना भी अच्छी तरह नहीं आता था। आज उसमें अचानक इतना परिवर्तन कैसा ?

बेंजो अपना काम छोड़ उसके पीछे-पीछे भीतर जा पहुँचा । वह लड़के से राइफल छीनकर कहीं छिपा देना चाहता था । लड़का किचन में मौजूद था और छुरे से कबूतरों की बोटियाँ उड़ाने में मस्त था । उसके चेहरे पर विशेष चमक थी । न जाने कसाइयों जैसे इस काम में उसे कौन सी प्रसन्नता का बोध हो रहा था। राइफल उसके पास ही रखी थी

बेंजों ने झपटकर राइफल उठाई और अपना स्वर कर्कश बनाकर बोला - "मैं तुम्हारा सेवक हूं मगर मेरे लिये तुम फरिश्ते नहीं हो, जो तुमसे डरता फिरूं । मेरे लिये तुम अपने बच्चे जैसे हो ।"

"बच्चा ही तो भगवान होता है बेंजो ।"

“अच्छा । तुम्हें इतनी ज़ुबान चलाना कहाँ से आ गई ?"

"जब से तुम लोगों ने मुझे भाषण देना सिखाया है । जहाँ मैं जाता हूं वहाँ मेरी पूजा होती है, सारे आदिवासी मेरे भक्त हैं । जब सब लोग मुझे भगवान का अवतार मानते हैं तो तुम्हें भी मानना चाहिये ।"

इस घमंड में मत रहना ।" बेंजों बोला - "मैं नास्तिक आदमी हूं और

यह राइफल दुबारा मत छूना

इतना कहकर वह वापस पलट पड़ा । कसाई की तरह छुरी चलाते चन्द्र पर उसे बहुत क्रोध आ रहा था । उसकी अक्ल ठिकाने नहीं लगती थी ।

वह लड़का एक पहेली बनता जा रहा था ।
 
विनीता उस गांव से निकलकर पगडण्डी पर बढ़ रही थी कि दायीं ओर के झुरमुट से जटाधारी मुलक्कड़ बाबा कूदकर सामने आ गया । सारे शरीर पर भभूत होने के कारण वह काँप उठी । मुलक्कड़ बाबा ने अपना त्रिशूल हवा में उठाया ।

“पूरब से आई है, पश्चिम को जायेगी । चौरंगी की चेली अपने बेटे को तलाश करने निकली है।"

विनीता उसे आश्चर्य से देखने लगी ।

'अलख निरंजन ।" वह ज़ोर से बोला - "क्यों स्त्री मिला तेरा बेटा ?"

'नहीं महाराज ।" उसने हाथ जोड़कर कहा - "आप कोई पहुँचे हुए साधु लगते हैं ।"

“एक सितारा टूट गया। दूसरा सितारा उग आया ।"

"मैं समझी नहीं महाराज ।"

कभी नहीं समझेगी। क्योकि तेरे पास अपना समझ नहीं है । पाप का रास्ता छोड़ स्त्री । पाप की छाया में रहकर तू नर्क की भागीदार बनेगी और तेरे फरिश्ते जैसे बेटे को अपार दुःख भोगने पड़ेंगे ।"

“मैंने कौन सा पाप किया महाराज ?" अब उसका डर थोड़ा कम हो

गया था।

“जो किया उसे भूल जा । वही फरिश्ता तुझे नेकी के रास्ते पर लायेगा । बोल तुझे अपना बेटा चाहिये ।"

"हाँ महाराज । मुझे उसका पता बता दो, आपकी बड़ी कृपा होगी ।"

“तो सुन। पश्चिम में नाग देवता का मन्दिर है, उस मन्दिर में पहुँचकर तुझे नेकी का मार्ग नज़र आयेगा और वह फरिश्ता खुद तुझे दर्शन देगा, मगर याद रख। अगर चौरंगी को इसका पता चल गया तो नाग देवता कुपित हो जायेंगे और फिर घोर अनिष्ट हो जायेगा ।"

“महाराज जैसा आप कहते हैं वैसा ही होगा ।"

" जय भोले बाबा की ।"

इतना कहकर मुलक्कड़ बाबा झाड़ियों में गुम हो गया। कुछ देर तक वह उसी जगह खड़ी रही, फिर पगडण्डी पर बढ़ गई। नाग देवता का मन्दिर उसी स्थान पर था जहाँ आदिवासियों का मेला भरता था । वह एक भैरवी का रूप धारण किये निर्भीक अपने पथ पर बढ़ रही थी । वह इस बात को अच्छी तरह जानती थी कि चौरंगी बाबा की अदृश्य आँखें उसकी रक्षा कर रही हैं। आदिवासी किसी भैरवी पर हमला नहीं करते । हर साधु सन्यासी से वह भय खाते हैं, अन्यथा वे लोग तो ज़रा से लालच में आकर राह चलते आदमी की हत्या कर देते हैं। परन्तु इन दिनों उन्होंने ब्रह्मचरी का धन्धा छोड़ दिया था, पहले कभी-कभी इस ओर कोई बाहर से आता था । परन्तु अब आये दिन कोई न कोई कार चमकती नज़र आ जाती थी। यह सब चौरंगी बाबा के मेहमान होते थे इसलिये आदिवासी उन्हें कुछ नहीं कहते थे। चौरंगी की तरफ से उन्हें आये दिन उपहार मिलते रहते थे और भंडारा तो चौबीसों घंटे खुला रहता था। वे लोग चौरंगी बाबा के लिये जंगल में कड़ी मेहनत भी किया करते थे, आये दिन कहीं न कहीं खुदाई चल ही रही होती थी, जंगल का कटाव भी होता जा रहा था ।

उन्हीं की मेहनत से चौरंगी बाबा ने मठ को स्वर्ग बनाया था। अब वह ऐसी इमारत का निर्माण कर रहा था, जो पूर्णतया ज़मीन के भीतर रहती । भीतर शीशे के घूमने वाले कमरे बनने थे साथ ही स्वीमिंग पूल भी । यह अत्यन्त ऐश्वर्य शाली बनने वाली थी। इन दिनों इसकी खुदाई चल रही थी । यह सारा काम आदिवासी करते थे । इस सारे क्षेत्र में चारों ओर सुरंग का जाल फैला देना चाहता था । वह इस स्थल को सुरक्षित गढ़ बनाकर हैडक्वार्टर के रूप में तैयार करना चाहता था ।

बड़े पैमाने पर अपराध करने वाला चौरंगी बाबा अगर किसी से डरता था तो जंगल के चारों तरफ फैले आदिवासियों से, जिन्हें न तो भय से पराजित किया जा सकता था और न ही दण्ड से । चौरंगी के पास इतने आदमी नहीं थे जो आदिवासियों का मुकाबला कर सके। फिर यदि वे रसद पानी का रास्ता बन्द कर दें तो चौरंगी के आदमी कितने दिन भोजन की व्यवस्था कर पाते । आदिवासी गुप्त ठिकानों से वार करना जानते थे। पहले वे लोग इसी तरह गुप्त वार किया करते थे। मीलों दूर तक उन्होंने ज़मीन के भीतर घास-फूस की छत वाली कब्रें बना रखी थीं। जो ऊपर से देखने में कभी नज़र नहीं आ सकती थीं । वे कब्रें इनके आक्रमण का गुप्त ठिकाना होता था ।

पुलिस या कानून व्यवस्था इस तरफ नहीं हो सकती थी। इन लोगों पर देवी देवताओं के चमत्कार का प्रभाव बहुत जल्दी होता था और उसी से वे चंगुल में आ सकते थे। इसी फार्मूले को अपना कर चौरंगी ने उनपर अपना शासन जमाया था। जो अब उजड़ता जा रहा था ।

चन्द्र बेताल को समाप्त करने के लिये उसने विनीता को लगा दिया था । वह जानता था यदि चन्द्र को फरिश्ते का ढोंग रचे रहना है तो वह अपनी माँ से नहीं टकरा सकता अन्यथा आदिवासियों का विश्वास खो बैठेगा । वह इसी तरह तीर से निशाना मारना चाहता था । यदि उसपर भी बच जाये तो बाकी काम आदिवासी पूरा कर सकते थे जिन्हें उसने अपने खेमे में कर लिया था। यह आदिवासी उन लोगों का भी सफाया कर सकते थे जो चन्द्र बेताल की पीठ पर थे ।

और चौरंगी के इसी उद्देश्य को लेकर विनीता नाग देवता के मन्दिर में जा पहुंची। वहाँ उजाड़ खंडहर फैले हुए थे। यह मन्दिर पुराने खंडहरों के बीच था, दूसरी तरफ कोई एक मील परे आदिवासी देवी देवताओं का मन्दिर था, जो एक टीले पर बना था ।

इस वीरान स्थल पर आते ही विनीता का दिल तेज़ी के साथ धड़कने लगा । परन्तु अपने बेटे के इन्तज़ार में उसका भय कुछ कम था, अन्यथा वह यहाँ पल भर भी नहीं ठहर पाती । मन्दिर नाम मात्र का था । टूटी दीवारों के एक खंडहर में एक नाग देवता की प्रतिमा रखी थी। शाम ढलने को आ गई। सूरज पश्चिम की गोद में खून का दरिया बहाता नज़र आने लगा । वृक्षों की परछाइयाँ लम्बी और धूमिल पड़ती महसूस हो रही थीं । सारा वातावरण शाम के एक रंग में रंग जाना चाहता था । वह खामोशी के साथ एक शिला पर बैठी थी। फिर उसे ध्यान आया, कहीं उस जटाधारी ने उसे यूँ ही तो नहीं बहका दिया ? क्या जाने वह कौन था और आखिर उसे इस बात से दिलचस्पी ही क्या थी ।

जब अँधेरा छाने लगा तो वह गहरी गहरी सांसें खींचती हुई उठ खड़ी हुई, अब वह इस जगह अधिक देर नहीं रुक सकती थी । रात होने से पहले उसे किसी-न-किसी गांव में डेरा डाल लेना था । वह निराश होकर वापस मुड़ ही रही थी कि उसे घोड़ों की टापों का स्वर सुनाई पड़ा। वह चौंक कर दायें-बायें देखने लगी। टापों की आवाज़ निकट आती जा रही थी। कुछ देर बाद टापों की आवाज़ निकट आती हुई गुम हो गई ।

उसने अपलक एक दिशा में घूरा । अंतिम बार टापों की आवाज़ उसी दिशा में सुनाई दी थी। कुछ समय बाद ही धीमी चाल से चलता हुआ एक घोड़ा नाग देवता के मन्दिर के पार्श्व से प्रकट हुआ। वह धीमे-धीमे चलता हुआ मन्दिर के सामने रुक गया । विनीता ने चारों ओर का निरीक्षण किया । परन्तु घोड़े के अलावा यहाँ कोई और नज़र नहीं आया। उसकी समझ में नहीं आया कि घोड़े का सवार कहाँ चला गया ? और यदि वह था तो छिप क्यों गया ? इसी दुविधा में फंसी वह घोड़े के पास पहुँची ।

अचानक उसकी निगाह घोड़े की पीठ पर चिपके एक कागज़ पर पड़ी, जिसपर कुछ अक्षर चमक रहे थे। यह अक्षर अन्धकार में भी स्पष्ट नज़र आ सकते थे ।

उस पर लिखा था - 'जो कोई चन्द्र बेताल से मिलना चाहे, वह इस घोड़े की पीठ पर चुपचाप बैठ जाये ।'

ओह । क्या उसका बेटा इतना रहस्यमयी हो गया है ? वह सोच में पड़ गई। लेकिन अब विलम्ब करना बेकार था । उसे हर हाल में अपने बेटे तक पहुँचना था। हालाँकि वह टेढ़ा रास्ता साबित होता जा रहा था । वह एक टीले का सहारा लेकर घोड़े की पीठ पर चढ़ी और घोड़ा उसे खंडहरों की दिशा में को ले चला ।

न जाने वह किन-किन रास्तों से गुज़र रहा था। फिर वह काफी देर बाद एक कंदरा में जाकर रुक गया। यह कंदरा भीतर से मुड़ी हुई थी और मुड़ा हुआ भाग एक कमरे जैसे हिस्से में समाप्त होता था । वहाँ एक आले में दीपक जल रहा था, जिसका प्रकाश कमरे तक सीमित था ।

वह उस कमरे में पहुँचकर रुक गई ।

कुछ देर तक वह रहस्यमयी वातावरण में अकेली खड़ी रही, फिर उसे पदचाप सुनाई दी। उसके साथ ही एक दहाड़ से उसने औसत कद एक व्यक्ति को कमरे में प्रविष्ट होते देखा। वह सिक्ख था, उसकी आँखों पर काली ऐनक थी, उसकी नाक ऊंची ऊपर उठी प्रतीत होती थी और उसके गालों पर झुरझुरी दाढ़ी थी ।

उसके शरीर पर काली चुस्त बनियान और पतलून थी, जिसमें वह अत्यन्त फुर्तीला नज़र आता था। उसकी आयु चालीस के आसपास लगती थी। उसके होंठों पर मुस्कान नाच रही थी ।

“त । तुम कौन हो तुम ।?" वह पीछे हटती हुई बोली ।

"यह मेरा कैद खाना है ।" वह शुष्क स्वर में बोला - "इस जगह का पता जानने के बाद भी उसके आदमी यहाँ नहीं पहुँच सकते । ।

उसे यह स्वर कुछ जाना पहचाना सा लगा। परन्तु उसकी समझ में नहीं आया कि यह आवाज़ उसने पहले कहाँ सुनी थी। वह आदमी अपने इरादों का पक्का लगता था ।

"मैंने अपनी सारी पूँजी एक ही काम में लगा दी ।" वह बोला

और अब मैं नहीं चाहता कि एंड मौके पर मुझे असफलता मिले । पहले यह जगह एक तांत्रिक के कब्ज़े में थी। मैंने उससे एक वादा किया है, इसलिये उसने यह जगह मुझे सौंप दी, अभी आदिवासियों के इन जंगलों में ऐसे बहुत से स्थान हैं, जिनके बारे में चौरंगी भी कुछ नहीं जानता, खेर इन बातों को जाने दो। मैं तुम्हें यह बताना चाहता था कि यहाँ तुम्हें किसी प्रकार की असुविधा नहीं होगी, और यहाँ तुम तब तक कैद रहोगी जब तक चौरंगी का काम तमाम नहीं हो जाता ।'

"क्या मतलब ? तुम मुझे धोखे से यहाँ कैद करना क्यों चाहते हो ?" "मैं नहीं चाहता कि मुझपर चौरंगी की कोई चाल कामयाब हो जाये । तुमसे मेरी कोई दुश्मनी नहीं है, लेकिन तुम मेरे रास्ते में रुकावट बन सकती हो। क्योंकि तुमपर उस पाखंडी का जादू चढ़ा हुआ है। मैं जनता हूं उसके चंगुल में जो भी सुन्दर स्त्री आ जाती है, उसे दवाओं के प्रभाव से वह वश में कर लेता है। वह स्त्री उसके चंगुल से नहीं निकल पाती । और अगर मैं कह दूँ कि उसने तुम्हारे पति की हत्या कर दी है तो तुम्हें कभी विश्वास नहीं होगा । और मैं तुम्हें विश्वास दिलाना भी नहीं चाहता ।"

"मुझे तुम्हारी किसी बात पर विश्वास नहीं । अगर तुम्हारी बातों में सच्चाई होती तो एक अबला स्त्री को कैद करके तुम यह बात न सुना रहे होते। मैं किसी कैदखाने से नहीं डरती, क्योंकि मैं जानती हूं कि चौरंगी बाबा की हज़ार आँखों की शक्ति से मेरी स्थिति छिप नहीं सकती और इसका तुम्हें खामियाज़ा भुगतना पड़ेगा ।"

"तुम्हारी इन बातों से यह तथ्य सिद्ध हो जाता है कि तुम्हें चौरंगी ने भेजा है ।" वह मुस्कुराया - "और मैं तुम्हें भड़का कर किसी तरह यह उगलवाना चाहता था। मैं जानता हूं कि स्त्री के पेट में कोई भी बात रह पाना बड़ा कठिन है, ज़रा सा जोश आते ही वह असलियत बखान कर देती हैं ।"

"तुम्ही ने मेरे बेटे का अपहरण किया है।"

"बेशक । तुम्हें उसकी सुरक्षा की चिंता नहीं करनी चाहिए। यदि वह चौरंगी के पास होता तो उसकी मृत्यु निश्चित थी। वह जानता है कि कोई भी करिश्मे बाज़ आदमी उसके लिये बखेड़ा खड़ा कर सकता है । एक दिन तुम्हें मालूम होगा कि मैंने न सिर्फ तुमपर बल्कि हज़ारों पर अहसान किया है। अगर मैंने उसका काम तमाम न किया तो सारे देश में व्यभिचार के अड्डे फैल जायेंगे और जब इसका भेद खुलेगा तो सब लोगों के मन से धर्म की आस्था समाप्त हो जायेगी ।”

विनीता को उसकी बातें दिलचस्प लग रहीं थीं ।

“तुम्हारी उससे क्या शत्रुता है ?"

“मैं नहीं जानता । मैं इतना जानता हूं कि मेरे परिवार ने मुझे यह शत्रुता निभाने के लिये छोड़ दिया है। हो सकता है यह मेरा पागलपन हो। परन्तु चौरंगी के मामले में मैं किसी हद तक पागल हो जाना भी गंवारा कर लूंगा । अब यहाँ विश्राम करो। इस असुविधा के लिये मैं पहले ही माफी मांग लेता हूं।"

इतना कहकर वह घोड़े पर सवार हुआ और गुफा से बाहर निकल गया। विनीता उसके पीछे-पीछे चली, परन्तु आगे कंदरा का मुख बन्द हो गया। इस बात की आशंका उसे पहले ही थी। वह चुपचाप उस कमरे में लौट आई, फिर कुछ हिचकिचाती हुई दरार में प्रविष्ट हुई । दरार एक कमरे में जा मिली थी, जिसमें सभी प्रकार का आवश्यक मिली थी, जिसमें सभी प्र सामान । जल इत्यादि रखा था ।
 
इस कमरे में ताज़ी हवा का आभास हो रहा था । यहाँ एक छोटी सी मशाल जल रही थी । जिसका धुआं एक सुराख के रास्ते बाहर आ रहा था । इस कमरे में एक आरामदायक बिस्तर भी बिछा हुआ था, एक पुस्तकों की रैक भी रखी थी। अच्छा शौकीन आदमी का कमरा लगता था ।

मन्दिर के चौखट पर गोलियों की बौछार पड़ी और एक कतार में नाचते चार आदिवासी ढेर हो गये । मन्दिर के भीतर देवता स्थल पर चन्द्र बेताल बैठा था । उसे प्रकट हुए अभी चार मिनट भी नहीं बीते थे कि यह दुर्घटना घट गई। गोलियों की इस बौछार के कारण मन्दिर के बाहर शोर उमड़ पड़ा। आदिवासियों के नेजे बाहर निकल आये ।

देवता स्थल के सामने आठ मुखिया झुककर बैठे थे । उन सबने गोलियों के धमाके और शोर सुना ।

चन्द्र बेताल ने शांत मुद्रा में कहा - "पाप का घड़ा भर चुका है। अब वह इस मन्दिर पर गोलियां चला रहा है। वह नादान यह नहीं जानता कि मुझे मारने से पहले उसका काल आ गया है।"

मेले में भगदड़ मच चुकी थी। अब तक आठ आदिवासी गोलियों के शिकार हो चुके थे।

एकाएक मुखिया लोग बाहर निकले। वे क्रोध में थे। उनकी आँखों से चिंगारियां बरस रही थीं । उन्हें इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं थी कि चौखट पर आते ही गोलियों की बौछार उनपर भी पड़ सकती थी । वे बहुत उन्मादी थे। उनके हाथों में नेजे चमक रहे थे।

उनमें से एक हवा में लहराता चीखा - “जिसने यह कुकर्म किया है उसे पकड़कर हमारे सामने पेश करो।'

"वह चौरंगी बाबा के आदमी थे।" किसी ने चिल्लाकर कहा - "मैंने उन्हें घोड़े से भागते देखा। आपके हुक्म से पहले ही कुछ आदमी उनके पीछे लग गये हैं।"

“हमारे देवी देवताओं पर गोली चलाने वाला इस धरती पर नहीं रह सकता ।" एक सरदार चीखा - "हम इसका बदला लेकर रहेंगे ।"

"बदला लेकर रहेंगे।" भीड़ में आवाज़ें गूंजी । ‘

"हमने आठ आदिवासियों की बलि दे दी है ।" तीसरा मुखिया बोला "चौखट से देवता की रक्षा करते हुए वह शहीद हो गये हैं, हम भी इन्हीं की तरह शहीद हो जायेंगे लेकिन उसके आगे नहीं झुकेंगे ।"

मेले में उत्तेजना फैल चुकी थी । यह समाचार जंगल की आग की तरह फैल चुका था कि चौरंगी बाबा के आदमियों ने गोलियां चलाई हैं । आज के मेले में चौरंगी बाबा को देवता की गद्दी पर नहीं बैठाया था । उस गद्दी पर नन्हा फरिश्ता आकर बैठा था । चौरंगी के आदमी फरिश्ते को खत्म करने आये थे ।

उसके बाद फरिश्ते ने भीड़ को दर्शन दिए ।

उसके बाद आठों शव चौखट पर रखकर सब ने उनकी सौगंध ली । एक प्रकार से यह युद्ध की घोषणा थी । चन्द्र बेताल वहाँ अधिक देर नहीं रुका । उसने आदमियों को वचन दिया कि उसकी गुप्त शक्तियां भी उनका साथ देंगी और वह खुद युद्ध का प्रतिनिधित्व करेगा । अपना भाषण समाप्त करते ही उसने हाथ उठाया, भीड़ को चीरता हुआ एक घोड़ा मन्दिर की चौखट पर आ गया। जिसकी पीठ पर मशाल जल रही थी । चन्द्र बेताल उसपर सवार हुआ और मशाल हाथ में ले ली। भीड़ ने जय जयकार के नारे लगाये उसके बाद चन्द्र बेताल घोड़ा कुदाता आगे बढ़ गया ।

जैसे ही वह मेले की सरहद से बाहर निकला उसके पीछे-पीछे एक घुड़सवार और लग गया। वह राइफल धारी बेंजो था, दोनों आगे पीछे दौड़ते रहे। आँधी-तूफान की तरह भागते घोड़े ऊबड़-खाबड़ रास्ते, टीले, झाड़ी, झंकार और जंगल पार करते हुए झील के किनारे जा निकले फिर उसी मकान में जा पहुँचे ।

शेड के नीचे दो घोड़े और खड़े थे। उन्हें देखकर बेंजो बुरी तरह चौंक पड़ा और राइफल लेकर झटके के साथ नीचे कूद पड़ा फिर चन्द्र बेताल को शेड में छिपे रहने को कहा

और खुद भी पोजीशन लेकर लेट गया ।

अचानक उसे एक आवाज़ सुनाई दी - " भीतर आ जाओ बेंजो यहाँ सब अपने ही साथी हैं ।"

बेंजो ने अपने मास्टर का स्वर पहचान लिया । वह फुर्ती के साथ खड़ा हुआ। फिर उसने हंसते हुए चन्द्र को मकान की तरफ बढ़ने का संकेत किया ।

कुछ देर बाद ही बेंजो धनंजय के सामने था । चन्द्र अपने कमर में चला गया ।

I

धनंजय के अलावा वहाँ दो पीले वस्त्रधारी योगी पुरुष भी मौजूद थे

“समय आ गया है ।" धनंजय बोला - “इसलिये तुम लोगों का एक- दूसरे से परिचित हो जाना ज़रूरी है। आगे तुम लोगों का एक-दूसरे से काम पड़ने वाला है । मैं तुम लोगों से बेंजो का जिक्र कर चुका हूं, यही है बेंजो । मेरा गार्ड । और बेंजो इन दोनों से मिलो ।"

उसने लम्बे आदमी की ओर इशारा किया - "मिस्टर नागर । मठ के योगाश्रम में काम करने वाला प्रमुख व्यक्ति जो महामाया की हर गतिविधि पर नज़र रखता है, बड़ा अच्छा निशाने बाज़ है... आज जो करिश्मा तुमने वहाँ देखा वह नागर का ही कमाल था। जिन आदिवासियों की कतार पर गोलियां चलाई गयीं वे द्रोह करने वाले थे और चन्द्र बेताल को हानि पहुँचाने का कारण बनने वाले थे, नागर ने उन्हें एक ही बार में शांत कर दिया ।

नागर अच्छी तरह जानता था कि वे लोग एक कतार बनाकर चौखट के सामने नाचते हुए पहुँचेंगे और जैसे ही चन्द्र बेताल सामने आयेगा उसपर ज़हरीला राख फेंक देंगे। यह राख महामाया ने उन्हें दी थी जो त्वचा पर गर्मी पैदा करती है और पसीने से जा मिलती है, फिर ज़हर सारे शरीर में फैलता चला जाता है और तीन घंटे बाद आदमी मर जाता है।

ऐसी ज़हरीली राख ने इससे पहले न जाने कितने लोगों की जानें ले लीं। चौरंगी ने बरसों राख का यह खतरनाक धन्धा भी किया है। लोग इसके पास जादू-टोने के लिये आते थे और यह अपना करिश्मा दिखाकर राख के प्रयोग से किसी को भी मरवा डालता । जब भेद खुल गया तो यह हिमालय पहाड़ की तरफ भाग निकला और वहाँ योग साधना करने लगा। पहले इसका नाम सुरेन्द्र ब्रह्मचारी था जिसने अब चौरंगी बाबा का चोंगा ओढ़ लिया । यह जड़ी बूटियों का खासा लगता है और हिमालय में रहकर इसने ऐसी जड़ी-बूटियों की खोज की जिनसे बड़े से बड़ा असहाय रोग भी ठीक हो सकता है ।

यदि अपने इस ज्ञान को वह सही मार्ग पर लगाता तो एक महान आदमी होता, परन्तु किसी आदमी के सिर पर जब कई हत्याओं का पाप चढ़ जाता है तो वह चाहकर भी नेकी के रास्ते पर नहीं चल सकता। इन जड़ी बूटियों और सम्मोहन विद्या को करिश्मा बनाकर मरीजों का इलाज करना महज अपने आप को प्रसिद्धि देना था । इसी प्रकार वह ब्लैकमेलर बना । लोगों की कमजोरियां इसके हाथ आने लगीं और जो एक बार इसके चंगुल में फंसा वह जान देकर ही निकल सकता था ।

इन्हीं लोगों से वह मन चाहा लाभ उठाता रहा, और इस प्रकार इसने करोड़ों रुपया जमा करके गुप्त बैंकिंग व्यवस्था खड़ी कर दी, आश्रम धनवानों के लिये वैश्यालय बनने लगे और यहाँ योग ही नहीं, बल्कि सेक्स की शिक्षा दी जाने लगीं । इसके प्रत्येक आश्रम में गुप्त बैंक हैं जहाँ काले धन को सुरक्षित रखने की पूर्ण व्यवस्था है । साथ ही सुरक्षा की गारन्टी । ऐसी बैंकिंग व्यवस्था, जिसकी खबर सरकार को भी न हो सारे देश में चलने लगे थे। क्या वह दूसरी सरकार नहीं बन जायेगी ।

लेकिन अभी उसका यह सपना पूरा नहीं हुआ। और अब हो भी नहीं सकता । नागर भी किसी-न-किसी रूप में चौरंगी के कारनामों से पीड़ित है और यह हैं पंडित मधुलेश शास्त्री । सितारों की विद्या और ज्योतिष शास्त्र में निपुण । मठ के भविष्य वक्ताओं में इसका स्थान सर्वोच्च है । और आजकल महामाया के विशेष सलाहकार हैं। इनकी अब तक की कई भविष्यवाणियां सच साबित हुई हैं । मधुलेश शास्त्री नागर के विशेष साथियों में से हैं । इसके अलावा बहुत से लोग अपने वातावरण से मुक्त होना चाहते हैं, जिन्हें उकसाने में मेरे इन दोनों साथियों का बड़ा योगदान रहा है । नागर ने ही मन्दिर में नौकर को काफी धन देकर खरीद लिया था । बाद में जब भेद खुलने को हुआ तो नागर ने इसका सफाया इस तरीके से किया कि किसी को संदेह भी न हो सका कि वह हत्या थी या आत्म- हत्या |

अब मेरी अगली योजना सुनो। आदिवासियों के हमला कर देने का वक्त आ गया है। मैं उन्हें यह युद्ध लड़ाऊंगा और तुम तीनों को तीन काम करने हैं। वह तीनों ही काम महत्वपूर्ण हैं। नंबर एक चौरंगी का स्पेशल हेलिकॉप्टर बेकार कर देना । नागर को अच्छी तरह मालूम है कि वह कहाँ पर छिपा है । नंबर दो । खाने-पीने का भण्डारा नष्ट करना । नंबर तीन । एम्यूनीशन बर्बाद करना... यह तीनों ही काम जोखिम भरे हैं। इसमें सबसे हल्का काम भण्डारा नष्ट करना है । वहाँ कोई पहरेदार नहीं रहता । इस गोदाम तक राशन पानी पहुँचाने के लिये चौड़ा रास्ता पिछले रास्ते तक गया है। ट्रक वहीं जाकर रुकता है, फिर उससे बोरे उतारकर गोदाम में फेंक दिए जाते हैं। गोदाम में इतना स्थान नहीं है कि महीने के राशन पानी रखा जाये... इस वक्त वहाँ मुश्किल से एक ट्रक से कम माल होगा ।

ट्रक वहाँ खड़ा ही रहता है... अब वह उसे बाहर नहीं भेज सकते और न बाहर से कोई वस्तु भीतर जा सकती है। सुबह से पहले रास्ते कट चुके होंगे। इसलिये अब सबसे पहला काम यही है कि ट्रक में सारे बोरे लाद दिए जाएँ और ट्रक वहाँ से भेज दिया जाये। यह सारा राशन- पानी में आदिवासियों को सौंपना चाहता हूं। ताकि पहले ही सफलता के कारण उनका जोश बढ़ जाये । भण्डारे को लूटने के लिये दस आदिवासी चुपचाप वहाँ पहुँच जायेंगे और बोरे तेज़ी के साथ ट्रक में लादने का काम वही करेंगे। भीतर देखेगा शास्त्री । बाहर तुम दोनों निशाने-बाज़ पहरेदारों से निबटने या अन्य किसी खतरे से निबटने का काम देखोगे । जैसे ही यह काम समाप्त होगा ट्रक को धक्का देकर बाहर लाया जायेगा । उसके बाद का काम मेरा है । इस ओर सिर्फ दो पहरेदार रहते हैं जिन्हें काबू करना कोई मुश्किल काम नहीं हमारा दूसरा कदम है हेलिकॉप्टर तबाह करना इस काम के लिये तुम दो ही जाओगे । शास्त्री उस वक्त अपने कमरे में ही होगा । उसने महामाया को उल्लू बनाया है । जैसे ही तुम लोग ताज़ा बन रही हवाई पट्टी की सीमा में कदम रखोगे गुप्त साइरन बज जायेगा जो सीधे महामाया से ही सम्बन्ध रखता है।

शास्त्री का काम होगा कि उसे ग्रहों का भय बताकर कुछ ज्योतिष लगाने का समय मांगे और तब तक उसे कमरे से बाहर न निकलने दे । उसे यह भय दिखाया जायेगा कि कंट्रोल रूम में न जाने कहाँ शत्रु घात लगाये बैठा है। शास्त्री की ज्योतिष पर उसे अपने से ज़्यादा भरोसा है, न चाहते हुए भी उसे रुकना पड़ेगा । और जब तक वह कंट्रोल रूम में नहीं पहुँचता तब तक दूसरे लोग भी सोते रहेंगे। इस बीच तुम लोग वायर की चौकसी करने वाले चार पहरेदारों को लुढ़का कर उसकी मशीनरी ख़राब कर चुके होंगे । अब सब के रास्ते बन्द हो जायेंगे, चौरंगी भी फंस जायेगा ।

उसके बाद तुम लोग बारूद घर की तरफ जाओगे, बारूद घर की स्पाती दावार बाहर कातिल दस्त का खुफिया कमरा है आर गा तयार से बाहर सशस्त्र पहरा रहता है खुफिया कमरे में कातिल दस्ते के दो ऑफिसर रहते हैं । उन दोनों को वहाँ से हटाने का काम शास्त्री का होगा । शास्त्री महामाया को सलाह देगा कि फौरन कातिल दस्ते के सीनियर ऑफिसरों को बुलाये... शत्रु भीतर आ गया लगता है, वह उसे बिलकुल बाहर न निकलने की सलाह देगा । महामाया ज्योतिष पर अंध विश्वास करता है । बौखलाहट में उसे वहाँ बांधकर रखा जा सकता है । सत्य भी यही है कि ऐसी खतरनाक स्थिति में वह अपने उन दोनों महारथियों को बुला लेगा ।

बस तुम दोनों का मार्ग साफ । स्टील की दीवार का प्रश्न शेष बचता है । उसका सम्बन्ध या तो खुफिया कमरे से है या महामाया के कंट्रोल रूम से । शास्त्री उसे बारूद घर खोलने के लिये बाध्य करेगा। ताकि तुरन्त सबको शस्त्र बाटें जा सकें... उसे बताएगा कि आदिवासी मठ पर चढ़ाई करने वाले हैं। महामाया को खतरे का सिग्नल तो मिल ही गया होगा, अतः वह बारूद घर तुरंत खोल देगा । ध्यान रहे, वे दोनों बारूद घर की मजबूत दीवार खुलने से पहले भी वहाँ पहुँच सकते हैं, इसलिये तुम दोनों को इस संकट से निबटने के लिये भी तैयार रहना है। तुम उस वक्त भीतर ही होंगे ।"

आगे तुम्हे परिस्थिति के अनुसार काम करना है । इस जगह भयानक संघर्ष भी छिड़ सकता है । क्योंकि तब तक सारे आदमी हलचल में आ चुके होंगे। बारूद के कमरे में आग लगाकर भाग निकलना ही बेहतर होगा। यही तुम दोनों को करना है । जब यह काम हो जायेगा तो शास्त्री अपने कमरे की रोशनी बुझा देगा । बारूद घर में आग लगाकर तुम्हें भाग निकलना है । उसके बाद तुम्हारा वहाँ कोई काम नहीं ।"

इतना कहकर धनंजय मौन हो गया ।
 
“मैं आपसे उस लड़के के बारे में पूछना चाहता था ।" बेंजो ने कुछ हिचकिचाते हुए कहा - "उसका भविष्य क्या होगा ?”



“उसका भविष्य मेरे साथ जुड़ चुका है। वह बहादुर और करामाती लड़का है, इसलिये मैं उसे अपना साथ रखूंगा। लेकिन बेंजो, मैं तुम लोगों को यह अच्छी प्रकार बता देना मुनासिब समझता हूं कि चौरंगी के नकद पूँजी में जो कुछ हाथ आयेगा, उसे मैं तुम लोगों में तकसीम कर दूँगा । मैं यह वादा अपने उन सभी साथियों से कर चुका हूं, जिन्होंने इस बड़े काम में मेरा साथ दिया । इसी तरह मेरा तांत्रिक मित्र भी है, मैंने उसे वादा किया है कि चौरंगी जिस रूप में भी हमारे साथ आयेगा उसके हवाले कर दूँगा । उसे चौरंगी के शव की आवश्यकता है । इसी तांत्रिक से मैंने विभिन्न सुरंगों का पता मालूम किया है। इसी की कृपा से मुझे दो सधे हुए घोड़े प्राप्त हुए । यह तांत्रिक चौरंगी के भय से एक कंदरा में छिपा रहता है। अपने क्षेत्र में ऐसे आदमियों को चौरंगी कभी बर्दाश्त नहीं करता था ।

उसने साधु सन्यासियों को अपमानित करके या तो इस क्षेत्र से बाहर निकाल दिया या मरवा दिया था । इस तांत्रिक के पिता का एक आदिवासी गांव पर प्रभाव था । और वह नाग देवता के मन्दिर में रहता था। चौरंगी ने मन्दिर उजाड़ दिया और वहीं उसे मौत के घाट उतार दिया। उन दिनों उसका बेटा तन्त्र विद्या सीख रहा था । उसे अपने पिता का शव मिला और तब से वह मारे डर के एक कंदरा में रहने लगा। अपने पिता का कंकाल उसने वहीं छिपाया हुआ है। ऐसी बहुत सी बातों का मुझे पहले ही पता चल गया था । इसी दिलचस्पी के कारण मैं यहाँ चौरंगी का रहस्य जानने के लिये आया था । जिसका अंजाम मुझे भुगतना पड़ा। मुझे उसी तांत्रिक ने बताया कि मेरे परिवार को चौरंगी के आदमियों ने साधु वेश में जाकर राख का ज़हर दे दिया था। बाद में वहाँ आग लगा दी गयी । तो दोस्तों । आप सब लोगों से मैंने कुछ-न-कुछ वादा किया है । अब वादा पूरा करने का वक्त आ गया है । आशा है हमारी अगली मुलाकात एक विजय के साथ होगी ।"

इस बैठक के समाप्त होते ही और विदा होने से पूर्व उन सब ने अच्छी प्रकार योजना पर विचार कर लिया । उसके बाद एक-दूसरे से विदा ली। जिस समय वह झील के किनारे से आगे बढ़े अन्धकार फैलने लगा था । उन्हें मालूम था यही बलि का समय है आदिवासी बलि चढ़ाने के बाद देवताओं के समक्ष सौगंध ले लेंगे। उसके बाद ढोल और नगाड़ों के साथ वे उत्सव मनायेंगे और इसी बीच उन्हें किसी भी समय आक्रमण करने का संकेत मिल जायेगा । यह सारा काम धनंजय और तांत्रिक को करना था ।

शायद चन्द्र बेताल को इस युद्ध से अलग रखा जाना था ।

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एक ज़बरदस्त धमाक के साथ चट्टान दूर-दूर गिरने लगी। प्रगाढ़ अंधेरे में कुछ चिंगारियां क्षणिक रूप से चमक कर लोप हो गयी । उसके बाद ही यह धमाका हुआ था और चट्टानों और पत्थरों के गिरने पड़ने की आवाज़ पांच मिनट तक आती रही ।

अँधेरा और भी भयानक हो गया था। पांच मिनट का यह शोर खत्म हुआ तो रोशनी की चमक नज़र आई, जिसकी रोशनी सीमित दायरे में घूम रही थी । इस रोशनी के साये में धनंजय घोड़े की पीठ पर सवार होकर आगे बढ़ रहा था। टूटती चट्टानें अब खामोशी में डूब चुकी थीं । उसने टॉर्च के प्रकाश में उसका निरीक्षण किया । वह डायनामाइट का परिणाम देख रहा था ।

तांत्रिक ने जिस जगह सुरंग का मार्ग होना बताया था । यह डायनामाइट उसी लक्ष्य पर लगाया गया था। धूल अब भी उड़ रही थी । कुछ देर तक वह प्रकाश धूल के आसपास घुमाता रहा, फिर वह घोड़े से उतरकर आगे बढ़ा। जब उसे निश्चित हो गया कि अब कोई पत्थर नहीं गिरने वाला, तो वह उस भूखंड की ओर बढ़ने लगा, जहाँ खड्ड सा नज़र आ रहा था । डायनामाइट ने यही स्थान तोड़ा था ।

खड्ड के पास पहुँचकर उसने प्रकाश डाला तो उसे एक बड़ा सुराख नज़र आया । जो काफी नीचे तक अन्धकार में डूबा था । उस खोखले स्थान को टॉर्च का प्रकाश पूरी तरह नहीं भेद पा रहा था । इसका मतलब वह खड्ड काफी गहरा था ।

उसने जल्दी से अपने बैग की ज़िप खोली और घोड़े को एक तरफ बांधने के बाद अपने काम में लग गया। एक रस्सी को मजबूत शिला पर बांधने के बाद वह रस्सी के सहारे सुराख में उतरता चला गया । चंद पल बाद ही टॉर्च का प्रकाश धरातल पर पड़ा, जहाँ कुछ पत्थर टूटे पड़े थे ।

वह धरातल पर शीघ्र ही उतर गया । इस गहरे खड्ड का अंत एक सुरंग की ज़मीन पर हुआ था जो वास्तव में काफी चौड़ी और ऊंची थी । तांत्रिक की बातें सही निकल रही थीं, उसका कथन था कि लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व यहाँ एक भव्य महल था जिसके नीचे चौड़ी सुरंगों का जाल बिछा था । यह सुरंग बड़ी मजबूत थी और इसमें घुड़सवार सेना । हाथी और रथ तक आ जा सकते थे। ऐसी ही एक सुरंग उसके सामने थी वह बेखटके एक दिशा में बढ़ चला ।

सुरंग की हालत से पता चलता था कि उसे इस्तेमाल किया जाता रहा है ऐसे अनेक चिन्ह उसे नज़र आये । सुरंग में किसी प्रकार की घुटन महसूस नहीं होती थी । रास्ते में किसी प्रकार का अवरोध नहीं आया । कुछ समय बाद सुरंग एक बड़े कमरे में समाप्त हो गयी । सामने ही उसे सीढ़ियों का सिरा नज़र आया। दूसरी ओर लोहे का एक फाटक सा खड़ा था। जिसपर बड़ी-बड़ी ज़ंजीरे लटक रही थीं। चारों तरफ का मुआइना करने के बाद वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ा ।

तभी कानों के परदे फाड़ देने वाले धमाके हुए। इन धमाकों के कारण सुरंग की दीवारें बुरी तरह भनभना उठी। गड़गड़ाहट की आवाज़ और तेज़ होती चली गई। ज़मीन पर भूकंप जैसा कम्पन हो रहा था । उसने घड़ी में समय देखा ।

फिर वह मुस्कुराया, निश्चित रूप से उसके साथियों ने बारूद घर नष्ट कर दिया था। इसका अर्थ यह भी था कि वह अपने सभी कार्यों में सफल हो गये हैं । अब भगदड़ शुरू हो चुकी होगी। मुख्य इमारत में आग लग चुका होगा, न उसक पास लड़ने का हाथयार रहग आर न खाने को कुछ, आदिवासियों का घेरा तंग होता जायेगा, भाग निकलने का कोई रास्ता शेष नहीं रहेगा ।

अब उसे चौरंगी बाबा का सामना करना चाहिए। इसी उपयुक्त समय की उसे प्रतीक्षा थी । उसके होंठों की मुस्कान और गहरी हो गई । सहसा धड़ धड़ की आवाज़ उभरी उसने एकदम पीछे मुड़कर प्रकाश डाला, फिर उसके चेहरे की मुस्कान सहसा गायब हो गयी । माथे पर तनाव के साथ ही चेहरे पर खौफ उत्पन्न हुआ और वह पीछे हटता हुआ सीढ़ियों से जा टिका ।

सुरंग ढह रही थी। आगे का रास्ता पत्थरों से भारत जा रहा था । छत लगातार ढहती जा रही थी। परन्तु उस कमरे की छत अभी सलामत थी। फिर भी उसका कोई भरोसा नहीं किया जा सकता था लेकिन इस वक्त उसके लिये बाहर निकलने का मार्ग बन्द हो गया था ।

इस कमरे में भी अधिक देर ठहरना खतरनाक था । वह सावधानी के साथ सीढ़ियां चढ़ने लगा । लगभग पच्चीस सीढ़ियां चढ़ने के बाद वह एक और कमरे के फर्श पर पहुँचा । परन्तु इस छोटे से कमरे में आगे निकलने का कोई मार्ग उसे नज़र नहीं आया। आगे अवरोध उत्पन्न हो गया था । उसने कमरे की दीवारों पर प्रकाश में एक-एक इंच टटोलना शुरू किया। परन्तु कोई नतीजा नहीं निकला जबकि उसे विश्वास था कि कोई न कोई मार्ग ज़रूर है जो मठ के किसी न किसी हिस्से में निकलता है और वह हिस्सा निश्चित रूप से चौरंगी का खुफिया भाग है

काफी देर तक रास्ता खोजते रहने के बाद भी जब कोई हल नहीं निकला तो वह फर्श पर बैठ गया । वह सोच रहा था क्या वह अब इस स्थान से कभी नहीं निकल पायेगा ? लेकिन अभी उसे हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। उसके पास आखिरी हथियार है डायनामाइट । वह चाहे तो इस सारे कमरे की धज्जियां उड़ा सकता है परन्तु इस अंतिम निर्णय पर वह तभी पहुँचता जब सारे रास्ते जाम होने के बाद वह स्पष्ट रूप से अपने को ज़िंदा कब्र में महसूस करता । डायनामाइट का इस्तेमाल और भी खतरनाक सिद्ध हो सकता था । बहुत संभव था कि वह कमरा भी ढह जाता और फिर रास्ता हमेशा के लिये बन्द हो जाता ।

वह अभी यह सोच ही रहा था कि उसे घरघराहट का स्वर सुनाई दिया । उसने एकदम टॉर्च बुझा दी और चौकस हो गया । घरघराहट बिलकुल नजदीक थी फिर प्रकाश चमका, वह तेज़ी के साथ दीवार से चिपक कर लेट गया । प्रकाश एकदम द्वार से फट रहा था जो अभी- अभी प्रकट हुआ था । उसका प्रकाश खाके के रूप में कमरे के भीतर पड़ रहा था, वह इत्मीनान से उसी तरफ देखने लगा ।

फिर उसने कदमों की आहट सुनी। वह साँस रोककर लेट गया । दो आदमी भीतर दाखिल हुए। वे एक भारी बक्सा थामे हुए थे उन्होंने वह बक्सा फर्श पर रखा और वापस उसी मार्ग पर चले गये । थोड़ी देर बाद वे एक और काला संदूक लेकर आये उन्होंने वह संदूक पहले वाले के ऊपर रख दिया ।

उनके पीछे-पीछे एक प्रभावशाली व्यक्ति आया । वह भगवा चोंगा पहने था । धनंजय ने देखते ही उसे पहचान लिया। यह चौरंगी बाबा था। जिसके चेहरे पर खौफ की कठोरता से मिले जुले भाव स्पष्ट नज़र आ रहा था

अचानक चौरंगी बोला - "मेरे साथ बड़ी मजबूरी है कि मुझे फिर से पर्वतों की ओर जाना पड़ रहा है लेकिन मैं फिर लौटकर आऊंगा । तब तक मेरे सभी सेवकों को इंतज़ार करते रहना होगा लेकिन मैं सोचता हूं इस बार बहुत लम्बा अंतराल पड़ जायेगा । लोग तो यही कहेंगे कि मैंने मठ में समाधि लगा ली। इतने लम्बे समय तक इंतज़ार करना मुमकिन नज़र नहीं आता । अच्छा यही होगा कि मैं विदा ले लूं । मैंने आज सबसे विदा ले ली है, और तुम लोग जानते हो कि मैंने कैसे विदा ली । मेरे विचार से तुम्हें इस सेवा का पुरस्कार ज़रूर मिलना चाहिए ।"

उनके चेहरे पर प्रसन्नता जाग उठी । निगाह बक्सों की तरफ झुक गयी ।

"उनकी तरफ ध्यान न दो। वह धन मैंने ग़रीबों के लिये रखा है । तुम्हारे लिये मेरी जेब में ही पर्याप्त धन है ।" इतना कहकर उसने गाउन के भीतर हाथ डाला ।

जिस तरफ धनंजय लेटा था, उस तरफ अन्धकार ही था और वे लोग अभी-अभी उजाले से आने के कारण भीतर पूरे कमरे का दृश्य नहीं देख सकते थे इसके लिये उनकी आँखों को कुछ समय चाहिए था जबकि वह कमरे का हर भाग स्पष्ट रूप से देख रहा था । चौरंगी आदम कद द्वार पर था और वे रोशनी के फीके साये में हाथ बांधे खड़े थे ।
 
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