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लबादे वाला आंधी-तूफान की तरह बीच के हिस्से में पहुँचा और उत्तर द्वार की तरफ लपक पड़ा। अब तक सारे मन्दिर में प्रकाश फैल गया था और खासी भगदड़ मची हुई थी, परन्तु वह अपने पथ पर अँधेरा फैलाते हुए उत्तर द्वार की तरफ बढ़ता ही चला गया । वह जानता था भीतर अधिक लोग नहीं रहते। तीनों पहरेदार होते हैं चौथा कुण्ड का जल्लाद है, जिसे इस प्रकार की भाग-दौड़ की आदत नहीं, एक पुजारी होगा, जिसे पश्चिम में पड़ने वाले पूजा कक्ष के अलावा किसी बात से सरोकार नहीं रहता । इनके अलावा सफाई करने वाला नौकर भी है, जो उसका सहयोगी पहले ही बन चुका है ।
उसे भीतर की सारी स्थिति का ज्ञान था। वहाँ अब भी एक ही आदमी उससे संघर्ष कर सकता था, परन्तु वह भी बुर्ज से रोशनी फेंकने में व्यस्त था । उसे नीचे उतरते देर लगेगी, और वह उतर भी गया तो... तो वह उसके सच्चे निशाने से बाहर नहीं होगा । परन्तु संयोग से वह मौत के लिये इतना फुर्तीला साबित नहीं हुआ। उससे पहले ही तमाम बाधाओं को पार करता हुआ वह उत्तर द्वार पर जा पहुँचा । द्वार पर उसका सहयोगी मौजूद था ।
द्वार खुला ।
वह तीर की तरह बाहर निकलता हुआ बोला - "अलविदा ।" उसके बाहर निकलते ही द्वार बन्द हो गया ।
I
बच्चे का हरण करने वाला मजबूत काठी वाला यह व्यक्ति निरन्तर जंगल भेदन करता रहा । मठ की तरफ वाले रास्ते पर जाने की मूर्खता वह नहीं कर सकता था और सवेरे से पहले वह खतरे की सीमा से बाहर निकल जाना चाहता था । जैसे-जैसे वह दूर होता चला जायेगा, चौरंगी बाबा की पकड़ ढीली होती चली जायेगी ।
तपोवन की सीमा से बाहर पहुँचने में उसे बड़ी भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । सारी रात जंगल में मशालची घुड़सवार दनदनाते रहे । ये सब महामाया योगी का कातिल दस्ता था, जो जंगल का इंच- इंच छान लेना चाहता था। जैसे ही कोई घुड़सवार नज़र आता वह किसी-न-किसी वृक्ष पर चढ़कर छिप जाता । इस तरह वह भारी मुसीबत उठाता हुआ आगे बढ़ रहा था ।
यदि रात का अँधेरा न होता तो वह कभी का नज़रों में आ गया होता । सड़क अभी पांच मील दूर थी। एक बार उस इकलौती सड़क पर पहुँचने भर की देर थी फिर उसे पकड़ पाना कातिल दस्ते के लिये सपने जैसी बात हो जाती । रास्ता घंटे भर का था परन्तु कातिल दस्ते के कारण वह कई घंटों का हो गया था । वे लोग चारों दिशाओं में दौड़ रहे थे। वह उनका इरादा भी भांप चुका था ।
उनकी अधिकांश दौड़ और व्यूह रचना निकासी के मार्ग पर थी । वहाँ उन्होंने बड़ा सख्त जाल बिछा दिया था और इस समय उनकी व्यूह रचना से स्पष्ट आभास होता था कि वे उसे सुबह तक जंगल में ही छिपे रहने के लिये बाध्य कर देना चाहते हैं या रास्ता भटक जाने पर विवश कर देना चाहते हैं । इस वक्त शिकार को पकड़ने का उनका कोई इरादा नहीं था । किसी तरह सुबह होने तक इसी स्थिति में रखना चाहते थे । उसके बाद क्या शिकार बचकर निकल पायेगा ?
इस नाकाबंदी को उसने भी भांप लिया था, इसलिये व्यूह भेदने के लिये उसने पहाड़ी नदी का सहारा लिया, परन्तु इसके लिये उसे चन्द्र
बताल से खतरा पैदा हो सकता था। क्या वह ठण्डे जल में डूबे रहने पर विचलित न होगा ? रास्ते में उसने एक-दो बार उससे बातें की थीं। यह अभी नासमझ बच्चा था । बस एक ही बात अनुकूल साबित हो रही थी । वह निर्भीक बच्चा था । सारे रास्ते खामोश रहा । यह दौड़ उसे भली लग रही थी, एक बार उसने सहयोग भी दिया था और पीठ पर न चढ़कर उसके साथ पैदल भी चला था । इस निर्भीकता का कारण यह भी हो सकता था कि वह मन्दिर के पाखंड से आतंकित हो गया हो, जल्लाद के खौफनाक साये से मुक्ति पाना चाहता हो... सच बात यही थी कि वह यहाँ से भाग जाना चाहता था । चाहे किसी का सहारा क्यों न लेना पड़े । सहारा ईश्वर ने भेज ही दिया था ।
नदी मार्ग से बाहर निकलने पर दो मील का चक्कर पड़ जाता था, परन्तु इसके सिवा कोई चारा नहीं था। आगे के क्षेत्र में एक-एक कदम पर कातिल दस्ते की कड़ी नज़र थी । ?"
"मैं नदी के पानी में कूद रहा हूं।" उसने कहा- “तुम डरोगे तो नहीं
"मैं तो आग से नहीं डरता । पानी से क्या डरूंगा ?" वह अपनी महीन आवाज़ में बोला - "मुझे यहाँ से बाहर निकाल लो बाबा ।"
"ठीक है बेटे । कितना भी कष्ट क्यों न हो चिल्लाना नहीं ।"
चन्द्र बेताल से सहयोग मिलते ही वह जलधारा की तरफ मुड़ गया । दृढ़ निश्चय कर वह जल में उतर गया। सर का ज़रा सा भाग पानी से बाहर निकाले वह धारा में बहता रहा । ठीक निकासी के पास आते ही उसने पानी में गोता लगा लिया और धारा में तेजी के साथ बढ़ने लगा । कुछ क्षण में ही पीठ पर सवार चन्द्र बेताल बेचैनी से छटपटाने लगा । वह समझ गया था कि पानी उसके नाक-मुंह में घुस रहा है, पर वह इस बात को अच्छी तरह जानता था कि पानी में डूबे रहने पर भी बच्चा सही सलामत रहेगा ।
कुछ समय बाद वह साँस लेने ऊपर आ गया ।
आकाश पर तनी चाँदनी अब सुबह के उजाले में बदलने लगी थी । ओस के कारण ऊपर का पानी अत्यधिक ठण्डा हो गया था, उसका शरीर ठंड के कारण काँपने लगा था ।
इतनी देर में ही उसकी कुल्फी जम गई थी ।
धारा उसे अपने आप ही बहाये लिये जा रही थी ।
जब उसने खतरे की सीमा से बाहर महसूस किया तो वह तट की तरफ तैरने लगा । चन्द्र उसकी पीठ पर ही बेहोश हो गया था, पर इस बात की उसे अधिक परवाह नहीं थी । यूँ उसके कंधे बुरी तरह दुख रहे थे । शरीर काँप रहा था और जब वह बाहर निकला तो तत्काल आगे न बढ़ सका । उसने चन्द्र बेताल को पीठ से उतार कर लिटा दिया और स्वयं भी लेट गया ।
परचों की पिटारी भीग चुकी थी, परन्तु माउज़र सही सलामत थी, कारतूस प्लास्टिक के डब्बे में थे । अतः उसके भीगने की भी गुंजाइश नहीं थी ।
अभी खतरा टला नहीं था ।
यूँ वह जंगल के पहरेदारों से काफी दूर निकल आया था। भोर का उजाला तेज़ी के साथ फैलने लगा था । पक्षी चहल-पहल करने लगे थे और धीरे-धीरे जंगल जागता जा रहा था। उसने आधा घंटा उसी जगह
बिताया, तब तक चन्द्र को भी होश आ चुका था ।
"अगर हम दौड़ लगायें तो ठण्ड भाग जायेगी ।" उसने चन्द्र को समझाया ।
"मैं काफी तेज़ दौड़ लेता हूं ।" चन्द्र बोला ।
"तो हम दौड़ चले ?"
दोनों दौड़ने लगे। कुछ देर में ही ताज़ी हवा और शरीर की गर्मी ने उनमें नई स्फुर्ति भर दी । सारी थकान और कंपकंपी मिट गई। जिस वक्त सूरज का लाल गोला पूर्वोकाश पर उतरा वह सड़क के मुहाने पर पहुँच चुके थे । यहाँ झाड़ियों में एक पुरानी खटारा कार छिपी हुई थी ।
कार में पहुँचने के बाद उसने संतोष की साँस ली । "बाबा, क्या यह आपकी कार है ?"
"हाँ बेटा । मैं इसे यहीं छोड़ गया था ।" "आप कहाँ से आये हैं बाबा ?”
“धीरे-धीरे तुम्हें सब पता चल जायेगा बेटा । जब तुम बड़े होगे तो सब समझ जाओगे । इस वक्त तुम्हें जीवन देना आवश्यकता है । मैंने तुम्हें अपनी जान पर खेल कर प्राप्त किया है। इसलिये भी कि मेरी कोई संतान नहीं है। हम दोनों को कुछ-न-कुछ चाहिए इसलिये हम दोनों एक-दूसरे के पूर्वक साबित होंगे।"
चन्द्र का नासमझ मस्तिष्क उस उलझनपूर्ण बात को नहीं समझ
सका ।
कार सड़क पर दौड़ने लगी ।
चन्द्र बेहद प्रसन्न था ।
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उसे भीतर की सारी स्थिति का ज्ञान था। वहाँ अब भी एक ही आदमी उससे संघर्ष कर सकता था, परन्तु वह भी बुर्ज से रोशनी फेंकने में व्यस्त था । उसे नीचे उतरते देर लगेगी, और वह उतर भी गया तो... तो वह उसके सच्चे निशाने से बाहर नहीं होगा । परन्तु संयोग से वह मौत के लिये इतना फुर्तीला साबित नहीं हुआ। उससे पहले ही तमाम बाधाओं को पार करता हुआ वह उत्तर द्वार पर जा पहुँचा । द्वार पर उसका सहयोगी मौजूद था ।
द्वार खुला ।
वह तीर की तरह बाहर निकलता हुआ बोला - "अलविदा ।" उसके बाहर निकलते ही द्वार बन्द हो गया ।
I
बच्चे का हरण करने वाला मजबूत काठी वाला यह व्यक्ति निरन्तर जंगल भेदन करता रहा । मठ की तरफ वाले रास्ते पर जाने की मूर्खता वह नहीं कर सकता था और सवेरे से पहले वह खतरे की सीमा से बाहर निकल जाना चाहता था । जैसे-जैसे वह दूर होता चला जायेगा, चौरंगी बाबा की पकड़ ढीली होती चली जायेगी ।
तपोवन की सीमा से बाहर पहुँचने में उसे बड़ी भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । सारी रात जंगल में मशालची घुड़सवार दनदनाते रहे । ये सब महामाया योगी का कातिल दस्ता था, जो जंगल का इंच- इंच छान लेना चाहता था। जैसे ही कोई घुड़सवार नज़र आता वह किसी-न-किसी वृक्ष पर चढ़कर छिप जाता । इस तरह वह भारी मुसीबत उठाता हुआ आगे बढ़ रहा था ।
यदि रात का अँधेरा न होता तो वह कभी का नज़रों में आ गया होता । सड़क अभी पांच मील दूर थी। एक बार उस इकलौती सड़क पर पहुँचने भर की देर थी फिर उसे पकड़ पाना कातिल दस्ते के लिये सपने जैसी बात हो जाती । रास्ता घंटे भर का था परन्तु कातिल दस्ते के कारण वह कई घंटों का हो गया था । वे लोग चारों दिशाओं में दौड़ रहे थे। वह उनका इरादा भी भांप चुका था ।
उनकी अधिकांश दौड़ और व्यूह रचना निकासी के मार्ग पर थी । वहाँ उन्होंने बड़ा सख्त जाल बिछा दिया था और इस समय उनकी व्यूह रचना से स्पष्ट आभास होता था कि वे उसे सुबह तक जंगल में ही छिपे रहने के लिये बाध्य कर देना चाहते हैं या रास्ता भटक जाने पर विवश कर देना चाहते हैं । इस वक्त शिकार को पकड़ने का उनका कोई इरादा नहीं था । किसी तरह सुबह होने तक इसी स्थिति में रखना चाहते थे । उसके बाद क्या शिकार बचकर निकल पायेगा ?
इस नाकाबंदी को उसने भी भांप लिया था, इसलिये व्यूह भेदने के लिये उसने पहाड़ी नदी का सहारा लिया, परन्तु इसके लिये उसे चन्द्र
बताल से खतरा पैदा हो सकता था। क्या वह ठण्डे जल में डूबे रहने पर विचलित न होगा ? रास्ते में उसने एक-दो बार उससे बातें की थीं। यह अभी नासमझ बच्चा था । बस एक ही बात अनुकूल साबित हो रही थी । वह निर्भीक बच्चा था । सारे रास्ते खामोश रहा । यह दौड़ उसे भली लग रही थी, एक बार उसने सहयोग भी दिया था और पीठ पर न चढ़कर उसके साथ पैदल भी चला था । इस निर्भीकता का कारण यह भी हो सकता था कि वह मन्दिर के पाखंड से आतंकित हो गया हो, जल्लाद के खौफनाक साये से मुक्ति पाना चाहता हो... सच बात यही थी कि वह यहाँ से भाग जाना चाहता था । चाहे किसी का सहारा क्यों न लेना पड़े । सहारा ईश्वर ने भेज ही दिया था ।
नदी मार्ग से बाहर निकलने पर दो मील का चक्कर पड़ जाता था, परन्तु इसके सिवा कोई चारा नहीं था। आगे के क्षेत्र में एक-एक कदम पर कातिल दस्ते की कड़ी नज़र थी । ?"
"मैं नदी के पानी में कूद रहा हूं।" उसने कहा- “तुम डरोगे तो नहीं
"मैं तो आग से नहीं डरता । पानी से क्या डरूंगा ?" वह अपनी महीन आवाज़ में बोला - "मुझे यहाँ से बाहर निकाल लो बाबा ।"
"ठीक है बेटे । कितना भी कष्ट क्यों न हो चिल्लाना नहीं ।"
चन्द्र बेताल से सहयोग मिलते ही वह जलधारा की तरफ मुड़ गया । दृढ़ निश्चय कर वह जल में उतर गया। सर का ज़रा सा भाग पानी से बाहर निकाले वह धारा में बहता रहा । ठीक निकासी के पास आते ही उसने पानी में गोता लगा लिया और धारा में तेजी के साथ बढ़ने लगा । कुछ क्षण में ही पीठ पर सवार चन्द्र बेताल बेचैनी से छटपटाने लगा । वह समझ गया था कि पानी उसके नाक-मुंह में घुस रहा है, पर वह इस बात को अच्छी तरह जानता था कि पानी में डूबे रहने पर भी बच्चा सही सलामत रहेगा ।
कुछ समय बाद वह साँस लेने ऊपर आ गया ।
आकाश पर तनी चाँदनी अब सुबह के उजाले में बदलने लगी थी । ओस के कारण ऊपर का पानी अत्यधिक ठण्डा हो गया था, उसका शरीर ठंड के कारण काँपने लगा था ।
इतनी देर में ही उसकी कुल्फी जम गई थी ।
धारा उसे अपने आप ही बहाये लिये जा रही थी ।
जब उसने खतरे की सीमा से बाहर महसूस किया तो वह तट की तरफ तैरने लगा । चन्द्र उसकी पीठ पर ही बेहोश हो गया था, पर इस बात की उसे अधिक परवाह नहीं थी । यूँ उसके कंधे बुरी तरह दुख रहे थे । शरीर काँप रहा था और जब वह बाहर निकला तो तत्काल आगे न बढ़ सका । उसने चन्द्र बेताल को पीठ से उतार कर लिटा दिया और स्वयं भी लेट गया ।
परचों की पिटारी भीग चुकी थी, परन्तु माउज़र सही सलामत थी, कारतूस प्लास्टिक के डब्बे में थे । अतः उसके भीगने की भी गुंजाइश नहीं थी ।
अभी खतरा टला नहीं था ।
यूँ वह जंगल के पहरेदारों से काफी दूर निकल आया था। भोर का उजाला तेज़ी के साथ फैलने लगा था । पक्षी चहल-पहल करने लगे थे और धीरे-धीरे जंगल जागता जा रहा था। उसने आधा घंटा उसी जगह
बिताया, तब तक चन्द्र को भी होश आ चुका था ।
"अगर हम दौड़ लगायें तो ठण्ड भाग जायेगी ।" उसने चन्द्र को समझाया ।
"मैं काफी तेज़ दौड़ लेता हूं ।" चन्द्र बोला ।
"तो हम दौड़ चले ?"
दोनों दौड़ने लगे। कुछ देर में ही ताज़ी हवा और शरीर की गर्मी ने उनमें नई स्फुर्ति भर दी । सारी थकान और कंपकंपी मिट गई। जिस वक्त सूरज का लाल गोला पूर्वोकाश पर उतरा वह सड़क के मुहाने पर पहुँच चुके थे । यहाँ झाड़ियों में एक पुरानी खटारा कार छिपी हुई थी ।
कार में पहुँचने के बाद उसने संतोष की साँस ली । "बाबा, क्या यह आपकी कार है ?"
"हाँ बेटा । मैं इसे यहीं छोड़ गया था ।" "आप कहाँ से आये हैं बाबा ?”
“धीरे-धीरे तुम्हें सब पता चल जायेगा बेटा । जब तुम बड़े होगे तो सब समझ जाओगे । इस वक्त तुम्हें जीवन देना आवश्यकता है । मैंने तुम्हें अपनी जान पर खेल कर प्राप्त किया है। इसलिये भी कि मेरी कोई संतान नहीं है। हम दोनों को कुछ-न-कुछ चाहिए इसलिये हम दोनों एक-दूसरे के पूर्वक साबित होंगे।"
चन्द्र का नासमझ मस्तिष्क उस उलझनपूर्ण बात को नहीं समझ
सका ।
कार सड़क पर दौड़ने लगी ।
चन्द्र बेहद प्रसन्न था ।
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