अध्याय - 40
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अब तक....
मेनका चाची और कुसुम कुछ देर बाद चली गईं। वो बच्ची लड्डू खाने में ब्यस्त थी और मैं ये सोचने में कि विभोर और अजीत के पास कुसुम की आख़िर ऐसी कौन सी कमज़ोरी है जिसके बल पर वो लोग कुसुम को मेरे खिलाफ़ मोहरा बनाए हुए हैं? आख़िर ऐसी क्या बात हो सकती है जिसके चलते कुसुम उनकी बात मानने के लिए इस हद तक मजबूर है कि वो अपने उस भाई को भी कुछ नहीं बता रही जो उसे दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार और स्नेह देता है? मैंने फैसला किया कि सबसे पहला काम मुझे इसी सच का पता लगाना होगा।
अब आगे....
दिन ढलने लगा था।
भाभी मेरे कमरे में आईं और मुझे बताया कि गुड़िया को लेने के लिए उसकी दादी फूलवती अपने दूसरे बेटे सूर्यभान के साथ आई हैं। मैंने देखा भाभी का चेहरा अब थोड़ा सामान्य था। मैंने भाभी से उनके हाथ की बनी चाय पिलाने को कहा तो वो सिर हिला कर चली गईं। इधर उनके जाने के बाद मैं भी उस बच्ची को ले कर नीचे आ गया।
नीचे आया तो देखा मणि शंकर की बीवी फूलवती माँ और मेनका चाची से बातें कर रही थी। तीनों के चेहरों पर ख़ुशी के भाव थे। बच्ची को लिए जब मैं उनके पास पहुंचा तो फूलवती मुझे और अपनी पोती को देख कर मुस्कुरा उठी।
"ये अभी तक तुमसे ही चिपकी हुई है?" फूलवती ने मुस्कुराते हुए किन्तु हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा____"लगता है तुमसे कुछ ज़्यादा ही घुल मिल गई है ये।"
"आप क्या इसे लेने आई हैं?" मैंने मुस्कुराते हुए पूछा____"पर अब तो ये मेरे पास ही हवेली में रहेगी। है न मेरी प्यारी गुड़िया?"
"हां ताता।" उस बच्ची ने मेरी तरफ देखते हुए मासूमियत से कहा____"मैं आपते पाथ ही लहूंगी।"
"हाय राम!" फूलवती उसकी बात सुन कर चकित भाव से कह उठी____"ये तो सच में तुमसे घुल मिल गई है बेटा। देखो तो एक ही दिन में अपनी उस दादी को भी भूल गई जिसके बिना ये रहती ही नहीं थी।"
मां और चाची उनकी बात सुन कर हंसने लगीं। जबकि फूलवती उस बच्ची से कहने लगी कि चल बेटा घर चल तेरी माँ तुझे बहुत याद कर रही है और तेरे बिना घर भी सूना सूना लगता है। फूलवती की ये बातें सुन कर भी वो बच्ची मेरी गोद से उतर कर उसके पास न गई। आख़िर मैंने जब उसे प्यार से समझाया और ये कहा कि मैं उसके लिए उसके घर लड्डू ले कर आऊंगा तो वो मान गई और फिर ख़ुशी ख़ुशी अपनी दादी के पास चली गई।
रागिनी भाभी सबके लिए चाय ले कर आईं। चाय पीने के बाद मैं बाहर बैठक में आ गया। बैठक में सूर्यभान जगताप चाचा के पास बैठा था और चाय पी रहा था। मैं भी उनके पास ही बैठ गया। कुछ देर हम तीनों के बीच इधर उधर की बातें होती रहीं उसके बाद फूलवती जब आई तो सूर्यभान उन्हें ले कर चला गया।
"तो कैसा चल रहा है हमारे भतीजे के मकान का निर्माण कार्य?" जगताप चाचा ने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा____"ब्यस्तता के चलते उधर जा ही नहीं पाए हम।"
"आधे से ज़्यादा कार्य हो गया है चाचा जी।" मैंने कहा____"जल्द ही शेष कार्य भी पूरा हो जाएगा।"
"चलो अच्छी बात है फिर।" चाचा जी ने कहा____"अच्छा अब तुम बैठो, हमें एक ज़रूरी काम से जाना पड़ेगा।"
चाचा जी के जाने के बाद मैं भी उठा और पैदल ही हवेली से बाहर चल पड़ा। कुछ दूरी से ही सड़क के दोनों तरफ लोगों के कच्चे मकान शुरू हो जाते थे। दिन ढल रहा था इस लिए धुप में ज़्यादा तपिश नहीं रह गई थी। मैं सोचता जा रहा था कि मेरे सामने सबसे महत्वपूर्ण दो मामले थे और दोनों ही मामले गंभीर थे, ख़ास कर बड़े भैया वाला मामला। बड़े भैया का जब भी ख़याल आता था तब मेरे दिल में एक दर्द सा जाग उठता था। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि भैया का जीवन काल इतना जल्दी ख़त्म हो जाएगा। मेरे लिए सबसे बड़ी हैरानी की बात ये थी कि भैया का बर्ताव एकदम से कैसे बदल जाता था? कभी वो बहुत अच्छे से बात करते थे और कभी ऐसे हो जाते थे कि वो गुस्से में आ कर मुझ पर हाथ ही उठा देते थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर ये क्या माजरा है? मैं ये सब सोचता चला ही जा रहा था कि सहसा मुझे ऐसा लगा जैसे कहीं से आवाज़ आई हो। मैं रुक कर इधर उधर देखने लगा और तभी मेरी नज़र दाएं तरफ जा रही एक संकरी गली पर पड़ी। गली के किनारे एक नीम का पेड़ था उसी पेड़ के पास एक आदमी खड़ा था। वो आदमी हमारे ही गांव का था। मैंने देखा वो मुझे अपनी तरफ बुला रहा था। मुझे उसका बर्ताव थोड़ा अजीब सा लगा लेकिन उत्सुकतावश मैं उसकी तरफ बढ़ ही गया।
"क्या बात है काका?" उस आदमी के पास पहुंचते ही मैंने उससे पूछा____"तुम मुझे इस तरह क्यों बुला रहे थे?"
"मेरी इस धृष्टता के लिए मुझे माफ़ कर देना छोटे ठाकुर।" उसने इधर उधर देखते हुए कहा_____"अच्छा हुआ कि आप मुझे मिल गए। मैं कई दिनों से हवेली में आना चाहता था लेकिन बड़ी कोशिश के बाद भी आ नहीं पाया अथवा ये समझ लीजिए कि हवेली में आने की मैं हिम्मत ही नहीं जुटा पाया।"
"आख़िर बात क्या है?" मैं उसकी बात सुन कर सोच में पड़ गया था, बोला_____"तुम किस लिए हवेली आना चाह रहे थे?"
"यहां नहीं छोटे ठाकुर।" उस आदमी ने इधर उधर देखते हुए धीमें स्वर में कहा____"आप मेरे साथ मेरे घर चलिए। मुझे आपको बहुत ज़रूरी बात बतानी है।"
उस आदमी की बात सुन कर मैं चौंका। एकाएक मेरे ज़हन में कई तरह के ख़याल उभरने लगे। मैं फ़ौरन ही उस आदमी के साथ चल पड़ा। जिस गली में हम थे वो ज़्यादा चौड़ी नहीं थी। अगल बगल बने घरों के बगल की दीवार थी गली की तरफ। आगे जा कर वो गली बाएं तरफ मुड़ जाती थी जहां पर निम्न वर्ग के लोगों के घर बने हुए थे। कुछ ही देर में मैं उस आदमी के साथ एक घर में पहुंच गया। आदमी ने इधर उधर नज़र घुमाई और एक तरफ देख कर हाथ से एक इशारा किया। मैंने उस तरफ देखा तो एक और आदमी परली तरफ खड़ा था। मुझे कुछ समझ नहीं आया लेकिन इतना ज़रूर सोचा कि कुछ तो बात ज़रूर है।
"वो मेरा छोटा भाई है छोटे ठाकुर।" उस आदमी ने कहा____"मैंने उसे निगरानी में लगा रखा है। असल में कुछ दिनों से मुझे एक बड़े ख़तरे का आभास हो रहा है।"
"आख़िर बात क्या है काका?" मैं बेचैन भाव से बोल पड़ा____"तुम साफ़ साफ़ बताते क्यों नहीं मुझे?"
"अन्दर आ जाइए।" उसने कहा और घर के अंदर दाखिल हो गया। उसके पीछे मैं भी सोच में डूबा दाखिल हो गया। मन में तरह तरह के ख़याल उभर रहे थे।
"अरे! ओ धनिया।" आदमी ने अंदर तरफ किसी को पुकारा____"जल्दी से जल पान ला, छोटे ठाकुर आए हैं।"
"काका इस सबकी कोई ज़रूरत नहीं है।" मुझसे अब रहा नहीं जा रहा था, इस लिए उतावलेपन से बोल पड़ा_____"तुम मुझे बस वो बताओ जिसके लिए तुम हवेली आना चाहते थे या फिर मुझे यहाँ ले कर आए हो।"
"तीन दिन पहले की बात है छोटे ठाकुर।" मैं जब खटिया में बैठ गया तो वो मेरे पास ही ज़मीन पर बैठने के बाद गंभीर भाव से बोला_____"मेरी भैंस घर नहीं आई थी तो मैं उसे खोज रहा था। आख़िर बड़ी खोज के बाद वो शाम को मुझे नदी के पास मिली। मेरे साथ मेरा छोटा भाई कलुवा भी था। मैंने कलुवा को भैंस ले कर घर चले जाने को कहा और खुद दिशा मैदान के लिए वहीं रुक गया। आप तो जानते हैं कि नदी से कुछ दूरी पर ही गांव के साहूकारों का बगीचा शुरू होता है। मैं डर तो रहा था कि मुझे उस जगह पर दिशा मैदान करते हुए साहूकारों का कोई नौकर न देख ले लेकिन क्योंकि मेरा ज़ोरों से पेट चढ़ा हुआ था इस लिए मजबूरन मुझे वहीं बैठ जाना पड़ा। दिशा मैदान से फुर्सत होने के बाद मैं उनके बगीचे से ही घुस कर घर की तरफ चल दिया। मैंने सोचा था कि बगीचे से हो कर अगर जाऊंगा तो जल्दी ही गांव की मुख्य सड़क पर पहुंच जाऊंगा। अँधेरा घिर चुका था पर मैं अंदाज़न चलता ही जा रहा था। थोड़ी दूर ही आया था कि अँधेरे में मुझे थोड़ी देर के लिए हवा में आग जलती दिखी और फिर बूझ गई। मैं समझ गया कि किसी ने बीड़ी सुलगाया होगा लेकिन तभी ख़याल आया कि अँधेरे में उस वक़्त भला वहां पर कौन हो सकता है? जहां तक मुझे पता था दिन ढले ही बगीचा सुनसान हो जाता था। ख़ैर मैंने इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और आगे बढ़ चला। कुछ दूर ही आया था कि तभी किसी के चिल्लाने की आवाज़ सुन कर मैं एकदम से उछल पड़ा। चिल्लाने की आवाज़ किसी लड़की या औरत की थी। मैंने सोचा अँधेरे में उस वक़्त कौन हो सकती थी जो इस तरह चिल्लाई थी? मन में एक उत्सुकता जाग उठी थी इस लिए दबे पाँव उस तरफ को मुड़ गया। डर तो बहुत लग रहा था छोटे ठाकुर क्योंकि साहूकारों का बगीचा था पर शायद नियति यही चाहती थी इस लिए मैं दबे पाँव उस तरफ बढ़ता ही चला गया।"
वो आदमी सांस लेने के लिए कुछ देर रुका। मैं गौर से उसकी बातें सुन रहा था। अभी वो फिर से बोलने ही वाला था कि अंदर से एक लड़की हाथ में एक थाली लिए आई। मैंने देखा लड़की जवान थी। सांवली रंगत वाले जिस्म पर घाघरा चोली था। चोली में कैद उसकी चूचियां साफ़ बता रहीं थी कि लड़की अब भरपूर जवान हो चुकी है। शायद इसी का नाम धनिया था और उस आदमी की बेटी थी। उसने झुक कर मेरी तरफ थाली बढ़ाई जिसमें एक गिलास पानी रखा हुआ था। वो झुकी हुई थी तो मेरी नज़र एकदम से उसके उभारों पर चली गई। चोली का गला झुकने से नीचे की तरफ फ़ैल सा गया था जिससे मुझे साफ़ साफ़ उसके उभार दिखने लगे थे। मेरे मन में एक हलचल सी हुई तो मैंने जल्दी से उसके उभारों से नज़र हटा कर ग्लास उठा लिया। मेरे ग्लास उठाते ही वो सीधा हुई और अंदर चली गई।
"आगे बताओ काका।" उसके जाते ही मैंने उस आदमी से कहा____"उसके बाद क्या हुआ?"
"बगीचे की ज़मीन पर सूखे पत्ते पड़े हुए थे इस लिए मेरे चलने से आवाज़ पैदा हो रही थी।" काका ने कहना शुरू किया____"और इस आवाज़ के चलते मैं ये सोच कर और भी डर रहा था कि कहीं मैं पकड़ा न जाऊं। उधर किसी लड़की या औरत के चिल्लाने की आवाज़ बीच बीच में आ रही थी। मैंने साफ़ सुना था कि वो खुद को छोड़ देने के लिए मिन्नतें कर रही थी, रो रही थी, गिड़गिड़ा रही थी। मैं किसी तरह उस तरफ पहुंचा। अचानक चिल्लाने की आवाज़ बंद हो गई। ऐसा लगा जैसे किसी ने जादू किया हो और शोर गुल शांत हो गया हो। मैं एक पेड़ के पीछे छुप कर खड़ा हो गया था। मुझसे क़रीब दस या पंद्रह क़दम की दूरी पर अँधेरे में मुझे तीन लोग खड़े दिखाई दिए। अँधेरे की वजह से उनकी शकल नहीं दिख रही थी और ना ही उनके कपड़े ठीक से समझ में आ रहे थे। उनमें से एक आदमी थोड़ा झुका हुआ दिख रहा था। शायद वो उस लड़की या औरत को पकड़े हुए था जो कुछ देर पहले चिल्ला रही थी।"
"मैंने तो पहले ही कहा था कि इस रांड के बस का नहीं है हवेली से उन कागज़ातों को निकाल कर लाना।" सन्नाटे को चीरती उनमें से एक की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी थी____"लेकिन आप ही नहीं माने और इसे हवेली की नौकरानी बना कर वहां रखवा दिया।"
"ग़लती तो हो ही गई मुझसे।" दूसरे की आवाज़ आई____"मुझे क्या पता था कि ये अपनी खूबसूरती और अपने मादक जिस्म का सही उपयोग ही नहीं कर पाएगी। इससे ज़्यादा समझदार तो वो शीला निकली जिसने अपने काम को अच्छे तरीके से अंजाम देना शुरू कर दिया है।"
"मुझे लगता है इसे थोड़ा और वक़्त देना चाहिए।" तीसरे की आवाज़ थी ये____"मत भूलिए कि इसी की वजह से हमारा एक महत्वपूर्ण काम सफलता से हुआ है। हवेली में आज कल जिस तरह के हालात हैं उसमें इसके लिए ये काम करना फिलहाल आसान नहीं हो सकता। उस कम्बख्त दादा ठाकुर को अब यकीन हो चला है कि कोई तो है जो उसके खानदान को बर्बाद करने के लिए शातिर खेल खेल रहा है। ज़ाहिर है ऐसे में वो पूरी तरह सतर्क हो गया होगा।"
"ये सही कह रहा है।" पहले वाले की आवाज़____"मामला थोड़ा पेंचीदा है इस लिए इसे थोड़ा वक़्त देना चाहिए हमें।"
"मुझ पर यकीन कीजिए।" सहसा वो लड़की या औरत की आवाज़ आई जो पहले चिल्ला रही थी____"मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही हूं लेकिन क्या करूं वहीं की दोनों ठकुराईनें हर वक़्त वहीं जमी रहती हैं। इस वजह से मुझे दादा ठाकुर के कमरे में जाने का मौका ही नहीं मिलता।"
"क्या एक बार भी उसके कमरे में जाने का तुझे मौका नहीं मिला?" दूसरे वाले की आवाज़ आई तो उस औरत ने कहा____"ऐसे तो कई बार मिला है और मैं गई भी हूं लेकिन ज़्यादा समय तक कमरे में रह ही नहीं पाई वरना उस कमरे में उन कागज़ातों को ज़रूर तलाश करती।"
"उसके कमरे को देख कर क्या समझ आया था तुझे?" दूसरे वाले ने उससे पूछा।
"समझ आया मतलब? मैं कुछ समझी नहीं?" उस औरत की उलझी हुई आवाज़।
"अरे! मतलब ये कि उस दादा ठाकुर के कमरे को देख कर।" दूसरे वाले की आवाज़ में इस बार थोड़ा गुस्सा था____"क्या तुझे ऐसा लगा कि उसी कमरे में वो कागज़ात रखे हो सकते हैं?"
"उनके कमरे में तो चारो तरफ बहुत कुछ है।" उस औरत की आवाज़____"लेकिन ठीक से देखने का मौका ही नहीं मिल पाया मुझे।"
"देख मैं इन दोनों के कहने पर तुझे आख़िरी मौका दे रहा हूं।" दूसरे वाले कठोरता से कहा____"अगर तूने वहां से कागज़ात निकाल कर हमें नहीं दिया तो सोच लेना कि तू और तेरा परिवार इस दुनिया में नहीं रहेगा।"
"वो तीनों लोग कौन थे काका?" वो आदमी जब सब कुछ बता कर चुप हुआ तो मैंने गहरी सांस लेते हुए उससे पूछा____"क्या उन तीनों की आवाज़ों से तुम उन्हें पहचान पाए?"
"यही तो नहीं हो पाया छोटे ठाकुर।" उस आदमी ने बेबस भाव से कहा____"अँधेरे की वजह से उनकी शकल तो वैसे भी नहीं दिख रही थी लेकिन बातें भी वो धीमें स्वर में ही कर रहे थे इस लिए साफ़ साफ़ उनकी आवाज़ मेरे कानों में नहीं पहुंच पा रही थी, अगर वो खुल कर बातें करते तो शायद उनकी आवाज़ से मैं कुछ अंदाज़ा लगा पाता।"
"और वो औरत कौन थी?" मैंने कहा___"क्या उसे भी नहीं पहचान पाए?"
"मुझे माफ़ कर दीजिए छोटे ठाकुर।" वो आदमी बेबसी बोल पड़ा____"औरत को पहचानना तो वैसे भी मेरे लिए मुश्किल था क्योंकि मैंने इस गांव की ज़्यादातर औरतों की आवाज़ें सुनी ही नहीं हैं।"
"ख़ैर उसके बाद क्या हुआ?" मैंने काका की तरफ देखते हुए पूछा____"क्या वो लोग वहीं रहे या फिर उनके जाने के बाद तुमने उनका पीछा भी किया था?"
"पीछा करने की नौबत ही नहीं आई छोटे ठाकुर।" काका ने कहा____"उनको पता चल गया कि वहां पर उनके अलावा भी कोई है जो उनकी बातें सुन रहा है।"
"अरे! पर उन्हें पता कैसे चल गया?" मैंने काका की बात सुन कर हैरानी से पूछा।
"मेरे दुर्भाग्य की वजह से छोटे ठाकुर।" काका ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"मैं पेड़ के पीछे खड़ा उनकी बातें सुन रहा था कि तभी मेरे पैर में से कोई चीज़ एकदम सर्र से निकल गई जिसके चलते मैं डर के मारे उछल ही पड़ा था और मेरे मुख से आवाज़ भी निकल गई थी। बस उसके बाद तो जैसे मुझ पर क़यामत ही टूट पड़ी थी। मैं भी अपनी जान बचा कर इस तरह वहां से भाग खड़ा हुआ था जैसे सैकड़ों भूत मेरे पीछे पड़ गए हों। पीछे मुड़ कर एक बार भी नहीं देखा था मैंने। सीधा घर पर ही आ कर रुका था।"
"तो इस बात को बताने के लिए तुम हवेली आना चाहते थे?" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा___"और अपने छोटे भाई को निगरानी में लगा रखे हो?"
"हां छोटे ठाकुर।" काका ने गंभीरता से कहा____"मैं यही सोच कर डर गया था कि क्या उन लोगों ने मुझे पहचान लिया होगा? आज तीसरा दिन है और अब यही लगने लगा है कि उस दिन उन लोगों ने मुझे पहचाना नहीं था। अगर पहचान गए होते तो संभव है कि आज मैं आपके सामने जीवित न बैठा होता। मैंने कई बार ये सब दादा ठाकुर से बताने के लिए हवेली जाने का मन बनाया लेकिन हिम्मत न हुई। क्योंकि मुझे कहीं न कहीं यही लगता है कि वो हवेली की तरफ जाने वाले हर ब्यक्ति को जांच परख रहे होंगे और जब मुझ जैसा नीच जाति का आदमी हवेली की तरफ जाता हुआ उन्हें दिखेगा तो वो फ़ौरन समझ जाएंगे कि उस रात उनकी बातें सुनने वाला शायद मैं ही था।"
"शायद तुम सही कह रहे हो काका।" मैंने काका की बुद्धि की मन ही मन सराहना की, फिर बोला____"तुम्हारी इस बुद्धिमानी ने ही तुम्हें अब तक सही सलामत रखा है और मेरा तुमसे यही कहना है कि तुम अब हवेली की तरफ देखना भी नहीं। अच्छा हुआ कि इत्तेफ़ाक से आज पैदल चलते हुए मैं इधर से गुज़र रहा था और तुमने मुझे देख लिया। सही कहते हैं बूढ़े बुजुर्ग लोग कि जो होता है अच्छे के लिए होता है। तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद काका ये सब बताने के लिए। आज तुमने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है। तुम्हारे इस खूबसूरत उपकार को मैं कभी नहीं भूलूंगा। तुमने हमारे प्रति जो वफ़ादारी दिखाई है उसका मोल एक दिन ज़रूर मिलेगा तुम्हें। ख़ैर, अब चलता हूं काका, अपना ख़याल रखना।"
"रूकिए छोटे ठाकुर।" मेरे उठते ही काका ने झट से कहा____"एक और बात उनके मुख से सुनी थी मैंने। मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा कि कोई ऐसा भी कर सकता है।"
"ऐसी कौन सी बात सुनी थी तुमने?" मैंने उत्सुकतावश पूछा।
और काका ने मुझे जो बात बताई उसे सुन कर मैं बुरी तरह अचम्भे में पड़ गया था किन्तु अगले ही पल मेरे चेहरे पर पत्थर जैसी शख़्ती उभर आई। गुस्से के मारे मेरी आँखें लाल सुर्ख पड़ने लगीं थी। काका ने मुझे किसी तरह समझा बुझा कर शांत किया।
सूरज डूब चुका था और अँधेरे की चादर चारो तरफ फैलने लगी थी। मैं गहरी सोच में डूबा हवेली की तरफ चला जा रहा था। मैं सोच भी नहीं सकता था कि कोई इतना बड़ा षड़यंत्र या इतना बड़ा खेल भी रच सकता है। दिलो दिमाग़ में जो तूफ़ान मचल रहा था उसे मैं बड़ी मुश्किल से दबाए हुए हवेली पहुंचा। आज बहुत कुछ पता चल गया था मुझे। मैं मन ही मन भगवान से उस काका के लिए दुआएं मांग रहा था जिसने मुझे इतने बड़े रहस्य के बारे में बताया था।
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रात का वक़्त था।
गांव से थोड़ा दूर जंगल के बीचों बीच चार इंसानी साए दो दो फिट के अंतराल में खड़े थे। यूं तो आसमान में आधे से थोड़ा कम ही चाँद मौजूद था जिसकी हल्की रौशनी हर तरफ फैली हुई थी लेकिन जंगल के बीच चाँद की वो हल्की रौशनी नहीं पहुंच पा रही थी। इस वजह से सब कुछ धुंधला सा दिख रहा था। रात के सन्नाटे में हवा के चलने से पेड़ों के पत्तों की सरसराने की ही आवाज़ें गूंज रहीं थी।
"अगर ऐसा ही चलता रहा तो हमारे सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा।" उन चारों में से एक साए की धीमी आवाज़ गूंजी_____"शुरु से ले कर अब तक हमने जो कुछ भी किया है उसका कोई भी फ़ायदा नहीं हुआ। उस कम्बख्त दादा ठाकुर ने अपनी पहुंच का फ़ायदा उठा कर सारा मामला ही रफा दफा कर दिया है।"
"बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी?" एक दूसरे साए की कर्कश आवाज़ गूंजी____"एक दिन तो वो हमारे लपेटे में आएगा ही। फिलहाल एक अच्छी बात ये है कि एक चिड़िया पूरी तरह हमारे बस में है। जल्द ही हवेली में एक ऐसा मातम छाने वाला है जिसकी भरपाई हवेली का कोई भी सदस्य नहीं कर पाएगा।"
"मुझे तो डर है कि कहीं वक़्त से पहले दादा ठाकुर को ऐसे किसी काम का शक न हो जाए।" तीसरे साए की सोचपूर्ण आवाज़ गूंजी____"अगर ऐसा हुआ तो समझो ये खेल भी बिगड़ जाएगा।"
"चिंता मत करो।" दूसरे वाले ने कहा____"दादा ठाकुर ख़्वाब में भी नहीं सोच सकता कि ऐसा कुछ हो सकता है। हमने शतरंज की बिसात ही ऐसी बिछाई है कि वो इस तरीके से सोच ही नहीं सकता। इस लिए इस बारे में फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है बल्कि फ़िक्र तो अब इस बात की है कि उसका दूसरा बेटा कुछ ज़्यादा ही अच्छा बन गया है। आज कल वो बुद्धि से कुछ ज़्यादा ही काम लेने लगा है। समझ में नहीं आ रहा कि वो आश्चर्यजनक रूप से इतना कैसे बदल सकता है?"
"उसके इस तरह बदल जाने से ही तो हमारे लिए मुश्किलें पैदा हो गई हैं।" चौथे ने कहा____"मुझे तो रातों में ये सोच सोच कर नींद नहीं आ रही कि उसका गरम खून इतना जल्दी ठंडा कैसे पड़ गया? अपने बाप से भी भिड़ जाने वाला वो छोकरा आख़िर कैसे यूं अचानक अपने बाप की जी हुज़ूरी करने लगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसके बाप ने उसे कोई सम्मोहन करने वाली दवा खिला दी है?"
"यकीनन ऐसा हो सकता है।" दूसरे साए ने कहा_____"क्योंकि इतने कम समय में किसी का इस तरह से कायाकल्प हो जाना लगभग असंभव बात है। जो छोकरा हमेशा अय्याशियां करने में ही मगन रहता था और अपने परिवार वालों की एक नहीं सुनता था उसका इस तरह पलक झपकते ही बदल जाना बिलकुल भी हजम नहीं होता। तुम सच कहते हो, ज़रूर दादा ठाकुर ने उसको कोई ऐसी ही दवा खिला दी है वरना किसी इंसान की फितरत इतना जल्दी बदल जाए ये असंभव है।"
"ये सब छोड़िए।" पहले वाले साए की आवाज़ गूंजी____"और ये सोचिए कि अब आगे हमें क्या करना चाहिए? एक बात और, मेरे एक ख़ास आदमी से मुझे पता चला है कि दादा ठाकुर ने दरोगा को गुप्त रूप से मुरारी के हत्यारे का पता लगाने का काम सौंपा है।"
"हां पता है मुझे।" दूसरे वाले साए ने कहा____"एक दिन तो उस साले दरोगा ने पकड़ ही लिया था मुझे। वो तो मेरी किस्मत अच्छी थी कि वो किसी पत्थर से टकरा कर गिर गया और मुझे उसके होने का पता चल गया था। उसके बाद मैंने बड़ी सफाई से अपने उस आदमी का काम तमाम किया और फिर उड़न छू हो गया था।"
"ऐसा नहीं होना चाहिए था।" तीसरे वाले साए ने कहा____"क्योंकि अब उस दरोगा के अलावा दादा ठाकुर को भी यकीन हो गया है कि मुरारी की हत्या करने के पीछे किसी का यही मकसद था कि उस हत्या में दादा ठाकुर के उस छोकरे को फंसा दिया जाए।"
"सही कहा तुमने।" दूसरे साए ने कहा____"लेकिन अच्छी बात यही है कि ये पता लगने के बाद भी वो दरोगा और दादा ठाकुर ये नहीं जान सकते कि ऐसा किसने किया होगा? हाँ ये ज़रूर है कि अब हमें पूरी तरह से सावधान रहना होगा और अपने किसी भी काम को पूरी सतर्कता से ही करना होगा।"
"क्या ये पता चल सका कि वो नक़ाबपोश कौन था जो उस दिन बगीचे में उस छोकरे का बचाव कर रहा था?" चौथे साए की आवाज़____"मुझे पूरा यकीन है कि वो नक़ाबपोश दादा ठाकुर का ही कोई आदमी है लेकिन हमारे लिए ये पता करना ज़रूरी है कि वो आख़िर है कौन? वो हमारे लिए बहुत ही बड़ा ख़तरा है।"
"मेरे आदमी उसका पता लगाने में लगे हुए है।" दूसरे साए ने कहा____"अभी तक उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली है। ऐसा लगता है वो नक़ाबपोश बहुत ही शातिर है।"
"कितना भी शातिर क्यों न हो।" चौथे साए की आवाज़____"उसका पता करना ज़रूरी है हमारे लिए।"
"एक बात समझ में नहीं आ रही।" दूसरे वाले साए ने कहा____"वो छोकरा उस बंज़र ज़मीन पर मकान क्यों बनवा रहा है? क्या अपनी अय्याशियों के लिए या फिर उसके ज़हन में कुछ और चल रहा है?"
"सुना तो यही है कि वो उस जगह पर महज शान्ति और सुकून के लिए मकान बनवाना चाहता है।" पहले वाले साए ने कहा____"बाकि असल बात क्या है ये तो आने वाले समय में ही पता चलेगा।"
"जो भी हो।" दूसरे साए ने कहा____"लेकिन एक बात निश्चित है कि जिस तरह से वो बदल गया है और बुद्धि से काम लेने लगा है उससे हमारा बना बनाया खेल बिगड़ जाएगा। इस लिए कुछ ऐसा करो कि उसका खेल ही ख़त्म हो जाए। मैं उसे अब और बरदास्त नहीं कर सकता। मुझे उस हवेली में ऐसा मातम छाया हुआ देखना है जो कभी खुशियों में तब्दील ही न हो सके।"
"ये इतना आसान नहीं है।" पहले वाले साए ने कहा____"पहले की बात और थी क्योंकि पहले वो पूरी तरह लापरवाह रहता था लेकिन अब वो सम्हल गया है या यूं कहें कि उसे सम्हल कर चलने के लिए प्रेरित किया गया है। दूसरी बात दादा ठाकुर भी ये समझ चुका है कि कोई तो ऐसा ज़रूर है जो उसके बेटे को मोहरा बनाए हुए है और उसके साथ साथ पूरे ठाकुर खानदान को भी। ऐसे में वो पूरी तरह सम्हल गया है और ये भी यकीन करो कि वो गुप्त रूप से इस सबका पता भी लगा रहा होगा। अब तुम लोग समझ सकते हो कि ऐसी परिस्थिति में हवेली के किसी भी ब्यक्ति का शिकार करना आसान नहीं होगा।"
"ये सब जान कर हम हार नहीं मान सकते।" दूसरे वाले साए ने शख़्त भाव से कहा____"और ना ही अपने प्रतिशोध को भूल सकते हैं।"
"मैं भी कहां अपने प्रतिशोध को भूला हूं?" पहले वाले ने कहा____"प्रतिशोध तो मैं ले कर ही रहूंगा फिर चाहे आख़िर में मुझे सब कुछ खुल कर ही क्यों न करना पड़े।"
"शांत हो जाओ।" तीसरे साए ने कहा_____"किसी को भी अपना संयम खोने की ज़रूरत नहीं है। हमारे लिए अभी यही ज़रूरी है कि परिस्थितियों को देख कर हमें पूरे होशो हवास में काम लेना है। हमारी थोड़ी सी चूक हमारे लिए बहुत बड़ी मुसीबत का सबब बन सकती है। इस लिए माहौल को देख कर काम करो। फिलहाल यही सोच कर तसल्ली रखो कि एक तो बहुत जल्द विदा होने ही वाला है। उसके बाद मौका देख कर दूसरे को भी वैसे ही विदा करवा देंगे।"
"अगर उसको भी उसी तरह विदा करवाना होता तो ये काम पहले ही कर दिया गया होता।" दूसरे साए ने कठोर भाव से कहा____"मगर किया इसी लिए नहीं कि उसे मैं अपने हाथों से तड़पा तड़पा कर इस दुनिया से विदा करना चाहता हूं और ये हो कर ही रहेगा चाहे इसके लिए मुझे कितनी ही बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।"
"वैसे मेरा ख़याल है कि ऐसा खूबसूरत वक़्त जल्द ही आ सकता है।" चौथे साए ने कहा_____"अब तो दोनों परिवारों के बीच अच्छे सम्बन्ध बन चुके हैं और वो छोकरा भी अपने दुश्मनों को दोस्त बना कर उनसे ख़ुशी ख़ुशी घुल मिल रहा है। हमारे लिए ऐसी परिस्थिति में कोई ऐसा सुनहरा मौका ज़रूर मिल सकता है कि हम उस छोकरे को अपने लपेटे में बड़ी आसानी से ले सकें।"
"बेवक़ूफ़ी भरी बात मत करो तुम।" तीसरे साए ने कहा____"तुम्हें क्या लगता है ये सब दाल चावल खाने जैसा आसान है? इस बात को सबसे पहले याद रखो कि दादा ठाकुर को ऐसे ही किसी ख़तरे का आभास हो चुका है इस लिए ये भी यकीन ही करो कि वो इस सबके लिए पूरी तरह से सतर्क हो गया होगा और गुप्त रूप से इस सबका पता भी लगा ही रहा होगा। मुझे तो अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उस छोकरे की फितरत को बदलने के पीछे उसके बाप दादा ठाकुर का ही महत्वपूर्ण हाथ है और मुझे ऐसा भी महसूस हो रहा है कि उसने किसी ख़ास योजना के तहत ही अपने छोकरे को मणि शंकर के यहाँ भेजा होगा।"
"तुम्हारी बातों में यकीनन भारी वजन है।" दूसरे वाले साए ने कहा____"मुझे भी यही आशंका है। ख़ैर तो इन सब बातों का निचोड़ यही है कि फिलहाल हमें कुछ नहीं करना है बल्कि अच्छे वक़्त का इंतज़ार करना है।"
"बिल्कुल।" तीसरे वाले साए ने कहा____"एक और बात, अपने उस दूसरे आदमी को भी कुछ समय के लिए छुपा दो। अगर वो दरोगा के हाथ लग गया तो समझ ही सकते हो कि उस सूरत में हम लोगों की गर्दनें पलक झपकते ही तलवार की धार पर धरी नज़र आएंगी।"
दूसरे साए ने हाँ में सिर हिलाया। उसके बाद चारो के चारो अलग अलग दिशा की तरफ पलट कर चल दिए। कुछ ही देर में वो चारों पेड़ों के बीच कहीं खो गए। जंगल में अब हवा की वजह से सिर्फ पत्तों के सरसराने की ही आवाज़ें सुनाई दे रहीं थी।
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अब तक....
मेनका चाची और कुसुम कुछ देर बाद चली गईं। वो बच्ची लड्डू खाने में ब्यस्त थी और मैं ये सोचने में कि विभोर और अजीत के पास कुसुम की आख़िर ऐसी कौन सी कमज़ोरी है जिसके बल पर वो लोग कुसुम को मेरे खिलाफ़ मोहरा बनाए हुए हैं? आख़िर ऐसी क्या बात हो सकती है जिसके चलते कुसुम उनकी बात मानने के लिए इस हद तक मजबूर है कि वो अपने उस भाई को भी कुछ नहीं बता रही जो उसे दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार और स्नेह देता है? मैंने फैसला किया कि सबसे पहला काम मुझे इसी सच का पता लगाना होगा।
अब आगे....
दिन ढलने लगा था।
भाभी मेरे कमरे में आईं और मुझे बताया कि गुड़िया को लेने के लिए उसकी दादी फूलवती अपने दूसरे बेटे सूर्यभान के साथ आई हैं। मैंने देखा भाभी का चेहरा अब थोड़ा सामान्य था। मैंने भाभी से उनके हाथ की बनी चाय पिलाने को कहा तो वो सिर हिला कर चली गईं। इधर उनके जाने के बाद मैं भी उस बच्ची को ले कर नीचे आ गया।
नीचे आया तो देखा मणि शंकर की बीवी फूलवती माँ और मेनका चाची से बातें कर रही थी। तीनों के चेहरों पर ख़ुशी के भाव थे। बच्ची को लिए जब मैं उनके पास पहुंचा तो फूलवती मुझे और अपनी पोती को देख कर मुस्कुरा उठी।
"ये अभी तक तुमसे ही चिपकी हुई है?" फूलवती ने मुस्कुराते हुए किन्तु हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा____"लगता है तुमसे कुछ ज़्यादा ही घुल मिल गई है ये।"
"आप क्या इसे लेने आई हैं?" मैंने मुस्कुराते हुए पूछा____"पर अब तो ये मेरे पास ही हवेली में रहेगी। है न मेरी प्यारी गुड़िया?"
"हां ताता।" उस बच्ची ने मेरी तरफ देखते हुए मासूमियत से कहा____"मैं आपते पाथ ही लहूंगी।"
"हाय राम!" फूलवती उसकी बात सुन कर चकित भाव से कह उठी____"ये तो सच में तुमसे घुल मिल गई है बेटा। देखो तो एक ही दिन में अपनी उस दादी को भी भूल गई जिसके बिना ये रहती ही नहीं थी।"
मां और चाची उनकी बात सुन कर हंसने लगीं। जबकि फूलवती उस बच्ची से कहने लगी कि चल बेटा घर चल तेरी माँ तुझे बहुत याद कर रही है और तेरे बिना घर भी सूना सूना लगता है। फूलवती की ये बातें सुन कर भी वो बच्ची मेरी गोद से उतर कर उसके पास न गई। आख़िर मैंने जब उसे प्यार से समझाया और ये कहा कि मैं उसके लिए उसके घर लड्डू ले कर आऊंगा तो वो मान गई और फिर ख़ुशी ख़ुशी अपनी दादी के पास चली गई।
रागिनी भाभी सबके लिए चाय ले कर आईं। चाय पीने के बाद मैं बाहर बैठक में आ गया। बैठक में सूर्यभान जगताप चाचा के पास बैठा था और चाय पी रहा था। मैं भी उनके पास ही बैठ गया। कुछ देर हम तीनों के बीच इधर उधर की बातें होती रहीं उसके बाद फूलवती जब आई तो सूर्यभान उन्हें ले कर चला गया।
"तो कैसा चल रहा है हमारे भतीजे के मकान का निर्माण कार्य?" जगताप चाचा ने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा____"ब्यस्तता के चलते उधर जा ही नहीं पाए हम।"
"आधे से ज़्यादा कार्य हो गया है चाचा जी।" मैंने कहा____"जल्द ही शेष कार्य भी पूरा हो जाएगा।"
"चलो अच्छी बात है फिर।" चाचा जी ने कहा____"अच्छा अब तुम बैठो, हमें एक ज़रूरी काम से जाना पड़ेगा।"
चाचा जी के जाने के बाद मैं भी उठा और पैदल ही हवेली से बाहर चल पड़ा। कुछ दूरी से ही सड़क के दोनों तरफ लोगों के कच्चे मकान शुरू हो जाते थे। दिन ढल रहा था इस लिए धुप में ज़्यादा तपिश नहीं रह गई थी। मैं सोचता जा रहा था कि मेरे सामने सबसे महत्वपूर्ण दो मामले थे और दोनों ही मामले गंभीर थे, ख़ास कर बड़े भैया वाला मामला। बड़े भैया का जब भी ख़याल आता था तब मेरे दिल में एक दर्द सा जाग उठता था। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि भैया का जीवन काल इतना जल्दी ख़त्म हो जाएगा। मेरे लिए सबसे बड़ी हैरानी की बात ये थी कि भैया का बर्ताव एकदम से कैसे बदल जाता था? कभी वो बहुत अच्छे से बात करते थे और कभी ऐसे हो जाते थे कि वो गुस्से में आ कर मुझ पर हाथ ही उठा देते थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर ये क्या माजरा है? मैं ये सब सोचता चला ही जा रहा था कि सहसा मुझे ऐसा लगा जैसे कहीं से आवाज़ आई हो। मैं रुक कर इधर उधर देखने लगा और तभी मेरी नज़र दाएं तरफ जा रही एक संकरी गली पर पड़ी। गली के किनारे एक नीम का पेड़ था उसी पेड़ के पास एक आदमी खड़ा था। वो आदमी हमारे ही गांव का था। मैंने देखा वो मुझे अपनी तरफ बुला रहा था। मुझे उसका बर्ताव थोड़ा अजीब सा लगा लेकिन उत्सुकतावश मैं उसकी तरफ बढ़ ही गया।
"क्या बात है काका?" उस आदमी के पास पहुंचते ही मैंने उससे पूछा____"तुम मुझे इस तरह क्यों बुला रहे थे?"
"मेरी इस धृष्टता के लिए मुझे माफ़ कर देना छोटे ठाकुर।" उसने इधर उधर देखते हुए कहा_____"अच्छा हुआ कि आप मुझे मिल गए। मैं कई दिनों से हवेली में आना चाहता था लेकिन बड़ी कोशिश के बाद भी आ नहीं पाया अथवा ये समझ लीजिए कि हवेली में आने की मैं हिम्मत ही नहीं जुटा पाया।"
"आख़िर बात क्या है?" मैं उसकी बात सुन कर सोच में पड़ गया था, बोला_____"तुम किस लिए हवेली आना चाह रहे थे?"
"यहां नहीं छोटे ठाकुर।" उस आदमी ने इधर उधर देखते हुए धीमें स्वर में कहा____"आप मेरे साथ मेरे घर चलिए। मुझे आपको बहुत ज़रूरी बात बतानी है।"
उस आदमी की बात सुन कर मैं चौंका। एकाएक मेरे ज़हन में कई तरह के ख़याल उभरने लगे। मैं फ़ौरन ही उस आदमी के साथ चल पड़ा। जिस गली में हम थे वो ज़्यादा चौड़ी नहीं थी। अगल बगल बने घरों के बगल की दीवार थी गली की तरफ। आगे जा कर वो गली बाएं तरफ मुड़ जाती थी जहां पर निम्न वर्ग के लोगों के घर बने हुए थे। कुछ ही देर में मैं उस आदमी के साथ एक घर में पहुंच गया। आदमी ने इधर उधर नज़र घुमाई और एक तरफ देख कर हाथ से एक इशारा किया। मैंने उस तरफ देखा तो एक और आदमी परली तरफ खड़ा था। मुझे कुछ समझ नहीं आया लेकिन इतना ज़रूर सोचा कि कुछ तो बात ज़रूर है।
"वो मेरा छोटा भाई है छोटे ठाकुर।" उस आदमी ने कहा____"मैंने उसे निगरानी में लगा रखा है। असल में कुछ दिनों से मुझे एक बड़े ख़तरे का आभास हो रहा है।"
"आख़िर बात क्या है काका?" मैं बेचैन भाव से बोल पड़ा____"तुम साफ़ साफ़ बताते क्यों नहीं मुझे?"
"अन्दर आ जाइए।" उसने कहा और घर के अंदर दाखिल हो गया। उसके पीछे मैं भी सोच में डूबा दाखिल हो गया। मन में तरह तरह के ख़याल उभर रहे थे।
"अरे! ओ धनिया।" आदमी ने अंदर तरफ किसी को पुकारा____"जल्दी से जल पान ला, छोटे ठाकुर आए हैं।"
"काका इस सबकी कोई ज़रूरत नहीं है।" मुझसे अब रहा नहीं जा रहा था, इस लिए उतावलेपन से बोल पड़ा_____"तुम मुझे बस वो बताओ जिसके लिए तुम हवेली आना चाहते थे या फिर मुझे यहाँ ले कर आए हो।"
"तीन दिन पहले की बात है छोटे ठाकुर।" मैं जब खटिया में बैठ गया तो वो मेरे पास ही ज़मीन पर बैठने के बाद गंभीर भाव से बोला_____"मेरी भैंस घर नहीं आई थी तो मैं उसे खोज रहा था। आख़िर बड़ी खोज के बाद वो शाम को मुझे नदी के पास मिली। मेरे साथ मेरा छोटा भाई कलुवा भी था। मैंने कलुवा को भैंस ले कर घर चले जाने को कहा और खुद दिशा मैदान के लिए वहीं रुक गया। आप तो जानते हैं कि नदी से कुछ दूरी पर ही गांव के साहूकारों का बगीचा शुरू होता है। मैं डर तो रहा था कि मुझे उस जगह पर दिशा मैदान करते हुए साहूकारों का कोई नौकर न देख ले लेकिन क्योंकि मेरा ज़ोरों से पेट चढ़ा हुआ था इस लिए मजबूरन मुझे वहीं बैठ जाना पड़ा। दिशा मैदान से फुर्सत होने के बाद मैं उनके बगीचे से ही घुस कर घर की तरफ चल दिया। मैंने सोचा था कि बगीचे से हो कर अगर जाऊंगा तो जल्दी ही गांव की मुख्य सड़क पर पहुंच जाऊंगा। अँधेरा घिर चुका था पर मैं अंदाज़न चलता ही जा रहा था। थोड़ी दूर ही आया था कि अँधेरे में मुझे थोड़ी देर के लिए हवा में आग जलती दिखी और फिर बूझ गई। मैं समझ गया कि किसी ने बीड़ी सुलगाया होगा लेकिन तभी ख़याल आया कि अँधेरे में उस वक़्त भला वहां पर कौन हो सकता है? जहां तक मुझे पता था दिन ढले ही बगीचा सुनसान हो जाता था। ख़ैर मैंने इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और आगे बढ़ चला। कुछ दूर ही आया था कि तभी किसी के चिल्लाने की आवाज़ सुन कर मैं एकदम से उछल पड़ा। चिल्लाने की आवाज़ किसी लड़की या औरत की थी। मैंने सोचा अँधेरे में उस वक़्त कौन हो सकती थी जो इस तरह चिल्लाई थी? मन में एक उत्सुकता जाग उठी थी इस लिए दबे पाँव उस तरफ को मुड़ गया। डर तो बहुत लग रहा था छोटे ठाकुर क्योंकि साहूकारों का बगीचा था पर शायद नियति यही चाहती थी इस लिए मैं दबे पाँव उस तरफ बढ़ता ही चला गया।"
वो आदमी सांस लेने के लिए कुछ देर रुका। मैं गौर से उसकी बातें सुन रहा था। अभी वो फिर से बोलने ही वाला था कि अंदर से एक लड़की हाथ में एक थाली लिए आई। मैंने देखा लड़की जवान थी। सांवली रंगत वाले जिस्म पर घाघरा चोली था। चोली में कैद उसकी चूचियां साफ़ बता रहीं थी कि लड़की अब भरपूर जवान हो चुकी है। शायद इसी का नाम धनिया था और उस आदमी की बेटी थी। उसने झुक कर मेरी तरफ थाली बढ़ाई जिसमें एक गिलास पानी रखा हुआ था। वो झुकी हुई थी तो मेरी नज़र एकदम से उसके उभारों पर चली गई। चोली का गला झुकने से नीचे की तरफ फ़ैल सा गया था जिससे मुझे साफ़ साफ़ उसके उभार दिखने लगे थे। मेरे मन में एक हलचल सी हुई तो मैंने जल्दी से उसके उभारों से नज़र हटा कर ग्लास उठा लिया। मेरे ग्लास उठाते ही वो सीधा हुई और अंदर चली गई।
"आगे बताओ काका।" उसके जाते ही मैंने उस आदमी से कहा____"उसके बाद क्या हुआ?"
"बगीचे की ज़मीन पर सूखे पत्ते पड़े हुए थे इस लिए मेरे चलने से आवाज़ पैदा हो रही थी।" काका ने कहना शुरू किया____"और इस आवाज़ के चलते मैं ये सोच कर और भी डर रहा था कि कहीं मैं पकड़ा न जाऊं। उधर किसी लड़की या औरत के चिल्लाने की आवाज़ बीच बीच में आ रही थी। मैंने साफ़ सुना था कि वो खुद को छोड़ देने के लिए मिन्नतें कर रही थी, रो रही थी, गिड़गिड़ा रही थी। मैं किसी तरह उस तरफ पहुंचा। अचानक चिल्लाने की आवाज़ बंद हो गई। ऐसा लगा जैसे किसी ने जादू किया हो और शोर गुल शांत हो गया हो। मैं एक पेड़ के पीछे छुप कर खड़ा हो गया था। मुझसे क़रीब दस या पंद्रह क़दम की दूरी पर अँधेरे में मुझे तीन लोग खड़े दिखाई दिए। अँधेरे की वजह से उनकी शकल नहीं दिख रही थी और ना ही उनके कपड़े ठीक से समझ में आ रहे थे। उनमें से एक आदमी थोड़ा झुका हुआ दिख रहा था। शायद वो उस लड़की या औरत को पकड़े हुए था जो कुछ देर पहले चिल्ला रही थी।"
"मैंने तो पहले ही कहा था कि इस रांड के बस का नहीं है हवेली से उन कागज़ातों को निकाल कर लाना।" सन्नाटे को चीरती उनमें से एक की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी थी____"लेकिन आप ही नहीं माने और इसे हवेली की नौकरानी बना कर वहां रखवा दिया।"
"ग़लती तो हो ही गई मुझसे।" दूसरे की आवाज़ आई____"मुझे क्या पता था कि ये अपनी खूबसूरती और अपने मादक जिस्म का सही उपयोग ही नहीं कर पाएगी। इससे ज़्यादा समझदार तो वो शीला निकली जिसने अपने काम को अच्छे तरीके से अंजाम देना शुरू कर दिया है।"
"मुझे लगता है इसे थोड़ा और वक़्त देना चाहिए।" तीसरे की आवाज़ थी ये____"मत भूलिए कि इसी की वजह से हमारा एक महत्वपूर्ण काम सफलता से हुआ है। हवेली में आज कल जिस तरह के हालात हैं उसमें इसके लिए ये काम करना फिलहाल आसान नहीं हो सकता। उस कम्बख्त दादा ठाकुर को अब यकीन हो चला है कि कोई तो है जो उसके खानदान को बर्बाद करने के लिए शातिर खेल खेल रहा है। ज़ाहिर है ऐसे में वो पूरी तरह सतर्क हो गया होगा।"
"ये सही कह रहा है।" पहले वाले की आवाज़____"मामला थोड़ा पेंचीदा है इस लिए इसे थोड़ा वक़्त देना चाहिए हमें।"
"मुझ पर यकीन कीजिए।" सहसा वो लड़की या औरत की आवाज़ आई जो पहले चिल्ला रही थी____"मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही हूं लेकिन क्या करूं वहीं की दोनों ठकुराईनें हर वक़्त वहीं जमी रहती हैं। इस वजह से मुझे दादा ठाकुर के कमरे में जाने का मौका ही नहीं मिलता।"
"क्या एक बार भी उसके कमरे में जाने का तुझे मौका नहीं मिला?" दूसरे वाले की आवाज़ आई तो उस औरत ने कहा____"ऐसे तो कई बार मिला है और मैं गई भी हूं लेकिन ज़्यादा समय तक कमरे में रह ही नहीं पाई वरना उस कमरे में उन कागज़ातों को ज़रूर तलाश करती।"
"उसके कमरे को देख कर क्या समझ आया था तुझे?" दूसरे वाले ने उससे पूछा।
"समझ आया मतलब? मैं कुछ समझी नहीं?" उस औरत की उलझी हुई आवाज़।
"अरे! मतलब ये कि उस दादा ठाकुर के कमरे को देख कर।" दूसरे वाले की आवाज़ में इस बार थोड़ा गुस्सा था____"क्या तुझे ऐसा लगा कि उसी कमरे में वो कागज़ात रखे हो सकते हैं?"
"उनके कमरे में तो चारो तरफ बहुत कुछ है।" उस औरत की आवाज़____"लेकिन ठीक से देखने का मौका ही नहीं मिल पाया मुझे।"
"देख मैं इन दोनों के कहने पर तुझे आख़िरी मौका दे रहा हूं।" दूसरे वाले कठोरता से कहा____"अगर तूने वहां से कागज़ात निकाल कर हमें नहीं दिया तो सोच लेना कि तू और तेरा परिवार इस दुनिया में नहीं रहेगा।"
"वो तीनों लोग कौन थे काका?" वो आदमी जब सब कुछ बता कर चुप हुआ तो मैंने गहरी सांस लेते हुए उससे पूछा____"क्या उन तीनों की आवाज़ों से तुम उन्हें पहचान पाए?"
"यही तो नहीं हो पाया छोटे ठाकुर।" उस आदमी ने बेबस भाव से कहा____"अँधेरे की वजह से उनकी शकल तो वैसे भी नहीं दिख रही थी लेकिन बातें भी वो धीमें स्वर में ही कर रहे थे इस लिए साफ़ साफ़ उनकी आवाज़ मेरे कानों में नहीं पहुंच पा रही थी, अगर वो खुल कर बातें करते तो शायद उनकी आवाज़ से मैं कुछ अंदाज़ा लगा पाता।"
"और वो औरत कौन थी?" मैंने कहा___"क्या उसे भी नहीं पहचान पाए?"
"मुझे माफ़ कर दीजिए छोटे ठाकुर।" वो आदमी बेबसी बोल पड़ा____"औरत को पहचानना तो वैसे भी मेरे लिए मुश्किल था क्योंकि मैंने इस गांव की ज़्यादातर औरतों की आवाज़ें सुनी ही नहीं हैं।"
"ख़ैर उसके बाद क्या हुआ?" मैंने काका की तरफ देखते हुए पूछा____"क्या वो लोग वहीं रहे या फिर उनके जाने के बाद तुमने उनका पीछा भी किया था?"
"पीछा करने की नौबत ही नहीं आई छोटे ठाकुर।" काका ने कहा____"उनको पता चल गया कि वहां पर उनके अलावा भी कोई है जो उनकी बातें सुन रहा है।"
"अरे! पर उन्हें पता कैसे चल गया?" मैंने काका की बात सुन कर हैरानी से पूछा।
"मेरे दुर्भाग्य की वजह से छोटे ठाकुर।" काका ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"मैं पेड़ के पीछे खड़ा उनकी बातें सुन रहा था कि तभी मेरे पैर में से कोई चीज़ एकदम सर्र से निकल गई जिसके चलते मैं डर के मारे उछल ही पड़ा था और मेरे मुख से आवाज़ भी निकल गई थी। बस उसके बाद तो जैसे मुझ पर क़यामत ही टूट पड़ी थी। मैं भी अपनी जान बचा कर इस तरह वहां से भाग खड़ा हुआ था जैसे सैकड़ों भूत मेरे पीछे पड़ गए हों। पीछे मुड़ कर एक बार भी नहीं देखा था मैंने। सीधा घर पर ही आ कर रुका था।"
"तो इस बात को बताने के लिए तुम हवेली आना चाहते थे?" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा___"और अपने छोटे भाई को निगरानी में लगा रखे हो?"
"हां छोटे ठाकुर।" काका ने गंभीरता से कहा____"मैं यही सोच कर डर गया था कि क्या उन लोगों ने मुझे पहचान लिया होगा? आज तीसरा दिन है और अब यही लगने लगा है कि उस दिन उन लोगों ने मुझे पहचाना नहीं था। अगर पहचान गए होते तो संभव है कि आज मैं आपके सामने जीवित न बैठा होता। मैंने कई बार ये सब दादा ठाकुर से बताने के लिए हवेली जाने का मन बनाया लेकिन हिम्मत न हुई। क्योंकि मुझे कहीं न कहीं यही लगता है कि वो हवेली की तरफ जाने वाले हर ब्यक्ति को जांच परख रहे होंगे और जब मुझ जैसा नीच जाति का आदमी हवेली की तरफ जाता हुआ उन्हें दिखेगा तो वो फ़ौरन समझ जाएंगे कि उस रात उनकी बातें सुनने वाला शायद मैं ही था।"
"शायद तुम सही कह रहे हो काका।" मैंने काका की बुद्धि की मन ही मन सराहना की, फिर बोला____"तुम्हारी इस बुद्धिमानी ने ही तुम्हें अब तक सही सलामत रखा है और मेरा तुमसे यही कहना है कि तुम अब हवेली की तरफ देखना भी नहीं। अच्छा हुआ कि इत्तेफ़ाक से आज पैदल चलते हुए मैं इधर से गुज़र रहा था और तुमने मुझे देख लिया। सही कहते हैं बूढ़े बुजुर्ग लोग कि जो होता है अच्छे के लिए होता है। तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद काका ये सब बताने के लिए। आज तुमने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है। तुम्हारे इस खूबसूरत उपकार को मैं कभी नहीं भूलूंगा। तुमने हमारे प्रति जो वफ़ादारी दिखाई है उसका मोल एक दिन ज़रूर मिलेगा तुम्हें। ख़ैर, अब चलता हूं काका, अपना ख़याल रखना।"
"रूकिए छोटे ठाकुर।" मेरे उठते ही काका ने झट से कहा____"एक और बात उनके मुख से सुनी थी मैंने। मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा कि कोई ऐसा भी कर सकता है।"
"ऐसी कौन सी बात सुनी थी तुमने?" मैंने उत्सुकतावश पूछा।
और काका ने मुझे जो बात बताई उसे सुन कर मैं बुरी तरह अचम्भे में पड़ गया था किन्तु अगले ही पल मेरे चेहरे पर पत्थर जैसी शख़्ती उभर आई। गुस्से के मारे मेरी आँखें लाल सुर्ख पड़ने लगीं थी। काका ने मुझे किसी तरह समझा बुझा कर शांत किया।
सूरज डूब चुका था और अँधेरे की चादर चारो तरफ फैलने लगी थी। मैं गहरी सोच में डूबा हवेली की तरफ चला जा रहा था। मैं सोच भी नहीं सकता था कि कोई इतना बड़ा षड़यंत्र या इतना बड़ा खेल भी रच सकता है। दिलो दिमाग़ में जो तूफ़ान मचल रहा था उसे मैं बड़ी मुश्किल से दबाए हुए हवेली पहुंचा। आज बहुत कुछ पता चल गया था मुझे। मैं मन ही मन भगवान से उस काका के लिए दुआएं मांग रहा था जिसने मुझे इतने बड़े रहस्य के बारे में बताया था।
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रात का वक़्त था।
गांव से थोड़ा दूर जंगल के बीचों बीच चार इंसानी साए दो दो फिट के अंतराल में खड़े थे। यूं तो आसमान में आधे से थोड़ा कम ही चाँद मौजूद था जिसकी हल्की रौशनी हर तरफ फैली हुई थी लेकिन जंगल के बीच चाँद की वो हल्की रौशनी नहीं पहुंच पा रही थी। इस वजह से सब कुछ धुंधला सा दिख रहा था। रात के सन्नाटे में हवा के चलने से पेड़ों के पत्तों की सरसराने की ही आवाज़ें गूंज रहीं थी।
"अगर ऐसा ही चलता रहा तो हमारे सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा।" उन चारों में से एक साए की धीमी आवाज़ गूंजी_____"शुरु से ले कर अब तक हमने जो कुछ भी किया है उसका कोई भी फ़ायदा नहीं हुआ। उस कम्बख्त दादा ठाकुर ने अपनी पहुंच का फ़ायदा उठा कर सारा मामला ही रफा दफा कर दिया है।"
"बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी?" एक दूसरे साए की कर्कश आवाज़ गूंजी____"एक दिन तो वो हमारे लपेटे में आएगा ही। फिलहाल एक अच्छी बात ये है कि एक चिड़िया पूरी तरह हमारे बस में है। जल्द ही हवेली में एक ऐसा मातम छाने वाला है जिसकी भरपाई हवेली का कोई भी सदस्य नहीं कर पाएगा।"
"मुझे तो डर है कि कहीं वक़्त से पहले दादा ठाकुर को ऐसे किसी काम का शक न हो जाए।" तीसरे साए की सोचपूर्ण आवाज़ गूंजी____"अगर ऐसा हुआ तो समझो ये खेल भी बिगड़ जाएगा।"
"चिंता मत करो।" दूसरे वाले ने कहा____"दादा ठाकुर ख़्वाब में भी नहीं सोच सकता कि ऐसा कुछ हो सकता है। हमने शतरंज की बिसात ही ऐसी बिछाई है कि वो इस तरीके से सोच ही नहीं सकता। इस लिए इस बारे में फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है बल्कि फ़िक्र तो अब इस बात की है कि उसका दूसरा बेटा कुछ ज़्यादा ही अच्छा बन गया है। आज कल वो बुद्धि से कुछ ज़्यादा ही काम लेने लगा है। समझ में नहीं आ रहा कि वो आश्चर्यजनक रूप से इतना कैसे बदल सकता है?"
"उसके इस तरह बदल जाने से ही तो हमारे लिए मुश्किलें पैदा हो गई हैं।" चौथे ने कहा____"मुझे तो रातों में ये सोच सोच कर नींद नहीं आ रही कि उसका गरम खून इतना जल्दी ठंडा कैसे पड़ गया? अपने बाप से भी भिड़ जाने वाला वो छोकरा आख़िर कैसे यूं अचानक अपने बाप की जी हुज़ूरी करने लगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसके बाप ने उसे कोई सम्मोहन करने वाली दवा खिला दी है?"
"यकीनन ऐसा हो सकता है।" दूसरे साए ने कहा_____"क्योंकि इतने कम समय में किसी का इस तरह से कायाकल्प हो जाना लगभग असंभव बात है। जो छोकरा हमेशा अय्याशियां करने में ही मगन रहता था और अपने परिवार वालों की एक नहीं सुनता था उसका इस तरह पलक झपकते ही बदल जाना बिलकुल भी हजम नहीं होता। तुम सच कहते हो, ज़रूर दादा ठाकुर ने उसको कोई ऐसी ही दवा खिला दी है वरना किसी इंसान की फितरत इतना जल्दी बदल जाए ये असंभव है।"
"ये सब छोड़िए।" पहले वाले साए की आवाज़ गूंजी____"और ये सोचिए कि अब आगे हमें क्या करना चाहिए? एक बात और, मेरे एक ख़ास आदमी से मुझे पता चला है कि दादा ठाकुर ने दरोगा को गुप्त रूप से मुरारी के हत्यारे का पता लगाने का काम सौंपा है।"
"हां पता है मुझे।" दूसरे वाले साए ने कहा____"एक दिन तो उस साले दरोगा ने पकड़ ही लिया था मुझे। वो तो मेरी किस्मत अच्छी थी कि वो किसी पत्थर से टकरा कर गिर गया और मुझे उसके होने का पता चल गया था। उसके बाद मैंने बड़ी सफाई से अपने उस आदमी का काम तमाम किया और फिर उड़न छू हो गया था।"
"ऐसा नहीं होना चाहिए था।" तीसरे वाले साए ने कहा____"क्योंकि अब उस दरोगा के अलावा दादा ठाकुर को भी यकीन हो गया है कि मुरारी की हत्या करने के पीछे किसी का यही मकसद था कि उस हत्या में दादा ठाकुर के उस छोकरे को फंसा दिया जाए।"
"सही कहा तुमने।" दूसरे साए ने कहा____"लेकिन अच्छी बात यही है कि ये पता लगने के बाद भी वो दरोगा और दादा ठाकुर ये नहीं जान सकते कि ऐसा किसने किया होगा? हाँ ये ज़रूर है कि अब हमें पूरी तरह से सावधान रहना होगा और अपने किसी भी काम को पूरी सतर्कता से ही करना होगा।"
"क्या ये पता चल सका कि वो नक़ाबपोश कौन था जो उस दिन बगीचे में उस छोकरे का बचाव कर रहा था?" चौथे साए की आवाज़____"मुझे पूरा यकीन है कि वो नक़ाबपोश दादा ठाकुर का ही कोई आदमी है लेकिन हमारे लिए ये पता करना ज़रूरी है कि वो आख़िर है कौन? वो हमारे लिए बहुत ही बड़ा ख़तरा है।"
"मेरे आदमी उसका पता लगाने में लगे हुए है।" दूसरे साए ने कहा____"अभी तक उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली है। ऐसा लगता है वो नक़ाबपोश बहुत ही शातिर है।"
"कितना भी शातिर क्यों न हो।" चौथे साए की आवाज़____"उसका पता करना ज़रूरी है हमारे लिए।"
"एक बात समझ में नहीं आ रही।" दूसरे वाले साए ने कहा____"वो छोकरा उस बंज़र ज़मीन पर मकान क्यों बनवा रहा है? क्या अपनी अय्याशियों के लिए या फिर उसके ज़हन में कुछ और चल रहा है?"
"सुना तो यही है कि वो उस जगह पर महज शान्ति और सुकून के लिए मकान बनवाना चाहता है।" पहले वाले साए ने कहा____"बाकि असल बात क्या है ये तो आने वाले समय में ही पता चलेगा।"
"जो भी हो।" दूसरे साए ने कहा____"लेकिन एक बात निश्चित है कि जिस तरह से वो बदल गया है और बुद्धि से काम लेने लगा है उससे हमारा बना बनाया खेल बिगड़ जाएगा। इस लिए कुछ ऐसा करो कि उसका खेल ही ख़त्म हो जाए। मैं उसे अब और बरदास्त नहीं कर सकता। मुझे उस हवेली में ऐसा मातम छाया हुआ देखना है जो कभी खुशियों में तब्दील ही न हो सके।"
"ये इतना आसान नहीं है।" पहले वाले साए ने कहा____"पहले की बात और थी क्योंकि पहले वो पूरी तरह लापरवाह रहता था लेकिन अब वो सम्हल गया है या यूं कहें कि उसे सम्हल कर चलने के लिए प्रेरित किया गया है। दूसरी बात दादा ठाकुर भी ये समझ चुका है कि कोई तो ऐसा ज़रूर है जो उसके बेटे को मोहरा बनाए हुए है और उसके साथ साथ पूरे ठाकुर खानदान को भी। ऐसे में वो पूरी तरह सम्हल गया है और ये भी यकीन करो कि वो गुप्त रूप से इस सबका पता भी लगा रहा होगा। अब तुम लोग समझ सकते हो कि ऐसी परिस्थिति में हवेली के किसी भी ब्यक्ति का शिकार करना आसान नहीं होगा।"
"ये सब जान कर हम हार नहीं मान सकते।" दूसरे वाले साए ने शख़्त भाव से कहा____"और ना ही अपने प्रतिशोध को भूल सकते हैं।"
"मैं भी कहां अपने प्रतिशोध को भूला हूं?" पहले वाले ने कहा____"प्रतिशोध तो मैं ले कर ही रहूंगा फिर चाहे आख़िर में मुझे सब कुछ खुल कर ही क्यों न करना पड़े।"
"शांत हो जाओ।" तीसरे साए ने कहा_____"किसी को भी अपना संयम खोने की ज़रूरत नहीं है। हमारे लिए अभी यही ज़रूरी है कि परिस्थितियों को देख कर हमें पूरे होशो हवास में काम लेना है। हमारी थोड़ी सी चूक हमारे लिए बहुत बड़ी मुसीबत का सबब बन सकती है। इस लिए माहौल को देख कर काम करो। फिलहाल यही सोच कर तसल्ली रखो कि एक तो बहुत जल्द विदा होने ही वाला है। उसके बाद मौका देख कर दूसरे को भी वैसे ही विदा करवा देंगे।"
"अगर उसको भी उसी तरह विदा करवाना होता तो ये काम पहले ही कर दिया गया होता।" दूसरे साए ने कठोर भाव से कहा____"मगर किया इसी लिए नहीं कि उसे मैं अपने हाथों से तड़पा तड़पा कर इस दुनिया से विदा करना चाहता हूं और ये हो कर ही रहेगा चाहे इसके लिए मुझे कितनी ही बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।"
"वैसे मेरा ख़याल है कि ऐसा खूबसूरत वक़्त जल्द ही आ सकता है।" चौथे साए ने कहा_____"अब तो दोनों परिवारों के बीच अच्छे सम्बन्ध बन चुके हैं और वो छोकरा भी अपने दुश्मनों को दोस्त बना कर उनसे ख़ुशी ख़ुशी घुल मिल रहा है। हमारे लिए ऐसी परिस्थिति में कोई ऐसा सुनहरा मौका ज़रूर मिल सकता है कि हम उस छोकरे को अपने लपेटे में बड़ी आसानी से ले सकें।"
"बेवक़ूफ़ी भरी बात मत करो तुम।" तीसरे साए ने कहा____"तुम्हें क्या लगता है ये सब दाल चावल खाने जैसा आसान है? इस बात को सबसे पहले याद रखो कि दादा ठाकुर को ऐसे ही किसी ख़तरे का आभास हो चुका है इस लिए ये भी यकीन ही करो कि वो इस सबके लिए पूरी तरह से सतर्क हो गया होगा और गुप्त रूप से इस सबका पता भी लगा ही रहा होगा। मुझे तो अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उस छोकरे की फितरत को बदलने के पीछे उसके बाप दादा ठाकुर का ही महत्वपूर्ण हाथ है और मुझे ऐसा भी महसूस हो रहा है कि उसने किसी ख़ास योजना के तहत ही अपने छोकरे को मणि शंकर के यहाँ भेजा होगा।"
"तुम्हारी बातों में यकीनन भारी वजन है।" दूसरे वाले साए ने कहा____"मुझे भी यही आशंका है। ख़ैर तो इन सब बातों का निचोड़ यही है कि फिलहाल हमें कुछ नहीं करना है बल्कि अच्छे वक़्त का इंतज़ार करना है।"
"बिल्कुल।" तीसरे वाले साए ने कहा____"एक और बात, अपने उस दूसरे आदमी को भी कुछ समय के लिए छुपा दो। अगर वो दरोगा के हाथ लग गया तो समझ ही सकते हो कि उस सूरत में हम लोगों की गर्दनें पलक झपकते ही तलवार की धार पर धरी नज़र आएंगी।"
दूसरे साए ने हाँ में सिर हिलाया। उसके बाद चारो के चारो अलग अलग दिशा की तरफ पलट कर चल दिए। कुछ ही देर में वो चारों पेड़ों के बीच कहीं खो गए। जंगल में अब हवा की वजह से सिर्फ पत्तों के सरसराने की ही आवाज़ें सुनाई दे रहीं थी।
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