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Hindi Xkahani - प्यार का सबूत

अध्याय - 50
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अब तक....


"फिर तो हमें जल्द ही अपने कुछ भरोसे के आदमियों को उन पर नज़र रखने के काम पर लगा देना चाहिए पिता जी।" मैंने जोशपूर्ण भाव से कहा____"हमारे पास फिलहाल अपने असल दुश्मन तक पहुंचने का कोई रास्ता या सुराग़ नहीं है तो अगर इस तरह में हमारे हाथ कुछ लग जाता है तो ये बड़ी बात ही होगी।"

कुछ देर और इस संबंध में पिता जी से हमारी बातें हुईं उसके बाद हम दोनों भाई बैठक से चले गए। एक तरफ जहां मैं इस मामले से गंभीर सोच में डूब गया था वहीं दूसरी तरफ इस बात से खुश भी था कि मेरे बड़े भैया अब मेरे साथ थे और ऐसे मामले में वो भी हमारे साथ क़दम से क़दम मिला कर चल रहे थे।


अब आगे....


दोपहर का खाना खाने के बाद मैं और बड़े भैया एक साथ ही ऊपर अपने अपने कमरे की तरफ चले थे। जैसे ही हम दोनों ऊपर पहुंचे तो पीछे से विभोर के पुकारने पर हम दोनों ही ठिठक कर पलटे। हमने देखा विभोर और अजीत सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर ही आ रहे थे। ये पहली बार था जब उनमें से किसी ने मुझे पुकारा था। ख़ैर जल्दी ही वो दोनों ऊपर हमारे पास आ कर खड़े हो गए। दोनों हमसे नज़रें चुरा रहे थे।

"क्या बात है?" मैंने दोनों की तरफ बारी बारी से देखते हुए सामान्य भाव से पूछा____"कोई काम है मुझसे?"
"ज...जी भैया वो मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं।" विभोर ने झिझकते हुए धीमें स्वर में कहा तो मैंने कहा____"जो भी कहना है बेझिझक कहो और हां, मेरे सामने तुम्हें शर्मिंदा होने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं चाहता हूं कि जो बीत गया है उसे भूल जाओ और एक नए सिरे से किंतु साफ़ नीयत के साथ अपने जीवन की शुरुआत करो। ख़ैर, अब बोलो क्या कहना चाहते हो मुझसे?"

"मुझे माफ़ कर दीजिए भैया।" विभोर ने दुखी भाव से कहा____"मैंने आपके साथ क्या क्या बुरा नहीं किया लेकिन इसके बाद भी आप मुझसे इतने अच्छे से बात कर रहे हैं और सब कुछ भूल जाने को कह रहे हैं। पता नहीं वो कौन सी मनहूस घड़ी थी जब मेरे मन में आपके प्रति ईर्ष्या का भाव पैदा हो गया था, उसके बाद तो जैसे मुझे किसी बात का होश ही नहीं रह गया था।"

"भूल जाओ वो सब बातें।" मैंने विभोर के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा____"हर इंसान से ग़लतियां होती हैं। तुमने तो शायद पहली बार ही ऐसी ग़लती की थी जबकि मैंने तो न जाने कितनी ग़लतियां की हैं। ख़ैर अच्छी बात ये होनी चाहिए कि इंसान ऐसी ग़लतियां दुबारा न करे और कुछ ऐसा कर के दिखाए जिससे लोग उसकी वाह वाही करने लगें।"

"अब से हम दोनों ऐसा ही काम करेंगे वैभव भैया।" अजीत ने कहा____"अब से हम दोनों वही करेंगे जिससे आपका और हमारे खानदान का नाम ऊंचा हो। अब से हम किसी को भी शिकायत का मौका नहीं देंगे, लेकिन उससे पहले हम अपनी बहन से माफ़ी मांगना चाहते हैं।"

"हां भैया।" विभोर ने कहा____"हमने अपनी मासूम सी बहन का बहुत दिल दुखाया है। अब जबकि हमें अपनी ग़लतियों का एहसास हुआ है तो ये भी एहसास हो रहा है कि हमने उसके साथ कितनी बड़ी ज़्यादती की है। ऊपर वाला हम जैसे भाई किसी बहन को न दे।"

"मुझे खुशी हुई कि तुम दोनों को अपनी ग़लतियों का एहसास हो गया है।" बड़े भैया ने कहा____"लेकिन सिर्फ एहसास होने बस से इंसान अच्छा नहीं बन जाता बल्कि उसके लिए उसे प्रायश्चित करना होता है और ऐसे कर्म करने पड़ते हैं जिससे कि उस इंसान की अंतरात्मा खुश हो जाए जिसका उसने दिल दुखाया होता है। ख़ैर अब तुम जाओ और कुसुम से अपने किए की माफ़ी मांग लो। वैसे मुझे यकीन है कि वो तुम दोनों को बड़ी सहजता से माफ़ कर देगी क्योंकि हमारी बहन का दिल बहुत ही विशाल है।"

बड़े भैया के ऐसा कहने पर विभोर और अजीत ने अपनी अपनी आंखों के आंसू पोंछे और कुसुम के कमरे की तरफ बढ़ गए। उनके जाने के बाद हम दोनों एक दूसरे की तरफ देख कर मुस्कुरा उठे। मैंने कुछ सोचते हुए भैया को एक अहम काम सौंपा और खुद वापस सीढ़ियों की तरफ बढ़ चला।

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मैं हवेली से निकल कर अपनी बुलेट से हाथी दरवाज़े के पास ही पहुंचा था कि मुझे मुंशी चंद्रकांत एक आदमी के साथ मिल गया। मुझे देखते ही दोनों ने सलाम किया। मैंने कई दिनों बाद आज मुंशी को देखा था जिसके चलते मेरे मन में कई सारे सवाल खड़े हो गए थे।

"आज कल तो आप इर्द का चांद हो गए हैं मुंशी जी।" मैंने मोटर साईकिल उसके क़रीब ही खड़े कर के कहा____"काफ़ी दिन से आप कहीं नज़र ही नहीं आए।"

"मैं अपने बेटे के साथ उसकी ससुराल गया हुआ था छोटे ठाकुर।" मुंशी ने अपनी खीसें निपोरते हुए कहा____"ठाकुर साहब की इजाज़त ले कर ही गया था। असल में बात ये थी कि मेरी समधन काफी बीमार थीं तो उन्हीं का हाल चाल देखने गया था। वैसे गया तो मैं एक दिन के लिए ही था क्योंकि यहां काम ही इतना था कि मुझे ज़्यादा समय तक कहीं रुकने की फुर्सत ही नहीं थी किंतु वहां से जल्दी वापस आ ही नहीं पाया। समधन ने ज़बरदस्ती रोके रखा ये कह कर कि कभी आते नहीं हैं तो कम से कम एक दो दिन तो सेवा करने का मौका मिलना ही चाहिए। बड़ी मुश्किल से वहां से छूटा तो एक दिन के लिए अपनी ससुराल चला गया। असल में कोमल बिटिया काफी समय से वहीं थी तो सोचा उसको भी घर ले आऊं। अभी घंटा भर पहले ही हम सब घर पहुंचे थे। थोड़ी देर आराम करने के बाद सीधा हवेली चला आया। डर रहा हूं कि कहीं ठाकुर साहब मेरे इस तरह अवकाश करने से नाराज़ ना हो गए हों।"

"चलिए कोई बात नहीं मुंशी जी।" मैं मन ही मन ये सोच कर थोड़ा खुश हो गया था कि मुंशी अपनी बेटी कोमल को उसकी ननिहाल से घर ले आया है, किंतु प्रत्यक्ष में बोला_____"जाइए पिता जी हवेली में ही हैं। मैं किसी काम से बाहर जा रहा हूं।"

मुंशी से विदा ले कर मैं आगे बढ़ चला। मैं सोच रहा था कि क्या मुंशी सच बोल रहा था अथवा झूठ? क्या वो सच में इतने दिनों से अपने बेटे के साथ उसकी ससुराल में था या किसी और ही काम से गायब था? वैसे अभी तक मुंशी या उसके बेटे ने ऐसा कोई भी काम नहीं किया था जिसके चलते उन दोनों बाप बेटे पर शक किया जाए किंतु हालात ऐसे थे कि किसी पर भी अब भरोसा करने लायक नहीं रह गया था।

मुंशी की बहू रजनी का रूपचंद्र से जिस्मानी संबंध था और ये मेरे लिए बड़ी ही हैरानी तथा सोचने की बात थी कि दोनों के बीच ऐसा संबंध कब और किन परिस्थितियों में बना होगा? रजनी से मेरे भी संबंध थे और रजनी से ही बस क्यों बल्कि उसकी सास प्रभा से भी थे लेकिन जाने क्यों मेरा दिल अब रजनी पर भरोसा करने से इंकार कर रहा था। क्या वो रूपचंद्र के साथ मिल कर मेरे साथ कोई खेल खेल रही थी या फिर रूपचंद्र से उसका संबंध सिर्फ़ मज़े लेने तक ही सीमित था? वैसे पहली बार जब मैंने उसे छुप कर रूपचंद्र के साथ संबंध बनाते देखा था तब वो जिस तरह से रूपचंद्र को अपनी बातों से जला रही थी उससे तो यही लगता था कि वो मन से रूपचंद्र के साथ नहीं है। रूपचंद्र से जिस्मानी संबंध बनाना ज़रूर उसकी मजबूरी ही होगी। रूपचंद्र इस मामले में कितना कमीना था ये मुझसे बेहतर भला कौन जानता था? मैं इस बारे में जितना सोच रहा था उतना ही मुझे लगता जा रहा था कि रजनी मजबूरी में ही रूपचंद्र के साथ जिस्मानी संबंध बनाए हुए होगी। हालाकि औरत का भेद तो ऊपर वाला भी नहीं जान सकता लेकिन रजनी मेरे साथ कोई खेल खेल रही थी ये बात मुझे हजम नहीं हो रही थी।

जल्दी ही मैं साहूकारों के घर के सामने पहुंच गया। सड़क के किनारे ही एक पीपल का पेड़ था जिसमें पक्का चबूतरा बना हुआ था किंतु इस वक्त वो खाली था। कड़ाके की धूप थी इस लिए दोपहर में कोई घर से बाहर नहीं निकल सकता था। मैंने कुछ पल सोचा और साहूकारों के घर की तरफ बुलेट को मोड़ दी। लोहे का गेट खुला हुआ था इस लिए मैं फ़ौरन ही लंबे चौड़े लॉन से होते हुए उनके मुख्य द्वार पर पहुंच गया। बुलेट की तेज़ आवाज़ जैसे ही बंद हुई तो दरवाज़ा खुला और जिस शख्सियत पर मेरी नज़र पड़ी उसे तो बस देखता ही रह गया।

दरवाज़े के बीचों बीच दोनों पल्लों को पकड़े रूपचंद्र की बहन रूपा खड़ी थी। उसके गोरे बदन पर हल्के सुर्ख रंग का लिबास था जिसमें वो बेहद खूबसूरत दिख रही थी। चांद की तरह खिला हुआ चेहरा मुझे देखते ही हल्का गुलाबी सा पड़ गया था। कुछ पलों के लिए यूं लगा जैसे वक्त अपनी जगह पर ठहर गया हो। मैं उसे देख कर हल्के से मुस्कुराया तो जैसे उसकी तंद्रा टूटी और वो एकदम से हड़बड़ा गई। मैं उसे यूं हड़बड़ा गया देख कर हल्के से हंसा और फिर उसी की तरफ बढ़ा। मुझे अपनी तरफ बढ़ता देख उसके चेहरे पर एकदम से घबराहट के भाव उभर आए, तभी अंदर से किसी की आवाज़ आई।

"अगर किस्मत में ऐसे ही हर रोज़ इस चांद का दीदार होना लिख जाए।" मैंने रूपा के क़रीब पहुंचते ही किसी गए गुज़रे हुए आशिक़ों की तरह आहें भरते हुए कहा____"तो बंदा दुनिया के हर ज़ुल्मो सितम को सह कर भी हुस्न वालों की दहलीज़ पर दौड़ता हुआ आएगा। क़सम से तुम्हें देखने के बाद अब अगर मौत भी आ जाए तो ग़म न होगा।"

"अच्छा जी ऐसा है क्या?" रूपा ने बहुत ही धीमें स्वर में किंतु शर्माते हुए कहा तो मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा_____"कोई शक है क्या?"

"कौन आया है रूपा?" अंदर से एक बार फिर किसी औरत की आवाज़ आई तो हम दोनों ही हड़बड़ा गए और मैं उससे थोड़ा दूर खड़ा हो गया।
"हवेली से कोई आया है मां।" रूपा ने मेरी तरफ देखते हुए किंतु मुस्कुराते हुए कहा____"लगता है रास्ता भटक गया है।"

"ये तो ज़ुल्म है यार।" मैंने धीमें स्वर में कहा____"जान बूझ कर अजनबी बना दिया मुझे जबकि होना तो ये चाहिए था कि चीख चीख कर सबको बताती कि एक दीवाना आया है तुम्हारा।"

"हां, ताकि मेरे घर वाले मेरे जिस्म की बोटी बोटी कर के चील कौवों को खिला दें।" रूपा ने आंखें दिखाते हुए किंतु मुस्कुरा कर कहा____"बड़े आए एक दीवाना आया है बोलवाने वाले... हुह!"

"आज शाम को मंदिर में मिलो।" मैंने अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को काबू करते हुए कहा तो उसने आंखें सिकोड़ते हुए कहा____"क्यों...क्यों मिलूं भला?"
"अपनी देवी के दर्शन करने हैं मुझे।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा_____"और दर्शन के साथ साथ देवी की पूजा भी करनी है। उसके बाद अगर देवी मेरी पूजा से प्रसन्न हो जाए तो वो मुझे मीठा मीठा प्रसाद भी दे सकती है।"

रूपा अभी कुछ बोलने ही वाली थी कि तभी अंदर से आती हुई एक औरत दिखी जिससे मैं थोड़ा और दूर खड़ा हो गया। मैंने रूपा को भी इशारा कर दिया कि उसके पीछे कोई आ रहा है। कुछ ही पलों में अंदर से आने वाली औरत रूपा के पास पहुंच गई। शायद वही उसकी मां ललिता थी। उन्हें देख कर मैंने बड़े आदर भाव से हाथ जोड़ कर उन्हें प्रणाम किया जिस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए मुझे आशीर्वाद दिया।

"बाहर क्यों खड़े हो वैभव बेटा अंदर आओ ना।" रूपा की मां ललिता देवी ने बड़े प्रेम भाव से कहा____"ये लड़की भी ना, एक भी अक्ल नहीं है इसमें। देखो तो घर आए मेहमान को अंदर आने के लिए भी नहीं कहा। जाने कब अक्ल आएगी इसे?"

"मैं मेहमान नहीं हूं काकी।" मैंने नम्र भाव से कहा____"मैं तो आपका बेटा हूं और ये घर भी तो मेरा ही है। क्या इतना जल्दी मुझे पराया कर दिया आपने?"

"अरे! नहीं नहीं बेटा।" ललिता देवी एकदम से हड़बड़ा गईं, फिर सम्हल कर बोलीं____"ऐसी तो कोई बात नहीं है। तुमने सच कहा ये तुम्हारा ही घर है और तुम मेरे बेटे ही हो। अब चलो बातें छोड़ो और अंदर आओ।"

"माफ़ करना काकी।" मैंने कहा____"अभी अंदर नहीं आऊंगा। असल में किसी काम से जा रहा था तो सोचा काका लोगों से मिल कर उनका आशीर्वाद ले लूं और सबका हाल चाल भी पूंछ लूं लेकिन लगता है कि काका लोग अंदर हैं नहीं?"

"हां तुमने सही कहा बेटा।" ललिता देवी ने कहा____"असल में घर के सभी मर्द और बच्चे हमारी जेठानी की लड़की आरती के लिए एक जगह लड़का देखने गए हुए हैं। सब कुछ ठीक ठाक रहा तो रिश्ता पक्का हो जाएगा और फिर जल्दी ही ब्याह के लिए लग्न भी बन जाएगी।"

"अरे वाह! ये तो बहुत ही खुशी की बात है काकी।" मैंने खुशी ज़ाहिर करते हुए कहा____"जल्द ही इस घर में शहनाईयां बजेंगी। मैं तो कहता हूं काकी कि घर की सभी लड़कियों का ब्याह कर के जल्द से जल्द उनकी छुट्टी कर दो आप और मेरे भाईयों का ब्याह कर के नई नई बहुएं ले आओ।"

"ऐसा क्यों कह रहे हैं आप?" रूपा अपनी मां के सामने ही एकदम से बोल पड़ी____"हम लड़कियां क्या अपने मां बाप के लिए बोझ बनी हुई हैं जो वो जल्दी से हमारा ब्याह कर के इस घर से हमारी छुट्टी कर दें?"

"देखिए ऐसा है कि दुनिया के कोई भी माता पिता अपनी लड़कियों से ये नहीं कहते कि उनकी लड़कियां उनके लिए बोझ हैं।" मैंने रूपा को छेड़ने के इरादे से मुस्कुराते हुए कहा____"जबकि सच तो यही होता है कि लड़कियां सच में अपने माता पिता के लिए बोझ ही होती हैं। मैं सही कह रहा हूं ना काकी?"

"हां बेटा, बहुत हद तक तुम्हारी ये बात सही है।" ललिता देवी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लड़कियां उन माता पिता के लिए यकीनन बोझ जैसी ही होती हैं जो अपनी लड़कियों का ब्याह कर पाने में समर्थ नहीं होते। जिनके घर में खाने के लिए दो वक्त की रोटी नहीं होती और अपनी जवान बेटियों के तन को ढंकने के लिए कपड़े नहीं होते। ऐसे माता पिता के लिए लड़कियां न चाहते हुए भी बोझ सी ही लगने लगती हैं।"

जाने क्यों मुझे ऐसा लगा जैसे इस मामले की बात शुरू हो जाने से माहौल थोड़ा संजीदा सा हो गया है इस लिए मैंने काकी से बाद में आने का कह कर उन्हें प्रणाम किया और उनसे विदा ले कर वापस चल पड़ा। काकी से नज़र बचा कर मैंने एक बार फिर से रूपा को आज शाम मंदिर में मिलने का इशारा कर दिया था। मुझे यकीन था रूपा मुझसे मिलने के लिए मंदिर ज़रूर आएगी।

एक बार फिर से मैं बुलेट में बैठ कर आगे बढ़ चला। मुंशी के घर के पास पहुंच कर मैंने एक नज़र उस तरफ देखा और फिर आगे बढ़ गया। काफी समय से मैं अपने नए निर्माण हो रहे मकान की तरफ नहीं जा पाया था। इस लिए मैं तेज़ रफ़्तार में उस तरफ बढ़ता चला जा रहा था। जिस तरफ मेरा मकान बन रहा था वहां पर जाने के लिए मुख्य सड़क से बाएं तरफ मुड़ना होता था। कुछ दूरी से बंजर ज़मीन शुरू हो जाती थी। पथरीली ज़मीन पर कई तरह के पेड़ पौधे भी थे। हालाकि पथरीली ज़मीन का क्षेत्रफल ज़्यादा नही था। यूं तो मुरारी काका के गांव की तरफ जाने के लिए मुख्य सड़क थी किंतु एक पगडंडी वाला रास्ता भी मुरारी के गांव की तरफ जाता था जो कि वहीं से हो कर गुज़रता था जिस तरफ मेरा नया मकान बन रहा था।

कुछ ही देर में मैं उस जगह पहुंच गया जहां पर मेरा मकान बन रहा था। मकान भुवन की निगरानी में बन रहा था इस लिए वो वहीं मौजूद था। मुझे देखते ही उसने मुझे सलाम किया और मकान के कार्य के बारे में सब कुछ बताने लगा।

"शहर से जिन लोगों को बुलाया था वो अपना काम कर रहे हैं ना?" मैंने भुवन की तरफ देखते हुए पूछा तो उसने कहा____"हां छोटे ठाकुर, आपके कहे अनुसार वो लोग रात में बड़ी सावधानी से अपना काम कर रहे हैं और इस बात का पता मेरे और आपके अलावा किसी और को बिल्कुल भी नहीं है। यहां तक कि यहां के इन मजदूरों और मिस्त्रियों को भी इस बात का आभास नहीं हुआ कि इसी मकान के नीचे गुप्त रूप से कोई तहखाना भी बनाया जा रहा है।"

"किसी को इस बात का आभास होना भी नहीं चाहिए भुवन।" मैंने सपाट लहजे में कहा____"यहां तक कि दादा ठाकुर तथा जगताप चाचा को भी नहीं। यूं समझो कि इस बात को तुम्हें हमेशा हमेशा के लिए अपने सीने में ही राज़ बना के दफ़न कर लेना है।"

"जी मैं समझ गया छोटे ठाकुर।" भुवन ने सिर हिलाते हुए कहा____"मैं अपना सिर कटा दूंगा लेकिन इस बारे में किसी को भी पता नहीं लगने दूंगा।"
"बहुत बढ़िया।" मैंने भुवन के कंधे को अपने हाथ से थपथपाते हुए कहा____"ख़ैर, और भी कुछ ऐसा है जो तुम्हें बताना चाहिए मुझे?"

"पिछले एक हफ्ते से तो हवेली का कोई भी सदस्य इस तरफ नहीं आया है।" भुवन ने कहा____"लेकिन दो दिन पहले आपके दो मित्र यहां आए थे और यहां के बारे में पूछ रहे थे। ये भी पूछा कि आप आज कल कहां गायब रहते हैं?"

"मेरे तो दो ही मित्र ऐसे हैं जो बचपन से मेरे साथ रहे हैं।" मैंने भुवन की तरफ देखते हुए किंतु सोचने वाले भाव से कहा____"चेतन और सुनील। क्या यही दोनों आए थे यहां?"
"हां हां छोटे ठाकुर।" भुवन एकदम से बोल पड़ा____"दोनों एक दूसरे का यही नाम ले रहे थे।"

भुवन से मैंने कुछ देर और बात की उसके बाद उसे सतर्क रहने का बोल कर मुरारी काका के घर की तरफ चल पड़ा। मैं सोच रहा था कि चेतन और सुनील यहां किस लिए आए होंगे और मेरे बारे में क्यों पूछ रहे थे? अगर उन्हें मुझसे मिलना ही था तो वो सीधा हवेली ही आ सकते थे। उन दोनों का तो हमेशा से ही हवेली में आना जाना रहा है। हालाकि इधर जब मुझे तड़ीपार कर दिया गया था तब वो कभी मुझसे मिलने इस जगह पर नहीं आए थे। ख़ैर मुझे याद आया कि मैंने उन दोनों को जासूसी करने का काम सौंपा था किंतु तब से ले कर अब तक में वो दोनों मुझसे मिले ही नहीं थे। दोनों मेरे बचपन के मित्र थे और हमने साथ में जाने क्या क्या कांड किए थे लेकिन अब हमारे बीच वैसा जुड़ाव नहीं रह गया था। एकदम से मुझे लगने लगा कि कहीं वो दोनों भी किसी फ़िराक में तो नहीं हैं? काफी दिनों से मेरी उन दोनों से मुलाक़ात नहीं हुई थी। मैं तो ख़ैर क‌ई सारे झमेलों में फंसा हुआ था लेकिन वो भला किस झमेले में फंसे हुए थे कि एक बार भी मुझसे मिलने हवेली नहीं आए। ये सब सोचते सोचते मुझे आभास होने लगा कि दाल में कुछ तो काला ज़रूर है। दोनों की गांड तोड़नी पड़ेगी अब, तभी सच सामने आएगा।

सोचते विचारते मैं मुरारी काका के घर पहुंच गया। बुलेट का इंजन बंद कर के जैसे ही मैं दरवाज़े के पास आया तो दरवाज़ा खुला। आज का दिन कदाचित बहुत ही बढ़िया था। उधर साहूकार के घर का दरवाज़ा जब खुला था तो एक खूबसूरत चेहरा नज़र आया था और अब मुरारी के घर का दरवाज़ा खुला तो अनुराधा की हल्की सांवली सूरत नज़र आ गई। एक ऐसी सूरत जिसमें दुनिया जहान की मासूमियत, भोलापन और सादगी कूट कूट कर भरी हुई थी। मुझे देखते ही उसके चेहरे पर एक ख़ास तरह की चमक के साथ साथ हल्की शर्म की लाली भी उभर आई थी।

"कैसी हो ठकुराईन?" मैंने मुस्कुराते हुए उसे छेड़ने के इरादे से धीमी आवाज़ में कहा तो वो एकदम शर्म से सिमट गई। गुलाबी होठों पर थिरक रही मुस्कान पलक झपकते ही गहरी पड़ गई। उसने बड़ी मुश्किल से नज़र उठा कर मेरी तरफ देखा और फिर धीमें स्वर में कहा____"आप क्यों बार बार मुझे ठकुराईन कहते हैं?"

"क्यों न कहूं?" मैंने उसे और छेड़ा____"आख़िर तुम हो तो ठकुराईन ही। अगर तुम्हें मेरे द्वारा ठकुराईन कहने पर ज़रा सा भी एतराज़ होता तो तुम्हारे होठों पर इस तरह मुस्कान न उभर आती।"

"तो क्या चाहते हैं आप कि मैं आपके द्वारा ठकुराईन कहने पर आप पर गुस्सा हुआ करूं?" अनुराधा ने अपनी मुस्कान को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा था।

"क्यों नहीं।" मैंने उसकी गहरी आंखों में देखा____"तुम्हें मुझ पर गुस्सा होने का पूरा हक़ है। तुम मेरी डंडे से पिटाई भी कर सकती हो।"

"धत्त! ये क्या कह रहे हैं आप?" अनुराधा मेरी बात सुन कर बुरी तरह चौंकी थी, फिर शर्माते हुए बोली____"मैं भला कैसे आपकी पिटाई कर सकती हूं?"
"क्यों नहीं कर सकती?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"अगर मैं कोई ग़लती करता हूं तो तुम्हें पूरा हक़ है मेरी पिटाई करने का।"

"न जी न।" अनुराधा शरमा कर दरवाज़े से एक तरफ हट गई, फिर अपनी मुस्कुराहट को दबाते हुए बोली____"मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकती।"
"काकी नहीं है क्या अंदर?" मैंने अंदर आंगन की तरफ नज़र डालते हुए पूछा तो अनुराधा ने ना में सिर हिला दिया।

मैं ये जान कर बेहद खुश हुआ कि सरोज काकी घर में नहीं है। वो दरवाज़े से हट गई थी, ज़ाहिर है वो चाहती थी कि मैं घर के अंदर आऊं वरना वो शुरू में ही मुझे बता देती और अपने बर्ताव से ये भी ज़ाहिर कर देती कि उसकी मां के न होने पर मैं अंदर न आऊं। ख़ैर, मैं अंदर आया तो अनुराधा ने बिना कुछ कहे दरवाज़ा बंद कर दिया।

"अच्छा तो इसी लिए तुम इतना बेझिझक हो कर मुझसे बातें कर रही थी।" मैंने आंगन के पार बरामदे में रखी खटिया पर बैठते हुए कहा____"और मुझ अकेले लड़के को छेड़ रही थी। आने दो काकी को, मैं काकी को बताऊंगा कि कैसे तुम मुझ मासूम को अकेला देख कर मुझे छेड़ रही थी।"

"हाय राम! कितना झूठ बोलते हैं आप।" अनुराधा बुरी तरह चकित हो कर बोली____"मैंने कब छेड़ा आपको और ये क्या कहा आपने कि आप मासूम हैं? भला कहां से मासूम लगते हैं आप?"

"बोलती रहो।" मैं मन ही मन हंसते हुए बोला____"सब कुछ बताऊंगा काकी को। ये भी कि तुम मुझे मासूम मानने से साफ़ इंकार कर रही थी।"

"अगर आप ऐसी बातें करेंगे तो मैं आपसे कोई बात नहीं करूंगी।" अनुराधा के चेहरे पर इस बार मैंने घबराहट के भाव देखे। शायद वो मेरी इस बात को सच मान बैठी थी कि मैं काकी को सब कुछ बता दूंगा।

"कमाल है।" मैंने उसके मासूम से चेहरे पर छा गई घबराहट को देखते हुए कहा____"कैसी ठकुराईन हो तुम जो मेरी इतनी सी बात पर इस क़दर घबरा गई?"

"मैं कोई ठकुराईन वकुराईन नहीं हूं समझे आप?" अनुराधा ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा____"और हां अब मुझे आपसे कोई बात नहीं करना। आप जाइए यहां से, वैसे भी अगर मां आ गई और उसने मुझे आपके साथ यूं अकेले में देख लिया तो मेरी ख़ैर नहीं होगी।"

"ओह! तो मेरी अनुराधा रूठ गई है मुझसे?" जाने कैसे मेरे मुख से मेरी अनुराधा निकल गया, जिसका आभास होते ही मेरी धड़कनें एकदम से तेज़ हो गईं और मैं अनुराधा की तरफ देखने लगा। यही हाल अनुराधा का भी हुआ था। वो आंखें फाड़े मेरी तरफ देखने लगी थी, किंतु जल्दी ही सम्हली और फिर बोली____"ये क्या कह रहे हैं आप? मैं आपकी अनुराधा कैसे हो गई?"

"पता नहीं कैसे मेरे मुख से निकल गया?" मैंने अपनी घबराहट को दबाने का प्रयास करते हुए कहा____"वैसे क्या तुम्हें मेरी अनुराधा कह देने पर एतराज़ है?"

"हां बिलकुल एतराज़ है मुझे।" अनुराधा के चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए थे____"मैं सिर्फ़ अपने माता पिता की अनुराधा हूं किसी और की नहीं। अगर आप ये समझते हैं कि आप बाकी लड़कियों की तरह मुझे भी अपने जाल में फंसा लेंगे तो ये आपकी सबसे बड़ी भूल है छोटे ठाकुर।"

मैं अनुराधा के चेहरे पर मौजूद भावों को देख कर एकदम से हैरान रह गया था। मुझे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि वो मेरी इस बात से इस हद तक बिदक जाएगी। मुझे समझ न आया कि जो अनुराधा मुझे देखते ही शर्माने और मुस्कुराने लगती थी वो मेरी इतनी सी बात से इस तरह कैसे बर्ताव कर सकती थी? वैसे सच कहूं तो हैरान मैं खुद भी अपने आप पर हुआ था कि यूं अचानक से कैसे मेरे मुख से मेरी अनुराधा जैसा संबोधन निकल गया था मगर अब जब निकल ही गया था तो मैं भला क्या ही कर सकता था?

"अब जल्दी से कोई डंडा खोज कर लाओ।" फिर मैंने बात को एक अलग ही दिशा में मोड़ने की गरज से कहा____"और उस डंडे से मेरी पिटाई करना शुरू कर दो।"

"ये क्या कह रहे हैं आप?" अनुराधा मेरी बात सुन कर मानो उलझ गई तो मैंने उसे समझाते हुए कहा____"सही तो कह रहा हूं मैं। कुछ देर पहले मैंने तुमसे कहा था ना कि अगर मैं कोई ग़लती करता हूं तो तुम्हें मेरी पिटाई करने का पूरा हक़ है। अब क्योंकि मैंने ग़लती की है तो इसके लिए तुम्हें डंडे से मेरी पिटाई करनी चाहिए।"

"बातें मत बनाइए।" अनुराधा ने कहा____"सब समझती हूं मैं। अगर आपके मन में मेरे प्रति यही सब है तो चले जाइए यहां से। अनुराधा वो लड़की हर्गिज़ नहीं है जो आपके जाल में फंस जाएगी। हम ग़रीब ज़रूर हैं छोटे ठाकुर लेकिन अपनी जान से भी ज्यादा हमें अपनी इज्ज़त प्यारी है।"

"तो फिर ये भी जान लो अनुराधा कि तुम्हारी इज्ज़त मुझे भी खुद अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारी है।" अनुराधा की बातें सुन कर जाने क्यों मेरे दिल में एक टीस सी उभर आई थी, बोला____"मैं खुद मिट्टी में मिल जाना पसंद करूंगा लेकिन तुम्हारी इज्ज़त पर किसी भी कीमत पर दाग़ नहीं लगा सकता और ना ही किसी के द्वारा लगने दे सकता हूं। मैं जानता हूं कि मेरा चरित्र ही ऐसा है कि किसी को भी मेरी किसी सच्चाई पर यकीन नही हो सकता लेकिन एक बात तुम अच्छी तरह समझ लो अनुराधा कि मैं चाहे सारी दुनिया को दाग़दार कर दूं लेकिन तुम पर दाग़ लगाने की कल्पना भी नहीं कर सकता। मैं तुम्हें कई बार बता चुका हूं कि तुम वो लड़की हो जिसने मेरे मुकम्मल वजूद को बदल दिया है और मुझे खुशी है कि तुमने मेरा कायाकल्प कर दिया है। तुमसे हसी मज़ाक करता हूं तो एक अलग ही तरह का एहसास होता है। मेरे मन में अगर ग़लती से भी तुम्हारे प्रति कोई ग़लत ख़्याल आ जाता है तो मैं अपने आपको कोसने लगता हूं। ख़ैर, मैं तुम्हें कोई सफाई नहीं देना चाहता। अगर तुम्हें लगता है कि मेरे यहां आने का सिर्फ़ यही एक मकसद है कि मैं तुम्हें भी बाकी लड़कियों की तरह अपने जाल में फंसाना चाहता हूं तो ठीक है। मैं तुम्हें वचन देता हूं कि ठाकुर वैभव सिंह आज के बाद तुम्हारे इस घर की दहलीज़ पर अपने क़दम नहीं रखेगा। तुम्हारे साथ जो चंद खूबसूरत लम्हें मैंने बिताए हैं वो जीवन भर मेरे लिए एक अनमोल याद की तरह रहेंगे। ये भी वचन देता हूं कि इस घर के किसी भी सदस्य पर किसी के द्वारा कोई आंच नहीं आने दूंगा। चलता हूं अब, ऊपर वाला तुम्हें हमेशा खुश रखे।"

मैं ये सब बोलने के बाद एक झटके से चारपाई से उठा और अनुराधा की तरफ देखे बिना ही तेज़ कदमों के द्वारा आंगन से होते हुए घर से बाहर निकल गया। इस वक्त मेरे अंदर एक आंधी सी चल रही थी। दिल में सागर की लहरों की तरह जज़्बात मानों बेकाबू हो कर हिलोरे मार रहे थे। मैं अपनी बुलेट पर बैठा और उसे स्टार्ट कर तेज़ी से आगे बढ़ गया। जैसे जैसे अनुराधा का घर पीछे छूटता जा रहा था वैसे वैसे मुझे ऐसा महसूस हो रहा था मानो मेरा एक खूबसूरत संसार मुझसे बहुत दूर होता जा रहा है। दिलो दिमाग़ पर मचलते तूफान को बड़ी मुश्किल से दबाते हुए मैं आगे बढ़ा चला जा रहा था।

जिस तरफ मेरे नए बन रहे मकान के लिए रास्ता जा रहा था उस तरफ न जा कर मैं हवेली जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ चला। कच्चा पगडंडी वाला रास्ता था जिसके दोनों तरफ कुछ बड़े बड़े पेड़ थे। मैं जैसे ही उन पेड़ों के थोड़ा पास पहुंचा तो एकदम से दो आदमी उन पेड़ों से निकल कर सड़क के किनारे खड़े हो गए। दोनों के हाथ में मजबूत लट्ठ मौजूद था।
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अध्याय - 51
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अब तक....

जिस तरफ मेरे नए बन रहे मकान के लिए रास्ता जा रहा था उस तरफ न जा कर मैं हवेली जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ चला। कच्चा पगडंडी वाला रास्ता था जिसके दोनों तरफ कुछ बड़े बड़े पेड़ थे। मैं जैसे ही उन पेड़ों के थोड़ा पास पहुंचा तो एकदम से दो आदमी उन पेड़ों से निकल कर सड़क के किनारे खड़े हो गए। दोनों के हाथ में मजबूत लट्ठ मौजूद था।

अब आगे.....


कुसुम अपने कमरे में पलंग पर लेटी बार बार अपनी आंखें बंद कर के सोने का प्रयास कर रही थी किंतु हर बार बंद पलकों में कुछ ऐसे दृश्य और कुछ ऐसी बातें उभर आतीं कि वो झट से अपनी आंखें खोल देने पर बिवस हो जाती थी। ऐसा सिर्फ़ आज ही नहीं हो रहा था बल्कि ऐसा तो उसके साथ जाने कब से हो रहा था। पिछले कुछ महीनों से दिन में कभी भी आसानी से उसकी आंख नहीं लगती थी और यही हाल रातों का भी था। पिछले कुछ महीनों से वो जो करने पर मजबूर थी उसकी वजह से वो अंदर ही अंदर बेहद दुखी थी और उस सबकी वजह से उसे एक पल के लिए भी शांति नहीं मिलती थी।

दो दिन पहले तक उसे सिर्फ़ इसी बात का दुख असहनीय पीड़ा देता था कि उसका जो भाई उसे अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार और स्नेह देता है वो उसी को चाय में नामर्द बनाने वाली दवा मिला कर पिलाने पर मजबूर है। हर वक्त उसके ज़हन में बस एक ही ख़्याल आता था कि वो ये जो कुछ भी कर रही है वो निहायत ही ग़लत है। माना कि वो अपनी इज्ज़त और मर्यादा को छुपाने के लिए वो सब कर रही थी लेकिन इसके बावजूद उसे यही लगता था कि उसके इतने अच्छे भाई का जीवन उसके अपने जीवन और उसकी अपनी इज्ज़त मर्यादा से कहीं ज़्यादा अनमोल है। वो अक्सर ये सोच कर अकेले में रोती थी कि वैभव भैया उस पर कितना भरोसा करते हैं, यानि अगर वो चाय में ज़हर मिला कर भी उन्हें पीने को देगी तो वो खुशी से पी लेंगे।अपने भाई के साथ वो हर रोज़ कितना बड़ा विश्वासघात करती है। ये ऐसी बातें थीं जिन्हें सोच सोच कर कुसुम तकिए में अपना मुंह छुपाए घंटों रोती रहती और अपने भाई से अपने किए की माफ़ियां मांगती रहती। कभी कभी उसके मन में एकदम से ख़्याल उभर आता कि अपने भाई से इतना बड़ा विश्वासघात करने के बाद अब उसे जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है। इस ख़्याल के चलते कई बार उसने खुदकुशी करने का मन बनाया लेकिन फिर ये सोच कर वो खुदकुशी भी नहीं कर पाई कि अगर उसने ऐसा किया तो उसका भाई उसे कभी माफ़ नहीं करेगा। उसके यूं मर जाने पर उसके भाई को बहुत दुख होगा और वो भला कैसे ये चाह सकती है कि उसकी वजह से उसके वैभव भैया को ज़रा सा भी कोई दुख हो?

एक समय था जब पूरी हवेली में कुसुम की हंसी और उसकी शरारतें गूंजती थीं। कोई कितना ही उदास क्यों न हो लेकिन कुसुम का सामना होते ही उस व्यक्ति के होठों पर मुस्कान उभर आती थी। विभोर उमर में उससे बड़ा था लेकिन अजीत छोटा था इसके बावजूद वो दोनों भाई उसे सताते रहते थे लेकिन सिर्फ़ वैभव का प्यार और स्नेह ही उसे इतना काफ़ी लगता था जिसकी वजह से वो कभी किसी भी बात पर अपने होठों की मुस्कान और शरारतें करना नहीं छोड़ती थी। वो जानती थी कि वैभव उसका वो भाई है जो उसके लिए दुनिया के कोने कोने से खुशियां खोज कर ला सकता है और ऐसा होता भी था। हवेली में वैभव के रहते किसी की मजाल नहीं होती थी कि कोई कुसुम से ऊंची आवाज़ में बात कर ले। वैभव के रहते कुसुम खुद एक शेरनी बन जाती थी। उसे ऐसा लगने लगता था जैसे हवेली में अब सिर्फ़ उसी का राज हो गया है। अपने बाप की भी ना सुनने वाला वैभव उसकी हर बात सुनता था और उसकी हर ख़्वाइश को पूरा करता था, फिर उसके लिए चाहे उसे खुद दादा ठाकुर से ही क्यों न टकरा जाना पड़े। ये सब देख कर जगताप अक्सर कहता था कि जिस दिन उसकी बेटी ब्याह होने के बाद हवेली से चली जाएगी तब क्या होगा वैभव का? कैसे रह पाएगा वो अपनी लाडली बहन कुसुम के बिना और खुद कुसुम कैसे अपने ससुराल में रह पाएगी अपने वैभव भैया के बिना?

"मुझे माफ़ कर दीजिए भैया।" जाने किस दृश्य को देख कर सहसा कुसुम की आंखों से आसूं छलक पड़े और वो रूंधे गले से किंतु धीमें स्वर में बोल पड़ी_____"आपकी इस बहन में इतनी हिम्मत नहीं है कि वो आपके सामने अपनी मजबूरी का सच बता सके। मैं जानती हूं कि आपको शायद बहुत कुछ पता चल गया है लेकिन इसके बावजूद आपने मुझसे कोई गिला शिकवा नहीं किया। उस दिन आप मुझसे जिनके लिए सज़ा मिलने की बात कह रहे थे न, मैं तभी समझ गई थी कि शायद आपको सब पता चल गया है। मैं जानती हूं कि आप उन लोगों को कड़ी से कड़ी सज़ा देना चाहते थे जिन्होंने आपकी बहन का दिल दुखाया है लेकिन भला मैं ये कैसे ऐसा चाह सकती थी? वो भी तो मेरे भाई ही हैं। भला कैसे कोई बहन अपने भाइयों को सबके सामने इस तरह से जलील होते या सज़ा पाते देख सकती थी? उन्होंने मेरा दिल दुखाया, मेरी आत्मा तक को छलनी किया, इसके बावजूद मैं उन्हें माफ़ कर देना चाहती हूं। मैं उनकी तरह नहीं हूं और मुझे यकीन है कि आप भी मुझसे ऐसी ही उम्मीद करते होंगे।"

पलंग पर तकिए में अपना मुंह छुपाए कुसुम रोते हुए जाने क्या क्या बड़बड़ाए जा रही थी। रोने से उसकी आंखें सुर्ख पड़ गईं थी और गोरा चेहरा भी। दोपहर में जब सब लोग खाना खा रहे थे तो कुसुम खाना परोसने के लिए रसोई से बाहर नहीं आई थी। अपने से उसकी हिम्मत ही नहीं पड़ती थी कि वो अपने उस भाई का सामना करे जो भाई उसे दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार और स्नेह करता है। एक दो बार वैभव के कमरे में उसे जाना पड़ा था लेकिन वो भी उसकी मजबूरी ही थी।

"शीला ने आपको सब कुछ बता दिया होगा न?" कुसुम के जहन में सहसा बिजली सी कौंधी तो वो बेहद दुखी भाव से बड़बड़ाई____"वो सब भी ना जो मैं किसी भी कीमत पर आपको जानने नहीं देना चाहती थी? आप सोच रहे होंगे न कि आपकी बहन कितनी गंदी है और उसके मन में कैसे कैसे गंदे विचार हैं? नहीं नहीं, भगवान के लिए ऐसा मत सोचिएगा भैया। आपकी बहन गंदी नहीं है। वो तो उस दिन मेरी सखियां खेल खेल में पता नहीं वो सब क्या करने लगीं थी। सब उनका ही दोष है भैया, मेरा यकीन कीजिए। मुझे नहीं पता था कि वो इतनी गन्दी हैं वरना मैं उनके साथ कोई खेल ही नहीं खेलती।"

कुसुम की आंखें लगातार आंसू बहाए जा रहीं थी। वो खुद से ही बड़बड़ा रही थी किंतु उसे एहसास यही हो रहा था मानों वो अपने भैया वैभव को ही ये सब बता रही हो जिसके चलते उसे बेहद शर्म भी आ रही थी।

"आप अपनी इस बहन से नाराज़ मत होना भैया।" कुसुम के दिल में सहसा एक हूक सी उठी जिसके चलते वो एकदम से फफक कर रो पड़ी____"और ना ही अपनी इस बहन के बारे में ग़लत सोचना। मैं आपकी वही छोटी और मासूम बहन हूं जिसे आप अपनी जान समझते हैं। बस एक बार अपनी इस बहन को माफ़ कर दीजिए न।"

अभी कुसुम ये सब बड़बड़ाते हुए रो ही रही थी कि तभी कमरे के दरवाज़े पर दस्तक हुई जिसके चलते वो बुरी तरह हड़बड़ा गई। पलंग पर झट से वो उठ कर बैठ गई और जल्दी जल्दी अपने आंसू पोंछने लगी। चेहरे पर घबराहट के भाव उभर आए थे। धड़कते दिल से वो कमरे के दरवाज़े को घूरने लगी थी। तभी दस्तक फिर से हुई और साथ ही बाहर से विभोर ने आवाज़ भी दी जिसे सुन कर कुसुम के चेहरे का मानों रंग ही उड़ गया। उससे जवाब में कुछ बोलते न बन पड़ा। बाहर से विभोर ने उसे आवाज़ दे कर दरवाज़ा खोलने के लिए कहा था। कुसुम की सांसें जैसे कुछ पलों के लिए रुक ही गईं थी लेकिन फिर जल्दी ही उसने खुद को सम्हाला और अपने दुपट्टे से जल्दी जल्दी अपने हुलिए को ठीक किया। तत्पश्चात वो पलंग से नीचे उतरी और फिर जा कर उसने दरवाज़ा खोला। दरवाज़े के बाहर अपने दोनों भाईयों को खड़े देख उसके चेहरे पर सहसा एक अजीब सी शख़्ती उभर आई।

"हम दोनों तुझसे माफ़ी मांगने आए हैं कुसुम।" विभोर ने अपनी नज़रें झुका कर दुखी भाव से कहा____"हम जानते हैं कि हमने तुझसे जो काम करवा के अपराध किया है उसके लिए हमें कोई माफ़ी नहीं मिलनी चाहिए फिर भी अपने गुनाहों के लिए तुझसे माफ़ी मांगने आए हैं।"

विभोर की ये बातें सुन कर कुसुम को मानों बिजली की तरह झटका लगा। वो हैरत से आंखें फाड़े अपने बड़े भाई विभोर को देखने लगी थी। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। उसे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि उसके अपने भाई किसी दिन उससे माफ़ी भी मांग सकते हैं।

"हां दीदी।" विभोर के थोड़ा पीछे खड़ा अजीत भी अपने बड़े भाई के जैसे बोल पड़ा____"हम अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हैं। वैभव भैया से ईर्ष्या करने के चलते पता नहीं हम क्या क्या कर बैठे जिसका कभी हमें आभास ही नहीं हुआ। ईर्ष्या और नफ़रत में अंधे हो कर हमने अपनी ही बहन को ऐसे काम के लिए मजबूर किया जो हर तरह से ग़लत था। हमें तो भाई कहलाने का भी हक़ नहीं रहा दीदी। हो सके तो हमें माफ़ कर दीजिए।"

कुसुम को एकदम से ऐसा लगा जैसे वो खुली आंखों से अचानक ही सपना देखने लगी है। उसने तेज़ी से अपने सिर को झटका। उसके लिए अपने भाइयों द्वारा कही गई ये सब बातें किसी बड़े झटके से कम नहीं थी। उसकी आंखों के सामने क़रीब दो क़दम की दूरी पर उसके दोनों भाई खड़े थे जिनके सिर अपराध बोध के चलते झुके हुए थे। कुसुम को समझ न आया कि वो उन दोनों की बातों पर क्या प्रतिक्रिया दे अथवा क्या जवाब दे?

"माफ़ी मुझसे नहीं।" फिर उसने किसी तरह खुद को सम्हाला और सपाट लहजे में कहा____"बल्कि उस इंसान से मांगिए जिनके साथ आप दोनों ने मुझसे बुरा करवाया है।"

"वैभव भैया से हमने माफ़ी मांग ली है और उन्होंने हम दोनों को माफ़ भी कर दिया है।" विभोर ने इस बार संजीदा भाव से कहा____"वो बहुत अच्छे हैं, उनका दिल बहुत विशाल है।"

"आपको पता है दीदी।" अजीत ने कहा____"पिता जी तो हमें जान से ही मार देना चाहते थे लेकिन ताऊ जी ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया। उसके बाद ताऊ जी ने भी हमें उस सबके लिए माफ़ कर दिया। हमने भी अब प्रण कर लिया है कि अब से हम दोनों ऐसा काम करेंगे जो हमारे साथ साथ हमारे समूचे खानदान के लिए बेहतर हो।"

"हमें सच में अपने किए पर बहुत पछतावा हो रहा है कुसुम।" कुसुम को कुछ न बोलता देख विभोर ने गंभीरता से कहा____"और अपने आपसे घृणा हो रही है। मन करता है किसी सूखे कुएं में कूद कर अपनी जान दे दें।"

"अगर वैभव भैया ने आप दोनों को माफ़ कर दिया है तो समझ लीजिए कि मैंने भी माफ़ कर दिया।" कुसुम ने पहले जैसे ही सपाट लहजे में कहा____"अब आप दोनों जाइए यहां से।"

"तेरा चेहरा और लहजा बता रहा है कि तूने दिल से हमें माफ़ नहीं किया है।" विभोर ने कुसुम की तरफ देखते हुए कहा____"बस एक बार माफ़ कर दे मेरी बहन। मैं समझ सकता हूं कि जो कुछ हमने तुझसे करवाया है वो सब भूलना इतना आसान नहीं है तेरे लिए।"

"मैं उस बारे में कोई बात नहीं करना चाहती।" कुसुम ने इस बार थोड़ा कठोरता से कहा____"ऊपर वाले से बस यही विनती करती हूं कि वो आप दोनों को सद्बुद्धि दे ताकि आज के बाद कभी आप दोनों के मन में ऐसा कुछ भी करने का ख़्याल न आए।"

कहते हुए कुसुम की आंखें अनायास ही छलक पड़ीं। विभोर और अजीत ने उसकी बातें सुन कर एक बार फिर से अपना सिर झुका लिया। कुछ पल दोनों खड़े रहे उसके बाद दोनों ने हाथ जोड़ कर फिर से कुसुम से माफ़ी मांगी और फिर चुप चाप चले गए। उनके जाते ही कुसुम ने दरवाज़ा बंद कर दिया। उसके बाद वो भाग कर पलंग पर आई और पहले की ही भांति तकिए में अपना चेहरा छुपा कर सिसकने लगी।

"आपने इतना कुछ हो जाने के बाद भी मेरी बात का मान रखा।" वो फिर से बड़बड़ा उठी____"आप सच में मेरे सबसे अच्छे वाले भैया हैं और मैं आपकी गंदी बहन हूं।"

कहने के साथ ही कुसुम की आंखें एक बार फिर से बरसने लगीं। कमरे में उसके सिसकने की धीमी आवाज़ें गूंजने लगीं थी। इस बार उसे अपने जज़्बातों को सम्हालना भारी मुश्किल लग रहा था।

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"तुम दोनों यहां क्या कर रहे हो?" मैंने बुलेट को उन दोनों के पास ही रोक कर कहा____"मैंने मना किया था न कि यूं खुले में कहीं मत घूमना?"

"माफ़ कीजिए छोटे ठाकुर।" उनमें से एक ने हाथ जोड़ते हुए कहा____"हम दोनों तो शाम के अंधेरे में ही आपके पास हवेली आते लेकिन जब हमने देखा कि आप इस तरफ ही आ रहे हैं तो हम दोनों भी आपके पीछे आ गए। दूसरी बात ये भी थी कि आपको एक ज़रूरी बात बतानी थी। हमने सोचा कि अंधेरा होने की प्रतीक्षा क्यों करें? जिस तरह के हालात बने हुए हैं उससे तो एक एक बात का पता जल्दी से लगना ज़रूरी है न छोटे ठाकुर।"

"अरे! तुम दोनों की जान से बढ़ कर कोई भी चीज़ ज़रूरी नहीं है।" मैंने उस आदमी से कहा____"मैं ये हर्गिज़ नहीं चाह सकता कि मेरी वजह से तुम दोनों पर ज़रा भी कोई आंच आए। ख़ैर, बताओ क्या ख़बर लाए हो?"

मेरे पूछने पर दोनों ने सबसे पहले इधर उधर निगाह घुमाई और फिर ख़बर के बारे में बताना शुरू कर दिया। सारी बातें सुनने के बाद मैं सोच में पड़ गया। अंदेशा तो मुझे था लेकिन ऐसा भी कुछ होगा इसकी ज़रा भी कल्पना नहीं की थी मैंने। ख़ैर, मैंने पैंट की जेब से कुछ पैसे निकाले और उन दोनों को पकड़ाया और ये भी कहा कि अपना ख़्याल सबसे पहले रखें।

एक बार फिर से मेरी बुलेट कच्ची पगडंडी पर दौड़ने लगी। ज़हन में बार बार उन दोनों आदमियों की बातें ही गूंज रहीं थी। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा भी कुछ हो सकता है। ख़ैर, जल्दी ही मैं अपने गांव की आबादी में दाखिल हो गया। सबसे पहले मुंशी चंद्रकांत का ही मकान पड़ता था। मैं जैसे ही मुंशी के घर के सामने आया तो देखा मुंशी की बीवी प्रभा अपने घर के दरवाज़े के बाहर खड़ी गांव की किसी औरत से बातें कर रही थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो दूसरी औरत से नज़र बचा कर हल्के से मुस्कुराई। मेरा फिलहाल उसके घर जाने का कोई इरादा नहीं था इस लिए उसकी मुस्कान का जवाब मुस्कान से ही देते हुए मैं आगे निकल गया।

साहूकारों के सामने से होते हुए मैं कुछ ही देर में हवेली पहुंच गया। बुलेट को एक तरफ खड़ी कर के मैं हवेली के अंदर दाखिल हो गया। बैठक में पिता जी के साथ कुछ लोग बैठे हुए थे जिन्हें मैं पहचानता नहीं था। ज़ाहिर है वो लोग मेरे गांव के नहीं थे। मैंने कुछ पल रुक कर पिता जी की तरफ देखा तो उन्होंने मुझे अंदर जाने का इशारा किया। मैं फ़ौरन ही अंदर चला आया। अंदर आया तो मां से मुलाक़ात हो गई।

"अच्छा हुआ कि तू आ गया।" मां ने कहा____"मैं तेरी ही राह देख रही थी।"
"क्या हुआ मां?" मैं ने फिक्रमंदी से पूछा____"कोई बात हो गई है क्या?"

"नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है।" मां ने सामान्य भाव से कहा____"असल में तेरी भाभी के मायके से एक संदेशा आया है। तेरी भाभी के भाई को वर्षों बाद संतान के रूप में एक बेटा हुआ है इस लिए उन्होंने संदेशा भेजा है कि हम उनकी बहन को कुछ दिन के लिए वहां भेज दें।"

"ये तो बड़ी खुशी की बात है मां।" मैं कुछ सोच कर मन ही मन खुश हो गया था किंतु प्रत्यक्ष में सामान्य सी खुशी ज़ाहिर करते हुए बोला____"साले साहब को पहली संतान के रूप में बेटा हुआ है तो ज़ाहिर है धूम धड़ाका तो करेंगे ही लेकिन भाभी को लेने वो खुद भी तो आ सकते थे?"

"अब अकेला आदमी क्या क्या करे?" मां ने कहा____"तुझे पता ही है कि तेरी भाभी का एक भाई उसके ब्याह के पहले ही कहीं चला गया था जो कि आज तक लौट कर नहीं आया। समधी जी तो घुटने के बात के चलते ज़्यादा चल फिर नहीं पाते। घर का सारा कार्यभार बेचारे वीरेंद्र के ही कंधों पर है। इसी लिए संदेशा भेजवाया है और तेरे पिता जी से विनती भी की है कि हम ही उनकी बहन रागिनी को वहां पहुंचा दें।"

"तो पिता जी ने क्या कहा?" मैंने धड़कते दिल के साथ पूछा।
"मुझसे कह रहे थे कि तू भेज आएगा अपनी भाभी को।" मां ने कहा____"और साथ में कुछ आदमियों को भी ले जाना। उनका कहना है कि ऐसे वक्त में काम का बोझ ज़्यादा हो जाता है तो मदद के लिए कुछ लोगों का वहां होना बेहद ज़रूरी है।"

"वो सब तो ठीक है मां।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"लेकिन भाभी को ले कर बड़े भैया भी तो जा सकते हैं, मैं ही क्यों?"
"वो तेरी तरह ढीठ और बेशर्म नहीं है।" मां ने आंखें दिखाते हुए कहा____"आज तक क्या कभी वो उसे अपने साथ ले कर गया है जो अब जाएगा? उसे अपनी बीवी को अपने साथ लाने ले जाने में शर्म आती है और ऐसा होना भी चाहिए। इस लिए तू ही अपनी भाभी को ले कर जाएगा।"

रागिनी भाभी के साथ उनके मायके जाने की बात से में एकदम खुश हो गया था। एक पल में जाने कितने ही खूबसूरत चेहरे आंखों के सामने उजागर हो गए थे लेकिन अगले ही पल मैं ये सोच कर मायूस हो गया कि आज कल जिस तरह के हालात हैं उसमें मेरा वहां जाना बिलकुल भी ठीक नहीं है।

"ठीक है मां।" मैंने बुझे मन से कहा___"मैं कल सुबह भाभी को उनके मायके भेज कर वापस आ जाऊंगा।"
"कल नहीं, आज और अभी जाना है तुझे।" मां ने ये कह कर मानों मेरे सिर पर बम्ब फोड़ा_____"और उसे वहां भेज कर वापस नहीं आ जाना है बल्कि वहां रह कर वीरेंद्र के कामों में उनका हाथ भी बंटाना है। जिस दिन बच्चे का नाम करण होगा उस दिन तेरे पिता जी भी यहां से जाएंगे।"

मां की बातें सुन कर मानो मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन ही खिसक गई थी। कोई और वक्त होता तो यकीनन मैं उनकी इन बातों से बेहद खुश हो गया होता लेकिन आज के वक्त में जो हालात थे उनकी वजह से मेरा इस तरह यहां से चले जाना बिलकुल भी उचित नहीं था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि पिता जी भला ऐसा हुकुम कैसे दे सकते थे? क्या उन्हें हालात की गंभीरता का ज़रा सा भी एहसास नहीं था?

"क्या हुआ, कहां खो गया?" मां ने मुझे हकीक़त की दुनिया में लाते हुए कहा____"जा, जा के जल्दी से तैयार हो जा। तब तक मैं देखती हूं कि रागिनी तैयार हुई कि नहीं।"

मैं भारी क़दमों से चलते हुए ऊपर अपने कमरे की तरफ चल पड़ा। साला ये क्या चुटियापा हो गया था? मुझे ये सोच कर गुस्सा आ रहा था कि पिता जी मुझे भाभी के मायके में रहने का कैसे कह सकते थे? सहसा मुझे याद आया कि आज जिन दो आदमियों से मैं मिला था उन्होंने मुझे कैसी ख़बर दी थी और अब मैं उस ख़बर के चलते क्या क़दम उठाने वाला था लेकिन अब मेरे यहां से यूं अचानक चले जाने पर सब गड़बड़ हो जाएगा।

मैं अपने कमरे के पास पहुंचा तो देखा दरवाज़ा खुला हुआ था। ज़ाहिर है कोई मेरे कमरे में मौजूद था। ख़ैर, में कमरे में दाखिल हुआ तो देखा बड़े भैया बैठे हुए थे। मुझे देखते ही वो हल्के से मुस्कुराए और मुझे पलंग पर अपने पास ही बैठने का इशारा किया।

"तेरे चेहरे के भाव बता रहे हैं कि तू अंदर से काफी परेशान है।" बड़े भैया ने कहा____"शायद तुझे मां के द्वारा पता चल चुका है कि तुझे अपनी भाभी को ले कर उसके मायके जाना है।"

"भाभी को उनके मायके ले कर जाने की बात से मैं परेशान नहीं हूं भैया।" मैंने धीर गंभीर भाव से कहा____"बल्कि इस बात से परेशान हो गया हूं कि मुझे वहां पर एक दिन नहीं बल्कि कई दिनों तक रुकना होगा। आप अच्छी तरह जानते हैं कि हालात ऐसे हर्गिज़ नहीं हैं कि मैं इतने दिनों तक कहीं रुक सकूं। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि पिता जी ने मां से ऐसा क्यों कहा? क्या उन्हें वक्त और हालात की गंभीरता का ज़रा सा भी एहसास नहीं है?"

"हमें अच्छी तरह वक्त और हालात की गंभीरता का एहसास है बर्खुरदार।" दरवाज़े से अचानक आई पिता जी की भारी आवाज़ को सुन कर हम दोनों भाई चौंके और पिता जी को देख कर खड़े हो गए, जबकि पिता जी हमारे क़रीब आते हुए बोले____"हमें अच्छी तरह पता है कि ऐसे वक्त में हमें क्या करना चाहिए।"

मैं और बड़े भैया उनकी बातें सुन कर कुछ न बोले। उधर वो पलंग पर आ कर बैठ गए और हमें भी बैठने का इशारा किया। हम दोनों के बैठ जाने के बाद वो बोले____"सबसे पहली बात तो ये कि हालात चाहे जैसे भी हों लेकिन हमें सभी से अपने रिश्ते सही तरीके से निभाना चाहिए। तुम्हारा चंदनपुर जाना ज़रूरी है क्योंकि वहां जो कार्यक्रम होने वाला है उसकी व्यवस्था करना अकेले वीरेंद्र के बस का नहीं है। दस साल बाद वीरेंद्र को ऊपर वाले की दया से संतान के रूप में पहले पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है। ज़ाहिर है ये उसके लिए बहुत बड़ी खुशी की बात है और वो अपनी इस खुशी को बड़े उल्लास के साथ मनाना चाहता है और ये हमारा भी फर्ज़ बनता है कि हम उसकी खुशी को किसी भी तरह से फीका न पड़ने दें। यकीन मानो अगर यहां हालात ऐसे न होते तो हम सब आज ही वहां जाते। ख़ैर, तुम्हें यहां की चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। यहां के जो हालात हैं उन पर हमारी पैनी नज़र है और बड़े से बड़े ख़तरे का सामना करने के लिए हम हर तरह से तैयार हैं।"

"ठीक है पिता जी।" मैं भला अब क्या कहता____"आप कहते हैं तो ऐसा ही करूंगा मैं। ख़ैर, आज मुझे मेरे दो ख़ास आदमियों के द्वारा कुछ खास बातें पता चली हैं।"
"कैसी बातें?" पिता जी के साथ साथ बड़े भैया के भी माथे पर बल पड़ गया था।

"जगन पर किया गया हमारा शक एकदम सही साबित हुआ।" मैंने ख़ास भाव से कहा____"वो एक नंबर का कमीना इंसान निकला।"
"साफ़ साफ़ बताओ।" पिता जी के चेहरे पर उत्सुकता के भाव उभर आए थे____"क्या पता चला है तुम्हें उसके बारे में?"

"मुझे पक्का यकीन तो नहीं था।" मैंने कहा____"लेकिन तांत्रिक की हत्या हो जाने के बाद से संदेह होने लगा था उस पर। उस रात जब हमने आपस में इस सबके बारे में विचार विमर्श किया था तो दूसरे दिन ही मैंने उसकी निगरानी में अपने दो ख़ास आदमियों को लगा दिया था। आज उन्हीं दो आदमियों ने मुझे उससे संबंधित ख़बर दी है। उन दोनों आदमियों के अनुसार पिछली रात जगन साहूकारों के बगीचे में एक ऐसे रहस्यमय आदमी से मिला जिसके समूचे जिस्म पर सफ़ेद लिबास था और चेहरा भी सफ़ेद नक़ाब से ढंका हुआ था।"

"ये क्या कह रहे हो तुम?" बड़े भैया बीच में ही मेरी बात काट कर बोल पड़े____"क्या तुम्हारे उन ख़ास ख़बरियों ने उस सफ़ेदपोश आदमी का पीछा नहीं किया?"
"किया था।" मैंने कहा____"लेकिन उससे पहले ये सुनिए कि बगीचे में सफ़ेदपोश और उस जगन के अलावा और कौन था?"
 
अध्याय - 52
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अब तक....

"ये क्या कह रहे हो तुम?" बड़े भैया बीच में ही मेरी बात काट कर बोल पड़े____"क्या तुम्हारे उन ख़ास ख़बरियों ने उस सफ़ेदपोश आदमी का पीछा नहीं किया?"
"किया था।" मैंने कहा____"लेकिन उससे पहले ये सुनिए कि बगीचे में सफ़ेदपोश और उस जगन के अलावा और कौन था?"


अब आगे.....

"जगन के अलावा और कौन था वहां?" बड़े भैया ने उत्सुकता पूर्ण भाव से पूछा। पिता जी के चेहरे पर भी जानने की वही उत्सुकता दिख रही थी।

"सुनील और चेतन।" मैंने बारी बारी से पिता जी और बड़े भैया की तरफ देखते हुए कहा____"मेरे वही दोस्त जो बचपन से ही हर काम में मेरे साथ रहे हैं और मेरे ही टुकड़ों पर पलते भी रहे हैं।"

"य...ये क्या कह रहा है तू??" पिता जी तो चौंके ही थे किंतु बड़े भैया तो उछल ही पड़े थे, बोले____"ए..ऐसा कैसे हो सकता है वैभव? मेरा मतलब है कि वो दोनों तेरे साथ कोई विश्वासघात कैसे कर सकते हैं?"

"इतना हैरान मत होइए भैया।" मैंने कहा____"पिछले कुछ समय से अपने और पराए लोगों ने जो कुछ भी हमारे साथ किया है वो क्या ऐसा नहीं था जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी?"

"ये सब छोड़ो।" पिता जी ने कहा____"और मुख्य बात बताओ। तुम्हारे उन दो ख़बरियों ने इस बारे में क्या क्या जानकारी दी है तुम्हें?"

"वो दोनों जगन पर नज़र रखे हुए थे।" मैंने गहरी सांस लेकर कहा____"कल शाम भी वो जगन के पीछे पीछे ही बड़ी सावधानी से हमारे बाग़ तक पहुंचे थे। अंधेरा हो गया था लेकिन ऐसा भी नहीं था कि वो दोनों कुछ ही दूरी पर पेड़ों के पास खड़े उन लोगों को देख नहीं सकते थे। उनके अनुसार, जगन जब वहां पहुंचा तो सुनील और चेतन पहले से ही वहां मौजूद थे। उन तीनों की आपस में क्या बातें हो रहीं थी ये वो दोनों सुन नहीं पा रहे थे। ख़ैर, कुछ ही देर बाद उन्होंने देखा कि दूसरी तरफ से एक ऐसा रहस्यमई आदमी आया जिसके समूचे जिस्म पर सफ़ेद लिबास था और उसका चेहरा सफ़ेद नक़ाब से ढका हुआ था। वो सफ़ेदपोश उन तीनों से कुछ कह रहा था जिसे वो तीनों ख़ामोशी से सुन रहे थे। क़रीब पंद्रह मिनट तक वो सफ़ेदपोश उनके बीच रहा और फिर वो जिस तरह आया था वैसे ही चला भी गया। मेरे दोनों आदमी इतना तो समझ ही चुके थे कि जगन के साथ साथ सुनील और चेतन भी महज मोहरे ही हैं जबकि असली खेल खेलने वाला तो वो सफ़ेदपोश था। इस लिए दोनों बड़ी होशियारी और सावधानी के साथ उस सफ़ेदपोश के पीछे लग गए मगर उन्हें खाली हाथ ही लौटना पड़ा। दोनों ने बताया कि उन्होंने उस सफ़ेदपोश को काफ़ी खोजा मगर वो तो जैसे किसी जादू की तरह ग़ायब ही हो गया था।"

"बड़े आश्चर्य की बात है।" बड़े भैया गहरी सांस ले कर बोले____"जो व्यक्ति अंधेरे में भी अपने सफ़ेद लिबास के चलते बखूबी दिखाई दे रहा था वो दो आदमियों की आंखों के सामने से बड़े ही चमत्कारिक ढंग से ग़ायब हो गया, यकीन नहीं होता। ख़ैर, सबसे ज़्यादा हैरानी की बात तो ये है कि तेरे अपने बचपन के दोस्त भी उस सफ़ेदपोश आदमी से मिले हुए हैं। आख़िर वो दोनों किसी ऐसे रहस्यमई आदमी के हाथ की कठपुतली कैसे बन सकते हैं जो उसके अपने दोस्त और उसके पूरे खानदान का शत्रु बना हुआ हो?"

"मैं खुद नहीं समझ पा रहा भैया कि वो दोनों उस सफ़ेदपोश आदमी से क्यों मिले हुए हैं?" मैंने सोचने वाले भाव से कहा____"जब से मुझे इस बारे में अपने उन दो ख़बरियों से पता चला है तभी से इस सबके बारे में सोच सोच कर परेशान हूं। जगन का तो समझ में आता है कि वो कई कारणों से उस सफ़ेदपोश आदमी का साथ दे सकता है लेकिन मेरे अपने बचपन के दोस्त भी ऐसा करेंगे इसकी तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था।"

"कोई तो ऐसी वजह ज़रूर होगी।" पिता जी ने सोचने वाले अंदाज़ में कहा____"जिसके चलते तुम्हारे वो दोनों दोस्त उस सफ़ेदपोश आदमी का साथ दे रहे हैं। संभव है कि वो दोनों ऐसा किसी मजबूरी के चलते कर रहे हों। इंसान कोई भी काम दो सूरतों में ही करता है, या तो ख़ुशी से या फिर किसी मज़बूरी से। ये तो पक्की बात है कि उनकी तुमसे कोई दुश्मनी नहीं है तो ज़ाहिर है उनका उस सफ़ेदपोश आदमी का साथ देते हुए तुम्हारे खिलाफ़ कुछ भी करना मजबूरी ही हो सकती है। अब हमें बड़ी होशियारी और सतर्कता से उनसे मिलना होगा और इस सबके बारे में पूछना होगा।"

"ये काम मैं ही बेहतर तरीके से कर सकता था।" मैंने पिता जी की तरफ संजीदगी से देखते हुए कहा____"लेकिन अब ये संभव ही नहीं हो सकेगा क्योंकि आपके हुकुम पर मुझे आज और अभी भाभी को लेकर चंदनपुर जाना होगा।"

"हां हम समझते हैं।" पिता जी ने कहा____"लेकिन रागिनी बहू को ले कर तुम्हारा चंदनपुर जाना ज़रूरी है। रही बात तुम्हारे उन दोनों दोस्तों से इस बारे में मिल कर पूंछतांछ करने की तो उसकी फ़िक्र मत करो तुम। हम अपने तरीके से इस बारे में पता कर लेंगे।"

"आज मैंने ये पता करने की कोशिश की कि उस दिन हवेली में ऐसा कौन व्यक्ति रहा होगा जिसने रेखा को ज़हर खाने पर मज़बूर किया होगा?" बड़े भैया ने कहा____"मैंने अपने तरीके से हवेली की लगभग हर नौकरानी से पूछताछ की और साथ ही हवेली के बाहर सुरक्षा में लगे आदमियों से भी पूछा लेकिन हैरानी की बात है कि इस बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं है।"

"हमें तो इस बारे में कुछ और ही समझ में आ रहा है।" पिता जी ने कुछ सोचते हुए कहा____"हो सकता है कि हमारा सोचना ग़लत भी हो किंतु रेखा के मामले में हम जैसा सोच रहे हैं शायद वैसा न हो। कहने का मतलब ये कि ज़रूरी नहीं कि उसे ज़हर खाने पर मज़बूर करने वाला उस समय हवेली में ही रहा हो बल्कि ऐसा भी हो सकता है कि उसे पहले से ही ऐसा कुछ करने का निर्देश दिया गया रहा होगा। हवेली की दो नौकरानियों के अलावा बाकी सभी नौकरानियां सुबह सुबह ही अपने अपने घरों से हवेली में काम करने आती हैं और फिर दिन ढले ही यहां से अपने घर जाती हैं। रेखा और शीला दोनों ही नई नौकरानियां थी और वो दोनों सुबह यहां आने के बाद शाम को ही अपने अपने घर जाती थीं। ख़ैर, हमारे कहने का मतलब ये है कि अगर उसे ज़हर खाने पर मज़बूर करने वाला हवेली में उस वक्त नहीं था अथवा हमारी पूछताछ पर ऐसे किसी व्यक्ति का पता नहीं चल सका है तो संभव है कि रेखा को पहले से ही ऐसा कुछ करने का निर्देश दिया गया रहा होगा। जिस तरह के हालात बने हुए थे उस स्थिति में उसके आका ने पहले ही उसे ये निर्देश दे दिया होगा कि अगर उसे अपने पकड़े जाने का ज़रा भी अंदेशा हो तो वो फ़ौरन ही ज़हर खा कर अपनी जान दे दे। उस दिन सुबह जिस तरह से हम सब लाव लश्कर ले कर चलने वाले थे उस सबको रेखा ने शायद अपनी आंखों से देखा होगा। उसे लगा होगा कि हमें उसके और उसके आका के बारे में पता चल गया है। वो इस बात से बुरी तरह घबरा गई होगी और फिर अपने आका के निर्देश के अनुसार उसने फ़ौरन ही खुदकुशी करने का इरादा बना लिया होगा।"

"हां शायद ऐसा ही हुआ होगा।" बड़े भैया ने सिर हिलाते हुए कहा____"तो फिर इसका मतलब ये हुआ कि रेखा उस दिन हमारे लाव लश्कर को देख कर ग़लतफहमी का शिकार हो गई थी और उसी के चलते उसने ज़हर खा कर अपनी जान दे दी, मूर्ख औरत।"

"ये सिर्फ़ एक संभावना है।" पिता जी ने कहा____"जो कि ग़लत भी हो सकती है। हमें इस बारे में सिर्फ़ संभावना नहीं करनी है बल्कि सच का पता लगाना है। आज सुबह गांव वालों से हमने कहा भी है कि हम रेखा और शीला दोनों की ही मौत का पता लगाएंगे।"

"कैसे पता लगाएंगे पिता जी?" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए कहा____"जबकि हम अच्छी तरह जानते हैं कि उन दोनों की मौत का असल सच क्या है। आप गांव वालों को वो सच इस लिए नहीं बताना चाहते क्योंकि उससे दुश्मन को हमारी मंशा का पता चल जाएगा लेकिन इसके चलते आज जो एक नई बात हुई है उस पर शायद आप ध्यान ही नहीं देना चाहते। हमारे इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि गांव के कुछ लोग हमारे प्रति अपने अंदर गुस्सा और घृणा के भाव लिए हमारी चौखट तक चले आए। मैंने अपनी आंखों से देखा था पिता जी कि उनमें से किसी की भी आंखों में हमारे प्रति लेश मात्र भी दहशत नहीं थी। उस वक्त जिस तरह से आप उनसे बात कर रहे थे उससे मुझे ऐसा आभास हो रहा था जैसे आप उनके ऐसे मुजरिम हैं जिनसे वो जैसे चाहें गरजते हुए बात कर सकते हैं। माफ़ कीजिए पिता जी लेकिन अगर आपकी जगह मैं होता तो उसी वक्त उन सबको उनकी औकात दिखा देता। एक पल भी नहीं लगता उन्हें आपके क़दमों में गिर कर गिड़गिड़ाते हुए अपनी अपनी जान की भीख मांगने में।"

"हम में और तुम में यही अंतर बर्खुरदार।" पिता जी ने कहा____"हम गांव और समाज के लोगों के अंदर अपने प्रति डर अथवा ख़ौफ नहीं डालना चाहते हैं बल्कि उनके अंदर अपने प्रति इज्ज़त और सम्मान की ऐसी भावना डालना चाहते हैं जिसकी वजह से वो हर परिस्थिति में हमारा आदर करें और हमारे लिए खुशी खुशी अपना बलिदान देने के लिए भी तैयार रहें। तुम में हमें हमेशा हमारे पिता श्री यानि बड़े दादा ठाकुर की छवि दिखती है। वही गुरूर, वही गुस्सा, वही मनमौजीपन और वैसी ही फितरत जिसके तहत हर किसी को तुच्छ समझना और हर किसी को बेवजह ही अपने गुस्से के द्वारा ख़ाक में मिला देना। तुम हमेशा उन्हीं के जैसा बर्ताव करते आए हो। तुम सिर्फ़ यही चाहते हो कि गांव और समाज के लोगों के अंदर तुम्हारा वैसा ही ख़ौफ हो जैसा उनका होता था। हमें समझ में नहीं आता कि ऐसी सोच रखने वाला इंसान ये क्यों नहीं समझता कि ऐसा करने से लोग उससे डरते भले ही हैं लेकिन उसके प्रति उनके दिल में सच्चा प्रेम भाव कभी नहीं रहता। उसके द्वारा बेरहमी दिखाने से लोग भले ही उससे रहम की भीख मांगें लेकिन अंदर ही अंदर वो हमेशा उसे बददुआ ही देते हैं।"

"मैं ये मानता हूं पिता जी कि मैंने हमेशा अपनी मर्ज़ी से ही अपना हर काम किया है।" मैंने गंभीरता से कहा____"और ये भी मानता हूं कि मैंने हमेशा वही किया है जिसके चलते आपका नाम ख़राब हुआ है लेकिन बड़े दादा ठाकुर की तरह मैंने कभी किसी मजलूम को नहीं सताया और ना ही किसी के अंदर कभी ख़ौफ भरने का सोचा है। मैं नहीं जानता कि आपको ऐसा क्यों लगता है कि मैं बड़े दादा ठाकुर के जैसी सोच रखता हूं या उनके जैसा ही बर्ताव करता हूं।"

"मैं वैभव की बातों से सहमत हूं पिता जी।" बड़े भैया ने झिझकते हुए कहा____"वो थोड़ा गुस्सैल स्वभाव का ज़रूर है लेकिन मैंने भी देखा है कि अपने गुस्से के चलते इसने किसी के साथ ऐसा कुछ भी बुरा नहीं किया है जैसा कि बड़े दादा ठाकुर करते थे।"

बड़े भैया ने पहली बार पिता जी के सामने मेरा पक्ष लिया था और ये देख कर मुझे बेहद खुशी हुई थी। पिता जी उनकी बात सुन कर कुछ देर तक ख़ामोशी से उनकी तरफ देखते रहे। मैंने देखा उनके होठों पर बहुत ही बारीक मुस्कान एक पल के लिए उभरी थी और फिर फ़ौरन ही ग़ायब भी हो गई थी।

"वैसे मैं ये सोच रहा हूं कि क्या जगन ने ही अपने बड़े भाई मुरारी की हत्या की होगी?" मैंने एकदम से छा गई ख़ामोशी को चीरते हुए कहा____"सोचा जाए तो उसके पास अपने भाई की हत्या करने की काफ़ी माकूल वजह है। यानि अपने भाई की ज़मीन जायदाद को हड़प लेना। मेरा ख़्याल है कि ऐसी मानसिकता उसके अंदर पहले से ही रही होगी किंतु इतना बड़ा क़दम उठाने से वो डरता रहा होगा लेकिन जब उसे सफ़ेदपोश आदमी का बेहतर सहयोग प्राप्त हुआ तो उसने अपने मंसूबों को परवान चढ़ाने में देरी नहीं की।"

"हमें भी ऐसा ही लगता है।" पिता जी ने कहा____"उस सफ़ेदपोश को शायद जगन के मंसूबों का पता रहा होगा तभी उसने उसे पूरा सहयोग करने का प्रलोभन दिया होगा। उसने जगन को ये भी कहा होगा कि उसके द्वारा मुरारी की हत्या कर देने से उस पर कभी कोई आंच नहीं आएगी। जगन को भला इसके बेहतर मौका और इसके सिवा क्या चाहिए था।"

"यहां पर सवाल ये उठता है कि क्या जगन के ज़हन में।" बड़े भैया ने कहा____"ये ख़्याल नहीं आया होगा कि जो रहस्यमय व्यक्ति उसका इस तरह से साथ देने का दावा कर रहा है वो उस सबके लिए एक दिन उसे फंसा भी सकता है? जगन अपने ही भाई की हत्या किसी ऐसे व्यक्ति के भरोसे कैसे कर देने का सोच सकता है जिसके बारे में वो ख़ुद ही न जानता हो?"

"बात तर्क़ संगत है।" पिता जी ने कहा____"यकीनन वो इतना बड़ा जोख़िम किसी अज्ञात व्यक्ति के भरोसे नहीं उठा सकता था लेकिन संभव है कि भाई के ज़मीन जायदाद के लालच ने उसके ज़हन को कुछ सोचने ही न दिया हो। ये भी हो सकता है कि उस सफ़ेदपोश ने उसे अपनी तरफ से थोड़ा बहुत धन का लालच भी दिया हो।"

"बेशक ऐसा हो सकता है।" बड़े भैया ने कहा____"पर सवाल है किस लिए? उसे भला जगन द्वारा उसके ही भाई की हत्या करा देने से क्या लाभ हो सकता था?"

"क्या ये लाभ जैसी बात नहीं थी कि मुरारी की हत्या हो जाने के बाद उसका इल्ज़ाम तुम्हारे छोटे भाई के ऊपर लग गया था?" पिता जी ने जैसे बड़े भैया को याद दिलाते हुए कहा_____"उस सफ़ेदपोश का ये सब करवाने का सिर्फ़ एक ही मकसद था____हम सबका नाम ख़राब करना। दूर दूर तक इस बात को फैला देना कि जो दादा ठाकुर आस पास के दस गांवों का फैसला करता है उसका अपना ही बेटा किसी ग़रीब व्यक्ति की इस तरह से हत्या भी करता फिरता है। अगर वाकई में जगन ने ही अपने भाई की हत्या की है तो समझ लो कि उस सफ़ेदपोश ने एक तरह से एक तीर से दो शिकार किए थे। एक तरफ जगन का फ़ायदा हुआ और दूसरी तरफ ख़ुद उस सफ़ेदपोश का फ़ायदा हुआ।"

"अगर ये सब संभावनाएं सच हुईं तो समझिए मुरारी की हत्या का रहस्य सुलझ गया।" मैंने सोचने वाले भाव से कहा____"लेकिन अब मुझे ये समझ में नहीं आ रहा कि वो सफ़ेदपोश आदमी मेरे दोस्तों के द्वारा अपना कौन सा उल्लू सीधा करना चाहता है?"

"वो दोनों तुम्हारे दोस्त हैं।" पिता जी ने कहा____"और उन्हें तुम्हारे हर क्रिया कलाप के बारे में बेहतर तरीके से पता है। संभव है कि वो सफ़ेदपोश आदमी उनके द्वारा इसी संबंध में अपना कोई काम करवा रहा हो।"

"मामला गंभीर है पिता जी।" मैंने चिंतित भाव से कहा____"सुनील और चेतन से इस बारे में पूछताछ करना बेहद ज़रूरी है।"
"जल्दबाजी में उठाया गया क़दम नुकसानदेय भी हो सकता है।" पिता जी ने कहा____"इस लिए बेहतर है कि हम पहले उन दोनों पर गुप्त रूप से नज़र रखवाएं। हम नहीं चाहते कि हमारी किसी ग़लती की वजह से उनकी जान को कोई ख़तरा हो जाए।"

पिता जी की बात सुन कर अभी मैं कुछ बोलने ही वाला था कि तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई और बाहर से मां की आवाज़ आई। वो मुझे डांटते हुए कह रहीं थी कि मैं अभी तक तैयार हो कर क्यों नहीं आया? मां की ये बात पिता जी और बड़े भैया ने भी सुनी। इस लिए पिता जी पलंग से नीचे उतर गए और मुझसे कहा कि मैं भाभी को साथ ले कर चंदनपुर जाऊं और यहां के बारे में कोई फ़िक्र न करूं।

पिता जी और बड़े भैया दोनों ही कमरे से चले गए तो मैं फ़ौरन ही अपने कपड़े उतार कर दूसरे कपड़े पहनने लगा। इस बीच कमरे में मेरे कुछ कपड़ों को एक थैले में डालते हुए मां जाने क्या क्या सुनाए जा रहीं थी मुझे। ख़ैर कुछ ही देर में मैं थैला लिए उनके साथ ही कमरे से बाहर निकला।

रागिनी भाभी तैयार हो कर नीचे ही मेरा इंतज़ार कर रहीं थी। मेरे आते ही भाभी ने अपने से बड़ों का आशीर्वाद लिया और फिर चल पड़ीं। एक थैला उनका भी था इस लिए मैं उनका और अपना थैला लिए बाहर आया। बाहर अभिनव भैया ने जीप को मुख्य दरवाज़े के सामने लगा दिया था। पिता जी ने मुझे कुछ ज़रूरी दिशा निर्देश दिए उसके बाद मैंने उनका आशीर्वाद ले कर जीप में अपना और भाभी का थैला रखा। बड़े भैया जीप से उतर आए थे। भाभी चुपचाप जा कर जीप में बैठ गईं। मैंने बड़े भैया के भी पैर छुए तो उन्होंने एकदम से मुझे अपने गले से लगा लिया और मुझे अपना ख़्याल रखने के लिए कहा।

कुछ ही देर में मैं भाभी को लिए जीप से निकल पड़ा। हमारे साथ कुछ आदमियों को भी जाना था इस लिए एक दूसरी जीप में वो लोग भी हमारे पीछे चल पड़े थे। वो सब दिखने में भले ही सामान्य नज़र आ रहे थे लेकिन मैं बखूबी जानता था कि वो सब हर तरह के ख़तरे से निपटने के लिए तैयार थे। रागिनी भाभी मेरे बगल से ही बैठी हुईं थी। उनके चेहरे पर एक अलग ही ख़ुशी की चमक दिख रही थी। ये पहला अवसर था जब मैं भाभी को ले कर कहीं जा रहा था और वो मेरे साथ जीप में अकेली थीं। सुर्ख साड़ी में वो बहुत ही खूबसूरत दिख रहीं थी। मैं चुपके से उनकी नज़र बचा कर उन्हें देखने पर मानों मजबूर हो जाता था।

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मुझे हवेली से निकले क़रीब आधा घंटा ही हुआ था कि जगताप चाचा हवेली में दाखिल हुए। जगताप चाचा को पिता जी ने रेखा और शीला के हत्यारे का पता लगाने का काम सौंपा था और साथ ही इस बात का भी कि सरजू कलुआ और रंगा सुबह जिस सुर में बात कर रहे थे उसके पीछे की असल वजह क्या थी। पिता जी बैठक में ही बड़े भैया के साथ बैठे हुए थे और हालातों के बारे में अपनी कुछ रणनीति बना रहे थे। जगताप चाचा आए तो वो भी उनके पास ही बैठक में रखी एक कुर्सी पर बैठ गए।

"तुम्हारे चेहरे के भाव ज़ाहिर कर रहे हैं कि हमने जो काम तुम्हें सौंपा था वो काम तुमने बखूबी कर लिया है।" पिता जी ने जगताप चाचा की तरफ देखते हुए कहा_____"ख़ैर हम तुमसे सब कुछ जानने के लिए उत्सुक हैं।"

"आपने सही अंदाज़ा लगाया भैया।" जगताप चाचा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा____"मुझे कामयाबी तो मिली है लेकिन पूरी तरह से नहीं।"
"ये क्या कह रहे हो तुम?" पिता जी के माथे पर सहसा सिलवटें उभर आईं____"पूरी तरह से कामयाबी नहीं मिली है से क्या मतलब है तुम्हारा?"

"बात दरअसल ये है भैया कि आपके हुकुम पर मैं इस सबका पता लगाने के लिए गया।" जगताप चाचा ने लंबी सांस लेते हुए कहा____"सबसे पहले तो मैं रेखा और शीला के पतियों से मिला और उनसे इस सबके बारे में विस्तार से बातें की और ये भी कहा कि क्या उन्हें लगता है कि उनकी बीवियों को हम बेवजह ही मौत घाट उतार देंगे? उन्हें समझाने के लिए और उनको संतुष्ट करने के लिए मुझे उन दोनों को सच बताना पड़ा भैया। मैंने उन्हें बताया कि उनकी बीवियां असल में हमारे किसी दुश्मन के इशारे पर काम कर रहीं थी और जब हमें इस बात का पता चला तो हम बस उनसे बात करना चाहते थे लेकिन उससे पहले ही उन दोनों की मौत हो गई। मैंने उन्हें बताया कि उनकी बीवियां किसी अज्ञात आदमी के द्वारा इस हद तक मज़बूर कर दी गईं थी कि वो दोनों उसके इशारे पर कुछ भी कर सकती थीं। मेरे द्वारा सच बताए जाने पर शीला और रेखा के पति बुरी तरह चकित हो गए थे। मैंने उन्हें समझाया कि इस बारे में उन्हें हमने सबके सामने इसी लिए नहीं बताया था क्योंकि इससे हमारे दुश्मन को भी पता लग जाता। जबकि हम तो ये चाहते हैं कि हमारा दुश्मन भ्रम में ही रहे और हम किसी तरह जाल बिछा कर उसे पकड़ लें। फिर मैंने उनसे सरजू कलुआ और रंगा के बारे में पूछा कि क्या वो तीनों उसके यहां आए थे तो दोनों ने बताया कि पिछली रात वो तीनों घंटों उनके यहां बैठे रहे थे और इस घटना के बारे में जाने क्या क्या उनके दिमाग़ में भरते जा रहे थे। मैंने उन्हें समझाया कि उन तीनों की बातों में न फंसे क्योंकि वो तीनों भी हमारे दुश्मन के आदमी हो सकते हैं। आख़िर मेरे समझाने बुझाने पर देवधर और मंगल मान भी गए और उन्हें सच का पता भी चल गया।"

"चलो ये तो अच्छा हुआ।" पिता जी ने कहा____"उसके बाद फिर क्या तुम उन तीनों से भी मिले?"
"उनसे मिलता तो ज़रूरी ही था भैया।" जगताप चाचा ने कहा____"आख़िर उन्हीं से तो ये पता चलता कि सुबह उतने सारे लोगों में से सिर्फ़ उन तीनों को ही ऐसी कौन सी खुजली हो रही थी जिसके चलते वो हमसे ऊंचे स्वर में बात करने की हिमाकत किए थे?"

"ह्म्म्म।" पिता जी ने हल्के से हुंकार भरी____"तो क्या पता चला इस बारे में उनसे?"
"अपने साथ यहां से दो आदमियों को ले कर गया था मैं।" जगताप चाचा ने कहना शुरू किया____"ऐसा इस लिए क्योंकि मुझे पूरा अंदेशा था कि वो लोग आसानी से मिलेंगे नहीं और अगर मिले भी तो आसानी से हाथ नहीं आएंगे। मैं सरजू के घर गया और अपने दोनों आदमियों को अलग अलग कलुआ और रंगा के घर भेजा। उन्हें हुकुम था कि वो उन दोनों को हर हाल में उन्हें ले कर सरजू के घर आएं और फिर ऐसा ही हुआ। तीनों जब मेरे सामने इकट्ठा हुए तो तीनों ही एकदम से घबरा गए थे। उन्हें समझने में देर नहीं लगी कि मैं और मेरे आदमियों ने किस लिए उन तीनों को इकट्ठा किया है। ख़ैर, उसके बाद मैंने तीनों से पूछताछ शुरू की। शुरू में तो वो तीनों इधर उधर की ही हांकते रहे लेकिन जब तीनों की कुटाई हुई तो जल्दी ही रट्टू तोते की तरह सब कुछ बताना शुरू कर दिया। उनके अनुसार, दो दिन पहले उन्हें सफ़ेद लिबास पहने एक रहस्यमई आदमी रात के अंधेरे में मिला था। उस सफ़ेदपोश आदमी के साथ दो लोग और थे जिनका चेहरा अंधेरे में नज़र नहीं आ रहा था। उस सफ़ेदपोश ने ही उन्हें बताया था कि कैसे उन तीनों को गांव वालों को इकट्ठा करना है और फिर कैसे शीला और रेखा की मौत के बारे में हवेली जा कर दादा ठाकुर के सामने पूरी निडरता से सवाल जवाब करना है। सफ़ेदपोश ने उन तीनों को धमकी दी थी कि अगर उन्होंने उसके कहे अनुसार ऐसा नहीं किया तो वो उसके परिवार वालों को जान से मार देगा। कहने का मतलब ये कि सरजू कलुआ और रंगा ने वो सब उस सफ़ेदपोश आदमी के मज़बूर करने पर किया था।"

"हमें लगा ही था कि उन तीनों के ऐसे ब्यौहार के पीछे ज़रूर ऐसी ही कोई बात होगी।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"ख़ैर, तुमने बताया कि सफ़ेदपोश ने उन तीनों को ऐसा करने के लिए दो दिन पहले कहा था, यानि जिस दिन रेखा और शीला की मौत हुई थी। ज़ाहिर है उस सफ़ेदपोश ने इस मामले को बड़ी होशियारी से हमारे खिलाफ़ एक हथियार के रूप में स्तेमाल किया है। एक बार फिर से उसने वही हथकंडा अपनाया है यानि हमें और हमारी शाख को धूल में मिलाने वाला हथकंडा। यही हथकंडा उसने मुरारी की हत्या के समय अपनाया था, वैभव के सिर मुरारी की हत्या का आरोप लगवा कर।"

"हमें ये तो पता चल गया पिता जी कि सरजू कलुआ और रंगा के उस ब्यौहार की वजह क्या थी।" अभिनव भैया ने कहा____"लेकिन इस सबके बाद भी अगर हम ये कहें कि कोई फ़ायदा नहीं हुआ है तो ग़लत न होगा। हमारा दुश्मन इतना शातिर है कि वो अपने खिलाफ़ ऐसा कोई भी सुराग़ नहीं छोड़ रहा जिसके चलते हम उस तक पहुंच सकें। वो अपने फ़ायदे के लिए जिस किसी को भी मोहरा बनाता है उसे पकड़ लेने के बाद भी हमें कोई फ़ायदा नहीं होता।"

"इसकी वजह ये है कि वो अपने हर प्यादे से अपनी शक्ल छुपा कर ही मिलता है।" पिता जी ने सोचने वाले भाव से कहा____"इतना तो वो भी समझता है कि उसका कोई न कोई प्यादा देर सवेर हमारे हाथ लगेगा ही और तब हम उसके उस प्यादे से उसके बारे में पता करने की पूरी कोशिश करेंगे। ज़ाहिर है अगर उसके प्यादे को उसके बारे में पता होगा तो हमें उसी प्यादे से उसके बारे में सब कुछ जान लेने में देर नहीं लगेगी। यही सब सोच कर वो हमेशा अपने प्यादों से अपनी शक्ल छुपा कर ही मिलता है।"

"फिर तो हमारे लिए उस तक पहुंच पाना लगभग असम्भव बात ही है भैया।" जगताप चाचा ने गहरी सांस ले कर कहा____"वो हमेशा हमसे दो क्या बल्कि चार क़दम आगे की सोच कर चलता है और हमें हर बार नाकामी का ही स्वाद चखना पड़ता है।"

"किसी भी इंसान के सितारे हमेशा गर्दिश में नहीं रहते जगताप।" पिता जी ने हल्की मुस्कान में कहा____एक दिन हर इंसान का बुरा वक्त आता है। हमें यकीन है कि उस सफ़ेदपोश का भी बुरा वक्त जल्द ही आएगा।"

कुछ देर और इस संबंध में भी बातें हुईं उसके बाद सब अपने अपने काम पर चले गए। दादा ठाकुर अकेले ही बैठक में बैठे हुए थे। उनके चेहरे पर कई तरह के विचारों का आवा गमन चालू था। सहसा जाने क्या सोच कर वो मुस्कुराए और फिर उठ कर हवेली के अंदर की तरफ बढ़ गए।
 
अध्याय - 53
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अब तक....

"किसी भी इंसान के सितारे हमेशा गर्दिश में नहीं रहते जगताप।" पिता जी ने हल्की मुस्कान में कहा____एक दिन हर इंसान का बुरा वक्त आता है। हमें यकीन है कि उस सफ़ेदपोश का भी बुरा वक्त जल्द ही आएगा।"

कुछ देर और इस संबंध में भी बातें हुईं उसके बाद सब अपने अपने काम पर चले गए। दादा ठाकुर अकेले ही बैठक में बैठे हुए थे। उनके चेहरे पर कई तरह के विचारों का आवा गमन चालू था। सहसा जाने क्या सोच कर वो मुस्कुराए और फिर उठ कर हवेली के अंदर की तरफ बढ़ गए।


अब आगे....


"इधर क्यों मोड़ दिया जीप को?" मैंने अपने नए बन रहे मकान के रास्ते की तरफ जीप को मोड़ा तो भाभी ने चौंक कर मुझसे पूछा____"क्या चंदनपुर जाने का इस तरफ से भी रास्ता है?"

"नहीं भाभी।" मैंने हल्के से मुस्कुरा कर कहा____"इस तरफ से आपके मायके जाने का रास्ता नहीं है लेकिन इधर इस लिए जीप को मोड़ा है क्योंकि मुझे कुछ काम है यहां पर किसी से।"

मेरी बात सुन कर भाभी मेरी तरफ देखने लगीं। ऐसा लगा जैसे कुछ सोचने लगीं हो। मैंने उनकी तरफ एक नज़र डाली और फिर ख़ामोशी से जीप चलाते हुए कुछ ही देर में मैं उस जगह पर पहुंच गया जहां पर मेरा नया मकान बन रहा था। मेरी उम्मीद के अनुसार भुवन वहीं मौजूद था। मुझे आया देख वो जल्दी से मेरे पास आया और पहले मुझे सलाम किया फिर भाभी को। मैंने भाभी को जीप में ही बैठे रहने को कहा और खुद जीप से उतर कर भुवन को लिए थोड़ा दूर चला आया।

"मैं कुछ दिनों के लिए भाभी के साथ उनके मायके जा रहा हूं भुवन।" मैंने भुवन से कहा_____"पिता जी के हुकुम से मुझे उनके मायके में कुछ दिन रुकना भी पड़ेगा। इस लिए मैं तुम्हें कुछ ज़िम्मेदारियां दे कर जा रहा हूं और उम्मीद करता हूं कि तुम उन ज़िम्मेदारियों को हर कीमत पर निभाओगे।"

"आप बस हुकुम कीजिए छोटे ठाकुर।" भुवन ने एकदम सतर्क हो कर कहा_____"आपकी हर आज्ञा का पालन मैं अपनी जान दे कर करूंगा। बताइए, आपके यहां ना रहने कर मुझे क्या करना होगा?"

"तुम्हें मुरारी काका के घर वालों की सुरक्षा का हर कीमत पर ख़्याल रखना है।" मैंने कहा____"तुम्हें इस बात पर ख़ास ध्यान देना है कि उस घर में बाहर का कौन व्यक्ति आता है और क्या करता है? तुम्हें तो पता ही है कि आज कल हालात बहुत ही ख़राब हैं इस लिए उनकी सुरक्षा का भार अब तुम्हारे कंधो पर रहेगा। एक बात और, जगन भले ही मुरारी का भाई है लेकिन तुम्हें उसकी गतिविधियों पर भी नज़र रखनी है।"

"मैं समझ गया छोटे ठाकुर।" भुवन ने कहा____"आप बिलकुल बेफ़िक्र हो कर जाइए। मुरारी के घर वालों पर मेरे रहते कोई आंच नहीं आएगी।"

"बहुत बढ़िया।" मैंने उसके कंधे पर हाथ रख कर कहा_____"इस सबके लिए तुम्हारे पास आदमियों की कोई कमी नहीं है इस लिए सिर्फ़ अपने आदमियों के ही भरोसे मत रहना बल्कि इस मकान से ज़्यादा मुरारी के घर वालों की सुरक्षा का ज़िम्मा तुम खुद अपने हाथ में लिए रहोगे। रही बात यहां की तो इस बारे में तुम्हें सब पता ही है।"

"आप निश्चिंत रहिए छोटे ठाकुर।" भुवन ने पूरी गर्मजोशी से कहा____"भुवन आपको वचन देता है कि मेरे रहते मुरारी के घर वालों पर कोई आंच नहीं आएगी। इसके अलावा बाकी जो काम आपने मुझे सौंपे हैं वो भी बेहतर तरीके से होते रहेंगे।"

भुवन से मैंने विदा ली और जीप में आ कर बैठ गया। अब मैं निश्चिंत हो चुका था इस लिए खुशी मन से जीप को स्टार्ट किया और मोड़ कर वापस मुख्य सड़क की तरफ चल पड़ा। मेरे पीछे एक दूसरी जीप में मेरे कुछ आदमी भी पूरी सतर्कता से आ रहे थे।

"यहां कोई ज़रूरी काम था क्या तुम्हारा?" रास्ते में भाभी ने मुझसे पूछा____"वैसे इस जगह पर मकान बनवाने का विचार क्यों आया था तुम्हारे मन में?"

"बस ये समझ लीजिए भाभी कि यहां पर मकान बनवा कर मैं ऐसा कोई काम नहीं करुंगा जिसकी शायद आप सब मुझसे उम्मीद कर रहे हैं।" मैंने एक नज़र भाभी के चेहरे पर डालने के बाद कहा____"ख़ैर ये सब छोड़िए, और ये बताइए कि मायके जाने की ख़ुशी तो है न आपको?"

"ख़ुशी क्यों नहीं होगी भला?" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"मेरे भैया को दस सालों बाद बड़ी मन्नतों से पहली संतान हुई है। सच कहूं तो मैं बहुत खुश हूं और मुझे यकीन है कि भैया तो इस खुशी में आज कल फूले न समा रहे होंगे। जी करता है एक पल में वहां पहुंच जाऊं और उन सबके खुशी से जगमगाते चेहरे देखूं।"

"ज़रूर देखेंगी भाभी।" मैंने कहा____"बहुत जल्द मैं आपको उन सबके पास पहुंचा दूंगा। वैसे वहां पहुंच कर आप तो अपनों के साथ ही ब्यस्त हो जाएंगी लेकिन सोच रहा हूं कि मुझ मासूम का क्या होगा? वहां कोई मेरी तरफ ध्यान भी देगा या नहीं?"

"सब ध्यान देंगे।" भाभी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"और हां, मेरे सामने तुम ज़्यादा मासूम और भोला बनने का ये नाटक मत करो। सब जानती हूं तुम्हारे कारनामे।"

"मेरे कारनामे??" मैं एकदम से चौंका____"ये क्या कह रही हैं आप?"
"मैंने कहा न कि मेरे सामने नाटक मत करो।" भाभी ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा____"तुम अगर ये सोचते हो कि मुझे कुछ पता नहीं है तो ये तुम्हारी भूल है। तुमने मेरे मायके में अपने नाम का जो डंका बजा रखा है न उसके बारे में सब पता है मुझे।"

"पता नहीं ये क्या कह रही हैं आप?" मैं अंदर ही अंदर उनकी इस जानकारी पर हैरान था किंतु प्रत्यक्ष में अंजान बनते हुए बोला_____"भला मैं भोला भाला आदमी कैसे कहीं अपने नाम का डंका बजा सकता हूं?"

"कुछ तो शर्म करो वैभव, कुछ तो भगवान से डरो।" भाभी ने मेरे बाजू पर ज़ोर से मारते हुए कहा____"मैंने मां जी से सुना है कि बड़े दादा ठाकुर के भी हर जगह ऐसे ही डंके बजते थे और अब तुम्हारे बजने लगे हैं। आख़िर कब सुधरोगे तुम?"

"क्या आपको नहीं लगता कि मैं पहले से थोड़ा सा ही सही लेकिन सुधर गया हूं?" मैंने इस बार थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"क्या आपको नहीं लगता भाभी कि मैं आपकी बातों को मान कर वो सब करने लगा हूं जो मुझे करना चाहिए?"

"बिल्कुल लगता है वैभव।" भाभी ने इस बार मुझे प्रशंशा की दृष्टि से देखते हुए कहा____"और सच कहूं तो तुम्हारे इस बदले हुए रूप को देख कर मैं बेहद खुश हूं। तुमने तो वो काम किया है जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। तुमने मेरी बेरंग और उजाड़ दुनिया में जो खुशी के रंग भर दिए हैं उसके लिए मैं हमेशा तुम्हारी ऋणी रहूंगी। अब तो बस एक ही इच्छा है कि तुम पूरी तरह से सुधर जाओ और पूरी ईमानदारी से हर ज़िम्मेदारी को निभाओ।"

"मुझसे जो हो सकता है उसे मैं पूरी ईमानदारी से कर रहा हूं भाभी।" मैंने संजीदगी से कहा____"और आगे भी यही कोशिश करता रहूंगा कि आपकी उम्मीदों पर खरा उतरूं। ख़ैर ये सब छोड़िए और ये बताइए कि अब भैया का बर्ताव कैसा है आपके साथ?"

"उनका तो जैसे कायाकल्प हो गया है वैभव।" भाभी ने ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए कहा____"साढ़े तीन साल पहले जैसे वो थे उससे कहीं ज़्यादा अब उनका बर्ताव बेहतर हो गया है। आज कल तो मैं उनके हर क्रिया कलाप से हैरान होती रहती हूं। कभी कभी तो ऐसा आभास होता है जैसे वो मेरे पति हैं ही नहीं बल्कि उनकी शक्ल में कोई और ही बेहतर इंसान आ गया है।"

"हाहाहा ऐसा क्या करने लगे हैं वो।" मैंने हंसते हुए कहा____"जिससे आप इतना ज़्यादा हैरान होती रहती हैं?"
"अब तुमसे क्या बताऊं वैभव।" भाभी के चेहरे पर सहसा शर्म की लाली उभर आई____"बस यूं समझो कि अब उनके हर कार्य से मैं खुश हूं।"

"फिर तो ये अच्छी बात है।" मैंने सहसा मायूस हो कर कहा_____"बस एक हम ही हैं जिस पर इतने कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए हैं। कुछ लोगों को शायद हमारा ख़ुश रहना अच्छा नहीं लगता।"

"चिंता मत करो।" भाभी ने हल्के से हंसते हुए कहा_____"तुम्हारी ख़ुशी का भी जल्द इंतजाम किया जाएगा। इस बार मां जी से कहूंगी कि वो तुम्हारे लिए कोई अच्छी सी लड़की खोजें और फिर जल्दी ही तुम्हारा ब्याह कर दें ताकि ख़ुश होने का तुम्हें भी एक बेहतरीन साधन मिल जाए।"

"ये तो ग़लत बात है भाभी।" मैंने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा____"अभी तो मेरी खेलने कूदने की उमर है और आप मेरे गले में किसी लड़की से ब्याह करवा के घंटी बांध देने की बात कर रही हैं? सरासर नाइंसाफी है ये मेरे साथ।"

"कोई नाइंसाफी नहीं है ये।" भाभी ने हंसते हुए कहा____"बल्कि ये तो ऐसी बात है जिसके बाद तुम्हारा हर जगह झंडे गाड़ना बंद हो जाएगा। ऐसी देवरानी लाऊंगी जो हर वक्त तुम्हारी अक्ल को ठिकाने लगाती रहे और तुम्हारा उछलना कूदना बंद कर दे।"

"वाह! क्या बात है।" मैंने कहा____"मेरी अपनी ही प्यारी भाभी मेरी खुशियों को आग लगा देना चाहती हैं। हे ऊपर वाले! ये सब सुनने से पहले मैं बहरा क्यों नहीं हो गया?"

"ज़्यादा नाटक मत करो।" भाभी ने हंसते हुए कहा____"और अब चुपचाप गाड़ी चलाओ। एक बात और, मेरे मायके में किसी के यहां झंडे गाड़ने का सोचना भी मत वरना इस बार मैं ख़ुद पिटाई करूंगी तुम्हारी।"

"देखिए ऐसा है भाभी कि मैं अपनी तरफ से तो पूरी कोशिश करूंगा कि ऐसा न हो।" मैंने मज़ाकिया लहजे में कहा____"लेकिन अगर कोई मुझ पर मोहित हो कर ख़ुद ही मेरे पास प्रसाद लेने आएगी तो फिर मैं प्रसाद दिए बगैर मानूंगा भी नहीं।"

"हाय राम! बहुत ही निर्लज्ज हो तुम।" भाभी ने फिर से मेरी बाजू पर ज़ोर से मारा____"मैं समझ गई कि तुम कभी नहीं सुधर सकते। जाओ मुझे तुमसे अब कोई बात नहीं करना।"

"अच्छा ठीक है बात मत कीजिए।" मैंने उन्हें छेड़ने के इरादे से कहा____"लेकिन ये तो बताइए कि आपके मायके में वो शालिनी नाम की लड़की अभी भी है न? असल में पिछली बार जब उससे मुलाक़ात हुई थी तो बता रही कि अब उसका भी ब्याह हो जाएगा तो शायद ही अब उससे मेरी मुलाक़ात हो पाए।"

"हे भगवान! क्या तुमने उसे भी नहीं बक्शा?" भाभी ने आश्चर्य से आंखें फाड़ कर मेरी तरफ देखा____"कितने ख़राब हो तुम वैभव। यकीन नहीं होता कि तुमने मेरी सहेली को भी....। उफ्फ क्या कहूं तुम्हें?"

"अरे! आप ग़लत समझ रही हैं भाभी।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"मैंने उस लड़की के साथ कुछ भी ग़लत नहीं किया है लेकिन हां, उस पर दिल ज़रूर आ गया था। जितनी प्यारी वो दिखती थी उतनी ही प्यारी बातें भी करती थी। हमारे बीच मामला कुछ हद तक आगे बढ़ चुका था। पिछली बार जब मैं उसकी गोद में सिर रख के लेटा हुआ था तो उसने अपनी ज़ुल्फों से मेरे चेहरे को ढंक दिया था। क़सम से भाभी, वो दृश्य बड़ा ही मनमोहक था। उसके बाद आपको पता है आगे क्या हुआ?"

"मुझे मत बताओ।" भाभी ने गुस्से से कहा____"मुझे तुम्हारी ये गंदी बातें हर्गिज़ नहीं सुनना। तुम बस ख़ामोशी से गाड़ी चलाओ।"
"ज़ालिम लोग।" मैंने हताश भाव से कहा____"किसी को हमारी खुशी की परवाह ही नहीं है। ख़ैर कोई बात नहीं, ठाकुर वैभव सिंह का नसीब ही खोटा है तो कोई क्या ही कर सकता है?"

मैं जानता था कि भाभी मेरी बातों से चिढ़ गई हैं इस लिए अब मैं और उन्हें गुस्सा नहीं दिलाना चाहता था। उसके बाद का सारा सफ़र ख़ामोशी में ही गुज़रा। आख़िर हम भाभी के मायके चंदनपुर पहुंच ही गए। वहां सबने बड़ी गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। भाभी अपने माता पिता और भैया भाभी से मिल कर बेहद खुश हो गईं थी।

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अनुराधा रसोई में दोपहर का खाना बना रही थी लेकिन उसका ध्यान खाना बनाने में नहीं बल्कि कहीं और ही था। बार बार उसके ज़हन में वैभव की कही हुई बातें गूंज उठती थी और वो उन बातों के बारे में सोचने लगती थी। जब से वैभव उसके यहां से वो सब कह कर गया था तब से वो ज़्यादातर उसी के बारे में ही सोचती रही थी। पिछली रात तो उसे नींद ही नहीं आ रही थी। चारपाई पर देर रात तक वो करवटें बदलती रही थी। बड़ी मुश्किल से पता नहीं रात के कौन से पहर उसे नींद आई थी। उसके बाद सुबह हुई और फिर जैसे ही उसे पिछली रात नींद न आने की वजह याद आई तो वो फिर से वैभव के बारे में सोचने लगी थी।

अनुराधा की मां सरोज सुबह से अब तक कई बार उससे पूछ चुकी थी कि वो इतना खोई खोई सी क्यों है? अगर उसकी तबियत ठीक नहीं है तो वो उसे वैद्य के पास ले जाएगी मगर अनुराधा ने बस यही कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है। अब भला वो उसे क्या बताती कि वो क्यों सुबह से गुमसुम है अथवा किस वजह से खोई खोई सी है? वो घर के कामों में अपना मन लगा कर किसी तरह उस सबको भूलने की कोशिश करती रही लेकिन रसोई में बैठ कर जब वो खाना बनाने लगी तो एक बार फिर से उसके ज़हन में वही सब चलने लगा था।

अनुराधा कोई बच्ची नहीं थी, वो जानती थी कि दुनिया में क्या क्या होता है और लोग कैसी कैसी मानसिकता के होते हैं। उसने अपनी छोटी सी दुनिया में यूं तो और भी बहुत कुछ देखा सुना था लेकिन पिछले कुछ महीनों में जो कुछ उसने देखा सुना था वो उस सबसे अलग था। वो एक ऐसी लड़की थी जिसने कभी किसी मर्द जात को नज़र उठा कर नहीं देखा था, सिवाय अपने बापू और काका जगन के। गांव से थोड़ा दूर उसका घर अकेला ही बना हुआ था इस लिए गांव के लड़के इस तरफ नहीं आते थे। जगन काका के घर भी जब वो जाती थी तो कोई न कोई उसके साथ होता था इस लिए उसके साथ कभी ऐसा वैसा कुछ हुआ ही नहीं था। दूसरे उसका स्वभाव भी कुछ शांत और शर्मीला सा था जिसकी वजह से वो कभी किसी पराए मर्द की तरफ देखने की हिम्मत नहीं करती थी। अपने बापू की लाडली थी वो, अपने बापू का गुरूर थी वो। हालाकि उसकी मां हमेशा उसके इस गुप्पे स्वभाव के लिए डांटती थी।

जीवन बहुत खुशहाल भले ही नहीं था लेकिन जैसा भी था वो उससे खुश थी। उसकी एक छोटी सी दुनिया थी, जिसमें उसके मां बापू और एक छोटा सा लेकिन प्यारा सा भाई था। उसने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि आगे एक ऐसा वक्त आएगा जब उसके छोटे से संसार में बहुत कुछ बदल जाएगा। एक दिन उसे पता चला कि उसके बापू ने दूसरे गांव के एक ऐसे लड़के की मदद करने की ज़िम्मेदारी ले ली है जिसके बाप ने उसे गांव समाज से बेदखल कर दिया है।

वक्त कभी किसी के लिए नहीं रुकता, वो पंख लगाए उड़ता ही रहता है। अनुराधा के कानों तक भी ये बात पहुंच चुकी थी कि दादा ठाकुर ने अपने जिस लड़के को गांव समाज से बेदखल किया है उस लड़के का नाम क्या है और उसका चरित्र कैसा है। अनुराधा ये सोच कर तो खुश हुई थी कि उसके बापू किसी बेसहारे की मदद कर रहे हैं लेकिन इस बात से वो थोड़ा असहज भी हो गई थी कि जिस लड़के का चरित्र ही ठीक नहीं है उसकी मदद करने का कोई बुरा असर न पड़ जाए। उसकी मां ने भी इस बात के लिए उसके बापू को समझाया था लेकिन होनी को तो जैसे यही मंजूर था। ख़ैर वक्त ऐसे ही गुज़रता रहा, और गुज़रते वक्त के साथ वैभव नाम के लड़के के प्रति जो ख़ौफ था वो भी दूर होता गया।

वैभव जब पहली बार उसके बापू के साथ उसके घर आया था तब उसने भी उसे चुपके से देखा था। उसके भोले भाले मन में ये जानने की उत्सुकता थी कि जिस लड़के के बारे में दूर दूर तक के गांव में भी बातें फैली हुई हैं वो दिखता कैसा है? जिस घर में वो बड़ी बेबाकी के साथ रहती आई थी उस दिन वैभव के आने से पता नहीं क्यों उसे असहज महसूस होने लगा था। ख़ैर जब उसकी नज़र उस करामाती लड़के पर पड़ी तो जैसे वो कुछ देर के लिए ख़ुद को ही भूल गई थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि कामदेव की तरह सुंदर और हट्टे कट्टे जिस्म वाला ये लड़का ऐसे काम भी करता होगा। उस मासूम को भला कैसे ये ज्ञान हो सकता था कि आंखें जो देखती हैं हमेशा वही सच नहीं होता। दुनिया में ऐसे नेक इंसान भी भरे पड़े हैं जिनकी शक्लो सूरत अच्छी नहीं होती लेकिन लोग पहली नज़र में उन्हें एक बुरा इंसान ही समझ बैठते हैं।

वैभव शक्ल सूरत से भले ही एक सुंदर नवयुवक था लेकिन उसके कर्म उसकी तरह सुंदर नहीं थे। अनुराधा को उस वक्त झटका लगा था जब वैभव ने भी उसकी तरफ देखा था और उसकी नज़र उससे जा मिली थी। वो एकदम से हड़बड़ा गई थी, दिल की धड़कनें धाड़ धाड़ कर उसकी कनपटियों पर बजने लगीं थी। वो घबरा कर जल्दी से अन्दर भाग गई थी। उसके बाद वो अक्सर यही कोशिश करती कि वैभव के घर आने पर वो उसके सामने कम ही जाए। हालाकि उसकी सूरत को एक बार देख लेने की चाह उसके मन में ज़रूर रहती थी और ऐसा क्यों था ये उसे ख़ुद नहीं पता था। शायद ये वैभव के सुंदर होने की वजह से था जिसके चलते न चाहते हुए भी एक लड़की उसे देखने पर मज़बूर हो जाती थी।

वैभव जब भी उसके घर आता तो वो चुपके से उसे देख लेती और फिर अपने सामने उसके बारे में तरह तरह की बातें सोचने लगती। उसे बार बार याद आता कि ये वही लड़का है जो न जाने कितनी लड़कियों और औरतों को अपने जाल में फांस कर उनके साथ ग़लत कर चुका है। इस ख़्याल के साथ ही अनुराधा के मन में वैभव के प्रति एक घृणा सी भर जाती लेकिन इसके लिए वो ख़ुद कुछ नहीं कर सकती थी। ऐसे ही वक्त गुज़रता रहा और एक महीना गुज़र गया। इस एक महीने में काफी कुछ बदल गया था। वैभव के प्रति उसके मन में जो ख़्याल पहले पैदा हुए थे वो अब ये सोच कर ग़ायब से होने लगे थे कि अगर ये इतना ही गंदा लड़का होता तो अब तक वो मुझे भी अपने जाल में फांस लेता, ये अलग बात है कि मैं उसके जाल में कभी न फंसती। उसने ख़ुद महसूस किया था कि इस एक महीने में वैभव ने कभी उसे ग़लत नज़र से नहीं देखा और ना ही कभी उससे बात करने की कोशिश की है। अनुराधा को लगने लगा कि शायद उसने उसके बारे में ग़लत सुना था, लेकिन फिर वो ये भी सोचती कि हर कोई तो ग़लत नहीं कह सकता ना?

इस सृष्टि का नियम है कि देर से ही सही लेकिन हमारे लिए सब कुछ सामान्य हो जाता है और हम सब कुछ भूल कर एक नए सिरे से जीवन को जीना शुरू कर देते हैं। यही हाल अनुराधा का हुआ था। उसे पूरी तरह से भले ही यकीन नहीं हुआ था लेकिन क्योंकि वो देख और महसूस कर चुकी थी कि वैभव वैसा तो बिलकुल नहीं है जैसा कि उसके बारे में लोगों ने फैला रखा है, इस लिए अब वो काफी हद तक सहज हो गई थी।

अपने गांव के लड़कों को देखा था उसने लेकिन वैभव उन सबसे अलग ही दिखता था उसे। वो उन सबसे सुंदर दिखता था, उसका जिस्म हट्टा कट्टा था जो उसकी उमर के लड़कों में उसने किसी का भी नहीं देखा था। जब भी किसी दिन वो उसके घर आता था तो वो उसे छुप कर देखती थी। अकेले में वो बस यही सोचती थी कि उसकी बूढ़ी दादी अपनी कहानियों में जिन राजकुमारों का ज़िक्र करती थी वैभव बिलकुल वैसा ही लगता है। ये बात सोच कर वो एकदम से खुश हो जाती और फिर सहसा मायूस हो कर सोचती कि काश वो भी एक राजकुमारी की तरह सुंदर होती।

सहसा कुछ जलने की गंध महसूस हुई तो अनुराधा को होश आया। उसने हड़बड़ा कर देखा तो तवे में पड़ी रोटी धुआं देने लगी थी। चूल्हे के अंदर जो रोटी लकड़ी के अंगारों की आंच में पकने के लिए एक तरफ टिकी थी वो तो कब की ख़ाक हो चुकी थी। ये सब देख कर अनुराधा बुरी तरह घबरा गई। एक तो गर्मी और ऊपर से चूल्हे की आंच में वैसे भी उसका बुरा हाल था। जीवन में पहली बार उसे खाना बनाना इतना मुश्किल काम लग रहा था। वो हताश और परेशान सी हो कर कभी तवे के ऊपर पड़ी अधजली और धुआं दे रही रोटी को देखती तो कभी अपने हाथ में लिए उस लोई को जिसे दोनों हथेलियों द्वारा थाप लगाने से उसे रोटी का आकार देना बाकी था।

अनुराधा ने फौरन ही लोई को गुंथे हुए आटे पर रखा और चिमटे से तवे को चूल्हे से उतारा। तवे पर पड़ी रोटी तवे पर एकदम से चिपक गई थी और धुआं छोड़ रही थी। अनुराधा जल्दी जल्दी चिमटे से उसे कुरेद कुरेद कर निकालने लगी। पसीने से उसका बुरा हाल था, उसने महसूस किया जैसे आज कुछ ज़्यादा ही गर्मी है। कुछ ही देर के प्रयास में उसने तवे से उस अधजली रोटी को निकाल कर एक तरफ रख दिया। तवे में एक काली परत सी बन गई थी जिससे नई बनने वाली रोटियां यकीनन ख़राब हो सकतीं थी इस लिए अनुराधा चिमटे से तवे को पकड़ कर बाहर नरदे के पास ले आई। उसकी मां कपड़े वगैरा ले कर घर के पीछे कुएं में गई हुई थी। अनुराधा ने जल्दी जल्दी पानी डाल कर पहले गर्म तवे को ठंडा किया और फिर थोड़ी मिट्टी ले कर तवे को मांजने लगी। कुछ ही देर में उसने तवे को एकदम साफ़ कर दिया।

रसोई में आ कर अनुराधा ने तवे में सफ़ेद छुई से हल्का लेप लगाया और फिर उस तवे को मिट्टी के चूल्हे पर चढ़ा दिया। चूल्हे में मौजूद लकड़ी और कंडे को उसने सुव्यवस्थित किया और फिर गुंथे हुए आटे से लोई ले कर रोटी पोने लगी। उसने निश्चय कर लिया कि अब वो सिर्फ़ रोटी बनाने पर ही ध्यान देगी वरना अगर उसकी मां आ गई और उसे रोटियों के जलने की गंध महसूस हो गई तो बहुत डांटेगी।

अक्सर ऐसा होता है कि हम सोचते कुछ हैं और होता कुछ और ही है। जिस चीज़ को हम भुलाने का प्रयास करते हैं वो भूलने के बहाने से याद आती ही रहती है। अनुराधा को सच में आज का खाना बनाना बेहद मुश्किल काम लगा था। ख़ैर किसी तरह खाना बना ही डाला उसने। उसकी मां भी नहा धो कर आ गई थी इस लिए सबने एक साथ ही बैठ कर खाना खाया। खाने के बाद अनुराधा ने जूठे बर्तनों को एक तरफ रखा और फिर वो अपने कमरे में चारपाई पर आराम करने के लिए लेट गई। आंखें बंद की तो एक बार फिर से वैभव का चेहरा उभर आया और साथ ही उसकी बातें उसके कानों में गूंजने लगीं।

अनुराधा ने झट से आंखें खोली और फिर बेचैनी से करवट बदल कर दूसरी तरफ घूम गई। वो बच्ची नहीं थी, उसे दुनियादारी वाली हर बातों की समझ थी। अच्छे बुरे का भली भांति ज्ञान था उसे। जो चीज़ उसे रात से परेशान कर रही थी उसका उसे अब शिद्दत से एहसास हो रहा था। उसे एहसास हो रहा था कि उसने वैभव को भावना में बह कर कुछ ज़्यादा ही बोल दिया था। पिछले पांच महीनों से वो वैभव को पहचानने की कोशिश कर रही थी और इन पांच महीनों में इतना तो उसे एहसास हो ही चुका था कि वैभव दूसरी लड़कियों के बारे में भले ही चाहे जैसा सोचता हो लेकिन कम से कम उसके बारे में वो ग़लत नहीं सोचता था।

अनुराधा को सहसा याद आया कि कैसे वो हर बार उसे ठकुराईन कह कर चिढ़ाता था और वो अपने लिए ठकुराईन सुन कर शर्म से सिमट जाती थी। आम तौर पर ठकुराईन शब्द किसी ब्याहता औरत के लिए प्रयोग किया जाता है किंतु वैभव का उसे ठकुराईन कहना अजीब तो लगता ही था लेकिन कहीं न कहीं अपने लिए उसे वैभव के मुख से ये सुन कर अच्छा भी लगता था। एक अलग ही तरह का एहसास होता था उसे जिसके बारे में उसे ख़ुद ही पता नहीं था। चारपाई पर दूसरी तरफ मुंह किए लेटी अनुराधा वैभव के साथ बिताए आख़िरी पलों में जैसे खो सी गई।

"आप क्यों बार बार मुझे ठकुराईन कहते हैं?" वैभव के ठकुराईन कहने पर वो शर्म से लाल हो गई थी, और फिर उसने उससे यही कहा था।

"क्यों न कहूं?" उसने मानों उसे छेड़ा____"आख़िर तुम हो तो ठकुराईन ही। अगर तुम्हें मेरे द्वारा ठकुराईन कहने पर ज़रा सा भी एतराज़ होता तो तुम्हारे होठों पर इस तरह मुस्कान न उभर आती।"

"तो क्या चाहते हैं आप कि मैं आपके द्वारा ठकुराईन कहने पर आप पर गुस्सा हुआ करूं?" उसने अपनी मुस्कान को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा था।

"क्यों नहीं।" वैभव ने उसकी गहरी आंखों में देखा था____"तुम्हें मुझ पर गुस्सा होने का पूरा हक़ है। तुम मेरी डंडे से पिटाई भी कर सकती हो।"

"धत्त! ये क्या कह रहे हैं आप?" वो वैभव की ये बात सुन कर बुरी तरह चौंकी थी, फिर शर्माते हुए बोली____"मैं भला कैसे आपकी पिटाई कर सकती हूं?"
"क्यों नहीं कर सकती?" वैभव ने मुस्कुराते हुए कहा था____"अगर मैं कोई ग़लती करता हूं तो तुम्हें पूरा हक़ है मेरी पिटाई करने का।"

"न जी न।" वो शरमा कर दरवाज़े से एक तरफ हट गई थी, फिर अपनी मुस्कुराहट को दबाते हुए बोली____"मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकती।"

चारपाई पर लेटी अनुराधा की आंखों के सामने जैसे ही ये सारे दृश्य उजागर हुए और वैभव से उसकी ये बातें महसूस हुईं तो सहसा उसके होठों पर मुस्कान उभर आई। उसके नन्हे से दिल में एक हलचल सी मच गई थी। तभी सहसा उसे कुछ ऐसा याद आया जिसने उसे कहीं और ही धकेल दिया।

"ओह! तो मेरी अनुराधा रूठ गई है मुझसे?" वैभव के मुख से जैसे ही उसने ये सुना तो उसे बड़ा ज़ोर का झटका लगा था। आंखें फाड़े वो उसकी तरफ देखने लगी थी, किंतु जल्दी ही सम्हली और फिर बोली____"ये क्या कह रहे हैं आप? मैं आपकी अनुराधा कैसे हो गई?"

"पता नहीं कैसे मेरे मुख से निकल गया?" उसने महसूस किया जैसे वैभव ने अपनी घबराहट को दबाने का प्रयास करते हुए कहा था____"वैसे क्या तुम्हें मेरी अनुराधा कह देने पर एतराज़ है?"

"हां बिलकुल एतराज़ है मुझे।" उसके चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए थे____"मैं सिर्फ़ अपने माता पिता की अनुराधा हूं किसी और की नहीं। अगर आप ये समझते हैं कि आप बाकी लड़कियों की तरह मुझे भी अपने जाल में फंसा लेंगे तो ये आपकी सबसे बड़ी भूल है छोटे ठाकुर।"

अनुराधा को अपनी कही हुई बातें जब महसूस हुई तो सहसा उसके समूचे बदन में सिहरन सी दौड़ गई। ज़हन में ख़्याल उभरा कि उस वक्त कितना कठोर हो गई थी वो। उसने वैभव की उन बातों का बस वही एक मतलब समझा था, पर क्या ये ज़रूरी था कि उसके कहने का सिर्फ़ वही मतलब रहा हो? ये सब सोच कर उसके अंदर एक हूक सी उठी जिसके चलते उसे एक ऐसे दर्द की अनुभूति हुई जो अब तक मिले हर दर्द से अलग था। अचानक उसके कानों में वैभव के कहे शब्द गूंज उठे।

"अब जल्दी से कोई डंडा खोज कर लाओ।" उसकी तीखी बातें सुन कर वैभव ने कहा था____"और उस डंडे से मेरी पिटाई करना शुरू कर दो।"

"ये क्या कह रहे हैं आप?" वैभव की बात सुन कर जब वो उलझ गई थी तो उसने जैसे उसे समझाते हुए कहा था____"सही तो कह रहा हूं मैं। कुछ देर पहले मैंने तुमसे कहा था ना कि अगर मैं कोई ग़लती करता हूं तो तुम्हें मेरी पिटाई करने का पूरा हक़ है। अब क्योंकि मैंने ग़लती की है तो इसके लिए तुम्हें डंडे से मेरी पिटाई करनी चाहिए।"

"बातें मत बनाइए।" उसने कठोरता से कहा था____"सब समझती हूं मैं। अगर आपके मन में मेरे प्रति यही सब है तो चले जाइए यहां से। अनुराधा वो लड़की हर्गिज़ नहीं है जो आपके जाल में फंस जाएगी। हम ग़रीब ज़रूर हैं छोटे ठाकुर लेकिन अपनी जान से भी ज्यादा हमें अपनी इज्ज़त प्यारी है।"

"तो फिर ये भी जान लो अनुराधा कि तुम्हारी इज्ज़त मुझे भी खुद अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारी है।" उसकी बातें सुन कर वैभव मानो हताश हो कर बोल पड़ा था____"मैं खुद मिट्टी में मिल जाना पसंद करूंगा लेकिन तुम्हारी इज्ज़त पर किसी भी कीमत पर दाग़ नहीं लगा सकता और ना ही किसी के द्वारा लगने दे सकता हूं। मैं जानता हूं कि मेरा चरित्र ही ऐसा है कि किसी को भी मेरी किसी सच्चाई पर यकीन नही हो सकता लेकिन एक बात तुम अच्छी तरह समझ लो अनुराधा कि मैं चाहे सारी दुनिया को दाग़दार कर दूं लेकिन तुम पर दाग़ लगाने की कल्पना भी नहीं कर सकता। मैं तुम्हें कई बार बता चुका हूं कि तुम वो लड़की हो जिसने मेरे मुकम्मल वजूद को बदल दिया है और मुझे खुशी है कि तुमने मेरा कायाकल्प कर दिया है। तुमसे हसी मज़ाक करता हूं तो एक अलग ही तरह का एहसास होता है। मेरे मन में अगर ग़लती से भी तुम्हारे प्रति कोई ग़लत ख़्याल आ जाता है तो मैं अपने आपको कोसने लगता हूं। ख़ैर, मैं तुम्हें कोई सफाई नहीं देना चाहता। अगर तुम्हें लगता है कि मेरे यहां आने का सिर्फ़ यही एक मकसद है कि मैं तुम्हें भी बाकी लड़कियों की तरह अपने जाल में फंसाना चाहता हूं तो ठीक है। मैं तुम्हें वचन देता हूं कि ठाकुर वैभव सिंह आज के बाद तुम्हारे इस घर की दहलीज़ पर अपने क़दम नहीं रखेगा। तुम्हारे साथ जो चंद खूबसूरत लम्हें मैंने बिताए हैं वो जीवन भर मेरे लिए एक अनमोल याद की तरह रहेंगे। ये भी वचन देता हूं कि इस घर के किसी भी सदस्य पर किसी के द्वारा कोई आंच नहीं आने दूंगा। चलता हूं अब, ऊपर वाला तुम्हें हमेशा खुश रखे।"

कानों में गूंजते वैभव के ये एक एक शब्द मानो अनुराधा के हृदय को चीरते हुए उसकी अंतरात्मा तक को झकझोरते चले गए थे। उसे एकदम से ऐसा महसूस हुआ जैसे सब कुछ एक पल में शांत हो गया हो। अपने चारो तरफ उसे दूर दूर तक फैली एक सफेद धुंध सी दिखाई दी और उस धुंध के बीच उसने खुद को अकेला पाया___एकदम बेबस, लाचार और असहाय। अनुराधा घबरा कर चारपाई पर उठ कर बैठ गई। समूचे बदन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई उसके। दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से कोई तूफ़ान सा उठ खड़ा हुआ। नन्हे दिल में अभी अभी पैदा हुए जज़्बात बुरी तरह से मचल उठे। सहसा उसकी बाईं आंख से एक आंसू का कतरा निकला और उसके रुखसार पर टपक पड़ा। उसने चौंक कर इधर उधर देखा और फिर आंसू के उस कतरे को पोंछते हुए कमरे से बाहर निकल गई। उसे बहुत तेज़ रोने का मन करने लगा था।
 
अध्याय - 54
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अब तक....

कानों में गूंजते वैभव के ये एक एक शब्द मानो अनुराधा के हृदय को चीरते हुए उसकी अंतरात्मा तक को झकझोरते चले गए थे। उसे एकदम से ऐसा महसूस हुआ जैसे सब कुछ एक पल में शांत हो गया हो। अपने चारो तरफ उसे दूर दूर तक फैली एक सफेद धुंध सी दिखाई दी और उस धुंध के बीच उसने खुद को अकेला पाया___एकदम बेबस, लाचार और असहाय। अनुराधा घबरा कर चारपाई पर उठ कर बैठ गई। समूचे बदन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई उसके। दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से कोई तूफ़ान सा उठ खड़ा हुआ। नन्हे दिल में अभी अभी पैदा हुए जज़्बात बुरी तरह से मचल उठे। सहसा उसकी बाईं आंख से एक आंसू का कतरा निकला और उसके रुखसार पर टपक पड़ा। उसने चौंक कर इधर उधर देखा और फिर आंसू के उस कतरे को पोंछते हुए कमरे से बाहर निकल गई। उसे बहुत तेज़ रोने का मन करने लगा था।

अब आगे....

गांव के शमशान में काफ़ी लोग जमा थे।
दरोगा ने रेखा और शीला की लाश को उनके घर वालों के सुपुर्द कर दिया था और अब दोनों के घर वाले अपनी अपनी बीवियों का अंतिम संस्कार करने के लिए उन्हें शमशान में ले आए थे। गांव के लोग तो थे ही साथ ही पास के गांव के भी लोग आ गए थे। दादा ठाकुर भी अपने छोटे भाई जगताप और बड़े बेटे अभिनव के साथ वहां मौजूद थे। गांव का साहूकार मणि शंकर तथा मुंशी चंद्रकांत भी वहीं था। ख़ैर सारी क्रियाएं होने के बाद लाशों का अंतिम संस्कार कर दिया गया। दोनों मृतकों के घर वाले बेहद दुखी थे। रेखा और शीला के छोटे छोटे बच्चे थे जो अब बिना मां के हो गए थे। कुछ समय बाद एक एक कर के सब लोग वहां से चले गए।

दादा ठाकुर ने आगे बढ़ कर मंगल और देवधर को सांत्वना दी और साथ ही ये भी कहा कि उन्हें जिस चीज़ की भी ज़रूरत हो वो हमेशा उन्हें हवेली से मिलती रहेगी। मंगल और देवधर को क्योंकि अपनी अपनी बीवियों का सच पता चल चुका था इस लिए वो खुद भी उस सबके लिए दादा ठाकुर के सामने हाथ जोड़े हुए थे। ख़ैर उसके बाद दादा ठाकुर और साहूकार मणि शंकर साथ साथ ही वहां से वापस चल दिए। रास्ते में इसी संबंध में थोड़ी बहुत बातें हुईं उसके बाद मणि शंकर ने बताया कि उसकी बेटी का रिश्ता एक जगह पक्का हो गया है और अब लग्न बनवा कर वो जल्द ही अपनी बेटी का ब्याह कर देना चाहते हैं। मणि शंकर की इस बात से दादा ठाकुर ने उसे बंधाई दी।

कुछ समय बाद दादा ठाकुर अपने भाई और बेटे के साथ हवेली पहुंच गए। बैठक में रखे अपने सिंहासन पर बैठने के बाद दादा ठाकुर ने जगताप और अभिनव को अलग अलग काम सौंपा और फिर कुछ देर आराम करने के लिए अपने कमरे में चले गए।

"क्या हुआ?" कमरे में आते ही हवेली की ठकुराईन सुगंधा देवी ने दादा ठाकुर से कहा____"आराम करने की जगह कहीं खोए हुए हैं आप?"
"कोई ख़ास बात नहीं है।" दादा ठाकुर ने बात को टालने की गरज से कहा____"बस ऐसे ही किसी के बारे में सोच रहे थे।"

"आप तो कभी हमसे कुछ बताते ही नहीं हैं।" सुगंधा देवी ने शिकायती लहजे में कहा____"हम तो सिर्फ़ नाम के लिए ही हैं इस हवेली में। आप मानें या न मानें लेकिन ये सच है कि इस हवेली के मर्द औरत जात को कभी कोई प्राथमिकता नहीं देते।"

"आप बेवजह ही ऐसा सोचती हैं।" दादा ठाकुर ने पलंग के सिरहाने से अपनी पीठ टीका कर कहा____"हमारी नज़र में तो इस हवेली की असल मालकिन आप ही हैं। हवेली के अंदर सिर्फ़ आप ही का शासन चलता है।"

"ये तो आप हमारा दिल रखने के लिए कह रहे हैं।" सुगंधा देवी ने कटाक्ष किया____"शायद आप ये समझते हैं कि हम बिल्कुल ही दिमाग़ से पैदल हैं इस लिए जो कुछ आप कह देंगे उसी को हम सच समझ बैठेंगे।"

"आज क्या हो गया है आपको?" दादा ठाकुर के माथे पर सहसा बल पड़ गया____"आज से पहले तो कभी आपने हमसे ऐसे उखड़े हुए लहजे में बात नहीं की, फिर आज ऐसा क्या हो गया है? क्या हमें बताएंगी नही?"

"हम जानना चाहते हैं कि आज कल हवेली के अंदर और बाहर दोनों जगह क्या चल रहा है?" सुगंधा देवी ने दादा ठाकुर की तरफ देखते हुए कहा____"अगर आप ये समझते हैं कि हमें कुछ महसूस नहीं होता तो ये आपकी ग़लतफहमी है।"

दादा ठाकुर ने फ़ौरन कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि वो सुगंधा देवी के चेहरे पर मौजूद भावों को पढ़ने की कोशिश करने लगे थे। उधर सुगंधा देवी उनके मुख से जवाब सुनने की उम्मीद में उन्हीं को देखे जा रहीं थी।

"ऐसा कुछ भी नहीं चल रहा है जैसे कि आप आशंका जता रही हैं।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"आप इन सब बातों के बारे में इतना ज़्यादा मत सोचिए। बाकी आप तो जानती ही हैं कि हर इंसान के जीवन में छोटी मोटी समस्याएं बनी ही रहती हैं। हमारे सामने भी छोटी मोटी समस्याएं हैं लेकिन आप फ़िक्र मत कीजिए, हम अपने तरीके से सब सम्हाल लेंगे।"

"हवेली की दो नौकरानियों की मौत हो गई।" सुगंधा देवी ने सहसा नाराज़गी भरे अंदाज़ से कहा____"कल सुबह गांव के कुछ लोग उनकी मौत होने पर आपकी हवेली में आ कर आपके ही सामने ऊंची आवाज़ में आप पर ही उनकी हत्या का आरोप लगा रहे थे और आप कहते हैं कि ये छोटी मोटी समस्या है? गांव के लोगों का तो समझ में आता है कि वो रेखा और शीला की इस तरह हो गई मौत से दुखी हो कर आपसे ऐसा कह रहे थे लेकिन ये समझ में नहीं आता कि हवेली में काम करने वाली दो नौकरानियों की इस तरह से मौत हो जाए? रेखा ने हमारी ही हवेली के एक कमरे में ज़हर खा कर खुदकुशी कर ली और शीला को किसी ने हमारे ही बगीचे में गला रेत कर मार डाला। क्या ये सब बातें आपको छोटी मोटी लगती हैं? नहीं ठाकुर साहब, ये कोई छोटी मोटी बात नहीं है बल्कि बहुत बड़ी बात है। आख़िर ऐसा क्या हो रहा है आज कल जिसे आप हम सबसे छुपा रहे हैं? आख़िर क्यों हवेली की दो दो नौकरियां इस तरह से ऊपर वाले को प्यारी हो गईं?"

दादा ठाकुर को समझते देर न लगी कि सुगंधा देवी बिना जवाब पाए मानेंगी नहीं। अतः उन्होंने उन्हें संक्षेप में उतना ही बताया जितना बताना ज़रूरी था और जितने में उनके मन में ज़्यादा बुरा असर न पड़ सके। दादा ठाकुर के मुख से सुगंधा देवी ने जो कुछ सुना वो उन्हें हैरत में डाल देने के लिए और सोचो में गुम कर देने के लिए काफ़ी था।

"हम चाहते हैं कि ये सब बातें सिर्फ़ आप तक ही रहें।" अपनी पत्नी सुगंधा देवी को कहीं खोए हुए देख कर दादा ठाकुर ने कहा____"हवेली के अंदर किसी को भी इन सब बातों का पता नहीं लगना चाहिए। हम नहीं चाहते कि इस सबके चलते किसी के भी मन में डर और चिंता के भाव पैदा हो जाएं।"

"हमें तो यकीन ही नहीं हो रहा कि इतने समय से ये सब चल रहा है।" सुगंधा देवी ने हैरानी भरे भाव से कहा____"हे भगवान! ये कैसा दिन दिखा रहे हैं आप?"
"शांत हो जाइए।" दादा ठाकुर ने पलंग से उठ कर सुगंधा देवी को सम्हाला____"इसी लिए हम आपसे कुछ भी नहीं बताना चाहते थे, क्योंकि इससे आप पर गहरा असर पड़ जाना था। ख़ैर, हमने जो कहा है उस बात पर ध्यान दीजिएगा। हवेली में किसी को भी इन बातों का पता नहीं लगना चाहिए।"

"कौन कर रहा है ये सब?" सुगंधा देवी ने दादा ठाकुर की तरफ देखते हुए पूछा____"आख़िर क्या दुश्मनी है उसकी हमसे?"

"वैसे तो हमें थोड़ा बहुत अंदाज़ा है।" दादा ठाकुर ने कहा____"लेकिन जब तक कोई प्रमाण नहीं मिलता तब तक न हमारी आशंका सच हो सकती है और न ही ये पता चल सकता है कि ये सब कौन कर रहा है। ख़ैर आप इस सबको अपने ज़हन से निकाल दीजिए और सबके सामने पहले की तरह ही सामान्य बने रहिए। मेनका, रागिनी बहू और हमारी कुसुम बिटिया को इस सबका पता नहीं चलना चाहिए।"

"ठीक है।" सुगंधा देवी ने गहरी सांस ली____"हम इस बारे में किसी से कुछ नहीं कहेंगे। हमें भी भान है कि इस सबका पता चलने से हमारे अपनों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।"

"ठीक है अब आप आराम कीजिए।" दादा ठाकुर ने कहा____"हमें एक जगह ज़रूरी काम से जाना है।"
"जी ठीक है।" सुगंधा देवी ने कहा____"आप अपना ख़्याल रखिएगा। ऐसे समय में लेश मात्र की भी लापरवाही नुकसानदायक हो सकती है।"

दादा ठाकुर आगे बढ़े और एक तरफ की दीवार से लगी लकड़ी की अलमारी को खोल कर उसमें से अपना एक रिवॉल्वर निकाला और फिर उसे कुर्ते के अंदर कमर के पास धोती में छुपा लिया। उसके बाद उन्होंने अलमारी को बंद किया और कमरे से बाहर निकल गए। सुगंधा देवी सोचो में गुम उन्हें जाता देखती रहीं।

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जब से वैभव के साथ रागिनी अपने मायके आई थी तब से घर के सभी सदस्य खुश थे। पूरे चंदनपुर में ये ख़बर फैल गई थी कि नरसिंहपुर के दादा ठाकुर का छोटा बेटा यानि ठाकुर वैभव सिंह आया है। दादा ठाकुर की ख्याति दूर दूर तक फैली हुई थी इस वजह से लोग उन्हें भली भांति जानते थे और उनकी भारी इज्ज़त करते थे। दादा ठाकुर की तरह वैभव सिंह का नाम भी लोगों ने काफी सुन रखा था लेकिन उसके बारे में सबके मन में अलग अलग विचार थे। वो ये तो जानते थे कि ठाकुर वैभव सिंह एक रंग मिज़ाज नवयुवक है लेकिन उन्हें ये भी पता था कि वो ज़बरदस्ती किसी पर अत्याचार नहीं करता था। जहां उसके पिता दादा ठाकुर नम्र और शांत स्वभाव वाले थे वहीं वैभव थोड़ा गरम स्वभाव का था। लोग जब वैभव को देखते थे तो उसके चेहरे की सुंदरता और मासूमियत को देख कर भ्रम का शिकार भी हो जाते थे, ये सोच कर कि ऐसा सुंदर और मासूम दिखने वाला नवयुवक भला इतने संगीन काम कैसे कर सकता है?

(दोस्तो, यहां पर मैं रागिनी के मायके वालों का संक्षिप्त परिचय देना उचित समझता हूं।)

☞ ठाकुर किशन सिंह (रागिनी के दादा/ये अब इस दुनिया में नहीं हैं)
गायत्री सिंह (रागिनी की दादी/ये भी अब इस दुनिया में नहीं हैं)

ठाकुर किशन सिंह और गायत्री को कुल तीन संतानें हैं। जो इस प्रकार हैं:-

(01) वीरभद्र सिंह
(02) बलभद्र सिंह
(03) राधिका सिंह

✮ वीरभद्र सिंह (रागिनी के पिता)
सुलोचना सिंह (रागिनी की मां)

वीरभद्र सिंह और सुलोचना को चार संतानें हैं।
(01) वीरेंद्र सिंह (रागिनी का बड़ा भाई)
वंदना सिंह (वीरेंद्र सिंह की पत्नी)
वीरेंद्र सिंह और वंदना को दस सालों बाद बड़ी मन्नतों से पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है।

(02) रागिनी सिंह (वीरेंद्र की बहन और दादा ठाकुर की बहू)

(03) नागेंद्र सिंह (रागिनी का छोटा भाई)
नागेंद्र सिंह अपने बड़े भाई की तरह ही एक अच्छा इंसान था और घर की सभी जिम्मेदारियां निभाता था। किसी को आज तक समझ नहीं आया कि आख़िर ऐसा क्या हो गया था जिसके चलते वो अचानक ही एक दिन घर गांव से गायब हो गया। उसके गायब होने के दो साल बाद रागिनी का ब्याह हुआ था। नागेंद्र को तलाश करने का बहुत प्रयास किया गया लेकिन उसका कहीं कोई सुराग़ तक नहीं मिला। अब तो बस ऊपर वाले पर ही भरोसा रह गया है कि शायद वो खुद ही किसी दिन वापस घर आ जाए। हालाकि गांव में तो सब दबी जुबान में यही कहते हैं कि नागेंद्र शायद अब इस दुनिया में नहीं है।

(04) कामिनी सिंह (रागिनी की छोटी बहन)
कामिनी का अभी तक ब्याह नहीं हुआ है किन्तु वीरभद्र और वीरेंद्र उसके ब्याह के लिए लड़के की तलाश करने लगे हैं। कामिनी, एक ऐसी लड़की है जो रागिनी की तरह सुंदर तो है लेकिन स्वभाव से एकदम शांत और किसी से ज़्यादा मतलब नहीं रखती है। वैभव ने कई बार उसको अपने झांसे में लेने की कोशिश की थी लेकिन सफल नहीं हो पाया था। वैभव की नीयत का उसे बखूबी पता है इस लिए जब भी वैभव उसके यहां आता है तो वो उससे दूर ही रहती है।

वीरभद्र सिंह अपने गांव में सबसे ज़्यादा संपन्न व्यक्ति हैं। उनके पास काफ़ी सारी जमीनें हैं जिन पर कई तरह की फसलें उगाई जाती हैं। उनकी आय का मुख्य स्त्रोत फल और सब्जियां हैं जो उनकी ज़मीन के काफी सारे हिस्से में उगाई जाती हैं। इधर कुछ सालों से वीरभद्र को घुटने में बात की समस्या हो गई है जिसके चलते उन्हें कहीं आने जाने में समस्या होती है। उधर उनकी पत्नी सुलोचना की भी तबियत ज़्यादा ठीक नहीं रहती है। असल में बेटे नागेंद्र के लापता होने का कुछ ज़्यादा ही दुख हुआ है उन्हें जिसके चलते उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता।

✮ बलभद्र सिंह (रागिनी के चाचा जी)
पुष्पा सिंह (रागिनी की चाची)

बलभद्र सिंह और पुष्पा के कुल चार बच्चे हैं जो इस प्रकार हैं:-

(01) वीर सिंह (बलभद्र सिंह का बड़ा बेटा)
गौरी सिंह (वीर सिंह की पत्नी)
=> वीर सिंह और गौरी के दो बच्चे हैं जो अभी बालिग नहीं हुए हैं।

(02) बलवीर सिंह (बलभद्र सिंह का दूसरा बेटा)
सुषमा सिंह (बलवीर की पत्नी)
=> बलवीर सिंह और सुषमा की शादी को अभी एक साल ही हुआ है, इन्हें अभी कोई औलाद नहीं हुई है।

(03) कंचन सिंह (बलभद्र सिंह की बेटी/अविवाहित)
(04 मोहिनी सिंह (बलभद्र सिंह की सबसे छोटी बेटी/अविवाहित)
कंचन और मोहिनी दोनों ही विवाह के योग्य हो गई हैं।

✮ राधिका सिंह (ठाकुर किशन सिंह की इकलौती बेटी)
राधिका सिंह का विवाह बहुत पहले हो गया था इस लिए अब वो यहां नहीं रहती। ससुराल में उसका अपना परिवार है। ख़ास मौकों पर ही उसका यहां आना होता है।

वीरभद्र सिंह और बलभद्र सिंह दोनों ही परिवार यूं तो अलग अलग घरों में रहते हैं लेकिन दोनों परिवारों के बीच आपसी रिश्ते बहुत ही गहरे हैं। इसका सबूत ये है कि दोनों भाइयों ने अभी तक ज़मीन का बटवारा नहीं किया है और सारी ज़मीन पर सब एक साथ ही मेहनत कर के अपना जीवन यापन करते हैं। जैसा प्रेम वीरभद्र और बलभद्र का आपस में है वैसा ही प्रेम उन दोनों के बच्चों में भी है। गांव के सब लोग इनकी बहुत इज्ज़त करते हैं, क्योकि ये सबकी हर तरह से मदद करते हैं।

(तो दोस्तो, ये था रागिनी के मायके वालों का संक्षिप्त परिचय, अब चलते हैं कहानी की तरफ।)

वैभव का हर बार की तरह इस बार भी ख़ास स्वागत सत्कार हुआ था। वैभव एक ऐसा लड़का था जिसे सब बेहद पसंद करते थे, क्योंकि सबको वैभव सिंह में असली ठाकुर के लक्षण नज़र आते थे। वीरभद्र तो मन ही मन ये भी चाहते थे कि उनकी बड़ी बेटी की तरह उनकी दूसरी बेटी कामिनी भी दादा ठाकुर की बहू बन जाए। अपनी बेटी कामिनी के लिए उन्हें वैभव हर तरह से पसंद था लेकिन वो खुल कर इस रिश्ते के लिए दादा ठाकुर से बात करने में झिझकते थे और इसका कारण ये था कि उन्हें अपनी बेटी कामिनी में वो बात नहीं दिखती थी जो वैभव सिंह जैसे लड़के के लिए योग्य हो। वो अपनी बेटी के स्वभाव को अच्छी तरह जानते थे। कामिनी यूं तो शांत स्वभाव की थी लेकिन जब उसे गुस्सा आता था तो वो खुद का ही नुकसान करने लगती थी जिसमें उसकी जान तक का ख़तरा हो जाता था। वीरभद्र वैभव के चरित्र से भी वाक़िफ थे इस लिए वो समझते थे कि अगर उनकी बेटी का वैभव सिंह से ब्याह हुआ तो वो उसके चरित्र को ध्यान में रख कर कोई समझौता नहीं कर पाएगी। वो ये भी जानते थे कि वैभव सिंह एक ऐसा लड़का है जो कभी किसी के बंधन में बंध जाना पसंद नही करता। वो अपनी मर्ज़ी से चलने वाला नवजवान है जिसके ऊपर खुद उसके पिता दादा ठाकुर भी आज तक कोई पाबंदी नहीं लगा पाए। ऐसे में अगर कामिनी ने पत्नी के रूप में उस पर पाबंदी लगाने की कोशिश की तो बहुत हद तक संभव है कि बात बिगड़ जाएगी और फिर आगे जो कुछ होगा उसकी कल्पना करना ज़्यादा मुश्किल नहीं है।

एक तो लंबा सफर, दूसरे स्वागत सत्कार के चक्कर में वैभव को इतना खिला पिला दिया गया था कि उसने बस आराम करना ही बेहतर समझा था। यूं तो अब तक उसे हर कोई नज़र आ चुका था लेकिन अब तक उसे अपनी भाभी की छुटी बहन कामिनी नज़र नहीं आई थी। पिछली बार दोनो के बीच झगड़ा हो ही गया होता अगर रागिनी ने आ कर फ़ौरन ही सब कुछ सम्हाल न लिया होता।

ख़ैर शाम तक वैभव किसी राजा महाराजा की तरह पलंग पर सोता रहा उसके बाद जब उसकी आंख खुली तो सहसा उसकी नज़र दरवाज़े के ओट से झांकती किसी के हसीन चेहरे पर पड़ी। ये देख कर वो मुस्कुराया। भाभी के मायके आने के लिए वो हमेशा तैयार रहता था क्योंकि यहां पर सुंदर सुंदर चेहरों वाली और मादक जिस्मों वाली लड़कियों की कमी नहीं थी। अभिनव सिंह की तो ये नाम मात्र की ससुराल थी जबकि ससुराल का असली मज़ा तो वैभव लेता था।

"अब अगर जी भर के दीदार कर लिया हो तो हम पर भी थोड़ा नज़रे इनायत कर दीजिए।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"हमारी नज़रों को भी आपके खूबसूरत चेहरे को देखने की हसरत है।"

"अच्छा जी।" बलभद्र सिंह की बड़ी बेटी कंचन दरवाज़े के उस पार से निकल कर कमरे के अंदर आते हुए किंतु शर्मा कर बोली____"तो आपकी नज़रें सिर्फ़ ख़ूबसूरत चेहरे देखने की ही हसरत रखती हैं हमेशा?"

"नहीं ऐसा तो बिलकुल नहीं है।" मैंने उठ कर पलंग के सिरहाने से अपनी पीठ टिका कर कहा____"आप कहें तो हम अपनी नज़रों को आपके चेहरे के अलावा भी ख़ास हिस्सों पर डाल देते हैं।"

"बड़ी गुस्ताख़ नज़रें है आपकी।" कंचन ने आंखें फैलाते हुए कहा____"अपनी नज़रों को थोड़ा सम्हाल कर रखिए, उन्हें चेहरे के अलावा कहीं और जा कर ठहरने की इजाज़त नहीं है।"

"ये तो संभव ही नहीं है सरकार।" मैंने कंचन को सिर से ले कर पांव तक देखते हुए कहा____"क्योंकि इसमें दोष हमारी नज़रों का नहीं है बल्कि आपके कहर ढाते हुस्न का है जो हमारी नज़रों को अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है।"

"हाय राम!" कंचन शर्म से लाल तो हुई ही थी किंतु फिर सम्हल कर बोली____"आपसे तो बात करना ही बेकार है। पता नहीं क्या क्या बिना मतलब की बातें करते रहते हैं।"

"तो आप ही बताइए।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"हम ऐसी क्या बातें करें जो सिर्फ आपके मतलब की हों?"
"हमें नहीं पता।" कंचन ने अपनी मुस्कान को दबाते हुए कहा____"अब चलिए शाम हो गई है, ताऊ जी आपका इंतज़ार कर रहे हैं।"

"आप तो बड़ी ज़ालिम चीज़ हैं सरकार।" मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा____"हम तो बड़ी उम्मीद ले कर आए थे यहां कि हमारी प्यारी प्यारी सालियां हमारा हर तरह से ख़्याल रखेंगी। ख़ैर कोई बात नहीं, अब तो यही हो सकता है कि हम कल सुबह ही यहां से वापस अपने गांव लौट जाएं।"

"ये क्या कह रहे हैं आप?" कंचन एकदम से चौंक कर बोली____"आप इतना जल्दी कैसे चले जाएंगे यहां से?"
"अब रुकने का फ़ायदा ही क्या है सरकार?" मैंने झूठा अफ़सोस जताते हुए कहा____"भारी आस लगा कर आपके पास आए थे। अब जब आपसे ही हर उम्मीद टूट गई तो रुकने का क्या मतलब रह गया?"

"आप तो बड़ा जल्दी हार मान गए।" कंचन ने एक बार फिर से अपनी मुस्कान को दबाते हुए कहा____"जबकि आपको अंतिम सांस तक प्रयास करते रहना चाहिए। क्या पता आख़िरी सांस के वक्त आपको कोई कामयाबी मिल जाए।"

"अच्छा ऐसा है क्या?" मैं उसकी इस बात से मुस्कुरा पड़ा____"फिर तो अभी से प्रयास करना शुरू कर देंगे हम। अगर आख़िरी सांस के वक्त ही कामयाबी के रूप में मीठा फल मिलना है तो बेशक पूरी शिद्दत से प्रयास करेंगे सरकार।"

"बिलकुल प्रयास कीजिए।" कंचन ने मुस्कुराते हुए कहा____"हम भी देखते कि आप कामयाबी पाने के लिए क्या क्या पैंतरे आजमाते हैं?"
"क्या ये चुनौती है?" मैंने उसकी आंखों में देखा।
"चुनौती तो नहीं है।" उसने बड़ी अदा से कहा___"पर क्या आप किसी चुनौती से डरते हैं?"

"सवाल ही नहीं पैदा होता।" मैंने जैसे गर्व से कहा___"ठाकुर वैभव सिंह आज तक किसी चुनौती से नहीं डरा। हम ज़रूर प्रयास करेंगे सरकार, बस आप अपनी बात पर क़ायम रहना।"

मेरी बात सुन कर कंचन ने शरारती अंदाज़ में जीभ निकाल कर मुझे चिढ़ाया और फिर मुस्कुराते हुए कमरे से चली गई। मैं भी सोचने लगा कि अब तो कुछ करना ही पड़ेगा। कंचन नाम की मिठाई को चखने का कोई न कोई जुगाड़ लगाना ही पड़ेगा। ये सब सोचते हुए मैं पलंग से उतरा और बाहर निकल गया।

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"सेवक हाज़िर है मालिक।" एक हट्टे कट्टे आदमी ने बैठक में बैठे दादा ठाकुर के सामने अदब से सिर नवा कर कहा।
"शेरा।" दादा ठाकुर ने उसकी तरफ देखते हुए कहा____"तुम्हें भी पता चल ही गया होगा कि वैभव यहां नहीं है इस लिए जब तक वो यहां नहीं है तब तक तुम्हें एक विशेष काम करना है।"

"हुकुम कीजिए मालिक।" शेरा ने नम्र भाव से कहा____"सेवक अपनी जान दे कर भी आपके हुकुम की तामील करेगा।"

"तुम्हें उस काले नकाबपोश आदमी को पकड़ना है जिसने शुरुआत में हमारे बेटे वैभव पर हमला करने की कोशिश की थी।" दादा ठाकुर ने कहा____"और अभी हाल ही में तुमसे उसका सामना भी हुआ था, ये अलग बात है कि तुम्हारे रहते हुए भी उसने शीला को मौत के घाट उतार दिया था।"

"माफ़ कर दीजिए मालिक।" शेरा ने सिर झुका कर कहा____"आपका हुकुम नहीं था इस लिए मैंने कभी उसे खोजने का प्रयास नहीं किया। आपने सिर्फ़ छोटे ठाकुर की सुरक्षा का कार्य सौंपा था मुझे।"

"हम जानते हैं कि इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है।" दादा ठाकुर ने कहा____"हालात ऐसे थे कि हमें सबसे ज़्यादा वैभव की फ़िक्र थी और इसी लिए हमने तुमसे कहा था कि उसकी सुरक्षा करने के अलावा तुम्हें कुछ भी नहीं करना है। ख़ैर, अब तुम्हारा सिर्फ़ एक ही काम है कि उस काले नक़ाबपोश को खोज कर ज़िंदा पकड़ो और साथ ही उसके आका उस सफ़ेदपोश का भी पता लगाओ। हम जानना चाहते हैं कि जो व्यक्ति रात के अंधेरे में भी अपने सफेद कपड़ों के चलते थोड़ा बहुत दिखता है वो अचानक से गायब कैसे हो जाता है?"

"जो हुकुम मालिक।" शेरा ने कहा____"अब मैं आपको अपनी शक्ल तभी दिखाऊंगा जब मैं अपने कार्य में सफल हो जाऊंगा।"
"ठीक है।" दादा ठाकुर ने कहा____"और हां, इस बात का विशेष ख़्याल रहे कि हमारे अलावा तुम्हारी किसी भी असलियत का किसी को भी पता ना चलने पाए। अब तुम जा सकते हो।"

शेरा ने सिर नवा कर दादा ठाकुर को प्रणाम किया और पलट कर बाहर निकल गया। उसके जाने के बाद दादा ठाकुर कुछ देर तक सोच विचार करते रहे उसके बाद वो उठे और हवेली से बाहर निकल गए। कुछ ही देर में वो जीप में दो आदमियों के साथ बैठे हाथी दरवाज़े से बाहर निकलते नज़र आए।

कुछ ही समय में उनकी जीप एक जगह रुकी। दादा ठाकुर जीप से उतरे और दोनों आदमियों को जीप के पास ही खड़े रहने का बोल कर एक मकान की तरफ बढ़ गए। ये गांव का पूर्वी छोर था। जिस मकान के क़रीब वो आए थे वो कच्चा ही बना हुआ था। दरवाज़े पर बाहर से कुंडी नहीं लगी हुई थी इस लिए उन्होंने कुंडी को पकड़ कर खड़काया तो कुछ ही पलों में दरवाज़ा खुल गया। दरवाज़ा खुलते ही धनंजय नाम का दरोगा नज़र आया। बाहर दादा ठाकुर को देखते ही उसने सबसे पहले उन्हें हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और फिर एक तरफ हट गया।

"तुमने हमें काफी निराश किया है धनंजय?" अंदर लकड़ी की एक कुर्सी पर बैठने के बाद दादा ठाकुर ने दारोगा से कहा____"जबकि हमने उम्मीद की थी कि तुम्हारे जैसा पढ़ा लिखा दारोगा जल्द ही मुरारी के हत्यारे को तलाश लेगा और साथ ही उस सफ़ेदपोश का भी पता लगा लेगा जिसने तुम्हारी आंखों के सामने अपने एक काले नकाबपोश को जान से मार दिया था।"

"माफ़ कीजिए ठाकुर साहब कि मैंने आपको निराश किया।" दरोगा ने बेचैनी से पहलू बदलते हुए कहा____"पर बिना किसी साक्ष्य के हत्यारे का पता लगाना इतना भी आसान नहीं था। मुरारी की हत्या जिस हथियार से की गई थी ना तो वो मेरे पास था और ना ही आपने मुझे घटना स्थल पर जाने दिया था। ऐसे में हत्यारे का पता लगाना कैसे आसान हो सकता था? रही बात उस सफ़ेदपोश की तो वो उस समय के बाद कभी नज़र ही नहीं आया मुझे। दूसरी बात ये भी हुई कि मां की तबियत अचानक से काफी बिगड़ गई थी जिसके चलते मैं इस मामले पर ज़्यादा ध्यान भी नहीं दे पाया।"

"ओह! हमें माफ़ करना धनंजय।" दादा ठाकुर ने अफ़सोस जताते हुए कहा____"हमें इस बारे में इल्म नहीं था। ख़ैर अब कैसी तबियत है तुम्हारी मां की?"
"जी अब पहले से बेहतर हैं वो।" दरोगा ने कहा____"उनकी देख भाल के लिए एक औरत को रखा है।"

"चलो ये अच्छा किया।" दादा ठाकुर ने कहा____"ख़ैर, तो अब क्या पता चला है तुम्हें इस मामले में?"
"रेखा और शीला की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से कुछ ख़ास पता नहीं चल सका।" दरोगा ने कहा____"रिपोर्ट में बस यही लिखा गया है कि शीला को किसी तेज़ धार वाले खंज़र से गला रेत कर मारा गया था और रेखा ने खुद ही ज़हर खाया था क्योंकि उसके शरीर पर ऐसे कोई निशान नहीं थे जिससे ये लगे कि किसी ने उसके साथ कोई ज़ोर ज़बरदस्ती की हो।"

"ह्म्म्म।" दादा ठाकुर ने हल्के से हुंकार भरी____"और?"
"मुरारी की हत्या जिस औजार से की गई थी वो मुझे मिल गया है।" दरोगा ने ये कहा तो दादा ठाकुर चौंके और फिर बोले____"क्या सच में?? कहां मिला वो तुम्हें?"

"सच सुनेंगे तो आप यकीन नहीं कर सकेंगे।" दरोगा ने ये कहा तो दादा ठाकुर ने कहा____"अब तक जो कुछ देखा सुना है वो भी यकीन करने लायक नहीं था धनंजय। तुम बेझिझक हो कर बताओ कि तुम्हें मुरारी की हत्या में प्रयोग किया गया औज़ार कहां मिला?"

"आपके बाग़ में जो मकान है वहीं एक जगह मिला है मुझे।" दरोगा ने ये कह कर मानों धमाका सा किया।
"क्या??" दादा ठाकुर बुरी तरह चौंके____"ये क्या कह रहे हो तुम?"

"यही सच है ठाकुर साहब।" धनंजय ने कहा____"आपके बाग़ में बने मकान के पीछे ट्रैक्टर की जो पुरानी टूटी हुई ट्रॉली पड़ी हुई है न उसी की पेटी में पड़ी थी वो कुल्हाड़ी।"

"ये तो बड़े ही आश्चर्य की बात है धनंजय।" दादा ठाकुर ने चकित भाव से कहा____"मुरारी की हत्या जिस औज़ार से हुई थी वो हमारी अपनी जगह पर कैसे पहुंच गया होगा? आख़िर किसने रखा होगा उस कुल्हाड़ी को उस जगह पर और क्यों रखा होगा? क्या इस लिए कि जब वो औज़ार हमारी अपनी किसी जगह पर मिले तो मुरारी की हत्या का आरोप सीधा हम पर या हमारे परिवार के किसी सदस्य पर लगे?"

"बिल्कुल, इसका तो यही मतलब हुआ।" धनंजय ने कुछ सोचते हुए कहा____"वैसे अगर आप बुरा न मानें तो अपनी एक बात आपके सामने रखूं?"
"क्या कहना चाहते हो?" दादा ठाकुर ने उसकी तरफ शंकित भाव से देखा।

"कहीं ऐसा तो नहीं कि मुरारी की इस तरह से हत्या करने वाला।" धनंजय ने धड़कते दिल से कहा____"कोई और नहीं बल्कि आपके ही परिवार का कोई सदस्य है?"

"ऐसा किस आधार पर कर रहे हो तुम?" दादा ठाकुर ने उसे घूरते हुए कहा____"भला हमारे परिवार का कोई सदस्य मुरारी की हत्या क्यों करेगा?"

"फिलहाल तो इसकी एक ही वजह समझ में आती है ठाकुर साहब।" धनंजय ने कहा____"छोटे ठाकुर को मुरारी की हत्या के आरोप में फंसा कर आपके अंदर अपने ही बेटे के प्रति ज़हर भर देना। ये तो सब जानते हैं कि आप छोटे ठाकुर को उनकी ग़लत हरकतों की वजह से पसंद नहीं करते हैं। ऐसे में अगर छोटे ठाकुर पर इतने बड़े संगीन अपराध का आरोप लगेगा तो ज़ाहिर है कि आप उनके और भी खिलाफ़ हो जाएंगे।"

दादा ठाकुर ने दारोगा की बातें सुन कर फ़ौरन कोई जवाब नहीं दिया। उनके चेहरे पर सोचो के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे थे। दरोगा की बातों में कहीं न कहीं सच्चाई तो थी ही। कुछ देर पता नहीं वो क्या सोचते रहे उसके बाद बोले____"बात तो तुम्हारी ठीक है, लेकिन हम सोच रहे हैं कि अगर असल हत्यारा हमारे बेटे को ही पूरी तरह मुरारी का हत्यारा बनाना चाहता था तो वो उस औज़ार को हमारे बाग़ में पड़ी ट्रैक्टर की उस ट्राली में नहीं बल्कि उस जगह पर रखता जहां वैभव झोपड़ा बना कर रह रहा था। उस सूरत में अगर लोगों को वो कुल्हाड़ी उसके झोपड़े से मिलती तो यकीनन हमें भी यकीन कर लेना पड़ता कि मुरारी की हत्या उसी ने ही की है लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उल्टा ये हुआ कि वो कुल्हाड़ी मुरारी के गांव से दूर हमारे गांव में हमारे बाग़ वाले मकान के पीछे पड़ी ट्राली में मिली। ये बहुत ही अजीब बात है धनंजय, जो आसानी से हजम नहीं हो रही है। ख़ैर हमारे लिए अब ये भी सोचने वाली बात है कि उस हत्यारे की कुल्हाड़ी तक तुम कैसे पहुंचे?"

"पुलिस वाला हूं ठाकुर साहब।" धनंजय ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा____"हम पुलिस वालों को ऐसा बना दिया जाता है कि हम अपने आप पर भी शक करने लगते हैं। ख़ैर, कुछ बातें ऐसी थीं जिन पर मैंने पहले ध्यान नहीं दिया था लेकिन अभी हाल ही में सब कुछ मेरी समझ में आया है। दिल तो मेरा भी कहता था कि छोटे ठाकुर भला उस इंसान की हत्या क्यों करेंगे जिसने उनके बुरे समय में हर तरह से मदद की हो लेकिन दिमाग़ पूरी तरह इस सच को मान नहीं रहा था।"

"ऐसा क्यों?" दादा ठाकुर पूछे बगैर न रह सके थे।

"क्योंकि छोटे ठाकुर के नाजायज़ संबंध मुरारी की बीवी सरोज से थे।" धनंजय ने ये कह कर मानों एक बार फिर से धमाका किया। दादा ठाकुर को ये सुन कर मन ही मन झटका तो लगा लेकिन फिर वो ये सोच कर कुछ न बोले कि अपने बेटे से उन्हें अच्छे काम की उम्मीद भी भला कैसे हो सकती है?

"पहले मुझे इस बात का पता नहीं था।" दादा ठाकुर जब कुछ न बोले तो धनंजय ने कहा____"एक दिन मैं छोटे ठाकुर का पीछा करते हुए मुरारी के खेत के पास पहुंच गया था। वहां पर मैंने छुप कर देखा कि मुरारी की बीवी सरोज छोटे ठाकुर के गुप्तांग को पकड़ रही थी और उनसे कुछ कह रही थी जिस पर छोटे ठाकुर ने उसे झिड़क दिया था। मैं ये देख कर बुरी तरह हैरान रह गया था। उनकी बातें सुनने के लिए मैं फ़ौरन ही उनके थोड़ा और क़रीब गया तो मैंने सुना कि छोटे ठाकुर सरोज को डांटते हुए कह रहे थे कि पहले जो कुछ हमारे बीच हुआ है अब वो दुबारा नहीं हो सकता और ये बात सरोज को भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। वहां से आने के बाद मैं ये सोच सोच कर चकित होता रहा कि छोटे ठाकुर के ऐसे संबंध उस औरत से कैसे हो सकते हैं जो उमर में उनसे दो गुना बड़ी हो। उसके बाद मैं दूसरे मामलों में व्यस्त हो गया। अभी जब कुछ दिन पहले मां का इलाज़ करा के लौटा और फिर से इस मामले में अपना दिमाग़ लगाया तो मुझे वो सब फिर से याद आ गया। एकदम से मेरे दिमाग़ की बत्ती जली कि कहीं मुरारी की हत्या छोटे ठाकुर ने ही तो नहीं की? ऐसा करने का उनके पास ठोस कारण भी था क्योंकि मुरारी की बीवी से उनके नाजायज़ संबंध थे और संभव है कि इस बात का पता मुरारी को चल गया रहा हो। मुरारी ने उन्हें धमकी दी होगी और आपको ख़बर कर के आपसे इंसाफ मांगने की बात कही होगी। छोटे ठाकुर मुरारी की इस धमकी से या तो डर गए होंगे या फिर गुस्से में आ गए होंगे और फिर उसी डर और गुस्से की वजह से उन्होंने मुरारी की हत्या कर दी होगी। हत्या का औज़ार नहीं मिला था इसका मतलब साफ था कि उन्होंने उसे कहीं छुपा दिया होगा। मैंने सोचा कुल्हाड़ी जैसा हत्या का औज़ार वो उस वक्त अपने झोपड़े में नहीं रख सकते थे क्योंकि ऐसे में उनका भेद जल्दी पता चल जाता इस लिए उन्होंने उसे ऐसी जगह छुपाया होगा जहां पर उसके होने की कोई कल्पना भी ना कर सके। अभी कुछ दिन पहले मैंने उन्हें बाग़ के मकान की तरफ जाते देखा था तो मेरे ज़हन में ख़्याल उभरा कि क्या वो हत्या का औज़ार यहां पर छुपाए हो सकते हैं? बस, अपनी तसल्ली के लिए मैं बारीकी से छानबीन के काम पर लग गया। मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि मुरारी की हत्या का औज़ार मुरारी के गांव से दूर इस गांव में ऐसी जगह पर छुपा हुआ मिल जाएगा।"

"तुमने कैसे पहचाना कि जो कुल्हाड़ी हमारी टूटी हुई ट्रॉली की पेटी से तुम्हें मिली है वो वही है जिसके द्वारा मुरारी की हत्या की गई थी?" दादा ठाकुर ने सपाट लहजे में पूछा____"क्या इसका तुम्हारे पास कोई ठोस प्रमाण है?"

"बिलकुल है ठाकुर साहब।" धनंजय ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा____"कुल्हाड़ी पर लगा खून मुरारी के खून से पूरी तरह मिलता है और इसी से साबित हो जाता है कि वो कुल्हाड़ी ही वो औज़ार है जिसके द्वारा मुरारी की हत्या की गई थी।"

"मुरारी का खून कहां मिला तुम्हें?" दादा ठाकुर के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे____"हमने तो तुम्हें मुरारी की लाश देखने के लिए उसके घर आने से भी मना कर दिया था और फिर कुछ समय बाद उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया था। फिर तुम्हें उसका खून कैसे मिला?"

"आपने मुझे घटना स्थल पर आने से ज़रूर मना किया था ठाकुर साहब।" धनंजय ने कहा____"लेकिन ये भी तो कहा था आपने कि मुरारी के हत्यारे का मुझे गुप्त रूप से पता लगाना है। अब भला बिना कोई सबूत या बिना कोई साक्ष्य के में कैसे हत्यारे का पता लगा सकता था? इस लिए मैं आपके मना करने के बावजूद सादे कपड़ों में तथा भेष बदल कर घटना स्थल पर पहुंचा था। घटना स्थल से मैंने मुरारी के खून का सैंपल लिया और थोड़ा बहुत मुआयना करने के बाद वापस चला गया था। उस कुल्हाड़ी के मिलने के बाद मैं उसके फल पर लगे खून की जांच के लिए उसे शहर ले गया था। कुल्हाड़ी पर लगे खून का मिलान तो मुरारी के खून से हो गया लेकिन कुल्हाड़ी की मूठ पर हत्यारे के उंगलियों के निशान कहीं पर भी नहीं मिले। ज़ाहिर है हत्यारा या तो इतना शातिर था कि उसने कुल्हाड़ी से अपनी उंगलियों के निशान मिटा दिए थे या फिर ये हो सोता है कि उसने हाथ में कोई कपड़ा लपेटा रहा होगा जिसकी वजह से कुल्हाड़ी पर उसकी उंगलियों के निशान छपे ही नहीं।"

"तो तुम इस नतीजे पर पहुंच चुके हो कि मुरारी की हत्या हमारे बेटे वैभव ने की है?" दादा ठाकुर ने दारोगा की तरफ देखते हुए कहा____"वजह यही है कि मुरारी की बीवी से उसके नाजायज संबंध थे जिसका पता मुरारी को चल गया था? तुम्हारी इस कहानी का यही सार है न?"

धनंजय को समझ न आया कि वो उन्हें क्या जवाब दे। हालाकि, उसे जो सबूत मिले थे और जो कुछ उसने देखा सुना था उसके आधार पर वो इसी नतीजे पर पहुंचा था कि मुरारी की हत्या दादा ठाकुर के बेटे वैभव सिंह ने ही की है। दादा ठाकुर जवाब पाने की उम्मीद में उसी की तरफ देख रहे थे और धनंजय मन ही मन इस दुविधा में पड़ गया था कि उसने जो कुछ दादा ठाकुर को मुरारी की हत्या के संबंध में विस्तार से बताया है क्या वास्तव में वही सच है या अभी भी कुछ ऐसा शेष है जिसे समझना उसके लिए बाकी है?
 
अध्याय - 55
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अब तक....

धनंजय को समझ न आया कि वो उन्हें क्या जवाब दे। हालाकि, उसे जो सबूत मिले थे और जो कुछ उसने देखा सुना था उसके आधार पर वो इसी नतीजे पर पहुंचा था कि मुरारी की हत्या दादा ठाकुर के बेटे वैभव सिंह ने ही की है। दादा ठाकुर जवाब पाने की उम्मीद में उसी की तरफ देख रहे थे और धनंजय मन ही मन इस दुविधा में पड़ गया था कि उसने जो कुछ दादा ठाकुर को मुरारी की हत्या के संबंध में विस्तार से बताया है क्या वास्तव में वही सच है या अभी भी कुछ ऐसा शेष है जिसे समझना उसके लिए बाकी है?

अब आगे....


क्षितिज में चमक रहा सूरज तेज़ी से पश्चिम दिशा की तरफ बढ़ते हुए शाम ढलने का संकेत दे रहा था। हालाकि सूरज के डूबने में अभी क़रीब एक से डेढ़ घंटे का समय लगना था किन्तु सूरज की तपिश अब कम हो गई थी। सरोज किसी काम से अपने देवर जगन के घर गई हुई थी जबकि अनुराधा अपने छोटे भाई अनूप के साथ घर पर ही थी। बाहर घर के बगल से ही एक ऊंचा तथा लंबा पेड़ था जिसकी छाया आंगन में आ रही थी। अनुराधा ने बरामदे से चारपाई ला कर आंगन में ही बिछा लिया था और अपने भाई अनूप के साथ लेटी हुई थी। खुले आंगन में पेड़ से छन कर ठंडी हवा आ रही थी जिसके चलते गर्मी से काफ़ी राहत थी।

चारपाई में एक तरफ लेटा अनूप अपने एक खिलौने के साथ खेल रहा था जबकि अनुराधा बिना पलकें झपकाए किसी गहरे ख़्यालों में गुम नज़र आ रही थी। आज सारा दिन वो गुमसुम ही रही थी और अभी भी उसका यही हाल था। मां के सामने उसने किसी तरह खुद को सम्हाले रखा था किंतु मां के जाते ही वो फिर से कहीं खो गई थी। सुबह से किसी भी काम में उसका मन नहीं लग रहा था। उसे ऐसा महसूस होता था जैसे उसके लिए दुनिया में अब ऐसी कोई चीज़ नहीं रही जिसमें कोई ख़ास बात हो और जिसे देख कर उसे कोई खुशी हो। आज से पहले अपना जीवन उसे कभी भी इतना नीरस और मायूसी भरा नहीं लगा था। वो अपने छोटे से घर में अपनी मां और छोटे भाई के साथ खुश थी मगर एक ही दिन में जैसे सब कुछ बदल गया था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्यों उसका मन बार बार वैभव की तरफ चला जाता था? वो ये मानती थी कि उसने वैभव के साथ कठोरता से बात कर के ठीक नहीं किया था और इसका उसे पछतावा भी था लेकिन इसके बावजूद क्यों उसका मन इतना विचलित था? आख़िर क्यों वो अपने ज़हन से वैभव और उससे संबंधित सभी बातों को निकाल नहीं पा रही थी?

सरोज ने उसे दुनियादारी की बातें तो बताई थी और अच्छे बुरे का भेद भी बताया था लेकिन ये नहीं बताया था कि अगर कोई किसी भी तरह से हमारे ज़हन से न जाए तो उसका क्या मतलब होता है? प्रेम के किस्से तो उसने कहानियों में सुने थे जो उसकी बूढ़ी दादी तब सुनाया करती थी जब वो ज़िंदा थीं लेकिन उन कहानियों में भी ज़्यादातर ज़िक्र किसी राज कुमार और राज कुमारी के प्रेम संबंधों का ही होता था। उस समय अनुराधा का ज़हन इतना विकसित नहीं था। उस समय तो कहानियां उसे बस अच्छी लगती थीं। उनके मर्म का अथवा उन कहानियों के भावों का उसे एहसास नहीं होता था। ये अलग बात है कि जहां पर उसके पसंदीदा किरदारों के बिछड़ जाने का प्रसंग आता तो उसे भी इस बात से बुरा लगता था। असल ज़िंदगी में प्रेम के मायने कभी उसने किसी के द्वारा समझे ही नहीं थे और ना ही कभी ऐसा उसके जीवन में हुआ था जिसके चलते उसे प्रेम के इस गहरे एहसास का पता चला होता।

वैभव को जब उसने पहली बार देखा था तो उसकी सुंदरता को देख कर उसे अपनी बूढ़ी दादी की कहानियों वाले राज कुमार की ही याद आई थी। अक्सर सोचती थी कि काश वो भी कहानियों की राज कुमारी की तरह सुंदर होती मगर जल्द ही उसे एक ऐसी हकीक़त का एहसास हुआ जिसने उसे विचलित कर दिया। उसने भी सुना था कि वैभव का चरित्र कैसा है। उसके चरित्र के बारे में सोचते ही उसे कहानियों वाला राज कुमार समझ लेने की अपनी ग़लती का एहसास हो गया था। हालाकि गुज़रते वक्त के साथ उसे एहसास हो चुका था कि वैभव उसके बारे में कुछ भी ग़लत नहीं सोचता है। वैभव का उससे बातें करना, उसका छेड़ना, और उसके बनाए खाने की तारीफ़ करना उसे एकदम से पुलकित कर देता था लेकिन वो इस सबको ये नहीं सोचती थी कि ये किस तरह का एहसास है अथवा ये किस तरह की खुशी है? वैभव को एक बार फिर से उसने कहानियों वाला राज कुमार मान लिया था मगर अचानक एक दिन उसे एक ऐसे सच का पता चला जिसकी वजह से उसे सदमा सा लग गया था।

रूपचंद्र नाम का एक लड़का एक दिन जाने कहां से आ टपका था और उसने वैभव के बारे में जो कुछ उसे बताया और फिर जो कुछ उसे करने के लिए कहा था वो उसके लिए किसी सदमे से कम नहीं था। उसके लिए इस हकीक़त को हजम करना बेहद मुश्किल हो गया था कि जिस वैभव को वो कहानियों वाला राज कुमार समझ कर खुश होती है उसी वैभव के उसके मां के साथ नाजायज़ संबंध हैं। पलक झपकते ही उसे ऐसा प्रतीत हुआ था जैसे वो आसमान से गिर कर धरती पर आ गई हो। रूपचंद्र की बातों का उसे बिलकुल भी यकीन नहीं हुआ था मगर जब रूपचंद्र ने ये कहा कि इस सच को खुद वैभव उसके सामने कुबूल करेगा तो उसके ज़हन ने जैसे काम करना ही बंद कर दिया था। ख़ैर जल्दी ही वैभव से उसका सामना हुआ और जब उसने उस संबंध में बात करते हुए वैभव को लताड़ा तो वैभव ने उस कड़वे सच को कबूल कर ही लिया। उस वक्त अनुराधा को बहुत तकलीफ़ हुई थी। वैभव के बारे में फैली हुई बातें जो उसने सुन रखी थीं उसका उसे बेहद ही कड़वा प्रमाण मिल गया था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसने उसकी ही मां के साथ ऐसा पाप कर्म किया था। उसे अपनी मां पर भी बेहद गुस्सा आया था लेकिन वो इस बारे में भला कर ही क्या सकती थी? जब उसकी अपनी मां ही ऐसी निकली थी तो दूसरे को क्या कहती?

बाद में भले ही वैभव ने दुबारा वैसा न किया हो और हर तरह से उसके परिवार की रक्षा की हो लेकिन उसके मन में उसके प्रति ये बात बैठ चुकी थी कि जो इंसान उसकी मां को अपने जाल में फांस कर उसके साथ ग़लत कर सकता है वो किसी दिन उसके साथ भी यही सब करने की कोशिश करेगा। अनुराधा ने सोच लिया था कि वो वैभव के जाल में किसी भी कीमत पर नहीं फंसेगी और अगर कभी ऐसा उसने महसूस किया तो वो उसी दिन वैभव को खरी खोटी सुना कर उसे अपने घर से चले जाने को कह देगी।

इंसान की सोच और उसके संकल्प महज परिस्थियों के तहत जन्म लेते हैं और फिर ऐसी ही दूसरी परिस्थितियों में वो या तो कमज़ोर पड़ जाते हैं या फिर एक अलग ही रूप अख़्तियार कर लेते हैं। अनुराधा ने भले ही ये सब सोच लिया था लेकिन हालात ऐसे बने कि वैभव के प्रति उसके विचार फिर से पहले जैसे बनते चले गए थे। इसकी वजह शायद ये थी कि हर मुलाक़ात में वैभव ने जिस तरह से अपने चरित्र को दर्शाया था और जिस तरह से उसके परिवार की जिम्मेदारी ली थी उससे उसके कोमल हृदय में उसके लिए नरमी आ गई थी। हर मुलाक़ात में वैभव ने उसे ये समझाने की कोशिश की थी कि वो एक ऐसी लड़की है जिसने उसके मुकम्मल वजूद को बदल दिया है और इसके लिए वो बेहद खुश है। वो उसके बारे में कभी ग़लत नही सोच सकता और अगर ग़लती से भी उसके मन में उसके प्रति कोई ग़लत ख़्याल आ जाता है तो वो खुद को कोसने लगता है। वक्त और हालात बड़े से बड़े ज़ख्म और बड़ी से बड़ी बात को इंसान के ज़हन से निकाल देते हैं।

अनुराधा चारपाई पर लेटी वैभव के ख़्यालों में खोई ही हुई थी कि तभी बाहर के दरवाज़े की शांकल बजी जिससे उसका ध्यान भंग हो गया। वो हड़बड़ा कर उठी तो उसके बगल से लेटा अनूप भी उठ बैठा। अनुराधा ने जा कर दरवाज़ा खोला तो बाहर किसी अंजान आदमी पर उसकी नज़र पड़ी। बाहर किसी अंजान आदमी को यूं खड़ा देख अनुराधा अंदर ही अंदर घबरा गई। बिजली की तरह उसके ज़हन में वैभव की बातें गूंज उठीं कि हालात ठीक नहीं हैं इस लिए किसी अंजान व्यक्ति के लिए दरवाज़ा मत खोलना।

"घबराओ मत।" अनुराधा के चेहरे पर उभर आई घबराहट को देख कर उस आदमी ने बड़ी शालीनता से कहा____"मैं कोई ऐसा व्यक्ति नहीं हूं जिससे तुम्हें घबराने की अथवा डरने की ज़रूरत हो। मैं बस ये देखने आया हूं कि यहां सब ठीक है कि नहीं?"

"अ..आप कौन हैं?" अनुराधा ने बड़ी मुश्किल से हिम्मत कर के पूछा।
"मैं भुवन हूं।" बाहर खड़े आदमी ने कहा____"और यहां पर मैं छोटे ठाकुर के हुकुम पर ही हाल चाल पूछने आया हूं।"

भुवन नाम सुनते ही अनुराधा को झटका लगा। मस्तिष्क में बिजली की तरह वैभव द्वारा कही गई उस दिन की बात गूंज उठी जब उसने उससे कहा था कि जहां पर उसका नया मकान बन रहा है वहां एक भुवन नाम का आदमी मिलेगा उसे। अगर उसे कोई परेशानी हो तो वो फ़ौरन उसके पास जा कर अपनी परेशानी बता सकती है। इस बात के याद आते ही अनुराधा के अंदर एक हूक सी उठी जिसके चलते उसका समूचा वजूद एक अजीब एहसास से आंदोलित हो उठा।

"घर में सब ठीक है ना बहन?" अनुराधा को ख़ामोशी से कुछ सोचता देख भुवन ने उसका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करते हुए पूछा____"तुम मुझे अपना बड़ा भाई समझ सकती हो। छोटे ठाकुर ने मुझे तुम्हारे घर की जिम्मेदारी सौंपी है और ये भी कहा है कि इस घर के किसी भी सदस्य को किसी भी तरह से कोई समस्या न होने पाए। इस लिए बहन तुम मुझे बताओ, यहां सब ठीक है ना?"

"ह..हां भैया सब...ठीक है।" अनुराधा के दिलो दिमाग़ में एकदम से तूफान उठ खड़ा हुआ था जिसे वो बड़ी मुश्किल से दबाते हुए कापती आवाज़ में बोली____"यहां हमें कोई समस्या नहीं है।"

"अच्छी बात है बहन।" भुवन ने नम्रता से कहा____"बाकी किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तो अपने इस भाई के पास आ जाना। मैं अपनी जान दे कर भी तुम्हारी ज़रूरत को पूरा करूंगा। ख़ैर, मैं यहीं पास में ही हूं इस लिए दिन में भी और रात में भी यहां का हाल चाल देखने आता रहूंगा।"

अनुराधा को समझ में न आया कि वो भुवन को अब क्या जवाब दे इस लिए ख़ामोशी से उसने सिर हिला दिया। भुवन के जाने के बाद अनुराधा ने दरवाज़ा बंद किया और चारपाई पर आ कर बैठ गई। अनूप चारपाई में ही अपना खिलौना लिए बैठा था। भुवन की बातें सुन कर अनुराधा को अब एक अलग ही तरह का एहसास हो रहा था। एक बार फिर से उसके ज़हन में वैभव द्वारा कही गई बातें गूंजने लगीं थी।

"अगर तुम्हें लगता है कि मेरे यहां आने का सिर्फ़ यही एक मकसद है कि मैं तुम्हें भी बाकी लड़कियों की तरह अपने जाल में फंसाना चाहता हूं तो ठीक है। मैं तुम्हें वचन देता हूं कि ठाकुर वैभव सिंह आज के बाद तुम्हारे इस घर की दहलीज़ पर अपने क़दम नहीं रखेगा। तुम्हारे साथ जो चंद खूबसूरत लम्हें मैंने बिताए हैं वो जीवन भर मेरे लिए एक अनमोल याद की तरह रहेंगे। ये भी वचन देता हूं कि इस घर के किसी भी सदस्य पर किसी के द्वारा कोई आंच नहीं आने दूंगा। चलता हूं अब, ऊपर वाला तुम्हें हमेशा खुश रखे।"

वैभव द्वारा कही गई ये बातें बार बार उसके जहन में गूंजने लगीं थी जिसके असर से अनुराधा के कोमल हृदय में दर्द का आभास होने लगा था। वो अपनी आंखें बंद कर के इस सबको अपने मन से निकालने का प्रयास करने लगी मगर कामयाब न हुई। बेबस और लाचारी का एहसास होते ही उसकी आंखें भर आईं और न चाहते हुए भी उसकी आंखों से आंसू के कुछ कतरे छलक ही पड़े। सहसा किसी आहट से वो चौंकी और फिर घबरा कर जल्दी जल्दी अपने आंसू पोछने लगी।

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"क्या सोचने लगे धनंजय?" दादा ठाकुर ने दारोगा को सोचो में गुम हुआ देखा तो बोले____"तुम्हारी चुप्पी और तुम्हारा अचानक से इस तरह से सोच में पड़ जाना इस बात को ज़ाहिर करता है कि तुमने जो कुछ मुरारी और उसके हत्यारे के संबंध में हमें बताया है उसे तुम खुद ही कबूल नहीं कर पा रहे हो।"

दादा ठाकुर की बात सुन कर दरोगा ने सिर उठा कर उनकी तरफ देखा किंतु जल्दी ही उनसे नज़रें हटा कर बगले झांकने लगा। चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए थे। दादा ठाकुर उसी को देख रहे थे।

"प्रतीत होता है जैसे तुम हमसे कुछ छुपा रहे हो।" दादा ठाकुर ने उसके चेहरे पर तेज़ी से बदलते भावों को देखते हुए कहा____"हम अच्छी तरह जानते हैं कि तुम्हारे जैसा पढ़ा लिखा दारोगा इस मामले में ऐसे निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकता। तुम भी अच्छी तरह समझते हो कि अगर वैभव ही मुरारी का हत्यारा होता तो खुद उस पर नकाबपोशों का हमला नहीं होता और ना ही वो हमें मुरारी के हत्यारे का पता लगाने के लिए ज़ोर देता।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए ठाकुर साहब।" धनंजय ने नज़रें चुराते हुए कहा____"मैं इस मामले में कुछ भी नहीं कर सकता।"
"ऐसा क्यों कह रहे हो तुम?" दादा ठाकुर के माथे पर सिलवटें उभर आईं____"आख़िर बात क्या है धनंजय? ऐसा क्या है जो तुम हमें बता नहीं रहे?"

"मैं जानता हूं कि आपके बहुत उपकार हैं मुझ पर।" दरोगा ने भारी गले से कहा____"आपने मेरे और मेरे परिवार के लिए बहुत कुछ किया है। आपके उपकारों का बदला मैं अपनी जान दे कर भी चुका नहीं सकता।"
"तुम्हें ऐसा कुछ करने की ज़रूरत भी नहीं है।" दादा ठाकुर ने कहा____"हम सिर्फ़ ये जानना चाहते हैं कि असल बात क्या है?"

"अपनी मां की तबियत के बारे में मैंने आपको जो कुछ बताया वो झूठ था ठाकुर साहब।" धनंजय ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"जबकि सच ये है कि मेरी मां का कुछ समय पहले अपहरण कर लिया गया है।"
"ये क्या कह रहे हो तुम?" दादा ठाकुर बुरी तरह चौंके____"कैसे हुआ ये और किसने किया ऐसा?"

"एक ऐसे रहस्यमई आदमी ने जो खुद को सफ़ेद कपड़े और नक़ाब में छुपा के रखता है।" धनंजय ने कहा____"एक हफ़्ता पहले की बात है। मैं इस कमरे से आगे की तहक़ीकात के लिए निकल ही रहा था कि तभी बाहर से दरवाज़ा खटखटाया गया। मैंने सोचा शायद आप होंगे इस लिए जा कर दरवाज़ा खोला। जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला एकदम से क़यामत टूट पड़ी मुझ पर। एक काला नकाबपोश आदमी बिजली की सी तेज़ी से टूट पड़ा था मुझ पर। मुझे उस सबकी ख़्वाब में भी उम्मीद नहीं थी इस लिए मैं उस सबसे बुरी तरह बौखला गया था किंतु जब तक सम्हला तब तक मैं काले नकाबपोश आदमी के कब्जे में आ चुका था। उसने पीछे से मेरे गले पर तेज़ धार वाला खंज़र लगा दिया था। अगर बात सिर्फ़ इतनी ही होती तो शायद मैं कुछ कर भी सकता था किंतु अगले ही पल दरवाज़े से उसके ही जैसा एक और नकाबपोश कमरे में आ गया। दूसरे नकाबपोश में सिर्फ़ इतना ही फ़र्क था कि उसके कपड़े सफ़ेद थे और चेहरे पर भी सफ़ेद रंग का ही नक़ाब था। उसे देख कर मेरी आंखों के सामने उस दिन का मंज़र घूम गया जब वो अपने ही एक नकाबपोश आदमी की जान ले रहा था। मैं सोच में पड़ गया था कि वो सफ़ेदपोश आदमी अपने काले नकाबपोश साथी के साथ मेरे पास क्यों आया है? क्या वो मेरी जान लेने आया था? अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी कमरे में उस सफ़ेदपोश की अजीब सी आवाज़ गूंजी। उसने मुझसे कहा कि अब से मैं वही करूंगा जो वो चाहेगा और अगर मैने ऐसा नहीं किया तो ये मेरे लिए ठीक नहीं होगा। उसके अनुसार मुझे मुरारी के हत्यारे का पता लगाने में कोई जल्दबाजी नहीं करनी है और ना ही कोई ईमानदारी दिखाना है। अगर आप मेरे पास आ कर मुझसे इस मामले में कुछ पूछते हैं तो मुझे यही बताना है कि मुरारी का हत्यारा आपका बेटा वैभव सिंह ही है। इसको प्रमाणित करने के लिए उसने मुझे वही तरीका बताया जो मैं आपको बता चुका हूं कि आपके बेटे का मुरारी की बीवी सरोज के साथ नाजायज़ संबंध बन गया था और ये बात मुरारी को पता चल गई थी। ख़ैर ये सब कह कर उस सफ़ेदपोश ने मुझे फिर से चेताया कि अगर मैंने उसका कहा नहीं माना तो अंजाम अच्छा नहीं होगा। उसके बाद उसके काले नकाबपोश साथी ने मेरे सिर पर वार किया जिससे मैं बेहोश हो गया। होश आया तो देखा वो दोनों कमरे से गायब थे। मैं सोचने लगा कि आख़िर वो सफ़ेदपोश मुझसे ये सब क्यों करवाना चाहता है? भला ऐसा करने से उसे क्या फ़ायदा हो सकता था जबकि वैभव को मुरारी का हत्यारा साबित करने से भी कुछ नहीं हो सकता था? ख़ैर उसकी धमकी को मैंने पूरी तरह नज़रंदाज़ कर दिया था। मैं भला ऐसे किसी आदमी के कहने पर अपने फर्ज़ से कैसे मुंह मोड़ लेता लेकिन जल्दी ही मुझे समझ में आ गया कि मुझे उसका कहा मान लेना चाहिए था। चार दिन पहले मुझे पता चला कि मेरी मां घर से गायब है। मैंने उन्हें बहुत खोजा मगर उनका कहीं पता नहीं चला। मुझे समझते देर न लगी कि ये काम ज़रूर उस सफ़ेदपोश का ही होगा। इस दुनिया में मां के अलावा मेरा है ही कौन? मैं बुरी तरह घबरा गया था कि अगर मां को कुछ हो गया तो मैं कैसे खुद को माफ़ कर पाऊंगा? मन में ख़्याल आया कि इस बारे में आपको बताऊं लेकिन फिर ये सोच कर बताना सही नहीं समझा कि इससे कहीं बात और न बिगड़ जाए। मैं जानता था उस सफ़ेदपोश से यहीं मुलाक़ात हो सकती है इस लिए मैं यहीं आ गया। दो दिन पहले रात के अंधेरे में सच में ही वो सफ़ेदपोश मेरे सामने आ गया और फिर उसने खुद ही बताया कि मेरी मां उसके कब्जे में है। अगर अब भी मैं उसका कहा नहीं मानूंगा तो इस बार मैं अपनी मां से हाथ धो बैठूंगा। बेबस हो कर मुझे उसके अनुसार चलना ही पड़ा ठाकुर साहब।"

"तो क्या तुम्हारी मां अभी भी उसी के कब्जे में है?" दादा ठाकुर ने पूछा।
"हां।" धनंजय ने हताश भाव से कहा____"उसका कहना है कि वो तभी मेरी मां को आज़ाद करेगा जब मैं आपको ये सब बता दूंगा कि मुरारी का हत्यारा आपका बेटा ही है।"

"बड़ी अजीब बात है।" दादा ठाकुर ने हैरानी भरे भाव से कहा____"भला उसे तुम्हारे द्वारा ऐसा करवाने से क्या लाभ हो सकता है? क्या उसे इतना भी ज्ञान नहीं है कि तुम्हारे द्वारा वैभव को मुरारी का हत्यारा साबित कर देने से भी हमें यकीन नहीं हो सकता या ये कहें कि हमारे बेटे पर कोई आंच नहीं आ सकती?"

"मैं खुद भी अभी तक यही बात सोच सोच कर परेशान हूं ठाकुर साहब।" धनंजय ने कहा____"मुझे खुद समझ में नहीं आ रहा कि मेरे द्वारा ऐसा करवाने से उसे क्या लाभ हो सकता है। ख़ैर, मैं तो ये सोच कर डर रहा हूं कि आपको असलियत बता देने के बाद अब मेरी मां का क्या होगा? कहीं वो मेरी मां को जान से न मार दे, अगर ऐसा हुआ तो मैं अनाथ हो जाऊंगा ठाकुर साहब। मेरी वजह से मेरी मां की जान चली गई तो कैसे इस अपराध बोझ से जी पाऊंगा मैं?"

"कुछ नहीं होगा तुम्हारी मां को।" दादा ठाकुर ने उसे धीरज बंधाते हुए कहा____"हमें यकीन है कि वो तुम्हारी मां के साथ कुछ भी बुरा नहीं करेगा।"
"पता नहीं वो कौन सी मनहूस घड़ी थी।" धनंजय ने हताश हो कर कहा____"जब मेरा तबादला इस शहर में हुआ था और फिर मैं इस मामले में फंस गया?"

"फ़िक्र मत करो धनंजय।" दादा ठाकुर ने खड़े हो कर उसके कंधे पर हाथ रखा____"तुम्हारी मां सही सलामत तुम्हें मिल जाएंगी। एक बात और, हम तुम्हें अब इस मामले से आज़ाद करते हैं। तुम्हारे आला अधिकारी से बात कर के हम तुम्हारा तबादला भी कहीं और करवा देंगे। हम नहीं चाहते कि हमारी वजह से तुम दोनों मां बेटे पर कोई संकट आए। अच्छा अब हम चलते हैं, अपना ख़्याल रखना।"

धनंजय ने हाथ जोड़ कर दादा ठाकुर को प्रणाम किया तो दादा ठाकुर उसे आशीर्वाद दे कर कमरे से बाहर निकल गए। कुछ ही देर में वो जीप में अपने दोनों आदमियों के साथ बैठे हवेली की तरफ बढ़े चले जा रहे थे। उनके चेहरे पर सोचो के गहरे बादल छाए हुए थे।

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शाम हो चुकी थी।
मैं सबके साथ बैठा चाय पी रहा था। गांव की कुछ औरतें आई हुईं थी और अंदर वो सब सोहर गीत गा रहीं थी। ये सुबह शाम रोज़ का ही काम बन गया था उनका। जब से बड़े भैया के साले वीरेंद्र को पुत्र हुआ था तभी से घर में खुशियों का माहौल छाया हुआ था। हम सब बाहर ही बैठे हुए थे इस लिए गाना बजाना साफ साफ सुनाई दे रहा था। मैं पहली बार रागिनी भाभी के द्वारा कोई गीत सुन रहा था। उनकी आवाज़ तो मधुर थी ही किंतु गाना भी वो बहुत ही सुंदर गा रहीं थी। कुछ गांव की औरतें और लड़कियां भी थीं जो उनका साथ दे रहीं थी।

चाय के दौरान ही मैंने वीरेंद्र से कहा कि मेरे लायक जो भी काम हो वो बेझिझक मुझे बताएं। मेरी ये बात सुन कर सब कहने लगे कि वो अपनी बेटी के देवर से कोई काम नहीं करवाएंगे। मैंने काफी कहा लेकिन वो न माने तब मैंने कहा कि ठीक है लेकिन मेरे साथ जो आदमी आए हैं वो यहां काम करने के लिए ही आए हैं इस लिए वो उन्हें काम पर लगा लें। मेरी इस बात से सब राजी हो गए। ख़ैर उसके बाद मैं गांव घूमने का बोल कर निकल गया।

चंदनपुर गांव में ज़्यादातर ठाकुर ही थे और बाकी अन्य जाति के लोग थे। यहां मुझे सब जानते थे और बड़े ही प्रेम भाव से मिलते थे। गांव में ज़्यादातर कच्चे मकान बने हुए थे। मैं बाहर आया और सोचा किस तरफ घूमने के लिए जाया जाए? घर में क्योंकि सब लोग गीत संगीत ने व्यस्त थे इस लिए किसी के पास मेरे लिए समय ही नहीं था। मैं चलते हुए अपने भैया के चाचा ससुर के घर की तरफ आ गया। शाम ढल चुकी थी इस लिए हर घर में लालटेन जला दी गई थी। हालाकि बिजली भी थी गांव में लेकिन उसके आने का कोई समय नहीं था। चौबीस घंटे में मुश्किल से चार पांच घंटे ही बिजली रहती थी, वो भी भगवान भरोसे।

घर का दरवाज़ा खुला हुआ था तो मैं अंदर दाखिल हो गया। चाचा ससुर यानि बलभद्र सिंह भाभी के घर में ही बैठे हुए थे और उनके साथ में उनका बड़ा बेटा भी था। मैं अंदर आया तो देखा बैठका खाली था तो मैं अंदर की तरफ बढ़ गया। थोड़ी ही देर में मैं अंदर आंगन में आ गया। आंगन में आ कर जैसे ही मैंने बाएं तरफ नज़र डाली तो एकदम से मेरी आंखें फट पड़ीं। अंदर की सांस अंदर और बाहर की बाहर ही रह गई। मैं अपनी जगह पर बुत बना खड़ा रह गया था।

आंगन के बाएं तरफ कोने में बलवीर की बीवी सुषमा पूरी तरह नंगी खड़ी थी। उसकी साड़ी नीचे ज़मीन पर पड़ी हुई थी। उसका पूरा जिस्म लालटेन के प्रकाश में नहाया हुआ था। उसकी नज़र मुझ पर नहीं पड़ी थी। मैंने देखा वो एक दूसरी साड़ी को हाथ में लिए उसे पहनने वाली थी। सहसा उसे किसी बात का आभास हुआ तो उसने नज़र उठा कर देखा और जैसे ही उसकी नज़र किसी पराए मर्द पर पड़ी तो वो बुरी तरह उछल पड़ी। डर और घबराहट के मारे उसके कंठ से चीख ही निकल गई। उसके बाद फ़ौरन ही वो अपनी नग्नता को छुपाने में लग गई थी। इधर उसकी चीख सुन कर मुझे होश आया था। उसको हैरत से अपनी तरफ देखता देख मैं एकदम से बौखला गया और फ़ौरन ही पलट कर बाहर की तरफ भागा।

बाहर बैठक में आ कर मैं एक तरफ रखे लकड़ी के तख्त पर बैठ गया। मेरी सांसें इतनी तेज़ चलने लगीं थी मानों मैं सैकड़ों मील भाग कर आया था। आंखों के सामने सुषमा का नंगा जिस्म बार बार घूमे जा रहा था। गोरे जिस्म का एक एक अंग साफ देखा था मैंने। सीने पर मध्यम आकार की ठोस और तनी हुई चूचियां, उसके नीचे सपाट पेट, पेट के बीच सुंदर सी नाभि और उसके नीचे चिकनी जांघों के बीच घने बालों में छुपी उसकी योनि। उफ्फ मैंने आंखें बंद कर के एक गहरी सांस ली। बंद आंखों में सुषमा का डरा सहमा और हैरत से सराबोर चेहरा उभर आया। यकीनन इस तरह उसे किसी के आ जाने की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी और उसे ही बस क्यों मुझे खुद भी इसकी उम्मीद नहीं थी। मैं सोचने लगा कि साला ये कैसा चूतियापा हो गया? सहसा मेरे मन में ख़्याल उभरा कि वो आंगन में उस हालत में क्यों थी? अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी अंदर से पायलों की छम छम करती आवाज़ बाहर आती सुनाई दी। मैं एकदम से सम्हल कर बैठ गया। मेरी धड़कनें अनायास ही तेज़ हो गईं।

कुछ ही पलों में सुषमा बाहर आ गई। मैंने नज़र उठा कर उसकी तरफ देखा। हमारी नज़रें मिलीं तो उसने बुरी तरह शरमा कर अपना सिर झुका लिया। इस वक्त वो साड़ी पहने हुए थी। गोरा चेहरा लाज्जावश सुर्ख पड़ा हुआ था।

"माफ़ कीजिएगा, मुझे पता नहीं था कि अंदर आप उस हालत में होंगी।" मैंने झिझकते हुए धीमें स्वर में कहा____"मैं तो बस आपसे मिलने आया था। मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि अंदर मुझे ऐसा ख़ूबसूरत नज़ारा देखने को मिल जाएगा।"

"आप बहुत ख़राब हैं ननदोई जी।" सुषमा ने बुरी तरह शरमा कर किन्तु नाराज़गी जताते हुए कहा____"भला कोई किसी के घर के अंदर इस तरह दबे पांव जाता है क्या? कम से कम आवाज़ तो लगाना चाहिए था आपको।"

"देखिए अब जो हो गया उसके लिए क्या ही किया जा सकता है भाभी जी।" मैंने जब देखा कि सुषमा उस सबसे ज़्यादा नाराज़ नहीं हुई है तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"रही बात आवाज़ लगा कर अन्दर आने की तो अब मैंने फ़ैसला कर लिया है कि अब से जब भी यहां आऊंगा तो ऐसे ही दबे पांव आऊंगा ताकि ऐसा ही ख़ूबसूरत नज़ारा देखने को मिलें।"

"धत्त, सच में बहुत गंदे हैं आप?" सुषमा एक बार फिर बुरी तरह लजा गई फिर बोली____"अगर आइंदा इस तरह दबे पांव आएंगे तो कूटे जाएंगे आप।"
"कोई बात नहीं सरकार।" मैंने मुस्कुरा कर कहा___"ऐसे ख़ूबसूरत नज़ारे को देखने के लिए तो हम खुशी से अपनी जान भी दे देंगे।"

"बस कीजिए अब।" सुषमा मानों शर्म से गड़ी जा रही थी____"वरना रागिनी दीदी से आपकी शिकायत कर देंगे हम।"
"ज़रूर कर दीजिए सरकार।" मैंने छेड़ा____"और ये भी बताइएगा कि कैसे आप मुझ मासूम को अपने हुस्न का दीदार करा रहीं थी।"

"हाय राम! हमने कब किया ऐसा?" सुषमा बुरी तरह हैरान हो कर बोल पड़ी थी।
"ख़ैर ये सब छोड़िए।" मैंने कहा____"और ये बताइए कि आप आंगन में उस हालत में क्यों थीं? भला आपको ये कैसा शौक चढ़ा हुआ था?"

"धत्त।" सुषमा ने शर्म से मुस्कुराते हुए कहा____"हमें ऐसा करने का कोई शौक नहीं चढ़ा हुआ था। हम तो दिशा मैदान जाने के लिए कपड़ा बदल रहे थे। घर में कोई था नहीं इस लिए सोचा आंगन में ही झट से कपड़ा बदल लेते हैं और फिर दिशा मैदान के लिए चले जाएंगे। अब हमें क्या पता था कि आप ऐसे दवे पांव आ जाएंगे।"

"शायद मेरी किस्मत बहुत अच्छी थी भाभी।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"इसी लिए तो इतना खूबसूरत नज़ारा देखने को मिल गया मुझे। उफ्फ! क्या लग रहीं थी आप?"

"भगवान के लिए ऐसी बातें मत कीजिए।" सुषमा ने फिर से शर्मा कर कहा____"हमारा वैसे भी शर्म से बुरा हाल है। कृपया इस बात का ज़िक्र किसी से मत कीजिएगा वरना बहुत बदनामी होगी हमारी।"

"फ़िक्र मत कीजिए।" मैंने उसके शर्म से लाल पड़े चेहरे को देखते हुए कहा____"मैं इस बारे में किसी से कुछ नहीं कहूंगा, लेकिन ये भी तो बताइए कि इससे मुझे क्या मिलेगा?"

"क...क्या मतलब है आपका?" सुषमा मानों उलझ गई।
"सीधी सी बात है भाभी।" मैंने समझाने वाले अंदाज़ से कहा____"मैं आपके इतने बड़े राज़ को सबसे छुपा कर रखूंगा जिससे कोई आपके बारे में ग़लत नहीं सोचेगा? तो मेरे इतने बड़े काम के लिए मुझे भी तो आपसे कुछ मिलना चाहिए।"

"क..क्या चाहते हैं आप?" सुषमा ने संदेहपूर्ण भाव से मेरी तरफ देखा।
"ज़्यादा कुछ नहीं।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"सिर्फ़ यही कि एक बार फिर से वैसा ही ख़ूबसूरत नज़ारा देखने को मिल जाए।"

"हाय राम! ये क्या कह रहे हैं आप?" सुषमा ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा_____"नहीं नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।"
"क्यों नहीं हो सकता?" मैंने तख्त से उतर कर कहा____"अभी थोड़ी देर पहले तो हुआ ही है तो एक बार फिर से क्यों नहीं हो सकता?"

"वो तो बस अंजाने में हुआ था।" सुषमा ने शर्म से नज़रें झुकाते हुए कहा____"अब वैसा कुछ भी हम जान बूझ कर नहीं करेंगे। कृपया आप हमें इसके लिए मजबूर न करें। अच्छा, अब हम चलते हैं। हमें दिशा मैदान के लिए जाना है।"

सुषमा मेरी कोई बात सुने बिना ही चली गई। शायद वो समझ गई थी कि जितना वो मुझसे इस बारे में बातें करेगी उतना वो खुद ही फंसती जाएगी। या फिर ये भी संभव था कि दिशा मैदान के लिए जाना उसके लिए ज़रूरी हो गया था। ख़ैर, मैं उसकी हालत को सोच कर मन ही मन मुस्कुराया और फिर बाहर की तरफ चल पड़ा। अभी दरवाज़े पर ही पहुंचा था कि सामने से मुझे सुषमा की ननद कंचन इधर ही आती हुई दिखी। उसे आता देख मेरे होठों पर गहरी मुस्कान उभर आई और मैं पलट कर इस बार दरवाज़े के बगल से दीवार की ओट में छिप गया।
 
अध्याय - 56
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अब तक....


सुषमा मेरी कोई बात सुने बिना ही चली गई। शायद वो समझ गई थी कि जितना वो मुझसे इस बारे में बातें करेगी उतना वो खुद ही फंसती जाएगी। या फिर ये भी संभव था कि दिशा मैदान के लिए जाना उसके लिए ज़रूरी हो गया था। ख़ैर, मैं उसकी हालत को सोच कर मन ही मन मुस्कुराया और फिर बाहर की तरफ चल पड़ा। अभी दरवाज़े पर ही पहुंचा था कि सामने से मुझे सुषमा की ननद कंचन इधर ही आती हुई दिखी। उसे आता देख मेरे होठों पर गहरी मुस्कान उभर आई और मैं पलट कर इस बार दरवाज़े के बगल से दीवार की ओट में छिप गया।

अब आगे....



मैं दीवार के ओट में छुपा देख रहा था कि कंचन तेज़ कदमों से चली आ रही थी। शाम का अंधेरा घिरने लगा था इस लिए उसका क़यामत ढाता हुस्न ज़्यादा साफ़ नहीं दिख रहा था। उसे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि उसके घर में इस वक्त मेरे अलावा कोई नहीं है। ख़ैर जल्दी ही वो अंदर दाखिल हुई। बिना इधर उधर देखे वो सीधा अंदर ही बढ़ती चली गई। कुछ ही पलों में उसकी आवाज़ मुझे सुनाई दी। वो सुषमा को भौजी कह कर पुकार रही थी। दो तीन बार पुकारने के बाद उसका पुकारना बंद हो गया। मेरे मन में ये जानने की उत्सुकता बढ़ गई कि अंदर वो क्या करने लगी होगी अकेले घर में?

मैं दबे पांव अंदर की तरफ बढ़ चला। बाहर बैठक में और अंदर आंगन में लालटेन जल रही थी, बाकी बाहर बरोठ में अंधेरा था। अंदर वाले बरोठ में जब मैं पहुंचा तो आंगन में जल रही लालटेन का हल्का प्रकाश महसूस हुआ। मैंने दीवार की ओट से छुप कर अंदर आंगन की तरफ देखा, कंचन कहीं नज़र ना आई। मेरे दिल की धड़कनें थोड़ा तेज़ हो गईं थी लेकिन फिर भी मैं दबे पांव आगे बढ़ा और जल्दी ही आंगन वाली दीवार के पास आ गया। मैंने आंगन के पूरे हिस्से में निगाह घुमाई और अगले ही पल मेरी नज़र आंगन के एक कोने में ठहर गई।

अपनी भाभी सुषमा की तरह कंचन भी अपने कपड़े उतारे पूरी नंगी खड़ी दूसरे कपड़े पहनने की तैयारी कर रही थी। लालटेन की रोशनी में उसका जिस्म ऊपर से नीचे तक एकदम साफ़ नज़र आ रहा था। उसे इस हालत में देख कर मेरे अंदर ज़बरदस्त हलचल मच गई। पहले सुषमा और अब उसकी ननद कंचन। मैं समझ गया कि वो भी दिशा मैदान जाने के लिए कपड़े बदल रही है। ये औरतों का रोज सुबह शाम का नियम था। दिशा मैदान जाने के लिए दूसरे कपड़े पहनते थे सब।

कंचन के सीने पर मध्यम आकार के उभार एकदम ठोस और तने हुए दिख रहे थे। उन उभारों के बीच भूरे रंग के चूचक बहुत ही सुंदर नज़र आ रहे थे। मेरा मन किया कि अभी जाऊं और उन चूचकों को मुंह में भर कर चूसना शुरू कर दूं लेकिन फिर किसी तरह मैंने खुद को रोका। ऐसा करना यकीनन ख़तरनाक हो सकता था, क्योंकि ये उसके साथ ज़बरदस्ती कहलाता। कंचन का पेट तक का हिस्सा मुझे साफ़ दिख रहा था किंतु उसके नीचे का हिस्सा उसके उस दूसरे कपड़े की वजह से छिपा हुआ था जिसे वो पहनने वाली थी। उसे इस हालत में देख कर मेरे अंदर का खून उबाल मारने लगा और मेरी टांगों के बीच कच्छे में छुपा मेरा लंड आधे से ज़्यादा सिर उठा चुका था। दिल की धड़कनें धाड़ धाड़ बजती महसूस हो रहीं थी।

मैं जानता था कि कंचन को फंसाने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलने वाला था लेकिन मैं ये भी जानता था कि अगर मैंने कुछ भी उल्टी सीधी हरकत की तो भारी गड़बड़ हो जाएगी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं? उधर कंचन अपने दूसरे कुर्ते को सीधा करने में लगी हुई थी। जल्द ही वो कपड़े पहन कर दिशा मैदान के लिए निकल जाने वाली थी। मेरा ज़हन बड़ी तेज़ी से कोई उपाय सोचने में लगा हुआ था लेकिन हड़बड़ी में कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। अचानक मैंने एक फ़ैसला किया, मैंने सोच लिया कि अब जो होगा देखा जाएगा। मैं ऐसा सुनहरा मौका गंवाना नहीं चाहता था।

आंखें बंद कर के मैंने दो तीन गहरी गहरी सांसें ली और पलट कर चार पांच क़दम पीछे आया। उसके बाद सामान्य अंदाज़ में भाभी भाभी पुकारते हुए मैं एकदम से आंगन में आ गया। उधर मेरे द्वारा भाभी भाभी पुकारने पर कंचन बुरी तरह हड़बड़ा गई और साथ ही घबरा भी गई। वो मादरजाद नंगी खड़ी थी। हम दोनों की नज़रें जैसे ही एक दूसरे से मिलीं तो मानो वक्त ठहर गया। मैंने तो ख़ैर बुरी तरह चकित हो जाने का नाटक किया लेकिन कंचन भौचक्की सी खड़ी रह गई। अचानक उसे अपनी हालत का एहसास हुआ। उसने बुरी तरह हड़बड़ा कर उसी कुर्ते को अपने सीने पर छुपा लिया जिसे वो सीधा कर के पहनने वाली थी।

"ह....हाय राम।" फिर वो बुरी तरह से शरमाते हुए बड़ी मुश्किल से बोली_____"आप यहां क्या कर रहे हैं जीजा जी? जाइए यहां से।"
"म...मैं तो यहां भाभी से मिलने आया था।" मैंने बुरी तरह हकलाने का नाटक किया____"मुझे क्या पता था कि यहां ग़ज़ब का सौंदर्य दर्शन हो जाएगा।"

"हे भगवान! कितने ख़राब हैं आप?" कंचन झल्लाहट में दबी आवाज़ से मानों चीखी____"जाइए आप यहां से। आपको शर्म नहीं आती किसी लड़की को इस तरह देखते हुए?"

"लो कर लो बात।" मैंने पूरी ढिठाई से कहा____"मैं थोड़ी ना नंगा खड़ा हूं जो मुझे शर्म आएगी? शर्म तो आपको आनी चाहिए सरकार जो मुझ जैसे भोले भाले लड़के के सामने अपना ये ख़ूबसूरत बदन दिखा रही हैं।"

"भगवान के लिए चले जाइए यहां से।" कंचन ने इस बार मिन्नतें की____"मुझे आपके सामने इस हालत में बहुत शर्म आ रही है।"
"ठीक है आप कहती हैं तो चला जाता हूं।" मैंने उसको ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा____"वैसे अब मुझसे कुछ छुपाने लायक तो रहा नहीं।"

"हे भगवान! क्या आपने सब देख लिया?" कंचन ने इस तरह कहा जैसे उसके प्राण ही निकल गए हों।
"मैं क्या करता भला?" मैंने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"आप सब कुछ खोले खड़ी थीं तो नज़र पड़ ही गई। अगर मुझे पहले से पता होता तो यहां आंगन में आता ही नहीं बल्कि छुप कर आपके ख़ूबसूरत बदन का जी भर के दीदार करता।"

"हाय राम!" कंचन आश्चर्य से आंखें फाड़ कर बोली____"कितने बेशर्म हैं आप? जा कर दीदी से शिकायत करूंगी आपकी।"
"ज़रूर कीजिएगा सरकार।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा_____"इतना ख़ूबसूरत नज़ारा देखने के बाद तो अब मैं सूली पर भी चढ़ जाऊंगा।"

कंचन का चेहरा शर्म से पानी पानी हुआ जा रहा था। वो कुर्ते को अपने सीने पर ऐसे कस के चिपकाए हुए थी मानो उसे डर हो कि कहीं वो उसके चिकने बदन से फिसल न जाए। अपनी समझ में उसने खुद को उस कुर्ते से पूरा छुपा लिया था जबकि सच तो ये था कि कुर्ते से अपने उभारों को छुपाने के चक्कर में उसकी नाभि से नीचे तक का पूरा हिस्सा बेपर्दा हो गया था। वो क्योंकि मेरी तरफ ही मुड़ कर खड़ी थी इस लिए लालटेन की रोशनी में मुझे मस्त गुदाज़ जांघों के बीच हल्के बालों से घिरी उसकी योनि साफ़ झलकती दिख रही थी। उसे इस बात का ध्यान ही नहीं रह गया था कि उसकी सबसे ज़्यादा अनमोल चीज़ तो मेरे सामने ही बेपर्दा है।

"मुझे और शर्मिंदा मत कीजिए?" कंचन ने बेबस भाव से कहा____"कृपया चले जाइए न यहां से। अगर कोई आ गया तो भारी मुसीबत हो जाएगी।"

"ठीक है जा रहा हूं।" मैंने इस बार थोड़ा संजीदा भाव से कहा____"और हां, आपको शर्मिंदा होने की कोई ज़रूरत नहीं है। इसमें आपकी कोई ग़लती नहीं है। जो कुछ हुआ वो बस इत्तेफ़ाक़ से हुआ है। वैसे एक बात कहूं, आप बिना कपड़ों में बहुत ही ख़ूबसूरत दिखती हैं। ख़ास कर आपकी राजकुमारी।"

इतना कह कर मैं पलटा और तेज़ी से बाहर निकल गया। मैं जानता था कि मेरी आख़िरी बात ने कंचन को बुरी तरह चौंका दिया होगा। वो जब अपने बदन के निचले हिस्से को बेपर्दा देखेगी तो उसका और भी शर्म से बुरा हाल हो जाएगा। अब इस घर में रुकना ठीक नहीं था इस लिए मैं घर से बाहर ही आ गया।

हर तरफ अंधेरा फ़ैल गया था। रागिनी भाभी के घर जाने का मेरा कोई इरादा नहीं था इस लिए मैं उस तरफ चल पड़ा जहां कुछ मिलने की उम्मीद थी। एक मोड़ से मुड़ कर मैं कुछ ही देर में एक घर के पास पहुंच गया। घर के सामने जो खाली जगह थी वहां एक तरफ मवेशी बंधे हुए थे जिनको एक आदमी भूसा डाल रहा था। घर के बाहर दीवार से सट कर ही चबूतरा बना हुआ था जिसमें लालटेन रखी हुई थी। द्वार के सामने कुछ ही दूरी पर एक चारपाई रखी हुई थी। मैं आगे बढ़ा और जा कर उस चारपाई पर बैठ गया।

"कैसे हैं राघव भैया?" मैंने भूसा डाल रहे आदमी को आवाज़ लगाते हुए कहा तो उसने फ़ौरन ही पलट कर मेरी तरफ देखा और मुझ पर नज़र पड़ते ही उसके चेहरे पर चमक उभर आई।

"अरे! वैभव महाराज आप यहां?" वो फ़ौरन ही भूसे की झाल को वहीं छोड़ कर भागता हुआ आया और मेरे पैर छूते हुए बोला____"धन्य भाग हमारे जो आपके दर्शन हो गए।"

"आज दोपहर ही आया हूं।" मैंने कहा____"साले साहब ने संदेशा भेजा था तो भाभी को ले कर आना पड़ा।"
"ये तो बहुत ही अच्छा हुआ जो आप यहां आ गए।" राघव भारी खुश हो गया था, बोला____"क़सम से आंखें तरस गईं थी आपको देखने के लिए।"

राघव सिंह इसी गांव का था और मेरी उससे काफ़ी अच्छी बनती थी। मुझसे उमर में दो तीन साल बड़ा था लेकिन मेरी ही तरह औरतबाज था वो। उससे मेरी इतनी गहरी दोस्ती हो गई थी कि कई बार हमने एक साथ ही एक दो औरतों को पेला था। ख़ैर मेरे कहने पर राघव ने पहले मवेशियों को भूसा डाला उसके बाद वो हाथ पैर धो कर अंदर चला गया। कुछ ही देर में मैंने देखा अंदर से एक लड़की उसके साथ बाहर आई। लड़की के हाथ में एक थाली थी। वो लड़की राघव की बहन जमुना थी। पिछली बार जब मैने उसे देखा था तो वो थोड़ा दुबली पतली थी किंतु अब उसका जिस्म भरा भरा दिख रहा था और उसके सीने के उभार भी अच्छे खासे दिख रहे थे। मुझ पर नज़र पड़ते ही उसने मुस्कुराते हुए नमस्ते किया।

जमुना ने घागरा चोली पहन रखा था इस लिए झुक कर जैसे ही उसने थाली मेरी तरफ बढ़ाई तो चोली के बड़े गले से उसकी आधे से ज़्यादा चूचियां दिखने लगीं। मेरी नज़र मानों उसके गोलों पर ही चिपक गई। जमुना भी समझ गई कि मैं उसकी चूचियों को देख रहा हूं इस लिए उसने मुस्कुराते हुए धीमें से कहा____"पहले थाली का प्रसाद खा लीजिए जीजा जी, उसके बाद अंदर का प्रसाद खाने का सोचिएगा।"

जमुना की बात सुन कर मैं पहले तो हल्के से हड़बड़ाया और फिर मुस्कुराते हुए थाली में रखी कटोरी को उठा लिया। राघव उसके पीछे कुछ ही दूरी पर खड़ा था। मैंने कटोरी लिया तो जमुना सीधी खड़ी हो गई और फिर मुस्कुराते हुए अंदर जाने लगी तो राघव ने उसे लोटा गिलास में पानी लाने को कहा।

जमुना के जाने के बाद राघव चबूतरे में बैठ गया। हम दोनों इधर उधर की बातें करने लगे। कुछ देर में जमुना लोटा गिलास में पानी ले कर आई और राघव से कहा कि भौजी बुला रही हैं। जमुना की बात सुन कर राघव मुझसे अभी आया महाराज बोल कर अंदर चला गया।

"क्या बात है सरकार, आप तो गज़ब का माल लगने लगी हैं।" मैंने जमुना के सीने के उभारों को देखते हुए कहा____"कभी हमें भी चखने का मौका दीजिए।"
"धत्त।" जमुना बड़ी अदा से बोली____"हम ऐसे वैसे नहीं हैं जीजा जी इस लिए होश में रह कर बात कीजिए।"

"आपको देखने के बाद अब हम होश में रहे कहां सरकार?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"आपके इस हुस्न ने तो हमारे अंदर के हर पुर्जे को हिला दिया है।"
"अच्छा जी ऐसा है क्या?" जमुना ने मुस्कुराते हुए कहा____"फिर तो आपके पुर्जों को जल्दी ही ठीक करना पड़ेगा हमें, है ना?"

"ये भी कोई पूछने की बात है क्या?" मैं जमुना की बेबाकी पर मन ही मन हैरान था मगर उसकी मंशा समझते हुए बोला____"अगर आप हमारे पुर्जों को ठीक करेंगी तो ये हमारा सौभाग्य होगा।"

"अगर ऐसी बात है तो ठीक है।" जमुना ने एक बार अंदर की तरफ निगाह डालते हुए कहा____"हम दिशा मैदान के लिए जा रहे हैं। आप भी कुछ देर में नदी तरफ आ जाइएगा। हम वहीं आपके पुर्जों को ठीक करेंगे।"

जमुना अपना निचला होठ दांतों से दबा कर मुस्कुराई और फिर अपनी गोल गोल गांड को मटकाते हुए अंदर चली गई। सच कहूं तो मुझे उससे ऐसी बातों की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। मुझे समझते देर न लगी कि राघव की ये बहन खेली खाई लौंडिया है। काफी समय हो गया था किसी लड़की को पेले हुए तो सोचा चलो यही सही। ज़हन में कंचन और सुषमा का ख़्याल तो आया लेकिन उनकी तरफ से कुछ मिलने की उम्मीद अगर थी भी तो अभी उसमें समय लगना था।

राघव आया तो हम दोनों फिर से बातों में लग गए। कुछ ही देर में जमुना हाथ में एक लोटा लिए बाहर आई और अपने भाई राघव से नज़र बचा कर मुझे आंखों से इशारा करते हुए चली गई। मेरी धड़कनें ये सोच कर थोड़ा तेज़ हो गईं कि ये तो साली सच में ही चुदने को तैयार है। कुछ देर तक मैं राघव से बातें करता रहा और फिर उससे कल मिलने का कह कर मैं उठ कर चल दिया। सड़क पर आ कर मैं रुका और पलट कर राघव की तरफ देखा। वो मेरे जाते ही चारपाई पर लेट गया था। शायद दिन भर की मेहनत से थका हुआ था वो। उसे लेटा देख मैं फ़ौरन ही उस तरफ बढ़ चला जिधर जमुना गई थी।

गांव के उत्तर में एक नदी थी इस लिए मैं तेज़ी से उसी तरफ बढ़ता चला जा रहा था। अंधेरा हो चुका था इस लिए दूर का साफ़ साफ़ दिख नहीं रहा था। शुक्र था कि गगन में आधे से थोड़ा कम चांद था जिसकी वजह से कुछ कुछ दिख रहा था। मन में कई तरह के ख़्याल बुनते हुए मैं जल्दी ही नदी के पास पहुंच गया। आम तौर पर गांव के लोग नदी की तरफ दिन में ही दिशा मैदान के लिए आते थे। आज कल तो वैसे भी खेत खलिहान खाली पड़े थे इस लिए जिसका जहां मन करता था रात के अंधेरे में वहीं हगने बैठ जाते थे। नदी के पास पेड़ पौधे और झाड़ियां थी इस लिए अंधेरे में कोई इस तरफ नहीं आता था।

नदी के पास आ कर मैं जमुना को इधर उधर देखने लगा। सहसा दाएं तरफ से हल्की आवाज़ आई तो मैं उस तरफ बढ़ चला। कुछ ही पलों में एक पेड़ के पीछे खड़ी जमुना मुझे मिल गई। मुझे देख कर वो मुस्कुराई और फिर जाने क्या सोच कर शर्माने लगी। अब क्योंकि हम दोनों ही जानते थे कि हम यहां किस लिए आए थे तो देर करने का सवाल ही नहीं था। मैं तो वैसे भी देर नहीं करना चाहता था।

"तो शुरू करें सरकार?" मैंने उसके कंधों को पकड़ कर उससे कहा तो उसने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा और फिर कहा____"आप हमें ऐसी वैसी समझ रहे होंगे न?"
"उससे क्या फ़र्क पड़ता है?" मैंने उसकी आंखों में देखा।

"नहीं, फ़र्क पड़ता है जीजा जी।" जमुना ने धीमी आवाज़ में कहा____"हम सच में ऐसी वैसी नहीं हैं। पिछली बार जब आपको देखा था तो आप हमें बहुत अच्छे लगे थे। फिर जब आपके बारे में हमें पता चला तो सोचने लगे कि क्या सच में आप ऐसे होंगे? मन में आपको परखने की ख़्वाइश पैदा हो गई थी लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि हम बर्बाद ही हो गए।"

"क्या मतलब?" मैं उसकी आख़िरी बात सुन कर चौंका।
"कुछ महीने पहले हमारी बड़ी दीदी के घर वाले आए थे।" जमुना ने सिर झुकाते हुए कहा____"उन्होंने हमें अपने जाल में फांस लिया और फिर हमारे साथ वो सब कर डाला जो शादी के बाद मिया बीवी करते हैं। हम नादान और नासमझ थे। जीजा जी हमारे लिए नए नए कपड़े लाए थे जिससे हम बहुत खुश थे और उसी खुशी की वजह से हम समझ न पाए कि वो हमारे साथ क्या क्या करते जा रहे थे। उनके छूने से उस वक्त हमें अच्छा लग रहा था और फिर धीरे धीरे बात आगे तक बढ़ती चली गई। उन्होंने हमें एक लड़की से औरत बना दिया। दर्द में हम बहुत रोए थे मगर किसी से कह नहीं सकते थे क्योंकि उन्होंने हमें अच्छी तरह समझाया कि ऐसा करने से हमारी बदनामी तो होगी ही साथ ही कोई हमसे ब्याह भी नहीं करेगा। उसके बाद कुछ समय तक सब ठीक रहा लेकिन एक दिन जीजा जी के यहां से हमारा बुलावा आ गया। असल में दीदी को बच्चा होना था तो वो घर के कामों के लिए हमें भेज देने को बोले थे। राघव भैया हमें उनके यहां भेज आए। वहां जाने के बाद दूसरी रात ही वो हमारे पास आ गए और हमारे साथ वो सब करने लगे तो हमने उन्हें रोका मगर वो कहने लगे कि अगर हमने उन्हें वो सब नहीं करने दिया तो वो सबको बता देंगे। बस अपनी बदनामी के डर से हम भी मजबूर हो गए और उन्होंने उस रात हमारे साथ कई बार वो सब किया। उसके बाद तो जब तक हम दीदी के यहां रहे तब तक वो हमारे साथ वही सब करते रहे। दीदी के यहां से जब हम यहां अपने घर आए तो हमें जल्दी ही महसूस हुआ कि हमें उसकी ज़रूरत है। शायद हम इसके आदि हो गए थे। हमें समझ ना आया कि हम क्या करें? किसी तरह समय गुज़रा। फिर भैया का ब्याह हुआ और भौजी आ गई। हम जानते थे कि बंद कमरे में भैया और भौजी क्या करते हैं। उन्हें चुपके से देखते तो हमारे अंदर और भी वो सब करने की इच्छा बढ़ गई। एक दिन हमने देखा कि गांव का एक लड़का हमें ग़लत इशारे कर रहा था। हम समझ गए कि वो हमसे क्या चाहता है। हमें भी उसी की ज़रूरत थी इस लिए हमने भी उसे मुस्कुरा कर देखा। उसी शाम को यहीं पर उस लड़के से हम मिले और फिर हमारे बीच वो सब हुआ। अब तो आदत पड़ गई है जीजा जी लेकिन यकीन मानिए उस लड़के के अलावा हमने और किसी के साथ ऐसा नहीं किया।"

"छोड़ो इस बात को।" मैंने उसके चेहरे को हथेलियों में ले कर कहा____"जो कुछ तुम्हारे साथ हुआ उसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं थी लेकिन हां ये ग़लती ज़रूर है कि तुम गांव के किसी लड़के के साथ ये सब करती हो। मान लो किसी दिन उस लड़के ने गांव में किसी और को ये सब बता दिया तो क्या होगा? गांव समाज के बीच तुम्हारी और तुम्हारे घर परिवार की इज्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी। इस लिए बेहतर ये है कि फ़ौरन ही ब्याह कर लो। मैं कल ही तुम्हारे भाई राघव से इस बारे में बात करूंगा।"

जमुना मेरी आंखों में देख रही थी। मैंने झुक कर उसके होठों को चूमा और फिर उसके होठों को मुंह में भर कर मज़े से चूसने लगा। जमुना पूरा साथ दे रही थी। मैं चोली के ऊपर से ही उसके ठोस उभारों को मुट्ठी में ले कर मसलने लगा था जिससे उसके मुंह से सिसकारियां निकलने लगीं थी।

मैंने चोली के अंदर हाथ डाला और उसकी एक चूची को पकड़ कर थोड़ा ज़ोर से दबाया तो जमुना सिसकी लेते हुए मचल उठी। वो पूरे जोश में आ चुकी थी और मेरी पीठ पर अपने हाथ चला रही थी। कुछ देर उसके होठों को चूमने चूसने के बाद मैंने उसे घुमा दिया जिससे उसकी पीठ मेरी तरफ आ गई। मैंने जल्दी जल्दी उसकी चोली की डोरी को छोरा और फिर उसे उसके जिस्म से उतार दिया। जमुना अब ऊपर से पूरी तरह नंगी हो गई थी। मैंने पीछे से दोनों हाथ बढ़ा कर उसकी नंगी चूचियों को मुट्ठी में भर कर मसलना शुरू कर दिया। जमुना सिसकियां भरते हुए अपने चूतड़ों को मेरे लंड पर घिसने लगी जिससे मेरा शख़्त लंड और भी बुरी तरह से अकड़ गया।

मैंने जमुना को अपनी तरफ घुमाया और उसकी एक चूची को मुंह में भर लिया। जमुना के मुंह से आनन्द में डूबी सिसकी निकल गई। वो मेरे सिर को अपनी चूची पर दबाने लगी। मैंने अच्छी तरह बारी बारी से उसकी दोनों चूचियों को मुंह में ले कर चूसा और फिर एक हाथ सरका कर घाघरे में डाल दिया। जमुना ने कच्छी पहन रखी थी। उसकी योनि वाला हिस्सा बुरी तरह धधक रहा था। मैंने कच्छी के अंदर हाथ डाल कर उसकी योनि को छुआ तो मेरी उंगली में उसका कामरस लग गया। जमुना पूरी तरह गरम हो गई थी। मैंने बीच वाली उंगली को उसकी योनि के अंदर डाला तो जमुना ने अपनी टांगों को भींच लिया और साथ ही उसके मुख से सिसकी निकल गई। उसने झटके से अपना एक हाथ मेरे हाथ के ऊपर रख लिया और उसे दबाने लगी।

मेरे पास ज़्यादा समय नहीं था इस लिए मैंने फ़ौरन ही अपना पैंट खोला और कच्छे से अपने लंड को निकाल कर जमुना के हाथ में पकड़ा दिया। जमुना को जैसे ही मेरे लंड की लंबाई और मोटाई का अंदाज़ा हुआ तो उसे झटका लगा।

"य...ये तो बहुत बड़ा और मोटा है जीजा जी।" जमुना ने हकलाते हुए कहा____"आह! कितना गरम है ये। मेरी योनि को तो फाड़ ही देगा ये।"

मैं उसकी बात पर मुस्कुराया, उधर जमुना बड़े प्यार से मेरे लंड को सहलाने लगी थी। उसके कोमल हाथों के स्पर्श से मेरा लंड और भी झटके खाने लगा था। जमुना एकदम से नीचे उकड़ू हो कर बैठ गई और मेरे लंड को पकड़ कर अपने चेहरे को आगे कर उसे चूम लिया। मैंने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा। मुझे उम्मीद नहीं थी कि वो ऐसा भी कर सकती है लेकिन फिर याद आया कि शायद उसके जीजा ने उससे ये सब करवाया होगा इस लिए उसे ये सब भी पता था। ख़ैर एक दो बार चूमने के बाद जमुना ने अपना मुंह खोला और मेरे लंड को मुंह में भर लिया। उसके गर्म मुख में मेरा लंड गया तो मेरे समूचे जिस्म में मज़े की लहर दौड़ गई। वो मेरे लंड के सुपाड़े को बड़े अच्छे तरीके से चूस रही थी। पलक झपकते ही मैं मज़े के सातवें आसमान में पहुंच गया।

मैंने जमुना को अपनी कच्छी उतारने को कहा तो उसने खड़े हो कर अपनी कच्छी उतारी। मैंने उसे घुमा दिया जिससे उसकी गांड मेरी तरफ हो गई। उसके बाद मैंने उसे पेड़ का सहारा ले कर झुक जाने को कहा तो वो झुक गई। मैंने उसके घाघरे को उसकी कमर तक चढ़ा कर एक हाथ से अपने लंड को उसकी कामरस बहा रही योनि में टिकाया और अपनी कमर को आगे की तरफ धकेल दिया।

"आह! जीजा जी।" लंड जैसे ही उसकी योनि में घुसा तो उसने आह भरी। मेरा लंड एक तिहाई ही उसकी योनि में घुसा था और फिर अगले ही पल मैंने ज़ोर का धक्का लगा दिया जिससे जमुना के मुख से हल्की दर्द भरी आह निकल गई। उसने पेड़ को दोनों हाथों से थाम लिया था।

जमुना की योनि पहले से ही चुदी हुई थी लेकिन इसके बावजूद मुझे थोड़ा कम खुली हुई महसूस हुई। मैंने जमुना की कमर को दोनों हाथों से पकड़ा और ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाने लगा। जमुना मेरे धक्के लगाने से जल्दी ही गनगना गई। शान्त वातावरण में उसकी मादक सिसकारियां गूंजने लगीं थी। मुझे जमुना को इस तरह झुका कर चोदने में बहुत मज़ा आ रहा था।

"आह! जीजा जी और ज़ोर से चोदिए मुझे।" जमुना आहें भरते हुए बोली____"मैं झड़ने वाली हूं। हाय! कितना मज़ा आ रहा है मुझे। मैं आसमान में उड़ी जा रही हूं जीजा जी। कृपया सम्हालिए मुझे....आह...।"

जमुना झटके खाते हुए झड़ने लगी थी। उसका समूचा बदन कांपने लगा था। उसका गरम गरम कामरस जैसे ही मेरे लंड को भिगोया तो मेरे जिस्म में सनसनी फ़ैल गई। आनंद की लहर ने फ़ौरन ही मुझे चरम पर पहुंचा दिया और इससे पहले कि मैं जमुना की योनि में झड़ जाता मैंने फ़ौरन ही अपने लंड को उसकी योनि से निकाल लिया। उधर जमुना जल्दी से पलटी और बैठ कर मेरे लंड को पकड़ लिया। मेरा लंड उसके कामरस में नहाया हुआ था जिसे जल्दी ही उसने अपने मुंह में भर कर चूसना चाटना शुरू कर दिया। मैंने जमुना के सिर को पकड़ा और उसके मुंह को ही योनि समझ कर धक्के लगाते हुए चोदने लगा। जमुना मेरे इस कार्य से थोड़ा हड़बड़ाई मगर उसने लंड को अपने मुंह से नहीं निकाला। जल्दी ही उसकी चुसाई से मेरा जिस्म झटके खाने लगा और मेरे लंड से वीर्य की धार उसके मुंह में ही छूटने लगी। वीर्य की अंतिम बूंद निकल जाने के बाद ही मैंने जमुना के सिर को छोड़ा और फिर शांत सा पड़ गया। उधर जमुना मेरे वीर्य को मजबूरी में पी जाने के बाद खांसने लगी थी।

"आपने तो जान ही निकाल दी मेरी।" जमुना ने अपनी उखड़ी हुई सांसों को काबू करते हुए कहा____"एक पल को ऐसा लगा जैसे अब तो मर ही गई मैं।"
"क्या करें सरकार?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"आपने चुसाई ही इस तरीके से की कि मैं होश खो बैठा था।"

"सही सुना था आपके बारे में।" जमुना ने कहा____"आप तो सच में कमाल के हैं जीजा जी। मन करता है एक बार और आपसे चुदवा लूं लेकिन घर जाना भी ज़रूरी है। अगर देर हो गई तो आफ़त हो जाएगी।"

हम दोनों ने जल्दी जल्दी अपने बचे हुए कपड़े पहने। जमुना को एक बार और चोदने का मन था मेरा लेकिन उसका घर जाना ज़रूरी था इस लिए उसकी चूचियों को जी भर के मसलने के बाद मैंने उसे जाने दिया। उसके जाने के कुछ देर बाद मैं भी घर की तरफ चल पड़ा। आज काफ़ी समय बाद किसी लड़की को पेलने का मौका मिला था। जमुना को चोदने के बाद मैं काफी खुश था।
 
अध्याय - 57
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अब तक....

"सही सुना था आपके बारे में।" जमुना ने कहा____"आप तो सच में कमाल के हैं जीजा जी। मन करता है एक बार और आपसे चुदवा लूं लेकिन घर जाना भी ज़रूरी है। अगर देर हो गई तो आफ़त हो जाएगी।"

हम दोनों ने जल्दी जल्दी अपने बचे हुए कपड़े पहने। जमुना को एक बार और चोदने का मन था मेरा लेकिन उसका घर जाना ज़रूरी था इस लिए उसकी चूचियों को जी भर के मसलने के बाद मैंने उसे जाने दिया। उसके जाने के कुछ देर बाद मैं भी घर की तरफ चल पड़ा। आज काफ़ी समय बाद किसी लड़की को पेलने का मौका मिला था। जमुना को चोदने के बाद मैं काफी खुश था।


अब आगे....


शाम का अंधेरा फ़ैल चुका था। मणि शंकर की बेटी रूपा अपने पुराने आमों के बाग़ में नित्य क्रिया करने के लिए आई हुई थी। बाग़ से क़रीब दो सौ मीटर की दूरी पर ही उसका घर था। बाग़ के किनारे ही वो बैठ गई थी क्योंकि अंदर घने पेड़ों की वजह से अंधेरा ज़्यादा था और उसे अंदर जाने में डर भी लग रहा था। आम तौर पर वो अपनी बाकी बहनों के साथ ही आती थी लेकिन आज उसे कई बार यहां आना पड़ा था और इसकी वजह ये थी कि उसका पेट ख़राब था। उसके एक तरफ खाली खेत थे जिसके पार उसका घर चांद की हल्की रोशनी में नज़र आ रहा था। वो बैठी ही हुई थी कि सहसा उसे कुछ आवाज़ें सुनाई देने लगीं जिससे रूपा की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसके अंदर ये सोच कर घबराहट भर गई कि कौन हो सकता है? आवाज़ें लगातार आने लगीं थी। ऐसा लगता था जैसे एक से ज़्यादा लोग ज़मीन पर चल रहे हों। बाग़ की ज़मीन पर क्योंकि पेड़ों के सूखे पत्ते पड़े हुए थे इस लिए चलने से आवाज़ हो रही थी। रूपा ने महसूस किया कि चलने की आवाज़ें उससे थोड़ी ही दूरी पर अचानक से बंद हो गईं हैं।

रूपा जो नित्य क्रिया करने के लिए बैठी हुई थी उसका डर के मारे सब कुछ अपनी जगह पर रुक गया। आवाज़ों से साफ़ था कि कई लोग थे इस लिए रूपा को समझ ना आया कि इस वक्त कौन आया होगा यहां? उसने बड़ी सावधानी से पानी के द्वारा शौच किया और अपनी कच्छी को ऊपर सरका कर कुर्ते को नीचे कर लिया। सलवार उसने पहना ही नहीं था, कदाचित इस लिए कि अंधेरे में कौन देखेगा और वैसे भी उसे हगने के लिए अपने बाग़ में ही तो आना था।

खाली हो गए लोटे को उसने उठाया और दबे पांव उस तरफ़ बढ़ी जिस तरफ से आवाज़ें आनी बंद हो गईं थी। उसे डर भी लग रहा था लेकिन उत्सुकतावश वो बड़ी सावधानी से उस तरफ़ बढ़ती ही चली गई। इस बात का उसने ख़ास ख़्याल रखा कि सूखे पत्तों पर पांव रखने से ज़्यादा तेज़ आवाज़ न होने पाए। अभी वो क़रीब पांच सात क़दम ही आगे गई थी कि सहसा उसके कानों में किसी की आवाज़ सुनाई दी। रूपा एक दो क़दम और आगे बढ़ी और एक पेड़ के पीछे छिप गई। पेड़ की ओट से उसने देखा कि उससे क़रीब आठ दस क़दम की दूरी पर अंधेरे में तीन इंसानी साए खड़े थे। तीनों एक दूसरे से दूरी बना कर खड़े हुए थे किंतु तीनों का ही मुंह एक दूसरे की तरफ था। रूपा को समझ ना आया कि वो तीनों कौन हैं और उसके आमों के बाग़ में क्या करने आए हैं?

"मामला हद से ज़्यादा बिगड़ गया है।" उन तीनों में से एक की आवाज़ रूपा के कानों तक पहुंची____"जो सोचा था वो नहीं हुआ बल्कि सब कुछ उल्टा पुल्टा हो गया है।"

पेड़ के पीछे छुपी रूपा एकदम से चौंकी। उसके दिल की धड़कनें एकदम ज़ोरों से चलने लगीं थी। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ, इस लिए उसने फिर से अपने कान खड़े कर आवाज़ को सुनने की कोशिश करने लगी।

"अगर यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हम सबका भेद खुल जाएगा।" एक दूसरे साए की आवाज़ रूपा के कानों में पड़ी____"और हमारी गर्दनें दादा ठाकुर की मुट्ठी में क़ैद हो जाएंगी।"

"मेरा ख़्याल ये है कि अब हमें खुल कर अपने काम को अंजाम देना चाहिए।" तीसरे साए की आवाज़____"और कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे हवेली में रहने वालों का कलेजा दहल जाए।"

"मेरे एक आदमी ने बताया कि दादा ठाकुर ने अपने बेटे वैभव को अपनी बहू के साथ उसके मायके भेज दिया है।" पहले साए की आवाज़____"ये हमारे लिए एक सुनहरा अवसर है दादा ठाकुर के उस सपूत को अपने रास्ते से हटाने का और दादा ठाकुर की कमर को तोड़ देने का भी।"

"ये तो एकदम सही कहा आपने।" तीसरे साए की आवाज़ में खुशी झलक रही थी, बोला____"चंदनपुर में जा कर बड़ी आसानी से उस पर प्राण घातक हमला किया जा सकता है। अगर हमने सच में उस हरामजादे को ख़त्म कर दिया तो समझो दादा ठाकुर गहरे सदमे में चला जाएगा और ये भी सच ही जानिए कि अपने बेटे के मौत के ग़म में वो बुरी तरह से टूट जाएगा। उस सूरत में उसको बर्बाद करना और हवेली को नेस्तनाबूत करना बेहद आसान हो जाएगा।"

"बात तो ठीक है तुम्हारी।" पहले साए की भारी आवाज़____"लेकिन ये मत भूलो कि उस हवेली में जगताप भी है जो दादा ठाकुर से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है। उसके दोनों बेटे तो नकारा और निकम्मे ही हैं लेकिन सुना है कि वैभव का बड़ा भाई भी आज कल अपने छोटे भाई के नक्शे क़दम पर चलने लगा है। कमबख़्त तंत्र मंत्र के प्रभाव से जल्दी मर जाता तो आज कहानी ही अलग होती।"

"जो नहीं हो पाया उसके बारे में हम क्या ही कर सकते हैं।" दूसरे साए ने कहा____"दादा ठाकुर के मन में जगताप के लिए जो शक के बीज हमने डाले थे उसका भी कुछ ख़ास असर नहीं हुआ। लगता है दादा ठाकुर को कुछ ज़्यादा ही अपने भाई पर भरोसा है।"

"किसी पर अगर एक बार शक हो जाए।" पहले वाले साए ने कहा____"तो वो धीरे धीरे भरोसे की जड़ों को खोखला करना शुरू कर देता है। दादा ठाकुर को भले ही अपने भाई पर लाख भरोसा होगा लेकिन मौजूदा समय में जो हालात हैं उससे कहीं न कहीं उसके मन में अपने भाई के बारे में शक तो हो ही गया होगा। अब देखना ये है कि इसका कब और क्या असर दिखता है?"

"हमारे पास इंतज़ार करने का ही तो समय नहीं है।" दूसरे साए ने कहा____"अब तक की अपनी नाकामियों के बाद अब हमें कोई ऐसा क़दम उठाना होगा जिससे हमारे दुश्मन का कलेजा दहल जाए। मैं उसके उस सपोले को अब और ज़्यादा दिनों तक ज़िंदा नहीं देखना चाहता।"

"फ़िक्र मत करो।" पहले साए ने कहा____"अगर हम यहां कामयाब नहीं हुए तो चंदनपुर में उसके उस सपोले को ख़त्म करने में ज़रूर कामयाब होंगे। कल ही मैं अपने कुछ आदमियों को उसका खात्मा करने के लिए चंदनपुर भेजूंगा।"

"मैं भी आपके आदमियों के साथ जाऊंगा।" तीसरे साए ने कहा____"मैं उस हरामजादे को अपने हाथों बद से बदतर मौत देना चाहता हूं। तभी मेरे कलेजे को ठंडक मिलेगी।"

"नहीं, तुम वहां नहीं जाओगे।" पहले साए ने सख़्ती से कहा____"वो बहुत ख़तरनाक लड़का है। अगर ज़रा भी बात बिगड़ गई तो अंजाम अच्छा नहीं हो सकता। इस लिए तुम यहीं रहोगे और उसके बदले दादा ठाकुर के बड़े लड़के का शिकार करोगे। मुझे पूरी उम्मीद है कि उसे तुम बड़ी आसानी से काबू में कर लोगे और उसका राम नाम भी सत्य कर दोगे।"

"ये इतना आसान नहीं है।" दूसरे साए ने कहा____"दादा ठाकुर ने आज कल अपने परिवार के हर सदस्य पर शख़्त निगरानी और पहरा लगा दिया है। जिस दिन गांव वाले रेखा और शीला की मौत का इंसाफ़ मांगने हवेली गए थे और जो कुछ दादा ठाकुर से कहा था उससे दादा ठाकुर तो शान्त है लेकिन उसका भाई जगताप बुरी तरह खार खाया हुआ है। इस लिए मेरी सलाह यही है कि यहां पर अभी किसी पर भी हाथ डालना सही नहीं होगा लेकिन हां चंदनपुर जा कर वैभव को ख़त्म करने का विचार ज़्यादा बेहतर है।"

वैभव को ख़त्म करने वाली बातें सुन कर रूपा का दिमाग़ मानों सुन्न सा पड़ गया था। दिलो दिमाग़ में आंधियां सी चलने लगीं थी। उसके बाद उसे कुछ भी सुनने का होश नहीं रह गया था। उसे पता ही नहीं चला कि कब वो तीनों साए वहां से चले गए। किसी पक्षी की आवाज़ से उसे होश आया तो वो चौंकी और हड़बड़ा कर उसने उस तरफ देखा जहां वो तीनों साए खड़े थे किंतु अब वहां किसी को न देख वो एकदम से घबरा गई। चारो तरफ अंधेरे में उसने निगाह घुमाई मगर कहीं कोई नज़र न आया। बाग़ में हर तरफ सन्नाटा फ़ैला हुआ था।

रूपा पलट कर वहां से दबे पांव चल पड़ी। खेतों में बनी पगडंडी पर आ कर वो तेज़ क़दमों से अपने घर की तरफ बढ़ चली थी। पहले वाले साए की आवाज़ अभी भी उसके कानों में गूंज रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा भी कुछ हो सकता है। उसके दिल में जहां एक तरफ हल्का दर्द सा जाग उठा था वहीं दूसरी तरफ ज़हन में एक द्वंद सा भी छिड़ गया था।

✮✮✮✮

धनंजय नाम का दरोगा अपने कमरे में रखी चारपाई पर बैठा गहरी सोच में डूबा हुआ था। उसे ये सोच कर पछतावा हो रहा था कि उसने दादा ठाकुर को अपनी मां के अपहरण हो जाने की बात बता दी थी जोकि उसे किसी भी कीमत पर नहीं बताना चाहिए था। ऐसे में अगर उस सफ़ेदपोश ने गुस्से में आ कर उसकी मां के साथ बुरा कर दिया तो वो खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाएगा। धनंजय को समझ नहीं आ रहा था कि अब वो क्या करे? अभी वो ये सब सोच ही रहा था कि तभी बाहर हुई अजीब सी आवाज़ और आहट से वो चौंका। ज़हन में बिजली की तरह ख़्याल उभरा कि क्या सफ़ेदपोश आया होगा? ये सोच कर वो फ़ौरन ही चारपाई से उठा और तेज़ी से दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

दरवाज़ा खोल कर उसने बाहर देखा। बाहर अंधेरा था किंतु चांद की हल्की रोशनी भी थी जिससे धुंधला धुंधला दिख रहा था। धनंजय ने इधर उधर नज़र घुमाई और फिर एकदम से उसकी निगाह एक जगह पर ठहर गई। बाएं तरफ कुछ ही दूरी पर उसे कुछ पड़ा हुआ नज़र आया। एक अंजानी आशंका से धनंजय की धड़कनें तेज़ हो गईं। वो फ़ौरन ही उस तरफ बढ़ा। कुछ पलों में जब वो उस पड़ी हुई चीज़ के पास पहुंचा तो देखा कोई औरत औंधे मुंह ज़मीन पर पड़ी हुई थी।

धनंजय के आशंकित ज़हन में बिजली की तरह सवाल उभरा कहीं ये उसकी मां तो नहीं? उसने झट से उस औरत को पलटा और जैसे ही नज़र औरत के चेहरे पर पड़ी तो उसके सिर पर एक झटके में आसमान गिर पड़ा। वो उसकी मां ही थी। धनंजय एकदम पागलों की तरह अपनी मां को हिलाते डुलाते हुए आवाज़ लगाने लगा लेकिन उसकी मां के द्वारा उसे कोई प्रतिक्रिया होती महसूस नहीं हुई। उसने जल्दी से नब्ज़ टटोली और अगले कुछ ही पलों में उसे ये जान कर ज़बरदस्त झटका लगा कि उसकी मां की नब्ज़ का कहीं पता नहीं है। दरोगा एकदम से बौखला गया, वो कभी अपनी मां की नब्ज़ को टटोलता तो कभी उसकी धड़कनें सुनने की कोशिश करता। जल्द ही उसे पता चल गया कि उसकी मां अब इस दुनिया में नहीं है। धनंजय का जी चाहा कि वो पूरी शक्ति से दहाड़ें मार कर रोना शुरू कर दे। आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी। अपनी मां के बेजान जिस्म से लिपट कर वो फूट फूट कर रो पड़ा।

जाने कितनी ही देर तक धनंजय अपनी मां को सीने से लगाए रोता रहा और उससे कहता रहा कि वो उसे छोड़ कर न जाए लेकिन दुनिया से जाने वाला भला कहां उसे कोई जवाब देता? दिलो दिमाग़ में आंधियां चल रहीं थी। तभी एक तरफ उसे किसी चीज़ की आहट सुनाई दी तो उसने गर्दन घुमा कर उस तरफ देखा। उसके मकान के पास ही अंधेरे में सफ़ेदपोश खड़ा था। धनंजय उसे देख कर पहले तो हड़बड़ाया किंतु अगले ही पल गुस्से से आग बबूला हो गया। अपनी मां को ज़मीन पर लेटा कर वो एक झटके से खड़ा हुआ और फिर किसी आंधी तूफ़ान की तरह उस सफ़ेदपोश की तरफ लपका। सफ़ेदपोश को शायद उससे ऐसे किसी कृत्य की उम्मीद नहीं थी इस लिए इससे पहले कि वो सम्हल पाता धनंजय उस पर जंप लगा कर उसे लिए ज़मीन पर गिरा। सफ़ेदपोश के सीने में सवार हो कर उसने दोनों हाथों से उसकी गर्दन को दबोच लिया।

"हरामजादे तूने मेरी मां को जान से ही मार डाला।" धनंजय गुस्से में मानों चीखते हुए बोला____"अब मैं तुझे भी जान से मार दूंगा।"

सफ़ेदपोश बुरी तरह छटपटाते हुए उससे अपनी गर्दन छुड़ाने का प्रयास कर रहा था लेकिन धनंजय की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वो उसके हाथों को हिला भी नहीं पा रहा था। प्रतिपल उसकी सांसें लुप्त होती जा रहीं थी। सफ़ेद नक़ाब में छुपा उसका चेहरा पसीने से तरबतर हो गया था। नक़ाब से झांकती उसकी आंखें बाहर को निकली आ रहीं थी।

"आज मैं तुझे ज़िंदा नहीं छोडूंगा कमीने।" धनंजय गुस्से में पगलाया हुआ गुर्राया____"तूने मेरी मां की जान ले कर अच्छा नहीं किया है। तुझे इसका हिसाब अपनी जान दे कर ही चुकाना होगा। बहुत खेल खेल रहा था न तू, अब तेरा किस्सा ही ख़त्म कर दूंगा मैं।"

दरोगा प्रतिपल अपना दबाव उसकी गर्दन पर बढ़ाता जा रहा था और उधर सफ़ेदपोश को सांस लेने में मुश्किल होने लगी थी। उसका दम घुटने लगा था, जिसकी वजह से वो बुरी तरह अपने हाथ पांव पटक रहा था। तभी सहसा चमत्कार हुआ। वातावरण में दरोगा की घुटी घुटी सी चीख गूंजी और उसका जिस्म हवा में लहराते हुए दूर जा कर गिरा। वो जल्दी ही सम्हल कर उठा तो देखा नीम अंधेरे में उसे काला नकाबपोश नज़र आया। वो समझ गया कि उसी ने अपने पांव की ठोकर से उसे दूर उछाला था। सफ़ेदपोश अब तक खड़ा हो चुका था और बुरी तरह खांस रहा था।

काले नकाबपोश को देख कर धनंजय का गुस्सा और भी बढ़ गया। वो तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ा किंतु जल्दी ही उसे ठिठक जाना पड़ा क्योंकि काले नकाबपोश के हाथ में एकदम से उसे लट्ठ नज़र आ गया था। लट्ठ को देख कर धनंजय कुछ पलों के लिए ही रुका था लेकिन अगले ही पल वो फिर से उसकी तरफ तेज़ क़दमों से बढ़ चला।

"अगर अपनी बहन को भी अपनी मां की तरह बेजान लाश के रूप में देखना चाहता है तो बेशक आ कर मुझसे मुकाबला कर।" काले नकाबपोश ने शख़्त भाव से कहा तो दरोगा एकदम से अपनी जगह पर रुक गया।

"अगर मेरी बहन को तुम दोनों ने हाथ भी लगाया तो ये तुम दोनों के लिए अच्छा नहीं होगा।" धनंजय ने गुस्से से गुर्राते हुए कहा____"अगर असली मर्द की औलाद है तो मर्द की तरह अपने दम पर मुझसे मुकाबला कर।"

"अच्छा ऐसा है क्या?" काले नकाबपोश ने इस बार अजीब भाव से कहा____"लगता है दो दो हाथ करने के लिए कुछ ज़्यादा ही मरे जा रहे हो तुम।" काले नकाबपोश ने कहने के साथ ही सहसा सफेदपोश की तरफ देखा____"आपका हुकुम हो तो इसकी ख़्वाइश पूरी कर दूं?"

सफ़ेदपोश ने उसे सिर हिला कर इजाज़त दे दी। इजाज़त मिलते ही काले नकाबपोश ने लट्ठ को एक तरफ रखा और फिर दरोगा को मुकाबला करने का इशारा किया। दरोगा उसका इशारा पा कर गुस्से में तिलमिला उठा। वो तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ा। इससे पहले कि वो उस नकाबपोश पर कोई प्रहार कर पाता काले नकाबपोश ने झुक कर उसे दोनों हाथों से सिर से ऊपर तक उठा लिया और कच्ची ज़मीन पर पूरी ताक़त से पटक दिया। वातावरण में दरोगा की दर्द में डूबी चीख गूंज उठी। ज़मीन पर शायद छोटे छोटे कुछ पत्थर पड़े हुए थे जो उसके गिरते ही उसकी पीठ पर गड़ गए थे और उसे भारी दर्द हुआ था। वो दर्द को बर्दास्त करते हुए जल्दी ही उठा लेकिन तभी उसकी पीठ पर काले नकाबपोश की लात का ज़ोरदार प्रहार हुआ जिसके चलते वो एक बार फिर से ज़मीन की धूल को चाटता नज़र आया।

उसके बाद तो दरोगा को सम्हलने तक का मौका न मिला। काला नकाबपोश लात घूंसों से उसको मारता ही चला गया और फिज़ा में दरोगा की दर्द में डूबी चीखें ही गूंजती रही। उसकी नाक और मुंह से खून निकलने लगा था। पूरा जिस्म पके हुए फोड़े की तरह दर्द करने लगा था। उसमें अब कुछ भी करने की हिम्मत न रह गई थी।

"रुक जाओ।" सहसा सफ़ेदपोश की अजीब सी आवाज़ गूंजी____"इतना काफ़ी है इसे ये समझने के लिए कि तुम असली मर्द ही हो जो अपने दम पर इससे बखूबी मुकाबला कर सकता है।"

सफ़ेदपोश के कहने पर काला नकाबपोश रुक गया। सफ़ेदपोश चल कर दरोगा के पास आया। दरोगा ज़मीन में पड़ा हुआ था इस लिए वो उसके समीप ही ज़मीन पर उकडू हो कर बैठा और फिर अपनी अजीब सी आवाज़ में बोला____"अपनी मां की मौत के तुम खुद ज़िम्मेदार हो दरोगा। हमने तुम्हें दादा ठाकुर से सच बताने से मना किया था लेकिन फिर भी तुमने उसे सब कुछ बता दिया। इसका अंजाम तो तुम्हें अपनी मां की मौत के रूप में भुगतना ही था। ख़ैर, अब अगर तुम चाहते हो कि तुम्हारी बहन सही सलामत रहे तो यहां से गधे के सींग की तरह गायब हो जाओ।"

सफ़ेदपोश की ये बात सुन कर दरोगा कुछ न बोला। दर्द को सहते हुए वो बस गहरी गहरी सांसें ले रहा था। इधर सफ़ेदपोश कुछ पलों तक उसे देखता रहा और फिर बोला_____"अगर दादा ठाकुर दुबारा तुमसे मिलने आए तो उससे यही कहना कि तुम्हारी मां तुम्हें सही सलामत मिल गई है और अब तुम यहां से इस मामले से खुद को अलग कर के जा रहे हो। अपनी मां की लाश को या तो कहीं दफना दो या फिर रातों रात इसे ले कर शहर चले जाओ और वहीं उसका अंतिम संस्कार कर देना। अगर हमें पता चला कि इसके बावजूद तुम इस मामले में दिलचस्पी ले रहे हो तो इसके अंजाम में जो होगा उसके ज़िम्मेदार तुम खुद ही होगे।"

सफ़ेदपोश इतना कहने बाद उठा और काले नकाबपोश को कुछ इशारा कर एक तरफ को बढ़ गया। जल्दी ही वो दोनों नीम अंधेरे में कहीं गायब हो गए। ज़मीन पर पड़ा दरोगा कुछ देर तक इस सबके बारे में सोचता रहा और फिर किसी तरह उठ कर अपनी मां की लाश के पास आया। मां की बेजान लाश को देख कर सहसा उसकी आंखें फिर से छलक पड़ीं। उसने फिर से मां को अपने सीने से लगा लिया और फूट फूट कर रोने लगा।

✮✮✮✮

शेरा काफी देर से सफ़ेदपोश और काले नकाबपोश का पीछा कर रह था। इस वक्त वो सादे कपड़ों में तो था लेकिन उसके कपड़े ऐसे बिलकुल भी नहीं थे कि रात के हल्के अंधेरे में आसानी से किसी की नज़र उस पर पड़ जाए। हथियार के नाम पर उसके हाथ में एक बड़ा सा लट्ठ था। धनंजय दरोगा के मकान के बाहर जो कुछ हुआ था उसे उसने अपनी आंखों से देखा था। उसके बाद जब दोनों नकाबपोश वहां से चल दिए तो वो भी उनके पीछे लग गया था। पीछा करते हुए वो दादा ठाकुर के बाग़ में आ गया था। बाग में घने पेड़ पौधे थे जिसकी वजह से वहां पर अंधेरा ज़्यादा था। फिर भी वो एक निश्चित फांसला बना कर उन दोनों के पीछे लगा हुआ था। सहसा उसने देखा दोनों नकाबपोश अलग अलग दिशा में मुड़ कर चल दिए।

शेरा को समझ ना आया कि सबसे पहले वो किसके पीछे जाए। वो जानता था कि सफ़ेदपोश इसके पहले भी एक बार उसकी आंखों के सामने से गायब हो चुका था और यही हाल काले नकाबपोश का भी हुआ था। नकाबपोश का उसने दो तीन बार पीछा किया था लेकिन पता नहीं कैसे वो उसे चकमा दे जाता था या फिर उसकी आंखों से ओझल हो जाता था?

शेरा ने फ़ौरन ही फ़ैसला किया और सफ़ेदपोश के पीछे लग गया। आज वो हर हाल में उसे पकड़ लेना चाहता था। उसने देखा था कि दरोगा ने बड़ी आसानी से उसे दबोच लिया था। ज़ाहिर था कि सफ़ेदपोश कोई ऐसा आदमी था जो काले नकाबपोश से कम ताक़तवर और लड़ने के दांव पेंच जानता था। शेरा ने देखा सफ़ेदपोश बाग़ के अंदर की तरफ तेज़ी से बढ़ा चला जा रहा था। कभी कभी वो किसी न किसी पेड़ की ओट में हो जाता था जिसकी वजह से वो उसे दिखाई देना बंद हो जाता था। सहसा वो शेरा की आंखों से ओझल हो गया।

शेरा ने साफ़ देखा था कि वो एक पेड़ की ओट में हुआ था और फिर उसके बाद वो उसे दुबारा नज़र नहीं आया। शेरा एकदम से बौखला गया और तेज़ी से आगे बढ़ते हुए उस पेड़ के पास पहुंचा लेकिन सफ़ेदपोश उसे दूर दूर तक कहीं नज़र न आया। शेरा को बड़ी हैरानी हुई कि आख़िर वो अचानक से गायब कैसे हो गया? क्या वो कोई जादू जानता था या फिर वो कोई भूत था जो एकदम से गायब हो गया? शेरा ने काफी देर तक आस पास का मुआयना किया लेकिन सफ़ेदपोश की कहीं झलक तक न मिली उसे। हताश हो कर वो वापस उस दिशा की तरफ तेज़ी से बढ़ चला जिधर काला नकाबपोश गया था।

कुछ ही देर में शेरा बाग़ से निकल कर उस जगह पर आ गया जहां दादा ठाकुर का बाग़ वाला मकान बना हुआ था। शेरा के ज़हन में ख़्याल उभरा कि क्या काला नकाबपोश इस मकान में आया होगा? क्या वो रात के अंधेरे में इस मकान में ही छुपता होगा? उसे याद आया कि पिछली बार उससे यहीं पर उसका सामना हुआ था और फिर अचानक से वो बाग़ की तरफ भाग गया था। उसके बाद कुछ ही देर में उसे बाग़ के अंदर किसी नारी की चीख सुनाई दी थी। जब उसने वहां जा कर देखा था तो वैभव किसी औरत के पास बैठा था। शीला नाम की औरत को उस काले नकाबपोश ने गला रेत कर मार डाला था।

शेरा ने ये सब सोच कर पूरी सतर्कता से मकान की छानबीन करने का सोचा। पहले उसने मकान के चारो तरफ का अच्छे से मुआयना किया, उसके बाद वो मकान के मुख्य दरवाज़े पर आया तो देखा दरवाज़े की कुंडी खुली हुई थी। शेरा समझ गया कि काला नकाबपोश अंदर ही गया होगा। उसने बड़ी सावधानी से दरवाज़े को अंदर की तरफ धकेला। दरवाज़ा आधा खोल कर उसने अंदर देखा, अंदर सियाह अंधेरा था।

शेरा अंदर दाखिल हुआ और ख़ामोशी से बारीक से बारीक आहट या आवाज़ को सुनने की कोशिश करने लगा मगर काफी देर की कोशिश में भी उसे कोई आहट अथवा आवाज़ सुनाई नहीं दी। उसने पलट कर दरवाज़ा बंद किया और फिर अपने काले कुर्ते की जेब से माचिस निकाल कर उसे जलाया। माचिस की तीली जैसे ही जली तो हर तरफ रोशनी फेल गई। उस रोशनी में उसे आस पास कोई नज़र ना आया। हाथ में जलती तीली लिए वो आगे बढ़ा और एक कमरे के पास पहुंचा। तीली जल कर बुझने लगी तो उसने फ़ौरन ही उसे फेंक कर दूसरी तीली जलाई और कमरे का दरवाज़ा खोल कर अंदर देखा। कमरे में कुछ समान के अलावा कुछ न दिखा उसे। उसने कई तीलियां जला जला कर सभी कमरों में देखा मगर उसे काला नकाबपोश कहीं नज़र ना आया। उसे समझ ना आया कि अगर नकाबपोश यहां नहीं आया तो गया कहां?

शेरा मकान से बाहर आ कर सोचने लगा कि अब वो उस काले नकाबपोश को कहां खोजे? सहसा उसे कुछ याद आया तो वो मकान के पीछे की तरफ बढ़ चला। जल्दी ही वो मकान के पिछले हिस्से में पहुंच गया। मकान के पिछले हिस्से में ट्रैक्टर की एक पुरानी और टूटी हुई ट्रॉली खड़ी हुई थी जिसके दोनों पहिए ज़मीन पर क़रीब आधा फुट धंसे हुए थे। ट्राली खस्ता हालत में थी और उसका उपयोग कई सालों से नहीं हुआ था। उसकी ऊपर की दीवारें जंग लगने से कुछ टूटी हुई भी थीं। शेरा ने धड़कते दिल से ट्राली में देखने का सोच कर अपने हाथ को ट्राली की दीवार पर रखा और अपना एक पैर ट्राली के पहिए पर रख कर उस पर चढ़ कर खड़ा हो गया।

अभी वो ट्राली के अंदर देखने ही वाला था कि अचानक उसके जबड़े पर किसी का ज़बरदस्त घूंसा पड़ा जिससे दर्द से चीखते हुए वो नीचे कच्ची ज़मीन पर जा गिरा। पीठ के बल गिरने से उसे दर्द तो हुआ लेकिन वो फ़ौरन ही उठा। तभी ट्राली से उसके पास ही कोई कूद कर आया। उसने फ़ौरन ही पास पड़े अपने लट्ठ को उठाया और नज़र उठा कर देखा। उससे क़रीब चार क़दम की दूरी पर काला नकाबपोश हाथ में लट्ठ लिए खड़ा था।

"कौन हो तुम?" काला नकाबपोश गुर्राया____"और यहां मरने के लिए क्यों आए हो?"
"कमाल है दोस्त।" शेरा ने मुस्कुरा कर कहा____"अपनी बिरादरी वाले को ही नहीं पहचान पाए तुम?"

"क्या मतलब??" काला नकाबपोश उसकी बात सुन कर चौंका।
"तुम्हारी तरह इस वक्त अगर मैं भी काले नक़ाब में होता।" शेरा ने कहा____"तो शायद तुम्हें मुझको पहचानने में देर न लगती।"

"अच्छा तो तुम वही हो?" काला नकाबपोश हैरानी भरे भाव से बोला____"जिससे मेरा पहले कई बार आमना सामना हो चुका है।"
"हां, और हर बार तुम मुझे अपनी पीठ दिखा कर भाग खड़े हुए हो।" शेरा ने मुस्कुराते हुए कहा____"ऐसा शायद इस लिए कि तुम मेरा सामना कर पाने में खुद को कमज़ोर समझते हो।"

"बहुत बड़ी ग़लतफहमी के शिकार हो तुम।" काले नकाबपोश ने शख़्त भाव से उसे घूरते हुए कहा____"जो ये समझते हो कि मैं तुम्हारा सामना करने से कतराता हूं और तुम्हें पीठ दिखा कर भाग जाता हूं।"

"तो फिर देर किस बात की दोस्त?" शेरा ने गहरी मुस्कान के साथ कहा____"अगर सच में तुम मेरा सामना करने की कूवत रखते हो तो इस बार तरीके से मुकाबला हो ही जाए। शायद मुझे भी पता चल जाए कि तुम्हारे बारे में मेरे ख़्याल सही हैं या फिर मेरा ऐसा सोचना महज एक भ्रम है।"

नीम अंधेरे में काले नकाबपोश के होठों पर मुस्कान उभर आई, बोला____"अगर तुम्हें मरने का कुछ ज़्यादा ही शौक चढ़ गया है तो आज तुम्हें विधाता भी मुझसे नहीं बचा सकेगा। अभी तक तो मैं तुम्हें इस लिए छोड़ कर चला जाता था क्योंकि मेरा मकसद तुम्हें मारना नहीं बल्कि कुछ और ही होता था।"

कहने के साथ ही काला नकाबपोश हमला करने के लिए तैयार होता नज़र आया। शेरा उससे कई बार मुकाबला कर चुका था इस लिए उसे अच्छी तरह पता था कि वो किसी भी मामले में उससे कमज़ोर नहीं है। जल्दी ही दोनों आमने सामने लट्ठ लिए भिड़ने को तैयार हो गए।

काले नकाबपोश ने लट्ठ को तेज़ी से घुमा कर शेरा पर वार किया किंतु शेरा पहले से ही उसके किसी भी हमले के लिए तैयार था इस लिए फौरन ही लट्ठ से उसके वार को रोका और उसी पल उसने अपनी दाहिनी लात चला दी। लात का ज़बरदस्त प्रहार काले नकाबपोश के पेट में लगा जिससे उसके हलक से हिचकी सी निकली और वो दर्द से झुक गया। उधर वो जैसे ही झुका शेरा ने लट्ठ का वार उसकी पीठ पर किया। प्रहार तेज़ था जिसके चलते काला नकाबपोश चीखते हुए भरभरा कर मुंह के बल ज़मीन पर गिरा। इससे पहले कि वो संभल पाता शेरा ने उसकी पीठ पर पूरी ताक़त से लात जमा दी। वातावरण में काले नकाबपोश की घुटी घुटी चीख गूंज उठी। शेरा ने उसे सम्हलने का मौका नहीं दिया और लात घूंसों की बरसात कर दी उस पर।

काले नकाबपोश के हाथ में सहसा शेरा की टांग आ गई जिसे पकड़ कर उसने पूरी ताक़त से उछाल दिया। शेरा उछलते हुए दूर ज़मीन पर गिरा। इधर काला नकाबपोश फ़ौरन लट्ठ ले कर उठा। इससे पहले कि शेरा सम्हल पाता उसने अपनी टांग चला दी जो शेरा के पेट के बगल से लगी। शेरा बुरी तरह दर्द से बिलबिला उठा। बात अगर सिर्फ़ इतनी ही होती तो शायद वो सम्हल भी जाता लेकिन काला नकाबपोश रुका ही नहीं बल्कि एक के बाद एक लातों का वार शेरा के पेट और छाती पर करता ही चला गया। कुछ देर पहले यही हाल शेरा कर रहा था और काला नकाबपोश दर्द से बिलबिला रहा था। शेरा ने सहसा काले नकाबपोश का पांव पकड़ लिया और उसके जैसे ही उसे उछाल कर दूर गिरा दिया। पेट और छाती में उसे बड़ा तेज़ दर्द हो रहा था जिसे सहते हुए वो तेज़ी से उठा। पास ही पड़े लट्ठ को ले कर वो तेज़ी से काले नकाबपोश के पास पहुंचा।

काला नकाबपोश सम्हल कर खड़ा हो चुका था। शेरा ने जैसे ही लट्ठ का वॉर किया उसने अपने लट्ठ से उसके वार को रोका। उसके बाद वातावरण में लट्ठ के टकराने की आवाज़ें गूंजनें लगीं। दोनों बड़ी दक्षता से एक दूसरे पर वार करते जा रहे थे और उसी दक्षता से एक दूसरे का वार रोकते भी जा रहे थे। अचानक शेरा की लट्ठ बीच से टूट गई और साथ ही काले नकाबपोश का अगला वार उसके बाजू में लगा। शेरा दर्द से बिलबिलाया किंतु जल्द ही सम्हला। काले नकाबपोश ने घुमा कर लट्ठ कर वार शेरा के सिर पर किया। शुक्र था शेरा ने ऐन वक्त पर देख लिया था वर्ना उसकी खोपड़ी लट्ठ लगने से निश्चित ही फूट जाती। शेरा ने झुक कर उसके वार को रोका और साथ ही एक लात काले नकाबपोश की कमर पर लगा दी जिससे नकाबपोश लहरा कर ज़मीन पर गिर गया। उसके हाथ से लट्ठ निकल गया था। शेरा ने उछल कर अपनी कोहनी का वार नकाबपोश की छाती पर किया जिससे नकाबपोश की चीख निकल गई। एकदम से उसकी आंखों के सामने अंधेरा सा छा गया। शेरा ने उसे सम्हलने का मौका नहीं दिया। उसने काले नकाबपोश का दाहिना हाथ पकड़ा और पूरी ताक़त से उल्टा कर के अपनी तरफ खींच लिया। फिज़ा में कड़कड़ की आवाज़ हुई और साथ ही नकाबपोश की दर्दनाक चीख भी गूंज उठी। शेरा ने उसका दाहिना हाथ तोड़ दिया था।

काला नकाबपोश ज़मीन पर पड़ा दर्द से छटपटा रहा था। अपने टूटे हाथ को दूसरे हाथ से पकड़े वो तड़प रहा था। ये देख शेरा ने उसका कालर पकड़ा और गुर्राते हुए कहा____"मैं चाहूं तो इसी वक्त तेरी जीवन लीला समाप्त कर दूं लेकिन तुझे ज़िंदा रहना होगा और फिर बताना होगा कि जिस सफ़ेदपोश के इशारे पर तू ये सब कर रहा है वो असल में है कौन?"

"मुझसे कुछ नहीं जान पाओगे तुम।" काले नकाबपोश ने दर्द से कराहते हुए कहा____"क्योंकि मुझे उसके बारे में कुछ भी पता नहीं है। मैंने उसका चेहरा कभी नहीं देखा।"

"इसके बावजूद तुझे उसके बारे में बहुत कुछ पता है।" शेरा ने कहा____"तेरे द्वारा ही उसे पकडूंगा मैं।"
"मेरा मुकाबला तो कर लिया तुमने।" काले नकाबपोश ने दर्द में भी मुस्कुरा कर कहा____"लेकिन उसका मुकाबला नहीं कर पाओगे। वो तुम जैसों को एक पल में धूल में मिला देने की क्षमता रखता है।"

"हां देखा है मैंने।" शेरा ने कहा____"कुछ देर पहले अपनी आंखों से देखा था कि कैसे उस दरोगा ने उसे दबोच रखा था और वो उससे खुद को छुड़ाने के लिए छटपटा रहा था। अगर तूने दरोगा को ठोकर नहीं मारी होती तो जल्द ही तेरे उस सफ़ेदपोश का काम तमाम हो जाना था।"

"अच्छा तो तुमने वो सब देखा है?" काला नकाबपोश बुरी तरह चौंका था फिर बोला____"ख़ैर उस वक्त तो मैं भी उसको उस हालत में देख कर आश्चर्य चकित हुआ था लेकिन फिर मुझे याद आया कि वो वही था जिसने पहली मुलाक़ात में मुझे बड़ी आसानी से हरा दिया था। उसके बाद ही मैंने उसके लिए काम करना मंजूर किया था।"

शेरा को लगा काला नकाबपोश बेवजह ही सफ़ेदपोश का गुणगान कर रहा है इस लिए समय को बर्बाद न करते हुए उसने उसकी कनपटी के ख़ास हिस्से पर वार किया जिसका नतीजा ये हुआ कि काला नकाबपोश जल्द ही बेहोशी की गर्त में डूबता चला गया। उसके बाद शेरा ने उसे उठा कर कंधे पर लादा और एक तरफ को बढ़ता चला गया।
 
अध्याय - 58
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अब तक....

शेरा को लगा काला नकाबपोश बेवजह ही सफ़ेदपोश का गुणगान कर रहा है इस लिए समय को बर्बाद न करते हुए उसने उसकी कनपटी के ख़ास हिस्से पर वार किया जिसका नतीजा ये हुआ कि काला नकाबपोश जल्द ही बेहोशी की गर्त में डूबता चला गया। उसके बाद शेरा ने उसे उठा कर कंधे पर लादा और एक तरफ को बढ़ता चला गया।

अब आगे....

रूपा अपने कमरे में पलंग पर लेटी गहरी सोच में डूबी हुई थी। बार बार उसके कानों में बाग़ में मौजूद उस पहले साए की बातें गूंज उठती थीं जिसकी वजह से वो गहन सोच के साथ साथ गहन चिंता में भी पड़ गई थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिस आवाज़ को उसने सुना था वो उसका कोई अपना था। वो अच्छी तरह जान गई थी कि वो आवाज़ किसकी थी लेकिन उसने जो कुछ कहा था उस पर उसे यकीन नहीं हो रहा था। उसे तो अब यही लगता था कि दादा ठाकुर से हमारे रिश्ते अच्छे हो गए हैं और इस वजह से वो वैभव के सपने फिर से देखने लगी थी। वो वैभव से बेहद प्रेम करती थी और इसका सबूत यही था कि उसने अपना सब कुछ वैभव को सौंप दिया था।

रूपा को पता चल गया था कि उसके प्रियतम वैभव की जान को ख़तरा है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो अपने प्रियतम की जान को कैसे महफूज़ करे? उसका बस चलता तो वो इसी वक्त चंदनपुर जा कर वैभव को इस बारे में सब कुछ बता देती और उससे कहती कि वो अपनी सुरक्षा का हर तरह से ख़्याल करे। सहसा उसे वैभव की वो बातें याद आईं जो उसने पिछली मुलाक़ात में उससे मंदिर में कही थीं। उस वक्त रूपा को उसकी बातों पर ज़रा भी यकीन नहीं हुआ था और यही वजह थी कि उसने कभी ये जानने और समझने की कोशिश नहीं की थी कि उसके घर वाले संबंध सुधार लेने के बाद भी दादा ठाकुर और उनके परिवार के बारे में कैसे ख़्याल रखते हैं? आज जब उसने बाग़ में वो सब सुना तो जैसे उसके पैरों तले से ज़मीन ही खिसक गई थी। वो सोचने पर मजबूर हो गई कि क्या सच में उसके घर वाले कुत्ते की दुम ही हैं जो कभी सीधे नहीं हो सकते?

जब से दोनों खानदान के बीच संबंधों में सुधार हुआ था तब से वो वैभव के साथ अपने जीवन के हसीन सपने देखने लगी थी। वो जानती थी कि उसकी तरह वैभव के दिल में उसके प्रति प्रेम के जज़्बात नहीं हैं लेकिन वो ये भी जानती थी कि बाकी लड़कियों की तरह वैभव उसके बारे में नहीं सोचता। अगर वो उसे प्रेम नहीं करता है तो उसे बाकी लड़कियों की तरह अपनी हवस मिटाने का साधन भी नहीं समझता है। कहने का मतलब ये कि कहीं न कहीं वैभव के दिल में उसके प्रति एक सम्मान की भावना ज़रूर है।

अभी रूपा ये सब सोच ही रही थी कि सहसा उसे किसी के आने का आभास हुआ। वो फ़ौरन ही पलंग पर सीधा लेट गई और अपने चेहरे के भावों को छुपाने का प्रयास करने लगी। कुछ ही पलों में उसके कमरे में उसकी एकमात्र भाभी कुमुद दाखिल हुई। कुमुद उसके ताऊ मणि शंकर की बहू और चंद्रभान की बीवी थी।

"अब कैसी तबियत है मेरी प्यारी ननदरानी की?" कुमुद ने पलंग के किनारे बैठ कर उससे मुस्कुरा कर पूछा____"चूर्ण का कोई फ़ायदा हुआ कि नहीं?"
"अभी तो एक बार दिशा मैदान हो के आई हूं भौजी।" रूपा ने कहा____"देखती हूं अब क्या समझ में आता है।"

"फ़िक्र मत करो।" कुमुद ने रूपा के हाथ को अपने हाथ में ले कर कहा____"चूर्ण का ज़रूर फ़ायदा होगा और मुझे यकीन है अब तुम्हें शौच के लिए नहीं जाना पड़ेगा।"

"यही बेहतर होगा भौजी।" रूपा ने कहा____"वरना रात में आपको भी मेरे साथ तकलीफ़ उठानी पड़ जाएगी। अगर ऐसा हुआ तो आपका मज़ा भी ख़राब हो जाएगा।"
"कोई बात नहीं।" रूपा के कहने का मतलब समझते ही कुमुद ने गहरी मुस्कान के साथ कहा____"अपनी प्यारी ननदरानी के लिए आज के मज़े की कुर्बानी दे दूंगी मैं। तुम्हारे भैया कहीं भागे थोड़े न जा रहे हैं।"

कुमुद की बात सुन कर रूपा के होठों पर मुस्कान उभर आई। इस घर में कुमुद का सबसे ज़्यादा रूपा से ही गहरा दोस्ताना था। दोनों ननद भाभी कम और सहेलियां ज़्यादा थीं। अपनी हर बात एक दूसरे से साझा करतीं थीं दोनों। कुमुद को रूपा और वैभव के संबंधों का पहले शक हुआ था और फिर जब उसने ज़ोर दे कर रूपा से इस बारे में पूछा तो रूपा ने कबूल कर लिया था कि हां वो वैभव से प्रेम करती है और वो अपना सब कुछ वैभव को सौंप चुकी है। कुमुद को ये जान कर बेहद आश्चर्य हुआ था लेकिन वो उसके प्रेम भाव को भी बखूबी समझती थी। एक अच्छी सहेली की तरह वो उसे सलाह भी देती थी कि वैभव जैसे लड़के से प्रेम करना तो ठीक है लेकिन वो उस लड़के के सपने न देखे क्योंकि उसके घर वाले कभी भी उसका रिश्ता उस लड़के से नहीं करना चाहेंगे। दूर दूर तक के लोग जानते हैं कि दादा ठाकुर का छोटा बेटा कैसे चरित्र का लड़का है। कुमुद के समझाने पर रूपा को अक्सर थोड़ा तकलीफ़ होती थी। वो जानती थी कि कुमुद ग़लत नहीं कहती थी, वो खुद भी वैभव के चरित्र से परिचित थी लेकिन अब इसका क्या किया जाए कि इसके बावजूद वो वैभव से प्रेम करती थी और उसी के सपने देखने पर मजबूर थी।

"क्या हुआ?" रूपा को कहीं खोया हुआ देख कुमुद ने कहा____"क्या फिर से उस लड़के के ख़्यालों में खो गई?"
"मुझे आपसे एक सहायता चाहिए भौजी।" रूपा ने सहसा गंभीर भाव से कहा____"कृपया मना मत कीजिएगा।"

"बात क्या है रूपा?" कुमुद ने उसकी गंभीरता को भांपते हुए पूछा____"कोई परेशानी है क्या?"
"हां भौजी।" रूपा एकदम से उठ कर बैठ गई, फिर गंभीर भाव से बोली____"बहुत बड़ी परेशानी और चिंता की बात हो गई है। इसी लिए तो कह रही हूं कि मुझे आपसे एक सहायता चाहिए।"

"आख़िर बात क्या है?" कुमुद के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं____"ऐसी क्या बात हो गई है जिसकी वजह से तुम मुझसे सहायता मांग रही हो? मुझे सब कुछ बताओ रूपा। आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसके चलते अचानक से तुम इतना चिंतित हो गई हो?"

"पहले मेरी क़सम खाइए भौजी।" रूपा ने झट से कुमुद का हाथ पकड़ कर अपने सिर पर रख लिया, फिर बोली____"पहले मेरी क़सम खाइए कि मैं आपको जो कुछ भी बताऊंगी उसके बारे में आप इस घर में किसी को कुछ भी नहीं बताएंगी।"

"तुम मेरी ननद ही नहीं बल्कि सहेली भी हो रूपा।" कुमुद ने कहा____"तुम अच्छी तरह जानती हो कि हम कभी भी एक दूसरे के राज़ किसी से नहीं बताते। फिर क़सम देने की क्या ज़रूरत है तुम्हें? क्या तुम्हें अपनी भौजी पर यकीन नहीं है?"

"खुद से भी ज़्यादा यकीन है भौजी।" रूपा ने बेचैन भाव से कहा____"लेकिन फिर भी आप एक बार मेरी क़सम खा लीजिए। मेरी बात को अन्यथा मत लीजिए भौजी।"

"अच्छा ठीक है।" कुमुद ने कहा____"मैं अपनी सबसे प्यारी ननद और सबसे प्यारी सहेली की क़सम खा कर कहती हूं कि तुम मुझे जो कुछ भी बताओगी उसके बारे में मैं कभी भी किसी से ज़िक्र नहीं करूंगी। तुम्हारा हर राज़ मेरे सीने में मरते दम तक दफ़न रहेगा। अब बताओ कि आख़िर बात क्या है?"

"वैभव की जान को ख़तरा है भौजी।" रूपा ने दुखी भाव से कहा____"अभी कुछ देर पहले जब मैं दिशा मैदान के लिए गई थी तब मैंने बाग़ में कुछ लोगों से इस बारे में सुना था।"

"य...ये क्या कह रही हो तुम?" कुमुद ने हैरत से आंखें फैला कर कहा____"भला बाग़ में ऐसे वो कौन लोग थे जो वैभव के बारे में ऐसी बातें कर रहे थे?"
"आप सुनेंगी तो आपको यकीन नहीं होगा भौजी।" रूपा ने आहत भाव से कहा____"मुझे ख़ुद अभी तक यकीन नहीं हो रहा है।"

"पर वो लोग थे कौन रूपा?" कुमुद ने उलझनपूर्ण भाव से पूछा____"जिन्होंने वैभव के बारे में ऐसा कुछ कहा जिसे सुन कर तुम ये सब कह रही हो। मुझे पूरी बात बताओ।"

रूपा ने कुमुद को सब कुछ बता दिया। जिसे सुन कर कुमुद भी गहरे ख़्यालों में खोई हुई नज़र आने लगी। उधर सब कुछ बताने के बाद रूपा ने कहा_____"आपको पता है वैभव को ख़त्म करने के लिए कहने वाला कौन था? वो व्यक्ति कोई और नहीं आपके ही ससुर थे यानि मेरे ताऊ जी। मैंने अच्छी तरह उनकी आवाज़ को सुना था भौजी। वो ताऊ जी ही थे।"

कुमुद को रूपा के मुख से अपने ससुर के बारे में ये जान कर ज़बरदस्त झटका लगा। एकदम से उससे कुछ कहते न बन पड़ा था। चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए थे जैसे वो इस बात को यकीन करने की कोशिश कर रही हो।

"बाकी दो लोग कौन थे मैं नहीं जानती भौजी।" कुमुद को गहरी सोच में डूबा देख रूपा ने कहा____"उन दोनों की आवाज़ मेरे लिए बिल्कुल ही अंजानी थी लेकिन ताऊ जी की आवाज़ को पहचानने में मुझसे कोई ग़लती नहीं हुई है।"

"ऐसा कैसे हो सकता है रूपा?" कुमुद ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"अब तो हवेली वालों से हमारे संबंध अच्छे हो गए हैं ना? ससुर जी ने तो खुद ही अच्छे संबंध बनाने की पहल की थी तो फिर वो खुद ही ऐसा कैसे कर सकते हैं?"

"यही तो समझ में नहीं आ रहा भौजी।" रूपा ने चिंतित भाव से कहा____"अगर ताऊ जी ने खुद पहल कर के हवेली वालों से अपने संबंध सुधारे थे तो अब वो ऐसा क्यों कर रहे हैं? इसका तो यही मतलब हो सकता है ना कि संबंध सुधारने का उन्होंने सिर्फ़ दिखावा किया था जबकि आज भी वो हवेली वालों को अपना दुश्मन समझते हैं। यही बात कुछ समय पहले वैभव ने भी मुझसे कही थी भौजी।"

"क्या मतलब?" कुमुद ने चौंकते हुए पूछा____"क्या कहा था वैभव ने?"
"उसे भी यही लगता है कि हमारे घर वालों ने उससे संबंध सुधार लेने का सिर्फ़ दिखावा किया है जबकि ऐसा करने के पीछे यकीनन हमारी कोई चाल है।" रूपा ने कहा____"वैभव ने मुझसे कहा भी था कि अगर वो ग़लत कह रहा है तो मैं खुद इस बारे में पता कर सकती हूं। उस दिन मुझे उसकी बातों पर यकीन नहीं हुआ था इस लिए मैंने कभी इसके बारे में पता लगाने का नहीं सोचा था लेकिन अभी शाम को जो कुछ मैंने सुना उससे मैं सोचने पर मजबूर हो गई हूं।"

"अगर सच यही है।" कुमुद ने गंभीरता से कहा____"तो यकीनन ये बहुत ही गंभीर बात है रूपा। मुझे समझ नहीं आ रहा कि ससुर जी ऐसा क्यों कर रहे हैं? आख़िर हवेली वालों से उनकी क्या दुश्मनी है जिसकी वजह से वो ऐसा कर रहे हैं? इस घर में मुझे आए हुए डेढ़ दो साल हो गए हैं लेकिन मैंने कभी किसी के मुख से दोनों खानदानों के बीच की दुश्मनी का असल कारण नहीं सुना। ये ज़रूर सुनती आई हूं कि तुम्हारे भाई लोगों का उस लड़के से कभी न कभी लड़ाई झगड़ा होता ही रहता है। जब संबंध अच्छे बने तो ससुर जी खुद ही उस लड़के को हमारे घर ले कर आए थे। मैंने सुना था कि वो घर बुला कर उस लड़के का सम्मान करना चाहते थे। उस दिन जब वैभव आया था तो मैंने देखा था कि वो सबसे कितने अच्छे तरीके से मिल रहा था और अपने से बड़ों के पैर छू कर आशीर्वाद ले रहा था। मेरी गुड़िया को तो वो अपने साथ हवेली ही ले गया था। अब सोचने वाली बात है कि अगर ससुर जी खुद उस लड़के को सम्मान देने के लिए यहां ले कर आए थे तो अब उसी लड़के को ख़त्म करने का कैसे सोच सकते हैं?"

"ज़ाहिर है वैभव को अपने घर ला कर उसे सम्मान देना महज दिखावा ही था।" रूपा ने कहा____"जबकि उनके मन में तो वैभव के प्रति नफ़रत की ही भावना थी। ये भी निश्चित ही समझिए कि अगर ताऊजी ऐसी मानसिकता रखते हैं तो ऐसी ही मानसिकता उनके सभी भाई भी रखते ही होंगे। भला वो अपने बड़े भाई साहब के खिलाफ़ कैसे जा सकते हैं? कहने का मतलब ये कि वो सब हवेली वालों से नफ़रत करते हैं और उन सबका एक ही मकसद होगा____'हवेली के हर सदस्य का खात्मा कर देना।"

रूपा की बातें सुन कर कुमुद हैरत से देखती रह गई उसे। उसके ज़हन में विचारों की आंधियां सी चलने लगीं थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसके घर वालों का सच ऐसा भी हो सकता है।

"मुझे आपकी सहायता चाहिए भौजी।" रूपा ने चिंतित भाव से कहा____"मुझे किसी भी तरह वैभव को इस संकट से बचाना है।"
"पर तुम कर भी क्या सकोगी रूपा?" कुमुद ने बेचैन भाव से कहा____"तुमने बताया कि वैभव अपनी भाभी को ले कर चंदनपुर गया हुआ है तो तुम भला कैसे उसे इस संकट से बचाओगी? क्या तुम रातों रात चंदनपुर जाने का सोच रही हो?"

"नहीं भौजी।" रूपा ने कहा____"चंदनपुर तो मैं किसी भी कीमत पर नहीं जा सकती क्योंकि ये मेरे लिए संभव ही नहीं हो सकेगा लेकिन हवेली तो जा ही सकती हूं।"

"ह...हवेली??" कुमुद ने हैरानी से रूपा को देखा।
"हां भौजी।" रूपा ने कहा____"आपकी सहायता से मैं हवेली ज़रूर जा सकती हूं और वहां पर दादा ठाकुर को इस बारे में सब कुछ बता सकती हूं। वो ज़रूर वैभव को इस संकट से बचाने के लिए कुछ न कुछ कर लेंगे।"

"बात तो तुम्हारी ठीक है।" कुमुद ने सोचने वाले भाव से कहा____"लेकिन तुम हवेली कैसे जा पाओगी? सबसे पहले तो तुम्हारा इस घर से बाहर निकलना ही मुश्किल है और अगर मान लो किसी तरह हवेली पहुंच भी गई तो वहां रात के इस वक्त कैसे हवेली में प्रवेश कर पाओगी?"

"मेरे पास एक उपाय है भौजी।" रूपा के चेहरे पर सहसा चमक उभर आई थी, बोली____"घर में सबको पता है कि मेरा पेट ख़राब है जिसके चलते मुझे बार बार दिशा मैदान के लिए जाना पड़ता है। तो उपाय ये है कि मैं आपके साथ दिशा मैदान जाने के लिए घर से बाहर जाऊंगी। उसके बाद बाहर से सीधा हवेली चली जाऊंगी। वैसे भी घर में कोई ये कल्पना ही नहीं कर सकता कि मैं ऐसे किसी काम के लिए सबकी चोरी से हवेली जा सकती हूं।"

"वाह! रूपा क्या मस्त उपाय खोजा है तुमने।" कुमुद के चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई, अतः मुस्कुराते हुए बोली____"आज मैं पूरी तरह से मान गई कि तुम सच में वैभव से बेहद प्रेम करती हो वरना अपने ही परिवार के खिलाफ़ जा कर ऐसी बात हवेली में जा कर बताने का कभी न सोचती।"

"मुझे इस बात को बताने की कोई खुशी नहीं है भौजी।" रूपा ने उदास भाव से कहा____"क्योंकि हवेली में दादा ठाकुर को जब मेरे द्वारा इस बात का पता चलेगा तो ज़ाहिर है कि उसके बाद मेरे अपने घर वाले भी संकट में घिर जाएंगे। वैभव की जान बचाने के चक्कर में मैं अपनों को ही संकट में डाल दूंगी और ये बात सोच कर ही मुझे अपने आपसे घृणा हो रही है।"

"मैं मानती हूं कि ऐसा करने से तुम अपने ही घर वालों को संकट में डाल दोगी।" कुमुद ने कहा____"लेकिन इसका भी एक सटीक उपाय है मेरी प्यारी ननदरानी।"
"क्या सच में?" रूपा के मुरझाए चेहरे पर सहसा खुशी की चमक फिर से उभर आई____"क्या कोई ऐसा उपाय है जिससे मेरे ऐसा करने के बाद भी मेरे घर वालों पर कोई संकट न आए?"

"हां रूपा।" कुमुद ने कहा____"उपाय ये है कि तुम दादा ठाकुर से इस बारे में बताने से पहले ये आश्वासन ले लो कि वो हमारे घर वालों पर किसी भी तरह का कोई संकट नहीं आने देंगे। अगर वो आश्वासन दे देते हैं तो ज़ाहिर है कि तुम्हारे द्वारा ये सब बताने पर भी वो हमारे घर वालों के लिए ख़तरा नहीं बनेंगे।"

"और अगर वो न माने तो?" रूपा ने संदिग्ध भाव से पूछा____"अगर वो गुस्से में आ कर सच में हमारे घर वालों के लिए ख़तरा बन गए तो?"

"नहीं, ऐसा नहीं होगा।" कुमुद ने मानों पूरे विश्वास के साथ कहा____"डेढ़ दो सालों में इतना तो मैं भी जान गई हूं कि दादा ठाकुर किस तरह के इंसान हैं। मुझे यकीन है कि जब तुम सब कुछ बताने के बाद हमारे परिवार पर संकट न आने के लिए उनसे कहोगी तो वो तुम्हें निराश नहीं करेंगे। आख़िर वो ये कैसे भूल जाएंगे कि तुमने अपने परिवार के खिलाफ़ जा कर उनके बेटे के जीवन को बचाने का प्रयास किया है? मुझे पूरा यकीन है रूपा कि वो हमारे लिए कोई भी ख़तरा नहीं बनेंगे।"

"अगर आपको उन पर यकीन है।" रूपा ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"तो फिर हम दोनों दिशा मैदान के लिए चलते हैं। अब एक पल का भी देर करना ठीक नहीं है।"

"रुको, एक उपाय और है रूपा।" कुमुद ने कुछ सोचते हुए कहा____"एक ऐसा उपाय जिससे किसी बात की चिंता करने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी।"
"क्या मतलब??" रूपा के माथे पर उलझन के भाव उभर____"भला इस तरह का क्या उपाय हो सकता है भौजी?"

"बड़ा सीधा सा उपाय है मेरी प्यारी लाडो।" कुमुद ने मुस्कुराते हुए कहा____"और वो ये कि हम दादा ठाकुर को ये नहीं बताएंगे कि वैभव को ख़त्म करने के लिए किसने कहा है। कहने का मतलब ये कि तुम उनसे सिर्फ यही बताना कि तुमने हमारे बाग में कुछ लोगों को ऐसी बातें करते सुना था जिसमें वो लोग चंदनपुर जा कर वैभव को जान से मारने को कह रहे थे। दादा ठाकुर अगर ये पूछेंगे कि तुम उस वक्त बाग में क्या कर रही थी तो बोल देना कि तुम्हारा पेट ख़राब था इस लिए तुम वहां पर दिशा मैदान के लिए गई थी और उसी समय तुमने ये सब सुना था।"

"ये उपाय तो सच में कमाल का है भौजी।" रूपा के चेहरे पर खुशी के भाव उभर आए____"यानि मुझे ताऊ जी के बारे में दादा ठाकुर से बताने की ज़रूरत ही नहीं है और जब ताऊ जी का ज़िक्र ही नहीं होगा तो दादा ठाकुर से हमारे परिवार को कोई ख़तरा भी नहीं होगा। वाह! भौजी क्या उपाय बताया है आपने।"

"ऐसा करने से एक तरह से हम अपने परिवार वालों के साथ गद्दारी भी नहीं करेंगे रूपा।" कुमुद ने कहा____"और उन्हें दादा ठाकुर के क़हर से भी बचा लेंगे। वैभव से तुम प्रेम करती हो तो उसके लिए ऐसा कर के तुम उसके प्रति अपनी वफ़ा भी साबित कर लोगी। इससे कम से कम तुम्हारे दिलो दिमाग़ में कोई अपराध बोझ तो नहीं रहेगा।"

"सही कहा भौजी।" रूपा एकदम कुमुद के लिपट कर बोली____"आप ने सच में मुझे एक बड़े धर्म संकट से बचा लिया है। आप मेरी सबसे अच्छी भौजी हैं।"
"सिर्फ़ भौजी नहीं मेरी प्यारी ननदरानी।" कुमुद ने प्यार से रूपा की पीठ को सहलाते हुए कहा___"बल्कि तुम्हारी सहेली भी। तुम्हें मैं ननद से ज़्यादा अपनी सहेली मानती हूं।"

"हां मेरी प्यारी सहेली।" रूपा ने हल्के से हंसते हुए कहा____"अब चलिए, हमें जल्द से जल्द ये काम करना है। देर करना ठीक नहीं है।"

रूपा की बात सुन कर कुमुद मुस्कुराई और फिर रूपा के दाएं गाल को प्यार से सहला कर पलंग से उठ गई। उसके बाद उसने रूपा को चलने का इशारा किया और खुद कमरे से बाहर निकल गई। रूपा को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसके दिलो दिमाग़ में जो अब तक भारी बोझ पड़ा हुआ था वो पलक झपकते ही गायब हो गया है। हवेली जाने के ख़्याल ने उसे एकदम से रोमांचित सा कर दिया था। आज पहली बार वो हवेली जाने वाली थी और पहली बार वो कोई ऐसा काम करने वाली थी जिसके बारे में उसके घर वाले कल्पना भी नहीं कर सकते थे।

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"क्या बात है?" बैठक में बैठे दादा ठाकुर ने हैरानी भरे भाव से अभिनव को देखते हुए कहा____"उनसे कुछ पता चला है क्या?"

"अभी तो कुछ पता नहीं चला है पिता जी।" अभिनव ने कहा____"हमारे आदमी वैभव के दोनों दोस्तों और जगन पर बराबर नज़र रखे हुए हैं। अभी मैं उनसे ही मिल कर आ रहा हूं। हमारे आदमियों के अनुसार वो तीनों सामान्य दिनों की तरह ही अपने अपने काम में लगे हुए थे। सुबह से अब तक वो लोग अपने अपने घरों से बाहर तो गए थे लेकिन किसी ऐसे आदमी से नहीं मिले जिसे सफ़ेदपोश अथवा काला नकाबपोश कहा जा सके। वैसे भी सफ़ेदपोश और काला नकाबपोश उन लोगों से रात के अंधेरे में ही मिलता है। दिन में शायद इस लिए नहीं मिलता होगा क्योंकि इससे उनका भेद खुल जाने का ख़तरा रहता होगा।"

"मेरा खयाल तो ये है भैया कि हम सीधे उन तीनों को पकड़ लेते हैं।" जगताप ने कहा____"माना कि वो लोग सफ़ेदपोश अथवा काले नकाबपोश के बारे में कुछ न बता पाएंगे लेकिन इतना तो ज़रूर बता सकते हैं कि उन लोगों ने आख़िर किस वजह से हमारे खिलाफ़ जा कर सफ़ेदपोश से मिल गए और उसके इशारे पर चलने लगे?"

"जगन का तो समझ में आता है चाचा जी कि उसने अपने बड़े भाई की ज़मीन हड़पने के लिए ये सब किया होगा।" अभिनव ने कहा____"लेकिन सुनील और चेतन किस वजह से उस सफेदपोश के सुर में चलने लगे ये सोचने वाली बात है। संभव है कि इसके पीछे उनकी कोई मजबूरी रही होगी लेकिन ये पता करना ज़रूरी है कि दोनों ने सफ़ेदपोश के कहने पर क्या किया है? रही बात उन लोगों को सीधे पकड़ लेने की तो ऐसा करना ख़तरनाक भी हो सकता है क्योंकि अगर वो लोग किसी मजबूरी में सफ़ेदपोश का साथ दे रहे हैं तो ज़ाहिर है कि हमारे द्वारा उन्हें पकड़ लेने से उनकी या उनके परिवार वालों की जान को ख़तरा हो जाएगा।"

"हम अभिनव की बातों से सहमत हैं जगताप।" दादा ठाकुर ने कहा____"हम किसी भी मामले को जानने के लिए किसी निर्दोष की जान को ख़तरे में नहीं डाल सकते। बेशक हमारा उनसे बहुत कुछ जानना ज़रूरी है लेकिन इस तरीके से नहीं कि हमारी किसी ग़लती की वजह से उन पर या उनके परिवार पर संकट आ जाए। जहां अब तक हमने इंतज़ार किया है वहीं थोड़ा इंतज़ार और सही।"

दादा ठाकुर की बात सुन कर जगताप अभी कुछ बोलने ही वाला था कि तभी एक दरबान अंदर आया और उसने दादा ठाकुर से कहा कि एक आदमी आया है और उनसे शीघ्र मिलना चाहता है। दरबान की बात सुन कर दादा ठाकुर ने कुछ पल सोचा और फिर दरबान से कहा ठीक है उसे अंदर भेज दो। दरबान के जाने के कुछ ही देर बाद जो शख़्स बैठक में आया। उसे देख दादा ठाकुर हल्के से चौंके। आने वाला शख़्स कोई और नहीं बल्कि शेरा था। दादा ठाकुर को समझते देर न लगी कि शेरा को उन्होंने जो काम दिया था उसमें वो कामयाब हो कर ही लौटा है। अगर वो कामयाब न हुआ होता तो वो अपनी शक्ल न दिखाता। दादा ठाकुर इस बात से अंदर ही अंदर खुश हो गए और साथ ही उनकी धड़कनें भी थोड़ा तेज़ हो गईं।

"प्रणाम मालिक।" शेरा ने हाथ जोड़ कर दादा ठाकुर को प्रणाम किया और फिर जगताप को भी।
"क्या बात है?" दादा ठाकुर ने शेरा की तरफ देखते हुए कहा____"इस वक्त तुम यहां? सब ठीक तो है न?"

"जी मालिक सब ठीक है।" शेरा ने अदब से कहा____"आपको एक ख़बर देने आया हूं। अगर आप मुनासिब समझें तो अर्ज़ करूं?"
"ज़रूरत नहीं है।" दादा ठाकुर कहने के साथ ही एक झटके में अपने सिंहासन से उठे, फिर बोले____"हम जानते हैं तुम क्या कहना चाहते हो। बस ये बताओ कहां हैं वो?"

शेरा ने जवाब देने से पहले बैठक में बैठे अभिनव और जगताप को देखा और फिर कहा____"माफ़ कीजिए मालिक लेकिन एक ही हाथ लगा है। मैं उसे अपने साथ ही ले कर आया हूं।"

शेरा की बात सुन कर दादा ठाकुर मन ही मन थोड़ा चौंके और फिर पलट कर बारी बारी से अपने बेटे अभिनव और छोटे भाई जगताप को देखा। उसके बाद कुछ सोचते हुए उन्होंने जगताप से कहा____"एक अच्छी ख़बर है जगताप।"

"कैसी ख़बर भैया?" जगताप ने उलझन भरे भाव से कहा____"और ये शेरा किसके हाथ लगने की बात कर रहा है?"
"हमने शेरा को एक बेहद ही महत्वपूर्ण काम सौंपा था" दादा ठाकुर ने कहा____"हमें ये तो उम्मीद थी कि ये हमारे द्वारा दिए गए काम को यकीनन सफलतापूर्वक अंजाम देगा लेकिन ये उम्मीद नहीं थी कि ये इतना जल्दी अपना काम कर लेगा। ख़ैर बात ये है कि शेरा के हाथ सफ़ेदपोश अथवा काले नकाबपोश में से कोई एक लग गया है और ये उसे अपने साथ ही ले कर आया है।"

"क...क्या??" जगताप से पहले अभिनव आश्चर्य से बोल पड़ा____"मेरा मतलब है कि क्या आप सच कह रहे हैं पिता जी?"
"बिलकुल।" दादा ठाकुर ने ख़ास भाव से कहा____"शेरा ने उनमें से किसी एक को पकड़ लिया है और उसे अपने साथ यहां ले आया है।" कहने के साथ ही दादा ठाकुर शेरा से मुखातिब हुए____"तुमने बहुत अच्छा काम किया है शेरा। तुम हमारी उम्मीद पर बिलकुल खरे उतरे। ख़ैर ये बताओ कि उनमें से कौन तुम्हारे हाथ लगा है?"

"मैं तो सफ़ेदपोश को ही पकड़ने के लिए उसके पीछे गया था मालिक।" शेरा ने कहा___"लेकिन बाग़ में अचानक से वो गायब हो गया। मैंने उसे बहुत खोजा लेकिन उसका कहीं पता नहीं चल सका। उसके बाद मैं काले नकाबपोश को खोजने लगा और आख़िर वो मुझे मिल ही गया। उसको अपने कब्जे में लेने के लिए मुझे उसके साथ काफी ज़ोरदार मुकाबला करना पड़ा जिसका नतीजा ये निकला कि आख़िर में मैंने उसे अपने कब्जे में ले ही लिया।"

"ये तो सच में बड़े आश्चर्य और कमाल की बात हुई भैया।" जगताप ने खुशी से कहा____"शेरा के हाथ उस सफ़ेदपोश का खास आदमी लग गया है। अब हम उसके द्वारा पलक झपकते ही सफ़ेदपोश तक पहुंच सकते हैं। उसके बाद हमें ये जानने में देर नहीं लगेगी कि हमारे साथ इस तरह का खेल खेलने वाला वो सफ़ेदपोश कौन है? बस एक बार वो मेरे हाथ लग जाए उसके बाद तो मैं उसकी वो हालत करूंगा कि दुबारा जन्म लेने से भी इंकार करेगा।"

"बेशक ऐसा ही होगा जगताप।" दादा ठाकुर ने कहा____"लेकिन तब तक हमें पूरे होशो हवास में रहना होगा। ख़ैर तुम शेरा के साथ जाओ और उस काले नकाबपोश को हवेली के किसी कमरे में बंद कर दो। हम सुबह उससे पूछताछ करेंगे।"

"सुबह क्यों भैया?" जगताप ने कहा____"हमें तो अभी उससे पूछताछ करनी चाहिए। उससे सफ़ेदपोश के बारे में सब कुछ जान कर जल्द से जल्द उस सफ़ेदपोश को खोजना चाहिए।"

"इतना बेसब्र मत हो जगताप।" दादा ठाकुर ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"धीरज से काम लो। हम जानते हैं कि तुम जल्द से जल्द हमारे दुश्मन को खोज कर उसको नेस्तनाबूत कर देना चाहते हो लेकिन इतना बेसब्र होना ठीक नहीं है। अब तो वो काला नकाबपोश हमारे हाथ लग ही गया है इस लिए सुबह हम सब उससे तसल्ली से पूछताछ करेंगे।"

"ठीक है भैया।" जगताप ने कहा____"जैसा आपको ठीक लगे।"
"हम तुम्हारे इस काम से बेहद खुश हैं शेरा।" दादा ठाकुर ने शेरा से कहा____"इसका इनाम ज़रूर मिलेगा तुम्हें?"
"माफ़ कीजिए मालिक।" शेरा ने हाथ जोड़ कर कहा____"आपके द्वारा इनाम लेने में मुझे तभी खुशी होगी जब उस सफ़ेदपोश को भी पकड़ कर आपके सामने ले आऊंगा।"

शेरा की बात सुन कर दादा ठाकुर मुस्कुराए और आगे बढ़ कर शेरा के बाएं कंधे पर अपना हाथ रख कर हल्के से दबाया। उसके बाद उन्होंने जगताप को शेरा के साथ जाने को कहा। जगताप और शेरा बैठक से बाहर आए। हवेली के एक तरफ दीवार के सहारे और दो दरबानों की निगरानी में काला नकाबपोश बेहोश पड़ा हुआ था। जगताप के कहने पर शेरा ने उसे उठा कर कंधे पर लाद लिया और फिर वो जगताप के पीछे पीछे हवेली के उत्तर दिशा की तरफ बढ़ता चला गया। जल्दी ही वो हवेली के एक तरफ बने एक सीलनयुक्त कमरे में पहुंच गया।

जगताप के कहने पर शेरा ने उस काले नकाबपोश को उस खाली कमरे में एक तरफ डाल दिया। काले नकाबपोश के चेहरे पर अभी भी काला नक़ाब था जिसे जगताप ने एक झटके से उतार दिया। कमरे में एक तरफ लालटेन का प्रकाश था इस लिए उस प्रकाश में जगताप ने उस आदमी को देखा। काला नकाबपोश उसे इस गांव का नहीं लग रहा था। जगताप की नज़र उसके एक हाथ पर पड़ी जो टूटा हुआ था। उसने पलट कर शेरा की तरफ देखा तो शेरा ने बताया कि मुकाबले में उसी ने उसका हाथ तोड़ा है, तभी तो वो उसके हाथ लगा था। ख़ैर, जगताप और शेरा कमरे से बाहर आ गए। जगताप के कहने पर एक दरबान ने उस कमरे के दरवाज़े की कुंडी बंद कर उसमें ताला लगा दिया।
 
अध्याय - 59
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अब तक....

जगताप के कहने पर शेरा ने उस काले नकाबपोश को उस खाली कमरे में एक तरफ डाल दिया। काले नकाबपोश के चेहरे पर अभी भी काला नक़ाब था जिसे जगताप ने एक झटके से उतार दिया। कमरे में एक तरफ लालटेन का प्रकाश था इस लिए उस प्रकाश में जगताप ने उस आदमी को देखा। काला नकाबपोश उसे इस गांव का नहीं लग रहा था। जगताप की नज़र उसके एक हाथ पर पड़ी जो टूटा हुआ था। उसने पलट कर शेरा की तरफ देखा तो शेरा ने बताया कि मुकाबले में उसी ने उसका हाथ तोड़ा है, तभी तो वो उसके हाथ लगा था। ख़ैर, जगताप और शेरा कमरे से बाहर आ गए। जगताप के कहने पर एक दरबान ने उस कमरे के दरवाज़े की कुंडी बंद कर उसमें ताला लगा दिया।

अब आगे....

उस वक्त शाम के क़रीब नौ बजने वाले थे। रूपा अपनी भाभी कुमुद के साथ अपने घर से दिशा मैदान जाने के लिए निकली थी। यूं तो आसमान में आधे से कम चांद था जिसकी वजह से हल्की रोशनी थी किंतु आसमान में काले बादलों ने डेरा जमाना शुरू कर दिया था। ऐसा लगता था जैसे रात के किसी प्रहर बारिश हो सकती थी। काले बादलों ने उस आधे से कम चांद को ढंक रखा था जिसकी वजह से उसकी रोशनी धरती पर नहीं पहुंच पा रही थी। रूपा और कुमुद पर मानों काले बादलों ने मेहरबानी कर रखी थी। घर के पीछे आने के बाद वो दोनों लंबा चक्कर लगाते हुए सीधा हवेली पहुंच गईं थी। कुमुद ने साड़ी से घूंघट किया हुआ था और रूपा ने अपने दुपट्टे को मुंह में लपेट लिया था ताकि रास्ते में अगर कोई मिले भी तो वो उन दोनों को पहचान न सके। दोनों ने अपने अपने लोटे को घर के पीछे ही एक जगह छिपा दिया था।

ननद भौजाई दोनों ही पहली बार हवेली आईं थी। दादा ठाकुर की हवेली के बारे में सुना बहुत था दोनों ने लेकिन कभी यहां आने का कोई अवसर नहीं मिला था। दोनों की धड़कनें बढ़ी हुईं थी। कुमुद कई बार रूपा को बोल चुकी थी कि कहीं हम किसी के द्वारा पकड़े न जाएं इस लिए वापस घर लौट चलते हैं लेकिन रूपा ने तो जैसे ठान लिया था कि अब तो वो हवेली जा कर दादा ठाकुर को सब कुछ बता कर ही रहेगी।

हवेली के हाथी दरवाज़े के पास पहुंच कर दोनों ही रुक गईं। हल्के अंधेरे में उन्हें हाथी दरवाज़े के पार दूर हवेली बनी हुई नज़र आई जो अंधेरे में बड़ी ही अजीब और भयावह सी नज़र आ रही थी। कुछ देर तक दोनों इधर उधर देखती रहीं उसके बाद आगे बढ़ चलीं। दोनों की धड़कनें पहले से और भी ज़्यादा तेज़ हो गईं। अभी दोनों ने हाथी दरवाज़े को पार ही किया था कि सहसा एक तेज़ मर्दाना आवाज़ को सुन कर दोनों के होश उड़ गए। घबराहट के मारे पलक झपकते ही दोनों का बुरा हाल हो गया।

"कौन हो तुम दोनों?" सहसा एक आदमी अंधेरे में दोनों के सामने किसी जिन्न की तरह नमूदार हो कर कड़क आवाज़ में बोला____"और इस वक्त कहां जा रही हो?"

"ज...जी वो हमें दादा ठाकुर से मिलना है।" कुमुद से पहले रूपा ने हिम्मत जुटा कर धीमें स्वर में कहा।
"दादा ठाकुर से??" वो आदमी जोकि हवेली का दरबान था चौंकते हुए दोनों को देखा____"तुम दोनों को भला उनसे क्या काम है?"

"देखिए हमारा उनसे मिलना बहुत ही ज़रूरी है।" रूपा ने अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को काबू करते हुए कहा____"आप कृपया हमें दादा ठाकुर के पास पहुंचा दीजिए।"
"अरे! ऐसे कैसे भला?" दरबान ने हाथ झटकते हुए संदिग्ध भाव से कहा____"पहले तुम दोनों ये बताओ कि कौन हो और रात के इस वक्त अंधेरे में कहां से आई हो?"

"देखिए आप समझ नहीं रहे हैं।" कुमुद ने सहसा आगे बढ़ कर कहा____"आपके लिए ये जानना ज़रूरी नहीं है कि हम कौंन है और कहां से आए हैं, बल्कि ज़रूरी ये है कि आप हमें जल्द से जल्द दादा ठाकुर के पास पहुंचा दीजिए।"

"आप हमें ग़लत मत समझिए।" रूपा ने कहा____"असल में बात कुछ ऐसी है कि हम सिर्फ़ दादा ठाकुर को ही बता सकते हैं। कृपा कर के आप या तो हमें दादा ठाकुर के पास पहुंचा दीजिए या फिर आप ख़ुद ही जा कर दादा ठाकुर को बता दीजिए कि कोई उनसे मिलने आया है।"

दरबान दोनों की बात सुन कर सोच में पड़ गया। रात के इस वक्त दो औरतों का हवेली में आना उसके लिए हैरानी की बात थी किंतु आज कल जो हालात थे उसका उसे भी थोड़ा बहुत पता था इस लिए उसने सोचा कि एक बार दादा ठाकुर को इस बारे में सूचित ज़रूर करना चाहिए।

"ठीक है।" फिर उसने थोड़ा नम्र भाव से कहा___"तुम दोनों यहीं रुको। मैं दादा ठाकुर को तुम दोनों के बारे में सूचित करता हूं। अगर उन्होंने तुम दोनों को बुलाया तो मैं तुम दोनों को अंदर उनके पास ले चलूंगा।"

दरबान की बात सुन कर दोनों ने हां में सिर हिलाया। उसके बाद दरबान दोनों को यहीं रुकने का बोल कर तेज़ कदमों के साथ हवेली की तरफ बढ़ता चला गया। इधर कुमुद और रूपा अंधेरे में इधर उधर देखने लगीं थी। उन्हें डर भी लग रहा था कि कहीं कोई गड़बड़ न हो जाए अथवा वो दोनों किसी ऐसे आदमी के द्वारा न पकड़ी जाएं जो उन्हें पहचानता हो। दूसरा डर इस बात का भी था कि अगर दोनों को घर लौटने में ज़्यादा देर हो गई तो वो दोनों घर वालों को क्या जवाब देंगी?

ख़ैर कुछ ही देर में दरबान लगभग दौड़ता हुआ आया और हांफते हुए दोनों से अंदर चलने को कहा। दरबान के द्वारा अंदर चलने की बात सुन कर दोनों ने राहत की लंबी सांस ली और फिर दरबान के पीछे पीछे हवेली की तरफ बढ़ चलीं। कुछ ही समय में दोनों उस दरबान के साथ हवेली के अंदर बैठक में पहुंच गईं। दोनों के दिल बुरी तरह धड़क रहे थे। दरबान उन दोनों को बैठक में छोड़ कर बाहर चला गया था। बैठक में इस वक्त कोई नहीं था। दोनों अपनी घबराहट को काबू करने का प्रयास करते हुए बैठक की दीवारों को देखने लगीं थी। तभी सहसा किसी के आने की आहट से दोनों चौंकीं और फ़ौरन ही पलट कर पीछे देखा। नज़र एक ऐसी शख्सियत पर पड़ी जिनके लंबे चौड़े और हट्टे कट्टे बदन पर सफ़ेद कुर्ता पजामा था। कुर्ते के ऊपर उन्होंने एक साल ओढ़ रखा था। चेहरे पर रौब और तेज़ का मिला जुला संगम था। बड़ी बड़ी मूंछें और क़रीब तीन अंगुल की दाढ़ी जिनके बाल आधे से थोड़ा कम सफ़ेद नज़र आ रहे थे।

"कौन हैं आप दोनों?" दादा ठाकुर ने अपने सिंहासन पर बैठने के बाद बड़े नम्र भाव से दोनों की तरफ देखते हुए पूछा____"और रात के इस वक्त हमसे क्यों मिलना चाहती थीं?"

दादा ठाकुर की आवाज़ से दोनों को होश आया तो दोनों हड़बड़ा गईं और फिर खुद को सम्हाले हुए आगे बढ़ कर एक एक कर के दोनों ने झुक कर दादा ठाकुर के पांव छुए। दादा ठाकुर दोनों को ये करते देख हल्के से चौंके किन्तु फिर सामान्य भाव से दोनों को आशीर्वाद दिया। कुमुद ने तो उनके सामने घूंघट कर रखा था लेकिन रूपा ने अपने चेहरे से दुपट्टा हटा लिया।

"मैं रूपा हूं दादा ठाकुर।" रूपा ने अपनी घबराहट को काबू करते हुए कहा____"मेरे पिता जी का नाम हरि शंकर है और ये मेरी भाभी कुमुद हैं।"
"हरि शंकर??" दादा ठाकुर एकदम से चौंके, फिर हैरानी से बोले___"अच्छा अच्छा, तुम साहूकार हरि शंकर की बेटी हो? हमें लग ही रहा था कि कहीं तो तुम्हें देखा है। ख़ैर, ये बताओ बेटी कि रात के इस वक्त इस तरह से यहां आने का क्या कारण है? अगर कोई बात थी तो सुबह दिन के उजाले में भी तुम आ सकती थी यहां।"

"सुबह दिन के उजाले में आती तो शायद देर हो जाती दादा ठाकुर।" रूपा ने बेचैन भाव से कहा____"इस लिए रात के इस वक्त यहां आना पड़ा हम दोनों को।"

"हम कुछ समझे नहीं बेटी।" दादा ठाकुर के चेहरे पर उलझन के भाव उभर आए थे, बोले____"आख़िर ऐसी क्या बात थी जिसके लिए तुम दोनों को रात के इस वक्त यहां आना पड़ा। एक बात और, तुम हमें दादा ठाकुर नहीं बल्कि ताऊ जी कह सकती हो। हम दादा ठाकुर दूसरों के लिए हैं, जबकि तुम तो हमारे घर परिवार जैसी ही हो। ख़ैर, अब बताओ बात क्या है?"

"वो बात ये है ताऊ जी कि आपके छोटे बेटे की जान को ख़तरा है।" रूपा ने अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को बड़ी मुश्किल से सम्हालते हुए कहा____"अगर हम सुबह आते तो बहुत देर हो जाती इस लिए हम आपको इस बारे में बताने के लिए फ़ौरन यहां चले आए।"

"हमारे बेटे की जान को ख़तरा है?" दादा ठाकुर बुरी तरह चौंके____"ये क्या कह रही हो बेटी?"
"मैं सच कह रही हूं ताऊ जी।" रूपा ने कहा।

"पर तुम्हें कैसे पता कि हमारे बेटे की जान को ख़तरा है?" दादा ठाकुर बुरी तरह हैरान थे कि रूपा जैसी लड़की को इतनी बड़ी बात कैसे पता चली? उसी हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए बोले____"हम तुमसे जानना चाहते हैं बेटी कि इतनी बड़ी बात तुम्हें कहां से और कैसे पता चली?"

रूपा ने एक बार कुमुद की तरफ देखा और फिर गहरी सांस ले कर सब कुछ दादा ठाकुर को बताना शुरू कर दिया। उसने ये नहीं बताया कि वैभव को ख़त्म करने के लिए कहने वाला खुद उसका ताऊ मणि शंकर था। सारी बातें सुनने के बाद दादा ठाकुर गहरी सोच में डूब गए। सबसे ज़्यादा उन्हें ये सोच कर हैरानी हो रही थी कि इतनी बड़ी बात को बताने के लिए साहूकार हरि शंकर की बेटी अपनी भाभी के साथ रात के वक्त हवेली आ गई थी।

"इतनी बड़ी बात बता कर तुमने हम पर बहुत बड़ा उपकार किया है बेटी।" दादा ठाकुर ने गंभीर भाव से कहा____"तुम्हारे इस उपकार का बदला हम अपनी जान दे कर भी नहीं चुका सकते। बस यही दुआ करते हैं कि ऊपर वाला तुम्हें हमेशा खुश रखे लेकिन बेटी इसके लिए तुम दोनों को खुद रात के इस वक्त यहां आने की क्या ज़रूरत थी? हमारा मतलब है कि ये बात तुम अपने पिता जी अथवा ताऊ जी को बताती। वो खुद हमारे पास आ कर हमसे ये सब बता सकते थे। इसके लिए तुम्हें खुद इतनी तकलीफ़ उठाने की क्या ज़रूरत थी?"

"मैंने उस वक्त जब ये सब सुना था तो मुझे समझ ही नहीं आया था कि क्या करूं?" दादा ठाकुर की बात सुन कर रूपा अंदर ही अंदर बुरी तरह घबरा गई थी, किंतु फिर जल्दी ही खुद को सम्हाले हुए बोली____"मेरे साथ कुमुद भाभी भी थीं तो मैंने इन्हें बताया। हम दोनों ने निश्चय किया कि जितना समय हमें अपने घर वालों को ये सब बताने में लगेगा उतने में तो हम खुद ही यहां आ कर आपको सब कुछ बता सकते हैं।"

"ख़ैर जो भी किया तुम दोनों ने बहुत ही अच्छा किया है।" दादा ठाकुर ने कहा____"और इसके लिए हम तुम दोनों से बेहद प्रसन्न हैं। हम अपने बेटे की जान को बचाने के लिए जल्द ही कुछ न कुछ करेंगे। ये सब होने के बाद हम तुम्हारे पिता और ताऊ से भी मिलेंगे और उन्हें खुशी खुशी बताएंगे कि उनकी बहू और बेटी ने हम पर कितना बड़ा उपकार किया है।"

"नहीं नहीं ताऊ जी।" रूपा बुरी तरह घबरा गई, फिर खुद को सम्हाले हुए बोली____"आप ये सब बातें हमारे पिता जी को या ताऊ जी को बिलकुल भी मत बताइएगा।"

"अरे! ये कैसी बात कर रही हो बेटी?" दादा ठाकुर ने हैरानी से कहा____"तुम दोनों ने हम पर इतना बड़ा उपकार किया है और हम तुम्हारे इतने बड़े उपकार को तुम्हारे ही घर वालों को न बताएं ये तो बिल्कुल भी उचित नहीं है। आख़िर तुम्हारे पिता और ताऊ जी को भी तो पता चलना चाहिए कि उनकी तरह उनकी बहू बेटी भी हमारे प्रति वफ़ादार हैं और हमारे अच्छे के लिए सोचती हैं। तुम चिंता मत करो बेटी, देखना ये सब जान कर तुम्हारे घर वाले भी बहुत प्रसन्न हो जाएंगे।"

"नहीं ताऊ जी।" रूपा का मारे घबराहट के बुरा हाल हो गया था, किसी तरह बोली____"मैं आपसे विनती करती हूं कि आप इस बारे में मेरे घर वालों में से किसी को भी कुछ मत बताइएगा। मेरे घर वाले बहुत ज़्यादा पुराने विचारों वाले हैं। अगर उन्हें पता चला कि उनके घर की बेटी और बहू रात के वक्त उनकी गैर जानकारी में हवेली गईं थी तो वो हम पर बहुत ही ज़्यादा नाराज़ हो जाएंगे।"

"ऐसा कुछ भी नहीं होगा बेटी।" दादा ठाकुर ने मानो उसे आश्वासन दिया____"तुम दोनों को इस बारे में फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है। हम उन्हें समझाएंगे कि तुम दोनों ने रात के वक्त हवेली में आ कर कोई अपराध नहीं किया है बल्कि हवेली में रहने वाले दादा ठाकुर पर उपकार किया है। हमें यकीन है कि ये बात जान कर उन सबका सिर गर्व से ऊंचा हो जाएगा।"

"आप मुझे बेटी कह रहे हैं ना ताऊ जी।" रूपा ने इस बार अधीरता से कहा____"तो इस बेटी की बात मान लीजिए ना। आप हमारे घर वालों को इस बारे में कुछ भी नहीं बताएंगे, आपको हम दोनों की क़सम है ताऊ जी।"

"बड़ी हैरत की बात है।" दादा ठाकुर ने चकित भाव से कहा____"ख़ैर, अगर तुम ऐसा नहीं चाहती तो ठीक है हम इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताएंगे। तुमने हमें क़सम दे दी है तो हम तुम्हारी क़सम का मान रखेंगे।"

"आपका बहुत बहुत धन्यवाद ताऊ जी।" रूपा ने कहने के साथ ही दादा ठाकुर के पैर छुए और फिर खड़े हो कर कहा____"अब हमें जाने की इजाज़त दीजिए। काफी देर हो गई है हमें।"

रूपा के बाद कुमुद ने भी दादा ठाकुर के पांव छुए और फिर दादा ठाकुर की इजाज़त ले कर हवेली से बाहर निकल गईं। दादा ठाकुर हवेली के मुख्य दरवाज़े तक उन्हें छोड़ने आए। कुछ ही देर में दोनों अंधेरे में गायब हो गईं। उनके जाने के बाद दादा ठाकुर गहरी सोच और चिंता में डूब गए। उनके ज़हन में ख़्याल उभरा कि वैभव की जान को ख़तरा है अतः उन्हें जल्द से जल्द कुछ करना होगा। रूपा के अनुसार वैभव को जान से मारने वाला सुबह ही चंदनपुर के लिए रवाना हो जाएगा। दादा ठाकुर के मन में सवाल उभरा कि ऐसा कौन हो सकता है जो उनके बेटे को जान से मारने के लिए सुबह ही चंदनपुर के लिए निकलने वाला है? क्या वो इसी गांव का है या फिर किसी दूसरे गांव का?

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"वैभव महाराज कहां चले गए थे आप?" मैं जैसे ही घर पहुंचा तो वीरेंद्र ने पूछा____"हमने सोचा एक साथ ही दिशा मैदान के लिए चलेंगे पर आप तो जाने कहां गायब हो गए थे?"

"जी वो गांव तरफ घूमने निकल गया था।" मैंने सामान्य भाव से कहा____"सोचा आप सब व्यस्त हैं तो अकेला ही घूम फिर आता हूं। वैसे आप फ़िक्र न करें, यहां से निकला तो राघव भैया मिल गए। उन्हीं से दरबार होने लगी तो समय का पता ही नहीं चला।"

"चलिए कोई बात नहीं।" वीरेंद्र ने कहा____"अगर आपको दिशा मैदान के लिए चलना हो तो चलिए मेरे साथ।"
"नहीं, अब तो सुबह ही जाऊंगा।" मैंने कहा____"आप फुर्सत हो आइए। मैं यहीं बाबू जी के पास बैठता हूं।"

वीरेंद्र सिर हिला कर निकल गया और मैं अंदर आ कर बैठक में भाभी के पिता जी के पास बैठ गया। बैठक में और भी कुछ लोग बैठे हुए थे जिनसे बाबू जी ने मेरा परिचय कराया। अब क्योंकि मैं भी दामाद ही था इस लिए सबने मेरे पांव छुए। मुझे अपने से बड़ों का इस तरह से पांव छूना अजीब लगता था लेकिन क्या करें उनका अपना धर्म था। सब मेरा और मेरे पिता जी का हाल चाल पूछते रहे उसके बाद गांव के लोग चले गए।

रात में हम सबने साथ ही भोजन किया। भाभी और भाभी की छोटी बहन कामिनी रसोई में थी जबकि वीरेंद्र की पत्नी अपने कमरे में अपने नन्हें से बच्चे के साथ थी। खाना परोसने का काम कंचन और मोहिनी कर रहीं थी। बड़े भैया के चाचा ससुर भी हम सबके साथ खाना खाने के लिए बैठे हुए थे। मैंने महसूस किया कि कंचन मुझसे नज़रें चुरा रही थी। ज़ाहिर था आज शाम को जो कुछ हमारे बीच हुआ था उससे उसका नज़रें चुराना लाज़मी था। मैं उसे पूरी तरह से नंगा देख चुका था और इस वजह से वो मेरे सामने शर्मा रही थी। आस पास सब लोग थे इस लिए उससे मैं कुछ कह नहीं सकता था वरना उसकी अच्छी खासी खिंचाई करता। ख़ैर जल्दी ही हम सब का खाना हो गया तो हम सब उठ गए।

गर्मी का मौसम था इस लिए घर के बाहर ही चारपाई लगा कर हम सबके सोने की व्यवस्था की गई। मेरे साथ जो आदमी आए थे उन सबको वीरेंद्र ने भोजन करवाया और उन लोगों को भी घर के बाहर ही अलग अलग चारपाई पर सोने की व्यवस्था कर दी। कुछ देर हम सब बातें करते रहे उसके बाद सोने के लिए लेट गए।

मुझे नींद नहीं आ रही थी। आंखों के सामने बार बार जमुना के साथ हुई चुदाई का दृश्य उजागर हो जाता था जिसके चलते मेरा रोम रोम रोमांच से भर जाता था। सुषमा और कंचन के नंगे जिस्म भी आंखों के सामने उजागर हो जाते थे। मैं सोचने लगा कि अब जब दोनों से दुबारा अकेले में मुलाक़ात होगी तो वो दोनों कैसा बर्ताव करेंगी? मैं इस बारे में सोच जी रहा था कि सहसा मुझे अनुराधा का ख़्याल आ गया।

अनुराधा का ख़्याल आया तो एकदम से मेरे दिलो दिमाग़ में अजीब से ख़्याल उभरने लगे। मैं सोचने लगा कि इस वक्त वो भी चारपाई पर लेटी होगी। मेरे मन में सवाल उभरा कि क्या वो भी मेरे बारे में सोचती होगी? मुझे याद आया कि उस दिन उसने कितनी बेरुखी से मुझसे बातें की थी और फिर मुझे वो सब कह कर उसके घर से चले जाना पड़ा था। क्या सच में अनुराधा को यही लगता है कि मैं बाकी लड़कियों की तरह ही उसे अपने जाल में फंसाना चाहता हूं? इस सवाल पर मैं विचार करने लगा। कुछ देर सोचने के बाद सहसा मुझे कुछ आभास हुआ। मैंने सोचा, अगर वो मेरे बारे में ऐसा सोचती है तो क्या ग़लत सोचती है? माना कि ये सिर्फ मैं जानता हूं कि मैं उसके बारे में कुछ भी ग़लत नहीं सोचता हूं लेकिन इस बात को भी तो नकारा नहीं जा सकता कि मेरा चरित्र पहले जैसा ही है।

एकदम से मुझे आभास हुआ कि मैं अपने उसी चरित्र की वजह से अभी कुछ घंटे पहले जमुना के साथ ग़लत काम कर के आया हूं और ये भी सच ही है कि जमुना के अलावा मैं सुषमा और कंचन को भी भोगने की हसरत पाले बैठा हूं। भला ये क्या बात हुई कि एक तरफ मैं अनुराधा की नज़र में अच्छा इंसान बनने का दिखावा कर रहा हूं वहीं दूसरी तरफ मैं अभी भी पहले की तरह हर लड़की और हर औरत को भोगने की ख़्वाइश रखे हुए हूं? इस बात के एहसास ने एकदम से मुझे सोचो के गहरे समुद्र में डुबा दिया। मैंने सोचा, अनुराधा ने अगर मुझसे वो सब कहा तो क्या ग़लत कहा था? मैं तो आज भी वैसा ही हूं जैसा हमेशा से था। फिर मैं अनुराधा से ये क्यों कहता हूं कि उसने मुझे मुकम्मल तौर पर बदल दिया है? क्या सच में मैं बदल गया हूं? नहीं, बिल्कुल नहीं बदला हूं मैं। अगर सच में बदल गया होता तो आज ना तो मैं सुषमा और कंचन को भोगने की इच्छा रखता और ना ही जमुना के साथ वो सब करता। इसका मतलब अनुराधा से मैंने अपने बदल जाने के बारे में जो कुछ कहा वो सब झूठ था। इस सबके बावजूद मैं ये ख़्वाइश रखता हूं कि अनुराधा मुझे समझे और वही करे जो मैं उससे चाहता हूं।

अचानक से मैंने महसूस किया कि मेरे दिलो दिमाग़ में आंधियां सी चलने लगीं हैं। एक अजीब सा द्वंद चलने लगा था मेरे अंदर जिसकी वजह से एकदम से मुझे अजीब सा लगने लगा। मैंने बेचैनी और बेबसी से चारपाई पर करवट बदली और ज़हन से इन सारी बातों को निकालने की कोशिश करने लगा मगर जल्दी ही आभास हुआ कि ये इतना आसान नहीं है। काफी देर तक मैं इन सारी बातों की वजह से परेशान और व्यथित रहा और फिर ना जाने कब मेरी आंख लग गई।

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"मालिक आप यहां?" शेरा ने दरवाज़ा खोला और जैसे ही उसकी नज़र बाहर खड़े दादा ठाकुर पर पड़ी तो आश्चर्य से बोल पड़ा था____"अगर मेरे लिए कोई हुकुम था तो किसी आदमी के द्वारा मुझे बोलवा लिया होता। आपने यहां आने का कष्ट क्यों किया मालिक?"

"कोई बात नहीं शेरा।" दादा ठाकुर ने दरवाज़े के अंदर दाख़िल होते हुए कहा____"वैसे भी बात ऐसी है कि उसके लिए हमारा खुद ही यहां आना ज़रूरी था।"

शेरा ने फटाफट चारपाई को सरका कर दादा ठाकुर के पास रखा तो दादा ठाकुर उस पर बैठ गए। ये पहला अवसर था जब दादा ठाकुर शेरा जैसे अपने किसी गुलाम के घर आए थे। दादा ठाकुर ने एक नज़र घर की दीवारों पर डाली और फिर शेरा की तरफ देखा।

"तुम्हें इसी वक्त चंदनपुर जाना होगा शेरा।" फिर उन्होंने गंभीर भाव से कहा____"अपने साथ कुछ आदमियों को भी ले जाना। असल में हमें अभी कुछ देर पहले ही पता चला है कि वैभव की जान को ख़तरा है। हम नहीं जानते कि वो कौन लोग हैं लेकिन इतना ज़रूर पता चला है कि वो सुबह ही चंदनपुर जाएंगे और वहां वैभव पर जानलेवा हमला करेंगे। तुम्हारा काम वैभव की जान को बचाना ही नहीं बल्कि उन लोगों को पकड़ना भी है जो वैभव को जान से मारने के इरादे से वहां पहुंचेंगे।"

"आप फ़िक्र मत कीजिए मालिक।" शेरा ने गर्मजोशी से कहा____"मेरे रहते छोटे ठाकुर को कोई छू भी नहीं सकेगा। मैं अपनी जान दे कर भी छोटे ठाकुर की रक्षा करूंगा और उन लोगों को पकडूंगा।"

"बहुत बढ़िया।" दादा ठाकुर ने शाल के अंदर से कुछ निकाल कर शेरा की तरफ बढ़ाते हुए कहा____"इसे अपने पास रखो और साथ में इस पोटली को भी लेकिन ध्यान रहे इसका स्तेमाल तभी करना जब बहुत ही ज़रूरी हो जाए।"

शेरा ने दादा ठाकुर के हाथ से कपड़े में लिपटी दोनों चीजें ले ली। शेरा ने एक चीज़ से कपड़ा हटाया तो देखा उसमें एक रिवॉल्वर था। दूसरी कपड़े की पोटली कुछ वजनी थी और उसमें से कुछ खनकने की आवाज़ भी आई। शेरा समझ गया कि उसमें रिवॉल्वर की गोलियां हैं।

"हमें पूरी उम्मीद है कि तुम अपना काम पूरी सफाई से और पूरी सफलता से करोगे।" दादा ठाकुर ने चारपाई से उठते हुए कहा____"कोशिश यही करना कि वो हमलावर ज़िंदा तुम्हारे हाथ लग जाएं।"

"मैं पूरी कोशिश करूंगा मालिक।" शेरा ने कहा____"मैं अभी इसी समय कुछ आदमियों को ले कर चांदपुर के लिए निकल जाऊंगा।"
"अगर वहां के हालात काबू से बाहर समझ में आएं तो फ़ौरन किसी के द्वारा हमें सूचना भेजवा देना।" दादा ठाकुर ने कहा____"चंदनपुर का सफ़र लंबा है इस लिए तुम हरिया के अस्तबल से घोड़े ले लेना।"

दादा ठाकुर की बात सुन कर शेरा ने सिर हिलाया और फिर उन्हें प्रणाम किया। दादा ठाकुर ने उसे विजयी होने का आशीर्वाद दिया और फिर दरवाज़े से बाहर निकल गए। दादा ठाकुर के जाने के बाद शेरा ने फ़ौरन ही अपने कपड़े पहने और कपड़ों की जेब में रिवॉल्वर के साथ दूसरी पोटली डालने के बाद घर से बाहर निकल गया।
 
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