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प्रिया की आंख खुली तो उसे लगा की वह अपने घर में है। कुछ पल बाद उसे पिछले दो दिनों की बातें याद आई और समझ गई की आहें उसकी मां नही पर उसकी जान बचाने वाली फुलवा भर रही थी।
कल जब फुलवा ने उसे मजेदार दर्द के बारे में बताया तो वह विश्वास नहीं कर पाई थी। रात को चिराग ने उसे इस कमरे में सोने को कहा तो वह चुपके से उसके पीछे पीछे जाकर दरवाजे को बिना आवाज किए खोल कर अंदर देखने लगी।
रण्डी की बेटी होने की वजह से उसे बचपन से खतरा था। उसकी मां ने उसे बचपन में ही सिखाया था कि कैसे बिना आवाज किए कमरे में आना और कैसे पता चले बगैर कमरे में से भाग जाना। प्रिया अपनी हिफाजत करने के लिए जासूसी करना सीखी और खतरों को पहचानने के लिए हर चीज याद करना भी सीख गई।
प्रिया नही जानती थी की वह क्या देखना चाहती थी पर उसने जो देखा वह उसकी उम्मीद से परे था। औरत और मर्द (यहां मां बेटे) एक दूसरे पर टूट पड़ने के बजाय एक दूसरे को मज़ा देने की होड़ में लगे नजर आए। फुलवा लगभग आधे घंटे तक बुरी तरह चीखने, अकड़ने और रोने के बाद अपने बेटे से खुश नज़र आई। फुलवा की चीखों में उसने कई बार मना किया था पर अब प्रिया को सोचना पड़ रहा था कि वह किस बात को माना कर रही थी?
क्या सच में मर्द से प्यार होता है?
क्या मर्द प्यार कर सकता है?
क्या प्रिया को प्यार हो सकता है?
क्या प्रिया से कोई मर्द प्यार कर सकता है?
क्या प्रिया भी दर्द को मजेदार.
प्रिया को एहसास हुआ की उसकी पैंटी गीली हो रही थी और उसे बुखार जैसे गर्मी लग रही थी। प्रिया इस बात से बेहद डर गई। अपने हाथों से अपने कान दबाकर फुलवा की आहें को भूलने की कोशिश करते हुए प्रिया बाथरूम में भाग गई।
प्रिया ने ठंडे पानी का शावर चालू किया और गाना गुनगुनाते हुए फुलवा की आहों को दबाने लगी। फुलवा की आहें प्रिया के दिल दिमाग पर हावी होकर उसके कानों में गूंज रही थी। ठंडा पानी उसके गरम बदन पर गिरते ही मानो भाप बनकर उड़ रहा था।
प्रिया समझ रही थी की उसे क्या हो रहा है। प्रिया जवानी की आग को महसूस कर रही थी। ऐसी आग जो एक दिन उसे ऐसे जलाएगी की वह उस मोटे कीड़े को अपने अंदर लेने को मजबूर हो जाएगी। प्रिया रण्डी की बेटी थी और उसके अब्बू ने उसे झीन के लिए ही तैयार किया था पर उसे वह कीड़ा देख कर हमेशा घिन आती थी। प्रिया शावर में बैठ कर रोने लगी क्योंकि आज चाहकर भी उसे चिराग का कीड़ा देख कर घिन नही आ रही थी।
प्रिया को डर सता रहा था कि वह अपनी मां की आखरी इच्छा पूरी नहीं कर पाएगी। प्रिया भी कीड़ा लेकर रण्डी बन जाएगी।
काफी देर बाद जब ठंडे पानी से प्रिया के बदन पर झुर्रियां पड़ने लगी तो वह ठिठुरती हुई बेडरूम में आ गई। उसने गाना जारी रखते हुए अपने कपड़े बदले और रसोई की ओर भागी। रसोई में सबके लिए नाश्ता बनाने के बाद जब प्रिया ने गाना बंद किया तो उसे एहसास हुआ कि दूसरे बेडरूम में से आवाजें बंद हो गई थी।
10 मिनट बाद मां बेटे नहाकर बाहर आए तो प्रिया उनसे आंख मिलाने से कतरा रही थी।
सुबह की गाड़ी पकड़ने के लिए ट्रेन के टिकट लेने चिराग समान लेकर आगे निकल गया। फुलवा की जिद्द पर चिराग को बापू की गाड़ी मुंबई पहुंचने का भी इंतजाम करना था। बाकी थोड़ा समान लेकर फुलवा और प्रिया को बाद में मोहनजी की गाड़ी में नारायण जी और सत्या के साथ रेलवे स्टेशन पहुंचना था।
फुलवा चुपके से, "मैं जानती हूं कि तुमने कल रात हमें देखा।"
प्रिया डर गई और अचानक अपना बदन चुराने लगी।
फुलवा, "यहां तुम्हें कोई पीटने वाला नही। एक बात हमेशा याद रखना पिटने को तयार रहोगी तो पिट जाओगी, पीटने को तयार रहोगी तो कोई पीटने से पहले एक बार सोचेगा जरूर।"
प्रिया, "माफ करना! मुझे लगा कि आप को चोट पहुंचाई जा रही थी!"
फुलवा ने प्रिया को अपनी बाहों में लेकर उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए उसे समझाया।
फुलवा, "जवानी में कदम रखना एक डरावना एहसास होता है। इसके लिए मां का साथ अच्छा होता है। जवानी के लिए न मेरे पास मां थी और ना ही तुम्हारे पास मां है। अगर तुम चाहो तो मुझे मां समझ सकती हो।"
प्रिया को अपनी खुशकिस्मती पर यकीन नहीं हो रहा था कि उसे इतनी जल्दी कोई अपनाने को तैयार हो गया है। प्रिया अपनी फुलवा मां की बाहों में समा गई पर कैसे बताती की उसकी आंखों से चिराग का लंबा मोटा कीड़ा जाने को तैयार नहीं था और उसे इस बात की घिन भी नहीं आ रही थी!!
प्रिया की आंख खुली तो उसे लगा की वह अपने घर में है। कुछ पल बाद उसे पिछले दो दिनों की बातें याद आई और समझ गई की आहें उसकी मां नही पर उसकी जान बचाने वाली फुलवा भर रही थी।
कल जब फुलवा ने उसे मजेदार दर्द के बारे में बताया तो वह विश्वास नहीं कर पाई थी। रात को चिराग ने उसे इस कमरे में सोने को कहा तो वह चुपके से उसके पीछे पीछे जाकर दरवाजे को बिना आवाज किए खोल कर अंदर देखने लगी।
रण्डी की बेटी होने की वजह से उसे बचपन से खतरा था। उसकी मां ने उसे बचपन में ही सिखाया था कि कैसे बिना आवाज किए कमरे में आना और कैसे पता चले बगैर कमरे में से भाग जाना। प्रिया अपनी हिफाजत करने के लिए जासूसी करना सीखी और खतरों को पहचानने के लिए हर चीज याद करना भी सीख गई।
प्रिया नही जानती थी की वह क्या देखना चाहती थी पर उसने जो देखा वह उसकी उम्मीद से परे था। औरत और मर्द (यहां मां बेटे) एक दूसरे पर टूट पड़ने के बजाय एक दूसरे को मज़ा देने की होड़ में लगे नजर आए। फुलवा लगभग आधे घंटे तक बुरी तरह चीखने, अकड़ने और रोने के बाद अपने बेटे से खुश नज़र आई। फुलवा की चीखों में उसने कई बार मना किया था पर अब प्रिया को सोचना पड़ रहा था कि वह किस बात को माना कर रही थी?
क्या सच में मर्द से प्यार होता है?
क्या मर्द प्यार कर सकता है?
क्या प्रिया को प्यार हो सकता है?
क्या प्रिया से कोई मर्द प्यार कर सकता है?
क्या प्रिया भी दर्द को मजेदार.
प्रिया को एहसास हुआ की उसकी पैंटी गीली हो रही थी और उसे बुखार जैसे गर्मी लग रही थी। प्रिया इस बात से बेहद डर गई। अपने हाथों से अपने कान दबाकर फुलवा की आहें को भूलने की कोशिश करते हुए प्रिया बाथरूम में भाग गई।
प्रिया ने ठंडे पानी का शावर चालू किया और गाना गुनगुनाते हुए फुलवा की आहों को दबाने लगी। फुलवा की आहें प्रिया के दिल दिमाग पर हावी होकर उसके कानों में गूंज रही थी। ठंडा पानी उसके गरम बदन पर गिरते ही मानो भाप बनकर उड़ रहा था।
प्रिया समझ रही थी की उसे क्या हो रहा है। प्रिया जवानी की आग को महसूस कर रही थी। ऐसी आग जो एक दिन उसे ऐसे जलाएगी की वह उस मोटे कीड़े को अपने अंदर लेने को मजबूर हो जाएगी। प्रिया रण्डी की बेटी थी और उसके अब्बू ने उसे झीन के लिए ही तैयार किया था पर उसे वह कीड़ा देख कर हमेशा घिन आती थी। प्रिया शावर में बैठ कर रोने लगी क्योंकि आज चाहकर भी उसे चिराग का कीड़ा देख कर घिन नही आ रही थी।
प्रिया को डर सता रहा था कि वह अपनी मां की आखरी इच्छा पूरी नहीं कर पाएगी। प्रिया भी कीड़ा लेकर रण्डी बन जाएगी।
काफी देर बाद जब ठंडे पानी से प्रिया के बदन पर झुर्रियां पड़ने लगी तो वह ठिठुरती हुई बेडरूम में आ गई। उसने गाना जारी रखते हुए अपने कपड़े बदले और रसोई की ओर भागी। रसोई में सबके लिए नाश्ता बनाने के बाद जब प्रिया ने गाना बंद किया तो उसे एहसास हुआ कि दूसरे बेडरूम में से आवाजें बंद हो गई थी।
10 मिनट बाद मां बेटे नहाकर बाहर आए तो प्रिया उनसे आंख मिलाने से कतरा रही थी।
सुबह की गाड़ी पकड़ने के लिए ट्रेन के टिकट लेने चिराग समान लेकर आगे निकल गया। फुलवा की जिद्द पर चिराग को बापू की गाड़ी मुंबई पहुंचने का भी इंतजाम करना था। बाकी थोड़ा समान लेकर फुलवा और प्रिया को बाद में मोहनजी की गाड़ी में नारायण जी और सत्या के साथ रेलवे स्टेशन पहुंचना था।
फुलवा चुपके से, "मैं जानती हूं कि तुमने कल रात हमें देखा।"
प्रिया डर गई और अचानक अपना बदन चुराने लगी।
फुलवा, "यहां तुम्हें कोई पीटने वाला नही। एक बात हमेशा याद रखना पिटने को तयार रहोगी तो पिट जाओगी, पीटने को तयार रहोगी तो कोई पीटने से पहले एक बार सोचेगा जरूर।"
प्रिया, "माफ करना! मुझे लगा कि आप को चोट पहुंचाई जा रही थी!"
फुलवा ने प्रिया को अपनी बाहों में लेकर उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए उसे समझाया।
फुलवा, "जवानी में कदम रखना एक डरावना एहसास होता है। इसके लिए मां का साथ अच्छा होता है। जवानी के लिए न मेरे पास मां थी और ना ही तुम्हारे पास मां है। अगर तुम चाहो तो मुझे मां समझ सकती हो।"
प्रिया को अपनी खुशकिस्मती पर यकीन नहीं हो रहा था कि उसे इतनी जल्दी कोई अपनाने को तैयार हो गया है। प्रिया अपनी फुलवा मां की बाहों में समा गई पर कैसे बताती की उसकी आंखों से चिराग का लंबा मोटा कीड़ा जाने को तैयार नहीं था और उसे इस बात की घिन भी नहीं आ रही थी!!


