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"मैं उस रात बहुत नशे में था। जब मेरी नींद खुली तो डॉली कमरे में नहीं थी। मैं उसे ढूँढ़ने के लिए बहार निकला तो पाया कि बग़ल वाला रूम जहाँ ज्योति ठहरी हुई थी, उसका दरवाज़ा खुला था। मैं उस कमरे में गया तो कमरे की लाइट्स बंद थीं। मैंने हल्की-सी रौशनी में देखा कि डॉली की लाश बैड पर पड़ी थी। उसके सीने में चक्कू घुसा हुआ था। मैंने जैसे वो चक्कू उसके सीने से निकला कि मेरे सर पर एक दो वार हुए। पता नहीं कौन था? उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं, आँख खुली तो हॉस्पिटल में था।" कहते हुए वो फिर से रो दिया। कुणाल आखों में सवाल लिये जय को देखे जा रहा था। जय समझ गया कि अब उसकी बारी थी। उसने राज से कहा-
"डॉली ज्योति के कमरे में क्या करने गयी थी?"
राज- "कहा ना मैं नहीं जानता, मैं तो रात भर से नशे में था!"
कुणाल- "क्या लगता है राज? कौन हो सकता है? जो तुम्हारी और डॉली की जान का दुशमन...?"
कुणाल की बात काटते हुए राज ने कहा-
"ज्योति! पागल थी वो मेरे लिए... वो मुझे अपना ग़ुलाम बनाके रखना चाहती थी। वो कुछ भी कर सकती थी। किसी को भी रास्ते से हटा सकती थी चाहे वो उसकी बहन डॉली ही क्यों ना हो। उसने मुझसे कहा भी था कि अगर मैंने उसकी ग़ुलामी नहीं की तो वो डॉली को मार देगी... उसी ने मारा है उसे... उसी ने!" कहते हुए वो रो पड़ा। जय और कुणाल अब आँखों ही आँखों में बातें कर रहे थे। एक तरफ़ ज्योति राज पर डॉली के क़त्ल का इल्ज़ाम लगा रही थी तो दूसरी तरफ़ अब राज ज्योति पर। गुथी सुलझने की बजाये और उलझती जा रही थी।
कुणाल- "देखो राज जब तक तुम हमें अपनी, डॉली और ज्योति की कहानी शुरू से नहीं सुनाओगे! ना तो हम तुम्हारी किसी बात का यक़ीन कर पायेंगे न ही तुम्हारी मदद। सो बेहतर होगा कि तुम हमें शुरू से सब कुछ सच-सच बताओ। एक-एक बात जो तुम्हारी बेगुनाही साबित कर सके!"
जय ने तब राज को वो कहानी सुनायी जो ज्योति ने उन्हें सुनायी थी। राज जय के मुँह से अपनी और ज्योति की कहानी सुनकर दंग था। एक भी शब्द ना ग़लत था ना झूठ। जय और कुणाल को ये तो समझ आ गया था कि ज्योति ने जो भी घटना बारात घर की बतायी थी वो बात सच थी। पर बारात घर के बाद क्या हुआ वो राज के मुँह से जानने को इच्छुक थे। जय ने कहा-
"देखो राज मानेसर के फ़ार्म हाउस में जो कुछ भी हुआ ज्योति ने हमें सब सच बता दिया है। मैं ये जानना चाहता हूँ कि उसके बाद क्या हुआ। जब तुम डॉली की डोली लेकर
वहाँ से चले गये।" जय ने देखा कि राज आगे की बात बताने में हिचकिचा रहा था। जय ने उसे चेतावनी दे डाली कि अगर उसने कुछ भी झूठ बताया तो डॉली के क़त्ल का शक उस पर भी जा सकता है। राज झल्ला उठा।
"मुझे शक है... शक नहीं यक़ीन है कि डॉली का मर्डर ज्योति ने ही किया है.. हाँ।"
जय- "अगर तुम्हें यक़ीन है तो मुझे बताओ फ़ार्म हाउस से जाने के बाद क्या हुआ था?" राज समझ चुका था कि ज्योति उसके और अपने रिश्ते के बारे में पुलिस को सब बता चुकी है। लिहाज़ा उसने भी आगे की बात बताने में कोई शर्म नहीं की। उसने बताना शुरू किया और जय की आँखों के सामने राज की कहानी किसी फ़िल्मी मंज़र की तरह घूमने लगी।
राज डॉली को अपने घर मेरठ ले आया था और वो अपने घर आकर वो कुछ ज़्यादा व्यस्त हो गया था। रिश्तेदारों के आमंत्रण की फ़ेरिस्त इतनी लम्बी थी कि कभी-कभी तो दिन में तीन बार उसका और डॉली का रिश्तेदारों के घर आना-जाना हो रहा था। उसे डॉली के साथ अकेले में वक़्त बिताने का मौक़ा ही नहीं मिल रहा था। जैसे एक ड्यूटी थी सुबह उठो, देखो आज किस रिश्तेदार के यहाँ जाना है, फिर देर रात को ओवरइटिंग करके घर आकर सो जाओ और इसी भाग दौड़ में उसके दिमाग़ से ज्योति भी निकल गयी थी। और फिर आख़िरकार वो दिन आ गया जब डॉली और राज को हनीमून के लिए निकलना था। वो केरल जा रहे थे। बेशक राज और डॉली के बीच अभी शारीरिक सम्बन्ध पूरी तरह से स्थापित नहीं हुआ था, पर दोनों के बीचे एक इमोशनल बोन्डिंग बन चुकी थी। डॉली राज को ख़ूब समझने लगी थी, इसीलिए तो उसने राज के कहे बिना उसका सारा सामान पैक कर दिया था और राज ने पाया कि उसके ज़रूरत की हर चीज़ उसके बैग में थी। ख़ुश था राज कि डॉली उसे अच्छी तरह समझने लगी थी। हाँ अब सब ठीक हो जायेगा। यही सोच उस दिन दोनों ने अपने माता-पिता से आशीर्वाद लिया और दिल्ली एयरपोर्ट के लिए टैक्सी पकड़कर रवाना होने लगे। राज की मम्मी रह-रहकर डॉली को हिदायत दिये जा रही थी-
"डॉली केरल जाकर अपना ख़याल रखना, खाने पीने में लापरवाई मत बरतना, राज खाने पीने में लापरवाह है, फ़ोन करती रहना!" और डॉली हर बात पर हाँ किये जा रही थी कि राज के पापा ने टोकते हुए कहा-
"अब जाने भी दो उनकी फ़्लाइट छूट जायेगी.. जा बेटा माँ की नसीहत तो ज़िन्दगी भर ख़त्म नहीं होती!" राज ने अपनी घड़ी देखी, वाक़ई देर हो रही थी। उसने मम्मी-पापा से आशीर्वाद लिया और डॉली को लेकर टैक्सी मैं बैठ रवाना हो गया।
"ये मिस्टर राज शर्मा और मिसेस डॉली शर्मा के लिए आख़िरी कॉल है। उनसे अनुरोध है कि वो जल्द से जल्द अपना सिक्यूरिटी चेक-इन काउंटर पर, नयी दिल्ली से केरल जाने वाली विमान संख्या E219 के लिए गेट न. 23A की तरफ़ प्रस्थान करें।" दिल्ली हवाई अड्डे पर घोषणा हो रही थी।
"डॉली ज्योति के कमरे में क्या करने गयी थी?"
राज- "कहा ना मैं नहीं जानता, मैं तो रात भर से नशे में था!"
कुणाल- "क्या लगता है राज? कौन हो सकता है? जो तुम्हारी और डॉली की जान का दुशमन...?"
कुणाल की बात काटते हुए राज ने कहा-
"ज्योति! पागल थी वो मेरे लिए... वो मुझे अपना ग़ुलाम बनाके रखना चाहती थी। वो कुछ भी कर सकती थी। किसी को भी रास्ते से हटा सकती थी चाहे वो उसकी बहन डॉली ही क्यों ना हो। उसने मुझसे कहा भी था कि अगर मैंने उसकी ग़ुलामी नहीं की तो वो डॉली को मार देगी... उसी ने मारा है उसे... उसी ने!" कहते हुए वो रो पड़ा। जय और कुणाल अब आँखों ही आँखों में बातें कर रहे थे। एक तरफ़ ज्योति राज पर डॉली के क़त्ल का इल्ज़ाम लगा रही थी तो दूसरी तरफ़ अब राज ज्योति पर। गुथी सुलझने की बजाये और उलझती जा रही थी।
कुणाल- "देखो राज जब तक तुम हमें अपनी, डॉली और ज्योति की कहानी शुरू से नहीं सुनाओगे! ना तो हम तुम्हारी किसी बात का यक़ीन कर पायेंगे न ही तुम्हारी मदद। सो बेहतर होगा कि तुम हमें शुरू से सब कुछ सच-सच बताओ। एक-एक बात जो तुम्हारी बेगुनाही साबित कर सके!"
जय ने तब राज को वो कहानी सुनायी जो ज्योति ने उन्हें सुनायी थी। राज जय के मुँह से अपनी और ज्योति की कहानी सुनकर दंग था। एक भी शब्द ना ग़लत था ना झूठ। जय और कुणाल को ये तो समझ आ गया था कि ज्योति ने जो भी घटना बारात घर की बतायी थी वो बात सच थी। पर बारात घर के बाद क्या हुआ वो राज के मुँह से जानने को इच्छुक थे। जय ने कहा-
"देखो राज मानेसर के फ़ार्म हाउस में जो कुछ भी हुआ ज्योति ने हमें सब सच बता दिया है। मैं ये जानना चाहता हूँ कि उसके बाद क्या हुआ। जब तुम डॉली की डोली लेकर
वहाँ से चले गये।" जय ने देखा कि राज आगे की बात बताने में हिचकिचा रहा था। जय ने उसे चेतावनी दे डाली कि अगर उसने कुछ भी झूठ बताया तो डॉली के क़त्ल का शक उस पर भी जा सकता है। राज झल्ला उठा।
"मुझे शक है... शक नहीं यक़ीन है कि डॉली का मर्डर ज्योति ने ही किया है.. हाँ।"
जय- "अगर तुम्हें यक़ीन है तो मुझे बताओ फ़ार्म हाउस से जाने के बाद क्या हुआ था?" राज समझ चुका था कि ज्योति उसके और अपने रिश्ते के बारे में पुलिस को सब बता चुकी है। लिहाज़ा उसने भी आगे की बात बताने में कोई शर्म नहीं की। उसने बताना शुरू किया और जय की आँखों के सामने राज की कहानी किसी फ़िल्मी मंज़र की तरह घूमने लगी।
राज डॉली को अपने घर मेरठ ले आया था और वो अपने घर आकर वो कुछ ज़्यादा व्यस्त हो गया था। रिश्तेदारों के आमंत्रण की फ़ेरिस्त इतनी लम्बी थी कि कभी-कभी तो दिन में तीन बार उसका और डॉली का रिश्तेदारों के घर आना-जाना हो रहा था। उसे डॉली के साथ अकेले में वक़्त बिताने का मौक़ा ही नहीं मिल रहा था। जैसे एक ड्यूटी थी सुबह उठो, देखो आज किस रिश्तेदार के यहाँ जाना है, फिर देर रात को ओवरइटिंग करके घर आकर सो जाओ और इसी भाग दौड़ में उसके दिमाग़ से ज्योति भी निकल गयी थी। और फिर आख़िरकार वो दिन आ गया जब डॉली और राज को हनीमून के लिए निकलना था। वो केरल जा रहे थे। बेशक राज और डॉली के बीच अभी शारीरिक सम्बन्ध पूरी तरह से स्थापित नहीं हुआ था, पर दोनों के बीचे एक इमोशनल बोन्डिंग बन चुकी थी। डॉली राज को ख़ूब समझने लगी थी, इसीलिए तो उसने राज के कहे बिना उसका सारा सामान पैक कर दिया था और राज ने पाया कि उसके ज़रूरत की हर चीज़ उसके बैग में थी। ख़ुश था राज कि डॉली उसे अच्छी तरह समझने लगी थी। हाँ अब सब ठीक हो जायेगा। यही सोच उस दिन दोनों ने अपने माता-पिता से आशीर्वाद लिया और दिल्ली एयरपोर्ट के लिए टैक्सी पकड़कर रवाना होने लगे। राज की मम्मी रह-रहकर डॉली को हिदायत दिये जा रही थी-
"डॉली केरल जाकर अपना ख़याल रखना, खाने पीने में लापरवाई मत बरतना, राज खाने पीने में लापरवाह है, फ़ोन करती रहना!" और डॉली हर बात पर हाँ किये जा रही थी कि राज के पापा ने टोकते हुए कहा-
"अब जाने भी दो उनकी फ़्लाइट छूट जायेगी.. जा बेटा माँ की नसीहत तो ज़िन्दगी भर ख़त्म नहीं होती!" राज ने अपनी घड़ी देखी, वाक़ई देर हो रही थी। उसने मम्मी-पापा से आशीर्वाद लिया और डॉली को लेकर टैक्सी मैं बैठ रवाना हो गया।
"ये मिस्टर राज शर्मा और मिसेस डॉली शर्मा के लिए आख़िरी कॉल है। उनसे अनुरोध है कि वो जल्द से जल्द अपना सिक्यूरिटी चेक-इन काउंटर पर, नयी दिल्ली से केरल जाने वाली विमान संख्या E219 के लिए गेट न. 23A की तरफ़ प्रस्थान करें।" दिल्ली हवाई अड्डे पर घोषणा हो रही थी।