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Erotica वासना का भंवर

लड़के वालों की तरफ़ अब राज अपने दोस्तों और कज़ंस के साथ बियर पी रहा था। सभी राज को एक सुखद गृहस्थ जीवन की नसीहत दे रहे थे। कुल मिलाकर वो ख़ुद को एक जोकर महसूस कर रहा था। जैसे कि दुल्हे का तो मज़ाक़ उड़ने का हक़ हर एक को होता है। पूरी छत एक मिनी बार में बदल चुकी थी। जगह-जगह लोग छोटे-छोटे झुण्ड बनाकर व्हिस्की और बीयर पी रहे थे और एक ढोल वाला पंजाबी बोलियों के साथ सबको नचा रहा था। ज़्यादातर लोगों को चढ़ चुकी थी। सबके बेढंगे डांस इस बात का प्रमाण थे और रागिनी यह मोमेंट्स अपने कैमरे में क़ैद कर रही थी कि राज के एक दोस्त ने रागिनी को आवाज़ लगते हुए कहा-

"रागिनी मैडम एक फ़ोटो हमारी राज भाई के साथ हो जाये.. आज तो बैचलर है कल से इसके गले में भी पति नाम का पट्टा आ जायेगा। उसकी बात पर सभी ने सहमती दिखाते हुए राज को बीच में कर लिया और हाथों में गिलास पकड़कर रागिनी के कैमरे के लिए पोज़ देने लगे थे।

और उधर दूसरी ओर ज्योति और डॉली अब दो-दो पैग पी चुके थे। डॉली को चढ़ने लगी थी। उसने गिलास नीचे रखते हुए कहा-

"बस ज्योति.. अब मुझे नींद आ रही है.. मैं सोने जा रही हूँ.." ज्योति ने उसे झिंझोड़ते हुए कहा, "नहीं.. ऐसा करोगी तो राज तुम्हें कभी प्यार नहीं करेगा.. समझी.. आज की रात तो उसके टैस्ट की रात होनी चाहिए। अच्छा बताओ वर्जिन हो?" ज्योति के इस बेतुके सवाल पर डॉली हैरान थी।

डॉली- "ये क्या सवाल हुआ.. राज मेरी ज़िन्दगी में पहला लड़का है.. और आख़िरी भी होगा। पर ये सवाल तू क्यों पूछ रही है? क्या तू वर्जिन नहीं है?"

"हाँ पर मेरा अभी टाइम नहीं आया, तेरे एक्सपीरियंस से ही सीखूँगी ना" कहते हुए पागलों की तरह हँसने लगी ज्योति.." डॉली ने मुँह पर हाथ रखते हुए कहा-

"हे भगवान्!" ज्योति की ये बेतुकी बातें सुनकर अब डॉली का दिमाग़ ख़राब हो रहा था।

"तू न बहुत ही गंदी हो गयी है ज्योति, मुझे न तुझसे बात ही नहीं करनी.." कहते हुए निकलने ही लगी थी कि ज्योति ने डॉली का हाथ पकड़ते हुए कहा- "किसी भी लड़के को ऐसी लड़की पसंद नहीं आती है जिसे कुछ ना पता हो.. डरी हुई सी घबराई हुई सी। जैसी कि तुम अब हो.. "डॉली जिसे अब चढ़ रही थी-

"मैं डरी हुई? हैं? मैं किसी से नहीं डरती बल्कि देखना राज मुझसे डरेगा!" कहते हुए अपनी ही बात पर हँस दी।

ज्योति- "दैन प्रूव इट.. नाओ... देखो नीचे, वो बड़ा कमरा है ना? जिसमें दहेज़ का सामान पड़ा है.. वहाँ उस कमरे में कोई नहीं आता जाता। मैं जीजू को वहाँ भेजती हूँ.. ठीक है तू चुपचाप जाकर उस कमरे में बैठ जा."

डॉली- "और मुझे क्या करना होगा?" ज्योति ने माथे पे हाथ मारते हुए कहा-

"जो शादी के बाद करोगी... वो आज करना है.. वैसे तुम्हें कुछ नहीं करना, जो करेगा राज करेगा.. समझी तुम.. बस उसे करने देना.. रोकना नहीं।" डॉली जो नशे में थी उसने आत्मविश्वास भरी हामी भर दी।

ज्योति- "गुड.. अब मैं राज को उस कमरे में भेजती हूँ.. ओके... तुम चुपचाप उस कमरे में जाकर बैठ जाओ।" कहते हुए ज्योति अपना घाँघरा सँभालते हुए वहाँ से निकल गयी। वो उस जगह पहुँच गयी थी जहाँ लड़के वाले थे और राज के होने की संभावना थी और कुछ ही देर में उसे सामने राज दिख गया कि तभी राज के चाचा हाथ में गिलास लेकर वहाँ आ गये।

"यार राज कहाँ घूम रहा है..चल आजा.. चाचा के साथ एक-एक हो जाये।" कहते हुए वो राज को अपने साथ ले जाकर ढोल की ताल पर नाचने लगा। ज्योति निराश हो गयी पर वो हर मानने वालों में से नहीं थी। वो वहाँ खड़े होकर मौक़े का इंतज़ार करने लेगी और जब भी उसे मौक़ा मिलता वो चुपके से सोनू के गिलास से एक छोटा-सा पैग पी लेती।

ज्योति ने देखा कि राज अब इन सब शराबियों से ख़ुद का पीछे छुड़वाने के तरीक़े खोज रहा था। मौक़ा अच्छा था, जैसे ही राज की नज़र ज्योति पर पड़ी उसने राज को इशारे से अपनी ओर बुलाया और उसके कान में इतना कह कर भाग गयी-

"वो दहेज़ वाले कमरे में आपका कोई इंतज़ार कर रहा है.." कहते हुए वहाँ से भाग गयी। राज की तो जैस बाँछे ही खिल गयीं। उसने दूर से देखा जहाँ ज्योति उसे उस रूम में जाने के लिए कह रही थी। उसकी उत्सुकता बढ़ गयी। उसने वहीं से जाम उठाकर ज्योति

को सहमती दे डाली। अब ज्योति सुनिश्चित हो गयी कि उसके जीजा को उसकी बहन डॉली का सन्देश मिल गया है जो उस दहेज़ वाले कमरे में पहुँच चुकी है और अब राज और उसके बीच अब कोई रिश्ता नहीं बनेगा।

पर राज जैसे ही अपना गिलास ख़ाली करके निकलने को था कि चाचा ने उसके गले में फिर से हाथ डाल दिया-

" कहाँ चल दिए बरखुरदार... आज की रात तो जाने नहीं देंगे तुम्हें.." राज ने देखा कि बड़े चाचा ने उसे गोद में उठा लिया और ढोल की तान पर नाचने लगे। राज परेशान था कि उसे दहेज़ वाले कमरे में पहुँचना है और यहाँ चाचा जी उसे नचाये जा रहे हैं। उसके पास कोई चारा नहीं था। बस वो इंतज़ार करने लगा कि एक-एक करके सब लुढ़कें तो वो जाये। रात गहराती जा रही थी। वक़्त बीत रहा था और राज की बैचनी बढ़ रही थी।

उधर लड़की वालों के यहाँ डॉली का कहीं पता नहीं चल रहा था। उसकी माँ डॉली का नाम पुकारकर उसे ढूँढ़ रही थी। पर किसी को नहीं पता था कि डॉली कहाँ गयी। अचानक उसे ज्योति दिखी जो चाची के साथ बैठकर मेहँदी लगवा रही थी। उसे देखते ही उसकी मम्मी ने उससे पूछा-

"डॉली कहाँ है?"

ज्योति- "मुझे क्या पता? मैं तो यहाँ मेहँदी लगवा रही हूँ!" इतना सुन उसकी मम्मी घबराती हुई बाहर निकल गयी। ज्योति जानती थी कि डॉली इस वक़्त राज के साथ दहेज़ वाले कमरे में है। पर इतनी देर कैसे लग गयी उसे? रात का एक बजने को था और डॉली अभी तक लौटकर नहीं आयी थी। इसे पहले ये बात सामने आ जाये ज्योति ने तय किया कि वो डॉली को लेकर आएगी। वो चुपचाप वहाँ से निकल गयी। बरात घर में तक़रीबन अब सभी सो चुके थे.. चारों तरफ़ अँधेरा पसरने लगा था। पर मिर्ची लाइट्स की रौशनी में सब साफ़ दिखायी दे रहा था।

ज्योति जैसे-तैसे दहेज़ वाले कमरे के सामने पहुँच गयी उसने धीरे से दरवाज़े को धकेला अंदर कोई नहीं था, हल्का-सा अँधेरा।

"डॉली? डॉली?" वो धीरे-धीरे आवाज़ लगा रही थी पर कोई जवाब नहीं आया। वो अपने पीछे दरवाज़ा बंद करके कमरे के अंदर आ गयी। वो डॉली को ढूँढ़ रही थी कभी सोफे के पीछे झाँक कर तो कभी पलंग के पीछे। अचानक उसे महसूस हुआ कि उसके पीछे कोई आया है। वो मुड़ पाती कि उससे पहले मज़बूत हाथों ने उसके सर पर हाथ रखकर उसे सोफे पर झुका दिया। ज्योति कुछ बोल पाती, उससे पहले एक मज़बूत हाथ ने उसकी चोली को पीठ से उठाकर ऊपर कर दिया। ज्योति चौंक गयी वो जैसे ही पीछे हटने को थी कि उसने देखा राज था। उसने अपने हाथ से ज्योति के मुँह को बंद करके धीरे से

जाकर दरवाज़ा बंद कर दिया। ज्योति को तो इस हादसे की उम्मीद ही नहीं थी, वो तो डॉली को ढूँढ़ने आयी थी। पर डॉली उसे कहीं नज़र नहीं आ रही थी और राज समझ रहा था कि ज्योति उसी से मिलने आयी है। राज ने बढ़कर ज्योति की ब्रा के नीचे से हाथ डालकर उसके वक्ष अपने हाथों में ले लिये। ज्योति इस बात का विरोध करने लगी।

ज्योति- "नहीं जीजा जी ये!" ज्योति अपनी बात पूरी कर पाती उससे पहले राज ने अपने होटों से ज्योति के होटों को जकड़ लिया। ज्योति ने बेशक अपने होंट कस कर बंद कर लिये थे पर राज की ज़ुबाँ के वार के आगे वो ज़्यादा देर टिक नहीं पायी। जैसे-जैसे राज के होंटों से रस ज्योति के मुँह में प्रवेश करने लगा ज्योति को हल्का-हल्का आनंद आने लगा था। एक तो ज्योति ने ख़ुद भी पी रखी थी ऊपर से राज के होंटों से वो नशीला रस ग्रहण कर रही थी। ज्योति का विरोध कम होने लगा कि अचानक उसे इस बात का एहसास हुआ कि ये सब तो डॉली का हक़ है, उसी के लिए तो वो सब कर रही थी। उसने राज को धीरे से पीछे करते हुए कहा-

"बस जीजा जी इसके आगे कुछ नहीं, ये सब डॉली के लिए है!" ज्योति की बात पूरी होने से पहले ही राज ने ज्योति का हाथ पकड़कर अपने लिंग पर रख दिया। ज्योति ने जैसे ही राज के तने लिंग का स्पर्श पाया वो घबरा गयी।

"नहीं जीजा जी प्लीज़ मुझे जाने दो!" पर राज पर तो अब काम क्रिया की सारी शक्तियाँ सवार थीं। उसने ज्योति के दोनों हाथ जकड़ते हुए उसके वक्षों पर चुम्बनों की बौछार कर दी।
 
"कुछ नहीं होगा डरो नहीं, सब आराम से करूँगा, ट्रस्ट मी तुम्हें अच्छा लगेगा.." बेशक ज्योति का मन इस बात का विरोध कर रहा था परन्तु उसके शरीर में राज को पाने की भूख जग चुकी थी। राज ने ज्योति के इस कमज़ोर लम्हे का फ़ायदा उठाते हुए दीवार की तरफ़ घूमा दिया। अब ज्योति अपने दोनों हाथों से दीवार का सहारा लेकर खड़ी थी और राज उसके पीछे। ज्योति ने जैसे ही नज़रें उठायीं सामने ड्रेसिंग टेबल थी। हल्की-सी रौशनी में वो शीशे में से राज को अपने पीछे देख पा रही थी। उसने देखा राज बहुत जल्दी में है। उसकी आँख बंद थीं, उसकी साँसों से उसकी भूख का अंदाज़ा लग रहा था। वो ज्योति की कमर को अपनी ओर ज़ोरों से खींच रहा था। अब ज्योति को भी राज का स्पर्श अच्छा लग रहा था, इसीलिए अब विरोध नहीं बल्कि राज की मदद कर रही थी। वो अपनी टाँगों को अँगूठे के बल उठाकर राज के क़द के बराबर ले आयी, जिससे राज आसानी से वो कर सके जो वो करना चाहता था। और फिर राज एक ज़ोर का झटका देते हुए ज्योति में समा गया। ज्योति की चीख़ निकलने वाली थी पर उसने अपने मुँह पर हाथ रख लिया। राज की चाल तेज़ होने लगी। वो ज्योति के भीतर विस्फोट करने को तैयार था और ज्योति उसे समेटने के

लिए। और फिर ज्योति को ऐसा लगा मानो कोई रेलगाड़ी का इंजन उसके अंदर से धधक-धधक करता हुआ तेज़ भाप छोड़ता हुआ अचानक स्टेशन पर थम गया हो। दोनों शांत हो गये। ज्योति अभी भी झुकी हुई थी। राज ने अपने कपड़े ठीक करते हुए उसकी पीठ को एक बार चूम लिया।

"थैंक्यू... अब तुम जाओ इससे पहले किसी को शक हो जाये!" पर उसने पाया कि ज्योति ने अचानक रोना शुरू कर दिया। अब राज डर गया।

"क्या हुआ रो क्यों रही हो? देखो जो भी हुआ सिर्फ़ तुम्हारे और मेरे बीच रहेगा, किसी को पता नहीं चलेगा!"

ज्योति- "पर ऐसा क्यों किया आपने जीजा जी, मेरी बहन से शादी हो रही है आपकी और आपने.?"

राज- "क्या मैंने? मैं थोड़े न तुम्हें बुलाने आया था तुम ख़ुद मेरे पास..." ज्योति ने राज की बात को काटते हुए कहा-

"मैंने तो डॉली को आपके पास भेजा था और अभी भी मैं डॉली को ही इस कमरे में ढूँढ़ने आयी थी। ये आपने ठीक नहीं किया, ठीक नहीं किया!" कहते हुए वहीं बैठकर रोने लगी। ये देख अब राज के हाथ पॉंव ठण्डे पड़ने लगे थे।

"यार तुम मुझे ये बात पहले नहीं बोल सकती थी?"

ज्योति- "आपने बोलने कहाँ दिया? बस सवार हो गये। बहुत ग़लत हो गया, बहुत ग़लत!" कहते हुए उसने अपने कपड़े ठीक किये और वहाँ से भाग गयी।

अब तो राज के चेहरे की हवाइयाँ उड़ रही थीं कि उसने जो भी ज्योति के संग किया उसमें उसकी रज़ामंदी नहीं थी। उसके पॉंव काँपने लगे कि ये उससे क्या हो गया। अब अगर बात बाहर आ गयी तो न जाने कितना बड़ा बवाल खड़ा हो जायेगा। यही सोचता हुआ वो अपने कमरे की तरफ़ चला गया। अपने कमरे में पहुँचकर वो भगवान को याद करने लगा। एक ही बात बड़बड़ाए जा रहा था-

"हे भगवान् इस बार बचा ले, आगे से ऐसा कोई काम नहीं करूँगा, बस एक बार भगवान् एक बार.."

उधर लड़की वालों की तरफ़ जब ज्योति पहुँची तो हैरान रह गयी कि कांता चाची उसे ही ढूँढ़ रही थी।

"कहाँ चली गयी थी तू?..तेरी माँ तुझे कब से ढूँढ़ रही है.. उसे सब पता चल गया है। आज तेरी ख़ैर नहीं। एक पल के लिए ज्योति घबरा गयी।

"क्या पता चल गया है?"

चाची- "जाकर देख डॉली कैसे उल्टियाँ कर रही है.... तूने उसे शराब पिलायी थी?"

ज्योति- "किसने कहा?" इतना सुनते ही ज्योति की मम्मी हाथ में चप्पल लेकर बाहर आ गयी जहाँ हाल में सभी औरतें बिस्तर लगाकर सोने की तैयारी कर रही थीं। डॉली की मम्मी ने चप्पल से ज्योति को पीटने शुरू कर दिया-

"किसने कहा? डॉली ने ख़ुद कहा कि तूने उसे शराब पिलायी ... इतनी... कि छत पर छोड़ आयी.... ये तो सोनू ने देख लिया... कहीं लड़के वाले देख लेते तो?... तू आज नहीं बचेगी.. जान से मार दूँगी तुझे!" कहते हुए उसने ज्योति पर चप्पलों की बौछार कर दी।

"कब सुधेरेगी ये... अक्कल है कि नहीं... आज तो में इसे जान से मार दूँगी।.. कल लड़की की शादी है और ये उसे शराब पिलाने ले गयी!" अचानक कांता चाची की नज़र ज्योति के कपड़ों पर पड़ गयी। उसे कुछ गड़बड़ लग रही थी। उसने जैस-तैसे ज्योति को उसकी माँ के हाथों से छुड़वाकर अंदर कमरे में जाने को कहा। ज्योति के कमरे में जाने से पहले उसने ज्योति का कान में कहा-

"सीधे बाथरूम में जाना नहाने के लिए.." ज्योति समझ गयी थी कि चाची ऐसा क्यों कह रही है।

ज्योति ने अपने कमरे में आकर देखा वहाँ डॉली ओंधे मुँह सो रही थी। ज्योति समझ गयी थी कि जब उसने डॉली को दहेज़ वाले रूम में जाने के लिए कहा था तो ये वहीं लुढ़क गयी थी। अचानक उसने महसूस किया कि उसकी टाँगों पर एक पतली-सी ख़ून की धारा बह रही है। वो समझ गयी कि चाची ने उसे नहाने के लिए क्यों कहा था। वो फट से बाथरूम में घुस गयी और बाथरूम में पहुँचते ही उसने अपने कपड़े एक-एक करके उतारने शुरू कर दिये। अगले पल वो शीशे के सामने निर्वस्त्र खड़ी थी। उसने अपनी जाँघों को छूकर देखा जहाँ से ख़ून का रिसाव हो रहा था। वो समझ गयी कि वो अपनी वर्जिनिटी खो आयी थी। वो भी राज के संग जो उसका होने वाला जीजा था। उसने अपने ऊपर फ़व्वारा खोल दिया और देखते-देखते पानी की तेज़ फ़ुहार में उसकी टाँगों में जमा ख़ून पानी के साथ नाली में बहने लगा। ज्योति उस बहते हुए ख़ून को देख रही थी। एक तरफ़ जहाँ वो अपनी वर्जिनिटी खोने का सुख उसे गुदगुदा रहा था तो दूसरी तरफ़ उसे इस बात का ग़ुस्सा था कि ये सब उसके साथ राज ने किया जो उसके होने वाला जीजा था। वो टॉवल से अपने बदन को पोंछते हुए यही सोच रही थी कि अचानक बाथरूम का दरवाज़ा खुल गया। उसने पाया किवो दरवाज़े की कुण्डी बंद करना भूल गयी थी और चाची सीधी अंदर आ गयी। उसकी नज़र से नाली में बह रहा लाल रंग का पानी छुप नहीं पाया। जैसे ही उसने अपनी आँखों में सवाल भरते हुए ज्योति को देखा, ज्योति का रोना निकल आया। कांता चाची

समझ गयी थी कि कुछ तो गड़बड़ हो गयी है। उसने मुँह पर उँगली रखकर ज्योति को चुप रहने का इशारा किया कि कहीं डॉली न जाग जाये और उसे कपड़े बदलकर बाहर आने के लिए कहा।

अगले पल कांता चाची बारात घर में बने बड़े से बग़ीचे में खड़ी थी, जहाँ मज़दूर डॉली की शादी की वेदी तैयार करके गये थे। इस वक़्त पूरे बरात घर में सन्नाटा पसरा हुआ था। ज्योति अपने कमरे बाहर आयी उसने देखा कांता चाची बहुत घबराई हुई है मानो वो सब समझ चुकी थी। ज्योति को अपने क़रीब पाकर उसने ज्योति पर सवाल दाग दिया-

" क्या हुआ? कैसे हुआ? बोल?" ज्योति हैरान थी कि चाची को कैसे शक हो गया? क्यों न हो आख़िर दो बच्चों की माँ है, सब पता होगा उसे। ज्योति की चुप्पी देखकर चाची ने ज्योति को झिंझोड़ते हुए पूछ ही लिया-

"बोल कौन?" ज्योति के मुँह से एक दम निकल गया।

"राज!" राज का नाम सुनते ही कांता चाची के तो होश उड़ गये, वो तो चकराकर गिरने ही वाली थी कि उसने वहाँ बनी वेदी के खम्बे का सहारा लेते हुए कहा-

"कल यहाँ इसी वेदी में तेरी बहन के फेरे राज से होने वाले हैं और तू अपने होने वाले जीजा के साथ? छी! छी! ज्योति मैं समझती थी कि तू सिर्फ़ बड़बोली है। अच्छे गंदे जोक्स मार लेती है, पर तूने तो हद पार कर दी ज्योति!"

"नहीं चाची ऐसा नहीं है, मैं ऐसा कुछ नहीं करना चाहती थी, वो तो राज.." ज्योति अभी अपनी बात पूरी कर ही नहीं पायी थी कि चाची ने उसका हाथ झटकते हुए कहा-

"हाँ राज तुझे ज़बरदस्ती उठाकर ले गया ना और तू बेजान गुड़िया चुपचाप ... सब कुछ होने दिया। मैं तुझे अच्छी तरह जानती हूँ ज्योति। हल्दी के टाइम भी तो राज के साथ गंदी हरकत कर रही थी। उसका पायजामा उतरवा दिया, उसको यहाँ-वहाँ छूने की कोशिश कर रही थी। दिख नहीं रहा था मुझे क्या? अंधी हूँ?" ज्योति अब रोये जा रही थी। "चाची मेरी बात सुनो, इसमें मेरी कोई ग़लती नहीं है.." कि चाची ने हाथ उठाते हुए उसकी हर दलील ख़ारिज करते हुए कहा-

"बस ज्योति! ग़लती किसी की भी रही हो पर सज़ा डॉली को ही भुगतनी पड़ेगी और अगर ये बात बाहर आ गयी तो समझ लेना कि सारा खेल ख़त्म। कितने ही रिश्ते टूटेंगे, कौन जियेगा कौन मरेगा कुछ नहीं पता और इस सब की ज़िम्मेदार तू होगी। बस एक ही रास्ता है कि जो भी हुआ उसे एक दम भूला दे और दुबारा डॉली और राज के नज़दीक भी मत आना.... अगर तू सबकी ख़ुशी चाहती है।" कहते हुए चाची वापस जाने को थी कि ज्योति ने उसे पुकार कर पूछा-

"और मेरी ज़िन्दगी? मेरे दुःख सुख?"

"वो इस वक़्त कोई मायने नहीं रखते!" कहते हुए कांता निकल गयी। ज्योति वहीं खड़े-खड़े रोने लगी। वो रोते हुए उस वेदी के पास बैठ गयी जहाँ अगले दिन डॉली और राज ने फेरे लेने थे।

इधर केरल में ज्योति ये सारी कहानी जय और कुणाल को सुना रही थी। कहानी सुनते-सुनाते उसके भी आँसू निकल आये। कुणाल ने उसके आगे पानी का गिलास करते हुए पूछा-

"उसके बाद तुमने क्या किया?"

ज्योति- "उस वक़्त तो मैं बहुत दुखी थी। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि मेरे संग धोखा हुआ है। जो राज ने मेरे साथ किया था। चलो माना कि उसमें कुछ हद तक मेरी नादानी थी, पर मुझे एक ही बात खाए जा रही थी कि कोई मेरी ज़िन्दगी के साथ ऐसे खिलवाड़ करके कैसे निकल सकता है। उस रात चाची ने मुझसे जो भी कहा, अगर मेरी मम्मी होती तो शायद वो भी मुझे यही कहकर चुप करवा देती। मैंने तय कर लिया कि अगर इस खेल में मैं अकेली पड़ गयी हूँ तो फिर ये खेल मैं खुलकर खेलूँगी। अगर यही इस खेल के नियम हैं तो यही सही!"

कुणाल- "मतलब क्या है तुम्हारा? कैसा खेल? कैसे नियम?" जय कुणाल की इस उत्सुकता को अपनी सहमती दे रहा था।

ज्योति ने कहा, "अब मुझे राज चाहिए था हर हाल में हर क़ीमत पर। चाची के जाने के बाद मैं अपने कमरे में चली आयी जहाँ डॉली सो रही थी। उसके बाद जो ज्योति ने बताना शुरू तो जय और कुणाल के सामने सब कुछ किसी फ़िल्मी मंज़र की तरह फिर से चलने लगा।
 
उस रात ज्योति अपने कमरे में लौट तो आयी पर अब वो बदली हुई ज्योति थी। वो डॉली के बग़ल में लेटकर उन लम्हों में खो गयी जो वो राज के संग बिताकर आयी थी। चाची से मिलने के बाद तो अब उसे किसी भी बात का गिल्ट नहीं था। वो बस बिस्तर पर करवट लेकर उन यादों को दोबारा जीने की कोशिश कर रही थी। वो इमैजिन कर पा रही थी कि डॉली को किस लेवल का सुख मिलने वाला था। उसने पलटकर डॉली को देखा। उसके मन में अब अजीब से विचार आने लगे थे। डॉली की शादी को अभी एक दिन बाक़ी था। अब वो उससे पहले राज को एक बार और पाना चाहती थी और ये थी एक ख़तरनाक खेल की शुरूआत।

उधर राज अपने कमरे में परेशान था उसे नींद नहीं आ रही थी। वो रह-रहकर घड़ी को देख रहा था कि कब सुबह होगी और ज्योति ये बात सबको बता देगी और फिर जो होगा? बस अपने मन में एक डर बिठा लिया था उसने। बस मन ही मन भगवान से प्राथना कर रहा था के कुछ भी करके इस मुसीबत से बाहर निकाल दे कि अचानक उसके फ़ोन

पर एक मैसेज आया। नाम था ज्योति शर्मा। वो डर गया के न जाने ज्योति ने क्या लिखा होगा। उसने डरते-डरते मैसेज खोला उसमें ज्योति ने लिखा था-

"हाय! कैसे हो जीजू?' राज तो इतना घबरा गया था कि उसने एक लम्बा-सा मैसेज टाइप कर डाला-

"ज्योति देखो जो हुआ सब अनजाने में हुआ। मैंने बहुत पी रक्खी थी। हो सके तो इस बात को भुला दो!" ज्योति ने जब राज का ये मैसेज देखा तो वो समझ गयी कि राज अंदर से डरपोक है। उसके साथ अब खेला जा सकता है उसने जवाब में लिखा

"अगर न भूलाऊँ तो?" राज ने जवाब दिया-

"प्लीज़ तुम जो कहोगी मैं वही करूँगा!"

ज्योति- "ठीक है तो इसी वक़्त मुझे वहीं आकर मिलो... उसी कमरे में.."

राज- "दिमाग़ ख़राब हो गया है तुम्हारा.. मैं तुम्हें बात को ख़त्म करने को कह रहा हूँ और तुम बात को बढ़ा रही हो.."

ज्योति- "आते हो या फिर इस बात को नाश्ते के समय सुबह वायरल कर दूँ? मर्ज़ी तुम्हारी है... राज बाबू.. अभी मिलना है अकेले में या फिर सुबह नाश्ते पे सबके बीच!" राज के पसीने छूट रहे थे। वो समझ नहीं पा रहा था कि आख़िर ज्योति चाहती क्या है। उसने काँपते हाथों से टाइप किया-

"ठीक है मैं आता हूँ!" ज्योति ने मुस्कुराकर फ़ोन बंद किया वो ख़ुश थी कि अब राज उसकी मट्ठी में है। वो डॉली को देखकर मुस्कुरायी जो गहरी नींद में सो रही थी। उसके माथे पर हाथ रखकर कहा-

"थैंक्स डॉली तुम्हारी शादी पे तोहफ़ा तो मुझे तुम्हें देना चाहिए था पर मुझे ये तोहफ़ा मिल गया.. तुमसे.."

ज्योति अब बदल चुकी थी। वो अब इस खेल को खुल के खेलने के लिए तैयार थी। वो चुपचाप दरवाज़ा खोलकर बाहर निकली गयी। उसने देखा सब थक के सो रहे थे। दीवार पर लगी घड़ी में रात के २ बज रहे थे। दबे क़दमों से वो बाहर निकल गयी। अब पूरे बारातघर में सन्नाटा छाया हुआ था। ज्योति चुपचाप उस कमरे में पहुँच गयी जहाँ दहेज़ का सामान पड़ा था। अंदर पहुँचते ही ज्योति ने देखा राज उससे पहले पहुँच चुका था। ज्योति ने अंदर आते ही दरवाज़ा बंद कर दिया। ज्योति को देखते ही राज उसके पाँव में गिर गया-

"ज्योति प्लीज़ मुझे माफ़ कर दो... मैं सच कहता हूँ ऐसा दोबारा नहीं होगा!" ज्योति राज की ये मजबूरी देख अंदर ही अंदर ख़ुश हो रही थी। उसने राज के मज़बूत काँधे पकड़कर उसे सीधा खड़ा किया। राज अभी भी माफ़ी माँगने की मुद्रा में था।

ज्योति- "बस मिस्टर राज अब घबराना बंद करो और मुझे बाबूराव के दर्शन करवायो.."

राज- "बाबूराव? कौन बाबूराव? मैं समझा नहीं!" ज्योति ने उसके काँधे पर अपना हाथ घुमाते हुए उसकी शर्ट के बटन खोलते हुए कहा-

"शर्ट उतरिये.." राज के पास ज्योति की बात मानने के सिवाए कोई चारा नहीं था। उसने अपनी शर्ट उतर दी। ज्योति अब अपने हाथ उसकी छाती पर फेरने लगी थी।

ज्योति- "जिम जाते हो लगता है?"

राज- "हाँ.. रेगुलर.." ज्योति अब उसके सामने सोफे पर पाँव रखकर बैठ गयी।

ज्योति- "चलो पायजामा उतारो.." इतना सुन राज घबरा गया। पर ज्योति की नज़रों में उसे एक हुकुम दिखायी दे रहा था। राज ने वैसा ही किया। ज्योति ने देखा के पायजामे के नीचे राज ने भूरे रंग का वी शेप जाँघिया पहना हुआ था।

ज्योति- "लगता है आपको भूरा रंग बहुत पसंद है.." कहते हुए उसने उसके जाँघिये पर अपना हाथ हल्का-हल्का घुमना शुरू कर दिया। राज हैरान था कि ज्योति क्या कर रही है और ज्योति ने महसूस किया कि उसके जाँघिये में हरकत शुरू हो गयी। उसने मुस्कुराते हुए कहा-

"बाबूराव जाग रहा है.. पहचान नहीं करवायोगे इनसे हमारी? " ज्योति की तीखी मुस्कराहट देख राज समझ गया था कि ज्योति बाबूराव किसे कह रही थी। ज्योति एक दम पीछे हटी। उसने राज के जाँघिये की तरफ़ इशारा करते हुए कहा

"अब इसे भी उतार दो होने वाले...जीजा जी.."

राज- " मैं तुम्हारे सामने कैसे?" ज्योति ने एक धमकी भरे स्वर में कहा, "क्यों पीछे से ही सब करना जानते हो? सामने से शर्म आ रही है? उतारो जल्दी!"

राज ने डरते-डरते अपना जाँघिया नीचे खिसका दिया। राज के गुप्त अंग को देख ज्योति की ऑंखें फटी की फटी रह गयीं। उसने किसी लड़के के गुप्त अंग को इतनी क़रीब से कभी नहीं देखा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई चिड़िया पेड़ से लटक कर अपने घोंसले में सो रही है। ज्योति उसे महसूस करना चाहती थी उसने हाथ आगे बढ़ाते हुए राज से इजाज़त माँगी-

ज्योति- "छु लूँ?" राज जानता था कि अगर वो मना भी करेगा तो भी ज्योति मानने वाली नहीं उसने अपना चेहरा घूमा लिया और ज्योति ने हाथ आगे बढ़ाकर उसके गुप्त अंग को छू लिया जो फ़िलहाल नीचे की तरफ़ झुका हुआ था। ज्योति उसे ऐसे प्यार करने लगी जैसे कोई किसी पालतू जानवर को पुचकारता है। ज्योति ने महसूस किया जैसे-जैसे उसके हाथ राज के अंग पर चल रहे थे उसमें हरकत हो रही थी। मानो वो जाग रहा हो। अचानक ज्योति ने पाया कि राज का वो अंग अब धीरे-धीरे सीधा होकर ज्योति को देखने लगा था। ज्योति के लिए ये एक अद्भुत अनुभव था। उसके चेहरे की रौनक़ बता रही थी कि उसे यक़ीन ही

नहीं था कि उसके छूने से किसी का गुप्त अंग ऐसे हरकत करने लगेगा। किसी नन्हे बच्चे की तरह उत्साहित को कर बोली-

"देखो राज.. बहुत जल्दी पहचान हो गयी तुम्हारे बाबूराव से..." अब वो अपने हाथ को ऊपर नीचे करके उसे और सहलाने लगी और कुछ ही पल में राज का वो अंग छोटे हाथी की सूंड की तरह चिंघाड़ रहा था, मानो ज्योति को सलामी दे रहा हो। पर राज को ये सब बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था।

राज- "क्यों कर रही हो तुम ये सब ज्योति? कम से कम हमारे रिश्ते का तो लिहाज़ तो करो!" ज्योति ने उसके लिंग को अपनी मट्ठी में दबोचते हुए कहा-

"यही सवाल मैंने तुमसे पूछा था, तुमने किया था लिहाज़? मैं रोयी, चिल्लायी पर तुमने इस रिश्ते का फ़ायदा उठाया! तो अब मैं इस खेल को तुम्हारे ही अंदाज़ में खेलना चाहती हूँ तो प्रॉब्लम क्या है तुम्हें?" ज्योति ने देखा कि राज के पास इस बात का जवाब नहीं था। कहते हुए ज्योति राज की कमर के पास झुक गयी अब राज का बाबूराव उसकी मट्ठी में था। जो अब इतना सख़्त और आकार में बड़ा हो चुका था कि ज्योति की मट्ठी भी उसके लिए छोटी पड़ रही थी।

राज ज्योति के इस पागलपन से परेशान हो रहा था पर उसके पास ज्योति की इस दीवानगी को सहने के सिवाए कोई चारा नहीं था कि ज्योति एक दम खड़ी हुई उसने धीरे-धीरे राज के सामने अपनी चोली के बटन खोलने शुरू कर दिये। राज ने नज़रें फेर लीं। ज्योति ने उसका चेहरा अपनी ओर करते हुए कहा-

"ये सब आपके लिए ही तो कर रही हूँ जीजा जी देखो.." कहते हुए उसने अपने ब्लाउज़ के सारे बटन खोल डाले। राज ने देखा कि उसने काले रंग की ब्रा पहनी हुई है जो उसके गोरे बदन को और निखार रही थी। ज्योति ने अपना हाथ पीठ पर ले जाकर एक ही झटके में ब्रा का हुक खोल डाला और काँधे से स्ट्रिप हटाते हुए ब्रा को नीचे गिरा दिया। राज देखकर स्तब्ध रह गया ज्योति के वक्ष छोटे-छोटे से थे परन्तु एक दम तने हुए थे। मानो अभी-अभी उन पर जवानी आयी थी। न कोई दाग़ न ही कोई सिलवट और गुलाबी रंग के वक्ष कांता। ज्योति अब राज की नज़रें पढ़ रही थी। वो जान गयी थी कि राज उसके चंगुल में फँस चुका है। वो एक पॉंव रखकर सोफे पे चढ़ गयी जिससे उसके वक्ष राज के चेहरे के पास आ जायें। उसने अपने दोनों वक्ष हाथ में लिये और अपने वक्ष बिन्दुओं राज के होंटों पर घूमाने लगी और कुछ ही पल में राज ने अपने होंट खोल दिये और उसकी ज़ुबाँ बाहर आकर लार टपकाने लगी थी। ज्योति एकदम नीचे उतर गयी और एक ही झटके में बाबूराव को ज़ोर से दबोच लिया। राज सिहर उठा।
 
ज्योति- "अब बोलो हमसे दोस्ती होगी इसकी?" राज ने दर्द से करहाते हुए कहा-

"हाँ! पर इसकी क़ीमत बहुत बड़ी है ज्योति। कल मेरी तुम्हारी बहन से शादी है!"

ज्योति- "उसकी चिंता तुम मत करो जीजू.. पति तुम डॉली के ही रहोगे.. बस मुझे तो बाबूराव से थोड़ी-सी दोस्ती चाहिए।" राज अब सबकुछ भुलाकर ज्योति के जाल में फँस चुका था। उसने देखा ज्योति ने अपनी बाज़ू राज के काँधे पे डाल दी थीं। राज से अब रुका नहीं जा रहा था, उसने अपना हाथ बढ़ाकर ज्योति की पीठ को दबोचना शुरू कर दिया और अपने होंटों के रस से ज्योति के वक्षों को नहलाने लगा। खिलाड़ी था राज, वो जानता था कि लड़की के किस अंग पर क्या क्रिया करने से उत्तेजना बढ़ती है। ज्योति ने अब अपने बदन को ढील देते हुए उसे राज के हवाले कर दिया। राज ने ज्योति को गोद में उठाया और वहाँ सोफे पर लेटा दिया। ज्योति भी अब तैयार थी। राज ने पूछा-

"अब बाबूराव के लिए क्या हुकुम है?" ज्योति ने मुस्कुराते हुए कहा-

"बोलो खुल जा चुनमुनियाँ.." राज को अब ज्योति का ये अंदाज़ अच्छा लग रहा था उसने भी कहा-

"खुल जा चुनमुनियाँ.." और ज्योति ने अपनी टाँगे फैलाकर राज के लिए चुनमुनियाँ के द्वार खोल दिये और राज ने भी एक ही झटके में बाबूराव को चुनमुनियाँ के द्वार में प्रवेश करवा दिया। ज्योति को अद्भुत सुख की प्राप्ति हो रही थी। उसने अपने सारे नाख़ून राज की पीठ में गाड़ दिये।

राज का डर अब जा चुका था। अपनी साली के साथ संग करने की उत्तेजना ही अलग थी। अब वो दोनों स्वयं को भोग रहे थे। और कुछ ही पल बाद दोनों ने उस अद्भुत विस्फोट को अपने भीतर महसूस किया। जिसे चरम सुख कहते हैं। ज्योति राज पदार्थ को अपने भीतर महसूस करते ही राज को एक पल के लिए कसकर जकड़ लिया। एक पल का सन्नाटा था। अचानक ज्योति ने टाइम देखा सुबह के तीन बजने वाले थे। उसने जल्दी से अपने कपड़े पहने।

"कल मिलते हैं... " कहते हुए निकल गयी। राज हैरान था कि कल? फिर से यही करना पड़ेगा क्या? पर जो भी हुआ राज को राहत ही नहीं ख़ुशी भी देकर गया था। कपड़े पहनते हुए वो मुस्कुराकर मन में यही सोच रहा था कि सुना था साली आधी घरवाली होती है, पर उसने तो महसूस कर लिया था उसे ऐसा लग रहा था कि अब उसके दोनों हाथों में लड्डू हैं, पर वो ये नहीं जानता था कि ये लड्डू कितने ज़हरीले होने वाले थे।

अगले दिन बारात घर शादी के मण्डप से सज चुका था। राज बहुत ख़ुश था उसके दिमाग़ पे कोई टेंशन नहीं थी। बारात वहीं से चलकर, एक चक्कर लगाकर वापस वहीं आ गयी। ख़ूब नाचे घोड़ी के आगे लड़के वाले और राज भी घोड़ी पे बैठा-बैठा नाच रहा था। शादी से ज़्यादा उसे डॉली और ज्योति दोनों को एक साथ पाने की ख़ुशी थी।

शादी की रस्में विधिपूर्वक हुईं। ज्योति हर रस्म में डॉली के साथ ही चिपकी रही और राज ने भी ऐतराज़ नहीं किया। सभी ख़ुश थे। शादी अच्छे से निपट गयी थी। जैसे-जैसे विदाई का वक़्त नज़दीक आ रहा था, राज की चिंता बढ़ रही थी। वो नहीं जानता था कि ज्योति का अब अगला क़दम क्या होगा!

विदाई भी बारात घर के आहाते में ही होनी थी। बस सबको इंतज़ार था कि दुल्हन कपड़े बदलकर आ जाये। उधर राज दुल्हन की विदाई करवाने का इंतज़ार कर रहा था कि ज्योति ने देखा कि राज अकेला है, उसने मौक़े का फ़ायदा उठाया और उसके पास जाकर बैठ गयी।

"कैसा महसूस कर रहे हैं जीजा जी?"

राज- "समझा नहीं.. मतलब जैसा एक दूल्हा महसूस करता है.."

"नहीं आज तो सुहागरात है न आपकी?" फब्ती कसते हुए ज्योति ने कहा। राज समझ गया था कि ज्योति के दिमाग़ में कोई तो ख़ुराफ़ात चल रही थी।

"हाँ शादी के बाद तो सुहागरात ही होती है.."

ज्योति- "क्या करोगे सुहागरात में "

राज ने हिचकिचाते हुए कहा " मतलब .. क्या है तुम्हारा? .. क्या करूँगा?"

ज्योति- "सेक्स! आप कहने से शर्मा रहे हैं.. पर कहना यही चाह रहे थे है ना? है ना?" कहते हुए ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी। राज ने दबी आवाज़ में कहा- "क्या कर रही हो लोग देख रहे हैं!"

ज्योति- "हाँ तो यही समझ रहे होंगे कि जीजा साली में मज़ाक़ चल रहा है.. हाँ तो मैं पूछ रही थी सुहागरात में क्या करोगे?" राज समझ गया था कि ज्योति वही जवाब सुनना चाहती है जो वो चाहती थी। राज ने ज्योति को टालने के लिए दबी आवाज़ में उससे कहा- "हाँ सेक्स!!"

"पर डॉली के साथ नहीं मेरे साथ!" कहते हुए वो मुस्कुराकर राज को देखने लगी मानो अपनी हँसी में वो भरी बिरादरी के बीच उसे हुकुम दे रही थी जो राज के लिए धमकी जैसा था। ज्योति ने राज की आँखों में डर देखते हुए कहा-

"डरो नहीं मैं आपको मैसेज करके बताऊँगी कि कहाँ आना है.. बस आप डॉली दीदी के नज़दीक मत जाना, कोई भी बहाना बना देना...मेरे लिए मेरे बाबूराव को सँभालकर रखना.." कहकर हँसते हुए वहाँ से निकल गयी। राज को अब लगने लगा था कि ज्योति का ये खेल ख़तरनाक मोड़ ले रहा है कि ज्योति की मम्मी ने आवाज़ लगायी-

"कोई डॉली को लेकर आयो डोली का वक़्त हो गया है.." ज्योति ने झट से कहा- "मैं लेकर आती हूँ।" उसने मुड़कर एक बार राज को देखा मानो एक रिमाइंडर था उसके लिए कि रात को उसे क्या करना है।

उधर कमरे में डॉली दुल्हन बनी अपनी विदाई का इंतज़ार कर रही थी। उसे रह-रहकर नींद आ रही थी कि उसकी एक सहेली ने उसे छेड़ते हुए कहा-

"अभी से नींद आ रही है?.. अभी तो राज ने तुझे रात भर जगाना है.." उस सहेली की बातें सुनकर डॉली की सभी सहेलियाँ हँस दीं। राज का स्मरण कर डॉली भी मन ही मन शर्मा गयी थी कि इतने में ज्योति दनदनाती हुई अंदर आ गयी।
 
"चलो-चलो सब बाहर निकलो मुझे डॉली दीदी से अकेले में बात करनी है।" सभी सहलियों के बाहर जाते ही ज्योति ने दरवाज़ा बंद कर लिया। इतना देख डॉली एक दम ज्योति के गले लग गयी-

ज्योति- "क्या हुआ?"

डॉली- "बहुत डर लग रहा है ज्योति .."

ज्योति- "कैसा डर?"

डॉली- "पता नहीं आज क्या होगा.. अब ऐसा लग रहा है काश कल तेरी बात मान ली होती तो आज ये डर निकल गया होता.. बे मतलब दारू पीकर लुढ़क गयी।" ज्योति ने कुछ सोचते हुए कहा, "कोई बात नहीं अब पूरी ज़िन्दगी वही तो करना है।"

डॉली- "यार तू समझ नहीं रही आयी ऍम वर्जिन!"

ज्योति- "हाँ तो कोई जुर्म थोड़े न है? हर लड़की वर्जिन होती है और ये तो वो परीक्षा है जिसे देने में डर बेशक लगता है पर पास होने की पूरी गारंटी होती है।"

डॉली- "हाँ तू तो ऐसे कह रही है जैसे तुझे बड़ा एक्स्पीरिंस है... दिल डर रहा है राज कैसा होगा? वो मुझसे क्या बात करेगा... देख मुझसे तो पहले-पहल नहीं होगी.. तू बता ना नेट पे देखकर मुझे क्या करना चाहिए.."

ज्योति- "डॉली तू न बे-मतलब में नर्वस हो रही है.. इट्स नैचुरल प्रोसेस यार.. और सुन आज की रात तो राज को नज़दीक आने मत दियो!" डॉली ने चौंकते हुए पूछा-

"क्यों? नहीं नहीं अगर वो चाहेगा मैं मना नहीं करूँगी.. आफ़्टर ऑल अब वो मेरा हस्बैंड हैं यार... वैसे मुझे थोड़ा बहुत पता चल गया है कि क्या करना है।"

ज्योति- "किसने बताया तुझे?" ज्योति डॉली से इस बात का जवाब ले पाती कि अचानक दरवाज़ा खुल गया और कांता चाची अंदर आ गयी थी। उसकी नज़र ज्योति पर थी कि कहीं ज्योति डॉली को कुछ बताकर गड़बड़ ना कर दे।

चाची- "लो बाहर सब विदाई का इंतज़ार कर रहे हैं और ये लड़कियाँ अभी तक गप्पे मार रही हैं।"

ज्योति- "नही बस वो मैं डॉली को बता रही थी कि शादी के बाद क्या करना होता है।" चाची ने डॉली को उठाकर उसका भारी लहँगा सँभालते हुए कहा-

"कोई ज़रूरत नहीं, मैंने सब समझा दिया है इसे कि पहली रात ही पति का दिल कैसे जीतना है।" ज्योति समझ रही थी कि चाची उसे डॉली से दूर रहने का इशारा कर रही थी। चाची ने डॉली का घूँघट सीधा करते हुए उसके कान में कुछ कहा जिसे सुनकर डॉली ने शर्माते हुए हाँ में सर हिला दिया और बाहर जाते हुए ज्योति को एक आँख मार गयी। ज्योति अब चिंतित थी कि राज से उसने वादा लिया है कि वो डॉली के साथ आज रात किसी भी हाल में सेक्स नहीं करेगा पर चाची तो जैसे डॉली को जिता कर रहेगी। उसके भाव बदलने लगे थे। बात अब उसके अहम् पे आ गयी थी। मानो उसने ठान लिया था कि कुछ भी हो जाये राज आज सुहागरात उसकी बहन डॉली के साथ नहीं बल्कि उसके साथ मनायेगा।

बाहर बैंडवालों ने वही परिचित धुन छेड़ दी थी बाबुल की दुआएँ लेती जा... जा तुझको सुखी संसार मिले..' बरसों से बैंड वाले हर दुल्हन की विदाई पर यही धुन बजाते आये हैं। ज्योति देख रही थी कि डॉली रोते हुए सबके गले लग रही थी और सभी रो रहे हैं। ये मौक़ा ही ऐसा होता है न चाहते भी आँसू निकल ही आते हैं, पर ज्योति की नज़र तो राज पर जमी थी जो ज्योति के आगे-आगे चल रहा था। जहाँ डोली वाली कार खड़ी थी। ज्योति कोशिश कर रही थी कि राज उसे एक बार देख ले पर राज रिश्तेदारों के डर से उसे नहीं देख रहा था। क्योंकि वो नहीं चाहता था कि उसके और ज्योति के रिश्ते के बारे में किसी को भनक भी लगे। राज डॉली को डोली में लेकर बैठ गया। रागिनी ने उनकी आख़िरी तस्वीर खींचते हुए कार की खिड़की से झुक कर राज से कहा-

"ओके राज आल दा बेस्ट फ़ॉर योर न्यू लाइफ़.. बस इतना ही कहूँगी कि इस रिश्ते को ईमानदारी से निभाना जैसे तुमने आज तक हर रिश्ते को निभाया है।" डॉली के गाल को छूकर वो उसे बाय कहकर चली गयी। डोली की कार चक्कर लगाकर वापस आ गयी। मइके, ससुराल दोनों तरफ़ की रस्में सबकुछ इसी बरात घर में ही होनी थीं।

मइके से चलकर अब डॉली अपने ससुराल पहुँच गयी थी और यहाँ डॉली के साथ अभी भी कांता चाची थी। राज की मम्मी और बाक़ी की औरतों ने डॉली के साथ वो सभी रस्में बड़े चाव से कीं जो एक नयी नवेली दुल्हन के साथ होती हैं। डॉली बहुत ख़ुश थी। आज उसके नये जीवन की शुरूआत होने जा रही थी। उसका मन राज के साथ सुहाग के कमरे में जाने के लिए उतावला हो रहा था। शादी होते ही सेक्स करने की इच्छा जागृत हो जाती है। ये नेचुरल प्रोसेस ही है। सही तो कहती थी ज्योति। वो मन ही मन ज्योति को बहुत

दुआएँ देने लगी। जो सामने दरवाज़े पे खड़ी इन रस्मों को देख रही थी। वो बेचारी नहीं जानती थी कि जिस बहन को वो इतनी दुआएँ दे रही थी वही उसकी शादीशुदा ज़िन्दगी के दरवाज़े पर आग के दरिया बिछा चुकी थी कि तभी कांता चाची डॉली को उसके सुहाग के कमरे में ले गयी।

राज को उसके दोस्तों ने कमरे से बाहर ही रोक लिया। सुहाग का कमरा ख़ुशबूदार फूलों से सजा हुआ था। चाची ने प्यार से डॉली को बैड पर बिठाया।

"आज से तेरी नयी ज़िन्दगी शुरू होने वाली है डॉली। पता है जब मेरी शादी हुई थी तो तेरी माँ ने मुझे सारी बातें समझायी थीं जो आज मैं तुझे समझाने जा रही हूँ।

देख हर लड़की के जीवन में यह मोमेंट आता है। पहली बार जब वो सेक्स के लिए तैयार होती है। डर लगता है किसी अजनबी चीज़ को देखकर।" चाची की बातें सुनकर डॉली शर्मा रही थी।

"क्या चाची कैसी बातें कर रही हो!"

चाची- "ये बातें जो तेरे साथ अब होंगी.. देख डरना नहीं... राज को भी तो कोई सिखाकर भेजेगा.. अगर वो तुझसे बड़ा खिलाड़ी निकला तो? ये खेल तुझे ही जीतना है समझी? याद रखना पहली रात जिस लड़की ने बिल्ली मार ली.. मतलब पति को ख़ुश कर लिया, उसका प्यार पा लिया, ज़िन्दगी भर पति को क़ाबू में रखती है।"

वो जब डॉली को ये सब समझा रही थी वो नहीं जानती कि ज्योति कमरे के अंदर आ चुकी है। वो देख रही थी कि कैसे चाची डॉली को राज के लिए तैयार कर रही हैं।

चाची- "देख हो सकता है राज शर्माये, नर्वस हो.. पर तू नहीं होना अगर वो पहल करने से डरे तो तू पहल करना।

डॉली- "अगर उसने मेरी तरफ़ ध्यान ही नहीं दिया तो?"

चाची- "क्यों नहीं देगा? इतनी सुंदर बीवी है उसकी, बाई चांस उसने ऐसा किया तो उसके सामने कपड़े बदल लेना शर्मना नहीं। बस ध्यान रहे उसकी नज़र तुम्हारे बदन से नहीं हटनी चाहिए बस बाक़ी फिर वो करेगा... समझ गयी?" डॉली चाची को हैरानी से देखे जा रही थी। डॉली-पाठ करने वाली कांता चाची ऐसी बातें भी खुलकर कर सकती है। चाची डॉली को प्यार करके बाहर जाने को थी कि उसने पाया ज्योति वहाँ खड़ी है।

चाची- "तू यहाँ क्या कर रही है?"

ज्योति- "मुझे ज़रा डॉली से बात करनी थी!" चाची ने ज्योति का हाथ पकड़ते हुए कहा-

"बस आज कुछ नहीं, आज उसे राज के साथ छोड़ दे.. आज उसका दिन है.. तू चल मेरे साथ।" वो लगभग ज्योति को अपने साथ खींचकर ले गयी। दरवाज़ा बंद था। डॉली

की नज़र अब दरवाज़े पर थी जहाँ से अब राज को आना था। राज... नाम में ही प्यार था जो डॉली को मिलना था। एक अजीब-सी गुदगुदी हो रही थी उसके दिल में। आज उसके दिलो-दिमाग़ में राज के सिवाय कुछ भी नहीं था। बस उस सुखद अनुभव को लेने के लिए अपने घुटनों पर सर रख के राज का इंतज़ार करने लगी।
 
सुहाग के कमरे के बाहर ही राज खड़ा था.. सफ़ेद शेरवानी सर पर बाल बिखरे हुए क्योंकि गर्मी के कारण अपनी पगड़ी उतार दी थी। राज की बड़ी चाची छोटी चाची, बुआ सभी तो उसे तंग कर रहे थे, अंदर नहीं जाने दे रहे थे। हँसी खेल चल रहा था और दूर खड़ी ज्योति यही सोच रही थी कि राज से जो उसने वादा माँगा है वो पूरा करेगा कि नहीं कि तभी राज की मम्मी ने सबको टोकते हुए कहा-

"चलो अब सब हटो अंदर जाने दो, राज को बहुत थक गया है। नींद आ रही होगी बेचारे को।" कि सभी औरतों ने हँसते हुए राज को डॉली के कमरे में धक्का दे दिया और राज की बुआ ने बाहर से दरवाज़ा बंद कर दिया। ज्योति ने देखा के राज की बुआ ने तो बाहर से कुण्डी लगा दी है अब राज को अगर बाहर आना होगा तो कैसे आयेगा? और उधर अंदर डॉली ने जैसे ही दरवाज़े पर आहट महसूस की वो समझ गयी कि राज आया है। वो सर पर साड़ी का पल्लू सँभालते हुए सहम कर बैठ गयी।

राज अब डॉली के क़रीब था। डॉली तो राज को अपने पीछे खड़ा देख सहम ही गयी। किसी पराये लड़के को ऐसे बंद कमरे में उसने अपने इतनी क़रीब कभी नहीं महसूस किया था। वो भी, वो लड़का जिसके सामने उसे अपना सब कुछ निछावर करना था। डॉली के तो हाथ-पैर फूलने लगे थे। राज ने देखा कि लाल रंग की साड़ी, लाल ब्लाउज़, गले में मंगल सूत्र, माँग में लाल सिन्दूर और हाथ में लाल रंग की चूड़ियाँ और पूरी की पूरी गहनों से लदी हुई थी डॉली। किसी ज्वैलरी की मॉडल लग रही थी। डॉली बिस्तर पर बैठकर चादर के कोने को उँगलियों से घुमाने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि पहला क़दम कौन बढ़ाएगा। राज ने सामने आकर हल्की-सी मुस्कान से उसका अभिनन्दन किया और अपनी शेरवानी के बटन खोलने लगा। उसके दिमाग़ से ज्योति का डर जा नहीं रहा था और डॉली समझ रही थी कि पहल कौन करेगा! उसने देखा कि राज ने शेरवानी उतारी, पर उससे पहले डॉली ने राज की शेरवानी पकड़ ली और साइड में रख दी। पहली ही रात उसने अपने पत्नी धर्म का परिचय दे दिया था। डॉली ने देखा कि राज अब बनियान और नीचे सिल्क का पायजामा पहने हुए था। वो फिर से राज के अगले क़दम का इंतज़ार करने लगी पर राज था कि वो बार-बार अपने फ़ोन को देख रहा था कि कहीं ज्योति का मैसेज ना आ जाये। डॉली ने उसका ध्यान तोड़ते हुए पूछ लिया-

"किसी ख़ास फ़ोन का इंतज़ार है?" डॉली की बात सुनकर राज घबरा गया-

"नही.. वो बस कुछ दोस्तों के फ़ोन जो शादी में नहीं आ पाये.. " राज ने अपने डर को छुपाते हुए डॉली से झूठ बोल दिया।

डॉली- "कोई बात नहीं आप आराम से अपने दोस्तों से बात कर लीजिये।" कहते हुए उसने अपना चेहरा AC की तरफ़ कर दिया।

"कितनी गर्मी है ना!" कहते हुए वो अपनी साड़ी का पल्लू नीचे करके ए सी की तरफ़ मुँह करके ठंडी हवा लेने लगी। राज ने शीशे में से देखा कि डॉली बहुत सुंदर थी। शादी की थकान के कारण मेकअप जगह-जगह से बिखर गया था। बालों की लटें यहाँ-वहाँ से उसके जूड़े का साथ छोड़कर उसके चेहरे पर लहरा रही थीं। अजीब-सा आकर्षण था डॉली में। राज की नज़रें डॉली से हट नहीं रही थीं। उसका जी कर रहा था बस उसे देखता ही जाये। अचानक डॉली की नज़रें राज से मिल गयीं। ये देख राज भी चौंक गया। उसने अपनी नज़रें फेर लीं। डॉली भी मुँह फेरकर मन ही मन मुस्कुरा दी। आख़िर राज ने उसे देख लिया था, पर सवाल था कि पहला क़दम कौन उठाएगा? पर डॉली तो हर क़दम के लिए तैयार थी। यही तो सिखाया था कांता चाची ने उसे और राज भी यही सोचे जा रहा था कि इतनी सुंदर पत्नी थी उसकी और वो हाथ में फ़ोन थामे साली के फ़ोन का इंतज़ार कर रहा था! उससे रहा नहीं गया, उसने अपना मोबाइल ऑफ़ कर दिया। उसने देखा कि डॉली अब चुपचाप बैड पर आकर बैठ गयी। मानो आमंत्रण था राज के लिए। राज भी धीरे से डॉली के पास जाकर बैठ गया। राज को क़रीब पाते ही डॉली के दिल की धड़कने बढ़ने लगीं कि अब राज का अगला क़दम क्या होगा? राज ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाकर डॉली के हाथ पर रख दिया। राज का स्पर्श क्या पाया डॉली ने किउसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। डॉली के दिल की धड़कन राज अब महसूस कर रहा था। डॉली ने आधे मन से अपना हाथ खींचना चाहा कि राज ने उसका हाथ पकड़ लिया और धीरे से अपने होंट डॉली के होंटों के पास ले गया। राज की साँसों को अपने होंटों पर महसूस कर डॉली तो ऐसे काँप गयी जैसे राज कोई ह्यूमन बम हो, जो कभी भी फट जायेगा। उसने आँख बंद करके दूसरे हाथ से चादर को मुट्ठी में भींच लिया।

"पहली बार?" डॉली की घबराहट देखते हुए राज ने डॉली से पूछ डाला। पहले तो डॉली को कुछ समझ नहीं आया कि राज ने अपने होंट उसके कान के पास ले जाकर पूछा-

"मतलब इससे पहले किसी लड़के ने तुम्हें छुआ है?" डॉली ने आँख बंद किये ही 'ना' में सर हिला दिया। इसके बाद राज ने धीरे से डॉली के हाथ से चादर की पकड़ ढीली की और उसके हाथ पकड़कर अपने गाल पर रख दिया। डॉली तो सिहर उठी। पहला स्पर्श था डॉली के लिए किसी मर्द का। वो तो बस आँख बंद करके काँपे जा रही थी। बस इजाज़त दे दी थी राज को कि वो जो चाहे करे।

"डर लग रहा है तो रहने देते हैं?" राज ने डॉली की घबराहट देखते हुए अपना हाथ पीछे खींचना चाहा कि डॉली ने राज का हाथ पकड़ लिया और 'ना' में सर हिलाते हुए फिर से आँख बंद कर लीं। संकेत था ये राज के लिए कि वो उसकी घबराहट की परवाह किये बिना आगे बड़े।

डॉली- "लाइट बहुत ज़्यादा है मुझे शर्म आ रही है।" राज के चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी। उसने जाकर लाइट बंद की तो पाया कि उस कमरे में एक नीले रंग का बल्ब जल रहा था। जिसकी रौशनी बड़ी रोमांटिक थी। उसने देखा कि नीले रंग की रौशनी डॉली के बदन पर पड़कर उसे और निखार रही थी। वो धीरे से डॉली के पास गया और धीरे से उसके सर से उसका पल्लू सरका दिया। कितनी ख़ूबसूरत थी डॉली और फिर धीरे-धीरे उसके गहनों के संग खेलने लगा। हर गहने को वो छूकर देख लेता जो डॉली की ख़ूबसूरती को निखार रहे थे। सर का माँग टिका, फिर कानों के झुमके। डॉली राज की इस क्रिया में उसका साथ दे रही थी। जब-जब राज उसके गहने छूता, उसकी उँगलियाँ डॉली को छू जातीं। एक सुखद अनुभव था डॉली के लिए और फिर अंत में राज ने उसके गले से एक बड़ा-सा सोने का हार जिसकी डोरी पीछे की ओर थी, धीरे से उतार दिया। जैसे ही वो हार डॉली के बदन से सरकता हुआ उतरा। डॉली की तो जैसे जान ही निकल गयी। राज ने देखा डॉली का असली रूप अब उसकी नज़रों के सामने था। इतनी सुंदर थी उसके बदन की बनावट। क्यों न हो सिर्फ़ २४ साल की सुन्दरी थी डॉली। वो भी अनछुई ख़ूबसूरती। राज को अब डॉली के बदन की ख़ुशबू अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। वो अब ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना चाहता था, पर डॉली को पूरा सम्मान भी देना चाहता था। उसने हाथ बढ़ाकर डॉली की पीठ से उसके ब्लाउज़ को डोरी धीरे से खोल दी। डॉली उत्तेजनावश एक पल के लिए छटपटाई, जिसका प्रमाण उसकी खनकती चूड़ियों ने दिया। राज के हाथ डॉली की पीठ पर जैसे ही आये, डॉली को न जाने क्या हुआ वो राज से लिपट गयी और राज ने भी अब डॉली को अपने आग़ोश में ले लिया। दो प्रेमी अब इस राज-सफ़र के लिए तैयार थे। राज ने धीरे से डॉली की पीठ पर हाथ सरकाकर धीरे-धीरे उसके ब्लाउज़ के हुक खोलने लगा। वो डॉली के गाल चूमता और एक हुक खोलता, फिर दो, फिर तीन। जैसे ही वो ब्लाउज़ के हुक खोलता डॉली आँख बंद करके अपनी मुट्ठी से चादर को पकड़ लेती। राज के इस वार से उसे मीठे मीठे झटके लग रहे थे और अगले ही पल डॉली का ब्लाउज़ अब डॉली के बदन को त्याग चुका था। प्रेमे के सामने अब डॉली के उभरे हुए वक्ष थे। जो अब पूर्ण आज़ादी के लिए बेताब हो रहे थे, जिसके लिए राज राज़ी था पर उन नन्हे क़ैदियों को आज़ाद करने से पहले राज एक बार डॉली के होंट चूम लेना चाहता था, पर उसने पाया कि डॉली ने अब भी डर के मारे आँखें बंद की हुई हैं। राज डॉली की

इस मासूमियत का फिर से क़ायल हो गया। उसके दिल ने आवाज़ दी कि उसे डॉली से प्यार हो गया है। वो एक टक डॉली को देखा जा रहा था। उसने हाथ बढ़ाकर डॉली के ब्रा का हुक खोल डाला। हुक के खुलने के हल्के झटके ने ही डॉली के अंदर एक अजीब से सरसराहट पैदा कर दी। राज देख रहा था कि कैसे डॉली आँख बंद किये अपनी साड़ी से अपने वक्षों को ढँके काँप रही थी। राज ने डॉली की मासूमियत देखते हुए उसके कान में फुसफुसाया-

"एक बार देखोगी भी नहीं डॉली कि तुम्हें चाहने वाला चेहरा कैसा है?" इतना सुनते ही डॉली ने आँखें खोल दीं। राज का चेहरा बिल्कुल उसके सामने था। इतना क़रीब कि उसकी साँसें डॉली की साँसों से टकरा रही थीं। डॉली की साँसें बढ़ने लगीं। इतनी कि उसके वक्ष अब रह-रहकर राज को अपने होने का प्रमाण दे रहे थे। ये भी उसके लिए नया अनुभव था। डॉली ने हिम्मत करके कहा-

"आपकी छवि तो मैंने दिल में बसा ली है। आँख बंद करती हूँ तो भी आप ही दिखते हैं मुझे!" कहते हुए उसने फिर आँखें बंद कर लीं।
 
एक ही झटके में राज ने डॉली के बदन से साड़ी खिकसा दी और उसके बदन को उसके वस्त्रों से आज़ादी दे दी। डॉली का गोरा बदन किसी पवित्र झरने की तरह राज के सामने था, जिसमें राज अब गोता लगाना चाहता था। राज ने अपनी हथेली धीरे से डॉली की पीठ पर क्या रखी, डॉली राज में और सिमट गयी। राज अब आसानी से उसकी पीठ सहला रहा था। राज अपने होंट धीरे से डॉली के होंटों के क़रीब ले आया। दोनों की साँसें आपस में टकराकर किसी चक्रवात के आने का संकेत देने लगी थीं। राज ने डॉली की हिम्मत की सरहाना करते हुए अपने होंट डॉली के होंटों पर रख दिये। डॉली ने भी विरोध नहीं किया। डॉली के लिए किसी पराये होंटों के रस का स्वाद एक नया अनुभव था। जो उसे अच्छा लग रहा था। राज और डॉली अब सब कुछ भुलाकर दूसरी दुनिया में पहुँच चुके थे। पर वो नहीं जानते थे कि उनकी इस राज क्रीडा पर किसी और की भी नज़र थी। 'ज्योति' जो पिछली खिड़की के परदे से अपने क्रोध को उबालते हुए ये सारा नज़ारा देख रही थी, अचानक वो वहाँ से ग़ायब हो गयी और यहाँ अब राज डॉली के संग आख़िरी गोता लगाने के लिए तैयार था। राज ने डॉली को आराम से बिस्तर पर वक्षों के बल लेटा दिया और फिर हल्के-हल्के डॉली की पीठ पर अपने होंटों से फूँकने लगा। डॉली तो बस चादर को अपनी मुट्ठियों से भींचे कांता चाची को याद कर रही थी। सही कहा था उन्होंने कि प्यार के यही सही मायने हैं। राज ने अचानक धीरे-धीरे डॉली की पीठ पर चुम्बनों को बौछार कर दी। डॉली सिहर उठी। फिर राज ने डॉली को धीरे से सीधा किया। डॉली तो इतनी शर्मा गयी कि उसने दोनों हाथों से अपने वक्ष ढँक लिये और ऑंखें ज़ोर से बंद कर लीं। राज ने

धीरे से डॉली के दोनों हाथ पकड़े और सीधे कर दिये। डॉली ने पहले तो विरोध किया पर राज की इस प्यार भरी पकड़ के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। दो बदन प्यार की आग में जलने को तैयार थे।

डॉली बंद आँखों से ही इस सुखद अनुभव को महसूस कर पा रही थी। उसका दिल अंदर ही अंदर अब उस सुखद दस्तक का इंतज़ार करने लगा जो राज किसी भी पल दे सकता था। उसके दिल ने उलटी गिनती शुरू कर दी थी। कभी भी वो उस असीम मिलन को महसूस कर सकती थी। जो क़ुदरत की रचना है। जो सच्चे प्यार की परिभाषा है। धक-धक करता हुआ उसका दिल उसके लिए ये गिनती गिन रहा था कि अचानक! अचानक! दरवाज़े पर ज़ोर से खटखटाने की आवाज़ आने लगी। बाहर से राज की मम्मी के चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी।

"राज! डॉली! जल्दी बाहर आयो.. जल्दी करो!" एक घबराहट थी राज की मम्मी की आवाज़ में। ये सुनकर डॉली और राज दोनों घबरा गये उन्होंने अपने कपड़े जल्दी-से ठीक किये और राज ने जाकर दरवाज़ा खोल दिया। पीछे-पीछे डॉली भी आ गयी। उसके बाद राज ने जो देखा तो उसके होश उड़ गाये। बाहर शादी की वेदी जहाँ उसके फेरे हुए थे धूँ-धूँ करके जल रही थी। कई लोग बाल्टी में पानी लेकर उस आग को बुझाने की कोशिश कर रहे थे। यह देख तो डॉली बहुत डर गयी। वो अपनी माँ के पास जाकर खड़ी हो गयी। राज को शायद अंदाज़ा था कि ये आग कैसे लगी। उसकी नज़रें ज्योति को ढूँढ़ने लगीं थी कि अचानक किसी की थपकी ने राज को चौंका दिया। वहाँ ज्योति खड़ी थी। उसने धीरे से राज के कान में कहा-

"ये तो ट्रेलर है जीजा जी, पिक्चर तो आपको सारी ज़िन्दगी दिखाऊँगी मैं आपको!" राज का शक यक़ीन में बदल गया कि ये सब ज्योति का किया-धरा था।

राज- "क्यों किया ये सब?"

ज्योति- "कहा था न मैंने कि डॉली के संग सुहागरात मनाने से पहले तुम मेरे साथ मोहब्बत करोगे.. कहा था न मैंने? और मुझे अवॉयड करने के लिए अपना फ़ोन भी बंद कर दिया।" राज ने देखा ज्योति की बात में एक ख़तरनाक धमकी छुपी हुई थी।

ज्योति- "अभी रात बाक़ी है अगर चाहते हो ये सब दोबारा न हो तो चले आना.. छत पर मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूँ।" कहते हुए वो वहाँ से निकल गयी। राज समझ चुका था कि वो बुरी तरह से ज्योति के चंगुल में फँस चुका है। बात अब उसकी नहीं रही, ज्योति किसी को भी नुक्सान पहुँचा सकती थी अगर उसकी बात न मानी गयी। चारों तरफ़ अफरा-तफरी मची हुई थी। राज ने देखा कि धीरे-धीरे वेदी में लगी आग बुझ रही थी, पर वो आग ज्वाला बनने जा रही थी जो उसने अपने और ज्योति के बीच लगा ली थी।

जैसे तैसे सभी रिश्तेदारों ने मिलकर आग बुझा दी। कोई कह रहा था कि अपशगुन टल गया तो कोई कह रहा था कि बला टली। कुल मिलाकर सभी की सोच पॉज़िटिव ही थी। घर में नयी दुल्हन आयी थी, इसीलिए राज की मम्मी इस घटना को लेकार कोई टेंशन नहीं पालना चाहती थी। माहौल को सामान्य करने के लिएउसने सबसे कहा, "चलो चाय बनाते हैं.. राज तुम डॉली को लेकर अंदर जाओ और सो जाओ। डॉली की मम्मी भी इस बात से सहमत थी। उसने भी डॉली को कमरे में जाने का इशारा किया और डॉली अपने कमरे में लौट गयी। सब शांत हो गया था। डॉली के पापा, राज के पप्पा और बाक़ी लोग इस बात की अटकलें लगा रहे थे कि आख़िर ये आग लगी कैसे होगी? पर राज जानता था कि ये किसका किया-धरा है। और ये तो सिर्फ़ शुरूआत थी, एक धमकी जो ज्योति ने उसे दी थी। वो इसी उधेड़बुन में था कि राज की मम्मी ने उसका ध्यान तोड़ते हुए कहा, "जा बेटा बहू अकेली है कमरे में!" राज ने हामी भर दी। पर वो कैसे जाये, छत पर ज्योति उसका इंतज़ार कर रही थी।

इधर डॉली अपने कमरे में सहमी हुए बैठी थी। उसके पति ने उसे प्यार करना शुरू ही किया था कि ये सब हो गया। वो समझ नहीं पा रही थी कि उसके विवाहित जीवन की शुरूआत सुखद हुई थी कि दुखद कि तभी राज अंदर आ गया। राज को देखकर वो खड़ी हो गयी। उसने देखा कि राज के चेहरे पर चिंता के भाव हैं। वो समझ रही थी कि राज शायद उस हादसे की वजह से घबरा गया है, पर वो नहीं जानती थी कि राज का मन तो ज्योति की धमकी को लेकर विचिलित था। उसने देखा कि राज चुपचाप आकर बैड पर बैठ गया।

डॉली- "जो हुआ ठीक नहीं हुआ, पर कोई बात नहीं अंत भला तो सब भला.. आग बुझ गयी है।" पर राज उसकी तरफ़ नहीं देख रहा था क्योंकि वो जानता था कि आग अभी बुझी नहीं है जो ज्वाला बनके छत पर उसका इंतज़ार कर रही है। डॉली राज के सामने सहमी हुई सी बैठी थी कि अब राज जैसा कहेगा वो वैसा ही करेगी कि राज ने उसे प्यार से देखते हुए उसके गाल पर अपना हाथ रखते हुए कहा-

"तुम चैन सो जाओ कल बात करेंगे.." डॉली समझ गयी थी कि राज का मूड ठीक नहीं है। उसने मुस्कुराते हुए राज की बात मानी और बिस्तर पर तकिया लेकर लेट गयी। राज अब डॉली के सोने की इंतज़ार कर रहा था, उसे नींद नहीं आ रही थी। अचानक उसने देखा य उसके मोबाइल पर ज्योति के तीन चार मैसेज थे। उसका मोबाइल म्यूट पर था इसीलिए आवाज़ नहीं आ रही थी और हर मैसेज में एक ही बात लिखी थी, "मैं इंतज़ार कर रही हूँ।" कि डॉली ने उसके हाथ पर हाथ रखते हुए पूछ लिया-

"क्या बात है?"

राज- "एक बात कहूँ बुरा तो नहीं मानोगी?"

डॉली- "कहिये " राज ने हिचकिचाते हुए कहा, "जब कभी टेंशन हो जाती है मैं सिगरेट पीता हूँ, अगर तुम इजाज़त दो तो एक सिगरेट पी आऊँ?" डॉली ने मुस्कुराते हुए कहा, "यहीं पी लीजिये, मैं बुरा नहीं मानूँगी!"

राज- "नहीं, मुझे किसी के सामने पीना अच्छा नहीं लगता और वैसे भी घर में अभी तक किसी को पता नहीं कि मैं सिगरेट पीता हूँ।" डॉली को यह बात अच्छी लगी कि राज ने उसके साथ उसकी पर्सनल बात शेयर की थी।

राज- "मैं चुपचाप छत पर जाकर सिगरेट पीके आ जाऊँगा, तुम किसी से मत कहना। डॉली ने मुस्कुराते हुए कहा, "जाइये किसी से नहीं कहूँगी!"

राज को तस्सली थी कि उसे ज्योति के पास जाने के लिए डॉली से कोई बड़ा बहाना बनाने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

राज- "मैं कपड़े बदलकर जाता हूँ, तुम भी कपड़े बदलकर सो जाना।" उसने बैग से अपना कुर्ता पायजामा निकालते हुए डॉली से कहा।

उधर छत पर ज्योति राज का इंतज़ार कर रही थी। उसे यक़ीन था कि राज आयेगा। उसे आना ही होगा अब तो ज्योति मन में एक ज़िद लेकर घूम रही थी। पिछली रात को छत पर जहाँ ख़ूब हंगामा था आज सन्नाटा पसरा हुआ था। जगह-जगह कुर्सियाँ और गद्दे पड़े थे। ज्योति ने दो गद्दे उठाकर दीवार के पीछे लगा दिये जहाँ कोई न देख सके। बस उसे अब राज का इंतज़ार था। सुबह के ४ बज चके थे, सूरज कभी भी उग सकता है और उसे पहले राज को आना है। अगर राज नहीं आया तो ज्योति क्या करेगी वो आगे की प्लानिंग करने लगी थी कि अचानक उसने पाया कि सीढ़ियों में किसी के आने की आहाट हो रही है। वो दीवार के सहारे छुप गयी। उसने देखा कि राज आ गया है और ज्योति को ही ढूँढ़ रहा था कि ज्योति ने हाथ बढ़ा कर राज को अपनी ओर खींच लिया। अब राज ज्योति के एक दम नज़दीक था। उसकी नज़रें ज्योति से मिल रही थीं। उसने देखा कि ज्योति की आँखों में उसे पाने की हवस थी, जिससे वो बच नहीं सकता था। वो तो पूर्ण समर्पण के लिए आया था। ज्योति उसका हाथ पकड़कर उस तरफ़ ले गयी जहाँ उसने गद्दे बिछाये थे।

राज- "लो आ गया हूँ, क्या चाहती हो?" ज्योति अपनी इस जीत पर ख़ुश थी। वक़्त न बर्बाद करते हुए उसने राज के हाथ अपने चेहरे पर रख दिए और ख़ुद ही उन्हें ज़ोर-ज़ोर से अपने बदन पर फेरने लगी। मानो अब वो राज को निर्देश दे रही थी कि उसे क्या करना है और फिर राज ने वैसा ही करना शुरू कर दिया। ज्योति ने पाया कि अब राज उसके निर्देशों का पालन करते हुए ख़ुद ही उसके हर अंग का स्पर्श कर रहा था। फिर ज्योति ने उसकी गर्दन पकड़कर अपने होंट उसके होंटों पे रखकर गहरे चुंबन देने शुरू कर दिये। ज्योति की इस क्रिया में प्यार से ज़्यादा हवस और ज़िद दिख रही थी। वो बेतहाशा अब राज के

होंटों को चूम रही थी। इसी क्रिया के दौरान दोनों गद्दे पर गिर गये। राज ने देखा कि ज्योति को उसे पाने की बहुत जल्दी थी। वो जल्दी-जल्दी उसका कुर्ता उतार रही थी और ख़ुद अपना ब्लाउज़ खोलने लगी। राज भी अब ये सब जल्दी निबटा देना चाहता था। ज्योति ने उसे छेड़ते हए कहा-

ज्योति- "बाबूराव के दर्शन करवायो न जीजा जी.." राज को ज्योति की इस अठखेली में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसने ज्योति को लिटाकर उसके हाथों को ज़ोर से जकड़ लिया। राज ने आगे बढ़ने से पहले एक बार ज्योति को देखा जो राज को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रही थी। राज की आँखों में ज्योति के लिए नफ़रत साफ़ दिखायी दे रही थी, पर ज्योति को उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। उसे बस राज चाहिए थे। वो भी अपने भीतर... ।

ज्योति- "अब देर मत करो जीजा जी.. आयो न.." कहते हुए उसने राज को फिर से एक बार अपनी ओर धकेलना चाहा कि राज ने हल्का-सा ज़ोर लगाकर ख़ुद को ज्योति के भीतर धकेल दिया। ज्योति की एक आह निकल गयी। राज अपना सारा क्रोध ज्योति पर निकाल देना चाहता था। लिहाज़ा उसने ज्योति पर पूरी खुन्नस से वार करना शुरू कर दिया और जल्द ही उसका सारा बारूद ज्योति के अंदर जा कर फट गया। ज्योति ने भी एक हल्की-सी आह के साथ राज के इस आक्रमण का स्वागत किया और अगले पल थक कर आँख बंद करके लेट गयी। राज ने ज्योति को घृणा भरी नज़र से देखा और अपने कपड़े ठीक किये और खड़ा हो कर निकल गया। ज्योति की एक और जीत हुई थी। उसने अपने कपड़े ठीक करके एक अँगड़ाई ली। वो बहुत ख़ुश थी कि राज अब पूरी तरह उसके क़ाबू में है। राज चुपचाप अपने कमरे में जाकर डॉली के बग़ल में सो गया। डॉली को इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि राज क्या करके आया था।
 
नयी सुबह का सूरज उग चुका था। बारात घर में बाहर हलचल शुरू हो चुकी थी। हलवाई आ गया था। लोगों का दिनचर्या शुरू हो गया था और देखते-देखते बारात घर में फिर से वो रौनक़ लौट आयी, पर सबका ध्यान अब डॉली और राज के कमरे पे था, ख़ासकर ज्योति का जो ये जानने को उत्सुक थी कि रात को डॉली के साथ राज ने कुछ किया तो नहीं। उसने देखा कि कांता चाची हलवाई से ट्रे में डॉली और राज के लिए चाय और बिस्कुट लेकर जा रही थी कि ज्योति ने उसे रास्ते में ही पकड़ लिया। उसके हाथ से ट्रे लेते हुए कहा-

"चाची मुझे दीजिये मैं ले जाती हूँ.."

कांता चाची- "तू रहने दे उन्हें डिस्टर्ब करेगी!" ज्योति ने लगभग चाची से ट्रे खींचते हुए कहा-

"रात को भी आपने मुझे डॉली के कमरे से निकाल दिया था। आख़िर बहन है मेरी।"

चाची- "ठीक है, पर अगर वो सो रहे हैं तो बाहर से ही पकड़ा कर आ जाना.." ज्योति ने चाची से ट्रे ली और डॉली के कमरे का दरवाज़ा नॉक करते हुए आवाज़ लगायी-

"डॉली! डॉली मैं हूँ ज्योति... चाय लायी हूँ।"

ज्योति की आवाज़ सुनकर डॉली ने दरवाज़ा खोल दिया। ज्योति ने देखा डॉली ने एक नाइटी पहनी हुई है। माँग में सिन्दूर बिखरा हुआ था। डॉली ने अपने लम्बे बाल पीछे जूड़े की तरह बाँधते हुए कहा-

"आ न अंदर ज्योति.." ज्योति ने वहीं से ट्रे डॉली को पकड़ते हुए फब्ती कसी-

"नहीं-नहीं मैं डिस्टर्ब नहीं करना चाहती, क्या पता जीजा जी का मूड फिर बन जाये.." डॉली ने मुँह बनाते हुए ज्योति का हाथ पकड़कर उसे अंदर खींच लिया।

"अब बस भी कर। हर वक़्त ऐसी बातें अच्छी नहीं लगतीं.." ज्योति ने अंदर आकर देखा कि राज बाथरूम से अभी बाहर आया है। ज्योति को देखकर राज की तो सिट्टी-पिट्टी गम हो गयी कि ये यहाँ क्या कर रही है?

ज्योति- "जीजा जी अगर ऐतराज़ ना हो तो में डॉली दीदी से कुछ बातें अकेले में कर सकती हूँ?" ज्योति की बातें सुनकर राज तो काँप उठा कि कहीं ये डॉली को कुछ बता ना दे। राज की घबराहट पढ़ते हुए ज्योति ने उससे कहा-

"घबराओ नहीं जीजा जी, मेरे और दीदी के बीच बहुत से सीक्रेट्स हैं। वैसे आप भी चाहें तो मेरे साथ कोई भी सीक्रेट शेयर कर सकते हैं। बहुत माहिर हूँ मैं सीक्रेट रखने में। ट्राई करके देख लीजिये।" राज देख रहा था जहाँ एक तरफ़ ज्योति डॉली के सामने उसके साथ अपनापन दिखा रही थी वहीं उसकी बातों में राज के लिए एक छुपी हुई धमकी भी थी। डॉली ने राज की घबराहट देखते हुए ज्योति को प्यार से डाँटते हुए कहा-

"चुप कर, इज़्ज़त से बात कर, जीजा हैं तेरे।"

ज्योति- "इतना मज़ाक़ तो जीजा-साली में चलता है, क्यों है ना जीजा जी?" राज ज्योति के इस भद्दे मज़ाक़ का जवाब नहीं देना चाहता था। उसने डॉली से कहा

"मैं ज़रा बाक़ी लोगों से मिल लेता हूँ.. चाय बाहर ही पी लूँगा" डॉली ने भी मुस्कुराकर उसे इजाज़त दे दी।

ज्योति ने तंज़ मारते हुए कहा, "हाय हाय क्या बात है जीजा जी बाहर क्यों चले गये? रात को सब ठीक रहा न?"

डॉली ने शर्माते हुए चाय का कप पकड़ते हुए कहा-

"हाँ ज्योति सब ठीक था बस वो छोड़कर।"

ज्योति- "वो छोड़कर? मतलब?"

डॉली- "रात को सब ठीक चल रहा था, ये मेरे क़रीब आये बस उसके बाद आग लग गयी मम्मी जी ने दरवाज़ा खटखटा दिया.."

ज्योति- "धत्त तेरे की.. मतलब कुछ भी नहीं हुआ?.... ज़रा-सा भी नहीं .....?" डॉली ज्योति की इन बातों को सुनकर शर्मा रही थी।

"क्या ज्योति ये बातें कोई बताने की होती हैं?"

ज्योति- "हाँ-हाँ पहली बार वाली तो बिल्कुल.. पता तो चले कि तू जीती कि राज जीजू...?"

डॉली- "कितनी बेशर्म है तू?"

ज्योति- "बता ना बता ना..?" डॉली ने चाय का सिप लेते हुए कहा-

"कुछ नहीं, बस इतना कहूँगी कि राज बहुत अच्छे हैं। एक लड़की की इज़्ज़त करना जानते हैं। ख़ास कर मेरी जैसी लड़की की जिसने आज से पहले ज़िन्दगी में ऐसा कुछ न देखा हो। शायद इसे ही प्यार कहते हैं.." ज्योति ने चुटकी लेते हुए कहा, "धत्त तेरे की, मतलब काम पूरा नहीं हुआ!"

डॉली- "पूरा मतलब? बस जितना भी हुआ बहुत अच्छा हुआ। उसके बाद वो छत पर सिगरेट पीने चले गये.." ज्योति जानती थी कि राज उसी से तो मिलने आया था। उसकी आँख में जीत की चमक थी कि राज ने उसका साथ पहले वो सब कर लिया जो उसे अपनी पत्नी डॉली के साथ करना था। उसने देखा कि डॉली बात करते-करते राज के ख़यालों में खो गयी थी। उसने डॉली का ध्यान तोड़ते हुए कहा-

"और जब वो वापस आया तो?"

डॉली- "मुझे नींद आ गयी.. "

ज्योति- "मतलब तू अभी भी वर्जिन.........?" डॉली ने ज्योति के मुँह पर हाथ रख दिया।
 
डॉली- "धीरे बोल.. बस अब मुझे इस बारे में कोई बात नहीं करनी। मुझे शर्म आ रही है। अब जो होगा हनीमून पे, डोंट वरी तुझे सारी रिपोर्ट दूँगी।" कहते हुए ज्योति के गले लग गयी। ज्योति की आँख में अब प्रश्न उठ रहे थे कि ये लोग अब हनीमून पे कहाँ जायेंगे?

ज्योति- "बस तू ख़ुश है न यही जानना था। चल जल्दी से तैयार हो जा.. आज बारात घर ख़ाली करना है.. घर निकलना है। वैसे तुम हनीमून के लिए कहाँ जा रहे हो?" डॉली ने ज्योति को छेड़ते हुए कहा-

"केरल! पर तू वहाँ मेरे पीछे मत आ जाना.." कहते हुए हँसने लगी और ज्योति के गले फिर से लग गयी।

ज्योति केरल में पुलिस स्टेशन में बैठी ये कहानी जय और कुणाल को सुना रही थी। जय हैरान था कि ये लड़की बयान दे रही है या फिर अपने जीजा के साथ अपनी रास लीला की गाथा सुना रही थी। ज्योति समझ गयी थी कि जय के मन में क्या सवाल उठ रहे हैं। उसने जय को समझाते हुए कहा-

"जानती हूँ बहुत अजीब लग रहा होगा न आपको कि एक लड़की अपने जिस्मानी रिश्तों की कहानी दो मर्दों के सामने बेबाक होकर सुना रही है! हाँ अजीब ही है। मुझे भी अजीब ही लगा था जब मैंने ये सब पहली बार किया था, पर नहीं जानती थी कि ऐसे घिनौने रिश्ते का अंत मेरी बहन की मौत पर जाकर होगा!" कहते हुए वो रोने लगी। उसके भाव से साफ़ दिख रहा था कि उसने जो भी राज के साथ किया उसे उस बात का पछतावा था। वो रोते हुए एक ही बात कहे जा रही थी-

"हाँ मैं यहाँ केरल में आकर भी जीजा जी को अपने साथ संबंध बनाने के लिए मजबूर करती रही, पर उस रात डॉली दीदी को हमारे रिश्ते के बारे में पता चल गया था। उनके हाथ वो वीडियो लग गया था जो मैंने राज के साथ बनाया था। मुझे तब एहसास हुआ कि डॉली राज से कितना प्यार करती थी इतना कि इन सब बातों के बावजूद वो मुझे माफ़ करने को तैयार थी और मैं अपनी हवस में पागल अपनी ही बहन का घर उजाड़ने पे तुली थी। बस फिर मैं डॉली से माफ़ी माँगकर चली गयी। ये सोचकर कि अब वो दोनों एक सुखी जीवन व्यतीत करेंगे। यही सब ठीक करके गयी थी मैं, पर नहीं जानती थी कि डॉली...." कहते हुए वो ज़ार-ज़ार रोने लगी। कुणाल ने फ़िलहाल आगे की पूछताछ करना ठीक नहीं समझा। जय ने लेडी हवलदार को इशारा किया कि इसे ले जाये। लेडी हवलदार ने ज्योति का हाथ पकड़ा और उसे बहार की तरफ़ ले जाने को थी कि ज्योति ने पलटकर फिर से कहा-

"मैं सच कह रही हूँ मैंने डॉली को नहीं मारा, पर मैं चाहती हूँ डॉली के असली क़ातिल को सज़ा मिले इसीलिए मैं आपको हर एक बात सच बता रही हूँ!"

कुणाल ने वहीं से सवाल दागते हुए कहा,

"तो फिर किसने मारा है.. डॉली को?" ज्योति ने उन्हें ये कहकर चौंका दिया-

"राज ने.. हाँ राज ने.. मैं राज के प्यार में इतनी दीवानी हो गयी थी कि अपने और राज के बीच में किसी को भी बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी अब वो चाहे मेरी बहन डॉली ही क्यों ना थी, पर राज हर बार डॉली से अपने रिश्ते का वास्ता देता था और उस दिन मैंने बात को टालने के लिए ऐसे ही कह दिया कि इतना डरते हो डॉली से, तो मार दो उसे.. मैं तो ये बात ग़ुस्से में कह गयी थी पर मुझे क्या पता था कि राज उसे सच में ही..." कहते हुए रोने लगी।

"राज ने ही मारा है...डॉली को हाँ राज ने ही.." कहते हुए वो लेडी हवलदार के साथ बाहर निकल गयी।
 
कुणाल के दिमाग़ में कई सवाल जनम ले रहे थे। उसने अपनी जेब से सिगरेट निकालकर होंटों के ऊपर घूमानी शुरू कर दी। जय भी कुणाल के दिमाग़ को पढ़ना चाहता था। उसने पूछा-

"क्या लगता है?"

कुणाल- "ये लड़की अपने साथ घटी हर छोटी से छोटी घटना बड़े विस्तार से बता रही है, ख़ासकर अपने जीजा राज के साथ अपने रिश्तों को लेकर जो बातें उसने बतायीं, उसके लिए तो साहस चाहिए। उसके हिसाब से अब तक की कहानी इस प्रकार बनती है कि राज और डॉली की शादी होने वाली थी कि ज्योति और राज के बीच एक हादसा हो जाता है, जिससे उनके बीच नाजायज़ रिश्ते स्थापित हो जाते हैं। उसके बाद ज्योति उस बात का फ़ायदा उठाकर राज को ब्लैकमेल करने लगती है इतना कि वो यहाँ उनके पीछे हनीमून पर भी आ जाती है। जहाँ वो उसके साथ अपनी एक वीडियो भी बनाती है। फिर एक रात वो वीडियो डॉली के हाथ लग जाती है तो वो राज का मोबाइल लेकर ज्योति से सवाल करने उसके कमरे में यानी रूम नंबर 224 में जाती है। जहाँ दोनों बहनों की कहा-सुनी होती है। फिर ज्योति का हृदय परिवर्तन होता है और ज्योति उसी रात अपना सामान लेकर एयरपोर्ट के लिएये निकल जाती है। जहाँ वो १.४० पर अपना बोर्डिंग पास भी लेती है... जिससे वो निर्दोष साबित होती है।"

जय- "और फिर राज आता है और डॉली को मार देता है और फिर ख़ुद को मारता है या दोनों की बीच मारा-मारी होती है जिससे डॉली की मौत हो जाती है और राज बुरी तरह ज़ख़्मी। मुझे तो किसी मर्डर मिस्ट्री जैसी मनगढ़ंत कहानी लगती है!"

कुणाल- "हो सकता है, पर ज्योति ने अब तक जो कहानी सुनायी है अगर वो राज के बयान से मेल खा गयी तो मतलब ये सच बोल रही है.."

जय- "चलो मान लेते हैं राज को होश आ जाता है। वो ज्योति के बयान की पुष्टि कर भी देता है, फिर उसके बाद क्या? ये कैसे पता चलेगा कि क़ातिल कौन है?" कुणाल ने अपने अंदाज़ में हँसते हुए सिगरेट जलाते हुए कहा, "अभी तो कहनी का इंटरवल हुआ है जय साहिब, सीधे क्लाइमेक्स पर पहुँचना चाहते हो? वैसे ये कहानी आगे नहीं बढ़ेगी, जब तक राज अपना बयान नहीं देता। इसीलिए जितनी जल्दी हो सके राज का बयान लेने की कोशिश करो।" कहते हुए उसने अपनी सिगरेट सुलगा ली। जय ने उसी वक़्त डॉक्टर को फ़ोन लगाया और उससे कहा कि जितनी जल्दी हो सके उसे राज का बयान लेना है। डॉक्टर ने बताया कि राज को होश आ गया अब वो ख़तरे से बहार है और बयान देने की स्थिति में भी है।

जय ने वक़्त न बर्बाद करते हुए कुणाल के साथ हॉस्पिटल का रुख़ किया जहाँ राज का इलाज चल रहा था। जय ने वहाँ पहुँचकर पहले डॉक्टर से पूछताछ की। डॉक्टर ने उसे बताया कि उसके सर पर गहरा घाव है, शायद किसी भारी चीज़ से चोट लगी है। डॉक्टर से इजाज़त लेकर जय और कुणाल राज से पूछताछ शुरू करने से उसके कमरे में प्रवेश कर गये।

उन्होंने देखा राज बैड पर लेटा हुआ था। सर पर पट्टियाँ बंधी हुई हैं। उसकी बाज़ुओं में ड्रिप की सुईयाँ लगी हुई थीं। जय ने देखा कि राज एक टक खिकड़ी की तरफ़ देख रहा था। उसकी आँख से आँसू बह रहे थे। कुणाल खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया और जय ने एक स्टूल खिसकाते हुए राज के हाथ पर हाथ रखते हुए पूछा-

"बात कर सकते हो?" राज ने देखा एक पुलिस इंस्पेक्टर उसके सामने बैठा है। वो समझ गया था कि वो डॉली के मर्डर के बारे में पूछताछ करने आया है। जय ने आगे पूछा-

"क्या हुआ था उस रात?" ये सुन राज फिर से रो पड़ा।

जय- "देखो मिस्टर राज, आपको हमें सब सच-सच बताना होगा, वर्ना हम आपकी कोई मदद नहीं कर पायेंगे। याद करके बताइए क्या हुआ था? आपके और डॉली के बीच कोई झगड़ा हुआ था? क्या आपने अपनी पत्नी डॉली को मारा है?"

राज ने 'ना' में सर हिला दिया और फिर रोने लगा।

जय- "तो फिर किसने?" राज चुप था।

जय- "देखिये कमरा नंबर 224 में आप और डॉली ख़ून से लथपथ पाए गये। आपको तो हमने बचा लिया पर आपकी पत्नी डॉली को..... बताइए क्यों और कैसे मारा आपने अपनी पत्नी डॉली को?"

राज- "मैंने डॉली को नहीं मारा... नहीं मारा.."

जय- "तुमने ही मारा है.. क्योंकि तुम्हारी पत्नी डॉली को तुम्हारे और तुम्हारी साली के नाजायज़ रिश्तों के बारे में पता चल गया था.. ये देखो.." कहते हुए जय ने उसका मोबाइल उसके सामने कर दिया जिसमें राज और ज्योति की अश्लील वीडियो थी। राज ये देखकर दंग रह गया कि कुणाल ने जय की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा-

"राज ज्योति ने इस बात की पुष्टि कर दी है, उसने आपके और उसके बीच सारे रिश्तों का खुलासा कर दिया है, बस अब आपसे आपकी तरफ़ की कहानी जाननी है। अगर आप चाहते हैं कि हम आपकी बात मान लें कि आपने डॉली को नहीं मारा तो जो भी आप जानते हैं हमें सच सच बताइये!" राज अब समझ चुका था कि उसके पास सच्चाई बताने के सिवाय कोई चारा नहीं था। उसने बताना शुरू किया-
 
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