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लड़के वालों की तरफ़ अब राज अपने दोस्तों और कज़ंस के साथ बियर पी रहा था। सभी राज को एक सुखद गृहस्थ जीवन की नसीहत दे रहे थे। कुल मिलाकर वो ख़ुद को एक जोकर महसूस कर रहा था। जैसे कि दुल्हे का तो मज़ाक़ उड़ने का हक़ हर एक को होता है। पूरी छत एक मिनी बार में बदल चुकी थी। जगह-जगह लोग छोटे-छोटे झुण्ड बनाकर व्हिस्की और बीयर पी रहे थे और एक ढोल वाला पंजाबी बोलियों के साथ सबको नचा रहा था। ज़्यादातर लोगों को चढ़ चुकी थी। सबके बेढंगे डांस इस बात का प्रमाण थे और रागिनी यह मोमेंट्स अपने कैमरे में क़ैद कर रही थी कि राज के एक दोस्त ने रागिनी को आवाज़ लगते हुए कहा-
"रागिनी मैडम एक फ़ोटो हमारी राज भाई के साथ हो जाये.. आज तो बैचलर है कल से इसके गले में भी पति नाम का पट्टा आ जायेगा। उसकी बात पर सभी ने सहमती दिखाते हुए राज को बीच में कर लिया और हाथों में गिलास पकड़कर रागिनी के कैमरे के लिए पोज़ देने लगे थे।
और उधर दूसरी ओर ज्योति और डॉली अब दो-दो पैग पी चुके थे। डॉली को चढ़ने लगी थी। उसने गिलास नीचे रखते हुए कहा-
"बस ज्योति.. अब मुझे नींद आ रही है.. मैं सोने जा रही हूँ.." ज्योति ने उसे झिंझोड़ते हुए कहा, "नहीं.. ऐसा करोगी तो राज तुम्हें कभी प्यार नहीं करेगा.. समझी.. आज की रात तो उसके टैस्ट की रात होनी चाहिए। अच्छा बताओ वर्जिन हो?" ज्योति के इस बेतुके सवाल पर डॉली हैरान थी।
डॉली- "ये क्या सवाल हुआ.. राज मेरी ज़िन्दगी में पहला लड़का है.. और आख़िरी भी होगा। पर ये सवाल तू क्यों पूछ रही है? क्या तू वर्जिन नहीं है?"
"हाँ पर मेरा अभी टाइम नहीं आया, तेरे एक्सपीरियंस से ही सीखूँगी ना" कहते हुए पागलों की तरह हँसने लगी ज्योति.." डॉली ने मुँह पर हाथ रखते हुए कहा-
"हे भगवान्!" ज्योति की ये बेतुकी बातें सुनकर अब डॉली का दिमाग़ ख़राब हो रहा था।
"तू न बहुत ही गंदी हो गयी है ज्योति, मुझे न तुझसे बात ही नहीं करनी.." कहते हुए निकलने ही लगी थी कि ज्योति ने डॉली का हाथ पकड़ते हुए कहा- "किसी भी लड़के को ऐसी लड़की पसंद नहीं आती है जिसे कुछ ना पता हो.. डरी हुई सी घबराई हुई सी। जैसी कि तुम अब हो.. "डॉली जिसे अब चढ़ रही थी-
"मैं डरी हुई? हैं? मैं किसी से नहीं डरती बल्कि देखना राज मुझसे डरेगा!" कहते हुए अपनी ही बात पर हँस दी।
ज्योति- "दैन प्रूव इट.. नाओ... देखो नीचे, वो बड़ा कमरा है ना? जिसमें दहेज़ का सामान पड़ा है.. वहाँ उस कमरे में कोई नहीं आता जाता। मैं जीजू को वहाँ भेजती हूँ.. ठीक है तू चुपचाप जाकर उस कमरे में बैठ जा."
डॉली- "और मुझे क्या करना होगा?" ज्योति ने माथे पे हाथ मारते हुए कहा-
"जो शादी के बाद करोगी... वो आज करना है.. वैसे तुम्हें कुछ नहीं करना, जो करेगा राज करेगा.. समझी तुम.. बस उसे करने देना.. रोकना नहीं।" डॉली जो नशे में थी उसने आत्मविश्वास भरी हामी भर दी।
ज्योति- "गुड.. अब मैं राज को उस कमरे में भेजती हूँ.. ओके... तुम चुपचाप उस कमरे में जाकर बैठ जाओ।" कहते हुए ज्योति अपना घाँघरा सँभालते हुए वहाँ से निकल गयी। वो उस जगह पहुँच गयी थी जहाँ लड़के वाले थे और राज के होने की संभावना थी और कुछ ही देर में उसे सामने राज दिख गया कि तभी राज के चाचा हाथ में गिलास लेकर वहाँ आ गये।
"यार राज कहाँ घूम रहा है..चल आजा.. चाचा के साथ एक-एक हो जाये।" कहते हुए वो राज को अपने साथ ले जाकर ढोल की ताल पर नाचने लगा। ज्योति निराश हो गयी पर वो हर मानने वालों में से नहीं थी। वो वहाँ खड़े होकर मौक़े का इंतज़ार करने लेगी और जब भी उसे मौक़ा मिलता वो चुपके से सोनू के गिलास से एक छोटा-सा पैग पी लेती।
ज्योति ने देखा कि राज अब इन सब शराबियों से ख़ुद का पीछे छुड़वाने के तरीक़े खोज रहा था। मौक़ा अच्छा था, जैसे ही राज की नज़र ज्योति पर पड़ी उसने राज को इशारे से अपनी ओर बुलाया और उसके कान में इतना कह कर भाग गयी-
"वो दहेज़ वाले कमरे में आपका कोई इंतज़ार कर रहा है.." कहते हुए वहाँ से भाग गयी। राज की तो जैस बाँछे ही खिल गयीं। उसने दूर से देखा जहाँ ज्योति उसे उस रूम में जाने के लिए कह रही थी। उसकी उत्सुकता बढ़ गयी। उसने वहीं से जाम उठाकर ज्योति
को सहमती दे डाली। अब ज्योति सुनिश्चित हो गयी कि उसके जीजा को उसकी बहन डॉली का सन्देश मिल गया है जो उस दहेज़ वाले कमरे में पहुँच चुकी है और अब राज और उसके बीच अब कोई रिश्ता नहीं बनेगा।
पर राज जैसे ही अपना गिलास ख़ाली करके निकलने को था कि चाचा ने उसके गले में फिर से हाथ डाल दिया-
" कहाँ चल दिए बरखुरदार... आज की रात तो जाने नहीं देंगे तुम्हें.." राज ने देखा कि बड़े चाचा ने उसे गोद में उठा लिया और ढोल की तान पर नाचने लगे। राज परेशान था कि उसे दहेज़ वाले कमरे में पहुँचना है और यहाँ चाचा जी उसे नचाये जा रहे हैं। उसके पास कोई चारा नहीं था। बस वो इंतज़ार करने लगा कि एक-एक करके सब लुढ़कें तो वो जाये। रात गहराती जा रही थी। वक़्त बीत रहा था और राज की बैचनी बढ़ रही थी।
उधर लड़की वालों के यहाँ डॉली का कहीं पता नहीं चल रहा था। उसकी माँ डॉली का नाम पुकारकर उसे ढूँढ़ रही थी। पर किसी को नहीं पता था कि डॉली कहाँ गयी। अचानक उसे ज्योति दिखी जो चाची के साथ बैठकर मेहँदी लगवा रही थी। उसे देखते ही उसकी मम्मी ने उससे पूछा-
"डॉली कहाँ है?"
ज्योति- "मुझे क्या पता? मैं तो यहाँ मेहँदी लगवा रही हूँ!" इतना सुन उसकी मम्मी घबराती हुई बाहर निकल गयी। ज्योति जानती थी कि डॉली इस वक़्त राज के साथ दहेज़ वाले कमरे में है। पर इतनी देर कैसे लग गयी उसे? रात का एक बजने को था और डॉली अभी तक लौटकर नहीं आयी थी। इसे पहले ये बात सामने आ जाये ज्योति ने तय किया कि वो डॉली को लेकर आएगी। वो चुपचाप वहाँ से निकल गयी। बरात घर में तक़रीबन अब सभी सो चुके थे.. चारों तरफ़ अँधेरा पसरने लगा था। पर मिर्ची लाइट्स की रौशनी में सब साफ़ दिखायी दे रहा था।
ज्योति जैसे-तैसे दहेज़ वाले कमरे के सामने पहुँच गयी उसने धीरे से दरवाज़े को धकेला अंदर कोई नहीं था, हल्का-सा अँधेरा।
"डॉली? डॉली?" वो धीरे-धीरे आवाज़ लगा रही थी पर कोई जवाब नहीं आया। वो अपने पीछे दरवाज़ा बंद करके कमरे के अंदर आ गयी। वो डॉली को ढूँढ़ रही थी कभी सोफे के पीछे झाँक कर तो कभी पलंग के पीछे। अचानक उसे महसूस हुआ कि उसके पीछे कोई आया है। वो मुड़ पाती कि उससे पहले मज़बूत हाथों ने उसके सर पर हाथ रखकर उसे सोफे पर झुका दिया। ज्योति कुछ बोल पाती, उससे पहले एक मज़बूत हाथ ने उसकी चोली को पीठ से उठाकर ऊपर कर दिया। ज्योति चौंक गयी वो जैसे ही पीछे हटने को थी कि उसने देखा राज था। उसने अपने हाथ से ज्योति के मुँह को बंद करके धीरे से
जाकर दरवाज़ा बंद कर दिया। ज्योति को तो इस हादसे की उम्मीद ही नहीं थी, वो तो डॉली को ढूँढ़ने आयी थी। पर डॉली उसे कहीं नज़र नहीं आ रही थी और राज समझ रहा था कि ज्योति उसी से मिलने आयी है। राज ने बढ़कर ज्योति की ब्रा के नीचे से हाथ डालकर उसके वक्ष अपने हाथों में ले लिये। ज्योति इस बात का विरोध करने लगी।
ज्योति- "नहीं जीजा जी ये!" ज्योति अपनी बात पूरी कर पाती उससे पहले राज ने अपने होटों से ज्योति के होटों को जकड़ लिया। ज्योति ने बेशक अपने होंट कस कर बंद कर लिये थे पर राज की ज़ुबाँ के वार के आगे वो ज़्यादा देर टिक नहीं पायी। जैसे-जैसे राज के होंटों से रस ज्योति के मुँह में प्रवेश करने लगा ज्योति को हल्का-हल्का आनंद आने लगा था। एक तो ज्योति ने ख़ुद भी पी रखी थी ऊपर से राज के होंटों से वो नशीला रस ग्रहण कर रही थी। ज्योति का विरोध कम होने लगा कि अचानक उसे इस बात का एहसास हुआ कि ये सब तो डॉली का हक़ है, उसी के लिए तो वो सब कर रही थी। उसने राज को धीरे से पीछे करते हुए कहा-
"बस जीजा जी इसके आगे कुछ नहीं, ये सब डॉली के लिए है!" ज्योति की बात पूरी होने से पहले ही राज ने ज्योति का हाथ पकड़कर अपने लिंग पर रख दिया। ज्योति ने जैसे ही राज के तने लिंग का स्पर्श पाया वो घबरा गयी।
"नहीं जीजा जी प्लीज़ मुझे जाने दो!" पर राज पर तो अब काम क्रिया की सारी शक्तियाँ सवार थीं। उसने ज्योति के दोनों हाथ जकड़ते हुए उसके वक्षों पर चुम्बनों की बौछार कर दी।
"रागिनी मैडम एक फ़ोटो हमारी राज भाई के साथ हो जाये.. आज तो बैचलर है कल से इसके गले में भी पति नाम का पट्टा आ जायेगा। उसकी बात पर सभी ने सहमती दिखाते हुए राज को बीच में कर लिया और हाथों में गिलास पकड़कर रागिनी के कैमरे के लिए पोज़ देने लगे थे।
और उधर दूसरी ओर ज्योति और डॉली अब दो-दो पैग पी चुके थे। डॉली को चढ़ने लगी थी। उसने गिलास नीचे रखते हुए कहा-
"बस ज्योति.. अब मुझे नींद आ रही है.. मैं सोने जा रही हूँ.." ज्योति ने उसे झिंझोड़ते हुए कहा, "नहीं.. ऐसा करोगी तो राज तुम्हें कभी प्यार नहीं करेगा.. समझी.. आज की रात तो उसके टैस्ट की रात होनी चाहिए। अच्छा बताओ वर्जिन हो?" ज्योति के इस बेतुके सवाल पर डॉली हैरान थी।
डॉली- "ये क्या सवाल हुआ.. राज मेरी ज़िन्दगी में पहला लड़का है.. और आख़िरी भी होगा। पर ये सवाल तू क्यों पूछ रही है? क्या तू वर्जिन नहीं है?"
"हाँ पर मेरा अभी टाइम नहीं आया, तेरे एक्सपीरियंस से ही सीखूँगी ना" कहते हुए पागलों की तरह हँसने लगी ज्योति.." डॉली ने मुँह पर हाथ रखते हुए कहा-
"हे भगवान्!" ज्योति की ये बेतुकी बातें सुनकर अब डॉली का दिमाग़ ख़राब हो रहा था।
"तू न बहुत ही गंदी हो गयी है ज्योति, मुझे न तुझसे बात ही नहीं करनी.." कहते हुए निकलने ही लगी थी कि ज्योति ने डॉली का हाथ पकड़ते हुए कहा- "किसी भी लड़के को ऐसी लड़की पसंद नहीं आती है जिसे कुछ ना पता हो.. डरी हुई सी घबराई हुई सी। जैसी कि तुम अब हो.. "डॉली जिसे अब चढ़ रही थी-
"मैं डरी हुई? हैं? मैं किसी से नहीं डरती बल्कि देखना राज मुझसे डरेगा!" कहते हुए अपनी ही बात पर हँस दी।
ज्योति- "दैन प्रूव इट.. नाओ... देखो नीचे, वो बड़ा कमरा है ना? जिसमें दहेज़ का सामान पड़ा है.. वहाँ उस कमरे में कोई नहीं आता जाता। मैं जीजू को वहाँ भेजती हूँ.. ठीक है तू चुपचाप जाकर उस कमरे में बैठ जा."
डॉली- "और मुझे क्या करना होगा?" ज्योति ने माथे पे हाथ मारते हुए कहा-
"जो शादी के बाद करोगी... वो आज करना है.. वैसे तुम्हें कुछ नहीं करना, जो करेगा राज करेगा.. समझी तुम.. बस उसे करने देना.. रोकना नहीं।" डॉली जो नशे में थी उसने आत्मविश्वास भरी हामी भर दी।
ज्योति- "गुड.. अब मैं राज को उस कमरे में भेजती हूँ.. ओके... तुम चुपचाप उस कमरे में जाकर बैठ जाओ।" कहते हुए ज्योति अपना घाँघरा सँभालते हुए वहाँ से निकल गयी। वो उस जगह पहुँच गयी थी जहाँ लड़के वाले थे और राज के होने की संभावना थी और कुछ ही देर में उसे सामने राज दिख गया कि तभी राज के चाचा हाथ में गिलास लेकर वहाँ आ गये।
"यार राज कहाँ घूम रहा है..चल आजा.. चाचा के साथ एक-एक हो जाये।" कहते हुए वो राज को अपने साथ ले जाकर ढोल की ताल पर नाचने लगा। ज्योति निराश हो गयी पर वो हर मानने वालों में से नहीं थी। वो वहाँ खड़े होकर मौक़े का इंतज़ार करने लेगी और जब भी उसे मौक़ा मिलता वो चुपके से सोनू के गिलास से एक छोटा-सा पैग पी लेती।
ज्योति ने देखा कि राज अब इन सब शराबियों से ख़ुद का पीछे छुड़वाने के तरीक़े खोज रहा था। मौक़ा अच्छा था, जैसे ही राज की नज़र ज्योति पर पड़ी उसने राज को इशारे से अपनी ओर बुलाया और उसके कान में इतना कह कर भाग गयी-
"वो दहेज़ वाले कमरे में आपका कोई इंतज़ार कर रहा है.." कहते हुए वहाँ से भाग गयी। राज की तो जैस बाँछे ही खिल गयीं। उसने दूर से देखा जहाँ ज्योति उसे उस रूम में जाने के लिए कह रही थी। उसकी उत्सुकता बढ़ गयी। उसने वहीं से जाम उठाकर ज्योति
को सहमती दे डाली। अब ज्योति सुनिश्चित हो गयी कि उसके जीजा को उसकी बहन डॉली का सन्देश मिल गया है जो उस दहेज़ वाले कमरे में पहुँच चुकी है और अब राज और उसके बीच अब कोई रिश्ता नहीं बनेगा।
पर राज जैसे ही अपना गिलास ख़ाली करके निकलने को था कि चाचा ने उसके गले में फिर से हाथ डाल दिया-
" कहाँ चल दिए बरखुरदार... आज की रात तो जाने नहीं देंगे तुम्हें.." राज ने देखा कि बड़े चाचा ने उसे गोद में उठा लिया और ढोल की तान पर नाचने लगे। राज परेशान था कि उसे दहेज़ वाले कमरे में पहुँचना है और यहाँ चाचा जी उसे नचाये जा रहे हैं। उसके पास कोई चारा नहीं था। बस वो इंतज़ार करने लगा कि एक-एक करके सब लुढ़कें तो वो जाये। रात गहराती जा रही थी। वक़्त बीत रहा था और राज की बैचनी बढ़ रही थी।
उधर लड़की वालों के यहाँ डॉली का कहीं पता नहीं चल रहा था। उसकी माँ डॉली का नाम पुकारकर उसे ढूँढ़ रही थी। पर किसी को नहीं पता था कि डॉली कहाँ गयी। अचानक उसे ज्योति दिखी जो चाची के साथ बैठकर मेहँदी लगवा रही थी। उसे देखते ही उसकी मम्मी ने उससे पूछा-
"डॉली कहाँ है?"
ज्योति- "मुझे क्या पता? मैं तो यहाँ मेहँदी लगवा रही हूँ!" इतना सुन उसकी मम्मी घबराती हुई बाहर निकल गयी। ज्योति जानती थी कि डॉली इस वक़्त राज के साथ दहेज़ वाले कमरे में है। पर इतनी देर कैसे लग गयी उसे? रात का एक बजने को था और डॉली अभी तक लौटकर नहीं आयी थी। इसे पहले ये बात सामने आ जाये ज्योति ने तय किया कि वो डॉली को लेकर आएगी। वो चुपचाप वहाँ से निकल गयी। बरात घर में तक़रीबन अब सभी सो चुके थे.. चारों तरफ़ अँधेरा पसरने लगा था। पर मिर्ची लाइट्स की रौशनी में सब साफ़ दिखायी दे रहा था।
ज्योति जैसे-तैसे दहेज़ वाले कमरे के सामने पहुँच गयी उसने धीरे से दरवाज़े को धकेला अंदर कोई नहीं था, हल्का-सा अँधेरा।
"डॉली? डॉली?" वो धीरे-धीरे आवाज़ लगा रही थी पर कोई जवाब नहीं आया। वो अपने पीछे दरवाज़ा बंद करके कमरे के अंदर आ गयी। वो डॉली को ढूँढ़ रही थी कभी सोफे के पीछे झाँक कर तो कभी पलंग के पीछे। अचानक उसे महसूस हुआ कि उसके पीछे कोई आया है। वो मुड़ पाती कि उससे पहले मज़बूत हाथों ने उसके सर पर हाथ रखकर उसे सोफे पर झुका दिया। ज्योति कुछ बोल पाती, उससे पहले एक मज़बूत हाथ ने उसकी चोली को पीठ से उठाकर ऊपर कर दिया। ज्योति चौंक गयी वो जैसे ही पीछे हटने को थी कि उसने देखा राज था। उसने अपने हाथ से ज्योति के मुँह को बंद करके धीरे से
जाकर दरवाज़ा बंद कर दिया। ज्योति को तो इस हादसे की उम्मीद ही नहीं थी, वो तो डॉली को ढूँढ़ने आयी थी। पर डॉली उसे कहीं नज़र नहीं आ रही थी और राज समझ रहा था कि ज्योति उसी से मिलने आयी है। राज ने बढ़कर ज्योति की ब्रा के नीचे से हाथ डालकर उसके वक्ष अपने हाथों में ले लिये। ज्योति इस बात का विरोध करने लगी।
ज्योति- "नहीं जीजा जी ये!" ज्योति अपनी बात पूरी कर पाती उससे पहले राज ने अपने होटों से ज्योति के होटों को जकड़ लिया। ज्योति ने बेशक अपने होंट कस कर बंद कर लिये थे पर राज की ज़ुबाँ के वार के आगे वो ज़्यादा देर टिक नहीं पायी। जैसे-जैसे राज के होंटों से रस ज्योति के मुँह में प्रवेश करने लगा ज्योति को हल्का-हल्का आनंद आने लगा था। एक तो ज्योति ने ख़ुद भी पी रखी थी ऊपर से राज के होंटों से वो नशीला रस ग्रहण कर रही थी। ज्योति का विरोध कम होने लगा कि अचानक उसे इस बात का एहसास हुआ कि ये सब तो डॉली का हक़ है, उसी के लिए तो वो सब कर रही थी। उसने राज को धीरे से पीछे करते हुए कहा-
"बस जीजा जी इसके आगे कुछ नहीं, ये सब डॉली के लिए है!" ज्योति की बात पूरी होने से पहले ही राज ने ज्योति का हाथ पकड़कर अपने लिंग पर रख दिया। ज्योति ने जैसे ही राज के तने लिंग का स्पर्श पाया वो घबरा गयी।
"नहीं जीजा जी प्लीज़ मुझे जाने दो!" पर राज पर तो अब काम क्रिया की सारी शक्तियाँ सवार थीं। उसने ज्योति के दोनों हाथ जकड़ते हुए उसके वक्षों पर चुम्बनों की बौछार कर दी।