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Erotica मेरी कामुकता का सफ़र

मैं: “मुश्किल शायद ये हैं कि क्या मर्द अपनी बीवियों को दूसरे मर्द के साथ रात भर लेटा हुआ सहन कर पाएंगे कि नहीं. भले ही उनके बीच कुछ गलत नहीं हो रहा हो.”

पायल: “एकदम सही, उनके मन में शक का कीड़ा कुलबुलाता रहेगा. खास तौर से जब उनकी बीवी बिना कपड़ों के किसी से चिपक कर सो रही होगी.”

डीपू: “कुल मिला के आप अपनी बीवी पर कितना भरोसा करते हो इसका टेस्ट.”

अशोक: “विजेता का फैसला कैसे होता हैं?”

पायल: “जो बीवीयां सुबह उठ कर बोल दे कि उन्होंने हार नहीं मानी.”

डीपू : “ऐसे तो कोई बीवी झूठ भी बोल सकती हैं.”

मैं: “आस पास दूसरे लोग भी तो होंगे. खास तौर से वो मर्द जो उसके साथ लेटा हैं. वो मर्द किसी ओर को जितवाने के लिए के लिए अपनी बीवी को तो नहीं हरवायेगा.”

अशोक: “सही कहा, दरअसल ये खेल मिया बीवी को मिल कर खेलना हैं. एक को उकसाने का काम करना हैं तो दूसरे को सहने का.”

पायल: “हैं न मजेदार चेलेंज?”

डीपू: “तो ये लेवल पहले करवा देती, शुरू के दो लेवल की क्या जरुरत थी?”

मैं: “मुझे बहुत नींद आ रही हैं अशोक, चलो हम चलते हैं.”

पायल: “प्रतिमा तुम सोने जाओ, वैसे भी तुम्हे कल मैंने लिखी वो सजा मिलेगी.”

मैं: “मुझे क्यों सजा मिलेगी ! मैंने चेलेंज करने से मना थोड़े ही किया था.”

पायल: “चेलेंज के रूल तोड़ने की सजा. हमने कपड़े से ढकने का रूल बनाया था, पर तुमने मेरे ऊपर से कपडा हटा दिया था.”

मैं: “पर तुमने भी तो मुझे कपड़ा नहीं लगाने दिया था.”

पायल: “क्युकी वो तुम्हारी चॉइस थी. तुमने ही तो पहले कहा था कि तुम बिना कपड़ा लगाए करवाओगी.”

डीपू: “हां प्रतिमा ने बोला था वो बिना कपड़े के ढके करवाने को रेडी थी.”

मैं: “पर ये तो गलत हैं, मैं जीती फिर भी मुझे ही सजा. अशोक कुछ तो बोलो, मैं ये सजा नहीं ले सकती.”

अशोक: “अब तुम्ही लोगो ने रूल बनाये, तुम्ही ने तोड़ा और सजा भी बनाई.”

पायल: “अशोक ये अब तुम्हारी जिम्मेदारी हैं कि तुम प्रतिमा से सजा पूरी करवाओगे.”

अशोक: “अरे करवा दूंगा. पर सजा हैं क्या? ”

पायल: “सजा तो कल ही दे पाएंगे. अभी तुम अपनी मम्मी की कसम खाके बोलो तुम प्रतिमा से सजा पूरी करवाओगे.”

मैं: “मत खाना कसम, फंस जाएंगे.”

अशोक: “अरे ऐसा क्या हैं सजा में?”

डीपू : “क्या फर्क पड़ता हैं, छोडो ना, कोई शरारत होगी. तुम खा लो कसम.”

अशोक: “ठीक हैं बाबा, माँ की कसम, प्रतिमा से सजा पूरी करवा दूंगा.”

पायल: “यस, अब मजा आएगा प्रतिमा का.”

अशोक: “वैसे सजा तो तुम्हे भी मिलेगी, रूल तो तुमने भी तोडा था.”

पायल “कौन सा रूल तोडा था?”

अशोक: “आखिरी के दो मिनट में तुमने प्रतिमा की छाती को मसाज दिया. रूल के हिसाब से मसाज सिर्फ डीपू को ही देना था.”

मैं: “यस, वैरी गुड अशोक. डीपू अब तुम कसम खाओ कि पायल से सजा पूरी करवाओगे.”

डीपू: “रूल तो सबके लिए बराबर हैं. दोनों को सजा मिलेगी. मैं भी मम्मी की कसम खाता हूँ, पायल से सजा पूरी करवाऊंगा.”

पायल: “एक काम करो, हम दोनों की सजा को आपस में कैंसिल कर दो.”

मैं: “हां, ये ठीक हैं.”

अशोक: “एक तो तुम हमको बता नहीं रहे हो कि सजा क्या हैं और अब खुद ही कैंसिल करवा रहे हो.”

डीपू: “हमने तो माँ की कसम भी खा ली, अब कुछ नहीं हो सकता. सजा तो पूरी करनी ही पड़ेगी. लाओ चिठ्ठी क्या सजा हैं.”

पायल: “अब कल ही देख लेना क्या है सजा.”

मैं: “चलो अशोक नींद आ रही हैं”.

पायल: “हां तुम सोने ही जाओ, अगर चेलेंज का तीसरा लेवल शुरू हो गया तो तुम्हारी सहनशक्ति की पोल खुल जाएगी.”

मैं: “तुम्हे जो बोलना हैं वो बोल दो, अब मैं तुम्हारी बातों में आ कर कोई चेलेंज नहीं करने वाली.”

अशोक: “पर तूम लोग तो बोल रहे थे कि इस लेवल में असली चेलेंज तो मर्दो के लिए हैं.”

डीपू: “अब सोना ही हैं तो उस कमरे में सोओ या यहाँ, क्या फर्क पड़ता हैं. बेड वैसे भी किंग साइज हैं, चार लोग सो सकते हैं.”
 
पायल: “मैं तो दूसरा लेवल वैसे ही हार चुकी हूँ, तीसरे का क्या फायदा?”

डीपू: “तुम प्रतिमा को हारते हुए देख पाओगी.”

पायल: “हां, ये फायदा तो हैं. पर हम औरतो के लिए आसान नहीं हैं इस तरह बिना कपड़ो के किसी ओर के साथ सोना.”

मैं: “सौ चूहे खाके बिल्ली हज को चली.”

पायल: “क्या मतलब?”

मैं: “पहले दोनो लेवल में क्या किया था हमने? वहा भी कपडे तो खुले ही थे सबके सामने.”

अशोक: “लाइट बंद रख सकते हैं या चद्दर ओढ़ सकते हैं.”

डीपू: “जब कुछ दिखेगा ही नहीं तो सहनशक्ति कैसे टेस्ट होगा!”

पायल: “तुम मर्दो को अब भी लगता हैं कि तुम में सहनशक्ति हैं! एक मिनट किसी की गोदी में तो देख नहीं पाए.”

अशोक: “चलो मर्द बनाम औरत का मुकाबला हो जाये. किस मे ज्यादा सहनशक्ति हैं.”

पायल: “क्या बोलती हो प्रतिमा, इनको सबक सिखाये?”

मैं: “सोच लो, हमारे साथ क्या क्या बीतेगी.”

पायल: “जो भी बीतेगी, सहन तो इन दोनों को ही करना पड़ेगा.”

मैं: “तुम औरत अकेली ना पड़ जाओ इसलिए साथ दे देती हूँ.”

डीपू: “सब लोग बाथरूम हो आओ. रूल के हिसाब से एक बार लेटने के बाद उठना नहीं हैं सुबह तक.”

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हम चारो अब चेलेंज के तीसरे लेवल के लिए तैयार हो गए. मैं और पायल बिस्तर के बीच में आमने सामने मुँह कर करवट लेकर लेट गए. मेरे पीछे डीपू लेटा था और पायल के पीछे अशोक.

हम लेट तो गए पर माहौल बड़ा अजीब सा लग रहा था. पति अपनी पत्नियों को किसी ओर के साथ लेटा देख रहे थे, जैसे वो उनकी नहीं उनके दोस्त की ही पत्नी हो. ऐसा ही हाल हम बीवियों का भी था.

थोड़ी देर पहले तक जो आसान लग रहा था वो इतना भी आसान नहीं था. कुछ सेकण्ड्स तक तो हम लोग ऐसे ही बिना कुछ किये लेटे रहे.

मर्दो के नाजुक अंग हम बीवियों के पिछवाड़े को छू रहे थे, तो शायद थोड़ी ही देर में उनके खम्बे भी जागने लगी थी.

पर अपने दोस्त और बीवी के डर से उनकी हिम्मत नहीं हो पा रही थी. वो दोनों अपनी कोहनियो से तकिया बना कर अपना सर थोड़ा ऊपर उठा कर लेटे थे.

पायल: “अब ऐसे ही लेटे रहना हैं तो इस से अच्छा है सो ही जाए.”
 
मैं: “मुझे लगता हैं ये दोनों सहन नहीं कर पाएंगे इसलिए आपस में हाथ मिला लिया हैं.”

अशोक: “ऐसा कुछ नहीं हैं. अब देखो.”

ये कहते हुए अशोक ने पायल का टैंकटॉप ऊपर खिसकाना शुरू किया और उसके मम्मो को बाहर कर दिया. फिर पायल के सर से होते हुए पूरा टॉप बाहर निकाल दिया.

पायल: “देखो देखो, डीपू की हालत देखो. तड़प रहा हैं.”

मैंने अपनी गर्दन थोड़ी मोड़ते हुए डीपू के चेहरे को पढ़ा. उसकी हवाइयाँ उडी हुई थी. डीपू नकली हंसी दिखा रहा था. मैं फिर सीधा देखने लगी.

पायल का हाथ उसके सर के ऊपर था जिससे उसकी कांख के छोटे छोटे बाल भी दिखाई दे रहे थे, उसने उनकी भी शायद कुछ समय से सफाई नहीं की थी.

अशोक ने अपने होठ वही पे लगा दिए और चूमने लगा.

चूमते चूमते वो अपने होंठ पायल के साइड बूब्स के उपर ले आया और चूमता रहा. पायल के गहरे गुलाबी निप्पल एक दम तन से गए और उसक सीने के रोंगटे खड़े हो गए. पायल सिसकिया निकालने लगी.

मैंने एक बार फिर गर्दन मोड़ कर डीपू को देखा, वो कड़वे घूंट पी रहा था. खास तौर से जिस तरह पायल सिसकियाँ मार रही थी.

मैं फिर आगे का नजारा देखने लगी. मुझे भी थोड़ी जलन तो हो रही थी पर इससे भी ज्यादा मैं देख चुकी थी दोपहर में अशोक और पायल को.

अशोक ने अब चूमना बंद किया अपने हाथों से पायल की गुलाबी चूंचियो अपने हाथों और उंगलियों से रगड़ने लगा.

पायल: “क्या हुआ मेरे पति, सहन तो कर पा रहे हो ना?”

डीपू ने आव देखा ना ताव और मेरे सीने पर हाथ मार मेरे स्लिप शर्ट के चारो बटन खोल दिए, और मेरे ऊपर की बाजु से शर्ट को पूरा निकाल दिया. फिर आगे झुकते हुए नीचे की बांह से भी शर्ट को खिंच कर पूरा निकाल दिया.

पायल: “लगता हैं डीपू को गुस्सा आ गया हैं. प्रतिमा तूम तो गयी.”

कुछ ही देर पहले पायल की हालत देख मेरे मम्मे वैसे ही तन गए थे. उसके शर्ट खोल देने से हल्की ठण्ड लगी और मेरे भी गूज़बम्प निकल आये.

अब डीपू भी गम कम करने के लिए मेरी चूंचियो को हाथ लगा मलने लगा. पर वो बड़े प्यार से कर रहा था, शायद मेरे मजे लेना चाहता था या फिर मेरा मूड बना मुझे हराना चाहता था.

पायल: “अब अशोक को देखो, अपनी बीवी को अपने ही दोस्त के हाथों नंगे होता देख इसको भी गुस्सा आ रहा हैं, देखो कैसे मसल रहा हैं मेरे सीने को.”

अशोक ने अपना हाथ अब आगे से पायल के पाजामे में डाल दिया. पायल के पाजामे में अशोक का हाथ ऊपर नीचे हिलता हुआ दिख रहा था. पायल नशीली आहें भर डीपू को जलाने लगी.

पायल: “उम्म, आह, आ हा हां, क्या जादू हैं तुम्हारे हाथों में अशोक. डीपू को तो कुछ आता ही नहीं.”

डीपू ने भी बदले की नीयत से अपना हाथ मेरी नाभी पर रखा और घसीटते हुए मेरी चूत पर ले गया, और शार्ट के ऊपर से ही मेरी चूत को एक हाथ से दबोच लिया. फिर शार्ट के ऊपर से ही मेरी चूत को अपने हाथ से रगड़ने लगा.

मुझे मजा तो आ रहा था पर बता नहीं रही थी, बस मन ही मन मुस्करा रही थी. पायल अपनी चूत को रगड़वाने से आहें भरती जा रही थी.

अब डीपू ने मेरे शॉर्ट्स को रगड़ना बंद किया. अपनी चारो उंगलिया एक दूसर से सटा कर पेट पर रख अपना हाथ धीरे धीरे नीचे फिसलाते हुए उंगलिया मेरी शॉर्ट्स और पैंटी में डाल दी. जैसे जैसे उसका हाथ मेरी पैंटी में घुसता गया मेरी हलकी आहें निकलती गयी.

जैसे ही उसका हाथ मेरी चूत की दरारों को छुआ मेरी एक गहरी सांस से सिसकी निकली. वो अपनी उंगलियों को चूत की दरार पर रगड़ते हुए नीचे छेद तक ले गया.

मैं: “आह्ह, अंदर ऊँगली मत डालना रूल के खिलाफ हैं.”

वो भी अब मेरी चूत की दरारों में अपनी उंगलिया फेरने लगा. मैं आँख बंद करते हुए उसकी मालिश को महसूस कर रही थी और अपनी आहों को दबाने की कोशिश कर रही थी.

थोड़ी देर बाद उसने मेरी चूत को रगड़ना बंद किया. मेरी आँखें अभी बंद ही थी और उसने हाथ मेरी पैंटी से निकाल कर मेरे मम्मो पर रख दिया.

माहौल थोड़ा हल्का हो रहा था. पायल एक राग में हलकी हलकी सिसकिया निकालते हुए जैसे लौरी सुना रही थी. डीपू बड़े प्यार से मेरे मम्मो को सहला रहा था. दिन भर की थकान और उस सहलाने और लौरी से पता ही नही चला मेरी आँख कब लग गयी.

मेरी नींद फिर से खुली. सामने पायल गहरी नींद में सोई हुई थी और उसके पीछे अशोक सोये थे. अशोक का हाथ पायल की कमर को लपेटे हुए था.

पीछे घडी में देखा तो रात के तीन बज रहे थे. एक दम शांती थी सब सो रहे थे. मेरे पीछे कोई चिपक के सोया था और उसका नंगा बदन मैं अपनी पीठ पर महसूस कर पा रही थी.

मुझे कुछ खुला खुला सा लगा और मैं अपना हाथ अपने कूल्हे पर ले गयी, मेरे नीचे के कपडे भी नहीं थे. जब आँख लगी थी तब मैंने शॉर्ट्स पहन रखे थे, शायद उसके बाद डीपू ने ही निकाले होंगे.
 
पीछे घडी में देखा तो रात के तीन बज रहे थे. एक दम शांती थी सब सो रहे थे. मेरे पीछे कोई चिपक के सोया था और उसका नंगा बदन मैं अपनी पीठ पर महसूस कर पा रही थी.

मुझे कुछ खुला खुला सा लगा और मैं अपना हाथ अपने कूल्हे पर ले गयी, मेरे नीचे के कपडे भी नहीं थे. जब आँख लगी थी तब मैंने शॉर्ट्स पहन रखे थे, शायद उसके बाद डीपू ने ही निकाले होंगे.

मेरी गांड पर मैं डीपू का नरम पड़ा लंड चिपका हुआ महसूस कर रही थी. पायल और अशोक के नीचे के कपड़े भी नहीं थे. हम चारो पुरे नंगे एक दूसरे के पार्टनर के साथ सोये हुए थे.

पता नहीं मेरे सोने के बाद क्या हुआ था. डीपू का हाथ मेरे दोनों मम्मो के बीच की गली में फंसा पड़ा था. मैंने डीपू के कूल्हे को हिलाकर उसको जगाने की कोशिश की. वो जाग गया और पूछा “क्या हुआ सुबह हो गयी क्या?”

मैं दबी आवाज में फुसफुसाते हुए बात करने लगी. “नहीं, अभी तीन बजे हैं. ये बताओ मेरे सोने के बाद क्या हुआ था?”

डीपू: “तुम्हारे सोने के बाद भी ये दोनों मुझे चिढ़ाने के लिए कुछ न कुछ हरकतें करते रहे. अशोक ने पायल का पाजामा और पैंटी निकाल दिया था तो मैंने भी उसको चिढ़ाने को तुम्हारे नीचे के कपड़े निकाल दिए थे.”

मैं: “और तुम दोनों के कपड़े?”

डीपू: “अशोक ने खुद ही अपने कपड़े निकाल दिए पायल के उकसाने पर. तो मैंने भी वैसा ही किया. पर तुम सोई थी तो तुम्हारी कोई प्रतिक्रिया ही नहीं थी तो मुझे भी बोरियत महसूस होने लगी और मैं तुमसे चिपक कर लेटा और फिर पता नहीं कब नींद आ गयी.”

मैं: “तुम जब सोये थे तब ये दोनों जाग रहे थे?”

डीपू: “हाँ.”

मैं: “तुम्हे क्या लगता हैं? इन दोनों ने कुछ किया होगा हम दोनों के सो जाने के बाद?”

डीपू: “नहीं, पायल ऐसा नहीं कर सकती. चेलेंज के रूल के हिसाब से भी अंदर डालना मना हैं.”

मैं: “पायल के नीचे देखो, दोनों जांघो के बीच में अशोक के अंग की टोपी पायल की योनी के एकदम पास.”

डीपू: “शायद पायल को उकसा कर चेलेंज में हराने के लिए दोनों जांघो के बीच लगाया हो, अंदर डाला हो इसके कोई सबूत नहीं.”

मैंने अपनी ऊँगली पायल के नीचे ले गयी और इशारा किया “ये देखो, पायल के नीचे के बाल आपस में चिपके हुए हैं. ऐसा चिकने पानी से होता हैं. पानी तो सूख गया पर बाल चिपक गए. मुझे गड़बड़ लग रही हैं.”

डीपू: “सही हैं, इन धोखेबाजो को मैं सबक सिखाऊंगा. मैं तुम्हे अभी चोदूंगा और अपना लंड तुम्हारे अंदर ही रख कर हम सो जायेंगे. सुबह जब ये उठ कर देखेंगे तो इनको पता चलेगा धोखा देना क्या होता हैं.”

मैं: “पागल हो क्या? करना हैं तो कर लो पर इनको नहीं पता चलना चाहिए कि हमने पूरा किया हैं. मेरे पति को मेरे पर भरोसा हैं, वो टूटना नहीं चाहिए.”

डीपू अपना लंड रगड़ कर कड़क करने लगा, उसको मुझे चोदने का मौका एक बार फिर मिल गया था. वैसे भी वो कल शाम को बहुत तड़पा था जब मेरे पति के सामने ही मसाज कर रहा था और आगे कुछ कर नहीं पाया था.

मैं: “कम से कम अब तो कंडोम पहन लो. दो बार बिना प्रोटेक्शन कर चुके हो.”

डीपू : “नहीं हैं, मैं दो रात के हिसाब से दो ही लाया था. एक सुबह घूमने जाने से पहले पायल पर इस्तेमाल कर लिया पर दूसरा मिला नहीं.”

मैं: “दूसरा कहाँ गया?”

डीपू : “नहीं मिला, पायल ने बोला इधर उधर कही बेग में छुप गया होगा, पर मुझे नहीं मिला.”

मैं सोचने लगी, उस रात जब अशोक इतनी देर से वापिस रूम में आये थे, तब हो न हो वो पायल के साथ ही थे, एक कंडोम तब यूज हुआ होगा. शायद पायल को अभी तक पता नहीं हैं कि मेरे पति किसी को माँ नहीं बना सकते.

मैं: “तो फिर पीछे वाले छेद में कर लो.”

डीपू: “आगे लेने में तुम्हारी हालत ख़राब हो जाती हैं, पीछे वाले छेद में ये लंबा वाला लंड सहन कर पाओगी तुम?”

मैं: “नहीं, आगे ही ठीक हैं. पीछे वाले में तो मेरी चीखें ही नहीं रुकेगी.”

डीपू: “चलो मेरा कड़क होकर तैयार हैं. दो बार बिना प्रोटेक्शन किया हैं तो एक बार ओर सही. वैसे भी दोपहर में मैं तुम्हे इमरजेंसी पिल लाकर दे दूंगा.”

मैं: “पक्का दे देना. और धीरे धीरे करना, तुम्हारा बहुत लंबा हैं, मेरी चीख निकली तो भांडा फुट जायेगा.”

डीपू: “दिन में जंगल में किया था तब तो इतनी चीख नहीं निकली थी.”

मैं: “तब तो वो दोनों मेरे सामने उधर नीचे खड़े थे न. बड़ी मुश्किल से रोका था खुद को.”

डीपू “तो अभी ये दोनों तुम्हारे सामने ही तो हैं. फिर से कण्ट्रोल कर लेना, पर मैं तो जैसे करता हूँ वैसे ही करूँगा.”

अब उसने अपना कड़क लंबा लंड पकड़ कर मेरी चूत के मुहाने पर रख दिया, और अपने हाथ से मेरे कूल्हे की हड्डी पकड़ते हुए मेरे कूल्हों के अपनी तरफ खिंचा और खुद को आगे की तरफ धक्का लगाते हुए अपना लंड मेरी चूत में पूरा पेल दिया. मेरी तो चीख निकलते निकलते बची.

वो अब गचागच झटके मारता हुआ मेरी चूत को चोद रहा था, और मैं बड़ी मुश्किल से अपने दोनों होंठों को भींचते हुए अपने कराहने की आवाज अंदर ही अंदर दबा रही थी.
 
मैं अपनी आँखें खुली रखने का प्रयास कर रही थी. ताकि देख पाऊ सामने लेटे दोनों लोग कही उठ ना जाये पर अपनी सिसकियों की आवाज को दबाने के चक्कर में मेरी आँखें बंद ज्यादा रही.

डीपू के लंड में सचमुच एक जादू सा था, या फिर मेरी चूत इसी तरह के लंड के लिए बनी थी. थोड़ी ही देर में हम दोनों का पानी बनने लगा था. और फच्च फच्च की आवाजे आने लगी.

मैं: “रुको, आवाज आ रही हैं. अब धीरे धीरे करो. थोड़ी देर में पानी छुट जाएगा फिर जोर से कर लेना.”

डीपू अब धीमे धीमे धक्के मारते हुए अंदर बाहर करने लगा. अब चिकने पानी पर लंड के रपटने की हलकी सी चिप चिप की आवाज आ रही थी.

धीरे धीरे जैसे ही वो आवाज बंद हुई तो डीपू ने फिर से जोर से झटके मारना शुरू कर दिया. वो अपने झटके इस तरह से एडजस्ट कर रहा था जहा से कम से कम आवाज आये.

जैसे भी झटके हो मेरी तो हालत ख़राब हो रही थी. मजा बहुत आ रहा था पर आवाज निकाल ही नहीं पा रही थी.

थोड़ी देर ऐसे ही चोदते चोदते हम दोनों एक के बाद एक झड़ गए. डीपू का लंड अभी भी मेरी चूत में ही था.

मैं: “चलो अब बाहर निकालो.”

डीपू: “अरे रहने दो ना, थोड़ी देर में नरम पड़ कर अपने आप बाहर आ जायेगा.”

मैं: “तुम मरवाओगे मुझे.”

डीपू मुझसे चिपक के लेटा रहा और मेरे मम्मो को हौले हौले सहलाता रहा और कच्ची नींद में उठने से मैं एक बार फिर नींद की आग़ोश में चली गयी.

सुबह मेरी आँख खुली. पायल और अशोक वहां नहीं थे. सामने घडी में देखा आठ बज चुके थे. तभी सामने बाथरूम से पायल और अशोक कपड़े पहने हुए बाहर आये, वो कुछ बातें कर रहे थे. मैंने अपनी आँखें बंद कर ली.

डीपू मेरे पीछे से चिपक के सोया हुआ था. उसका लंड मेरी दोनों जांघो के बीच फंसा था, चूत के एकदम पास.

मैं सोच में पड़ गयी, अशोक ने पता नहीं क्या देखा होगा. जब अशोक उठा होगा तब तक क्या डीपू का लंड मेरी चूत में ही होगा.
 
मैं सोच में पड़ गयी, अशोक ने पता नहीं क्या देखा होगा. जब अशोक उठा होगा तब तक क्या डीपू का लंड मेरी चूत में ही होगा.

अशोक और पायल अब बिस्तर के नजदीक आते जा रहे थे और उनकी आवाज स्पष्ट सुनाई देने लगी. मैं बिना हिले ढूले उनको बातें सुननी लगी.

पायल: “तुम मानो या न मानो, इन दोनों ने पक्का कोई गुल खिलाया हैं. देखो प्रतिमा की चूत के एकदम बाहर डीपू का लंड हैं.”

अशोक: “तुम प्रतिमा को नहीं जानती, बहुत पतिव्रता हैं. कल भी चेलेंज के टाइम वो कितना घबरा रही थी. उसने कुछ नहीं किया होगा.”

पायल: “तो फिर उसने डीपू को उसका लंड अपनी चूत के इतना करीब कैसे आने दिया, लगभग छू रहे हैं.”

अशोक: “दोनों अंग इतने पास में हैं इसका मतलब ये थोड़े ही न हैं कि अंदर भी डाला ही होगा. अगर डीपू ने प्रतिमा को सोते हुए कुछ किया होता तो प्रतिमा जग जाती और उसको रोक देती.”

पायल: “तुम्हे डीपू के लंड पर सूखा हुआ सफ़ेद पानी नहीं दिख रहा क्या?”

अशोक: “डीपू का थोड़ा बहुत पानी निकल गया होगा, प्रतिमा सो गयी थी, उसको थोड़े ही पता होगा.”

पायल: “चलो अभी इनको उठा कर पूछते हैं.”

पायल और अशोक अब हम दोनों को उठाने लगे. मैंने नींद में होने का नाटक किया, पर डीपू जग गया और उन दोनो को देख हड़बड़ी में मुझसे अलग हुआ.

फिर मैंने भी अपनी आँखों पर हाथ मलते हुए अपनी आँखें खोली. उनको देखते ही मैंने भी जल्दी से वहा पड़े अपने कपड़े उठाये और पहनने लगी. डीपू ने तब तक अपना पाजामा पहन लिया था.

पायल: “अब कपड़े पहनने का क्या फायदा, सब कुछ तो कर लिया तुमने.”

मैं: “क्या बकवास कर रही हो? तुम लोग रात को मस्ती कर रहे थे और मेरी आँख लग गयी, उसके बाद तो मैं अब उठी हूँ. मेरे नीचे के कपड़े किसने खोले?”

अशोक: “चिंता मत करो, हमारे सामने कल रात को डीपू ने ही खोले थे.”

डीपू: “प्रतिमा के बाद मुझे भी नींद आ गया थी. तुम लोगो का क्या हुआ फिर?”

पायल: “क्या होना था, तुम दोनों तो सो गए, फिर अशोक ने मुझे उकसाना जारी रखा और फिर मैंने हार मान ली.”

डीपू: “हार गयी ! मतलब?”

पायल: “ज्यादा शक मत करो, मैंने अशोक को बोल दिया कि अब परेशान करना बंद करो मैं हार मान लेती हूँ.”

डीपू: “मैं शक थोड़े ही कर रहा हूँ. मैं तो ये कह रहा था कि ये राउंड तो तुम्हारे लिए ज्यादा आसान था.”

पायल: “तुमने तो मेरी मदद नहीं की ना. तुम प्रतिमा को हराने की कोशिश कर सकते थे, पर सो गए.”

डीपू: “अब नींद आ गयी तो क्या कर सकते हैं.”

पायल: “मेरे साथ तो गलत हुआ न? प्रतिमा सोने की वजह से बच गयी. ये अनफेयर हैं. देखा जाये तो प्रतिमा ने चेलेंज पूरा किया ही नहीं.”

अशोक: “अरे अब छोडो, नहा धो कर नाश्ता कर लेते हैं. हम चेकआउट करके सामान होटल के लॉकर में रख देते हैं, फिर घूमने निकलते हैं. शाम को हमें घर के लिए निकलना भी हैं.”

मैं: “चलो चलते हैं, हमारा रूम कल रात से सूना पड़ा हैं. एक रात के पैसे बर्बाद हो गए.”

पायल: “चेकआउट तो बारह बजे तक कर सकते हैं. तब तक यही रुकते हैं. वैसे भी आज ज्यादा जगह नहीं हैं घूमने को, तीन चार घंटे में कवर कर लेंगे.”

डीपू: “चेकआउट का बाद में देखते हैं, पहले नहा धो कर नाश्ता कर लो, कैंटीन बंद हो जाएगी.”

अशोक: “आज नाश्ता फ़ोन करके अपने अपने कमरे में ऊपर ही मंगा लेते हैं, क्यों कि नहा के जाएंगे तब तक देर हो जाएगी.”

डीपू: “ठीक हैं नाश्ते के बाद हम तुम्हारे रूम में आते हैं, फिर आगे का प्लान करते हैं.”

मैं और अशोक अब हमारे रूम में आ गए. अशोक मेरे बारे में पूछने लगा.

अशोक: “डीपू ने मेरे सोने के बाद तुम्हे परेशान तो नहीं किया ना?”

मैं: “मैं तो सो गयी थी, पता नहीं. क्यों क्या हुआ तुम्हे कुछ गड़बड़ लगा?”

अशोक: “नहीं, मेरा मतलब. अगर कोई नींद में.. कुछ करने की कोशिश..”

मैं: “हम औरतो को सब पता चलता हैं, बेहोशी में भी कोई करे तो उठने के बाद पता चल जाता हैं. तुम मुझ पर शक तो नहीं कर रहे?”

अशोक: “तुम पर नहीं, डीपू पर, जिस तरह कल उसने मजाक मजाक में तुम्हारे शर्ट में हाथ डाल दिया था.”

मैं: “ये सारा चेलेंज वाला खेल भी तो तुम्ही लोगो ने शुरू किया था. मुझ बेचारी को तो ऐसे ही फंसा दिया. पता नहीं क्या क्या काम करवाया मुझसे बेशर्मो वाला.”

अशोक: “आई एम सॉरी, वो दोस्ती यारी में चेलेंज चेलेंज करते ज्यादा ही हो गया. चलो तुम पहले नहा धो लो. मैं तब तक नाश्ते के लिए फ़ोन कर देता हूँ.”

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मैं अब नहाने को चली गयी. वापिस आयी तब तक अशोक ने नाश्ता कर लिया था. वो नहाने गया तब तक मैंने भी नाश्ता कर लिया.

फिर मैं और अशोक अभी भी बाथरोब पहने हुए थे कि पायल और डीपू भी आ गए. वो लोग भी हमारी तरह अभी तैयार नहीं हुए थे और बाथरोब में ही थे.
 
मैं: “हम तो अभी तैयार भी नहीं हुए, तुम बड़ा जल्दी आ गए. और तुम लोग अभी तक तैयार क्यों नहीं हुए, बाहर नहीं जाना क्या?”

पायल: “मुझे न्याय चाहिए. ये डीपू मुझ पर शक कर रहा हैं कि इसके सोने के बाद मैंने कुछ किया हैं अशोक के साथ मिलकर.”

अशोक: “डीपू ये क्या हैं? अपने दोस्त पर यकीन नहीं तुम्हे?”

पायल: “डीपू ही नहीं, ये अशोक भी सुबह डीपू और प्रतिमा को चिपक कर सोते हुए देख शक कर रहा था.”

अशोक: “झूठी, शक तुम कर रही थी, मैं नहीं.”

मैं: “अच्छा ! यहाँ रूम में आने के बाद भी तुम मुझे पूछते हुए शक कर रहे थे, उसका क्या?”

अशोक: “अरे यार तुम दोनों बीवियां तो मेरे पीछे ही पड़ गयी. मैं तो बस ऐसे ही पूछ रहा था.”

डीपू: “थोड़ा बहुत पूछ लिया तो क्या हो गया. क्लियर ही तो कर रहे थे.”

पायल: “इसे पूछना नहीं, शक करना कहते हैं. हम बीवियों ने तो तुम पतियों पर शक नहीं किया फिर. तुम ही क्यों करते हो?”

मैं: “वो तो ठीक हैं कि कल रात वाला तीसरा चेलेंज बीच में ही छूट गया, वरना ये दोनों पति तो शक के मारे पता नहीं क्या करते हमारा.”

अशोक: “ना तो हम शक करते हैं और ना ही किसी चेलेंज से डरते हैं.”

डीपू : “चाहिए तो वापिस करा लो चेलेंज.”

पायल: “चेलेंज तो होकर ही रहेगा. मैं प्रूव कर दूंगी कि ये दोनों पति शक्की हैं.”

मैं: “नहीं बाबा, मुझे नहीं करना. मैं अब ओर कपड़े नहीं उतारने वाली फिर से.”

पायल: “चिंता मर कर कपड़े के अंदर कोई नहीं देखेगा.”

अशोक: “तो फिर बाहर घूमने का क्या? हम तो घूमने आये थे.”

पायल: “मुझे सिर्फ एक घंटा दो, तुम दोनों मर्दो की पोल खोल दूंगी.”

डीपू: “आ जाओ, जो करना हैं करो. हम शक नहीं करेंगे.”

पायल: “चल प्रतिमा, बेड पर चल.”

मैं: “पर मैं अब कपड़े नहीं खोलूंगी.”

पायल: “अरे हां, नहीं खोलने, चल.”

मैं और पायल कल रात की तरह बेड के बीच एक दूसरे की तरफ मुंह कर करवट लेके लेट गए.

पायल: “तुम दोनों पति अपने बाथरोब की लैस खोल कर एक दूसरे की बीवियों के पीछे चिपक कर लेट जाओ.”

अपने बाथरोब की लैस खोल कर डीपू मेरे पीछे आकर लेट गया और अशोक पायल के पीछे.

पायल: “अब पहले किसका टेस्ट ले?”

मैं: “पहले तुम ही करके बताओ क्या करना चाहती हो.”

पायल: “ठीक हैं. मैं और अशोक मिल कर डीपू के मन में शक पैदा करने की कोशिश करेंगे. अगर डीपू को शक हुआ तो वो अपनी जगह से उठ कर हमारे पास में आ शक दूर करने की कोशिश करेगा. अगर वो वही लेटा रहा तो मतलब उसे शक नहीं हैं. सिंपल?”

सबने इसमें अपनी हामी भरी.

पायल: “अशोक अपना सामान तैयार करो.”

अशोक: “ऐसे कैसे करू, कुछ मूड नाम की चीज भी तो होती हैं.”

पायल: “ऐसे करो” ये कहते हुए पायल ने अपने बाथरोब की लैस खोल उसको पीछे से ऊपर कर अपनी गांड को बाहर निकाल दिया.

मुझे और डीपू को तो आगे से कुछ नहीं दिखा पर अशोक तो पायल के पीछे ही था, उसे दिखा. अशोक पायल की गांड को घूरते हुए अपना लंड को पकड़ आगे पीछे रगड़ते हुए कड़क करने लगा.

अगले दो तीन मिनट में ही अशोक अपने कड़क सामान के साथ तैयार था.

अशोक: “अब बोलो, तैयार हैं?”

पायल: “मेरे पीछे चिपक कर लेट जाओ और अपना सामान से मेरे पीछे झटके मारो, पर याद रखना मेरी उस जगह के वहा ना जाए.”

अशोक ने अब पायल के पिछवाड़े के उभारो पर जोर जोर से झटके मारना शुरू कर दिया. पायल की गुदगुदेदार गांड से अशोक के शरीर के टकराने से थाप थाप की आवाजे आने लगी.

आगे से देखने पर एकदम ऐसा भ्रम हो रहा था जैसे सचमुच अशोक पायल को चोद रहा हो.

पायल: “डीपू, जब भी तुम्हे शक हो तो आकर देख लेना, कही हम कुछ कर तो नहीं रहे.”

डीपू: “अब तो तुम असली में कर लो फिर भी नहीं आऊंगा.”

पायल ने जानबूझकर सिसकियाँ निकालनी शुरू कर दी जैसे सच में चूदा रही हो. पर डीपू समझ गया था ये उसको फंसाने का जाल था. पायल ने अब अपनी अगली तरकीब लगायी.

पायल: “अशोक, अपना सामान अब मेरे जांघो के बीच रखो. एक दम ऊपर की तरफ जहा दोनों टाँगे मिलती हैं.”

पायल ने अपनी ऊपर की टांग को थोड़ा उठा दिया और अशोक ने पायल की चूत के एकदम पास अपना लंड रख दिया. पायल ने अपनी टांग फिर बंद कर दी.

हमें आगे से सिर्फ पायल की दोनों जाँघे दिख रही थी. अशोक ने अब फिर झटके मारने शुरू कर दिए और पायल ने सिसकिया मारते हुए डीपू को जलाना.

थोड़ी देर ये चलता रहा पर डीपू पर कोई असर नहीं हुआ, हां उसका लंड जरूर कड़क हो, मेरे पिछवाड़े को छू, चुभ रहा था.

पायल: “ये आखिरी प्रयास हैं. प्रतिमा जरा चादर लाकर हम दोनों के कमर से लेकर नीचे टांगो तक ओढ़ा दे.”

मैं सोचने लगी अब ये क्या करने वाली हैं. मैंने वैसा ही किया और फिर अपनी जगह आकर लेट गयी.

उनके नीचे का हिस्सा पूरा ढक चूका था तो कुछ दिख ही नहीं रहा था. अशोक के झटको की वजह से सिर्फ चद्दर हिल रहा था.

थोड़ी देर बाद अशोक के हाथ की उंगलियों की आकृति पायल के कूल्हों पर चादर में से दिख रही थी. धीरे धीरे जरूर पायल की सिसकियाँ तेज होने लगी थी.

फिर थोड़ी देर में अशोक की जोर लगाने वाली हलकी सिसकिया भी सुनाई देने लगी. पायल असल में सिसकियाँ निकाल रही थी या नकली ये कह पाना बहुत मुश्किल हो गया था.
 
थोड़ी देर बाद अशोक के हाथ की उंगलियों की आकृति पायल के कूल्हों पर चादर में से दिख रही थी. धीरे धीरे जरूर पायल की सिसकियाँ तेज होने लगी थी.

फिर थोड़ी देर में अशोक की जोर लगाने वाली हलकी सिसकिया भी सुनाई देने लगी. पायल असल में सिसकियाँ निकाल रही थी या नकली ये कह पाना बहुत मुश्किल हो गया था.

डीपू का लंड अब काफी कड़क हो चुका था और शायद उसने अपने बाथरोब के आगे के थोड़े खुले हिस्से से अपना लंड बाहर निकाल कर मेरे मोटे बाथरोब के बाहर से ही मेरी गांड में घुसाने की कोशिश कर रहा था.

कुछ मिनटों तक ऐसा ही खेल चलता रहा, पर डीपू ने हिम्मत दिखाते हुए अपने शक़ को बाहर नहीं आने दिया. थोड़ी देर बाद पायल जोर जोर से सिसकिया निकालते हुए चीखने लगी.

पायल: “आह्ह्ह्हह अह्ह्ह्हह्ह डीपू आओ चादर हटा कर देखो अह्ह्ह्हह अह्ह्ह्हह्ह जाओ. देखो मैं सच में चूदवा रही हूँ. ये देखो अशोक का लंड मेरे अंदर तक गया. बचाओ अपनी बीवी को उई माँ अह्ह्हह्ह्ह्ह अह्ह्ह्हह्ह्ह्ह मर गयीईई.”

डीपू : “नाटक बाज कही की, मैं तुम्हारे झांसे में नहीं आने वाला.”

थोड़ी देर ऐसे ही आवाजे निकालने के बाद पायल हाँफते हुए चुप हो गयी. थोड़ी देर वो चादर में ही रहे और अपने बाथरोब ठीक करने लगे. फिर उन्होंने वो चादर निकाल दी और अपनी लैस फिर से बाँध दी.

डीपू: “हो गया मेरा टेस्ट या ओर भी करना हैं?”

पायल: “तुम्हारा हो गया अब अशोक का करना हैं. प्रतिमा मैंने किया वैसा ही तुम भी करो और देखो मजे.”

शायद पायल ने सच में अशोक के साथ चुदाई करवाई और डीपू ने उनको पकड़ने तक की जहमत नहीं उठाई. अब मेरा नंबर था, मुझे ये डर था कि कही डीपू सच में कुछ कर ना बैठे और अशोक मुझे रंगे हाथों ना पकड़ ले.

मैं: “डीपू को तो शायद सामान तैयार करने की भी जरुरत नहीं. पहले से तैयार हैं.”

डीपू शरमा गया. पायल ने हाथ आगे बढ़ा कर मेरे बाथरोब की लैस खोल दी और फिर डीपू ने खुद ही पीछे से बाथरोब उठा मेरी गांड को बेनकाब कर दिया.

उसे पहले ही पता था क्या करना हैं. उसने जोर जोर से मेरी गांड पर चोट मारना शुरू कर दिया और थपा थाप कर आवाज शुरू हो गयी. सब कुछ पायल की बनाई स्क्रिप्ट के हिसाब से हो रहा था.

डीपू ने मेरी ऊपर वाली टांग उठा दी, जल्दी में अपना लंड मेरी चूत से अड़ा के वापिस टांग नीचे कर दबा दिया. अब वो झटके मारने लगा जैसे सच में मुझे चोद रहा हो. उसके लंड की टोपी रह रह कर मेरी चूत को बाहर से रगड़ रही थी.

पायल: “प्रतिमा कुछ आवाज तो निकाल, अशोक को अहसास तो करा.”

मैं अब बीच बीच में हँसते हुए आह्ह्हह आह्ह्हह करने लगी.

पायल: ”एक्टिंग नहीं आती क्या? हंसना बंद कर और सिरियस चेहरा बना कर सिसकियाँ निकाल.”

डीपू के लंड की रगड़ से वैसे भी मेरा थोड़ा बहुत मूड बनने लगा था, तो मैंने भी अब चेहरा सिरियस बनाते हुए सिसकियाँ निकालना शुरू कर दिया.

पायल: “हां ये हुई ना बात. अशोक जाओ देखो, अपनी बीवी को चेक करो.”

अशोक ने हंस के टाल दिया. पायल ने उठ कर वो चादर मेरे और डीपू के गले से लेकर पांवो तक पूरी ही ओढ़ा दी और फिर अशोक के आगे लेट गयी.

डीपू को तो शायद इसी मौके का इंतज़ार था. उसने अपना हाथ मेरे बाथरोब में डाल मेरे मम्मो को दबोच लिया.

इतनी देर रगड़ के बाद थोड़ा पानी निकलने से चूत के बाहर चिकना हो चूका था. उसने अपने लंड के झटको की डायरेक्शन बदली और ऊपर की तरफ जोर से झटका मार मेरी चूत में अपना लंड उतार दिया.

मुझे ये उम्मीद नहीं थी कि वो सच में अंदर डाल देगा. ये तो अच्छा हुआ कि मैं पहले से सिसकियाँ निकाल रही थी तो मेरी चीख से ज्यादा फर्क नहीं पड़ा.
 
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