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रंगीला लाला और ठरकी सेवक

गीला कपड़ा पैर पर लपेटने से शंकर को दर्द में राहत महसूस हुई.., चंपा रात के खाने के इन्तेजाम में लग गयी.., मामी ने उसके दर्द के बारे

में पुछा तो उसने कहा कि अब ज़्यादा दर्द नही है…!

कुच्छ देर बाद चारू अपनी मित्र मंडली के पास से घर लौटी.., ये समय अक्सर उसके मोडीलिंग क्लास का होता है.., सो इस समय भी वो एक सूपर मॉडेल जैसी ही लग रही थी…!

हल्के से मेक-अप के साथ उसके बदन के कपड़े.., एकदम शरीर से चिपका उसका वन पीस ड्रेस.., जो कि उसकी गोल-गोल माखन जैसी चिकनी मलाईदार जांघों तक ही थी.., जिसके अंतिम सिरे पर कपड़े की डिज़ाइन की झालर जैसी…!

उपर एक शोल्डर कंप्लीट्ली नंगा.., ड्रेस में कसे हुए उसके 32” के ब्रेस्ट जिनकी हल्की सी दरार भी दिख रही थी.., लंबी सुराई दार गर्दन में एक पतली सी गोल्ड चैन के सहारे लटका एक बेश-कीमती हीरा पहने हुए थी वो…,

कानो में बड़े बड़े कुंडल और सुतवान नाक में एक बहुत ही पतली सी बाली…

शंकर एकटक उसे पागलों की तरह बस देखता ही रह गया..,

वो मदमस्त चल से छोटे छोटे कदम बढ़ाती हुई अपने 4” उँची हील के सॅंडलो से ठक-ठक करती हुई हॉल में प्रविष्ट हुई, पास आकर उसने

अपनी माँ से ही मोम बोला और सोफे पर धम्म से टाँगें जोड़कर बैठ गयी…!

आज तो कुच्छ ज़्यादा ही देर लगा दी बेटा तुमने.. वर्षा देवी ने उसकी ही बात का जबाब देते हुए कहा…

हां मोम आज थोड़ा ज़्यादा देर तक रॅंप डॅन्स करते रहे.., उसके बाद कुच्छ बॉलीवुड से सेलेब्रिटीस भी आए थे.., उन्होने सबका इंट्रो लिया बस इसलिए देर हो गयी..,

फिर उसने एक उड़ती सी नज़र शंकर पर डाली और बस ऐसे ही औपचारिकता बस हेलो किया.., इससे पहले की शंकर मुस्कुरा कर उसके हेलो का जबाब देता वो उठकर अपने कमरे की तरफ चल दी…!

शंकर के प्रति उसका रूखा व्यवहार वर्षा देवी को भी पसंद नही आया.., उन्होने बात संभालते हुए कहा…,

आज ज़्यादा वर्क की वजह से शायद थक गयी है इसलिए यहाँ हमारे पास ज़्यादा देर नही बैठी.., तुम ये सब माइंड मत करना हां…!

शंकर ने मुस्कराते हुए कहा – ओह नही मामी जी मे समझ सकता हूँ.., चारू जी को देख कर ही लग रहा था कि वो कितनी टाइड हैं…!

कुच्छ देर बाद मामा जी भी आगये.., वो शंकर को आया देख कर बहुत खुश हुए..,

फिर जब उनकी पैर की चोट पर नज़र पड़ी, जहाँ अभी भी एक गीला कपड़ा बँधा हुआ था.., तो उन्होने भी उसे डॉक्टर को दिखाने की सलाह देते हुए कहा –

शंकर बेटे मेरे ख्याल से तुम्हें एक बार डॉक्टर को ज़रूर दिखा लेना चाहिए.., कोई अन्द्रुनि चोट हुई तो प्राब्लम बढ़ सकती है…!

शंकर – अरे नही मामा जी.., ऐसी चोटें तो खेतों में आए दिन लगती रहती है.., और अपने आप ही ठीक हो जाती हैं.., आप बिल्कुल फिकर ना करो…!

 
कुच्छ देर बाद सबने मिलकर खाना खाया.., मामा जी कुच्छ देर बाहर गार्डन में वॉक करते रहे और फिर सोने चले गये…!

उनके कुच्छ देर बाद मामी जी भी सोने चली गयी.., शंकर भी कुच्छ देर और टीवी देखने के बाद सोने के लिए उठने ही वाला था कि चंपा एक हाथ में एक कटोरी और दूसरे हाथ में एक बड़ा सा स्टील का ग्लास थामे वहाँ आ पहुँची…!

शंकर को सोफे से उठते हुए देखकर बोली – थोड़ा ठहरिए भैईयाज़ी.., देखिए हम आपकी चोट के लिए एक रामबाण दवा बनाकर लाए हैं…!

फिर उसने शंकर को वो ग्लास थमाते हुए कहा – पहले आप इससे पी लीजिए.., देखना सुबह तक आपका पैर का दर्द छूमन्तर हो जाएगा…!

शंकर ग्लास पकड़ते हुए बोला – क्या है इसमें…???

अरे भैया जी.. आप तो गाओं के ही रहने वाले हैं.., जानते ही होंगे की चोट में हल्दी वाला दूध कितना काम करात है.., बस आँख मींच कर पी जाइए…!

शंकर फिरसे सोफे पर बैठकर दूध पीने लगा और वो उसके पैरों के पास ज़मीन पर अपनी गांद रखकर बैठ गयी…, बैठ क्या गयी.., उसने

शंकर के दोनो पैरों को अपनी टाँगों के बीच कर लिया.., और खुद घुटने मोड़ कर बैठी थी…,

चंपा ने अपना घांघरा घुटनो तक चढ़ा रखा था.., वो इस तरह से उसके सामने बैठी की घान्घरे का नीचे का पल्ला नीचे रह गया और उपर का

घुटनो के उपर की ओर होने के कारण उपर टंगा रह गया…!

इतना ही नही, उसने अपनी ओढनी भी नही ले रखी थी.., चौड़े गले की उसकी चोली से उसके दोनो कसे हुए कलमी आम शंकर की ठीक

नज़रों के सामने थे.., जो बेहद टाइट चोली के अंदर ऐसे फडफडा रहे थे मानो दो कबूतर पिंजरे से बाहर आना चाहते हों…,

वो इतना अनाड़ी भी नही था कि उसकी मंशा को ना समझ पाए.., अब वो खुद अपना लहंगा पसारे सामने बैठी है तो कुच्छ तो इनाम उसे

मिलना ही चाहिए, इसलिए शंकर ने उसके साथ मज़े लेने का मन बना लिया…!

उसने अपना सही वाला पैर थोड़ा सीधा कर लिया जो चंपा के लहंगे की छतरि के नीचे उसकी केले जैसी मोटी और नंगी जाँघ से टच हो

गया.., चोट वाला पैर थोड़ा मोड़ कर चंपा के हाथ में था…!

चंपा ने कटोरी से लेप लिया और उसके पैर पर लगाने लगी..,

शंकर कुच्छ हद तक जानता था कि वो क्या लेप है.., लेकिन फिर भी अंजान बनते हुए कहा – ये क्या है चंपा बेहन…???

चंपा ने जब देखा कि शंकर का एक पैर उसकी मोटी जाँघ से टच हो रहा है तो उसने अपनी एक टाँग को, जो कि उसके चोट वाले पैर की

तरफ थी उसे सीधे करते हुए उसने अपनी गान्ड को और आगे सरकाते हुए बोली –

ये आमिया हल्दी है, इसके लेप से देखना सुबह तक पता भी नही चलेगा कि आपको कहीं चोट भी लगी थी…!

चंपा के आगे सरकने से अब शंकर का सीधे वाला पैर उसकी चूत के बेहद नज़दीक था.., इतना नज़दीक कि अगर वो अपने पैर के अंगूठे को उपर नीचे करे तो वो उसकी चूत की मोटी मोटी गुदाज फांकों से रगड़ने लगे…!

चंपा ने शंकर के चोट वाले पैर को अपनी जाँघ पर टीकाया और हल्के हाथ से उसके पैर पर लेप लगाने लगी.., और साथ ही वो शंकर की

तरफ और खिसकती जा रही थी..,

जैसे ही वो थोड़ा और खिसकी की शंकर के पैर का अंगूठा उसकी चूत की फांकों से टच हो गया.., जो की एकदम नंगी थी.., उसने नीचे

कच्छी भी नही पहनी थी…!

शंकर को जैसे ही ये पता चला कि वो नीचे एकदम नंगी है और उसके पैर का अंगूठा उसकी नंगी चूत की फांकों पर रखा है जिसके आस

पास थोड़ा सा जंगल भी है.., उसका लंड पाजामा में खड़ा होने लगा…!

चंपा लेप लगाते हुए बोली – अब कैसा लग रहा है भैया जी…?

शंकर – कुच्छ राहत सी लग रही है..,

चंपा – तो अपना अंगूठा चलाओ ना..,

शंकर – कॉन सा वाला…?

चंपा – दोनो एक साथ चलाओ…, तभी तो पता चलेगा कि किस्में दर्द होता है और कितना…???

शंकर चंपा की बात का मतलब समझ गया था फिर भी उसने चोट वाले पैर का अंगूठा चलाते हुए कहा – आहह.. अभी थोड़ा दर्द है…,

चंपा – अब दूसरा भी चला कर देखो.., पता चले उसमें तो कोई दर्द तो नही है..?

शंकर – उसमें कहाँ से दर्द होगा.., उसमें चोट थोड़ी ना लगी है..,

चंपा – अरे आप समझते काहे नही उसको भी चला कर देखना ज़रूरी है.., चलाइए ना…!

शंकर ने मुस्कराते हुए अपने दूसरे पैर के अंगूठे को जैसे ही मूव्मेंट दिया.., चंपा ने अपनी टाँगें और खोल दी और वो उसकी फांकों के बीच उपर नीचे होने लगा…!

हां भैया जी ऐसे ही चलाते रहो.., पता चले कितना असर होता है दवा का..,

उधर शंकर का अंगूठा चंपा की मोटी मोटी फांकों के बीच की दरार में उपर नीचे हो रहा था जिससे चंपा की चूत में सुरसूराहट तेज होती

जा रही थी, और वो अंदर से गीली होने लगी थी…!

बस किसी तरह चूत का मूह थोड़ा खुलना चाहिए और उसका मोटा सा अंगूठा वो अपनी चूत के च्छेद में घुसा सके…, इसी कोशिश में चंपा

अपनी गान्ड को धीरे धीरे इधर उधर कर रही थी..,

जिसका फ़ायदा भी होता जा रहा था और शंकर के पैर का अंगूठा धीरे-धीरे ही सही फांकों के बेच में समाता जा रहा था…!

इधर शंकर की उत्तेजना ये सोच कर बढ़ती जा रही थी की उसका अंगूठा चंपा की मालपुए जैसी चूत की गुदगुदी फांकों में घुसता जा रहा है…!

अब चंपा की चूत पूरी तरह गरमा चुकी थी, अब उसका रस धीरे धीरे बाहर आने लगा था और चूत गीली होने लगी.., अब वो उसके पैर पर

अपना दबाब बढ़ाने लगी.., जिससे उसका अंगूठा और अंदर तक रगड़ने लगा…,

दोनो ही अब ये भूल चुके थे कि वो यहाँ किस मक़सद से बैठे हैं.., बस अब दोनो दो गूंगों की तरह बस अपनी वासना के भंवर में गोते लगा रहे थे…,

जैसे ही शंकर का अंगूठा उपर जाकर उसकी चूत की क्लिट जो अब किसी कन्कौये की तरह चोंच खड़ी कर चुकी थी उससे जब रगड़ ख़ाता

तो चंपा अपने निचले होठ को दांतो में दबाकर अपनी सिसकी को मूह से निकलने से रोकने की कोशिश करती…,

फिर भी एक दो बार उसकी आअहह… निकल ही गयी.., अब वो बिल्कुल किनारे पर पहुँचने वाली थी.., अचानक उसके मूह से निकल पड़ा.., आहह..भैया जी थोड़ा तेज तेज करो ना…!

शंकर के अंगूठे की रफ़्तार तो वैसे ही तेज होती जा रही थी.., फिर एक बार जैसे ही उसका अंगूठा उसके सुराख के मूह पर आया..,

चंपा ने आगे को झुक कर शंकर का पैर मजबूती से पकड़ लिया और उसे अपनी चूत पर दबा दिया.., शंकर का पूरा अंगूठा उसकी रस छोड़ती चूत में गcछcछ्ह… से घुस गया….!

अंगूठे के अंदर घुसते ही शंकर ने उसे स्थिर कर दिया, चंपा का शरीर किसी सूखे पत्ते की तरह काँपने लगा और वो बुरी तरह से उसके पैर को अपनी चूत पर दबाते हुए झड़ने लगी…..!!!!

 
चंपा की पकड़ अपने पैर पर से ढीली पड़ते ही शंकर ने अपना पैर उसके घान्घरे के अंदर से खींच लिया, पुक्क्कक.. की आवाज़ के साथ

उसका अंगूठा उसकी पनीलि चूत से बाहर आगया जैसे किसी ने काँच की बॉटल से कॉर्क का ढक्कन झटके से निकाला हो…!

इससे पहले कि चंपा अपने होश ठिकाने कर पाती.., शंकर अपने लंड को पाजामा में मसलता हुआ सोफे से खड़ा हो गया और अपने कमरे की तरफ सोने चल दिया…!

चंपा मूह बाए अपने लहंगे से गीली चूत पोन्छ्ते हुए शंकर को जाते हुए देखती रह गयी.., वो समझ नही पा रही थी कि ये लड़का आख़िर किस मिट्टी का बना हुआ है…!

जब उसने अपने अंगूठे के बल पर उसकी जैसी खेली खाई औरत की चूत से पानी निकलवा दिया यहाँ तक कि उसने अपनी आँखों से पाजामा के अंदर उसके लंड को तूनकते हुए देखा है.., इतनी उत्तेजना के बाद भी कोई मर्द अपने आप पर काबू कैसे रख सकता है भला…!

इसकी जगह कोई और मर्द होता तो वो अबतक उसकी चूत में लंड पेलकर उसे चोद चुका होता.., अब उसे शंकर पर शक़ होने लगा.., क्या पता वो इश्स लायक ही ना हो की किसी औरत को संतुष्ट कर सके…,

नही..नही… ऐसा नही हो सकता मेने खुद अपनी आँखों से कुच्छ घंटों में ही दो-तीन बार उसके लंड के उभार को देखा है.., और अभी कुच्छ

देर पहले तो वो उसके पाजामा में ही किस तरह से फुदक रहा था…!

शायद ये मुझ जैसी ग़रीब औरत के साथ वो सब नही करना चाहता होगा…, हां बिल्कुल यही बात हो सकती है.., ऐसा मन में विचार करते

हुए वो बेचारी अपनी गीली चूत लेकर अपने सर्वेंट क्वॉर्टर की तरफ चल दी जिसका रास्ता रसोई से होकर जाता था…!

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इधर शंकर कमरे में आकर अपने शानदार बिस्तर पर आकर धडाम से जा गिरा.., घुटने से नीचे उसकी टाँगें अभी भी पलंग के नीचे ही लटकी हुई थी..

उसका मन हाल ही में चंपा के साथ हुए उत्तेजञात्मक हादसे से बुरी तरह बैचैन हो रहा था.., ना जाने क्यों चंपा के साथ उसने इतनी बेरूख़ी दिखाई.., बेचारी क्या क्या मंसूबे बाँध कर आई होगी और क्या लेकर गयी…?

दिनभर की थकान से अब उसकी आँखें भी बोझिल हो रही थी लेकिन आँखें बंद करते ही उसकी आँखों के सामने वो वाकिया घूम जाता जो अभी अभी चंपा के साथ उसने किया…!

उसकी चूत किस तरह पनिया रही थी.., ये सोचते ही उसका लंड वासना की आग में दहक उठा…, उसने पाजामा के उपर से ही उसको सहलाया.., जो सच में ही बहुत गरम सा लगा उसे…!

अब वो अपने मन ही मन विचार करने लगा - क्या वो इतने लायक ही है कि उसकी चूत में मेरा पैर का सिर्फ़ अंगूठा ही डाला जाए..?

नही बिल्कुल नही.. शंकर तूने उस बेचारी के साथ ये ठीक नही किया.., ये तो एक औरत की जवानी का अपमान है…, एक औरत को वासना

में झोंक कर इश्स तरह छोड़ना ठीक नही है.., क्या सोच रही होगी वो अपने मन में…!

तो अब क्या करूँ..? अब तो वो चली गयी होगी सोने.., फिर क्या किया जाए…?

फिर अपने आप से ही बोला - चल एक बार चलकर रसोई में देख ले, शायद वो अब भी वहाँ हो, चल एक बार उससे अपने इस व्यवहार के

लिए माफी माँग ले.., हां.. यही ठीक रहेगा…,

ऐसा विचार करके शंकर बिस्तर से उठ गया और चंपा को देखने रसोई घर के लिए चल पड़ा…,

लेकिन जैसे ही उसने अपने कमरे का दरवाजा खोला.., सामने वर्षा देवी को खड़ा देख कर वो वहीं जड़ होकर रह गया…!

ना तो शंकर को ये उम्मीद थी कि वो इस समय उसके पास आने वाली हैं और ना वर्षा देवी ये जानती थी कि शंकर इतनी रात को दरवाजा खोलकर कहीं जाने वाला होगा…,

 
दोनो ही हतप्रभ कुच्छ देर तक बस एक दूसरे को घूरते रहे.., इस समय वर्षा देवी के बदन पर दिन वाली साड़ी ब्लाउस नही थे, वो अपने सोने वाली ड्रेस में उसके सामने खड़ी थी..,

मात्र एक वन पीस झीने से कपड़े के गाउन में जोकि उनके घुटनो तक भी नही पहुँच पा रहा था.., गावन् के चौड़े और डीप गले से उनके उभारों की गहरी घाटी काफ़ी गहराई तक दिखाई दे रही थी.., कुलमिलाकर इस समय वो किसी भी मर्द का ईमान डिगा ने में सक्षम दिख रही थी…,

शायद विश्वामित्र भी उर्वशी के कुच्छ ऐसे ही रूप को देखकर अपनी तपस्या भंग करने पर मजबूर हो गये होंगे.., वर्षा देवी इश्स समय शंकर के सामने काम की देवी बनी खड़ी थी…!

उन्हें रात के इस प्रहार में इस रूप में देखकर शंकर के पूरे बदन में वासना की एक तेज लहर दौड़ गयी.., वो अंदर तक हिल उठा…,

उसकी नज़र कितनी ही देर तक उपर से नीचे तक लगातार उनके इस मनोहारी…हाहकारी मादक बदन पर ठहर गयी…!

उधर शंकर भी इस समय कामदेव से कम नही लगा उनको.., उपर से उसका वो बलशाली बलिश्त लंड जिसे वो एक बार देख कर आजतक भुला नही सकी थी.., ना जाने कितनी रातें उसकी याद में करवट बदलते हुए काटी थी..,

ना जाने कितनी बार उसकी छवि अपने मन मस्तिष्क में बिठाकर उन्होने अपनी चूत में उंगलियाँ डालकर अपनी वासना को शांत करने की

कोशिश की है.., लेकिन वो तो मुई वजाए कम होने के और भड़कती ही गयी…,

वो इस समय अपने फुल फॉर्म में था और पाजामा में बड़ा सा तंबू बनाए हुए था…!

गनीमत थी की शंकर नीचे अंडरवेर भी पहने था वरना तो वो शायद पाजामा को फाड़ ही डालता…,

जहाँ शंकर की नज़र मामी के पूरे बदन का अवलोकन करके उनके मादक दूध जैसे गोरे.., और सुडौल वक्षों पर आ टिकी थी वहीं मामी

एकटक उसके लंड के उभार को ही ताके जा रही थी…!

ना जाने कितनी ही देर तक वो दोनो एक दूसरे को देखते रहे…, एक दूसरे में जैसे खो गये.. ना जाने और कितनी देर वो ऐसे ही एक दूसरे में खोए रहते की तभी….,

ना जाने कहाँ से एक छोटी सी चुहिया वर्षा देवी के पाँव के उपर से गुज़री… वो एकदम से डर गयी…, चुहिया को अपने पैर से चिटक कर

हड़बड़ाते हुए आगे को गिरने ही वाली थी कि शंकर की बलिष्ठ बाहों ने उन्हें थाम लिया….!

मामी ने अपने दोनो हाथ मोड़ कर शंकर की चौड़ी छाती पर टिका दिए.., इसके बावजूद भी उनके मक्खन से भी मुलायम बड़े-बड़े पूर्ण रूप

से तने हुए स्तन शंकर की छाती में जाकर धँस गये…!!

जैसे ही मामी को ये आभास हुआ कि वो अब सेफ हाथों में उन्होने अपने शरीर को शंकर के उपर ढीला छोड़ दिया जिससे उनका यौनी प्रदेश शंकर के तने हुए घोड़े के ठीक नीचे सट गया…,

इस समय उसका घोड़ा मस्ती में हिन-हिनाता हुआ मामी के कमर के नीचे उनकी गद्दार मुनिया के ठीक उपर ठोकर मारने लगा…!

शंकर का एक हाथ मामी की पीठ पर था तो दूसरा उनकी मखमली गान्ड के पर्वत शिखारों पर जा कसा..,

अचानक मामी के उसके उपर आ गिरने से वो एक बार तो पीछे की तरफ डिसबॅलेन्स हुआ लेकिन अपने फौलादी जिस्म को जल्दी ही बॅलेन्स करते हुए उसने मामी को अपने शरीर पर कस लिया…!

शंकर की पकड़ मजबूत होते ही मामी के उभार उसके सीने में और ज़्यादा दब गये और गान्ड पर कसाब पड़ते ही शंकर का लंड मामी की

चूत की फांकों के उपरी भाग पर ठोकर देने लगा…!

मामी अपने तन-बदन की सुध-बुध खो बैठी.., दोनो के चेहरे एकदम नज़दीक आगये.., एकदुसरे की साँसें आपस में टकरा उठी.., दिल की

धड़कनें तेज होकर एक दूसरे में समाने लगी..!

लंड की ठोकर अपनी मुनिया की फांकों के करीब महसूस करते ही मामी के मूह से एक मादक कराह निकल गयी… जिसे सुनकर शंकर के उपर वासना का खुमार चढ़ने लगा…!

दीन-दुनिया से बेख़बर वो दोनो एक दूसरे की आँखों में कितनी ही देर तक झाँकते रहे.., पलभर में ही मामी को ये एहसास हो गया कि वो

किसी सच्चे मर्द की मजबूत बाहों में हैं.. जैसा मर्द पाने की हर औरत की ख्वाहिश होती है…!

तभी शंकर को जैसे होश आया कि वो कहाँ और किस अवस्था किसके साथ खड़ा, उसने अपने दोनो हाथों को मामी के कंधों पर टीकाया और उन्हें अपने से अलग करते हुए बोला –

मामी जी आप ठीक तो हैं.., क्या हुआ था आपको…?

वर्षा देवी मानो नींद से जागी हों, जैसे किसी ने उनका हसीन सपना चूर चूर कर दिया हो… शंकर की बात सुनकर वो बुरी तरह से झेंप गयी और स्वतः ही शर्म से उनकी पलकें झुक गयी…!!!!
 
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