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रंगीला लाला और ठरकी सेवक

एक बार सलौनी की सील क्या टूटी, अब तो उसकी आँखों के सामने दिन रात अपने भाई का लंड ही दिखाई देता रहता था, यहाँ तक कि कॉलेज जाते वक़्त भी उसकी बाइक पर पीछे बैठकर उसे छेड़ती जाती थी.

अब वो भी कॉलेज से ही ग्रॅजुयेशन कर रही थी, शंकर का ये फाइनल एअर था…!

एक दिन ऐसे ही कॉलेज से लौटते वक़्त तो उसने हद ही करदी, अपने दोनो अनार जो अब काफ़ी बड़े हो चुके थे उन्हें उसकी पीठ से रगड़ते हुए उससे पूरी तरह चिपक गयी.

दोनो हाथों को आगे ले जाकर उसने शंकर के लंड पर रख लिए और उसे पॅंट के उपर से ही सहलाने लगी.

शंकर का लंड पहले ही उसकी चुचियों की नोके की रगड़ से सनसना उठा था, उपर से उसके मुलायम हाथों की सुगंध मिलते ही वो और फन-फ़ना उठा.

बाइक चलाते हुए शंकर ने उसे ऐसा ना करने को कहा, लेकिन सलौनी पर भला इस बात का क्या असर होता, वो भी तब जबकि अब वो उसके लंड की औथराइज्ड मालकिन हो चुकी थी.

उसकी माँ ने खुद उसपर मुहर लगवा दी थी.., शंकर ना नुकर करता ही रह गया.., उल्टा सलौनी ने थोड़ा उचक कर उसके कान की लौ को अपने दाँतों में दबा लिया..

जवान शंकर ये सब कहाँ सहन कर पाता, लिहाजा उसने भी अपना एक हाथ पीछे घूमकर सलौनी के गले में डाला और उसके होठों का रस्पान करने लगा.

लेकिन ये सब ज़्यादा देर लंबा नही चल सकता था वरना दोनो किसी झाड़ी में पड़े होते.

शंकर ने उसे छोड़ते हुए कहा – बस अब ज़्यादा शरारत नही, वरना मे तेरी चोटी काट कर हाथ में पकड़ा दूँगा समझी…!

सलौनी – अच्छा ! अरे जा-जा तू क्या मेरी छोटी काटेगा, मे देख तेरे इस घोड़े को ही काबू में करके अपने पास रख लूँगी, ये कहते हुए उसने शंकर के पॅंट की जीप खोलकर उसके लंड को बाहर निकाल लिया और उसे मुठियाने लगी.

हर पल के साथ शंकर का बुरा हाल होता जा रहा था.., पीठ पर अनारों की चुभन और उसके कोमल हाथों में लंड, वो बार बार उसे ऐसा करने से मना करता रहा लेकिन वो बिगड़ैल घोड़ी उसकी कहाँ सुनने वाली थी.

चलती बाइक पर ही वो थोड़ा पीछे को खिसकी और लगभग आगे को लंबी होकर शंकर के एक बगल से अपनी मुन्डी घुसाकर उसने उसके लौडे को अपने मूह में ले लिया.

शंकर को उससे इतने दुस्साहस की उम्मीद कतई नही थी…, एक हाथ से वो उसकी चोटी पकड़ कर उसे उठाने की कोशिश करते हुए बोला – अरे ये क्या कर रही सलौनी, मान जा किसी ने राह चलते देख लिया तो पता है क्या होगा..?

सलौनी अपना मूह हटाते हुए बोली – तो तू बाइक साइड में करके रोक.

शंकर – क्यों ?

सलौनी – मुझे अभी के अभी चुदना है तेरे इस मूसल से..,

शंकर – तेरा दिमाग़ तो खराब नही हो गया, जानती भी है तू क्या कह रही है..?

सलौनी – मे जो भी कह रही हूँ, सही कह रही हूँ… अब मेरे से सबर नही हो रहा..,

शणक्र – लगता है तेरा दिमाग़ ठिकाने पर नही है.., राह चलते हुए किसी ने हमें देख लिया तो कहीं मूह दिखाने के लायक नही रहेंगे समझी तू.

सलौनी – मुझे कुच्छ नही पता, बाइक रोक वरना मे कूद पड़ूँगी.

उसकी ये बात सुन शंकर की खोपड़ी सनक गयी, उसने साइड बाइक रोक कर साइड स्टॅंड पर खड़ी कर दी. बाइक रुकते ही सलौनी तुरंत कूद गयी,

शंकर बाइक खड़ी करके उसकी तरफ मुड़ा ही था कि वो उसके साथ लिपट गयी.

शंकर ने उसे गुस्से से अपने से अलग किया और एक झन्नाटे दार तमाचा उसके गाल पर रसीद कर दिया…!

कुच्छ देर तो सकते की हालत में वो खड़ी खड़ी उसका मूह तकती रह गयी, उसे ये अंदाज़ा कतई नही था कि उसका भाई अपनी प्यारी गुड़िया पर हाथ भी उठा देगा…!

शंकर ने फिरसे बाइक स्टार्ट की, कुच्छ देर उसका इंतजार किया.., लेकिन वो अभी भी सकते से बाहर नही निकल पा रही थी, उसने उसकी कलाई थाम कर अपने पीछे बिठाया और बाइक दौड़ा दी गाओं की तरफ.

सलौनी गुम-सूम उसके पीछे बैठी सोचने पर मजबूर हो गयी कि आख़िर भाई को इतना गुस्सा आया क्यों ? जबकि अब तो वो उसको चोदने भी लगा है तो फिर उसने आज ऐसा क्यों किया उसके साथ…?

 
घर पहुँचने तक उन दोनो के बीच कोई बात नही हुई.., पीछे बैठी सलौनी सोचते सोचते उसकी आँखों में आँसू आगये, इधर शंकर के अंदर भी बबन्डर सा चल रहा था….,

क्या उसने अपनी प्यारी बेहन पर हाथ उठाकर अच्छा किया..? नही शायद ये अच्छा नही हुआ.., उसे उसको प्यार से समझाना चाहिए था…!

लेकिन मेने उसे बहुत मना किया, ऐसे खुलेआम ये सब ठीक नही है, लेकिन उसपर आज इतना चुदाई का भूत सवार था जिसे उतारना ज़रूरी था… वरना वो इसके लिए हर रोज़ ज़िद करती और खुदा न ख़स्ता किसी रोज़ किसी पहचान वाले को ये पता चल जाता कि देखो सगे भाई बेहन आपस में ये सब करते हैं, तो समाज में हमारे परिवार की क्या इज़्ज़त रह जाती…!

आज उसे ये सबक मिलना ज़रूरी था, कभी कभी अपने प्यार से प्यारे को भी दंडित करना पड़ता है…!

खैर वो दोनो घर भी पहुँच गये, दोनो को गुम सूम देखकर रंगीली समझ गयी कि आज इन दोनो के बीच कुच्छ तो हुआ है..? लेकिन उसने इस समय दोनो से कोई बात करना सही नही समझा.

अकेला होते ही शंकर ने खुद से ही उसे सब कुच्छ बता दिया…, जिसे रंगीली ने भी सही ठहराया और अकेले में सलौनी को समझाने का सोचा.

दिन बीतते गये, लेकिन अब सलौनी ने शंकर के साथ छेड़-छाड़ बिल्कुल बंद कर दी, वो चुपचाप उसके पीछे बैठ जाती, कभी कभार शंकर उससे बात करने की कोशिश करता तो वो बस उसे हां या ना में जबाब दे देती.

खैर इसी तरह से शंकर का फाइनल एअर भी ख़तम हो गया, कॉलेज कुच्छ दिनो के लिए बंद हो गया…!

एक दिन सुषमा को शहर जाना था, उसने शंकर को पहले ही बता दिया था.., तैयार होकर जाने से पहले वो कल्लू को देखने उसके कमरे में गयी.., उसकी बेटी गौरी जो अब कुच्छ समझदार सी होने लगी थी…

वो अपने पापा के पास बैठी उससे बातें कर रही थी.., कल्लू कुच्छ बोल तो पाता नही था, बस अपनी बेटी की प्यारी प्यारी बातें सुनकर कभी मुस्करा देता तो कभी सीरीयस हो जाता.

सुषमा के आते ही गौरी उसके पास से उठी और दौड़कर अपनी मम्मी से लिपट गयी.., और अपनी उसी मासूमियत के साथ शिकायत करने लगी…

गौरी – मम्मी देखो ना मे कब से पापा से बातें कर रही हूँ, लेकिन ये कुच्छ बोलते ही नही…!

सुषमा – बेटा ! पापा बीमार हैं ना, इसलिए कुच्छ बोल नही पाते.., अब तू जा, रंगीली काकी को बोल वो तेरे को नहला कर खाना दे देगी, और हां ज़्यादा शरारत मत करना और भैया के साथ अच्छे से खेलना, ये तेरी ज़िम्मेदारी है कि वो रोए नही…!

गौरी – आप कहीं जा रहे हो..?

सुषमा – हां मेरा बच्चा मामा किसी काम से शहर जा रही है, जल्दी आ जाएगी ठीक है, अब जाओ…

गौरी मुन्डी हिलाकर किसी चंचल तितली की तरह उस कमरे से बाहर भाग गयी, तभी शंकर भी तैयार होकर वहाँ पहुँचा, उसने भी कल्लू का हाल जाना…!

सुषमा, शंकर के बिल्कुल पास जाकर उससे सट्ते हुए खड़ी हो गयी और कल्लू को संबोधित करते हुए बोली- क्यों पतिदेव, मे अकेली शंकर के साथ शहर जा रही हूँ, तुम्हें बुरा तो नही लग रहा…..?

इतने महीनो ही नही सालों से कल्लू बिस्तर पकड़े हुए था, कुच्छ बोल तो नही सकता था लेकिन उसकी आँखों के इशारों को सब समझने लगे थे,

सुषमा की बात सुनकर उसने आँखों के इशारे से बताया कि उसे कुच्छ बुरा नही लगा…!

सुषमा उसके इशारे को समझते हुए शंकर की बाजू में अपनी बाजू डालते हुए बोली – चलो अच्छा है तुम्हें बुरा नही लगा, हालातों से समझौता कर लेना ही बुद्धिमानी है..,

अच्छा तो शायद ये भी पता होगा कि हम दोनो के आपस में संबंध किस हद तक हैं…?

कल्लू ने फिर एक बार अपनी पलकें झपका कर ये जता दिया कि उसे इस बारे में भी सब पता है…, उसके इस इशारे पर वो दोनो एक बार को चोंक गये फिर संभालते हुए सुषमा ने फिर कहा…

इसका मतलब तुम्हें हमारे संबंधों से भी कोई एतराज नही है..?

कल्लू ने फिर एकबार इशारे से जताया कि उसे अब कोई शिकायत नही है..,

क्योंकि शायद उसे कहीं ना कहीं ये विश्वास हो चुका था कि अब वो दुबारा कभी भी इस लायक नही हो पाएगा कि घर को संभाल सके…!

सुषमा के मन से मानो एक बोझ हल्का हो गया हो.., उसे ना जाने क्यों आज पहली बार कल्लू पर दया आई, वो शंकर को साथ लिए उसके नज़दीक तक गयी, उसके बालों को सहलाते हुए उसने उसे इस रज़ामंदी के लिए धन्यवाद किया…!

उसके बालों में उंगलियाँ घूमाते हुए वो फिर बोली – अच्छा ये बताओ, अगर तुम्हें ये पता चले कि अंशुल (बेटा) शंकर का अंश है तो ???

सुषमा के ये शब्द सुनकर पहले तो कल्लू को हल्का सा आघात लगा, वैसे तो उसे शक़ तो था ही, लेकिन आज सुषमा ने खुद अपने मूह से बताया तो उसे थोड़ा दुख हुआ फिर एक फीकी सी मुस्कान उसके होठों पर आ गयी…,

जिसे देखकर सुषमा के साथ साथ शंकर भी चोन्के बिना ना रह सका……!

………………………

कल्लू के कमरे से निकलते ही वो दोनो अहाते में खड़ी जीप की तरफ बढ़ गये जो प्रिया ने शंकर को गिफ्ट में दी थी,

चलते-चलते शंकर ने सुषमा से पुछा – वैसे हम जा कहाँ रहे हैं भाभी…?

सुषमा ने अपने चेहरे पर एक मनमोहक मुस्कान बिखेरते हुए कहा – अब तुम्हारे भविष्य को बदलने का समय आगया है, हम सीधे शहर अपने मामा जी के यहाँ जा रहे हैं जहाँ उनके कॉलेज से तुम्हें एमबीए की डिग्री लेनी है जिससे तुम बिज़्नेस की सारी बारीक़ियाँ समझ सको…!

शंकर – लेकिन हो सकता है हमें आने में देर हो जाए, ये भी हो सकता है वो हमें ज़बरदस्ती आज की रात रोक लें, तो ऐसे में अंशुल को यहाँ छोड़ना क्या सही होगा..?

शंकर की बात सुनकर सुषमा को भी लगा कि उसकी बात सही है, फिर भी वजाय सीरीयस होने के उसे छेड़ते हुए बोली – वाह बच्चू वाह, अब बेटे की माँ से ज़्यादा अपने बेटे की चिंता होने लगी…!

शंकर अपनी झेंप मिटाने की कोशिश करते हुए बोला – ऐसी बात नही है, मे तो बस इसलिए बोल….

सुषमा उसकी बात बीच में ही काटते हुए बोली…मज़ाक कर रही थी, वैसे तुम्हारी बात सही है, 5 मिनिट रूको मे उसे अभी लेकर आती हूँ.

कहते ही वो तुरंत पलटी और अपने सुडौल कसे हुए गोल-मटोल फुटबॉल जैसे नितंबों को मटकाते हुए हवेली के अंदर की तरफ बढ़ गयी…!

सिल्क की कसी हुई साड़ी में लिपटे हुए उसके लयबद्ध तरीक़े से थिरकते हुए सुडौल नितंबों को देखकर शंकर के लौडे ने एक मस्त अंगड़ाई ली.

सुषमा तो घर के अंदर चली गयी, शंकर उसकी थिरकति गान्ड को तब तक देखता रहा जब तक वो उसकी आँखों से ओझल नही हो गयी.., काफ़ी दिनो से वो सुषमा को चोद नही पा रहा था, इसलिए वो आज उसे स्वर्ग से उतरी किसी अप्सरा जैसी लग रही थी…!

लंड के मचलने का असर उसके दिमाग़ तक चढ़ने लगा, मन बहलाने की गरज से वो कॉंपाउंड में टहलने लगा.., टहलते टहलते वो फाटक से बाहर निकल गया..,

 


अभी उसने अपना कदम बाहर रखा ही था कि तभी उसके कानों में जोरदार सीटी जैसी आवाज़ पड़ी.., उसने जैसे ही आवाज़ की तरफ मुड़कर देखा..,

पड़ौस की एक 60 साल की औरत जो उसकी दादी लगती थी, अपन लहंगा कमर तक चढ़ाए नाली में मूत रही थी…!

वो नीचे मुन्डी करके अपने भोसड़े से निकल रहे मूत की मोटी सी धार को देखने में मशगूल थी इसलिए उसकी नज़र शंकर पर नही पड़ी..,

शंकर को उसका काले काले मोटे मोटे मालपुए जैसे होठों वाला भोसड़ा पूरी तरह दिख रहा था.., जिसके बीच में काफ़ी मोटी सी खाई जैसी थी. ये देखकर शंकर का लंड पॅंट के अंदर तुनकि मारने लगा..,

लेकिन उसे उस बूढ़ी काकी की चूत उन सभी औरतों से अलग सी लगी जिनको वो अब तक चोद चुका था, उसे बड़ा ताज्जुब हुआ ये देख कर कि चूत चूत में भी इतना फ़र्क हो सकता है…!

शंकर को ध्यान ही नही रहा कि वो कहाँ खड़ा है और क्या देख रहा है, तभी उसके कानों में पड़ने वाली सीटी की मधुर धुन सुनाई देनी बंद हो गयी.., उसने नाली पर मूत रही दादी को देखा जो अपना कुलाबा बंद करके उठने वाली थी,

शंकर फाटक से उल्टे पैर फाटक के अंदर चला गया.., जहाँ अपने बेटे की उंगली पकड़े सुषमा जीप के पास खड़ी उसकी राह देख रही थी….!

पास आते ही सुषमा ने सवाल किया – कहाँ चले गये थे..?

शंकर ने अंशुल को गोद में उठाते हुए उसके मुलायम गाल पर एक प्यारी सी पप्पी लेते हुए कहा- बस ऐसे ही टहलते-2 फाटक तक निकल गया था…!

शंकर ने अपने बेटे को अपनी बगल में बिठाया और खुद ड्राइविंग सीट पर बैठ गया, दूसरी तरफ से आकर सुषमा भी अगली सीट पर बैठ गयी..,

शंकर ने एक नज़र सुषमा के सुंदर चेहरे पर डाली, फिर बच्चे के गाल को सहलाते हुए जीप स्टार्ट की….चलें…कहकर उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी…!

गाओं से बाहर निकते ही उसने सुषमा की तरफ देखा, जो एक तक उसी को देख रही थी, होठों पर मुस्कान लाकर शंकर बोला – आज तो आप कयामत लग रही हो भाभी…!

सुषमा ने शिकायत भरे लहजे में कहा – अकेले में ये मुझे भाभी कहना ज़रूरी है..? नाम नही ले सकते..?

शंकर – पता नही क्यों, आपका नाम लेते हुए मुझे ऐसा लगता है कि मे आपको इज़्ज़त नही दे रहा, जबकि मेरे दिल में आपके लिए जितनी इज़्ज़त है उतनी शायद माँ के अलावा और किसी के लिए नही होगी…!

सुषमा ने अपने बेटे को सीट से उठाकर अपनी जांघों पर बिठा लिया और खुद खिसक कर शंकर से सटते हुए बोली – ये तुमसे किसने कहा कि किसी का नाम लेने से उसकी इज़्ज़त कम हो जाती है, बल्कि नाम ही नही आप की जगह तुम कहो तो अपनापन और बढ़ता है…

उसने शंकर की जाँघ को अपने हाथ से सहलाते हुए आगे कहा – अब से तुम कम से कम अकेले में मुझे नाम लेकर और तुम कह कर ही बुलाया करो… क्या समझे..?

शंकर ने मुस्करा कर उसकी कमर में हाथ डालकर अपने से सटाते हुए कहा – मे कोशिश करूँगा भाभी…!

सुषमा ने उसकी बगल में चुन्टी काटते हुए मूह बीसूरते हुए कहा – फिर भाभी…, इतना कह कर वो उससे अलग होते हुए नाराज़गी भरे स्वर में बोली – जाओ मे तुमसे बात नही करती….!

शंकर ने फिरसे उसे अपनी तरफ खींचते हुए कहा – नाराज़ मत हो जानेमन.., तुम बात नही करोगी तो रास्ता कैसे कटेगा…?

अच्छा एक बात तो बताओ, अभी चलने से पहले मे फाटक से बाहर चला गया था, वहीं बाजू वाली दादी लहंगा उपर करके मूत रही थी.., मेरी नज़र उसके उसपर पड़ गयी…

सुषमा अपने मूह पर हाथ रखते हुए बोली – हाए राम ! मुझे नही पता था कि तुम इतने बड़े गुंडे हो, दूसरी औरतों को मुतते हुए देखते हो…?

शंकर ने हँसते हुए कहा – ऐसा नही है यार, वो ग़लती से मेरी नज़र उसके मूत की सीटी की आवाज़ सुनकर वहाँ चली गयी…!

सुषमा भी हँस पड़ी और बोली – कहाँ चली गयी तुम्हारी नज़र….?

 
शंकर – अरे समझा करो यार, वहीं उसकी मूतने वाली जगह पर, तो वो मुझे इतनी मोटी मोटी फूली हुई और एकदम काली सी लगी, जबकि तुम्हारी तो एकदम मस्त चिकनी गोरी और उसके मुक़ाबले बहुत छोटी सी है…, दोनो में इतना फरक क्यों..?

सुषमा ने पैंट के उपर से ही उसके पप्पू को छेड़ते हुए कहा.., अच्छा एक बात बताओ, सभी आदमियों का ये पप्पू एक जैसा होता है क्या…?

शंकर – नही पर… फिर भी ये तो अलग ही होता है ना…!

सुषमा – तुम्हें पता है उस दादी के कितने बच्चे हैं..?

शंकर – 9-10 तो हैं शायद…!

सुषमा – अब ज़रा सोचो.., मुझे तुमने अबतक कितनी बार चोदा होगा.., ज़्यादा से ज़्यादा 20-25 बार, और मेरे दो ही बच्चे हैं.., वहीं उस दादी को 10 बच्चे पैदा करने के लिए सैकड़ों बार चुदना पड़ा होगा..,

अरे यार अब तुम खुद सोचो 10-10 बच्चे निकाले हैं उसने अपनी चूत से तो भोसड़ा तो बनेगा ही उसका…!

शंकर – ओ तेरी का, तो भोसड़ा इसको कहते हैं, वही तो सोचु, मेरे क्लासमेट बार बार भोस्डे की गाली क्यों देते हैं…!

सुषमा ने उसके गाल को सहलाते हुए कहा – हाए मेरे भोले बालम, क्या वाकई में भोस्डे का मतलब नही पता था तुम्हें अब तक…?

शंकर – नही सच में, उसके मूह से इतना सुनते ही सुषमा ने आगे बढ़कर उसके गुलाबी होठों पर अपने लिपीसटिक वाले होठ रख दिए, फिर अलग होते हुए बोली – तुम वाकई बहुत प्यारे और सॉफ दिल हो शंकर…,

इसी तरह की चुहलबाज़ी और छेड़-छाड़ करते हुए वक़्त ना जाने कब गुजर गया और वो दोनो शहर पहुँच गये…..!

सुषमा के मामा जी पुरुषोत्तम दास, शहर के जाने माने बिज़्नेसमॅन और समाजसेवी उम्र लगभग 50-52 वर्ष. पत्नी वर्षा देवी कोई 41-42 साल की गोरी चिट्टी निहायत ही खूबसूरत औरत कद 5’6” की औसत हाइट, 36-32-38 का शानदार जान मारु फिगर.

कसे हुए ब्लाउस में तनी हुई चुचियाँ किसी का भी ईमान खराब कर दें.., कबूतरों की चोंच जैसे वक्षों के उपर जब वो अपना पल्लू डाल लेती तो और भी ज़्यादा सेक्शी लगती,

सपाट पेट के बाद ख़ासे चुड़े कूल्हे, सलीके से पहनी हुई साड़ी में कसे हुए कूल्हे…आअहह…जब मटक मटक कर चलती तो राह चलते लोग ठंडी आहें भर कर रह जाते होंगे…!

वर्षा देवी असल में पुरुषोत्तम दास की दूसरी पत्नी थी, पहली पत्नी के साथ इनका साथ मात्र साडे तीन साल ही रहा उसके बाद वो समय से पहले ही भगवान को प्यारी हो गयी थी.

पुरुषोत्तम दास की एक 20 साल की बेटी चारू लता, अपने ही कॉलेज से ग्रॅजुयेशन कर रही थी, उम्र के इस पड़ाव में उसके दर्जनो फ्रेंड्स थे, जिनमें लड़के भी थे, बला की खूबसूरत अपनी माँ की छवि.

हाइट में अपनी माँ के बराबर, लेकिन साँचे में ढला 32-28-34 का फिगर, कॉलेज का बेस्ट ब्यूटिफुल गर्ल का खिताब इसके नाम था, मॉडलिंग का शौक था उसको.

दोपहर ढले सुषमा और शंकर उनके यहाँ पहुँच गये, उस समय घर पर उसकी मामी वर्षा देवी और नौकर ही थे, मामा जी देर रात को ही लौटते थे…

चारू लता कॉलेज के बाद अपने मॉडलिंग वग़ैरह के चक्कर में बिज़ी रहती थी..

सुषमा को देख कर मामी ने उनकी आवभगत की, चाय पानी के दौरान सुषमा ने शंकर का परिचय उनसे कराया…,

शंकर उसकी एक कामवाली का लड़का है ये बात सुनकर उनको बड़ा ताज्जुब लगा, कैसे कोई मालकिन अपने ही किसी नौकर के साथ अकेली घूमने फिरने निकल सकती है…

हालाँकि शंकर की पर्सनालटी देखकर मामी भी प्रभावित हुए बिना नही रह पाई थी, उन्हें सुषमा के पति कल्लू की हालत का भी पता था फिर भी मन में ये विचार आने स्वाभाविक ही थे, और सबसे बड़ी बात तो ये थी कि लाला जी जैसे सुलझे हुए इज़्ज़तदार आदमी को भी इस बात से कोई एतराज नही है….!

कहते हैं ना कि औरत के मन की बात ज़्यादा देर तक अंदर नही रह पाती, सो बातों बातों में उनके मूह से ये निकल ही गया….

जब सुषमा ने बताया कि उनका यहाँ आने का पर्पस क्या है तो वर्षा देवी कहे बिना नही रह पाई…!

बुरा मत मानना सुषमा बेटी, लेकिन नौकरों को इतनी ढील नही देनी चाहिए कि वो सिर पर ही चढ़ जायें.., और तुम इसे पढ़ाने के लिए यहाँ शहर लेकर आई हो.., नौकरों से इतना लगाव अच्छा नही है…!

सुषमा को अपनी मामी से ऐसे शब्दों की अपेक्षा थी, उसने एक नज़र शंकर के चेहरे पर डाली, ये जान’ने की कोशिश की, कि मामी के इन शब्दों की उसके उपर क्या प्रतिक्रिया होती है…,

लेकिन उसके सपाट चेहरे से वो कोई अनुमान नही लगा सकी कि वो इस विषय में क्या सोच रहा होगा..,

फिर मामी की ओर मुखातिब होकर बोली…, आपका सोचना ग़लत नही है मामी जी, हर कोई यही सोचेगा, लेकिन यहाँ आप थोड़ी सी ग़लत हैं.., हमारे घर का कोई भी सदस्य शंकर या उसकी माँ को नौकर नही समझता….!

शायद आपको पता नही है, इसने छोटी सी उमर से ही हमारे लिए ऐसे ऐसे काम किए हैं जिन्हें कोई अपना भी नही कर सकता, फिर उसने सारी घटनाए सिलसिलेवार उनको बताई और आगे कहा…!

आपके दामाद के साथ हुई उस दुखद घटना के बाद शंकर ने सारे घर और कारोबार की ज़िम्मेदारी बखूबी संभाली है, पिताजी इस पर अपने बेटे से ज़्यादा भरोसा करते हैं, यही कारण है कि मे चाहती हूँ ये बिज़्नेस मॅनेज्मेंट का कोर्स करके हमारे बिज़्नेस को और अच्छे से संभाल सके…!

 


ये सब बातें सुनकर वर्षा देवी को एहसास हुआ कि शायद उसने ग़लत बात कही थी, सो सुषमा का हाथ अपने हाथों में लेकर बोली –

माफ़ करना बेटी, मुझे नही पता था कि ये लड़का आप लोगों के लिए क्या मायने रखता है.., फिर शंकर की तरफ देखते हुए बोली – माफ़ करना शंकर बेटा मेरी बात शायद तुम्हें बुरी लगी होगी.

शंकर – नही मामी जी आपने तो वही कहा जो आपको सही लगा, और आमतौर पर ऐसा होता भी तो नही है.., इसलिए आप मेरी तरफ से बेफिकर रहिए.., मुझे आपकी बात का ज़रा भी बुरा नही लगा…!

वो तो सुषमा भाभी और लाला जी बड़े दिल वाले हैं जो मुझ जैसे तुच्छ लड़के पर इतना भरोसा करते हैं, इतना मान सम्मान देते हैं, वरना मेरे जैसे 36 इनकी ड्योडी पर पानी भरते हैं…!

सुषमा – नही शंकर तुम तुच्छ लोगों में नही हो.., मामी जी की बात से अगर तुम्हें ज़रा सी भी ठेस पहुँची हो तो मे उसके लिए तुमसे माफी मांगती हूँ…!

नही भाभी प्लीज़ ऐसा मत कहिए, मुझे सच में इनकी बात का बुरा नही लगा.., शंकर ने फ़ौरन सुषमा की बात काट’ते हुए कहा…, इनकी जगह कोई और होता वो भी यही सोचता…!

ये लोग ड्रॉयिंग हॉल में बैठे इसी तरह की बातें कर ही रहे थे तभी बाहर से उनकी बेटी चारू लता अंदर आई, जैसे ही उसकी नज़र सुषमा पर पड़ी वो उसे देखते ही दौड़कर उसके गले से लिपट गयी…!

सुषमा दीदी आप और यहाँ…? व्हाट आ प्रेज़ेंट सर्प्राइज़…? व्हाट हॅपन..?

सुषमा पहले तो उसको उपर से नीचे तक निहारती रही जो इस समय किसी टॉप क्लास की मॉडेल के ही लिबास में थी, जांघों तक का बॉडी फिट वन पीस लिबास में क़ैद जिसमें से उसके मादक अंगों का एक एक कट दिखाई दे रहा था…!

सुंदरता की इस मूरत को देखकर एक बारगी शंकर भी मूह बाए देखता ही रह गया, वा ! क्या मस्त माल छोकरी है यार…, फिर सुषमा की आवाज़ सुनकर उसने अपने दिमाग़ को झटक दिया…!

अरे वाह चारू तुम तो एक दम फिल्मी हेरोयिन जैसी लग रही हो, बाइ दा वे इनसे मिलो, ये हैं शंकर हमारे…..??

इससे पहले कि सुषमा उसका इंट्रो देती उससे पहले ही वर्षा देवी बीच में बोल पड़ी…इनके खास रिस्तेदार, यहाँ एमबीए करने आए हैं अपने कॉलेज से…!

पहली बार चारू और शंकर की आँखें चार हुई.., शंकर भी इस समय किसी फिल्मी हीरो से कम नही लग रहा था, बेल्ल्बोटम पैंट के उपर एक टाइट फिट शर्ट जिसमें उसका बेहद कसरती बदन अपनी झलक छोड़ रहा था..,

कसरती सीने का कटाव, हाफ बाजू शर्ट में उसके मसल्स बेहद ही आकर्षक लग रहे थे.., एक बार को तो चारू भी उसके मोहपास में फँसती दिखाई दी, लेकिन अपने गरूर के मुताविक उसने शीघ्र ही ऐसा जाहिर किया जैसे वो शंकर से कोई खास इंप्रेस्ड नही हुई हो….!

रात को मामा जी देर रात तक अपने बिज़्नेस की वजह लेट ही आते थे, तो उनका इंतजार किए बिना ही डिन्नर लेकर सब लोग सोने के लिए अपने अपने कमरे में चले गये…,

सुषमा और शंकर को भी अलग अलग कमरों में सोने के लिए जाना था. सुषमा अपने बेटे को लेकर अपने कमरे में छाई गयी और शंकर अपने कमरे में.

सेठ पुरुषोत्तम दास लेट ही आते थे इसलिए वर्षा देवी उनके आने तक जागती रहती थी.., अपने कमरे में टहलते टहलते वो रात को बाहर लॉबी में टहलने चली गयी…,

टहलते टहलते फर्स्ट फ्लोर पर शंकर वाले कमरे के रोशनदान से उन्हें रोशनी की किरण आती दिखाई दी, कौतूहल बस वो स्टेर्स पर चढ़ती हुई उसके कमरे की तरफ चल दी, ये देखने कि इतनी देर रात तक आख़िर वो जाग क्यों रहा है…,

शायद उसे कोई प्राब्लम हो, या नयी जगह की वजह से उसे नींद नही आ रही हो इसका कारण जानने, लेकिन जैसे जैसे वो उसके कमरे की तरफ कदम बढ़ा रही थी, वैसे वैसे उनके कानों में कमरे से आती हुई कुच्छ अजीब सी आवाज़ों ने उन्हें और ज़्यादा आकर्षित कर दिया और वो किसी अंजान डोरे की तरह खींची हुई उसके कमरे तक चली गयी…

गेलरी में रखे उस कमरे की विंडो पर कूलर की साइड की एक झिर्री से जैसे ही उन्होने कमरे के अंदर झाँक कर देखा…, अंदर का नज़ारा देखकर उनकी आँखें चौड़ी हो गयी………!

 
मित्रो अपडेट दे दिया है अगला अपडेट टाइम मिलते ही दे पाउन्गा
 
सुषमा काफ़ी दिनो से शंकर से दूर ही थी, उसके जिस्म की आग बुझाने वाला और कोई था भी तो नही…,

कुच्छ तो एग्ज़ॅम की वजह से और घर के कामों का बोझ उपर से उसे अपनी माँ-बेहन को भी समय देना पड़ता था….!

लेकिन आज जैसे ही उसका बेटा गहरी नींद में सो गया, उससे रहा नही गया, वो चुपके से अपने बिस्तर से उठी, और बगल के रूम में सो रहे शंकर के रूम पर हल्के से दस्तक दे दी….!

शंकर भी अभी तक सोया नही था, हालाँकि उसे सुषमा की तरफ से पहले से ही कोई इशारा तो नही था लकिन उसे पक्का यकीन था कि आज वो उसके पास ज़रूर आएगी…,

अभी वो रास्ते की छेड़ छाड़ को याद करके मन ही मन उत्तेजित हो रहा था की तभी उसे अपने दरवाजे पर हल्की सी दस्तक सुनाई दी.., बिना एक पल गँवाए उसने पलंग से ही सीधी जंप दरवाजे पर लगा दी….!

सामने एक पिंक फूलों से जड़ी ट्रॅन्स्परेंट गाउन डाले सुषमा को देख कर उसकी बान्छे खिल उठी, ट्रॅन्स्परेंट कपड़े से उसके अन्तह्वस्त्र कमरे की रोशनी में साफ-साफ दिखाई दे रहे थे…,

जल्दी से सुषमा को अंदर करके उसने दरवाजे को लॉक किया और किसी बेसबरे पति की तरह उसे अपनी गोद में उठाकर बिस्तर तक ले गया…!

शंकर सुषमा को लिए हुए ही बिस्तेर पर लेट गया, वो उसके उपर पड़ी उसकी छाती के छोटे छोटे बालों से खेलते हुए बोली – तुम्हें पता था मे आउन्गि..?

शंकर उसके नितंब शिखरों को अपने पंजों में भरते हुए बोला – हां, मुझे यकीन था कि आज आप ये मौका कभी नही छोड़ोगी…!

ज़ोर्से अपने नितंबों को मसले जाने पर सुषमा के मूह से आहह… निकल गयी.. वो कराहते हुए बोली – आहह…बहुत बदमाश होते जा रहे हो.., ये भी मेरे ही उपर मढ़ दिया…, तुम भी तो इतने उतावले हो रहे हो….!

लेटे हुए ही शंकर ने उसका गाउन उसके बदन से अलग कर दिया.., खुद भी मात्र एक फ्रेंची अंडरवेर में ही था.., उसके उन्नत उरोज बुरी तरह से उसके कठोर कसरती सीने से दबे हुए थे, दोनो के बीच दो पर्वत श्रंखलाओं के बीच की खाई भरकर एक दरार का रूप ले चुकी थी..,

शंकर ने अधरों को चूमकर उसके मुलायम और गोल-गोल कलश जैसे नितंबों को मींजते हुए कहा – आअहह…सुषमा मेरी जानन्न…आज तो तुम्हारा ये मखमली बदन बुरी तरह से दहक रहा है, कहीं मुझे ये जल्दी ही पिघला ना दे…!

शंकर की बात का कोई जबाब देने की बजाय सुषमा ने उसके सीने पर अपने तपते हुए होंठ रख दिए, एक प्यार भरा चुंबन लेकर वो बैठ गयी..,

उसे बैठा देख कर शंकर भी बैठ गया, और उसने खींचकर उसे अपनी गोद में बिठा लिया…, यही वो वक़्त था जब वर्षा देवी ने उनके कमरे में झाँक कर अंदर का नज़ारा देखने का प्रयास किया था…!

कसे हुए ब्रा में सुषमा के तने हुए कबूतरों को देखकर शंकर का मन डाँवाडोल होने लगा.., उसने पीछे से अपने दोनो हाथ उसके कबूतरों पर जमा दिए और उन्हें फड़फड़ाने का मौका दिए बगैर एक बार पूरी निर्ममता के साथ मसल डाला….!

सस्स्सिईईईईई….आअहह….मेरे राज्जाअ…ज़ोर्से नही…, दर्र्द्दद्ड..होता है…!

शंकर के हाथों अपनी भांजी के चुचि मर्दन होते देख वर्षा देवी की काम इच्छा जो महीनो से दबी पड़ी थी (पति की ढलती उमर उपर से बिज़्नेस के बोझ के कारण वो तो लगभग अपनी भरपूर जवान पत्नी को भूल ही चुके थे) ये देखकर एकदम से भड़क उठी…!

उनका हाथ स्वतः ही अपने पूर्ण विकसित वक्षों पर चला गया और वो उन्हें ब्लाउस के उपर से ही मसलने लगी…!

शंकर ने उसकी गोरी चिकनी पीठ को चूमते हुए पीछे से उसकी ब्रा के हुक्स भी खोल दिए, दोनो कबूतर फड़फ़डाकर बंधन मुक्त हो गये, हल्की सी ढलान लिए वो दोनो तन्कर खड़े हो गये जो किसी भी मर्द को चेलेंज कर सके की आओ हमें पकड़ कर दिखाओ…!

शंकर ऐसे चेल्लेंज लेने से कहाँ पीछे हटने वाला था.., उसने अपने दोनो हाथों से उन्हें सहलाते हुए उनकी चोंचों को अपनी दो उंगलियों के बीच दबा लिया…..!

सुषमा की सिसकी एक बार फिर कमरे में गूँज उठी…!

नीचे से उसका नाग फुफ्कारें मार रहा था, दो कपड़ों की दीवार के बबजूद भी वो उसकी गान्ड की दरार में फिट हो चुका था और उसके छोटे से बिल में घुसने की कोशिश कर रहा था..,

 


उंगलियों से निप्पलो की मसाज, नीचे रोड जैसे सख़्त लंड का गान्ड के छेद पर ठोकर लगने से सुषमा का बुरा हाल होता जा रहा था.., उसकी पैंटी सामने से गीली होने लगी थी…!

शंकर ने अपना एक हाथ उसकी पैंटी के अंदर डाल दिया, अंदर जाते ही वो उसके कामरस से गीला हो गया.., चिकनी चूत की फांकों को सहलाते हुए उसने अपनी एक उंगली जैसे ही उसकी गीली चिपचिपा रही चूत के छेद में डाली…!

सुषमा ने सिसक कर अपनी जांघों को भींच लिया…, जैसे तैसे शंकर ने अपना हाथ बाहर निकाला और अपनी गीली उंगलियों को चटकारे लेकर चाट लिया…!

उसकी इस हरकत पर सुषमा बुरी तरह शर्मा गयी…, उधर ये सब देख कर मामी का भी हाल कोई ज़्यादा अच्छा नही था, उन्हें भी अपनी जांघों के बीच गीलापन महसूस होने लगा था…!

सुषमा को ये सब सहन करना अब दूभर होने लगा था, वो उसकी गिरफ़्त से आज़ाद होकर शंकर की टाँगों की तरफ खिसक गयी…, एकबार उसने शंकर के अंडरवेर के विशालकाय तंबू को ज़ोर्से दबा दिया…, और फिर उसकी चड्डी को निकाल फेंका…!

शंकर के लंड का साइज़ देख कर मामी के मूह से चीख निकलते निकलते रह गयी…, इससे पहले कि उनके मूह से कोई आवाज़ निकलती उन्होने अपना एक हाथ अपने मूह पर रख लिया..,

इससे पहले शायद उन्होने कभी 8” लंबा और खूब मोटा ताज़ा लोहे जैसा कड़क लंड अपनी जिंदगी में देखा नही था…!

हाए राम…, ये किसी आदमी का लंड है या घोड़े का.., लाल सुर्ख दह्कते लंड को देखकर इतनी दूर से ही डर के मारे उनकी चूत ने और पानी छोड़ दिया जो अब उनकी जांघों पर बहने लगा था.

उनसे रहा नही गया, और अपना हाथ जांघों के बीच ले जाकर अपनी गीली चूत को साड़ी से ही दबाकर पोंच्छ डाला.., यहीं वो मात खा गयी.., हाथ लगते ही चूत से चिंगारियाँ सी फूटने लगी.., और वो चाहकर भी अपना हाथ वहाँ से हटा नही पाई…!

उधर सुषमा ने अपने प्रियतम का मूसल जैसा सख़्त लॉडा अपने हाथों में ले लिया.., उसकी गर्मी से उसकी चूत फूल पिचकने लगी..,

एक बार उसने शंकर के गरमा-गरम लंड को अपने मुलायम गालों से मसला और फिर उसे अपने मूह में ले लिया…! वो उसकी अपनी लार और जीभ से सेवा करने लगी.., ये देखकर मामी भी अपने हाथ की उंगली को मूह में देकर चचोर्ने लगी…!

कुच्छ देर लंड चुसाई करके सुषमा ने अपनी पैंटी उतार फेंकी, और अपनी रस से लिथड़ी हुई चूत को लंड पर सेट करके वो उसके उपर बैठती चली गयी…!

ना जाने कब मामी की साड़ी भी कमर तक जा पहुँची और उनकी दो उंगलियाँ चूत के अंदर पहुँच गयी…, पूरा लंड अंदर होते होते ही दो सिसकियाँ एक साथ निकल पड़ी…

एक कमरे के अंदर और दूसरी कमरे के बाहर…..! सुषमा ने धीरे धीरे लय पकड़ना शुरू किया.., उसी लय से वर्षा देवी की उंगलियाँ भी उनकी चूत के अंदर बाहर होने लगी…!

चूत से रस टपक-टपक कर जांघों को भिगोने लगा…, जिसका उन्हें कोई भान नही रहा था…, वो बस अंदर का बाइज़कॉप देखते हुए अपने दाँत पर दाँत चढ़ाए सुषमा की लय से लय मिलाती जा रही थी…!

सुषमा की चूत का रस भी शंकर के टट्टों को गीला कर चुका था.., सुषमा के कूदने से शंकर का काम नही बन पा रहा था.., कुच्छ देर तो उसने नीचे से ही अपनी गान्ड उचका कर धक्के देने की कोशिश की…लेकिन सुषमा उसके साथ लय मिलाने में असमर्थ रही…..

उसने एक झटके से उसे अपने नीचे लिया, और उसकी जांघों को पेट से सटा’ते हुए जो हवाई जहाज़ बनाया…, सुषमा हाए—हाए—करती हुई झड़ने लगी…

साथ ही मामी का भी ट्यूब वेल चालू होगया और वो बुरी तरह से हाँफती हुई वहीं खड़े-खड़े झड़ने लगी…!

ये घोर अचंभे की स्थिति थी उनके लिए.., इतना जबरदस्त स्खलन उन्हें आज पहली बार हुआ था.., यहाँ तक कि उनके पति के चोदने पर भी नही, उनसे खड़ा रह पाना मुश्किल हो गया और वो दीवार से पीठ सटा कर वही पर बैठकर लंबी-लंबी साँसें भरने लगी…!

अंदर निरंतर शंकर की धुआँ धार चुदाई का दौर चल रहा था, जिसका प्रमाद था सुषमा की निरंतर बढ़ती सिसकारियाँ, किल्कारियाँ…, लेकिन अब उनमें ये सब देखने की हिम्मत वाकी नही थी..,

साड़ी से अपनी चूत और जाँघो को पोन्छती हुई धीरे धीरे कदम बढ़ाकर वो जीने की तरफ बढ़ गयी…..!

नीचे आकर वो सीधी बाथरूम में घुस गयी, अच्छे से साफ सफाई काके वो जैसे ही फारिग हुई कि तभी डोरवेल्ल चीघाड़ उठी….!!!!

 
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