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रंगीला लाला और ठरकी सेवक

सेठानी ने अपनी बाहें उसकी पीठ पर कस दी.., पंजों पर उचक कर पेटिकोट के उपर से ही अपनी चूत को भोला के खड़े लंड पर रगड़ते हुए बोली – अरे खाने की क्यों चिंता करता है भोला राजा.., जो कहेगा वो खिलाउन्गी तुझे.., बस अब जल्दी से मुझे बिस्तर पर पटक कर जमकर चुदाई कर्दे मेरी…बहुत खुजली हो रही है मेरी चूत में…!

ये सुनते ही भोला ने सेठानी के ब्लाउस को फाड़कर उनके बदन से अलग कर दिया.., बहुत दिनो से उसे चूत के दर्शन भी नही हुए थे.., आनन फानन में उसने सेठानी को नितन्ग नंगा कर दिया..,

बिस्तर पर पटक कर, अपनी लूँगी उतार फेंकी.., अपने मूसल को हाथ से मसल्ते हुए वो सेठानी की ओर बढ़ने लगा..,

भोला के खड़े लंड को देख कर ही सेठानी की वासना उफान लेने लगी.., उनकी सुखी चूत गीली हो उठी..,

मोटी-मोटी जांघों के बीच आकर भोला ने अपना मूसल सेठानी की चूत की मोटी-मोटी पाव रोटी जैसी फांकों के बीच रखा.., दो चार तगड़े से घिस्से मारे…!

सस्सिईईई…आआहह….भोला…अब और ना तडपा रे…, घुसा दे इसे अंदर…, हाए रे कितना गरम लंड है तेरा…!

भोला ने मुस्कुरा कर उनकी बड़ी बड़ी चुचियों को लगाम की तरह कसकर जकड़ा..और एक करारा सा धक्का उनकी चूत में लगा दिया…!

सेठानी की कम चुदि चूत को चीरता हुआ उसका मूसल जैसा लंड आधे रास्ते तक चला गया.., कसकर होठों को भीचने पर भी सेठानी की अंदर ही अंदर चीख निकल गयी…!

उसके सीने पर अपनी हथेली अड़ाते हुए बोली – थोड़ा धीरे डाल निोगोड़े…तूने तो दम ही निकाल दिया मेरा..,

भोला ने थोड़ा सा मूसल बाहर किया और धीरे से एक और धक्का लगा कर ¾ लंड सेठानी की चूत में डाल दिया…, सेठानी दर्द से कराह उठी…!

लेकिन भोला ने कोई तबज्जो नही दी.., वो धीरे-धीरे उतने ही लंड से उन्हें चोदने लगा.., कुछ देर में ही सेठानी की अधेड़ चूत भी रस छोड़ने लगी..

लंड को आने जाने में आसानी होने लगी.., चोदते चोदते उसने अपना पूरा लंड सेठानी की चूत की बच्चे दानी तक पहुँचा दिया…!

धक्कों के साथ सेठानी की बड़ी बड़ी चुचियाँ भी समंदर की लहरों की तरह हिलोरें ले रही थी.., उन्हें अब बहुत मज़ा आ रहा था..,

भोला की पीठ और गान्ड सहलाते हुए वो उसे अब और तेज चोदने के लिए उकसाने लगी.., हाई..रामम्म…कितना मस्त चोदता है रे तू…!

शाबास.., और पेल मुझे…, फाड़ दे मेरी चूत को उऊययईीी…मैया..मोरी… उउउन्न्नग्घ…मे तो गयीइ….कहते हुए उनकी चूत ने अपना रस छोड़ दिया..,

झड़ने के बाद वो भोला को रुकने का इशारा करते हुए बोली…

थोड़ी देर रुक जा भोला.., मेरी साँसें थमने दे.., तेरा मूसल बहुत बड़ा है.., मेरी हालत खराब कर दी रे…!

लेकिन भोला ने उन्हें ज़बरदस्ती बिस्तर पे औधा कर दिया.., उनके मोटे-मोटे चुतड़ों पर थप्पड़ मारकर पहले खूब लाल कर दिया…,

फिर उनकी चक्की के पाटों जैसी गान्ड में मूह घुसाकर उनकी गान्ड के छेद को जीभ से कुरेदते हुए वो उनकी चूत को हाथ से मसल्ने लगा…!

दो मिनिट में ही सेठानी फिर से गरम होने लगी.., भोला ने अपनी हथेली पर थूक लेकर लंड को गीला किया और पीछे से अपना लंड उनकी गीली चूत में पेल दिया.., और किसी कुत्ते की तरह सेठानी को कुतिया बना कर चोदने लगा…!

सेठानी अपनी जिंदगी का सबसे लंबा तगड़ा लंड लेकर मस्त हो गयी..,आधे घंटे की मस्त चुदाई करवाकर वो पूर्ण संतुष्ट हो गयी..,

फिर उन्होने खुद अपने हाथों से भोला को बढ़िया सा भरपेट नाश्ता करवाया.., और दोबारा आने का बोलकर उसे विदा किया…..!

समय अपनी निर्धारित गति से आगे बढ़ता रहा.., भोला को इस बीच एक-दो बार रंगीली मिली भी घर पर लेकिन सबके सामने उसकी हिम्मत नही हुई बात करने की…!

पर उसे तसल्ली इस बात की थी.., कि कुछ हद तक लाजो की कमी सेठानी से पूरी हो रही थी.., वो जब मन होता दोपहर में बुलवा लेती.., और अपने कमरे में जमकर चुदने के बाद खूब उसकी खातिर भी करती…!

देखते देखते सुषमा का समय भी आ गया और उसने एक सुन्देर से बेटे को जन्म दिया.., हवेली में चारों तरफ खुशियों का साम्राज्य फैल गया…!

शंकर मन लगाकर अपनी पढ़ाई कर रहा था.., उसके पहले साल के रिज़ल्ट के रूप में अच्छे मार्क्स के साथ साथ उसकी प्रेमिका सुप्रिया ने भी एक बच्चे को जन्म दिया.., वो भी बेटे के रूप में…!

कभी कभी ये सोचकर शंकर के मन में डर और उत्तेजना का मिला जुला भाव पैदा हो जाता कि वो इतनी सी उमर में दो दो बच्चों का बाप बन गया है…!

आगे चलकर अगर ये असलियत सबके सामने आई तब क्या होगा…?

लेकिन उसकी सोच से अलग… उसकी माँ रंगीली बेहद खुश थी..,

हर एक दो महीने में वो किसी भी बहाने से अपने मायके जाती रहती थी..,

जहाँ उसके घर का ही एक और अंश लाजो के पेट में पनप रहा था…,

लाला जी अपने वादे के मुतविक उसके द्वारा उसे धन पहुँचाते रहते थे…!

लाजो के साथ साथ रंगीली के घर का भी हुलिया बदल चुका था.., आज उनका पक्का मकान था.., जो उस गाओं में उस जमाने में बहुत बड़ी बात थी…!

रंगीली का छोटा भाई पढ़ लिख कर शहर में एक छोटी-मोटी नौकरी करने लगा था.., जिससे उसका व्याह अच्छे घर की लड़की से हो गया, और वो अपनी पत्नी के साथ शहर में ही रहने लगा…..,

सुप्रिया के बच्चे के जन्म के दूसरे महीने में ही लाजो ने भी एक बेटी को जन्म दिया.., इस बात की जानकारी गुप्त रूप से सिर्फ़ रंगीली को ही थी…!

लाजो सब कुछ भूलकर अपनी बेटी के लालन पालन में लग गयी.., बेटी को देख कर उसे भोला की याद भी आती.., लेकिन अंदर ही अंदर अपने आँसुओं को पी जाती…!

 
इसी तरह कुछ महीने और गुजर गये.., एक दिन एक दिन रंगीली अपने सास-ससुर और रामू के साथ अपने घर में ही थी.., उसने बात चलाते हुए कहा –

मे क्या कहती हूँ.., मेरे बापू अब काफ़ी बृद्ध हो गये हैं.., आपको तो पता ही है भाई शहर में नौकरी करने चला गया.., अब उनकी खेती बाड़ी संभालने के लिए कोई नही है…!

रामू – हां, बात तो सही कह रही हो तुम, और उनके पास खेती बाड़ी भी खूब है.., अगर सही से देखभाल नही हुई तो बाहर के लोग ही उसका फ़ायदा उठाते रहेंगे..

पर रंगीली.., इसमें हम लोग भी क्या कर सकते हैं…?

रंगीली – मेरी मानो तो क्यों ना जेठ जी को वहाँ भेज दिया जाए..,

वैसे भी यहाँ वो गाय-भैंसॉं का ही तो करते हैं.., वहाँ रहेंगे तो बापू की मदद करते रहेंगे…!

रामू की माँ – अरी बहू कैसी बच्चों जैसी बात कर रही है.., वो वैसे भी आधा पागल है., वो भला उनकी क्या मदद करेगा..?

रंगीली – ऐसा मत कहिए माँ जी.., क्या आप में से किसी ने पशुओं को संभालने में उनकी मदद की है कभी..?

सब काम खुद के ही दिमाग़ से करते हैं ना.., तो फिर जो भी नया काम उन्हें करने का बोला जाए देखना वो उसे भी बखूबी कर ही लेंगे…!

रामू के पिता – कह तो तुम ठीक रही हो बहू.., पर क्या वो जाने को राज़ी होगा वहाँ.., और फिर अकेला जा पाएगा या नही…?

रंगीली – वो सब आप मुझ पर छोड़ दीजिए.., मे उन्हें शंकर के साथ अपनी जीप से छुड़वा दूँगी.., इसी बहाने मे भी अपने माँ-बापू से मिल आउन्गि…!

रामू – लेकिन फिर जानवरों को यहाँ कों संभालेगा..? मे तो सेठ के काम पे ही रहता हूँ, बापू के बस का कुछ है नही…!

रंगीली – अरे तो एक गाय रख लो, वाकी के बेच दो.., उनसे कोन्सि ज़्यादा आमदनी हो रही है.., घर दूध लायक एक गाय बहुत है..,

रामू की माँ – जैसा तू ठीक समझे कर हमें तो कोई एतराज नही है.., वो यहाँ रहे या वहाँ, उसे बस भर पेट खाना मिलता रहे…!

रंगीली – तो फिर ठीक है शंकरा के बापू.., तुम एक गाय छोड़कर वाकी सब को बेच दो.., मे जेठ जी से बात कर लेती हूँ, कल शंकर के कॉलेज की छुट्टी भी है.., हम लोग कल ही चले जाते हैं…!

रामू – अरे इतनी जल्दी कॉन खरीदेगा उन्हें..?

रंगीली – तो दाम बोलो.., मे लाला जी से कहकर उन्हें उनके बाडे में भिजवा देती हूँ.., आप लोगों को मूह माँगे दाम मिल जाएँगे ठीक है.., उन्हें बादे तक पहुँचवा तो सकते हो…? या ये भी मे करूँ…?

किसी काम के नहीं हो…!

चूँकि इनके घर पर रंगीली की धाक थी.., आज जो भी था उसी की बदौलत था.., सो उसके गुस्से में बोली गयी बात से सबके सब सकपका गये.., रामू तो घिघियाते हुए बोला –

हां..हां..मे पहुँचा दूँगा.., तुम गुस्सा मत करो.., उसकी बात पर रंगीली घूँघट के अंदर ही मुस्करा कर रह गयी..,

कुछ देर बाद वो अपने घेर पर थी.., जहाँ भोला जानवरों को चारा डाल रहा था..,

रंगीली को आते देख उसने अपना काम धंधा बंद किया और लपक कर उसके पास आया…!

आओ बहू.., कितने दिनो बाद सुध ली है तुमने.., कोई खबर है उसकी…?

रंगीली ने अपने आँचल से थोड़ा सा घूँघट किया हुआ था भोला की तरफ से.., वो मुस्कराते हुए बोली – अरे..अरे..जेठ जी आप तो बड़े बैचैन दिखाई दे रहे हैं..!

ऐसे काम कोई एक दिन में नही हो जाते.., उसकी खबर निकालते निकालते इतने दिन निकल गये.., अब एक काम करो.., कल अच्छे से नहा धोकर नये से कपड़े पहन कर तैयार रहना..,

भोला उत्तेजित होते हुए बोला – अच्छा रंगीली बहू.., तू सच में उससे मिलवाने ले जाएगी..?

रंगीली हँसते हुए बोली – आपको तो बस सोते जागते अपनी लाजो की ही फिकर है.., परिवार की कोई फिकर नही..?

रंगीली का उलाहना सुनकर भोला के उत्साह पर जैसे ठंडा पानी पड़ गया हो…, थोड़ा निराश होते हुए बोला – मे भला परिवार की क्या फिकर करूँ.., उसके लिए तो तुम और रामू है ही…!

रंगीली भोला की हालत पर मन ही मन मुस्कुरा रही थी.., मज़ा लेते हुए बोली – फिकर करना चाहोगे तभी तो होगी..,

कल बस जैसा मेने कहा है वैसे ही सबेरे तैयार मिलना.., आपको मेरे साथ मेरे मायके चलना है…!

भोला – तुम्हारे मायके.. और मे..? क्यों रामू नही जा रहा क्या..?

रंगीली थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए बोली – आप सवाल जबाब बहुत करते हो.., लाजो से मिलना है या नही..?

भोला – हां..हां..क्यों नही.., क्या वो वहाँ मिलेगी..?

रंगीली – जहाँ भी हो.., पहले बोलो मेरी बात मानोगे..? कल सबेरे 10 बजे तैयार रहना.., मे और शंकर आपको लेने आएँगे..,

इतना कहकर वो वहाँ से झटके से मूडी और घेर से बाहर निकल गयी…!

पीछे भोला बहुत देर तक उसी हालत में खड़ा सोचता रह गया की आख़िर ये उसे अपने मायके क्यों ले जाना चाहती है…!

उसी उधेड़-बुन में उसका काम करने में भी मन नही लगा.., कुछ देर बाद रामू आकर एक गाय को छोड़कर सारे जानवरों को हांक ले गया..,

 
भोला बस उसे देखता ही रहा.., कुछ पूछना चाह कर भी पूछ नही पाया..!

सारी रात उसे करवट बदलते ही गुजारनी पड़ी.., लेकिन दूसरी सुबह वो उदास मन से ही नहा धोकर नये कपड़े पहनकर इस आस में तैयार हो गया कि चलो अपना काम निकलवाने के बाद ही सही रंगीली उसे लाजो से मिलवा तो देगी…!

सही सवा दस बजे शंकर और रंगीली जीप लेकर उसके पास पहुँचे.., उन्हें देखते ही भोला उत्सुकता के साथ बोला – हम लोग इस मोटर गाड़ी से जा रहे हैं..?

शंकर – ताऊ जी.. आप क्या ये सोच रहे थे कि हमें वहाँ तक पैदल जाना है..? आओ बैठो…

भोला को आज पहली बार किसी वहाँ में बैठने का मौका मिला था.., वो उच्छालकर पीछे की सीट पर जा बैठा..,

इस चक्कर में वो सीट पर लुढ़क भी गया...,

शंकर ने हँसते हुए कहा - ताऊ ज़रा संभलकर...

उसके बैठते ही शंकर ने अपनी गाड़ी दौड़ा दी अपनी ननिहाल की तरफ….!

बीती रात हुए माँ-बेटे के बीच रंगा-रंग संगम के दौरान ही आज उसके ननिहाल जाने के बारे रंगीली शंकर को सारी बातें बता चुकी थी…!

अब चूँकि वो भी तो बच्चा नही रहा था, भले ही उमर जो भी हो, एक नव-युवक को जब उसके जीवन की सबसे बड़ी सौगात वो भी उससे जो अपने जीवन की सारी उम्मीदें ही अपने जान से ज़्यादा प्यारे, जिगर के टुकड़े अपने बेटे के नाम कर चुकी थी.

तो स्वाभाविक है वो भी अब दुनियादारी समझने लगा था, माँ के मूह ये सुनकर की साथ में ताऊ जा रहे हैं, जिनके साथ उसका ही नही अपितु उसकी माँ का आमना सामना बीते 20-21 सालों में गिनती का हुआ होगा…….!

तपाक से अपनी माँ की चुनिरि के जान-मारु उभार को अपनी मुट्ठी में भरते हुए बोला – क.क.क्याअ…कह रही हो माँ, ताऊ और हमारे साथ…ननिहाल को…??

अपने दोनो कबूतर जो चोंच लड़ाने के लिए लालयत दिख रहे थे, उनकी चोंच को बुरी तरह से रौन्दते अपने बेटे के हाथों की छुवन से ही

रंगीली के पूरे बदन में रोमांच की एक मीठी लहर सी दौड़ गयी…..

शंकर के पाजामे में बने तंबू के उभार को अपने हाथ में भरते हुए दबाकर बोली … सस्सिईइ…आअहह…मेरे लाल…बेचारे जेठ जी का नाग भी तो तेरे इसकी तरह फड्फाडाता ही होगा ना…,

रंगीली की चोली के बटन पर खेलती शंकर की उंगलियाँ थम गयी.., बड़े उत्तेजना भरे स्वर में बोला – क्क़.क.कहना क्या चाहती है माँ…, क्या ताऊ का कोई जुगाड़ किया है आपने..?

रंगीली अब तक शंकर का पाजामा नीचे सरका चुकी थी, अपने चिर-परिचित मनपसंद खिलौने से खेलते हुए बोली – अरे मे क्या जुगाड़ करूँगी.., मे तो बस उनको उनकी जुगाड़ से मिलवा रही हूँ…!

अबतक शंकर उसकी चोली के सारे बटन्स खोल चुका था, अपनी माँ की सुडौल मखमली चुचियों को अपनी मुट्ठी में भरते हुए बोला –

क्याअ…कह रही हो…, ताऊ की जुगाड़…? वो भी आपके मायके में…?

रंगीली अपने अंगूठे के पोर साथ में हल्के से नाख़ून का सहारा लेकर उसके लंड के पी होल को कुरेदते हुए बोली –

अपने ताऊ को क्या समझता है..? वो इतने भी चोदु नही हैं…? तेरी पुरानी आशिक़ लाजो के एक बेटी भी पैदा कर चुके हैं…!

शंकर ने माँ का लहंगा भी खोल दिया था, नंगी फूली हुई चूत की फांकों पर अपना लॉडा दबाते हुए बोला – इसका मतलब लाजो आपके मायके में है..?

रंगीली ने भी उसके लौडे को अपनी चूत के मुलायम होठों पर रगड़ते हुए कहा – हां, सेठानी ने उन दोनो को रंगे हाथों पकड़ लिया था, और घर से धक्के मार कर निकाल दिया…!

लेकिन लाला जी ने मुझे किसी अच्छी जगह रखने को बोला और चुपके से मे उसे यहाँ ले आई.., उस समय वो पेट से थी.., जो आज एक बेटी की माँ बन चुकी है…!

अब तेरे ताऊ को अपनी बेटी से तो मिलने का हक़ है कि नही…?

शंकर ने रंगीली की एक मांसल गुदाज जाँघ को उपर उठा लिया.., वाकी का काम उसकी माँ ने खुद संभालते हुए उसके लंड को चूत के छेद पर अड़ा दिया…,

दोनो ने अपनी अपनी तरफ से एक साथ धक्का मारा.., लंड सरसराता हुआ गीली चूत में आधे रास्ते तक सरक गया…!

सस्सिईइ….आअहह…बोल मेने सही किया ना बेटा..?

उउउफ़फ्फ़…माआ…मज़ा आ गया…तुम सचमुच बहुत समझदार हो, लाला जी आपको इसलिए सम्मान देते हैं…, हल्के हल्के धक्के लगाता हुआ शंकर बोला…,

रंगीली भी अपनी कमर चलाकर, उसके लंड को अंदर और अंदर तक लेने की कोशिश करते हुए बोली – वो तो मुझ पर सेठानी से भी ज़्यादा भरोसा करते हैं…!

हाईए…मेरे लाल.., चल बिस्तर पर ले चल.., ऐसे ज़्यादा मज़ा नही आरहा..,

शंकर ने उसे किसी बच्ची की तरह गोद में उठा लिया.., वो अपने पैरों की केँची उसकी गान्ड पर कसते हुए पूरे लंड को अंदर निगल गयी…,

पूरा लंड अंदर पहुँचते ही आनंद के मारे उसकी आँखें बंद हो गयी.., सिसकते हुए बोली – आअहह…उउउफ़फ्फ़…, मे चाहती हूँ, इसी विश्वास का फ़ायदा उठाकर तू ज़्यादा से ज़्यादा ज़िम्मेदारी अपने सिर लेने लायक हो जा…!

शंकर ने उसे बिस्तर पर लाकर लिटा दिया.., बिना लंड बाहर निकाले वो बिस्तर पर लेट गये.., शंकर ने उसकी दोनो टाँगों को उपर उठा लिया और जैसा उसकी प्राणप्यारी माँ चाहती थी उस तरह से उसे चोदने लगा……!

 
गाड़ी में रात की बातें याद करते हुए शंकर ने अपने ताऊ को छेड़ते हुए कहा – ताऊ जी..आज तो आप ऐसे बन-ठन के आए हो, जैसे अपनी खुद की ससुराल जा रहे हो..?

भोला – अरे शंकरा.., मेरे ऐसे नसीब कहाँ जो मेरी कोई ससुराल होती.., मेरे जैसे पागल का क्या है.., जिधर हाँकोगे तुम लोग उधर चल दूँगा…!

तेरी माँ ने ही कहा था.., नये कपड़े पहनने को..,

शंकर – क्या ताऊ आप भी.., अरे आप की ना सही आपके छोटे भाई की सही.., ससुराल तो है ही ना.., फिर क्या पता वहाँ कोई आपके मेल की मिल जाए..,

रंगीली ने हँसते हुए शंकर की जाँघ पर धौल मारते हुए कहा- निगोडे अपने ताऊ से मज़ाक करता है..? वैसे देखने में वो तेरे बाप से तो अच्छे ही लगते हैं..!

शंकर भी हँसते हुए बोला -अरे वो ही तो माँ, ताऊ आज किसी वरना से कम नही लग रहे.., देखना आपकी कोई गाओं वाली इन पर फिदा ना हो जाए..?

रंगीली – होने दे.., ये तो और अच्छी बात है.., ये भी परिवार वाले हो जायेंगे.., क्यों है ना जेठ जी…?

उन दोनो की मज़ाक का सरल मन भोला के पास भला क्या जबाब हो सकता था.., बस शरमा कर गर्दन झुकाए बैठा रहा…!

रंगीली ने शंकर के पॅंट में बने उभार को दबाते हुए फुसफुसा कर कहा – और छेड़ ना उनको.., देख कैसे शरमा रहे हैं…!

शंकर ने माँ की जाँघ सहलाते हुए कहा – वैसे ताऊ जी आपने कोई जबाब नही दिया.., अगर कोई फँस गयी तो क्या उसे अपने घर ले आओगे..?

भोला ने पीछे से अपना हाथ उठाते हुए कहा – तेरे एक धौल मारुन्गो खींच के.., अपने ताऊ को छेड़ते हुए लाज ना आई रही तोइ…?

शंकर – अरे तो इसमें मेने क्या ग़लत कहा है.., मानलो कोई मिल गयी आपके मनपसंद की.., तो इसमें हर्ज़ ही क्या है.., ले आना साथ…,

वैसे ताऊ जी एक बात पूछू आपको.., सही सही बोलना – वो लाजो आपको कैसी लगती थी…?

भोला शंकर की बात सुनकर झटका सा खा गया.., फिर भी झूठ बोलने की कोशिश करते हुए बोला – कोन्सि लाजो…?

शंकर – ओ तेरे की…इसका मतलब आप बहुत सारी लाजो को जानते हैं…?

भोला – बहुत मारुन्गो तोइ…, देख ले रामू की बहू.., मान ना रहो…!

रंगीली ने भोला की शिकायत पर ध्यान ना देते हुए कहा – तो आपने मुझे कोन्सि वाली लाजो के बारे में बताया था…?

भोला – समझ गयो.., तो तेने ही इसे भी बता दियो.., हां बेटा बहुत अच्छी थी लाजो.., पर ना जाने उस मदर्चोद सेठानी की चोदि को क्या खुजली हुई..,

बेचारी को घर से निकाल दियो.., अब ना जाने कहाँ..कहाँ भटक रही होगी..? किस हालत में होगी..?

शंकर – अच्छा ताऊ जी मानलो लाजो भाभी आपको कहीं मिल जाए तो क्या करोगे ?

भोला – तेरी माँ ने वचन तो दियो है मिलवाने को…, बस एक बार वो मोको मिल जाए.., फिर चाहें कछू है जाय.., मे वाइ फिर कहूँ नही जान दून्गो…!

शंकर – कैसे और कहाँ रखोगे उसे…?

भोला – बहुत दम है तेरे ताऊ के बाजुओं में.., कहीं भी मेहनत मज़दूरी करके वाको पेट पाल दून्गो.., बस एक बार रंगीली बहू मोकू मिलवायदे.., अपनी जान से ज़्यादा हिफ़ाज़त करुन्गो वाकी…!

भोला के दिल के उद्गार सुनकर एक बार को रंगीली भी गंभीर हो गयी.., उसे आज भोला के अंदर का मर्द दिखाई दे रहा था जो अपने साथी की इज़्ज़त और हिफ़ाज़त करना जानता हो…!

वो जिस मंसूबे से उसको अपने मायके ले जा रही थी.., उसमें उसे नाकामी की कोई गुंजाइश नज़र नही आ रही थी…!

उसने शंकर की जाँघ दबाकर इशारा किया.., जिसे समझते हुए वो बोला – जब माँ ने आपको मिलवाने का वचन दे दिया है.., तो समझो आपकी मनोकामना जल्दी पूरी होगी…!

भोला – सच..सच कर रहो तू बेटा.., अपनी माँ को बोल.., जिंदगी भर जाके पाँव धो-धो के पीबेगो जे पागल…!

भोला की इस आंतरिक खुशी को देख कर वो दोनो माँ बेटे भी बहुत खुश थे..,

बातों बातों में रास्ते का पता भी नही चला.., और वो लोग अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँच गये…!

दरवाजे पर जीप के हॉर्न की आवाज़ सुनकर रंगीली की माँ ने लाजो को कहा – देखना बेटी कॉन्सा बड़ा आदमी आया है हंमरे यहाँ…?

लाजो अपनी बेटी को माँ की गोद में देकर दरवाजे पर पहुँची.., शंकर की जीप को तो वो अच्छे से पहचानती थी..,

उसके साथ उसकी माँ और तीसरे व्यक्ति को पीछे से उतरते हुए देखा.., फिर जैसे ही उसने उस व्यक्ति का चेहरा देखा…, उसकी साँसें राजधानी की गति से दौड़ने लगी…!

उल्टे पाँव घर के अंदर भागती हुई चली गयी.., अपनी बेटी को वहीं छोड़कर वो सीधी अपने कमरे में चली गयी.., और पलंग पर लेट कर लंबी-लंबी साँसें लेने लगी…!

 
रंगीली के माता-पिता अपनी बेटी और नवासे को देख कर बहुत खुश हुए.., शंकर उन्होने पहली बार देखा था.., कामदेव जैसे अपने नवासे को वो एक टक देखते ही रह गये…!

रंगीली ने लाजो की बेटी को अपनी गोद में लेकर कुछ देर उसे प्यार किया.., फिर उसने भोला का परिचय अपने माँ-बापू से कराया.., जो उन्होने पहली बार ही देखा था…!

कुछ देर आपस में बातें की फिर वो उसकी बच्ची को शंकर की गोद में देकर भोला से बोली – जेठ जी आप एक मिनिट मेरे साथ आइए तो…!

उसकी माँ ने उसकी तरफ प्रश्नवाचक नज़रों से देखा.., उसने आखों आँखों में ही कुछ इशारा किया जिसे उन बूढ़ी आँखों ने समझ लिया…!

भोला को लेकर वो लाजो के कमरे में पहुँची.., लाजो अभी भी अपने अंदर की बढ़ी हुई धड़कनों को समेटने की कोशिश कर रही थी.., दरवाजे पर किसी के आने की आहट पाकर वो उठ बैठी..,

पहले उसे रंगीली दिखाई दी.., भोला को उसने दरवाजे के बाहर ही आड़ में खड़ा कर दिया था..,

रंगीली को देखते ही वो बैठते हुए अपनी मनोदशा को काबू में करते हुए बोली – आओ काकी कैसी हैं आप…?

रंगीली उसके पास आकर बैठते हुए बोली – मे तो ठीक हूँ, लेकिन लगता है तुम ठीक नही हो.., ऐसा लग रहा है जैसे अभी भी किसी का इंतजार है..?

लाजो कुछ संभालते हुए बोली – नही ऐसा तो कुछ भी नही है.., अब यहाँ आपने मुझे इतना अच्छा आसरा दिया है.., माँ-बापू मेरा बहुत ख्याल रखते हैं.., फिर भला और किसका इंतजार करूँगी..?

रंगीली – क्या अपनी बेटी के पिता का भी इंतेज़ार नही है तुम्हें..? कभी दिल तो करता होगा कि बच्ची का पिता कम से कम आकर अपनी बेटी को अपनी गोद में लेकर प्यार करे.., उसके साथ खेले..?

लाजो – क्या आपको पता है उसके पिता कॉन हैं..?

रंगीली – मुझे सब पता है लाजो.., इसलिए तो अब मे तुम्हें बहू नही कह रही.., भले ही तुम्हारा पति कल्लू हो लेकिन वो कम से कम तुम्हारी बेटी का पिता तो नही है…!

लाजो – तो फिर आपके हिसाब से कॉन है इसका पिता..?

रंगीली – मे जानती ही नही.., उन्हें अपने साथ लेकर आई हूँ.., और शायद तुमने उन्हें देख भी लिया है.., इसलिए दरवाजे से भाग आई थी.., है ना…!

लाज बस लाजो ने अपना चेहरा रंगीली के कंधे में छुपा लिया.., आप सब कुछ जानती हैं.., तो फिर क्यों पूछ रही हो..?

रंगीली ने उसे अपने अंक में दबा लिया और भोला को आवाज़ देकर अंदर आने को कहा .

आवाज़ सुनते ही भोला कमरे में दाखिल हुआ.., चूँकि दरवाजे पर वो लाजो को देख नही पाया था.., सो अपने ठीक सामने उसको बैठा देख कर वो पहले तो बुरी तरह से चोंक पड़ा…!

फिर कुछ क्षणों में ही उसके अंदर का गुबार फट पड़ा.., और दौड़कर उसने लाजो को अपने गले से लगा कर फुट-फुट कर रोने लगा..,

उन दोनो का मिलन कराकर रंगीली एक मिनिट के लिए भी उस कमरे में नही रुकी.., बिना उन्हें खबर होने दिए ही वो चुप-चाप उन दोनो प्रेमियों के बीच से खिसक ली !

कुछ देर के लिए तो लाजो भी ये भूल गयी कि यहाँ रंगीली भी है.., वो भी भोला के सीने से लग कर आँसू बहाती रही..,

फिर जब उसे ग्यात हुआ कि यहाँ रंगीली भी है उसने उससे अलग होने की कोशिश करते हुए उसे देखा.., उसे कमरे में ना पाकर वो फिर से भोला से चिपक गयी..!

भोला ने शिकायत करते हुए कहा – कम से कम गाओं छोड़ने से पहले एक बार मिलकर तो आ सकती थी.., तुझे पता है.., जब तू कुछ दिन मुझे दिखाई नही दी, तो मुझे तेरी बहुत याद आने लगी..,

लाजो – सच कह रहे हो तुम.., मेरी याद आती थी..?

भोला – तेरी सौगंध लाजो.., जब मुझसे नही रहा गया.., तो मेने बेशर्म बन कर रामू की बहू से पूछ ही लिया..,

मेरे ज़्यादा मिन्नत करने पर उसने तुझसे मिलवाने का वायदा किया.., लेकिन ये नही बताया कि तू यहाँ मिलेगी…!

लाजो – वो बहुत समझदार औरत हैं.., जब मुझे घर से निकाल दिया था.., तब मेरे सामने अपनी जान देने के अलावा और कोई रास्ता नही बचा था.., कुए में कूदकर अपनी जान देने वाली थी मे..,

लेकिन एन मौके पर पहुँच कर उन्होने मुझे बचाया ही नही अपितु मुझे यहाँ ले आईं, जहाँ उनके माता-पिता ने मुझे अपनी बेटी की तरह ही रखा है..

भोला – अच्छा लाजो एक बात तो बता, बाहर एक छोटी सी प्यारी सी बच्ची देखी मेने रंगीली बहू की गोद में, वो किसकी है.., इस घर में और तो कोई दिखता नही…?

लाजो बड़े रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराइ.., फिर उसके सीने पर अपनी हथेली से सहलाते हुए बोली – जब इस घर में कोई और नही है तो फिर मेरी ही होगी ना…!

भोला – तुम्हारी बेटी..? वो कब हुई..?

लाजो – वो आपका ही अंश है मेरे भोले बालम.., जब में यहाँ आई थी तब वो मेरी कोख में ही थी.., यहाँ आते ही मुझे चक्कर आया..,

रंगीली जीजी उसी समय समझ गयी कि मे माँ बनने वाली हूँ और ये बच्चा किसका है..,

भोला – क्या तुम सच कह रही हो.., वो मेरी बेटी है..,

लाजो ने बस मुस्कुरा कर अपनी गर्दन हां में हिला दी.., फिर उसे पलंग पर लेकर पास बैठते हुए बोली – गौर से देखना उसे.., तुम्हारी उसमें साफ-साफ छबि दिखाई देगी…!

ये सुनते ही भोला झट से उठ खड़ा हुआ.., लाजो उसका हाथ पकड़ते हुए बोली – अरे क्या हुआ..? अब कहाँ चले..?

भोला बड़े मासूमियत भरे अंदाज में बोला – अपनी बेटी को लाने.., मुझे उसे अभी गोद में लेकर खिलाना है..,

 
लाजो ने उसे ज़बरदस्ती से बेड पर बिठाया.., फिर जाकर दरवाजा बंद करके उसके पास बैठकर उसके गले में अपनी मरमरी बाहें लपेट दी.., उसके खुश्क होठों पर एक प्यारा सा चुंबन अंकित करके बोली…

खिला लेना.., और खूब जी भर कर खेलना उसके साथ.., लेकिन राजा अभी तो तुम कह रहे थे कि मेरी बहुत याद करते थे.., तो अब बेटी को देख कर उसकी माँ को ही भूल गये..?

भोला ने लपक कर उसे अपनी गोद में बिठा लिया.., उसे अपनी बाहों में कसते हुए बोला – तुझे में कभी नही भूल पाउन्गा लाजो.., तू मुझे पहली ऐसी औरत मिली है जिसे में चाहकर भी नही भुला पाया..,

मे नही जानता इसे क्या कहते हैं.., प्रेम का नाम तो कई ज़ुबानो से सुना था.., लेकिन अब समझ में आ रहा है कि शायद यही प्रेम है…!

लाजो पलट कर उसके गले में झूलते हुए बोली – हां..मेरे भोले राजा.. यही प्रेम है.., मे भी तुम्हें एक पल के लिए नही भूली हूँ..,

लेकिन यहाँ में अपने मन की बात किससे कहती.., कॉन समझने वाला था यहाँ…!

भोला – अब चाहे जो भी हो जाए.., मे तुझे और अपनी बेटी को कभी अपने से दूर नही होने दूँगा.., हम कहीं और चले जाएँगे.., बहुत जान है मेरे इस शरीर में कहीं भी मेहनत मज़दूरी करके तुम दोनो का पेट भर सकता हूँ…

बस थोड़ी अकल की कमी है.., सो वो तू मुझे देती रहना…!

लाजो तड़प कर भोला से लिपट गयी.., उसकी बातें सुनकर उसे भोला पर बहुत प्यार आ रहा था.., उसी प्यार में सराबोर वो बोली – हां यही सही होगा.., अब मे भी एक पल के लिए तुमसे दूर नही रहना चाहती…!

इतना कहकर उसने भोला को बिस्तर पर लिटा दिया.., और खुद उसके उपर अढ़लेटी होकर प्यार से उसके बदन को सहलाने लगी…!

आग और फूंस का बैर तो हमेशा से ही रहा है.., भले ही सिचुयेशन कैसी भी रही हो.., जब दो जवान बदन एक दूसरे के इतने करीब हों.., तो आग तो लगनी ही थी…!

धीरे-धीरे उन दोनो पर वासना की खुमारी बढ़ने लगी.., देखते ही देखते दोनो के बदन कपड़ों से मुक्त हो गये..,

दो दाहकते प्यासे बदन जब एकाकार हुए तो तभी अलग हुए जब दोनो के दिल की प्यास बुझ नही गयी…,

लाजो को फिरसे पाकर भोला का मन खुशी से झूम उठा.., फिर जब उसने रंगीली से ये सुना कि अब उसे यहीं रहकर उसके बापू का काम-धाम संभालना है तब तो उसकी खुशी का कोई परावार ही नही रहा…!

वो रंगीली के पैरों में गिर पड़ा.., रिश्तों की मर्यादा में बँधी रंगीली झट से पीछे हट गयी.., और बोली…

हाए राम जेठ जी ये आप क्या अनर्थ कर रहे हैं.., मेरे पाँव पड़कर क्यों मेरे सिर पाप चढ़ाना चाहते हैं.., मे आपके छोटे भाई की पत्नी हूँ..,मुझे आपके पैर पड़ने चाहिए…!

भोला की आँखों में आँसू थे.., उन्ही आँसुओं भरी निगाहों से उसकी तरफ देखते हुए बोला – तू देवी है बहू.., तूने इस पागल की जिंदगी में ना जाने कहाँ कहाँ से रंग बटोरकर भर दिए…!

आज मेरा भी मन होने लगा है कि मे भी औरों की तरह जियू.., एक बेटी को उसके बाप से मिलाकर तूने बड़ा उपकार किया है मेरे उपर.., आज से ये भोला तेरी एक ज़ुबान पर अपनी जान नियोछाबर कर देगा…!

अपने आधे अधूरे जेठ को उसकी जिंदगी सौंप कर उसी शाम दोनो माँ-बेटे अपने घर लौट आए.., जहाँ उन दोनो के अलावा और किसी को ये भनक तक नही थी कि भोला को ले जाने का असल माजरा क्या था…!

रास्ते में उसने शंकर को भी समझा दिया कि इस बात की खबर उन दोनो के अलावा और किसी को ना हो…!

शंकर जानता था कि उसकी माँ जो भी करती है उसके पीछे कोई बड़ा कारण होता है.., इसलिए उसने भी आगे इस मामले कोई और बात नही चलाई कि वो ऐसा क्यों चाहती है…!

शंकर नियमित रूप से अपने कॉलेज जाने लगा था.., दोनो भाई बेहन एक साथ ही पढ़ने जाते थे.., रास्ते भर दोनो की बेहन भाई वाली छेड़-छाड़ हमेशा होती ही रहती..

लेकिन शायद सलौनी की छेड़-छाड़ में बेहन वाले प्यार के अलावा भी कुछ और था जो दिनो-दिन उसे शंकर के करीब खींचता जा रहा था..!

जब वो इस विषय पर अपने अंदर ही अंदर विचार करती कि जो वो अपने भाई के सपने देख रही है, रिस्ते के लिहाज से क्या उचित है..?

लेकिन तभी उसकी इस सोच को झटकने के लिए माँ-बेटे के बीच के संबंधों का खुलासा जो उसे सालों से पता था वो काफ़ी था....!

 
जब माँ अपने बेटे का प्यार पा सकती है तो बेहन क्यों नही.., माँ-बेटे से पवित्र रिश्ता इस दुनिया में और कोई हो ही नही सकता.., जब वो इस तरह के संबंध बना सकती है तो मे क्यों नही..!

दोनो एक ही बाइक से पढ़ने जाते थे, सलौनी 12थ में पढ़ रही थी.., शंकर का भी ग्रॅजुयेशन का ये फाइनल एअर था..,

बरसात का मौसम था.., आसमानों में हर समय काले काले बदल छाये रहते थे.., काली काली घटाओं का कुछ ठिकाना नही कब बरसने लगें…!

ऐसे ही एक दिन जब वो पढ़के लौट रहे थे कि जोरदार बारिश शुरू हो गयी.., सलौनी के मन की मुराद पूरी हो गयी जो वो अपने भाई के साथ बारिश का मज़ा लेने के ख्वाब बुनती रहती थी…!

वो पीछे से उसके बदन से जोंक की तरह चिपक गयी.., उसकी कड़क कठोरे अनछुई गुदाज चुचियों जो अब किसी टेनिस की बॉल के आकार को भी पार कर चुकी थी, की चुभन अपनी पीठ पर होते ही शंकर की भावनायें बदलने लगी…!

उसपर भी मस्ती की खुमारी छाने लगी, और पॅंट में उसका घोड़ा पछाड़ सिर उठाने लगा…!

सलौनी ने पीछे से उसे कसकर जाकड़ लिया और हल्के हल्के झटकों के बहाने वो अपनी चुचियों के कड़क निप्प्लो को उसकी कठोर पीठ से रगड़ने लगी…!

सुरसूराहट के मारे शंकर के हाथ काँपने लगे.., अपने मनोभावों पर काबू रखने की कोशिश करते हुए वो बोला…

ये क्या कर रही है गुड़िया.., ठीक से बैठ ना.., इतनी ज़ोर्से क्यों जकड लिया है मुझे..?

सलौनी उसके चौड़े चाकले कंधे पर अपना गाल रगड़ते हुए बोली – देख नही रहा है सामने से कितनी तेज बौछार पड़ रही है.., अपने आप को तेरे पीछे बचा सकती हूँ तो बचु नही क्या..?

शंकर – तो ऐसे हिल क्यों रही है.., बारिश में बाइक स्लिप हो गयी तो हम दोनो किसी खेत में पड़े दिखाई देंगे.. समझी…!

सलौनी तूनकते हुए बोली – मुझे नही पता.., गिरते हैं तो गिरने दे.., मुझसे ये बौछार सहन नही हो रही, मुझे तेरे साथ चिपकने में बहुत अच्छा लग रहा है..,

शंकर भी अब सलौनी के मनोभावों को समझने लगा था.., लेकिन अपनी तरफ से वो उसे ज़्यादा नज़दीक आने नही देता था..,

इस समय भी वो उसके मन की बात खूब अच्छे से समझ रहा था…!

उसे समझाते हुए बोला – ठीक है बचना चाहती है तो बच ले मे मना नही कर रहा, बस ठीक से मुझे पकड़ कर शांति से तो बैठ.., बाइक हिलती है..,

रोड भी ठीक नही है जगह जगह गड्ढों में पानी भर गया है.., किसी गहरे गड्ढे में बाइक उच्छल कर गिर पड़ेगी..!

सलौनी थोड़ा और चिपक कर उसे आगे से अपने हाथों को उपर नीचे करने के बहाने अपने हाथ उसके पेट तक ले गयी.., जो धीरे-धीरे करके उसकी जांघों के बीच तक पहुँच गये…!

पॅंट में शंकर के उभार को महसूस करते ही उसकी छुपी हुई वासना अपना फन फैलाने लगी..,

लंड के बेहद नज़दीक सलौनी के हाथों का स्पर्श होते ही शंकर के बदन में कंपकंपी सी होने लगी.., वो किसी तरह से अपने आपको कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा था…!

तभी सलौनी ने अपना एक हाथ ठीक उसके लंड पर रख कर उसे दबाते हुए कंपकपाते स्वर में बोली – ये क्या है भैया…?

शंकर ने बिना कोई जबाब दिए उसके हाथ को वहाँ से हटाने की गर्ज से अपना हाथ उसके हाथ के उपर रखा..,

तभी बाइक सड़क के एक गहरे से गड्ढे में चली गयी.., एक हाथ से वो उसका बॅलेन्स नही बना पाया.., नतीजा वो लहराते हुए संकरी सी सड़क से नीचे खेत में उतर गयी..,

इससे पहले कि वो उसमें ब्रेक लगाकर कंट्रोल कर पाता कि उसके व्हील कच्ची गीली मिट्टी में धँस गये और वो दोनो पानी भरे खेत में बाइक से गिरकर एक दूसरे में गुड-मूड हो गये…!

बाइक के एक साइड में पलटने से शंकर का एक पैर बाइक के नीचे फँस गया.., उसके उपर सलौनी पड़ी हुई थी.., ठीक उसके सामने…!

दोनो के चेहरे एक दूसरे के बेहद करीब, दोनो की गरम साँसें एक दूसरे से टकरा रही थी.., दोनो के कपड़े पानी से सराबोर जो अब खेत की गीली मिट्टी लगने से कीचड़ के हो गये थे…!

सलौनी के बेहद कठोर उभार शंकर के सीने से दब गये थे, इस वजह से वो सामने से उसके कुर्ते के गले से अपनी पुष्ट छबि शंकर की आँखों में अमृत घोलने का काम कर रहे थे…!

सलौनी की मुनिया उसके लंड के पर्वत शिखर पर टिकी हुई थी.., दोनो ही निरि देर तक अपनी वर्तमान स्थिति से अन्भिग्य बस अपने अंदर उठ रहे वासना के तूफान के बाशिभूत बस यूँ ही पड़े रहे…!

सबसे पहले शंकर ने ही अपने आपको संभाला उसके बाजुओं को पकड़ कर उसने सालौनी को अपने उपर से उठाना चाहा..!

लेकिन उसने उठने की वजाय वो नीचे की तरह पलट गयी, जबरन अपनी बाहों में जकड़कर शंकर को अपने उपर कर लिया,

शंकर ने अपने आपको उसके बंधन से छुड़ाते हुए कहा – छोड़ ना गुड़िया.., उठने दे मुझे.., देख क्या हाल हो गया है कपड़ों का…!

 
सलौनी ने वजाय अपनी पकड़ ढीली करने के उसे और ज़ोर्से अपने उपर भींचते हुए कहा – होने दे भैया.., जो हो रहा है.., मुझे अपने में समा ले भाई..,

मे तेरे लिए सालों से तड़प रही हूँ, मुझे अपना बना ले.., मुझे भी अपने प्यार से सराबोरे कर्दे भैयाअ…

ये शब्द उसके कंठ से इस तरह से निकल रहे थे मानो वो कहीं बहुत दूर से आ रहे हों.., आवाज़ में एक अजीब मादक लरज थी.., मानो वो अपने बस में ना होकर किसी अंजानी शक्ति उससे बुलवा रही हो..!

शंकर उसके मूह से ये शब्द सुनकर स्तब्ध रह गया.., कितनी देर वो अपनी मासूम बेहन के पानी की बूँदों भरे हसीन चेहरे को निहारता ही रहा..,

उसके अपने होश भी उड़े हुए थे.., मन किया कि वो उसके इन लरजते होठों को चूम ले, खूब जी भरकर प्यार करे उसे लेकिन ना जाने क्यों वो ऐसा कर ना सका और उसे समझाते हुए बोला..,

ये तू क्या बोल रही है छुटकी.., हम दोनो भाई बेहन हैं.., ऐसा कैसे हो सकता है.., चल छोड़ मुझे अभी तू बच्ची है नादान है.., कुछ भी बोलती रहती है पगली...!

सलौनी ने उसे अपने उपर से हिलने तक नही दिया, उसके बदन को अपने उपर और ज़ोर्से कसते हुए बोली – अब मे नादान नही हूँ भाई.., और ये तू भाई बेहन के रिस्ते की क्या दुहाई देता है हां..!

क्या भाई बेहन का रिश्ता.. माँ बेटे के रिस्ते से भी बड़ा है.., पाक है…?

शंकर उसकी आँखों में झाँकते हुए बोला – तू कहना क्या चाहती है..?

सलौनी – मे माँ और तेरे रिश्ते के बारे में सालों से जानती हूँ.., जब माँ को अपने बेटे का प्यार पाने का हक़ है तो मुझे क्यों नही…?

मे ये नही कहती कि मुझे पता है कि तेरा माँ के साथ कैसा रिश्ता है इस बजह से मे कोई फ़ायदा उठाना चाहती हूँ.., लेकिन सच कहती हूँ भाई मे उससे कहीं पहले से ही तुझे मे अपने दिल का हीरो मान चुकी हूँ..!

मे अपने आपको तुझे ही सौंपना चाहती हूँ.., मुझे अपना प्यार दे दे भाई.., मे तेरे आगे हाथ जोड़ती हूँ.., अगर तूने मुझे नही अपनाया तो मे किसी और को भी अपना कौमार्य नही दूँगी…!

शंकर भौंचक्का सा बस उसके मूह को ताकता ही रह गया.., उसे ये अंदाज़ा लगाते देर नही लगी कि उसकी बेहन अपनी ज़िद की कितनी पक्की है.., ये जो कह रही है वो करके रहेगी…!

सो हथियार डालते हुए बोला – चल ठीक है.., जैसा तू चाहती है मे वैसा ही करूँगा.., लेकिन फिर उसके बाद मे जो कहूँ वो तुझे मानना होगा…!

सलौनी – मुझे मंजूर है.., उसके बाद तू कुए में कूद जाने को कहेगा तो भी कूद जाउन्गि..!

शंकर – तो फिर अभी छोड़ मुझे.., घर चलते हैं.., ज़्यादा देर यहाँ पड़े रहना ठीक नही है, कोई इधर आ निकला तो क्या कहेगा…!

शंकर की हां सुनकर सलौनी ने उसे अपने बंधन से आज़ाद किया.., दोनो ने बारिश में अपने कीचड़ भरे कपड़े सॉफ किए.., बाइक कीचड़ से निकाली और चल दिए अपने घर की तरफ…!

लेकिन अब वो दोनो बयके पर एक दूसरे से इस अंदाज से चिपके थे जैसे दो प्रेमी…..!

आज से पहले, आज से ज़्यादा खुशी आज तक (सलौनी को) नही मिली……!

दोनो भाई बेहन जब घर पहुँचे तो बारिश पूरे शबाब पर थी.., आज का सावन मानो सलौनी की खुशी को दुगना बनाए रखने की कसम ले चुका था…!

 
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