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रंगीला लाला और ठरकी सेवक

फिर भी जब वो पैडल पर ज़ोर देता, तब वो उसके बगल से टच हो जा रहा था, सलौनी को अपनी कमर में कुछ अटकता सा लगा, एक दो बार उसने उसे समझने की कोशिश की…!

फिर कनखियों से उसने जैसे ही पीछे मुड़कर देखा, वो फ़ौरन समझ गयी कि ये भाई का खूँटा है जो उसके कमर पर ठोकरें लगा रहा है…!

वो मन ही मन मुस्करा उठी, और अपने दिमाग़ के घोड़े दौड़ा दिए ये सोचने के लिए की भाई के खड़े लंड के मज़े कैसे लिए जाएँ…!

आहह…भाई, साइकल थोड़ा कम कुदा ना, कितना रास्ता खराब है, डंडे से मेरे चुतड़ों में दर्द होने लगा है, ये कहकर सलौनी ने एक साथ कई काम किए…

एक तो वो थोडा पीछे को खिसकी और अपनी एक जाँघ पर वजन लेकर दूसरी को उसके उपर चढ़ा लिया, दूसरा वो आगे को झुकी, जिससे उसका एक अमरूद भाई की बाजू से टच होने लगा…

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण काम ये किया कि उसने अपनी गाड़ को उचका कर उसकी दरार को भाई के लंड के सामने ले आई…!

अपने इस आइडिया पर वो मन ही मन मगन हो उठी, क्योंकि उसका एक मम्मा उसके बाजू से रगड़ खाने लगा था, जिससे उसके बदन में करेंट सा दौड़ गया…!

अभी वो उसी फीलिंग में ही थी कि तभी शंकर के लंड का टोपा उसकी गान्ड की दरार से घिस्सा मार गया…!

सलौनी की गान्ड उसकी चूत तक झन-झना गयी…, उसके मुँह से हल्की सी सिसकी निकल गयी, और उसकी छोटी सी कुँवारी मुनिया में सुर-सुराहट होने लगी…!

अपनी धुन में मगन शंकर ने साइकल की स्पीड तो कम कर ली, लेकिन उसे ये होश नही था, कि उसका लंड क्या-क्या हरकतें कर रहा है…

वो तो बस दे दनादन अपनी माँ की चूत में धक्के मारे जा रहा था…, इसी सोच में उसकी गान्ड साइकल की सीट पर आगे पीछे होने लगी,

अपनी बेहन की गान्ड की दरार का घिस्सा भी उसे माँ की चूत में जाता हुआ अपना मूसल लग रहा था…!

सलौनी को जब भाई के लंड का ठोके दरार में ज़्यादा ज़ोर्से लगने लगा, तो उसने उसे और उपर उठा लिया, जिससे अब उसका लंड उसकी मुनिया के दरवाजे तक दस्तक देने लगा…!

सलौनी अपने एक टिकोले का वजन भाई की बाजू पर डालकर मस्ती से भर उठी, उसे तो ऐसा लग रहा था, जैसे भाई उसे चोद रहा हो, उसकी मुनिया से रस की बूँदें टपकने लगी…!

आँखें बंद किए उसने दूसरे मम्मे को अपनी मुट्ठी में दबाकर मसल डाला, और चूत को भाई के लंड पर दबाकर वो अपना कामरस छोड़ने लगी…!

स्कूल पहुँचकर जब शंकर ने साइकल खड़ी की तब तक उसकी पैंटी पूरी तरह भीग चुकी थी, वो फ़ौरन साइकल से उतर कर बाथरूम की तरफ लपकी…

इधर शंकर के लंड का टोपा भी चिपचिपाने लगा था, सो साइकल खड़ी करके वो भी झाड़ियों की तरफ धार मारने के लिए लपक लिया…!

आज जीवन में पहली बार सलौनी ने जाना की मर्द के लंड का कितना महत्व है, जो अपनी गर्मी से ही रगड़ा देकर भी चूत का पानी निकाल सकता है, अगर वो अंदर जाता होगा तो…. सस्सिईईई…हाई…..क्या करता होगा…माआ…कैसा लगता होगा.. रीए..

यही सब सोचती हुई वो बाथरूम में घुस गयी…, उसका मन कर रहा था कि वो अपनी मुनिया को ज़ोर-ज़ोर्से सहलाए, उसे मसले, उसमें उंगली करे, लेकिन इतना सब करने लायक ना समय था, और ना जगह…!

स्कर्ट उपर करके जब उसने अपनी पैंटी को देखा…, माइ गॉड.. वो एक दम तर होकर उसकी चूत की फांकों में फँस गयी थी, जिसकी वजह से उसकी मुनिया के होंठ भी पैंटी से बाहर दिखाई दे रहे थे…

जैसे-तैसे उसने हाथ से रगड़ रगड़ कर उसे थोड़ा सा ड्राइ किया, और अपने हाथ धोकर वो क्लास में चली गयी…!

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लाला और लाजो को चुदाई का खेल शुरू किए हुए 1 साल से उपर हो गया था, लेकिन अभी तक कोई नतीजा सामने नही आया, लाला की सारी आशायें धूमिल पड़ती जा रही थी…,

लेकिन लाजो को इससे कोई मतलव नही था कि वारिस हो ही जाए, उसे तो बस लंड मिलना चाहिए सो मिल रहा था, वो सारी-सारी रात बैठक में ही अपने ससुर के साथ पड़ी रहती थी…!

उसकी चूत जैसे ही खुजाने लगती, वो लाला का लंड मुँह में लेकर लॉलीपोप की तरह चूसने लगती, वो मना भी करते तो उन्हें घुड़क देती…!

अब लाला के लंड की चाबी उसके पास ही थी, और इसके लिए वो बेचारे कुछ कर भी नही सकते थे, वरना साली छिनाल औरत क्या भरोसा कोई बखेड़ा ही खड़ा कर्दे…!

एक दिन मौका देख कर रंगीली लाला के पास पहुँची, वो उसके सामने अपना दुखड़ा लेकर बैठ गये…!

उसने उन्हें हौसला बनाए रखने के लिए कहा और हकीम जी से जवानी बढ़ाने की कोई औषधि लेने की सलाह दे डाली…,

लाला को उसकी बात जम गयी, और उन्होने हकीम जी से कहकर शक्तिबर्धक औषधि बनवा ली, जिसमें सीलाजीत, मुसली और ना जाने क्या-क्या जड़ी बूटियाँ थी,

वो उसका नियमित रूप से सेवन करने लगे…..,

साथ ही कल्लू की कमज़ोरी के लिए भी शहर के बड़े डॉक्टर की सलाह ली, और वो काम के बहाने उसे शहर इलाज कराने भेजने लगे…..

उधर रंगीली बड़ी बहू सुषमा से माले-जोल बढ़ने लगी, यौ तो उसके सौम्य और संस्कारी स्वाभाव के कारण सभी नौकर उससे प्रभावित रहते थे और उसकी बहुत इज़्ज़त करते थे…

लेकिन अब रंगीली को लाला की तरफ ज़्यादा तबज्जो ना दे सकने के कारण वो अपना ज़्यादातर समय उसके पास, उसकी तीमारदारी में ही बिताने लगी…!

सुषमा ने भी अपनी बेटी की सारी ज़िम्मेदारियाँ रंगीली पर छोड़ दी, वो उसके साथ किसी दोस्त की तरह व्यवहार रखती थी…!

अपनी रात की रंगीनियों जो वो अपने बेटे के साथ आधी रात तक करती रही थी, उसी में खोई रंगीली सुषमा के कमरे में पहुँची,

उसी समय सुषमा किसी काम से अपनी जगह से उठी, हाल ही में बंद हुए उसके मासिक धर्म (पीरियड्स) की वजह से उसे अपनी कमर में दर्द का एहसास हुआ…!

उसके मुँह से आअहह…निकल गयी, रंगीली बोली – क्या हुआ बहू रानी..? कमर दर्द है..?

सुषमा – हां काकी, थोड़ा दर्द है, पर कोई ना एक दो दिन में चला जाएगा…!

रंगीली – अरे नही बहू रानी, इसे आज अनदेखा करोगी, तो बुढ़ापे में बहुत परेशान करेगा, लाओ में आपकी मालिश कर देती हूँ, फिर देखना आप किसी घोड़ी की तरह दौड़ने लगोगी…!

रंगीली झट-पॅट तेल गुनगुना करके ले आई, और सुषमा को उसने अपनी साड़ी उतारकर पलंग पर औंधे मुँह लिटा दिया…!

लेटने से पहले उसने सुषमा से उसके पेटिकोट का नाडा ढीला करने को भी बोल दिया…!

 
एक बेटी होने के बबजूद भी सुषमा का बदन अभी भरा नही था, 34 के बूब्स के बाद उसकी 30 की कमर फिर 36 की गान्ड किसी भी मर्द का लंड खड़ा करने के लिए पर्याप्त थी…

रंगीली ने उसका पेटिकोट खिसका कर थोड़ा नीचे कर दिया, अब उसकी छोटी सी पैंटी में क़ैद उसकी गान्ड की दरार का उपरी भाग दिखाई देने लगा…

गुनगुने तेल की धार उसकी नंगी पीठ पर पड़ते ही, सुषमा का बदन थर थरा उठा….!

अपने लहंगे को घुटनो तक चढ़ाकर रंगीली अपनी दोनो टाँगों को उसके आजू-बाजू करके उसकी जांघों पर बैठ गयी, और अपने दोनो हाथों को उसकी पीठ पर जमाते हुए उसने कहा –

आअहह…क्या कंचन सी काया है बहू रानी आपकी, कॉन कह सकता है कि आपकी एक इतनी बड़ी बेटी भी होगी, ये कहकर उसने अपने तेल लगे हाथों का दबाब उसकी पीठ पर डाला और कमर से लेकर उसके ब्लाउस के छोर तक रगड़ती चली गयी….!

दबाब पड़ते ही सुषमा के दशहरी आम बिस्तेर पर दब गये, वो अपने मुँह से कराह निकालते हुए बोली – आअहह…काकी इतनी ज़ोर्से नही, थोड़ा आराम से करो…!

रंगीली उपर से मसल्ति हुई, दोनो हाथों के अंगूठों को उसकी पीठ की रीड पर दबाब डालते हुए नीचे की तरफ लाई, और उसकी कमर से होते हुए उसके कुल्हों के उभारों तक रगड़ती चली गयी…!

उसकी पैंटी को उसने और थोड़ा नीचे खिसका दिया, अब वो एकदम उसकी गान्ड के उठान के शिखर पर थी…

अपने हाथों को तिर्छे करके उसने एक दूसरे को विपरीत ले जाते हुए उसकी गान्ड के उभारों को मसल्ते हुए कहा – आराम से करने में भी कोई मज़ा है बहू रानी, ये काम तो ऐसा है की जितना ज़ोर का रगड़ा लगे उतना ही मज़ा ज़्यादा आता है…!

तुम कोन्से काम की बात कर रही हो काकी.. पुछा सुषमा ने…!

रंगीली ने अपनी एक उंगली से उसकी गान्ड की दरार की मालिश करते हुए कहा – मालिश की ही बात कर रही हूँ, आप क्या समझी…?

आआहह…ज़्यादा नीचे मत करो काकी, मेरी कमर में दर्द है, गान्ड में नही…!

रंगीली – अरे बहू रानी, कमर और पीठ की हड्डी तो यहीं तक आती है ना, आप तो बस देखती जाओ मेरा कमाल, दर्द ऐसे छूमन्तर हो जाएगा, जैसे गधे के सिर से सींग…!

अपने ब्लाउस के बटन खोलो बहू रानी…ये कहकर रंगीली अपने हाथों को उपर ले जाने लगी,

सुषमा – क्यों ब्लाउस क्यों काकी..?

रंगीली – अरे कैसी पढ़ी-लिखी हो, रीड की हड्डी शुरू तो गर्दन से ही होती है ना, तो नसें भी तो उसी बनबत में होंगी ना,

उसकी बात मानकर उसने अपने दोनो हाथ अपनी छाती तक ले जाकर ब्लाउस के बटन भी खोल दिए…,

अब रंगीली के हाथ उसकी पीठ से होते हुए गर्दन तक पहुँचने लगे, और उसके कंधों की मालिश करते हुए उसकी बगलों तक लेजा कर वो उसकी चुचियों के साइड तक मालिश करने लगी…!

उसने फिर से अच्छा ख़ासा तेल अपने हाथों में लिया, और दोनो हाथो को चिकना करके, वो फिर से उसकी कमर से शुरू करके उसके कंधों तक गयी, और चुचियों के बगल से होते हुए नीचे को कमर तक लाई…

और उसके कुल्हों की बगल से मालिश करती हुई गान्ड के शिखर को रगड़ा, साथ ही उसकी पैंटी को सरका कर जाँघो तक कर दिया,

फिर उसकी गान्ड की गोलाईयों को मसल्ते हुए अपनी उंगलियाँ जांघों के बीच फँसा दी और उसकी चूत की फांकों के बगल तक मालिश करने लगी…!

रंगीली के हाथों का जादू, सुषमा के बदन पर चल चुका था, वो अब बिना कुछ बोले, आनंद सागर में डूबती जा रही थी,

फिर रंगीली ने अपना एक हाथ उसकी गान्ड के सेंटर से रगड़ते हुए एक उंगली का दबाब उसकी गान्ड के छेद पर डालते हुए उसकी चूत की फांकों तक ले गयी और उसकी चूत की मसाज करने लगी…

रंगीली के तेल लगे हाथ ने जैसे ही उसकी चूत के मोटे-मोटे होंठों मसला,

सुषमा की चूत रस छोड़ने लगी, सही मौका देखकर रंगीली ने अपनी एक उंगली उसकी चूत में सरका दी और बोली – दर्द ठीक हुआ बहू रानी..?

सस्सिईइ…आहह…कॉन्सा दर्द काकी…? अब तो कुछ और ही हो रहा है…,

रंगीली समझ गयी कि सुषमा गरम हो चुकी है, उसका खुद का भी हाल अच्छा नही था, उसने उसकी जांघों पर बैठे हुए ही अपनी चोली उतार फेंकी, और लहंगे का नाडा खोलकर बोली –

सीधी हो जाओ बहू रानी, लाओ आगे की भी मालिश कर देती हूँ, सुषमा भी तो यही चाहती थी, सो किसी कठपुतली की तरह पलट कर चित्त हो गयी…

आअहह…उत्तेजना के मारे उसके दूधिया उभार एकदम गोलाई में आ गये, उसके निपल कड़क होकर कंचे जैसे कमरे की छत की तरफ खड़े हो गये, उसकी आँखें बंद ही थी, सो वो ये नही देख पाई कि रंगीली भी बिना कपड़ों के ही है…!

रंगीली फिर से उसकी जाँघो के उपर घुटने मोड़ कर औंधी हो गयी, और अपने तेल से साने हाथों से उसके कंधे मसाज करती हुई उसने उसके दोनो उभारों को जैसे ही मालिश किया…

सुषमा की आहह…निकल पड़ी… फिर जैसे ही रंगीली ने उसके निप्प्लो को मसला.. उसने अपने दोनो हाथ उपर उठा कर रंगीली की बाजुओं को पकड़ कर अपने उपर झुका लिया और उसके होंठों से अपने होंठ जोड़ दिए…

 
दोनो की चुचियाँ आपस में दब गयी, तब उसने अपनी आँखें खोलकर देखा, रंगीली को भी अपनी तरह पाकर वो और ज़्यादा उत्तेजित हो गयी, और ज़ोर-ज़ोर्से उसके होंठों को चूसने लगी…

रंगीली की चुत भी कामरस छोड़ने लगी थी, सो वो अपनी चूत को सुषमा की चूत से सटा कर ज़ोर-ज़ोर्से रगड़ने लगी….

दोनो पर वासना का वो भूत सवार हुआ, जो थमने का नाम ही नही ले रहा था…,

चूत से चूत रगड़ने से उन दोनो के चूत के कन-कौए अपनी चोंच बाहर निकाले एक दूसरे की फांकों के बीच हलचल करने लगे…

रंगीली ने अपनी दो उंगलियाँ सुषमा की चूत में पेलते हुए कहा –

आअहह..बहू रानी, कितनी गरम चूत है तुम्हारी, कॉन कह सकता है कि तुम्हारे जैसी भरपूर औरत एक बेटा नही जन सकती…!

मुझे तो मालकिन की बात ग़लत जान पड़ती है…!

सुषमा वासना की आग में झुलस रही थी, सोचने समझने की स्थित से उपर पहुँच चुकी थी वो, सो उसकी बात सुनते ही बोल पड़ी -…

बकवास करती है साली कुतिया, खुद का बेटा साला हिज़ड़ा कुछ कर नही पाता और बहुओं को दोष देती है…!

आहह..काकी..सस्स्सिईइ….और ज़ोर्से चोदो मेरी चूत को…हाई रे, बहुत प्यासी है ये…उउउफ़फ्फ़.. आहह…करते हुए उसने भी अपनी उंगलियाँ रंगीली की चूत में पेल दी…

दोनो के हाथ मशीन अंदाज में चल रहे थे…, अपनी चुचियों को आपस में रगड़ती हुई वो दोनो ही किल्कारी मारते हुए झड़ने लगी…, फिर एक दूसरे को किस करते हुए आपस में लिपट गयी…!

तूफान के गुजर जाने के बाद अब दोनो ही एक दूसरे से लिपटी हुई अपनी साँसों को ठीक कर रही थी…

रंगीली उसके कूल्हे सहलाते हुए बोली – आअहह.. बहुत गरम औरत हो बहू, कैसे संभाल पाती हो अपने आपको बिना लंड के…?

सुषमा ने चोन्क्ते हुए उसकी तरफ देखा – बिना लंड से आपका क्या मतलब है काकी..?

रंगीली – अभी जो आपने कल्लू भैया के बारे में कहा ना.. कि उनके बस का कुछ नही है…!

सुषमा अब होश में आ चुकी थी, जोश जोश में वो जो बोल चुकी थी, वो उसे नही बोलना चाहिए था, लेकिन अब क्या हो सकता है, तीर कमान से निकल चुका था…!

ये सोचकर उसकी आँखें नम होने लगी, रंगीली ने उसके उभारों को बड़े प्यार से सहलाते हुए कहा – विश्वास रखो बहू, ये बात किसी और के कानों तक नही पहुँचेगी…

सुषमा – क्या बताऊ काकी मे कैसे अपने आपको संभालती हूँ, हां ये सच है, कि इनमें किसी भी औरत को बच्चा पैदा करना बस की बात नही है,

वो तो शुरू-शुरू में ना जाने कैसे गौरी मेरे पेट में आ गई, उसके बाद से इनकी ग़लत आदतों ने इन्हें नपुंश्क बना दिया है…

लेकिन ये बात सासूजी को कॉन समझाए…? वो तो अब भी हम में ही कमी देखती हैं…!

रंगीली – आप एक भरपूर जवान औरत हो, तो जाहिर सी बात है कि आपके कुछ अरमान भी होंगे, जिन्हें आप पूरा नही कर पा रही हो, लेकिन उन्हें पूरा करने के सपने तो ज़रूर देखती होगी…!

सुषमा – इस घर में आने के बाद तो यही अरमान वाकी रह गये थे कि किसी तरह इस घर को वारिस दे सकूँ, जिससे मेरा मान-सम्मान बरकरार बना रहे..

लेकिन अब सारी आशाएँ धूमिल होती नज़र आ रही हैं…., अब तो सपनों में भी सोचना बंद कर दिया है मेने कि मे आगे कभी माँ बन पाउन्गि..!

रंगीली – लेकिन बहू रानी, फिर भी ये जवान दिल कुछ सपने तो देखता ही होगा…? कल्लू भैया को फिर से एक भरपूर मर्द के रूप में देखती होगी अपने सपने में, क्यों है ना…….?

इतना कहकर रंगीली टक-टॅकी लगाकर उसके चेहरे के की तरफ देखने लगी, वो उसके चेहरे से उसके मानो-भावों को पढ़ने की कोशिश कर रही थी…..!

रंगीली की बात सुनकर सुषमा मौन रह गयी, अपने मन में उठ रहे विचारों के बवंडर में फँसी वो सोचने लगी…

जिस नामर्द पति को वो अपने दिल से कबका निकालकर फेंक चुकी थी, भला अब उसको अपने सपनों में जगह कैसे दे सकती है..,

 
लेकिन ये बात भी अपनी जगह सही थी, कि औरों की तरह उसके भी कुछ सपने तो थे ही, जवान दिल के कुछ अरमान थे जिन्हें वो पूरा करना चाहती है…

लेकिन अपने दिल की बात किसी गैर औरत के सामने कैसे बयान करे कि वो अपने पति के अलावा किसी और के ही सपने देखती है, उसके सपनों का राजकुमार कॉन है…!

वो इसी उधेड़-बुन में उलझी थी, जब काफ़ी देर तक सुषमा ने कुछ नही कहा तो रंगीली ने उसके दिल पर चोट करते हुए कुछ ऐसे अंदाज में कहा, जिसे वो टाल ना सकी –

ओहूओ…बहू रानी, अब नयी नवेली दुल्हन की तरह क्या शरमाना,

मान भी लो, जो मेने कहा है वो सही है…, ये कहकर उसने उसके एक उरोज को प्यार से मसल दिया…!

आअहह…सस्सिईइ… ये सही नही है काकी…! क्योंकि मे जानती हूँ अब उनका मर्द बनाना नामुमकिन है, तो भला ऐसे सपने देखने का क्या लाभ…?

रंगीली – तो इसका मतलब अब आपके दिल में कोई अरमान वाकी ही नही है, कोई सपने ही नही हैं आपके…?

सुष्समा – मेने ऐसा कब कहा..? सपने तो सभी देखते हैं, तो जाहिर सी बात है कि मे भी किसी के सपने देखती हूँ,… पर……..! अपनी बात अधूरी छोड़ कर वो चुप हो गयी…!

रंगीली – पर..? पर क्या बहू रानी.. ? कॉन है वो खुश नसीब जो आपके हसीन सपनों में आकर आपको छेड़ता है… हान्न्न….आअंन्न..बोलो… ये कहकर रंगीली उसकी बगलों में गुद-गुदि करने लगी..….!

लाख अपनी हँसी पर काबू रखने की कोशिश के सुषमा खिल-खिलाकर हंस पड़ी, और उसी खिल-खिलाहट भरी हसी की झोंक में उसके मुँह से निकल गया – आपका बेटा…!

रंगीली अपने मुँह पर हाथ रख कर आश्चर्य जताते हुए बोली – क्या…? मेरा बेटा..? आपका मतलब… शंकर…?

सुषमा ने शर्म से अपना चेहरा अपने दोनो हाथों से ढांप लिया और शरमाते हुए बोली – हां काकी, शंकर भैया मेरे सपनों में आकर रोज़ मुझे सताते हैं,

रंगीली – लेकिन वो तो अभी बच्चा है.. उसके सपने…? मेरा मतलब है, अभी वो ठीक से जवान भी नही हुआ…, औरत मर्द के संबंधों को भी नही समझता… फिर कैसे आपने ये सोच…

सुषमा – जबसे वो इनको कॉलेज के लड़कों से बचाकर लाए थे, उसी दिन से उनकी मर्दानगी मेरे दिलो-दिमाग़ में छप गयी, उनका वो कामदेव जैसा स्वरूप रोज़ मेरे सपनों में आता है,

उनकी वो मासूम सी छवि मेरे मन-मस्तिष्क में बस चुकी है…और अब मे चाहती हूँ, कि इस घर के वारिस के रूप में उनका ही अंश मेरी कोख में आए,

ये कहकर उसने रंगीली के हाथ अपने हाथों में ले लिए और मिन्नतें सी करते हुए बोली

अब मेरा मान-सम्मान आपके हाथ में है काकी, आप चाहो तो मे अपने अधिकार फिर से पा सकती हूँ, वरना तो भगवान ही मालिक है.. पता नही क्या होगा मेरा इस घर में..?

रंगीली कुछ देर चुप रहकर सोचने का नाटक करती रही, सुषमा ने आगे कहा – क्या सोच रही हो काकी, भरोसा रखो, मे ये बात अपने शरीर की हवस मिटाने के लिए नही कह रही,

मे सच में शंकर भैया को चाहने लगी हूँ, और इसलिए मुझे इस घर को वारिस देना है तो यही एक रास्ता है मेरे पास…!

शंकर को मन ही मन अपने होने वाले बच्चे का पिता मान चुकी हूँ मे, उनके अलावा और कोई मेरे सपनों को साकार नही कर सकता…

रंगीली ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा – लेकिन एक वादा आपको भी करना पड़ेगा बड़ी बहू.., इस घर को वारिस देने से पहले, इस घर की कुंजी अपने हाथों में लेनी होगी…!

सुषमा – वो भला क्यों..? जब मे इस घर को इसका वारिस दे दूँगी, तो वैसे ही हवेली में मेरी इज़्ज़त बढ़ जाएगी…! फिर उसकी क्या ज़रूरत रह जाएगी…!

रंगीली – आप बड़ी भोली हैं बड़ी बहू…, मुझे छोटी बहू के चाल-चलन ठीक नही लगते, वो अपने फ़ायदे के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है, आप समझ रही हो ना मेरी बात…!

और फिर ये ना हो कि इस घर को वारिस मिलते ही बड़े मालिक और मालकिन की नज़र घूम जाए, इसलिए आपको ये करना ही बेहतर होगा,

आप बहुत सीधी और संस्कारी घर की बेटी हैं, घर की मान मर्यादा का ख्याल है आपको, लेकिन छोटी बहू ऐसी नही है, ये तो आप भी जानती ही होंगी…!

ये दुनिया बड़ी लालची है बहू…, ये बात मे आपके भले के लिए ही कह रही हूँ.. वरना आप ही बताइए मेरा इसमें क्या स्वार्थ हो सकता है भला…!

आपके मिलनसार और सबको सम्मान देने वाले अच्छे स्वाभाव की वजह से मे आपसे थोड़ा हिट रखती हूँ, और कोई बात नही…!

सुषमा – शायद आप ठीक कह रही हैं काकी, मे वादा करती हूँ… समय आने पर मे अपने अधिकार माँग लूँगी…, लेकिन अब आगे सब आपको देखना होगा…!

रंगीली ने मुस्कराते हुए उसकी रसीली चूत को सहला कर कहा – भला मुझे क्या देखना है..? जो भी देखना है वो आपको ही देखना है,

मे तो बस इतना कर सकती हूँ, कि शंकर ज़्यादा से ज़्यादा समय आपके पास बिताए, गौरी बिटिया के साथ खेलने के बहाने आपके करीब रहे, उसको कैसे पटाना है वो आप जानो…!

सुषमा उसकी बात सुनकर शरमा गयी, और अपनी नज़र झुकाकर बोली – ठीक है, आप इतना करदो वो भी बहुत है.., वाकी मे कोशिश कर लूँगी…!

रंगीली अपने मकसद में कामयाब होती जा रही थी, वो जिस काम के लिए सुषमा के पास आई थी वो हो चुका था, अपनी कामयाबी पर मन ही मन बहुत खुश थी वो…

उसी खुशी में गद-गद होते हुए उसने सुषमा की गान्ड के छेद में अपनी एक उंगली घुसाते हुए कहा – अच्छा बहू, जब आप माँ बन जाओगी, तो मुझे क्या इनाम मिलेगा..?

सुषमा ने उसकी कलाई थाम ली और कराहते हुए बोली – आअहह…काकी, अपनी जान से ज़्यादा कुछ कीमती चीज़ नही है मेरे पास, चाहो तो वो माँग लेना, मना नही करूँगी…!

रंगीली ने उसे अपनी छाती से चिपका लिया फिर उसके माथे को चूमकर बोली – जीती रहो बहू रानी, तुमने इतना कह दिया मुझे सब कुछ मिल गया…!

मे एश्वर से प्रार्थना करूँगी कि तुम्हारी गोद जल्दी से जल्दी भर्दे, मे आज से ही शंकर और सलौनी को आपके पास भेजती हूँ,

आप गौरी की जेममेदारी उनको सौंप देना जिससे वो ज़्यादा से ज़्यादा आपके पास ही रहे…!

इतना समझाकर रंगीली ने अपने कपड़े पहने, और वहाँ से चली गई…, उसके पीछे सुषमा शंकर के हसीन सपनों में खोई बहुत देर तक ऐसे ही पड़ी रही…!

सारा काम धाम निपटाने के बाद रंगीली जब अपने कमरे में पहुँची तो वो कुछ थकि हुई सी लग रही थी, सो आते ही बिस्तर पर लेट गयी, फिर ना जाने कब उसकी आँख लग गयी…!

कल रात से वो अनगिनत बार झड चुकी थी, अपने बेटे के साथ तो वो लगातार पानी बहाती रही थी, फिर कुछ समय पहले भी सुषमा को पटाने के बहाने भी उसे वो मज़ा लेना पड़ा था,

उधर स्कूल के बाद लौटते समय भी सलौनी अपने भाई के साथ मज़े लेने के चक्कर में थी, उसने कोशिश भी की लेकिन शंकर ने उसपर ध्यान ही नही दिया..

घर आकर सलौनी अपनी दादी के पास चली गयी, और शंकर अपनी माँ के पास..!

कमरे में घुसते ही उसकी नज़र अपनी माँ पर पड़ी, जो इस समय बेसूध सोई पड़ी थी, उसके कपड़े अस्त-व्यस्त हुए पड़े थे, उसकी ओढनी एक तरफ पड़ी थी, सो उसकी चोली से उसके कसे हुए दूधिया उरोज झाँक रहे थे…

घांघरा भी घुटनों तक चढ़ा हुआ था, माँ की गोरी-गोरी टाँगें और दूध जैसे फक्क गोरे उरोजो को देखते ही शंकर का लंड खड़ा होने लगा…,

उसने अपना स्कूल बॅग एक तरफ रखा, और माँ के बाजू में बैठकर कुछ देर उसे निहारता रहा, फिर धीरे से वो उसकी गोरी-गोरी पिंडलियों पर हाथ रख कर सहलाने लगा…!

शंकर के हाथ के स्पर्श से उसकी आँख खुल गयी, उन्नीदी आँखों से उसकी तरफ देखा, फिर मुस्कुरा कर उसे अपने सीने से लगा लिया और उसके गाल को सहला कर बोली –

आ गया मेरा लाल.., चल तुझे खाना दे दूं, भूख लगी होगी..!

शंकर को तो इस समय किसी और चीज़ की भूख थी, अपनी लालची नज़रों को माँ की चोली में कसे दूधिया उरोजो की घाटी पर जमाए हुए बोला…

खाने से पहले थोड़ी देर अपना दूध पिलादे माँ.., मेरी अच्छी माँ, ये कहकर उसने उसकी एक चुचि को अपने हाथ में लेकर दबा दिया…!

रंगीली ने प्यार से उसके गाल पर एक चपत लगाई, फिर मुस्कुरा कर उसका हाथ हटाते हुए बोली – वो सब रात में.., अभी मेरा मन नही है, रात में तूने बहुत थका दिया था मुझे, उपर से दिनभर का काम…!

ये कहकर वो उसके लिए खाना लेने उठ खड़ी हुई, शंकर अपना लंड मसोस कर बेमन से कपड़े बदल कर खाना खाने बैठ गया…!

खाना खिलाते समय रंगीली ने उसके बालों को सहलाते हुए कहा – बेटा अपना स्कूल का काम ख़तम करके तुम दोनो भाई-बेहन बड़ी बहू के पास चले जाया करो,

थोड़ा गौरी बिटिया के साथ खेल लिया करो, वो भी अब बड़ी हो रही है, उसे भी खेलने के लिए किसी का साथ चाहिए..,

अपनी माँ की बात मानकर उसने हामी भर दी…, और उसी शाम अपना पढ़ाई का

काम ख़तम करके दोनो भाई-बेहन सुषमा के पास चले गये…!

शंकर को देख कर सुषमा के मन की मुरझाई हुई कली खिल उठी,

उसने गौरी को सलौनी के साथ खेलने के लिए कर दिया, और शंकर को लेकर काम के बहाने से अपने कमरे में चली गयी…!

ऐसा नही था कि सुषमा रंगीली से कम सुंदर थी, वो एक निहायत ही खूबसूरत जवानी से लदी फदि भरपूर औरत थी,

और ऐसा भी नही था कि शंकर को वो अच्छी नही लगती थी, लेकिन अब तक उसने उसे इस नज़र से कभी नही देखा था…!

अपनी माँ के बाद उसे कोई पसंद थी तो वो सुषमा ही थी, लेकिन एक मालिक और नौकर वाली दीवार भी थी, जिसे वो कभी लाँघना नही चाहता था…!

यही कारण था कि जब भी वो उसके नज़दीक जाता था, एक आदर और सम्मान के साथ, जिससे उसके सामने हमेशा उसकी नज़र झुकी हुई रहती…,

सुषमा उसे लेकर अपने कमरे में आई, आज उसने जानबूझकर एक बहुत ही डीप गले का झीने से कपड़े का स्लीवेलेस्स ब्लाउस पहना था…,

उसके कंधे तक उसकी मांसल गोरी-गोरी मरमरी बाहें बहुत ही सुंदर लग रही थी…, झीने कपड़े से उसकी काले रंग की ब्रा साफ दिखाई दे रही थी…

कुछ इधर उधर के काम में अपने साथ लगाकर उसने शंकर से करवाए, फिर वो उसे लेकर पलंग पर बैठ गयी…!

सुषमा – आओ शंकर भैया, थोडा बैठते हैं, मे तो भाई थक गयी..,

शनकर – कोई बात नही भाभी, आप बैठकर मुझे काम बताती जाइए मे कर लूँगा, आपको साथ में लगने की कोई ज़रूरत नही है…

सुषमा – अरे छोड़ो उसे, ऐसा कुछ ज़्यादा भी काम नही है, आओ थोड़ा मेरे पास बैठो, ये कहकर उसने उसका हाथ पकड़ा और पलंग पर बैठ गयी…

शंकर वहीं पास में खड़ा रहा…, वो उसके साथ पलंग पर बैठने में हिचक महसूस कर रहा था…

लेकिन सुषमा ने उसे ज़बरदस्ती खींचते हुए कहा – अरे बैठो ना, क्या हुआ…

वो हिचकते हुए बोला – वो..वू..भाभी मे आपके साथ…पलंग पर कैसे…

सुषमा ने थोड़ा हाथ झटक कर उसे बैठने का इशारा करते हुए कहा – क्यों…क्यों नही बैठ सकते मेरे पास…, आओ कोई बात नही.., बैठो..

 
आख़िर में शंकर को उसके पलंग पर उसके बाजू में बैठना पड़ा, लेकिन थोड़ी दूरी बनाकर.., सुषमा उसके हाथ को पकड़े सहलाते हुए उससे उसकी पढ़ाई के बारे में पूच्छने लगी…

कुछ देर इधर-उधर की बात करने के बाद वो बोली – तुम्हें ताश (प्लेयिंग कार्ड) खेलना आता है…?

शंकर – बहुत ज़्यादा तो नही, बस कुछ-कुछ गेम आते हैं…

सुषमा – चलो वही खेलते हैं थोड़ी देर, मज़ा आएगा…, ये कहकर वो कार्ड लेने उठ खड़ी हुई…

शंकर बोला – सलौनी और गौरी को भी बुला लेते हैं, वो भी साथ में खेल लेंगी…

सुषमा – अरे नही, उन दोनो को वहीं बाहर ही खेलने दो, बेकार में गौरी यहाँ धमाल करेगी, हमें भी खेलने नही देगी, हो सकता है कार्ड ही फाड़ दे…!

सुषमा कार्ड के साथ-साथ एक प्लेट में नमकीन काजू, पिस्ता बगैरह भी ले आई और आकर पलंग पर सिरहाने की तरफ बैठ गयी, शंकर को भी उसने अपने सामने पलंग पर चढ़कर बैठने को कहा…

अब वो दोनो आमने सामने बैठ गये, एक साइड में उन्होने मेवा की प्लेट रख दी, और दोनो के बीच में कार्ड रखकर खेलने लगे…!

ये कोई सीक्वेन्स बनाने वाला गेम था, कुछ कार्ड बराबर नंबर्स में एक दूसरे ने ले लिए, वाकी की गॅडी बीच में रख ली, जिसमें से एक-एक करके कार्ड लेना था,

ज़रूरत का कार्ड अपने पास रख के, बिना ज़रूरत का नीचे डाल देना था, पहले का फेंका हुआ कार्ड अगर दूसरे के काम का होगा तो वो उसे गॅडी की बजाय उसे ले सकता था…

शंकर के सामने सुषमा अपनी तागे फैलाकर बैठी थी, जिससे उसकी साड़ी पीड़लियों के उपर तक चढ़ि हुई थी,

गोरी-गोरी एकदम गोलाई लिए संगेमरमर जैसी सुडौल पिंडलिया देख कर शंकर की निगाह उनपर जमी रह गयी, तिर्छि नज़र से सुषमा उसकी हरेक गतिविधि पर नज़र बनाए हुए थी…

कार्ड खेलते खेलते कभी-कभी वो अपनी टाँगें खुजाने के बहाने अपनी साड़ी को उपर करती जा रही थी, जो अब उसके एक टाँग के घुटने तक जा पहुँची…

शंकर का ध्यान जब भी कार्ड की तरफ होता, वो किसी ना किसी बहाने से उसे अपनी तरफ आकर्षित कर लेती…

इसी शृंखला में उसने अपना आँचल ढलका दिया, और कार्डों में मशगूल होने का नाटक करने लगी..,

जैसे ही शंकर की नज़र उसके खुले गले से लगभग आधे गोरे-गोरे सुडौल दूधिया मम्मों पर पड़ी, उसकी साँसें थम गयी…,

सुषमा के इतने सुंदर दूधों को देखकर उसका लॉडा पाजामे में सिर उठाने लगा.., उसकी नज़र ताड़ते हुए सुषमा मंद-मंद मुस्कराने लगी…

अपने हुष्ण का जादू उसने शंकर के मन-मस्तिष्क पर चला दिया था, यही नही वो नीचे गिरे कार्ड को उठाने के बहाने अपने आपको और आगे को झुका देती, जिससे उसकी चुचियों की मादक घाटी काफ़ी अंदर तक दिखाई देने लगती…

शंकर कार्ड खेलना भूलकर उसकी घाटी में खो गया…, उसकी कार्ड चलने की बारी थी, लेकिन बहुत देर तक भी उसने कार्ड नही चला, सुषमा उसकी हालत का मज़ा लेते हुए बोली –

कार्ड फेंको शंकर भैया, कहाँ खो गये…?

उसकी आवाज़ सुनकर शंकर पहले हड़बड़ा गया, फिर अपने खुश्क हो चुके होंठों को जीभ से तर करते हुए अपना ध्यान कार्ड्स पर लगाया और बिना काम का एक कार्ड फेंक दिया…

सुषमा ने शंकर के उपर से अपना ध्यान हटा लिया, जिससे वो अच्छे से उसके रूप का रस्पान कर सके, और अपना एक हाथ जाँघ पर ले जाकर उसे खुजाने लगी…!

शंकर फिर से उसके रूप लावण्य में खो गया…, मौका ताडकर सुषमा ने अपनी टाँगों का ऐसा पोज़ बनाया जिससे उसकी साड़ी का नीचे का पल्ला और ज़्यादा नीचे हो गया, और उपर का भाग तंबू की तरह दोनो घुटनों पर तन गया…

उसकी दोनो गोरी-गोरी, केले जैसी मोटी-मोटी, चिकनी सुडौल जांघे अंदर तक नुमाया हो गयी…,

शंकर की चंचल नज़रें अंदर तक का एक्सरे करती चली गयी, और अंत में जाकर उसकी गुलाबी रंग की पैंटी पर टिक गयी…,

पैंटी में कसी हुई उसकी मोटी-मोटी जांघों के बीच दबी उसकी चूत के मोटे-मोटे होंठ जो जांघों के दबाब के कारण पैंटी के अंदर और ज़्यादा उभरे हुए से लग रहे थे,

उनपर नज़र पड़ते ही शंकर का घोड़ा अपने अस्तबल में हिन-हिनाने लगा..,

उसने अंडरवेर और पाजामे के बबजूद भी उसके आगे बड़ा सा तंबू बना दिया…, जिसपर नज़र पड़ते ही सुषमा की साँसें तेज होने लगी…

उसकी मुनिया में सुरसूराहट बढ़ गयी, और उसके होंठ गीले होने लगे..,

उसने शंकर के लंड को यहीं चैन से खड़े नही होने दिया, अपने घुटनो को एकदुसरे के करीब लाई जिससे उसकी सुरंग का रास्ता और चौड़ा और साफ, किसी एक्सप्रेसवे की तरह हो गया…,

और फिर आगे झुक कर गॅडी से कार्ड लेने के बहाने अपने उपर की स्क्रीन एकदम शंकर की आँखों के आगे कर दी…..

उठाऊ या गॅडी से खींचू ऐसा बड़बड़ाते हुए झुकी हुई सुषमा ये जताने का प्रयास कर रही थी कि वो ये तय नही कर पा रही है, कि कार्ड गॅडी से ले या शंकर का फेंका हुआ ले…

शंकर की आँखों के सामने दोनो ही स्क्रीन एकदम खुली पड़ी थी…, वो ये फ़ैसला नही कर पा रहा था कि कॉन सी स्क्रीन पर सीन अच्छा चल रहा है, जबकि वो किसी एक से भी नज़रें हटाने की हिम्मत नही कर पा रहा था…

उत्तेजना के मारे उसके कान तक गरम होकर लाल हो गये, लौडे की हालत का तो कहना ही क्या…, वो तो इतने बंदोबस्त के बाद भी ठुमके लगाने लगा, जिसका भरपूर मज़ा कार्ड उठाने के बहाने सुषमा खूब अच्छे से लूट रही थी…

उसकी मुनिया तो खुशी से लार टपकाने लगी…,

फिर दोनो ने अपने आप पर थोड़ा सा काबू किया और गेम को आगे बढ़ाते हुए सुषमा ने अपने हाथ से एक कार्ड सामने फेंका जो शंकर के मतलब का था…

सो उसने झट से उठा लिया, तभी सुषमा बोली – सॉरी शंकर, वो कार्ड मेने ग़लती से फेंक दिया, वो मुझे वापस दे दो, मे दूसरा कार्ड फेकुंगी…,

शंकर – नही अब नही भाभी, ये आपको पहले देखना चाहिए था, एक बार फेंक दिया तो फिर वापस नही ले सकती…

सुषमा – अरे तुम समझा करो, वो कार्ड मेरे काम का है, प्लीज़ वापस दे दो, ये कहकर उसने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया…

शंकर ने वो कार्ड वाला हाथ पीछे खींचा, जिसे सुषमा छीनने के लिए झपटी….

तभी शंकर ने वो हाथ अपनी पीठ के पीछे कर लिया, वो उसे हर हालत में पाने की गरज से उसपर झपट पड़ी, इसी चक्कर में वो शंकर के उपर जा गिरी…

शंकर अपनी जगह पर पीछे को लुढ़क गया, और सुषमा उसके उपर…

शंकर का कार्ड वाला हाथ उसकी पीठ के नीचे दब गया था, जिसे निकालने के लिए वो उसके हाथ को पकड़ने के लिए अपना हाथ भी घुसाने लगी…

सुषमा के पुष्ट कड़क दूधिया उभार शंकर की कठोर चौड़ी छाती से दब गये, जिससे वो अब उसके ब्लाउस के और ज़्यादा बाहर को निकल पड़े,

अपनी आँखों के ठीक सामने उसके दोनो उभार जो दबकर एक-दूसरे पर ओवेरलेप हो रहे थे देखकर शंकर की साँसें तेज होने लगी,

उधर सुषमा भी कार्ड-वॉर्ड सब भूल गयी, और शंकर के लंड के तंबू को अपनी जांघों के ठीक बीच में अपनी चूत के होंठों के उपर महसूस करके उसके दिल की धड़कनें बुलेट ट्रेन की तरह चलने लगी…

आँखों में वासना के डोरे तैरने लगे, वो अपनी लाल-लाल नशीली आँखों से शंकर की आँखों में झाँकने लगी, जहाँ उसे वासना के कीड़े बिज-बीजाते हुए दिखे…

उसने अपनी गान्ड का दबाब और बढ़ाकर अपनी चूत को उसके लंड के उभार पर और बढ़ा दिया, जिससे उसकी मुनिया बुरी तरह से गीली होने लगी…

दोनो के दिल इतने पास-पास थे, कि वो धाड़-धाड़ बजते दोनो एक दूसरे के दिलों की धड़कन को साफ-साफ सुन रहे थे…

दोनो को ये होश नही रहा कि वो कहाँ और किस स्थिति में हैं,

ना जाने वो कितनी देर और यौंही पड़े रहते कि तभी बाहर से मम्मी…मम्मी चिल्लाते हुए गौरी की आवाज़ सुनाई दी…

सुषमा जैसे किसी भंवर से बाहर निकली हो, होश आते ही वो फ़ौरन शंकर के उपर से उठकर अपनी जगह पर बैठ गयी, तब तक गौरी कमरे के अंदर आ चुकी थी…

अभी वो अपने कपड़े ठीक कर ही रही थी कि पीछे से सलौनी भी अंदर आ गयी…,

उसने राहत की साँस ली कि चलो बच गये, वरना अगर सलौनी उसे ऐसी हालत में देख लेती तो ना जाने क्या सोचती…

वो सब कुछ देर और बैठे कार्ड खेलते रहे, फिर गौरी को दूसरे दिन आने का प्रॉमिस करके दोनो भाई-बेहन अपनी माँ के पास चले गये…!

 
जब से सुषमा ने शंकर को रिझाना शुरू किया, तब से वो उसकी तरफ खींचता ही जा रहा था, सोने पे सुहागा ये की उसकी माँ ने उसे चूत का चस्का भी लगा दिया था,

जैसा कि आप सभी लोग अनुभवी हैं, जब किसी नवयुवक को नया नया चूत का चस्का लगता है, तो उसे अपने चारों ओर चूत ही चूत दिखाई देती हैं…

वो हर संभव औरतों के कामुक अंगों को घूर्ने की चेष्टा ही करता रहता है…, उत्तेजित होकर सारे-सारे दिन अपने लौडे पर ज़ुल्म ढाता रहता है…!

यहाँ तो सुषमा जैसी निहायत खूबसूरत औरत सामने से अपने रूप यौवन को उसके सामने परोसने में कोई कोर कसर नही छोड़ रही थी…,

शंकर को जब भी मौका हाथ आता वो सुषमा के कसे हुए दूधिया उभारों को नज़र भर निहारता ही रहता, वो भी उसे रिझाने के लिए कोई ना कोई तरकीब लड़ाती ही रहती…

जब शंकर उसे चाहत भरी नज़रों से उसके अंगों को देखता, ये देखकर सुषमा अंदर ही अंदर आनंद से भर उठती,

उसे इस बात की तसल्ली होती कि चलो अपने रूप सौंदर्या से वो उसे अपनी तरफ आकर्षित करने में सफल हो रही है…, और अब जल्दी ही उसकी ये इच्छा पूरी हो सकती है..

एक रात जब दोनो माँ-बेटे ज़मीन पर बिस्तर लगाए सोने की कोशिश कर रहे थे.., शंकर दिन की बातें सोच-सोच कर सुषमा की भरी जवानी को अपनी सोचों में पाकर उत्तेजित हो रहा था…!

वो जैसे ही अपनी आँखें बंद करता, सुषमा के गोरे-चिट्टे ब्लाउस से झाँकते हुए दूधिया उरोजो के बीच की खाई सामने आ जाती,

उसकी गोरी-गोरी पिंडलियाँ और आधी-अधूरी केले जैसी गोरी चिकनी जांघों की झलक आँखों में आते ही उसका घोड़ा हिन-हिनाने लगा…

उसका लंड कड़क होकर पाजामे में उच्छल कूद मचाने लगा, अब नींद उसकी आँखों से कोसों दूर भाग चुकी थी….

जब उससे नही रहा गया तो वो अपनी माँ के बिस्तर पर आकर पीछे से उसकी गान्ड की दरार में अपना मूसल अटका कर चिपक गया…!

रंगीली भी अपने ही ख्वाबों ख़यालों में गुम अभी तक सो नही पाई थी, शंकर का लंड अपनी गान्ड पर महसूस कर उसने करवट बदली और सीधी लेट गयी..

शंकर का हाथ अपनी चुचियों पर रखकर बोली – क्या बात है रे बदमाश, नींद नही आ रही..?

वो उसकी मुलायम गोल-गोल चुचियों को सहलाते हुए बोला – बहुत मन कर रहा है माँ, एक बार करने दे ना…!

रंगीली ने भी अब उसकी तरफ मुँह कर लिया, और उसके खड़े लंड को अपनी मुट्ठी में लेकर दबाते हुए बोली – क्या करने दूं…?

शंकर – वू.. माँ…वू…, तू देख ही रही है…ये साला आज बहुत परेशान कर रहा है, एक बार अपनी उसमें डालने दे ना इसे…!

रंगीली – ये क्या ये, वो, उसमें, करने दे बोलता रहता है, सीधे सीधे बोलना क्या करने दूं तुझे..? सीधे सीधे बोल ना क्या चाहिए..?

शंकर – वू..मुझे तेरे सामने ऐसे गंदे शब्द बोलने में शर्म आती है…!

रंगीली उसके लंड को मुठियाते हुए बोली – अच्छा मदर्चोद, माँ की चूत चोदना चाहता है, बोलने में शर्म आती है,

खुलकर बोला कर ये सब, इन कामों में शर्म नही करते, खुलकर बोलने में ज़्यादा मज़ा आता है… समझा…

शंकर – तो तू बुरा तो नही मानेगी ना, अगर मे कहूँ कि मुझे तेरी चूत में अपना लंड डालकर चोदना है तो…!

रंगीली – हां ! ये हुई ना कुछ बात, तो मेरे चोदु बेटे का अपनी माँ को चोदने का मॅन कर रहा है,, हां..,

ये कहकर उसने उसके पाजामा का नाडा खींच दिया, और उसके लंड को बाहर निकालकर मूठ मारते हुए बोली – पर अचानक से मन क्यों करने लगा तेरा…?

शंकर – वो माँ..वू…आज सुषमा भाभी की मस्त गदर चुचियाँ देख-देखकर इतना मज़ा आ रहा था..मत पुच्छ....आअहह…क्या मस्त गदराई हुई है वो… एकदम दूध जैसी गोरी…!

रंगीली – तो उन्हें ही सोच-सोचकर तेरा ये लंड फन-फ़ना रहा है,, क्यों..? वैसे वो तेरे साथ कुछ छेड़-छाड़ भी करती है…?

शंकर ने माँ की चुचियों को उसके बटन खोकर चोली से बाहर निकाल लिया और उसके एक निपल को अपनी जीभ से चाट कर बोला – बहुत छेड़ती है भाभी, पर मुझे डर लगता है, इसलिए मे अपनी तरफ से कुछ कर नही पाता…!

रंगीली उसके सिर के पीछे अपना एक हाथ रखकर उसके मुँह को अपनी चुचि पर दबाते हुए बोली – देख बेटा, कोई भी औरत अपने मुँह से कभी सीधे-सीधे ये नही कहेगी कि आजा मेरे राजा चोद ले मुझे…!

वो ऐसी ही छेड़-छाड़ करके मर्द को उकसा सकती है, अब तू ठहरा नादान, भला कैसे समझेगा कि उसकी चूत तेरा ये मूसल लेने के लिए मचल रही है…!

शंकर ने उसके लहँगे को कमर तक चढ़ा दिया और उसकी जांघों को सहलाते हुए उसका हाथ उसके मुलायम चूतड़ पर चला गया, उसे अपनी मुट्ठी में भरने की कोशिश करते हुए बोला –

तो इसका मतलब सुषमा भाभी मेरे से चुदना चाहती है…?

रंगीली कराहते हुए बोली – आहह…हां.. बेटा, वो बहुत प्यासी औरत है, उसने मुझे भी बोला था तुझे उसके पास जाने के लिए, इसलिए तो मेने तुम दोनो को गौरी के साथ खेलने के लिए कहा था…!

शंकर ने अपनी माँ की केले के तने जैसी चिकनी टाँग को अपने उपर रख लिया और उसकी रसीली चूत में उंगली डालकर बोला – इसका मतलब तू भी चाहती है कि मे उन्हें चोद दूं..!

रंगीली सीसियाते ही बोली – ससिईइ….आअहह…हहान..मेरे लाल, बहुत प्यासी है बेचारी…, मौका देखकर चोद डाल उसे…, पिला दे अपने लंड का पानी उसकी चूत को…, बना दे अपने बच्चे की माँ…!

सस्सिईई…हाईए…रीए…मदर्चोद उंगली ही करता रहेगा या अब चोदेगा भी मुझे… डाल अपना मूसल मेरी ओखली में… बहुत खुजा रही है सालीइीइ…. ससिईईईईई…

हाईए..रीए.., कर्दे जमके कुटाइईई इस निगोडी कििई..….

शंकर अपनी माँ की कामुक बातें सुनकर फ़ौरन उसकी टाँगों के बीच आकर बैठ गया.., और उसकी टाँगों को चौड़ी करके, अपना गरम दहक्ते हुए लंड का टोपा अपनी माँ की प्यासी चूत में पेल दिया…!

एक ही झटके में आधा लंड उसकी चूत में सरक गया…. रंगीली कराह उठी…आअहह…. मेरे घोड़े… धीरे.., बहुत मोटा खूँटा है तेरा…, मेरी चूत को चीर दिया रे….मदर्चोद…..उउफफफ्फ़….

शंकर ने उसके होंठों को चूमा और चुचियों को मसल्ते हुए एक और धक्का लगा दिया, अपने लंड को जड़ तक माँ की चूत में चेंपकर वो उसके उपर पसर गया…

अपने दर्द पर काबू पाने के लिए रंगीली ने उसके होंठों को अपने मुँह में भर लिया…, और अपने पैरों को उसकी कमर में लपेटकर गान्ड को उपर उठा दिया…!

अब धीरे-धीरे चोद बेटा, हाआंन्न…शाबास मेरे शेर, फाड़ अपनी माँ की चूत.. बहुत गरम है ये साली…, और ज़ोर्से..एयेए..ययईीीई…म्माआ…उउउफफफ्फ़…बहुत अच्छा..चोद रहा है तुऊउ.….

ऐसी ही उत्तेजक बातें करते हुए वो उसे और ज़ोर्से चोदने के लिए उकसाने लगी.... शंकर उसकी कामुक बातों से ज़्यादा उत्तेजित होकर और दम लगाकर ठुकाई करने लगा..,

दोनो माँ-बेटों की अब अच्छे से ट्यूनिंग सेट हो गयी…, जब शंकर अपने लंड को बाहर खींचता तब रंगीली अपनी गान्ड को बिस्तेर पर लॅंड करा देती…

फिर जैसे ही वो उपर से धक्का मारता, रंगीली नीचे से अपनी कमर उचका देती जिससे शंकर के मजबूत कठोर जांघों के पाट उसकी गान्ड से टकराते और एक थपाक की आवाज़ कमरे में गूँज उठती…

शंकर का लंड एकदम सुपाडे तक बाहर आता और एक ही झटके में जड़ तक उसकी रसीली चूत में फ़चाक से समा जाता…!

दोनो को इस समय जो मज़ा आरहा था उसे तो वो दोनो ही बता सकते थे…, इस घमासान चुदाई से रंगीली थोड़ी ही देर में अपनी चूत का ढक्कन खोल बैठी…

उसके बाद शंकर ने उसे घोड़ी बनाकर पीछे से उसकी चुदाई शुरू करदी.. अपना नलका खुलने तक वो उसे दे दनादन चोदता रहा…!

शंकर के दमदार धक्कों से वो पूरी तरह हिल जाती थी, उसकी गोल-मटोल सुडौल चुचियाँ सागर की लहरों की तरह हिलोरें मार रही थी…

जब उसने अपनी माँ की चूत में अपना रस छोड़ा तब तक वो दो बार और झड चुकी थी, और पस्त होकर औंधे मुँह बिस्तर पर गिर पड़ी,

शंकर का लंड अपनी चूत में लिए हुए ना जाने कब उसकी झपकी लग गयी….!

 
लेकिन शंकर का लंड अभी भी ढीला नही हुआ था, चूत में डाले हुए ही वो फिर से तुनकने लगा…,

उसने उसे हिलाने की कोशिश की, लेकिन वो तो 3 बार अपना पानी फेंक कर गहरी नींद में डूब चुकी थी…

बेचारे को थक-हार कर अपना खड़ा लंड चूत से बाहर निकालना ही पड़ा.., और अपनी मा के गाल पर एक किस करके लॉडा हाथ में लेकर सोने की कोशिश करने लगा…!

एक दिन सलौनी किसी काम से अपनी दादी के पास ही रुक गयी, फिर भी रंगीली ने शंकर को अकेले ही गौरी के साथ खेलने के लिए भेज दिया…

वो और सुषमा दोनो उसके घर में गौरी के साथ खेल रहे थे…,

ये कोई छुआ-च्छुई का खेल था, गौरी की बारी थी उन दोनो में से किसी एक को छुने की, पहले उसने शंकर को छुने की कोशिश की लेकिन वो हाथ नही आया..

फिर वो अपनी माँ को छुने के लिए लपकी, उससे बचने के लिए वो झटके से पीछे को मूडी, सामने पलग था, सो झपट कर पलंग पर चढ़ गयी…

उसी आपा-धापी में पलंग से नीचे उसने जंप लगाई, क्योंकि गौरी उसके पीछे ही थी, उसी चक्कर में उसकी पीठ में झटका सा लगा…

वो अपनी पीठ पकड़ कर वहीं बैठ गयी और कराहने लगी…, शंकर लपक कर उसके पास आया और बोला – क्या हुआ भाभी, चोट लगी क्या..?

सुषमा कराह कर बोली – हाँ भैया, लगता है झटके से मेरी पीठ चटख गयी…

वो उसे उठाने के लिए आगे बढ़ा, और उसका एक बाजू अपने कंधे पर रख कर बोला – चलो मेरे सहारे पलंग तक चलो, फिर मे माँ को भेजता हूँ, वो कुछ ना कुछ ज़रूर करेगी…!

वो कराह कर बोली – आअहह…मेरे से खड़ा नही हुआ जा रहा.., मुझे गोद में लेकर पलंग तक ले चलो…!

शंकर ने सकुचा कर उसकी तरफ देखा, वो कराहते हुए फिर बोली – आअहह…क्या सोच रहे हो, ले चलो मुझे…म्माआ…आहह…

शंकर ने उसकी पीड़ा समझकर उसे गोद में उठा लिया, सुषमा ने अपनी बाहें उसके गले में लपेट दी, और अपनी गदर रस से भरी चुचियों को उसके सीने में दबाते हुए लिपट गयी…!

चुचियों के मखमली एहसास से उसका लंड खड़ा होने लगा, जिसे सुषमा ने अपनी गान्ड के नीचे महसूस किया, और वो भी उत्तेजित होने लगी…!

बिस्तर पर लिटाकर उसने सुषमा से कहा – आप थोडा आराम करो भाभी, मे अभी माँ को भेजता हूँ, वो आकर आपकी मालिश कर देगी तो आप जल्दी ठीक हो जाओगी, इतना बोलकर वो वहाँ से जाने के लिए उठा…!

सुषमा ने फ़ौरन उसकी कलाई थाम ली, और बोली – गौरी चली जाएगी काकी को बुलाने, तुम यहीं रहो मेरे पास, मुझे बहुत दर्द है पीठ में, आअहह… ज़रा तबतक तुम ही सहला दो…प्लीज़…!

फिर उसने गौरी से कहा – बेटा ज़रा रंगीली काकी से बोल माँ को पीठ में दर्द हो रहा है, शंकर काका उनके पास हैं…!

अपनी माँ की बात सुनकर गौरी दौड़ती हुई रंगीली को बताने चल दी, और वो खुद बिस्तर पर औंधे मुँह लेट गयी……!

गौरी के जाते ही सुषमा ने शंकर से कहा – ज़रा दरवाजा बंद करदो शंकर,

शंकर ने चोंक कर कहा – क्यों भाभी…

सुषमा – अरे बुद्धू, तुम मेरी पीठ की मालिश करोगे, इस बीच कोई आ गया तो खम्खा कुछ ग़लत-सलत सोचेगा..,

उसने जाकर दरवाजा बंद किया, इतने में सुषमा ने अपने ब्लाउस के हुक खोल दिए और अपनी साड़ी को ढीला करके पेटिकोट के नाडे को भी खोल दिया…

जब वो गेट बंद करके लौटा तो सुषमा ने औंधे मुँह लेटे हुए ही फिर कहा – अब देखो तो ज़रा वहाँ ड्रेसिंग टेबल पर मूव रखा होगा, वो ले आओ तो…!

शंकर वहाँ से मूव की ट्यूब ले आया, तो वो फिर बोली – अब ज़रा इसमें से थोडा-थोड़ा अपनी उंगलियों पर लेकर मेरी कमर और पीठ पर मलो…!

शंकर कुछ देर तक असमंजस में खड़ा रहा, उसकी हिम्मत नही हो रही थी कि वो सुषमा के बदन पर मालिश करे, जब कुछ देर तक उसने शुरू नही किया तो वो कराह कर बोली…

अब खड़े क्यों हो शंकर, जल्दी से मेरी पीठ की मालिश करो आअहह…बहुत दर्द है, मेरी पीठ फटी जा रही है दर्द के मारे…माआ….!

उसने हिचकिचाते हुए सुषमा की सारी को पीठ से अलग किया, पिच्छवाड़े से उसके गोरे चिट्टे बदन की बनबत देखकर उसके शरीर में कंप-कपि सी होने लगी…!

उपर से नीचे तक उसकी पतली कमर किसी शंकु के आकर में जिसके बीचो-बीच रीड की गहरी नाली सी…,

उसके बाद उपर को खूब उभरे हुए उसके कूल्हे, दो चट्टानों जैसे जो साड़ी में कसे हुए किसी का भी लंड खड़ा करदें…

अपनी माँ के अलावा अभी तक उसने किसी और स्त्री के बदन को छुआ तक नही था, सो दर्र और उत्तेजना के मारे उसका शरीर काँपने लगा,

हिम्मत जुटाकर उसने थोड़ा सा ट्यूब अपनी उंगलियों पर लिया, और अपने घुटने टेक कर उसके बगल में बैठ गया…

काँपते हाथों से उसने जैसे ही सुषमा की पीठ को छुआ, दोनो के ही शरीर में बिजली के करेंट की तरह एक लहर सी दौड़ गयी...,

शंकर अपनी उंगलियों के पोर से उसकी पीठ पर हल्के हाथ से मूव को मलने लगा, ठंडी-ठंडी मूव क्रीम जिसमें थोड़ी चुन-चुनाहट सी सुषमा को हो रही थी,

वो सिसकते हुए बोली – सस्सिईई…आअहह…शंकर भैया, थोड़ा ज़ोर्से मलो ना, क्या लड़कियों के जैसे हाथ चला रहे हो, और थोड़ा उपर तक मालिश करदो…

शंकर उसकी बात मानकर अपने पूरे हाथ की हथेली से उसकी मालिश करने लगा, वो कराह कर बोली – आअहह…हां ऐसे ही, अब थोड़ा उपर तक भी…

शंकर – लेकिन भाभी, उपर तो आपका ब्लाउस है…

सुषमा – आहह…अपना हाथ तो डालो अंदर…, चला जाएगा वो, जी कड़ा करके शंकर ने जैसे ही अपना हाथ उपर को सरकाया,

उसकी उंगलियाँ और फिर पूरा हाथ ब्लाउस के अंदर घुसता चला गया, शंकर फ़ौरन समझ गया कि आगे से इसके हुक्स खुले हुए हैं..

अंदर हाथ जाते ही उसकी उंगलियाँ जैसे ही उसकी ब्रा की स्ट्रीप से टकराई…, दोनो की ही साँसें तेज हो गयी…, वो कुछ देर उसके आस-पास ही मालिश करने लगा..,

सुषमा एक कामुक भरी आहह.. लेकर बोली – आअहह…शंकर, भैयाअ…मेरी ब्रा के हुक खोलकर पूरी पीठ पर मूव मलो ना…!

उसके मुँह से ब्रा के हुक खोलने की बात सुनते ही शंकर का लंड उसके पाजामे में झटके मारने लगा, उसका मुँह कानों तक लाल हो गया..., हुक पर उसके हाथ बुरी तरह से काँप रहे थे…

उसकी इस मनोदशा को बिस्तर में मुँह छुपाये सुषमा बड़ी अच्छी तरह समझ रही थी, वो खुद उसके हाथों के स्पर्श से बहुत ज़्यादा गरम हो चुकी थी, नीचे उसकी चूत गीली होने लगी थी…

जैसे तैसे करके शंकर ने उसकी ब्रा के हुक खोल दिए, और अब वो थोडा सा ट्यूब लेकर उसकी पूरी पीठ पर मालिश कर रहा था……………!

उधर गौरी जब रंगीली के पास पहुँची, और उसको बताया जो उसकी माँ ने कहने के लिए बोला था,

वो मुस्करा उठी, और उसको अपनी गोद में लेकर बोली – तुम चिंता ना करो बिटिया रानी, वहाँ शंकर काका हैं ना, वो मम्मी को बिल्कुल ठीक कर देंगे..!

चलो अपन लोग सलौनी के पास चलते हैं उसके घर, चलोगि ना…

 
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