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रंगीला लाला और ठरकी सेवक

शंकर की इस हरकत से सुप्रिया बुरी तरह शरमा गयी, उसके सीने पर प्यार से धौल जमाकर बोली – कितने शरारती हो गये हो तुम…!

छोटे-छोटे बालों से घिरी उसकी छोटी सी चूत, जिसकी पतली-पतली लेकिन थोड़ी सी फूली हुई दोनो फांकों के बीच की दो इंच लंबी दरार को देख कर उसका लंड किसी विषधर नाग की तरह फनफनाने लगा……!!

शंकर ने उसकी आँखों में देख कर कहा – आअहह…क्या मस्त है ये, आप कहो तो इसका रस टेस्ट करके देखूं दीदी..?

शंकर की ऐसी कामुकता भरी बात सुनकर उसका शर्म के मारे बुरा हाल था, उसके चौड़े चक्ले सीने में मुँह छुपाकर बोली – मुझे नही पता, तुम्हें जो करना है वो करो…!

शंकर ने मुस्कुरा कर उसे फिर से लिटा दिया, और उसके होंठों को चूमते हुए पूरे बदन पर अपने होंठों की छाप छोड़ते हुए उसकी रसीली चूत पर जा पहुँचा…

उसकी छोटी सी चूत को अपने बड़े से हाथ से सहलाया, फिर उसे अपनी मुट्ठी में भींच लिया…!

सुप्रिया की मानो जान ही चूत के रास्ते उसके हाथ में समा गयी हो….आहह… भरते हुए उसने शंकर की कलाई थाम ली, और सिसकते हुए बोली –

इतना मत तडपाओ शंकर… मेरे रजाआ… वरना मे मर जाउन्गि, प्लीज़ जल्दी कुछ करो अब..…

शंकर उसके कमरस से भीगे हुए अपने हाथ को चाटते हुए बोला, सफ़र अभी बहुत लंबा है मेरी बुल-बुल… तुम तो अभी से मैदान छोड़ने लगी…!

ये कह कर उसने अपनी जीभ से उसकी चूत की उभरी हुई फांकों को चाट लिया…

सुप्रिया तो जैसे ऊडनखटोले में बैठ कर हवाओं की शैर करने लगी.., उसने अपने आप को शंकर के हवाले कर दिया…, ऐसे सुख की कामना उसने कभी सपने में भी नही की थी…!

उसकी फांकों के बीच अपनी जीभ की नोक से कुरेदते हुए उसका एक हाथ उसकी चुचियों से खेल रहा था, दोहरी मार से सुप्रिया का पूरा शरीर भूकंप में आए झटके की तरह काँपने लगा,

फिर वो उसके भज्नासे को अपने होंठों में दबाकर चचोर्ते हुए जैसे ही उसने अपनी एक उंगली उसकी चूत के छेद में डालकर अंदर बाहर की, सुप्रिया की कमर अपने आप हवा में लहराने लगी,

अपनी चूत को उसके मुँह पर दबाकर वो काँपते हुए झड़ने लगी, शंकर उसकी चूत के होंठों पर अपने होंठों को दबाकर उसका सारा रस चूस गया…!

फिर चटकारे लेकर अपने होंठों को अपनी जीभ से चाटते हुए भोली सी सूरत बनाकर बोला – आहह…बहुत मीठा है, मज़ा आ गया.., आपको कैसा लगा दीदी…???

सुप्रिया तो जैसे अपने होश में ही नही थी, उसकी ये बात सुनकर वो लपक कर उसकी छाती से लिपट गयी, और उसके होंठों को चूस्ते हुए बोली – जादूगर हो तुम…!

कहाँ से सीखा ये सब…?

उसने मुस्कुरा कर उसकी चुचि को सहलाते हुए कहा – ये राज की बात है.., आप बस मज़े लो और मुझे भी थोड़ा मज़ा दो, ये कहकर उसने अपना पाजामा नीचे सरका दिया, और अपना रोड जैसा कड़क लंड उसके होंठों से लगा दिया…!

शंकर के डंडे जैसे शख्त 7.5” लंबे और खूब मोटे खूँटे जैसे लंड को देख कर सुप्रिया की आँखें फटी रह गयी,

उसे देख कर अब उसे डर लगने लगा था, वो सोचने लगी, कि इतने तगड़े लंड को वो अपनी चूत में कैसे ले पाएगी, वो.. काँपते हाथों से उसे अपनी मुट्ठी में पकड़ने लगी, जो उसके छोटे से हाथ में भी नही समा पा रहा था..

पकड़ते ही उसकी गर्मी से और ज़्यादा घबरा गयी, और डरते हुए बोली – य..यईी.. इतना बड़ा कैसे है शंकर…?

शंकर ने चोन्क्ते हुए कहा – क्यों कभी लंड देखा नही आपने…?

वो – देखा तो है, पर इतना बड़ा नही, क्या इसे मे ले पाउन्गि अपने अंदर…!

शंकर ने अपने लंड को अपने हाथ में लेकर उसे उसके होंठों से लगाते हुए कहा – पहले इसे अपने मुँह में लो बेबी, ज़्यादा नाटक नही…, ये चूत चोदने के लिए ही होता है…

सुप्रिया शंकर के मुँह से ऐसे रफ शब्द सुनकर चोंक पड़ी, उसने उसकी आँखों में देखा, जिन्हें देखते ही उसे झूर-झूरी सी होने लगी…

शंकर की लाल –लाल आँखों में उसे वासना के अलावा और कुछ नही दिखा, वो समझ गयी, कि अब अगर इसको रोका, तो हो सकता है ये उसे ज़बरदस्ती चोद डाले,

अगर ऐसा हुआ तो ना जाने वो कितनी बुरी तरह से उसे रौंदेगा, सो उसने बिना कुछ कहे उसका लंड अपने मुँह में ले लिया, और चूसने की कोशिश करने लगी…!

शंकर को उसका लंड चूसना पसंद नही आया, सो कुछ देर में ही उसने उसे बाहर निकाल लिया, और उसकी टाँगों को अपनी जांघों पर चढ़ाकर अपने गरम सुपाडे को उसकी चूत के छेद पर रख कर हल्का सा धक्का देकर सुपाडे को अंदर कर दिया…!

सुप्रिया आने वाले संकट को झेलने के लिए अपने आपको तैयार करते हुए बोली – थोड़ा आराम से करना शंकर प्लीज़…, तुम्हारा ये बहुत बड़ा है..

शंकर ने प्यार से उसके निप्प्लो को सहलाते हुए कहा – आप इतना भी निर्दयी मत समझो मुझे.., मे आपको कुछ नही होने दूँगा..

ये कहकर उसने एक तगड़ा सा धक्का देकर अपना आधा लंड उसकी कसी हुई चूत में डाल दिया, उसे लगा जैसे वो पहली बार चुद रही हो,

सुप्रिया अपने दर्द को पीने की कोशिश में अपने होंठों को चबाने लगी, उसकी आँखों से पानी बहने लगा…!

वो कुछ देर पहले के उसके रौद्र रूप को देख कर डर गयी थी, इसलिए उसने कोई प्रतिरोध नही किया, लेकिन अपने आँसुओं को वो नही रोक पाई…!

शंकर को कुछ गड़बड़ लगी, वो वहीं थम गया, उसने उसके होंठों को चूमा, फिर उसके उभारों को सहलाते हुए बोला – क्या हुआ दीदी, आपको ज़्यादा दर्द है तो रहने दें..?

वो अपने दर्द पर काबू पाने की कोशिश करते हुए कराह कर बोली – आहह…नही शंकर, तुम आगे बढ़ो, मे कोशिश करती हूँ, झेल लूँगी…!

शंकर – लेकिन आपको इतना दर्द क्यों हो रहा है..? जैसे पहली बार चुद रही हो..,

सुप्रिया – ये समय इन बातों का नही है शंकर, प्लीज़ आगे बढ़ो, बातें बाद में.. ये कहकर उसने उसके होंठों को चूमकर अपनी आँखें बंद कर ली…!

शंकर ने एक बार अपने लंड को थोड़ा सा बाहर निकाला, उसे अपने लंड पर कुछ गरम-गरम सा महसूस हुआ, उसने नीचे नज़र डालकर देखा तो, उसे अपने लंड पर खून लगा हुआ नज़र आया…!

वो आश्चर्य में पड़ गया और सोचने लगा, शादी के 3 साल बाद भी क्या ये अभी तक कुँवारी है, …? लेकिन फिर अपनी सोच को झटक कर उसने एक और हल्का सा धक्का लगा दिया…

उसका लंड और दो इंच तक आगे सरक गया, उसने सुप्रिया के चेहरे पर नज़र डाली, वो आँखें बंद किए हुए अपने दर्द को काबू में करने की कोशिश कर रही थी..

शंकर ने कुछ देर तक उसके बदन को सहलाया, उसके निप्प्लो को चाटा, और फिर धीरे-धीरे उतनी लंबाई तक उसे चोदने लगा..,

सुप्रिया का दर्द कुछ पलों बाद कम हो गया, और अब वो भी मादक सिसकियाँ लेती हुई, चुदाई में साथ देने लगी..,

5 मिनिट में वो उसके आधे-पौने लंड से ही झड गयी, अब उसकी चूत गीली हो गयी थी सो लंड के आने जाने में अब कोई तकलीफ़ नही थी, इसका फ़ायदा लेकर शंकर ने एक आख़िरी शॉट लगाते हुए उसे जड़ तक अंदर कर दिया…

इस बार सुप्रिया को कोई अंदाज़ा नही था, सो उसके मुँह से चीख निकल ही गयी, और वो हान्फ्ते हुए उसकी आँखों में देख कर बोली – आहह…शंकर, और कितना बचा है अभी.., मेरे मुँह से होकर बाहर निकालने का इरादा है क्या…?

शंकर ने उसकी चुचियों को मसल्ते हुए कहा – नही रानी, बस अब लास्ट हो गया.., आज से मेने तुम्हारी चूत की गहराई को फिक्स कर दिया, अब कभी भी कोई रुकावट नही होगी…

ये कहकर उसने अपने धक्के लगाना शुरू कर दिए!

सुप्रिया एक भरपूर लंड पाकर मस्त हो गयी, शंकर जैसे ताक़तवर लंड से जिसकी ठोकर उसकी बच्चेदानी के अंदर तक पहुँच रही थी, उसकी नयी फटी मुनिया लगातार पानी छोड़ने लगी…

अब वो अपने दर्द को भूल कर मस्ती से कमर उचका-उचका कर चुदाई का मज़ा ले रही थी…!

शंकर के एक बार झड़ने तक वो कई बार बरस चुकी थी.., उसने उसे उलट-पलटकर उसकी चूत को अच्छे से रबां कर दिया…, अब उसकी चूत के होंठ कुछ मोटे से होकर फैल चुके थे…!

उसकी चूत की फाँकें सूजी सी लग रही थी, जैसे किसी के मुँह पर थप्पड़ मार-मारकर उसके होंठ सूजा दिए हों…

आख़िर में शंकर के लंड की बरसात से उसकी अबतक सुखी पड़ी खेती जिसने आजतक पानी की एक बूँद तक ना देखी हो वो हरी-भरी हो उठी, और उसकी चूत की छोटी सी बगिया लह-लहा उठी…!

जब दोनो एक बार अच्छे से झड गये और अपनी-अपनी साँसों को नियंत्रित कर चुके, तब शंकर ने अपने लंड को उसकी चूत से बाहर निकालकर उसपर लगे खून को दिखाते हुए बोला – ये क्या है दीदी…?

सुप्रिया ने उसके लंड से खून का एक कतरा अपनी उंगली पर लेकर उसके लंड पर तिलक करते हुए कहा - तुम्हारा अंदाज़ा सही है शंकर, मे आज ही लड़की से औरत बनी हूँ…, ये तिलक इस बात का सबूत है कि यही मेरी चूत का असली मालिक है…!

शंकर – क्यों ? आपके पति..? मेरा मतलब शादी को 3 साल हो गये, फिर अभी तक आप कुँवारी थी…?

सुप्रिया ने उसकी बात का कोई जबाब नही दिया, बोलने की वजाय वो उसकी छाती में अपना मुँह छुपाकर सुबकने लगी…

शंकर ने उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर कहा – क्या बात है, मुझे बताओ दीदी..,

सुप्रिया ने सुबक्ते हुए कहा – मेरा पति इस लायक है ही नही शंकर कि मुझे एक पत्नी का सुख दे सके, उसे तो लड़के अच्छे लगते हैं, औरतों से वो कोसों दूर भागता है…!

शंकर ने चोन्क्ते हुए कहा – ये क्या कह रही हैं आप ? इसका मतलब उन्होने आपके साथ अभी तक सुहागरात तक नही मनाई…?

सुप्रिया ने ना में अपनी गर्दन हिला दी, और मौसी भरे स्वर में बोली – तुम सुहागरात की बात करते हो, अभी तक मेरा पूरा बदन तक नही देखा…!

शंकर - तो आपने ये बात अभी तक किसी को बताई क्यों नही..?

सुप्रिया – वो दिल के बहुत अच्छे इंसान हैं, अब ये बुरी लत कैसे और कब लगी मुझे नही पता…!

उन्होने गिडगिडाते हुए मुझ से इस बात के लिए माफी माँगी और ये भी कहा कि मे अगर चाहूँ तो किसी और से अपने संबंध बना सकती हूँ, उन्हें उसमें कोई एतराज नही होगा,

लेकिन प्लीज़ मेरी ये कमज़ोरी किसी और से मत कहना वरना में जीवित नही रह पाउन्गा…!

अब तुम्ही बताओ, मे अपने सुख की खातिर किसी की जान कैसे ले सकती हूँ, फिर मेने फ़ैसला किया कि अब मे केवल और केवल अपने शंकर को ही अपना ये शरीर सौपूंगी, जो मेरे बचपन का प्यार है…!

उसकी बात सुनकर शंकर ने उसे कस कर अपने सीने से लगा लिया और उसके होंठों का चुंबन लेते हुए बोला –

ओह्ह्ह.. सुप्रिया मेरी जान तुम सच में बहुत अच्छी हो, तुमने सही किया जो उनका राज किसी पर उजागर नही होने दिया…!

सुप्रिया ने उसकी तरफ देखते हुए कहा – लेकिन ये वादा करो शंकर, तुम भी ये राज अपने तक ही सीमित रखोगे..!

शंकर ने उसे वचन दिया, कि वो ये राज अपने सीने में दफ़न कर लेगा, और उसे जब भी उसकी ज़रूरत होगी वो उसके लिए जी जान से हाज़िर रहेगा…!

सुप्रिया – ऊहह मेरे शंकर ! तुम कितने अच्छे हो, अब बस एक अहसान और करदो मुझ पर…!

शंकर ने उसे अपनी गोद में खींचते हुए उसके रसीले लज़्जत भरे होंठों को चूमकर कहा – अहसान नही मेरी जान, हुकुम करो.., ये गुलाम तुम्हारे लिए जान देने के लिए हाज़िर है…

सुप्रिया – तुम किसी के गुलाम नही, तुम तो मेरे दिल का वो हिस्सा हो शंकर, जो मेरी जान जाने के बाद ही अलग हो पाएगा, बस मुझे एक बच्चा दे दो, जिसके सहारे में अपना जीवन काट सकूँ…!

जो हुकुम मेरे आका, ये कहकर उसने उसे अपने उपर लिटा लिया, और उसके गोल-गोल चुतड़ों को मसलते हुए उसकी चुचियों को चूसने लगा…

वो दोनो एक बार फिर से गरम हो गये, और एक बार फिर कमरे में मादक सिसकियों का बाज़ार गरम हो उठा…!

सुप्रिया की चूत थोड़ा दर्द कर रही थी, लेकिन चोरी की चुदाई के लिए इतना तो सहना पड़ता ही है, सो अपने दर्द को दरकिनार करके वो शंकर के लंड के झटकों को फिर से झेलने लगी…

जब वो दोनो अपने अपने कपड़े पहन कर चुके ही थे, तभी रंगीली और सलौनी वहाँ आ गये,

सुप्रिया उन दोनो के सामने शर्म से अपनी नज़रें झुकाए वहाँ से बिना कुछ कहे चली गयी…!

शाम के खाने में अभी वक़्त था, सो रंगीली कुछ हवेली के काम निपटाने चली गयी, और शंकर अपनी बेहन को मैथ के सवाल करने बैठ गया…!

सलौनी अब बच्ची तो नही थी, वो 10थ क्लास में पढ़ रही थी, सुप्रिया इतनी देर उसके भाई के पास अकेली क्या करती रही होगी खूब समझ रही थी,

पर वो ये नही समझ पा रही थी कि उसकी माँ ने जान बूझकर उन दोनो को अकेला क्यों छोड़ा, क्या माँ ही उन्हें मिलाना चाहती है, लेकिन क्यों…?

ये कुछ ऐसे सवाल थे जो उसके अविकसित दिमाग़ में समा नही पा रहे थे…

शंकर उसे सवाल बताने में व्यस्त था, लेकिन उसका ध्यान तो कहीं और ही था…

जब शंकर ने उससे पुछा, समझ में आ गया गुड़िया…? तो वो हड़बड़ा कर उसकी तरफ देखने लगी, शंकर ने फिर कहा – समझ गयी या तेरा ध्यान ही कहीं और है…?

वो उसकी तरफ देख कर बोली – एक बात पुच्छू भैया..?

उसने कहा – हां पुच्छ..

वो बोली – सच सच बताना आप और सुप्रिया दीदी इतनी देर अकेले यहाँ क्या कर रहे थे…?

वो उसके मुँह की तरफ देखने लगा, वो समझ नही पा रहा था कि सलौनी ने ये सवाल क्यों किया…? और वो उसे इसका क्या जबाब दे, लेकिन कुछ तो बताना ही था सो बोला…

बस इतने दिनो बाद वो यहाँ आई हैं, बचपन में हम लोग जो खेल खेलते थे उन्ही बीती बातों को याद कर रहे थे, वो भी अपने ससुराल की बातें बताती रही.. वैसे तूने ये सवाल क्यों किया..?

सलौनी उसके सवाल को अनसुना करके बोली – बस यही बातें होती रही दो घंटे तक…?

शंकर – हां, लेकिन तू इन बातों पर इतना ज़्यादा ज़ोर क्यों दे रही है, अपनी पढ़ाई पर ध्यान दिया कर आगे-आगे बहुत कठिन पढ़ाई आने वाली है समझी…!

सलौनी – वो तो मे कर लूँगी, लेकिन मे ये नही समझ पा रही कि हमारे आते ही वो नज़र झुका कर बिना कोई बात किए चली क्यों गयी, फिर एक पल भी नही रुकी माँ के पास…?

शंकर उसकी बातों से झुंझला उठा और उसे झिड़कते हुए बोला – तू अब बहुत मार खाएगी मेरे हाथों से, बहुत बातें बनाने लगी है, अब मे तुझे क्या जबाब दूँ, कि वो ऐसे क्यों चली गयी…?

सलौनी तपाक से बोली – लेकिन मे बता सकती हूँ वो ऐसे नज़र झुकाए क्यों चली गयी…?

 
शंकर उसके मुँह की तरफ देखता ही रह गया, वो सोचने लगा कि अब ये शैतान की नानी आगे क्या बोलने वाली है…सो पुच्छ ही बैठा.. क्यों चली गयी..?

सलौनी मंद-मंद मुस्कराते हुए अपने भाई के बाजू के सख़्त मसल्स को दोनो हाथों में लेकर दबाते हुए बोली – मेरे भाई की मर्दानगी पर मर मिटी है वो…

ये कहकर वो खिल-खिला कर वहाँ से भाग गयी, शंकर अपना थप्पड़ दिखाते हुए उसके पीछे-पीछे दौड़ा…!

रुक जा शैतान की अम्मा, बहुत बातें बनाने लगी है तू, ठहर अभी खबर लेता हूँ तेरी… !

वो खिल-खिलाती हुई किसी चाचल तितली की तरह इधर से उधर उससे बचती बचाती भाग रही थी, शंकर उसके पीछे-पीछे था…!

फिर आख़िर में वो तक कर एक जगह रुक गयी और अपने घुटनों पर हाथ टिका कर झुक कर हाँफने लगी,

शंकर ने उसे पीछे से उसकी कमर में एक बाजू डालकर किसी फूल की तरह उठा लिया और उसे अपने कंधे पर डालकर उसके चुतड़ों पर प्यार भरे थप्पड़ लगाने लगा…

वो अपने पैर फड़फड़ाकर उससे छूटने का नाटक करने लगी, लेकिन अपनी बाजू उसने उसके गले में लपेटे हुए वो उस’से और ज़्यादा चिपक गयी…!

अपनी बेहन के कच्चे अमरूदो का एहसास अपने कंधे पर महसूस करके शंकर को पहली बार ये एहसास हुआ कि उसकी बेहन अब बच्ची नही है, वो अब कच्ची कली से फूल बनने की राह में है…!

अनायास ही उसका हाथ थप्पड़ देने की वजाय उसके कोमल चुतड़ों को सहलाने लगा, जो अब थोड़े से चौड़े और पीछे को निकल आए थे..,

सलौनी अपने भाई के बदन की रगड़ और उसके गान्ड को सहलाने की वजह से मस्ती में भर उठी,

मचल कर वो नीचे की तरफ खिसकी और उसके गले में झूल गयी.., इससे पहले की शंकर उसे नीचे उतारता, उसने अपने भाई के गाल को चूम लिया…!

उसकी इस हरकत से शंकर सन्न रह गया, और वो चंचल तितली हस्ती हुई वहाँ से फ़ुउरर्र्र्ररर… हो गयी….!

वो अपने गाल पर हाथ रखकर सहलाता ही रह गया………!

उधर सुप्रिया जब हवेली के चौक में पहुँची तो वहाँ उसकी बेहन प्रिया और उसकी माँ तखत पर बैठी बातें कर रहीं थी, साइड में दोनो बहुएँ खड़ी थी..

औरतों की बातों का कोई ओर-छोर तो होता नही बात में से दूसरी बात निकल आती है.., एक बार इनको खाना ना मिले तो भी चलेगा, लेकिन बातें….

अब भी उनकी बातें वही थी जिनका केंद्र बिंदु वो घटना ही थी, प्रिया बढ़ा-चढ़कर शंकर की वीरता का बखान कर रही थी, जिसका उन तीनों पर मिला जुला असर था…

जहाँ सेठानी अभी भी एक नौकर द्वारा अपने मालिक की बेटी की जान बचाना उसका फ़र्ज़ बता रही थी, वहीं सुषमा शंकर को देवता का स्वरूप मानकर चल रही थी,

वो मन ही मन अपने आप पर बड़ा गर्व महसूस कर रही थी, शंकर जैसे वीर के बच्चे की माँ बनने का उसे सौभाग्य मिल रहा है...., वो मन ही मन ईश्वर और रंगीली का धन्यवाद कर रही थी…!

वहीं लाजो को शंकर जैसे ताक़तवर नौजवान के लंड को लेने की लालसा और बल्बति होने लगी, क्योंकि अब वो अपने ससुर के लंड से संतुष्ट नही हो पा रही थी,

और वैसे भी ये आश् तो वो दोनो ही छोड़ चुके थे कि अब उनके वीर्य में बच्चा पैदा करने की शक्ति बची भी है या नही…!

लाजो को कोई ठोस प्लान बनता नज़र नही आ रहा था, उसके रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा थी शंकर की माँ रंगीली…,

उसका नाम दिमाग़ में आते ही, उसको एक झटका सा लगा, उसने तय कर लिया कि अब वो कैसे भी करके रंगीली को पटाने के कोशिश करेगी, जिसने अपने ससुर से संबंध बनाने के लिए उसे उकसाया था…!

अब तो शंकर बड़ा भी हो गया है, तो अब अगर थोड़ी कोशिश की जाए तो शायद बात बन सकती है,

इस प्लान को फाइनल करते हुए उसने रंगीली को शीशे में ढालने की ठान ली……!

सुप्रिया के वहाँ पहुँचते ही सबकी सोचों और बातों पर विराम लग गया…

उसकी चाल में लंगड़ाहट थी, जिसे देख कर सेठानी ने उससे पुछा – तू कहाँ चली गयी थी, कब्से तेरी राह देख रहे हैं हम सब…, और इस तरह लंगड़ा कर क्यों चल रही है…?

सुप्रिया – रंगीली काकी के पास थी, शंकर के हाल चाल पुछने गयी थी.., और खेतों में थोड़ा पैर मूड गया था, तो उन्होने गरम तेल की मालिश भी करदी…, क्यों कोई काम था.,..?

सेठानी – अरी, तुझे कितनी बार कहा है, नौकरों को ज़्यादा सिर चढ़ाने की दरकार नही है, उनपर अपना हुकुम चलाया जाता है समझी… लेकिन मेरी ये बात कभी तेरे मगज में नही घुसी…!

अपनी माँ की बातों पर ध्यान देने की वजाय, प्रिया ने पुछा – कही चोट तो नही लगी उसे…?

सुप्रिया – शरीर पर तो कहीं चोट नही है, पर माँ की बातों से शायद उनकी आत्मा पर ज़रूर चोट लग सकती है…!

सेठानी – ये तू अपनी माँ से किस तरह से बात कर रही है, मुझे दुनियादारी मत सीखा, सब जानती हूँ इन नौकरों की जात, ये ऐसे ही कामों के लिए होते हैं…!

प्रिया – बस करो माँ, शायद तुम्हें ये अंदाज़ा नही है कि उसने कितना बड़ा अहसान किया हैं हमारे उपर…!

आपकी बेटी की जान बचाने के लिए साक्षात मौत से भिड़ गया था वो, जिस सांड़ पर लाठियों की मार से कोई फरक नही पड़ता है, उसे उसने अपनी ताक़त के बल पर धूल चटा दी थी…!

उसका अहसान मानने की वजाय कम से कम इस तरह की जली कटी बातें तो मत करो..!

सेठानी – ये तू कह रही है..? कल तक तो तू मुझसे भी ज़्यादा इन लोगों से चिढ़ती थी.

प्रिया – वो मेरी सबसे बड़ी भूल थी, नौकर भी इंसान होते हैं, और फिर शंकर तो हमारा खास नौकर है, पिताजी ने उसे ऐसे ही देखभाल का भार नही सौंप दिया है…

ये दूसरा चान्स है जब उसने हम लोगों पर इतना बड़ा अहसान किया है, हमें उसकी इज़्ज़त करनी चाहिए…!

इस तरह की बहस के बाद भी जब सेठानी के तेवर नही बदले तो एक-एक करके वो चारों उसे अकेली छोड़कर चली गयी, वो अकेली वहाँ बैठी बुद-बुदाती रही…!

वहाँ से निकल कर प्रिया ने सुप्रिया का हाथ पकड़ा और बोली – चल मेरे साथ…

सुप्रिया – कहाँ..?

प्रिया – मुझे शंकर से मिलना है अभी…, कहाँ मिलेगा वो..?

सुप्रिया – मे तो उसे अपने घर में ही छोड़कर आई थी, अब पता नही कहाँ होगा..?

प्रिया लगभग दौड़ती हुई हवेली के पीछे शंकर के घर की तरफ चल दी.., सुप्रिया मुस्कुराती हुई अपने कमरे में आ गई…!

वो आज बहुत खुश थी, थोड़ी चाल में लंगड़ाहट थी, लेकिन उसकी उसे कोई परवाह नही थी, आज उसने वो पा लिया था जिसे पाने का हक़ हर औरत को होता है…!

वो इस बात से भी ज़्यादा खुश थी कि शंकर ने हर संभव उसका साथ देते रहने का वचन भी दे दिया है.., अब वो अपने गान्डु पति को वजाय कोसने के धन्यवाद दे रही थी…!

उधर प्रिया दौड़ती हुई जब शंकर के घर पहुँची तो वहाँ उसे बस सलौनी मिली, जब उसने शंकर के बारे में पुछा तो उसने बताया कि वो तो अभी-अभी खेतों की तरफ निकल गया…!

वो वहाँ एक पल भी नही रुकी, और लगभग दौड़ते हुए खेतों की तरफ चल दी, पीछे से सलौनी के चेहरे पर एक शरारती मुस्कान आ गयी, और अपने ही आप से बुद बुदाति हुई बोली…

लो एक गयी, अब दूसरी आ गयी, वाह भैया… क्या किस्मत पाई है तूने…!

उधर प्रिया जैसे ही हवेली के मेन गेट से बाहर आई, उसे कुछ दूर शंकर किसी शेर जैसी चाल से चलता हुआ खेतों की तरफ जाता दिखाई दिया…!

उसने अपनी गति और बढ़ा दी, वो इस समय एक लोंग स्कर्ट और टाइट सा कुर्ता पहने हुए थी, जिसमें दौड़ने की वजह से उसके 34 डी साइज़ के बूब्स उपर नीचे हो रहे थे…!

उसके मदमस्त यौवन को यूँ छलकते देख कर लोगों की नज़रें उस पर जम गयी.., कुछ देर में ही वो उसके अत्यंत नज़दीक पहुँच गयी, और पीछे से उनसे पुकारा – शंकर…, रूको…!

प्रिया की आवाज़ कानों में पड़ते ही वो वहीं रुक गया, मुड़कर पीछे देखा तो वो उसके पीछे दौड़ी चली आ रही थी, शंकर की नज़र उसकी हिलती हुई चुचियों पर जम गयी…!

वो उसके सामने जाकर अपने घुटनों पर हाथ रख कर झुक गयी, और लंबी-लंबी साँसें भरने लगी…

झुकने से उसके गोल-गोल दूधिया उभर कुर्ते के चौड़े गले से काफ़ी अंदर तक अपनी भौगौलिक स्थिति को दर्शाने लगे…,

उसकी एकदम गोल-गोल, मोटी और गोरी-चिटी चुचियों की छटा देखकर शंकर का लंड अपना सिर उठाने लगा, उसने उससे पुछा –

क्या हुआ दीदी, इस तरह से भागते हुए क्यों आ रही हो..?

प्रिया ने ऐसे ही झुके हुए ही अपना मुँह शंकर की तरफ उठाया, उसे अपने उभारों को ताकते हुए देख कर वो अंदर तक सिहर गयी, उसकी नज़रों का स्पर्श पाकर उसके निपल कड़क हो उठे…!

उसने मन ही मन मुस्कराते हुए कहा – मे तुम्हें ही ढूँढ रही थी, कहाँ जा रहे हो…?

शंकर – क्यों .. कोई काम था मुझसे…?

वो सीधी खड़ी हुई, और हल्की सी मुस्कान के साथ उसने उसका हाथ पकड़ा और बोली – चलो मेरे साथ, तुमसे मुझे कुच्छ बात करनी है, मेरी जान बचाने के बाद तो तुम दिखे ही नही…!

वो उसके पीछे-पीछे वापस हवेली के अंदर चल दिया…!

प्रिया उसकी हवेली के अंदर ले जाने की वजाय, अपनी तीन मंज़िला हवेली की छत पर ले गयी, जहाँ एक लंबा-चौड़ा तखत पड़ा हुआ था, उसने उसे उसपर बिठाया, और खुद उसके बगल में बैठ गयी…!

अभी भी उसकी साँसें फूली हुई थी, जिससे उसके वक्ष अभी भी उपर नीचे हो रहे थे…!

शंकर ने उसके सुर्ख पड़ चुके चेहरे पर नज़र जमाकर कहा – हां दीदी, बोलिए क्या बातें करनी थी आपको मुझसे…?

प्रिया ने बड़े प्यार से शंकर का हाथ अपने हाथ में लिया, और उसे दूसरे हाथ से सहलाते हुए बोली – तुमने मेरी जान बचाकर बहुत बड़ा अहसान किया है शंकर,

मे आज तक दूसरे नौकरों की तरह तुम्हें और तुम्हारी माँ को बुरा भला बोलती रहती थी, इसके बबजूद भी तुमने अपनी जान जोखिम में डालकर मुझे बचाया…

उसके लिए मे तुम्हें थॅंक्स भी नही कह पाई, हो सके तो मेरी ग़लतियों के लिए मुझे माफ़ कर देना मेरे भाई, ये कहकर उसने अपना सिर उसके कंधे से टिका लिया !

शंकर तो बस मूक्दर्शक बना उसके सुंदर गोल-मटोल चेहरे को ही निहारे जा रहा था, उसकी बात सुनकर उसने अपना दूसरा हाथ उसके हाथों पर रखा और शालीनता भरे स्वर में बोला –

ये तो मेरा फ़र्ज़ था दीदी, और आपकी वो डाँट-डपट एक मालकिन की थी अपने नौकर के लिए, इसमें आपको माफी माँगने की कोई ज़रूरत नही है…!

आप सच मानो, मेने आपकी बात का कभी बुरा नही माना, क्योंकि मे अपनी हैसियत से बफ़िक हूँ…!

प्रिया उसके और नज़दीक खिसक गयी, अब दोनो की जांघें आपस में जुड़ चुकी थी, फिर उसने झिझकते हुए शंकर के गाल पर एक किस कर लिया, और खुद ही शर्म से नज़रें नीची करके बोली –

आज मेरी नज़रों में तुम्हारी हैसियत बहुत बढ़ गयी है शंकर, बहुत उँचा कद हो गया है तुम्हारा.., हो सके तो मेरी पुरानी ग़लतियों को भूलकर मुझे माफ़ कर देना…!

अपने गाल पर प्रिया के सुर्ख होंठों का स्पर्श पाकर शंकर का शरीर अंदर तक झन-झना गया, वो उसके चेहरे पर अपनी नज़रें जमाए बोला –

प्लीज़ दीदी, अब आप यूँ बार-बार मुझसे माफी मत मांगिए, मेरे दिल में आपके लिए कभी कोई दुश्विचार नही थे…!

ये कहकर शंकर अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ, और बोला – आप अपना ख्याल रखिए, मे चलता हूँ…!

प्रिया ने उसका हाथ पकड़ लिया, शंकर ने पलट कर उसकी तरफ देखा, वो भी उसके सामने अपनी नज़रें झुकाए खड़ी थी, अपनी तेज-तेज चलती साँसों पर काबू पाने की कोशिश करते हुए बोली –

कल में अपने घर जा रही हूँ, क्या तुम मेरे यहाँ घूमने आओगे…?

मालिक की अग्या मिल गयी तो ज़रूर आउन्गा.., ये कहकर वो वहाँ से चला गया, पीछे प्रिया उसे जाते हुए देखती रही…! वो उसकी मर्दानगी पर मर मिटी थी,

दूसरे दिन प्रिया अपने घर के लिए विदा हो गयी, सुप्रिया ने कुछ दिन रहने का फ़ैसला लिया, और उसने अपनी बेहन के साथ जाने से मना कर दिया…!

उन दोनो की ससुराल एक ही शहर में हैं, दोनो के घर भी एक दूसरे से ज़्यादा दूरी पर नही है,

प्रिया अपनी खुद की गाड़ी से आई थी ड्राइवर के साथ और सुप्रिया भी उसी के साथ आई थी…

जाने से पहले प्रिया ने अपने पिताजी से कहा – पिताजी, सुप्रिया को अकेला मत भेजना, शंकर उसे छोड़ने चला जाएगा, इसी बहाने मेरा घर भी देख लेगा, क्योंकि वो अब इतना ज़िम्मेदार हो गया है कि सबका ख़याल रख सके, तो उसका आना-जाना भी लगा ही रहेगा…!

लाला जी को अपनी बेटी की बात जँची, उन्हें शंकर की क्षमताओं पर अटूट विश्वास होता जा रहा था…, वहीं अपने सगे बेटे कल्लू पर से उठता जा रहा था…!

कल्लू की हरकतों से दिनो-दिन वो खीजते जा रहे थे, अब उन्हें सुषमा का फ़ैसला सही लगने लगा था, और दिल से वो सुषमा को ये ज़िम्मेदारी सौंपने को तैयार हो गये…!

उन्होने वकील को बुलाकर सारे दस्तावेज़ पर साइन करके, अपनी सारी मिल्कियत की मालिक सुषमा को बना दिया, और खुद ने उसके रख रखाब का जिम्मा जैसे पहले था ज्यों का त्यों ही रहने दिया…!

 
वसीयत में ये भी लिखा गया, कि अगर भविष्य में कल्लू से कोई और संतान किसी भी पत्नी से पैदा होती है तो वो उनकी मिल्कियत की हिस्सेदार होगी…!

सुषमा के सारी मिल्कियत की मालिक बन’ने से रंगीली ने अपना पहला दाँव चल दिया था…!

अब सुषमा के साथ-साथ सुप्रिया भी शंकर के लंड की गुलाम बन चुकी थी, दोनो भाभी ननद मौका लगते ही उसके लंड का स्वाद लेने से नही चूकती थी..,

एक रात, सुप्रिया को नींद नही आ रही थी, वो उठकर थोड़ा टहलने के लिए अपने कमरे से बाहर आई…!

उसका कमरा भी सुषमा वाले पोर्षन में ही था, गॅलरी से गुज़रते हुए वो खुले चौक में आ रही थी…!

जैसे ही वो सुषमा के बेडरूम के पास से गुज़री, तो उसे अपनी भाभी के कमरे से मादक सिसकियों की आवाज़ें सुनाई दी…!

उसने सोचा भाभी-भैया दोनो चुदाई कर रहे होंगे.., कौतूहल वश वो वहीं खड़े होकर उनकी चुदाई की बातें सुनने लगी…

तभी उसके कान में सुषमा की मादक कराह सुनाई दी.., आअहह…शंकर मेरे राजा… धीरे, एक साथ मत डाला करो.., वरना तुम्हारे बच्चे को चोट लग जाएगी..

ये शब्द सुनकर सुप्रिया के कान खड़े हो गये, और उसके मन में उनकी चुदाई को देखने की इच्छा होने लगी…!

वो साइड से उनकी खिड़की पर कान लगाकर सुनने की कोशिश में खड़ी हो गयी, उसकी कनपटी के दबाब से खिड़की का एक पाट जो पहले से ही केवल ढालका हुआ था हल्का सा खुल गया, और उसमें देखने लायक जगह बन गयी…!

सुप्रिया के मन की मुराद पूरी हो गयी, और अपनी आँखें उसने उस जगह जमा दी…!

कमरे में शंकर और उसकी भाभी दोनो निर्वस्त्र अवस्था में चुदाई में लीन थे,

शंकर उसकी भाभी को घोड़ी बनाकर पीछे से धक्के मारते हुए उसकी चुचियों को बुरी तरह मसलता जा रहा था…!

सुषमा की सिसकियों ने कमरे का वातावरण गरम कर रखा था…, ये देख कर सुप्रिया की चूत में सुर-सुराहट होने लगी…!

वो अपने नाइट सूट के पाजामे के उपर से ही अपनी चूत को सहलाने लगी…!

आहह…शंकर, मेरे राजकुमार…, मे तो गयीइ…आहह…बस करो…, आयईयी…थोड़ा सा तो रुकू मेरे राजा…, सुषमा उससे मन्नत सी करते हुए बोली..

शंकर ने ना चाहते हुए अपना सोट जैसा लंड उसकी चूत से बाहर निकाल लिया…

पूरा खड़ा किसी मोटे खूँटे जैसा सुषमा के काम रस से भीगा हुआ लंड देख कर सुप्रिया की चूत खड़े खड़े ही टपकने लगी.., वो मन ही मन बुदबुदाई…!

सच में कितना मस्त लंड है शंकर का, इसका मतलब भाभी का गर्भ भी शंकर के लंड से ही है.., ये सोचकर उसका शरीर उत्तेजना से भर उठा, वो मन ही मन मुस्कुरा उठी,

अपने आप में ही बुदबुदाते हुए बोली - आअहह…भाभी, जल्दी ही मे भी तुम्हारी तरह अपने शंकर के बच्चे की माँ बनूँगी…उउउंम्म…ये कहकर उसने पाजामे की एलास्टिक में हाथ डालकर अपनी चूत को अपनी उंगली से कुरेद दिया…!

तभी शंकर, सुषमा को लिटाकर उसकी चूत चाटने लगा, थोड़ी सी देर में ही उसकी सिसकियाँ कमरे में फिर से गूंजने लगी..,

अब वो शंकर के उपर बैठकर कूद रही थी.., शंकर के नीचे से ही धक्कों की स्पीड देख कर सुप्रिया की साँसें चढ़ गयी, वो अपनी आँखें फाडे शंकर की चुदाई में खो गयी…!

आख़िरकार शंकर ने भी अपने वीर्य से सुषमा की ओखली को भर दिया और उसे अपने सीने से चिपका लिया…!

सुषमा उसकी चौड़ी छाती से चिपक कर किसी बच्ची की तरह उसके उपर लेटी अपनी साँसों को इकट्ठा करती रही…!

सुप्रिया को उसका बलिष्ठ शरीर किसी देव-पुरुष जैसा लग रहा था, वो इतनी ज़्यादा उत्तेजित हो चुकी थी, कि अगर उसे इसी समय शंकर का लंड नही मिला तो वो पागल हो जाएगी…!

उसने मन ही मन कुछ फ़ैसला लिया, और सुषमा के दरवाजे पर जाकर हल्के से दस्तक दी…!

अपनी चुदाई की खुमारी में तृप्त दो बदन दरवाजे पर दस्तक सुनकर चोंक पड़े, सुषमा ने शंकर को चादर ओढ़ने के लिए बोला, और खुद एक गाउन पहन कर दरवाजे की तरफ बढ़ी…!

वो सोच रही थी, इस तरह की दस्तक तो रंगीली काकी ही देती हैं, वो इस वक़्त यहाँ आएँगी नही, तो फिर कॉन हो सकता है..? ये सोचते-सोचते उसने दवाजा खोल दिया…!

सामने अपनी छोटी ननद को देख कर वो एकदम से चोंक पड़ी, और उसकी तरफ प्रश्नवाचक नज़रों से देखते हुए बोली – अरे सुप्रिया तुम..? इस वक़्त यहाँ कैसे..? कोई काम था..?

सुप्रिया मुस्कराते हुए बोली – अरे..अरे..भाभी, इतने सारे सवाल, वो भी एक साथ, अंदर तो चलो बताती हूँ, पर लगता है, मेने आपको ग़लत टाइम पर डिस्टर्ब कर दिया है,, क्यों..?

सुषमा झेन्प्ते हुए.. नही नही, ऐसी बात नही है, वो मे,.. वो तुम्हें इतनी रात गये यहाँ देखा तो पुछा…

सुप्रिया कमरे के अंदर घुसने लगी, ये देख कर सुषमा की हालत खराब होने लगी, वो उसके आगे खड़ी होते हुए बोली – अरे कोई काम हो तो सुबह बता देना, अभी मुझे बहुत जोरों की नींद आ रही है…

ये कहकर उसने जानबूझकर एक लंबी सी जमहाई लेते हुए अंगड़ाई ली…!

सुप्रिया उसके बगल से निकल कर पलंग की तरफ बढ़ते हुए बोली – अरे भाभी , मुझे नींद नही आ रही थी,

आपके कमरे से कुछ आवाज़ सुनाई दी, सोचा थोड़ा बहुत आपके साथ बैठकर टाइम पास कर लूँ, लेकिन आप तो लगता है मेरे आने से आप खुश नही हो, मुझे अंदर ही आने नही दे रही…!

सुषमा ने पलटकर उसकी बाजू थाम ली, और बोली – सच में मुझे बहुत जोरों की नींद आरहि है ननद रानी और कोई वजह नही है, अब जाओ प्लीज़…!

सुप्रिया ने उसके कान में फुसफुसा कर कर कहा – आप चिंता मत करो भाभी, मे किसी को कुछ बताने वाली नही हूँ…!

उसकी बात सुनकर सुषमा को बड़ा ज़ोर का झटका लगा, वो चोन्क्ते हुए बोली – तुम कहना क्या चाहती हो..? किसी को क्या बताने वाली नही हो..?

सुप्रिया अपनी मुस्कान को बरकरार रखते हुए बोली – वही, जो कुछ देर पहले आपके कमरे में हो रहा था…!

हम दोनो एक ही किश्ती में सवार हैं भाभी, बस फरक इतना है कि आप जो चाहती थी वो मिल गया है, मे अभी वो पाने की कोशिश कर रही हूँ…!

सुषमा मुँह बाए उसी को देख रही थी, सुप्रिया ने आगे कहा – अब यहीं खड़े होकर किसी और के आने का इंतेज़ार मत करो, जल्दी से गेट बंद करदो, मुझे पता है, पलंग पर चादर के नीचे शंकर है…

ये कहकर वो उस खिड़की को अच्छे से बंद करते हुए बोली – इस खिड़की का भी ध्यान रखा करो, किसी दिन आपका भंडा फोड़ देगी…!

सुषमा चूतियों सा मुँह फाडे गेट बंद करने लगी, इतने में सुप्रिया खिड़की लॉक करके पलंग पर जा बैठी, और उसने चादर हटाकर शंकर को नंगा कर दिया…!

फिर उसकी चौड़ी छाती को चूमते हुए बोली – कितना मज़ा देते हो तुम, भाभी की चुदाई देख कर मुझसे रहा नही गया, आना ही पड़ा वरना मे आज रात सो ही नही पाती…!

ये कहकर वो दोनो एक दूसरे के होंठ चूसने लगे, सुषमा अभी भी कुछ ना समझ पाने की स्थिति में पलंग के नीचे ही खड़ी थी…!

शंकर ने बाजू से पकड़ कर उसे भी पलंग पर खींच लिया, सुप्रिया ने उसका गाउन निकाल फेंका और वो शंकर को छोड़कर उसके होंठों पर टूट पड़ी…!

सुषमा की झिझक देख कर वो बोली – बातें बाद में करेंगे भाभी, पहले मज़े करने दो, क्यों मेरे राजा जी…,

शंकर ने उसकी नाइट सूट के टॉप को उतारकर उसकी चुचियों को मसल्ते हुए कहा – एकदम सही मेरी मेरी जान, पहले मज़े लो बातें बाद में…

फिर क्या था, सुषमा भी उन दोनो के साथ फिर से शामिल हो गयी, और वो तीनों एक साथ मिलकर एक ही पलंग पर खाट कबड्डी खेलने में जुट गये….!

आज बेचारे पलंग की तो शामत ही आ गई, सारी रात धक्कों की मचक झेलते-झेलते उसके सारे अंजर-पंजर ढीले पड़ गये…, गनीमत रही कि वो धराशयाई नही हुआ बस….!

शंकर कभी सुप्रिया की सवारी करता तो कभी सुषमा की, दोनो घोड़ियाँ भी रात भर उसके मूसल जैसे लंड की सवारी से हिन-हिनाती रही…!

शंकर उन दोनो को जमकर छोड़-चढ़ कर 4 बजे के करीब अपने घर चला गया, तब सुषमा ने अपनी ननद से पुछा-

ननद रानी अब बोलो, तुम्हारा कब्से शंकर के साथ चक्कर चल रहा है..?

 
सुप्रिया – बस भाभी जिस दिन उसने प्रिया दीदी की जान बचाई थी…, फिर वो उसे सारी बातें डीटेल में बताती चली गयी और ये भी कि वो क्यों उसने शंकर से संबंध बनाए है..

सुषमा के बच्चे का राज तो सुप्रिया के लिए अब राज नही रहा था, सो उसने कहा –

भाभी मेरी तो मजबूरी ये है कि मेरा पति गान्डु है, उसे अपनी गान्ड की खुजली मिटाने को ही किसी का लंड चाहिए…

लेकिन आपके सामने कोन्सि मजबूरी है जो आपने शंकर का अंश अपने पेट मे पाल रखा है…!

सुषमा ने बड़ी गहरी नज़रों से उसे घूरा और बोली – क्या बता सकती हो तुम्हारे भैया का दूसरा ब्याह क्यों हुआ था…?

सुप्रिया – हां ! ताकि इस घर को वारिस मिल सके…!

सुषमा – फिर भी क्यों नही मिला, तुम्हारी छोटी भाभी अभी तक प्रेग्नेंट क्यों नही हुई, और मे ही दोबारा कैसे माँ बन गयी, जबकि मे तो इस काबिल थी ही नही..

सुप्रिया – आपका कहने का मतलब कल्लू भैया….???

सुषमा – तुम ठीक समझी, तुम्हारे कल्लू भैया भी अब नपुंसक हो चुके हैं, अपनी ग़लत आदतों की वजह से..,

वो तो शुरुआत में ही ना जाने कैसे गौरी मेरे पेट में आ गयी…, वरना वो भी नही हो पाती अगर कुछ दिन और लेट करते तो.…!

सुप्रिया – सच में भाभी, हम दोनो एक ही नाव में सवार हैं, भला हो शंकर का जो निस्वार्थ हमारी इच्छाओं का मान करते हुए अपने जीवन को दाव पर लगा रहा है…

सुप्रिया – उस दिन से जब उसने सांड़ को पटखनी दी थी, उसके ठीक पहले हम दोनो गन्ने के खेत में ही थे, तभी मेने उसे अपने मन की बात कही थी…

फिर जब मे उसके हाल-चाल जानने गयी, तो रंगीली काकी ने हम दोनो को अकेला छोड़ दिया और खुद सलौनी को लेकर वहाँ से चली गयी…, एक तरह से रंगीली काकी ने ही हमारा मिलन कराया..

वैसे भाभी मे उसे बचपन से ही चाहती हूँ, लेकिन कम उम्र होने की वजह से मेरी शादी से पहले बस मे उसे दिल ही दिल में पसंद करती थी…

सुषमा – सच में रंगीली काकी हम दोनो के लिए देवी स्वरूपा हैं, उनका बेटा तो हीरा है हीरा, अपनी माँ की इच्छा के विरूद्ध कोई काम नही करता…!

सुप्रिया – सच कह रही हो भाभी, वो दोनो माँ-बेटे ही हमारे लिए वरदान स्वरूप हैं, वरना ना जाने इस जीवन में मे कभी नारी सुख भी ले पाती या नही…!

सुषमा – वैसे तुम्हें क्या उम्मीद लगती है, अपने गर्भ को लेकर..?

सुप्रिया – शायद आ भी गया हो, क्योंकि यहाँ आने से एक हफ्ते पहले ही मेरे पीरियड्स ख़तम हुए थे.., अब तो वो डेट भी आ गयी है शायद कल या परसों की है…

अगर पीरियड्स नही आए तो समझो मेरा भी बेड़ा पार हो ही जाएगा आपकी तरह…!

सुषमा ने उसके बाजू पकड़ कर उसे अपने सीने से लिपटा लिया और रुँधे स्वर में बोली - ईश्वर करे तुम्हारी गोद भी जल्दी भर जाए…, कम से कम जीवन काटने के लिए कुछ तो सहारा हो…!

लेकिन ननद रानी जैसे ही ये बात कन्फर्म हो जाए, फ़ौरन यहाँ से रवानगी डाल देना, जिससे तुम्हारे घर वालों को कोई शक़ सूबा ना हो…!

सुप्रिया – मे भी यही सोच रही थी, दो दिन में अगर नही आया, तो मे शंकर को लेकर चली जाउन्गि…!

सुषमा ने गहरी नज़र से उसको घूरते हुए कहा – शंकर को क्यों..? उसको हमेशा के लिए साथ रखने का इरादा है क्या…? ये कहकर मुस्कराते हुए उसने उसको चिकोटी काट ली…

सुप्रिया खिल-खिलाते हुए बोली – अरे नही भाभी, वो प्रिया दीदी पिताजी से बोलकर गयी है, कि मेरे साथ शंकर को भेज देना, वो उसके घर भी घूम आएगा..!

सुषमा मुस्कराते हुए बोली – लगता है बड़ी ननद रानी की चूत भी गीली हो गयी होगी हमारे गबरू शेर को देख कर.., इस बात पर वो दोनो खिल-खिलाकर कर हँसने लगी…

फिर सुप्रिया भी अपने कमरे में आ गई, उस दिन वो दोनो ही दोपहर तक सोती रही !

उसी दिन दोपहर का काम ख़तम करके रंगीली अपने घर में लेटी हुई थी, सलौनी अभी स्कूल से नही आई थी, शंकर और रामू खेतों पर ही थे…

तभी लाजो वहाँ आ धमकी, रंगीली ने वकायदा आदर के साथ उसे बिठाया…

लाजो सकुचती हुई उससे बोली – काकी, आपके कहने से मेने पिताजी से भी अपने नाजायज़ संबंध बना लिए, लेकिन दो साल के बाद भी कोई फ़ायदा नही हुआ..,

रंगीली ने मन ही मन मुस्कराते हुए कहा – हो सकता है उनकी अब उमर हो गयी है, तो शायद अब वो आपको बच्चा देने में असमर्थ होंगे…,

आपने कल्लू भैया के साथ सोना बंद कर दिया है क्या..?

लाजो – नही तो, मे तो अब ज़्यादातर उनके साथ ही सोती हूँ, लेकिन उनसे भी कुछ नही हो पा रहा.., वो तो अब भी मुझे अधूरा ही छोड़ देते हैं…!

रंगीली – फिर बड़ी बहू उम्मीद से कैसे हो गयी…?

लाजो – यही तो मेरी समझ में नही आ रहा है…?

रंगीली – बुरा ना मानो तो एक बात कहूँ छोटी बहू..! मुझे लगता है, तुम कुछ ज़्यादा ही गरम औरत हो,

जल्दी से तुम्हारा रज नही छूटता होगा, और जबतक छूट’ता होगा तब तक पुरुष के कीड़े ख़तम हो जाते होंगे…!

लाजो – क्या ऐसा भी होता है..?

रंगीली – अब मेने तो अपने गाओं में बड़ी-बुढ़ियों से यही सुना था…!

लाजो – एक बार शंकर भैया के साथ कोशिश करके देखूं तो…?

रंगीली ने थोड़ा तल्ख़ लहजे में कहा – देखो छोटी बहू, हम नौकर हैं तो इसका मतलब ये नही है, कि तुम्हारी कोई भी जायज़-नाजायज़ बात मान लेंगे…!

मे पहले भी कह चुकी हूँ, मेरे बेटे से अलग ही रहो, वो नादान है अच्छे-बुरे की पहचान नही है उसे, मे अपने बेटे को किसी मुसीबत में नही डाल सकती…!

मेरे जीवन का एकमात्र सहारा है मेरा बेटा, मे उसे खोना नही चाहती, मालिक को या किसी को भनक भी लग गयी, तो वो उसको सूली पर लटका देंगे..,

लाजो मायूस होकर बोली – तो फिर मे क्या करूँ..?

रंगीली – किसी जानकार को दिखा क्यों नही लेती, शायद कोई उपचार हो इसका..?

लाजो – आप जानती हैं किसी को…?

रंगीली – पता लगा सकती हूँ, कई औरत होती हैं जो इन बातों की जानकारी होती है उन्हें..,

लाजो – तो आप जल्दी से पता करके बताइए ना काकी, मेरी भी गोद सुनी ना रहे…!

रंगीली – भगवान करे आपको भी एक चाँद सा बेटा हो, मेरी तो यही इच्छा है..!

उसको सांत्वना देकर रंगीली ने उसे विदा किया, जब वो चली गयी तो पीछे से उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान आ गई, जिसका मतलब निकालना हर किसी के बस की बात नही थी…..!

दो दिन तक भी सुप्रिया को पीरियड्स नही आए सो उसने अपने माता-पिता को अपने लौटने के बारे में कहा – लाला जी ने शंकर को बुलाकर अपनी बेटी के साथ जाने के लिए कहा जो उसने अपनी माँ के उपर छोड़ दिया…!

रंगीली को इसमें भला क्या एतराज हो सकता था, उसे तो अपने बेटे को हर तरह से दुनियादारी सिखानी थी,

कहीं आएगा-जाएगा तो कुछ नया जानने को ही मिलेगा सो उसने सहर्ष अपनी स्वीकृति दे दी…

तीसरे दिन हसी-खुशी वो शंकर को लेकर अपनी ससुराल के लिए निकल पड़ी… जहाँ देखते हैं क्या-क्या धमाल मचाने वाला है अपना बब्बर शेर….! || रंगीली का शंकर ||

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घर से स्टेशन तक लाला जी की बग्घी ने पहुँचा दिया, वहाँ से लोकल ट्रेन से जाना था, 70-80 किमी की दूरी ये ट्रेन घूम फिरकर 4-5 घंटे लगाती थी…

ट्रेन में ज़्यादा भीड़ भाड़ नही थी, नौकरों की मदद से सब समान अच्छे से एक खाली से कूपे में रखवा दिया, और वो दोनो प्रेमी एक खाली सीट पर बैठ गये…!

गाड़ी के चलते ही सुप्रिया, शंकर के सीने पर अपना सिर टिका कर बैठ गयी.., वो उसके चौड़े कसरती सीने को चूमकर उसे सहलाते हुए बोली –

थॅंक यू शंकर अपना पहला वादा पूरा करने के लिए…

शंकर ने प्रश्नवचक निगाहों से उसकी तरफ देखा, तो वो बोली – मे तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ,

भाभी के बाद मुझे अपना प्यार देकर तुमने दो ज़िंदगियों को बर्बाद होने से बचा लिया, मे तुम्हारा ये अहसान कभी नही उतार पाउन्गि मेरे प्यारे…

कूपे के उस भाग में उन दोनो के अलावा और कोई भी नही था, सो बिंदास शंकर ने उसे उठाकर अपनी गोद में बिठा लिया, और उसके होंठों को चूमते हुए बोला –

अहसान चुकवाने के लिए नही किए जाते मेरी जान, दिल की आवाज़ सुनकर किए गये फ़ैसले निस्वार्थ होते हैं, मेने तुम्हारे उपर कोई अहसान नही किया है, तुम इसकी हक़दार थी…!

किसी का हक़ मारने वाला मे कॉन होता हूँ.., फिर तुम तो मेरे बचपन की यादों की अमिट कहानी हो जिसे मे कभी भुला नही सकता…!

सुप्रिया – सच ! क्या तुम भी मुझे चाहते थे बचपन में…?

शंकर – पता नही वो क्या था ? चाहत थी या प्यार, लेकिन जबसे मे थोड़ा बहुत संबंधों को समझने लगा, अपनी माँ और बेहन के अलावा कोई मुझे अपना सा लगता था तो वो तुम थी…!

फिर वो अपनापन बढ़ता गया, और मुझे तुम्हें हर हाल में देखते रहने की लालसा होने लगी, जब तुम शादी होकर विदा हुई तो मे बहुत उदास हो गया,

मुझे लगा, जैसे मेरे अंदर से कोई चीज़ मुझसे दूर चली गयी हो, मेरी ये हालत बहुत दिनो तक रही, जिसे शायद मेरी माँ ने समझ लिया था,

फिर समय के साथ साथ यादें धूमिल होती गयी…!

लेकिन जैसे ही उस दिन तुम हवेली में आईं, ना जाने क्यों मेरे दिल की धड़कनें बढ़ गयी, चोर निगाहों से मेने तुम्हें देखने की कोशिश की,

जैसे ही तुमसे नज़र मिली, मुझे ऐसा लगा कि मेरा दिल उछल कर मेरे हाथ में आ गया हो…, तुम्हारी मुस्कान देख कर मुझे बहुत सकुन मिला…!

सुप्रिया किसी पत्थर की मूरत बनी शंकर की बातों में खो गयी थी, उसकी बात ख़तम होते ही, वो उसके बदन से लिपट कर सुबकने लगी..,

ये उम्र, समाज, उन्च-नीच के बंधन क्यों होते हैं शंकर…? अब हम कभी जुदा नही होंगे, मे तुम्हें अब वापस नही आने दूँगी,

अपने घर से ढेर सारा पैसा लेकर हम कहीं दूर चले जाएगे, जहाँ हम तीनों के अलावा और कोई हमें रोकने – टोकने वाला ना हो…!

शंकर ने उसकी ठोडी के नीचे हाथ लगाकर उसके चेहरे को उपर किया, और उसकी आँखों में झाँकते हुए बोला –

तुम्हारा प्यार इतना स्वार्थी कैसे हो सकता है मेरी जान..? जानती हो उसके बाद क्या होगा…?

तुम्हारा पति ज़िल्लत की वजह से मौत को अपने गले लगा लेगा, मलिक मेरे परिवार को मिट्टी में मिला देंगे…!

तो फिर मे क्या करूँ मेरे राजा.., मे अब तुम्हारे बिना नही रह पाउन्गि, तुम्हारी जुदाई नही सह पाउन्गि मे…!

शंकर – मेने तुम्हें वादा किया है, जब भी मेरी ज़रूरत पड़े, हाज़िर हो जाउन्गा..., अब अपनों की भलाई के लिए इतना बलिदान तो करना ही पड़ेगा जान..!

ओह्ह्ह…शंकर..! तुम सबके बारे में कितना सोचते हो, ये कहकर वो उसके होंठों को चूसने लगी, शंकर भी उसका साथ देने लगा…!

दोनो के शरीर गरम होने लगे, लेकिन इससे ज़्यादा लोकल ट्रेन के कूपे में कुछ नही हो सकता था…!

कहते हैं, आदमी की अच्छाई या बुराई, हमेशा उसके चार कदम आगे चलती है,

सुप्रिया की ससुराल में उनके पहुँचने से पहले ही ये बात पहुँच गयी कि कैसे हवेली के एक नौकर ने प्रिया की जान एक सांड़ से अकेले टक्कर लेकर बचाई…!

जब प्रिया को पता चला कि आज शंकर उसकी छोटी बेहन को साथ लेकर आरहा है, तो वो उसके पूरे परिवार के साथ उसके घर पहुँच गयी…!

सुप्रिया की ससुराल में दोनो परिवारों ने शंकर का भव्य स्वागत किया.., वो बेचारा गाओं का नादान छोरा,

जो आज भी एक खड़ी की कमीज़ और ढीले-ढाले से पॅंट में, गले में लाल रंग की स्वाफी (कॉटन तौलिया) डाले उसके घर की भव्यता देख कर भौचक्का रह गया…!

ये तो उसके घर के बाहर के लॉन और उसकी पोर्च/ पार्किंग ही थी, जहाँ उसका फूल मालाओं से स्वागत किया जा रहा था,

प्रिया और उसके पति ने खुद आगे आकर उसको माला पहनकर स्वागत किया…!

फिर जैसे ही उसने उसके घर के अंदर कदम रखा, वो एक विशालकाय हॉल की भव्यता को देख कर पलकें झपकाना ही भूल गया,

चारों ओर घूम-घूम कर उसने उस हॉल का निरीक्षण किया, जिसके ठीक सामने ही किसी बहुत चौड़े रोड के बराबर की सीडीयाँ कुछ उपर तक जाती हुई, उसके बाद वो दो अलग-अलग दिशाओं में चली गयी…!

सीडीयों के दोनो तरफ बहुत ही सुंदर तरीक़े की सजावट वाली रेलिंग.., हॉल की छत तो मानो आसमान छू रही थी, जिसमें बीचो-बीच एक बहुत बड़ा फ़ानूस लटका हुआ, वो उसका नाम भी नही जानता होगा शायद…!

हॉल की भव्यता में खोया हुआ शंकर तब चोंका जब प्रिया ने उसके कंधे पर हाथ रखा,

प्रिया – क्या देख रहे हो शंकर…? चलो उस सोफे पर बैठो…!

वो उसकी बात समझा ही नही कि सोफा क्या होता है, जब वो उसका हाथ पकड़ कर उसे हॉल के बीचो- बीच एक गद्दी दार सोफे को देखा जिसे देख कर वो प्रिया की शकल देखने लगा…

प्रिया ने उसका हाथ पकड़ कर उसे सोफे पर बिठाया, उसे लगा मानो वो किसी जन्नत में आ गया हो, उसका पूरा पिच्छवाड़ा उस मुलायम सोफे की गद्दी में धँस गया…!

अपने दोनो तरफ हाथ रखकर वो उसे दबा-दबाकर देखने लगा, वाकी सभी लोग उसे देख कर मंद मंद मुस्करा रहे थे…

प्रिया भी उसके बाजू में बैठ गयी, तो उसने पुछा, आपका भी घर ऐसा ही है दीदी..?

प्रिया ने अपनी आँखों को छोटा करते हुए मुस्कुरा कर कहा – हां, बस थोडा सा इससे बड़ा है..!

शंकर चोन्क्ते हुए बोला – क्या..? इससे भी बड़ा…? उसने ये बात इतनी ज़ोर्से कही थी कि वहाँ पर मौजूद हर शख्स सुनकर हँसने लगा…!

खैर इतने बड़े घरानों में अपना इस तरह का स्वागत देख कर शंकर अपने अंदर गर्व महसूस कर रहा था…!

आज उसे अपनी माँ का वो त्याग और बलिदान याद आ रहा था, जो दिन-रात काम करके भी वो उसका ख़याल रखती थी, उसे इतना मजबूत बनाया था उसने,

जिसकी वजह से ही वो उस सांड़ से मुक़ाबला कर पाया था, और आज यहाँ इस घर में इतनी इज़्ज़त पा रहा था…!

फिर उसने सबसे उसका परिचय कराया, सुप्रिया की सास, ससुर उससे मिलकर बड़े खुश हुए, उसका पति श्याम, शक्ल से ही गान्डु टाइप, चिकना लंबे बाल, शर्मिला सा,

वहीं प्रिया का पति विवेक, शानदार व्यक्तित्व, लंबा-चौड़ा, चेहरे से ही एक बहुत बड़े बिज़्नेस मॅन जैसा रुआब.., उसके सास-ससुर और उसका पति शंकर से बहुत प्रभावित दिख रहे थे…

 
यहाँ आते आते शाम हो ही चुकी थी, प्रिया कल उसे लेने आने का बोलकर अपने परिवार के साथ अपने घर लौट गयी…

शंकर को सुप्रिया ने अपने पास वाले कमरे में ही ठहराया, उस रात खाने के बाद शंकर जल्दी ही सो गया,

वैसे भी गाओं में ज़्यादा देर तक कोई जागता नही है, लेकिन शहरों में 12 बजे से पहले सोते नही हैं…!

वो मुलायम गद्दे के बिस्तेर पर गहरी नींद में सोया हुआ था, तभी उसके कानों में चिड़ियाओं के चहचाने की आवाज़ सुनाई दी….,

कुछ देर वो नींद में ही कुन्मूनाता रहा, जब कुछ देर बाद फिर से वही आवाज़ सुनाई दी, उसने सोचा सबेरा हो गया, चिड़ियाँ चहचाने लगी..,

वो उठकर अपने पलग पर बैठ गया…!

तभी उसके गेट पर थप-थपाने की आवाज़ हुई…, उसने उठकर दरवाजा खोला, सामने सुप्रिया और उसके पति को देख कर वो चोंक पड़ा….!

गेट खुलते ही श्याम बोला – बहुत गहरी नींद में सोते हो शंकर, कब्से बेल बजा रहे हैं हम लोग…!

शंकर ने अंजान बनते हुए कहा – ये बैल यहाँ कहाँ से आ गये दीदी, वो तो खेतों में हल खींचते हैं नाके लिए होते हैं, बजाने के लिए तो नही सुना….!

सुप्रिया ने हँसते हुए कहा – अरे बुद्धू, वो तुमने चिड़ियों की आवाज़ सुनी थी…?

शंकर – हां, उसी आवाज़ से तो उठा हूँ,

सुप्रिया – ये इस कमरे की बेल माने घंटी, पढ़ा नही क्या.., वो ऐसे बजती है देखो.., ये कहकर उसने गेट के बाजू में लगे बिजली के स्विच को दबा कर बेल बाजाई,

कमरे में कहीं चिड़ियाँ सी चहकि, तब जाकर शंकर को समझ आया कि इस आवाज़ को सुनकर उसकी नींद खुली है…!

शंकर – तो सुवह हो गयी क्या…?

श्याम – सुवह..? अरे भाई अभी 11:30 हुए हैं, हम लोगों के सोने का टाइम अब हुआ है, और तुम सुवह होने की बात कर रहे हो,

शंकर – तो इतनी रात गये, आप लोगों ने मुझे क्यों जगाया…?

सुप्रिया – श्याम को तुमसे कुछ बात करनी थी, आओ हमारे साथ…

शंकर – कहाँ..?, उसने कहा – हमारे कमरे में, आओ तो सही…!

वो उनके पीछे पीछे उनके कमरे में आ गया…

कमरे में घुसते ही उसकी आँखें फटी रह गयी…

क्या कमरा था, खूब लंबा चौड़ा, सारी सुख सूबिधाओं से युक्त किसी 5 स्टार होटेल का सूयीट जैसा, (ये रीडर्स के लिए शंकर को नही पता 5 स्टार का सूयीट क्या होता है..)

कमरे में एक बहुत बड़ा सा पलंग, साइड में एक मिनी सोफा, सेंटर टेबल, सब कुच्छ था जो एक कपल को चाहिए…!

श्याम उसे लेकर सोफे पर बैठ गया.., और उसके हाथ को अपने हाथ में लेकर सहलाते हुए बोला…!

थॅंक यू शंकर, तुमने सुप्रिया को अपना प्यार देकर हम पर बहुत बड़ा अहसान किया है, उसने मुझे सब कुछ बता दिया है, उसे माँ बनाकर तो तुमने हमें बिन मोल खरीद लिया…!

शंकर श्याम के मुँह को ताकते ही रह गया, वो सोच रहा था कि ये शायद दुनिया का पहला पति है जो अपनी पत्नी को दूसरे से चुदवा कर उसका अहसान मान रहा है, उसके बच्चे को पाकर खुद को धन्य समझ रहा है…!

श्याम उसको सोच में डूबा देख कर बोला – मे जानता हूँ तुम क्या सोच रहे हो, लेकिन सच मानो दोस्त, तुमने मेरे लिए ये बहुत बड़ा काम किया है, मेरा जीवन बचा लिया तुमने…!

मुझे तुम दोनो के इस रिश्ते से बहुत खुशी हुई है, क्योंकि मे इसे एक पति का सुख देने के लायक ही नही हूँ, ऐसे में इस बेचारी पर ज़ुल्म क्यों किया जाए, इसलिए ये अपनी मर्ज़ी की मालिक है और इसके हर फ़ैसले में मे इसके साथ हूँ…

अब में कल ही अपने मम्मी पापा को इस बच्चे के बारे में खुश खबरी सुनाता हूँ, वो तो खुशी से झूम ही उठेंगे…!

श्याम की बात सुनकर सुप्रिया झुंझला उठी और खीजते हुए बोली – तुम हर बात अपनी गान्ड के हिसाब से ही सोचते हो क्या..?

श्याम ने उसकी तरफ आश्चर्य से देखा, वो आगे बोली – अरे चोदु राम ज़रा सोचो, अभी मुझे आए हुए एक रात भी नही हुई, और तुम उन्हें कल ही ये बात बताओगे, तो वो लोग क्या सोचेंगे..?

जिस बात को पता लगने में कम से कम 1 से 1.5 महीना लगता है वो 1 रात में कॉन मान लेगा…!

सुप्रिया की बात समझ में आते ही श्याम झेन्प्ते हुए बोला – ओह्ह.. सॉरी बेबी, तुम सही कहती हो, सच में मेरे अंदर इन सब बातों को समझने लायक दिमाग़ ही नही है…!

वो आगे बोला - खैर अब मेरी एक रिक्वेस्ट और पूरी करदो शंकर…, तुम एक बार मेरे सामने सुप्रिया के साथ सेक्स करो, मे देखना चाहता हूँ, तुम इसको कैसे चोदते हो…!

शंकर उसकी ये बात सुनकर बुरी तरह चोंक गया.., जब उसने बहुत देर तक कोई रेस्पॉन्स नही दिया, तो श्याम ने उसका हाथ पकड़कर उसे पलंग पर ले आया जहाँ सुप्रिया एक मिनी गाउन में अपने घुटने मोड़ कर बैठी थी…!

शंकर को पलंग पर बिठाकर वो खुद सोफे पर आकर बैठ गया, सुप्रिया पहल करते हुए वो शंकर की गोद में आकर बैठ गयी…

क्योंकि वो जानती थी कि शंकर कितना ही दिलेर और ताक़तवर सही, इतना बेगैरत नही है कि एक औरत को उसी के पति की आँखों के सामने चोद दे…!

उसकी गोद में बैठकर अपनी बाहें उसके गले में डाल दी, और उसके होंठों को चूमकर बोली – श्याम की इचा पूरी करो शंकर,

शंकर – लेकिन दीदी मे इनके सामने आपके साथ...कैसे……!

सुप्रिया ने फिर से अपने होंठ उसके मुँह से चिपका कर बोलने से रोक दिया, चूमने के बाद बोली – अब दीदी कहना बंद करो डार्लिंग, तुम मेरी जान हो, ये कहकर उसने अपना गाउन उतार कर फेंक दिया…

अब वो मात्र अपनी टाइनी सी ब्रा और पैंटी में ही थी, पैंटी जो पीछे से एक डोरी सी उसकी गान्ड की दरार में फँसी हुई थी, आगे से चूत को ढकने वाली जगह भी जालीदार थी…!

उसने शंकर की कमीज़ को भी निकाल दिया, और अपने बदन को उसके शरीर के साथ रगड़ते हुए उसे उकसाते हुए बोली – कम ऑन राजा.., दिखा दो अपने लंड की ताक़त मेरे गान्डु पति को…!

इतना ही नही उसने उसे धक्का देकर पलंग पर लिटा दिया, और उसके पाजामे को भी उसके बदन से अलग करके उसके अंडरवेर के उपर से ही उसके आधे खड़े लंड को मसल्ने लगी…

 
अभी तक शंकर ने अपनी तरफ से कोई पहल नही की, वो बस सुप्रिया की हरकतों को देखे जा रहा था…!

सुप्रिया उसके उपर लेट गयी, अपनी छोटी-छोटी चुचियों को ब्रा के उपर से ही शंकर की कठोर छाती से रगड़ती हुई उसके होंठों को चूसने लगी..,

जब फिर भी उसने अपनी तरफ से कोई रिक्षन नही दिया, तो वो उसकी आँखों में झाँक कर बोली – क्या अपनी रानी की प्यास नही बुझाओगे मेरे राजा…?

शंकर ने पहली बार उसकी बात का जबाब देते हुए कहा – मुझे इतना बेगैरत मत बनाओ सुप्रिया, मे तुम्हारे पति के सामने तुम्हारी प्यास नही बुझा सकता…!

शंकर की बात सुनकर उसने श्याम से कहा – वेल श्याम.., तुम ज़रा दूसरे रूम चले जाओ प्लीज़..!

श्याम – बट डार्लिंग, मे तुम दोनो को सेक्स करते हुए देखना चाहता था,

सुप्रिया ने उसकी तरफ आँख मारते हुए इशारा किया और बोली – तुम्हारी ये इच्छा फिर कभी पूरी कर देंगे, अभी तुम जाओ यहाँ से…!

श्याम उसका इशारा समझ कर शंकर वाले रूम में जाते हुए बोला – ओके, यू एंजाय सेक्स…!

जाते-जाते वो दरवाजे को थोड़ा सा खुला छोड़ कर बाहर निकल गया…! शंकर उनकी चाल को भली भाँति समझ गया था,

लेकिन फिर भी वो एक अंजान दीवार बनाना चाहता था.., छुपकर कोई भी देखे उससे उसको कोई फरक नही पड़ता.., लेकिन सामने किसी को तमाशबीन बनकर वो अपने पौरुष को नही दिखाना चाहता था…!

श्याम के कमरे से बाहर जाते ही शंकर ने सुप्रिया को पलट कर अपने नीचे ले लिया, और उसके होंठों पर टूट पड़ा..,

दो सेकेंड में ही उसका लंड खूँटे की तरह अकड़कर खड़ा हो गया, जो अब किसी भी कठोर से कठोर ज़मीन को चीर कर उसमें छेद कर सकता था…!

उसने सुप्रिया की ब्रा को खींचकर उसके गोरे बदन से अलग कर दिया, और उसकी चुचियों को मसल्ते हुए उसके निप्प्लो को मरोड़ दिया…!

सुप्रिया उसके अटॅक से बुरी तरह बिल-बिला उठी, लंबी-लंबी सिसकियाँ लेते हुए उसकी चूत का रस पैंटी की जाली से छन-छन कर रिसने लगा..!

वो उसके बदन के नीचे से किसी मछलि की तरह फिसलकर बाहर आ गई, और उसके अंडरवेर को भी निकाल फेंका…

औंधे मुँह पड़े शंकर के कसरती कठोर कुल्हों पर बैठकर अपनी चूत को रगड़ते हुए वो उसकी पीठ पर सवार हो गयी…और उसकी पीठ पर अपनी चुचियों को रगड़ते हुए उसने शंकर के कंधे पर अपने दाँत गढ़ा दिए…!

शंकर आहह..भरते हुए पलट गया, जिससे वो उसके बाजू में लुढ़क गयी, उसने पलटी खाते हुए फिर से सुप्रिया के नाज़ुक बदन को अपने नीचे ले लिया, और उसकी चुचियों को बुरी तरह से मसल्ने और चूसने लगा…!

आअहह…..शंकरर्र…..मेरि…जाअंन्न….सस्सिईईई….चुसूओ…रजाअ… खा..जाऊ..इनको…बहुत सताते हैं…यी…,

कमरे का वातावरण इतना कामुक हो चुका था, कि बाहर खड़ा श्याम ये सब देखकर हैरान रह गया…,

उसने कभी सपने में भी नही सोचा था कि उसकी नाज़ुक सी दिखने वाली पत्नी, इस खेल में इतना सब कुछ कर सकती है…

जब उसकी नज़र शंकर के फन्फनाते हुए नाग पर पड़ी, जिसे देखकर उसकी गान्ड में चिंतियाँ सी रेंगने लगी,

अपनी गान्ड की खुजली के वशीभूत होकर उसने लोवर उतारकर अपनी गान्ड को पीछे उभार दिया, और अपनी दो उंगली एक साथ अपनी गान्ड में डाल ली…!

शंकर के लंड को देखकर श्याम का मन उसे चूसने का होने लगा, वो उसे अपनी गान्ड में फील करना चाहता था..,

उसने आज तक जितने भी लंड अपनी गान्ड में लिए थे वो इसके सामने बौने नज़र आने लगे…!

उधर शंकर ने अपने नाग का फन पकड़कर उसे सुप्रिया के मुँह में डाल दिया, वो उसे मुश्किल से आधे तक अपने मुँह में ले पा रही थी..,

बाहर खड़ा श्याम अपने होंठों पर जीभ फिरा कर अपनी लार टपका रहा था…

कुछ देर के बाद उसने अपना लंड सुप्रिया के मुँह से निकाल लिया, वो एकदम कड़क बबूल के डंडे की तरह उसकी लार से चमक रहा था…!

अब शंकर सुप्रिया की टाँगों के बीच आकर बैठ गया, उसने पैंटी के उपर से ही उसकी गीली चूत के सहलाया, और फिर उस छोटी सी गीली चूत को अपने बड़े से हाथ में भींच लिया…!

सुप्रिया बुरी तरह से सिसकती हुई उसकी कमर हवा में लहरा उठी…सस्स्सिईईई….. आआहह…म्माआ….माअरीइ…….,

अब शंकर ने उसको पलटा दिया, और उसके गोल-गोल नितंबों पर चान्टे मारकर उसकी पैंटी की डोरी को उसकी गान्ड से बाहर करके एक साइड में किया, और कमर को उचका कर अपना मुँह उसकी गान्ड की दरार में डाल दिया…!

शंकर की जीभ को अपनी गान्ड के छेद पर महसूस करते ही सुप्रिया की वासना चरम पर पहुँच गयी, वो अपनी गान्ड को उसके मुँह पर दबाकर कराहते हुए बोली ….

आअहह…सस्सिईइ…अब बस करो रजाअ… और कितना तडपाओगे अपनी रानी को..? डाल भी दो अब अपना मूसल मेरी चूत में..,

शंकर पर उसकी फरियाद का कोई असर नही हुआ, और उसने अपनी जीभ का सफ़र और आगे बढ़ाते हुए उसकी मुनिया की फांकों तक पहुँचा दिया…, अपनी झीभ की नोक को चूत में अंदर तक घुसाते हुए उसे चोदने लगा…!

हाथ के अंगूठे से जैसे ही उसके भज्नासे को मसला.., सुप्रिया की चूत ने अपना रस छोड़ दिया…, वो बुरी तरह सिसकते हुए झड़ने लगी…!

सुप्रिया झड़ने के बाद, पलटकर किसी बिल्ली की तरह झपट्टा मारकर घुटनों पर बैठे शंकर की गोद में बैठ गयी, और उसके होंठों को चूस्ते हुए बोली –

बहुत जालिम हो तुम, ज़रा भी रहम नही करते अपनी रानी पर.., कितना सताते हो..?

शंकर ने उसके निप्प्लो को सहलाते हुए पुछा – क्यों तुम्हें मज़ा नही आया..?

सुप्रिया ने उसके लंड को अपनी मुट्ठी में कसते हुए कहा – किसी दिन मज़े के मारे मेरी जान ही ना अटकी रह जाए, इतना मज़ा है तुम्हारी हरकतों में कि क्या कहूँ..,

फिर वो उसकी आँखों में झँकते हुए मुस्कुरा कर बोली – अब तो डाल दो इसे.., मेरी चूत कब्से आँसू बहा रही है…!

शंकर ने भी मुस्कराते हुए उसे लिटा दिया, और उसकी टाँगों को अपनी मजबूत जांघों पर चढ़ाकर अपने दहक्ते हुए सुपाडे को उसकी चूत के मुँह पर रख कर हल्का सा दबाते हुए कहा –

जो हुकुम मेरे आका…, ये कहकर एक जोरदार धक्का उसकी चूत में लगा दिया…

सरसरात्ताआआअ..हुआ लंड गीली चूत में तीन चौथाई तक समा गया, सुप्रिया के फरिस्ते कून्च कर गये, दर्द से उसकी आँखों में पानी आ गया…

कराह कर बोली ….आआईयईई….जालिम.. धीरे डाला कर…., ये तेरी रानी की चूत है, भूसे का ढेर नही….!

 
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