• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

कुदरत का इंसाफ

मैं तो डुअल पर्सनल्टी का शिकार था, उसे पाना भीचाहता था और कोई रिस्क भी लेने का पक्षधर नहीं था लेकिनमेरी लगाम डॉली ने अपने हाथ में ले ली–

और फिर साहब ऐसी ऐसी साजिशें सामने आईं कि लोगोंकी आंखें हैरत से फटी रह जाएं और यह सब डॉली के हीदिमाग की उपज थी, मैं तो ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकताथा–मैं तो हैरान रह जाता था कि सीधी-सादी नजर आने वालीडॉली क्या ऐसा चकव्यूह भी रच सकती है–

पहला चकव्यूह–

मेरी राज से मुलाकात–

किस प्लानिंग के तहत, जरा जानिये–चूंकि राज समलैंगिकहै, शरीर से भूखा है, उसे कोई भी भोग सकता है, वो इसकेलिए हमेशा फ्री रहा है–मर्द को देखकर उसका शरीर ढीला होजाता है, वह हमेशा औरत के परिधान में रहना चाहता है–उसेअपना नाम संगीता पसंद है, यह बात एक बार डॉली ने सुनली थी–राज सन्नी से कह रहा था कि मुझे संगीता कहकरपुकारा करो, संगीता नाम मुझे मदहोश कर देता है...इसी बेसपर डॉली ने ऐसा प्लान रच डाला कि जब मैंने सुना तो मैंहतप्रभ रह गया, सोचता रह गया कि क्या किसी के अंदरइतना सुपर माइंड भी हो सकता है–

(प्रिय पाठक मित्र, अभी यह मत समझना कि कहानी काअंत हो गया। अभी तो ट्विस्ट बाकी है मेरे दोस्त)

☐☐☐
 
“एक दिन मैंने राज से उसकी फैक्ट्री के बाहर मुलाकातकी–पहली मुलाकात–

लेकिन अजीब स्टाइल में–

मैंने उससे कहा कि तुम मेरी पूर्व जन्म की पत्नी हो, संगीता–क्या तुम मुझे नहीं पहचानती? मैं तो पूर्व जन्म काकुछ भी नहीं भूला हूँ... ।

मतलब इन्हीं बातों से मैंने उसे अपने जाल में फंसाया थाऔर वो फंसा–

उसे यकीन हो गया कि वो पिछले जन्म की संगीताहै–डॉली की इस गढ़ी हुई कहानी को उसने सच मान लियाऔर मेरे अंदर वह अपने पति का दर्शन करने लगा–

इस तरह पहले तो हमने उसे विश्वास में लिया।

उधर–

डॉली ने उसकी तरफ से अपना व्यवहार बदला।

कहां तो राज और डॉली एक-दूसरे के कट्टर दुश्मननजर आते थे लेकिन अब डॉली ने उसे अपना प्यारा पतिबना लिया यानि उसके इसी रूप को मानो डॉली ने पसंद करलिया था और इस रूप पर अब वह वारी जाती थी–

सच बताऊँ साहब...

जब से डॉली ने राज को गे रूप देखा था दोनों मेंझगड़ा रहता था, क्लेश रहता था–डॉली राज से उखड़ाव्यवहार करती थी, जिसकी वजह से राज उससे बहुत खिन्न रहता था और हर वक्त डॉली को दुत्कारता और गाली-गलौजकरता रहता था–

राज इसलिए खिन्न रहता था कि डॉली उसे मान्यतानहीं देती थी, राज चाहता था कि डॉली उसके इस रूप कोएक्सेप्ट कर ले–अब जब मैंने राज को इस प्लान में फांसलिया कि वो मेरी पूर्व जन्म की पत्नी है और मैंने भरोसा दिलादिया कि इस जन्म में भी मैं उसे आजीवन अपनी पत्नी बनाकररखूंगा तो वो मुझे अपने घर ले आया–

“मेरे लिए सजा-संवरा और अपनी भूख मिटायी। अब डॉलीउसके साथ अच्छा व्यवहार करने लगी थी तो उनका आपस कावो क्लेश भी खत्म हो चुका था–

दरअसल सर...डॉली बहुत बड़ी प्लानिंग पर काम कररही थी। वो सन्नी के हाथों राज का मर्डर कराना चाहती थी।ताकि उसके जीवन के कांटे दूर हो जायें और वह मेरे साथसैटल हो जाये–

इस प्लानिंग पर काम करने के लिए एक तरफ तो उसनेमेरे माध्यम से राज का ब्रेनवाश किया–राज को नयासाथी मिल गया–अब उसे सन्नी की कोई जरूरत नहीं थी –वहमुझे अपने घर में रख सकता था। इस तरह हमारे सारे निशानेसध जाते–

डॉली के चकव्यूह का दूसरा हिस्सा यह था कि सन्नी जोउसे भोगने का आकांक्षी था तो डॉली ने उसके आगे भी घासडालना शुरू कर दी, डॉली सन्नी को अपने रूपजाल मेंफंसाने लगी और इसे यह अहसास कराने लगी कि मैं तुमसेप्यार करती हूँ और सदा के लिए तुम्हारी हो जाना चाहती हूँ,उस छक्के से छुटकारा चाहती हूँ –

इस तरह डॉली ने सन्नी को उकसाया राज के मर्डर केलिए–

मगर सन्नी स्याना निकला। वह डॉली को भोगना तोचाहता था और राज की हत्या की बातें भी करता था मगरडॉली को उसके अंदर झूठ और फरेब नजर आया।

यानि वह सिर्फ डॉली को भरमा भर रहा था, डॉली कोलगा कि यह कभी इतना बड़ा कदम नहीं उठाएगा कि राजका मर्डर कर दे, बस ऐसे ही मूर्ख बनाता रहेगा, झूठी बातेंकरता रहेगा–तब डॉली ने अपने प्लान को चेंज कियाऔर–अब राज के हाथों सन्नी के मर्डर की रूपरेखा तैयारकी गयी, राज सन्नी का मर्डर कर दे और जेल चला जाये या उसको भी कहीं ठिकाने लगा दिया जाये।

इसके लिए डॉली ने एक कहानी तैयार की कि राज को यह पता चल जाये कि उसे सन्नी मर्डर करने जा रहा है और उसका माध्यम मैं बना–

क्योंकि हम दोनों एक ही बैंक में नौकरी करते हैं तो प्लान यह रचा गया कि जब मैं राज के साथ होऊंगा तोकोई फोन आएगा जिसको मैं ऐसे रियेक्ट करूंगा कि वहसन्नी की तरफ से है और वह अपने किसी दोस्त का मर्डर करना चाहता है–

इस तरह हमने राज के दिमाग में यह घुसेड़ दिया किसन्नी उसका मर्डर करना चाहता है। अब हमारा...डबल प्लानयह था कि या तो सन्नी राज का मर्डर कर दे या फिर राजसन्नी का–

हम इसी प्लान पर आगे बढ़ रहे थे लेकिन अफसोस कीबात यह रही कि दोनों ने ही एक-दूसरे का मर्डर नहीं किया।सन्नी तो इच्छुक ही नहीं था, वो तो बस डॉली को भोगने केलिए झूठे दिलासे दे रहा था। उसे मर्डर नहीं करना था और न उसने किया लेकिन राज जरूर सीरियस था लेकिन मर्डर कीहिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

दूसरी बात डॉली की भी ख्वाहिश यही थी कि मर्डरराज का ही हो ताकि आजीवन डॉली फ्री हो सके।

इसलिए डॉली फिर खुद मैदान में आयी



☐☐☐
 
लंच का टाइम हो रहा था।

ऋषभ का फोन बजा। डॉली का नंबर था।

वह रिसीव करते हुए बैंक से बाहर निकल आया–“हांहैलो–।”

“अब मेरी प्लानिंग ध्यान से सुनो।”

“क्या?”

“कोई पास में तो नहीं है?”

“न–।”

“देखो–।” उधर से सांस ली गयी–“यह सन्नी तो इसका मर्डर करेगा नहीं, यहसाला ऐसे ही मुझे भरमाता रहेगा कि हांकरूंगा, ये करूंगा वो करूंगा, मगर मर्डर कभी नहीं कर पाएगाक्योंकि मर्डर वाली इसके अंदर दिलचस्पी ही नजर नहीं आती–।”

“फिर–?”

“यह काम हमें खुद करना पड़ेगा।”

“किसे–?”

“हमें और तुम्हें–।”

“क्या–म–मैं– ?”

“मिमियाओ मत–अब पहले की तरह मैदान छोड़कर मतभाग जाना–यह निर्णायक मोड़ है–अब या तो यह काम होगाया मैं सुसाइड करूंगी–मेरे पास दूसरा चारा नहीं है, इस हिजड़ेके साथ मैं हरगिज जिंदगी नहीं गुजार सकती–या तो तुम्हारेसाथ जीना है या फिर नहीं जीना है।”

“लेकिन मर्डर करना ठीक नहीं है डॉली।”

“तो फिर बताओ क्या रास्ता है?”

“तुमने गेम अच्छा तो खेल दिया–दोनों को एक-दूसरे कादुश्मन बना दिया, अब यह उसको मारे या वो इसको मारे–हमारेरास्ते से कांटें साफ हो जाएंगे।”

“लेकिन मार तो नहीं रहे–सन्नी मर्डर नहीं करेगा। मैंनेउसे देख लिया, वो सिर्फ मुझे फुसला रहा है भोगने के लिए–नउसके अंदर इतनी हिम्मत है कि वो मर्डर करे और न वो ऐसाकरना चाह रहा है–।”

“फिर क्या किया जाए?”

“यह काम हमें करना पड़ेगा।”

“कल रात मैंने राज को भड़काया है कि वह सन्नी केखिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज कराके आये कि यह मेरा मर्डरकरना चाहता है, मैंने इसीलिए उसे भड़काया क्योंकि मर्डर तोउसका हम कर देंगे और पुलिस सन्नी को उठा लेगी–हमारेरास्ते साफ–।”

“अरे क्या मरवाओगी तुम?”ऋषभ डरे-सहमे स्वर मेंबोला–“ऐसे तो मैं धर लिया जाऊंगा, तुम्हारे कहने पर मैंनेतुम्हारा फोन रिसीव करके राज के सामने यह नाटक खेलदिया था कि सन्नी मुझसे शूटर मांग रहा है–अब जबकिपुलिस में रिपोर्ट दर्ज होगी तो क्या मैं नहीं धर लिया जाऊंगाकि सन्नी मुझसे शूटर मांग रहा था–डॉली तुम ऐसे उल्टे-सीधे काम मत करो–।”

“वहां तुम्हारा नाम नहीं आएगा–मैं बयान दूंगी कि मैंनेअपने कानों से सुना था कि सन्नी फोन पर किसी से शूटर मांगरहा था राज के मर्डर के लिए–।”

“अरे नहीं यार, तुम यह काम मत करो–ज्यादा ओवरकॉन्फिडेंटमत बनो–पुलिस, पुलिस होती है। घर में बैठकर प्लान बनानेसे प्लान सक्सेस नहीं होजाते–पुलिस देखते ही ताड़ जाती हैकि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ बोल रहा है–तुम तोखुद फंसने का प्लान बना रही हो।”

“देखो, ये इसलिए जरूरी है कि राज के मर्डर के बादपुलिस भटकेगी नहीं बल्कि सीधे सन्नी को अरेस्ट करेगी।”

“नहीं भाई–मुझे ऐसा प्लान नहीं चाहिए।” वह सांस लेकरआगे बोला–“प्लान ऐसा होना चाहिए कि हमारे नाम दूर दूरतक न हो–हमारा कोई इन्वॉल्वमेंट ही न हों–देखो तुम्हारेअंदर अगर दिमाग है तो ऐसा प्लान रचो कि घटनास्थल पर हीबहुत बारीक कट में ऐसे सबूत प्लान्ट हों कि पुलिस बहुतखोजबीन के बाद स्वतः सन्नी तक पहुंचे।”

“ऐसा–?”

“और क्या–हमारा कहीं इन्वॉल्वमेंट नहीं होना चाहिए।हमें तो पुलिस के सामने आना ही नहीं चाहिए ताकि पुलिससच-झूठ की पहचान न कर सके–तुम आज रिपोर्ट दर्ज करादोगी कि मैंने सन्नी को बोलते सुना है कि वह राज के मर्डरकी बात किसी से फोन पर कर रहा था तो कल को जब होजाएगा तो पुलिस सबसे पहले तुम्हीं से तो इंक्वायरी करेगी–फिर तुम कहां तक झूठ-पर-झूठ बोलती रहोगी –सच और झूठ मेंफर्क होता है और पुलिस को ताड़ते देर नहीं लगती।”

“हुम्म–SS –।”

“तुम तो जेल जाने वाले काम करने लगीं।”

“तो फिर कैसा प्लान चाहिए?”

“मर्डर होने के बाद पुलिस बहुत मुश्किल से, खुद अपनीपीठ ठोकती हुई सन्नी तक पहुँचे, तब बात है–हमारा कहींकोई जिक्र नहीं, कोई इन्वॉल्वमेंट नहीं होना चाहिए।”

“चलिये सनम, ऐसा भी प्लान बनाते हैं। तुम्हें पाने के लिएतो क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ेंगे–?”

“हां ऐसा कोई प्लान बुनकर मुझे सुनाओ–फुलप्रूफ होगा,तभी मैं हामी भरूंगा –अरे भोले सनम...मर्डर के बाद हमेंशानदार जिंदगी गुजारनी है–न कि जेल की–तो इससे अच्छेतो हम अभी हैं, ऐसे ही जुदाई की जिंदगी जिये लेते हैं–।”

“यह जिंदगी मेरे लिए जेल से भी बदतर है–मुझे ऐसीजिंदगी जीना पड़ गयी तो मैं मरना पसंद करूंगी।”

“उसकी नौबत नहीं आएगी–तुम्हारे बगैर मेरा भी जीनामुहाल है डॉली नहीं जिया जा रहा यार–मैं तो समझ रहाथा कि जिंदगी आसान होती है, जैसे चाहे जी लो मगर जबजीने चले तो पता चला कि जीवन का सिर्फ एक ही पैटर्न होताहै जो दिल के रास्ते से जाता है।”

“इतनी अक्ल तुम्हें पहले आ गयी होती तो आज यह दिनक्यों देखना पड़ता–?”

“उसी की सजा तो भुगत रहे हैं, बहुत पछता रहे हैं।”

“अब प्रायश्चित कर लो–मैं प्लान बनाती हूँ तुम्हारे प्रायश्चितका।”

“मगर फुलप्रूफ–विद आऊट अवर इंवॉल्वमेंट।”

“टेंशन न लो यार–हम हैं तो–।”

“ओके–।”

“बाय मेरी जान।”

“बाय जान।”

☐☐☐

सितम्बर, 2018 में सुप्रीमकोर्ट ने समलैंगिक सम्बन्ध को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था।

भारतवर्ष के समलैंगिकों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी थी।राज भी बहुत खुश हुआ था।

उसने सर्वप्रथम ऋषभ को फोन किया था–“कहां होराजा–हम लड़ाई जीत गये राजा।”

“कौन-सी लड़ाई जीत गये हम–?”

“सुप्रीम कोर्ट–सच्ची आज मैं बहुत खुश हूँ –यह हमारीबहुत बड़ी जीत हुई है–आज तो मैं रातभर जश्न मनाऊंगी–

“लेकिन हम सुप्रीम कोर्ट में कौन-सी लड़ाई जीत गये–मेरातो कोई केस नहीं चल रहा, क्या तुम्हारा केस चल रहा था– ?”

“हाँ मेरी जान–मेरे बालम हरजाई, क्या तुमने धारा 377का नाम नहीं सुन रखा है–।”

“ओह समझ गया–वैरी गुड–कांग्रेचुलेशन संगीता मेरीजान है–।”

“थैंक्यू मेरे राजा–आज जश्न की क्या प्लानिंग है? आजतो बहुत सजूंगी मैं–।”

“लेकिन यह जश्न हम बाहर मनाएंगे–मुझे वो जगह मिलगयी है संगीता जहां पिछले जन्म में एक पुलिया के नीचे दुश्मनजमाने ने हमें पकड़कर मार डालाथा।”

“क्या कह रहे हो–? कहां है वो जगह? चलो वहीं चलते।”

“वही खुशखबरी मैं तुम्हें सुनाने वाला था जब तक तुम्हाराफोन आ गया–मैं उधर से निकला जा रहा था तो उस स्थानको देखते ही मेरे दिमाग में क्लिक होने लगी–वो जगह मैंनेपहचान ली, मैंने बाइक रोकी और उसे देखने लगा–संगीता...।”

“हाँ राजा–।”

“हम पिछले जन्म में भी इसी शहर में थे, हम एक होने केलिए घर से भागे थे मगर नगले की पुलिया पर पकड़ लिये गयेथे–वहां हमने खुद को छिपाया था मगर छिपा नहीं पाये औरवो हमारे पूर्वजन्म का आखिरी दिन था।”

“मेरे चन्दा, हमारे प्रेम के आगे भगवान को फिर झुकनापड़ा और हमें फिर जन्म देना पड़ा।”

“आज यह जश्न हम वहीं मनाएंगे संगीता।”

“बिल्कल मेरे तारा–मैं तो तुम्हारी हूँ–जहां चाहे ले जाओ–मैंभी उस स्थान कोदेखने की इच्छुक हूँ जहां हम पकड़े गये थे।”

“तुम्हें पता नहीं है संगीता, वहां हम एकाकार भी हुएथे–आज फिर हम इतिहास को दोहराएंगे।”

“बिल्कुल मेरे बलमा–मैं तो तुम्हारे लिए बनी हूँ।”

“रात नौ बजे तैयार रहना–।”

☐☐☐
 
रात साढ़े नौ बजे नगले की पुलिया के पास एक बाइकआकर रुकी।

चलाने वाला हेलमेट पहने था, कदाचित राज और पीछेऋषभ बैठा था।

ऋषभ के पास एक बैग था जिसमें बाहर से ही पानी की बोतल झांक रही थी।

दोनों बाइक से उतरे।

वातावरण में पैना सन्नाटा था। यह रोड तो दिन ही मेंसुनसान रहता था, रात कीतो क्या कहिए। शायद ही कोईवक्त का मारा इधर से गुजरकर जाता हो।

दस साल पहले तक यह रोड लूटमार को लेकर बहुतबदनाम था मगर अब चूंकि ऐसी घटनाएं नहीं होती हैं मगरफिर भी बदनामी का ठप्पा अभी हटा नहीं है और दहशत मेंकमी तो आयी है लेकिन समाप्त नहीं हुई है।

ऋषभ राज से बोला–“बाइक इस पेड़ की आड़ में छिपादो–गश्ती पुलिस ने देख लिया तो हमारे रंग में भंग होजाएगा।”

बात राज के पल्ले पड़ी।

उसने बाइक आगे धकेलकर पेड़ और झाड़ियों की आड़ मेंखड़ी कर दी और रोड से वो दृष्टिगोचर नहीं होती थी।

राज ने हेलमेट उतारकर बाइक पर टांग दिया।

उसका चेहरा सजा संवरा था।

गहरी लिपस्टिक लगी थी। क्रीम पाउडर की अधिकतासाफ दिखाई देती थी।आंखों में काजल लगा रखा था।

बस बालों की विग नदारद थी।

वह पेन्ट-शर्ट पहने था।

बोला–“किधर चलना है?”

“आओ संगीता डार्लिंग–क्या यह जगह तुम्हें कुछ याद-सीपड़ रही है?”

चूंकि अंधेरा था मगर मामूली चांदनी-सी में थोड़ा-बहुतवातावरण स्पष्ट होता था।

ऋषभ के हाथ में मोबाइल टॉर्च ऑन थी।

राज इधर-उधर का जायजा लेते हुए स्मृति पर दबावडालने लगा।

मगर उसे कुछ भी याद आकर नहीं दिया।

कोई बीस कदम चलकर वे लोग नीचे को उतरे। ऋषभ कीपीठ पर बैग चिपका था।

पुलिया के बराबर से कुछ ढलान था जिससे सावधानी केसाथ कोई दस फीट नीचे उतरा जा सकता था जहां पुलिया कातल था।

वे लोग उतरकर नीचे आये। राज ने ऋषभ का हाथपकड़ रखा था और नर्मो-नाजुक कदम आगे को बढ़ा रहा था।

वे लोग उतरकर पुलिया में आये।

पुलिया में एक बड़े से ह्यूम पाइप का इस्तेमाल किया गयाथा।

ऋषभ उसे दिखाते हुए बोला–“यही वो पुलिया है संगीताजहाँ हमने पिछले जन्म में पनाह ली थी लेकिन यह पुलियाहमारे लिए काल साबित हुई थी–हम यहां पकड़ लिए गये थेऔर इसी पुलिया में मार दिये गये थे।”

राज के झुरझुरी चढ़ गयी।

ऋषभ का स्वर जरूरत से ज्यादा खतरनाक और रहस्यमयीथा लेकिन राज स्वर की गंभीरता को नहीं समझ पाया।

राज ह्यूम पाइप और आसपास क्षेत्र को देखकर यादकरने की कोशिश कर रहा था।

और साथ में अपनी पेंट-शर्ट उतार रहा था। जैसे-जैसे बटन खोलता जा रहा था,अंदर के कपड़े नमूदार होते जा रहे थे।

वह अंदर लेडी सूट पहने हुए था। यह वही सूट था जोउसने अपनी मनमर्जी कासिलवाया था और डॉली टेलर कोअपना नाप देकर आई थी।

उसने पेंट-शर्ट उतार दी और तह बनाकर वहीं ह्यूम पाइपके किनारे पर रख दी।

उसकी स्मृति ने जब कोई जवाब नहीं दिया तो वो वर्तमानमें लौट आया।

और ऋषभ की गर्दन में बांहें डालता हुआ बोला–“आजजश्न की रात है बालम–आज सुप्रीम कोर्ट ने हमें आज़ाद करदिया है, हम जो चाहें करें।”

उसके स्वर में उत्तेजना थी।

वह पूर्णरूपेण एक स्त्री नजर आता था। उसी की तरह उसका स्वर मदहोशी में डूबा था।

बस जूते उसके पास जेन्ट्स थे।

सूट बड़ा तड़क-भड़क वाला था, उसका मेकअप भी आकर्षितकरता था।

वे लोग ह्यूम पाइप के मुहाने पर थे ताकि रोड से कोईगुजरे तो वे नज़र न आयें।

राज ऋषभ के होंठ चूसने लगा।

जैसे उसे खा जाना चहता हो।

ऋषभ भी उससे लिपटा था और उसे चूस रहा था।

राज ने होंठ छोड़े और नाराजगी से उसके सीने पर मुक्केबरसाता हुआ बोला–“तुम घर रहने क्यों नहीं आ जाते। क्योंमुझे तरसा रहे हो, मेरा दम निकाल रहे हो, कब शिफ्ट होगे,बोलो कब शिफ्ट होगे?”

“थोड़ा सा वक्त दो।”

“कितना वक्त–तुम्हें पता है कि सन्नी को घर से निकलेभी धीरे-धीरे में पन्द्रह दिन हो गये।”

“हां–मैं आऊंगा मेरी जान–अभी समागम की बातें कर लो –अंदर आ जाओ पुलिया में–बाहर से किसी ने देखा लिया तो हल्ला मचा देगा।”

“कोई कुछ नहीं करेगा, जी तो चाहता है ऐसे ही कपड़ों में दुनिया जहान मेंघूमूं...मगर यह लोग बहुत बुरे हैं, क्या-क्याबात करते हैं–आओ अंदर आओ।”

वे लोग ह्यूम पाइप में अंदर आये।

ऑन टार्च मोबाइल उन्होंने पाइप से सटाकर रख दिया।

जिसका प्रकाश वहां भरपूर था।

अगले कुछ क्षणों में राज ऋषभ से अमरबेल की तरहलिपट गया था।

उन्होंने पांच मिनट तक क्रीड़ा की।

पाँच मिनट बाद का दृश्य कुछ यूं था कि राज आगे कोझुका हुआ था, ऋषभ उसकी हिप से खुद को सटाये खड़ा था।

घर्षण के दौरान राज ने आंखें बंद कर ली थीं।

उचित समय देखकर ऋषभ ने क्रिया के दौरान ही अपनीपेंट का एक पांयचा ऊपर उठाया, उसकी जुराब में एक लंबेफल वाला चाकू घुसा हुआ था जिसे उसने अविलंब बाहरखींच लिया।

और सोचने या एक्शन के लिए अधिक समय नहीं लिया।खंजर को जुराब से निकालने के मात्र पाँच सेकेंड बाद हीउसका खंजर वाला हाथ राज की गर्दन पर पहुँच गया था।

और हाथ विद्युत गति से चला।

एक खून की धारा वहां फूटी।

राज के हलक से चीख उबली मगर ऋषभ का दूसरा हाथप्रेशर कुकर का ढक्कन बनकर उसके मुंह से चिपक गया था।

गर्दन कटती चली गयी।

मात्र कुछ क्षणों में आधी गर्दन कट चुकी थी।

राज का शरीर किसी कटे वृक्ष की तरह जमीन पर गिरा ।

धम्म से।

ऋषभ पर वहशततारी थी। उसकी मुंह पर खून की छींटें थीं । खून भलभलाकर ह्यूम पाइप में फैलता जा रहा था।

☐☐☐

शन्नो को जब थाने में बैठे-बैठे घण्टों गुजर गये और जो पहला व्यक्ति ऋषभ अंदर गया था, वही अभी तक बाहर नहींआया। कितनी लंबी पूछताछ कर रहे हैं? अगर इतना टाइमएक-एक व्यकित से लेंगे तब तो कई दिन यहीं गुजार देंगे।

शन्नो का धैर्य जवाब दे गया।

कोफ्त तो सन्नी, चन्द्रभान और देवेन्द्र को भी हो रही थीलेकिन शन्नो एक कांस्टेबल के पास जाकर बोली–“हमें कबतक बैठाया जाएगा?”

कांस्टेबल डपटता हुआ बोला–“वहीं बैठी रहिये–देखनहीं रही हो कि पूछताछ चल रही है?”

“तो कब तक चलेगी पूछताछ–कई घंटे हो गये।”

“क्या तुमसे पूछकर पूछताछ होगी? वहाँ बैठो जाकर।” शन्नो अपना सा मुंह लेकर वापस बेंच की तरफ चली।

☐☐☐

कक्ष में पैना सन्नाटा पसरा था।

ऐसा कि सुई भी गिरे तो बम की आवाज लगे।

ऋषभ ने अभी-अभी विराम लिया था।

इंस्पेक्टर नाइक और अखिलेश की दृष्टि मोबाइल पर जमीथी। दोनों ने पुश्तसे पीठ लगा रखी थी। नाइक का मोबाइलमेज पर रखा था जो टेप रिकार्डर पर ऑन था। एक-एक शब्दउसमें जज्ब हो रहा था। फोन फ्लाइट मोड पर लगा रखा थाताकि कोई कॉल डिस्टर्ब न कर सके।

विराम लेकर ऋषभ शून्य को देख रहा था। बड़ा अपराध बोध या पछतावा उसपर नजर नहीं आता था, शायद इसलिए कि उसे भरोसा था कि यह कहानी मैं मित्रों को सुना रहा हूँ । कदाचित उसे खुद के फंस जाने की जरा भी आशा नहीं थी ।यही कारण था कि उसके स्वर में जरा भी भय या संकोच नहीं था । ढेर सारे शब्दों का इस्तेमाल करते चल रहा था ताकिकुछ भी छूट न जाए।

एक विराम लेकर उसने गहरी सांस ली–

और बोला–“उसकी आधी गर्दन कट चुकी थी, वो धड़ामसे फर्श पर गिरा–हमारी योजना का अहम हिस्सा यह था किपुलिस ये जाने कि हत्यारे ने मृतक की शिनाख्त मिटाने के सारेकाम किये हैं, वो इसलिए ताकि पुलिस हत्यारे तक न पहुँचसके–मतलब पुलिस का इस तरह माइंड सेट होना चाहिए किवो हत्यारे को बहुत चालाक जाने और बड़ी मुश्किल से हत्यारेतक पहुँचे–पुलिस की इन्वेस्टीगेशन अगर आसान रही तोपुलिस यह ताड़ सकती है कि सबूत और क्लू प्लांट किये गयेहैं, किसी अन्य को हत्यारा बनाने के लिए इसलिए मैं उस दिनसुबह को अर्ली मॉर्निंग वहां ह्यूम पाइप के दूसरे किनारे परएक हथौड़ा छिपा आया था उसका चेहरा कुचलने के लिए–

जब वह पाइप के फर्श पर गिर गया तो सर्वप्रथम तो मैंनेउसको सीधा किया। फिर उसके वो कपड़े उतारे–लेडीज सूट।उसे पेन्ट-शर्ट पहनाया जो कि वह पहनकर आया था औरउतारकर उसने वहीं ह्यूम पाइप के कोने पर रख दिये थे।

उसके लेडीज कपड़े उतारकर उसे जेन्ट्स कपड़े पहनाए। फिर ह्यूम पाइप के दूसरे कोने पर जाकर सुबह का छिपाया हुआ हथौड़ानिकाला और ताबड़तोड़ उसके चेहरे पर वार किये।

उफ् मेरे भगवान! कैसे कर गया मैं यह सब?

मैं जो कि आज तक ज्यादा तेज आवाज से किसी से बोलातक नहीं था। मुझे तो लड़ाई-झगड़ों से भी डर लगता थालेकिन यह कैसी शक्ति थी कि मैं इतना वहशी हो गया किएक आदमी की गर्दन काट दी थी। खून भल-भलाकर निकलरहा था और मैं उसके चेहरे पर वार-पर-वार किये जा रहा था।

मैं इतना वहशी कैसे हुआ? शायद डॉली के प्यार कीताकत थी यह जिसने मेरे अंदर साहस फूंक दिया था।

मैंने उसका चेहरा बिल्कुल बिगाड़ दिया। मैं हांफ रहा था।

मुझे पसीने आ रहे थे।

मैं दो खंजर लाया था। एक खंजर मुझे राज की बनियान में पीठ पर ठूंसना था ताकि इन्वेस्टीगेटर यह अर्थ लगाये किमृतक भी हत्यारे को मार देना चाहता था। यह कहानी तबअपना पूर्ण रूप लेती जब पुलिस को यह पता चलता किहत्यारा सन्नी है और राज भी सन्नी को इसलिए मार डालनाचाहता था कि सन्नी राज की बीवी पर बुरी नजर रखता थाजिसके बाद से ही दोनों में मतभेद हुए थे और एक-दूसरे केखून के प्यासे हो गये थे।

यही प्लानिंग थी हमारी। पुलिस पहले तो अपनी इन्वेस्टीगेशनसे जीरो परिणाम पाती क्योंकि हमने घटनास्थल पर प्वाइंट इसतरह उलझा रखे थे कि पुलिस किसी परिणाम पर पहुंचती हीनहीं, बल्कि अपना माथा पीटती रह जाती–फिर धीरे-धीरेडॉली शिगूफे छोड़ती, लोगों को बताती कि राज सन्नी केसाथ समलैंगिक था, फिर बताती कि सन्नी मुझ पर बुरी नजर रखता था इसलिए राज और सन्नी में ठन गयी थी इसीलिएराज ने सन्नी को बाहर किया और इसी के चलते यह मर्डरहुआ–।”

उसने फिर विराम लिया।

थोड़ी देर को शांत हुआ।

नाइक और अखिलेश बिल्कुल शांत बैठे थे। वे कोई भीप्रश्न करके इकबालिया बयान की निरंतरता में कोई विघ्नडालना नहीं चाहते थे।

पहले सब कुछ बाहर आ जाना चाहिए। जब वो अपनेबयान पर फुलस्टॉप लगा दे तब जो उलझे हुए प्रश्न थे, वोकिये जा सकते थे।

ऋषभ आगे बोला–“उसके बाद मैं वो लेडीज कपड़े, एकखंजर और उसका मोबाइल, उसकी जेबों में मोबाइल के अलावा कुछ नहीं मिला था, लेकर ह्यूम पाइप से बाहर आया औरढलान से चढ़कर रोड पर आया–दूसरी साइड में बाइक खड़ीथी–बैग मेरी पीठ पर चिपका था–मेरे हाथ खून से सने थेजिनको सर्वप्रथम धोना जरूरी था। मैंने बैग उतारा और बाहरीजेब में लगी पानी की बोतल निकाली और अपने हाथ औरचेहरा अच्छा करके धोया –।

उसके बाद बैग की चेन खोली, उसमें से कई पॉलीथीननिकालीं जो मैं साथ में लाया था।

एक पॉलीथीन में वो लेडीज सूट डाला, दूसरी पॉलीथीन मेंखंजर और अपना एक रूमाल, जो हाथ-पैर पोंछते वक्त खून मेंरंग गया था, डाला और हैमर तथा राज का मोबाइल उस पॉलीथीन में बंद करके बैग में डाला–

मेरे कपड़े भी खून में रंग गये थे। मैंने अपने कपड़े भीउतारे और उसे दूसरी पॉलीथीन में बंद किये और उसे भी बैगके हवाले किया व साथ लाया एक पजामा और टी-शर्ट बदनपर डाल दिया।

इस सबसे निश्चिंत होकर मैंने बैग को पुनः पीठ पर लादाऔर बाइक निकालकर वापस शहर की तरफ चल पड़ा।

वो पानी की बोतल मैंने वहीं फेंक दी थी।

सारी प्लानिंग हम लोग पहले ही तैयार कर चुके थे किकिस स्टेप पर क्या करना है? वहां से एक किलोमीटर दूर एकनाला पड़ता है, उस नाले में मैंने वो दोनों पॉलीथीन फेंकदी–एक लेडीज कपड़ों वाली और दूसरी खंजर, हैमर वालीऔर उस मोबाइल को पहले पुलिया पर रखकर हैमर सेतोड़ा–क्योंकि यह मोबाइल आफत की जड़ होता है, हालांकिमैं अपना मोबाइल साथ में नहीं लाया था,मुझे पता था किअपने मोबाइल की लोकेशन ट्रेस होने के बाद मैं पकड़ा जासकता हूँ –टूटे मोबाइल के पार्टस् मैंने यूं ही नाले में खुले फेंकदिये और हैमर –खंजर को पॉलीथीन में बंद करके डुबो दिया।

इतना करके मैं अपने रूम की तरफ चल पड़ा। शहर सेपहले एक सरकारी नल पड़ता है जिस पर मैंने दोबारा हाथऔर मुंह धोये–बहुत अच्छा करके और जूते के तले भी रगड़े,उसके बाद मैं अपने रूम पर पहुंचा।

सबसे पहले मैंने अपने कपड़ों की थैली निकाली, एकबाल्टी में पानी भरकर कपड़ों को रगड़-रगड़कर धोया, फिर उसपानी में ढेर सारा नील डालकर फ्लश में डाल दिया–नील इसलिए डाला था ताकि पानी की लालिमा बिल्कुल न रहे–कहींनाली में पानी बहता हुआ हो तो नीला ही दिखाई दे–फिर बैगभी धोया, हालांकि उस पर कोई खून का छींटा नजर नहीं आताथा लेकिन तब भी मैंने उसे धो डाला।

उस पॉलीथीन को जिसमें मैं कपड़े बांधकर लाया था, उसेकिचन में ले जाकर जला दिया–

बस इतनी कहानी है–।”

उसने गहरी सांस ली।

☐☐☐
 
नाइक ने बोतल का ढक्कन खोला और पानी हलक मेंउड़ेला।

वापस बोतल टेबल पर रखते हुए ऋषभ से पूछा–“वोबाइक किसकी है?”

“मेरी–अभी दस दिन पहले नई निकाली थी।”

अखिलेश ने प्रश्न किया–“जब लाश राज की ही थी तोकपड़ों को डॉली ने पहचानने से इंकार क्यों किया?”

“यह मैंने पहले ही समझाया था डॉली को कि न तोकपड़े पहचानने हैं और न लाश पहचाननी है, क्योंकि मैं इसमामले में बिल्कुल भी इन्वॉल्वमेंट नहींचाहता–मैं पुलिस कासामना करने का बिल्कुल इच्छुक नहीं था–बस खाली हमेंगुमशुदगी दर्ज करानी थी क्योंकि वो जरूरी थी। जब किसी कापति नदारद है तो एक बार रिपोर्ट होना जरूरी है वरना खुद हीसंदिग्ध बन जाएंगे। इसलिए गुमशुदगी दर्ज कराना जरूरीथा इसलिए हमारा प्लान था कि कपड़े और लाश पहचानने सेइंकार कर दिया जाएगा–पुलिस अगर हत्यारे तक पहुंचती हैतो ठीक और अगर नहीं पहुंचती है तो उससे ज्यादा ठीकक्योंकि रास्ते का कांटा राज तो हट चुका है –बस यही हमारीसफलता थी–।”

“आप हत्यारा किसे बनाना चाहते थे?”

“सन्नी को।”

“तो इसके लिए क्या सबूत प्लांट किये?”

“उसके लिए हमने कोई सबूत प्लांट नहीं किये, बस लाश की शिनाख्त मिटायी –फिर डॉली के हाथ में था कि वहचाहती तो सन्नी को शक के घेरे में ले आती और नहीं चाहतीतो नहीं लाती–लेकिन फिर भी इसलिए लाना पड़ता क्योंकि वरना लोग सवाल करते कि राज क्यों गायब हुआ–लोगउसके पीछे की वजह कुरेदते इसलिए लोगों को बताना यहजरूरी था कि राज के सन्नी से समलैंगिक संबंध थे औरसन्नी डॉली पर कुदृष्टि रखता था जिससे दोनों के बीचमतभेद हो गये थे और दुश्मनी पैदा हो गयी थी। इस तरहपुलिस सन्नी तक पहुंच जाती और चूंकि यह सच था कि दोनोंके समलैंगिक सम्बन्ध थे इसलिए पुलिस सन्नी को ही संदिग्धमानती और उस पर कार्रवाही करती–।”

“क्या तुम्हारे पास उनके समलैंगिक सम्बन्धों के सबूत हैं – ?”

“हां–कुछ फोटोग्राफ्स हैं और वीडियो हैं जो डॉली नेबना रखी थी–लेकिन साब... मेरे एक सवाल का जवाब देदीजिए–आप मुझ तक कैसे पहुंचे, कौन-सा लूज प्वाइंट छूटगया था– ?”

नाइक ठहरकर ऋषभ को देखता रहा।

वो इतनी गहन सोच में डूबा था कि मानो उसने सवालसुना ही न हो।

थोड़े अंतराल के बाद ऋषभ पुनः बोला–“मुझे इस बातकी बहुत जिज्ञासा है सर कि आप हम लोगों तक कैसे पहुंचे–हमनेतो बहुत सावधानी बरती थी फिर भी आप हम तक पहुंचगये?”

“अपराध सिर चढ़कर बोलता है इसीलिए तुम इतनी देर तक बोलते रहे थे, तुम निर्दोष होते तो तुम्हारे पास बोलने केलिए कुछ नहीं होता, तब हम चाहकर भी तुम्हारा कुछ नहींबिगाड़ सकते थे–।”

“मतलब मैं यही तो जानना चाह रहा हूँ कि तुम बैंक मेंकैसे पहुंच गये?”

“डॉली के सिर चढ़े अपराध ने हमें बैंक तक पहुंचाया थाऔर तुम्हारे सिर चढ़े अपराध ने हमें तह तक पहुंचा दिया।”

यह रहस्यपूर्ण स्वर ऋषभ की समझ में नहीं आ पायालेकिन वो चुप रह गया।

नाइक उससे बोला–“ठीक है, तुम बाहर बैठ सकते हो।”

ऋषभ पुनः मोबाइल स्क्रीन खोलता हआ बोला–“एक बारमुझे अपना एकाउंट नम्बर दे देते, मैं ट्रांसफर कर देता–।”

“दे देंगे, अभी बाहर बैठो जाकर।”

“ओके सर।” ऋषभ उठकर खड़ा हो गया।

और अखिलेश चकित दृष्टि से नाइक को देखने लगा। उसेहैरानी इस बात की थी कि जिसे हवालात में डालना चाहिए था,उसे बाहर बैठने को क्यों कहा जा रहा है?

जब ऋषभ बाहर निकल गया तो अखिलेश ने नाइक सेपूछा–“सर इसे आपने फ्री बाहर छोड़ दिया, अगर भाग गयातो क्या होगा?”

“मैं इसके बारे में कोई दूसरा फैसला करना चाहता हूँ ।”

“दूसरा फैसला?”

“पहले सन्नी को लाओ बुलाकर, बाद में चर्चा करते हैं–।”

अखिलेश कुर्सी से उठा और बाहर की तरफ चल दिया।

☐☐☐

अगले क्षणों में सन्नी उस कुर्सी पर बैठा था।

नाइक सन्नी की आंखों में झांकता हुआ बोला–“राज सेक्या सम्बन्ध थे तुम्हारे–?”

“म–म–राज से–साहब उससे तो मेरे कोई सम्बन्ध नहींथे–।”

अपेक्षाकृत नर्म लेकिन कोड़े की फटकार वाले स्वर मेंनाइक बोला–“तुम्हें पता है कि राज की हत्या हो चुकीहै–?”

“ह-ह-हत्या...?”उसका मुंह खुला का खुला रह गया।

“इसलिए बोल रहा हूँ कि जो भी बोलो वो सच बोलो, अगर मुझे गुमराह करने की कोशिश करोगे तो तुम्हें ही हत्यारोपीकर जेल में ठूँस दूंगा जबकि मुझ पता है कि हत्या तुमने नहीं की है–इसलिए सच बोलो, झूठ बोलकर मेरी वहशत मत जगाओ–।”

दुनिया भर का आश्चर्य सन्नी के चेहरे पर जमा हो गयाथा।

उसका मुंह खुला-का-खुला था।

नाइक पुनः उसकी रीढ़ की हड्डी तक में सिहरन पैदा करताहुआ बोला–“राज से तुम्हारे क्या सम्बन्ध थे?”

“स...सर...वो गे था–।”

“तुमसे सम्बन्ध?”

“मेरे साथ वो समलैंगिक था लेकिन यह पन्द्रह दिन पहलेतक की बात है, फिर उसकी सास ने मुझे उस घर से निकलवादिया था–साहब वो मेरा बचपन का दोस्त है और वो बचपनसे ही ऐसा है–उससे स्कूल टाइम से मेरे ऐसे ही सम्बन्धथे–फिर मैं दूर चला गया, अभी महीना भर पहले मेरा इसशहर में ट्रांसफर हुआ–वो मुझसे फेसबुक पर जुड़ा–मैंने तोइसलिए उसे मैसेज किया था कि वो मेरी कुछ मदद करेगा मगरउसने तो मुझ पर प्रेशर बना दिया कि मैं उसी के घर मेंरहूंगा...साहब...यह मेरी गलती थी कि मैं उस घर मेंरहा...करीब बीस दिन उस घर में रहा। वो रोज रात कोबन-संवरता था और मेरे साथ सोता था–फिर पन्द्रह दिन पहलेमैं सेपरेट दूसरी जगह शिफ्ट हो गया–उसके बाद से तो आजतक उसकी मेरी बातचीत भी नहीं हुई है–न उसी ने फोनकिया और न मैंने ही कभी फोन किया।”

“डॉली से तुम्हारे कैसे सम्बन्ध रहे?”

“डॉली से? ठीक-ठाक रहे–नार्मली...पहले वो मुझसेचिढ़ती थी, फिर उसने देखा कि मैं उसे कभी कोई नुकसाननहीं पहुंचाऊंगा तो उसके व्यवहार में चेंजिंग आ गयी–फिरजब में उस फ्लैट से निकल गया तो डॉली ने भी कभी मुझेकॉल नहीं की और मैंने भी कभी उसे कॉल करना जरूरी नहींसमझा।”

नाइक ने होंठ भींचे और उससे बोला–“ठीक है, तुम जासकते हो–उस मोटी औरत को भेज देना।”

सन्नी राम-राम करता हुआ कुर्सी से उठा और बाहर निकलगया।

नाइक अखिलेश से बोला–“इसने कन्फर्मेशन दे दी कि ऋषभ ने जो बोला था, सच बोला था।”

अखिलेश ने हुंकारा भरा ही था कि शन्नो भीतर आ गयी।

नाइक ने कुर्सी पर बैठाया–“बैठिए।’

शन्नो इस तरफ पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी।

नाइक ने पूछा –“बैंक में कैसे हंगामा काट रही थीं आप?”

“साहब...यह जो अभी गया है, इसी ने मेरे दामाद राजको गायब किया है–।”

“यह गायब क्यों करेगा?”

“यह साला हरामी है–इसने फुसलाकर राज का माइंडचेंज कर रखा था–यह बहुत कमीना है, बहत ढीठ, बेशर्म है।पहले यह राज के ही घर में रहता था–उसके साथ बेशर्महरकत करता था तो मेरी बेटी ने हड़काकर इसे घर से निकालातो इसने राज को गायब करके बदला लिया है–पता नहींइसने कहां छिपाकर रखा हुआ है–इसे हड़काकर पूछिए, इसपर थर्ड डिग्री यूज कीजिए–राज के बारे में इसी को पताहै–।”

“ठीक है हम पूछ लेंगे–इस केस में तुम और क्या जानतीहो?”

“बस साहब मेरा दामाद मुझे मिल जाये, मेरी टेंशन खत्महो जाये। पता नहीं इसने उसे कहां गायब कर दिया है।”

“तुम्हारी बेटी जिससे प्यार करती थी, तुमने उसके साथउसकी शादी क्यों नहीं की?”

“प्यार करती थी? आपको किसने बताया और इस मामलेमें आप इस दूसरे लडके को क्यों लाये हैं उठाकर?”

“अगर तुमने इसी के साथ डॉली को ब्याह दिया होता तोआज तुम्हें यह दिन नहीं देखना पड़ता–आखिर तुम लोग बच्चोंके मां-बाप होते हो या उनके फ्यूचर के दुश्मन–यह पागलपंतीतुम लोग कब छोड़ोगे?”

शन्नो एकटक नाइक को देखती रह गयी थी।

खुले मुँह से बोली–“क्या यह सारी कहानी यह लड़काऋषभ बताकर गया है?”

“उसके बताने न बताने से तुम्हारे क्रूर फैसलों का पाप नहींधुल जाएगा–आखिर तुम लोग औलाद को क्या समझकर पैदाकरते हो। इसलिए कि एक बच्चे को जन्म दे रहे हो या इसलिएकि एक गुलाम को, प्रजा को जन्म दे रहे हो जिसको तुम्हारेआदेशों का पालन करना परम कर्त्तव्य होगा और जिसके सपनेतुम्हारी तानाशाही की वेदी पर बलि चढेंगे और तुम्हारे अंदरका शैतान अट्टहास करेगा क्योंकि तुम्हारी कुंठा को शांति मिलेगी–?”वह सांस लेकर तुरन्त आगे बोला–“आखिर क्यासमझकर तुमने डॉली की शादी ऋषभ से नहीं होने दी– ?”

“अरे साहब वो अदर कास्ट है, नीच जाति का है।”

“तुम्हें ये इल्म है कि तुम्हारी सोच कितनी नीच है?”

वह बिजली की तरह कड़क रहा था जिसका सामना शन्नोनहीं कर पा रही थी।

“यह थोथे विचार, ये रूढ़ियां पता नहीं कब इन भारतवासियोंके जेहन से आऊट होंगी–तुम्हें पता है कि तुम्हारी इसी नीचसोच की वजह से भारत हजार साल तक गुलाम रहा था–प्रकृतिने तुम्हें कड़ी सजा दी थी तुम्हारी उस हिमाकत की मगर सबकतुमने आज भी नहीं उठाया है–रस्सी जल गयी है मगर बलनहीं गये हैं–क्या होती है नीच जाति? क्या ऋषभ या उसकेजाति वालों के पास मस्तिष्क नहीं है, वो सोचना-समझना नहींजानते–उन्हें कौन-सा कौशल नहींआता है यह बताओ मुझे,आखिर तुमने कैसे जाना कि वो नीच है–?”

शन्नो चुप बैठी रही। बगलें झांकती रही।

नाइक फिर बिजली की तरह कड़का–“हर व्यक्ति का, हरलड़का-लड़की का जन्मसिद्ध अधिकार है कि वो किसी से प्यार करे, फिर उससे शादी करे, उसके साथ आलिंगन हो, उसकेसाथ अपनी दुनिया बसाये और तुम जैसे तानाशाह जो प्रकृति का मजाक उड़ाने के लिए पैदा हुए हो–क्योंकि तुम प्रकृति केउसूलों के खिलाफ मुहिम चलाते हो–तुम्हारा काम है किसी के भविष्य को तहस-नहस करना, उसके सपनों को स्वाहकरना–मालूम है कितना बड़ा पाप है यह? इसी पाप कीभगवान ने तुम्हें यह सजा दी कि तुम्हें हिजड़ा दामाद दिया–जबतुम्हारी बेटी खून के आंसू बहाएगी तो उसकी पीड़ा से तुमचाहकर भी खुद को मुक्त नहीं कर सकतीं–यही सजा है तुम्हारी तिल-तिल मरना और यह तुम्हारी उसी नीच सोच कीवजह से है जिसके तहत तुम किसी इंसान को नीच जाति कासमझने का पाप करती हो।”

शन्नो शर्मसार बैठी थी।

नाइक के दांत किटकिटा रहे थे। वह बहुत नफरत कीदृष्टि से शन्नो को देख रहा था मानो किसी बहुत नीच वस्तुको देख रहा हो।

“चला गया वो अपने तबेले में जहां उसकी तरह तालीबजाने वाले रहते हैं–अब तुम्हारा ऊंची जाति वाला छक्कादामाद कभी लौटकर नहीं आएगा क्योंकि उसे पत्नी की नहींपति की जरूरत थी–वह चला गया अपने पति के पास–।”

वह आगे बोला–“जाओ–अब मैं तुम्हारा प्रायश्चित करूंगा,इसी थाने में डॉली और ऋषभ का विवाह होगा और मैंकराऊंगा और किसी ने नौटंकी दिखाई तो उठाकर ठूंस दूंगाजेल में–जाओ...तुम लोग जाओ–।”

शन्नो झटके के साथ हैरान दृष्टि से नाइक को देखती रहगयी।

और उससे ज्यादा हैरान दृष्टि से अखिलेश नाइक को देखरहा था।

अखिलेश की तो बुद्धि चकरा रही थी।

जैसे कोई तश्तरी हवा में तैर रही हो।

☐☐☐

उन लोगों के बाहर जाने के बाद नाइक ने अपना फोन रेकार्डिंग और फ्लाइट मोड से हटाया ।

मोबाइल में सिगनल आते ही मिस काल मैसेज मिलना शुरू हो गये जिसमें एसएसपी अमित कुमार का भी मैसेज था ।

नाइक ने अमित कुमार को फोन किया ।

उधर से रिसीव हुआ—“हैलो ।”

नाइक बोला—“जय हिंद सर ।”

“जय हिन्द—उस लावारिश लाश के सम्बन्ध में क्या इन्वेस्टीगेशन चल रही है ?”

“अभी तक तो कुछ नहीं हो पा रहा सर—जब तक लाश या कपड़ों की शिनाख्त नहीं होगी तब तक इन्वेस्टीगेशन को कोई दिशा नहीं मिलेगी ।”

अखिलेश की आंखें गोल हो गयी थीं । अब तो उसकी बुद्धि फिरकनी बन चुकी थी । समझ में नहीं आ रहा था कि यह माजरा क्या है मगर अब समझ में आने लगा था । ये शायद पचास हजार रुपये की ताकत थी जो नाइक से अनुचित फैसले करवा रही थी ।

मगर नाइक को जहां तक वो जानता है, पचास हजार की रकम तो प्रभावित नहीं कर सकती, तो फिर इस व्यवहार का क्या कारण है ?

अखिलेश की आंखें गोल हो रही थीं और बुद्धि फिरकनी ।

प्रत्युत्तर में दूसरी तरफ से नाइक के कान में शब्द पड़े—“थाना प्रेमनगर में आज एक गुमशुदगी दर्ज हुई है—गुमशुदा व्यक्ति की उम्र लावारिश लाश से मेल खाती है । इसलिए एक बार उस परिवार के यहां जाकर पूछताछ कर सकते हो— ।”

“मैं वहां हो आया सर और उस परिवार के कई सारे लोगों को थाने भी ले आया पूछताछ के लिए— ।”

“हूं—S—हूं—SS ।”

“मगर लावारिश लाश से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है, पूछताछ में पता चला है कि वहां मामला दूसरा है —उसका पति गे है, बीवी से रोज झगड़ा रहता था, उसे पत्नी की नहीं पति की जरुरत थी—आखिर रोज-रोज की कलह से तंग आकर वो घर छोड़कर चला गया है— ।”

“ओह— !”

“यस सर, इस लावारिश लाश का जैसे ही कोई क्लू मिलेगा, मैं जोर शोर से इन्वेस्टीगेशन शुरू कर दूंगा मगर अभी हमारे पास कोई दिशा नहीं है ।”

“पोस्टमार्टम कब होगा ?”

“आज देर शाम होगा—कल को हम बॉडी उठाकर लाएंगे, फिर क्या करना है सर, किसे सौंपनी है ?”

“चूंकि लाश हिन्दू समुदाय से ताल्लुक रखती है इसलिए किसी हिन्दू वेलफेयर सोसायटी को सौंप देना, वे अंतिम संस्कार कर देंगे ।”

“ओके सर— ।”

कॉल डिसकनेक्ट हुई ।

अखिलेश नाइक को यूं अचरज से देख रहा था मानो कोई किले के प्रांगण में कुतुबमीनार को ठुमके लगाते देख रहा हो ।

ऐसा ही अविश्वसनीय भाव था अखिलेश के चेहरे पर ।

अखिलेश नाइक से बोला—“सर आपने...हत्यारे को भी जाने दिया—?” वो चकित स्वर में पूछ रहा था ।

“हां— ।”

“क्यों—?”

नाइक ने अखिलेश की आंखों में विद्रोह पाया । नाइक उसकी आंखों में झांकता रह गया ।

उसने गहरी सांस छोड़ी ।

☐☐☐
 
नाईक ने इस बार बोतल से पानी मुंह में उंड़ेला तो बोतल खाली करके ही छोड़ी ।

अखिलेश प्रश्नों का तनाव चेहरे पर लिए बैठा था ।

नाइक उससे बोला—“सारा मामला तुम्हारे सामने है—इसमें इन्सानियत पहलू क्या कहता है, मैं तुमसे पूछता हूं—?”

नाइक ने अखिलेश की तरफ प्रश्न उछाल दिया था ।

मगर अखिलेश भी पहले से कसा हुआ तैयार बैठा था । वह बोला—“हम यहां इंसानियत के प्रचार-प्रसार के लिए नहीं बैठे हैं, न हमने उस पर कोई पीएचडी कर रखी है—हम कानून के नौकर हैं, हमें कानून का काम करना है, इसमें हमारे अपने नजरिये की कहां गुंजाइश है—?”

नाइक थोड़ा ठहरा ।

थोड़ा अंतराल लिया ।

और ठहरे हुए शब्दों में बोला—“ठीक है, हम कानून के नौकर हैं—ठीक है हमने ऋषभ और डॉली को अभियुक्त बनाकर कोर्ट में पेश कर दिया—वहां अगर यह दोनों सबूतों के अभाव छूट जाते हैं, जैसे कि बहुत मामलों में होता, फिर आप क्या करेंगे—?”

“हमारा कर्त्तव्य सर कोर्ट तक अभियुक्त को पहुंचाना है, उसके खिलाफ जितने सुबूत मिलते हैं उन्हें पेश करना है, यहां हमारे कर्त्तव्य की इतिश्री हो जाती है—फिर वो सजावार होते हैं या छूटते हैं, इससे हमें क्या मतलब है—आपके कहने का मतलब है कि जब अभियुक्त कोर्ट से छूट ही जाता है तो बेहतर है कि उसे थाने से ही छोड़ दिया जाये, यही कहना चाहते हैं सर आप ?”

“नहीं-नहीं— ।”

“आपकी मंशा यही है सर । तब तो देश का निजाम तहस-नहस हो जाएगा—अगर थाने में ही फैसले होने लगे तो यह देश चार दिन भी नहीं चल पाएगा सर और अराजक शक्तियां सिर उठाकर खड़ी हो जाएंगी ।”

“मैं मानता हूं ।” नाइक कसमसाकर बोल रहा था—“मुझे डॉली की जिंदगी पर तरस आ रहा है, प्लीज एक बार तुम इंसानियत की दृष्टि से सोचो—सपोज करो डॉली तुम्हारी बहन है—एक बार मानो कि तुम्हारी अपनी बहन के साथ...क्या नाम है तुम्हारी बहन का ?”

“अर्पिता— ।”

“गुड—जरा गहराई से सोचो कि अर्पिता का पति गे निकल आता है और उसे पत्नी में कोई दिलचस्पी नहीं है । वो अपने लिए लड़के लाता है और उसी घर में रखता है—अर्पिता किस नर्क से गुजरती है, अर्पिता के सामने उसका पति सजता-संवरता है और अपने कथित पति के साथ कमरे में बंद हो जाता है । जरा अर्पिता के इस दर्द को महसूस करो—उसके पास दो रास्ते हैं कि या तो उसका पति उसे डिवोर्स दे दे जो कि वो नहीं दे रहा है या फिर वो उस नर्क से निकलने के लिए सुसाइड को एक रास्ता मानती है—तुम्हारे ख्याल से अर्पिता को क्या सुसाइड कर लेना चाहिए—?”

“नहीं—उसे फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी करके कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए और डिवोर्स मांगना चाहिए ।”

नाइक मुस्कुराया और बोला—“कानून के बारे में तुम अच्छी तरह से जानते ही हो—किसी भी मामले को दस-बारह साल आसानी से लटकाया जा सकता है या—पांच साल वर्ष आगे खींचा जा सकता है—राज अगर अपना मर्दाना सर्टिफिकेट कोर्ट में लगा दे तो अर्पिता का पक्ष कमजोर माना जाने लगेगा । बहरहाल यह तो कोर्ट का मैटर हुआ लेकिन तुम जानते हो कि बहुत मामलों में शर्म-लिहाज और सामाजिक संस्कारों के चलते लड़की कोर्ट तक पहुंचती ही नहीं क्योंकि उसकी अपनी फैमिली उसके साथ खड़ी नहीं होती तो ऐसे मामलों में डॉली के पास एक ही रास्ता बचता है और वो है सुसाइड— ।”

“लेकिन तब भी सर डॉली को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वे मर्डर कर दें—मर्डर को क्षमा नहीं किया जा सकता ।”

नाइक चुप रहा ।

वह बोलने को शब्द ढूंढता रहा जिससे कि अखिलेश को प्रभावित कर सके मगर सच यह था कि उसे अपने शब्द खोखले प्रतीत हो रहे थे ।

नाइक समझ चुका था कि मैं अखिलेश को प्रभावित नहीं कर पाऊंगा ।

नाइक बोला—“मैं क्या समझाना चाहता हूं, तुम अच्छी तरह समझ रहे हो और तुम मुझे क्या समझाना चाहते हो, यह बात मैंने समझ ली है तब भी तुम मुझसे इत्तेफाक नहीं रखते और मैं भी तुमसे इत्तेफाक नहीं रखता—हालांकि तुम्हारा मुझसे इत्तेफाक ना रखने का उचित और ठोस कारण है, मेरा तुमसे इत्तेफाक न रखने का कानूनी तौर पर अनुचित कारण है और इंसानियत के तौर पर मजबूत कारण है मगर तुम जब उसको मान नहीं रहे तो उसे मजबूत भी नहीं कहा जा सकता— ।”

थोड़ा ठहरकर अखिलेश बोला—“सर अपराधी, अपराधी है—कुछ और नहीं है—अपराध पर दफाएं लागू होती हैं, भावनाएं लागू नहीं होतीं—मेरा तो बस इतना ही मानना है— ।”

“क्या तुमने ऋषभ के बयान को टेप किया था ?”

“नहीं, आप तो कर रहे थे ।”

“गुड— ।” नाइक फोन की गैलरी में गया और उस आडिओ को डिलीट मार दिया ।

लेकिन इसका पता उसने अखिलेश को नहीं चलने दिया ।

नाइक लंबी सांस छोड़ता हुआ बोला—"ओके अखिलेश, तुम इस मामले को देखो, मैं कोई हस्तक्षेप करूंगा क्योंकि मैं कोई हस्तक्षेप कर ही नहीं सकता—मुझे कल से इमर्जेंसी लीव पर जाना है । तुम जैसे चाहे केस हैंडिल कर सकते हो और हो सकता है आफ्टर लीव मेरा ट्रांसफर हो जाये— ।”

अखिलेश शून्य दृष्टि से नाइक को देख रहा था ।

“चलो अब तुम बाहर जा सकते हो— ।”

अखिलेश उठा और बाहर निकला । अभी गेट तक ही पहुंचा था कि नाइक बोला—“अरे...यह क्या हुआ—मैंने तो उस रिकार्डिंग को सेव किया था लेकिन यह तो सेव ही नहीं हुई— ।”

अखिलेश मन-ही-मन बुदबुदाया—“पचास हजार रूपये हजम करना चाह रहा है ।”

☐☐☐

आधा घण्टा बाद ही ऋषभ पुनः इंस्पेक्टर नाइक के समक्ष बैठा था ।

कक्ष में नाइक और ऋषभ ही थे ।

अखिलेश को भीतर नहीं बुलाया था ।

नाइक ऋषभ से बोला—“मेरी एक-एक बात ध्यान से सुनना—तुम्हें बहुत सावधानी और परिश्रम की जरुरत है वरना तुम्हें जेल में सड़ने से कोई नहीं रोक सकता— ।”

ऋषभ जर्द चेहरा लिए नाइक को देखता रहा ।

नाइक आगे बोला—“मैंने जो तुम्हें पचास हजार की बात कही थी... ।”

“जी सर...मैं अभी डाल देता हूं एकाउण्ट में ।”

“वो एक झांसा था—मैं कभी रिश्वत नहीं लेता हूं—मेरे जीने का अपना स्टाइल है और आज मेरे उस स्टाइल ने ही मुझे दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है—मेरी नौकरी तक जाने के चांसेंज हैं—हो सकता है मैं नौकरी गंवा दूं, मगर अपने मूल्यों से समझौता नहीं कर सकता—मैंने देखा है लगभग साठ प्रतिशत केसेज में अपराधी पर्याप्त सुबूत न होने की वजह से छूट जाते हैं—जब अपराध करने के बाद भी अपराधी को कोर्ट इस विवशता के चलते छोड़ देती है कि उसके खिलाफ पर्याप्त सुबूत नहीं थे या जो सुबूत पेश किये गये थे उसको बचाव पक्ष ने भ्रामक बना दिया और कोर्ट कन्फ्यूज हो गयी, इस लाभ में अपराधी छूट जाता है— ।” नाइक ने गहरी सांस ली और आगे बोला—“मेरा जोर इसी बात पर है कि जब अपराध करने वाले को छोड़ने का इतिहास रहा हो तो एकाध मामले में इंसानियत के बल पर किसी अपराधी पर केस ही न बनाया जाये तो कौन-सा अनर्थ हो जाएगा, ड्यूटी के साथ कौन सी गद्दारी हो जाएगी—मेरे ख्याल से गद्दारी नहीं होगी— ।”

ऋषभ बैठा सुन रहा था । शब्द समझ में भी आ रहे थे लेकिन बात पल्ले नहीं पड़ रही थी ।

नाइक उसकी आंखों में झांकता हुआ बोला—“मेरी बात बहुत ध्यान से सुनो । कल से मैं छुट्टी पर चला जाऊंगा—अभी मैंने जो तुमसे पूछताछ की थी, वो तुम्हें झांसे में लेकर की थी, अंधेरे में तीर चलाया था । हमें पता नहीं था कि हत्या तुमने ही की है लेकिन तुम झांसे में आ गये और हम पर विश्वास करके सबकुछ सच-सच बता दिया लेकिन यह गलती अब आगे मत करना—अगर दोबारा ऐसी गलती दोहरायी तो उम्रकैद के लिए तैयार रहना ।”

ऋषभ की सूरत निचुड़ गयी ।

जैसे कोल्हू के पाटों के बीच से गुजार दिया हो ।

नाइक बोला—“मुझे तुमसे सहानुभूति है और वो भी तुमसे नहीं है बल्कि तुम्हारी कहानी से सहानुभूति है मुझे, खासकर डॉली के दुर्भाग्य से । इसलिए मुझसे जो बन पड़ रहा था मैं करने की कोशिश कर रहा था मगर अफसोस अब नहीं कर पा रहा हूं—तुमसे फिर बयान लिये जाएंगे—अब किसी झांसे में आकर सच मत बोल देना, लगातार झूठ बोलना कि यह हत्या मैंने नहीं की है—तुम्हारे खिलाफ बस एक सुबूत है और वो है खून सनी बोतल जिससे तुमने ह्यूम पाइप से बाहर आकर, रोड पर हाथ धोये थे, उस बोतल पर तुम्हारे फिंगरप्रिंट हैं, वरना तुम्हारे खिलाफ कोई सुबूत नहीं है ।”

“खंजर और हैमर पर भी तो मेरे फिंगरप्रिंट्स होंगे ?”

“नाले में डूबे होने के कारण उस पर से निशान नहीं उठाये जा सके ।”

“हूं— ।”

“तुम्हारे खिलाफ बस एक ही सुबूत है—वो बोतल—मैं तुम्हें उस अधिकारी का फोन नंबर हुए एड्रेस दूंगा—तुम उसे खरीद लेना, वो बिक जाएगा, ऐसा मैं जानता हूं, मगर यह मत बताने लगना कि मैंने भेजा है और न इसमें मैं तुम्हारी कोई मदद कर सकूंगा...एक बार अगर तुमने वो बोतल हथिया ली तो फिर तुम्हें कोई खतरा नहीं है—बस तुम लगातार इंकार करते रहना कि यह काम मैंने नहीं किया है, मैं निर्दोष हूं—समझ गये—?”

“समझ गया से—वो अधिकारी कितने रूपये से मान जाएगा— ।”

नाइक ने थोड़ी देर सोचकर बताया—“तीन से पांच के बीच— ।”

“कितना—लाख—?”

“हां— ।”

ऋषभ की आंखें खुली की खुली रह गयीं । उसके मस्तिष्क में पनपा कि यह मेरे साथ गेम खेल रहा है—मुझे नये-नये बहाने से लूट रहा है ।

ऋषभ बोला—“पहले तो आपने मुझे बताया नहीं था कि किसी अधिकारी को भी पैसे देने पड़ेंगे—पहले तो आप कह रहे थे कि बस पचास हजार दे दो, मैं बचा लूंगा ।”

“वो मेरा झांसा था जिसके बारे में मैंने तुम्हें बताया— ।”

“अब क्या पता क्या सच है—फिर ऐसे तो कल को कोई और निकल आएगा कि इसे भी पैसे दो ।”

नाइक ठहरी हुई आंखों से ऋषभ को देखने लगा । उसके मन में ख्याल आया कि उसकी मदद करके कहीं मैं बेवकूफी तो नहीं कर रहा हूं ।

क्योंकि यह अनचाही मदद है । कोई जब गिड़गिड़ाये तो उसके लिए मदद के बड़े मायने होते हैं और खुद-ब-खुद मदद करो तो व्यक्ति शक्की हो जाता है कि कहीं मुझे फांसा तो नहीं जा रहा है— ।

नाइक ऋषभ को ठहरी हुई दृष्टि से देखता रहा ।

शुष्क आंखों से—

तब भी बोला—“घर जाकर सोच लेना, जो उचित लगे करना—मैं कल से छुट्टी पर चला जाऊंगा । मोटे तौर पर तीन बातें मेरी सुन लो—एक, उस बोतल को हथियाना, चाहे किसी कीमत पर हाथ आये क्योंकि उस पर तुम्हारे फिंगरप्रिंट हैं, वो अकेला सुबूत तुम्हें सजा करा देगा—दूसरा उन जूतों को कहीं नष्ट कर देना जो घटना के वक्त पहन रखे थे और तीसरा डॉली से फोन पर कभी बात मत करना क्योंकि तुम्हारे नम्बर ट्रेस हो रहे हैं— ।”

“ओ माय गाड !”

नाइक ने अपने मोबाइल से उतारकर एक नम्बर और नाम और एड्रेस एक कागज पर नोट करके ऋषभ को दिया और कहा—“यह फिंगर एक्सपर्ट का नाम-नम्बर, एड्रेस है, इससे अभी सम्पर्क कर लेना, तुम्हारे पास ज्यादा वक्त नहीं है—हो सकता है रात में ही तुम उठा लिये जाओ । फिर कोर्ट से जमानत पर ही बाहर आ सकोगे—समझे ?”

ऋषभ एकाएक नाइक को देख रहा था और समझने की कोशिश कर रहा था । उसने वो कागज लेकर अपने पर्स में ठूंस लिया ।

नाइक बोला—

“तुम जा सकते हो ।”

हैरानी की पराकष्ठा लिए ऋषभ वहां से उठ गया । नाइक के अंतिम वाक्यों ने उस पर गहरा प्रभाव डाला था ।

वह उठकर खड़ा हो गया ।

☐☐☐
 
ऋषभ प्रांगण में खड़ी अपनी बाइक की तरफ बढ़ रहा था कि अखिलेश ने पुकारा लिया—“ऐSS, इधर आ ।”

ऋषभ ने मुड़कर देखा । वह अखिलेश की तरफ बढ़ा । अखिलेश स्वयं उस स्थान से उठकर ऋषभ की तरफ आने लगा था ।

दोनों मिले ।

अखिलेश गहन दृष्टि चेहरे पर रखे बोला—“कितने रुपये ट्रांसफर किये ?”

“रूपये ? नहीं तो, उन्होंने मना कर दिया—बोले मैं कभी रिश्वत नहीं लेता हूं ।”

“तो फिर दोबारा क्यों बुलाया था ?”

“कुछ ऐसे ही बातें बता रहे थे ।” बहुत देर तक रटाने के बाद ऋषभ के कुछ तो पल्ले पड़ गयी थी । इतना तो वो जान गया था कि किसी को कुछ नहीं बताना है ।

सो बोला—“ऐसे ही बस पूछताछ कर रहे थे ।”

“क्या पूछताछ ?”

“अभी मैं जल्दी में हूं सर, बाद में बताऊंगा ।” वह पीछा छुड़ाते हुए बाइक की तरफ बढ़ा ।

और इस अंदाज में कि अब बुलाये भी तो नहीं सुनने वाला ।

वह बाइक पर बैठा और स्टार्ट की और चल पड़ा ।

☐☐☐

अगले दिन अखिलेश ने ऋषभ को तलब कर लिया था । इंस्पेक्टर संदीप नाइक छुट्टी पर चला गया था और लावारिश लाश का केस अखिलेश के हाथ आ गया था ।

अब अखिलेश ही सर्वेसर्वा था और इसको लेकर वह बहुत उत्साहित भी था । उसके पास एक मौका था खुद को साबित करने के लिए—एक लावारिश लाश के केस को साल्व करना और उसके हत्यारे तक पहुंचना, चार्जशीट तैयार करना, यह तो बड़ा कर्त्तव्यपरायण का सबूत था, वरना लावारिश लाश का केस कौन देखता है ? जिस कसे की पैरवी न होती हो तो भला उसमें कौन अधिकारी मेहनत करना चाहेगा ?

मगर अखिलेश खुद को साबित करना चाहता था । केस तो उसके सामने क्लियर हो ही चुका था, इसमें सारी मेहनत इंस्पेक्टर नाइक की ही थी मगर पता नहीं कैसे नाइक का ह्रदय परिवर्तन हुआ था कि इतनी मेहनत करने के बाद जब केस सॉल्व कर दिया और जब उसका श्रेय लेने का नम्बर आया तो पता नहीं क्या बोधत्व जगा कि केस से ही कदम वापस खींच लिए । हत्यारों को बजाय सजा के, उन्हें इनामो-इकराम से नवाजने की बातें करने लगे ।

दोनों की शादी कराये दे रहे हैं ।

नाइक की यह भूमिका अखिलेश की बुद्धि में नहीं फंसी । प्रयत्न के बाद भी उसकी समझ में नहीं आया कि नाइक ऐसा क्यों करना चाह रहा है , भला एक पुलिस अधिकारी का कौन-सा उद्देश्य सफल हो रहा है ?

नाइक के छुट्टी जाते ही अखिलेश ने ऋषभ को उठा लिया । ऋषभ रातभर अपने रूम पर नहीं मिला था ।

सुबह बैंक ड्यूटी आया था, वहीं से पुलिस ने उसे अरेस्ट कर लिया था ।

ऋषभ रातभर अपनी मेहनत में जुटा रहा था । उसने डॉली से भी मुलाकात की थी ।

अभी जब अखिलेश उसे अपने सामने बैठाकर पूछा—“वो कहानी फिर से दोहराओ— ।”

“कौन-सी कहानी सर ?”

“जो कल दोहरायी थी ।”

“अच्छा— ।” ऋषभ ने सांस ली और भूमिका तैयार की । तदुपरांत बोला—“किसी जमाने में मैं और डॉली दोस्त थे—शायद हमारे बीच का रिश्ता प्यार ही कहलाता है—यह सच है कि मैं डॉली से शादी करने का इच्छुक था मगर भगवान को यह मंजूर नहीं हुआ और डॉली की शादी दूसरी जगह हो गयी—कोई बात नहीं, प्रेयसी छूट गयी तो जिंदगी खत्म नहीं हो जाती, बस इसी फलसफे को मानकर मैंने जीना शुरू कर दिया और आज जो कुछ हूं आपके सामने बैठा हूं... ।”

ऋषभ चुप हुआ तो बोला ही नहीं, अखिलेश प्रतीक्षा करता रहा । उसका मोबाइल रिकार्डिंग मोड पर लगा टेबिल पर रखा था ।

जब ऋषभ चुप्पी साधकर बैठा ही रह गया तो अखिलेश ने टोका—“आगे ।”

“आगे क्या ? कहानी तो खत्म हो गयी ।”

“फिर तुमने मर्डर कैसे किया ?”

“कौन-सा मर्डर ?”

“राज का ।”

“राज—?— कौन राज ?”

अखिलेश ने ठहरी हुई दृष्टि से ऋषभ को देखा और बोला—“हमें बुलवाना भी आता है— ।”

“आप क्या कह रहे हैं, सर मेरी समझ में नहीं आ रहा ।”

“आएगा समझ में, पुलिस के सामने पत्थर बोलते हैं, थोड़ी आवभगत की जरुरत है तुम्हें ।”

अखिलेश ने एक कांस्टेबिल को बुलाया और उससे बोला—“इन्हें ले जाओ और तब लाना जब यह बोलने लगें— ।”

कांस्टेबिल ने ऋषभ का कॉलर पकड़ लिया और खींचा—“चल ।”

“एक मिनट भाई साहब—मेरा वकील पांच मिनट में आने ही वाला है । उसके बाद आप जो चाहे करना, मैं प्रतिरोध नहीं करूंगा ।”

वकील का नाम सुनते ही अखिलेश की परेशानी पर बल पड़ गये ।

☐☐☐

पोस्टमर्टम होकर लाश थाने आ गयी थी । अखिलेश हर चन्द सूरत लगा था कि वो ऋषभ और डॉली का पर्दाफाश कर दे लेकिन अब यह काम उसके लिए बड़ा दुरूह बनता जा रहा था । उसने डॉली से भी पूछताछ कर ली थी । दोनों ही इकरार नहीं कर रहे थे कि हत्या में उनका कोई हाथ ही सकता है । अब तो सुबूतों के माध्यम से ही उन्हें मुजरिम ठहराना था ।

उनका वकील थाने में आकर बैठ गया था । ऐसे सूरत में ऋषभ डॉली से सवाल-जवाब तो कितने भी तीखे किये जा सकते थे मगर थर्ड डिग्री नहीं लगाई जा सकती थी ।

और सवालों के कब्जे में वे दोनों आ नहीं रहे थे ।

लाश को राज के परिवार वालों को दिखलाया गया ताकि लाश की शिनाख्त हो सके ।

लाश कई दिन पुरानी हो गयी थी । त्वचा का कलर तक चेंज हो गया था ।

चेहरा तो नदारद था ही उसका ।

राज के परिवार से डॉली, पिता चन्द्रभान सिंह और भाई देवेन्द्र आया था, शन्नो भी वहां मौजूद थी ।

राज की मां थी नहीं और एक भइया-भाभी दूर रहते थे जिन्हें आने में कई दिन लगते ।

परिवार ने उस वीभत्स लाश को देखा ।

चेहरा तो छिपा ही दिया गया था, बाकी बाडी दिखाई थी ।

डॉली, चन्द्रभान, देवेन्द्र और शन्नो उस बाडी को गौर से देख रहे थे ।

सर्वप्रथम डॉली बोली—“नहीं, इसको हम नहीं पहचानते— ।”

अखिलेश ने चन्द्रभान और देवेन्द्र से पूछा—“आप लोग—?”

वे बॉडी को गौर से देख रहे थे ।

बॉडी की कंडीशन बहुत खराब हो चुकी थी ।

डॉली पुनः जोर से बोली—“नहीं भइया, इस बाडी को हम नहीं पहचानते हैं—भगवान न करे...हमारे वो तो तन्दुरुस्त थे—नहीं...यह कोई और है—क्यों मम्मी—?”

“नहीं, राज तो ऐसे कहां थे—हृष्ट-पुष्ट थे, ये तो कोई और है—भगवान न करे...राज तो कहीं सही-सलामत हैं, मैंने रात ही उन्हें सपने में देखा है ।”

चन्द्रभान ने बॉडी देखते हुए इंकार कर दिया—“इसे हम नहीं पहचानते— ।”

अखिलेश ने बड़ी हारी हुई सांस छोड़ी ।

मायूसी ने उसके चेहरे पर अधिपत्य जमा लिया ।

☐☐☐
 
डॉली ने घर-परिवार में यह सबको बता दिया था कि राज वास्तविक रूप से क्या था ।

उसके पास जो फोटोग्राफ्स थे, वो भी उसने दिखा दिये थे । इस कारण चन्द्रभान और देवेन्द्र की नजर नीची रहती थी । वे बहुत शर्मिंदा थे । फोटो और वीडियो देखने के बाद तो कुछ कहना बाकी नहीं बचा था ।

मगर उन लोगों को भी नहीं पता था कि एक घटना उनके जीवन में ऐसी घटने जा रही है जो उनके होशो-हवास उड़ा देगी ।

हुआ यूं कि वे थाने से वापस आ रहे थे । ऑटो में बैठे थे ।

उस समय शन्नो अपनी आदतानुसार बड़बड़ा रही थी और चन्द्रभान से कह रही थी—“राम-राम...कैसी भयानक लाश हमारे सामने रख दी—अरे भला हमारा उससे क्या मतलब है—वो हमारा राज कैसे हो सकता है—राम-राम-राम...यह पुलिस अपने ऊपर से बोझ उतारना चाह रही है ताकि हम किसी लाश की शिनाख्त कर दें और पुलिस यह कहने की हकदार बन जाये कि हम गुमशुदा को अब क्यों ढूंढे, वो तो मर गया—ले बता, वो हमारे जिंदा को मार डाल रहे हैं— ।”

चन्द्रभान ने स्वीकृति में ऊपर-नीचे गर्दन हिलायी । बात उनकी समझ में आ गयी थी ।

वे लोग ऑटो से सफर कर रहे थे और घर जा रहे थे ।

शन्नो आगे कुछ कहती, उससे पहले डॉली की एक चीख ने उसका ध्यान भंग कर दिया—“मम्मीSS— !”

“क्या हुआ ?” सभी चौंक उठे ।

“राज— ।” डॉली फैली आंखों से एक तरफ देख रही थी और ड्राइवर से बोली—“ऑटो रोको ।”

उसने ब्रेक मारे ।

“कहां है राज ?” शन्नो समेत सब देखने लगे ।

“वो देखो— ।” डॉली ने अंगुली से इशारा किया ।

वह एक थर्ड जेंडर था जो सलवार सूट पहने था । यह वही सूट था जो डॉली अपना नाप देकर सिलवाकर लाई थी और राज ने लिए सिलवाया था ।

“कहां है राज ?” वे लोग क्षणभर में ऑटो से कूदकर बाहर आ गये ।

“वो सलवार-सूट में—वो राज ही है ।” कहती हुई डॉली तेजी से उधर ही बढ़ी ।

पीछे-पीछे सब लोग चले ।

उस थर्ड जेंडर के मुंह से दुपट्टा बंधा था, खाली आंखें दिखती थीं । वह एक वैन के पास खड़ा था ।

डॉली उसके पास पहुंच गयी उसे पुकारा— “राज ।”

वह झटके के साथ मुड़ा—उसकी नजर इन सब पर। पड़ी उसके मुंह से निकला—“डॉली ।”

डॉली की आंखों से आंसू निकल पड़े थे । वह बोली—“कहां चले गये थे तुम ?”

“मैं आऊंगा डॉली—मैं तुम्हारे लायक नहीं हूं ।” उसकी आवाज भरभरा रही थी । मानो किन्नर जैसी आवाज बनाने के लिए वह कुछ उपयोग करता हो, इसीलिए उसकी आवाज भरभरा रही थी और किन्नर जैसी प्रतीत होती थी ।

राज की आवाज तो मानो कहीं खो गयी थी । वह कह रहा था—“मैंने तुमसे पहले भी कहा था डॉली तुम कहीं शादी कर लो—मैं घर आऊंगी मेरी बहन —मैं घर आऊंगी— ।” कहते हुए उसने वैन का दरवाजा खोला था । ड्राइवर ने वैन स्टार्ट की और फर्राटा भर गयी ।

वे लोग ठगे से खड़े रह गये ।

ऑटो चलालक भी वहां मौजूद था ।

देर तक उन लोगों के वजूदों पर सकता तारी रहा जैसे उनके होश उड़ चुके थे ।

जैसे पत्थर की शिला में तब्दील खड़े रह गये थे ।

उनके अंदर जुम्बिश तक बाकी नहीं थी ।

☐☐☐

“मीलार्ड— !” अदालत कक्ष में खड़ा बचाव पक्ष का वकील कहता चला गया—“पुलिस ने यह चार्जशीट बड़ी नादानी के साथ तैयार की है—ऐसा लगता है जैसे पुलिस पर दबाव था कि एक लावारिश लाश का कातिल उसे मेरे मुवक्किलों को ही ठहराना है । पुलिस ने कमअक्ली का सुबूत दिया है अपनी हास्यास्पद भूमिका को उजागर किया है—पुलिस चार्जशीट में कहती है कि डॉली और ऋषभ राज की हत्या के दोषी हैं क्योंकि ये दोनों पूर्व प्रेमी रह चुके हैं और डॉली शादी के बाद अपने पति से संतुष्ट नहीं थी इसलिए डॉली ने ऋषभ के हाथों अपने पति राज का मर्डर करा दिया—साथ में एक लंबी-चौड़ी कहानी पेश की है कि ऋषभ ने किस प्रकार राज को अपने पूर्व जन्म की कहानी सुनाकर अपने चक्रव्यूह में फांसा ताकि उसे एक सुनसान स्थान पर ले जाकर कत्ल कर सके—यह ऐसी हास्यास्पद कहानी है मीलार्ड कि सहसा पुलिस की मूर्खता पर हंसी आती है कि उसे एक झूठ को सच साबित करने के लिए कितने झूठ पर झूठ गड़ने पड़े हैं—मीलार्ड—खुद पुलिस की कहानी मुताबिक मेरे क्लाइंट्स ने राज की हत्या की है । किसी लावारिश लाश से मेरे क्लाइंट्स सम्बन्ध नहीं है—पुलिस की कहानी के अनुसार मेरे क्लाइंट्स का ताल्लुक सिर्फ राज नामक प्राणी से है और मैं अदालत में यह रहस्योद्घाटन करना चाहुंगा कि राज आज भी जीवित है । उस लावारिश लाश का राज से कोई लेना देना नहीं है, उस लाश के बाद कई लोगों ने राज को देखा था जिनमें राज के पिता और भाई भी मौजूद हैं, एक ऑटोवाला गवाह है, डॉली की मां गवाह है—मैं चाहूंगा राज के पिता चन्द्रभान सिंह जी को विटनेस बॉक्स में बुलाकर उनकी जवाही ली जाये ।”

अदालत कक्ष में पैना सन्नाटा पसर गया था ।

जिसने सुना उसका दिमाग तश्तरी बनकर हवा में तैरने लगा ।

क्या मृतक ही जीवित है ?

जज को भी खासी हैरत हुई ।

जज ने आदेश दिया—“चन्द्रभान सिंह को विटनेस बॉक्स में लाया जाए ।”

चन्द्रभान अपने स्थान से उठे और विटनेस बॉक्स में खड़े हो गये ।

वकील ने कुछ औपचारिकताएं पूर्ण करने के बाद पूछा—“वो लावारिश लाश जो नागले की पुलिया से मिली थी, क्या आपने उसको देखा था ?”

“हां मैंने उसे देखा था ।”

“क्या वो आपके बेटे राज की लाश थी ?”

“नहीं साहब, पता नहीं पुलिस को हमसे क्या दुश्मनी है—एक लावारिश लाश से पता नहीं क्यों हमारा सम्बन्ध जोड़ा जा रहा है, पता नहीं पुलिस को यह सब करके क्या मिल रहा है—?”

“आप थाने से वापस आ रहे थे, ऑटो में थे तो एक जगह आपने अपने बेटे राज को देखा था ?”

“हां साहब देखा था, मैं बहुत शर्मिंदा हूं और मैं अपनी बहू से माफी चाहता हूं कि हमारी जिद की वजह से उसकी जिंदगी खराब हुई—मेरा बेटा थर्ड जेंडर है—वो शादी को मना करता था लेकिन हम नहीं समझे थे—बाद में पता चला कि वह मन से एक औरत है... ।”

“आप थाने से वापस आ रहे थे तो आपने क्या देखा ?”

“वह लेडीज सूट में था—वह डॉली से कह रहा था कि मुझे माफ़ कर दो, मैं तुम्हारे लायक नहीं हूं, उसने डॉली को बहन कहकर पुकारा था, ऐसे अंदाज में जैसे दो औरतें बातें करती हैं—उसने यह भी कहा था कि डॉली को कहीं शादी कर लेनी चाहिए ।”

“यानी आप जानते हैं कि आपका बेटा जीवित है ?”

“बिलकुल जीवित है साहब—मैंने खुद देखा है अपनी आंखों से, मेरे बेटे ने देखा है, कई लोगों ने देखा है ।”

“वैरी गुड—दैट्स ऑल—आप अपने स्थान पर बैठ सकते हैं— ।”

सरकारी वकील के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था । वो पुलिस पर मन-ही-मन क्रोधित हो रहा था कि यह कैसा बकवास केस उसके गले डाल दिया ।

“योर ऑनर ।” बचाव पक्ष का वकील बोल रहा था—“जो शख्स जिंदा है उसके मर्डर में पुलिस ने मेरे मुवक्किल को फंसा दिया है—जानबूझकर—किसी प्रेशर तले—मेरे मुवक्किल का एक भी इकबालिया बयान नहीं है, वो हमेशा इंकार करता रहा कि मर्डर मैंने नहीं किया है, कोई सुबूत मेरे मुवक्किल के विरुद्ध नहीं मिला है—एक खून की बोतल मिली थी घटनास्थल पर—मैं रिपोर्ट पेश करना चाहूंगा । मेरे दोनों मुवक्किलों के फिंगरप्रिंट उस बोतल से मिले फिंगरप्रिंट से मेल नहीं खाते हैं—इसके अलावा खंजर और हैमर पर कोई फिंगरप्रिंट्स मिले नहीं हैं—क्योंकि वो पानी में डूबे हुए थे—मैं अदालत के समक्ष ये फिंगरप्रिंट रिपोर्ट पेश करना चाहता हूं— ।” उसने अर्दली को रिपोर्ट थमायी ।

☐☐☐

कक्ष में पैना सन्नाटा पसरा था ।

आज जजमेंट का दिन था ।

चूंकि केस शुरू से ही इकतरफा चला था । पुलिस की कहानी को प्राइवेट वकील ने निराधार साबित कर दिया था और सबसे बड़ी बात, जिसके मर्डर पर इन दो अभियुक्तियों को फंसाया गया था गवाही के मुताबिक़ वो व्यक्ति जिंदा था तो भला उसके मर्डर का केस कैसे चल सकता था ?

जज की आवाज ने कक्ष के पैने सन्नाटे को भंग किया—“तमाम गवाहों और सुबूतों की रोशनी में यह अदालत अभियुक्त ऋषभ महतो और डॉली सिंह को कथित राज हत्याकाण्ड से बरी करती है, चश्मदीद गवाहों के अनुसार राज जीवित है, खुद राज के पिता ने उसके जीवित होने की गवाही दी है जो कि विश्वसनीय है—मुलजिमों के खिलाफ कोई भी सुबूत पुलिस पेश नहीं कर पाई—पुलिस ने एक कहानी बनाई जो कल्पना के सिवा कुछ नहीं थी । पुलिस की भूमिका संदिग्ध नजर आती है । बहुत अबोधपने से पुलिस ने चार्टशीट तैयार की, मस्तिष्क का बिलकुल उपयोग नहीं किया—अदालत का कीमती टाइम ख़राब किया, इसके लिए पुलिस इंस्पेक्टर संतोष परमार को पनिशमेंट किया जाता है । अगले पांच वर्ष तक वह किसी केस के मुख्य जांच अधिकारी नहीं रहेंगे ।

मौजूदा केस के दोनों अभियुक्तों को अदालत बाइज्जत बरी करती है और पुलिस द्वारा उन्हें व्यथित करने के लिए क्षमा मांगती है ।”

जज ने अपना फैसला पढ़कर फैसले पर साइन कर दिये और वे उठकर खड़े हो गये ।

डॉली और ऋषभ ने एक दूसरे को विजयी मुस्कान के साथ देखा ।

कक्ष में मौजूद इंस्पेक्टर संतोष परमार का चेहरा निचुड़ चुका था । फक्क पड़ा था चेहरा । उसे एसआई अखिलेश पर बेइन्तिहा गुस्सा आ रहा था । सब उसी की जिद और नादानी चलते हुआ था । संतोष परमार की इतनी गलती थी की उसने अखिलेश पर यकीन कर लिया था ।

☐☐☐

इस फैसले के चार दिन बाद डॉली और ऋषभ ने मैरिज रजिस्ट्रार के यहां आवेदन दिया । दोनों के बयान के बाद कोर्ट ने उनकी शादी पर मुहर ठोक दी ।

राज के पिता चन्द्रभान सिंह डॉली के साथ थे । शन्नो कुमारी बहुत खुश नहीं थी लेकिन नाराजगी भी प्रकट नहीं कर रही थी ।

बस चुपचुप थी ।

अब उसकी नाराजगी प्रकट करने का अर्थ भी नहीं था । डॉली उसकी एक नहीं सुनने वाली थी, बल्कि जरूरत पड़ती तो वह उसको फटकार भी लगा सकती थी । इसलिए शन्नो कुमारी चुप थी ।

जब गले में मालायें डाले ऋषभ और डॉली बाहर निकले तो इंस्पेक्टर संदीप नाइक सिविल ड्रेस में उन्हें खड़ा मिला ।

उसे देखकर डॉली की आंखें छलक उठीं । अनायास वह चरणों में झुक गयी । नाइक ने गले से लगा लिया ।

“भैया—SSS ।” सिसकती हुई डॉली उससे चिपट गयी और भर्राये गले से बोली—“आप मेरे लिए भगवान हैं । अगर आप समय-समय पर हमें गाइड नहीं करते तो आज हम कहीं के नहीं रहते । जिंदगी तबाह-बरबाद थी हमारी—भैया आप इंसान नहीं देवता हैं ।”

नाइक ने उसे अपने सामने किया । अपनी हथेली से उसके आंसू पोंछे और बोला—“तुम्हारे आर्तनाद और चीत्कार ने भगवान का दिल पिघला दिया था, तभी भगवान ने मुझे तुम्हारी मदद के लिए दृढ़ किया और मैंने सबकुछ दांव पर लगाकर तुम्हारी मदद की—आज मुझे बहुत सुकून हासिल है । मैंने अपनी ड्यूटी के साथ वफा की—मेरे हाथों दो जिंदगियां महफूज हुईं—कुदरत का इंसाफ कायम हुआ—अब तुम लोग अपनी खूबसूरत जिंदगी का आगाज करो, मेरी दुआएं तुम्हारे साथ हैं— ।”

एक क्षण ठहरकर वह पुनः बोला—“संयोग से वही किन्नर अगर तुम्हारी शादी में नाचने आ जाये तो इस बार उसे पहचानने का अभिनय मत करना, हो सकता है वो तुम्हारे दोबारा सिलवाये हुए कपडे ही पहनकर आ जाये ।” कहकर नाइक हंसा ।

प्रयुत्तर में वे दोनों भी हंसे ।

दोनों पुनः चरणों में झुक गये ।

नाइक ने दोनों के सिर पर हाथ रखा ।

फिर दोनों को अपने आजू-बाजू लिया और गर्वोक्ति के भाव के साथ एक फोटोग्राफर से उस क्षण को कैमरे में कैद करवाया ।

वो क्षण वही ठहर गया था ।

(समाप्त)
 

Similar threads

S
Replies
65
Views
66
StoryPublisher
S
Back
Top